पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
३१६ पञ्चदशी व्यवहार चलता रह सकता है। [अनादिकाल की वासनायें ज्ञानी से भी 'मैं मनुष्य हूँ' ऐसा कहला देती हैं] प्रारब्धकर्मणि क्षीणे व्यवहारो निवर्तते । कर्माक्षये त्वसौ नैव शाम्येद् ध्यानसहस्रतः ॥२६३॥ प्रारब्ध कर्म के क्षीण हो जाने पर, व्यवहार भी (स्वयमेव) शान्त हो जाता है, ध्यान रक्खो कि जब तक कर्म क्षीण नहीं हो जाते, तब तक तो हज़ारों ध्यानों से भी यह व्यवहार निवृत्त नहीं हो सकता । ऐसी अवस्था में व्यवहार को जबरदस्ती बन्द करने का वहम झूठा वहम है। ज़बरदस्ती कर्मसन्यास का जो मार्ग है वह कल्याण कारी नहीं है। एक जगह औषधप्रयोग से दबाया हुआ फोड़ा जैसे दूसरी जगह फूट निकलता है, इसी प्रकार व्यवहार को ज़बरदस्ती बन्द करने से या तो बाहर का बाज़ार अन्दर मन में जा लगता है, या यह होता है कि एक जगह का व्यवहार बन्द करते ही, व्यवहार का जो अनादि अभ्यास है, उससे दूसरी जगह दूसरी तरह का व्यवहार होने लग पड़ता है। व्यवहार को ज़बरदस्ती बन्द करने के इसी वहम से प्रभावित हुए पुरुष, स्त्री पुत्रों के या घर के व्यवहार को छोड़कर महन्ती में या अन्य के प्रबन्धों में फँसे पाये जाते हैं। देशान्तरवास का [कालेपानी का] दण्ड जिन को राजा देता है उनका इस देश का व्यवहार तो बन्द हो जाता है, परन्तु वे वहां जाकर नये सम्बन्ध बना ही लेते हैं। यों व्यवहार ज़बरदस्ती बन्द करने की चीज़ नहीं है । व्यव- हार छूटता है छोड़ा नहीं जाता। यह तो यमनियमों का अभ्यास करते-करते स्वभाव से स्वयमेव छूटना चाहिये। पका हुआ
खरबूजा जैसे स्वयमेव डण्ठल से अलग हो जाता है, या जैसे पक जाने पर गर्भ माता की नाभि के बन्धन से टूट कर बाहर आ जाता है, इसी प्रकार यह व्यवहारत्याग भी अत्यन्त स्वाभाविक रूप में होना चाहिये। व्यवहार के रुकने के लिये कर्मों के क्षीण होने की बाट बड़े धैर्य से देखनी चाहिये। जैसे छोड़ा हुआ बाण ध्यान करने से बीच में नहीं रुक जाता, इसी प्रकार प्रारब्ध जब तक समाप्त नहीं हो लेता तब तक व्यवहार किसी के भी रोके रुक नहीं सकता। विरलत्वं व्यवहृतेरिष्टं चेद् ध्यानमस्तु ते। अबाधिकां व्यवहृतिं पश्यन् ध्यायाम्यहं कुतः ॥२६४॥ व्यवहार को विरल (कम) करने के लिये यदि तुझे ध्यान करना पसन्द आता है तो तू ध्यान किया कर। परन्तु मुझे तो अब यह व्यवहार बाधक ही नहीं दीखता है। फिर मैं ध्यान के बखेड़े में क्यों पहूं ? जब कि 'तज्जलान्' इस न्याय से सभी कुछ ब्रह्मतत्व है, तो इस व्यवहार को भी ब्रह्मरूप में ही देखना चाहिये। आँखें बन्द करके केवल एकान्त में बैठकर ही ब्रह्मतत्व का ध्यान करना तो ऐसा ही है जैसे किसी बालक को एक कोठरी में बैठाकर दिशा बतायी गई हों और फिर जब कहीं बाहिर उससे दिशा बूझी जाय कि इधर कौनसी दिशा है ? और वह यह कहने लगे कि चलो कोठरी में चलकर बताऊंगा। यहां तो मुझे मालूम नहीं है। ठीक इसी प्रकार केवल ध्यानमुद्रा में बैठकर ही ब्रह्मतत्व को समझना और व्यवहार में इस तत्व को भूल जाना—व्यवहार में इस तत्व को लागू न करना—भी ऐसा ही अधूरा ज्ञान है। जो ज्ञान व्यवहार में न
