पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१९
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१९
ही फांसा खुल सकता है । क्लेशों के नष्ट हो जाने पर फिर
जन्म लेना नहीं पड़ता ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वे.
३-८) इस श्रुति में कहा है कि उस पूर्वोक्त परमात्मा को
जानने वाला ही इस मृत्यु रूपी संसार को अतिक्रमण कर जाता
है । अर्थात् आत्मज्ञान के सिवाय मुक्ति का दूसरा कोई
भी साधन नहीं है । ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्म-
मृत्युप्रहाणिः (श्वे. १-११) इस श्रुति में कहा गया है कि—
देव अर्थात् स्वप्रकाश ब्रह्मात्मा को जो कोई जान लेता है किंवा
अपरोक्षरूप से अनुभव कर लेता है फिर उसके काम क्रोध
आदि सभी पाशों की हानि हो जाती है । जब उसके रागादि
क्लेश क्षीण हो जाते हैं तब फिर उसके जन्म और मृत्यु भी नहीं
होते । क्योंकि नष्ट हुए रागादि अगला जन्म दिलाने वाले कर्मों
को उत्पन्न ही नहीं कर सकते। यों परलोक के न रहने पर इस
आत्मज्ञान से जैसे इस लोक के अनिष्ट नष्ट होते हैं, इसी
तरह परलोक के अनिष्ट भी मर जाते हैं ।
देवं मत्वा हर्षशोकौ जहात्यत्रैव धैर्यवान् ।
नैनं कृताकृते पुण्यपापे तापयतः क्वचित् ॥६॥
धीर पुरुष देव को जानकर इसी जन्म में और इसी लोक
में हर्ष शोक करना छोड़ देता है । किये और बेकिये पुण्य
पाप फिर इसे कभी भी दुःखी नहीं करते ।
‘अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति’ (कठ.
१-२-१२) इस श्रुति में कहा गया है कि—धैर्य अर्थात् ब्रह्म-
चर्य आदि साधनों से सम्पन्न पुरुष, चिदानन्दरूपी देव को जान
४२० पञ्चदशी
कर, इसी जन्म में हर्ष और शोक करना छोड़ देता है। नैनं
कृताकृते तपतः इस वाक्य में कहा गया है कि—किया
और बेकिया हुआ पुण्य तथा पाप इस ज्ञानी को तप्त
नहीं करता। एक प्रकार का चित्तविकार ही 'ताप' कहाता है।
जब पुण्य किया जाता है तब हर्ष रूपी विकार उत्पन्न होता है।
जब नहीं किया जाता तब विषाद् रूपी विकार होता है। इसके
विपरीत जब पाप का आचरण न हो तब हर्ष होता है जब हो
जाय तब विषाद होता है। तत्वज्ञानी में तो ये दोनों ही, दोनों
तरह के विकारों को उत्पन्न नहीं कर सकते। क्योंकि उस तत्व-
ज्ञानी को तो अविक्रिय ब्रह्मरूपता का परिज्ञान हो चुकता है।
भाव यह है कि—नव ज्ञानियों में इष्टानिष्ट की प्राप्ति या परि-
हार के लिये प्रवृत्ति दीखती भी हो परन्तु दृढ़ अपरोक्ष ज्ञान
जिन्हें हो जाता है उन्हें फिर हर्ष शोक नहीं होते। वे फिर इष्टा-
निष्ट की प्राप्ति या परिहार का उद्योग छोड़ बैठते हैं।
इत्यादि श्रुतयो बह्व्यः पुराणैः स्मृतिभिः सह ।
ब्रह्मज्ञानेऽनर्थहानि मानन्दं चाप्यघोषयन् ॥१०॥
ये ही नहीं, ऐसी बहुत सी श्रुतियें, स्मृतियें तथा पुराण,
इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि ब्रह्मज्ञान से अनर्थ की हानि
और आनन्द की प्राप्ति होती है ।
आनन्दस्त्रिविधो ब्रह्मानन्दो विद्यासुखं तथा ।
विषयानन्द इत्यादौ ब्रह्मानन्दो विविच्यते ॥११॥
'ब्रह्मानन्द' 'विद्यानन्द' और 'विषयानन्द' यों तीन प्रकार
का आनन्द जानना चाहिये। [इनमें से पिछले दोनों आनन्द
ब्रह्मानन्दमूलक होते हैं इस लिये ] पहले
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२१
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२१
नन्द, अद्वैतानन्द नाम के तीनों अध्यायों में ] ब्रह्मानन्द का ही
विभाग करके दिखायेंगे ।
भृगुः पुत्रः पितुः श्रुत्वा वरुणाद् ब्रह्मलक्षणम् ।
अन्नप्राणमनोबुद्धींस्त्यक्त्वाऽऽनन्दं विजज्ञिवान् ॥१२॥
भृगु नाम के पुत्र ने अपने वरुण नाम के पिता से ब्रह्म के
लक्षण [ "जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके
सहारे से जीते रहते हैं मरते समय जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं,
उसको जानो वही ब्रह्म है" ] को सुना और जब उसने अन्न
प्राण मन और बुद्धि नामक कोशों में इस लक्षण को नहीं पाया
तब उसे उनके अब्रह्म होने का निश्चय हो गया । फिर इन सब
को छोड़ कर अन्त में उसने [ आनन्द में ब्रह्म का लक्षण मिलने
से ] आनन्द को ही ब्रह्म जान लिया ।
आनन्दादेव भूतानि जायन्ते तेन जीवनम् ।
तेषां लयश्च तत्रातो ब्रह्मानन्दो न संशयः ॥१३॥
[ आनन्द में ब्रह्म का लक्षण कैसे घट जाता है सो भी देख
लो ] ग्राम्यधर्म [ मैथुन ] से जब माता पिता को आनन्द
आता है तब उसी से ये प्राणी उत्पन्न होते हैं । [ विषयभोगादि
मूलक ] आनन्द के सहारे से ही ये प्राणी जीवन धारण कर
