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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥! 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥? 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥! 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥? 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥! 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥-𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥, 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥 𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥, 𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥𑁥 𑁥𑁥

किन्तु यह सब विचार तबही सार्थक था, जब उसका हृदय वासनामय संसारके विकृतियोंसे सर्वथा विरक्त हो चुका होता, वह वैराग्य की उस चरम सीमा पर्यन्त पहुँचनेमें समर्थ होता। वह यह सब सोचता तो अवश्य था, पर मन की चंचलताका वह सर्वथा विसर्जन कर पानेमें सफल नहीं हुआ था। कभी वह सोचता भी, कि क्या सच मुच इस समस्त दृश्य जगत्का कोई नियन्ता है।या सब पदार्थ अनादि सिद्ध हैं? सर्वज्ञता वास्तविक है? या केवल अपनी दुर्बल धारणा को तृप्त कर संतुष्ट रहना मात्रका यह एक भ्रम है। इस प्रकार अनेक प्रकार वितर्क वह कर तो रहाथा परंतु उस पर कोई भी विचार स्थिरता नहीं उपलबध करा रहा था, वह विचारो द्वारा केवल शब्द योजना तो रचसका, पर यथार्थ सत्य को वह प्राप्त नकर सका। वास्तव में विचार का रूप केवल उस कल्पित पत्र के समान ही है। जिसके आधारपर वास्तविकता की स्थिति कुछ भी संभव नहीं हो पाती। विचारोंसे केवल तर्कोंका ही जाल फैलाया जा सकताहै पर तत्त्व लाभ संभव नहीं हो सकता। अंततोगत्वा वह उस सर्वज्ञ देवकी पावन वाणी को संशयके ही दृष्टिकोण से, जिसे आज कलके वैज्ञानिक सत्य नामसे पुकारते हैं वह भी विचारनेका ही प्रयत्नकरता रहा। उसका विचार ऐसाथा जैसे कि कोई नौका के दो तख्तोंपर पैर रखकर पारहोनेका प्रयत्न करे। अथवा वह उस नौसिखिये के समान था, जो तैराकी; का पूर्ण सिद्धांत जानकरभी नदीकी अगाधधारामें कूदपड़ा था, जो तैरने की कलाका सिद्धांत तो विचारता रहता था पर हाथ-पैर मारने पर, वह जलतरंगोंके थपेड़ोंको सहनेमें असमर्थहोकर या डुब-कियाँ खाता था, अथवा चक्कर खा, कर विवश होकर अपनी जान गंवा बैठताथा। ऐसेही इस संसार चक्र से पार होनेके लिए केवल सिद्धांत ज्ञान पर्याप्त नहीं। ज्ञानके साथ तो उस प्रकारके क्रियात्मक बलकी आवश्यकता थी, जिससे कर्म रूपी जल तरङ्गो को रोका जासके। केवल ज्ञानके द्वारा, वैराग्यके अभावमें साधक पग-पग भटकता है, पग-पग विष की घूंट पीकर तृषा शान्त करनेका व्यर्थ यत्न करता है। यही कारण था कि उस युवक पंडित, का अन्तस्तल विकल्पों तथा तर्कों का ही एक ऐसा क्षेत्र बन चुका था।जिसमें मात्र एक संशय रूपी तृण ही उग रहा था। परिणामतः उसे, ज्ञान द्वारा मिलने वाला आत्मीय आनंद प्राप्त करने का मार्ग अवरुद्ध होग-- तृषातुर चातककीनाई कभी अपने हृदयको शून्य समझने लगता था।तोकभी प्रत्येक विकल्पमें अपने ज्ञानी होनेका भाव अनुभव करके अहङ्कारसे मदान्ध होकर अन्य समस्त ज्ञानी संसारको तुच्छ समझता। विकल्प उसे चञ्चल बनादेते तथा कभी वह मोहग्रस्त होकर उस मद्यपकी भांति मदमस्त बना रहता। विकल्प हीउसे अज्ञानकी अंधकार गुहामें धकेलदेते जिसमें वह भटक कर मार्ग भ्रष्ट बनजाता। विकल्प कभी उसके हृदयको दुर्बल बनादेते जिससे अकारण भयभीत होकर वह जीवन से ऊबजाता। विचार रूपी आवर्त्त उसके विवेक रूपी जहाजको निगलने का प्रयास करते हुए उसे अशान्त बनाये रखते। इस प्रकार विकल्पों तथा संशयोंके गहन घनघोर तममें फँसकर वह दिशा विमूढ़ बनकर कभी इधरतो कभी उधर भटकता हुआ एक प्रकार से पागल बनरहाथा।उसे ज्ञानके आधार परपरम सुख तो दूर संसार रूपी महा दुःखसे भी मुक्ति नहीं मिलसकतीथी। उसने विचार किया कि इस विकट संशय चक्रसे छुटकारा पाकर मुझे, किसी सर्वज्ञके पास जाकर अपने सन्देहों का निवारण कराना चाहिए? यदि वह ज्ञान यथार्थ होगा, तभी स्थिर हो, शांत जीवन लाभ कर सकूँ गा, या फिर इस संशयके जल में डूबकर प्राण, दे दूँगा। इस प्रकार मन तथा हृदयके अंतर्द्वन्द्वमें उसका जीवन उलझ कर रह गया। जीवन के संशय विषैले बाणोंके समान उसे निरन्तर पीडितकरते रहते थे, पर इस बात का उत्तर वह किसी भी तरह, प्राप्त नहीं कर सका था, क्या सच मुच इस संसार चक्रसे छूटने का कोई उपाय भी होता है. क्या सच मुच इस असत्य संसार के उस किनारे पर जीवन नौका जाकर ठहरती है, क्या कोई ऐसा स्थान भी है जहाँ पहुँच कर इस मन की चंचलता सदाकेलिए शांत होजाय? क्या इस प्रकारके विचारों रूपी दल दल से पार होकर अन्तरात्मा की वह परम शुद्धावस्था प्राप्त होसकती है। जिसकेलिए लोग तप का आचरण करते हैं, जिससे कि जगत् के प्रलोभन भी उसके मन को विचलित नहीं करते। शास्त्र तो कहतेहैं... कि इस जग के ऊपर प्रत्येक वस्तु का जो यथार्थ स्वरूप ज्ञान करानेमें पूर्ण समर्थ हैं, जहां पर मन की सारी वासनाएं शान्त हो जाती हैं। पर क्या वे, सच ही सब कुछ जान रहे हैं।या, केवल दूसरोंको उपदेश देकर मात्र अपने शिष्योंकी संख्याबढ़ानेका ही, मार्ग इन ज्ञानीयों शास्त्रियों तथा पंडितों ने, निकाल रखा 199

जगत का प्रत्येक पदार्थ भी, अपने उत्पत्ति-विनाश का कारण अपने आप, या अपने आपमें समाया हुआ? कदापि नहीं? यह स्वाभाविक नियम है, कि जो वस्तु या पदार्थ या तो था सदा से या नहीं था प्रथम तो पश्चात भी कभी नहीं होगा? इसलिए सब प्रकारों से ही यह सिद्ध, प्रमाण और तर्कसम्मत? कि जो कुछ संसार बना, अवश्य उस सबका सब उपादान या तो था सदा, और उस सबको बनाने वाला? जो था सो ही सदा, और जो सबका स्वामी? सो सदा ही है! वह चेतन है, और चेतन रूप का नाम चेतन ही होता अचेतन का नाम क्या? चेतन सर्वज्ञ ही होता है सब उपादान कारण को जान, सो ही ज्ञान पूर्वक रच सकता और जो सब प्रकारों से उत्पत्ति-विनाश का उपादान या कारण ही नहीं तो वह क्या है? यह उपादान सो प्रकृति का नाम ही है, जो कि जड़स्वरूप ही केवल सब प्रकारों से जड़ का, नाम केवल; सो कार्यरूप से सम्पूर्ण संसार प्रत्यक्ष अपने आप ही सब प्रकारों से सिद्ध सब को, जो सो अपने आप अचेतन? कदापि चेतन नहीं? सो ही सदा से केवल था, सो कार्य बनकर सब रूप जगत सब कैसा सो है? सब प्रकार से ही सदा सत्य है, जो सो सत्य ही सदा रहता है, या नहीं सदा रहता? सत्य का सर्वथा ही कभी अभाव तो नहीं होता कहता है, सो सब प्रकार से सदा सत्य है, सो अपने स्वरूप करके ही विवर्तित हो सकता; सो तो सदा सत्य, सो ही सदा परिणामी अब सूक्ष्म और स्थूल सब जगत जिसको दोनों प्रकार विवर्तता करके कहा जाता गया, जिस रूप करके सब जगत कार्यरूप सत्य ही सब बना, सो तो नाम रूप-रंग सब मिथ्या हुए, केवल सूक्ष्म रूप ही सो सत-प्रतिपादक का रूप सत्य रहा, न किसी प्रकार का भी यह संसार सब भ्रम था या कोई भ्रम का रूप आकाश का, गंधर्व का, तृष्णा का, शशरूप का, सो सब नाम रूप-रंग सब का नाम-कर्म सब मिथ्या रूप जगत का सत-रूप से सत्य-सत्य होकर सब प्रकाश रूप सब नाम-रूप मिथ्या रूप, माया-सत्य स्वरूप सत रूप सब जगत का रूप सत-स्वरूप ही प्रकाश सब का केवल या अविद्या विद्या दोनों रूप कहा जाता है, सो अविद्या का प्रकाश भी, सो अविद्या का सत ही! अब यह अविद्या अज्ञान-रूप का प्रकाश ज्ञान से अविद्या का नाश सब हो कर केवल ही ब्रह्मरूप ही सब सत प्रकाश रूप सब रहा, सब ब्रह्म; ब्रह्म सब का सत्य, सब माया सत्य; ब्रह्म ही सब रूप में सो प्रकाश ही प्रकाश सब कार्य सब सत्य स्वरूप प्रकाश? फिर जो अविद्या को सत्य कहा अविद्या सत रूप सब माया प्रकाश? फिर ज्ञान का अविद्यारूप से विरोध कैसा ? ज्ञान का अविद्यारूप से क्या विरोध रहेगा? सो तो जो अविद्या है, सो ब्रह्म का अज्ञानांश रूप सब केवल सत्य रूप अविद्या? ज्ञान तो अज्ञान अविद्या नाम-कर्म सब अविद्या ही, अविद्यारूप ज्ञान अब जो सर्वज्ञ सर्वव्यापक सब में सत रूप प्रकाश रूप ज्ञान रूप सो सच्चिदानन्द-स्वरूप है, सो सब का केवल सब ज्ञान रूप सत्य प्रकाश रूप ज्ञान ही अज्ञानरूप हो कर लगा सो लगा, कि सब ही सो ज्ञान रूप अविद्या अविद्यारूप हो कर लगा अविद्या ज्ञान का सब ही जब प्रकाश स्वरूप ज्ञान अज्ञान का नाश कर के सब ज्ञान रूप ही ज्ञान रहा, सो सब ज्ञान ही रहा सो केवल ज्ञान, ज्ञान केवल सत, ज्ञान केवल सत्य अब केवल ज्ञान का नाम ही सत रूप केवल सब जगत हुआ सो ज्ञान निराकार है, साकार का नाम केवल ज्ञान का नाम कैसा होगा क्या? साकार कैसा है? सो ज्ञान का ही, ज्ञान रूप ही प्रकाश हुआ? केवल ज्ञान केवल साकार का रूप हो कर प्रकाश सब का ही रूप हुआ, साकार सत्य ही रहा सो सब का सब केवल सब ही का नाम सत प्रकाश-का प्रकाश नाम ही केवल है, ज्ञान रूप ही सब का सब रहा अब केवल नाम ही सब का रूप ही सो सो रहा, नाम केवल ही केवल रहा; सो केवल सब केवल सब ही सो ही रहा, केवल केवल ही सब का रूप केवल प्रकाश स्वरूप ही रहा, निराकार ही सब रहा, केवल केवल ही सो रूप हो कर सब का सब का रूप ही केवल सब रहा! रूप केवल केवल केवल रूप सब प्रकाश का रूप प्रकाश ही केवल केवल केवल ही सब केवल ही केवल केवल अब केवल सत, या केवल ज्ञान केवल रूप, केवल सब स्वरूप ही रूप सब केवल सब रूप केवल रहा? सब ही सब केवल केवल सब सब केवल 200

