भारतकोश
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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

९२ पंचदशी

सभी प्राणी दिन रात दुःखी बने रहते हैं—वे सुखी कभी नहीं होते। इस कारण इन तीन का ही दृष्टान्त हमने दिया है। अब प्रकृत बात तो यही हुई कि—यह सोता हुआ प्राणी भी इन ही तीनों की तरह ब्रह्मानन्द में तत्पर रहता है उसे स्त्री से आलिंगित कामी की तरह अन्दर बाहर का कुछ भी ज्ञान नहीं रह जाता। उस अवस्था के विषय में श्रुति ने कहा है कि—उस समय पिता पिता नहीं रहता। अर्थात् जीव का जीवभाव ही उतने समय के लिये खोया जाता है। उस समय तो जीव ब्रह्मतत्व ही हो गया होता है। क्योंकि संसारिपन का तो कोई चिह्न ही उस समय नहीं रह जाता। जानते हो सुख दुःख देने वाली वस्तु क्या है ? सुनो ! पितापन आदि का अभिमान ही सुख दुःख का कारण हुआ करता है। सुषुप्ति जब आती है तब यही अभिमान नहीं रह जाता और यह प्राणी उस समय सब शोकसरिताओं के पार पहुँच गया होता है। जब कोई पुरुष सोकर उठता है तब कहता है कि मैं सुखपूर्वक सोया और मैंने कुछ भी नहीं जाना। अर्थात् वह उस समय सुख और अज्ञान दोनों को जान रहा था। चित्स्वरूप होने के कारण सोते समय सुख तो स्वयं ही प्रतीत हो जाता है। उसी स्वयंप्रकाश सुख पर जो अज्ञान का पर्दा पड़ा है, उस की प्रतीति भी उस सुख के सहारे से ही हो जाती है। वाजसनेयी शाखा वालों ने सुख विज्ञान और आनन्द इन तीनों को एक ही बात कहा है। उससे यह समझने में और भी सुभीता हो जाता है कि स्वयंप्रकाश जो भी कोई सुख है वह ब्रह्मतत्व ही है। सुषुप्ति के समय सुख के ऊपर जो अज्ञान का ढकना पड़ा था उसी अज्ञान में बुद्धि और मन लीन हो जाया करते हैं। विज्ञानमय और मनोमय का विलीन हो जाना ही 'निद्रा' कहाती है। इसी को कोई-कोई

[Header] ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९३ 'अज्ञान' भी कह देते हैं। पिघला हुआ घी जैसे ठण्डक लगने से गाढ़ा हो जाता है, इसी प्रकार भोगदायी कर्मों के सम्पर्क से यही अज्ञान गाढ़ा हो कर 'विज्ञानमय' हो जाता है। विलीन अवस्था के उसी अज्ञान को 'आनन्दमय' कह देते हैं। सुषुप्ति से पहले क्षण में जो अन्तर्मुख बुद्धिवृत्ति होती है, उस बुद्धिवृत्ति में जब सुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसके बाद उस प्रतिबिम्ब को अपने मुँह में पकड़े ही पकड़े वह वृत्ति निद्रा रूप से लीन हो जाती है तब यही 'आनन्दमय' कहाने लगती है। वह जो अन्त- र्मुख आनन्दमय है वह, चिदाभास से मिली हुई तथा अज्ञान से पैदा हुई अति सूक्ष्म वृत्तियों के द्वारा ब्रह्मसुख को भोगा करता है। जागरण में जब हम सुख भोगते हैं तब तो हमें यह याद भी रहता है कि हम सुख भोग रहे हैं परन्तु उस [ निद्रा के ] समय ऐसा विचार न होने का कारण भी सुनलो—वे अज्ञानवृत्तियाँ बहुत ही सूक्ष्म होती हैं, वे बुद्धिवृत्तियों की तरह स्पष्ट नहीं होतीं इसी से सुषुप्ति में सुखभोग का स्पष्ट परिज्ञान नहीं होता। वेदान्त का गम्भीर मनन करने वालों ने यह बात बतलायी है। माण्डूक्य और तापनीय आदि उपनिषदों में तो बड़ी ही स्पष्ट भाषा में 'आनन्दमय' को भोगने वाला और 'ब्रह्मानन्द' को भोग्य कहा है। जो आत्मा जागते समय मन, बुद्धि आदि अनेक रूप हो रहा था वही अब सुषुप्ति के समय चावलों की पिट्ठी की तरह फिर एकता को प्राप्त हो गया होता है। पहले जो बहुत सी बुद्धिवृत्तियां थी अब सुषुप्ति के समय उनका एक घनपिण्ड हो गया है—मानों पानी का जम कर बर्फ़ बन गया हो। जिस प्रज्ञानघनता का वर्णन हमने ऊपर किया है, इसी को बहुत से लोग दुःखाभाव कह बैठते हैं। क्योंकि उस समय सम्पूर्ण दुःखवृत्तियों का विलोप हो जाता है।

