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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

४० नीतिवाक्यामृतम् अविवेकपूर्ण दण्डनीति से राज्य की क्षति— दुष्प्रणीतो हि दण्डः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाद्वा सर्वविद्वेषं करोति ॥६॥ काम-क्रोध के वशीभूत होकर अथवा अज्ञानवश दिये गये दण्ड से राजा से समस्त प्रजा विद्वेष करने लगती है। अप्रणीतो हि दण्डो मात्स्यन्यायमुत्पादयति ॥ ७ ॥ यथा दोष दण्ड न देने से राज्य में 'मात्स्य-न्याय' की प्रवृत्ति होती है। मात्स्य न्याय क्या है— बलीयानबलं ग्रसति इति मात्स्यन्यायः ॥ ८ ॥ जिस प्रकार जल में बड़ी मछली छोटी मछलियों को खा जाती है उसी प्रकार दण्ड का डर न होने पर बलवान् निर्बल को सताते हैं। यही मात्स्य न्याय है। इति दण्डनीतिसमुद्देशः। १०. मन्त्रिसमुद्देशः अहार्यबुद्धि राजा का लक्षण— मन्त्रिपुरोहितसेनापतीनां यो युक्तमुक्तं करोति स अहार्यबुद्धिः ॥१॥ मन्त्री, पुरोहित और सेनापति इनकी युक्तियुक्त बात को जो राजा मानता है वह 'अहार्य बुद्धि होता है। अर्थात् शत्रुओं द्वारा वह बुद्धिबल में परास्त नहीं होता। सत्सङ्गति का माहात्म्य— असुगन्धमपि सूत्रं कुसुमसंयोगात् किन्नारोहति देवशिरसि ॥ २ ॥ डोरे में यद्यपि सुगन्ध नहीं होता तथापि क्या वह फूल के सम्पर्क से देव- ताओं के शिर पर नहीं चढ़ता। महद्भिः पुरुषैः प्रतिष्ठितोऽश्मापि भर्वात देवः कि पुनर्मनुष्यः ॥ ३ ॥ महान् पुरुषों से प्रतिष्ठित पाषाण भी देवत्व को प्राप्त होता है तो फिर मनुष्य का क्या कहना है। अर्थात् क्षुद्र मनुष्य भी महत् पुरुषों के संयोग से महत्त्व को प्राप्त होता है। तथा चानुभूयते विष्णुगुप्तानुग्रहादनधिकृतोपि किल चन्द्रगुप्तः साम्राज्यपदमवापेति ॥ ४ ॥ जैसा कि इतिहास बताता है कि चंद्रगुप्त राज्य पद के लिये अनधिकारी होते हुए भी विष्णुगुप्त की कृपा से साम्राज्य पद को प्राप्त कर सका। मन्त्रिपद के लिये अपेक्षित योग्यता— ब्राह्मणक्षत्रियविशामेकतमं स्वदेशजमाचाराभिजनविशुद्धमव्यसनिन-

मन्त्रिसमुद्देशः ४१ मव्यभिचारिणमधीताखिलव्यवहारतन्त्रमखङ्गमशेषोपधिविशुद्धं च मन्त्रिणं कुर्वीत ॥ ५ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में से किसी एक को जो अपने देश का हो, आचार व्यवहार और वंश से विशुद्ध हो, व्यसनी न हो, व्यभिचारी न हो, समस्त व्यवहार शास्त्र अर्थात् नीति और धर्मशास्त्र को पढ़ा हुआ हो, अस्त्र-शस्त्र जानने वाला हो और समस्त छल-छद्म से रहित हो, ऐसे व्यक्ति को मन्त्री बनाना चाहिये । स्वदेश प्रेम का गौरव — समस्तपक्षपातेषु स्वदेशपक्षपातो महान् ॥ ६ ॥ समस्त पक्षपातों में अपने देशका पक्षपात् महान् है। अर्थात् मन्त्री अपने देश का हो इसका सर्वप्रथम ध्यान रखना चाहिये । दुराचार निन्दा— विषनिषेक इव दुराचारः सर्वान् गुणान् दूषयति ॥ ७ ॥ विष सिञ्चन की भांति दुराचार सब गुणों को दूषित कर देता है। अकुलीन मन्त्री का दोष — दुष्परिजनो मोहेन कुतोऽप्यपकृत्य न जुगुप्सते ॥ ८ ॥ अकुलीन मन्त्री राजा का घृणित अपराध करके मूर्खता वश लज्जा का अनुभव नहीं करता, (परिजन का अर्थ यहां नौकर चाकर न करके प्रसङ्ग वश कुल किया गया है) । व्यसनी मन्त्री से राजा की क्षति— सव्यसनसचिवो राजा आरूढव्यालगज इव नासुलभोऽपायः ॥ ६ ॥ व्यसन शील मन्त्री वाले राजा का नाश दुष्ट हाथी पर चढ़ने वाले की तरह दुर्लभ नहीं होता अर्थात् शीघ्र ही संभव होता है । किं तेन केनापि यो विपदि नोपतिष्ठते ॥ १० ॥ जो विपत्ति में सहायक नहीं होता उससे क्या लाभ । भोज्येऽसम्मतोऽपि हि सुलभो लोकः ॥ ११ ॥ भोजन के लिये तो अनिमन्त्रित लोग भी सुलभ हो जाते हैं। अर्थात् सुख के साथी बिना ढूंढ़े भी मिल जाते हैं, पर दुःख के साथी नहीं होते। किं तस्य भक्त्या यो न वेत्ति स्वामिनो हितोपायमहितप्रती- कारं वा ॥ १२ ॥ जो मन्त्री राजा की भलाई का और बुराई को दूर करने का उपाय न जानता हो उसकी भक्ति से क्या लाभ ।

