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पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

( ७० ) पञ्चतन्त्रम् ।

वह बोली-“यदि ऐसा है बता किसप्रकारसे मैं दृढ बंधनमें बँधी हुई वहां जाऊं? और यह पापात्मा मेरा पति समीपमें है”। नायन बोली-“सखी ! मदसे विह्वल हुआ यह सूर्य निकलनेपर जागेगा । सो मैं तुझे खोले देतीहूं, मुझे अपने स्थानमें बाँधकर बहुत शीघ्र देवदत्तका मन मनाकर आ” वह बोली-“ऐसाही हो” तब यह नायन उस अपनी सखीको बन्धनसे खोल उसके स्थानमें यथापूर्व अपनी आत्माको बांधकर उसको देवदत्तके निकट संकेत स्थानमें भेजती हुई। ऐसा होनेपर कौलिक कुछ काल उपरान्त उठकर कुछगतकोप और मद उतरनेसे बोला-“हे कठोरवादिनि ! यदि आजसे लेकर तू घरसे न निकले तो तुझे खोलदूं” नायनभी स्वरभेदके भयसे जबतक कुछ नहीं बोलती तबतक वहभी वारंवार उससे यही कहने लगा और जब उसने कुछभी उत्तर नदिया तब वह क्रोधकर तीक्ष्ण छुरी लेकर उसकी नाक काटता हुआ और बोला-“कुलटा ! ठहर फिर नतुझको संतुष्ट करूंगा” यह कहकर सोगया। देवशर्माभी धनके नाशसे क्षुधासे शुष्ककंठ हुआ निद्रा रहित होकर यह सब स्त्रीचरित्र देखता रहा था, और वह कौलिकभार्या यथेच्छ देवदत्तके संग सुरतका सुख अनुभव कर कुछ काल उपरान्त घर आकर उस नायनसे बोली-“कहो तुम्हारे कुशल है ? अयि ! तुम्हारी कुशल है ? मेरे जानेपर यह पापात्मा उठा तो नहीं” नायन बोली-“नासिकाके बिना और सब शरीरमें कुशल है, सो शीघ्र मुझे बन्धनसे खोल जबतक यह मुझे न देखे जिससे मैं अपने घर चली जाऊं” ऐसा करनेपर फिरभी कौलिक उठकर बोला-“पुंश्चलि ! क्या अबभी नहीं, बोलती क्या अब फिर कठिन दण्ड कर्णछेदनका तुझको करूं”। तब वह क्रोध और आक्षेपके सहित यह बोली,-“धिक् धिक् महामूढ ! कौन मुझ महासतीको धर्षण करनेका अथवा व्यंग ( शरीरछेदन ) करनेको समर्थ है। सो सब लोकपाल सुनें-

आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च
द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये
धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ १९३ ॥

सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिनरात, दोनों संध्या और धर्म मनुष्यका वृत्त जानते हैं ॥ १९३ ॥

भाषाटीकासमेतम्। ( ७१ )

तद्यदि मम सतीत्वमस्ति मनसापि परपुरुषो नाभिलषितः ततो देवा भूयोऽपि मे नासिकां तादृग्रूपामक्षतां कुर्वन्तु । अथवा यदि मम चित्ते परपुरुषस्य भ्रान्तिरपि भवति मां भस्मसान्नयन्तु” । एवमुक्त्वा भूयोऽपि तमाह–“भो दुरात्मन् ! पश्य मे सतीत्वप्रभावेण तादृशी एव नासिका संवृत्ता” । अथ असा उल्मुकमादाय यावत्पश्यति तावत् तद्रूपां नासिकाञ्च भूतले रक्तप्रवाहञ्च महान्तमपश्यत् । अथ स विस्मितमनास्तां बन्धनाद्विमुच्य शय्यायामारोप्य च चाटुशतैः पर्य्यतोषयत् । देवशर्मा अपि तं सर्ववृत्तान्तमालोक्य विस्मितमना इदमाह–

सो यदि मेरा सतीत्व है और मनसेभी परपुरुषका अभिलाष नहीं कियाहै तो देवता फिरभी मेरी नासिकाको उसी प्रकारकी अक्षत करदें । अथवा यदि मेरे चित्तमें परपुरुषकी भ्रान्तिभी हो तो मुझको भस्म करदें”। यह कह फिर उससे बोली,–“भो दुरात्मन् ! देख मेरे सतीत्वके प्रभावसे फिर वैसीही नासिका होगई” तब यह दीपक लेकर देखनेलगा तो उसी प्रकारकी उसकी नासिका और पृथ्वीमें रक्तप्रवाह बहुत देखता भया। तब यह विस्मितमन होकर उस बन्धनसे खोल शय्यामें आरोपणकर सैकडों मनोहर वचनोंसे उसको सन्तुष्ट करताहुआ । देवशर्माभी इस सब वृत्तान्तको देखकर विस्मयको प्राप्त होकर यह बोला–

“शम्बरस्य च या माया या माघा नमुचेरपि । बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥ १९४ ॥

“जो शम्बरकी मायाहै, जो नमुचिकी मायाहै, बलि और कुम्भीनसकी जो मायाहै वे सब माया स्त्रियें जानतीहैं ॥ १९४ ॥

हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्त्यपि । अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णन्ति कालयोगतः ॥ १९५ ॥

यह हँसते हुएके साथ हँसती, रोते हुएके साथ रोतीं, समय योगसे अनुरक्त जनको प्रियवचनोंसे ग्रहण करती हैं ॥ १९५ ॥

उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः । स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तस्माद्रक्ष्याः कथं हि ताः ॥१९६॥

( ७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

जो शास्त्र शुक्र जानताहै और जो शास्त्र बृहस्पति जानता है वह स्त्रीकी बुद्धिमें कुछ विशेष नहीं है इस कारण उन स्त्रियोंकी कैसे रक्षा हो ॥ १९६ ॥

अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम् । इति यास्ताः कथं धीरैः संरक्ष्याः पुरुषैरिह ॥ १९७ ॥

जो असत्यको सत्य और सत्यको असत्य कहती हैं धीर पुरुष इस संसारमें उनकी किस प्रकार रक्षा कर सकतेहैं ॥ १९७ ॥

अन्यत्रापि उक्तम्- और स्थानमे भी कहाहै-

नातिप्रसंगः प्रमदासु कार्यो नेच्छेद्बलं स्त्रीषु विवर्द्धमानम् । अतिप्रसक्तैः पुरुषैर्युतास्ताः क्रीडन्ति काकैरिव लूनपक्षैः १९८

स्त्रियोंमे अतिप्रसगन करे और उनका बल बढने नदे कारण अति आसक्त हुए पुरुषोंसे वह पंखनुचे कौओंकी समान क्रीडा करती हैं ॥ १९८ ॥

सुमुखेन वदन्ति वल्गुना प्रहरन्त्येव शितेन चेतसा । मधु तिष्ठति वाचि योषितां हृदये हालहलं महद्विषम् १९९

सुन्दर मुखसे मनोहर बोलतीहैं, तीक्ष्ण चित्तसे प्रहार करती हैं स्त्रियोंके वचनमें मधु और हृदयमें हलाहल विष रहताहै ॥ १९९ ॥