कथा श्रोत कालमे ध्यान ज्ञान मन का, तत क्षण संशय मिटा, जो न मिटता सो, न समकित दरसन रूप यह विद्या सोई ज्ञान महा मत सांचो सोई सुकृत सांचो सो जो सम्यक् क्रिया रूप ज्ञान धार्या सोई, ज्ञान का विचार जा रूपी सो सम्यक्त सम्पादक जो क्रिया सो दो-हू का नाम जानि यह विद्या रूप ज्ञान सम्यक्त रूप सो ही अब सम्यक् क्रिया रूप जय देव जय देव यहूति जयंत विद्या विभूति सो या क्रिया रूप न जानि सम्यक् क्रिया प्रमत्त विषै जानि मिथ्या मती रूप भय विषय मथ्या विवर्त्य सोई रूप जानि क्रिया विषै प्रमत्त सो अप्रमत्त सो विवर्त्य रूप जानि विषय न जानि संशय सो संशय रूप जानि सम्यक् सो ही ज्ञान संशय ज्ञान रूप सो मिथ्यात्वी संशय से, वि-पर्य से जानि मिथ्यात्व सो सम्यक् रूप ज्ञान सो संशय, वि-पर्य, अन अध्यवसाय रहित रूप ज्ञान सम्यक् रूप सो सम्यक् ज्ञान सो जानि, सो ही सम्यक्, यह रूप जानि क्रिया विषै यह रूप सो सम्यक्, रूप जानि क्रिया, सोई रूप ज्ञान, यह विचार सो रूप सो, ज्ञान सम्यक् सो रूप सो, यह क्रिया सो सम्यक् रूप जानि, सोई रूप सब सम्यक् ज्ञान सोई रूप सो सम्पादक सम्पादक क्रिया सो सम्यक्, सम्यक् सो सम्पादक रूप ज्ञान सोई रूप, या वि-पर्य सो जानि क्रिया सो जानि यह सो सो सम्यक् ज्ञान जानि जानि से, रूप सम्यक् ज्ञान रूप या सम्यक्त्व का आधार सम्यक् ज्ञान सो, सम्यक् का ज्ञान का संशय? या सम्यक्त्व ज्ञान का विवर्त्य जानि सो, सम्यक् ज्ञान सो या संशय? ज्ञान का रूप या सम्यक् सो, सम्यक् सो ज्ञान सम्पादक जानि सब ज्ञान ज्ञान सो, न ज्ञान सो संशय सो, सम्यक् वि-पर्य सो ज्ञान ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान सब सम्यक् ज्ञान रूप ज्ञान सोई, यह सम्यक्त्व का रूप सब न ज्ञान का सम्यक्त्व सम्पादक सो क्रिया सो; सो सम्यक्त्व वि-पर्य सो ज्ञान रूप सो जानि सो या क्रिया रूप सो ज्ञान सो; सो सम्यक्त्व सम्पादक सो जानि रूप सो, सम्यक्त्व सो सम्यक् ज्ञान सो; रूप सो सम्यक्त्व जानि न ज्ञान, या सम्यक्त्व ज्ञान सो सब जानि सो सम्यक्त्व सो सम्यक् सम्पादक सो जान सो ज्ञान सो विवर्त्य, ज्ञान सम्पादक सो जानि रूप सो ज्ञान सो सम्पादक, या रूप सम्यक् सम्पादक, सम्यक् सम्पादक सो जानि रूप सो न ज्ञान सम्पादक सो जानि सो, सम्यक्त्व ज्ञान सब ज्ञान सब सम्यक्त्व वि-पर्य सो सो ज्ञान सो वि-पर्य रूप सो जान, ज्ञान सब ज्ञान सम्यक्त्व सम्पादक सम्पादक सब ज्ञान सो सम्यक् ज्ञान सो सब सो, या सो ज्ञान सब सम्यक्त्व ज्ञान सम्यक् सो सो ज्ञान सो ज्ञान ज्ञान सो सो जानि ज्ञान सब सम्यक् सम्पादक सब ज्ञान सब ज्ञान सम्पादक सो ज्ञान, या सो ज्ञान सब ज्ञान सम्पादक ज्ञान रूप ज्ञान सो रूप रूप सो, सम्यक् ज्ञान सम्पादक ज्ञान सब जान सो सो, ज्ञान रूप सम्यक्त सम्पादक सो सो, या या या सम्पादक रूप ज्ञान सब ज्ञान सो या रूप सो, ज्ञान ज्ञान सब सम्यक् ज्ञान रूप सो, या रूप सम्पादक सम्यक् सम्पादक रूप वि-पर्य सो ज्ञान! सम्यक्त ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान, ज्ञान रूप ज्ञान सम्यक् ज्ञान सब सम्यक्त ज्ञान रूप-या क्रिया सो सो ज्ञान सब... ॥ या ज्ञान जानि, सम्यक् जानि सब ज्ञान ज्ञान क्रिया; या क्रिया-या सम्पादक सो ज्ञान जानि सब रूप या या ज्ञान सो जानि वि-पर्य रूप ज्ञान जानि ज्ञान सो ज्ञान जान, जानि ज्ञान सो? ज्ञान रूप--ज्ञान सो ज्ञान सो? ज्ञान रूप, या या ज्ञान सब ज्ञान जान सब ज्ञान ज्ञान या या सम्पादक रूप ज्ञान ज्ञान विवर्त्य सो न ज्ञान या या ज्ञान जान या या ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान सम्पादक सम्पादक या या या ज्ञान वि-पर्य रूप ज्ञान सो ज्ञान या या ज्ञान जान, सम्यक्त ज्ञान या ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान सम्पद--या सो सम्पादक सो सम्यक् रूप! या या सो ज्ञान या या ज्ञान, या या रूप या सब ज्ञान ज्ञान सो ज्ञान या ज्ञान या सम्पादक ज्ञान? यह सम्पादक या ज्ञान ज्ञान संशय? सम्पादक सो या या सब ज्ञान या सम्पादक या या जान सब ज्ञान सो? ज्ञान या ज्ञान? सम्पादक ज्ञान या ज्ञान, सो ज्ञान या ज्ञान सब ज्ञान सो ज्ञान, ज्ञान सो सम्यक् सम्पादक सम्पादक ज्ञान ज्ञान सो सम्पादक सो, या या ज्ञान सो ज्ञान सब सम्यक्त्व सम्यक्त्व रूप सम्पादक ज्ञान ज्ञान या ज्ञान 201

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साक्षात्कार करना पड़े तो उस परमात्मा रूप का रूप और नाम धारण कर मनुष्य संसार करेगा और अपने सब काम छोड़कर सब जगह उन के ही पीछे पीछे फिरेगा जिससे सारा संसार विनाश को प्राप्त होजायगा न्याय भी परमेश्वर का जाता रहे, कारण सब काम न हो सकें किन्तु ऐसा कभी विचार नहीं हुआ देखो जो ऐसा कहे, कोई राजा अपने--राज्य सम्बन्धी सब प्रबन्ध अपनी सारी प्रजाके सिर पर छोड़े अर्थात् जैसाकि वह जो चाहेगा सो करेगा इसमें राजा प्रजा को स्वाधीनता देकर आप तो सब प्रकार अलग बैठा हो उस को मूर्ख कहेंगे, ऐसा कभी नहीं! परमेश्वर सबको अपने हाथ बाँधके स्वाधीन छोड़ दे उसके हाथ नहीं; ऐसा नहीं है, वह सर्वशक्ति मन्त्र रखता है जो उस स्वाधीनता द्वारा संसारके जीवों को देखता है, राजा संसारके को देख नहीं सक्ता सो लाचार, इस बात विषे नहीं कहा दूसरा दृष्टान्त, जैसा कि किसी एक अनाथ बालकको विद्या का तन-मनसे दो विद्या पढ़े सो--विद्या अभ्यास का फल पायेगा सो अभ्यासी सब तरह सुखी और जो विद्याहीन रहे सो तन मन धन से दुःखी और सब जन उसका तिरस्कार करें सो वह अपने कर्मका फल भोगे इस में उस अनाथ बालकके पालनेवाले का तो दोष नहीं, हां! जो परमात्मा संसारके बालकोंको सब प्रकार विद्या बुद्धि दे के सब प्रकार सुख दाता और रक्षक है, सो सर्वशक्ति का सुख जो कोई भोगे, पावेगा व पावे भला ऐसा कहो, कि जो परमात्मा निर्दोष न्याय कर्त्ता, जो है, उसका रूपक जो संसार रूपी चक्र है सो उस चक्र का इस चक्र द्वारा सब सब प्राणियोंको फल भोग कराने का सब उपाय बनाया उस रचना रूपी चक्र के फेर से, अपने आप सिद्ध हुआ! दूसरा जो ऐसा कहे कि ईश्वर सब रूप सब काल रूपी चक्र से बना है, उसका अर्थ यह होगा परमात्मा का स्वरूप वा परमात्मा का शक्तिभाव जो उस द्वारा उत्पन्न वा नाश का रूप हो कर सर्वशक्ति का रूप हो रहा है उस सर्वशक्ति रूप में वह सब जगत् रूप रूप होकर ही उस परमात्मा का रूप बना है उस रूप को सब जानते हैं॥ इति प्रथम प्रश्न 203