४२ नीतिवाक्यामृतम् असमर्थ अस्त्रवेत्ता की अनुपयोगिता— किं तेन सहायेनास्त्रज्ञेन मन्त्रिणा यस्यात्मरक्षणेऽप्यङ्गं न प्रभ- वति ॥ १३ ॥ उस अस्त्र वेत्ता सहायक मन्त्री से क्या लाभ जिसका अङ्ग आत्मरक्षा में भी समर्थ न हो । उपधा का लक्षण— धर्मार्थकामभयेषु व्याजेन परचित्तपरीक्षणमुपधा ॥ १४ ॥ धर्म, अर्थ, काम और भय के विषय में गुप्तचर के द्वारा किसी व्याज से शत्रु राजा के चित्त की परीक्षा 'उपधा' है ( 'उपधा' राजा के मन्त्री के लिये गुण है ) । सोदाहरण अकुलीन मन्त्री के दोष— अकुलीनेषु नास्त्यपवादाद् भयम् ॥ १५ ॥ जो मन्त्री कुलीन नहीं है उसे लोक निन्दा का भय नहीं होता अतः वह राजा का कोई भी अहित कर सकता है । अलर्कविषवत् कालं प्राप्य विकुर्वते विजातयः ॥ १६ ॥ पागल कुत्ते के विष के समान विजातीय मन्त्री समय पाकर विरोध करते हैं । विशेषार्थ—जिस प्रकार पागल कुत्ते का विष कुछ समय बाद वर्षाकाल में अपना विकृत रूप प्रदर्शित करता है उसी प्रकार दूसरी जाति का मन्त्री कुछ समय तक राजा के अनुकूल चलकर बाद में प्रतिकूल हो सकता है । कुलीनता का गुण— तदमृतस्य विषत्वं यः कुलीनेषु दोषसंभवः ॥ १७ ॥ कुलीन पुरुष अथवा मन्त्री में विश्वासघात आदि दोषों का होना अमृत के विष हो जाने के समान है । अर्थात् असंभव है । ज्ञानी होने पर भी मन्त्री के ज्ञान की व्यर्थता— घटप्रदीपवत्तज्ज्ञानं मन्त्रिणो यत्र न परप्रतिबोधः ॥ १८ ॥ जिस प्रकार घड़े के भीतर जलाया गया दीपक बाहर अपना प्रकाश नहीं प्रसारित कर सकता, अतः व्यर्थ होता है उसी प्रकार मन्त्री अथवा किसी विद्वान् का वह ज्ञान व्यर्थ है जो राजा अथवा अन्य व्यक्ति का प्रतिबोध न कर सके अर्थात् अपनी बात दूसरों को समझा सकने की कला यदि मनुष्य में नहीं है तो उसका ज्ञानी होना व्यर्थ है । सभीत मन्त्री की व्यर्थता— तेषां शस्त्रमिव शास्त्रमपि निष्फलं येषां प्रतिपक्षदर्शनाद् भयमन्व- यन्ति चेतांसि ॥ १६ ॥

मन्त्रिसमुद्देशः ४३ शस्त्र की तरह उन लोगों का वह शास्त्र ज्ञान भी व्यर्थ है जिन लोगों का चित्त प्रतिपक्षी अथवा प्रतिद्वन्द्वी को देखने से भयाकुल हो जाता है । तच्छस्त्रं शास्त्रं वात्मपरिभवाय यन्न हन्ति परेषां प्रसरम् ॥ २० ॥ जो शस्त्र अथवा शास्त्र दूसरे के आक्रमण को न रोक सके वह अपने ही अनादर का कारण होता है । नहि गली बलीवर्दो भारकर्मणि केनापि युज्यते ॥ २१ ॥ बोझा ढोने के लिये सुस्त बैल को कोई नहीं उपयोग में लाता । विशेषार्थ—प्रसंगानुकूल यहां यह अर्थ है कि स्वस्थ सबल तथा अन्य बातों से युक्त मन्त्री यदि उत्साह सम्पन्न और स्फूर्ति से युक्त नहीं है, कार्यों में विलम्ब करता है तो राजा को उसे नहीं रखना चाहिए । राजा के लिये मन्त्रणा की आवश्यकता— मन्त्रपूर्वः सर्वोऽप्यारम्भः क्षितिपतीनाम् ॥ २२ ॥ राजाओं को अपना समस्त कार्य मन्त्रियों से परामर्श पूर्वक ही प्रारम्भ करना चाहिए । मन्त्र-बल की उपयोगिता— अनुपलब्धस्य ज्ञानम् , उपलब्धस्य निश्चयः, निश्चितस्य बलाधानम् , अर्थस्य द्वैधस्य संशयच्छेदनम् , एकदेशलब्धस्याशेषोपलब्धिरिति मन्त्र- साध्यमेतत् ॥ २३ ॥ अप्राप्त वस्तु, भूमि, देश कोष आदि का अनुसन्धान, उपलब्ध के विषय में पूर्ण निश्चयात्मक ज्ञान, निश्चित के विषय में भी प्रमाणान्तरों से पुष्टि करना, संशयात्मक विषय में संशय दूर करना; किसी वस्तु, भूमि, देश आदि का एक भाग प्राप्त हो जाने पर पूर्ण की प्राप्ति करना यह सब काम मन्त्रणा से सिद्ध होते हैं । योग्य मन्त्री का लक्षण— अकृतारम्भस्यारम्भमारब्धस्याप्यनुष्ठानमनुष्ठितस्य विशेषविनियोग- सम्पदं च ये कुर्युस्ते मन्त्रिणः ॥ २४ ॥ बिना किये हुए अर्थात् नये-नये कार्यों का प्रारम्भ करना, प्रारम्भ किये गये कार्यों का चालू रखना, और किये हुए अर्थात् पूर्ण कार्यों में उस के उपयोग की और व्यवहार की विशेषता बतलाना-इतना जो कर सकें वे मन्त्री होने योग्य हैं । मन्त्रणा के अङ्ग— कर्मणामारम्भोपायः, पुरुषद्रव्यसम्पद्, देशकालविभागोविनिपात- प्रतीकारः कार्यसिद्धिश्चेति पञ्चाङ्गो मन्त्रः २५ ॥

४४ नीतिवाक्यामृतम् विविध कार्यों को प्रारम्भ करने के साधन और युक्तियों को जानना, पुरुष अर्थात् सैन्यबल और द्रव्य अर्थात् कोष बल को रखना, देश और काल विभाग अर्थात् अनुकूल और प्रतिकूल समय तथा स्थान का ध्यान रखना, आनेवाली आपत्ति को दूर करने के उपाय कर लेना और कार्य सिद्धि को परमलक्ष्य बनाना यह पांच मन्त्रणा के अङ्ग हैं । मन्त्रणा के योग्य स्थान— आकाशप्रतिशब्दवति चाश्रये मन्त्रं न कुर्यात् ॥ २६ ॥ चारों ओर से खुले हुये स्थान में तथा जहां प्रतिध्वनि होती हो ऐसे स्थानों पर मन्त्रणा नहीं करनी चाहिए । मुखविकारकराभिनयाभ्यां प्रतिध्वानेन वा मनःस्थमप्यर्थमभ्यूहन्ति विचक्षणाः ॥ २७ ॥ मुख की चेष्टाओं और हाथ के अभिनयअर्थात् घुमाने फिराने से तथा प्रतिध्वनि अर्थात् शब्दों की गूंज से भी चतुर पुरुष मन की बात जान लिया करते हैं । मन्त्रणा को गुप्त रखने की अवधि— आकार्यसिद्धेरक्षितव्यो मन्त्रः ॥ २८ ॥ जब तक कार्य सिद्ध न हो जाय तब तक अपनी मन्त्रणा (सलाह- मशविरा ) को गुप्त रखना चाहिए । मन्त्रणा के लिये आवश्यक विचार— दिवानक्तं चाऽपरीक्ष्य मन्त्रयमाणस्याभिमतः प्रच्छन्नोवा भिनत्ति मन्त्रम् ॥ २९ ॥ रात और दिन का विचार न करके मन्त्रणा करने वाले की गुप्त मन्त्रणा का रहस्य अपने अनुकूल व्यक्ति अथवा इधर उधर छिपे हुए व्यक्ति प्रकट कर देते हैं । श्रूयते किल रजन्यां वटवृक्षे प्रच्छन्नो वररुचिः—अ-प्र-शि-ख-इति पिशाचेभ्यो वृत्तान्तमुपश्रुत्य चतुरक्षराद्यैः पादैः श्लोकमेकं चकारेति ॥३०॥ ऐसा सुना जाता है कि रात्रि के समय वट-वृक्ष के ऊपर छिपकर बैठे हुए वररुचि ने पिशाचों के द्वारा "अ-प्र-शि-ख" इन चार अक्षरों से सम्बन्धित वृत्तान्त सुनकर इन चार अक्षरों से प्रारम्भ होने वाले चार पादों के एक श्लोक की रचना की, अनेन तव पुत्रेण प्रसुप्तस्य वनान्तरे । शिखामाक्रम्य पादेन, खड्गेनोपहृतं शिरः ॥ अन्तर्गत कथा :