उनकी यह एकदेशीय दृष्टि ही उनके भ्रम का कारण बन जाती है। यह हम पहले ही कह चुके हैं कि अज्ञान में बिम्बित चैतन्य से ही आनन्द का भोग तब हुआ करता है। अज्ञान के पर्दे के कारण भोग्य के स्वरूप का पता हमें चलता ही नहीं। यदि उस का पता चल जाता तो प्राणी को विषयों में भटकना ही न पड़ता। इसी कारण भोग में आते हुए भी उस ब्रह्मसुख की अवहेलना करके कर्मों के प्रताप से इस जीव को फिर फिर वाहर निकलना ही पड़ता है किंवा यों कहो कि—जागना पड़ ही जाता है। जब यह जीव सो कर उठता है तब कुछ काल तक उस भोगे हुए ब्रह्मानन्द की बासना तो बनी ही रहती है। जभी तो वह बिना किसी सुखदायी विषय के ही सुखी हो कर चुप चाप बैठा रहता है। जिन कर्मों ने सुषुप्ति में से इसे जगा लिया था वे ही कर्म फिर इस से संसार के नाना दुःखों की भावना कराने लगते हैं। फिर यह अभागा प्राणी धीरे धीरे हाय ! हाय ! उस जगज्जी- वन ब्रह्मानन्द को सर्वथा भूल ही जाता है। निद्रा के पीछे और निद्रा के पहले सभी मनुष्यों को इस ब्रह्मानन्द में बड़ा स्नेह होता है। हां इतना तो अवश्य है वे इस आनन्द का यह नाम नहीं जानते हैं। इतना समझ चुकने पर हम समझते हैं कि कोई भी समझदार इस आनन्द के विषय में विवाद तो नहीं करेगा। जो ब्रह्मानन्द बड़े परिश्रम से मिला करता है, वही ब्रह्मानन्द आल- सियों और सर्वसाधारण को मिला ही हुआ है, फिर आप गुरु और शास्त्र की पख क्यों लगाते हो ? ऐसा यदि कोई पूछे तो हम कहेंगे कि हां यदि सचमुच ही वे लोग यह पहचान जांय कि यह ब्रह्मानन्द ही है तो वे अवश्य ही कृतार्थ हो जांय। परन्तु गुरु और शास्त्र के बिना तो यह गम्भीर तत्व किसी की समझ में

ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९५ आता ही नहीं। जब तक कोई इस ब्रह्ममार्ग का भेदिया साथ न हो तब तक ब्रह्मदुर्ग पर अधिकार पाना सरल काम नहीं है। प्रकृत बात तो यही हुई कि जहां जहां विषय न हों और सुख होता हो वहां वहां इस ब्रह्मानन्द की 'वासना' को समझ लो। विषयों के मिलने पर भी, जब कि उनकी इच्छा नहीं रह जाती और मनोवृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है, तब उसमें आनन्द का प्रति- बिम्ब पड़ जाता है। बस इसी को 'विषयानन्द' जान लो। 'ब्रह्मा- नन्द' 'वासनानन्द' और 'प्रतिबिम्ब' [विषयानन्द] इन तीन के सिवाय तो इस जगत् में चौथा आनन्द है ही नहीं। इन तोनों आनन्दों में भी यह बात ध्यान रखने योग्य है कि यह स्वयं- प्रकाश 'ब्रह्मानन्द' ही 'वासनानन्द' और 'विषयानन्दों' को यदा तदा उत्पन्न कर देता है। यहां तक श्रुति, युक्ति और अनुभव के सहारे से यह सिद्ध किया गया है कि सुषुप्ति काल में यह स्वयंप्रकाश और चेतन ब्रह्मानन्द रहता है। अब जागरण काल में उस ब्रह्मानन्द को कैसे जानें ? सो भी सुन लीजिए—सुषुप्ति के समय जिस 'आनन्द- मय' को हमने ऊपर बताया है, वही जब 'विज्ञानमय' हो जाता है तब स्थानभेद के, कारण कभी जागरण और कभी स्वप्न में पहुँच जाता है। नेत्र में 'जागरण' होता है, कण्ठ में 'स्वप्न' होता है और हृदय कमल में 'सुषुप्ति' होती है। यह चेतन जब जागता है तब पैरों से मस्तकपर्यन्त देह को व्याप्त कर लेता है। तपे हुए लोहपिण्ड के साथ जैसे अग्नि हिल मिल कर एक होजाती है, इसी प्रकार इस देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त हुआ यह चेतन, निश्चित रूप से यह मान बैठता है कि 'मैं तो मनुष्य हूँ'। यह मनुष्य क्रम से 'उदासीन' 'सुखी' और 'दुःखी' इन तीन अव-

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स्थाओं में रहने लगता है। इन तीनों अवस्थाओं में से सुख दुःख की दो अवस्थायें कर्म से उत्पन्न हुआ करती हैं। परन्तु उदासी- नता तो किसी भी कर्म से उत्पन्न नहीं होती [ वह तो स्वाभाविक ही होती है ]। बाह्य पदार्थों के भोग से या फिर मनोराज्य से भिन्न भिन्न प्रकार के सुख दुःख होते हैं। परन्तु कभी कभी ऐसा भी होता है कि उस समय न तो सुख ही होता है और न दुःख ही। उस समय निजानन्द की धुंधली प्रतीति सब ही को होती है। उस समय प्रायः सभी यह कहा करते हैं कि आज मुझे कुछ भी चिन्ता नहीं है। आज तो मैं सुखपूर्वक बैठा हूँ। 'मैं सुखपूर्वक' हूँ' इस प्रकार सूक्ष्म अहंकार से ढका रहने के कारण ही इस आनन्द को हम मुख्यानन्द नहीं कह सकते। इसे तो मुख्य आनन्द की वासना समझना चाहिए, जो कि अहंकार के छनने में को छन कर हमें अस्पष्ट दीख रही है—जो अपनी ओर को हमारा विशेष ध्यान नहीं खींच सकी है। जिस घड़े के अन्दर जल भर रहा हो उस के बाहर जो शीतलता आजाती है वह शीत- लता जल नहीं होती, किन्तु वह तो जल का गुण होता है। उस शीतलता को देखकर जल का तो अनुमान ही हो जाता है। इसी प्रकार यह उदासीनता का सुख ही 'ब्रह्मानन्द' नहीं है। यह तो 'ब्रह्मानन्द' की वासना है। इस वासना से तो 'ब्रह्मानन्द' का अनु- मान होता है। निरोध समाधिका अभ्यास करने से जितना इस अहंकार का विस्मरण होता जायगा, योगी की दृष्टि उतनी ही सूक्ष्म होने लगेगी और उसी परिमाण से योगी को निजानन्द का अनु- भव भी होने लग पड़ेगा। जब अहंकार का विस्मरण पूर्ण रूप से हो जाता है, तब यह परमसूक्ष्म होकर रहता है—लीन नहीं होता— इस कारण इस अवस्था को निद्रा नहीं कह सकते। यही कारण

