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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

५१० पञ्चदशी बालस्य हि विनोदाय धात्री वक्ति शुभां कथाम् । क्वचित् सन्ति महाबाहो राजपुत्रास्त्रयः शुभाः ॥२२॥ द्वौ न जातौ तथैकस्तु गर्भ एव न च स्थितः । वसन्ति ते धर्मयुक्ता अत्यन्तासति पत्तने ॥२३॥ स्वकीयाच्छून्यनगरान्निर्गत्य विमलाशायाः । गच्छन्तो गगने वृक्षान् ददृशुः फलशालिनः ॥२४॥ भविष्यन्नगरे तत्र राजपुत्रास्त्रयोऽपि ते । सुखमद्य स्थिताः पुत्र ! मृगयाव्यवहारिणः ॥२५॥ धात्र्येति कथिता राम ! बालकाख्यायिका शुभा । निश्चयं स ययौ बालो निर्विचारणया धिया ॥२६॥ बालकों को बहलाने के लिए धायी एक बड़ी मनोहर कहानी कहा करती हैं कि—किसी देश में तीन बड़े सुन्दर राजकुमार रहते हैं । उनमें से दो तो अभी तक उत्पन्न ही नहीं हुए हैं। और एक तो अभी तक गर्भ में ही नहीं आया है। वे तीनों के तीनों बड़े धर्मपूर्वक एक अत्यन्त असत् नगर में रहते हैं । एक बार वे तीनों उदार राजकुमार अपने शून्य नगर में से निकल कर जा रहे थे कि उन्होंने आकाश में फलों से लड़े हुए बहुत से पेड़ देखे । वे तीनों गजपुत्र भविष्यत् नगर में शिकार खेलते खेलते आज आनन्द पूर्वक रह रहे हैं ।. हे राम ! धायी ने ये एक बड़ी मनोहर कहानी कही थी। वह भोला बच्चा अपनी विचारशून्य [भोली] बुद्धि से इसे ठीक मान बैठा । इयं संसाररचना विचारोज्झितचेतसाम् । बालकाख्यायिकेवेत्थमवस्थितिमुपागता ॥२७॥

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५११

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५११ ठीक इसी प्रकार इस संसाररचना का हाल है [विचार कर देखें तो कहीं भी इसकी श्रृंखला नहीं जुड़ती। खोदते खोदते रेत की दीवार की तरह, विचार करते करते ही यह तितर बितर हो जाती है] परन्तु जिनके चित्त को विचार करना नहीं आता बालकों की कहानी की तरह उनके लिए ही यह संसाररचना सच्ची हो जाती है। इत्यादिभिरुपाख्यानैर्मायाशक्तेश्च विस्तरम् । वसिष्ठः कथयामास सैव शक्तिर्निरूप्यते ॥२८॥ इत्यादि उपाख्यानों के द्वारा मायाशक्ति का विस्तृत निरू- पण वसिष्ठ ने किया है। उसी मायाशक्ति का निरूपण अब किया जायगा । कार्यादाश्रयतश्चैषा भवेच्छक्तिर्विलक्षणा । स्फोटाङ्गारौ दृश्यमानौ शक्तिस्तत्रानुमीयते ॥२९॥ यह मायाशक्ति अपने कार्य [जगत्] से और अपने आश्रय [ब्रह्म] इन दोनों से ही विलक्षण [किंवा विपरीत] स्वभाववाली होती है। दृष्टान्त में देख लो कि वह्नि की शक्ति का कार्य 'स्फोट' [विदारण] तथा शक्ति का आश्रय 'अङ्गार' तो प्रत्यक्ष ही दीखा करते हैं। शक्ति का अनुमान तो कार्य को देख कर ही किया जाता है। [इस कारण वह शक्ति उन दोनों (कार्य और आश्रय अथवा स्फोट और अंगार) से विलक्षण होती है] पृथुबुध्नोदराकारो घटः कार्योऽत्र मृत्तिका । शब्दादिभिः पञ्चगुणैर्युक्ता शक्तिस्त्वतद्विधा ॥३०॥ मिट्टी की शक्ति के विषय में भी यही बात समझ लो— मोटे और गोल पेट वाला घट तो मिट्टी की शक्ति का कार्य है।

५१२ पञ्चदशी उस कार्य का आश्रय मिट्टी तो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध नाम के पाँच गुणों वाली है। परन्तु शक्ति तो इन दोनों से ही विलक्षण होती है [वह न तो घटरूप ही है और न वह मृत्तिका रूप ही है।] न पृथ्वादिर्नशब्दादिः शक्तावस्तु यथा तथा। अत एव ह्यचिन्त्यैषा न निर्वचनमर्हति ॥३१॥ कार्य के धर्म मुटापा आदि, तथा आश्रय के धर्म शब्दादि कोई भी शक्ति में नहीं पाये जाते। इस कारण वह शक्ति अपने कार्य तथा अपने आश्रय से विलक्षण होती है। वह तो कुछ ऐसी ही विलक्षण वस्तु है। कार्य और आश्रय से विलक्षण होने के कारण ही वह अचिन्त्य है [उसका चिन्तन नहीं किया जा सकता] भेद अभेद या अचिन्त्यत्वादि किसी भी रूप से उसका निर्वचन हो ही नहीं सकता। कार्योत्पत्तेः पुरा शक्तिर्निगूढा मृद्यवस्थिता। कुलालादिसहायेन विकाराकारतां व्रजेत् ॥३२॥ मिट्टी की शक्ति घटादि कार्य की उत्पत्ति से पहले तो मिट्टी में छिपी पड़ी रहती है [इस कारण प्रकट नहीं होती] कुलाल दण्ड चक्र आदि की सहायता जब उस शक्ति को मिल जाती है तब वह विकार [कार्य] के आकार की हो जाती है। पृथुत्वादिविकारान्तं स्पर्शादिं चापि मृत्तिकाम्। एकीकृत्य घटं प्राहुः विचारविकला जनाः ॥३३॥ जो लोग विचारहीन हैं, वे पृथुत्वादिरूपी कार्य को, तथा शब्दस्पर्शादिरूपी मिट्टी को, अपने अविचार के कारण एक [वस्तु] बना कर उसे 'घट' कहने लगते हैं।