अतएव निपीयतेऽधरो हृदयं मुष्टिभिरेव ताड्यते । पुरुषैः सुखलेशवञ्चितैर्मधुलुब्धैः कमलं यथालिभिः २००॥

इसी कारण उनके अधर पिये जातेहैं और हृदय मुष्टियोंसे ताडन किया जाता है, सुखलेशसे वञ्चित हुए पुरुषोंसे, मधुसे लुब्ध हुए भौरों द्वारा कमलकी समान ( भोग किया जाता है ) ॥ २०० ॥

अपिच- और भी कहतेहै-

आवर्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् । दुर्ग्राह्यं यन्महद्भिर्नरवरवृषभैः सर्वमायाकरण्डं स्त्रीयन्त्रं केन लोके विषममृतयुतं धर्मनाशाय सृष्टम् २०१॥

भाषाटीकासमेतम् । (७३)

संदेहोका आवर्त (भौर), अविनयका घर, साहसका पत्तन (नगर), दोषोंका स्थान, कपटका शतगृह, अविश्वासका क्षेत्र, बडे नरपुरुषोंसे ग्रहण करनेको असमर्थ, सब मायाकी पोटली स्त्रीरूपी यंत्र जो विष और अमृतसे युक्त है सो धर्म नाशके लिये किसने निर्माण की है ? ॥ २०१ ॥

कार्कश्यं स्तनयोर्दृशोस्तरलतालीकं मुखे दृश्यते कौटिल्यं कचसञ्चये प्रवचने मान्द्यान्नितम्बे स्थूलता । भीरुत्वं हृदये सदैव कथितं मायाप्रयोगः प्रिये यासां दोषगणो गुणो मृगदृशां ताः किं नराणां प्रियाः ॥ २०२ ॥

स्तनोंमें कठिनता, नेत्रोंमें चंचलता, मुखमें असत्य, बालसमूहमें कुटिलता, वचनमें मधुरता, नितम्बोंमे स्थूलता, हृदयमें भय, स्वामीमें मायापूर्वक वचनोंका कहना, इस प्रकारके जिनके दोष गुणनामसे ग्रहण किये जाते हैं, क्या वह मनुष्योंकी प्रिया हैं ? अर्थात् नहीं हैं ॥ २०२ ॥

एता हसन्ति च रुदन्ति च कार्यहेतो- र्विश्वासयन्ति च परं न च विश्वसन्ति । तस्मान्नरेण कुलशीलवता सदैव नार्य्यः श्मशानवटिका इव वर्जनीयाः ॥ २०३ ॥

यह कार्यके निमित्त हँसती और रोती हैं, विश्वास करकेभी यह विश्वासको प्राप्त नहीं होती हैं इसकारण कुलशीलवाले मनुष्यको श्मशानके वटवृक्षकी समान सदा स्त्रियें वर्जनीय हैं ॥ २०३ ॥

व्याकीर्णकेशरकरालमुखा मृगेन्द्रा नागाश्च भूरिमदराजिविराजमानाः । मेधाविनश्च पुरुषाः समरेषु शूराः स्त्रीसन्निधौ परमकापुरुषा भवन्ति ॥ २०४ ॥

बिखरे हुए गरदनके बालोंसे करालमुखसिंह, अत्यन्त मदसमूहसे विराज-मानहाथी तथा बुद्धिमान् समरशूर, पुरुष भी स्त्रीके निकट परम कायर होजाते हैं ॥ २०४ ॥

कुर्वन्ति तावत्प्रथमं प्रियाणि यावन्न जानन्ति नरं प्रसक्तम् ।

( ७ ) पञ्चतन्त्रम् ।

ज्ञात्वा च तं मन्मथपाशबद्धं
ग्रस्तामिषं मीनमिवोद्धरन्ति ॥ २०५ ॥

जबतक यह मनुष्यको प्रसक्त नहीं जानती तबतक प्रिय करतीहैं और पीछे उसे कामके वशीभूत जानकर मांस ग्रहण करनेवाली मछलीकी समान उठा-लेती हैं ॥ २०५ ॥

समुद्रवीचीव चलस्वभावाः
सन्ध्याभ्ररेखेव मुहूर्त्तंरागाः ।
स्त्रियः कृतार्थाः पुरुषं निरर्थं
निष्पीडितालक्तकवत्त्यजन्ति ॥ २०६ ॥

समुद्रकी तरंगोंकी समान चंचल स्वभाव संध्याकालके मेघरेखाकी समान मुहूर्त्तमात्रको रागवाली स्त्रिये सिद्धकाम होकर निर्धन पुरुषको निचोडे महावरकी समान त्याग देती हैं ॥ २०६ ॥

अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता ।
अशौचं निर्दयत्वञ्च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥ २०७ ॥

झूंठ, साहस, माया, मूर्खत्व, अतिलोभ, अपवित्रता, निर्दयता यह स्त्रियोंके स्वाभाविक दोषहैं ॥ २०७ ॥

सम्मोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति
निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति ।
एताः प्रविश्य सरलं हृदयं नराणां
किं वा न वामनयना न समाचरन्ति ॥ २०८ ॥

मोहित करती, मदकरती, प्रसन्न करती, वंचित करती, घुडकती, रमती और विषादित करती हैं, बहुत क्या यह कुटिल नेत्रवाली पुरुषोंके सरल हृदयोंमें प्रवेश करके क्या क्या नहीं करती हैं ॥ २०८ ॥

अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।
गुञ्जाफलसमाकारा योषितः केन निर्मिताः ॥ २०९ ॥”

यह भीतरसे विषममय और बाहरसे मनोरम, चोंटलीके फलकी समान स्त्रियें किसने निर्मित की हैं ? ॥ २०९ ॥”

एवं चिन्तयतस्तस्य परिव्राजकस्य सा निशा महता कृच्छ्रेण अतिचक्राम। सा च दूतिका छिन्ननासिका स्वगृहं गत्वा

भाषाटीकासमेतम् । ( ७५ )

