फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
४६८ फलदीपिका प्राणच्युतिर्गुरुसुहृज्जनविप्रयोगः सौरेड्यमायुरपहृत्य ददाति केतुः ॥४२॥ नानाविधार्थपशुधान्यपरिच्छदस्त्री- पुत्रान्नपानशयनाम्बरभूषणाप्तिः । देवद्विजार्चनमुपासनतत्परत्व- मायुर्यदा हरति जैवमथासुरेड्यः ॥४३॥ शत्रोर्जयः क्षितिपमाननकीर्तिलाभः स्याच्चण्डता नरतुरङ्गमवाहनाप्तिः । श्रेण्यग्रहारपुरराष्ट्रसमस्तसंपद् दुच्चैरुचथ्यसहजायुरपाहृतेऽर्के ॥४४॥ योषिद्बहुत्वमरिनाशनमर्थलाभः कृष्यर्थवस्तुपरमोन्नतकीर्तिलाभः । देवद्विजार्चनपरत्वमतीव पुंसां संजायते गुरुदशाहृति शर्वरीशे ॥४५॥ बन्धूपतोषममरिव्रजतोऽर्थलाभः सुक्षेत्रसत्कृतिरिह
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४६९ (i) बृहस्पति की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : सौभाग्य की वृद्धि हो, कान्ति बढ़े, सब ओर से मान-सम्मान मिले, पुत्र प्राप्ति हो, जातक के गुणों का उदय और राजदरबार में इज्जत हो। आचार्य और साधु-जनों से संयोग हो। मन की आकांक्षायें पूर्ण हों ॥३९॥ (ii) बृहस्पति की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : वेश्याओं की संगति हो, शराब पीना आदि दोषों की वृद्धि हो, सांसा- रिक स्थिति में उन्नति हो, सुख प्राप्ति हो, किन्तु जातक के कुटुम्ब और पशुओं को पीड़ा हो। धन बहुत अधिक खर्च हो। जातक के हृदय में सदैव भय बना रहे। आँखों में रोग हो और पुत्र को पीड़ा ॥४०॥ (iii) बृहस्पति की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : इस सम्बन्ध में दो मत हैं। एक मत यह है कि बृहस्पति में बुध की अन्तर्दशा अशुभ फल दिखाती है। स्त्रियों से संग हो, शराब पीने का घोर दुर्व्यसन हो और जातक जुआ खेले। वात, पित्त, कफ तीनों दोषों के कारण जातक बीमार पड़े। दूसरा मत यह है कि बृहस्पति की महा- दशा में बुध की अन्तर्दशा केवल शुभ फल देने वाली होती है। और जातक देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन करता है। पुत्र, धन और सुख की प्राप्ति होती है ॥४१॥ (iv) बृहस्पति की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : शस्त्र के व्रण होते हैं। नौकरों से विरोध बढ़ता है। चित्त में व्यथा रहती है, जातक के स्त्री और पुत्रों को कष्ट हो, गुरुजनों अथवा प्रियजनों से वियोग हो और जातक के स्वयं के प्राण जाने का भी कष्ट हो ॥४२॥ (v) बृहस्पति की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : अनेक प्रकार के धन, पशु, अन्न, वस्त्र, स्त्री, पुत्र, भोजन, पीने की वस्तुएँ, आभूषण, शयन-सुख, घर में काम में आने वाली वस्तुएँ प्राप्त
४७० फलदीपिका हों और इन सबसे सुख हो। जातक देवताओं और ब्राह्मणों के अर्चन में तत्पर रहे ॥४३॥ (vi) बृहस्पति की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : शत्रु पर विजय प्राप्त हो, राजा से मान मिले, यश वृद्धि हो, लाभ हो, पालकी और घोड़े की सवारी मिले। जातक के हृदय में पुरुषार्थ बढ़े और जातक किसी बड़े शहर में रहता हुआ समस्त सम्पत्ति का उपभोग करे ॥४४॥ (vii) बृहस्पति की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : बहुत सी स्त्रियों की प्राप्ति हो, धन-लाभ हो, देवता और ब्राह्मणों की पूजा हो, जातक का यश बढ़े, कृषि से लाभ हो, माल के खरीद- फ़रोख़्त में भी नफ़ा हो और शत्रुओं का नाश हो ॥४५॥ (viii) बृहस्पति की महादशा में मंगल की अर्न्तदशा का फल : इस समय जातक के कार्य से बन्धुओं को सन्तोष होता है और जातक को शत्रुओं के संग से लाभ होता है। उत्तम भूमि की प्राप्ति हो, जातक सत्कर्म करे और उसके प्रभाव में वृद्धि हो। जातक के किसी गुरुजन को चोट लगे या उसके स्वयं के नेत्रों में कष्ट हो ॥४६॥ (ix) बृहस्पति की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : बन्धुओं को संताप हो या बन्धुओं से संताप हो। मस्तिष्क में घोर दुश्चिन्तायें और व्यथायें रहें। बीमारी हो, चोर से भय हो। किसी गुरुजन को बीमारी हो या जातक को स्वयं को उदर-विकार हो। राजा से पीड़ा प्राप्त हो। शत्रुओं से कष्ट वृद्धि हो, धन का नाश हो। बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। राहु देवताओं का शत्रु है, इसलिये बृहस्पति में राहु का अशुभ फल होना स्वाभाविक ही है ॥४७॥ शनि को महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल कृषिवृद्धिभृत्यमहिषाभ्युदयः पवनामयो वृषलजातिधनम् ।
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७१ स्थविराङ्गनाप्तिरलसत्वमघो निजवत्सरान्तरगते रविजे ॥४८॥ सुभगत्वमस्ति सुखिता वनिता नृपलालनं विजयमित्रयुतिः । त्रिगदोद्भवः सहजपुत्ररुजा शनिदायहारिणि शशाङ्कसुते ॥४९॥ मरुदग्निपीडनमरि व्यसनं सुतदारविग्रहमतिः सततम् । अशुभावलोकनमहेश्च भयं , मृदुवत्सरं हरति केतुपतौ ॥५०॥ सुहृदङ्गनातनयसौख्ययुतः कृषितोययानजनितार्थचयः । शुभकीर्तिरुद्भवति देहभृतां यमदायहारिणि भृगोस्तनये ॥५१॥ मरणं तु वा रिपुभयं सततं गुरुवर्गरुग्जठरनेत्ररुजा । धनधान्यविच्युतिरिह प्रभवेत्- रविजाय
४७२ फलदीपिका स्वपदच्युतिः स्वजनविग्रहरुक्- ज्वरवह्निशस्त्रविषभीरथ वा । अरिवृद्धिरान्तररुगक्षिभयं रविजायुराविशति भूमिसुते ॥५४॥ अपमार्गयानमसुभिर्विरहस्तु अथ वा प्रमेहगुरुगुल्मभयम् । ज्वररुक्क्षतिः सततमेव नृणा- मसितान्तरं विशति भोगिपतौ ॥५५॥ अमरार्चनद्विजगणाभिरुचि- र्गृहपुत्रदारविहृतिस्तु भवेत् । धनधान्यवृद्धिरधिका हि नृणां गतवत्यार्किवयसोन्द्रगुरौ ॥५६॥ (i) शनि की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : खेती में वृद्धि हो, नौकर और भैंसों की वृद्धि हो अर्थात् जातक अधिक नौकर और भैंसें रखे । वात रोग हो, किसी शूद्र जाति के व्यक्ति से धन का लाभ हो, कुछ अधिक उम्र की स्त्री प्राप्त हो, आलस्य और पाप बढ़े ॥४८॥ (ii) शनि की महादशा में वुध की अन्तर्दशा का फल : सौभाग्य वृद्धि हो, राजा से सत्कार मिले, विजय प्राप्त हो, मित्रों से सौभाग्य हो, स्त्री की प्राप्ति हो और सुख मिले । किन्तु वात, पित्त, कफ, इन तीनों में से किसी एक या अधिक दोषों के कारण रोग हो और जातक के भाई, बहिन या पुत्र को भी बीमारी हो ॥४९॥ (iii) शनि की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : हवा और अग्नि से पीड़ा हो या जातक के शरीर में वायु या गर्मी से
