पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
११२ पञ्चदशी सुरेश्वराचार्य ने कहा कि—अद्वैतरूप आत्मतत्व को जान चुका हुआ भी यदि अभी तक यथेष्टाचारी ही है, तो फिर वह अशुचिभक्षणादि गर्हित से गर्हित काम भी करेगा ही। फिर बताओ कि विधि निषेध की आज्ञा न मानने वाले ऐसे तत्व ज्ञानियों में और कुत्तों में क्या भेद रह गया ? 'सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति संप्राप्ते हि कलौ युगे। तानुत्तिष्ठन्ति मैत्रेय शिश्नो- दरपरायणाः' कलियुग जब आयगा तब ब्रह्म की चर्चा तो बहुतायत से होगी, परन्तु उपस्थ और पेट के गुलाम बनकर करें धरेंगे कुछ भी नहीं। ऐसी शोचनीय अवस्था जिस की है वह ज्ञानी नहीं है वह तो ज्ञानिविदूषक है। ऐसे ज्ञानी से तो अज्ञानी ही अच्छे हैं। क्योंकि वे अपने दोष को स्वीकार तो करते हैं। औषध खाकर जैसे पथ्य न किया जाय ऐसे ही ब्रह्मज्ञानी हो कर यदि व्यवहार शुद्धि नहीं है, यदि दैवी संपत्ति नहीं आयी है, तो इस सूखे ब्रह्मज्ञान से क्या होना है ? प्रत्युत ऐसा ब्रह्मज्ञान घातक हो सकता है (सरकण्डे के फूल पर जैसे फल नहीं लगता इसी प्रकार ऐसे शुष्क ब्रह्मज्ञान रूपी पुष्प पर मुक्तिरूपी फल नहीं लगता) बोधात् पुरा मनोदोषमात्रात् क्लिश्नास्यथाधुना । अशेषलोकनिन्दा चेत्यहो ते बोधवैभवम् ॥५६॥ जब तक तुझे तत्वज्ञान नहीं हुआ था तब तक तो तुझे केवल काम क्रोधादि मनोदोष ही क्लेश पहुँचाया करते थे। परन्तु अब तत्वज्ञान हो जाने पर वे कामादि मनोदोष तो हैं ही, उनके साथ ही साथ अब तेरी सर्वलोकनिन्दा भी होने लगी है [कि देखो तत्वज्ञानी हो कर भी यह बुरे बुरे काम करता है] यों
द्वैतविवेकप्रकरणम् ११३
द्वैतविवेकप्रकरणम् ११३ तुझे दुगना क्लेश अब हो गया है। अरे भाई, तेरा बोधवैभव भी विचित्र ही है [ परमात्मा करे ऐसा बोध किसी को भी न हो।] विड्वराहादितुल्यत्वं मा कांक्षीस्तत्वविद् भवान् । सर्वधीदोषसन्त्यागाल्लोकैः पूज्यस्व देववत् ॥५७॥ (तुम अब तत्वज्ञानी हो गये हो तो मैला खाने वाले सूकरादि अधम प्राणियों के समान होना मत चाहो) किन्तु सब ही दोषों को छोड़ कर देवताओं की तरह पूजो। यदि तुम तत्वज्ञानी हो गये हो—सर्वाधिक उत्कर्ष का कारण ज्ञान यदि तुम्हें प्राप्त हो गया है—तो कामादि को त्याग देने की असमर्थता के कारण, निकृष्ट से निकृष्ट ग्रामसूकर आदि के तुल्य मत हो जाओ। जिन काम क्रोधादि में ग्राम के सूकर आदि अधम प्राणी भी फँस रहे हैं, तत्वज्ञानी होकर तुम उन काम क्रोधादि में मत फँसे रहो। किन्तु कामादि नाम के जितने भी मनोदोष हैं, उन सब को छोड़ कर देवता के समान सब लोगों के पूज्य हो जाओ। तत्वज्ञान का इतना तो दृष्ट फल भी होना ही चाहिये। (तत्वज्ञान की चार बातें मुँह से निकालकर भी यथेष्टाचारी होने से हमारी अपनी ही हानि नहीं होती, प्रत्युत तत्वज्ञान का मार्ग बदनाम होता है) इससे लोगों को घृणा होती है और बहुत से साधक हमारे पापाचार को देखकर इस मार्ग में आने से परहेज़ करने लगते हैं। यों हमारे यथेष्टाचरण से अकल्पित अनन्त हानियाँ होती हैं । काम्यादिदोषदृष्ट्याद्याः कामादित्यागहेतवः । प्रसिद्धा मोक्षशास्त्रेषु तानन्विष्य सुखी भव ॥५८॥