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri मन्त्रिसमुद्देशः ४५ नन्द राजा का पुत्र हिरण्यगुप्त शिकार खेलते खेलते वनमें दूर निकल गया और रात को घर न लौट सका। उसने वहां सोते हुए अपने एक मित्र को खड्ग से मार डाला। मरते समय उस मित्रने 'अप्रशिख' इन चार अक्षरों का उच्चारण किया और उसकी मृत्यु हो जाने पर राजकुमार को पश्चात्ताप हुआ और वह पागल हो गया। राजदूत जब उसे महल में लाये तो उसका पिता नन्द उसकी विक्षिप्तावस्था देखकर बड़ा दुःखी हुआ। उसके द्वारा प्रतिक्षण उच्चारित अ-प्र-शि-ख इन चार अक्षरों को सुनकर उसका अर्थ जानने के लिये वह चिन्तित रहने लगा। अनन्तर उसके मन्त्री वररुचि ने वन में जाकर प्रच्छन्न रूप से बरगद के वृक्ष पर बैठकर पिशाचों द्वारा आपस की वार्ता में इस प्रसङ्ग को पूर्ण रूपसे जान लिया और उपर्युक्त श्लोक बनाकर राजा को सुनाया और अर्थ समझाया कि तुम्हारे इस पुत्र ने वन में सोए हुए मित्र की शिखा पैर से दबाकर तलवार से उसका सिर काट डाला। मन्त्रणा के अयोग्य व्यक्ति— न तैः सह मन्त्रं कुर्यात् येषां पक्षीयेष्वपकुर्यात् ॥ ३१ ॥ जिनके पक्ष के लोगों के साथ कोई अहित कार्य किया हो उनके साथ परामर्श न करे। अनायुक्तो मन्त्रकाले न तिष्ठेत् ॥ ३२ ॥ मन्त्रणा के समय ऐसा कोई भी व्यक्ति वहां न रहे जिसको बुलाया न गया हो। तथा च श्रूयते शुक·सारिकाभ्यामन्यैश्च तिर्यग्भिर्मन्त्रभेदः कृतः ॥ ३३ ॥ सुना जाता है कि तोता, मैना तथा अन्य पशु-पक्षियों ने भी मन्त्रणा का रहस्य प्रकट कर दिया। मन्त्र-भेद से उत्पन्न दोष की कठिनाई— मन्त्रभेदादुत्पन्नं व्यसनं दुष्प्रतिविधेयं स्यात् ॥ ३४ ॥ मन्त्रणा का रहस्य प्रकट हो जाने से उत्पन्न संकट बहुत कठिनाई से दूर होता है। मन्त्र-भेद के कारण— इङ्गितमाकारो मदः प्रमादो निद्रा च मन्त्रभेदकारणानि ॥ ३५ ॥ इङ्गित (हाथ, आँख आदि का इशारा) मुख और शरीर की आकृति, मदपान, असावधानी और निद्रा ये पाँच मन्त्रभेद के मुख्य कारण हैं। मन्त्रभेद के कारणों के लक्षण— इङ्गितमन्यथावृत्तिः ॥ ३६ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

४६ नीतिवाक्यामृतम् हृदय के आशय को प्रकट करनेवाली चेष्टा इङ्गित है । कोपप्रसादजनिता शारीरी विकृतिराकारः ॥ ३७ ॥ क्रोध अथवा हर्ष के कारण उत्पन्न शारीरिक विकार का नाम आकार है। पानस्त्रीसंगादिजनितो हर्षो मदः ॥ ३८ ॥ मदपान और स्त्रीसंभोग आदि से उत्पन्न हर्ष मद है। प्रमादो गोत्रस्खलनादिहेतुः ॥ ३९ ॥ नाम आदि के कहने में अक्षरों का उल्टा सीधा हो जाना प्रमाद है। अन्यथा चिकीर्षतोऽन्यथावृत्तिर्वा प्रमादः ॥ ४० ॥ अथवा कुछ करना चाहते हुए कुछ दूसरा करना प्रमाद है। निद्रान्तरितो निद्रितः ॥ ४१ ॥ निद्रा के अधीन हो जाना निद्रितावस्था है। मन्त्रणा के पश्चात् अविलम्ब कार्य की आवश्यकता— उद्धृतमन्त्रो न दीर्घसूत्रः स्यात् ॥ ४२ ॥ मन्त्रणा कर लेने के अनन्तर उसके आचरण में विलम्ब न करे । प्रयोग के बिना मन्त्र व्यर्थ है— अनुष्ठानेच्छां विना केवलेन किं मन्त्रेण ॥ ४३ ॥ प्रयोग में लाने की इच्छा के बिना केवल मन्त्रणा से कोई लाभ नहीं होता । न ह्यौषधपरिज्ञानादेव व्याधिप्रशमः ॥ ४४ ॥ केवल औषध जान लेने मात्र से व्याधि की शान्ति नहीं हो जाती । अविवेक की निन्दा— नास्त्यविवेकात् परः प्राणिनां शत्रुः ॥ ४५ ॥ अविवेक से बढ़कर प्राणियों का शत्रु दूसरा नहीं है। स्वयं कार्य करने की आवश्यकता— आत्मसाध्यमन्येन कारयन्नौषधमूल्यांदेव व्याधिं चिकित्सति ॥४६॥ अपने से किया जा सकने योग्य कार्य दूसरों से कराना औषध के मूल्य मात्र के द्वारा रोग को दूर करने की इच्छा के समान व्यर्थ है। सहयोगी के हानिलाभ का अपने ऊपर प्रभाव— यो यत्प्रतिबद्धः स तेन सहोदयव्ययी ॥ ४७ ॥ जो जिससे सम्बद्ध है, उसका उसीके साथ वृद्धि और ह्रास होता है। स्वामी की शक्ति ही सेवक को सबल निर्बल बनाती है— स्वामिनाधिष्ठितो मेषोऽपि सिंहायते ॥ ४८ ॥