चिन्तयामास । “किमिदानीं कर्तव्यम् । कथमेतत् महच्छिद्रं स्थगयितव्यम्” । अथ तस्या एवं विचिन्तयन्त्या भर्त्ता कार्य्यवशाद्राजकुले पर्युषितः प्रत्यूषे च स्वगृहमभ्युपेत्य द्वारदेशस्थः विविधपौरकृत्योत्सुकतया तामाह-“भद्रे ! शीघ्रformानीयतां क्षुरभाण्डं येन क्षौरकर्मकरणाय गच्छामि”। सापि छिन्ननासिका गृहमध्यस्थितैव कार्य्यकरणापेक्षया क्षुरभाण्डात्क्षुरमेकं समाकृष्य तस्य अभिमुखं प्रेषयामास । नापितोऽपि उत्सुकतया तमेकं क्षुरमवलोक्य कोपाविष्टः सन् तदभिमुखमेव तं क्षुरं प्राहिणोत् । एतस्मिन्नन्तरे सा दुष्टा उर्द्ध्वबाहू विधाय फूत्कर्त्तुमना गृहात् निष्चक्राम । “अहो ! पापेन अनेन मम सदाचारवर्त्तिन्याः पश्यत नासिकाच्छेदो विहितः। तत्परित्रायतां परित्रायताम्” । अत्र अन्तरे राजपुरुषाः समभ्येत्य तं नापितं लगुडप्रहारैर्जर्जरीकृत्य दृढबन्धनैर्बद्धा तया छिन्ननासिकया सह धर्माधिकरणस्थानं नीत्वा सभ्यान् ऊचुः-“शृण्वन्तु भवन्तः सभासदः । अनेन नापितेन अपराधं विना स्त्रीरत्नमेतद्व्यङ्गितं तदस्य यत् युज्यते तत् क्रियताम्” । इति अभिहिते सभ्या ऊचुः-“रे नापित ! किमर्थं त्वया भार्य्या व्यङ्गिता । किमनया परपुरुषोऽभिलषितः, उत स्वित् प्राणद्रोहः कृतः, किंवा चौर्य्यकर्म आचरितम् । तत् कथ्यतामस्या अपराधः?” । नापितोऽपि प्रहारपीडिततनुर्वक्तुं न शशाक । अथ तं तूष्णींभूतं दृष्ट्वा पुनः सभ्या ऊचुः-“अहो ! सत्यमेतत् राजपुरुषाणां वचः पापात्मा अयम् । अनेन इयं निर्दोषा वराकी दूषिता । उक्तञ्च-

यह विचार करते उस सन्यासीको वह रात बडे कष्टसे बीती और वह नाककटी दूती अपने घर जाकर विचार करने लगी कि, “अब मैं क्या करूं । किस प्रकार यह महाछिद्र छिपाना चाहिये” । उसके यह विचार करतेही उसका स्वामी किसी कार्यके वशसे राजकुलमें रहाहुआ प्रातःकाल निज घरमें आकर द्वारपर स्थित हुआही बहुतसे नगरवासियोंके कार्यकी उत्कठासे उससे बोला-

( ७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

"भद्रे ! शीघ्र क्षुरभाण्ड (किस्वत) ला जिससे कि, क्षौरकर्म (हजामत) बनानेको जाऊं" । वहभी नाककटी अपने घरमेंसेही बहुत कार्य करनेकी व्याजतासे किसबतमेंसे एक उसतरा निकाल उसके निकट भेजती भई, इधर नापितनेभी उत्कंठासे एक क्षुरको देख क्रोधकर उसके सम्मुख उस क्षुरको फेंकदिया । इसी अवसरमें वह दुष्टा ऊपरको भुजा उठाकर स्वास लेती (हाय हाय) करती घरसे निकली, "अहो ! इस नाईने मुझ सदाचारमें रहनेवालीकी नाक काटदी, सो रक्षा करो रक्षा करो" । उसी अवसरमें राजपुरुष आकर उस नाईको डंडोंसे ताड़ितकर दृढ बंधनसे बांध उस छिन्ननासिकाके सहित धर्माधिकारीके स्थान (कचहरी) में लेजाकर वहांके सभ्योंसे बोले-"हे सभासदों ! सुनो । इस नाईने अपराधके विनाही इस स्त्रीरत्नका अंगभंग किया, सो जो कुछ इसका करना हो करो" । यह कहनेपर सभ्य बोले-"हे नाई ! क्यों तैने इस स्त्रीको व्यंगित किया ? क्या इसने परपुरुषकी अभिलाषा की । या प्राणद्रोह किया । या चोरी की । सो इसका अपराध कहो ?" । नाईभी प्रहारसे पीड़ित शरीर होनेके कारण कुछ न कहसका । उसको चुप देखकर सभ्य बोले-"अहो यह राजपुरुषोंका वचन सत्यहै । यह पापात्मा है इसने इस विचारी निर्दोषीको दूषित कियाहै । कहाहै-

भिन्नस्वरमुखवर्णः शङ्कितदृष्टिः समुत्पतिततेजाः । भवति हि पापं कृत्वा स्वकर्मसन्त्रासितः पुरुषः ॥ २१० ॥

और प्रकारका स्वर, मुखका अन्य वर्ण, संदिग्ध दृष्टि, उत्तपतित तेज (नष्टश्री) यह वस्तु पापकरके अपने कर्मसे सन्तापित पुरुषोंको होतीहैं ॥ २१० ॥

तथाच- और देखो-

आयाति स्खलितैः पादैर्मुखवैवर्ण्यसंयुतः । ललाटस्वेदभाक् भूरि गद्गदं भाषते वचः ॥ २११ ॥

स्खलित चरणोसे आताहै, मुखमें विवर्ण होताहै, माथेपर पसीना, और बोलनेमें गडबड़ ॥ २११ ॥

अधोदृष्टिर्भवेत्कृत्वा पापं प्राप्तः सभां नरः । तस्माद्यत्नात्परिज्ञेयश्चिह्नैरैतैर्विचक्षणैः ॥ २१२ ॥

पाप करके यदि मनुष्य सभामें आवे ता उसकी अधोदृष्टि होती है इसकारण इन चिन्होंसे मनुष्य यत्नसे इनको पहचाने ॥ २१२ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ७७ )

अन्यच्च-
और भी-

प्रसन्नवदनो दृष्टः स्पष्टवाक्यः सरोषदृक् ।
सभायां वक्ति सामर्षं सावष्टम्भो नरः शुचिः ॥ २१३ ॥

प्रसन्नवदन, दृष्टता, स्पष्टवचन बोलनेवाला, क्रोधदृष्टि, धैर्यतासे सभाके बीचमे पवित्र मनुष्य क्रोधसे बोलताहै ॥ २१३ ॥

तदेष दुष्टचरित्रलक्षणो दृश्यते । स्त्रीधर्षणात् वध्य इति । तच्छूलमारोप्यताम्” इति । अथ वध्यस्थाने नीयमानं तमवलोक्य देवशर्मा तान् धर्माधिकृतान् गत्वा प्रोवाच-“भोः ! भोः ! अन्यायेन एष वराको वध्यते । नापितः साधुसमाचार एषः। तत् श्रूयतां मे वाक्यम् । “जम्बूको हुड्डयुद्धेन” इति। अथ ते सभ्या ऊचुः-“भो भगवन् ! कथमेतत् ?” । ततो देवशर्मा तेषां त्रयाणामपि वृत्तान्तं विस्तरेण अकथयत । तदाकर्ण्य सुविस्मितमनसस्ते नापितं विमोच्य मिथः प्रोचुः-“अहो !

सो यह दुष्टचरित्रलक्षणवाला दीखताहै, स्त्रीके धर्षणसे वध्यहै सो इसको शूलपर अरोपण करो”। तब वध्यस्थानमें लेजाते हुए इसको देख देवशर्मा उन अधिकारियोंके पास जाकर बोला-“भो ! भो ! अन्यायसे यह बिचारा मारा जाताहै, यह नाई तो श्रेष्ठ आचारवालाहै, सो मेरा वाक्य श्रवण करो-“जम्बुक हुड्डयुद्धसे” इत्यादि। तब वे सभ्य बोले- “भगवन् ! यह क्या बातहै ?” । तब देवशर्मा उन तीनोंके वृत्तान्तको विस्तारसे कहता भया । यह वचन सुन वे सब विस्मयको प्राप्तहो नाईको छोडकर परस्पर कहने लगे “अहो !