३१८ . पञ्चदशी आ सके, व्यवहार की जरा सी ठोकर भी जिस ज्ञान से न सहारी जाय, जो ज्ञान व्यवहारभीरु बनादे, वह ज्ञान ज्ञान ही नहीं है। जिस ज्ञान के छोटे से कल्पित कोने में अनन्त ब्रह्माण्ड भरे पड़े हैं, वही ज्ञान यदि व्यवहार के आ पड़ने पर भाग खड़ा होता हो, तो उस ज्ञान को सच्चा ज्ञान मत समझो। वह तो तोते के राम राम की तरह निर्वीर्य ज्ञान है। उस पर मुक्ति रूपी फल कदापि लगने वाला नहीं है। विक्षेपो नास्ति यस्मान्मे न समाधिस्ततो मम। विक्षेपो वा समाधिर्वा मनसः स्याद्विकारिणः ॥२६५॥ मुझ को तो विक्षेप ही नहीं होता है, इसी से मुझे समाधि की भी आवश्यकता नहीं है। विक्षेप और समाधि ये दोनों तो विकारशील मन के ही धर्म हैं। [इन्द्रियों को रोककर ही दीखने वाला आत्मा सच्चा आत्मा नहीं है। इन्द्रियों को रोककर चित्त- वृत्ति को बन्द करके पाई हुई अवस्था तो योगवालों की समाधि है। वेदान्त की समाधि तो यह है कि आत्मा और ब्रह्मतत्व को एक समझा जाय और फिर अखण्ड ब्रह्मरूप होकर बैठा जाय, हरएक क्रिया, हरएक व्यवहार, हरएक पदार्थ, हरएक प्राणी ब्रह्मरूप दीखें यह तो—यही सहज समाधि है। यह करनी नहीं पड़ती यह तो स्वभाव से होती है।] नित्यानुभवरूपस्य को मे वानुभवः पृथक् । कृतं कृत्यं प्रापणीयं प्राप्तमित्येवनि श्चयः ॥२६६॥ जो मैं नित्यानुभव स्वरूप हूँ, उस मुझ को मुझ से पृथक् अनुभव भी क्या होगा ? [इसी से मैं समाधि के फल कहाने वाले अनुभव के सम्पादन का उद्योग भी अब नहीं करता हूँ]
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३१९
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३१९ मुझे तो अब यह निश्चय हो गया है कि मुझे जो कुछ करना था सो मैं कर चुका हूँ तथा जो कुछ मुझे पाना था सो मैं पा चुका हूँ। व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो चान्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥२६७॥ कर्ता और भोक्तापन जिस मुझ में नहीं है, उस मेरा जो भी भिक्षा आदि लौकिक, जप समाधि आदि शास्त्रीय तथा हिंसा आदि प्रतिषिद्ध व्यवहार है, वह सबका सब जैसा मेरा प्रारब्ध हो उसके अनुकूल चलता रहो। [मुझे अब उसकी विशेष परवा नहीं है] अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेहं का मम क्षतिः ॥२६८॥ अथवा यों समझो कि मैं तो कृतकृत्य हो ही चुका हूँ। परन्तु लोकानुग्रह [प्राणियों पर कृपा] की इच्छा से मैं शास्त्र के अनुकूल मार्ग से ही चलता हूँ। मेरी तो उससे भी कुछ हानि नहीं होनी है। [मोक्ष तक पहुँचने का जो सरल राज- मार्ग है, वह दूसरों को भी दिखा दिया जाय, ज्ञानी लोगों की लापरवाही से वह मोक्ष की पद्धति नष्ट न हो जाय, इस कारण लोकसंग्रह के लिये भी ज्ञानी को शुभकर्म करने ही चाहियें। बिल्ली जैसे अपने बच्चों को चूहे का शिकार करना सिखा जाती है, उसी प्रकार अविद्या का शिकार करना प्रत्येक साधक को, ज्ञानी लोग सिखा दें तो वह मार्ग अक्षुण्ण बना रह सकता है]
३२० पञ्चदशी देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक्तद्वत् पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥२६९॥ विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥२७०॥ यह मेरा शरीर देवार्चन करे, स्नान कर, शौच या भिक्षा- चरण करे, यह मेरी वाणी तार (प्रणव) का जप करे, या वेदान्त शास्त्र का पाठ करती रहे, यह मेरी बुद्धि चाहे तो विष्णु का ध्यान करे या ब्रह्मानन्द में विलीन हो जाय । इन सब कामों में से मैं तो कुछ भी करता या करवाता नहीं हूँ । मैं तो इन सब का साक्षी हूँ । एवं च कलहः कुत्र संभवेत् कर्मिणो मम । विभिन्नविषयत्वेन पूर्वापरसमुद्रवत् ॥२७१॥ ऐसी परिस्थिति में पूर्व और पश्चिम समुद्र के समान, भिन्न विषय होने से, कर्मी के साथ मेरा झगड़ा कहां रहा । [कर्मी और मैं दोनों एक ही विषय पर कथन करते, तो उस का हमारा कलह होना संभव भी था] वपुर्वाग्धीषु निर्बन्धः कर्मिणो नतु साक्षिणि । ज्ञानिनः साक्ष्यलेपत्वे निर्बन्धो नेतरत्र हि ॥२७२॥ कर्मों का निर्बन्ध तो शरीर वाणी और बुद्धि तक ही है । साक्षी में उसका कुछ भी निर्बन्ध नहीं है [उससे उसको कुछ भी मतलब नहीं है] इसके विपरीत ज्ञानी का निर्बन्ध तो साक्षी के निर्लेपपने में है । उन शरीरादियों में उसका निर्बन्ध कुछ भी नहीं है [देह से उसका कोई भी नाता नहीं रहता है।]