५१४ पञ्चदशी काम्य और द्वेष्य पदार्थों में जो (अनित्यता तथा साति- शयता आदि) दोष भरे पड़े हैं, उन दोषों पर दृष्टि रखना आदि बातें, कामादि के त्याग करने के साधन हैं। ये साधन मोक्ष- शास्त्रों में जहां-तहां कहे गये हैं। उन सब साधनों को वहां से ढूँढ लो [वैसे बनो] और सुखी हो जाओ। त्यज्यतामेष कामादि मनोराज्ये तु का क्षतिः । अशेषदोषबीजत्वात् क्षतिर्भगवतेरिता ॥५९॥ “अनर्थ के कारण इन कामादियों को तो हम त्याज्य मान लेते हैं। परन्तु मनोराज्य तो वैसा नहीं है। सो हम मनोराज्य करते रहें, उस में भला क्या हानि है ?” यह विचार भी ठीक नहीं है क्योंकि—यद्यपि मनोराज्य से साक्षात् तो कोई अनर्थ नहीं होता है, परन्तु परम्परा से तो सम्पूर्ण दोषों का मूलकारण यह मनोराज्य ही है। इस से मनोराज्य से बड़ी हानि होती है यह बात भगवान् कृष्ण ने कही हैं। ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषूपजायते । सङ्गात् संजायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥६०॥ जो पुरुष विषयों का ध्यान करता [किंवा मनोराज्य करता] रहता है, वह फिर उन विषयों को अच्छा समझने लगता है [अर्थात् उसे उन विषयों में संग हो जाता है]। संग से कामना की उत्पत्ति होती है [वह फिर उन विषयों को अपने लिये मांगने या चाहने लगता है] उस कामना से क्रोध उत्पन्न हो जाता है। [उस कामना के पूरा होने में जो रुकावट डालता है उस पर क्रोध आता है ] यों मनोराज्य ही तो सम्पूर्ण अनर्थों की जड़ है।
द्वैतविवेकप्रकरणम् ११५
द्वैतविवेकप्रकरणम् ११५ शक्यं जेतुं मनोराज्यं निर्विकल्पसमाधितः । सुसंपादः क्रमात् सोऽपि सविकल्पसमाधिना ॥६१॥ केवल निर्विकल्प समाधि से ही मनोराज्य जीता जा सकता है। वह निर्विकल्प समाधि धीरे धीरे सविकल्प समाधि करते करते प्राप्त हो सकती है। बुद्धतत्त्वेन धीदोषशून्येनैकान्तवासिना । दीर्घं प्रणवमुच्चार्य मनोराज्यं विजीयते ॥६२॥ जिस को आत्मतत्व का ज्ञान हो चुका हो—जिस को आत्मद्रव्य की सूचना सद्गुरु से मिल चुकी हो—बुद्धि के काम क्रोधादि दोषों से जो रहित हो चुका हो, जो विजन देश (हृदय) में रहने लगा हो, ऐसा पुरुष [चार छ आठ दस किंवा बारह मात्रा] लम्बे प्रणव का उच्चारण कर करके मनोराज्य को जीत सकता है । जिते तस्मिन् वृत्तिशून्यं मनस्तिष्ठति मूकवत् । एतत्पदं वसिष्ठेन रामाय बहुधेरितम् ॥६३॥ उस मनोराज्य के जीत लेने पर मन के सकल व्यापार इस प्रकार बन्द हो जाते हैं जैसे कि गूंगा आदमी सम्पूर्ण वाग्व्यव- हार से रहित होकर चुपचाप बैठा होता है। ऐसे शान्त पद का वर्णन वशिष्ठ ने राम के प्रति अनेक प्रकार से किया है । [इस कारण इस दशा को परम पुरुषार्थ मानना चाहिये ] । दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम् । संपन्नं चेत्तदुत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृतिः ॥६४॥ 'नेह नानास्ति किंचन'(बृ०४-४-१९) इस श्रुति के अनुसार जब यह ज्ञान हो जाय कि 'दृश्य नहीं है' और इस ज्ञान के
प्रताप से जब मन में से दृश्य का निवारण हो चुका हो [ जब बोधरूपी झाडू से मनरूपी घर में से दृश्यरूपी कूड़े को बुहार डाला हो] तब यह जान लेना चाहिये कि परा निर्वाण निर्वृति किंवा निरतिशय मोक्ष सुख प्राप्त हो चुका है । विचारितमलं शास्त्रं चिरमुद्ग्राहितं मिथः । सन्त्यक्तवासनान्मौनादृते नास्त्युत्तमं पदम् ॥६५॥ अद्वैत शास्त्र को हमने खूब विचार कर देख लिया है, गुरु शिष्यादि संवाद के द्वारा आपस में बहुत दिनों तक एक दूसरे को समझा देखा है, इतना सब करने पर हम तो इसी निश्चय पर पहुँचे हैं कि वासनारहित मौन से उत्तम कोई पद ही नहीं है [तात्पर्य यह है कि कामादि वासनाओं के निकल जाने से मन में जब तूष्णींभाव किंवा मौनावस्था आ जाती है तब इस दशा से उत्तम दशा कोई भी नहीं है] । विक्षिप्यते कदाचिद्धीः कर्मणा भोगदायिना । पुनः समाहिता सा स्यात् तदैवाभ्यासपाटवात् ॥६६॥ [ वृत्तिरहित हुआ भी चित्त प्रारब्ध कर्मों से जब कभी विक्षिप्त होने लगे तब उस का इलाज बताया जाता है कि ] भोगदायी प्रारब्ध कर्म के बल से यदि कभी बुद्धि विक्षिप्त हो जाती हो तो वह बुद्धि प्रबल अभ्यास के सामर्थ्य से फिर भी समाहित हो जाती है । [इस से साधकों को अभ्यास को बढ़ाना चाहिये ] । विक्षेपो यस्य नास्त्यस्य ब्रह्मवित्वं न मन्यते । ब्रह्मैवायमिति प्राहुर्मुनयः पारदर्शिनः ॥६७॥ जिस को कभी विक्षेप ही नहीं होता है उस को तो ब्रह्मवित्