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१३

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१३ विचार करें तो उन्हें मोटा और गोल रूप अलग दिखाई दे तथा स्पर्शादिरूपी मिट्टी अलग दीखने लगे और घट नाम की कोई वस्तु ही वहाँ न रह जाय । ] कुलालव्यापृतेः पूर्वो यावानंशः स नो घटः । पश्चात्तु पृथुबुध्नादिमत्वे युक्ता हि कुम्भता ॥३४॥ [घट के व्यवहार के अविचारमूलक होने का कारण यह है कि] कुलाल के व्यापार से पहले जो मिट्टी का भाग है, वह तो घट है ही नहीं। कुलाल आकर जब मिट्टी पर कुछ व्यापार कर लेता है और जब मोटे गोल आदि आकार वाली कोई चीज़ बन जाती है तब उसे ही ‘घट’ कहना ठीक हो जाता है । स घटो न मृदो भिन्नो वियोगे सत्यनीक्षणात् । नाप्यभिन्नः पुरा पिण्डदशायामनवेक्षणात् ॥३५॥ वह घड़ा मिट्टी से भिन्न नहीं है। क्योंकि मिट्टी से पृथक् करके उसे देखा ही नहीं जा सकता। और न वह घड़ा मिट्टी से अभिन्न ही होता है, क्योंकि पहले जब पिण्डदशा थी तब तो वह दीखता ही नहीं था। [यों वह घड़ा पारमार्थिक पदार्थ नहीं है, उसे तो अनिर्वचनीय शक्ति ने बना कर खड़ा कर दिया है।] अतोऽनिर्वचनीयोऽयं शक्तिवत् तेन शक्तिजः । अव्यक्तत्वे शक्तिरुक्ता, व्यक्तत्वे घटनामभृत् ॥३६॥ इस कारण जैसे शक्ति अनिर्वचनीय है, वैसे ही घट भी अनिर्वचनीय है। इसी से कहते हैं कि यह ‘घट’ शक्ति से ही उत्पन्न हुआ है। किसी को ‘शक्ति’ और किसी को ‘घट’ कहने ३४

५१४ • पञ्चदशी का कारण यह है कि--जब तक अव्यक्त अवस्था रहती है, तब तक उसे 'शक्ति' कहते हैं। जब व्यक्तावस्था आ जाती है तब उसी का 'घट' नाम पड़ जाता है। ऐन्द्रजालिकनिष्ठापि माया न व्यज्यते पुरा । पश्चाद् गन्धर्वसेनादिरूपेण व्यक्तिमाप्नुयात् ॥३७॥ ऐन्द्रजालिक में रहने वाली माया भी मणिमन्त्रादि का प्रयोग करने से पहले पहले व्यक्त नहीं होती। पीछे से तो गन्धर्व सेना आदि के रूप से प्रकट हो जाया करती है [इससे यह समझ लो कि माया पहले अप्रकट रहती है और पीछे से प्रकट हो जाती है।] एवं मायामयत्वेन विकारस्यानृतात्मताम् । विकाराधारमृद्वस्तुसत्यत्वं चाब्रवीच्छ्रुतिः ॥३८॥ 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छा० ६-४-१) इस श्रुति ने इसी सब विचार को लेकर मायामय [अर्थात् माया का कार्य] होने से, विकार [अर्थात् कार्यों] को तो अनृत [मिथ्या] कहा है तथा घटादि विकारों के आधार मिट्टी की ही सत्यता का वर्णन किया है। वाङ्निष्पाद्यं नाममात्रं विकारो,नास्य सत्यता । स्पर्शादिगुणयुक्ता तु सत्या केवलमृत्तिका ॥३९॥ ‘वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छा०६-४-१) इस श्रुति ने कहा है कि ये जितने कार्य दीख रहे हैं ये सब वाणी से बोले जान वाले नाम ही नाम तो हैं। ये घटादि कार्य सत्य नहीं हैं (नाम के सिवाय इनका पारमार्थिक रूप कुछ भी