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७३ विकार हो, शत्रुओं से संताप हो, अपनी स्त्री और पुत्र से सदैव झगड़ा रहे । अशुभ बातें देखनी पड़ें और सर्पों से भय हो ॥५०॥ (iv) शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : स्त्री, पुत्रों और मित्रों को सुख हो, खेती और एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट के काम से धन संग्रह हो। मूल श्लोक में समुद्र पार से जहाज द्वारा जो वस्तुएँ लाई या ले जाई जाती हैं उनसे लाभ लिखा है। इस अन्तर्दशा में जातक का यश बहुत फैलता है ॥५१॥ (v) शनि की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : जातक की मृत्यु या सदैव शत्रु का भय रहे । गुरुजनों को रोग हो, जातक को स्वयं को उदर-विकार या नेत्र-रोग हो, धन्न और धान्य का नाश हो ॥५२॥ (vi) शनि की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : जातक की स्त्री नष्ट हो या स्वयं की मृत्यु हो, मित्रों पर विपत्ति पड़े, जल और वायु के कारण अति भय हो और जातक को रोग का बहुत भय हो ॥५४॥ (vii) शनि की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : जातक की पदच्युति हो अर्थात् नौकरी छूटे या जिस पद पर वह आरूढ़ हो उस पद से हटाया जाये । अपने आदमियों से झगड़ा हो अथवा रोग, ज्वर, अग्नि, शस्त्र और विष से भय हो । शत्रुओं में वृद्धि हो हर्निया से कष्ट हो या नेत्र रोग हो ॥५४॥ (viii) शनि की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : जातक खराब रास्ते पर जावे, प्राणों का संकट हो । प्रमेह, गुल्म, ज्वर, चोट आदि से पीड़ा हो । शनि और राहु दोनों क्रूर-ग्रह हैं, इस कारण क्रूर-ग्रह की महादशा में क्रूर-ग्रह की अन्तर्दशा पीड़ा- कारक होती है ॥५५॥ (ix) शनि की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : यह अन्तर्दशा शुभ होती है। देवताओं के पूजन और ब्राह्मणों में विशेष
४७४ फलदीपिका रुचि हो। अपनी स्त्री, पुत्र आदि के साथ जातक सुख-पूर्वक अपने घर में रहे। धन और धान्य की अधिकाधिक वृद्धि हो ॥५६॥ बुध की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल धर्ममार्गनिरतिर्विपश्चितां सङ्गमो विमलधीर्धनं द्विजात् । विद्यया बहुयशः सुखं सदा चन्द्रजे हरति वत्सरं स्वकम् ॥५७॥ दुःखशोककलहाकुलात्मता गात्रकम्पनममित्रसंयुतिः । क्षेत्रयानवियुतिर्यदा भवेत्- सोममसूनुशरदं गतः शिखी ॥५८॥ देवविप्रगुरुपूजनक्रिया दानधर्मपरतासमागमः । वस्त्रभूषणसुहृद्युतिर्भवेद्बोधनायुषि समागते सिते ॥५९॥ हेमविद्रुमतुरङ्गवारणप्रावृतं भवनमन्नपानयुक् । भूपतेरपि च पूजनं भवेद्भानुमालिनि बुधाब्दकं गते ॥६०॥ मस्तकव्यसनमक्षिपीडनं कुष्ठदद्रुबहुकण्ठपीडनम् । प्राणसंशययुतिर्नृणां भवेज्ज्ञायुषं व्रजति शीतदीधितौ ॥६१॥ अग्निभीतिरपि नेत्रजा रुजा चोरजं भयमतीव दुःखिता । स्थानहानिरथ वातरोगिता ज्ञायुषं हरति मेदिनीसुते ॥६२॥