रहे हैं । उन प्राणियों का लय भी उसी आनन्द में हो जाता है
[ सुषुप्ति के समय प्रतीत होने वाला जो स्वरूपभूत आनन्द है
उसी में ये प्राणी लीन हो जाते हैं । क्योंकि सुषुप्ति में आनन्द
की अधिकता के सिवाय और किसी का भी अनुभव नहीं
होता ] इस कारण कहते हैं कि आनन्द नाम की जो वस्तु है
४२२ पञ्चदशी
वही तो ब्रह्म है [ सब के अनुभव से सिद्ध होने के कारण ]
इसमें सन्देह न करना चाहिये ।
भूतोत्पत्तेः पुरा भूमा त्रिपुटी द्वैतवर्जनात् ।
ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपा त्रिपुटी प्रलये हि नो ॥१४॥
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा (छा०
७-२४-१) इस छान्दोग्य श्रुति में कहा गया है कि भूत [आकाश
आदि और उनके कार्य जरायुज अण्डज आदि ] की उत्पत्ति
जब तक नहीं हुई थी उससे पहिले त्रिपुटी रूपी द्वैत [ ज्ञाता
ज्ञान ज्ञेय-रूपी तीन आकारों का नाम ही द्वैत है उस ] के न
रहने से, बस एक भूमा नाम का परमात्मा ही परमात्मा था
[उस समय उसमें देश काल और वस्तुकृत परिच्छेद नहीं था ।
क्योंकि वेदान्तों का यह सिद्धान्त है कि ] प्रलयकाल में ज्ञाता
ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटी रहती ही नहीं ।
विज्ञानमय उत्पन्नो ज्ञाता, ज्ञानं मनोमयः ।
ज्ञेयाः शब्दादयो, नैतत्त्रयमुत्पत्तितः पुरा ॥१५॥
उस भूमा परमात्मा से उत्पन्न होने वाला, विज्ञानमय नाम
का यह जीव 'ज्ञाता' कहाता है । मन में प्रतिबिम्बित होकर
मनोमय कहाने वाला वही चैतन्य 'ज्ञान' कहा जाता है । शब्द
स्पर्श आदि 'ज्ञेय' प्रसिद्ध ही हैं। ये तीनों उत्पत्ति से पहले नहीं
थे । [उस समय ये कारणरूप ही हो रहे थे । ]
त्रयाभावे तु निर्द्वैतः पूर्ण एवानुभूयते ।
समाधिसुप्तिमूर्च्छासु पूर्णः सृष्टेः पुरा तथा ॥१६॥
प्रकृत तात्पर्य यही है कि—[ज्ञाता आदि] तीनों जब नहीं
रहते तब समाधि सुषुप्ति और मूर्च्छा के समय उस निर्द्वैत पूर्ण
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२३
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२३
भूमा का अनुभव हुआ करता है। [समाधि में उस निद्वैत पूर्ण
आत्मा का अनुभव विद्वान् को होता है। सुषुप्ति और मूर्छा में
उस निद्वैत पूर्ण भूमा का अनुभव सर्वसाधारण को भी हुआ
करता है।] सुषुप्ति आदि के समय परिच्छेदक न रहने पर जैसे
आत्मा में पूर्णता आ जाती है, इसी प्रकार सृष्टि बनने के पहले
भी भेदक के न रहने से वह आत्मा पूर्ण ही रहता है।
यो भूमा स सुखं नाल्पे सुखं त्रेधा विभेदिनी ।
सनत्कुमारः प्राहैवं नारदायातिशोकिने ॥१७॥
‘यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति’ (छा. ७-२४-१)
इसमें बताया गया है कि प्रथम कहा हुआ जो ‘भूमा है’ वही
सुख किंवा आनन्द है। भूमा और सुख में कोई भी भेद नहीं
है। जो अल्प है [जो परिच्छिन्न है, जिसके ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय
नाम के तीन तीन टूक हो जाते हैं] उसमें तो सुख है ही नहीं।
अपनी अवस्था पर अत्यधिक शोक करने वाले नारद को सनत्कु-
मार ने यही बात समझायी थी।
सपुराणान् पञ्च वेदाञ्शास्त्राणि विविधानि च ।
ज्ञात्वाप्यनात्मवित्वेन नारदोऽतिशुशोच ह ॥१८॥
चारों वेदों, पुराणों और विविध शास्त्रों को जानकर भी,
आत्मज्ञानरहित होने के कारण, नारद को बड़ा ही शोक हो
गया था।
वेदाभ्यासात् पुरा तापत्रयमात्रेण शोकिता ।
पश्चाच्चभ्यासविस्मारभङ्गगर्वैश्च शोकिता ॥१९॥
[वेदादि को जानने से तो शोक की निवृत्ति हो जानी
चाहिये थी, फिर इन्हें जानकर भी नारद के अतिशोकी होने
४२४ पञ्चदशी
का कारण यह था कि] वेदाभ्यास से पहले पहले तो आध्यात्मिक
आदि तीन ताप ही इसे शोकी रखते थे। अब तो उसे इन वेदों
का अभ्यास करना पड़ता है। इनके भूलने का डर बना रहता
है। पराजय की शंका लगी रहती है। अपने से थोड़े पढ़े को
देखकर गर्व भी हो जाता है। यों वेद पढ़ने के बाद उसके
शोक के कारण बढ़ गये हैं।
सोऽहं विद्वन् प्रशोचामि शोकपारं नयात्र माम् ।
इत्युक्तः सुखमेवास्य पारमित्यभ्यधादृषिः ॥२०॥
[नारद ने स्वयं अपने मुख से यह बात कही है कि] हे
विद्वन् ! वह मैं शोक में फंसा पड़ा हूँ। उस मुझको आप शोक
से पार कर दीजिये। यों जब उसने शोक की निवृत्ति का उपाय
बूझा था तब सनत्कुमार ऋषि ने अपने जाने हुए] सुखरूप ब्रह्म
को ही शोकनिवृत्ति का उपाय बता दिया था। [उसने कहा था
कि सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यम् (छा. ७-२२-१) यदि शोक का
पार पाना है तो सुख को ही जान लो कि सुख क्या तत्व है ?