[Header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१५

[Header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१५ नहीं है)। [इन घटादि कार्यों का आधार बनी हुई] स्पर्श आदि गुणवाली केवल मिट्टी ही सत्य पदार्थ है। व्यक्ताव्यक्ते तदाधार इति त्रिष्वाद्ययोर्द्वयोः। पर्यायः कालभेदेन, तृतीयस्त्वनुगच्छति ॥४०॥ 'व्यक्त', 'अव्यक्त' तथा 'इन दोनों का आधार' ये तीन ही पदार्थ हैं। [घट आदि कार्य व्यक्त कहाते हैं। इन कार्यों की कारण शक्ति अव्यक्त कही जाती है। कार्य और शक्ति इन दोनों का 'आधार' मिट्टी होती है]। इन तीनों में पहले दोनों [कार्य तथा शक्ति] का कालभेद से पर्याय [क्रम] रहता है। [कभी कार्य होता है और कभी शक्ति रहती है। शक्ति और कार्य ये दोनों ही कादाचित्क हैं। इसी से ये मिथ्या या अनृत कहे जाते हैं]। किन्तु इन दोनों का आधार तीसरा पदार्थ जो मिट्टी आदि है वह तो दोनों में ही अनुगत रहता है [वह मिट्टी कार्यावस्था में भी रहती है और शक्ति काल में भी बनी रहती है। यों त्रिकालस्थायी होने से वही सत्य तत्व है]। निस्तत्त्वं भासमानं च व्यक्तमुत्पत्तिनाशभाक्। तदुक्तौ तस्य नाम वाचा निष्पाद्यते नृभिः ॥४१॥ व्यक्त कहाने वाले घटादि पदार्थ यद्यपि निस्तत्व [अर्थात् स्वरूप से असत्] हैं तो भी भासा करते हैं। इनके उत्पत्ति और विनाश भी रहते हैं। जब ये उत्पन्न हो जाते हैं तब मनुष्य शब्दों में इनका नाम रख लेते हैं। [इन्हीं सब कारणों से इन विकारों (कार्यों) को 'असत्य' कहा जाता है।] व्यक्ते नष्टेऽपि नामैतन्नृवक्त्रेष्वनुवर्तते। तेन नाम्ना निरूप्यत्वाद् व्यक्तं तद्रूपमुच्यते ॥४२॥

व्यक्त [ कार्य ] पदार्थ जब नष्ट भी हो जाते हैं तब भी [उन कार्यों से अभिन्न] यह नाम, नाम लेने वाले आदमियों की जिह्वा पर चढ़ा रह जाता है। अब तो वह व्यक्त [ कार्य ] पदार्थ वाणी से लिये जाने वाले केवल उस नाम से ही निरूपणीय [ व्यवह्रियमाण ] रह जाता है [ उसके व्यवहार का अब कोई साधन नहीं रह जाता ] इस कारण वह तद्रूप [अर्थात् नाम के ही रूप वाला किंवा नामात्मक ] कहलाने लगता है । भाव यह है कि—विवादास्पद जो घट है वह घटशब्द- रूप ही होना चाहिये, क्योंकि उसका व्यवहार ठीक इसी प्रकार घटशब्द से होता है जिस प्रकार घट इस शब्द का व्यवहार घट शब्द से होता है। यों व्यक्त पदार्थ नामात्मक होते हैं। निस्तत्त्वाद् विनाशित्वाद् वाचारम्भणनामतः । व्यक्तस्य न तु तद् रूपं सत्यं किञ्चिन्मृदादिवत् ॥४३॥ व्यक्त घटादि कार्यों का मोटा गोल आदि जो रूप [ या आकार ] हमें दीखता है वह कुछ भी, जैसे मिट्टी सत्य है, वैसे सत्य नहीं हैं। क्योंकि वह आकार तो निस्तत्त्व है [उसका वास्तव रूप तो कुछ भी नहीं है ] विनाशी है [ मिट्टी के रहते रहते ही वह तो नष्ट हो जाता है ] तथा वाणी से कहा हुआ एक शब्द मात्र ही तो है। यदि यह आकार असत्य न होता तो जैसे मिट्टी आदि निस्तत्त्व नहीं है, विनाशी नहीं है या केवल नाम मात्र ही नहीं हैं ऐसे ही यह भी होते । व्यक्तकाले ततः पूर्वमूर्ध्वमप्येकरूपभाक् । सतत्त्वमविनाशं च सत्यं मृद्वस्तु कथ्यते ॥४४॥ व्यक्त पदार्थ की स्थिति के समय, व्यक्त पदार्थ की उत्पत्ति

