पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ध्यानदीप का संक्षेप ६९ प्राय से श्रुति ने हिरण्यनिधि का दृष्टान्त दिया है। भूगर्भ विद्या को न जानने वाले लोग हिरण्यनिधि के ऊपर घूमते रहने पर भी उसे पा नहीं सकते। इसी प्रकार ये सारी प्रजायें प्रतिदिन ब्रह्म के पास जाती हैं, परन्तु [ विषयवासना रूपी ] अनृत से ढकी रहने के कारण, उसको पहचान नहीं सकतीं। किसी यति के लिये तो बीता हुआ महिषी का स्नेह ही ज्ञान में प्रतिबन्ध हो रहा था और उसे तत्वज्ञान नहीं हो पाया था। उसके महिषी के स्नेह का अनु- सरण करके ही जब उसे तत्व का उपदेश किया गया तब प्रति- बन्ध का क्षय हो जाने पर उसे यथार्थ ज्ञान हुआ। वर्तमान प्रतिबन्ध चार प्रकार का होता है एक विषयासक्ति दूसरा बुद्धि की मन्दता तीसरा कुतर्क चौथा अपने विपरीत- ज्ञान पर अड़ कर बैठ जाना कि 'यही ठीक है।' शमदमादि श्रवणमननादि उपायों से [ जो भी जिस जिस प्रतिबन्ध को हटाने में उपयुक्त है ] उस उस प्रतिबन्ध के हट जाने पर अपना ब्रह्म- भाव हाथ आ जाता है। जन्मान्तर दिलाने वाला जो आगामी प्रतिबन्ध होता है, जिसको प्रारब्धशेष भी कहते हैं, यह तो भोग के बिना क्षीण नहीं हो पाता। यही कारण है कि उस आगामी प्रतिबन्ध की निवृत्ति का समय नियत नहीं किया जा सकता कि—इतने दिनों में आगामिप्रतिबन्ध नष्ट हो जायगा। वह प्रतिबन्ध वामदेव का तो एक जन्म में ही क्षीण हो गया था। भरत को तो इसमें तीन जन्म धारण करने पड़े थे। गीता में तो यहां तक कहा है कि जो योगभ्रष्ट हो जाते हैं—[ जो तत्व साक्षात्कार पर्यन्त विचार नहीं कर पाते। जिन का विचार बीच में ही छूट जाता है ] उनके प्रतिबन्ध का क्षय होने में कभी कभी बहुत जन्म लग जाते हैं। परन्तु ध्यान रहे कि इस रुकावट के
कारण उनका विचार निरर्थक नहीं हो जाता है । ज्यों ही उनका प्रतिबन्ध हटता है त्यों ही उन्हें आत्मज्ञान हो जाता है । गीता में यह भी कहा है कि—योगभ्रष्ट लोगों को आत्मविचार के प्रभाव से पुण्यकारी लोगों को मिलने वाले स्वर्गादि लोक मिलते हैं । फिर भी यदि कोई अभिलाषा रह गयी हो तो वे पवित्र श्रीमानों के कुल में जन्म लेते हैं [ और वहां अपनी अभिलाषा को पूरा कर लेते हैं । ] यदि वे आत्म तत्व के विचार के प्रभाव से निःस्पृह हो गये हों तो लौटकर योगियों के कुल में ही जन्म लेते हैं । किन्तु ऐसा जन्म बड़ा ही दुर्लभ होता है। यह थोड़े पुण्यों से किसी को नहीं मिलता । क्योंकि ऐसा योगभ्रष्ट इस कुल में आते ही उसी पहले वाले बुद्धिसंयोग को पा जाता है । वैसा 'बुद्धियोग' उसे योगी मां- बापों से दायभाग के रूप में मिल जाता है । फिर तो वह पहले से भी दूने उत्साह से प्रयत्न करने लग पड़ता है । उसका पूर्वा- भ्यास उसे बलात् अपनी ओर खेंच ले जाता है । यों सिद्ध होने में अनेक जन्म लग जाते हैं । यदि तो किसी को ब्रह्मलोक को पाने की इच्छा हो और वह उसे वहीं दाबकर—तत्त्वज्ञान से उसको न उखाड़ कर—आत्मविचार करने लगे तो वह भी साक्षा- त्कार नहीं कर पाता । वह फिर कल्पान्त के समय इस जगत् के समष्टि अभिमानी के साथ मुक्त होता है,ऐसा शास्त्र का अभिप्राय है। कई तो ऐसे होते हैं कि उनके सांसारिक धन्धे उन्हें अपने आपे के विचार का अवसर ही नहीं आने देते। इस शरीर की दासता और मन की चाकरी में यदि उनके आठों पहर बीत जायँ तो वे घब- राते नहीं। परन्तु जिसकी कृपा से यह मट्टी का पुतला चलता फिरता है, उस अन्दर छिपे हुए प्राणाधीश की मीमांसा के लिये उन्हें एक क्षण का भी अवकाश नहीं मिलता । इतनी ही क्यों !
