न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
१२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० वैगुण्यं समीहाभ्रेषः१, कर्तृवैगुण्यम्-अविद्वान् प्रयोक्ता कपूयाचरणश्च। साधनवै- गुण्यम्-हविरसंस्कृतमुपहतमिति, मन्त्रा न्यूनाधिकाः स्वरवर्णहीना इति, दक्षिणा दुरागता हीना निन्दिता चेति। अथोपजनाश्रयं कर्मवैगुण्यम्—मिथ्यासम्प्रयोगः। कर्तृवैगुण्यम्—योनिव्यापादो बीजोपघातश्चेति। साधनवैगुण्यम् इष्टावभिहितम्। लोके च 'अग्निकामो दारूणी मथ्नीयात्' इति विधिवाक्यम्, तत्र कर्मवैगुण्यम्- मिथ्यामन्थनम्, कर्तृवैगुण्यम्-प्रज्ञाप्रयत्नगतः प्रमादः, साधनवैगुण्यम्-आर्द्रं सुषिरं दार्विति। तत्र फलं न निष्पद्यत इति नानृतदोषः, गुणयोगेन फलनिष्पत्ति- दर्शनात्। न चेदं लौकिकाद्भिद्यते-'पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत' इति ॥ ५९ ॥ अभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात् ॥ ६० ॥ न व्याघातो हवनः-इत्यनुवर्त्तते। योऽभ्युपगतं हवनकालं भिनत्ति ततोऽन्यत्र करना। कर्तृविपर्यय जैसे—माता-पिता अविद्वान् ( वैदिक विधि के ज्ञाता न ) हों, निन्दित आचरण वाले हों। साधनविपर्यय जैसे—हवि असंस्कृत हो, या कुत्ता बिल्ली आदि से अपवित्र कर दी गयी हो; मन्त्र स्वरवर्णहीन तथा न्यूनाधिक पढ़े जायें। यज्ञ के बाद दी जाने वाली दक्षिणा का धन जूआ, चोरी या रिश्वतखोरी से कमाया हुआ हो; कम हो, या सुवर्ण के अतिरिक्त निषिद्ध धातु के रूप में दिया जाये। पुत्रोत्पादनाश्रित कर्मविपर्यय जैसे—मिथ्यासम्प्रयोग ( अनुचित सम्बन्ध )। कर्तृ- विपर्यय जैसे—मातृयोनि में या पिता के शुक्र में खराबी। साधनविपर्यय तो इष्टिप्रसङ्ग में कह ही दिया गया। लोक में भी यह विपर्यय देखते हैं—'अग्नि की इच्छा रखने वाला अरणिमन्थन करें' ( दो लकड़ियों को रगड़े ) यह विधिवाक्य है। यहाँ कर्मविपर्यय जैसे—गलत ढंग से उनको रगड़ना। कर्तृविपर्यय जैसे—रगड़ने वाले का प्रज्ञा या प्रयत्न में प्रमाद करना। साधन-विपर्यय जैसे—लकड़ियां गीली या पोली ( दीमक लगी हुई ) हों। यहाँ भी ऐसी स्थितियों में अग्नि नहीं बन पाती; क्योंकि यथोचित सम्बन्ध से ही फलनिष्पत्ति देखी जाती है। पूर्वपक्षी का दिया हुआ 'पुत्रेच्छु पुत्रेष्टि से यज्ञ करे' उदाहरण में दृष्ट उदाहरण से भिन्न नहीं, अतः उसमें अनृत दोष देकर शब्द को अप्रमाण नहीं कह सकते ॥ ५९ ॥ स्वीकार करके पुनः भिन्न काल में हवन करनेवाले को उक्त दोष कहने से ( व्याघातदोष नहीं है ) ॥ ६० ॥ वचनव्याघात दोष भी नहीं है; क्योंकि जो अभ्युपेत हवनकाल को छोड़ कर अन्य काल में हवन करता है, ऐसे अभ्युपगत कालभेद में यह दोष कहा गया है—'श्याव श्वा १. समीहा = तदङ्गसमिदादिकर्मानुष्ठानम्, तस्या भ्रेषः = भ्रंशः, अननुष्ठानमिति यावत्।
६३. सू० ] . शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १२९
६३. सू० ] . शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १२९ जुहोति, तत्रायमभ्युपगतकालभेदे दोष उच्यते—'श्यावोऽस्याहुतिमभ्यवहरति य उदिते जुहोति'; तदिदं विधिभ्रंशे निन्दावचनमिति ॥ ६० ॥ अनुवादोपपत्तेश्च ॥ ६१ ॥ पुनरुक्तदोषोऽभ्यासे नेति प्रकृतम् । अनर्थकोऽभ्यासः = पुनरुक्तम्, अर्थ- वानभ्यासः = अनुवादः । योऽयमभ्यासः 'त्रिःप्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम्' इत्यनुवाद उपपद्यते; अर्थवत्त्वात् । त्रिवंचनेन हि प्रथमोत्तमयोः पञ्चदशत्वं सामिधेनीनां भवति । तथा च मन्त्राभिवादः१—'इदमहं भ्रातृव्यं पञ्चदशावरेण वाग्वज्रेण बाधे योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः' इति पञ्चदशसामिधेनीर्वज्रं मन्त्रो- ऽभिवदति, तदभ्यासमन्तरेण न स्यादिति ॥ ६१ ॥ वाक्यविभागस्य चार्थग्रहणात् ॥ ६२ ॥ प्रमाणं शब्दो यथा लोके ॥ ६२ ॥ विभागश्च ब्राह्मणवाक्यानां त्रिविधः— विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् ॥ ६३ ॥ इसकी आहुति को खा डालता है जो उदित समय में हवन करता है'—यह विधिभ्रंश में निन्दापरक श्रुति है । इससे वचनव्याघात नहीं होता ( अतः यह वचनव्याघात शब्दा- प्रामाण्य में हेतु नहीं कहा जा सकता ) ॥ ६० ॥ अनुवादोपपादन होने से ( भी पुनरुक्त दोष नहीं है ) ॥ ६१ ॥ अभ्यास में पुनरुक्त दोष नहीं है—यह प्रसङ्ग चल रहा है। निरर्थक अभ्यास ( आवृत्ति ) पुनरुक्त होता है, परन्तु सार्थक अभ्यास अनुवाद कहलाता है । 'प्रथम की तीन आवृत्ति तथा अन्तिम की तीन आवृत्ति करे'—इस श्रुति में यह अभ्यास सार्थक होने से अनुवाद है; क्योंकि प्रथम तथा अन्तिम के त्रिरावर्तन से सामिधेनियों में पञ्चदशत्व सिद्ध हो पायेगा । जैसा कि मन्त्राभिवाद है—'मैं इस पञ्चदश सामिधेनीरूप वाग्वज्र से शत्रु को मारूँगा, जो हमसे द्वेष करता है, या जिससे हम द्वेष करते हैं।' यहाँ पञ्चदश सामिधेनीरूप वाग्वज्र का मन्त्र अभिवदन कर रहा है । यह पञ्चदशत्व एकादश सामि- धेनियों में आवृत्ति के बिना नहीं बन सकता । अतः अनुवाद सार्थक है ॥ ६१ ॥ वाक्यविभाग के अर्थवान् होने से भी शब्द प्रमाण है ॥ ६२ ॥ शब्द ( वेद-वाक्य ) प्रमाण है, सार्थक विभागवान् होने से, जैसे—लोक में (मन्त्रा- दिवाक्य ) ॥ ६२ ॥ ब्राह्मणवाक्यों का विभाग तीन प्रकार का है— १. विधि वचन २. अर्थवाद वचन तथा ३. अनुवाद वचन—यों विनियोग होने से ॥ ६३ ॥ १. अभि मुख्याय कर्मणे प्रवृत्तये वादो वाक्यमित्यर्थः ।
१३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ त्रिधा खलु ब्राह्मणवाक्यानि विनियुक्तानि—विधिवचनानि, अर्थवादवचनानि, अनुवादवचनानीति ॥ ६३ ॥ तत्र— विधिर्विधायकः ॥ ६४ ॥ यद्वाक्यं विधायकं चोदकं स विधिः । विधिस्तु = नियोगः, अनुज्ञा वा, यथा— ‘अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः’ इत्यादि ॥ ६४ ॥ स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्प इत्यर्थवादः ॥ ६५ ॥ विधेः फलवादलक्षणा या प्रशंसा सा स्तुतिः, सम्प्रत्ययार्था—स्तूयमानं श्रद्दधीतेति । प्रवर्त्तिका च, फलश्रवणात् प्रवर्त्तते—‘सर्वजिता वै देवाः सर्वमजयन् सर्वस्याप्त्यै सर्वस्य जित्यै सर्वमेवैतेनाऽऽप्नोति सर्वं जयति’ इत्येवमादि । अनिष्टफलवादो निन्दा, वर्जनार्था—निन्दितं न समाचरेदिति । ‘स एष वाव प्रथमो यज्ञो यज्ञानां यज्ज्योतिष्टोमो य एतेनानिष्ट्वाऽन्येन यजते गर्तं१ ब्राह्मणाख्य श्रुतिवाक्यों का विधिवचन, अर्थवादवचन तथा अनुवादवचन—यों तीन प्रकार का विनियोग है ॥ ६३ ॥ वहाँ— विधायक ( प्रवर्तक ) वाक्य को ‘विधि’ कहते हैं ॥ ६४ ॥ उनमें जो वाक्य विधायक है, प्रेरक ( प्रवृत्तिहेतु ) है, उसे ‘विधि’ कहते हैं । विधि- वाक्य नियोग ( आदेशात्मक ), तथा अनुज्ञा ( कामचारात्मक ) वाक्य हैं, जैसे ‘स्वर्गो- च्छुक अग्निहोत्र हवन करे’ इत्यादि वाक्य ॥ ६४ ॥ स्तुतिवाक्य, निन्दावाक्य, परकृतिवाक्य तथा पुराकल्पवाक्य अर्थवाद हैं ॥ ६५ ॥ विधि की फलोत्कर्षबोधक प्रशंसा ही ‘स्तुति’ है । वह स्तुति उन मन्त्रों में साधा- रणजनों का विश्वास जमाने के लिये होती है कि जिसकी स्तुति की जा रही है, उसमें वे श्रद्धा करें तथा तदनुसार कर्म करें । विधि का स्तुतिपरक फल सुन कर मनुष्य उधर प्रवृत्त हो सकता है । जैसे ‘विश्वजिता यजेत’ इस विधिवाक्य का स्तुतिवाक्य है—‘देव- गण सर्वविजयी हो गये, उन्होंने सब को जीत लिया, ( अतः ) सर्वप्राप्ति ( वशीकार ) के लिये, सर्वविजय के लिये ( यह विश्वजित् यज्ञ है ) इससे सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, सब को जीता जा सकता हैं’—आदि अनिष्ट फल को बतलानेवाले वाक्य निन्दावाक्य हैं, वे उस निन्दित कर्म के निषेधक हैं । जैसे—‘यों कहिये कि यह ज्योतिष्टोम यज्ञ ही सब यज्ञों में प्रथम ( मूर्धन्य ) है, जो इस यज्ञ को न कर अन्य (विधि) से यज्ञ करता है, वह गढे में ही गिरता है, उसका किया हुआ १-१. ‘गर्तपत्यमेव तज्जीयते वा प्रवामीयते वा’ इति शाबरभाष्योद्धृतः पाठः । अस्य “गर्तपतनं यथा भवति तथैव जीयते, ‘ज्या वयोहानौ’”—इति व्याख्या ।
६६. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३१
६६. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३१ पतत्ययमेवैतज्जीर्यते वा प्रमीयते वा' इत्येवमादि । अन्यकर्तृकस्य व्याहतस्य विधेर्वादः परकृतिः । 'हुत्वा वपामेवाग्रेऽभिघार- यन्ति अथ पृषदाज्यम्१, तदुह चरकाध्वर्यवः पृषदाज्यमेवाग्रेऽभिधारयन्ति, अग्नेः प्राणाः पृषदाज्यमित्येवमभिदधति' इत्येवमादि । ऐतिहासमाचरितो विधिः पुराकल्प इति । 'तस्माद्वा एतेन पुरा ब्राह्मणा बहिष्पवमानं सामस्तोममस्तोममस्तौषन् योने यज्ञं प्रतनवामहे' इत्येवमादि । कथं परकृतिपुराकल्पावर्थवादाविति ? स्तुतिनिन्दावाक्येनाभिसम्बन्धाद् विध्याश्रयस्य द्योतनादर्थवादाविति ॥ ६५ ॥ विधिविहितस्यानुवचनमनुवादः ॥ ६६ ॥ विध्यनुवचनं चानुवादो विहितानुवचनं च । पूर्वः शब्दानुवादः, अपरोऽर्था- नुवादः । यथा पुनरुक्तं द्विविधम् एवमनुवादोऽपि । किमर्थं पुनर्विहितमनूद्यते ? अधिकारार्थम् । विहितमधिकृत्य स्तुतिर्बोध्यते, निन्दा वा, विधिशेषो वाऽभि- वह अन्य यज्ञ बिना फल दिये ही नष्ट हो जाता है या वह अन्यफलदृक् यष्टा असमय में मर जाता है' इत्यादि । अन्यकर्त्तृक विरोधक विधिवाक्य 'परकृति' अर्थवाद कहलाता है । जैसे—'पहले वपाहोम कर अभिधारण करे पश्चात् पृषदाज्य अभिधारण करें ? यहाँ चरकशाखा के याज्ञिक पृपदाज्य ( दधिसर्पि ) का पहले अभिधारण करते हैं, वे कहते हैं कि पृषदाज्य अग्नि के प्राण हैं' । इतिहासमिश्रित विधिवाक्य 'पुराकल्प' अर्थवाद कहलाता है। जैसे—'ब्राह्मणों ने प्राचीन काल में इस बहिष्पवमान सामस्तोममन्त्र की इसीलिए स्तुति की कि इससे वे अपने यज्ञों का विस्तार कर पावें'—यहाँ पुराकाल के ब्राह्मणों द्वारा बहिष्पवमान सामस्तोम मन्त्र की स्तुति द्वारा इसका विधान बतलाया गया है । परकृति, तथा पुराकल्प अर्थवाद कैसे हैं ? ये दोनों स्तुति या निन्दा वाक्य से अभिसम्बद्ध होकर विध्याश्रित किसी अर्थ का द्योतन कराने के कारण अर्थवाद हैं ॥६५॥ विधिविहित का अनुवचन अनुवाद वाक्य है ॥ ६६ ॥ विधि का अनुवचन, तथा विहित का अनुवचन 'अनुवाद' कहलाता है । इनमें प्रथम शब्दानुवाद, तथा द्वितीय अर्थानुवाद है । जैसे 'पुनरुक्त' दो प्रकार का होता है उसी प्रकार अनुवाद भी दो प्रकार का है । यहाँ विहित का अनुवाद किसलिये है ? अधिकार ( फलप्राप्ति के लिये साधनप्रवृत्ति ) के लिये । अर्थात् विहित को लेकर जिससे स्तुति, १. 'पृषदाज्यं सवघ्याज्ये'—इति अमरकोशः ( २. ७. २४ ) ।
१३२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० धीयते । विहितानन्तरार्थोऽपि चानुवादो भवति । एवमन्यदप्युत्प्रेक्षणीयम् । लोकेऽपि च विधिः, अर्थवादः, अनुवाद इति च त्रिविधं वाक्यम् । 'ओदनं पचेत्' इति विधिवाक्यम् । अर्थवादवाक्यम्-'आयुर्वर्चो बलं सुखं प्रतिभानं चान्ने प्रतिष्ठितम्' । अनुवादः-पचतु पचतु भवानित्यभ्यासः, क्षिप्रं पच्यतामिति वा, अङ्ग पच्यतामित्यध्येषणार्थम्, पच्यतामेवेति चावधारणार्थम् । यथा लौकिके वाक्ये विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वम्, एवं वेदवाक्यानामपि विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वं भवितुमर्हतीति ॥ ६६ ॥ नानुवादपुनरुक्तयोर्विशेषः, शब्दाभ्यासोपपत्तेः ? ॥ ६७ ॥ पुनरुक्तमसाधु, साधुरनुवादः-इत्ययं विशेषो नोपपद्यते, कस्मात् ? उभयत्र हि प्रतीतार्थः शब्दोऽभ्यस्यते, चरितार्थस्य शब्दस्याभ्यासादुभयम- साध्विति ? ॥ ६७ ॥ शीघ्रतरगमनोपदेशवदभ्यासाज्ञाविशेषः ॥ ६८ ॥ नानुवादपुनरुक्तयोरविशेषः । कस्मात् ? अर्थवतोऽभ्यासस्यानुवादभावात् । समानेऽभ्यासे पुनरुक्तमनर्थकम् । अर्थवानभ्यासोऽनुवादः, शीघ्रतरगमनोपदेशवत् । निन्दा या विधिशेष बतलाया जाये । विहितानन्तर-कर्त्तव्यबोधन के लिये भी अनुवाद होता है । इसी तरह अन्य उत्प्रेक्षा भी कर लेनी चाहिये । लोक में भी, विधि, अर्थवाद तथा अनुवाद यों तीन प्रकार का वाक्य होता है । 'ओदन पकाओ' यह विधिवाक्य है । अर्थवाद वाक्य है—'आयु, तेज, बल, सुख, प्रतिभा सब कुछ अन्न में प्रतिष्ठित हैं' । अनुवाद वाक्य है—'आप पकाइये, पकाइये'—यह आवृत्ति, या 'जल्दी पकाइये' । 'अरे, पकाओ' यह अध्येषणार्थक अनुवाद है, तथा 'पका- इये ही'—यह अवधारणार्थक अनुवादवाक्य है । जैसे लौकिक वाक्य में विभाग द्वारा अर्थग्रहण होने से वह प्रमाण है, उसी तरह वेद- वाक्यों का भी विभाग से अर्थग्रहण होने से उसमें प्रामाण्य मानना उचित ही है ॥ ६६ ॥ शब्दाभ्यासोपपादनमात्र होने से अनुवाद और पुनरुक्त में कोई अन्तर नहीं ? ॥ ६७ ॥ 'पुनरुक्त दोष है, तथा अनुवाद सार्थक होने से समीचीन है'—यह विभाजन ठीक नहीं; क्योंकि दोनों में जिसका अर्थ पहले से जान लिया गया है, ऐसा शब्द ही दुहराया जाता है । चरितार्थ शब्द के दुहराये जाने से दोनों ही निरर्थक हैं ? ॥ ६७ ॥ अधिक जल्दी चलने के आदेश की तरह अनुवाद से पुनरुक्त की समानता नहीं है ॥ ६८ ॥ अनुवाद और पुनरुक्त में समानता नहीं; क्योंकि सार्थक आवृत्ति ही अनुवाद कह- लाती है । निष्प्रयोजन आवृत्ति में पुनरुक्त निरर्थक होता है, पर सार्थक अभ्यास तो
६९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३३