मन्त्रिसमुद्देशः ४७ स्वामी के द्वारा सुप्रतिष्ठित भेड़ा भी सिंह के समान बली हो जाता है । मन्त्रणा के समय ध्यान देने योग्य बातें— मन्त्रकाले विगृह्य विवादः स्वैरालापश्च न कर्त्तव्यः ॥ ४९ ॥ मन्त्रणा के समय मन्त्रियों को परस्पर झगड़कर विवाद और मनमानी बातचीत न करनी चाहिए । मन्त्रणा के योग्य व्यक्ति— अविरुद्धैरस्वैरैर्विहितो मन्त्रो, लघुनोपायेन महतः कार्यस्य सिद्धि- र्मन्त्रफलम् ॥ ५० ॥ जो परस्पर विरोधी और ईर्ष्या-द्वेष वाले न हों तथा बहुत स्वच्छन्द आचरणवाले न हों उनके साथ परामर्श मन्त्रणा है और लघु साधनों से भी महान् कार्य सिद्धि मन्त्रणा का फल है । न खलु तथा हस्तेनोत्थाप्यते ग्रावा यथा दारुणा ॥ ५१ ॥ पत्थर हाथ से उस प्रकार नहीं उठाया जा सकता जैसा कि लकड़ी के सहारे से । राजा की इच्छा मात्र का अनुसरण करना मन्त्री का दोष है— स मन्त्री शत्रुर्यो नृपेच्छयाऽकार्यमपि कार्यरूपतयाऽनुशास्ति ॥५२॥ वह मन्त्री नहीं शत्रु है जो राजा की इच्छा देखकर अकार्य को भी कार्य बतलाता है । वरं स्वामिनो दुःखं न पुनरकार्योपदेशेन तद्विनाशः ॥ ५३ ॥ इच्छा के विघात से स्वामी को दुःख होना अच्छा है, किन्तु न करने योग्य काम का उपदेश देकर उसका विनाश करना उचित नहीं है । पीयूषमपिबतो बालस्य किं न क्रियते कपोलहननम् ॥ ५४ ॥ अमृत अथवा अमृत के समान हितकारी औषध आदि को पीना न चाहने वाले बच्चे को क्या माता गाल में थप्पड़ लगाकर नहीं पिलाती । मन्त्री की किसी से घनिष्ठता अनुचित है— मन्त्रिणो राजद्वितीयहृदयत्वान्न केनचित् सह संसर्गं कुर्युः ॥ ५५ ॥ मन्त्रिगण राजा के दूसरे हृदय-रूप होते हैं अतः उनको किसी के साथ घनिष्ठ स्नेह आदि नहीं रखना चाहिए । राजा और मन्त्री का एकचित्त होना— राज्ञोऽनुग्रहविग्रहावेव मन्त्रिणामनुग्रहविग्रहौ ॥ ५६ ॥ राजा की ही अनुकूलता और प्रतिकूलता मन्त्रियों की अनुकूलता प्रतिकू- लता है अर्थात् राजा जिस पर कृपा करे अथवा जिससे द्वेष करे मन्त्रियों के लिये भी वे ही ग्राह्य और अग्राह्य होने चाहिएं ।

४८ नीतिवाक्यामृतम् राजा के भाग्यदोष का अवसर— म दैवस्यापराधो न मन्त्रिणां यत् सुघटितमपिकार्यं न घटते ॥५७॥ जब मन्त्रियों द्वारा सुविचारित और सुनियोजित कार्य सिद्ध न हो तब उसमें मन्त्रियों का नहीं किन्तु दैव अर्थात् राजा का भाग्य दोष समझना चाहिए। मन्त्री की उपेक्षा का दोष— स खलु को राजा यो मन्त्रिणोऽतिक्रम्य वर्त्तेत ॥ ५८ ॥ वह राजा राजा नहीं है जो मन्त्रियों के परामर्श का उल्लंघन करके व्यवहार करता है। अर्थात् हितैषी मन्त्रियों की बातें न मान कर चलने वाला राजा अपना राज्य खो बैठता है। कार्यसिद्धि के लिये सुविचारित मन्त्रणा की आवश्यकता— सुविवेचिताद् मन्त्राद् भवत्येव कार्यसिद्धियदि स्वामिनो न दुराग्रहः स्यात् ॥ ५६ ॥ राजा यदि हठी नहीं होता तो सुविचारित मन्त्रणा से कार्य सिद्धि अवश्य होती है। राजा के लिये पुरुषार्थ की आवश्यकता— अविक्रमतो राज्यं वणिक् खड्गयष्टिरिव ॥ ६० ॥ राजा यदि पराक्रम का प्रदर्शन नहीं करता तो उस का राज्य बनिये की तलवार के समान है। विशेषार्थ—व्यापारी आदमी तलवार चलाने में कुशल नहीं हो सकता अतः उसके पास तलवार का होना व्यर्थ होता है उसी प्रकार राजा भी यदि कुछ पौरुष न प्रदर्शित करे तो उसका राज्य व्यर्थ है। नीति शास्त्र की उपयोगिता— नीतिर्यथावस्थितमर्थमुपलम्भयति ॥ ६१ ॥ नीति-ज्ञान के द्वारा यथार्थ विषय का अर्थात् कर्त्तव्याकर्त्तव्य का ज्ञान हो जाता है। पुरुषार्थ के लाभ— हिताहितप्राप्तिपरिहारौ पुरुषकारायत्तौ ॥ ६२ ॥ हित की प्राप्ति और अहितकापरित्याग अपने पुरुषार्थ के अधीन है। समय से कार्य करने की आवश्यकता— अकालसहकार्यम् अद्यश्वीनं न कुर्यात् ॥ ६३ ॥ विलम्ब से बिगड़ जाने वाले कार्य में आज कल आज-कल करता हुआ विलम्ब न करे। अर्थात् कार्य समय से ही कर डालने पर ठीक होता है।

मन्त्रिसमुद्देशः ४६ कालातिक्रमण से कार्यसिद्धि में कठिनता— कालातिक्रमान्नखच्छेद्यमपि कार्यं भवति कुठारच्छेद्यम्॥ ६४॥ समय का उल्लङ्घन करने से नाखून से काटी जा सकने वाली चीज भी कुल्हाड़ी से काटने योग्य बन जाती है अर्थात् कार्य करने का समय बीत जाने पर सरल कार्य भी अत्यन्त कठिन हो जाता है। समझदार की पहिचान— को नाम सचेतनः सुखसाध्यं कार्यं कृच्छ्रसाध्यमसाध्यं वा. कुर्यात्॥ ६५॥ कौन समझदार व्यक्ति सरलता से सिद्ध हो जाने वाले काम को कठिनाई से सिद्ध होने वाला अथवा असाध्य बनावेगा । मन्त्रियों की संख्या के विषय में छह सूत्र— एको मन्त्री न कर्त्तव्यः ॥ ६६ ॥ राजा को एक मन्त्री नहीं रखना चाहिए । एको हि मन्त्री निरवग्रहश्चरति मुह्यति च कार्येषु कृच्छ्रेषु ॥ ६७ ॥ अकेला मन्त्री निरंकुश एवं स्वतन्त्र हो जातां है और कठिन काम आ पड़ने पर मोह-अज्ञान में पड़ जाता है समझ नहीं पाता कि क्या करे । द्वावपि मन्त्रिणौ न कार्यों ॥ ६८ ॥ दो मन्त्री भी न बनावे । द्वौ मन्त्रिणौ संहतौ राज्यं विनाशयतः ॥ ६६ ॥ दो मन्त्री परस्पर में सलाह करके राज्य का नाश कर डालते हैं। निगृहीतौ तौ तं विनाशयतः ॥ ७० ॥ यदि उन दोनों को दण्ड दिया जाता है तो वे राजा को ही नष्ट कर देते हैं। अतः— त्रयः पञ्च सप्त वा मन्त्रिणस्तैः कार्याः ॥ ७१ ॥ अतः, तीन पांच अथवा सात मन्त्री राजा को रखना चाहिए । मन्त्रियों में एकता की आवश्यकता— विषमपुरुषसमूहदुर्लभमैकमत्यम् ॥ ७२ ॥ परस्पर प्रतिकूल विचार वाले पुरुषों-मन्त्रियों का एकमत हो जाना कठिन होता है ! परस्पर द्वेषी मन्त्रियों के दोष— बहवो मन्त्रिणः स्वमतीरुत्कर्षयन्ति ॥ ७३ ॥ अनेक मन्त्री अपनी-अपनी राय-बात को उत्कृष्ट सिद्ध करना चाहते हैं और इस आपस की खींचतान से राजा का काम बिगड़ता है। ४ नी० Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