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१७

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१७ से पहले, तथा व्यक्त के नष्ट हो जाने के बाद, यों तीनों ही कालों में एक रूप रहने वाला मिट्टी नाम का पदार्थ, सत्यत्व [अर्थात् वास्तवरूप वाला] तथा विकार के साथ नष्ट न होने वाला सत्य- पदार्थ कहाता है। व्यक्तं घटो विकारश्चेत्येतै र्नामभिरीरितः। अर्थश्चेदनृतः कस्मान्न मृद्बोधे निवर्तते ॥४५॥ शंका—व्यक्त घट या विकार इन तीन नामों [शब्दों] से कहा हुआ कार्य नाम का पदार्थ यदि अनृत है [यदि वह कारण से भिन्न कोई चीज़ नहीं है] तो यह बताओ कि मिट्टी रूपी कारण का ज्ञान हो जाने पर उसकी निवृत्ति क्यों नहीं हो जाती है ? निवृत्त एव, यस्मात् ते तत्सत्यत्वमतिर्गता । ईदृङ्निवृत्तिरेवात्र बोधजां, नत्वभासनम् ॥४६॥ इसका उत्तर यह है कि—ज्ञान हो जाने पर उसकी निवृत्ति तो हो ही जाती है। क्योंकि अब तुमने घटादियों को सत्य समझना छोड़ दिया है। [इन सोपाधिक भ्रमस्थलों में तो ] बोध से ऐसी ही निवृत्ति मानी गई है [कि इनकी सत्यत्व बुद्धि जाती रहे] इनके स्वरूप की प्रतीति होनी ही बन्द हो जाय यह बात [सोपाधिक भ्रमस्थलों में] ज्ञान से कदापि नहीं होती। [हां रज्जु सर्पादि के निरुपाधि भ्रमस्थलों में तो यही होता है कि सर्पादि रूप का भान होना ही बन्द हो जाता है।] पुमानधोमुखो नीरे भातोऽप्यस्ति न वस्तुतः । तटस्थमर्त्यवत्तस्मिन्नैवास्था कस्यचित् क्वचित् ॥४७॥ [सोपाधि भ्रम का दृष्टान्त देखलो कि]—जल में नीचे को

५१८ पञ्चदशी

मुख किए हुए जो आदमी दीखता है वह वस्तुतः नहीं होता । क्योंकि ज्ञानी या अज्ञानी कोई भी उस छायापुरुष को, किनारे पर खड़े हुए पुरुष की तरह, कभी कहीं भी सत्य नहीं मान लेता [वह समझ लेता है कि जलरूपी उपाधि के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा है। जब तक जलरूपी उपाधि बनी है तब तक ऐसी मिथ्या प्रतीति होती ही रहेगी। इसी प्रकार सर्वकारण आत्म- तत्त्व का ज्ञान हो जाने पर, विवेकी पुरुष इस जगत् को मिथ्या मान लेता है। उसके बाद फिर जब उसे यह जगत् भासता है तब वह इसे इन्द्रियोपाधिक भ्रम समझ कर टालता रहता है। वह जान लेता है कि जब तक ये इन्द्रियें बनी हैं, तब तक ऐसी प्रतीति होती ही रहेगी। वह फिर इसको सत्य मानकर कोई व्यवहार नहीं करता । सोपाधिक भ्रमों का यही हाल होता है।] ईदृग्बोधे पुमर्थत्वं मतमद्वैतवादिनाम् । मृद्रूपस्यापरित्यागाद् विवर्तत्वं घटे स्थितम् ॥४८॥ ऐसा बोध हो जाने को ही अद्वैतवादी पुरुषार्थ मानता है। [उसके मत में आनन्दात्मा से भिन्न सभी कुछ को मिथ्या समझ लेने पर ही अद्वितीय आनन्द की अभिव्यक्ति हो सकती है ] जब तक सांसारिक पदार्थों के सत्य होने की वासना नहीं टल जाती तब तक अद्वैतानन्द प्रकट होता ही नहीं। देखो, घट की मिट्टी ने, घट बन जाने पर भी, अपने मृद्रूप का परित्याग नहीं किया है, इस कारण यह घट मिट्टी का विवर्त है। [यही कारण है कि मिट्टी का ज्ञान हो जाने पर घट के सत्यत्व की बुद्धि निवृत्त हो जाती है]

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१९

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५१९ परिणामे पूर्वरूपं त्यजेत् तत् क्षीररूपवत् । मृत्सुवर्णे निवर्तेते घटकुण्डलयो र्न हि ॥४९॥ [घट को मिट्टी का परिणाम नहीं मान सकते क्योंकि।] जिन दुग्धादि में परिणाम माना जाता है, उन में तो पूर्वरूप का त्याग कर दिया जाता है। [परन्तु विवर्त के उदाहरण ] घट और कुण्डल के बन जाने पर भी उनके उपादान कारण मिट्टी और सुवर्ण, उन में से निवृत्त नहीं हो जाते हैं। [यह बात लोक में प्रसिद्ध ही हैं]। घटे भग्ने न मृद्भावः कपालानावेक्षणात् । मैवं चूर्णेऽस्ति मृद्रूपं स्वर्णरूपं त्वतिस्फुटम् ॥५०॥ [यदि कहो कि—] घट के टूट जाने पर तो मृद्भाव नहीं पाया जाता। क्योंकि घट के फूट जाने पर तो कपाल देखे जाते हैं। तो हम कहेंगे कि यह कथन ठीक नहीं। क्योंकि चूरा हो जाने पर—जबकि कपाल भी नहीं रहते तब—मिट्टी को देखा जा सकता है। इस कारण घट को मिट्टी का विवर्त ही मानना चाहिये। सोने में तो यह आक्षेप चल भी नहीं सकता क्योंकि कुण्डल आदि के टूट जाने पर भी सोने का स्वरूप तो अत्यन्त स्पष्ट दीखता ही रहता है। क्षीरादौ परिणामोऽस्तु पुनस्तद्भाववर्जनात् । एतावता मृदादीनां दृष्टान्तत्वं न हीयते ॥५१॥ जब दूध का दही बन जाता है तब फिर वह लौट कर दूध नहीं बन सकता। इस कारण क्षीरादि में तो परिणाम मानना पड़ता है परन्तु इतने मात्र से [क्षीरादि के परिणामी होने से ] मिट्टी आदि के विवर्त का दृष्टान्त होने में कुछ बिगड़ नहीं जाता।