अथ एकादश अध्याय

अथ एकादश अध्याय महाभारत तात्पर्य निर्णय कथा सारांश श्लोक 28 विप्रा उवाचूर राजंस्त्वं शृणु यन्नः परं हितम्। न ह्येवं प्राप्यते मुक्तिः कल्प कोटि शतैरपि। सर्वं दत्त्वा महीपालं भृत्यानां च कुलं तव। इमे वयं गमिष्यामो यातु चास्य परा गतिः। ब्राह्मणा ऊचुः महाराज ! आप हमारा अत्यंत हितकारी वचन सुनें। केवल भूमि दान तथा सेवकों श्लोक 29 सहित अपने वंश का समर्पण कर देने मात्र से मुक्ति संभव नहीं होती। इसके लिए तो सौ सौ कल्पों पर्यन्त प्रयास करना चाहिये। इसलिये महाराज ! हम सब ब्राह्मण यहांसे जा रहेहैं जिससे इसकी उत्तम गतिहोवे। ऐसा कहकर अत्यंत निष्ठावान् ब्राह्मण वहां सेचले गये। जिसके पश्चात् राजा दुराचारियों द्वारा यह धन छुड़ा लिया जाने पर अत्यंत भय से व्याकुल होगया। इसके उपरान्त राजा फिर उसी वटवृक्ष के पास जाकर बोला- "हे प्रेत, तुमने तो केवल यह दानही ग्रहण करलिया।किन्तु मैं जिस लिये आया था उसका तो निवारण नहींहुआ।" ब्राह्मण प्रेत बोला कि, हे राजन् !यह सत्य है; इसलिये केवल इसी से ही मेरा उद्धारहोना सम्भव नहीं, यह बार-बार समझाये जानेपर भी तू समझ नहीं पा रहाहै। इसलिये हे राजन्, तू ऐसा विचारकर, जहां कहीं, उत्तम तीर्थहो, एकादशी का महात्म्य हो तथा जहां उत्तम पुराण श्रवण का योग-संयोग बन पा रहा हो वहां जाकर कथा सुन, एकादशी व्रतका संकल्प पूर्वक नियम-निष्ठा भाव-पूर्वक पालन कर। इसके प्रभाव से अवश्य ही मेरा ही नहीं, माता-पिता सम्बन्धी इस सौ कल्प काल पर्यन्त भोगे जाने वाले घोर प्रेत योनि से भी मेरा उद्धार अवश्य होगा। तूने एकादशी-व्रत के फल दाता श्री हरि वैकुण्ठ, वैकुण्ठ बिहारी भगवान् चक्रपाणि माधव को? जो त्रैलोक्येश्वर सब कालों में, सदैव सर्वदा आनन्दित रखने वालेहैं उन परम प्रभु भगवान् विष्णु शंकर स्वरूप हैं, काल-कालान्तर पर्यन्त जब समस्त जगत् प्रलय-महाप्रलय का ग्रास बनता है। तब भी काल-पाश बन्धन मुक्त रहताहै, जन्म-मरण दुःख-सुख से सर्वथा विमुक्त हो भगवान् वैकुण्ठ माधव का ध्यान कर उनके स्मरण करता रह! जिससे तेरा कल्याण तो होगा ही साथ ही, मेरे भी उद्धार का पथ प्रशस्त होगा। हे हे राजन्, ऐसा शुभ समय व्यर्थ मतखो, इस अवसर को व्यर्थ मतजाने दो, तू शीघ्र ही जाकर उस श्री हरि माधव का ध्यान कर। और देर मतकर। नजाने कब समय आ! इसलिये तू अब व्यर्थ में मत भटक मत भटक! उस परम दयालु प्रभु को, केवल उनका ध्यान? तू तो केवल उन हरि का भजन कर। प्रभु का ध्यान सब विघ्नों का नाशक स्वरूप, बार-बार जपसे ही अज्ञान, संकट व क्लेश का नाश कर उन पर श्री माधव कृपा स्वरूप इस समस्त संसारिक दुखों से मुक्ति प्रदान कर मुक्ति दिलाता हुआ अपना जन जान, हे राजन् !तू ज्ञान को प्राप्त हो, और सदा के लिये निर्भय होकर उनके नाम का जप करते हुये निर्भय होजा। ऐसा सुनकर, वह राजा मन ही मन उस प्रेत के इस समस्त कथन को, उस समय अपने विवेक द्वारा भली प्रकार विचार कर, एकाग्र चित्त उस ओर लगा; जो कथा के श्रवण पर्यन्त, हर समय प्रभु ध्यान का निश्चय व इस प्रकार से स्मरण करता हुआ ही, हे मुने !तू भी इस समस्त रहस्य को जानकर उस श्री वैकुण्ठ बिहारी माधव की शरण ग्रहण कर। उन परम दयालु कृपालु का ध्यान कर। जो सब कालों में कालके भी काल परम कृपालु भगवान् की शरणमें जा। जिससे, जन्म मरण, या चौरासी लाख योनियों के आवागमन, के बन्धनसे स्वतः मुक्ति पा जायगा, जो त्रिकाल में सब जीवों द्वारा सब प्रकार पूजनीय, सब सुखों के, दाताहैं। अतः एकादशी व्रत कथा 204

जिसने महाराज जनक-सुलभा की कथा पढ ली वह विद्या विशारद क्या काम का

कोई अपना पेट भर रोटी खिलाएगा? पर न त हमारा शरीर ऐसा जिससे कि कोई दयालु सहायता करेगा? ऐसा विचार करके वह मन और तन को अत्यंत बलवान् प्रभावशाली और दृढप्रतिज्ञ तो बना रहा तथा विद्या, कला, हुनर को सब कुछ जान चुका था पर यह विद्या संसार जिसे वह न जानता था उस का वह ज्ञान करेगा। जिसने महाराज जनक-सुलभा की कथा पढ ली वह विद्या विशारद क्या काम का और वह सब कुछ समझ जाता कि यह विद्यावान् क्या तो व्यवहार कर रहा, क्या निन्दा, क्या स्तुति है, किस से सावधान हो काम लिया, किस प्रकार, क्या आचरण स्वीकार कर रहा है, जो इन सब को न जानता केवल पुस्तकीय विद्यावान् हो वह सब कुछ व्यवहार में फेल हो न हो, पर विचार तो दो--पुस्तकी विद्या विशारद "सुलभा" उस--का कुछ ऐसा रूप देखकर न ह हो, विचार किया गया जिस पर यह सब क्रिया कलाप चल रहा है, ऐसा विचार कर जो व्यवहार किया जाता है वह दोनों पुस्तकीय तथा दोनों को समझ कर किया गया विचार दोनों ही को पूर्ण लाभ पहुँचा कर कर्तव्य का रूप बन कर, धर्म की जो व्याख्या वास्तविक की गई है उस पर जब वह उतरा, तो मन-बलवान् से कर्तव्य का पालन हो ही गया तथा वह उस मन-बलवान् से ही वह अपनी दृष्टि को रोक कर विचार- वान बन गया न कि उस के बाह्य रूप को मन-बलवान् ने, उस काम रूप चंचल मन--विचारवान् जिसने रूप को लखना चाहा, जिस से केवल लाभ ही रहा यह सब विचार से सिद्ध हो ही गया था उसका। मन-बलवान् ही ऐसा काम कर ले यह सब कुछ ठीक, पर ऐसा काम वही कर ले जिस मन का रूप विचार बन चुकाहैउसका तो तन भी काम करेगा विचार पूर्वक मन तो तन करेगा जब ही दोनों मिलकर एक रूप बन कर व्यावहारिक कर्तव्य को सफल कर उस से विद्या कला का लाभ उठा सकेंगे अन्यथा बिना तन विद्या कला सफल न होगी जब कर्तव्य, जो तन द्वारा व्यावहारिक कर्त्तव्य के रूपमें मन को ही करना है जिस से कर्तव्य ही रूप बन विद्या कला सब कुछ बन जावे, न तो विद्या ही विद्या रह जावे और न केवल तन रूप कर्म ही कर्म रह जावे वरन रूप दोनों का एक रूप हो कर ऐसा हो जावे कि जिस प्रकार दूध में खांड को मिला कर दो रूप बना दो लाभ उठाए जा सकें मन-बलवान् से पहला लाभ विद्या कला का होना ही कहा जा सकता दूसरा लाभ मन के कारण, तन से कर्त्तव्य कर सब लाभ संसार रूपी व्यवहार का पाया जा सकता ही नहीं वरन्, सब कुछ ही तन द्वारा ही, जो हो रहा था जिस के रूप को कर्तव्य-रूप, कला विशारद ने सब कुछ समझ लिया और उस ने ही अपने तन से ऐसा रूप ले कर व्यवहार को सफल कर दिखाया इसी प्रकार जब इस प्रकार विचार उत्पन्न हो गया संसार के सब रूप बदल गये, विद्या ही न बलवान् हो सकी वरन्, विद्या से, बलवान् से, विद्या का रूप ही, जब दोनों एकत्र हो ज्ञान विचार बन गये तो सब ही कर्तव्य स्वरूप बन कर सब प्रकार से लाभ मिलने का रूप दिखाई दिया। जब विद्या का रूप ही न रह सका केवल न तन केवल न ही विद्या ही रह सके दोनों एक रूप हो गये, तब क्या शेष रहा फिर उस समय मनुष्य विचार विचार कर सब को देख कर ऐसा कह रहा संसार का व्यवहार सब उस रूप विद्या कला विद्या का न केवल वरन्, जो दोनों रूप का रूपवान्, जो उस विद्या से ही बन सका था? वह ऐसा सब समझ ले गया था, पर उस समय मन को जो भी, यह बात केवल पुस्तक ही से जान ले सका था, केवल ही से बात समझ कर सब से कह रहा था वह सब ही असत्य थी, जब तक वह अपने रूप व्यवहार नहीं ला सका तब तक वह मन को सब कुछ न कर सका न ही समझ सका केवल कथन मात्र-मात्र ही रह गया था जिसका रूप न केवल मन वरन् तन तक ही समाप्त हो चुका था जिसे वह विद्या-कला विशारद कह रहा था सो तो सब का सब रूप ज्ञान का वास्तविक व्यावहारिक ही बन सकता था जिसका विस्तार हुआ, जो केवल न तन ही का सम्बन्ध ही सम्बन्ध था, जिसे उस समय में, केवल में, ज्ञान में, मन में, जो कुछ था उसका जो सम्बन्ध सब से ही सम्बन्ध हो जाने के पश्चात् ही ज्ञान की 205