५० नीतिवाक्यामृतम् मन्त्रियों की स्वतन्त्र प्रकृति का दोष — स्वच्छन्दाश्च न विजृम्भन्ते ॥ ७४ ॥ अनेक स्वतन्त्र प्रकृति के मन्त्री परस्पर एकमत नहीं होते । करने योग्य कार्य — यद्बहुगुणमनपायबहुलं भवति तत्कार्यमनुष्ठेयम् ॥ ७५ ॥ ऐसा कार्य करना चाहिए जिसमें गुण बहुत हों और विनाश की सम्भा- वना न हो । दृष्टान्त— तदेव भुज्यते यदेव परिणमति ॥ ७६ ॥ जो वस्तु सुगमता से पच जाने वाली होती है वही खाई जाती है । विशेषार्थ—भोजन के दृष्टान्त से यहां राजा और मनुष्य को कर्त्तव्य का उपदेश दिया गया है कि जिसका परिणाम मङ्गलकारी हो, अपयश आदि न हो वही कार्य करना चाहिए । यथावर्णित गुण के एक दो मन्त्री से भी कार्य निर्वाह— यथोक्तगुणसमवायिन्येकस्मिन् युगले वा मन्त्रिणि न कोऽपि दोषः ॥ ७७ ॥ इस उद्देश्य के पांचवें सूत्र में वर्णित गुण समूह यदि एक या दो मन्त्री में मिलते हों तो ऐसे गुण सम्पन्न एक या दो मन्त्री भी रखने में दोष नहीं है । दृष्टान्त — न हि महानप्यन्धसमवायो रूपमुपलभेत ॥ ७८ ॥ अन्धों का झुण्ड भी रूप ग्रहण करने में समर्थ नहीं होता अर्थात् मन्त्री संख्या में बहुत हों पर मूर्ख हों तो उनसे कोई लाभ नहीं । दृष्टान्त— अवार्यवीर्यौ धुर्यौ किन्न महति भारे नियुज्येते ॥ ७६ ॥ क्या उद्दाम बल वाले दो बैल महान् भारवहन के लिये नहीं नियुक्त होते ? राजा के लिये अनेक सहायकों की आवश्यकता— बहुसहाये राज्ञि प्रसीदन्ति सर्व एव मनोरथाः ॥ ८० ॥ जिस राजा के बहुत से सहायक होते हैं उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं । उक्त मत का समर्थन — एको हि पुरुषो केषु कार्येष्वात्मानं विभजते ॥ ८१ ॥

मन्त्रिसमुद्देशः ५१ अकेला आदमी कितने कार्यों के लिये अपने को विभाजित कर सकता है ? अर्थात् एक व्यक्ति राज्य के नानाप्रकार के कार्यों की स्वयं देख-भाल नहीं कर सकता अतः सहायकों का होना आवश्यक है । दृष्टान्त— किमेकशाखस्य शाखिनो महती भवतिच्छाया ॥ ८२ ॥ क्या एक शाखा वाले वृक्ष की विशाल छाया होती है । अवसर की अपेक्षा से कार्य करना अनुचित है— कार्यकाले दुर्लभः पुरुषसमुदायः ॥ ८३ ॥ अवसर पड़ने पर अर्थात् आपत्ति आ जाने पर पुरुष समुदाय अर्थात् सहायकों का मिलना दुर्लभ होता है । अतः सहायकों का संग्रह पहले से करना चाहिए । दृष्टान्त— दीप्ते गृहे कीदृशं कूपखननम् ॥ ८४ ॥ घर में आग लग जाने पर कुआं खोदना कहाँ तक उचित है ? धनकी अपेक्षा सहायक संग्रह की उत्तमता— न धनं पुरुषसंग्रहाद् बहु मन्तव्यम् ॥ ८५ ॥ धन को सहायक पुरुषों के संग्रह से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए । अर्थात् धन बटोरने की अपेक्षा सहायकों का संग्रह अच्छा है । दृष्टान्त द्वारा समर्थन— सत्क्षेत्रे बीजमिव पुरुषेषूप्तं कार्यं शतशः फलति ॥ ८६ ॥ अच्छे खेत में बोये गये बीज से जिस प्रकार बहुत अन्न उत्पन्न होता है उसी प्रकार अच्छे सहायकों में बांटा गया कार्य सुन्दर फल देता है । कार्य पुरुष का लक्षण— बुद्ध्यावर्थे युद्धे च ये सहायास्ते कार्यपुरुषाः ॥ ८७ ॥ बुद्धि अर्थात् सन्मति और सत्परामर्श, धन तथा संग्राम में सहायता देने वाले पुरुष कार्य पुरुष अर्थात् काम के आदमी होते हैं । समर्थन— खादनवेलायां को नाम न सहायः ॥ ८८ ॥ खाने के समय कौन नहीं सहायक होता है । मूर्ख के साथ मन्त्रणा का निषेध— श्राद्ध इवाश्रोत्रियस्य न मन्त्रे मूर्खस्याधिकारोऽस्ति ॥ ८९ ॥ श्राद्ध में जिस प्रकार अश्रोत्रिय ब्राह्मण का अधिकार नहीं है उसी प्रकार मन्त्रणा देने के लिये मूर्ख को भी अधिकार नहीं है ।