[भाव यह है कि पूर्वरूप को छोड़कर दूसरी अवस्था को प्राप्त होने के कारण दुग्धादि तो केवल परिणामी ही हैं। मिट्टी और सुवर्ण तो अवस्थान्तर को भी पा लेते हैं और अपने पूर्वरूप को भी नहीं छोड़ते हैं इस कारण वे 'परिणामी' भी हैं और 'विवर्त्त' भी हैं]। आरम्भवादिनः कार्ये मृदो द्वैगुण्यमापतेत् । रूपस्पर्शादयः प्रोक्ताः कार्यकारणयोः पृथक् ॥५२॥ [ 'परिणाम' और 'विवर्त्त' दोनों बात मान लेने पर भी मिट्टी आदि को आरम्भक नहीं मानते क्योंकि ] आरम्भवादी [नैयायिक आदि] के मत में तो घट आदि कार्यों में मिट्टी आदि कारण द्रव्य दुगुने दुगुने हो जायेंगे !, [उनके मत में कार्याकार से रहने वाली और कारणाकार से रहने वाली दो मिट्टी हो जांयगी। फिर उन दोनों मिट्टियों में गुरुत्वादि भी दुगुने दुगुने हो जांयगे] क्योंकि आरम्भवादी लोग कार्य के रूपस्प- र्शादि अलग मानते हैं और कारण के रूपस्पर्शादि को अलग बताते हैं। [अर्थात् वे कार्य कारण का भेद मानने वाले हैं। इस दोष के कारण हमें आरम्भवाद तो सर्वथा माननीय नहीं है] मृत् सुवर्णमयश्चेति दृष्टान्तत्रयमारुणिः । प्राहातो वासयेत् कार्यानृतत्वं सर्ववस्तुषु ॥५३॥ छान्दोग्य उपनिषत् में उद्दालक नाम वाले अरुणपुत्र ने 'मिट्टी' 'सुवर्ण' और 'लोहा' ये तीन दृष्टान्त कार्यों के अनृत होने में दिये हैं। कई दृष्टान्त देने का भाव यही है कि जब बहुत से पदार्थों में कार्यों का अनृत होना पाया जा रहा है तब फिर भूत भौतिक सभी पदार्थों में कार्यों के मिथ्यापन की वासना साधक लोग किया करें।

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२१

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२१ कारणज्ञानतः कार्यविज्ञानं चापि सोऽवदत् । सत्यज्ञानेऽनृतज्ञानं कथमत्रोपपद्यते ॥५४॥ छान्दोग्य में उसी अरुणिने ‘यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्’ (छा० ६-१-४) इत्यादि वाक्यों में ‘कारण [मिट्टी आदि] के ज्ञान से घटादि सब कार्यों का ज्ञान हो जाता है’ ऐसा कहा है। इस पर प्रश्न यह होता है कि सत्य पदार्थ का ज्ञान हो जाने पर, उससे विलक्षण जो घटादि अनृत पदार्थ हैं उन का ज्ञान कैसे हो सकता है ? यह हमें समझाओ । समृत्कस्य विकारस्य कार्यता लोकदृष्टितः । वास्तवोऽत्र मृदंशोऽस्य बोधः कारणबोधतः ॥५५॥ अनृतांशो न बोद्धव्य स्तद्बोधानुपयोगतः । तत्त्वज्ञानं पुमर्थ स्या न्नानृतांशावबोधनम् ॥५६॥ लोक में मिट्टी के सहित घटादि विकार को ही कार्य कहते हैं [अकेले घटादि को नहीं] । सो इस कार्य में जो सच्चा मृद्भाग है इस सत्यांश का ज्ञान तो कारण के ज्ञान से ही हो जाता है । ५५। शेष रहा हुआ जो मिथ्या भाग है, वह तो ज्ञातव्य है ही नहीं। क्योंकि उसके ज्ञान का तो कुछ उपयोग ही नहीं होता । जो वस्तु तत्व है [ जिस वस्तु की बाधा नहीं होती ] उस वस्तु का ज्ञान किसी को हो, तो उससे ही जानने वाले का कुछ प्रयो- जन सिद्ध हो सकता है । इसी से तत्व ज्ञान को पुरुषार्थ माना गया है । अनृत भाग किंवा विकार को जानने का तो कुछ प्रयो- जन ही नहीं होता है ।