ध्यानदीप का संक्षेप ७१ जो लोग इस आत्मतत्व का विचार करते हैं उन्हें वे निकम्मा और मूढ़ समझते हैं। वे उनके सहवास को भी यथाशक्ति टाला करते हैं। ऐसे लोगों को ध्यान में रखकर ही तो कठ में कहा है कि बहुत से पापियों को तो वह परात्मतत्व सुनने को भी नसीब नहीं होता। जिस श्रद्धालु की बुद्धि अतिमन्द हो, जिसे अध्यात्मदर्शी गुरु हाथ न लगे, या अनुकूल देश कालादि न मिल सके, वह इतना ही करे कि दिन रात ब्रह्मोपासना (प्रणवाभ्यास) ही करता रहे। निर्गुण ब्रह्म की उपासना की रीति यह है कि उसके ज्ञान को बार बार दोहराता रहे। शैव्य प्रश्न के उत्तर में तापनीय उपनिषत् में निर्गुणोपासना का कथन किया है। प्रश्न उपनिषत् में त्रिमात्र ओंकार की उपासना का वर्णन आया है। कठ और माण्डूक्य में भी इसी निर्गुणोपासना का समुल्लेख पाया जाता है। निर्गुण उपा- सना को कैसे करें ? यह यदि जानना हो तो आद्य शंकराचार्यजी के पंचीकरण नाम के पुस्तक को देखना चाहिये। एक बात इसमें ध्यान रखने योग्य है कि सारी शाखाओं में निर्गुण ब्रह्म के जितने गुण आये हैं, उन सब का उपसंहार इस उपासना में कर लेना चाहिये। उसमें 'आनन्द' 'सत्' 'चित्' 'पूर्ण' आदि जितने विधेय गुण हैं या अस्थूल अनणु, अह्रस्व, अदीर्घ आदि जितने भी निषेध्य गुण हैं उन सभी का उपसंहार इसमें साधक को कर लेना चाहिये। ऐसा न हो कि किसी एक प्रकरण में जिन गुणों का वर्णन आया है केवल उन्हीं गुणों के आधार पर इस उपासना को करने लगें। उपासना करते हुए यह कभी न भूलें कि आनन्द आदि विधेय और अस्थूलादि निषेध्य गुणों से एकमात्र अखण्ड आत्मतत्व ही लक्षित होता है। इन सबसे जो तत्व लक्षित होता है 'वही तत्व
७२ पञ्चदशी मैं हूँ' ऐसा ध्यान साधक को यथाशक्ति आठों पहर रहना चाहिये । अब बोध और उपासना का भेद भी सुन लीजिये—बोध तो वस्तु के अधीन होता है। इसके विपरीत उपासना उपासक के हाथ की बात होती है। बोध की उत्पत्ति विचार से होती है— साधक न भी चाहे तो भी वस्तु के सामने आने पर बोध होता ही है। उसे वह रोक नहीं सकता। वह बोध रूपी दिवाकर जब उदय होता है तब इस सब संसार की सत्यता को भस्मसात् करके छोड़ता है। जब इतना हो चुकता है तब साधक कृतकृत्य हो जाता है। उसके बाद उसे नित्य तृप्ति रहने लगती है। अब वह जीवन्मुक्त हो जाता है। अब तो वह प्रारब्धक्षय की बाट जोहने लगता है कि 'यह कब समाप्त होगा' । ऐसा परमपद यदि किसी को पाना हो तो वह गुरु के उप- देश पर विश्वास करे। उस पर किसी प्रकार का भी संशय न करे और अपने उपास्य का निरन्तर ऐसा विचार करे कि—इस चिन्तन के बीच में, अन्य किसी भी विषय का विचार तक न आने दे। चिन्ता करते करते अन्त में ऐसी अवस्था आ जायगी कि साधक को स्वयं ही यह भान होने लगेगा कि ओहो ! यह चिन्त्यस्वरूप तो मैं ही हूँ। यहां पहुंचते ही साधक का चिन्तन भी छूट जायगा। फिर यह प्रयत्न करना चाहिये कि किसी तरह मरणपर्यन्त यही धारणा बराबर बनी रहे। क्योंकि उपासना पुरुष के अधीन होती है। कोई चाहे उसे करे, चाहे न करे, या जैसे जी में आये कुछ का कुछ किया करे। इस कारण उपासकों से यह बात विशेषरूप से कह देना चाहते हैं कि वे इस उपासना को सदा ही किया करें। सुपने में भी वेदपाठ करने वाले वेदपाठी का या सुपने में जप करने वाले जपिता, का जो हाल हो जाता
ध्यानदीप का संक्षेप ७३ है वही हाल उपासक का हो जाना चाहिये । उपासना की ऐसी प्रगाढता तो तभी होगी जब कि विरोधी विचारों को छोड़ कर निरन्तर भावना की जायगी और वासना का आवेश बढ़ने लगेगा । ऐसी उपासना सर्वपरित्यागी संन्यासमार्गी लोग ही कर सकते हों, यह धारणा ठीक नहीं है । क्योंकि इस उपासना में आस्था की अधिकता जब हो जायगी तब विषयव्यसनी की तरह, अपने प्रारब्ध भोगों को भोगते हुए भी, अपना लोकव्यवहार करते हुए भी, यह उपासना बराबर चल ही सकेगी । देखते हैं कि जिस नारी को परपुरुषसंग का व्यसन पड़ जाता है, वह घर के कामों में उलझी रहने पर भी, अन्दर मन में तो उसी परसंग रसायन को चखती रहती है । ऐसा करते हुए भी उसके घर के