सुख को जान लेने पर शोक करने का प्रसंग नहीं आयेगा ।
सुख तत्व को न समझने के कारण ही संसारी प्राणी उसे
विषयों में तलाश करते हैं। यदि वे सुख तत्व को समझ जांय
तो उनकी सुख की बाह्य मांग बन्द हो जाय और वे शोक-
सागर को एक क्षण में पार कर सकें। यही उस ऋषि का
अभिप्राय था]
सुखं वैषयिकं शोकसहस्रेणावृतत्वतः ।
दुःखमेवेति मत्वाऽह नाल्पेऽस्ति सुखमित्यसौ ॥२१॥
सनत्कुमार मुनि ने जब यह कहा था कि 'अल्प में सुख
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नहीं है' तब उन्होंने यह समझ कर ही कहा था कि—वैषयिक
[विषयों की मार्फत मिले हुए] सुख हज़ारों शोकों से आच्छा-
दित रहते हैं, इस कारण वे तो एक प्रकार के दुःख ही हैं।
वैषयिक सुखरूपी मांस के टुकड़े पर हज़ारों शोकरूपी
गीधों और बाघों के दांत लगे रहते हैं—वे उस पर सदा मंड-
राते रहते हैं और उसे नोच नोच कर खाते रहते हैं। इस
कारण वैषयिक सुख को सुख कहना ही भूल है। वह तो एक
प्रकार दुःख ही है। वह तो ऐसा है जैसे किसी को खाज में
ही आनन्द आता हो। उसको तो सुख के वेश में आने वाला
दुःख ही मानना चाहिये।
ननु द्वैते सुखं मा भूदद्वैतेऽप्यस्ति नो सुखम् ।
अस्ति चेदुपलभ्येत तथा च त्रिपुटी भवेत् ॥२२॥
अच्छा यह तो मान लिया कि द्वैत में सुख नहीं है। परन्तु
हमें तो दीखता है कि अद्वैत में भी सुख नहीं है। यदि अद्वैत
में सुख होता तो वह [विषयसुखादि की तरह] उपलब्ध होना
चाहिये था [उपलब्ध न होने से मानते हैं कि अद्वैत में भी सुख
नहीं है] यदि कोई कहने लगे कि अद्वैत में तो सुख की उप-
लब्धि होती है तो उससे कहो कि फिर तो त्रिपुटी बन जायगी
[और अद्वैत नहीं रह सकेगा। तब तो अनुभवित्ता अनुभव
और अनुभाव्य ये तीन आकार मानने ही पड़ेंगे और अद्वैत
का नाश हो जायगा।]
मास्त्वद्वैते सुखं किन्तु सुखमद्वैतमेव हि ।
किं मानमिति चेन्नास्ति मानाकांक्षा स्वयंप्रभे ॥२३॥
४२६ पञ्चदशी
[सिद्धान्ती उत्तर देता है कि] अद्वैत में सुख न सही,
परन्तु अद्वैत ही सुख है इस बात का प्रमाण बूझना चाहो तो
यह तुम्हारा प्रमाण का प्रश्न ही नहीं बनता । क्योंकि स्वयंप्रकाश
वस्तु में तो प्रमाण की आवश्यकता होती ही नहीं ।
स्वप्रभत्वे भवद्वाक्यं मानं यस्माद् भवानिदम् ।
अद्वैतमभ्युपेत्यास्मिन् सुखं नास्तीति भाषते ॥२४॥
अद्वैत की स्वप्रकाशता में भी प्रमाण बूझना चाहो तो हम
कहेंगे कि उसमें तो तुम्हारा वाक्य ही प्रमाण है । क्योंकि तुम
प्रमाणों के बिना ही अद्वैत को मानकर, केवल सुख पर आक्षेप
करते हो कि अद्वैत में सुख नहीं है । [इस कारण कहते हैं कि
अद्वैत तत्त्व—जिसको तुम 'मैं' कहते हो—स्वयंप्रकाश ही है ।]
नाभ्युपैम्यहमद्वैतं त्वद्वचोनूद्य दूषणम् ।
वच्मीति चेत्तदा ब्रूहि किमासीद् द्वैततः पुरा ॥२५॥
[पूर्वपक्षी कहता है] मैं अद्वैत को मानने वाला नहीं हूँ ।
किन्तु मैं तो तुम्हारे कथन का अनुवाद करके उस पर दूषण
दे रहा हूँ । ऐसी अवस्था में मेरे शब्दों से अद्वैत की सिद्धि
करना अनुचित है। इस पर सिद्धान्ती कहता है कि अच्छा
तो यह बताओ कि द्वैत से पहले क्या था ?