५२२ पञ्चदशी तर्हि कारणविज्ञानात् कार्यज्ञानमितीरिते । मृद्बोधान्मृत्तिका बुद्धेत्युक्तं स्यात् कोऽत्र विस्मयः ॥५७॥ पूर्वपक्षी पूछता है कि—'कारण [मिट्टी आदि] के ज्ञान से कार्य का [अर्थात् कार्य में जो मिट्टी आदि सत्य भाग है उस का ] ज्ञान हो जाता है' ऐसा कहने पर तो तुमने दूसरे शब्दों में यही बात [लौट फेर कर] कही कि—मिट्टी के बोध से मिट्टी का बोध हो जाता है । फिर बताओ कि तुमने विस्मय करने वाली नयी बात कौनसी कही । [यह तो तुम्हारा केवल शाब्दिक चमत्कार ही हुआ आर्थिक नहीं] । सत्यं कार्येषु वस्त्वंशः कारणात्मेति जानतः । विस्मयो मास्त्विहाज्ञस्य विस्मयः केन वार्यते ॥५८॥ इसका उत्तर यह है कि—कार्य घटादियों में जो वास्तव अंश है, वह कारणस्वरूप ही हे, ऐसा जो लोग जानते हैं, उन लोगों को विस्मय भले ही न हो । परन्तु जो अज्ञ हैं, जिन्हें तत्व ज्ञान नहीं है, उनको इस बात से जो विस्मय होता है, उसे कौन हटा सकता है ? आरम्भी परिणामी च लौकिकश्चैककारणे । ज्ञाते सर्वमिति श्रुत्वा, प्राप्नुवन्त्येव विस्मयम् ॥५६॥ आरम्भी [जो समवायी असमवायी और निमित्त कारणों से भिन्न कार्य को उत्पन्न हुआ मानते हैं] परिणामी [जो पूर्व- रूप का त्याग करके रूपान्तर की प्राप्ति रूपी परिणाम को मानते हैं] तथा लौकिक [जो इन दोनों प्रक्रियाओं को नहीं जानते केवल लोक व्यवहार में लिपटे पड़े हैं] ये तीनों ही जब यह सुनते हैं कि एक कारण के परिज्ञान से अनेक कार्यों का ज्ञान

[Header] ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२३

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हो जाता है तब इन तीनों को बड़ा विस्मय होता है । [ उनकी दृष्टि में यह एक बड़े ही अचम्भे की बात है कि एक के ज्ञान से सब का ज्ञान हो जाता हो अद्वैतेऽभिमुखीकर्तुमेवात्रैकस्य बोधतः । सर्वबोधः श्रुतौ, नैव नानात्वस्य विवक्षया ॥६०॥ छान्दोग्यश्रुति में जो एक कारण के विज्ञान से सब कार्यों का ज्ञान होना कहा है उसमें कार्यों के नानात्व की विवक्षा नहीं है । उसका यह मतलब नहीं है कि हमारे पाठकों को कार्यों की अनेकता का परिज्ञान कराया जाय किन्तु उनका अभि- प्राय तो केवल इतना ही है कि अद्वैतज्ञान की ओर अधिकारियों को अभिमुख कर दिया जाय [ इस महाफल का लालच दिखा कर उन्हें अद्वैतज्ञान की ओर को आकृष्ट किया जाय यही उनका अभिप्राय है । एकमृत्पिण्डविज्ञानात् सर्वमृन्मयधीर्यथा । तथैकब्रह्मबोधेन जगद्बुद्धिर्विभाव्यताम् ॥६१॥ प्रकृत तात्पर्य तो यह हुआ कि—घटादि पदार्थ जिस के बनते हैं, उस एक मिट्टी के पिण्ड को जान लेने से, मिट्टी के बने हुए घटादि सभी पदार्थों का बोध जैसे हो जाता है, इसी प्रकार सब के उपादान एक ब्रह्म को जान लेने पर, उसी से बने हुए इस सकल जगत् का बोध हो ही जाता है यह भी जानलो । सच्चित्सुखात्मकं ब्रह्म, नामरूपात्मकं जगत् । तापनीये श्रुतं ब्रह्म सच्चिदानन्दलक्षणम् ॥६२॥ ब्रह्मतत्व तो सत् चित् आनन्द स्वरूप है और यह जगत्

नामरूपात्मक है 'ब्रह्मैवेदं सर्वं सच्चिदानन्दमात्रम्' इत्यादि उत्तर- तापनीय उपनिषद् में ब्रह्म को सच्चिदानन्दस्वरूप बताया है। सद्रूपमारुणिः प्राह, प्रज्ञानं ब्रह्म बह्वृचः । सनत्कुमार आनन्दमेवमन्यत्र गम्यताम् ॥६३॥ अरुण के पुत्र उद्दालक मुनि ने सदेव सोम्येदमग्र आसीत् इत्यादि छान्दोग्य श्रुति में ब्रह्म के सद्रूप का वर्णन किया है। बह्वृच शाखा वालों ने ऐतरेय उपनिषत् में 'प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म (ऐत० ५-१) इत्यादि में ब्रह्म को ज्ञानरूप कहा है। छान्दोग्य श्रुति में सनत्कुमार ने नारद के प्रति 'यो वै भूमा तत्सुखम्' (छा०७- २३) इत्यादि वाक्यों के द्वारा ब्रह्म को आनन्दरूप बताया है। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझलो । [तैत्तिरीय आदि श्रुतियों में भी 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' (तै० ६-६) इत्यादि वाक्यों के द्वारा ब्रह्म के इन तीनों स्वरूपों का जहां तहां वर्णन आता है]। विचिन्त्य सर्वरूपाणि कृत्वा नामानि तिष्ठति । अहं व्याकरवाणीमे नामरूपे इति श्रुतेः ॥६४॥ सर्वाणि रूपाणि विचिन्त्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते तथा अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि (छा०६-३-२) इन श्रुतियों में जगत् के स्रष्टव्य नामरूपों को भी दिखाया गया है [ सच्चिदानन्द तत्व के होने में जैसे श्रुति प्रमाण है वैसे ही नाम और रूप की बताने वाली भी श्रुतियें हैं यही इस श्लोक का भाव है ] अव्याकृतं पुरा सृष्टेरूर्ध्वं व्याक्रियते द्विधा । अचिन्त्यशक्तिर्मायैषा ब्रह्मण्यव्याकृताभिधा ॥६५॥ तद्धेदं तर्ह्यव्याकृत मासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्यक्रियतौसौनामायमिदं