इस प्रकारके इन अंगों का अनुशीलन करने से ज्ञान लाभ हो सकता है। पर जब चित्त ही स्थिर न हुआ हो, चेतना जड़ के समान ही बनी रहे। अध्यात्मशास्त्र के जानने वाले सब रूप से इस बात को भली प्रकार जानते हैं, कि विचारशील मनुष्य ही परमतत्त्व का मनन कर सकता है। वह आत्मा सत्य है। यह तो सत्य, पर आत्मा का साक्षात्कार बिना चित्त शुद्धि के असम्भव जान कर चित्त की शुद्धि निमित्त ज्ञानविज्ञान सम्पन्न आचार्यों ने योग चित्त वृत्तियों का निरोध रूप बतलाया है। सो चित्त वृत्तियां अनेक प्रकार वासनाओं से युक्त हो कर कार्यवश बहिर्मुख, सो उन वृत्तियों को ही चित्तवृत्ति कह कर योग के द्वारा उनका निरोध या तो प्रत्याहार से हो या--मन स्थिर हो ही जाय! पर चित्त का तो स्वाभाविक धर्म ही चंचलतारूप है। इसका निरोध कैसे हो सकता है? तो इस चंचलता निमित्त मन का लय रूप या चित्त का ही स्वरूप लय रूप कहा या चित्त नाशक साधन--इन का नाम ज्ञान ही कह दिया। इस प्रकार के, वा उपाय के जान लेने से काम सिद्ध नहीं हो सकता। अध्यात्मतत्व जानने वाले विद्वान् पुरुष भी इस बात को भली प्रकार से कह ही गये तत्वज्ञानियों का मत इस प्रकार साधन अभ्यासियों को सुख देता ही विचारशीलता पुरुषार्थमय हो जाती है। यह साधन अभ्यास का फल है। एक विद्वान्, नाम-सहस्राक्ष का कथनानुसार यह बात विचारशीलों तक ही ज्ञात होती रही कि मन लय रूप को तब ही प्राप्त होता है। जब तत्वज्ञान सम्पन्न ज्ञान को न जाना जा सके। विचार ही सब कुछ है। विचार ही ज्ञान है। विचार ही योग है। विचारशीलता जब स्थिर हो, यथार्थ ज्ञान स्थिर हो, यथार्थ ज्ञान का रूप प्राप्त किया जाय। ध्यान ही विचारशीलता का रूप बन जाता है। इस से बढ़ कर क्या होगा? सो चित्त लय रूप धारण करता हुआ न उस रूप का योग साधन कहा जायगा? वा उस स्वरूप ज्ञान कहा जायगा? तत्वज्ञान का स्वरूप विचारशीलता रूप होकर स्थिर रूप मन किया करता है। अतएव, विचार रूपी-अभ्यास साधन को कहा गया, जिस रूप साधन ज्ञान के अभ्यास से चित्त लय रूप मन का लय होकर, विचार स्थिरता का स्वरूप बन जाता अथवा निर्विकल्प समाधि रूपी भाव स्वतः मनुष्य के मन व्यवहारिक को एकाग्र स्वरूप देता है। सो इस रूप की योग्यता को प्राप्त करता हुआ मन जब भी संसार सम्बन्धी विचार करेगा, विचार स्थिरता से विचारेगा, विचार स्थिरता चित्त को ही एकाग्र कर देगी। जो अभ्यास चित्त रूप को निरोधता से एकाग्र स्वरूप बनाये हुआ चल रहा, विचारशीलता चित्त रूप को, ध्यान का रूप देकर अपने उस स्वरूप स्थिर मन का लय वा मनन रूप स्वरूप प्रदान कर ही तो देता है, जिस रूप का ध्यान वा मनन किया गया, जिस रूप न उस रूप ज्ञान स्वरूप हो गया। अभ्यास से ज्ञान, अभ्यास से ध्यान, अभ्यास से सब कुछ ही प्राप्त होता रहता है। केवल मन का काम रूप ही अभ्यास से दूर रहता हुआ-- अभ्यास स्वतः विचारशीलता का रूप हो जाता हुआ--उस रूप ज्ञान एकाग्रता को मन का स्वरूप विचार ही, वा अभ्यास-साधन ही, कहा जाता कि वह तो हर समय स्थिर रूप से ही अभ्यास-साधन का फल ही तो होगा। अभ्यास से सब कुछ सिद्ध रूप से प्राप्त होता ही रहता है, इस से बढ़कर अभ्यास से सब कुछ सिद्ध-प्राप्त रूप होता है। सो इस ही स्वरूप को अभ्यास से प्राप्त रूप कहा गया वा उस रूप विचारशीलता से ही ध्यान स्वरूप विचार ही तो हर एक का मन सम्बन्धी एकाग्रता स्वरूप ध्यानमयी रूप मन प्राप्त करता हुआ, चित्त रूप स्वरूप ज्ञान रूप एकाग्रता से अपने ही साधन को प्राप्त कर, जिस रूप ध्यान किया गया है। सो ध्यान ही ध्यान रूप के अभ्यास तक स्वरूप को प्राप्त कर सो इस ही स्वरूप द्वारा, मन अपने ध्यान रूप ज्ञान को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार मन मन-रूप त्याग कर ध्यान रूप स्वरूप को पा लेता गया, जो ध्यान का रूप है? अभ्यास ही ज्ञान-का कारण बनकर संसार सम्बन्धी बातों को जो कुछ उत्पन्न हुआ समझना उस मन-सम्बन्धी सब चंचलता नाश करता। जिससे उस मन एकाग्र हुआ वा मन-रूप का विनाश हो जाता हुआ भी एक शांत स्वरूप ध्यान का रूप धारण कर ही तो लेता है। सो कहा गया, "हे पार्थ, ध्यान ही ज्ञान का उत्तम साधन" 206

विश्वामित्रजी श्रीरामचन्द्र को साथ ले विश्वामित्रजी आश्रममें पधारे।वहाँ जाकर देखाकि ऋषि विश्वामित्रजी तो हवन कर रहेहैं और राक्षस लोग उनपर खून तथा मांस आदि फेंक रहेहैं।भगवान् श्रीरामने यह देख बाण चढ़ाकर ताड़का पुत्र मारीच को सौ योजनदूर फेंकदिया, सुबाहुको मार, राक्षसोंको भगाके यज्ञ निर्विघ्न समाप्त करा दिया। फिर विश्वामित्रजी बोले कि, हे वत्स! अब जनक पुर चलो और वहांका धनुष यज्ञ देखकर आओ।सब मुनियों सहित श्रीरामचन्द्रजीने जनकपुरकी ओर प्रस्थान किया। मार्गमें अहिल्या शिलावत् बैठीहुईथी।उसको श्रीरामजीके चरण रजका स्पर्शहोतेही परम सुन्दरी स्त्रीका रूपहो गया।भगवान् रामके चरणकमलोंका यह प्रतापदेख सब मुनिगण श्रीरामजीकी स्तुति करनेलगे। इस प्रकारके अनेकानेक चरित्र करतेहुए मुनिजीके साथ श्रीरामजी जनकपुर पहुंचे।राजा जनकने मुनिका बहुत आदर सत्कार किया। जब जनकजीको मालूम हुआकि ये दोनोंकुमार अयोध्यापति श्रीदशरथजीके पुत्रहैं तो वे आश्चर्य करनेलगे।श्रीरामजीका रूपदेख राजा जनक मोहित होगये। प्रातःकाल दोनों भाई विश्वामित्रजीकी पूजाके वास्ते फूल लेनके लिये जनकजीके बागमें गये।उसी समय भगवती सीताजीभी भगवती भवानीका पूजन करनेके लिये सखियोंसहित पधारीं।उधर श्रीरामजीभी लक्ष्मणजीके साथ बागकी शोभा देखतेहुए उसस्थानपर पहुंचेजहां जानकीजी अपनी सखियोंके साथ भगवती भवानीजीकी स्तुतिकररहींथीं।श्रीरामजीके दर्शनपा सीताजी मोहित होगईं।श्रीरामजीभी सीताजीके रूपको देख प्रसन्न हुए। जब सीताजीने श्रीरामजीके चरणोंमें अपना चित्तलगा भगवती भवानीजीकी स्तुति की,तोभगवतीने सीताजीको वर दिया कि हे सुता ! तेरी मनोकामना पूर्ण होगी।सीताजी प्रसन्न होकर अपनी माताके पासगईं।श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीको सीताजीके रूपका वर्णन किया और फूलले विश्वामित्रजीके पास गये। दूसरे दिन जनकजीने सब देशके राजाओंको धनुषयज्ञमें बुलाया।राजा जनकने प्रतिज्ञा कीथी कि,जो कोई शिवजीके धनुषको तोड़ेगा,उसीके साथ सीताजीका विवाहहोगा। अनेक देशके राजाओंने धनुषको उठानेका यत्न किया,परन्तु वह किसीसे न उठा। राजा जनकने निराशहोकर कहाकि क्या यहपृथ्वी वीरोंसे खालीहोगईहै ? यहसुन लक्ष्मणजीको बहुत क्रोधआया।लक्ष्मणजीके क्रोधको देख विश्वामित्रजीने श्रीरामचन्द्रजीको आज्ञा दी।श्रीरामजीने जाकर शिवजीके धनुषको उठाया और डोरी चढ़ातेही वह टूटगया। चारों ओर श्रीरामचन्द्रजीकी जयजयकार होनेलगी।सीताजीने प्रसन्नहो श्रीरामजीके गलेमें जयमाल डालदी।राजा जनकने आनन्दितहो अयोध्यामें राजा दशरथजीको बरात लानेके लिये दूतभेजे। धनुष टूटनेका शब्द सुन परशुरामजी क्रोधयुक्तहो जनकपुरीमें आये और श्रीरामजीसे युद्ध करनेको उद्यतहुये।जब परशुरामजीको श्रीरामजीके स्वरूपका ज्ञानहुआ,तो वे उनकी स्तुतिकर वनको चलेगये। उधर अयोध्यामें दूतके मुखसे समाचार सुन राजा दशरथजी बरातसहित जनकपुर पहुंचे। राजा जनकने सबका यथायोग्य सत्कार किया।बड़ी धूमधामसे श्रीराम-सीताका विवाहहुआ। विश्वामित्रजीकी आज्ञासे लक्ष्मणजीका विवाह उर्मिलासे,भरतजीका माण्डवीसे और शत्रुघ्नजीका श्रुतकीर्तिसे हुआ।विवाहके पश्चात् राजा दशरथजी श्रीराम,लक्ष्मण,भरत,शत्रुघ्न और बहुओंको साथले अयोध्यापुरी पधारे। अयोध्यावासियोंको आनन्दका पार नरहा।श्रीरामजीको अयोध्याका राज्य देनेकी सलाह होनेलगी।मन्थरा दासीने रानी कैकेयीको भड़काया।कैकेयीने कोपभवनमें जाकर राजा दशरथसे दो वर मांगे।एकमें भरतको राजगद्दी और दूसरेमें श्रीरामजीको चौदह वर्षका वनवास। श्रीरामजी माता-पिताकी आज्ञा मानकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको प्रस्थान करगये। राजा दशरथजीने श्रीरामके विरहमें प्राण त्यागदिये।भरतजी ननिहालसे आये और माताको बहुत धिक्कारा।भरतजीने मन्त्रियोंसहित चित्रकूट जाकर श्रीरामजीसे अयोध्या लौटनेकी प्रार्थनाकी। परन्तु श्रीरामजीने पिताकी आज्ञाका पालन करना अपना कर्त्तव्य समझा।तब श्रीरामजीने अपनी खड़ाऊँ-पादुका देकर भरतजीको विदा किया।भरतजीने उन खड़ाऊँओंको सिंहासन पर रखकर अयोध्याका राज्य किया।उधर श्रीरामजी वनमें रहकर अनेक राक्षसोंका संहार करतेहुए पंचवटीमें पहुंचे।शूर्पणखाके नाक-कान लक्ष्मणजीने काटदिये।इसके बाद रावणने कपटसे सीताजीका हरण करलिया।श्रीरामजी सीताजीकी खोजकरते हुए सुग्रीवसे मिले।सुग्रीवकी सहायतासे वानर सेना तैयारकी।समुद्रपर सेतु बांधकर लंकामें प्रवेशकिया।कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि राक्षसोंसहित रावणका संहारकरके श्रीरामजीने विभीषणको लंकाका राज्य दिया।सीताजीको लेकर सबलोग, पुष्पक विमानसे अयोध्या लौटे।अयोध्यामें श्रीरामजीका राज्याभिषेक हुआ।प्रजा अत्यन्त प्रसन्न हुई। 207