किमद्वैत मुत द्वैत मन्यो वा कोटिरन्तिमः ।
अप्रसिद्धो, न द्वितीयोऽनुत्पत्तेः, शिष्यतेऽग्रिमः ॥२६॥
बताओ ? द्वैत से पहले अद्वैत था, द्वैत था, या कोई और
कोटि थी ? द्वैत और अद्वैत से भिन्न कोई तीसरी कोटि तो
प्रसिद्ध ही नहीं है । द्वैत से पहले द्वैत ही हो यह तो ठीक नहीं
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२७
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२७
है। क्यों कि तब तक तो द्वैत की उत्पत्ति ही नहीं हुई थी। इस
कारण प्रथम पक्ष ही शेष रह जाता है अर्थात् द्वैत की उत्पत्ति
से प्रथम अद्वैत ही था।
अद्वैतसिद्धिर्युक्त्यैव नानुभूत्येति चेद्वद।
निर्दृष्टान्ता सदृष्टान्ता वा कोट्यन्तर मत्र नो ॥२७॥
यदि कहो कि अद्वैत की सिद्धि युक्ति से तो हो जाती है,
परन्तु अनुभव से तो अद्वैत का अनुमोदन नहीं होता। तो
बताओ कि जो युक्ति अद्वैत को सिद्ध करती है वह किसी
दृष्टान्त को न देकर सिद्ध करती है, या दृष्टान्त को देकर सिद्ध
करती है ? इन दोनों अवस्थाओं के अतिरिक्त तीसरी बात तो
हो ही नहीं सकती।
नानुभूति र्न दृष्टान्त इति युक्तिस्तु शोभते।
सदृष्टान्तत्वपक्षे तु दृष्टान्तं वद मे मतम् ॥२८॥
[जो (इसी प्रकरण के २७श्लोक में) कहता है कि अद्वैत की
सिद्धि युक्ति से ही होती है, अनुभव से अद्वैत की सिद्धि नहीं
होती वह अनुभूति का तो निषेध ही कर रहा है, और दृष्टान्त
के बिना युक्ति कुछ सिद्ध नहीं कर सकती। फिर यह कहना कि]
बिना ही दृष्टान्त के अद्वैत सिद्धि हो जाती है आपके ही मुंह
को शोभा देने वाली बात है [विवेचक लोग तो ऐसी बात को
मान ही नहीं सकते कि बिना दृष्टान्त के भी कोई बात युक्ति से
सिद्ध हो जाती हो] अब केवल सदृष्टान्तत्व पक्ष शेष रह जाता
है [कि दृष्टान्त देकर ही युक्ति किसी अर्थ को सिद्ध किया करती
है] उसमें आपको ऐसा दृष्टान्त देना चाहिये जो हम दोनों
वादियों को सम्मत हो।
४२८ पञ्चदशी
अद्वैतः प्रलयो द्वैतानुपलम्भेन सुप्तिवत् ।
इति चेत् सुप्तिरद्वैतेत्यत्र दृष्टान्तमीरय ॥२९॥
[पूर्ववादी कहता है कि अच्छा लो दृष्टान्त भी सुन लो]
प्रलय तो एक प्रकार का अद्वैत [अर्थात् द्वैत रहित अवस्था]
है। क्योंकि उस समय द्वैत की उपलब्धि नहीं होती। जिस
जिस में द्वैत की उपलब्धि नहीं होती वह वह सभी अद्वैत होता
है जैसे कि सुप्ति। इस पर हमारा कहना है कि सुप्ति अद्वैत
होती है इस बात को सिद्ध करने के लिये भी तुम्हें अन्य दृष्टान्त
देना पड़ेगा। [यदि तुम अपनी सुप्ति का दृष्टान्त दोगे तो उसे कोई
जानता नहीं। वह तो दूसरे के प्रति असिद्ध है। इस कारण उसकी
सिद्धि के लिये कोई और दृष्टान्त तुम्हें टटोलना ही पड़ेगा।]
दृष्टान्तः परसुप्तिश्चेदहो ते कौशलं महत् ।
यः स्वसुप्तिं न वेत्स्यस्य परसुप्तौ तु का कथा ॥३०॥
यदि तुम दूसरे की सुप्ति का दृष्टान्त दो 'सुप्तिरद्वैता पर-
सुप्तिवत्' तब तो यह तुम्हारी बड़ी [भद्दी] चतुराई है [क्योंकि
अप्रसिद्ध होने के कारण परसुप्ति का तो तुम्हें दृष्टान्त ही नहीं
देना चाहिये] भला जो तुम अपनी सुप्ति को भी नहीं जानते
हो वह तुम दूसरे की सुप्ति की बातें क्यों करते हो [जिसे
अपनी सुप्ति का ज्ञान नहीं है उसे परसुप्ति का ज्ञान भी नहीं
हो सकता।]
निश्चेष्टत्वात् परः सुप्तो यथाहमिति चेत् तदा ।
उदाहर्तुः सुषुप्तेस्ते स्वप्रभत्वं भवेद् बलात् ॥३१॥
यदि अनुमान से परसुप्ति को सिद्ध करना चाहो कि-
परः सुप्तः निश्चेष्टत्वात् अहमिव दूसरा सोया पड़ा है क्योंकि
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२९
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२९
[इसके प्राण चल रहे हैं और] निश्चेष्ट पड़ा है जैसे कि मैं सोया
करता हूँ । इस पर हम कहेंगे कि बस तब तो मेरे प्रति सुषुप्ति
का दृष्टान्त देने वाले तेरी सुषुप्ति ही, तेरे न चाहने पर भी
[तेरी इच्छा के विरुद्ध भी] स्वयं प्रकाश सिद्ध हो जाती है ।
[तभी तो तुम उसका उदाहरण दे रहे हो । नहीं तो बताओ कि
अपनी सुप्ति को तुम कैसे जानते हो ?]