६९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३३ शीघ्रं शीघ्रं गम्यताम्, शीघ्रतरं गम्यतामिति क्रियातिशयोऽभ्यासेनैवोच्यते । उदाहरणार्थं चेदम् । एवमन्योऽप्यभ्यासः । 'पचति पचति' इति क्रियानुपरमः । 'ग्रामो ग्रामो रमणीयः' इति व्याप्तिः । 'परि परि त्रिगर्त्तेभ्यो वृष्टो देवः' इति परिवर्जनम् । 'अध्यधिकुड्यं निषण्णम्' इति सामीप्यम् । 'तिक्तं तिक्तम्' इति प्रकारः। एवमनुवादस्य स्तुतिनिन्दाशेषविधिश्वधिकारार्थता, विहितानन्त- रार्थता चेति ॥ ६८ ॥ किं पुनः प्रतिषेधहेतूद्धारादेव शब्दस्य प्रमाणत्वं सिध्यति ? न; अतश्च— मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यम्, आप्तप्रामाण्यात् ॥ ६९ ॥ किं पुनरायुर्वेदस्य प्रामाण्यम् ? तत्तदायुर्वेदेनोपदिश्यते-इदं कृत्वेष्टमधि- गच्छति, इदं वर्जयित्वाऽनिष्टं जहाति, तस्यानुष्ठीयमानस्य तथाभावः सत्यार्थ- ताऽविपर्ययः । मन्त्रपदानां च विषभूताशनिप्रतिषेधार्थानां प्रयोगेऽर्थस्य तथाभाव एतत् प्रामाण्यम् । किं कृतमेतत् ? आप्तप्रामाण्यकृतम् । किं पुनराप्तानां प्रामाण्यम् ? अनुवाद ही होगा। जैसे- 'जल्दी-जल्दी चलिये, और जल्दी चलिये'—यहाँ गमनक्रिया- तिशय अभ्यास (आवृत्ति) से ही कहा जा सकता है। यह एक उदाहरण दे दिया, अन्य उदाहरणों की भी कल्पना कर लेना चाहिये । 'पकाता है, पकाता है' यह अभ्यास क्रिया- सातत्य, 'इस देश का ग्राम-ग्राम रमणीय हैं' यह व्याप्ति, 'त्रिगर्त देश से परे परे वर्षा हुईं' यह त्रिगर्त में वृष्टिपरिवर्जन, 'दीवाल दीवाल पर बैठा हुआ' यह अभ्यास सामीप्य का बोधक है। 'तिक्त-तिक्त' यह अभ्यास प्रकार ( भेद ) का बोधन कराता है। इस प्रकार अनुवाद स्तुति, निन्दा, विधिशेष में तथा विहितानन्तरकर्तव्यता के बोधन कराने में काम आता है, अतः सार्थक है। (परन्तु पुनरुक्त, अर्थवान् न होने से दोषरूप है। अतः दोनों में कोई समानता नहीं है ) ॥ ६८ ॥ क्या पूर्वपक्षी द्वारा उठायी गयी आशङ्काओं के निवारण से ही शब्द प्रमाण सिद्ध हो जाता है ? नहीं; इसलिये भी— मन्त्र, आयुर्वेद के प्रामाण्य की तरह उसमें भी प्रामाण्य है; क्योंकि वह भी आप्तो- देश है ॥ ६९ ॥ आयुर्वेद का प्रामाण्य क्या है ? यह आयुर्वेद उपदेश करता है—'यह करके इष्ट (स्वास्थ्य) को प्राप्त किया जा सकता है, या यह न करके अनिष्ट (रोग) से छुटकारा पाया जा सकता है' । इस उपदेश के अनुसार चलने से वैसा ही सत्यार्थ, (अनुकूल कार्य) होता देखा गया है। मन्त्रों से भी विष, भूत प्रेत, तथा टोना-टोटका का प्रतिषेध देखा जाने से, मन्त्रों की सत्यार्थता (यथार्थता) स्पष्ट है, अतः उनमें प्रामाण्य है। यह प्रामाण्य उनमें कैसे आता है ? आप्तोपदेश के प्रामाण्य से । आप्तोपदेश में क्या प्रामाण्य है ? उस विषय का साक्षा-
१३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० १. आ० साक्षात्कृतधर्मता, भूतदया, यथाभूतार्थचिख्यापयिषेति । आप्ताः खलु साक्षात्कृत- धर्माणः 'इदं हातव्यम्, इदमस्य हानिहेतुः, इदमस्याधिगन्तव्यम्, इदमस्याधिगम- हेतुः' इति भूतान्यनुकम्पन्ते । तेषां खलु वै प्राणभृतां स्वयमनवबुद्ध्यमानानां नान्यदुपदेशादवबोधकारणमस्ति । न चानवबोधे समीहा, वर्जनं वा, न वाऽकृत्वा स्वस्तिभावः, नाप्यस्यान्य उपकारकोऽप्यस्ति । 'वयमेभ्यो यथादर्शनं यथाभूत- मुपदिशामस्त इमे श्रुत्वा प्रतिपद्यमाना हेयं हास्यन्त्यधिगन्तव्यमेवाधिगमिष्यन्ति' इति एवमाप्तोपदेशः । एतेन त्रिविधेनाप्तप्रामाण्येन परिगृहीतोऽनुष्ठीयमानोऽ- र्थस्य साधको भवति, एवमाप्तोपदेशः प्रमाणम् । एंवामाप्ताः प्रमाणम् । दृष्टार्थेनाप्तोपदेशेनायुर्वेदेनादृष्टार्थो वेदभागोऽनुमातव्यः प्रमाणमिति । आप्तप्रामाण्यस्य हेतोः समानत्वादिति । अस्यापि चैकदेशः 'ग्रामकामो यजेत' इत्येवमादिर्दृष्टार्थस्तेनानुमातव्यमिति । लोके च भूयानुपदेशाश्रयो व्यवहारः । लौकिकस्याप्युपदेष्टुरुपदेष्टव्यार्थ- ज्ञानेन परानुजिघृक्षया यथाभूतार्थचिख्यापयिषया च प्रामाण्यं तत्परिग्रहादाप्तोप- देशः प्रमाणमिति । त्कार, प्राणियों पर दया (उनके अहित की परिहारेच्छा) तथा यथार्थकथन की इच्छा । आप्त जन उस विषय को साक्षात् किये रहते हैं और 'यह छोड़ देना चाहिये, यह इसके छोड़ देने में कारण है' या 'यह ग्रहण करना चाहिए, यह इसके ग्रहण में कारण है'—यों उपदेश द्वारा वे साधारण जनों पर दया करते हैं ! वे साधारण प्राणी स्वयं हिताहित को नहीं समझ पाते, उपदेश बिना उन्हें समझने में दूसरा कोई कारण नहीं । समझ आये विना हित की इच्छा तथा अहित का परिवर्जन नहीं बनेगा, और विना हिताचरण (दवा-आदि) किये स्वस्तिभाव (स्वास्थ्य-आदि कल्याण) नहीं होगा, उसका कोई अन्य साथी भी नहीं है जो उसका हित सोच सके ! तब वे आप्तपुरुष सोचते हैं कि 'हम इन निरीह प्राणियों को जैसा हमने देखा है वैसे सत्य का उपदेश करें ताकि ये हेय को छोड़ दें, अधिगन्तव्य को प्राप्त कर लें'। यही आप्तोपदेश है । इस तीन प्रकार के आप्त प्रामाण्य से परिगृहीत हो क्रियमाण वह आप्तोदेश प्रयोजन का साधन होता है । यों, हमारे मत में आप्तोपदेश और आप्त पुरुष दोनों प्रमाण हैं । दृष्टार्थ आप्तोदेश आयुर्वेद से अदृष्टार्थक आप्तोदेश वेदभाग के प्रामाण्य का अनु- मान कर लेना चाहिये; क्योंकि 'आप्तोपदेश' हेतु उभयत्र समान है । इस वेदभाग का भी 'ग्राम की इच्छा करने वाला यज्ञ करे'—यह एकदेश तो दृष्टार्थ है ही, इस दृष्टार्थ से भी अवशिष्ट अदृष्टार्थ में प्रामाण्य का अनुमान कर लेना चाहिए । लोक में बहुत सा व्यवहार आप्तोपदेशाश्रित ही है । लौकिक उपदेष्टा के उपदेष्टव्य अर्थज्ञान से दूसरे प्राणियों पर अनुग्रहाकांक्षा से या उसकी यथाभूत अर्थ को बतलाने की ईच्छा से उसके उपदेश में प्रामाण्य आता है, तथा उस उपदेश के अनुसार साधारणजनों द्वारा आचरण किया जाता है, अतः आप्तोपदेश प्रमाण है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
६९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३५
६९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३५ द्रष्टृप्रवक्तृसामान्याच्चानुमानम्। य एवाप्ता वेदार्थानां द्रष्टारः प्रवक्तारश्च त एवायुर्वेदप्रभृतीनाम्-इत्यायुर्वेदप्रामाण्यवद् वेदप्रामाण्यमनुमातव्यमिति। नित्यत्वाद् वेदवाक्यानां प्रमाणत्वे तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यादित्ययुक्तम्। शब्दस्य वाचकत्वादर्थप्रतिपत्तौ प्रमाणत्वं न; नित्यत्वात्। नित्यत्वे हि सर्वस्य सर्वेण वचनाच्छब्दार्थव्यवस्थानुपपत्तिः। नानित्यत्वे वाचकत्वमिति चेद्, न; लौकिकेष्वदर्शनात्। तेऽपि नित्या इति चेद्, न; अनाप्तोपदेशादर्थविसंवादोऽनु- पपन्नः। नित्यत्वाद्वि शब्दः प्रमाणमिति। अनित्यः स इति चेत् ? अविशेष- वचनम्। अनाप्तोपदेशो लौकिको न नित्य इति कारणं वाच्यमिति ! यथानियोगं चार्थस्य प्रत्यायनाद् नामधेयशब्दानां लोके प्रामाण्यं नित्यत्वात् प्रामाण्यानुपपत्तिः। यत्रार्थे नामधेयशब्दो नियुज्यते लोके, तस्य नियोगसामर्थ्यात् प्रत्यायको भवति; न नित्यत्वात्। मन्वन्तरयुगान्तरेषु चातीतानागतेषु सम्प्रदायाभ्यासप्रयोगाविच्छेदो वेदानां द्रष्टा तथा प्रवक्ता के उभयत्र समान होने से भी उस अदृष्टार्थ में प्रामाण्य का अनुमान कर लेना चाहिये। जो आप्त पुरुष वेदमन्त्रों के द्रष्टा तथा प्रवक्ता हैं, वे ही आयुर्वेद आदि के प्रवक्ता हैं, जब उनसे उपदिष्ट आयुर्वेदादि सत्य हैं तो उन्हीं द्वारा उपदिष्ट वेदमन्त्र भी सत्य होने चाहिये—यों अनुमान करना चाहिये। वेदवाक्यों के नित्य होने से ही उनमें