है कि साधक का देह गिर नहीं जाता । गीता के छठे अध्याय में

ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप . ९७ है कि साधक का देह गिर नहीं जाता । गीता के छठे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन के प्रति कहा है कि—जिस समय द्वैत का भान बन्द हो जाय और नींद भी न आये, उस समय जो सुख किसी को प्रतीत होता हो बस वही ब्रह्मानन्द कहाता है । साधक को चाहिए कि धीर बुद्धि के सहारे से धीरे धीरे मन की उपरति की साधना किया करे और जब मन को आत्मसंस्थ कर चुके—जब मन को यह निश्चय कराया जा चुके कि यह सब कुछ आत्मा ही है, उससे भिन्न यह कुछ भी नहीं है—ऐसी अवस्था जब आजाय फिर सब कुछ सोचना बन्द कर दे । यही योग की अन्तिम स्थिति है । ऐसी उच्च स्थिति पाने की विधि यह है कि—जो मन स्वभाव- दोष से चंचल है अस्थिर है, जो किसी एक विषय के साथ बंध कर कभी नहीं ठहरता, ऐसा मन जिस कारण से बाहर निकला हो, उसकी ओर से उसे रोक कर, उस के दोष उसे दिखा कर, उसे वैराग्य का उपदेश दे दे कर, वहां से हटा ले और आत्मा के बस में करता जाय । इस प्रकार योगाभ्यासी पुरुष का मन अभ्यास के प्रताप से आत्मा में ही शान्त हो जाता है । जब इस योगी का मन शान्त हो जाता है, जब इसका रजोगुण नष्ट हो जाता है, जब वह निष्पाप हो जाता है, तब उसे ब्रह्मभाव की प्राप्ति हो जाती है, तभी उसे उत्तम सुख मिलता है । जिस समय चित्त योगसेवा करते करते रुक कर आराम पा लेता है, जब अपने आप से अपने आप को देख कर मग्न होने लगता है, जिस समय आत्मा में स्थित हुआ योगी अनन्त तथा बुद्धिग्राह्य अतीन्द्रिय और अपूर्व सुख का अनुभव किया करता है, जब वह योगी आत्मतत्व को कभी नहीं भूलता, जिस आत्मा को पाकर दूसरे लाभ तुच्छ दीखने लगते हैं, जहां पहुँच कर योगी दुःखों के पर्वत

९८ पंचदशी : गिर पड़ने पर भी प्रह्लाद की तरह विचलित नहीं होता है, बस दुःखों के संयोग को छुड़ा देने वाली इस पुण्य अवस्था को ही 'योग' कहते हैं। ऐसे योग को निर्वेदरहित मन से बड़ी लगन से करना चाहिए। जब कोई योगी इस रीति से सदा आत्मा को योग में लगाए रहेगा, तब उसके योगविघ्न भाग जांयगे। फिर तो बिना ही परिश्रम के उसे ब्रह्मसुख मिल जायगा। समुद्रजल को अपनी चोंच से सींच कर समुद्र सुखाने के लिए जितना धीरज टिट्टिभी ने धारण किया था, उतना धीरज कोई योग के लिए धारण करे तो उसके मन का निग्रह हो सकता है। मैत्रायणी शाखा में योग की विधियां लिखी हैं कि जैसे बेईंधन की आग अपने कारण में शान्त हो जाती है, इसी प्रकार जब वृत्तियें नहीं रह जातीं तब यह चित्त अपने कारण में शान्त हो जाता है। जो मन अपने कारण में शान्त हो चुका है, जो मन अब इन्द्रियार्थों की ओर को देखता भी नहीं है, ऐसे मन की दृष्टि में कर्मवश से मिलने वाले सुखादि पदार्थ मिथ्या समझ लिए जाते हैं। यह एक अनादिसिद्ध रहस्य है कि चित्त ही संसार है इस कारण उस चित्त को शोध कर रखना चाहिए। जिसका चित्त जिसमें पड़ा रहता है वह प्राणी तन्मय हुआ रहता है। चित्त में जब प्रसाद आजाता है तब शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं। प्रसन्नचित्त वाला पुरुष जब आत्मा में स्थित होता है तब उसे अक्षय्य सुख मिल जाता है। इस मायामोहित प्राणी का चित्त जैसे विषयों में आसक्त हो रहा है वैसे यदि ब्रह्मतत्व की ओर को झुक जांय तो फिर कौन है जो बन्धन से छुटकारा न पा जाय ? मन दो प्रकार का होता है एक शुद्ध दूसरा अशुद्ध । कामना के मेल से मन में अशुद्धता आ जाती है। जब यही मन कामना

ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९९ से हीन हो जाता है तब उसे 'शुद्ध मन' कहते हैं । मनुष्यों के बन्ध और मोक्ष का कारण यह मन ही है । विषयों में आसक्त मन मनुष्य को बँधवा देता है । निर्विषय बने हुए मन से मनुष्य को मुक्ति मिल जाती है । जिस चित्त को आत्मा में लगा दिया जाता है, जिस चित्त के रजस्तमोमल समाधिरूपी जल से धो दिये जाते हैं, उस चित्त को समाधि में जो आनन्द आता है, उसका वर्णन वाणी से किया ही नहीं जा सकता । क्योंकि वह तो एक अलौकिक ही सुख है । वाणी आदि लौकिक साधन उसे कैसे दिखा सकेंगे ? उसे तो मौन की अमानवी भाषा में ही समझना होगा । वह स्वरूपभूत सुख तो अन्तःकरण से ही ग्रहण किया जा सकता है । यद्यपि हरएक साधक मन को चिरकाल तक आत्मा में स्थिर नहीं कर सकता, फिर भी यदि किसी को क्षणभर की समाधि भी होने लगे तो उसे अगाध ब्रह्मानन्द समुद्र का निश्चय तो हो ही जाता है । जो श्रद्धालु हैं, जिन्हें इसकी चाट लग जाती है, उन्हें तो इसका निश्चय होकर ही रहता है । एक बार जब उन्हें निश्चय हो जाता है तब फिर वे सदा ही उस पर विश्वास किये रहते हैं । जिनको एक बार भी इस तत्व का निश्चय हो जाता है वे लोग उदासीनता के समय आने वाली आनन्द की वासना को 'दूर हट' कह देते हैं और तब भी इस मुख्य ब्रह्मानन्द की भावना को बड़ी तत्परता से किया करते हैं । परपुरुष के व्यसन वाली नारी की तरह बाह्य व्यापार करता हुआ भी धीर पुरुष, जब एक बार भी इस तत्व में विश्राम पा लेता है, तब सदा इसी आनन्द को चखता रहता है । 'धीर' हम उसी को कहते हैं कि जब इन्द्रियां विषयों की ओर को जाने को जोर जबरदस्ती करने लगें तब भी जो आत्मानन्द के आस्वाद की इच्छा

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से उन सब को डाट बता कर उसी की चिन्ता में लगा रहे। बोझा उठाने वाला पुरुष जब सिर के बोझ को उतार कर फेंक देता है, उस समय उसे जैसा विश्राम मिलता है, संसार की खट- पट के छूट जाने से जब वैसी बुद्धि किसी की हो जाय, तब उसे ही हम 'विश्राम पाना' कहते हैं। इस तत्व में विश्राम पा लेने वाले पुरुष की ऐसी अवस्था हो जाती है कि वह उदासीनकाल में जैसे आनन्दतत्पर रहता है, ठीक उसी तरह सुख दुःख के कारणों या सुख दुःखों के प्राप्त होने पर भी उसी लगन से आत्मानन्द का स्वाद लेता रहता है। वह शरीर को सुख दुःख भोगने देता है और मन से ब्रह्मानन्द को चखता रहता है। संसार के जो कोई विषय ब्रह्मानन्द का अनुसन्धान नहीं करने देते, उनकी ओर से तो वह इतना लापरवाह हो जाता है जैसे कोई सती होने वाली स्त्री शृङ्गार की ओर से लापरवाह हो गई हो। ॅ धीर पुरुष की बुद्धि तो कन्वे की आंख की तरह कभी आत्मानन्द को भोगती और कभी आत्मानन्द का विरोध न करने वाले संसारी सुखों का अनुभव किया करती है। कव्वे की एक ही पुतली होती है, वही कभी दाहिनी आंख में और कभी बांयी आंख में आया जाया करती है, इसी प्रकार तत्वज्ञानी की मति दोनों आनन्दों में चक्कर लगाती रहती है। 'विषयानन्द' और 'ब्रह्मानन्द' दोनों आनन्दों को भोगने वाला तत्वज्ञानी तो दुभाषिये की तरह का होता है। दुभाषिया जैसे दोनों की बात समझ लेता है ऐसे ही तत्वज्ञानी 'लौकिक' और 'वैदिक' दोनों आनन्दों को लूटा करता है। जो पुरुष आधा गंगाजल में डूब रहा हो और आधा धूप में खड़ा हो वह जैसे सर्दी गर्मी दोनों को एक साथ अनुभव किया करता है इसी प्रकार दुखों से उसे उद्वेग नहीं होता क्योंकि उसी

ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप १०१


समय उसे वह महानन्द भी तो मिल ही रहा है। वह तो अब दो दृष्टि वाला हो गया है। विपत्ति के पहाड़ टूटने पर भी वह वैदिक ब्रह्मानन्द को याद करके उद्विग्न नहीं हो पाता है। इस प्रकार जागरण काल में चाहे तो दुःखानुभव हो रहा हो चाहे सुखानुभव होता हो, और चाहे वह उदासीन होकर चुप- चाप बैठा हो, तत्वज्ञानी को सदा ही ब्रह्मानन्द दीखा करता है। इतना ही नहीं, इस जागरण की वासना से जो सपने बनते हैं उनमें भी उसको ब्रह्मसुख भासने लग पड़ता है। सपने आनन्द- वासना से भी आते हैं और अविद्यावासना से भी आते हैं। जब इस ज्ञानी को अविद्यावासना के स्वप्न आयेंगे तब इसे भी अज्ञा- नियों की तरह सुख दुःख देखना पड़ेगा ही। सुषुप्ति अवस्था में, उदासीन काल में, समाधि भावना के समय तथा सुख दुःख भोगते हुए भी स्वयंप्रकाश ब्रह्मानन्द को प्रकाशित करने वाला योगी का प्रत्यक्ष कैसा होता है वह इस प्रकरण में बताया गया।