नेन्द्रियाणि न दृष्टान्तस्तथाप्यङ्गीकरोषि ताम् ।
इदमेव स्वप्रभत्वं यद् भानं साधनैर्विना ॥३२॥
[तुम्हारे न चाहने पर भी, सुप्ति स्वयंप्रकाश कैसे सिद्ध हो
जाती है सो भी देख लो]—सुप्ति को ग्रहण करने वाली इन्द्रियें
नहीं होतीं [क्योंकि वे उस समय अपने कारण में विलीन हो
जाती हैं] तुम्हारे पास कोई दृष्टान्त भी नहीं है फिर भी तुम
उस सुप्ति को मान रहे हो। इसे देखकर यही कहना पड़ता है
कि ज्ञान के साधनों के बिना भी प्रकाशित होते रहना यही
[सुषुप्ति की] 'स्वयंप्रकाशता' है।
स्तामद्वैतस्वप्रभत्वे, वद सुप्तौ सुखं कथम् ।
शृणु, दुःखं तदा नास्ति ततस्ते शिष्यते सुखम् ॥३३॥
[प्रश्न यह है कि] सुषुप्ति अद्वैत और स्वयंप्रकाश भले ही हो,
परन्तु सुषुप्ति में सुख है, यह कैसे मान लें ? इस का उत्तर है
कि—उस समय [सुख का विरोध करने वाला] दुःख नहीं
रहता, इस कारण सुख ही शेष रह जाता है। [क्योंकि प्रकाश
और अन्धकार के समान सुख दुःख भी विरोधी वस्तुएँ हैं।
जब दुःख नहीं रहता तब सुख शेष रह ही जाता है। जैसे कि
अन्धकार के न रहने पर प्रकाश शेष रह जाता है।]
४३० पञ्चदशी
अन्धः सन्नप्यनन्धः स्याद्विद्धोऽविद्धोऽथ रोग्यपि।
अरोगीति श्रुतिः प्राह, तच्च सर्वे जना विदुः ॥३४॥
तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो
भवति उपतापी सन्ननुपतापी भवति (छ. ८-४-२) तद्यद्यपीदं भगवः
शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति (छ. ८-१०-३) इस श्रुति में
कहा गया है कि—सुषुप्ति के आ जाने पर अन्धा अन्धा नहीं
रहता, ज़खमी ज़खमी नहीं रहता, रोगी अरोगी हो जाता है।
[अर्थात् देहाभिमान के कारण उत्पन्न हुए दोष सुषुप्ति में भाग
जाते हैं] इस बात को सब लोग ही जानते हैं [कि—रोग से
पीडित भी पुरुष को जब सुषुप्ति आ जाती है तब उसे उस
के दुःख का अनुभव नहीं होता।]
न दुःखाभावमात्रेण सुखं लोष्टशिलादिषु ।
द्वयाभावस्य दृष्टत्वादितिचेद् विषमं वचः ॥३५॥
केवल दुःख के न होने से ही सुख की कल्पना करना ठीक
नहीं है। देखा जाता है कि—ढेले और पत्थर आदि में दोनों
का ही अभाव होता है [उन में जहां दुःख नहीं है, वहां
उनमें सुख भी तो नहीं है] इस का उत्तर यह है कि तुम्हारा
दृष्टान्त दाष्टन्तिक के अनुसार नहीं है]
मुखदैन्यविकासाभ्यां परदुःखसुखोहनम् ।
दैन्याद्यभावतो लोष्टे दुःखाद्यूहो न संभवेत् ॥३६॥
[दाष्टन्तिक के अनुसार न होने की बात भी देख लो
कि] दूसरे के दुःख और दूसरे के सुख की ऊहना
उस के मुख की दीनता और उसके मुख के विकास को देख
कर ही तो की जाती है
होने से यह तो दुःखी है और प्रसन्न मुख वाला होने से यह
सुखी है । प्रकृत तात्पर्य तो यही हुआ कि ] लोष्ठ आदि में
दीनता या विकास आदि लिंग नहीं पाये जाते इस कारण उनमें
दुःख सुख की कल्पना ही नहीं हो सकती [ यही कारण है कि
लोष्ठ आदि में यह भी निश्चय नहीं किया जा सकता कि उनमें
दुःखाभाव है । ]
स्वकीये सुखदुःखे तु नोहनीये ततस्तयोः ।
भावो वेद्योऽनुभूत्यैव, तदभावोऽपि नान्यतः ॥३७॥
[ अनुभवसिद्ध होने के कारण अपने सुख दुःख तो ऊहना
[ कल्पना ] के योग्य ही नहीं होते, किंवा अनुमेय नहीं होते ।
इस कारण उन सुख दुःख़ों का सद्भाव जैसे अनुभूति ( प्रत्यक्ष )
से मालूम हो जाता है, उसी तरह उन सुख दुःख का अभाव
भी अनुमान आदि से ही नहीं जाना जाता । किन्तु उन सुख
दुःख का अभाव भी प्रत्यक्ष से ही जाना जाता है [ अपने और
पराये सुख दुःख में यही बड़ी विषमता है ]
तथा सति स्वसुप्तौ च दुःखाभावोऽनुभूतिभिः ।
विरोधिदुःखराहित्यात् सुखं निर्विघ्नमिष्यताम् ॥३८॥
जब कि अपने सुखादि अनुभवगम्य सिद्ध हो चुके तब
अपनी सुषुप्ति में का दुःखाभाव भी अनुभव से ही सिद्ध हो गया ।
जागरण के समय जैसे सुख का विरोधी दुःख बना रहता है
सुख का विरोधी वैसा दुःख सुषुप्ति में नहीं रहता । इस कारण
सुषुप्ति के समय निर्विघ्न (बाध रहित) सुख मान ही लेना चाहिये ।
महत्तरप्रयासेन मृदुशय्यादिसाधनम् ।
कुतः संपाद्यते सुप्तौ सुखं चेत् तत्र नो भवेत् ॥३६॥
४३२ पंचदशी
उस सुषुप्ति में यदि सुख ही नहीं है तो बड़े भारी प्रयासों
से कोमल शय्या आदि साधनों का उपार्जन क्यों किया जाता है ?