॥ -> ॥५७॥ (ii) बुध की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : दुःख, शोक और कलह से मन व्याकुल रहे, जातक का बदन काँपे; शत्रुओं से समागम हो, खेत और सवारी नष्ट हो ॥५८॥ (iii) बुध की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : देवता, ब्राह्मण और गुरुओं का पूजन हो । दान और धर्म में जातक लगा रहे । वस्त्र और भूषणों की प्राप्ति हो । मित्रों से समागम हो ॥५९॥
Everything is checked and aligned accurately with the line markers.इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७५ मानहानिरथवाश्रयच्युतिः स्वक्षयोऽग्निविषतोयजं भयम् । मस्तकाक्षिजठरप्रपीडनं शीतरश्मिजदशां गतेऽसुरे ॥६३॥ व्याधिशत्रु भयविच्युतिर्भवे- द्ृ हासिद्धिरवनीशसत्कृतिः । धर्मसिद्धितपसां समुद्गमो देवमन्त्रिणि विदो दशां गते ॥६
४७६ फलदीपिका (iv) बुध की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : सुवर्ण, मूँगा, घोड़े और हाथियों सहित मकान की प्राप्ति हो, जातक को खाने, पीने का सुख रहे और राजा से सम्मान प्राप्त हो ॥६०॥ (v) बुध की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : सिर में पीड़ा, कण्ठ में बहुत अधिक पीड़ा, नेत्र विकार, कोढ़, दाद आदि की बीमारी का भय होता है। जातक के प्राणों का संशय उपस्थित हो जाता है ॥६१॥ हमारे विचार से दोनों बुध और चन्द्र में मारकत्व होने से ही ऐसा अनिष्टफल होगा अन्यथा नहीं। (vi) बुध की दशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : अग्नि से भय हो, नेत्र रोग हो, चोरी का भय हो, और जातक सदैव दुःखी रहे। जातक की स्थान हानि हो अर्थात् उसका पद या मकान छूट जावे, वात रोग से भी कष्ट होने की संभावना है। यह सब फल बुध की महादशा में जब मंगल की अन्तर्दशा जाती है तब होते हैं ॥६२॥ (vii) बुध की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : मस्तक, नेत्र तथा उदर में पीड़ा हो अपना क्षय हो अर्थात् रोग के कारण जातक का शरीर कमजोर होता चला जाय या जातक के धन का नाश हो। अग्नि, विष और जल से भय हो, जातक की मान हानि हो या जिस पद पर वह कायम हो उस पद से हटाया जाय ॥६३॥ (viii) बुध की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : शत्रुओं का नाश हो, रोग से निवृत्ति हो, धार्मिक बातों में सिद्धि प्राप्त हो और राजा से सम्मान मिले। तपस्या और धर्म की ओर विशेष अभिरुचि हो ॥६४॥ (ix) बुध की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : धर्म और अर्थ का नाश हो, सब कार्यों में विफलता मिले, वात और कफ के कारण रोग हों ॥६५॥
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७७ केतु की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल रिपुजनकलहं सुहृद्विरोधं त्वशुभवचः श्रवणं ज्वराङ्गदाहम् । गमनपरधाम्नि वित्तनाशं शिखिनि लभेत दशां गते स्वकीयाम् ॥६६॥ द्विजवरकलहः स्त्रिया विरोधः स्वकुलजनैरपि कन्यकाप्रसूतिः । परिभवजननं परोपतापो भवति सिते शिखिवत्सरान्तराले ॥६७॥ गुरुजनमरणं ज्वरावतारः स्वजनविरोधविदेशयानलाभः । नृपकृतकलहः कफानिलार्ति- र्विशति रवौ शिखिवत्सरान्तरालम् ॥६८॥ सुलभबहुधनं तथैव हानिः सुतविरहो बहुदुःखभाक्प्रसूतिः । परिजनयुवतिप्रजाप्रलाभः शशिनि यदा शिखिदायमभ्युपेते ॥६९॥ स्वकुलजकलहं स्वबन्धुनाशं भयमपि पन्नगजं वदन्ति चोरात् । हुतवहभयशत्रु पीडनं च व्रजति कुजे ध्वजनामखेचरायुः ॥७०॥