12. Atmananda

[ १२ ] ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप योगी लोग तो योग के द्वारा निजानन्द को पा ही लेंगे, पर जिनकी योग में गति नहीं है वे इस आत्मानन्द को कैसे जानें ? इसी प्रश्न का उत्तर यह है कि हम चाहे जितनी उदारता दिखायें सर्वसाधारण तो इस गहन बात को समझ ही नहीं सकेंगे । इस मार्ग द्वारा उनका तिल भर भी उपकार नहीं हो सकेगा । वे जिस प्रवृत्ति मार्ग में लगे हैं उनके लिए वही ठीक है । प्रवृत्ति मार्ग की दुःखपरम्परा से ही तो आत्मजिज्ञासा जागा करती है । संसारनदी के प्रवाह को रोक कर खड़ी हो जाने वाली बाधायें जब तक किसी के सामने आकर खड़ी नहीं हो जातीं तब तक किसी के भी हटाने से प्रवृत्ति मार्ग छोड़ा नहीं जाता । यह तो अपने अनु- भव से ही शिक्षा मिलने पर छूटता है और तब निवृत्ति आकर ज्ञान की उत्पत्ति कर देती है । प्रवृत्ति से जिज्ञासा होती है और निवृत्ति से ज्ञान हो जाता है । यों आप उन प्रवृत्तिमार्गियों को व्यर्थ फँसा हुआ मत समझो । इस संसार नाम की पाठशाला में सभी अपनी अपनी शक्ति के अनुसार शिक्षण ले रहे हैं । इसमें जल्दी का प्रश्न थोड़ा सा भी नहीं है । उन्हें तो उनके अधिकार के अनुसार कर्म या उपासना में ही लगा देना श्रेयस्कर होगा । हर किसी को आत्मानन्द की बात बताना ठीक नहीं है । आवश्यकता से पहले दी हुई चीज़ से लाभ के स्थान में हानि होती है । हां,

ब्रह्मानन्दन्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०३

जो तो मन्दप्रज्ञ जिज्ञासु हों उनको निम्न रीति से आत्मानन्द का बोध करा देना चाहिए। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी इसी श्रेणी की थी। याज्ञवल्क्य ने उसे जिस रीति से समझाया था उस ही रीति से उसको भी समझा देना पर्याप्त होगा। याज्ञवल्क्य ने कहा था कि—अरे मैत्रेयी ! अपने जी से ही पूछ लो—तुमको स्वयं पति के लिए तो पति प्रिय नहीं होता है। पति, पत्नी, पुत्र, वित्त, पशु, ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोक, देव, वेद, भूत, और सभी कुछ अपने मतलब से ही तो प्रिय हो जाते हैं। इनमें से एक भी तो पदार्थ स्वरूप से प्यारा नहीं है। जितनी भी प्रीतियां हैं वे सब एकपक्षीय [एकतर्फ़ा] होती हैं—जब किसी पत्नी को भोग की इच्छा होती है तब ही वह अपने पति से प्यार करने लगती है। परन्तु उसका पति भूखा हो, किसी काम में लगा हो, रोगग्रस्त हो, तो वह उसे नहीं चाहता। तब उसे प्रेम का उत्तर नहीं मिलता। ऐसी अवस्था में तो पत्नी का प्रेम एकपक्षीय सिद्ध होता है। उसका यह प्रेम, पति के लिए है ही नहीं। यह तो स्वार्थ के लिए ही है। यदि उसका यह प्रेम पति के लिए होता तो पति किसी भी अवस्था में होकर उस प्रेम का अभिनन्दन [स्वागत] करता। उधर पति का भी यही हाल होता है—वह भी जब अपनी पत्नी से प्रेमालाप करता है तब अपने ही मतलब से करता है। उसका प्रेम भी पत्नी के निमित्त नहीं होता। जब तो दोनों ओर से एक साथ ही प्रेम उमड़ पड़ा हो, तब भी यही उपर्युक्त विश्लेषण काम दे सकता है। दोनों ही प्रेमी अपनी इच्छा को लेकर प्रवृत्त हुआ करते हैं। देखा जाता है कि—दाढ़ी मूँछ की कीलें चुभ रही हैं, बालक रो रहा है, तौ भी प्रेमी पिता बालक को चूमता ही जाता है। उसके चिल्लाने पर भी उसे छोड़ना

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नहीं चाहता। क्या कोई भी इस प्रेम को बालक के लिए किया हुआ प्रेम कह सकेगा ? पिता का यह प्रेम स्पष्ट ही एकपक्षीय प्रेम है। यह तो अपनी तुष्टि के लिए ही किया गया है। जिस जड रत्न को कुछ भी इच्छा नहीं है, उसकी जब यत्न से रक्षा की जाती है तब इस प्रेम को भी तो स्वार्थ ही समझ लो। क्या कोई इस प्रेम को रत्नार्थ प्रेम कह सकता है ? बैल नहीं चाहता कि मैं बोझ ढोऊँ। हमने उसे ज़बरदस्ती इस काम के लिए क़ैद कर रक्खा है। उस बैल पर हम प्रेम करते हैं। क्या इस प्रेम को कोई बैल के लिए किया हुआ प्रेम कह सकेगा। यह प्रेम तो स्पष्ट ही हमारे लिए है। ब्राह्मणत्वमूलक पूजा से जब हमें प्रसन्नता होती है तब यह सन्तुष्टि ब्राह्मण जाति की नहीं स्वयं अपनी ही होती है। जब हम स्वर्ग या ब्रह्मलोक को पाना चाहते हैं तब हमारा उद्देश्य इन लोकों का उपकार करना नहीं होता। किन्तु अपना भोग ही उसका लक्ष्य होता है। हम विष्णु आदि देवताओं की पूजा अपने पापनाश के लिए करते हैं। निष्पाप देवताओं को तो उसकी कुछ दर्कार ही नहीं होती। यह तो स्वार्थ के लिए ही की जाती है। 'हम व्रात्य् न हो जायँ' इसी उद्देश्य से तो हम वेदों को पढ़ते हैं, वेद तो व्रात्य हो ही नहीं सकते । स्थान, तृषा, पाक, शोषण और अवकाश की आवश्यकता होती है इसी से तो हम पांचों भूतों को चाहते हैं। यहाँ भी हमारा स्वार्थ (मतलब) ही मुख्य होता है। कहाँ तक कहते जायें, सभी कुछ अपने मतलब से प्रिय होता है। जब सब कामों में अपनी ही प्रधानता है तब यह हमारा स्पष्ट कर्त्तव्य हो जाता है कि हम अपने आपे के बारे में ही बुद्धि को दृढ़ कर डालें। अब प्रश्न होता है कि—यह उपर्युक्त आत्मप्रेम कैसा है ?

ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०५ यह राग तो है नहीं, वह तो स्त्री आदि नियत विषयों में ही होता है । वह श्रद्धा भी नहीं है, वह तो यागादि में ही परिमित रहती है । वह भक्ति भी नहीं है, भक्ति तो गुरु देवादि तक ही चलती है । वह इच्छा भी नहीं है, इच्छा तो अप्राप्त पदार्थ की ही होती है ? इसका समाधान यह है कि—वह आत्मप्रेम तो एक प्रकार की केवल सुख ही को विषय करने वाली सात्विक वृत्ति ही है । उस प्रेम को तो सत्वगुण से बनी हुई केवल सुख के साथ नथी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो । इस प्रीति को इच्छा नहीं कह सकते, क्योंकि प्राप्त, नष्ट और अप्राप्त तीनों ही विषय में यह रहती है । इच्छा तो केवल अप्राप्त की ही रहती है । अन्नपान आदि हमारे सुख के साधन हैं, इसलिए जैसे वे प्रिय हैं, आत्मा को भी यदि इस प्रकार से सुख का साधन होने से ही प्रिय मानोगे, तो यह बताना पड़ेगा, कि यह आत्मा किस के सुख का साधन है ? इस आत्मा से किसको खुश करना है ? आत्मा स्वयं ही आत्मा को प्रसन्न करे, इसमें अपने कन्धे पर चढ़ बैठने वाला 'कर्मकर्तृविरोध' आता है । विषयजन्य जितने भी सुख हैं उनमें तो साधारण सी प्रीति प्राणी को होती है, परन्तु आत्मा तो अतिप्रिय होता है । यह प्रीति विषयसुख में कभी कभी नहीं भी रहती—कभी कभी विषयसुख को छोड़ कर चली भी जाती है—परन्तु आत्मा में प्रीति न रहे यह तो कभी हो ही नहीं सकता । प्राणी का स्वभाव है कि वह एक विषयसुख से प्रेम करना छोड़ देता है दूसरे विषयसुख से नेह का नाता जोड़ लेता है । परन्तु यह आत्मतत्त्व तो छोड़ा या पकड़ा जाने वाला ही नहीं है । फिर उसमें प्रेम का व्यभिचार कैसे हो ? लेना या छोड़ना जिसमें नहीं है, उसकी कोई उपेक्षा ही कैसे कर सकेगा ?

१०६ पंचदशी वह तो उपेक्षा करने वाले का स्वरूप ही है। इस कारण आत्मा उपेक्ष्य कभी नहीं हो सकता। रोग या क्रोध से दुःखी होकर जो प्राणी मरना चाहते हैं, वे भी इस देह को ही छोड़ना चाहा करते हैं, आत्मा को छोड़ देना तो उनके बस की बात नहीं होती। हम सब किसी से प्रेम तभी तो करते हैं जब उसे निश्चित रूप से आत्मार्थ समझ लेते हैं। परन्तु आत्मप्रेम करते समय ऐसा कोई विचार होना संभव ही नहीं है। यहाँ तो यह प्रश्न ही नहीं उठता। वह तो एक स्वाभाविक प्रेम ही है, यह बात यहाँ तक सिद्ध हो चुकी। लोक में भी देखते हैं कि पिता को पुत्र के मित्र से पुत्र ही अधिक प्यारा लगता है। इस प्रकार जो सब पदार्थ केवल अपने सम्बन्धी हो जाने के कारण ही प्रेम के पात्र बन गये हैं, उन सब की अपेक्षा से यह आत्मा ही अत्यन्त प्रिय होता है। आइये इस विषय में अपने अनुभव की भी साक्षी ले लें कि वह क्या कहता है—प्रत्येक प्राणी अपने को सदा यही अशीष देता है कि 'भगवान् करे मैं सदा ही बना रहूँ।' इस अनुभव से भी आत्मा में निरतिशय प्रेम सिद्ध होता है। यों आत्मप्रेम के सर्वाधिक प्रेम सिद्ध हो जाने पर भी, बहुत से अभागे लोग आत्मा को ही पुत्रादि का शेष [ अंग ] मान बैठे हैं। इस विषय में वे बहुत से प्रमाणाभास देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि तभी तो प्रत्येक मनुष्य ऐसा प्रबन्ध किया करता है कि जिससे उसके मर जाने पर भी उसके पुत्रादि सुभीते से जीवन निर्वाह कर सकें। परन्तु इतने मात्र से यह आत्मा किसी का अंग सिद्ध नहीं हो सकता। ऐसे लोगों को यह मालूम हो जाना चाहिए कि—आत्मा तीन तरह का होता है—एक गौण आत्मा, दूसरा मिथ्या आत्मा, तीसरा मुख्य आत्मा। पुत्रादि तो

ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०७ ऐसे ही आत्मा हैं, जैसे देवदत्त को कोई शेर कह दे और वह शेर कहाने लग पड़ा हो। क्योंकि उनका भेद तो प्रत्यक्ष ही भास रहा है। इस कारण पुत्रादि को 'गौण आत्मा' मानना चाहिए। साक्षी और पांच कोश अलग अलग हैं ही, परन्तु यह भेद हर किसी को मालूम नहीं है। जैसे ठूंठ का ही मिथ्या चोर हो जाता है ऐसे ही ये कोश 'मिथ्या आत्मा' बन गये हैं। अब तीसरे आत्मा को भी सुन लीजिए- साक्षी का भेद है भी नहीं और भासता भी नहीं। क्योंकि वह साक्षी सर्वान्तर है। वही साक्षी 'मुख्य आत्मा' कहाता है। यहाँ तक आपको यह तो स्पष्ट मालूम हो ही गया कि- तीन तरह का आत्मा होता है। अब इतना और जान लीजिए कि जिस व्यवहार में इन तीनों में से जिसका आत्मा होना ठीक जंच पड़े, उस प्रसंग के लिए उसी को मुख्य आत्मा मान लो। शेष को उसका अंग मान लो। जो मरने लगा है, उसे घर की रक्षा के लिए तो गौण आत्मा [पुत्रादि] ही चाहिए। क्योंकि मिथ्या आत्मा [शरीर] तो मरने ही लगा है तथा मुख्य आत्मा [साक्षी] इन बखेड़ों में पड़ता ही नहीं है। इस कारण मरते समय पुत्रादि ही मुख्य आत्मा माने जाते हैं। जब कोई कमजोर होकर पुष्टिकर अन्न खाना चाहता है, तब उसे देहात्मा को ही खिलाना होगा ! वह पुष्टि- कारक अन्न पुत्र को खिला बैठेगा तो पुष्टि कैसे होगी ? तथा मुख्यात्मा कुछ खायेगा ही नहीं। ऐसे स्थलों में 'मिथ्या आत्मा'- यह देह- ही मुख्य आत्मा हो सकता है। जब कोई शरीर को सुखाने वाला घोर तप करता है तब वह लोकान्तर में जाने वाले विज्ञानमय को आत्मा मान रहा है। जब तो कोई मुक्ति चाहता है तब चैतन्य ही आत्मा होना चाहिए। कहने का तात्पर्य यही

१०८ पंचदशी है कि—जिस जिस व्यवहार में जो जो आत्मा उचित होता है उस उस व्यवहार में उसी उस आत्मा में सर्वाधिक प्रेम हो जाता है। जो पदार्थ तो आत्मा भी नहीं होता और आत्मा का अंग भी नहीं होता, उसमें किसी भी तरह का प्रेम नहीं होता। ऐसी चीजें दो तरह की पायी जाती हैं—एक 'उपेक्ष्य' जैसे मार्ग में पड़े हुए तिनके आदि। दूसरे 'द्वेष्य' जैसे व्याघ्र या सर्प आदि। ये सब मिल कर संसार के पदार्थों की चार मुख्य श्रेणियां हो गयीं। (एक) आत्मा (दूसरी) उसका शेष [अंग-सहायक] तीसरी) उपेक्ष्य और (चौथी) द्वेष्य। इन चारों में यह नियम नहीं किया जा सकता कि अमुक पदार्थ 'उपेक्ष्य' ही रहेगा या यह 'द्वेष्य' ही रहेगा। प्रसंगा- नुसार इनमें परिवर्तन भी हो जाता है—'उपेक्ष्य' पदार्थ 'द्वेष्य' या शेष हो जाते हैं—'द्वेष्य' पदार्थ 'उपेक्ष्य' या 'शेष' हो जाते हैं। लोक में भी देख लो कि वही डरावना व्याघ्र जंगल में सामने से आता मिले तो 'द्वेष्य', परे को जाता दीखे तो 'उपेक्ष्य', सिखा पढ़ा लें तो अनुकूल होकर विनोद की चीज बन कर 'शेष' हो जाता है। इन सब की व्यवस्था कि 'कौन सा द्वेष्य है तथा कौन सा उपेक्ष्य है' केवल लक्षण मिला कर ही करनी पड़ती है। जिसमें जब जो लक्षण मिले उसे तब वही मान लो। जो जब अनुकूल हो उसे तब 'शेष' समझो। जो जब प्रतिकूल हो पड़े उसे तब 'प्रतिकूल' मानो। जो जब अनुकूल या प्रतिकूल कुछ भी न हो उसे तब 'उपेक्ष्य' कह लो। अब संक्षेप यों समझो कि आत्मा 'प्रेयान्' [अत्यधिक प्रिय] है, उपकारक पदार्थ 'प्रिय' होते हैं, शेष रहे पदार्थ या तो 'द्वेष्य' होते हैं या फिर 'उपेक्ष्य' हो जाते हैं। इन चार विभागों के कारण ही लोक की व्यवस्था चल रही है। यह तो लौकिक दृष्टि से विचार करने का परिणाम हुआ। अब

चीर कर अन्दर की रसमयी वस्तु से विवेक की आंखें भिड़ा देने को

ब्रह्मानन्दान्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १०९


ज़रा श्रौती विचार दृष्टि से देखें तो प्रतीत होता है कि सच्चा आत्मा तो यह साक्षी ही है। उससे भिन्न और कुछ भी आत्मा नहीं है। पांचों कोशों को नारियल के छिलके की तरह ज्ञान के चाकू से चीर कर अन्दर की रसमयी वस्तु से विवेक की आंखें भिड़ा देने को ही तो हम श्रौती विचार दृष्टि कह रहे हैं। 'जागरण' 'स्वप्न' और 'सुषुप्ति' ये तीनों अवस्थायें आती हैं और चली जाती हैं, यह बात हमको जिस तत्व के सहारे से पता चलती है, वही स्वयं प्रकाश चेतन पदार्थ आत्मा है। शेष तो प्राण से लेकर धनपर्यन्त पदार्थ न्यूनाधिक भाव से उसके आस पास लगे रहते हैं। उसी न्यूनाधिक भाव के लिहाज़ से उनमें न्यूनाधिक प्रेम हो जाता है। देखते हैं कि—धन से तो पुत्र, पुत्र से शरीर, शरीर से इन्द्रिय, इन्द्रिय से प्राण, और प्राण से आत्मा अधिक प्रिय होता है। तत्वज्ञानी को तो इस स्थिति का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। परन्तु मूर्ख लोग समझते हैं कि प्रियतम तो पुत्रादि ही हैं, हम तो केवल उन को भोगने के लिये ही बने हैं। इस आत्मा को छोड़कर किसी अन्य पदार्थ को जो प्रिय कहने लगा है, उसे समझाना चाहिये कि—तू जिस चीज़ को प्रिय समझेगा वही तो तुझे संसार में बांध रखने का खूंटा बन जायगी। तू पुत्र को प्रिय समझता है तो देख उसके साथ तुझे कितने अनिष्ट प्रसंग देखने पड़ेंगे—जब वह उत्पन्न न होगा तब तुझे दुःख होगा। जब गर्भपात होगा तब भी तुझे बड़ा कष्ट पहुँचायेगा, जब प्रसव होगा तो अनन्त प्रसववेदना होगी, फिर रोगी होगा, मूर्ख रह जायगा, विवाह न हो सकेगा, परस्त्रीगमन करने लगेगा, निःसन्तान होगा, सन्तान वाला होकर भी दरिद्र होगा, धनी होकर भी मर जायगा, यों तुम्हारे क्लेशों का अन्त कभी भी नहीं हो सकेगा। इस कारण अपने से भिन्न किसी