दुःखनाशार्थमेवैतदिति चेद् रोगिणस्तथा।
भवत्वरोगिण स्त्वेतत् सुखायैवेति निश्चिनु ॥४०॥
यदि कहो कि यह सब साधन संग्रह तो दुःखनाश के लिये
किया जाता है तो हम कहेंगे कि [दुःख नाश को इसका फल
कहना ठीक नहीं है। क्योंकि] यह फल तो केवल रोगी को ही
हो सकता है [जो अरोगी है उसके लिये क्या कहोगे ?] जब
कोई रोग ही नहीं है तब तो इन साधनों का सम्पादन सुख के
लिये ही है ऐसा निश्चय कर लो।
तर्हि साधनजन्यत्वात् सुखं वैषयिकं भवेत् ।
भवत्वेवात्र निद्रायाः पूर्वं शय्यासनादिजम् ॥४१॥
अच्छा सौषुप्त सुख को साधनजन्य मानोगे तो तुम्हें उस
को वैषयिक सुख मानना होगा। [फिर तुम उसे आत्मस्वरूप
कैसे कह सकोगे ?] इसका उत्तर यह है कि—निद्रा आने से
पहले पहले जो शय्या और आसनादि से सुख होता है उसे तो
हम भी वैषयिक सुख मानते हैं।
निद्रायां तु सुखं यत्तज्जन्यते केन हेतुना।
सुखाभिमुखधीरादौ पश्चान्मज्जेत् परे सुखे ॥४२॥
परन्तु निद्रा आजाने पर जो सुख होता है वह तो किसी
भी साधन से नहीं होता [क्योंकि उस समय उन शय्या आदि
साधनों का विचार ही किसी को नहीं रहता] निद्रा आने से पहले
पहले तो इस जीव की बुद्धि शय्या आदि से मिलने वाले सुखों
की तर्फ को रहती है। परन्तु निद्रा आजाने पर तो वही बुद्धि
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३३
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३३
[विषय सुख में से निकल कर] परम सुख में डूब जाती है
[उस समय जीव की बुद्धि स्वरूप सुख में विलीन हो जाती
है। यों निद्रा से पहला सुख विषय सुख है। निद्रा आ जाने
पर मिलने वाला सुख स्वरूप सुख है।]
जागद्व्यावृत्तिभिः श्रान्तो विश्रम्याथ विरोधिनि ।
अपनीते स्वस्थचित्तो ऽनुभवेद् विषये सुखम् ॥४३॥
[ऊपर की बात को तीन श्लोकों में विस्तारपूर्वक यों समझो
कि] जागते समय जो अनेक व्यापार यह जीव करता है,
उनसे थक कर जब मृदुशय्या आदि पर विश्राम लेता है, तब
उसके अनन्तर [दुःखदायी व्यापारों से मिलने वाले] विरोधी
दुःखों के हटा दिए जाने पर, जब वह स्वस्थचित्त हो जाता है,
[जब इसका मन व्याकुल नहीं रह जाता] उसी समय शय्या
आदि विषयों से मिलने वाले सुख का साक्षात्कार यह किया
करता है।
आत्माभिमुखधीवृत्तौ स्वानन्दः प्रतिबिम्बति ।
अनुभूयैनमत्रापि त्रिपुट्या श्रान्तिमाप्नुयात् ॥४४॥
[विषयों को उपार्जन करता करता तंग हो कर जब उस
दुःख को हटाने के लिए कोमल शय्या पर लेट जाता है, तब इस
की बुद्धि अन्तर्मुख हो जाती है,] अन्तर्मुख हुई उस बुद्धिवृत्ति
में [सामने रखे हुए दर्पण की तरह] स्वरूपभूत जो आनन्द
है वह प्रतिबिम्बित हो जाता है। [बस इसी को 'विषयानन्द'
कहते हैं] परन्तु इस समय इस विषयानन्द को अनुभव करते
हुए भी त्रिपुटी के रहने के कारण जीव को श्रम होता ही है।
२९
४३४ पञ्चदशी
तच्छ्रमस्यापनुत्त्यर्थं जीवो धावेत् परात्मनि ।
तेनैक्यं प्राप्य तत्रत्यो ब्रह्मानन्दः स्वयं भवेत् ॥४५॥
[उसके बाद यह होता है कि] उस उपर्युक्त श्रम को हटाने
के लिए वह जीव परमात्मा में को दौड़कर चला जाता है।
वहां जाकर उस ब्रह्म के साथ एकता किंवा तादात्म्य को पाकर
वह जीव स्वयं भी सुषुप्ति के समय प्रकट होने वाला ब्रह्मानन्द
हो जाता है। [तभी तो कहा है कि सता सोम्य तदा सपन्नो भवति
(छा० ६-८-१) हे सोम्य उस समय सत् से सम्पन्न हो
जाता है]
दृष्टान्ताः शकुनिः श्येनः कुमारश्च महानृपः ।
महाब्राह्मण इत्येते सुप्त्यानन्दे श्रुतीरिताः ॥४६॥
शकुनि, श्येन, कुमार, महाराजा और महाब्राह्मण ये पांच
दृष्टान्त सुप्त्यानन्द को सिद्ध करने के लिए श्रुति ने दिये हैं।