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२१
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२१ और वह यही चाहता भी है कि किसी तरह यह नाता सदा के लिये टूट जाय] एवं चान्योन्यवृत्तान्तानभिज्ञौ बधिराविव । विवदेतां, बुद्धिमन्तो हसन्त्येव विलोक्य तौ ॥२७३॥ एक दूसरे की बात को न सुनने और न समझने वाले दो बहरे जब आपस में विवाद करते हों तब बुद्धिमान् लोग उन्हें झगड़ते देखकर हंसते ही हंसते हैं। यों जब ज्ञानी और कर्मी आपस में विवाद कर पड़ते हैं, तब अनुभवी विद्वान् लोग उन्हें देख देखकर हँसा करते हैं [क्योंकि उन दोनों को एक दूसरे के वृत्तान्त का परिज्ञान ही नहीं है] यं कर्मी न विजानाति साक्षिणं तस्य तत्ववित् । ब्रह्मत्वं बुध्यतां, तत्र कर्मिणः किं विहीयते ॥२७४॥ कर्मी पुरुप जिस साक्षी तत्व को नहीं पहचानता है, ज्ञानी पुरुप यदि उसी साक्षितत्व को ब्रह्म जान ले तो इसमें कर्मी का क्या बिगड़ता है ? [ उससे उसके कर्मानुष्ठान में कुछ भी रुकावट नहीं पड़ती है । ] देहवाग्बुद्धयस्त्यक्ता ज्ञानिनानुतबुद्धितः । कर्मी प्रवर्तयत्वाभिर्ज्ञानिनो हीयतेऽत्र किम् ॥२७५॥ देह वाणी और बुद्धि इन सभी को ज्ञानी ने अनृत समझ कर छोड़ दिया है । कर्मी इन से काम में प्रवृत्त होता है तो हुआ करे। ज्ञानी का उससे क्या बिगड़ता है ? [ ज्ञानी और कर्मी का विवाद तो हमारी समझ में निर्विषय ही है । इनके विवाद को देखकर तो सभी हँसेंगे ] । २१
३२२ पञ्चदशी प्रवृत्तिर्नोपयुक्ता चेन्निवृत्तिः कोपयुज्यते । बोधहेतु र्निवृत्तिश्चेद् बुभुत्सायां तथेतरा ॥२७६॥ यदि कहा जाय कि ज्ञानी लोग प्रयोजन रहित होने से कर्मों में प्रवृत्ति नहीं करते । परन्तु हम पूछेंगे कि निवृत्ति का भी तो ज्ञानी को कुछ उपयोग नहीं है। फिर ज्ञानी लोग निवृत्ति भी क्यों करते हैं ? यदि कहा जाय कि निवृत्ति तो बोध का कारण होती है, इससे ज्ञानी लोग निवृत्ति को स्वीकार कर लेते हैं, तो हम कहेंगे कि ऐसे तो प्रवृत्ति भी ज्ञान की इच्छा में उपयोगी होती ही है । [हम अनादि काल से प्रवृत्ति में ही हैं। जब कभी किसी जन्म में हमारे मन में यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि—इस प्रवृत्ति से हमें क्या मिला ? क्या मिल रहा है ? और क्या कुछ मिलेगा ? इस प्रश्न का जब कोई सद्दु- त्तर हमें नहीं मिल पाता, तब हम प्रवृत्ति से हट जाते हैं— किनारा करने लगते हैं, और तब तत्त्व की जिज्ञासा हमें हो जाती है । यों प्रवृत्ति भी वैराग्य दिलाकर ज्ञान की इच्छा में उपयोगी होती ही है ]। बुद्धश्चेन्न बुभुत्सेत नाप्यसौ बुध्यते पुनः । अबाधादनुवर्तेत बोधो न त्वन्यसाधनात् ॥२७७॥ यदि कहा जाय कि जो ज्ञानी है उसे तो बुभुत्सा [ज्ञानेच्छा] ही नहीं हो सकती, [फिर वह ज्ञानी प्रवृत्ति में क्यों फँसेगा ?] तो हम कहेंगे कि उस ज्ञानी को दोबारा बोध भी तो नहीं होता है, इस कारण ज्ञानी के लिये निवृत्ति का भी तो कुछ उप- योग नहीं रहता है । [महावाक्यों को सुनकर जो बोध उत्पन्न होता है उस ] बोध की बाधा किसी भी प्रमाण से न हो तो
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२३