११० पंचदशी को प्रिय मानना ही छोड़ दो और यह निश्चय कर लो कि परम प्रीति तो अपने आत्मा में ही होती है। ऐसा निश्चय करके दिन रात इसी आत्मप्रेम की ओर को देखते रहो। जो तो किसी प्रकार के आग्रह में आकर इस पक्ष को न छोड़ेगा, उसे अनेक योनियों में घूम घूम कर इस का प्रायश्चित करना पड़ेगा। जो तो आत्मा को ही निरतिशय प्रेम का पात्र समझ कर सदा आत्मा की ही सेवा में लगा रहता है, उसके प्रिय आत्मा के नष्ट होने का प्रसंग कभी भी नहीं आता। यहां तक सिद्ध हो चुका कि परम-प्रेम का स्थान होने से यह आत्मा परमानन्दरूप है। देखा जाता है कि— ज्यों ज्यों प्रीति बढ़ती जाती है त्यों त्यों सुख भी बढ़ता जाता है। राजा को अपने उपकरणों में अधिक प्रेम होता है तो उसे सुख भी अधिक ही मिलता है। अब एक विचार उठता है कि—यदि चैतन्य की तरह सुख भी इस आत्मा का स्वभाव होता तो वह भी सब बुद्धिवृत्तियों में आना ही चाहिए था। इसका समाधान यह है कि सब स्वभावों का आना आवश्यक नहीं होता। देखते हैं कि दीपक उष्ण और प्रकाश दो रूप का होता है, उसकी प्रभा जब किसी मकान में फैलती है तब उसकी उष्णता नहीं फैलती। इसी प्रकार चैतन्य की ही अनुवृत्ति होती है सुख की नहीं होती। एक विचार यह भी है कि—जैसे एक पदार्थ में गन्ध, रूप,रस और स्पर्श सभी होते हैं, परन्तु एक एक इन्द्रिय इन में से एक एक को ही ग्रहण कर सकती है, सब को नहीं, इसी प्रकार चैतन्य और आनन्द दोनों की ही अनुवृत्ति होती तो है, परन्तु अशुद्ध मन से केवल चैतन्य का ही भास होता है, आनन्द का नहीं होता। सात्विकवृत्ति बड़ी निर्मल होती है, इस कारण उसमें चैतन्य और सुख दोनों ही

ब्रह्मानन्दन्तर्गत आत्मानन्द का संक्षेप १११ प्रतीत हो जाते हैं परन्तु तब ये दोनों एक ही पदार्थ दीखते हैं । रजोवृत्तियों के मलिन होने के कारण, इनमें सुख भाग के दर्शन नहीं हो पाते । लोक में देखते हैं कि इमली का फल बहुत खट्टा होता है, परन्तु नमक मिलाने पर उसकी खटाई छिप जाती है इसी तरह रजोवृत्तियों के मिश्रण से आनन्द छिप जाता है । अब एक बड़ा गम्भीर प्रश्न यह होता है कि यों प्रियतम होने के कारण आत्मा की परमानन्दरूपता जान भी ली जाय तो भी ऐसे थोथे 'विवेक' से क्या होगा ? मुक्ति का साधन-योग जब तक न किया जायगा, तब तक अपरोक्ष ज्ञान कैसे हो सकेगा ? इस का उत्तर यही है कि—जो फल 'योग' से मिलना है वही फल इस 'विवेक' से भी मिल जायगा । गीता में तो स्पष्ट ही कहा है कि—'सांख्यमार्गी' को जो स्थान मिलता है 'योगी' भी उसे ही पाते हैं । जानने योग्य बात इस प्रसंग में इतनी ही है कि किसी के लिए योग मार्ग से चलना असाध्य होता है और किसी को ज्ञान का निश्चय होना असम्भव हो जाता है । मनुष्य स्वभाव की इन कमजोरियों को जानने वाले परमेश्वर ने इसीलिए 'योग' और 'सांख्य' [ विवेक ] नाम के दो मार्ग कह दिये हैं । 'योगी' और 'विवेकी' दोनों को ही एक समान ज्ञान हो जाता है । दोनों एक समान ही रागद्वेष से हीन होते हैं । देह के प्रतिकूल पदार्थों से द्वेष भी दोनों को समान ही होता है । व्यवहार काल में द्वैत का भान जैसे 'योगी' को होता है, वैसे ही 'विवेकी' को भी हुआ करता है । समाधि करते समय 'योगी' को द्वैत का भान जैसे नहीं होता वैसे ही जब 'विवेकी' अद्वैततत्व का विवेक करने बैठता है तब उसे भी द्वैत का भान नहीं होता । जो सदा आत्मा- नन्द को देखने लगा है, जिसे द्वैत का दीखना ही बन्द हो चुका