४७८ फलदीपिका अरिकृतकलहं नृपाग्निश्चौरै- भयमपि पन्नगजं वदन्ति तज्ज्ञाः । खलजनवचनं दुरिष्टचेष्टा तमसि गतेऽत्र शिखीन्द्रदायमाहुः ॥७१॥ सुतवरजननं सुरेन्द्रपूजा धरणिधनाप्तिरुपायनार्थसिद्धिः । धनचयजननं महीशमानो भवति गतेऽत्र गुरौ शिखीन्द्रदायम् ॥७२॥ परिजनविहतिं परोपतापं रिपुजनविग्रहमङ्गभङ्गतां च धनपदवियुतिं तथाहुराार्या गतवति सूर्यसुते शिखाधरायुः ॥७३॥ सुतवरजननं प्रभुप्रशस्तिः क्षितिधनसिद्धिररीश्वरप्रपीडा । पशुकृषिविहतिर्भवेत्तु पुंसां विशति बुधे शिखिवत्सरान्तरालम् ॥७४॥ (i) केतु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : शत्रुओं से कलह हो, मित्रों से विरोध हो, अशुभ वचन सुनने पड़ें, शरीर में बुखार तथा तपिश की बीमारी हो (शरीर के किसी भाग में जलन या दाह) । दूसरे के घर जाना पड़े और धन का नाश हो ॥६६॥ (ii) केतु की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : श्रेष्ठ ब्राह्मण से कलह हो, अपनी स्त्री तथा कुल के लोगों से
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४७९ विरोध हो, जातक के घर में कन्या का जन्म हो, जातक की मान- हानि हो या उसे नीचा देखना पड़े तथा उसे और लोगों से कष्ट पहुँचे ॥६७॥ (iii) केतु की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : किसी गुरुजन* का मरण हो, अपने आदमियों से विरोध हो, ज्वर से कष्ट हो, राजा या सरकार की ओर से कलह उपस्थित हो, वात या कफ जनित रोग हो, किन्तु विदेश जाने से लाभ हो ॥६८॥ (iv) केतु की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : अचानक बहुत धन का लाभ हो और बहुत धन का नुकसान भी हो, पुत्र से विरह हो, घर में ऐसी प्रसूति (बच्चा पैदा होना) हो जिसके कारण दुःख उठाना पड़े, नौकरों और कन्या-सन्तति का लाभ हो ।.६८।। (v) केतु की महादशा में मंगल की अन्तर्दशा का फल : अपने पुरखे लोगों से कलह हो, अपने बन्धुओं का नाश हो, सर्प, चोर और अग्नि से भय हो, शत्रु से पीड़ा हो ॥७०॥ (vi) केतु की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : शत्रुओं के कारण कलह उपस्थित हो, राजा से, अग्नि से और चोर से भय हो। दुष्ट लोगों की वाणी सुननी पड़े और दूसरे को हानि पहुँचाने वाले कर्म जातक करे ॥७०॥ (vii) केतु की महादशा में गुरु की अन्तर्दशा का फल : श्रेष्ठ पुत्र की उत्पत्ति हो, देवताओं का पूजन हो, पृथ्वी और धन की प्राप्ति हो अथवा भूमि से धन की प्राप्ति हो, काफी आमदनी *संस्कृत में गुरुजन का अर्थ गुरु या आचार्य ही नहीं होता है। पिता, चाचा, ज्येष्ठ भाई, मामा, ताऊ, मौसा, श्वशुर या गुरु—यह सब गुरुजन के अन्तर्गत आ जाते हैं। माता, दादी, बाबा आदि को भी गुरुजन में ही समझना चाहिये।