५२ नीतिवाक्यामृतम् दृष्टान्त द्वारा समर्थन— किं नामान्धः पश्येत् ॥ ६० ॥ अन्धा क्या देखेगा ? । द्वितीय दृष्टान्त— किमन्धेनाकृष्यमाणोऽन्धः समं पन्थानं प्रतिपद्यते ॥ ६१ ॥ क्या अन्धे के सहारे चलता हुआ अन्धा सम-मार्ग को पा सकता है ? समर्थन— तदन्धवर्त्तकीयं काकतालीयं वा यन्मूर्खमन्त्रात् कार्यसिद्धिः ॥ ६२ ॥ मूर्ख पुरुष की मन्त्रणा से कभी-कभी कार्य का सिद्ध हो जाना संयोग वश अन्धे के हाथ बटेर आ जाने के तथा स्वयं गिरते हुए ताड़ के फल पर अक- स्मात् कौवे के बैठ जाने के समान है । समर्थन-- स घुणाक्षरन्यायो यन्मूर्खेषु मन्त्रपरिज्ञानम् ॥ ६३ ॥ मूर्ख को मन्त्रणा का ज्ञान घुणाक्षरन्याय के समान है। लकड़ी का कीड़ा 'घुन' स्वेच्छा से लकड़ी खाता है उसमें कभी संयोग-वश किसी अक्षर की आकृति बन जाना जैसे सार्वकालिक या घुन की स्वाभाविक कला नहीं होती उसी प्रकार संयोग वश कभी ही मूर्ख अच्छी सलाह दे सकता है । मन्त्रणा के लिये शास्त्र ज्ञान की आवश्यकता— अनालोकं लोचनमिवाशास्त्रं मनः कियत् पश्येत् ॥ ६४ ॥ बिना ज्योति के नेत्र के समान शास्त्र ज्ञान से शून्य मन कितना विचार कर सकता है । सेवक के लिये स्वामी की प्रसन्नता ही मुख्य है— स्वामिप्रसादः सम्पदं जनयति न पुनराभिजात्यं पाण्डित्यं वा ॥ ६५ ॥ । स्वामी की कृपा से सम्पत्ति प्राप्त होती है कुलीनता और पाण्डित्य से नहीं । यथार्थ का गौरव अक्षुण्ण रहता है— । हरकण्ठलग्नोऽपि कालकूटः काल एव ॥ ६६ ॥ शङ्कर जी के गले में भी लगा हुआ कालकूट विष सर्वसाधारण के लिये मारक विष ही है । मूर्ख व्यक्ति पर राज्य-भार की निन्दा— स्ववधाय कृत्योत्थापनमिव मूर्खेषु राज्यभारारोपणम् ॥ ६७ ॥ मूर्ख पुरुष को राज्य भार सौंपना अपने ही वध के लिए 'कृत्या' उत्पन्न करने के समान है ।

मन्त्रिसमुद्देशः ५३ कृत्या—अपने शत्रु का विनाश करने के लिये यज्ञानुष्ठान के द्वारा शक्ति विशेष या पुरुष विशेष को प्राप्त करना 'कृत्या' उत्पन्न करना कहा जाता है। अविवेकी का शास्त्रज्ञान व्यर्थ है— अकार्यवेदिनः किं बहुना शास्त्रेण ॥ ९८ ॥ कर्त्तव्य कर्म को न जानने वाले का अनेक शास्त्रों का ज्ञान व्यर्थ है। गुणहीन व्यक्ति की निन्दा— गुणहीनं धनुः पिंजनादपि कष्टम् ॥ ९९ ॥ प्रत्यञ्चाहीन धनुष पिंजन अर्थात् रुई धुनने की 'धुनकी' से भी अधिक कष्टदायक होता है। धुनकी से तो कम से कम रुई तो साफ हो जाती है। पर बिना डोर का धनुष क्या काम देगा ? मन्त्री के गौरव का कारण— चक्षुष इव मन्त्रिणोऽपि यथार्थदर्शनमेवात्मगौरवहेतुः ॥ १०० ॥ जिस प्रकार आंख की प्रशंसा उसकी सूक्ष्मदर्शी ज्योति के कारण होती है उसी प्रकार मन्त्री का राजनीति का यथार्थ ज्ञान ही उसको गौरव प्रदान करता है । शस्त्र और मन्त्र का अधिकार भिन्न-भिन्न है— शस्त्राधिकारिणो न मन्त्राधिकारिणः स्युः ॥ १०१ ॥ शस्त्र के अधिकारी अर्थात् क्षत्रिय अथवा शस्त्रोपजीवियों को मन्त्रणा देने का अधिकार नहीं देना चाहिए। क्षत्रिय का स्वभाव— क्षत्रियस्य परिहरतोऽप्यायात्युपरि भण्डनम् ॥ १०२ ॥ क्षत्रिय बचाते बचाते हुए भी लड़ बैठता है। शस्त्रोपजीविनां कलहमन्तरेण भक्तमपि भुक्तं न जीर्यति ॥ १०३ ॥ शस्त्रोपजीवी अर्थात् क्षत्रियों को लड़ाई किये बिना खाया हुआ भात अर्थात् सूक्ष्म भोजन भी नहीं पचता । मनुष्य के गर्व के हेतु— मन्त्राधिकारः, स्वामिप्रसादः शस्त्रोपजीवनं चेत्येकैकमपि पुरुषमुत्से- कयति किं पुनर्न समुदायः ॥ १०४ ॥ जब कि मन्त्रिपद, राजा की कृपा और शस्त्र से आजीविका इन तीनों में से एक एक वस्तु भी पुरुष को मदमत्त करने में समर्थ होती है तो क्या इन तीनों का एकत्र होना उसे मदमत्त नहीं करेगा ? अधिकारी होने के अयोग्य व्यक्ति— न लम्पटोऽधिकारी ॥ १०५ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

५४ नीतिवाक्यामृतम् स्त्री, धनादि का लोभी पुरुष अधिकारी बनने योग्य नहीं है। अर्थ लोभी मन्त्री के दोष— मन्त्रिणोऽर्थग्रहणलालसायां मतौ न राजकार्यमर्थोवा ॥ १०६ ॥ जब मन्त्री को धन की स्पृहा हो जाती है तब न तो राजा की कार्य सिद्धि होती है न धन होता है। उदाहरण द्वारा उक्तनीति का समर्थन— वरणार्थं प्रेषित एव यदि कन्यां परिणयति तदा वरयितुस्तप एव शरणम् ॥ १०७ ॥ किसी के विवाहार्थ कन्या को देखने के लिये भेजा गया व्यक्ति ही जब उस कन्या से विवाह कर ले तो वर के लिये तप ही शरण है। प्रसङ्गानुसार आशय है कि यदि मन्त्री स्वयं ही अधिकार और धन-लोलुप हो जाय तो राजा क्या करेगा ? दृष्टान्त— स्थाल्येव भक्तं चेद् स्वयमश्नाति कुतो भोक्तुर्भुक्तिः ॥ १०८ ॥ बटलोई ही अगर भात को स्वयं खाने लगेगी तो भोजन करने वाले को किस प्रकार भोजन मिल सकेगा ? मानवीय शुचिता की सीमा— तावत् सर्वोऽपि शुचिर्निः स्पृहोयावन्न परस्त्रीदर्शनमर्थागमोवा ॥१०९॥ तब तक सभी मनुष्य शुद्ध और निःस्पृह होते है जब तक उनको परस्त्री दर्शन और धनागम नहीं होता है। निर्दोष को दोषी सिद्ध करने से, हानि — अदुष्टस्य हि दूषणं सुप्तव्यालप्रबोधनमिव ॥ ११० ॥ निर्दोष को दोषी बनाना सोए हुए सर्प को जगाने के समान है। एक बार फटा मन फिर नहीं जुड़ता— सकृद्विघटितं चेतः स्फटिकवलयमिव कः सन्धातुमीश्वरः ॥१११॥ एक बार फटे हुए मन को स्फटिक के कङ्कन के समान कौन दुबारा जोड़ सकता है। मेल की अपेक्षा बैर सहज होता है— न महतांप्युपकारेण चित्तस्य तथानुरागो यथा विरागो भवत्यल्पेना- प्यपकारेण ॥ ११२ ॥ बहुत बड़े उपकार के कार्य से भी चित्त में उतना अनुराग नहीं उत्पन्न होता जितना कि थोड़े से भी अपकार से विराग होता है।