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२५

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२५ रूप इति (बृ. १-४-७) इस श्रुति में कहा गया है कि—सृष्टि से पहले यह सब जगत् अव्याकृत था [ अर्थात् इस का नाम और इसका रूप अप्रकट दशा में था ] सृष्टि बन चुकने पर वह जगत् दो प्रकार से [ अर्थात् वाच्य वाचक भाव से ] व्यक्त हो गया है। तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् (बृ. १-४-७) इस वाक्य के अव्याकृत शब्द से ब्रह्म में रहने वाली यह अचिन्त्यशक्ति माया ही ली गयी है। [ इस श्रुति का अव्याकृत शब्द इस माया को ही कह रहा है ]। अविक्रियब्रह्मनिष्ठा विकारं यात्यनेकधा । मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ॥६६॥ [ 'तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियते' इस श्रुतिखण्ड का भाव इस श्लोक में दिखाया गया है ] अव्याकृत नाम की वही माया, अविक्रिय ब्रह्म में रहती रहती ही, अनेक रूप से परिणाम को प्राप्त होती आती है [ यह भूत भौतिक सभी प्रपंच उसी अव्या- कृत नाम वाली माया का विकार किंवा परिणाम है ] मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इस श्रुति में कहा है कि पूर्वोक्त 'माया' को प्रकृति अर्थात् उपादान कारण जानना चाहिये। माया का आश्रय होने के कारण जो 'मायी' कहाता है उसको महेश्वर अर्थात् माया का नियामक मान लो। [ माया और मायी सर्वथा भिन्न भिन्न प्रकार के हैं ] आद्यो विकार आकाशः सोऽस्ति भात्यपि च प्रियः। अवकाशस्तस्य रूपं तन्मिथ्या न तु तत् त्रयम् ॥६७॥ मायोपहित ब्रह्म का सब से पहला विकार [कार्य] आकाश ही है। वह 'अस्ति' 'भाति' और 'प्रिय' रूप

५२६ पञ्चदशी नन्दस्वरूप ] है । अवकाश उसका अपना निजी स्वरूप है । उसका जो यह निजीरूप है यही मिथ्या है । पहले कहे हुए वे तीनों रूप मिथ्या नहीं होते । न व्यक्तेः पूर्वमस्त्येव न पश्चाच्चापि नाशतः । आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत् तथा ॥६८॥ आकाश का जो वह अवकाश नाम का चौथा रूप है, वह आकाश के व्यक्त होने से पहले भी नहीं था और नाश हो जाने के पश्चात् भी न रहेगा । इस कारण वह तो मिथ्या ही है । विचार कर देख लो कि—आदि और अन्त में जो बात नहीं रहती वह मध्य में भी नहीं होती । [ भाव यह कि उत्पत्ति और विनाश के बीच बीच में प्रतीत होने वाला यह अवकाश असत् पदार्थ है ] अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येवेत्याह कृष्णोऽर्जुनं प्रति ॥६९॥ अर्जुन के प्रति कृष्ण भगवान् ने भी यही कहा है कि—ये भूत पहले भी अव्यक्त थे। हे भारत ! ये बीच में कुछ काल के लिये व्यक्त हो गये हैं। अन्त में जाकर ये फिर अव्यक्त में लीन हो जायेंगे। मृद्वत् ते सच्चिदानन्दा अनुगच्छन्ति सर्वदा । निराकाशे सदादीना मनुभूति र्निजात्मनि ॥७०॥ घटादि कार्यों में जैसे मिट्टी तीनों कालों में अनुगत रहती है, इसी प्रकार वे सच्चिदानन्द नाम के तीनों रूप, सदा अनुगत रहते हैं। जब आकाश नहीं रहता—

जाते हैं] तब भी इन सच्चिदानन्द धर्मों का अनुभव अपने आत्मा में तो होता ही रहता है । अवकाशे विस्मृतेऽथ तत्र किं भाति ते वद । शून्यमेवेति चेदस्तु नाम तादृग् विभाति हि ॥७१॥ [ उसी का स्पष्टीकरण ] बताओ कि—जब तुम अवकाश को भूल जाते हो तब तुम्हें क्या भान होता रहता है ? यदि कहो कि शून्य का भान होता है तो हम कहेंगे कि अच्छा यों ही सही। तुम उसका नाम शून्य ही रख लो । वैसे तो अवकाशाभाव रूपसे प्रतीत होने वाली वह कोई वस्तु प्रतीत तो होती ही है । तादृक्त्वादेव तत्सत्व मौदासीन्येन तत् सुखम् । आनुकूल्यप्रातिकूल्यहीनं यत्तन्निजं सुखम् ॥७२॥ [ शून्य नजर आता है ऐसा तुम कहते हो] तादृक्पने के कारण अर्थात् उपर्युक्त रूप से प्रतीत होने के कारण ही उसकी सत्ता तो सिद्ध हो ही जाती है [ उसका स्वरूप तो मानना ही पड़ता है ] उस समय उदासीनावस्था होने के कारण वह तत्व सुख ही है । जो तत्व अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो वही तो निज सुख होता है । आनुकूल्ये हर्षधीः स्यात् प्रातिकूल्ये तु दुःखधीः । द्वयाभावे निजानन्दो निजदुःखं न तु क्वचित् ॥७३॥ आनुकूल्य हो तो हर्ष होता है । प्रातिकूल्य जान पड़े तो दुःख होता है । जब तो आनुकूल्य या प्रातिकूल्य कुछ भी प्रतीत नहीं होता तब 'निजानन्द' भासने लग पड़ता है । निजानन्द की तरह निज दुःख भी होता होगा ऐसी शंका मत करो। क्योंकि दुःख में निजपना तो कहीं देखा ही नहीं जाता ।