४८० फलदीपिका हो, जगह-जगह से भेट मिले। राजा या सरकार से सम्मान प्राप्त हो । इस अन्तर्दशा का फल उत्तम होगा ॥७२॥ (viii) केतु की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : नौकरों की हानि हो, दूसरों से कष्ट मिले, शत्रुओं से झगड़ा हो, जातक का कोई अंग-भंग हो, स्थान, (नौकरी या मकान) छूटे और धन की हानि हो । इस अन्तर्दशा का बहुत अनिष्ट फल है ॥७३॥ (ix) केतु की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : उत्तम पुत्र की उत्पत्ति हो, अपने मालिक से प्रशंसा प्राप्त हो, भूमि और धन की प्राप्ति हो किन्तु किसी बड़े शत्रु द्वारा जातक सताया जावे । पशु और खेती का नुकसान हो। इस अन्तर्दशा का मिश्रित फल है ॥७४॥ शुक्र की महादशा में विविध अन्तर्दशाओं का फल वसनभूषणवाहनचन्दना- द्यनुभवः प्रमदासुखसंपदः । द्युतियुतिः क्षितिपाद्धनलब्धयो भृगुसुते स्वदशां प्रविशत्यपि ॥७५॥ नयनकुक्षिकपोलगदोद्भवः क्षितिभृतो भयमस्ति शरीरिणाम् । गुरुकुलोद्भवबान्धवपीडनं भृगुसुतायुषि भानुमति स्थिते ॥७६॥ नखशिरोरदनक्षतिरुच्चकैः पवनपित्तरुगर्थविनाशनम् ।
इक्कीसवां अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४८१ ग्रहणिगुल्मकयक्ष्मकपीडनं सितवयोहृति तत्र हिमत्विषि ॥७७॥ रुधिरपित्तगदार्तिसमाश्रयः कनकताम्रचयावनिसंग्रहः । युवतिदूषणमुद्यमविच्युति- र्वृषभवल्लभवत्सरगे कुजे ॥७८॥ निधिभवः सुतलब्धिरभीष्टवाक् स्वजनपूजनमप्यरिबन्धनम् । दहनचोरविषोद्भवपीडनं तुलधरेश्वरवत्सरगेऽसुरे ॥७९॥ विविधधर्मसुरेशनमस्क्रिया भवति चात्मजवामहृदागमः । विविधराज्यसुखं च शरीरिणां कविदशाहृति कार्मुकनायके ॥८०॥ नगरयोधनृपोद्भवपूजनं प्रवरयोषिदवाप्तिरथास्ति वा । विविधवित्तपरिच्छदसंयुति- र्दितिपूजितदायगते शनौ ॥८१॥ तनयसौख्यसमागमसम्पदां निचयलब्धिरतिप्रभुता यशः । पवनपित्तकफार्तिररिच्युति र्दनुजमन्त्रिदशाहृति चन्द्रजे ॥८२॥
४८२ फलदीपिका सुतसुखादिबहिः स्थितिरग्निजं भयमतीव विनाशनमङ्गरुक् । अपि च वारवधूजनसंयुतिः शिखिनि यात्यलमौशनसीं दशाम् ॥८३॥ (i) शुक्र की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा का फल : वस्त्र, आभूषण, सवारी, चन्दन आदि खुशबूदार पदार्थ की प्राप्ति हो, स्त्री भोग, सुख और सम्पत्ति मिले। जातक के शरीर में कान्ति की वृद्धि हो । राजा से बहुत धन प्राप्त हो ॥७५॥ (ii) शुक्र की महादशा में सूर्य की अन्तर्दशा का फल : नेत्र, कुक्षि, कपोल इन स्थानों में बीमारी हो। राजा से भय प्राप्त हो अर्थात् राजा की तरफ से कोई टन्टा खड़ा हो । गुरुजन, कुटुम्ब के आदमी अथवा बन्धुओं को पीड़ा हो । इस अन्तर्दशा का फल उत्तम नहीं है ॥७६॥ (iii) शुक्र की महादशा में चन्द्रमा की अन्तर्दशा का फल : नख (नाखून), सिर और दाँतों में चोट लगे या पीड़ा हो । वायु और पित्त की बीमारियां हो, धन का नाश हो, संग्रहणी, यक्ष्मा अथवा गुल्म रोग से पीड़ा हो । (गुल्म पेट के अन्दर तिल्ली को कहते हैं ॥७७॥ (iv) शुक्र की महादशा में मगल की अन्तर्दशा का फल : रुधिरदोष तथा पित्त के कारण बीमारियाँ हों । सोना, तांबा और भूमि का संग्रह हो । जिस कार्य में मनुष्य लगा है वह कार्य छोड़ना पड़े। किसी युवती से अनुचित सम्बन्ध हो ॥७८॥