काम काज बराबर चलते ही हैं । हां, इतना तो अवश्य हो जाता है कि उसके घर के काम ऊपर के मन से होने लगते हैं । इसी प्रकार उपासना में निष्ठावाले पुरुष, ऊपर के मन से तो संसार के काम काज निभाते रहें । हम उनके ऊपर के मन को छीनना नहीं चाहते । हमें तो वे अन्दर का मन ही दे दें । अन्दर के मन से तो वे आठों पहर अखण्डोपासना-रूपी दीपक को जगाते रहें । जिस तत्वज्ञानी ने यह समझ लिया है कि—यह प्रपंच तो मायामय है, आत्मा तो केवल चैतन्य रूप है, फिर बताओ, उसे व्यवहार में क्या उलझन होगी ? व्यवहार को यह ज़रूरत तो है ही नहीं कि—यह प्रपंच सच्चा ही हो और न व्यवहार को यही दरकार है कि आत्मा जड ही हो,तब ही उसका काम चले, किन्तु इस विचारे [व्यवहार] को तो केवल साधनों की ही ज़रूरत होती है। देखो व्यवहार के साधन जो मन, वाणी, शरीर अथवा ये बाह्य पदार्थ हैं, इनको तत्वज्ञानी तोड़ फोड़ कर तो फेंक ही नहीं
७४ पंचदशी देता है। फिर बताओ कि इसका व्यवहार कैसे रुकेगा ? यह मत कह बैठना कि तत्वज्ञानी भी चित्त का उपमर्दन तो करता ही है। अरे भाई ! यह बात तो तुम 'ध्याता' की कह रहे हो। तत्वज्ञानी पुरुष कभी भी चित्त का उपमर्दन नहीं कर सकता। भला क्या कहीं घटतत्व को जानने वाला पुरुष भी बुद्धि का मर्दन किया उसे एकाग्र करता देखा जाता है ? यदि केवल एकवार ज्ञान हो जाने पर फिर घट जैसा जड़ पदार्थ भी सदा ही भासने लगता है तो फिर स्वयं प्रकाश यह आत्मा एक वार ज्ञान हो जाने पर सदा ही क्यों न भासने लगेगा ? घटादि का निश्चय जब एक बार हो जाता है तब उसके बाद घटज्ञान नष्ट तो हो जाता है परन्तु फिर जब कभी घट की ज़रूरत होती है, तभी उस घट को ले जा सकते हैं। उस घट में चित्त को स्थिर किये रखने की ज़रूरत ही नहीं होती। ठीक यही बात आत्मा के विषय में भी समझ रखनी चाहिये—उसमें भी चित्त को स्थिर किये रखना आवश्यक नहीं है। जब किसी को एक बार आत्मा के स्वरूप का निश्चय हो जाता है तब फिर जब कभी उसे अपेक्षा होती है, तभी वह ज्ञानी उसके विषय में कथन, मनन या ध्यान आदि कर ही सकता है। यदि कोई ज्ञानी भी उपासक की तरह लौकिक व्यवहार को भूल जाता है तो इस भूल को ज्ञान से हुआ मत समझो। यह विस्मरण तो उसे ध्यान से हुआ है। परन्तु यह ध्यान तो उस ज्ञानी ने अपनी इच्छा से ही पसन्द कर लिया है। शास्त्र उससे ध्यान करने को नहीं कहता। मुक्ति तो उसे केवल ज्ञान से ही मिल चुकी है। यह बात वेदान्तों में अनेक जगह कही गयी है। यदि तत्वज्ञानी लोग ध्यान न करें तो वे भले ही बाह्य व्यापारों में लगे रहें। उनकी प्रवृत्ति में किसी तरह की कोई भी रुकावट नहीं
ध्यानदीप का संक्षेप ७५
है । तत्त्वज्ञानी की बाह्य प्रवृत्ति मान कर अतिप्रसक्ति से डरना ठीक नहीं है। क्योंकि तत्त्वज्ञानी के प्रति तो 'प्रसंग' किंवा 'विधि शास्त्र' ही नहीं होता । जिस अविचारी को देह के वर्ण, आश्रम, आयु और अवस्थाओं में अभिमान बना हुआ है, ये सब विधि और निषेध शास्त्र केवल उसी के लिये बने हैं । ज्ञानी का निश्चय तो इसके विपरीत होता है । उसे तो यह मालूम हो जाता है कि— जैसे माया ने देह बनाया है, इसी तरह वर्णाश्रमादि भी उसी ने घड़ दिये हैं । बोधरूप आत्मा के तो कोई वर्ण या आश्रम आदि नहीं होते । जिसने अपने जी में से सम्पूर्ण आसक्तियों को निकाल कर फेंक दिया हो, जिसका आशय निर्मल हो चुका हो, वह तो मुक्त ही है । ऐसा महापुरुष समाधि करे या न करे, काम करे या बैठा रहे, यह सब उसकी ( प्रारब्धानुकूल ) इच्छा पर ही निर्भर होता है । इस बारे में शास्त्र की यह हिम्मत नहीं है कि उससे कुछ करने को कह सके । जो पुरुष कामवासनाओं के बन्धन से छूट चुका हो, कर्म को छोड़ बैठने या करते जाने से, फिर उसे कुछ भी प्रयोजन नहीं रह जाता । समाधि और जप से भी उसका कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । "आत्मा असंग है उससे भिन्न सभी कुछ इन्द्रजाल के समान मायिक है" ऐसा स्थिरनिर्णय जिन्होंने कर लिया हो, उनके मन में वासना कैसे ठहरेगी ? जब कि तत्वज्ञानी में वासना ही नहीं रहती तब वह उसे हटाने के लिए ध्यान भी क्यों करेगा ? या जब ज्ञानी को प्रसंग ही नहीं रह गया है तो अतिप्रसंग कहां से आयेगा ? जिस बालक के लिये विधि नहीं होती, उसको अति प्रसंग भी नहीं देखते हैं । जैसा विधि का अभाव बालक को है वैसा ही तत्वज्ञानी को भी है । कुछ न जानने के कारण बालक के लिये विधि नहीं