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२३ बोध की स्थिरता हो जाती है । उसकी स्थिरता के लिये किसी भी साधन की अपेक्षा नहीं होती । [ यों बोध की स्थिरता के लिये भी निवृत्ति की आवश्यकता नहीं बता सकते हो । संसार से निवृत्ति आदि किसी भी साधन से बोध की स्थिरता [ क़ायमी ] नहीं होती है किन्तु वह तो तब ही स्थिर रहता है जब कि किसी प्रमाण से उसकी बाधा न हो] बोध की स्थिरता अबाध पर निर्भर हैं । निवृत्ति पर बोध की स्थिरता निर्भर नहीं है । नाविद्या नापि तत्कार्यं बोधं बाधितुमर्हति । पुरैव तत्त्वबोधेन बाधिते ते उभे यतः ॥२७८॥ अविद्या या अविद्या के कार्य [कर्तृत्वादि के अध्यास] भी बोध की बाधा नहीं कर सकते । क्योंकि उन दोनों को तो तत्त्व- ज्ञान ने पहले ही पछाड़ दिया था । बाधितं दृश्यतामक्षै स्तेन बाधो न शक्यते । जीवन्नाखुर्न मार्जारं हन्ति हन्यात् कथं मृतः ॥२७९॥ यह बाधित जगत्, इन्द्रियों से भले ही दीखता रहे, परन्तु इस बाधित जगत् से [ तत्त्वज्ञान की ] बाधा नहीं हो सकेगी [ क्योंकि अविद्यारूपी उपादान के निवृत्त हो जाने से उसका कार्य भी बाधित हो चुका है] दृष्टान्त भी देख लो कि जो चूहा जीते जी बिल्ली को नहीं मार सकता वह भला मर जाने पर कैसे मार सकेगा ? अपि पाशुपतास्त्रेण विद्धश्चेन्न ममार यः । निष्फलेषुवितुन्नाङ्गो नङ्क्ष्यतीत्यत्र का प्रमा ॥२८०॥
३२४ पञ्चदशी जो महाबलशाली, पाशुपत अस्त्र से बिंध कर भी नहीं मरा था, वह बिना नोक के बाणों से ही मर जायगा इसमें क्या प्रमाण है ? आदावविद्यया चित्रैः स्वकार्यै र्जृम्भमाणया । युद्द्वा बोधोऽजयत् सोऽद्य सुदृढो बाध्यतां कथम्॥२८१॥ जब ब्रह्मविद्या का अभ्यास प्रारम्भ किया था, अपने नाना- विध कार्यों की फौज को लेकर चढ़ाई करने वाली जिस अविद्या से झगड़ कर बोध ने उसे तभी जीत लिया था, वही महाबलशाली बोध [ जो अभ्यास की पटुता से आज तो बहुत ही दृढ़ हो चुका है ] क्योंकर बाधा जायगा ? तिष्ठन्त्वज्ञानतत्कार्यशवा बोधेन मारिताः । न भीति र्बोधसम्राजः कीर्तिः प्रत्युत् तस्य तैः॥२८२॥ अज्ञान और अज्ञान के बच्चे, जिनको कि बोध ने मार डाला है भले ही पड़े रहें, बोध रूपी सम्राट् को उन से कुछ भी ख़तरा नहीं होता। प्रत्युत उनसे तो उसकी कीर्ति ही होती है [कि देखो ये अज्ञान और उसके बच्चे बोध के मारे हुए सामने पड़े हैं।] य एवमतिशूरेण बोधेन न वियुज्यते । प्रवृत्त्या वा निवृत्या वा देहादिगतयास्य किम् ॥२८३॥ जो पुरुष इस तरह के अतिशूर बोध से कभी भी [ एक क्षण के लिये भी ] वियुक्त नहीं होता है, देहादि की प्रवृत्ति या निवृत्ति से उस महात्मा का कुछ इष्ट या अनिष्ट नहीं हो सकता है । प्रवृत्तावाग्रहो न्याय्यो बोधहीनस्य सर्वथा । स्वर्गाय वापवर्गाय यतितव्यं यतो नृभिः ॥२८४॥
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२५
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२५ जो बोधहीन है, उसका प्रवृत्ति में आग्रह करना उचित ही है। क्योकि मनुष्यों को स्वर्ग या मुक्ति इनमें से एक के लिये प्रयत्न तो करना ही होगा [ सांसारिक मज़ा और मुक्ति- सुख इन दोनों म से किसी एक के बिना तो इस जीवन में कुछ सार ही नहीं रहता। या तो मुक्तिसुख मिलना चाहिये। नहीं तो फिर दुनियादारी का मज़ा ही सही। सांसारिक मज़ों को भोग कर जब उनके फलस्वरूप दुःख के पहाड़ भोक्ता के ऊपर टूट पड़ते हैं तब साधक बनकर मोक्ष मार्ग में को दौड़ जाना पड़ता है। संसार की सारी विपत्तियां इसी मोक्षमार्ग के गूंगे बुलावे हैं]। विद्वांश्चेत् तादृशां मध्ये तिष्ठेत् तदनुरोधतः । कायेन मनसा वाचा करोत्येवाखिलाः क्रियाः ॥२८५॥ वैसे लोगों के बीच में यदि ज्ञानी को रहना पड़ जाय तो वह उन्हीं के अनुसार शरीर, वाणी और मन से [लोक संग्रह के लिये] सब विहित कामों को किया ही करे [उसको उन कामों से उन्हें हटाना नहीं चाहिये। ऐसे लोगों को उनकी बिना इच्छा के परमार्थ वार्ता नहीं बतानी चाहिये। अधिकार से ऊँची बात बताना ऐसा ही होता है जैसा कि ऊसर में बीज बोना]। एष मध्ये बुभुत्सूनां यदा तिष्ठेत् तदा पुनः । बोधायैषां क्रियाः सर्वा दूषयंस्त्यजतु स्वयम् ॥२८६॥ यही विद्वान् जब जिज्ञासुओं में पहुँचे तब उनको बोध करा देने के लिये सब क्रियाओं को दूषित करते हुए स्वयं भी उन सब क्रियाओं का त्याग करदे। [उनसे भी त्याग करादे। क्रियाओं में जो गुप्त अनन्त दोष भरे पड़े हैं, उनका मर्म उन्हें समझा
३२६ पञ्चदशी कर, इस कर्म और भोग के दुःखदायी अनन्त चक्र में से उन का भी उद्धार करले] । अविद्वदनुसारेण वृत्ति र्बुद्धस्य युज्यते । स्तनन्धयानुसारेण वर्तते तत्पिता यतः ॥२८७॥ ज्ञानी लोगों का बर्ताव तो अज्ञानियों के अनुसार ही होना चाहिये। देखते हैं कि छोटे-छोटे बच्चों के माता पिता उन्हीं के अनुकूल बर्ताव किया करते हैं । अधिक्षिप्तस्ताडितो वा बालेन स्वपिता तदा । न क्लिश्नाति न कुप्येत बालं प्रत्युत लालयेत् ॥२८८॥ देखा जाता है कि जब बच्चा पिता को भला बुरा कहता या मार बैठता है तब भी उसके पिता को क्रोध कुछ भी नहीं होता। प्रत्युत वह इसके बदले में भी उसे प्यार ही किया करता है । निन्दितः स्तूयमानो वा विद्वानज्ञैर्न निन्दति । न स्तौति किन्तु तेषां स्याद् यथा बोधस्तथा चरेत् ॥२८९॥ अज्ञानी लोग जब विद्वान् पुरुष की निन्दा या स्तुति करें तब इसके बदले में वह स्वयं उनकी निन्दा या स्तुति न करने लगे । किन्तु इन लोगों को जैसे भी बोध हो सके वैसा वैसा प्रयत्न करता रहे । येनायं नटनेनात्र बुध्यते कार्यमेव तत् । अज्ञप्रबोधान्नैवान्यत् कार्यमस्त्यत्र तद्विदः ॥२९०॥ विद्वान् के जिस जिस तरह के आचरण करने से, इस अज्ञानी को ज्ञान हो जाय, ज्ञानी को वही वही आचरण करते जाना चाहिये । ज्ञानी का तो इसके अतिरिक्त और कुछ भी
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२७
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२७ कर्तव्य नहीं है कि वह अज्ञानी प्राणी को किसी तरह बोध करादे । [ इस कारण ज्ञानी को उनका अनुसरण करके तत्व बोध कराना चाहिये । अज्ञानी की तरह सब कुछ करने लगना इष्ट नहीं है । ] कृतकृत्यतया तृप्तः प्राप्तप्राप्यतया पुनः । तृप्यन्नेवं स्वमनसा मन्यतेऽसौ निरन्तरम् ॥२९१॥ यह विद्वान् पहले तो कृतकृत्य हो जाने के कारण तृप्त हो कर, फिर आगे कही विधि से प्राप्तप्राप्तव्य हो जाने के कारण तृप्त होकर, अपने मन में सदा यही सोचा करता है— धन्योऽहं धन्योहं नित्यं स्वात्मानमञ्जसा वेद्मि । धन्योहं धन्योऽहं ब्रह्मानन्दो विभाति मे स्पष्टम् ॥२९२॥ मैं धन्य हूँ । क्योंकि मैं अपने आत्मतत्व को साक्षात् जान गया हूँ । यों आत्मा को समझ लेने से ही मुझे परम हर्ष है । ब्रह्म नाम का जो आनन्द है, वह अब मुझे स्पष्ट ही प्रतीत होने लगा है । यों आत्मज्ञान के फल के मिलने से मैं परम धन्य होगया हूँ । धन्योहं धन्योहं दुःखं सांसारिकं न वीक्षेऽद्य । धन्योहं धन्योहं स्वस्याज्ञानं पलायितं क्वापि ॥२९३॥ आज तो मुझे कोई भी सांसारिक दुःख नहीं दीखता । इस कारण अनिष्ट की निवृत्ति हो जाने से भी मैं धन्य हो गया हूँ । क्योंकि आज मेरा अज्ञान [ अनेक कर्मों की वासनाओं का पुञ्ज ] न मालूम कहां भाग गया है ? [ यही कारण है कि अब मुझे कोई दुःख प्रतीत नहीं होता । इसी से मैं कृतार्थ हो चुका हूँ । ]