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४८३ (v) शुक्र की महादशा में राहु की अन्तर्दशा का फल : धन की प्राप्ति, पुत्र की उत्पत्ति आदि शुभ फल होते हैं। जातक उत्तम वाणी बोलता है, उसके कुल के लोग उसका आदर करते हैं और जातक अपने शत्रुओं पर विजयी होता है । हो सकता है कि जातक के शत्रु को जेल भी जाना पड़े। किन्तु जातक को स्वयं को भी कुछ कष्ट होता है । जातक को भी विष, अग्नि और चोर से पीड़ा हो ॥७९॥ (vi) शुक्र की महादशा में बृहस्पति की अन्तर्दशा का फल : नाना प्रकार के धर्म के कार्य बन पड़ें। देवताओं का पूजन हो । अपने पुत्र और स्त्रियों से समागम रहे और राज्य में नाना प्रकार के सुख मिलें अर्थात् उत्तम पद और अधिकार के कारण जातक को सुख मिले ॥८०॥ (vii) शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा का फल : सरकार से, सेना के लोगों से और नागरिकों से सम्मान प्राप्त हो । उत्तम स्त्री की प्राप्ति हो । नाना प्रकार का धनागम हो और सुख के अन्य उपकरण या साधनों की प्राप्ति हो ॥८१॥ (viii) शुक्र की महादशा में बुध की अन्तर्दशा का फल : पुत्र सुख हो, सम्पत्तियों का समागम हो; यश, प्रभुता और सुख की प्राप्ति हो । जातक के शत्रुओं का नाश हो किन्तु जातक का स्वयं का वात, पित्त, कफ इन त्रिदोषों में से किसी एक या अधिक दोषों से स्वास्थ्य बिगड़े ॥८२॥ (ix) शुक्र की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का फल : अग्नि से भय हो। शरीर के किसी अंग में पीड़ा हो । सम्पत्ति
४८४ फलदीपिका नष्ट हो, सुख की कमी रहे और वेश्याओं की संगति रहे । पुत्र से विरह हो ॥८३॥ दशापहारेषु फलं यदुक्तं वर्णाधिकारानुगुणं वदन्तु । छिद्रेषु सूक्ष्मेष्वपि तत्फलाप्तिः छायाङ्गवार्ताश्रवणानि वा स्युः ॥८४॥ ऊपर जो दशा अन्तर्दशा का फल कहा गया है; वह जातक की परिस्थिति, वह किस जाति का है, किस पद पर है, क्या कार्य करता है इन सब बातों का विचार कर कहना चाहिये । ऊपर के श्लोकों में केवल महादशा और अन्तर्दशा का फल बताया गया है। इन्हीं सिद्धान्तों को लागू कर प्रत्यन्तर्दशा आदि का फल भी कहना चाहिये अर्थात् “क” ग्रह की महादशा में “ख” ग्रह की जो अन्तर्दशा का फल है वही “क” ग्रह की अन्तर्दशा में “ख” ग्रह की प्रत्यन्तर्दशा का फल होगा। इसी प्रकार तारतम्य कर प्रत्यन्तर्दशा, सूक्ष्म दशा आदि का फल कहे । वराहमिहिर ने लिखा है कि जिस ग्रह की महादशा होती है उस ग्रह की छाया मनुष्य पर विद्यमान होती है और उस मनुष्य को देखकर यह कहा जा सकता है कि उस पर किस ग्रह का प्रभाव चल रहा है। सूर्य और मंगल का अग्नि तत्व है । चन्द्रमा और शुक्र का जल तत्व, बुध का पृथ्वी तत्व, बृहस्पति का आकाश तत्व और शनि का वायु तत्व । द्वितीय अध्याय में ग्रहों के पृथक्- पृथक् गुण दिये हैं । जिस ग्रह की महादशा होती है उसके लक्षण जातक में विशेष रहते हैं, उसकी आकृति और वचन भी ग्रह के प्रभाव अनुसार होते हैं। इन सब बातों से भी यह निष्कर्ष निकालना
इक्कीसवाँ अध्याय : प्रत्यन्तर्दशाफल ४८५ चाहिये कि जातक पर किस प्रकार का प्रभाव चल रहा है और तदनुसार ऊहापोह कर फल कहना चाहिये । जिसकी जन्म-कुंडली न हो उसके शरीर की कान्ति, छाया, उसकी चेष्टा, वाणी, क्रिया, व्यवहार आदि से यह पता लगाने की कोशिश करनी चाहिये कि किस ग्रह की महादशा, किसकी अन्तर्दशा, किसकी प्रत्यन्तर्दशा है । किन्तु जिसकी शुद्ध कुंडली सामने हो—उसमें अनुमान की अपेक्षा नहीं है ।