द्वैतविवेकप्रकरणम् ११७
द्वैतविवेकप्रकरणम् ११७ नहीं माना जाता । वेदान्त के पारदर्शी मुनि लोग तो कहते हैं कि वह तो साक्षात् ब्रह्म ही है । [उस महापुरुष को पूर्वाभ्यास- वश गौणरूप से ही 'ब्रह्मवित्' कहा जा सकता है] । दर्शनादर्शने हित्वा स्वयं केवलरूपतः । यस्तिष्ठति स तु ब्रह्मन् ब्रह्म न ब्रह्मवित्स्वयम् ॥६८॥ वशिष्ठ ने भी कहा है कि—ब्रह्म को जानता हूँ या ब्रह्म को नहीं जानता हूँ इन दोनों ही झगड़ों को छोड़ कर जो महा पुरुष स्वयं केवल अद्वितीय चैतन्य रूप से अवस्थित हो बैठता है, अथवा केवल बन जाता है हे ब्रह्मन् ! वह तो साक्षात् ब्रह्म ही है [ऐसे महापुरुष को ब्रह्मज्ञानी कह कर छोटा सा बना देना ठीक नहीं है]। जीवन्मुक्तेः पराकाष्ठा जीवद्वैतविवर्जनात् । लभ्यतेऽसावतोऽत्रेद मीशद्वैताद्विवेचितम् ॥६९॥ उक्त प्रकार की जीवन्मुक्ति की अन्तिम अवस्था किसी को जभी मिल सकती है जब वह जीव के द्वैत [किंवा मनोमय प्रपंच] का परित्याग कर चुका हो । इसी कारण से हमने ईश्वर के बनाये हुए द्वैत से जीव के द्वैत को पृथक् करके मुमुक्षु लोगों को दिखा दिया है । इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं द्वैतविवेकप्रकरणं समाप्तम्
5. Mahavakya Viveka
ओम्
महावाक्यविवेकप्रकरणम् ॥५॥
येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च । स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ॥१॥ जिस से देखता है, सुनता है, सूंघता है, बोलता है, स्वादु अस्वादु को जानता है, उसी को 'प्रज्ञान' कहा जाता है । 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (ऐत० ५-१) 'अहं ब्रह्मास्मि' (बृ० १-४-१०) 'तत्त्वमसि' (छा० ६-८-७) 'अयमात्मा ब्रह्म' (बृ० २-५-१९) ये चार महावाक्य हैं। जिन से मुमुक्षु को मोक्ष के साधन ब्रह्मात्मै- कता का ज्ञान हो जाता है । इन्हीं चारों वाक्यों के अर्थों का निरूपण इस प्रकरण में किया है । सब से प्रथम ऋक्शाखा के ऐतरेयारण्यक के 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस महावाक्य का अर्थ करते हुए प्रज्ञान शब्द का अर्थ बताया जाता है कि—चक्षु और श्रोत्र के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरण की वृत्ति से उपहित जिस चैतन्य से यह संसार रूपादि पदार्थों को देखा करता और शब्दों को सुना करता है, नासिका के द्वारा बाहर निकली हुई अन्तःकरण वृत्ति को उपाधि बनाये हुए जिस चैतन्य से भले बुरे गन्ध सूंघे जाते हैं, वागिन्द्रिय से ढके हुए जिस चैतन्य से शब्द बोले जाते हैं, रसना से निकले हुए अन्तःकरण की वृत्ति को अपनी उपाधि बनाये हुए जिस चैतन्य से स्वादु और
महावाक्यविवेकप्रकरणम् ११९
महावाक्यविवेकप्रकरणम् ११९