अवध्यो ब्राह्मणो बालः स्त्री तपस्वी च रोगभाक् ।
विहिता व्यंगिता तेषामपराधे महत्यपि ॥ २१४ ॥

ब्राह्मण, बालक, स्त्री, तपस्वी, रोगी यह अवध्यहैं, यदि इनका कोई वडा अपराध हो तोभी कोई अङ्ग विकल करदेना उचितहै ॥ २१४ ॥

तदस्या नासिकाच्छेदः स्वकर्मणा हि संवृत्तः । ततो राजनिग्रहस्तु कर्णच्छेदः कार्यः”। तथानुष्ठिते देवशर्मापि वित्त-

( ७८ ) पंचतन्त्रम् ।

नाशसमुद्भूतशोकरहितः पुनरपि स्वकीयं मठायतनं जगाम । अतोऽहं ब्रवीमि- "जम्बूको हुडुयुद्धेन" इति ।

सो इसका नासिकाच्छेद तो इसके कर्मसेही होगयाहै। अब राजनिग्रह कर्णच्छेद करना”। ऐसा होनेपर देवशर्माभी अपने धननाशके शोकसे रहित हो अपने मठमें आया, इससे मैं कहताहूं- "जम्बुक हुडुयुद्धसे" इत्यादि ।

करटक आह- "एवंविधे व्यतिकरे किं कर्त्तव्यमावयोः" । दमनकोऽब्रवीत्- "एवंविधेऽपि समये मम बुद्धिस्फुरणं भविष्यति, येन सञ्जीवकं प्रभोर्विश्लेषयिष्यामि । उक्तञ्च-

करटक बोला- "इस प्रकारकी अवस्थामें हम दोनोंको क्या करना चाहिय" । दमनक बोला- "इस प्रकारके समयमेंभी मेरी बुद्धि स्फुरित होगी, जिससे संजीवकको प्रभुसे पृथक् करसकूंगा । कहाहै-

एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुरुक्तो धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतः सृष्टा हन्ति राष्ट्रं सनायकम् ॥ २१५ ॥

धनुर्धारीके धनुषसे निकला हुआ बाण किसी एकको मारे या न मारे लेकिन बुद्धिमानकी बुद्धिसे किया कृत्य राजा सहित राज्यको नष्ट करताहै ॥ २१५ ॥

तदहं मायाप्रपञ्चेन गुप्तमाश्रित्य तं स्फोटयिष्यामि" । करटक आह- "भद्र ! यदि कथमपि तव मायाप्रवेशं पिङ्गलकः ज्ञास्यति सञ्जीवको वा तदा नूनं विघात एव" । सोऽब्रवीत्- "तात ! नैवं वद गूढबुद्धिभिरापत्काले विधुरेऽपि दैवे बुद्धिः प्रयोक्तव्या नोद्यमस्त्याज्यः कदाचित् घुणाक्षरन्यायेन बुद्धेः साम्राज्यं भवति । उक्तञ्च-

सो मैं मायाप्रपंचसे गुप्त आश्रय कर इनमें फूट करूं” करटक बोला- “भद्र ! यदि किसीप्रकार यह पिंगलक संजीवक तुम्हारी मायाका प्रवेश जान जायँ तो अवश्य नष्ट होना होगा ” वह बोला- "तात ! ऐसा मतकहो, महाबुद्धिमानोंको आपत्कालमें प्रारब्धके नष्ट होनेमेंभी बुद्धिका प्रयोग करना उचितहै, उद्यमका त्याग करना अच्छा नहीं है, कदाचित् घुणाक्षरन्यायसे बुद्धिद्वारा सुखसाम्राज्य प्राप्त होजाय । कहा भी है--


१ घुनके कुरेदनेसे जो अक्षर बनजाय ।

भाषाटीकासमेतम्। (७९)

त्याज्यं न धैर्य्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः । याते समुद्रेऽपि हि पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म्म एव ॥ २१६ ॥

दैवके बिगडनेमेभी धीरता त्यागन करनी नहीं चाहिये कारण कि, धैर्यसे कदाचित् स्थितिकी प्राप्ति होजाय समुद्रमे जहाज डूबनेपरभी पोत वणिक् उद्यम करनेकीही इच्छा करता है। (अर्थान्तरन्यासः) ॥ २१६ ॥

तथाच—
और देखो—

उद्योगिनं सततमत्र समेति लक्ष्मी- दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः ॥ २१७ ॥

उद्योगी पुरुषको निरन्तर लक्ष्मी मिलती है, प्रारब्ध देता है यह कायर कहते हैं, दैवको त्यागकर आत्मशक्तिसे पुरुषार्थ कर यत्न करनेपरभी यदि सिद्ध न हो तो किसका दोष है ॥ २१७ ॥

तदेवं ज्ञात्वा सुगूढबुद्धिप्रभावेण यथा तौ द्वौ अपि न ज्ञास्यतः तथा मिथो वियोजयिष्यामि । उक्तञ्च—

सो ऐसा जानकर अपनी बुद्धिके प्रभाव करके जैसे वह दोनों न जाने इस प्रकार उनको वियुक्त कर दूंगा । कहाभी है—

सुगुप्तस्यापि दम्भस्य ब्रह्माप्यन्तं न गच्छति ।
कौलिको विष्णुरूपेण राजकन्यां निषेवते ॥ २१८ ॥”

सम्यक् प्रकारसे छिपाये दम्भके अन्तको तो ब्रह्माभी नहीं जानसकता, इसी लिये एक कौलिक विष्णुके रूपसे राजकन्यासे रमताथा ॥ २१८ ॥”

करटक आह—“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्—
करटक बोला,—“यह कैसी कथा है ?” वह बोला—

( ८० ) पञ्चतन्त्रम् ।

कथा ५.

कस्मिंश्चिदधिष्ठाने कौलिकरथकारौ मित्रे प्रतिवसतः स्म। तत्र च तौ बाल्यात् प्रभृति सहचारिणौ, परस्परमतीव स्नेहपरौ सदा एकस्थानविहारिणौ कालं नयतः। अथ कदाचित् तत्राधिष्ठाने कस्मिंश्चिद्देवायतने यात्रामहोत्सवः संवृत्तः। तत्र च नटनर्त्तकचारणसंकुले नानादेशागतजनावृते तौ सहचरौ भ्रमन्तौ, काञ्चिद्राजकन्यां करेणुकारूढां सर्वलक्षणसनाथां कञ्चुकिवर्षवरपरिवारितां देवतादर्शनार्थं समायातां दृष्टवन्तौ। अथासौ कौलिकस्तां दृष्ट्वा विषार्दित इव दुष्टग्रहगृहीत इव कामशरैः हन्यमानः सहसा भूतले निपपात । अथ तं तदवस्थमवलोक्य रथकारः तद्दुःखदुःखित आत्मपुरुषैस्तं समुत्क्षिप्य स्वगृहमानाययत् । तत्र च विविधैः शीतोपचारैः चिकित्सकोपादिष्टैः मन्त्रवादिभिरुपचर्यमाणश्चिरात्कथञ्चित्सचेतनो बभूव । ततो रथकारेण पृष्टः । “भो मित्र ! किमेवं त्वमकस्मात् विचेतनः सञ्जातः । तत्कथ्यतामात्मस्वरूपम् ?” । स आह,— “वयस्य ! यदि एवं तच्छृणु मे रहस्यं येन सर्वामात्मवेदनां ते वदामि यदि त्वं मां सुहृदं मन्यसे ततः काष्ठप्रदानेन प्रसादः क्रियतां, क्षम्यतां यद्वा किञ्चित्प्रणयातिरेकाद्युक्तं तव मयानुष्ठितम्” । सोऽपि तदाकर्ण्य बाष्पपिहितनयनः सगद्गदमुवाच— “वयस्य ! यत्किञ्चिद्दुःखकारणं तद्वद येन प्रतीकारः क्रियते यदि शक्यते कर्तुम् । उक्तञ्च—