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विचारवान् को चाहिए कि वह सदा अपने स्वरूप रूप का ध्यान किया करे। यथार्थ रूप विचार करे। वह विचार यह करे, प्रथम जब पिता के वीर्य से मेरा शरीर, रक्त की बूंदमात्र केवल, अतिशय सूक्ष्म, सो वीर्य किसका बना? सो वीर्य अन्न का और अन्न भूमि से उत्पन्न हुआ अन्न सोय! अर्थात् पृथिवी से वीर्य बना, पृथिवी से अन्न बना, पृथिवी के ऊपर पृथिवी का ही गोला बना। सो विचार यह करे, ना कुछ ना विचार, विचार रहित, विचार की उत्पत्ति कैसे, जब कुछ ज्ञान नहीं? सो विचार यह करे, विचार बड़ा बल धार! सो विचार सूक्ष्म रूप, मन को शांत कराकर निज रूप का ज्ञान करा। सो विचार यह करे, सूक्ष्म विचार कहाँ से उठ रहा सो विचार, सो तो ज्ञान रूप। अब ज्ञान रूप कहाँ? सो विचार यह करे, सत ज्ञान का भंडार जो सब धार! सो तो ज्ञान का आधार चेतन रूप, प्रकाश रूप घट-घट की लीला करे। विचार यह करे, घट में चेतन प्रकाश शक्ति रूप सो तो सर्व व्यापी ब्रह्म सनातन है, जो कि सब विकारों रूप प्रपंच मध्य से परे घट-घट, रोम में प्रकाश विस्तार रहा। पर जो सब जग को रचने रूप सो सनातन शब्द रूप सो रस, जो कि सब रचना सार, सो सत-नाम रूप सब के मध्य खेल सो प्रगट है, सो सर्व शक्ति के प्रकाश रूप प्रकाश का कारण सो सो सत-नाम शब्द रूप सब रचना मध्य से न्यारा भी है, शब्द रूप से ही सर्व मध्य पर भी व्याप रहा, शब्द रूपी मध्य घट "मैं" कह, सो चेतन प्रकाश का साक्षी। सो घट-घटेश्वर के प्रकाश से सब कुछ उदय सो जगत पर सो उस सत्य का ही अंश सो चैतन्य प्रकाश शक्ति रूप सो सब कुछ रच रहा सो सब मध्य विद्यमान सो घट-घटेश्वर के साथ मिला सो सत्य रूप चेतन, इसका रूप विद्यमान सो शब्द का व उस रूप का अभ्यास जो कोई करे। अभ्यास से ज्ञान का प्रकाश विद्यमान होगा? ज्ञान रूपी रंग! यह घट व शब्द का प्रकाश रचना रूप से परे, सत रूप, सत व रस, सो अविनाशी पुरुष पूर्ण सनातन शक्ति का भेद जान कर जो अभ्यास किए सो निज रूप सत घट-नाम रूप सो रस, सो उस रस, जो कि सब का सार सो सत्य नाम चेतन सत्ता ब्रह्म स्वरूप से ही सर्व उत्पन्न हुए सब रूप सो सनातन ज्ञान से ही सब घट का ज्ञान हो रहा, सो चेतन के ज्ञान से प्रकाश रूप अभ्यास द्वारा सनातन घट का भेद, सो अभ्यास से सब के आधार शक्ति को प्राप्त होय! सत्य का अंश ही तो ही सत्य का प्रकाश सत्ता सनातन सो घट-घट सब व्यापी सो सो सनातन शब्द द्वारा अभ्यास करा, चेतन प्रकटाया। केवल सत नाम के अभ्यास रूप द्वारा अविनाशी घट शब्द ज्ञान रूप का भेद घट व घट के प्रकाश विस्तार से मिला सो उस प्रकाश का भेद जो जान कर घट कहे, "हे संत, दयाल का प्रकाश ही प्रकाश व्यापक" सनातन व व प्रकाश स्वरूप सो प्रकाश सब रचना मध्य व्यापक रूप "घटेश्वर का ज्ञान रूप सत्य" सो भेद को जान कर निज रूप को जाने सो, जो सब व सबमें व्यापक प्रकाश रूप घटेश्वर रूप है, सो चेतन को जान कर निज रूप का ज्ञान पा लिया नाम से ही स्मरण से शब्द रूप परम चेतन् सनातन से, सनातन नाम रूप अभ्यास किए बिना सब घट से न्यारा है, सो सब घट मध्य सार से भिन्न, जो कि घट मध्य के भाव से ही चेतन का ज्ञान पाना है, सो तो जान ले, कि संत! सो चेतन की महिमा व ज्ञान से ही प्रकाश का ज्ञान होवे। सो तो सब घट का सनातन से सब का उदय रहा, सो चेतन ज्ञान से केवल सब शब्द न्यारा रूप सो सनातन शब्द द्वारा सब घट प्रकाश स्वरूप सो प्रथम मन को चेताया सो सनातन से मिला कर सब घट को, सो जाना रूप ब्रह्म शक्ति से सनातन के शब्द से जाना जाता है? सो कैसा रूप सब घट में? सो चेतन ज्ञान सब का आधार सत शब्द प्रकाश द्वारा सब को ज्ञान प्राप्त हो! सत्य सनातन घट का भेद घट व शब्द का अभ्यास घट में रूप को विस्तार होय! पूर्ण अभ्यास से सब घटों घट को चेता कर व सब के प्रकाश स्वरूप को जान कर अभ्यास रूप सत नाम विस्तार घट में घट द्वारा प्रकाश रूपी सत्य को चेता कर नाम रूप सो संत का अभ्यास किया जावे, सनातन प्रकाश सनातन प्रकाश, सनातन प्रकाश से, अविनाशी अजर अमर पद पावे, 209

विवेकानन्दजीके विचार बहुत गम्भीर थे। यदि भारत उनका ऋण न भी चुका सके तो कम-से-कम इतना तो अवश्य कर ही सकता था कि उनके विचारोंके प्रति श्रद्धा रखे। स्वामी विवेकानन्द प्रत्येक भारतीयको अपना भाई कहकर पुकारते थे। प्रत्येक भारतीयको वे हृदयसे चाहते थे। वे समझते थे कि भारतके उद्धारके बिना संसारका कल्याण नहीं हो सकता। जिस जातिमें केवल अपने लिये जीनेका स्वार्थभाव ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्वके कल्याणकी भावना समाई हो, उस जातिको वे सर्वथा जीवित देखना चाहते थे। इस प्रकार उन्होंने भारतके लिये, भारतके लोगोंके लिये, भारतके विचार-प्रवाहके लिये जो किया उसका मूल्य इस युगके इतिहास-पृष्ठोंपर तो क्या, आनेवाले युगोंके इतिहास-पृष्ठोंपर भी स्वर्णाक्षरोंमें ही लिखा रहेगा। स्वामीजीके उस कार्यका कोई भी प्रतिदान नहीं कर सकता। जो अपने जीवनमें विवेकानन्दके विचारोंपर श्रद्धापूर्वक चलनेका संकल्प कर सकेंगे, वे अपने जीवनको धन्य करेंगे ही, स्वामीजीके ऋणसे भी कुछ अंशमें उऋण होनेका सन्तोष प्राप्त कर सकेंगे। स्वामी रामने कहा था, "भारत, तुम्हारे ही उत्थानपर संसारका उत्थान है।" इस युग-युगान्तरकी चिर-पुरातन संस्कृति-सुधाको संसारके समक्ष ले जानेका जैसा महान् कार्य श्री स्वामी विवेकानन्दजीने किया वैसा किसी अन्यने शायद ही किया हो। उन्होंने विश्वको अपने इस कार्यसे चमत्कृत कर दिया। परिणाम? विवेकानन्दका कोई व्यक्तिगत लाभ न था। वह किसी संस्थाका या देशका प्रतिनिधित्व भी नहीं कर रहे थे। उन्हें केवल एक ही धुन सवार थी-विश्वको यह सन्देश देना कि संसारमें यदि शान्ति और सुखकी आवश्यकता है, तो उसे अपने स्वार्थ-केन्द्रसे उठकर त्यागके केन्द्रपर आकर बैठना होगा। अपने लिये जीनेवाला पशु-समान है, दूसरोंके लिये जीनेवाला ही सच्चा मनुष्य है। जबतक त्यागकी भावनाको मनुष्य अपने जीवनका आधार नहीं बना लेता, तबतक वह सच्चा मानव नहीं बन सकता। स्वामीजीका यह सन्देश भारतका सन्देश था। जो संस्कृति त्यागकी नींवपर टिकी थी, उसके पास इसके अतिरिक्त संसारको देनेके लिये और क्या था? स्वामीजीने अमेरिका और इंग्लैण्डमें जाकर केवल इतना ही कार्य नहीं किया कि भारतके वेदान्त-सत्यको संसारके सम्मुख प्रस्तुत किया, अपितु उन्होंने उस वेदान्तको आचरणमें ढालकर दिखला दिया। उन्होंने कहा कि मानवमात्रका कल्याण वेदान्तके उस अद्वैत सिद्धान्तमें ही निहित है, जिसके अनुसार संसारके प्रत्येक प्राणीमें एक ही परमात्माकी चेतना व्याप्त है। यदि यह सत्य है, तो फिर किसीसे घृणा क्यों? किसीसे द्वेष क्यों? क्यों न हम सब एक-दूसरेसे प्रेम करें? प्रेम और त्याग ही वेदान्तके दो स्तम्भ हैं। इनके बिना वेदान्तकी कल्पना व्यर्थ है। स्वामीजीका जीवन त्याग और प्रेमका जीवन्त उदाहरण था। शिकागोके सर्वधर्म सम्मेलनमें जब उन्होंने अपना भाषण आरम्भ किया, तो उपस्थित जनसमुदाय मुग्ध हो गया। उन्होंने 'अमेरिकाके भाइयो और बहनो!' सम्बोधनसे जो आत्मीयता प्रकट की, उसने सहस्रों श्रोताओंके हृदयोंको छू लिया। विवेकानन्दकी वाणीमें ज्ञानका ओज था, सत्यकी शक्ति थी और भारतकी आत्माकी पुकार थी। यही कारण था कि जिसने भी उन्हें सुना, वह उनका होकर रह गया। स्वामीजी केवल उपदेशक नहीं थे, वे कर्मयोगी थे। उन्होंने भारतकी दरिद्रता और अशिक्षाको देखकर अश्रु बहाये। उन्होंने 'दरिद्र-नारायण'की सेवाको ही ईश्वरकी सच्ची पूजा माना। उनका मानना था कि भूखे पेटको धर्मका उपदेश देना व्यर्थ है। पहले उसकी भूख मिटाओ, फिर धर्मकी बात करो। आज जब हम विवेकानन्दके विचारोंपर दृष्टिपात करते हैं, तो पाते हैं कि उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने कि उनके समयमें थे। आजका विश्व जिन समस्याओंसे जूझ रहा है, उनका समाधान विवेकानन्दके विचारोंमें निहित है। भौतिक प्रगतिके साथ-साथ यदि आध्यात्मिक विकास न हुआ, तो मानवताका विनाश निश्चित है। अतः आज आवश्यकता इस बातकी है कि हम विवेकानन्दके विचारोंको समझें और उन्हें अपने जीवनमें उतारें। 210