अस्वादु रस पहचाने जाते हैं, एवं और भी सकलेन्द्रियों तथा अन्तःकरण की भिन्न भिन्न वृत्तियों से जिस चैतन्य की सूचना तत्वदर्शी को जब तब मिला करती है, उसी चैतन्य को इस महावाक्य में 'प्रज्ञान' कहा गया है। चतुर्मुखेन्द्रदेवेषु मनुष्याश्वगवादिषु । चैतन्यमेकं ब्रह्मातः प्रज्ञानं ब्रह्म मय्यपि ॥२॥ अब ब्रह्म शब्द का अर्थ बताया जाता है [ उत्तम कहाने वाले] चतुर्मुख इन्द्र तथा देवों में [मध्यम कहाने वाले] मनुष्यों में तथा [अधम कहाने वाले ] घोड़े गाय आदि में [ एवं आकाशादि भूतों में] जो एक चैतन्य व्याप्त हो रहा है [जिस से इस जगत् के जन्म स्थिति और प्रलय हो भी रहे हैं और प्रतीत भी हो रहे हैं] वही ब्रह्मतत्व है। क्योंकि सब जगह रहने वाला 'प्रज्ञान' ही 'ब्रह्म' है। इसी से कहता हूँ कि मुझ में भी जो 'प्रज्ञान' है वह भी 'ब्रह्म' ही है [क्योंकि मेरे और उनके 'प्रज्ञान' में कोई भी भेद नहीं है]। परिपूर्णः परात्मास्मिन् देहे विद्याधिकारिणि । बुद्धेः साक्षितया स्थित्वा स्फुरन्नहमितीर्यते ॥३॥ [अब यजुः शाखा की बृहदारण्यक उपनिषद् के 'अहं ब्रह्मास्मि' इस वाक्य के अर्थ को प्रकट करने के लिये इस श्लोक में 'अहं' शब्द का अर्थ बताया जाता है] यों तो सभी देहों में परात्मा परिपूर्ण हो रहा है और वह सभी की बुद्धियों का साक्षी भी है, परन्तु जब किसी अधिकारी देह में परिपूर्ण हुआ वह परमात्मा, बुद्धि के साक्षीरूप में अधिकारी को भासने भी लग पड़ता है तब उसी स्फूर्तियुक्त परात्मा को इस वाक्य में 'अहं' [मैं] कहा गया है।
३२० पञ्चदशी
यद्यपि परात्मतत्व समस्त देशों, सम्पूर्ण कालों, तथा सकल वस्तुओं से अपरिच्छिन्न ही है, परन्तु वह इस मायाकल्पित जगत् में माया की ओढ़नी ओढ़ कर छिप कर बैठ गया है। जब तो वही परमात्मा शमदमादि साधनों से युक्त होने के कारण, ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के योग्य बने हुए, और श्रवण मननादि किये हुए, मनुष्यादि के अधिकारिशरीर में, बुद्धि किंवा सूक्ष्म शरीर का भासक होकर फिर प्रकाशित होने लग पड़ता है— अपनी माया की ओढ़नी को उतार कर फेंक देता है—इस महा- वाक्य का 'अहं' शब्द उसी परात्मा की ओर को इशारा कर रहा है। स्वतः पूर्णः परात्ममात्र ब्रह्मशब्देन वर्णितः । अस्मीत्यैक्यपरामर्श स्तेन ब्रह्म भवाम्यहम् ॥४॥ [अब इसी 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य में के ब्रह्म शब्द का अर्थ बताया जाता है] स्वभाव से ही [देशकालादि के परि- च्छेद में न आने वाले] परिपूर्ण परात्मा को इस महावाक्य में 'ब्रह्म' कहा गया है। इसी महावाक्य में जो कि 'अस्मि' [हूँ] पद है, उस से जीव और ब्रह्म की एकता का परामर्श किया गया है। जिस का यही सारांश होता है कि मैं ब्रह्म ही हूँ। [मनुष्यादि देहों की दुर्बलताओं से दब कर मरने वाला—मनु- ष्यादि देहों के परिच्छेद में आकर क़ैदी बना हुआ—इन देहेन्द्रियादिरूपी उपनेत्र की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि से ही विचार करने वाला—क्षुद्र प्राणी मैं नहीं हूँ]। एकमेवाद्वितीयं सन्नामरूपविवर्जितम् । सृष्टेः पुराधुनाप्यस्य तादृक्त्वं तदितीर्यते ॥५॥
महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२१
महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२१ [अब सामवेद शाखा के छान्दोग्य उपनिषत् के 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य का अर्थ बताने के लिये पहले 'तत्' पद का लक्ष्य अर्थ बताया जाता है] सृष्टि से पहले जो सजातीय, विजातीय और स्वगत भेद से शून्य, तथा नामरूप से रहित सद्धस्तु 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' इस श्रुति में बतायी गई है, सृष्टि बन जाने के बाद अब भी वह सद्धस्तु वैसी की वैसी ही है, यह बात विचार दृष्टि से ही देखने की है । उस सद्धस्तु में अब भी कोई विकार नहीं आया है 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य का 'तत्' शब्द उसी की ओर को इशारा कर रहा है [तत् शब्द के उस लक्ष्यार्थ तक केवल अधिकारी की ही उदार दृष्टि पहुँच सकती है । जिसका यह देह अन्तिम देह हो,जिसको इस देह के पश्चात् दूसरा देह मिलना ही न हो,उसी को हम अधिकारी देह कहते हैं। सब से पिछले देह को ही विद्याधिकारी देह भी कहा जाता है। ] श्रोतुर्देहेन्द्रियातीतं वस्त्वत्र त्वंपदेरितम् एकता ग्राह्यतेऽसीति तदैक्यमनुभूयताम् ॥