प्रामाण्य है, फिर यहां उन्हें आप्तोपदेश मान कर उनमें प्रामाण्य सिद्ध करना अनुचित है? (तथा परस्परविरोधी भी है, क्योंकि जो नित्य है वह आप्तोपदिष्ट क्यों कर होगा?) शब्द का वाचत्व (संकेत से बोधकत्व) हेतु से अर्थप्रतिपादन में प्रामाण्य है, न कि नित्यत्व हेतु से। केवल नित्यत्व मानने पर सबका सबसे ज्ञान होने से शब्द-अर्थ की 'इस शब्द का यह अर्थ है'—यह व्यवस्था नहीं बनेगीं। अनित्य मानने पर उसमें वाचकत्व न बनें—ऐसी बात भी नहीं; क्योंकि अनित्य लौकिक शब्दों में भी अर्थ देखा जाता है, नित्यत्व नहीं। उन लौकिक शब्दों को भी नित्य मान लेने पर, उनमें से कुछ के अनाप्तोपदेश होने से जो अर्थवैपरीत्य देखा जाता है, वह अनुपपन्न होने लगेगा; क्योंकि नित्य होने से ही शब्द प्रमाण है! अनाप्तोद्दिष्ट 'शब्द अनित्य हैं' यह वचन तो लौकिक यथार्थ प्राकृत शब्दों में भी संगत हो सकता है। लौकिक अनाप्तोपदेश ही अनित्य मानना है तो उसमें कोई हेतु दिखाना चाहिये। शब्द के साथ यथासंकेत अर्थ-ज्ञान होने से संज्ञाशब्दों का लोक में प्रामाण्य है। नित्यत्व के रहने से प्रामाण्य नहीं बनता। एवं च—लौकिक शब्द जिस अर्थ में संकेतित है, उसका वह ज्ञान करा देता है, न कि नित्य होने से ज्ञान कराता है। अतीतानागत मन्वन्तर-युगान्तर में सम्प्रदायाभ्यास-प्रयोग से उनका निरन्तर बना
प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १-१२ ]
१३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० नित्यत्वम् । आप्तप्रामाण्याच्च प्रामाण्यम् । लौकिकेषु शब्देषु चैतत् समान- मिति ॥ ६९ ॥ इति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य प्रथमाह्निकम् [ द्वितीयाह्निकम् ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १-१२ ] [ पूर्वपक्षः ] अयथार्थः प्रमाणोद्देश¹ इति मत्वाऽऽह— न चतुष्ट्वम्, ऐतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात् ॥ १ ॥ न चत्वार्येव प्रमाणानि, किं तर्हि ? ऐतिह्यम्, अर्थापत्तिः, सम्भवः, अभावः— इत्येतान्यपि प्रमाणानि, तानि कस्मान्नोक्तानि ? 'इति होचुः' इत्यनिर्दिष्टप्रवक्तृकं प्रवादपारम्पर्यम्— ऐतिह्यम् । रहना ही वेदों का नित्यत्व है। आप्तप्रामाण्य होने से उनका प्रामाण्य है—यह बात लौकिक वैदिक उभयविध शब्दों में समान है ॥ ६९ ॥ वात्स्यायनीय न्याय(भाष्यसहित न्यायदर्शन) के द्वितीय अध्याय का प्रथम आह्निक समाप्त सिद्धान्ती का किया हुआ प्रमाणों का नाम से परिगणन यथार्थ नहीं, ऐसा मानकर पूर्वपक्षी कहता है— केवल चार ही प्रमाण नहीं; अपितु ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव, अभाव भी प्रमाण हैं ? ॥ १ ॥ शङ्का—चार ही प्रमाण नहीं; बल्कि ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव, अभाव—ये भी प्रमाण हैं, इनका परिगणन क्यों नहीं किया ? 'ऐसा किन्हीं ने कहा था'—यों वक्ता का नामनिर्देश न होते हुये जो प्रवाद— (जनश्रुति) परम्परा चली आती है, 'उसे 'ऐतिह्य' कहते हैं । १. प्रत्यक्षमेकं चार्वाकाः, कणादसुगतौ पुनः । अनुमानं च तच्चापि साङ्ख्याः शब्दश्च ते उभे ॥ न्यायैकदेशिनोऽप्येवमुपमानं च केचन ॥ अर्थापत्त्या सहैतानि चत्वार्याहुः प्रभाकराः । अभावषष्ठान्येतानि भाट्टा वेदान्तिनस्तथा । सम्भवैतिह्ययुक्तानि तानि पौराणिका जगुः ॥ इत्यभियुक्तोक्त्या प्रमाणविभाजकसंख्यायां संशय इति भावः ।
२. सू० ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३७
२. सू० ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३७ अर्थादापत्तिरर्थापत्तिः । आपत्तिः = प्राप्तिः, प्रसङ्गः । यत्राभिधीयमानेऽर्थे योज्योऽर्थः प्रसज्यते सोऽर्थापत्तिः, यथा–मेघेष्वसत्सु वृष्टिर्न भवतीति । किमत्र प्रसज्यते ? सत्सु भवतीति । सम्भवो नामाविनाभाविनोऽर्थस्य सत्ताग्रहणदन्यस्य सत्ताग्रहणम्, यथा– द्रोणस्य सत्ताग्रहणादाढकस्य सत्ताग्रहणम्, आढकस्य सत्ताग्रहणात् प्रस्थस्येति । अभावः = विरोधी, अभूतं भूतस्य, अविद्यमानं वर्षकर्म विद्यमानस्य वाय्वभ्र- संयोगस्य प्रतिपादकम्, विधारके हि वाय्वभ्रसंयोगे गुरुत्वादपां पतनकर्म न भवतीति ? ॥ १ ॥ सत्यम् एतानि प्रमाणानि, न तु प्रमाणान्तराणि । प्रमाणान्तरं च मन्य- मानेन प्रतिषेध उच्यते । सोऽयम्— शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावा- नर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः ॥ २ ॥ अनुपपन्नः प्रतिषेधः । कथम् ? 'आप्तोपदेशः शब्दः' इति, न च शब्दलक्षण- मैतिह्याद्व्यावर्तते । सोऽयं भेदः सामान्यात् सङ्गृहीत इति । प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षस्य फल से आपादन (प्रत्ययविशेषप्रसक्ति) को 'अर्थापत्ति' कहते हैं । आपत्ति = प्राप्ति, अर्थात् प्रसङ्ग । जहाँ अभिधीयमान अर्थ में अन्य अर्थ प्रसक्त हो उसे 'अर्थापत्ति' कहते हैं । जैसे—'मेघों के न होने पर वृष्टि नहीं होती' । यहाँ अन्य अर्थ प्रसक्त हुआ—'मेघों के होने पर वृष्टि होती हैं' । सम्भव से तात्पर्य हैं; 'अविनाभावी अर्थ की सत्ता के ग्रहण से अन्य की सत्ता का भी ग्रहण' । जैसे—द्रोण (परिमाणविशेष) की सत्ता के ग्रहण से आढक की सत्ता का ग्रहण, आढक की सत्ता के ग्रहण से प्रस्थ की सत्ता का ग्रहण । अभाव कहते हैं विरोधी को, यथा-भूत का विरोधी अभूत । जैसे—वर्षा का अविद्यमान होना विद्यमान वायु-मेघ के संयोग का प्रतिपादक है अर्थात् मेघ होने पर वृष्टि का अभाव बतलाता है कि धारणाविरोधी वायु-मेघ संयोग के गुरु होने से जल का पतन नहीं होगा ? ॥ १ ॥ समाधान—अवश्य ये प्रमाण हैं; परन्तु प्रमाणान्तर नहीं हैं । प्रमाणान्तर मानकर हमारे पूर्वोक्त परिगणन का निषेध किया जा रहा है, यह उचित नहीं; क्योंकि— शब्द में ऐतिह्य का तथा अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव हो जाने से, और सम्भव या अभाव के प्रमाणान्तर न होने से (प्रमाणचतुष्ट्व का निषेध कैसे होगा !) ॥२॥ यह परिगणन का निषेध नहीं बनता; क्योंकि हमने पीछे कहा है—'आप्तोपदेश शब्द प्रमाण होता है' (१. १. ७) । यह शब्द प्रमाण ऐतिह्य से व्यावृत्त नहीं होता । अतः यह ऐतिह्यरूप शब्द का भेद समानतया शब्द में ही अन्तर्भूत (संगृहीत) हो सकता CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० सम्बद्धस्य प्रतिपत्तिरनुमानम् । तथा चार्थपत्तिसम्भवाभावाः । वाक्यार्थसम्प्रत्य- येनानभिहितस्यार्थस्य प्रत्यनीकभावाद् ग्रहणमर्थापत्तिरनुमानमेव । अविनाभाववृत्त्या च सम्बद्धयोः समुदायसमुदायिनोः समुदायेनेतरस्य ग्रहणं सम्भवः, तदप्यनुमानमेव । 'अस्मिन् सतीदं नोपपद्यते' इति विरोधित्वे प्रसिद्धे कार्यानुत्पत्त्या कारणस्य प्रतिबन्धकमनुमीयते । सोऽयं यथार्थ एव प्रमाणोद्देश इति ॥ २ ॥ अर्थापत्तिप्रामाण्यपरीक्षा 'सत्यमेतानि प्रमाणानि, न तु प्रमाणान्तराणि' इत्युक्तम्, अत्रार्थापत्तेः प्रमाण- भावाभ्यनुज्ञा नोपपद्यते । तथा हीयम्— अर्थापत्तिरप्रमाणमनैकान्तिकत्वात् ? ॥ ३ ॥ असत्सु मेघेषु वृष्टिनं भवतीति सत्सु भवतीत्येतदर्थादापद्यते, सत्स्वपि चैकदा न भवति—सेयमर्थापत्तिरप्रमाणमिति ? ॥ ३ ॥ नानैकान्तिकत्वमर्थापत्तेः, अनर्थापत्तावर्थापत्त्यभिमानात् ॥ ४ ॥ है । प्रत्यक्ष द्वारा सम्बद्ध व्याप्यव्यापकभावापन्न अप्रत्यक्ष अर्थ का प्रतिपादन करना अनुमान का कार्य है । आपके अर्थापत्ति, संभव, और अभाव भी यही कार्य करते हैं । वाक्यार्थज्ञान से अनभिहित अर्थ का विरोधी भाव से ज्ञान अर्थापत्ति कहलाता है, यह अनुमान ही तो है । अविनाभाववृत्ति से सम्बद्ध समुदाय-समुदायी के समुदाय से दूसरे अर्थ का ग्रहण होना 'सम्भव' कहलाता है, यह भी अनुमान ही है । 'इसके होने पर यह नहीं होता'—ऐसे विरोधी प्रतिबन्धक के प्रसिद्ध होने पर कार्य की अनुपपत्ति से प्रति- बन्धक कारण का अनुमान होता है, अतः 'अभाव' भी अनुमान ही है । इसलिए हमारा प्रमाणपरिगणन यथार्थ ही है ॥ २ ! शङ्का—आपने कहा-'सचमुच ये प्रमाण हैं, परन्तु प्रमाणान्तर नहीं हैं'; यहाँ अर्थापत्ति में प्रमाणत्वस्वीकृति हमें जची नहीं; क्योंकि यह— अर्थापत्ति अप्रमाण है, अनेकान्तिक (व्यभिचार) होने से ? ॥ ३ ॥ 'मेघों के न होने पर वृष्टि नहीं होती' इस वाक्य से अर्थापत्ति द्वारा आप यह गृहीत करते हैं कि 'मेघ होने पर वृष्टि होती है'; परन्तु सच्चाई यह है कि कभी-कभी मेघ होने पर वृष्टि नहीं भी होती । अतः यह अर्थापत्ति प्रमाण नहीं बनता ? ॥ ३ ॥ उत्तर—अर्थापत्ति में व्यभिचार नहीं है; क्योंकि— अनर्थापत्तिरूप उक्त उदाहरण में अर्थापत्त्यभिमान किया जाने से ॥ ४ ॥
५. सू० ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३९
५. सू० ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३९ 'असति कारणे कार्यं नोत्पद्यते' इति वाक्यात्प्रत्यनीकभूतोऽर्थः सति कारणे कार्यमुत्पद्यते इत्यर्थादापद्यते । अभावस्य हि भावः प्रत्यनीक इति । सोऽयं कार्योत्पादतः सति कारणेऽर्थादापद्यमानो न कारणस्य सत्तां व्यभिचरति, न खल्वसति कारणे कार्यमुत्पद्यते, तस्मान्नानेकान्तिकी । यत्तु सति कारणे निमित्तप्रतिबन्धात् कार्यं नोत्पद्यत इति ? कारणधर्मोऽसौ, न त्वर्थापत्तेः प्रमेयम् । किं तर्ह्यस्याः प्रमेयम् ? सति कारणे कार्यमुत्पद्यते इति योऽसौ कार्योत्पादः कारणस्य सत्तां न व्यभिचरति तदस्याः प्रमेयम् । एवं तु सत्यनर्थापत्तावर्थापत्त्यभिमानं कृत्वा प्रतिषेध उच्यते इति । दृष्टश्च कारणधर्मो न शक्यः प्रत्याख्यातुमिति ॥ ४ ॥ प्रतिषेधाप्रामाण्यं चानेकान्तिकत्वात् ॥ ५ ॥ अर्थापत्तिर्न प्रमाणमनेकान्तिकत्वादिति वाक्यं प्रतिषेधः । तेनानेनार्थापत्तेः प्रमाणत्वं प्रतिषिध्यते, न सद्भावः-एवमनेकान्तिको भवति । अनेकान्तिकत्वाद- प्रमाणेनानेन न कश्चिदर्थः प्रतिषिध्यते इति ॥ ५ ॥ 'कारण न होने पर कार्य नहीं होता' इस सिद्धान्त से 'कारण होने पर कार्य होता हैं'—यह विरोधी अर्थ अनुमान से ज्ञात हो जाता है । अभाव का भाव-विरोधी अर्थ है । यह कार्योत्पत्ति अनुमान से मालूम होती हुई कारण की सत्ता को व्यभिचरित नहीं करती । यह तो नहीं होता कि कारण न होने पर भी कार्य होता है । अतः अर्थापत्ति में अनै- कान्तिकत्व दोष कैसे दिया जा सकता है ! यह भी होता है कि 'कारण होने पर भी निमित्तप्रतिवन्ध से कार्य उत्पन्न नहीं होता' ? यह प्रतिबन्धक कारण-धर्म है । ऐसा उदाहरण अर्थापत्ति का प्रमेय नहीं बन सकता । तो इसका प्रमेय क्या है ? 'कारण होने पर कार्य होता हैं' इस व्याप्ति से जो कार्योत्पत्ति होती है वह कारण की सत्ता को व्यभिचरित न करे तो वैसा स्थल अर्थापत्ति का प्रमेय बन सकता है । पूर्वपक्षी का उदाहरण अर्थापत्ति का नहीं था, परन्तु उसने उसे उदाहरण मानकर प्रामाण्य-प्रतिषेध में उपस्थित कर दिया । यदि एक बार कहीं प्रतिबन्धक कारणधर्म प्रत्यक्ष कर लिया गया हो तो उसका खण्डन नहीं किया जा सकता है ॥ ४ ॥ व्यभिचारदोष होने से प्रतिषेध में प्रामाण्य भी नहीं बनता ॥ ५ ॥ 'अर्थापत्ति प्रमाण नहीं हैं, हेतु के अनैकान्तिक होने से'—यह पूर्वपक्षी ने कहा था । इस तरह वह अर्थापत्ति के प्रामाण्य का खण्डन कर सकता है, परन्तु उसकी सत्ता का खण्डन नहीं हुआ; ( क्योंकि लोक में ऐसा नहीं देखा जाता कि जो अनैकान्तिक है, वह सब होता ही नहीं ।) अतः यह प्रतिषेधहेतु स्वयं अनैकान्तिक बन गया । अनैकान्तिक होने के कारण इस प्रतिषेधहेतु से किसी अर्थ का प्रतिषेध कैसे किया जा सकता है ! ॥५॥
कारणधर्मो निमित्तप्रतिबन्धात् कार्यानुत्पादकत्वमिति ॥ ६ ॥
१४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० अथ मन्यसे—नियतविषयेष्वर्थेषु स्वविषये व्यभिचारो भवति, न च प्रति- षेधस्य सद्भावो विषयः ? एवं तर्हि— तत्प्रामाण्ये वा नार्थापत्त्यप्रामाण्यम् ॥ ६ ॥ अर्थापत्तेरपि कार्योत्पादेन कारणसत्ताया अव्यभिचारो विषयः । न च कारणधर्मो निमित्तप्रतिबन्धात् कार्यानुत्पादकत्वमिति ॥ ६ ॥ अभावप्रामाण्यसिद्धिः अभावस्य तर्हि प्रमाणभावाभ्यनुज्ञा नोपपद्यते । कथमिति ? नाभावप्रामाण्यं प्रमेयासिद्धेः ? ॥ ७ ॥ अभावस्य भूयसि प्रमेये लोकसिद्धे वैजात्यादुच्यते, नाभावप्रमाण्यम्; प्रमेया- सिद्धेरिति ॥ ७ ॥ अथायमर्थबहुत्वादर्थैकदेश उदाह्रियते— लक्षितेष्वलक्षणलक्षितत्वादलक्षितानां तत्प्रमेयसिद्धिः ॥ ८ ॥ तस्याभावस्य सिध्यति प्रमेयम् । कथम् ? लक्षितेषु वासःसु अनुपादेयेषु उपादेयानामलक्षितानामलक्षणलक्षितत्वाद् लक्षणाभावेन लक्षितत्वादिति । यदि यह कहो कि अर्थों में नियतविषयकत्व होने से स्वविषय में व्यभिचार बन सकता है, हम हेतु की सत्ता का निषेध नहीं कर रहे ? तब भी— प्रमाण माना जाने पर भी, वह प्रतिषेध अर्थापत्ति में सिद्ध नहीं होता ॥ ६ ॥ अर्थापत्ति का भी 'कार्योत्पत्ति ( वृष्टि ) से कारणसत्ता ( मेघसत्ता ) का व्यभिचार न होना' विषय है । कारणधर्म ( मेघसत्ता ) प्रतिबन्धकनिमित्त होने पर कार्य ( वर्षा ) की उत्पत्ति न करे तो वह अर्थापत्ति का उदाहरण नहीं बन सकता ॥ ६ ॥ शङ्का—अभाव को प्रमाण मानना आपका उचित नहीं; अभाव प्रमाण नहीं है; क्योंकि उसका कोई प्रमेय नहीं मिलता ? ॥ ७ ॥ क्योंकि अभाव का बहुत सा प्रमेय तो लोकसिद्ध ही है, इसमें वैजात्य नहीं है, अतः अभाव प्रमाण से सिद्ध होने वाला कोई प्रमेय न मिलने से वह प्रमाण नहीं है ? ॥ ७ ॥ उत्तर—अर्थबहुत्व होने पर भी अर्थैकदेश ही उपस्थित किया जा रहा है— लक्षितों में अलक्षणलक्षित होने से अलक्षित अभाव के प्रमेय बन जायेंगे ॥ ८ ॥ उस अभाव का भी प्रमेय बन सकता है, कौन ? किसी वस्तु का लक्षण कर देने पर उस लक्षण से व्यतिरिक्त पदार्थ । जैसे—चिह्नित तथा अचिह्नित, उभयविध वस्त्रों के रहते कोई किसी से अचिह्नित वस्त्र मँगवाता है तो वह झट चिह्नित वस्त्रों को उनमें से हटा कर अचिह्नित वस्त्र ले आता है । यहाँ उन अचिह्नित वस्त्रों का ज्ञान कैसे हुआ ?