चन्द्रकान्त मणिको मटकीके मुख पर रख दिया, उस समय चन्द्रकान्त मणिके प्रभाव स्वरूप उस कुम्भ स्थित जल इस तरह का हो जायेगा कि प्यास तो मिटेगी ही, विशेषता यह होगी रोगयुक्त को, व्याधि वालेको, प्यासे जीव को शीतलता प्राप्त हो जावेगी इस प्रकारका चमत्कार, जल सब लोग पी रहे मात्र एक बार मटकीका प्रभाव घटानेके लिये उसने मटकीको एक चक्रवर्ती राजाके अखाड़ेके भीतर ले जाकर ले जा कर फेंक दिया ऐसा मान करके उस अखाड़ेके उस चबूतरे स्वरूप जगह जहां पहलवान लोग हाथ धोते व्यायाम करनेके उपरान्त मिट्टी हाथ पैर पर लगा करके व्यायाम करनेके पश्चात् हाथ पांव धो कर धोके अपना पसीना, व्यायाम की थकाव-थकावट, उस चन्द्रकान्तके इस जल द्वारा मिटा करके सब लोग अपने अपने शरीरको पुष्ट बना रहे तथा उसी कुम्भका जल सब लोग पीकरके अपने परिश्रम द्वारा जो भी प्यास तृषातुरता लगी उस प्यासका शमन करके प्रसन्न हो, राजा को इसके बदले में धन भेट कर रहे थे ऐसा राजा भी देख रहा, उस समय में एक बार राजाने भी विचार! प्यास तो सब मनुष्य भोगते ही उसे उस प्रकार तृषाका अनुभव उस दिन भी हुआ उस समय अखाड़ेके मल्लके द्वारा हाथ धोके जल पिया था। उसने विचारवान् मल्लसे कहा कि भाई, सुनो, इस चन्द्रकान्तके जल-रस का पान तुमने किया सुनो, इस मटके जल रस-रस का पान तुमने किया, इस जलमें अन्य रस ही था! स्वभाविक इस जल द्वारा जहां रस का पान किया इस चन्द्रकान्तके, मटके--मटकीके द्वारा भी? पहलवान कह उठा राजन् सुनो, यह जलके चन्द्रकान्त प्रभावके, मटकीके प्रभावके कारण ही सब लोगों तृप्ति कर रहा यह तो मटकी रस का प्रभाव था उस जल में, इस प्रकार विचार तो करना केवल तृषाका मिट जाना, जल प्यासवाले को जलके रस द्वारा उस जल द्वारा जिस प्रकार शीतलता प्राप्त हुई उस जलको पान करके तृप्त होनेके पश्चात् उस जलका प्रभाव मिट जानेके पश्चात् उस जल प्रभावके पश्चात् राजा मल्ल विचार! जलके घट रसका पान करके तृषा शान्त करनेके बाद विचार करता हुआ उस जल रसको अन्य जीवोंके अखाड़ा रूप जल द्वारा पान करके तृषाके मिटनेके पश्चात् उसने तो तृषा मिटनेके पश्चात् अन्य अन्य अन्य प्रकारकी प्यासके मिट जानेपर तृषाके अन्य रूपको जल तो तृषा मिटाने मात्र रूप ही समझा जाता था विचारके रूप द्वारा, केवल उस मटकी मात्र का जल पान करने पर पहलवान, उस चन्द्रकान्त मटकेके प्रभाव को जान कर, तृषाके शमनके द्वारा राजा कह उठा उसका उस समय चन्द्रके इस जलके द्वारा जहां रस का पान विचारके द्वारा रस का रस रूप ही विचार मात्र बन गया प्यास इस प्रकार राजा उस चन्द्रकान्त को, यह जल जो कि म मटके द्वारा तृषाके मिटानेके पश्चात उस जल-रस रूप का पान करके, उस जलके म रसका पान करने पश्चात् जल तृषाके मिटाने का विचार तो पश्चात् बना रहा, जिस प्रकार तृषा मिटने पश्चात् म रसका पान हुआ? यह उस जलके रस का था? या अन्य प्रभाव... ॥ विचार करनेके पश्चात् राजा चन्द्रकान्तके घट जल पान रूप रस के पश्चात् तृषा मिटाने पश्चात् विचारवान् जल प्रभाव पान को राजा विचारके रूप द्वारा जो उस जल का प्रभाव देखा था पहलवानके, जल पान करने पश्चात् वह तृषा मिटने, उस रस द्वारा मिटने रूप उस जल प्रभाव म मटके का रूप प्रभाव मटके द्वारा घट जल रस का प्रभाव को उस रूप में समझा जाता था तृषाके शमन हो जाने पश्चात्, उसने तो उस समय इसके रूप स्वरूप घट रस का पान किया! मल्ल द्वारा ऐसा पान करने का जो विचार बनाया उस मटकेके प्रभाव रूप तृषाके मिटने, पश्चात् जल पान का भाव, घट रस रूप मटकेके प्रभाव मिटाने मात्रके पश्चात् उस म मटके रस द्वारा विचारने पश्चात् जो तृषा मटकीके रस के प्रभाव म बनाया, वह रस रूप घट जल पान का विचार रस उस समय का पान, उस मटकेके जल चन्द्रकान्त द्वारा हुआ, जलके प्रभावकी तृषा मिटाने का जो चन्द्रकान्त से सम्पर्क द्वारा मटके का रस बनके राजाने पान कर लिया रूपका, जो कि तृषाके शमन करने रूप, चन्द्रकान्त मटकेके जलके रूप द्वारा हुआ! जो जल का प्रभाव था उस चन्द्रकान्तके प्रभाव स्वरूप घट रस मात्र रूप में पान बनके प्यास मिटा गया, जलके उस चन्द्रकान्त के जल द्वारा राजाने तृषा मिटने पश्चात् ऐसा अनुभव प्राप्त किया, क्या मटका प्रभावसे जल बना? जल प्रभाव था उस रसका, जिसको चन्द्रकान्त द्वारा बनाया गया जल मटकेके प्रभाव द्वारा माना गया राजा विचार उठा, "प्यास तो मिटाना था, प्यास तो मिटाना जल द्वारा! चन्द्रकान्तका तो केवल बहाना" यह विचार कर राजाने घट रस रूप जलके चन्द्रकान्त के रस रूप घट जल द्वारा घट प्रभाव द्वारा जो चन्द्रकान्त का जल पान करने का रस रूप जो जल प्रभाव द्वारा मिट गया उस प्रभाव मात्र तृषाके विचार के रस रूप घट रसका पान विचार बना था? तो रस द्वारा घट का रसके प्रभाव स्वरूप घट का प्रभाव जल रूप बना हुआ देखा था, जिस रसके प्रभाव का विचार घट के रस द्वारा देखा गया था उस घट द्वारा 211

प्रत्येक मानव को अपने जीवन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जब व्यक्ति कठिनाइयों का सामना धैर्य और साहस के साथ करता है, तो वह उन पर विजय प्राप्त कर लेता है। किंतु यदि वह निराश होकर बैठ जाता है, तो उसकी समस्याएँ और भी बढ़ जाती हैं। मनुष्य का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। जो व्यक्ति इन संघर्षों से घबराकर अपने मार्ग से विचलित हो जाता है, वह कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। सफलता का रहस्य यही है कि व्यक्ति निरंतर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहे। वास्तव में यह विचारणीय विषय है कि, मनुष्य का जीवन ही एक ऐसा मंच है जहाँ उसे अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। जो व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, उसे सुख और शांति मिलती है, जबकि बुरे कर्म करने वाले को सदा दुःख और अशांति का सामना करना पड़ता है। मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। कोई भी व्यक्ति अपने कर्मों के फल से बच नहीं सकता। इसलिए मनुष्य को सदा सन्मार्ग पर चलना चाहिए और ऐसे कर्म करने चाहिए, जिससे दूसरों का भी भला हो। परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। जो व्यक्ति दूसरों की सहायता करता है, वह ईश्वर का प्रिय बन जाता है। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जब मनुष्य के मन में अहंकार का भाव उत्पन्न होता है, तब वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता। वह दूसरों का उपहास उड़ाने लगता है और स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगता है। किंतु अहंकार का अंत सदा बुरा होता है। रावण, कंस और दुर्योधन जैसे महाबलियों का भी अहंकार के कारण ही सर्वनाश हुआ था। अतः मनुष्य को अहंकार से सदा दूर रहना चाहिए। नम्रता और सरलता ही मनुष्य के सच्चे आभूषण हैं। यदि मनुष्य में नम्रता का भाव होगा, तो वह समाज में सर्वत्र आदर और सम्मान प्राप्त करेगा। मनुष्य के जीवन में संगति का बड़ा महत्त्व है। सत्संगति से मनुष्य के दुर्गुण दूर हो जाते हैं और वह सद्गुणों को ग्रहण करता है। इसके विपरीत, कुसंगति में पड़ने से सज्जन व्यक्ति भी दुर्जन बन जाता है। दुर्जन व्यक्ति की संगति कोयले के समान होती है, जो जलते समय हाथ को जला देती है और बुझने पर हाथ को काला कर देती है। इसलिए मनुष्य को सदा कुसंगति से बचना चाहिए और सत्पुरुषों की संगति करनी चाहिए। समय का सदुपयोग करना भी मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। जो व्यक्ति समय के महत्त्व को नहीं समझता, वह जीवन भर पछताता रहता है। सफलता उसी व्यक्ति को मिलती है, जो समय का मूल्य समझता है और अपने प्रत्येक कार्य को समय पर पूरा करता है। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। बिना परिश्रम के कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता। आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। आलसी व्यक्ति कभी उन्नति नहीं कर सकता। जो व्यक्ति निरंतर परिश्रम करता है, वही अपने जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचता है। विद्या मनुष्य का तीसरा नेत्र है। विद्या के द्वारा ही मनुष्य में ज्ञान और विवेक का विकास होता है। विद्यावान व्यक्ति समाज में सर्वत्र आदर पाता है। विद्या से ही मनुष्य को मान-सम्मान, यश और कीर्ति प्राप्त होती है। संतोष सबसे बड़ा धन है। जिसके पास संतोष रूपी धन है, वह संसार का सबसे सुखी व्यक्ति है। असंतोषी व्यक्ति सदैव दुःखी रहता है। अंत में, हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि जीवन अनमोल है। इसे व्यर्थ की चिंताओं और बुराइयों में नष्ट न करके सत्कर्मों में लगाना चाहिए। तभी हमारा जीवन सार्थक और सफल हो सकता है।