किसी स्थानमें एक कौलिक और बढ़ई दो मित्र रहतेथे, वह बालकपनसे सहचारी थे; परस्पर अत्यन्त स्नेहवाले सदा एक स्थानमें रहते समय विचरतेथे, तब कभी उस स्थानमें किसी देवताके स्थानमें यात्राका महोत्सव हुआ । वहां नट नर्तक चारणसे युक्त अनेक अनेक देशोंसे आये मनुष्योंसे आवृत्त वह दोनों सहचर घूमते हुए किसी राजकन्याको हथिनीपर चढी सम्पूर्ण गहने पहरे अन्तःपुरके वृद्ध ब्राह्मण और नपुंसकोंसे युक्त देवताके दर्शन करनेके निमित्त आई

भाषाटीकासमेतम् । (८१)

हुईको देखते भये, तब यह कौलिक उसको देखकर विषसे अर्दित हुएकी समान दुष्टग्रहसे गृहीत हुआसा कामबाणसे ताड़ितकी समान सहसा पृथ्वीमे गिरा । उसकी यह दशा देखकर रथकार उसके दुःखसे दुःखी हुआ, अपने मनुष्योंसे उसको उठवाय अपने घरमें लाया । वहा अनेक प्रकारके शीतल उपचार वैद्योंके किये हुए तथा मंत्रादिसे उपचारको प्राप्त हुआ बहुतकालमे कुछ सचेत भया । तब रथकारने पूंछा-"मित्र ! यह क्या हे जो तुम अकस्मात् अचेतन होगये अपनी बात तो कहो ?" । वह बोला,-"मित्र ! जो ऐसा हे तो मेरी गुप्तवार्ता सुनो, जिस कारण मै सब अपना दुःख तुझसे कहताहू । जो तू मुझे अपना सुहृदय मानता है तो चिता रचकर मेरे ऊपर कृपा करो । और क्षमा करना जो कुछ प्रणयके कारण तुमसे अयुक्त कहा होवे" । वहभी यह वचन सुन आखोंमे आंसू भर गद्गद-कण्ठसे बोला-"मित्र ! जो कुछ दु खका कारण हे, सो कहो जिससे यदि होसके-गा तो उसका प्रतिकार किया जायगा । कहा है-

औषधार्थसुमन्त्राणां बुद्धेश्चैव महात्मनाम् ।
असाध्यं नास्ति लोकेऽत्र यद्ब्रह्माण्डस्य मध्यगम् ॥२१९॥

इस संसार और ब्रह्माण्डके मध्यमें जो कुछभी है वह औषधी, अर्थ और सुमन्त्र तथा महात्माओंकी बुद्धिके सामने कुछ असाध्य नहीं है ॥२१९॥

तदेषां चतुर्णां यदि साध्यं भविष्यति तदा अहं साधयिष्यामि" । कौलिक आह- "वयस्य ! एतेषामन्येषामपि सहस्राणामुपायानामसाध्यं तत् मे दुःखम् । तस्मान्मम मरणे मा कालक्षेपं कुरु" । रथकार आह-"भो मित्र ! यद्यपि असाध्यं तथापि निवेदय येनाहमपि तदसाध्यं मत्वा त्वया सह वह्नौ प्रविशामि । न क्षणमपि त्वद्वियोगं सहिष्ये । एष मे निश्चयः" । कौलिक आह-"वयस्य ! याऽसौ राजकन्या करेणुकारूढा तत्र उत्सवे दृष्टा तस्या दर्शनानन्तरं मकरध्वजेन ममेयमवस्था विहिता । तन्न शक्नोमि तद्वेदनां सोढुम् । तथाचोक्तम् -

सो इन चारोमे यदि साध्य होगा तो मै साधन करूंगा" । कौलिक बोला,-

( ८२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

“मित्र ! इन चारोंमें अथवा अन्य सहस्रों उपायोंसेभी मेरा दुःख असाध्य है इस कारण मेरे मरणमें वृथा समयका बिताना मतकरो” । रथकार बोला- “मित्र ! यद्यपि असाध्य है, तथापि निवेदन तो कर जिससे मैंभी उसे असाध्य मानकर तेरे संग अग्निमें प्रवेश करूं क्षणमात्रको भी तुम्हारा वियोग न सहूंगा यह मेरा निश्चय है” । कौलिक बोला- “मित्र ! जो यह कन्या हथिनीपर चढी उस उत्सवमें देखीथी उसके दर्शन करतेही कामके कारण मेरी यह दशा हुई सो उसकी वेदना अब नहीं सही जाती । जैसा कहा भी है-

मत्तेभकुम्भपरिणाहिनि कुंकुमार्द्रे तस्याः पयोधरयुगे रतखेदखिन्नः । वक्षो निधाय भुजपञ्जरमध्यवर्ती स्वप्स्ये कदा क्षणमवाप्य तदीयसंगम् ॥ २२० ॥

मत्त हाथियोंके कुम्भकी समान परिणाहवाले केशरसे गीले उसके युगल स्तनोंको रतिके खेदसे खिन्न हुआ मैं भुजाओंके मध्यमें कर हृदयमें रख क्षण मात्रको उसके अंगसंगको प्राप्त होकर कब सोऊंगा ॥ २२० ॥

तथाच- तैसेही-

रागी बिम्बाधरोऽसौ स्तनकलशयुगं यौवनारूढगर्वं चीना नाभिः प्रकृत्या कुटिलकमलकं स्वल्पकञ्चापि मध्यम् । कुर्वन्त्येतानि नाम प्रसभमिह मनश्चिन्तितान्याशु खेदं यन्मां तस्याः कपोलौ दहत इति मुहुः स्वच्छकौ तन्न युक्तम् ”

लालवर्ण उसका कंदूरीकी समान अधर, कलशकी समान स्तन, गर्वको प्राप्त यौवन, गम्भीर नाभि, स्वभावसेही कुटिल बाल, पतली कमर इतनी वस्तु विचारतेही हठसे मनमें खेद उत्पन्न करतीही हैं और जो उसके स्वच्छ विमल कपोलको मैं वारंवार चिन्तन करताहूं वह जो मुझे जलाते हैं यह युक्त नहीं है ॥ २२१ ॥”

रथकारोऽपि एवं सकामं तद्वचनमाकर्ण्यः सस्मितमिदमाह- “वयस्य ! यदि एवं तर्हि दिष्ट्या सिद्धं नः प्रयोज-