शकुनिः सूत्रबद्धः सन् दिक्षु व्यापृत्य विश्रमम् ।
अलब्ध्वा बन्धनस्थानं हस्तस्तम्भाद्युपाश्रयेत् ॥४७॥
जीवोपाधिमनस्तद्वद् धर्माधर्मफलाप्तये ।
स्वप्ने जाग्रति च भ्रान्त्वा क्षीणे कर्मणि लीयते ॥४८॥
[स यथा शकुनिः सूत्रेण बद्धो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतन
मलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयते एवमेव खलु सोम्य तन्मनो दिशं दिशं
पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः
(छा० ६-८-२) बालक लोग खेल के लिए सूत्र में बुलबुल
आदि पक्षियों को बाँध कर हाथ आदि पर बैठा लेते हैं उसको
ध्यान में रख कर इस श्रुति में कहा गया है कि]—सूत्र से
बंधा हुआ पक्षी, इधर उधर कुछ उड़ कर वहां ठहरने का
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ५३५
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ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ५३५
आधार न पाकर, फिर अपने बन्धन स्थान हाथ आदि पर ही
लौट आता है ॥४७॥ इसी प्रकार जीव की उपाधि यह मन भी
धर्माधर्म के सुख दुःख रूपी फलों को अनुभव करने के लिए,
स्वप्न और जाग्रत् में, जहां तहां भ्रमण करके, जब भोगदायी
कर्म क्षीण हो जाते हैं तब [अपने उपादान अज्ञान में] विलीन
हो जाता है । [उस समय उस मन से उपहित जो 'जीव' है
वह 'परमात्मा' ही हो जाता है ]
श्येनो वेगेन नीडैकलम्पटः शयितुं व्रजेत् ।
जीवः सुप्त्यै तथा धावेद् ब्रह्मानन्दैकलम्पटः ॥४९॥
तद्यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः संहृत्य
पक्षौ स्वालयायैव म्रियते एवमेवायं पुरुष एतस्मा आनन्दाय धावति यत्र
सुप्तो न कंचन कामं कामयते न कंचन स्वप्नं पश्यति' (बृ० ४-३-२२)
इस श्रुति में कहा गया है कि जैसे आकाश में सब ओर घूमता
हुआ श्येन पक्षी गगन में घूमने की थकावट को हटाने के
उद्देश्य से, सोने के लिए केवल मात्र घोंसले की ओर जल्दी
जल्दी जाता है, ठीक इसी प्रकार यह जीव भी केवल मात्र
ब्रह्मानन्द का लम्पट होकर सुषुप्ति के लिए जल्दी ही हृदयाकाश
में पहुँच जाता है ।
अतिबालः स्तनं पीत्वा मृदुशय्यागतो हसन् ।
रागद्वेषाद्यनुत्पत्ते रानन्दैकस्वभावभाक् ॥५०॥
महाराजः सार्वभौमः संतृप्तः सर्वभोगतः ।
मानुषानन्दसीमानं प्राप्यानन्दैकमूर्तिभाक् ॥५१॥
महाविप्रो ब्रह्मवेदी कृतकृत्यत्वलक्षणाम् ।
विद्यानन्दस्य परमां काष्ठां प्राप्यावतिष्ठते ॥५२॥
५३६ पञ्चदशी
'स यथा कुमारो वा महाराजो वा महाब्राह्मणो वातिघ्नीमानन्दस्य गत्वा
शयीतैवमेवैष एतच्छेते' (बृ. २-१-१९) इस श्रुति में कहा गया
है कि—जैसे स्तनपायी बालक पेट भर कर स्तन पीकर कोमल
शय्या पर पड़ा पड़ा हंसता रहता है और अपना पराया न
पहचानने के कारण रागद्वेष से रहित होकर सुख की मूरत
बना रहता है, या जैसे सार्वभौम महाराज [ अशुद्ध बुद्धि होने
पर भी ] सब मानुषानन्दों से युक्त होने के कारण, जब कि उसे
किसी वस्तु की चाह नहीं रहती तब मानुषानन्द की सीमा पर
पहुंच कर आनन्द की मूर्ति दीखा करता है, या जैसे कोई महा
ब्राह्मण जिसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो चुका हो जब 'मैं कृत कृत्य
हो चुका' ऐसी विद्यानन्द की सीमा को पा जाता है किंवा
जीवन्मुक्ति को पा लेता है, तब परमानन्द स्वरूप ही हो जाता
है । ठीक इसी प्रकार सोया हुआ पुरुप भी आनन्द रूप हो
गया होता है ।
मुग्धबुद्धातिबुद्धानां लोके सिद्धा सुखात्मता ।
उदाहृतानामन्ये तु दुःखिनो न सुखात्मकाः ॥५३॥
मुग्ध, बुद्ध और अतिबुद्ध ये ही तीन लोक में सुखी माने