३२८ पञ्चदशी धन्योऽहं धन्योऽहं कर्तव्यं मे न विद्यते किञ्चित् । धन्योऽहं धन्योऽहं प्राप्तव्यं सर्वमद्य सम्पन्नम् ॥२९४॥ मैं धन्य हूँ, आजतो मुझे कुछ कर्तव्य ही नहीं रहा है। मैं धन्य हूँ क्योंकि जो मुझे प्राप्तव्य था वह सब आज मिल चुका है । धन्योऽहं धन्योऽहं तृप्तिर्मे कोपमा भवेल्लोके । धन्योऽहं धन्योऽहं धन्यो धन्यः पुनः पुनर्धन्यः ॥२९५॥ मैं धन्य हूँ । आज मेरे समान तृप्ति किसको है ? इससे अधिक और क्या कहूँ ? कि मैं धन्य हूँ,मैं धन्य हूँ,मैं बार बार धन्य हूँ [ मुझे तो अब तृष्टि ही तृष्टि दिखाई दे रही है । ] अहो पुण्यं महो पुण्यं फलितं फलितं दृढम् । अस्य पुण्यस्य संपत्ते रहो वयमहो वयम् ॥२९६॥ वे मेरे अनन्त कोटि जन्मों के अनन्त पुण्य आज निश्चय ही फलरूप में आगये । पुण्यों की इस राशि के प्रताप से आज मैं आनन्द सागर की लहरों में हिलोरे ले रहा हूँ । आज मेरे पुण्यों के प्रताप से वह सारा संसार मुझे संतोष ही संतोष दीख पड़ रहा है । अहो शास्त्र महोशास्त्र महो गुरु रहो गुरुः । अहो ज्ञान महो ज्ञान महो सुखमहो सुखम् ॥२९७॥ उन शास्त्रों और उन गुरुओं को स्मरण करके भी आज मुझे बड़ा हर्ष हो रहा है, जिनके कि प्रताप से मेरी हृदय की ग्रन्थि खुली है । ज्ञान के प्रताप से मैं इस हर्षातिरेक में आया हूँ और आनन्दित हो रहा हूँ उस ज्ञान और उस सुख की महिमा का क्या वर्णन करूँ ?
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२९
तृप्तिदीपप्रकरणम् ३२९ तृप्तिदीपमिमं नित्यं येऽनुसन्दधते बुधाः । ब्रह्मानन्दे निमज्जन्तस्ते तृप्यन्ति निरन्तरम् ॥२९८॥ जो बुध लोग इस तृप्तिदीपनाम के प्रकरण का विचार नित्य करेंगे वे ब्रह्मानन्द में निमग्न हो कर सदा ही तृप्त रहने लगेंगे। इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं तृप्तिदीपप्रकरणं समाप्तम् ।
8. Kutasthadipa
ॐ कूटस्थदीपप्रकरणम् खादित्यदीपिते कुड्ये दर्पणादित्यदीप्तिवत् । कूटस्थभासितो देहो धीस्थजीवेन भास्यते ॥१॥ जो भित्ति पहले सूरज से दीपित हो रही है, उसी भित्ति पर जैसे दर्पण में के सूरज की दूसरी दीप्ति भी जा पड़ती हो, [और वह भित्ति दो प्रकाशों से चमक उठती हो] उसी प्रकार [पहले] कूटस्थ [अविकारिचैतन्य] से भासित भी यह देह [फिर दुबारा] बुद्धिस्थ चिदाभास से भी भासित हुआ करता है। सूर्य के प्रकाश से जो भित्ति अभी तक सामान्यतया प्रकाशित हो रही थी, दर्पण पर गिर कर लौट कर भित्ति पर पड़ी हुई सूर्य की रश्मि फिर जैसे उसी भित्ति को विशेषतया प्रकाशित किया करती है, इसी प्रकार निर्विकार चैतन्य ने इस देह को सामान्यतया प्रकाशित तो कर ही रक्खा है, उसे ही यह बुद्धिस्थ चिदाभास फिर दुबारा विशेष रूप से प्रकाशित किया करता है। यों देह को प्रकाशित करने वाले दो चैतन्य हैं—। एक सामान्य चेतन दूसरा विशेष चेतन। अनेकदर्पणादित्यदीप्तीनां बहुसन्धिषु । इतरा व्यज्यते, तासामभावेऽपि प्रकाशते ॥२॥ यदि एक ही भित्ति पर अनेक दर्पणों के आदित्यों के आभास [प्रभा-अक्स] डाले जांय, तो उन आभासों किंवा
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३१