भाषाटीकासमेतम्। ( ८३ )

नम्। तदद्यैव तया सह समागमः क्रियताम्” इति । कौलिक आह- “वयस्य ! यत्र कन्यान्तःपुरे वायुं मुक्त्वा न अन्यस्य प्रवेशोऽस्ति तत्र रक्षापुरुषाधिष्ठिते कथं मम तया सह समागमः। तत् किं मां असत्यवचनेन विडम्बयसि ?” । रथकार आह--“मित्र ! पश्य मे बुद्धिवलम्” । एवमभिधाय तत्क्षणात् कीलसञ्चारिणं वैनतेयं बाहुयुगलं वायुजवृक्षदारुणा शंखचक्रगदापद्मान्वितं सकिरीटकौस्तुभं अघटयत् । ततः तस्मिन् कौलिकं समारोप्य विष्णुचिह्नितं कृत्वा कीलसञ्चरणविज्ञानञ्च दर्शयित्वा प्रोवाच--“वयस्य ! अनेन विष्णुरूपेण गत्वा कन्यान्तःपुरे निशीथे तां राजकन्यामेकाकिनीं सप्तभूमिकप्रासादप्रान्तगतां मुग्धस्वभावां त्वां वासुदेवं मन्यमानां स्वकीयमिथ्यावक्रोक्तिभिः रञ्जयित्वा वात्स्यायनोक्तविधिना भज”। कौलिकोऽपि तदाकर्ण्य तथारूपः तत्र गत्वा तामाह- “राजपुत्रि ! सुप्ता किं वा जागर्षि ? अहं तव कृते समुद्रात् सानुरागो लक्ष्मीं विहाय एव आगतः। तत् क्रियतां मया सह समागमः” इति । सापि गरुडारूढं चतुर्भुजं सायुधं कौस्तुभोपेतमवलोक्य सविस्मया शयनादुत्थाय प्रोवाच- “भगवन् ! अहं मानुषी कीटिकाऽशुचिः भगवान् त्रैलोक्यपावनो वन्दनीयश्च । तत्कथमेतद्युज्यते ?” । कौलिक आह- “सुभगे ! सत्यमभिहितं भवत्या परं किन्तु राधा नाम मे भार्या गोपकुलप्रसूता प्रथममासीत् सा त्वं अत्र अवतीर्णा । तेन अहमत्र आयातः” । इति उक्ता सा प्राह- “भगवन् ! यदि एवं तत् मे तातं प्रार्थय सोऽपि अविकल्पं मां तुभ्यं प्रयच्छति” । कौलिक आह--“सुभगे ! न अहं दर्शनपथं मानुषाणां गच्छामि । किं पुनरालापकरणम्, त्वं गान्धर्वेण विवाहेन आत्मानं प्रयच्छ । नो चेत् शापं दत्त्वा सान्वयं ते पितरं भस्मसात् करिष्यामि” इति। एवमभिधाय गरुडादवतीर्य सव्ये पाणौ गृहीत्वा, तां सभयां सल

( ८४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

ज्ञां वेपमानां शय्यायामानयत् । ततश्च रात्रिशेषं यावद् वात्स्यायनोक्तविधिना निषेव्य प्रत्यूषे स्वगृहमलक्षितो जगाम । एवं तस्य तां नित्यं सेवमानस्य कालोयाति । अथ कदाचित् कंचुकिनः तस्या अधरोष्ठप्रवालखण्डनं दृष्ट्वा मिथः प्रोचुः—"अहो ! पश्यत अस्या राजकन्यायाः पुरुषोपभुक्ताया इव शरीरावयवाः विभाव्यन्ते । तत् कथमयं सुरक्षितेऽपि अस्मिन् गृहे एवंविधो व्यवहारः। तत् राज्ञे निवेदयामः” । एवं निश्चित्य सर्वे समेत्य राजानं प्रोचुः—"देव ! वयं न विद्मः । परं सुरक्षितेऽपि कन्यान्तःपुरे कश्चित् प्रविशति । तद्देवः प्रमाणम्” इति । तच्छ्रुत्वा राजा अतीव व्याकुलितचित्तो व्यचिन्तयत् ।

रथकारभी इसप्रकार सकाम उसके वचनको सुनकर हँसता भया । "मित्र ! यदि ऐसा है तो भाग्यसे हमारा मनोरथ सिद्ध हुआ । सो आजही उसके साथ समागम करो” । कौलिक बोला—"मित्र ! जिस कन्याके अन्तःपुरमें वायुको छोड अन्य वस्तुका प्रवेश नहीं है, वहां राजाके पुरुषोंसे युक्त स्थानमे मेरा उसके साथ कैसा समागम होगा । सो क्यों मुझे असत्यवचनसे वंचित करताहै.”!। रथकार बोला—"मित्र ! मेरी बुद्धि और बलको देखो” ऐसा कह उसीसमय कील घुमानेसे चलनेवाले गरुड जो वायुज वृक्षके काष्ठकी दो भुजा शंख, चक्र, गदा, पद्म, किरीट और कौस्तुभकोभी बनाताहुआ उसपर उस कौलिकको चढाकर विष्णुचिन्हसे चिन्हितकर कील प्रवेशके विज्ञानकोभी दिखाकर बोला—"मित्र ! इस विष्णुरूपसे जाकर कन्याके अन्तःपुरमे अर्धरात्रिके समय उस राजकन्याको जो इकली सतमहले मन्दिरमें प्राप्त हुई मुग्धस्वभावसे तुझे वासुदेव माननेवाली उसको अपनी कुटिल उक्तिसे प्रसन्नकर वात्स्यायन मुनिके कहे कामशास्त्रके विधानसे भोगो”। कौलिकभी यह वचन सुन उस रूपसे वहां जाकर उससे बोला—"राजपुत्रि ! सोतीहो या जागती ? मैं तुम्हारे निमित्त समुद्रसे अनुराग करनेवाली लक्ष्मीको त्याग करके आयाहूं । सो मेरे साथ समागम करो” । वहभी गरुडपर चढे चार भुजा आयुध लिये कौस्तुभसे युक्त देखकर विस्मयपूर्वक शयनसे उठकर बोली—"भगवन् ! मैं मानुषी कीटजाति अपवित्रहूं । आप

भाषाटीकासमेतम् । ( ८५ )