जाते हैं [ जिनको विवेक नहीं है, उनमें बालक सब से सुखी
माना जाता है । जिन्हें कुछ विवेक है, उनमें सार्वभौम राजा
सर्वाधिक सुखी गिना जाता है । जो अतिविवेकी हैं उनमें
आत्मदर्शी को सर्वाधिक सुखी मानते हैं ] इन तीनों के अति-
रिक्त और तो सब सदा रागद्वेषादिसंकुल रहने के कारण दुःखी
ही बने रहते हैं । वे सुखी कभी नहीं होते [ इसी कारण उन
किसी का दृष्टान्त नहीं दिया है ]
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३७
ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४३७
कुमारादिवदेवायँ ब्रह्मानन्दैकतत्परः ।
स्त्रीपरिष्वक्तवद् वेद न बाह्यं नापि चान्तरम् ॥५४॥
प्रकृत में तो हमें यही कहना है कि स्तनपायी कुमार या
महाराजा आदि जैसे आनन्द में मग्न रहते हैं ऐसे ही यह सुषुप्त
प्राणी केवल ब्रह्मानन्द को भोगा करता है। तद्यथा प्रियया स्त्रिया
संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना
संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम् (बृ. ४-३-२१) इस वाक्य
में कहा गया है कि जैसे कोई कामी स्त्री का आलिंगन कर लेने
पर अन्दर बाहर के विषयज्ञान से शून्य होकर सुख की मूर्ति
हो जाता है इसी प्रकार सुषुप्ति के समय प्राज्ञ परमात्मा के साथ
एकता को प्राप्त हुआ यह जीव भी बाह्य और आन्तर कुछ भी
नहीं जानता और आनन्दरूप हो गया होता है ।
बाह्यं रथ्यादिकं वृत्तं, गृहकृत्यं यथान्तरम् ।
तथा जागरणं बाह्यं, नाडीस्थः स्वप्न आन्तरः ॥५५॥
[ऊपर के वाक्य में जो बाह्य और आन्तर दो शब्द आये
हैं उनके अर्थ यों जानने चाहियें] जैसे लोक में गली कूर्चा
आदि बाह्य तथा घर के काम आन्तर कहाते हैं, इसी प्रकार
जागरण को ‘बाह्य’ कहा जाता है तथा नाड़ी में प्रतीत होने
वाला स्वप्नप्रपंच ‘आन्तर’ कहाता है ।
पितापि सुप्तावपितेत्यादौ जीवत्ववारणात् ।
सुप्तौ ब्रह्मैव नो जीवः संसारित्वासमीक्षणात् ॥५६॥
अत्र पिताऽपिता भवति (बृ. ४-३-२२) इत्यादि श्रुति में
कहा गया है कि—सुप्तिकाल जब आता है तब पिता पिता
नहीं रहता । यों जीवत्व का वारण कर दिया है कि सुप्ति के
५३८ पञ्चदशी
समय ब्रह्म ही रह जाता है जीव नहीं रहता । क्योंकि उस समय
संसारिभाव का कहीं पता ही नहीं चलता [भाव यह है कि-
सुप्ति में जीव के जो आध्यासिक पितृत्व आदि धर्म हैं वे नहीं
रहते । जीवभाव की प्रतीति के बन्द हो जाने पर अर्थात् ही
ब्रह्मभाव शेष रह जाता है । ]
पितृत्वाद्यभिमानो यः सुखदुःखाकरः स हि ।
तस्मिन्नपगते तीर्णः सर्वाञ्छोकान् भवत्ययम् ॥५७॥
तीर्णो हि तदा सर्वाञ्शोकान् हृदयस्य भवति (बृ. ४-३-२२) इस
वाक्य में बताया गया है कि-पितापने आदि का जो
अभिमान है वही तो सुख दुःख का आकर है । जब वह अभि-
मान नहीं रह जाता तब यह जीव सब शोकों के पार पहुँच
जाता है [यह संसार देहाभिमानमूलक है । जब देहाभिमान
नहीं रहता तब संसार भी नहीं रहता । देहाभिमान के भूलते
ही सब प्रकार के शोक समाप्त हो जाते हैं । ]
सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमसावृतः ।
सुखरूपमुपैतीति ब्रूते ह्याथर्वणी श्रुतिः॥५८॥
आथर्वणी श्रुति कहती है कि-यह सकल [जाग्रदादि]
प्रपंच जब [अपनी उपदान, तमःप्रधान प्रकृति में] विलीन हो
जाता है तब उसी तमोमयी प्रकृति से ढका हुआ यह जीव सुख
रूप [ब्रह्म] को प्राप्त हो जाता है ।
सुखमस्वाप्समत्राहं न वै किंचिदवेदिषम् ।
इति सुप्ते सुखाज्ञाने परामृशति चोत्थितः ॥५६॥
[सबका अनुभव भी इसी बात को कह रहा है कि-]
'इस समय मैं सुख पूर्वक सोया । इतने समय मैंने कुछ भी नहीं