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३१ दीप्तियों के बीच बीच में दूसरी जो सामान्यप्रभा रूपी सूर्य- दीप्ति है वह भी देखी ही जाती है। दर्पणों की अनेक प्रभायें जब नहीं रहतीं वह [सामान्य प्रभा] तो तब भी सब जगह प्रकाशित ही रहती है। चिदाभासविशिष्टानां तथानेकधियामसौ । सन्धिं धियामभावं च भासयन् प्रविविच्यताम् ॥३॥ ऊपर कहे हुए दृष्टान्त के अनुसार, चिदाभासयुक्त जो अनेक बुद्धियां किंवा अनेक बुद्धिवृत्तियां होती हैं, [जाग्रत् तथा स्वप्न में तो] उन बुद्धियों के सन्धिकाल को प्रकाशित करने वाले तथा [सुषुप्ति के समय] उन बुद्धियों के अभाव को प्रकाशित करने वाले, इस कूटस्थ को [ऊपर कहे दृष्टान्त के अनुसार उन बुद्धियों से] पृथक् जान लो। जाग्रत् तथा स्वप्न के समय एक वृत्ति नष्ट होती है; दूसरी उत्पन्न होती है। इन दोनों वृत्तियों की सन्धि को जब कि थोड़े से समय के लिये कोई भी वृत्ति नहीं रहती—जो कोई तत्व प्रकाशित करता है, वही कूटस्थ चैतन्य है। सुषुप्ति के समय जब कोई भी बुद्धिवृत्ति नहीं रहती, तब वृत्तियों के अभाव को जो कोई तत्त्व प्रकाशित करता है, वही कूटस्थ चैतन्य है। वह इन बुद्धिवृत्तियों से और इनके अभावों से सर्वथा भिन्न है। यों उस कूटस्थ तत्व का विवेक कर लेना चाहिये। घटैकाकारधीस्था चिद्घटमेवावभासयेत् । घटस्य ज्ञातता ब्रह्मचैतन्येनावभासते ॥४॥ घट को देखते समय जो बुद्धि केवल घटाकार हो जाती है, उस बुद्धि में जिस चैतन्य का आभास पड़ता है, वह तो
३३२ पञ्चदशी केवल घट को ही प्रकाशित किया करता है । परन्तु उस घट में जो ज्ञातता नाम का धर्म रहता है [जिस धर्म के सहारे से ‘घट को जान लिया’ यह व्यवहार किया जाता है] उसको तो [घट की कल्पना का अधिष्ठान] ब्रह्मचैतन्य ही प्रकाशित किया करता है [यों देह से बाहर चिदाभास और ब्रह्म को पृथक् पृथक् समझ लेना चाहिये ] अज्ञातत्वेन ज्ञातोयं घटो बुद्धयुदयात् पुरा । ब्रह्मणैवोपरिष्टात्तु ज्ञातत्वेनेत्यसौ भिदा ॥५॥ जब तक बुद्धि उत्पन्न नहीं हो जाती, तब तक तो यह घट अज्ञात रूप से ब्रह्मतत्त्व से ही ज्ञात रहता है । बुद्धि की उत्पत्ति हो जाने पर तो वही ब्रह्म इसे ज्ञातरूप से प्रकाशित करने लग पड़ता है, बस केवल इतना सा ही भेद है [ऐसी अवस्था में यह शंका निर्मूल हो जाती है कि—ज्ञातता को भासित करने वाले चैतन्य से ही घट की प्रतीति भी हो सकती है। बुद्धि की क्या आवश्यकता होती है ? क्योंकि ज्ञातता आदि भेदों की सिद्धि के लिये बुद्धि की भी परमावश्यकता तो रहती ही है ।] चिदाभासान्तधीवृत्तिर्ज्ञानं लोहान्तकुन्तवत् । जाड्यमज्ञानमेताभ्यां व्याप्तः कुम्भो द्विधोच्यते ॥६॥ [‘ज्ञातता’ और ‘अज्ञातता’ कराने वाले ‘ज्ञान’ और ‘अज्ञान’ का स्वरूप इस श्लोक में बताया गया है] भाले की नोक पर जैसे लोहा लगा रहता है, इसी प्रकार चित्प्रतिबिम्ब से युक्त जो बुद्धि वृत्ति है [ जिस बुद्धिवृत्ति के अन्त अर्थात् अग्रभाग में चिदाभास लगा रहता है ] उस को तो ‘ज्ञान’ कहते हैं। जो तो जाड्य है—[जो स्वतः स्फूर्ति का न होना है]
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३३
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३३ वही 'अज्ञान' कहाता है । जब कोई कुम्भ इस ज्ञान से व्याप्त होता है तब उसे 'ज्ञात कुम्भ' कहते हैं। जब कोई कुम्भ अज्ञान से व्याप्त हुआ रहता है तब उसको 'अज्ञात कुम्भ' कहा जाता है । अज्ञातो ब्रह्मणा भास्यो ज्ञातः कुम्भ स्तथा न किम् । ज्ञातत्वजननेनैव चिदाभासपरिक्षयः ॥७॥ जैसे अज्ञात कुम्भ ब्रह्म से भास्य होता है, क्या ऐसे ही ज्ञात कुम्भ ब्रह्म से भास्य नहीं होसकता ? [किन्तु हो ही सकता है। अज्ञातता को उत्पन्न करके जैसे अज्ञान उपक्षीण हो जाता है इसी प्रकार] चिदाभास [ ज्ञान ] भी ज्ञातता को उत्पन्न करके क्षीण होजाता है, [उसके बाद उसका कोई उपयोग नहीं रहता, फिरतो अज्ञात कुम्भ की तरह ज्ञात कुम्भ भी ब्रह्म से ही भास्य होता है] आभासहीनया बुद्ध्या ज्ञातत्वं नैव जन्यते । तादृग्बुद्धेर्विशेषः को मृदादेः स्याद् विकारिणः ॥