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri मन्त्रिसमुद्देशः ५५ क्षति प्राप्त पुरुष की प्रतिक्रिया— सूचीमुखसर्पवन्नानपकृत्य विरमन्त्यपराद्धाः ॥ १ ॥ जिन के प्रति कोई अपकार या अपराध किया गया हो ऐसे व्यक्ति 'सूची मुख' जाति के सर्प के समान बिना हानि पहुँचाए विश्राम नहीं लेते । अतिकामी के दोष— अतिवृद्धः कामस्तन्नास्ति यन्न करोति ॥ ११४ ॥ अत्यधिक कामी पुरुष ऐसा कोई अकार्य नहीं है जो वह न करे । दृष्टान्त — श्रूयते किल हि कामपरवशः प्रजापतिरात्मदुहितरि, हरिर्गोपवधुषु, हरः शान्तनुकलत्रेषु, सुरपतिर्गौतमभार्यायां चन्द्रश्च वृहस्पतिपत्न्यां मनश्चकारेति ॥ ११५ ॥ पुराणादि की कथा में सुना जाता है कि कामातुर ब्रह्मा अपनी कन्या पर, कृष्ण गोपों की स्त्रियों पर, महादेव शान्तनु की स्त्री गङ्गा पर इन्द्र गौतम ऋषि की पत्नी अहल्यापर और चन्द्रमा वृहस्पति की पत्नी तारा पर कामासक्त हुए । धन की स्पृहा स्वाभाविक है— अर्थेषूपभोगरहितास्तरवोऽपि साभिलाषाः किंपुनर्मनुष्याः ॥ ११६ ॥ फल पुष्पादि का स्वयम् उपभोग न करने वाले वृक्ष भी जब फल पुष्परूप अर्थ के इच्छुक होते हैं तो फिर मनुष्यों का क्या कहना है । वह तो अर्थ का स्वयम् उपभोग करता है उसे तो धन की स्पृहा होगी ही । धन प्राप्ति से लोभ वृद्धि— कस्य न धनलाभाल्लोभः प्रवर्तते ॥ ११७ ॥ धन का लाभ होने लगने पर किसे लोभ नहीं होता ? प्रत्यक्ष देवता का स्वरूप— स खलु प्रत्यक्षं दैवं यस्य परस्वेष्विवपरस्त्रीषु निःस्पृहं चेतः ॥११८॥ निश्चय ही वह प्रत्यक्ष देवता है जिसकी पराये धन के समान ही परस्त्री में स्पृहा नहीं होती । आय-व्यय में विवेक की आवश्यकता— समायव्ययः कार्यारम्भो राभसिकानाम् ॥ ११६ ॥ बिना विवेक के तुरन्त कार्य अथवा व्यापार अर्थात् जल्दबाजी में काम करने वाले को काम का लाभ नहीं होता । लाभ हानि बराबर हो जाता है । महामूर्खता के लक्षण— बहुक्लेशोनाल्पफलः कार्यारम्भो महामूर्खाणाम् ॥ १२० ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu

५६ नीतिवाक्यामृतम् जो महामूर्ख होते हैं वे ही बहुत क्लेश साध्य किन्तु स्वल्प फल वाले कार्य आरम्भ करते हैं । कापुरुष का लक्षण— दोषभयान्न कार्यारम्भः कापुरुषाणाम् ॥ १२१ ॥ दोष के भय से कार्य न करना कापुरुष का लक्षण है । दृष्टान्त— मृगाः सन्तीति किं कृषिर्न क्रियते ॥ १२२ ॥ अजीर्णभयात् किं भोजनं परित्यज्यते ॥ १२३ ॥ मृग हैं इसलिए क्या कोई खेती नहीं करता । और अजीर्ण के भय से क्या कोई भोजन छोड़ देता है ? विघ्नों की अनिवार्यता— स खलु कोऽपीहाभूदस्ति भविष्यति वा यस्य कार्यारम्भेषु प्रत्यवाया न भवन्ति ॥ १२४ ॥ इस संसार में क्या कोई ऐसा भी है या होगा जिसके कार्य में विघ्न न होते हों । दुष्टात्मा की कार्य पद्धति— आत्मसंशयेन कार्यारम्भो व्यालहृदयानाम् ॥ १२५ ॥ अपने प्राणों को संशय में डालकर कार्य प्रारम्भ करना दुष्टात्माओं का कार्य है । महापुरुष की पहिचान— दूरभीरुत्वमासन्नशूरत्वं ( रिपुं प्रति ) महापुरुषाणाम् ॥ १२६ ॥ महापुरुष लोग शत्रु जब तक दूर रहता है तब तक तो उससे डरते हैं किन्तु जब वह आक्रमण कर समीप आ जाता है तब अपनी शूरता का प्रदर्शन करते हैं । मृदुता के गुण— जलवन्मार्दवोपेतः पृथूनपि भूभृतो भिनत्ति ॥ १२७ ॥ जिस प्रकार कोमल जल प्रवाह बड़े-बड़े पर्वतों को भी फोड़ कर गिरा देता है उसी प्रकार मृदुतायुक्त राजा भी बड़े-बड़े राजाओं का विनाश कर देता है । प्रियवादिता के लाभ— प्रियम्बदः शिखीव सदर्पानपि द्विषत्सर्पानुत्सादयति ॥ १२८ ॥ प्रिय वाणी वाला मयूर जिस प्रकार दर्प युक्त सर्पों को नष्ट कर देता है उसी प्रकार प्रियवक्ता राजा भी सदर्प शत्रुओं का विनाश कर देता है ।