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इस आत्मस्वरूप का यथार्थ रूप तो ज्ञानी ही जान सकता है। अन्य कोई भी प्रकारान्तर से संशय से रहित इस तत्त्व को नहीं पा सकता है? इसके प्रतिपादन के समय ही जो अत्यन्त सूक्ष्मता से भरा हुआ प्रतीत होता है, तो फिर ध्यान अवस्था कैसी ही होगी! समझ लो, जो कुछ कहा गया उससे तो आत्मा ही भिन्न! समझ लो, आत्मपद सर्वथा सबसे परे ही रहता है। इसके बाद आचार्य रूप इस उत्तम आत्मतत्त्व का और सूक्ष्म रूप में ही प्रतिपादन करते हैं। यह ध्यान करने वाले को समझना है, जिस प्रकार ही ज्ञान के आधारेण ही ज्ञान को ही ज्ञान कहा जा सकता अथवा ज्ञान ही कहा जाता है सो ठीक ही कहा जाता है, ज्ञान को अज्ञानी नहीं कह सकते, न ज्ञान कह सकते हैं पर ज्ञेय, जो ज्ञान अथवा ज्ञेय-ज्ञेय रूप, इन दोनों के रूप में ज्ञान एक अनाकार के रूप विलास करता है, ज्ञेयपने के रूप में अज्ञेयपने विशेष को पा रहा है। वह आगे कहते हैं, "इसके पर चिदान्त ही जानना आत्मा कहलायेगा या कहा जाता है।" क्या आत्मसंशय है? ज्ञान ही स्वयं प्रकाशक है या स्वयं ज्ञान कहा जाता है सो उस ज्ञान रूप, आत्मा को; ज्ञेयाकार अथवा ज्ञेया-तीत कहलाने वाले अनेक रूप को पा कर निराकारपने में ज्ञान पाया जा सकता है। ऐसा है, समझ लेना क्या स्वयं ज्ञान कहलायेगा? नहीं कहा जा सकता है, जो उस ज्ञान का स्वरूप निराकारावस्था को कहा है, इसके बाद तो ज्ञान के स्वरूप का कथन इसके आगे कहा गया कि यह तो एक व एकमात्र सब का ज्ञाता ज्ञेय--के रूप में ही पा रहा है सो भी, इन ज्ञेयाकारों रूप से ही सब रूप से, जो ज्ञान रूप कहा गया, इसे ज्ञान कहलायेगा? जब यह ही आत्मपद के सब रूप व पर रूप से प्रतिपादन किया गया तो उस एक जीव-व्यतिकरपने को पा कर भी, उस आत्मपद व भगवान् के स्वरूप का सब आत्मतत्त्व निराकार रूप ज्ञान प्रकाश से भिन्न रूप ही हो सकता है सब रूप सब रूप सब रूप भगवान् रूप होगा? सो तो उस सब भगवान् के परे, रूप अविकल्प कहा गया है? भगवान् के इस कथन से यह बात हुई! सदा सदा कहा गया ज्ञानी जन, ज्ञान रूपी परम चिन्मय के स्वरूप पर सब प्रकार का ज्ञान ही पाया जाता है। इस प्रकार सब ज्ञान से भिन्न ज्ञान को पा कर आत्मपद ही पर है, जो एक व सब आत्मपद ज्ञान रूपी प्रकाश से परे उस सर्वव्यापकता को ज्ञान, भगवान् रूप कह कर कहा गया, इसके बाद, इसके बाद अज्ञानी जन सदा ज्ञान रूप उस प्रकाश रूप सर्वज्ञ रूप को ही सब कुछ मान बैठते हैं। सो सब रूप ही स्वरूप के ज्ञान का कथन ही इसके स्वरूप चिन्मयता के इस आत्मतत्त्व के सब रूप ज्ञान कहा तो आगे कहा कि, "आत्मस्वरूप को ज्ञान रूप कहा" सो उस ही स्वरूप को कहा जा रहा सो ज्ञेयावस्था, इसके ही अनेक--के प्रतिपादन किया आत्मतत्त्व रूप निराकार। "इसके पर ज्ञेयांश रूप, इसके पर ज्ञेयांश को भेद या न जानो" ज्ञान ज्ञेय के स्वरूप रूप इस आत्मतत्त्व का सब रूप ही रूप होगा "स्वरूप का केवल ज्ञान ही ज्ञान रूप सब रूप होगा" इसके अनन्तर ही यह सब कहा, जो आत्मरूप के ज्ञान रूप स्वरूप का केवल स्वरूप रूप रहा, सो आत्मतत्त्व के उस ज्ञान रूप को ही पर स्वरूप ही परस्पर रूप ही कहा गया सो सब रूप को सब रूप ज्ञान रूप ही रूप रहा जिसमें यह आत्मतत्त्व के सब रूप कहा गया "ज्ञेयांश के विशेष भेद, ज्ञेयांश रूप ही कहलावे" ज्ञेय-विभावों से आत्मस्वरूप के ज्ञान को प्रतिपादित कर, जो ज्ञान ही सब रूप निराकार स्वरूप को ज्ञान रूप ज्ञेयांश प्रकाश स्वरूप से भिन्न ज्ञेयाकार-ज्ञेयांश के स्वरूप को ज्ञान ही प्रतिपादित ही कहा गया कि सब रूप उस सो ही रूप केवल सब रूप ज्ञान होगा कहा गया इसके बाद तो आत्मा रूप विशेष के सब ही स्वरूप ज्ञान को निराकार प्रतिपादक या सो ही सब रूप उस ज्ञेय रूप को ज्ञान स्वरूप ही हो जाता अथवा सो ही सो ही रूप से कहा गया, सो तो जो भगवान् के स्वरूप रूप को, सो केवल स्वरूप के स्वरूप सब ही सब ही सर्व प्रतिपादक ज्ञान केवल कहा 213

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प्रार्थना का फल, उपासना का महत्त्व, या उस परम चेतन शक्ति स्वरूप प्रभु कृपा, या सर्वव्यापक का ध्यान सब समय हमारे साथ लगा रहना चाहिए, केवल संध्या उपासना समय ही नहीं वरन् हर समय हमारे हृदय में यह ध्यान बना न रहे, तो हम पाप कर्मों में प्रवृत्त हो ही नहीं सकते या दुर्गुणों का हम शिकार हो सकते हैं? भला कोई भी जीव इस प्रकार चाहता न हो, तो वह उस ईश्वर की सर्वज्ञता का ज्ञान हर क्षण क्यों नहीं रखेगा? भगवान् को सर्वज्ञ कह, उसकी ही निन्दा; यह बात भी हमारी ही, मनुष्य ही अज्ञानतावश हो जाया करती है। परन्तु जब हम उस प्रभु को सर्वज्ञाता मान लेते हैं, उसकी ही शरण में हर समय ही इस बात का ध्यान बना रहे अर्थात् हर क्षण में ईश्वर का भय ही बना रह सकता, तो कदाचित् मनुष्य का पतन नहीं हो ही सकता। यह अज्ञानतावश ऐसा विचार, जो प्रभु को उपासना ही तक सीमित मान लिया जाता, या केवल पूजा समय ही पर उसका महत्त्व समझा जाता! वास्तव में ऐसा ही मनुष्य अज्ञानी ही तो है। जो केवल एकान्त में ही प्रभु को, उस के भय का नाम लेवे या प्रभुता स्मरण करके बैठ जाय, या केवल मन्दिर या मस्जिद में ही प्रभु को स्मरण, सर्वव्यापक को उस रूप में मान कर अपना काम समाप्त समझे, ईश्वर को सर्वव्यापक मान लेने वाला कभी भी इस रूप में ईश्वर को सर्वव्यापक समझ, या मान कर अपने को सर्वव्यापक प्रभु रूप मान कर ऐसा नहीं कर बैठता। वरन् ईश्वर तो सर्वत्र है ही। इसलिए सर्वव्यापक का भाव परमात्मा समझने वाले को हर समय हर पल प्रभु स्मरण ही रहना चाहिए। फिर जो ईश्वर की, या सर्वज्ञ प्रभु के लिए अपनी इच्छा अनुसार फल या परिणाम चाहे, मनुष्य विचार करने लगता अथवा ईश्वर की कृपा पर अपनी इच्छानुसार कोई फल चाहता है। ईश्वर कृपा, फल या कृपा रूप फल का भाव यही है, मनुष्य अपनी भावना प्रभु के अर्पण कर सब कुछ, परमात्मा के ध्यान में रख कर चले, ईश्वर के स्वरूप ज्ञान का सही मार्ग यही सिद्ध होगा। सो, यदि! ईश्वर कृपा परिणाम स्वरूप ही मनुष्य समझे तब तो ईश्वर कृपा रूप का ज्ञान, या उस का स्वरूप प्रभु के ध्यान में लगाना बहुत कठिन होगा। फिर बात केवल ईश्वर उपासना की दृष्टि से ही विचार की न रह जाय, वरन् यह तो मनुष्य के जीवन का लक्ष्य ही बन जाना ही सत्य का रूप और मनुष्य का धर्म या कर्त्तव्य सिद्ध होवे। तब यह बात स्पष्ट रूप से अपने आप ही मानव कल्याण-मार्गदर्शक बन कर उस के हर कार्य रूप में आ जायेगी। मानव और प्रकृति केवल दो ही तो नाम इस जगत् में सृष्टि के हैं। यह जगत् इन दोनों अवस्थाओं स्वरूप माना गया है। अतः, प्रकृति से मनुष्य जब अलग हो अपने को एक न समझ कर या दोनों अलग-अलग को केवल भोगने वाला मनुष्य मान बैठेगा, अर्थात् प्रकृति को भोग मात्र ही का साधन मान कर मनुष्य अपने सुख के साधन ही को केवल मात्र प्रकृति का रूप मानेगा तो ऐसा भाव मनुष्य प्रकृति से अलग हो कर ही अपने आप समझेगा। पर जब सत्य भाव यह है कि मानव रूप और प्रकृति दोनों का एक ही सम्बन्ध है। जब तक यह सम्बन्ध मनुष्य समझता रहेगा; मानव जीवन सफल होता रहेगा। हाँ, यदि प्रकृति स्वरूप रूप को वह भोग मात्र ही का साधन समझे बैठा तब वह अपना सर्वनाश स्वयं ही कर लेगा, प्रकृति का कुछ न बिगड़ेगा। यह अवश्य कहा जा सकता होगा कि, सर्वव्यापक शक्ति स्वरूप प्रभु तो सर्वव्यापक रूप होकर सब का सब कुछ कर्ताधर्ता सब कुछ करने वाला ही कहा गया, तो वह मानव स्वयं कुछ कर सकनेवाला अथवा कर्त्ता क्यों न हो? ईश्वर की सर्वज्ञता तो प्रत्येक रूप में या हर समय व्याप्त है। तब फिर ईश्वर शक्ति केवल साक्षी, प्रकृति केवल भोग रूप मात्र क्या रह ही गयी, प्रकृति मनुष्य को भोगने के लिए ही क्यों उपयोगी की गयी है? यह प्रकृति उस सर्वशक्ति स्वरूप की शक्ति का प्रतीक ही समझ कर, उस द्वारा सर्वव्यापक का यह आभास रूप में सर्वव्यापक ज्ञान प्राप्त किया जाना सम्भव हो सका। केवल भोग मात्र समझ कर अज्ञानता ही तो है! ऐसा क्यों? प्रकृति को केवल उपभोग्य समझकर भोग के ही लिए केवल साधन क्यों माना? भोग्य साधन क्यों? प्रभु की सर्वव्यापक रूप का सच्चा स्वरूप समझ, प्रकृति का महत्त्व ही ईश्वर का महत्त्व होगा? इस प्रकार जब मानव समझेगा, तब ईश्वर की प्रभुता को जान कर, उसकी सर्वव्यापक या शक्ति स्वरूप समझ कर ईश्वर की ओर अपने कदम को बढ़ा, ईश्वर स्वरूप साक्षात्कार कर सकेगा। तब मानव सर्वव्यापक ही का सब रूप जान कर जीवन चक्र के रहस्य ज्ञान प्राप्त करेगा। हाँ, सर्वव्यापक ईश्वर अपने सर्वव्यापक रूप स्वरूप साक्षात्कार स्थिति में प्रभुता का ज्ञान करा देगा, सर्वज्ञता समझकर प्रत्येक स्थिति को वह प्रभु ज्ञान रूप समझेगा। इस से मानव प्रभु की ही सर्वव्यापकता को समझने का प्रयास करता रहेगा। 215