७६ पंचदशी
होती, सब कुछ जानने के कारण ज्ञानी के लिये भी विधि नहीं रहती। सम्पूर्ण विधियों का बोझ तो अल्पज्ञ के कन्धों पर ही लदा रहता है। एक प्रासंगिक बात यह भी जानने योग्य है कि किसी किसी ज्ञानी में शाप और वरदान का सामर्थ्य भी पाया जाता है। सो यह सामर्थ्य किसी दूसरे तप से उनमें आता है। ज्ञान को उत्पन्न करने वाले तप से यह सामर्थ्य उत्पन्न होता ही नहीं। ऐसी अवस्था में जिन ज्ञानियों में शाप या वरदान का सामर्थ्य नहीं है, उनके ज्ञानी होने की शंका नहीं करनी चाहिये। प्रकृत बात तो यही कह रहे थे कि लौकिक व्यवहार जिन साधनों से चला करता है, तत्वज्ञान के हो जाने पर उन साधनों का उपमर्द ( नाश ) नहीं हो जाता, इस कारण ज्ञानी लोग राज्यादि जैसे बड़े से बड़े आरम्भ भी भले प्रकार निभा ही सकते हैं। उनको मिथ्या समझने से यदि किसी की इच्छा ही उधर को न चलती हो तो वह भले ही ध्यान करने लगे और व्यवहार को बन्द कर दे। यह सब ज्ञानी के प्रारब्ध पर ही निर्भर होता है। इसके विप- रीत उपासक को तो चाहिए कि वह तो सदा ध्यान ही करता रहे। इसे तो यह कभी भी न भूलना चाहिए कि उस (उपासक) की ब्रह्मता तो केवल ध्यान के प्रताप से ही होती है। जो चीज़ ध्यान से बनी है वह तो ध्यान के हटते ही नष्ट हो जायगी। परन्तु सच्ची ब्रह्मता तो जब उसका ध्यान नहीं भी रहता तब भी बनी ही रहती है। इसलिए ज्ञान तो उसका बोधक ही हो सकता है, जनक नहीं हो सकता। ज्ञापक के न रहने से सत्य वस्तु छिप नहीं जाती। वैसे तो उपासक भी ब्रह्म ही है, परन्तु अभी तक उस को इस बात का निश्चय नहीं हो पाया है, इस कारण उस की ब्रह्मता उस के उपयोग में नहीं आती। जैसे भूखों मरने से भीख
ध्यानदीप का संक्षेप ७७ मांगना भला होता है, इसी प्रकार और सब कामों से उपासना का दर्जा ऊँचा है। पामर लोगों के व्यवहार से तो यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान बेहतर है, उन यज्ञादियों से सगुणोपासना श्रेष्ठ है, सगुणोपासना से भी निर्गुणोपासना ऊँची मानी गयी है। इस ऊँचनीच भाव का निर्णायक आधार पूछो तो यह है कि ज्यों ज्यों विज्ञान की समीपता आती जाती है, त्यों त्यों श्रेष्ठता भी बढ़ने लगती है। निर्गुणोपासना के सर्वश्रेष्ठ होने का कारण तो यही है कि यह उपासना पीछे जाकर धीरे धीरे ब्रह्मज्ञान के रूप में बदल जाती है। फल मिलने के समय जैसे सफल भ्रम प्रमाज्ञान होजाता है इसी प्रकार मुक्ति का समय आने पर यह 'निर्गुणोपासना' ही 'ब्रह्मविद्या' बन जाती है। निर्गुणोपासना में यही विशेषता है कि वह ज्ञान के सब से अधिक समीप होती है। वह निर्गुणोपासना जब पकने लगती है तब पहिले तो इसी की 'सविकल्प समाधि' हो जाती है। फिर पीछे से उस सविकल्प समाधि की ही 'निर्विक- ल्पसमाधि' बन जाती है। यह निरोध नामक समाधि निर्गुणोपासक को अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जब किसी को निरोध का महालाभ हो जाता है, तब उस पुरुष के अन्दर असंग वस्तु शेष रह जाती है। उस असंग वस्तु की भावना यदि कोई बार बार करे तो 'तत्वमसि' आदि वाक्यों के याद आते ही बिजली की चमक की तरह तत्वज्ञान का उदय हो जाता है। उस समय की ज्ञानोन्मुख अवस्था की सराहना किन शब्दों में करें—उस समय ही निर्विकारता, असंगता, नित्यता, स्वप्रकाशता, एकता और पूर्णता आदि का सच्चा भाव अभ्यासी की बुद्धि में ठीक तौर पर जंचने लगता है। इन का यथार्थ मर्म तभी अभ्यासी की समझ में आता है। अपरोक्षज्ञान को उत्पन्न करने वाली इस निर्गुणोपासना को