११. सू०] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १४१
११. सू०] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १४१ उभयसन्निधावलक्षितानि वासांस्यानयेति प्रयुक्तो येषु वासस्सु लक्षणानि न भवन्ति तानि लक्षणाभावेन प्रतिपद्यते, प्रतिपद्य चानयति । प्रतिपत्तिहेतुश्च प्रमाणमिति ॥ ८ ॥ असत्यर्थे नाभाव इति चेन्न; अन्यलक्षणोपपत्तेः ॥ ९ ॥ यत्र भूत्वा किञ्चिन्न भवति तत्र तस्याभाव उपपद्यते । न चालक्षितेषु वासस्सु लक्षणानि भूत्वा न भवन्ति, तस्मात्तेषु लक्षणाभावोऽनुपपन्न इति ? न; अन्यलक्षणोपपत्तेः । यथाऽयमन्येषु वासस्सु लक्षणानामुपपत्तिं पश्यति, नैव- मलक्षितेषु । सोऽयं लक्षणाभावं पश्यन्नभावेनार्थं प्रतिपद्यत इति ॥ ९ ॥ तत्सिद्धेरुलक्षितेष्वहेतुः ? ॥ १० ॥ तेषु वासस्सु लक्षितेषु सिद्धिर्विद्यमानता येषां भवति, न तेषामभावो लक्षणानाम् । यानि च लक्षितेषु विद्यन्ते लक्षणानि, तेषामलक्षितेष्वभाव इत्यहेतुः । यानि खलु भवन्ति तेषामभावो व्याहत इति ? ॥ १० ॥ न; लक्षणावस्थितापेक्षासिद्धेः ॥ ११ ॥ केवल चिह्न न होना ही उन अचिह्नित वस्त्रों को चिह्नित वस्त्रों से पृथक् कर रहा था, अतः चिह्नाभाव वाले जितने वस्त्र मिले उन्हें वह ले आया। यहाँ चिह्नाभाव ही उस ज्ञान में कारण बना, अतः अभाव का प्रामाण्य सिद्ध है ॥ ८ ॥ 'अर्थ (सत्ता) के न होने पर अभाव नहीं बनेगा'—ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि उस अभाव का अन्य लक्षणों से उपपादन हो सकता है ॥ ९ ॥ जहाँ कुछ पहले है फिर वह न रहे, तब तो उसका अभाव बताना ठीक है, परन्तु जो है ही नहीं उसका अभाव कैसे होगा ? अचिह्नित वस्त्रों में तो कोई चिह्न था नहीं, फिर उनमें चिह्नाभाव का ज्ञान प्रयोक्ता को कैसे हो गया ?—यह पूर्वपक्षी का मन्तव्य भी उचित नहीं; क्योंकि अन्य लक्षणों द्वारा वहाँ उस अभाव का ज्ञान बन सकता है । यथा—वह प्रयोक्ता चिह्नित वस्त्रों में जैसे लक्षण पाता है वैसे अचिह्नितों में नहीं पावे तो 'वैसे लक्षण न पाना' ही एक तरह से उस अभाव का लक्षण उपपन्न हो गया और अचिह्नित अर्थ का बोधक बन गया ॥ ९ ॥ अलक्षितों में उस लक्षण का न होना अभाव की सिद्धि में हेतु नहीं बन सकता ? ॥ १० ॥ उन चिह्नित वस्त्रों में जिन लक्षणों की विद्यमानता है, उनका अभाव तो है नहीं, फिर जो लक्षण (चिह्न) लक्षित (चिह्नित) में हैं, उनका अलक्षितों में भी अभाव बताना हेतु कैसे बनेगा ? क्योंकि जो हैं उनका अभाव बताना तो विरुद्ध है ? ॥ १० ॥ अहेतु नहीं है; लक्षण(वस्थित की अपेक्षा से उसकी सिद्धि हो जायेगी ॥ ११ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० २. आ० न ब्रूमः–यानि लक्षणानि भवन्ति तेषामभाव इति, किन्तु केषुचिल्लक्षणा- न्यवस्थितानि, अनवस्थितानि केषुचित् । अपेक्षमाणो येषु लक्षणानां भावं न पश्यति तानि लक्षणाभावेन प्रतिद्यत इति ॥ ११ ॥ प्रागुत्पत्तेरभावोपपत्तेश्च ॥ १२ ॥ अभावद्वैतं खलु भवति—प्राक् चोत्पत्तेरविद्यमानता, उत्पन्नस्य चात्मनो हानादविद्यमानता । तत्रालक्षितेषु वासस्सु प्रागुत्पत्तेरविद्यमानतालक्षणो लक्षणानामभावः, नेतर इति ॥ १२ ॥ शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् [ १३-३९ ] ‘आप्तोपदेशः शब्दः’ इति प्रमाणभावे विशेषणं ब्रुवता नानाप्रकारः शब्द इति ज्ञाप्यते । तस्मिन् सामान्येन विचारः—किं नित्यः, अथानित्य इति ? विमर्श- हेत्वनुयोगे च विप्रतिपत्तेः संशयः । १. आकाशगुणः शब्दो विभुर्नित्योऽभिव्यक्तिधर्मक इत्येके । २. गन्धादिसह- वृत्तिर्द्रव्येषु सन्निविष्टो गन्धादिवदवस्थितोऽभिव्यक्तिधर्मक इत्यपरे । ३. आकाश- गुणः शब्द उत्पत्तिनिरोधधर्मको बुद्धिवदित्यपरे । ४. महाभूतसंक्षोभजः शब्दोऽना- श्रित उत्पत्तिधर्मको निरोधधर्मक इत्यन्ये । हम यह नहीं कहते कि ‘जो लक्षण हैं, उनका अभाव है’; अपितु ‘कुछ में लक्षणों के होने पर, कुछ अलक्षितों में व्यवस्थित (वृत्ति) भी रह जाते हैं, प्रयोक्ता जिन वस्तुओं में उन लक्षणों को नहीं देख पाता उनको लक्षणाभाव से जान लेता है’ ॥ ११ ॥ उत्पत्ति से पूर्व अभावोपपत्ति बन जाने से भी अहेतु नहीं है ॥ १२ ॥ दो प्रकार का अभाव होता है—१. उत्पत्ति से पहले वस्तु का न रहना, तथा २. उत्पन्न के नाश से न रहना । यहाँ अचिह्नित वस्त्रों में उत्पत्ति से पूर्व पहले वाला अभाव है, न कि दूसरे प्रकार का । अतः यहाँ वस्तु की अविद्यमानता के लक्षण का अभाव सिद्ध हुआ उससे प्रमेय का प्रतिपादन होने से वह प्रमाण है—यह सिद्ध हो गया ॥ १२ ॥ प्रमाण-लक्षण में ‘आप्तोपदेश’—यह विशेषण देकर ‘शब्द नाना प्रकार का होता है’ यह बताया है । उस शब्द पर साधारणतः विचार कर रहे हैं कि क्या वह नित्य है, या अनित्य ? क्योंकि विप्रतिपत्ति के विमर्शपिक्ष होने पर संशय हुआ ही करता है । वहाँ कुछ (मीमांसक) विद्वान् शब्द को विभु, नित्य तथा अभिव्यक्तिधर्मक मानते हैं । कुछ (साङ्ख्यकार) विद्वान् ‘शब्द गन्धादि के साथ द्रव्य में रहने वाला गन्धादि की तरह रहता हुआ अभिव्यक्तिधर्मक हैं’—ऐसा मानते हैं । दूसरे (वैशेषिक) विद्वान् शब्द को आकाश का गुण तथा उत्पत्तिनिरोधधर्मक मानते हैं । ‘महाभूतों के संयोगविशेष से उत्पन्न होनेवाला शब्द अनाश्रित है, उत्पत्तिधर्मा भी है, और निरोधधर्मा भी’—ऐसा कुछ (बौद्ध) विद्वान् मानते हैं ।
१३. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४३
१३. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४३ अतः संशयः—किमत्र तत्त्वमिति ? अनित्यः शब्द इत्युत्तरम् । कथम् ? 'आदिमत्त्वादैन्द्रियकत्वात् कृतकवदुपचाराच्च ॥ १३ ॥ आदिः = योनिः, कारणम्, आदीयते अस्मादिति । कारणवदनित्यं दृष्टम् । संयोगविभागजश्च शब्दः कारणवत्त्वादनित्य इति । का पुनरियमर्थदेशना—कारण- वत्त्वादिति ? उत्पत्तिधर्मकत्त्वादनित्यः शब्द इति, भूत्वा न भवति विनाशधर्मक इति । सांशयिकमेतत्—किमुत्पत्तिकारणं संयोगविभागौ शब्दस्य, आहोस्विदभि- व्यक्तिकारणम् ? इत्यत आह—ऐन्द्रियकत्वात् । इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्य ऐन्द्रियकः । किमयं व्यञ्जकेन समानदेशोऽभिव्यज्यते रूपा दिवत् ? अथ संयोगजाच्छब्दा- सन्ताने सति श्रोत्रप्रत्यासन्नो गृह्यत इति ? संयोगनिवृत्तौ शब्दग्रहणान्न व्यञ्जकेन समानदेशस्य ग्रहणम् । दारुव्रश्चने दारुपरशुसंयोगनिवृत्तौ दूरस्थेन शब्दो गृह्यते । न च व्यञ्जकाभावे व्यङ्ग्यग्रहणं अतः सन्देह होता है कि इनके कौन मत समीचीन हैं ? 