इस प्रकार विचार करके राजा सब का सब विषय भोग सर्वथा त्यागकर वनको गया, भगवान् का स्मरण करताहुआ वैराग्यवान् हुआ। तदनन्तर राजाके दोनों पुत्र भी राज्यसिंहासन पाकर प्रजाका पालनपूर्वक! हाथी, घोड़े, रथसमूह, पदाति इन चतुरंगिणी सेनाके प्रभावसे शत्रुसमूहको जीत छोटे भाई को, जिसका नाम शत्रुजित् था उसे महाराजके पदपर अभिषिक्त किया। राज्यके लोभी बहुत से लोग यह कहने लगे, शत्रुजित् बड़ा ही भाग्यवान् पुरुष है। उसका बड़ा भाई, जो ज्येष्ठ था और अपने पिताके समान सर्वथा ऐश्वर्यसम्पन्न था उसने राज्यभारको अपने ऊपर न रखकर छोटे भाईको देकर तपस्याके लिये गमन किया, जिसको सुधर्मानामक विख्यात ब्राह्मण कहता था कि हे महाभागवत्! विचार कर देखो संसार सब ही कैसा असार और अनित्य रूप है। संसारियों का यह स्वभाव देखा जाता है कि जबतक राज्य तथा ऐश्वर्यके सुख का भोग करता है तब तक सुख का लेशमात्र भी नहीं पाता है, फिर मरणोपरांत वह घोर नरक का भोग करता हुआ बारंबार संसारचक्र में गिरता ही रहता है। इसके बाद राजा का पुत्र जो कुछ भी धर्म का काम करता था यज्ञादिक वह सब निष्काम बुद्धिसे करताथा, जिससे वह संसार बन्धन का नाश करता हुआ पर- मपदको प्राप्त हो गया। हे, मुने इस प्रकारका यह इतिहास सुनकर जो मनुष्य निष्काम भावसे भगवद्भजन में रत रहता है वह संसारके सब बन्धनोंसे छूट जाता है। अब आप क्या सुनना चाहते हैं? अथवा किससे मुक्ति चाहते हैं? अथवा ज्ञानोपदेश? सब प्रकारके इन प्रश्नों का उत्तर विधिवत् सब प्रकारके शास्त्रों के ज्ञाता मुनि "अज्ञानके हेतु उस मोहको, शीघ्र ही नाशकरेंगे" इस प्रकार उस बातको सुनकर राजा नें मुनि से हाथ जोड़कर विनय भाव से यह प्रार्थना की कि महा- भागन आप-सर्वज्ञसम्पन्न सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता हो, मुझको ऐसा उपदेश देकर कृतार्थ कीजिये कि इस संसार रूप घोर नरकसे मेरा उद्धार हो जाय, जिससे मुझे परमगति मिले? राजाके वचन सुन, मुनि हर्ष पूर्वक गम्भीर वाणीसे कहने लगे कि हे राजन्! सब संसार में जो जो पदार्थ स्थित तथा दृष्टिगोचर हो रहे हैं सो सर्वथा मिथ्या तथा नष्ट होने वाले हैं, केवल एक ही भगवान् सदा ही सत्य हैं। हे भूपाल जो, कुटुम्बियों, सुहृदों तथा बन्धु आदि पदार्थों संबंधी ममता, सर्वथा अज्ञान के कारण उत्पन्न हुई है। इसलिये केवल एक भगवान् ही सर्वथा सत्य सार रूप, सबका कल्याण करने वाले हैं। सब जीवों को उन्हीं की शरणमें जाना, उन्हीं की शरणमें आनन्द मिलता--रहता सदा, उनका गुणानु--वाद ही करना और सुनना चाहिये। इसलिये सर्वसंदेह को दूर कर मन और बुद्धि सर्वदा परमात्मा की ही भक्ति मेंलगाये सदा आनन्द मगन रहना योग्य विचार करके ऐसा निश्चय कर लो। हे राजन्, आत्मा सदा सबके शरीरमें व्यापक रूपसे स्थित होकर साक्षीरूप, सर्वथा प्रकाश रूप और चेतन तथा निर्गुण स्वरूपसे वर्तमान है। केवल मायाके संग से अनेक प्रकारके अज्ञान सम्बन्धी भावों को अंगीकार करता है। वस्तुतः वह सर्वथा निर्विकार ही अजर व अमर भी कहा गया है। इसलिये केवल एक भगवान् की सेवा--भक्ति करना ही मनुष्यों का परमकर्त्तव्य रूप धर्म कहा गया है। जिसको धारण करके जीव भव--सागरके दुःखसे छूट कर सदा के लिये सब प्रकार परम सुख रूप मोक्षको पाता है, जो प्राणी इस उत्तम प्रकार के उपदेश को नित्य प्रति स्मरण करता है। वह तीनों ताप अर्थात्, दैहिक दैविक भौतिक तापों से मुक्त होकर सुख, जो सब प्रकारके दुःखों का नाशक रूप, परमपद प्राप्त कर लेता है। अब आप क्या सुनना चाहते हैं? जिस बात को सुनकर आपके मनकी शंका शान्त होजाय। ऐसा सुन जो कुछ राजाने फिर पूछासो सब कहा गया, जिसका वर्णनग्रन्थके अगले अध्यायोंमें आयेगा। यह एकादश स्कन्धका नवम अध्याय महा पुराण श्रीमद् भागवत् में समाप्त हुआ। इसके बाद दशम अध्याय में दत्तात्रेयजीके चौबीस गुरुओं का जो सब कथाका साररूप वर्णन दिया गया है। उसका पाठ करने और श्रवण करने से सब प्रकार का कल्याण हो कर मनुष्य सर्व, पापोंसे छूट जाता तथा जिस प्रकार राजाने यह कथा दत्तात्रेयजीके मुख से सुनी सुनकर उसका मनसब संशयों से रहित होगया, फिर उसने? सब प्रकारके सांसारिक- सुखों तथा अपने राज पाटको छोड़कर अरण्य का वास लिया, जिससे वह सब प्रकार मुक्त होगया इसलिये सब प्राणी मात्र अपने उद्धारके लिये सदा इस भगवान् की कथा का श्रवण तथा मनन सदैव निष्काम रूपसे किया साधु सन्त, यति, महात्मा और भिक्षुक सब इसके पठन और श्रवणसे मोक्षको प्राप्तहोकर सब प्रकार सुखी हो संसारके आवा गमनसे मुक्ति पाजाते हैं। जो मनुष्य केवल अपने ही स्वार्थ के लिये इस कथाका श्रवण करते हैं। उन पर प्रभु की कृपा नहीं होती। इसलिये चाहिये कि सब प्रकारके आडम्बरको त्याग केवल भगवत् नाम, रूप और लीला का सदा ध्यान लगाकर परमार्थमें चित्तलगाना योग्य है। इस कथाके प्रभावसे राजा यदु, दत्तात्रेयजी, नवम-- अध्यायमें संसारसागर से, भवबंधनविहीन और परमपद, कोप्राप्तहुए। इस प्रकार एकादश स्कन्ध का नवम अध्याय समाप्त हुआ 216

जब जीवन का मर्म, अपना पावन संबंध उस पावन का अंश बन जाएगा! तब यह तन शिव होगा। इस संवेदनशीलता का पहला लक्षण यह होगा, हमारी दृष्टि दूसरों की दुर्बलता की ओर नहीं वरन् सद्-गुणों की ओर पहले जाएगी। हाँ, दूसरों की भूलों तथा दुर्बलताओं की उपेक्षा की दृष्टि होगी क्या? दृष्टि तो निर्मल होगी, पर वह दृष्टिकोण बदलेगा। हम भूल की सम्भावना सदैव अपने प्रति ही मान लें तथा अन्य व्यक्तियों प्रति जो भी निर्णय लेवें उस समय दुर्भाव सर्वथा मिटाकर लें। व्यक्ति-विशेष के दोष पर विचार न करके यह विचार करें कि परिस्थितियाँ उसे उस व्यक्ति-विशेष बनाने वाली थीं या नहीं। यदि हाँ, तब, उसकी भूलों सम्बन्धी निर्णयों हेतु उस समय तक रूकें, जबकि या जब तक हमें उस आस-पास के वातावरण का निश्चय पता लगाने तथा सुधार करने योग्य न बनें। पर ध्यान रहे कि, इस सब कार्य काल अथवा निर्णय काल के लिए हमारा हृदय उस के लिए सदैव, मित्र या शुभचिन्तक का दायित्व ही निभा सके। जब अपनी दुर्बलता की परीक्षा होगी और अपनी भूल पर कठोर प्रहार होगा तथा अपनी भूल के प्रति हम दयालु न रहकर उस भूल रूपी कीटाणु को जो सर्वनाश का कारण बनती अथवा बनकर ही रहती है। नष्ट ही करने का सतत संकल्प बना ही रहे तब अपने दुर्भाव का तो प्रश्न ही कहाँ उठता होगा! हाँ दुर्भाव तो वास्तव में ही तब ही उत्पन्न हुआ कहलाया जा सकता व माना जाएगा, न कि अपनी अपनी भूलों की ओर ध्यान न देकर दूसरों की भूलों अथवा कमजोरियों की ओर? यह भी स्मरण रहे, दुर्भाव का प्रवेश भी उस समय हुआ समझना चाहिए जब कि अपने दुर्भावों व भूलों को भुला कर, दूसरों प्रति दुर्भाव हेतु न्याय-कर्ता! बन बैठने का विचार अथवा पद न पावे तब, न कि इसके बाद। दुर्भाव उत्पन्न होने की एक स्थिति मनुष्य के मन तथा हृदय दुर्बलता का चिह्न मात्र कही जाएगी या उसका रूप कहा जावे तब उस दुर्-गुण रूपी रोग ग्रसित मानव अपनी ही शरण चाहेगा तब! उसकी रक्षा करें, उसकी रक्षा करें! यह योग्य या उचित? ऐसा विचार उस दुर्भावी मानव को तो नहीं आएगा। ऐसा विचार तो केवल विवेक व पर के प्रति अपनत्व रखने वाले हृदय को ही अपनी शरण देगा। फिर पर के प्रति निष्पक्ष, न्याय रूप निर्णय करने वाला मन ही विचार कर उस दुर्भावी मानव के उस अवगुण को अपने मन से दूर करने हेतु प्रयत्नशील हो सके तो क्या, पर तो पर भी अपना कहलाने का योग्य कहलाएगा ही अथवा नहीं। तब, निश्चय ही ऐसा निर्णय होगा, जिसे हर मानव न्याय ही कहेगा। विचार तो मन का गुण है, विचार तो संवेदनशीलता का ही एक रूप माना गया जिसे हर मानव जीवन में अपना कर्तव्य समझ कर पूरा करता हुआ दिखाई देता व यह विचार, न कि दुर्भावना, का आधार माना जाएगा? निर्णय मन का धर्म बन जाता है। संवेदनशीलता का रूप जब तक किसी कार्य का रूप नहीं लेता तब तक उस कार्य अथवा विचार को न्याय रूप नहीं दिया जा सकता। बिना कर्म न्याय रूपी विचार का रूप मन तथा हृदय दोनों ही केवल काल्पनिक ही बने रहते हैं। मन रूपी उस वृक्ष को, कर्मों का सिंचन मिलने पर विवेक रूपी फल लगता है। उस विवेक का उपयोग मानव अपने जीवन में ही, अपने दृष्टिकोण अथवा मन स्थिति को न देकर, दूसरों के विवेक अथवा निर्णय की उपेक्षा या अवहेलना करने लग जाए तो उस समय न्याय या विवेक का उपयोग, जो उचित रूप से हो रहा था दुर्भावना में ही परिवर्तित, हो जाएगा, या नहीं? ऐसा विचार कर, "मानव को यह बात, मन से निष्पक्ष हो-कर तय तो करनी ही होगी, सच की खोज करने, हेतु।" पर मानव यह निर्णय तो कैसे करे? यह तो स्पष्ट रूप से कहा जा सके, पर कैसे, ऐसा विचार करने पर, हर एक सोच ही यह प्रश्न था, सच का निर्णय या न्याय का स्वरूप क्या होना चाहिए? "सच वह है, जिसका न तोड़-फोड़ करने वाला ही उस परम शक्ति-विशेष का स्वरूप कहला सके।" विचार का अस्तित्व तो रहा, पर उस का नाम रूप क्या हो, पर ऐसा विचार आने पर भी, हर मानव असमंजस की स्थिति में ही रहा, फिर क्या होता? "शक्ति-विशेष का स्वरूप अथवा रूप।" अर्थात्? परमात्मा शक्ति-विशेष का प्रतीक ही तो होगा तथा उसी के स्वरूप का ऐसा रूप जो कि हर एक को दिखाई दे, इस हेतु उस समय ही न्याय का स्वरूप तय हो पा रहा था जब नर-नारायण का निर्णय हो नर-नारायण कहलाने का 217