७८ पंचदशी छोड़ कर जो लोग तीर्थों में टकराते हैं, और जपादि में व्यस्त पड़े रहते हैं, वे तो ऐसे हैं जैसे हाथ पर रक्खे गुड़ को फेंक कर कोई हाथ को ही चाटने लगता हो । विचारक के सामने तो उपासक का दर्जा भी बहुत नीचा होता है, यह बात कभी न भूलनी चाहिए। यही कारण है कि—विचार न कर सकने की अवस्था में ही 'योग' किंवा 'उपासना' का विधान किया गया है। जिन पुरुषों के चित्त अत्यन्त व्याकुल हुए रहते हैं, उन को विचार से तत्वज्ञान हो ही नहीं सकता, उन के लिए तो 'योग' ही मुख्य उपाय है। क्योंकि योग करने से उनका धीदर्प नष्ट हो जाता है। जिन महापुरुषों की बुद्धि कभी व्याकुल नहीं होती, जिन का आत्मा केवल मोह के आवरण में छिपा रहता है, उनके लिए तो 'सांख्य' नाम का विचार ही मुख्य उपाय है। क्योंकि उन्हें उसी से झटपट सिद्धि मिल जाती है। गीता में कहा है कि—'सांख्यमार्गी' जिस परमपद को पाते हैं 'योगमार्गी भी वहां पहुंच जाते हैं। जिस ज्ञानी को यह मालूम है कि परिणाम में जाकर 'सांख्य' और 'योग' एक ही हैं, जिसे इनमें भेद नहीं दीखता, उसी को शास्त्र का मर्मज्ञ समझ लो। जिसकी तो उपासना भी इस जन्म में अधकचरी रह गयी हो, वह या तो मरते समय या फिर ब्रह्मलोक में जाकर तत्व का ज्ञाता होता है और मुक्त हो जाता है। मरते समय इस जन्म के विचारों का निचोड़ (सार) प्रकट होने लगता है अर्थात् मरते समय इस जन्म के जो सब से पिछले विचार होते हैं, उनसे यह पता चल ही जाता है कि—अगला जन्म कैसा और काहे का होगा ? बच्चों को पिछले जन्म के और वृद्ध को अगले जन्म के सपने आने लगते हैं। जीवन के पिछले ज्ञान
ध्यानदीप का संक्षेप ७९ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~
से आगामी जन्म की सूचना जैसे साधारण प्राणी को भी मिल जाती है या जैसे मरण के समय सगुणोपासकों को उनके सगुण ब्रह्म दर्शन दे देते हैं, इसी तरह पूर्वाभ्यास के प्रताप से मरते समय निर्गुणोपासकों को भी निर्गुणब्रह्म का ज्ञान हो ही जायगा, इसमें वृथा सन्देह क्यों किये जा रहे हो । यदि कहो कि निर्गुणो- पासक को मरण काल में निर्गुणब्रह्म की ही प्राप्ति हो सकती है, उसे मुक्ति भी मिल जायगी यह हम क्यों कर मान लें ? उसका उत्तर यह है कि तुम उस दर्शन का नित्य निर्गुण नाम भले ही गाते रहो असल में तो वह मोक्ष ही है । जैसे संवादिभ्रम कहने को तो भ्रम है, असल में तो उसे तत्वज्ञान ही कह देना चाहिए। ऐसे ही निर्गुणब्रह्म की 'प्राप्ति'और 'मुक्ति' ये दो नाम एक ही वस्तु के हैं। निर्गुणोपासना का सामर्थ्य ही कुछ ऐसा है कि—उससे मूलाज्ञान को मार भगाने वाली बुद्धि का जन्म हो ही जाता है । तापनीय- उपनिषत् में भी मोक्ष को इसी निर्गुणोपासना का फल बताया है । उपासना करते करते अन्त में तो ज्ञान की उत्पत्ति हो ही जाती है और यों 'नान्यः पन्था विद्यते' ज्ञान के सिवाय दूसरा रास्ता ही नहीं है इससे भी विरोध नहीं रह जाता । निष्काम उपासना करने से मुक्ति मिलती है, तथा सकाम उपासना करने से ब्रह्मलोक मिलता है । उस ब्रह्मलोक में जाकर भी इस उपासना के सामर्थ्य से तत्व का दर्शन हो जाता है । फिर वह उपासक इस कल्प में लौट कर नहीं आता और कल्प का अन्त होते समय कल्पेश्वर के साथ मुक्त हो जाता है। श्रुतियों में अधिकता से प्रणव की निर्गुणोपासनायें ही आयी हैं। सगुणोपासना तो कहीं कहीं दी है। पिप्पलादमुनि ने ओंकार को 'पर' और 'अपर' ब्रह्मरूप कहा है। यम ने भी नचिकेता से कहा है कि जो
मिले। प्रकरण में तो हमें केवल इतना ही कहना है कि—
८० पंचदशी इस ओंकाररूपी आलम्बन को जान ले तो वह जो चाहे वहीं उसे मिले। प्रकरण में तो हमें केवल इतना ही कहना है कि— जो निर्गुणब्रह्म की उपासना भले प्रकार कर लेता है वह इस लोक में या मरते समय या फिर ब्रह्मलोक में जाकर, ब्रह्म का साक्षात्कार करके ही छोड़ता है। आत्मगीता में भी कहा है कि—जो विचार न कर सकते हों, उन्हें तो निर्गुण ब्रह्म की उपासना निरन्तर ही करनी चाहिये। आत्मगीता में यह भी कहा है कि—जिसमें आत्मसाक्षात्कार करने की शक्ति न हो, वह निःशंक होकर मेरी उपासना ही किया करे। समय आने पर मैं उसके अनुभव में आऊंगा और निश्चय ही फलित होकर