५२८ पञ्चदशी निजानन्दे स्थिरे हर्षशोकयो र्व्यत्ययः क्षणात् । मनसः क्षणिकत्वेन तयोर्मानसतेष्यताम् ॥७४॥ यह निजानन्द तो स्थिर ही है [यह तो सदानन्दरूप ही है] इसलिये सदा हर्ष ही हर्ष रहना चाहिये । शोक कदापि न होना चाहिये । फिर भी जो क्षण क्षण में हर्ष शोक का व्यत्यय होता रहता है वह [उस निजानन्द को ग्रहण करने वाले] मन के क्षणिक होने से होता है । मन के क्षणिक होने से उससे गृहीत होने वाले हर्ष और शोक भी क्षणिक ही हैं और क्षणिक होने के कारण ही ये हर्ष तथा शोक मानस माने जाते हैं । आकाशेऽप्येवमानन्दः सत्ताभाने तु संमते । वाय्वादिदेहपर्यन्तं वस्तुष्वेवं विभाव्यताम् ॥७५॥ जैसे आत्मा में आनन्द रहता है इसी प्रकार आकाश में भी आनन्द रहता है । आकाश में के उसी आनन्द की प्रतीति अवकाश के विस्मरण हो जाने पर निजात्मा में होती है । यह बात यहां तक सिद्ध की गयी । आकाश में 'सत्ता' तथा 'भान' भी रहते हैं परन्तु उस का प्रतिपादन हम नहीं करते, क्योंकि उन्हें तो तुम भी मानते ही हो । आकाश में जिस तरह सच्चिदा- नन्द धर्म रहते हैं इसी तरह वायु से लेकर शरीरपर्यन्त पदार्थों में भी यही बात समझ लेना कि उनमें भी सच्चिदानन्द धर्म हैं। गतिस्पर्शौ वायुरूपं वह्ने र्दाहप्रकाशने । जलस्य द्रवता भूमेः काठिन्यं चेति निर्णयः ॥७६॥ सच्चिदानन्द धर्म तो सबमें हैं ही। परन्तु गति तथा स्पर्श वायु का निज रूप हैं। अग्नि के निज रूप दाह तथा प्रकाश हैं। जल का निज रूप द्रवत्व है । भूमि का निजरूप कठिनता होती है ।

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२९

ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्दप्रकरणम् ५२९ असाधारण आकार ओषध्यन्नवपुष्यपि । एवं विभाव्यं मनसा तत्तद्रूपं यथोचितम् ॥७७॥ ओषधि अन्न तथा शरीरों में भी उन उन का असाधारण आकार होता ही है । उन उन के उचित रूप को अपने मन से समझ लेना चाहिये । अनेकधा विभिन्नेषु नामरूपेषु चैकधा । तिष्ठन्ति सच्चिदानन्दा विसंवादो न कस्यचित् ॥७८॥ सब वस्तुओं में नाम रूप तो भिन्न भिन्न होते ही हैं परन्तु सच्चिदानन्द नाम के धर्म सब में एक रूप ही होते हैं । इसमें किसी भी विवेकी को विसंवाद नहीं है । निस्तत्वे नामरूपे द्वे जन्मनाशयुते च ते । बुद्ध्या ब्रह्मणि वीक्षस्व समुद्रे बुद्बुदादिवत् ॥७९॥ इन दीख पड़ने वाले नामरूपों की गति हमसे पूछो तो हम कहेंगे कि—ये दोनों नाम रूप तो 'निस्तत्व' किंवा कल्पित ही हैं । क्योंकि इनके जन्म और नाश [वार बार] होते ही रहते हैं । समुद्र में जैसे बुलबुलों को देखते हो, इसी प्रकार इन नाम रूपों को बुद्धि के सहारे ब्रह्मतत्व में ही देखा करो । सच्चिदानन्दरूपेऽस्मिन् पूर्णे ब्रह्मणि वीक्षिते । स्वयमेवावजानाति नामरूपे शनैः शनैः ॥८०॥ जब कोई अधिकारी इस पूर्ण सचिदानन्द ब्रह्म को बुद्धि से देख पाता है [ बुद्धि का उड़ान मारकर सब जगह देख आता है ] तब फिर वह धीरे धीरे नाम रूपों की अवज्ञा करने लग पड़ता है [ उसे फिर यह सब पसारा नहीं भाता किन्तु उसे तो कारण तत्व ही प्यारा लगने लगता है ।] ३५