'शब्द अनित्य हैं'—यह (नैयायिकों का) उत्तर है । कैसे ?— आदिमान् होने से, ऐन्द्रियक होने से, अनित्य की तरह उपचार होने से ॥ १३ ॥ आदि से तात्पर्य है योनि, अर्थात् कारण—जिससे आदान (उत्पादन) किया जाये । जो कारणवान् है वह अनित्य देखा गया है । शब्द भी संयोगविभागज होने से कारणवान् है, अतः अनित्य है । यह क्या अर्थदेशना (अर्थप्राप्ति) हुई कि 'कारण होने से' ? हमारा मतलव है उत्पत्तिधर्मवान् होने से शब्द अनित्य है, तथा वह होकर नहीं होता है (विनष्ट हो जाता है), अतः विनाशधर्मक है ! तब तो संशय उठ खड़ा होगा कि क्या ये संयोगविभाग शब्द के उत्पत्तिकारण हैं ? या अभिव्यक्तिकारण ? इसलिये कहते हैं—ऐन्द्रियक होने से । इन्द्रिय के सन्निकर्ष से गृहीत होनेवाला 'ऐन्द्रियक' कहलाता है । क्या यह शब्द व्यञ्जक (इन्द्रिय संयोग) से समानदेशस्थ एकाधिकरणवृत्ति होता हुआ रूप की तरह अभिव्यक्त होता है ? या संयोगज शब्द से शब्दसन्तान होने पर श्रोत्रेन्द्रिय से प्रत्यासन्न (सम्बद्ध) होता हुआ गृहीत होता हैं ? संयोगनिवृत्ति होने पर भी शब्द का ग्रहण होता है, अतः व्यञ्जक से समानाधिकरण हो कर उस समान देश का ग्रहण नहीं हो सकता । काष्ठछेदनकाल में परशुदारुसंयोग की निवृत्ति होनेपर भी दूरस्थ व्यक्ति को जैसे शब्द गृहीत होता है । व्यञ्जक के विना व्यङ्ग्य का ग्रहण नहीं हुआ करता । इसलिये यहाँ संयोग व्यञ्जक नहीं है । १. वेदानां नित्यत्वे शब्दप्रामाण्यप्रयोजकगुणविरहप्रयुक्ताप्रामाण्यसम्भवनिरासाय शब्दानित्यत्वप्रकरणमारभते सूत्रकारः ।
१४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० भवति, तस्मान्न व्यञ्जकः संयोगः, उत्पादके तु संयोगे संयोगजाच्छब्दाच्छब्द- सन्ताने सति श्रोत्रप्रत्यासन्नस्य ग्रहणम्-इति युक्तं संयोगनिवृत्तौ शब्दस्य ग्रहणमिति । इतश्च शब्द उत्पद्यते, नाभिव्यज्यते; कृतकवदुपचारात् । तीव्रं मन्दमिति कृतकमुपचर्यते = तीव्रं सुखं मन्दं सुखम्, तीव्रं दुःखं मन्दं दुःखमिति; उपचर्यते च तीव्रः शब्दः, मन्दः शब्द इति । व्यञ्जकस्य तथाभावाद् ग्रहणस्य तीव्रमन्दता रूपवदिति चेद् ? न; अभि- भवोपपत्तेः । संयोगस्य व्यञ्जकस्य तीव्रमन्दतया, शब्दग्रहणस्य तीव्रमन्दता भवति, न तु शब्दो भिद्यते; यथा—प्रकाशस्य तीव्रमन्दतया रूपग्रहणस्येति ? तच्च नैवम्; अभिभवोपपत्तेः । तीव्रो भेरीशब्दो मन्दं तन्त्रीशब्दमभिभवति, न मन्दः । न च शब्दग्रहणमभिभावकम्, शब्दश्च न भिद्यते । शब्दे तु भिद्यमाने युक्तोऽभिभवः । तस्मादुत्पद्यते शब्दो नाभिव्यज्यत इति । अभिभवानुपपत्तिश्च, व्यञ्जकसमानदेशस्याभिव्यक्तौ प्राप्त्यभावात् । 'व्यञ्जकेन समानदेशोऽभिव्यज्यते शब्दः' इत्येतस्मिन् पक्षे नोपपद्यतेऽभिभवः; न संयोग को उत्पादक मानने पर संयोगज शब्द से शब्दधारा सन्तान के उत्पत्ति-क्रम से श्रोत्रप्रत्यासन्न शब्द का ग्रहण होता है, अतः संयोग की निवृत्ति होने पर शब्द का ग्रहण उपपन्न ही है । इस कारण भी शब्द अनित्य है कि वह उत्पन्न होता है, अभिव्यक्त नहीं होता । यतः अनित्य में तीव्रता या मन्दता का आरोप किया जाता है । जैसे सुख में तीव्रतादि का आरोप करके 'सुख तीव्र है, मन्द है', 'दुःख तीव्र है, मन्द है' कहा जाता है, उसी प्रकार 'शब्द तीव्र है, मन्द है'—ऐसा उपचार होता है । यदि कहें कि व्यञ्जक के वैसा होने से तीव्रतादि का ग्रहण होता है, रूप की तरह ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि शब्द स्वाभिर्भाव से दूसरे आविर्भूत शब्द को दबाता है । तात्पर्य यह है—यदि कहो कि व्यञ्जक संयोग की तीव्रता-मन्दता से शब्द का ग्रहण होने से उसमें तीव्रता-मन्दता होती है, शब्द भिन्न नहीं होता; जैसे—प्रकाश की तीव्रता- मन्दता से रूप का ग्रहण होता है ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि तीव्र भेरीशब्द मन्द वीणाशब्द को दवा देता है, न कि मन्द तीव्र को । शब्दज्ञान यहाँ अभिभावक नहीं है; और शब्द आपके मत में भिन्न नहीं होता । हाँ ! शब्द यदि भिन्न हो तब तो वैसा अभि- भव युक्त है। इसलिये यह स्थिर हुआ कि शब्द उत्पन्न होता है, अभिव्यक्त नहीं होता । अभिभव अनुपपन्न भी होने लगेगा; क्योंकि व्यञ्जक समानदेशवाले शब्द की प्राप्ति अन्यदीय शब्द की अभिव्यक्ति के समय उपपन्न नहीं है । तात्पर्य यह है कि 'व्यञ्जक से समानदेशस्थ शब्द अभिव्यक्त होता है'—इस मत में अभिभव उपपन्न नहीं होता; क्योंकि भेरीशब्द से तन्त्रीशब्द का संयोग तो हुआ नहीं । अर्थात् भेरीसंयोग तन्त्री से नहीं है ।
१४. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४५
१४. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४५ हि भेरीशब्देन तन्त्रीस्वनः प्राप्त इति । अप्राप्तेऽभिभव इति चेत् ? शब्दमात्राभिभवप्रसङ्गः । अथ मन्येत-असत्यां प्राप्तावभिभवो भवतीति ? एवं सति यथा भेरीशब्दः कञ्चित्तन्त्रीस्वनमभिभवति, एवमन्तिकस्थोपादानमिव दवीयःस्थोपादानानपि तन्त्रीस्वनानभिभवेद्; अप्राप्ते- रविशेषात् । तत्र क्वचिदेव भेर्यां प्रणादितायां सर्वलोकेषु समानकालास्तन्त्रीस्वना न श्रूयेरन्निति । नानाभूतेषु शब्दसन्तानेषु सत्सु श्रोत्रप्रत्यासत्तिभावेन कस्यचिच्छ- ब्दस्य तीव्रेण मन्दस्याभिभवो युक्त इति । कः पुनरयमभिभवो नाम ? ग्राह्य- समानजातीयग्रहणकृतमग्रहणम् = अभिभवः । यथा-उल्काप्रकाशस्य ग्रहणार्ह- स्यादित्यप्रकाशेनेति ॥ १३ ॥ न; घटाभावसामान्यनित्यत्वान्नित्येष्वप्यनित्यवदुपचाराच्च ? ॥ १४ ॥ न खलु आदिमत्त्वादनित्यः शब्दः । कस्माद् ? व्यभिचारात् । आदिमतः खलु घटाभावस्य दृष्टं नित्यत्वम् । कथमादिमान् ? कारणविभागेभ्यो हि घटो न भवति । कथमस्य नित्यत्वम् ? योऽसौ कारणविभागेभ्यो न भवति, न तस्याभावो भावेन कदाचिन्निवर्त्यत इति । यदि संयोग न होने पर भी अभिभव मानोगे तो शब्दमात्र का अभिभव होने लगेगा । मतलब यह है कि 'संयोग न होने पर अभिभव होता है'—ऐसा मानोगे तो ऐसी स्थिति में जैसे भेरीशब्द समीपस्थ वीणा शब्द को अभिभूत कर देता है, वैसे ही समीपस्थ अभिभव की तरह बहुत दूर के वीणाशब्द को अभिभूत करने लगेगा; क्योंकि संयोग की अप्राप्ति दोनों जगह समान है । तब कहीं एक भेरी के बजते ही उस समय संसार में सभी जगह के वीणाशब्द अभिभूत होने लगेंगे ! उचित तो यह है कि नाना प्रकार के शब्दसन्तानों के रहते श्रोत्र के सन्निकर्ष में किसी शब्द के तीव्र होने पर मन्द शब्द अभिभूत हो जाता है । यह 'अभिभव' क्या चीज है ? ग्रहण करने योग्य वस्तु के सजातीय ग्रहण से कृत अग्रहण ही 'अभिभव' कहलाता है । जैसे ग्रहणयोग्य उल्काप्रकाश का सूर्य के प्रकाश से अभिभव (अग्रहण) हो जाता है ॥ १३ ॥ [ गत सूत्र में दिखाये गये हेतुओं में व्यभिचार दिखाते हैं—] घटाभावसामान्य के नित्य होने से तथा नित्य में अनित्यवद् आरोप से (वे तीनों हेतु शब्द का अनित्यत्व सिद्ध नहीं कर सकते ?) ॥ १४ ॥ आदि(कारण)मान् होने से शब्द अनित्य है—ऐसा नहीं है; क्योंकि वह हेतु व्यभिचरित है । आदिमान् घटाभाव का नित्यत्व देखा गया है । आदिमान् कैसे है ? क्योंकि कारणों का विभाग हो जाने पर घट नहीं रहता । नित्य कैसे है ? कारणों के विभक्त होने पर जो नहीं होता, उसका अभाव किसी भी सत्ता से कभी निवृत्त नहीं हो सकता । न्या० द०
१४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० यदप्यैन्द्रियकत्वादिति ? तदपि व्यभिचरति—ऐन्द्रियकं च सामान्यं नित्यं चेति । यदपि कृतकवदुपचारादिति ? एतदपि व्यभिचरति—नित्येष्वनित्यवदुपचारो दृष्टः। यथा हि—भवति वृक्षस्य प्रदेशः, कम्बलस्य प्रदेशः, एवमाकाशस्य प्रदेशः, आत्मनः प्रदेश इति भवतीति ? ॥ १४ ॥ तत्त्वभाक्तयोर्नानात्वविभागादव्यभिचारः ॥ १५ ॥ नित्यमित्यत्र किं तावत्तत्त्वम् ? अर्थान्तरस्यानुत्पत्तिधर्मकस्याऽऽत्महाना- नुपपत्तिर्नित्यत्वम् । तच्चाभावे नोपपद्यते, भाक्तं तु भवति यत्तत्रात्मानमहासीद्यद् भूत्वा न भवति, न जातु तत्पुनर्भवति; तत्र नित्य इव नित्यो घटाभाव इत्ययं पदार्थ इति । तत्र यथाजातीयकः शब्दः न तथाजातीयकं कार्यं किञ्चिन्नित्यं दृश्यत इत्यव्यभिचारः ॥ १५ ॥ यदपि सामान्यनित्यत्वादिति ? इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्यमैन्द्रियकमिति— सन्तानानुमानविशेषात् ॥ १६ ॥ नित्येष्वव्यभिचार इति प्रकृतम् । नेन्द्रियग्रहणसामर्थ्याच्छब्दस्यानित्यत्वम्, ऐन्द्रियकत्व हेतु भी व्यभिचारी है; क्योंकि वह ऐन्द्रियक सामान्य है, वह नित्य देखा गया है, अतः आदिमत्त्व हेतु की तरह व्यभिचारी है । कृतकवदुपचार हेतु भी अनित्य है; क्योंकि नित्यों में भी अनित्यत्व का उपचार देखा गया है, जैसे—'कम्बल का प्रदेश' (प्रान्त भाग), 'वृक्ष का प्रदेश'—ऐसा बोलते हैं; वैसे ही 'आकाश का प्रदेश' (प्रान्त भाग) 'आत्मा का प्रदेश'—यह भी बोला जाता है । अतः यह हेतु भी अनित्य है ? ॥ १४ ॥ तत्त्व तथा भाक्त में नानात्वरूप विभाग है, अतः उन हेतुओं में व्यभिचार नहीं है ॥ १५ ॥ नित्य से आपका क्या मतलब है ? जिस अनुत्पत्तिधर्मा अर्थान्तर की आत्महानि न हो उसे हम 'नित्य' कहते हैं । नित्यत्व घटाद्यभाव में नहीं बनता, हाँ, भाक्तप्रयोग बन सकता है । जिसने अपने को ध्वस्त कर दिया है, जो होकर नहीं होता, वह कभी नहीं हो सकता—इसलिये यों 'नित्य' की तरह होने से नित्य घटाभाव का प्रयोग होता है । परन्तु जैसी जाति का शब्द है वैसी जाति का कार्य कहीं नित्य नहीं देखा जाता, अतः कृतकवदुपचार हेतु भी व्यभिचारी नहीं है ॥ १५ ॥ तथा वह जो 'ऐन्द्रियकत्व' हेतु सामान्य में नित्यत्व का व्यभिचार बताया था ? वह भी नहीं बनता; क्योंकि ऐन्द्रियक हेतु के— सन्तानानुमान का विशेषण होने से ॥ १६ ॥ नित्यत्व में अव्यभिचार है । हम यह नहीं कहते कि इन्द्रियग्रहणसामर्थ्य से शब्द में
१७. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४७
१७. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४७ किं तर्हि ? इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्यत्वात् सन्तानानुमानं तेनानित्यत्वमिति ॥ १६ ॥ यदपि नित्येष्वप्यनित्यवदुपचारादिति ? न; कारणद्रव्यस्य प्रदेशशब्देनाभिधानात् ॥ १७ ॥ नित्येष्वप्यव्यभिचार इति । एवमाकाशप्रदेशः, आत्मप्रदेश इति नात्राकाशात्मनोः कारणद्रव्यमभिधीयते, यथा कृतकस्य । कथं ह्यविद्यमानमभिधीयते, अविद्यमानता च ? प्रमाणतोऽनु- पलब्धेः । किं तर्हि तत्राभिधीयते ? संयोगस्याव्याप्यवृत्तित्वम् । परिच्छिन्नेन द्रव्येणाकाशस्य संयोगो नाकाशं व्याप्नोति अव्याप्य वर्त्तत इति, तदस्य कृतकेन द्रव्येण सामान्यम् । न ह्यामलकयोः संयोग आश्रयं व्याप्नोति । सामान्यकृता च भक्तिः-आकाशस्य प्रदेश इति । अनेनात्मप्रदेशो व्याख्यातः । संयोगवच्च शब्दबुद्ध्यादीनामव्याप्यवृत्तित्वमिति । परीक्षिता च तीव्र- मन्दता शब्दतत्त्वं न भक्तिकृतेति । कस्मात् पुनः सूत्रकारस्यास्मिन्नर्थे सूत्रं न श्रूयते इति ? शीलमिदं भगवतः सूत्रकारस्य—बहुष्वधिकरणेषु द्वौ पक्षौ न व्यवस्थापयति, तत्र शास्त्रसिद्धान्तातत्त्वावधारणं प्रतिपत्तुमर्हतीति मन्यते । अनित्यत्व है, अपितु इन्द्रियसामीप्य होने पर ग्राह्य होने के कारण शब्द का सन्ताना- नुमान है, अतः उसमें अनित्यत्व है ॥ १६ ॥ पूर्वपक्षी ने जो नित्यों में अनित्यवदुपचार बताया था ? वह भी नहीं बनता; क्योंकि— कारणद्रव्य का प्रदेशशब्द द्वारा अभिधान होने से ॥ १७ ॥ नित्यों में व्यभिचार नहीं बनता । आकाशप्रदेश, आत्मप्रदेश—आदि में आत्मा या आकाश का कारणद्रव्य नहीं कहा जाता, जैसे अनित्य वृक्षादि में पदार्थों का कहा जाता है । वहाँ अविद्यमान का क्या अभिधान करते हो, अविद्यमान की तो प्रमाण से उपलब्धि नहीं हो पाती ? वहाँ केवल संयोग का अव्याप्यवृत्तित्व अभिहित है । परिच्छिन्न द्रव्य से आकाश का संयोग है, वह आकाश को व्याप्त करके नहीं रहता, अपितु अव्याप्त होकर रहता है । यह बात अनित्य द्रव्य के समान है, जैसे—दो आमलकों का संयोग अपने आश्रय को व्याप्त करके नहीं रहता, अतः यह—'आकाश का प्रदेश' यह सामान्य सामान्यप्रयुक्त भाक्त प्रयोग है । इससे 'आत्मप्रदेश' शब्द का व्याख्यान भी समझ लें । शब्द, बुद्धि, सुख-आदि की तरह संयोगवत्त्व अव्याप्यवृत्ति है । यो, शब्द की तीव्रता- मन्दता के बारे में निर्णय कर दिया गया, उसे पूर्वपक्षी 'आकाशप्रदेश' की तरह भाक्त नहीं कह सकता । फिर सूत्रकार ने इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए कोई सूत्र क्यों न बनाया ? यह भगवान् सूत्रकार का बडप्पन है कि वे कई विषयों में जानबूझ कर दो पक्ष का उत्थान नहीं करते । वहाँ वे समझते हैं कि जिज्ञासु शिष्य शास्त्र-सिद्धान्तों के सहारे