त्रिलोकीके नमस्कार करने योग्य पवित्र करनेवाले हैं, सो यह कैसे होसकता है?"। कौलिक बोला—"सुभगे ! तुमने सत्य कहा, परन्तु राधा नामक मेरी भार्या जो प्रथम गोपकुलमें उत्पन्न हुईथी, वही तू यहा अवतीर्ण हुई है । इसीकारण मैं यहां आयाहू" ऐसा कहनेपर वह बोली,—"भगवन् ! यदि ऐसाहै तो मुझे मेरे पितासे मांगो वह भी तत्काल तुमको प्रदान करेंगे"। कौलिक बोला—"सुभगे ! मैं मनुष्योंके दर्शनपथको प्राप्त नहीं होताहू फिर बात करनी तो कैसी ! तू गन्धर्व-विवाहसे अपने आपको मुझे प्रदानकर, नहीं तो शापदेकर कुलसहित तेरे पिताको भस्म करदूंगा" यह कह गरुडसे उत्तर सीधे हाथसे उसे ग्रहणकर उस भय लज्जासे कंपित हुईको शय्यापर ले आया शेषरात्रिमें वात्स्यायन विधिके अनुसार उसको सेवनकर बहुत प्रभातमे अलक्षितहो अपने स्थानको गया । इसप्रकार नित्य उसको भोगते, समय बीतता भया । तब कभी कंचुकी उसके अधरोष्ठ रक्त और खंडित देखकर परस्पर कहने लगे—"अहो ! देखो तो इस राजकन्याके पुरुषसे भोगे हुए शरीरके अंगप्रत्यंग दीखते हैं । सो कैसे यह सुरक्षित इस घरमें इस प्रकारका व्योहारहै, सो हम राजासे निवेदन करें"। ऐसा निश्चयकर सब मिलकर राजासे बोले—"देव हम नहीं जानते परन्तु सुरक्षितभी कन्याके अन्तःपुरमे कोई प्रवेश करता है, सो इसमें आपही प्रमाण हैं" यह सुन राजा महाव्याकुल हो विचारने लगा.-

"पुत्रीति जाता महतीह चिन्ता कस्मै प्रदेयेति महान्वितर्कः । दत्त्वा सुखं प्राप्स्यति वा न वेति कन्यापितृत्वं खलु नाम कष्टम् ॥ २२२ ॥

"इस संसारमें कन्या होना यह बडी चिन्ता है, कारण यह किसको दें यह महान् वितर्क है, और भी देनेसे सुख पावेगी या नहीं यह भी नहीं जानाजाता इसलिये कन्या पिताके निमित्त एक कष्टहीहै ॥ २२२ ॥

नद्यश्च नार्य्यश्च सहकप्रभावा- स्तुल्यानि कूलानि कुलानि तासाम् । तोयैश्च दोषैश्च निपातयन्ति नद्यो हि कूलानि कुलानि नार्य्यः ॥ २२३ ॥

( ८६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

नदी और नारियोंका समान प्रभाव होताहै, उनके दोनो किनारे और कन्याके मातृ पितृ कुल समान हैं, नदी जलसे और नारी दोषसे अपने कुलको नष्ट करती हैं ॥ २२३ ॥

तथाच- और देखो-

जननीमनो हरति जातवती परिवर्द्धते सह शुचा सुहृदाम् । परसात्कृतापि कुरुते मलिनं दुरतिक्रमा दुहितरो विपदः ॥”

कन्या उत्पन्न होतेही माताका मन हरती है, सुहृद्जनोंके शोचके सहित बढ़ती है, पराये आधीन करनेपर भी मलीन करती है, कन्यारूपी विपत् तरी नहीं जाती ॥ २२४ ॥”

एवं बहुविधं विचिन्त्य देवीं रहःस्थां प्रोवाच-“देवि ! ज्ञायतां किमेते कञ्चुकिनो वदन्ति । तस्य कृतान्तः कुपितो येन एतदेवं क्रियते” । देवी अपि तदाकर्ण्य व्याकुलीभूता सत्वरं कन्यान्तःपुरे गत्वा तां खण्डिताधरां नखविलिखितशरीरावयवां दुहितरमपश्यत् । आह च-“आः पापे ! कुलकलङ्कारिणि ! किमेवं शीलखण्डनं कृतम् । कोऽयं कृतान्तावलोकितः त्वत्सकाशमभ्येति । तत्कथ्यतां ममाग्रे सत्यम्” इति कोपाटोपविशङ्कटं वदन्त्यां मातरि राजपुत्री भयलज्जानताननं प्रोवाच-“अम्ब ! साक्षात् नारायणः प्रत्यहं गरुडारूढो निशि समायाति । चेदसत्यं मम वाक्यम् । तत् स्वचक्षुषा विलोकयतु निगूढतरा निशीथे भगवन्तं रमाकान्तम्” । तत् श्रुत्वा सा अपि प्रहसितवदना पुलकाङ्कितसर्वाङ्गी सत्वरं गत्वा राजानमूचे-“देव ! दिष्ट्या वर्द्धसे । नित्यमेव निशीथे भगवान् नारायणः कन्यकापार्श्वेऽभ्येति तेन गान्धर्वविवाहेन सा विवाहिता । तदद्य त्वया मया च रात्रौ वातायनगताभ्यां निशीथे द्रष्टव्यो, यतो न स मानुषैः सह आलापं करोति” । तच्छ्रुत्वा हर्षितस्य राज्ञस्तद्दिनं वर्षशतप्रायमिव कथञ्चिद जगाम । ततस्तु रात्रौ निभृतो भूत्वा राज्ञीसहितो राजा

भाषाटीकासमेतम् । ( ८७ )

वातायनस्थो गगनासक्तदृष्टिः यावत्तिष्ठति तावत्तस्मिन् समये गरुडारूढं तं शंखचक्रगदापद्महस्तं यथोक्तचिह्नाङ्कितं व्योम्नोऽवतरन्तं नारायणमपश्यत् । ततः सुधापूरप्लावितमिव आत्मानं मन्यमानः तामुवाच-“प्रिये ! नास्ति अन्यो धन्यतरो लोके मत्त्तस्त्वत्तश्च, यत्प्रसूतिं नारायणो भजते । तत्सिद्धाः सर्वेऽस्माकं मनोरथाः । अधुना जामातृप्रभावेण सकलामपि वसुमतीं वश्यां करिष्यामि”। एवं निश्चित्य सर्वैः सीमाधिपैः सह मर्यादाव्यतिक्रममकरोत् । ते च तं मर्यादाव्यतिक्रमेण वर्त्तमानमालोक्य सर्वे समेत्य तेन सह विग्रहं चक्रुः । अत्रान्तरे स राजा देवीमुखेन तां दुहितरमुवाच-“पुत्रि ! त्वयि दुहितरि वर्त्तमानायां नारायणे भगवति जामातरि स्थिते तत् किमेवं युज्यते यत् सर्वे पार्थिवा मया सह विग्रहं कुर्वन्ति। तत् सम्बोध्योऽद्य त्वया निजभर्त्ता यथा मम शत्रून् व्यापादयति” ततः तया स कौलिको रात्रौ सविनयमभिहितः-“भगवन् ! त्वयि जामातरि स्थिते मम तातो यच्छत्रुभिः परिभूयते तन्न युक्तम् । तत्प्रसादं कृत्वा सर्वान् तान् शत्रून् व्यापादय ” । कौलिक आह-“सुभगे ! कियन्मात्रास्तु एते तव पितुः शत्रवः। तद्विश्वस्ता भव क्षणेनापि सुदर्शनचक्रेण सर्वान् तिलशः खण्डयिष्यामि”। अथ गच्छता कालेन सर्वदेशं शत्रुभिः उद्वास्य स राजा प्राकारशेषः कृतः, तथापि वासुदेवरूपधरं कौलिकमजानन् राजा नित्यमेव विशेषतः कर्पूरागुरुकस्तूरिकादिपरिमलविशेषान् नानाप्रकारवस्त्रपुष्पभक्ष्यपेयांश्च प्रैषयन् दुहितृमुखेन तमूचे-“भगवन् ! प्रभाते नूनं स्थानभङ्गो भविष्यति, यतो यवसेन्धनक्षयः सञ्जातः तथा सर्वोऽपि जनः प्रहारैर्जरितदेहः संवृत्तो योद्धुमक्षमः, प्रचुरो मृतश्च । तदेवं ज्ञात्वा अत्र काले यदुचितं भवति तद्विधेयम्” इति । तच्छ्रुत्वा कौलिकोऽपि अचिन्तयत् । “यत् स्थानभङ्गे जाते मम अनया सह वियोगो भविष्यति । तस्मात् गरुडमारुह्य