८॥ जो बुद्धि आभास से हीन है, उससे तो ज्ञातता उत्पन्न ही नहीं होती। वैसी बुद्धि में और मिट्टी पत्थर में तो कोई भेद ही नहीं होता । [इसलिये चिदाभास को निरर्थक मत समझो । अकेली बुद्धि के बस का यह काम नहीं है कि वह ज्ञातता को उत्पन्न कर सके ।] ज्ञात इत्युच्यते कुम्भो मृदा लिप्तो न कुत्रचित् । धीमात्रव्याप्तकुम्भस्य ज्ञातत्वं नेष्यते तथा ॥९॥ लोक में भी देखलो कि—जो घड़ा मट्टी से ढकरहा हो उसे कोई भी ज्ञात कुम्भ नहीं कहता। ईसी प्रकार जो कुम्भ
१३४ पञ्चदशी चिदाभासरहित बुद्धि से व्याप्त हो रहा हो उसे कोई भी 'ज्ञात कुम्भ' नहीं मान सकता। ज्ञातत्वं नाम कुम्भेऽतश्चिदाभासफलोदयः । न फलं ब्रह्मचैतन्यं मानात् प्रागपि सत्वतः ॥१०॥ [क्योंकि केवल बुद्धि तो ज्ञातता को उत्पन्न करही नहीं सकती] इस कारण कुम्भ में चिदाभासरूपी फल का उदय हो जाना ही 'ज्ञातता' कहाती है । ब्रह्मचैतन्य को ही फल मान लें और [चिदाभास को हटादें] यह भी ठीक नहीं है [ क्योंकि ब्रह्मचैतन्य को तो फल अर्थात् घटादिका स्फुरण कह ही नहीं सकते इसका कारण यह है कि ] ब्रह्म चैतन्य तो प्रमाणों से भी पहले से विद्यमान रहता है । [प्रमाणों का फल तो उसे कहना चाहिये जो प्रमाणों के पीछे से होता हो] बात यह है कि जिसे अनुभव या स्फूर्ति या प्रतीति कहते हैं, वह तो अजर अमर अखण्ड और एकरस है। वह अनादि काल से ऐसी ही है, और ऐसी ही रहेगी। परन्तु हम विचारदरिद्र लोगों को इस अखण्ड अनन्त सदातन स्फूर्ति का ध्यान बिल्कुल भी नहीं है। अब यह होता है कि जब किसी पदार्थ में ज्ञातता नाम का धर्म उत्पन्न हो जाता है, त्यों हीं हम उस पदार्थ की स्फूर्ति होना मान लेते हैं। असलमें देखा जाय तो वहां जो स्फूर्ति है वह तो सदातन ब्रह्म चैतन्य ही है। ज्ञातता उत्पन्न होने के कारण जो पदार्थ उस अखण्ड स्फूर्ति के लपेटे में आगया है वह भी प्रतीत सा होने लग पड़ा है। तत्व विचार से मालूम होता है कि यह प्रतीति प्रमाणों से पैदा नहीं होती । प्रमाणों से तो पदार्थों
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३५
कूटस्थदीपप्रकरणम् ३३५
में चिदाभास रूपी फल का उदय हो जाना ही घट का जान लिया जाना है । परागर्थप्रमेयेषु या फलत्वेन सम्मता । संवित् सैवेह मेयोऽर्थो वेदान्तोक्तिप्रमाणतः ॥११॥ परागर्थ जो घटादि वाह्य पदार्थ हैं, वे जब प्रमेय अर्थात् प्रमाण के विषय होते हैं, उस समय प्रकट होने वाली जो संवित् (ज्ञान) प्रमाणों का फल मानली गयी है, वही संवित् इस वेदान्तशास्त्र में वेदान्त वाक्य रूपी प्रमाणों से जानने योग्य एक पदार्थ है । इति वार्तिककारेण चित्साहृश्यं विवक्षितम् । ब्रह्मचित्फलयोर्भेदः साहश्यां विश्रुतो यतः ॥१२॥ ऊपर कहे हुए श्लोक में वार्तिककार सुरेश्वराचार्य ने चित्साहश्य की विवक्षा की है—अर्थात् ब्रह्म चैतन्य के सदृश चिदाभास को प्रमाणों का फल कहा है । ब्रह्मचैतन्य को फल नहीं कहा । वार्तिककार के गुरु श्रीमच्छंकराचार्य ने भी उपदेश- साहसी में ब्रह्मचैतन्य तथा ब्रह्मचैतन्य के फल [चिदाभास] को भिन्न भिन्न बताया है । आभास उदित स्तस्माज्ज्ञातत्वं जनयेद् घटे । तत् पुनर्ब्रह्मणा भास्य मज्ञातत्ववदेव हि ॥१३॥ प्रकृत बात तो यही हुई कि-क्योंकि ब्रह्मचित् तथा चिदा- भासका भेद सिद्ध होचुका, इसलिये घट में जो आभास उदित होता है, वह घट में ज्ञातता को उत्पन्न किया करता है । वह ज्ञातता, अज्ञातता की तरह, ब्रह्म से ही भास्य होती है, यह तो प्रसिद्ध ही है ।