६॥ [अब 'तत्त्वमसि' के 'त्वं' पद का लक्ष्यार्थ बताया जाता है] श्रवणादि का अनुष्ठान करके जिसने इस महावाक्य को समझना है, उसके देहेन्द्रियों किंवा तीनों देहों से अलग रहने वाला, उसके तीनों देहों का साक्षी, जो कोई भी पदार्थ है, उसीको इस महा वाक्य का 'त्वं' पद लक्षणा से कह रहा है। इसी वाक्य के 'असि' पद से 'तत्' और 'त्वं' दोनों पदों में रहने वाली एकता का ग्रहण अधिकारी को कराया जाता है। मुमुक्षु लोगों को चाहिये कि उन 'तत्' और 'त्वं' पदार्थों की जो एकता अब प्रमाण- पुष्ट हो चुकी है उसका दिव्यानुभव वे भी ले लें।
३२२ पञ्चदशी स्वप्रकाशापरोक्षत्वमयमित्युक्तितो मतम् । अहंकारादिदेहान्तात् प्रत्यगात्मेति गीयते ॥७॥ [अब क्रमानुगत अथर्ववेद के अयमात्माब्रह्म इस वाक्य के अर्थ का व्याख्यान करते हुए 'अयम्' और 'आत्मा' इन दोनों का जो अभिप्राय है उसको क्रम से दिखाया जाता है] जो तत्व स्वयं प्रकाश होने के कारण ही प्रत्यक्ष हो रहा हो, उसको इस महावाक्य का 'अयम्' शब्द कह रहा है। क्योंकि यह तत्व धर्माधर्मादि के समान सदा परोक्ष रहने वाला नहीं है तथा घटादि के समान दृश्य पदार्थ भी नहीं है । अहंकार से लेकर देहपर्यन्त (अहंकार प्राण मन इन्द्रिय तथा देह का) जो संघात है,उस सभी का अधिष्ठान तथा सभी का साक्षी होने के कारण जो तत्व सभी से प्रत्यक् है, किंवा सभी का आन्तर है, इस महावाक्य में उसी को 'आत्मा' कहा गया है । क्योंकि वह तो सभी के अन्दर व्याप्त रहने वाली वस्तु है । दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्वमीर्यते । ब्रह्मशब्देन, तद् ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम् ॥८॥ [अब 'अयमात्मा ब्रह्म' इस महावाक्य के ब्रह्म शब्द का जो अर्थ विवक्षित है उसका वर्णन किया जाता है] इस दृश्यमान क्षणभंगुर जगत् का जो सत्य तत्व है, उसी को 'ब्रह्म' शब्द कह रहा है । स्वयंप्रकाश तथा आत्मरूप जो ब्रह्म है वह यह आत्मा ही तो है । सब को सदा प्रत्यक्ष रहने वाले इस आत्मा से भिन्न कोई भी ब्रह्म नामका तत्व नहीं है । आकाशादि जगत्, जो कि दृश्य होने के कारण ही मिथ्या है, इस जगत् का जो अधिष्ठान है—इस जगत् की बाधा हो
महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२३
महावाक्यविवेकप्रकरणम् १२३
जाने पर भी जो पारमार्थिक तत्व शेष रह जाता है, जिसको सच्चिदानन्दस्वरूप भी कहा जाता है, वही तो इस वाक्य के 'ब्रह्म' शब्द का अर्थ है । महावाक्य का संपिण्डित अर्थ तो यह हुआ कि—ऐसा जो स्वयं प्रकाश तथा आत्मरूप ब्रह्म है वह यही आत्मा है । इस आत्मा से भिन्न किसी को ब्रह्म समझना भारी भूल है ।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं महावाक्यविवेकप्रकरणं समाम्
6. Chitradipa
ओम् चित्रदीपप्रकरणम् यथा चित्रपटे दृष्टमवस्थानां चतुष्टयम् । परमात्मनि विज्ञेयं तथावस्थाचतुष्टयम् ॥१॥ चित्रयुक्त पट में जैसे [आगे कही हुई] चार अवस्थायें देखी जाती हैं, इसी प्रकार परमात्मा की भी [आगे कही] चार अवस्थायें जाननी चाहियें । 'अध्यारोपापवादाभ्यां निष्प्रपंचं प्रपञ्च्यते' क्योंकि आत्मतत्व निष्प्रपंच है, इस कारण उसका सीधा निरूपण तो हो ही नहीं सकता, परन्तु अध्यारोप तथा अपवाद नाम के दो ऐसे सहारे अध्यात्मशास्त्र ने ढूँढ निकाले हैं कि उन से उसका वर्णन शक्य हो गया है । इस न्याय के अनुसार जो जगत् परमात्मा में आरोपित हो रहा है, उसकी स्थिति कैसी है, इस का स्पष्टी- करण इस प्रकरण में किया गया है । इस निरूपण से यह होगा कि इस आरोपित जगत् का निषेध करने में बड़ी सुकरता हो जायगी । यथा धौतो घट्टितश्च लाञ्छितो रञ्जितः पटः । चिदन्तर्यामी सूत्रात्मा विराड् चात्मा तथेर्यते ॥२॥