( ८८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सायुधमात्मानमाकाशे दर्शयामि । कदाचित मां वासुदेवं मन्यमानास्ते साशंका राज्ञो योद्धृभिः हन्यन्ते । उक्तञ्च-

इस प्रकार बहुत विचार कर एकान्तमें रानीसे कहा—“देवि ! जानो तो जो यह कंचुकी कहते हैं। उसपर कालने क्रोध किया हे जो ऐसा करताहै” देवीभी यह वचन सुनकर व्याकुलहो शीघ्र कन्याके अन्तःपुरमे जाय खंडित अधर नखोंसे चिन्हित शरीरके अवयववाली अपनी कन्याको देखती हुई बोली—“हे पापे ! कुलकलंककारिणी ! यह क्या चरित्र दूषण किया, कौन यह कालका देखा हुआ तेरे समीप आताहै ? सो मेरे आगे सत्य कह” । इस प्रकार क्रोधके वेगसे निष्ठुर कहती हुई अपनी मातासे राजपुत्री भय लज्जासे शिर झुकाये बोली—“माता ! साक्षात् नारायण प्रतिदिन गरुडपर चढ रात्रिमें आतेहैं । यदि मेरा वाक्य असत्य मानो तो अपनी नेत्रोंसे गूढतर अर्धरात्रमें रमाकान्त भगवान्को देखो” । यह वचन सुन वह भी प्रहसितवदन होकर सब अंगसे पुलिकित शरीर हो शीघ्र जाकर राजासे बोली—“देव ! भाग्यसेही बढतेहो । नित्यही अर्धरात्रिमें भगवान् नारायण कन्याके निकट आतेहैं । और उन्होने गान्धर्वविवाहसे उससे विवाह किया । सो आज हम और तुम रात्रिमें झरोखोंमें बैठकर अर्धरात्रमें देखें कारण कि, मनुष्योंके साथ वह वार्ता नहीं करते” । यह सुन प्रसन्नहुए राजाको वह दिन सौ वर्षकी समान बीता । फिर रात्रिमें एकान्तमें प्राप्तहोकर रानीके सहित राजा झरोखेमें बैठकर आकाशमें दृष्टि लगाये जबतक बैठा कि, उसी समय गरुडपर चढे, शंख, चक्र, गदा, पद्म हाथमें लिये, यथोक्त चिन्होंसे युक्त, आकाशसे उतरते हुए, नारायणको देखा । तब अमृतके पूरसे प्लावितकी समान अपने आपको मानताहुआ उससे बोला—“प्रिये ! हमसे अधिक कोई धन्य नहीं जिसकी कन्याको नारायण भजतेहैं । सो हमारे सब मनोरथ सफल हुए । अब जामाताके प्रभावसे सब पृथ्बीको अपने वश करूंगा” यह विचार सबही सीमाधिपतियोंके साथ मर्यादाका अतिक्रम करता भया वे उसको मर्यादा अतिक्रमसे वर्तते देखकर सब मिलकर उसके साथ विग्रह करतेहुए, इसी समय राजा दूतके मुखसे अपनी कन्याको कहलाताहुआ—“पुत्रि ! तुमसी कन्या होनेपरभी और भगवन् नारायणसे जामाताहोनेमें भी यह क्यों उचितहै कि, सब राजा मेरे साथ विग्रहकरें । सो आज यह अपने स्वामीसे कहना कि, वह मेरे शत्रुओंको

भाषाटीकासमेतम् । (८९)

मारें” । तब उसने उस कौलिकको विनयपूर्वक रात्रिमें कहा-“भगवन् ! आपसे जामाता स्थित होनेमें मेरे पिता शत्रुओंसे तिरस्कृत होतेहैं, सो युक्त नहींहै, सो कृपाकर उनको मारो” । कौलिक बोला-“सुभगे ! तुम्हारे पिताके वे शत्रु क्या पदार्थ हैं, सो विश्वास रख क्षणमात्रमें उन सबको सुदर्शनचक्रसे तिलवत् खण्ड खण्ड कर दूंगा” । तब कुछ समय बीतनेपर स्वदेश शत्रुओंने नष्टकर वह राजा परकोट मात्र अवशिष्ट किया ( परकोटमात्र बचा ) तोभी वासुदेवरूपधारी कौलिकको न जानकर वह राजा नित्यही विशेष कपूर अगर कस्तूरी आदि सुगन्धित द्रव्योंसे नानाप्रकार वस्त्र पुष्प भक्ष्य पेय आदि पदार्थ भेजकर कन्याके मुखसे कहलाताभया-“भगवन् ! कल प्रभात काल अवश्यही स्थान भंग होगा, कारण कि, अब घास इन्धन आदिकाभी क्षय हुआहै और सम्पूर्ण जन प्रहारसे जर्जरित देहहुए युद्ध करनेको असमर्थहैं और बहुत मरगये सो यह जानकर इस समय जो उचितहो सोकरो” । यह सुन कौलिकभी विचार करने लगा कि-“स्थानभंग होनेसे अवश्य इसका मेरे साथ वियोग होगा, इसकारण गरुडपर चढ आयुधसहित अपनेको आकाशमे दिखाऊ, कदाचित मुझे वासुदेव जानकर वे डरे हुए राजाके योद्धाओंसे मारे जाय । कहा भी है-

निर्विषेणापि सर्पेण कर्त्तव्या महती फणा । विषं भवतु मा भूयात्फटाटोपो भयंकरः ॥ २२५ ॥

निर्विष सर्पकोभी महाफणा नी चाहिये विष हो या नही फणाटोप भयंकर है ॥ २२५ ॥

अथ यदि मम स्थानार्थमुद्यतस्य मृत्युः भविष्यति तदपि सुन्दरतरम् । उक्तञ्च-

सो यदि मेरी इस स्थानके लिये मृत्यु हो तोभी अच्छा है । कहाहै-

गवामर्थे ब्राह्मणार्थे स्वाम्यर्थे स्त्रीकृतेऽथवा । स्थानार्थे यस्त्यजेत्प्राणांस्तस्य लोकाः सनातनाः ॥२२६।

गो, ब्राह्मण, स्वामी, स्त्री और स्थानके निमित्त जो प्राणोंका त्यागन करतेहैं उनके लिये सनातन लोकहैं ॥ २२६ ॥

चन्द्रे मण्डलसंस्थे विगृह्यते राहुणा दिनाधीशः । शरणागतेन सार्द्धं विपदपि तेजस्विनां श्लाघ्या ॥ २२७॥”