रहूंगा। अगाध खज़ाना पाना हो तो जैसे खोदना ही होगा, ऐसे ही मुझे पाना हो तो आत्म- चिन्ता करनी ही होगी। पुरुष को चाहिये कि—बुद्धि रूपी कुदाल से देह-रूपी रोड़े को दूर हटा दे। मनरूपी भूमि को बार बार खोदे और अन्त में मुझ गुप्त निधि को प्राप्त करके ही छोड़े। यदि किसी को अनुभूति न भी हो तो भी उसे 'अहं ब्रह्मास्मि' मैं ब्रह्म तत्व हूं' यह उपासना अवश्य करनी चाहिये। ध्यान का तो इतना महाप्रताप है कि उससे असत् भी मिल जाता है। नित्य प्राप्त जो सर्वात्मक ब्रह्म है वह ध्यान से मिलेगा या नहीं? ऐसी तो शंका ही कभी न करो। ध्यान करके देखो तो पता चले कि—ध्यान करने से दिन पर दिन अनात्मबुद्धि ढीली पड़ती जाती है। ध्यान के इस महाफल को देखकर भी यदि कोई ध्यान नहीं करता है तो वह बड़ा ही अभागा है। सम्पूर्ण प्रकरण का सार तो यही है कि—यदि कोई ध्यान से देहाभिमान को खोदे और अपने अद्वितीय आत्मा के दर्शन करले, तो यह अनादिकाल से मरने वाला प्राणी ही अमर हो जाय और इसी जन्म में सच्चिदानन्द ब्रह्म के दर्शन करके छोड़े।
ध्यानदीप का संक्षेप ८१ जो पुरुष इस 'ध्यानदीप' का विचार करेंगे उनके सब ही संशय भाग जायेंगे। विश्वास है कि—वे फिर सदा ही ब्रह्म ध्यान में निमग्न रहने लगेंगे।
10. Natakadipa
[१०] नाटकदीप का संक्षेप वह परमात्मतत्त्व पहले भी अद्वयानन्द पूर्ण था और अब भी है। वह कुतूहल में आकर अपनी माया के प्रताप से पहले तो जगत् बना और फिर जीवरूप से उसी में प्रवेश कर गया। उत्तम देहों में प्रवेश करके तो वह देवता हुआ। अधम देहों में प्रवेश करने से उसमें मर्त्यपन आ गया। जब उसने अनेक जन्मों तक अपने कर्म ब्रह्मार्पण करने शुरू किये तब उसमें फिर आत्मस्वरूप का विचार करने की शक्ति जाग उठी। विचार की आंच के सामने जब माया न ठहर सकी तब वह फिर स्वयम् अकेला का अकेला ही रह गया। ये जगत् और जीव सब के सब पलायन कर गये। उस अद्वितीय तत्व के सच्चे बन्ध और मोक्ष का निरूपण करने का सामर्थ्य तो किसी में है ही नहीं। जब उस तत्व को दुःखी होने का धोखा लग जाता है तब बस यही उस का 'सद्वयपना' और यही उस का 'बन्ध' कहाता है। यह दुःखीपना जब हटता है और जब स्वरूप में स्थिति मिल जाती है तब इसी को 'मोक्ष' कहने लगते हैं। जानते हो यह बन्ध कहां से आया है? सुनो, यह बन्ध अविचार से आया है और विचार करने से यह बन्ध खुल जायगा। इस कारण जब तक तत्व का साक्षात्कार न हो जाय तब तक जीव और परात्मा का विचार सदा ही करते रहना चाहिये। विचार
नाटकदीप का संक्षेप ८३ करने की रीति भी सुन लीजिये—देहादियों में 'मैंपन' का अभि- मान करने वाला अहंकार 'कर्ता' (जीव) कहाता है। उसके अभि- मान करने के साधन को मन कहते हैं। वह क्रम से कभी अन्दर और कभी बाहर क्रियायें किया करता है। वह मन जब अन्त- र्मुख होकर 'म' ऐसी वृत्ति करता है तब वह वृत्ति 'कर्ता' (जीव) की ओर इशारा करती है। जब तो उसी मन में बहिर्मुख वृत्ति होती है तब वह बाह्य पदार्थों की ओर 'यह' ऐसा संकेत किया करती है। अब उस इदम् (यह) में जो रूपादि विशेष विशेष धर्म होते हैं, उनका ज्ञान पांचों इन्द्रियों से होता है। इतनी बातें समझ लेने के बाद अब जरा 'साक्षी' तत्व को भी समझ लीजिये— जो तो केवल चिद्रूप रह कर ही उस 'कर्ता' को भी, उपर्युक्त 'क्रियाओं' को भी, तथा एक दूसरे से अत्यन्त विलक्षण गन्ध आदि 'विषयों' को भी, एक ही प्रयत्न से प्रकाशित किया करता है, उसी चिद्रूप तत्व को वेदान्तों में 'साक्षी' कहा है। लोक में भी देख लो—नृत्यशाला में जलता हुआ दीपक, नाट्यगृह के 'प्रभु' को, नाट्य देखने वाले 'सभ्यों' को तथा 'नर्तकी' को एक ही रूप से प्रकाशित किया करता है। प्रकाश करते हुए किसी की खास रियायत नहीं करता है और जब ये सब लोग नृत्यशाला को छोड़ कर चले जाते हैं तब भी वह विचारा अकेला ज्यों का त्यों जला ही करता है। ठीक इसी दृष्टान्त की तरह यह साक्षी तत्त्व 'अहं- कार' को 'बुद्धि' को तथा 'विषयों' को प्रकाशित किया करता है। परन्तु जब सुषुप्ति आदि के समय अहंकार आदियों में से कोई भी शेष नहीं रह जाता है तब भी तो यह 'साक्षी' पहले की तरह ही जगमगाता रहता है। वह कूटस्थ तत्व तो सदा भासता ही रहता है। मानो कोई अखण्ड दीपक ही जल रहा हो। यह