मन्त्रिसमुद्देशः ५७ महापुरुष का स्वभाव— नाविज्ञाय परेषामर्थमनर्थं वा स्वहृदयं प्रकाशयन्ति महानुभावाः ॥ दूसरों का सदाशय और दुराशय जाने बिना महापुरुष अपने मन की बात नहीं प्रकट करते। महान् व्यक्ति से सम्भाषण का लाभ— क्षीरवृक्षवत् फलसम्पादनमेव महतामालापः ॥ १३० ॥ महापुरुषों का सम्भाषण दूधवाले वृक्ष की तरह फल सम्पादन करता है। विशेषार्थ—जिस प्रकार पत्ता या छाल निकालने पर जिनमें दूध निकल आता है ऐसे वृक्ष मीठा फल देते हैं उसी प्रकार महापुरुषों की बातचीत से भी अच्छा परिणाम निकलता है। नीच को वश में लाने का उपाय— दुरारोहपादप इव दण्डाभियोगेन फलप्रदो भवति नीचप्रकृतिः ॥ कांटे या ऊँचाई के कारण न चढ़े जा सकने योग्य वृक्षों का फल जैसे दण्ड से पीटने पर ही गिरता है उसी प्रकार नीच प्रकृति के पुरुष भी दण्डदान से ही फलीभूत या वशीभूत होते हैं। महान् पुरुष का लक्षण— स महान् यो विपत्सु धैर्यमवलम्बते ॥ १३२ ॥ महान् वही है जो विपत्ति में धैर्य धारण करे। आकुलता दोष है— उत्तापकत्वं हि सर्वकार्येषु सिद्धीनां प्रथमोऽन्तरायः ॥ १३३ ॥ आकुल हो उठना समस्त कार्यों की सिद्धि के निमित्त प्राथमिक या प्रार- म्भिक विघ्न है। कुलीन का लक्षण— शरद्घना इव न खलु वृथालापं गलगर्जितं वा कुर्वन्ति सत्कुल- जाताः ॥ १३४ ॥ उत्तम कुल में उत्पन्न व्यक्ति शरत्कालीन मेघ की गर्जना के समान व्यर्थ आलाप नहीं करते। सुन्दर-असुन्दर का भेद— न स्वभावेन किमपि वस्तु सुन्दरमसुन्दरं वा, किन्तु यदेव यस्य प्रकृतितो भाति तदेव तस्य सुन्दरम् ॥ १३५ ॥ स्वभाव से ही कोई वस्तु सुन्दर या असुन्दर नहीं होती किन्तु जिसकी प्रकृति से जिसका मेल बैठता है अथवा जिस किसी को स्वभाव से ही जो वस्तु अच्छी लगती है वही उसके लिये सुन्दर होती है।

५८ नीतिवाक्यामृतम् दृष्टान्त-- न तथा कर्पूररेणुना प्रीतिः केतकीनां यथाऽमेध्येन ॥ १२६ ॥ केतकी के वृक्ष को कपूंर की रज से वह प्रसन्नता नही होती जितनी अमेध्य वस्तु गोबर आदि की खाद से । केतकी का वृक्ष कपूर का चूरा डालने से नहीं किन्तु खाद डालने से बढ़ता हैं । अधिक क्रोध से प्रभुता की हानि— अतिक्रोधनस्य प्रभुत्त्वमग्नौ पतितं लवणमिव शतधा विशीर्यते ॥ जो पुरुष अत्यन्त क्रोधी होता है उसकी प्रभुता अग्नि में पतित लवण खण्ड अर्थात् नमक के टुकड़े की भांति सौ-सौ टुकड़े हो जाती है । अर्थात् खण्डित होकर नष्ट हो जाती है । गुणों के नष्ट होने का कारण— सर्वान् गुणान् निहन्त्यनुचितज्ञः ॥ १३८ ॥ उचित अनुचित का ज्ञान न रखनेवाला व्यक्ति अपने समस्त गुणों को नष्ट कर देता है । जिसे भले बुरे का ज्ञान न रहा वह गुणशाली होते हुए भी निर्गुण है । गुप्त रहस्य दूसरों से न कहना चाहिए— परस्य मर्मकथनम् आत्मविक्रय एव ॥ १३६ ॥ दूसरे को अपना गुप्त भेद बता देना उसके हाथ अपने को बेच देना ही है । क्योंकि तब उस व्यक्ति से यह डर सदा बना रहेगा कि कहीं यह व्यक्ति मेरा भेद न खोल दे और मैं विपत्ति में पड़ जाऊं इस प्रकार उसकी सदा अनुनय-विनय ही करनी पड़ेगी । शत्रु पर विश्वास घातक है— तदजाकृपाणीयं यः परेषु विश्वासः ॥ १४० ॥ शत्रु पर विश्वास करना 'अजाकृपाणीय' है बकरी बकरे का मांस खाने वालों का खड्ग कब बकरी या बकरे पर गिरेगा जैसे यह निश्चय नहीं उसी प्रकार विश्वस्त शत्रु कब वध कर देगा यह निश्चय नहीं कहा जा सकता । अतः शत्रु पर विश्वास उचित नहीं । चञ्चलता से हानि— क्षणिकचित्तः किंचिदपि न साधयति ॥ १४१ ॥ चञ्चल चित्त वाला व्यक्ति कोई भी काम पूरा नहीं करता । राजा की स्वेच्छाचारिता का दोष— स्वतन्त्रः सहसाकारित्वात् सर्वं विनाशयति ॥ १४२ ॥

मन्त्रिसमुद्देशः ५६ स्वतन्त्र व्यक्ति, प्रसङ्गानुसार, मन्त्रियों से परामर्श न लेकर एकाएक कार्य करने वाला राजा अपना सर्वनाश कर बैठता है । आलसी की अयोग्यता— अलसः सर्वकर्मणामनधिकारी ॥ १४३ ॥ आलसी व्यक्ति समस्त प्रकार के कार्यों के अयोग्य होता है । प्रमाद का दोष— प्रमादवान् भवत्यवश्यं विर्द्विषां वशः ॥ १४४ ॥ प्रमादी अर्थात् असावधान रहने वाला निश्चय ही शत्रु के वश में आ जाता है । अनुकूल को प्रतिकूल न करने का उपदेश— कमप्यात्मनोऽनुकूलं प्रतिकूलं न कुर्यात् ॥ १४५ ॥ जो व्यक्ति अपने अनुकूल रहता हो या हो ऐसे किसी एक भी व्यक्ति को प्रतिकूल न होने दे । गुप्त भेद की रक्षा की आवश्यकता— प्राणादपि प्रत्यवायो रक्षितव्यः ॥ १४६ ॥ प्राण से भी अधिक गुप्त भेद की रक्षा करनी चाहिये । गुप्त बात का फूटना तरह-तरह के विघ्न उत्पन्न करता है अतः यहां विघ्न- वाचक प्रत्यवाय शब्द का 'गुप्त रहस्य' अर्थ करना उचित है । अपनी शक्ति समझने की आवश्यकता— आत्मशक्तिमजानतो विग्रहः क्षयकाले कीटिकानां पक्षोत्थान- मिव ॥ १४७ ॥ अपनी शक्ति का अनुमान न करके बैर ठान लेना मरते समय चींटियों और फतिङ्गों को पर निकलने के समान है । शत्रु से सद्व्यवहार की अवधि— कालमलभमानोऽपकर्त्तरि साधु वर्त्तेत ॥ १४८ ॥ अपने अनुकूल समय न पाकर मनुष्य को अपने अपकारी अथवा शत्रु के प्रति सद्व्यवहार करते रहना चाहिए । दृष्टान्त— किन्नु खलु लोको न वहति मूर्ध्ना दग्धुमिन्धनम् ॥ १४६ ॥ जलाने वाली लकड़ी को क्या लोग शिर पर नहीं ढोते ? दृष्टान्त— नदीरयस्तरूणामङ्घ्रीन् क्षालयन्नप्युन्मूलयति ॥ १५० ॥