चित्, दूसरी अन्तर्यामी, तीसरी सूत्रात्मा, चौथी विराट्, ये
(जैसे (१) धुला हुआ, (२) मांडी दिया हुआ, (३) चित्रों की रेखा वाला, तथा (४) रंग भरा हुआ—ये चार अवस्थायें छींट के कपड़े की होती हैं, इसी प्रकार परमात्मा में भी पहली चित्, दूसरी अन्तर्यामी, तीसरी सूत्रात्मा, चौथी विराट्, ये चार अवस्थायें होती हैं।) स्वतः शुभ्रोऽत्र धौतः स्याद् घट्टितोऽन्नविलेपनात् । मष्याकारैर्लाञ्छितः स्याद् रञ्जितो वर्णपूरणात् ॥३॥ जो वस्त्र स्वतः [अर्थात् दूसरे द्रव्य से सम्बन्ध हुए बिना] ही शुभ्र है उसको यहाँ ‘धौत’ कहा जाता है। अन्न [अर्थात् मांडी] से पुतने पर उसको ‘घट्टित’ कहते हैं। स्याही से जिस पर [खाली] आकार बना दिये गये हों वह ‘लाञ्छित’ कहाता है। [यथायोग्य] रंग भर देने पर वही ‘रञ्जित’ कहाने लगता है। स्वतश्चिदन्तर्यामी तु मायावी, सूक्ष्मसृष्टितः । सूत्रात्मा, स्थूलसृष्ट्यैव विराडित्युच्यते परः ॥४॥ वह परमात्मा जब स्वतः हो [जब उसमें माया और माया के कार्यों का मिश्रण न हुआ हो] तब ‘चित्’ कहाता है। माया का योग हो जाने पर वही परात्मा ‘अन्तर्यामी’ हो जाता है। जब उसका सूक्ष्म सृष्टि से योग हो जाता है [किंवा जब उसे अपंचीकृत भूतों से बना हुआ समष्टि सूक्ष्म शरीर मिल जाता है] तब वही ‘सूत्रात्मा’ कहा जाता है। स्थूल सृष्टि [किंवा पंचीकृत भूतों के बने हुए समष्टि स्थूल शरीर] के कारण वही परमात्मा अन्त में ‘विराट्’ कहाने लगता है। ब्रह्माद्याः स्तम्बपर्यन्ताः प्राणिनोऽत्र जडा अपि । उत्तमाधमभावेन वर्तन्ते पटचित्रवत् ॥५॥
१२६ पञ्चदशी ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त चेतन प्राणी तथा गिरि, नदी. आदि जड जगत्, जो कि इस परमात्मा में ऊँच नीच भाव से रह रहा है, ठीक ऐसा ही है जैसे कि कपड़े के चित्र हों और वे आपस में एक दूसरे से उत्तम वा अधम हों। [कपड़े के चित्रों का उच्च नीच भाव जैसे परिणाम में निकम्मा है इसी प्रकार प्राणियों का उच्च नीच भाव भी वेमतलव है। उच्च नीच कोई नहीं है, ये सब जीव अनन्त को पाने में लगे हुए हैं, जिसने उसे जितना पा लिया है वह उतना उच्च है। न पानेवाला नीच है । उच्च नीच उसको पाने या न पाने की ही अवस्थायें हैं। विद्या- लय और महाविद्यालय में पढ़ने वाले छोटे बड़े छात्रों में जैसे उच्च नीच भाव नहीं गिना जाता है । यही अवस्था इस संसार रूपी महाविद्यालय के विद्यार्थी सब प्राणियों की है ।] चित्रार्पितमनुष्याणां वस्त्राभासाः पृथक् पृथक् । चित्राधारेण वस्त्रेण सदृशा इव कल्पिताः ॥६॥ पृथक् पृथक् चिदाभासाश्चैतन्याध्यस्तदेहिनाम् । कल्प्यन्ते जीवनामानो बहुधा संसरन्त्यमी ॥७॥ [ यों तो चित्र में पर्वत, वृक्ष, मनुष्य आदि सभी होते हैं परन्तु ] चित्र में जो मनुष्यशरीर होते हैं उस चित्र में केवल उनके ही पृथक् पृथक् रंग विरंगे कपड़े, उस चित्र के आधार- वस्त्र के समान दीखनेवाले बनाये जाते हैं [ उस चित्र में पर्व- तादि के कपड़े नहीं बनाये जाते । चित्र के वे कपड़े भी कपड़े नहीं होते । वे तो बनावटी कपड़े होते हैं। उन कपड़ों से किसी के शीत आदि का निवारण नहीं होता ]। ठीक इसी प्रकार