८४ पंचदशी
बिचारी गरीब बुद्धि उसी सदाविभात साक्षी की चमक से उधारी चमक लेकर अनेक रूप से नाचा करती है। यह बुद्धि जिस नाटक को खेल रही है, उसके पात्र आदि को भी जान लो। 'अहंकार' ही इस नाटक का 'प्रभु' है। क्योंकि नाटक के मालिक की तरह विषयभोग की सफलता और विफलता से हर्ष और विषाद इसी को तो होते हैं। 'विषय' ही इस नाटक के 'सभ्य' माने गये हैं। नाटक के दर्शकों को जैसे सुखदुःखमयी घटना देखने पर भी सुख दुःख नहीं होते, इसी प्रकार इन विषयों को भी सुख दुःख कुछ नहीं होते। 'बुद्धि' ही इस नाटक की 'नर्तकी' है। क्योंकि नर्तकी की तरह नाना तरह के विकार इसी में तो होते हैं। ताल आदि को धारण करने वाली 'इन्द्रियां' हैं। क्योंकि ये इन्द्रियां बुद्धि के विकारों के अनुकूल व्यापार किया करती हैं। यह 'साक्षी' ही, इन सब का 'प्रकाशक दीपक' माना गया है। क्योंकि इसी से इन सब का प्रकाश होता है। दीपक जैसे एक ही जगह रक्खा हुआ अपने चारों ओर प्रकाश पहुंचा देता है इसी प्रकार यह साक्षी भी अपने स्वरूप में स्थित रहकर ही बाहर और अन्दर प्रकाशित कर देता है। अन्दर और बाहर का यह विभाग भी देह की दृष्टि से ही है। साक्षी की दृष्टि में तो ऐसा कोई भी विभाग नहीं है। वैसे तो बुद्धि अन्दर बैठी रहती है, परन्तु वह इन्द्रियों की टोली के साथ बाहर निकल पड़ती है। अब समझ गये होंगे कि चंचलता इस बुद्धि की ही है। परन्तु फिर भी इस चंचलता का आरोप साक्षी तत्व में व्यर्थ ही कर लिया जाता है। झरोखे में से जो प्रकाश घर में आ रहा है, उसमें यदि हाथ को नचावें तो जैसे वह धूप ही नाचती सी दीखती है, इसी प्रकार साक्षी तो अपनी जगह पर ही डटा बैठा
नाटकदीप का संक्षेप ८५ है वह अन्दर बाहर आता जाता नहीं है, परन्तु बुद्धि की चंचलता के कारण आता जाता सा मालूम होने लगा है। यह साक्षी अन्दर या बाहर का कभी नहीं होता। ये तो दोनों बुद्धि के ही देश हैं। कल्पना करो कि तुम्हारी बुद्धि और इन्द्रियां मर चुकी हैं— उनकी प्रतीति बन्द हो गयी है—अब बताओ कि वह प्रकाश कहां जगमगा रहा है ? बुद्धि आदि की प्रतीति के बन्द हो जाने पर भी यह प्रकाश जहां जगमगा रहा है, वही साक्षी का अपना स्थान है। यदि कहो कि ऐसी अवस्था आने पर तो कोई भी देश भासता नहीं है तो हम कहेंगे कि तुम उस साक्षी को बेदेश का ही तत्व समझ लो। शास्त्र में कहीं कहीं जो उस साक्षी को 'सर्वगत' या 'सर्वसाक्षी' कह दिया है वह भी सब देश की कल्पना के आधार पर ही कहा है। स्वाभाव से तो वह अद्वितीय और असंग ही है। यह शैतान बुद्धि अन्दर या बाहर के जिस किसी देशादि को घड़ कर खड़ा कर देती है उस देश का यह तत्व उसका साक्षी कहाने लगता है। यह शैतान बुद्धि जिन रूपादि की कल्पना कर लेती है, उन उन को प्रकाशित करते ही यह उनका साक्षी हो जाता है। परन्तु इस साक्षी का अपना निराला स्वभाव पूछो तो यह स्वयं तो वाणी और बुद्धि का गोचर ही नहीं हो पाता है। स्वतंत्र रूप से विचार करने बैठें तो उसे साक्षी भी क्यों कर कह दें? ऐसे साक्षी के विषय में एक बड़ी उलझन यह है कि—फिर ऐसे अगोचर तत्व को हम मुमुक्षु लोग कैसे समझें ? इसका समा- धान यह है कि आप लोग ग्रहण करना ही छोड़ दो। सारा झगड़ा तो ग्रहण करने का ही है। यह जब तक ग्रहण करते रहोगे तब तक आत्मतत्व दीखने वाला नहीं है। ग्रहण करना छोड़ते ही उस तत्व के दर्शन मिल जाते हैं। किसी को ग्रहण न