बाईसवां अध्याय मिश्रदशा दस्रादितः पादवशेन मेषान्- मीनांशकान्तं क्रमशोऽपसव्यम् । कीटाद्ध्यान्तं गणयेच्च सव्य- मार्गेण पादक्रमशोऽजतारात् ॥१॥ (i) अश्विनी से तीन नक्षत्र अश्विनी, भरणी, कृत्तिका इनके १२ चरण हुए । मेष, वृष, मिथुन, कर्क यह अश्विनी के ४ नवांश हुए । सिंह, कन्या, तुला वृश्चिक यह भरणी के चार नवांश हुए । धनु, मकर, कुंभ, मीन यह चार नवांश कृत्तिका के हुए । इस क्रम से १२ नवांशों से इन तीन नक्षत्रों को विभाजित कीजिये । (ii) रोहिणी से तीन नक्षत्र-रोहिणी, मृगशिर, आर्द्रा--इन तीन नक्षत्रों के १२ नवांश हुए। इनको वृश्चिक से उलटा गिनकर—अर्थात् वृश्चिक, तुला, कन्या, सिंह, कर्क, मिथुन, वृष, मेष, मीन, कुंभ, मकर, धनु इन १२ नवांशों में विभाजित कीजिये । रोहिणी प्रथम चरण का वृश्चिक, द्वितीय चरण का तुला.....इस क्रम से आर्द्रा चतुर्थ चरण का धनु नवांश हुआ । एवं भूयाच्चापसव्यं च सव्यं भानि त्रीणि त्रीणि विद्यात्क्रमेण । तद्राशीशप्रोक्तवर्षैर्दशास्य देवं प्राहुः कालचक्रे महान्तः ॥२॥
बाईसवाँ अध्याय : मिश्रदशा ४८७ इस प्रकार ऊपर (i) में जो क्रम बताया गया है उस क्रम से पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा को और (ii) में जो क्रम बताया गया है उस क्रम से मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी को; पुनः (i) में जो क्रम बताया गया है उसके अनुसार हस्त, चित्रा, स्वाती को और (ii) में जो क्रम है उस क्रम से, विशाखा, अनुराधा ज्येष्ठा को; फिर (i) वाले क्रम से मूल पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ और (ii) वाले क्रम से श्रवण, धनिष्ठा शतमिषा को और (i) वाले क्रम से पूर्वा- भाद्र, उत्तरा भाद्र, रेवती को विभाजित कीजिये : राशि की दशा उतने वर्ष की होती है—जितनी उस राशि के स्वामी की नीचे के श्लोक में बताई गई है ॥२॥ मनुः परः सनिर्धर्निर्नृपस्तपो वने क्रमात् । दिवाकरादिवत्सराः शुभाशुभाप्तिहेतवः ॥३॥ सूर्य के ५ वर्ष (सूर्य की राशि सिंह है—इसलिये सिंह के ५ वर्ष) चन्द्रमा के २१ वर्ष (चन्द्रमा की राशि कर्क है इसलिये कर्क के २१ वर्ष), मंगल की के ७ वर्ष की (मंगल की राशि मेष और वृश्चिक हैं— इस कारण मेष के ७ वर्ष और वृश्चिक के ७ वर्ष), बुध के ९ वर्ष (अर्थात् मिथुन के ९ वर्ष, कन्या के भी ९ वर्ष), बृहस्पति के १० वर्ष (इस कारण धनु के १० वर्ष, मीन के भी १० वर्ष), शुक्र के १६ वर्ष (इसलिये वृष और तुला दोनों के सोलह, सोलह वर्ष) शनि के ४ वर्ष (इसकी दो राशियाँ हैं—मकर और कुंभ इस कारण मकर के ४ वर्ष, कुंभ के भी ४ वर्ष) । अब जिस राशि की दशा हो—उस राशि और राशि के स्वामी के अनुसार कालचक्र दशा का फल कहने का नियम है। इस कारण केवल मेष राशि की दशा, या केवल मंगल की दशा इस कालचक्र दशा में नहीं कहते हैं किन्तु मेष-मंगल की दशा कहते हैं। इसी प्रकार वृश्चिक मंगल की दशा कहते हैं। मेष और