चित्रदीपप्रकरणम् १२७
चित्रदीपप्रकरणम् १२७ . पर्वतादि का चिदाभास नहीं होता है किन्तु] जो देवादि देहधारी चैतन्य में अध्यस्त हैं, उन्हीं के पृथक्-पृथक् जीवनामक चिदाभास कल्पित कर लिये जाते हैं । [ उनके चिदाभास की कल्पना का कारण तो यह है कि देव, तिर्यङ्, मनुष्यादि के शरीर को पाकर] ये जीव ही तो अनेक प्रकार से संसार में चक्कर लगाया करते हैं [ निर्विकार रहने के कारण वह परमात्मा संसार में नहीं फंसता ] । वस्त्राभासस्थितान् वर्णान् यद्वदाधारवस्त्रगान् । वदन्त्यज्ञास्तथा जीवसंसारं चिद्गतं विदुः ॥८॥ उन बनावटी कपड़ों में जो रंग भरे हैं उनको भी जैसे अज्ञ लोग आधार वस्त्र के ही रंग कहने लगते हैं, ठीक इसी प्रकार सम्पूर्ण वादी लोग तथा सब लौकिक लोग मिलकर, अपने अज्ञान से वृथा ही कहने लगे हैं कि चेतन आत्मा ही संसार में फंस गया है [विचार कर देखने से तो यह संसार जीव का ही है । आत्मा नाम का तत्व कभी संसार में नहीं फंसता ।] चित्रस्थपर्वतादीनां वस्त्राभासो न लिख्यते । सृष्टिस्थमृत्तिकादीनां चिदाभासस्तथा न हि ॥९॥ चित्र में जो पर्वतादि होते हैं उनका जैसे चित्र में वस्त्रा- भास नहीं खींचा जाता, इसी प्रकार सृष्टि में जो मिट्टी आदि हैं उनमें भी चिदाभास नहीं होता । संसारः परमार्थोऽयं संलग्नः स्वात्मवस्तुनि । इति भ्रान्तिरविद्या स्याद् विद्ययैषा निवर्तते ॥१०॥ [देहादि को ही आत्मा मानने वाले कहते हैं कि] यह संसार परमार्थ है । अपने आत्मा में [आत्माराधन में] ही यह संसार
१२८ पञ्चदशी लगा हुआ है । बस उनकी यह भ्रान्ति ही [ इस संसार का मूल कारण ] अविद्या कहाती है । [ इस भ्रान्ति ने ही इस संसारं को चला रक्खा है ] विद्या से ही यह अविद्या निवृत्त हुआ करती है । आत्माभासस्य जीवस्य संसारो नात्मवस्तुनः । इति बोधो भवेद् विद्या लभ्यतेऽसौ विचारणात् ॥११॥ 'यह संसार तो आत्माभास [चिदाभास] जीव का ही है । आत्मवस्तु का संसार नहीं है' ऐसा ज्ञान ही 'विद्या' कहाती है । अध्यात्म विचार करते रहने से [कालान्तर में] यह विद्या हाथ आजाती है । [सूखे अध्ययन से इसकी प्राप्ति नहीं होती ।] सदा विचारयेत् तस्माज्जगज्जीवपरात्मनः । जीवभावजगद्भाववाधे स्वात्मैव शिष्यते ॥१२॥ क्योंकि विचार से विद्या मिलती है, इसलिये सदा ही जगत्, जीव और परात्मा का विचार करता रहे [ कि इनका कैसा कैसा स्वरूप है इत्यादि। यहाँ पर प्रश्न होता है कि मोक्षा- वस्था मिल जाने पर फलरूप में हाथ आने वाले परात्मा का विचार तो ठीक है, परन्तु जगत् और जीव का विचार करके हम क्या करें ? उसका उत्तर यह है कि-] जीव भाव और जग- द्भाव की जब बाधा होजाती है, किंवा जब जीवभाव और जग- द्भाव का अपवाद कर दिया जाता है उस समय केवल अपना आत्मा ही शेष रह जाता है [ इसी से कहते हैं कि पर- मात्मा के विचार के साथ जीव और जगत् का विचार भी करना ही चाहिये ] ।
चित्रदीपप्रकरणम् १२९
चित्रदीपप्रकरणम् १२९ नाप्रतीति स्तयोर्बाधः किन्तु मिथ्यात्वनिश्चयः । नो चेत् सुपुप्तिमूर्च्छादौ मुच्येतायततो जनः ॥१३॥ जीव और जगत् की प्रतीति के बन्द हो जाने को हम उनका 'बाध' नहीं कहते हैं। किन्तु उन दोनों के मिथ्याभाव का निश्चय कर लेना ही हमारे मत में 'बाध' कहाता है। यदि तो प्रतीति न होने को ही बाध कहते हों तब तो सुपुप्ति या मूर्च्छा आदि के समय [ जब कि स्वतः ही द्वैत की प्रतीति नहीं होती ] तब बिना ही यत्न किये [ तत्त्वज्ञान का सम्पादन बिना किये ही ] मनुष्य मुक्त हो जाया करें । परमात्मावशेषोऽपि तत्सत्यत्वविनिश्चयः । न जगद्विस्मृतिर्नो चेज्जीवन्मुक्तिर्न संभवेत् ॥१४॥ पिछले बारहवें श्लोक में जो कि 'स्वात्मैव शिष्यते' कहा गया है उस स्वात्ममात्र शेष रहजाने का मतलब भी केवल उसी को सत्य समझ लेने से ही है। 'परमात्मा से भिन्न सब जगत् को भूल जाना उसका मतलब कदापि नहीं है। यदि स्वात्ममात्र शेष रह जाने का अभिप्राय जगद्विस्मरण से हो तब तो जीवन्- मुक्ति कोई चीज ही न रहे । [ जीवन्मुक्ति का मतलब यही है कि—संसार की खटपट में भी बुद्धि स्थिर रह सके । गम्भीर से गम्भीर और उत्तेजक से उत्तेजक अवस्था में भी परमात्म- तत्व को याद रखते हुए उस पर मजबूत दृष्टि जमाये हुए संसार की यात्रा की जाय ] परोक्षा चापरोक्षेति विद्या द्वेधा विचारजा । तत्रापरोक्षविद्यासौ विचारोऽयं समाप्यते ॥१५॥
१३० पञ्चदशी
उसकी अवधि इस श्लोक में बतायी गयी है ]—विचार से उत्पन्न होने वाली विद्या दो प्रकार की है—एक 'परोक्ष' दूसरी 'अपरोक्ष'। जब अपरोक्ष विद्या की प्राप्ति किसी को हो जाती है, तभी विचार की यह खटपट बन्द हो जाती है। अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद परोक्षज्ञानमेव तत् । अहं ब्रह्मेति चेद् वेद साक्षात्कारः स उच्यते ॥१६॥ यदि कोई [किसी के समझाने से] यह समझ जाय कि 'ब्रह्म तत्व है' बस इसी को 'परोक्ष ज्ञान' समझा जाता है। जब तो किसी को यह दृढ विश्वास हो जाय कि 'मैं ही ब्रह्म हूँ' इसी को 'साक्षात्कार' कहते हैं। तत्साक्षात्कारसिद्धयर्थ मात्मतत्वं विविच्यते । येनायं सर्वसंसारात् सद्य एव विमुच्यते ॥१७॥ जिस साक्षात्कार के प्रभाव से यह मनुष्य सब संसार से तुरन्त ही [साक्षात्कार होते ही] मुक्त हो जाता है,उसी साक्षा- त्कार को सिद्ध करने के लिये अब हम आत्मतत्त्व का विवेचन करते हैं। कूटस्थो, ब्रह्म, जीवेशावित्येवं चिच्चतुर्विधा । घटाकाशमहाकाशौ जलाकाशाभ्रखे यथा ॥१८॥ जैसे एक ही आकाश घटाकाश, महाकाश, जलाकाश, तथा मेघाकाश चार प्रकार का होता है, इसी प्रकार एक ही चेतन कूटस्थ, ब्रह्म, जीव तथा ईश भेद से चार प्रकार का है। घटावच्छिन्नखे नीरं यत्तत्र प्रतिबिम्बितः । साभ्रनक्षत्र आकाशो जलाकाश उदीर्यते ॥१९॥
चित्रदीपप्रकरणम् १३१
चित्रदीपप्रकरणम् १३१ निरूपण करना छोड़कर जलाकाश का निरूपण इस श्लोक में किया जाता है ] घट के अन्दर के आकाश में जो जल भरा है, उस जल में जो मेघ और नक्षत्र सहित आकाश प्रतिबिम्बित हो रहा है, उसी को यहाँ 'जलाकाश' कहा जाता है । महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते । प्रतिबिम्बतया तत्र मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०॥ इस महाकाश में जो मेघमण्डल दीखता है [ उस मेघ- मण्डल में जो जल रहता है ] उस जल में प्रतिबिम्बित जो आकाश है वही 'मेघाकाश' कहाता है । मेघांशरूपमुदकं तुषाराकारसंस्थितम् । तत्र खप्रतिबिम्बोऽयं नीरत्वादुन्मीयते ॥२१॥ मेघ का अंश रूपी जो जल होता है वह तुपार के [ बहुत छोटे से ] आकार में रहता है । जल होने के कारण यह अनु- मान कर लिया जाता है कि उसमें भी आकाश का प्रतिबिम्ब होगा ही । अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्नचेतनः । कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते ॥२२॥ [ स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही प्रकार के देह अविद्याकल्पित हैं, उन ] दोनों देहों का अधिष्ठान होने से जो चेतन दोनों देहों से अवच्छिन्न (घिरा.हुआ) हो रहा है, उसी चेतन को 'कूटस्थ' कहते हैं। क्योंकि वह लुहारे के कूट [ ऐरन= जिस लोहे पर रखकर दूसरे लोहे ठोके पीटे जाते हैं, परन्तु जो स्वयं सदा एक सा बना रहता है ] के समान निर्विकार रहता है इससे उसे 'कूटस्थ' कहा जाता है ।