८६ पंचदशी करना ही, उस तत्व को ग्रहण करना कहाता है। जब यह सर्वग्रह—जिसे तुम अनादि काल से करते आ रहे हो— रुक जायगा उस समय जो अनुपम सत्य तत्व शेष रह जायगा, वही तो यह है। उस तत्व को जानने के लिये आपको किसी भी प्रमाण से सहायता लेनी नहीं पड़ेगी। क्योंकि वह तत्व तो स्वयं प्रकाश है। वैसी स्वयंप्रकाश वस्तु को समझना हो तो किसी अनुभवी के मुख से श्रुति का पठन करो। अनुवादों के पढ़ने से वह बात मिलने वाली नहीं है। जो जिस मार्ग की यात्रा कर लेता है उसके मर्म का वही सच्चा जानकार होता है वही दूसरे को भी सच्चा मार्ग दिखा सकता है। मुरदा पुस्तकों को पढ़ लेने से बात का मर्म हाथ नहीं लगता। इस कारण अनुभवी गुरु की आवश्यकता होती ही है। यदि तो मन्दाधिकारी लोग उपर्युक्त सर्वग्रह का त्याग न कर सकें तो वे बुद्धि की शरण में पहुँच जांय। बुड्ढे लोग जैसे लकड़ी के सहारे से चलते हैं इसी प्रकार वे लोग बुद्धि के सहारे से इसी साक्षी तत्व को पहचानें, कि यह बुद्धि जिस किसी बाह्य या आन्तर पदार्थ की कल्पना करती है उस उस पदार्थ का साक्षी होकर यह परात्मा बुद्धि के अधीन होता है। यों बुद्धि का हाथ पकड़ कर इस गहन तत्व को वे लोग भी टटोल लें।
11. Yogananda
[११] ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप इस प्रकरण में उस ब्रह्मानन्द का वर्णन किया गया है जिसे पहचानते ही इस लोक और परलोक के त्रिविध ताप कूच कर जाते हैं और पहचानने वाला सुखरूप ब्रह्मतत्व ही हो जाता है। इस ब्रह्मज्ञान की श्रुतियों ने बड़ी प्रशंसा की है। वे कहती हैं कि—"ब्रह्मदर्शी पुरुष पर को पा लेता है। आत्मज्ञानी शोक मोह की हालत से ऊपर उठ जाता है। रस अथवा सार तो ब्रह्म ही है। इस रस को पाकर ही आनन्दी हो सकता है और तरह से नहीं। जब अपने रूप में प्रतिष्ठा (ठहरना) मिल जाती है तभी पुरुष अभय हो सकता है। जब तो अपने में भेद देखने लगता है तब उसे डरना ही पड़ता है। यह समझ लेने वाला पुरुष कि 'आनंद तो जहां भी है वहां ब्रह्मतत्व का ही है,' किसी भी बात और किसी भी घटना से नहीं डरता। कर्मरूपी अग्नि की चिन्ता बस एक इस ज्ञानी को ही छोड़ती है। शेष तो सब प्राणी इस कर्तव्याग्नि की ज्वालाओं से झुलसे पड़े हैं और इसी के झूठे इलाज करने में व्यग्र हो रहे हैं। ऐसा जान चुकने वाला पुरुष पाप पुण्यों को छोड़कर सदा आत्मा को याद रखने लगता है और किये हुए धर्मों को भी तो आत्मरूप ही जान लेता है। उस परावर को देख चुकने पर इसकी 'हृदयग्रन्थि' खुल जाती है। इसके सब सन्देह मिट जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। उसी को जान चुकने वाला पुरुष जन्म मरणरूपी चक्कर से छूट सकता है। इस चक्र
पंचदशी ८८ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 से छुटकारे का दूसरा कोई मार्ग ही नहीं है। देव को जानकर ही फांसा खुल जाता है। क्लेशों के नष्ट हो जाने पर फिर जन्म लेना नहीं पड़ता। जो धीर पुरुष देव को जान लेता है वह इसी जन्म और इसी लोक में हर्ष शोक से छूट जाता है। किये या बेकिये पुण्य पाप फिर इसे कभी भी दुःखी नहीं करते।” उपर्युक्त श्रुतियों में ब्रह्मज्ञान से अनर्थ की हानि और आनन्द की प्राप्ति दोनों ही बातों की घोषणा की गयी है। आनन्द के मुख्य तीन भेद हैं एक ‘ब्रह्मानन्द’ दूसरा ‘विद्या- नन्द’ तीसरा ‘विषयानन्द’। सबसे पहले ब्रह्मानन्द का विवेचन करेंगे— भृगु के पिता वरुण ने उसको ब्रह्म का लक्षण बताया कि ‘जिससे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं, जिसके सहारे से जीते हैं तथा मरते समय जिसमें लीन हो जाते हैं वह ब्रह्म है।’ इस लक्षण को जब उसने अन्न, प्राण, मन और बुद्धि में घटाकर देखा तब उसे यह निश्चय हो गया कि ये ब्रह्मतत्व नहीं है। अन्त में जाकर इसी लक्षण के सहारे से उसे आनन्द के ही ब्रह्म होने का निश्चय हुआ। क्योंकि आनन्द से ही ये भूत उत्पन्न होते हैं उसी से जीते हैं और उसी में ही लीन हो जाते हैं। इस कारण आनन्द ही ब्रह्मतत्व है। इसमें फिर उसे संशय नहीं रहा। भूतों के उत्पन्न होने से पहले [त्रिविध द्वैत के न होने से] भूमा परमात्मा ही था। क्योंकि प्रलय काल में ज्ञाता ज्ञान ज्ञेयरूपी त्रिविध द्वैत होता ही नहीं। उस परमात्मा में से जब विज्ञानमय उत्पन्न हुआ तब वह ‘ज्ञाता’ हो गया। जब मनोमय उत्पन्न हुआ तब ‘ज्ञान’ होने लगा। जब शब्दादि विषय उत्पन्न हुए तब वे ‘ज्ञेय’ हो गये। ये तीनों ही उत्पत्ति से पहले नहीं थे। आप उस अवस्था