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प्रबोधसुधाकर (हिन्दी अनुवाद सहित)

Prabodhasudhakara with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished86 पृष्ठ

प्रबोधसुधाकर मन्दारपुष्पवासितमन्दानिलसेवितं परानन्दम् । मन्दाकिनीयुतपदं नमत महानन्ददं महापुरुषम् ॥ १८९ ॥ जो कल्पवृक्षके पुष्पोंकी गन्धसे युक्त मन्द-मन्द वायुसे सेवित हैं, परमानन्दस्वरूप हैं तथा जिनके चरण-कमलोंमें श्रीगंगाजी विराजमान हैं उन महानन्ददायक महापुरुषको नमस्कार करो । सुरभीकृतदिग्वलयं सुरभिशतैरावृतं सदा परितः । सुरभीतिक्षपणमहासुरभीमं यादवं नमत ॥ १९० ॥ जिन्होंने समस्त दिशाओंको सुगन्धित कर रक्खा है, जो चारों ओरसे सैकड़ों कामधेनु गौओंसे घिरे हुए हैं तथा देवताओंके भयको दूर करनेवाले और बड़े-बड़े राक्षसोंके लिये भयङ्कर हैं उन यदुनन्दनको नमस्कार करो । कन्दर्पकोटिसुभगं वाञ्छितफलदं दयार्णवं कृष्णम् । त्यक्त्वा कमन्यविषयं नेत्रयुगं द्रष्टुमुत्सहते ॥ १९१ ॥ जो करोड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर है, वाञ्छित फलके देने- वाले हैं, दयाके समुद्र हैं, उन श्रीकृष्णचन्द्रको छोड़कर ये नेत्र- युगल और किस विषयको देखनेके लिये उत्सुक होते हैं। पुण्यतमामतिसुरसां मनोऽभिरामां हरेः कथां त्यक्त्वा । श्रोतुं श्रवणद्वन्द्वं ग्राम्यकथामादरं वहति ॥ १९२॥ ५४

सगुण-निर्गुणकी एकता [ अहो ! खेदकी बात है कि ] अत्यन्त पवित्र, अति सुन्दर रसमयी और मनोहारिणी हरिकथाको छोड़कर ये कर्णयुगल अन्य ग्राम्य-वार्ताओंके सुननेमें श्रद्धा प्रकट करते हैं । दौर्भाग्यमिन्द्रियाणां कृष्णे विषये हि शाश्वतिके । क्षणिकेषु पापकरणेष्वपि सज्जन्ते यदन्यविषयेषु ॥ इन्द्रियोंका यह परम दुर्भाग्य ही है कि नित्य विद्यमान श्रीकृष्ण- रूप विषयके रहते हुए भी वे अन्य क्षणिक और पापमय विषयोंमें आसक्त हो जाती हैं । सगुण-निर्गुणकी एकता श्रुतिभिर्महापुराणैः सगुणगुणातीतयोरैक्यम् । यत्प्रोक्तं गूढतया तदहं वक्ष्येऽतिविशदार्थम् ॥१६४॥ श्रुतियों और महापुराणोंने जो सगुण और निर्गुणकी एकता गूढ़भावसे कही है, उसीको मैं स्पष्ट करके बतलाता हूँ । भूतेष्वन्तर्यामी ज्ञानमयः सच्चिदानन्दः । प्रकृतेः परः परात्मा यदुकुलतिलकः स एवायम्॥१६५॥ जो ज्ञानस्वरूप, सच्चिदानन्द, प्रकृतिसे परे परमात्मा सब भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं यह यदुकुल-भूषण श्रीकृष्ण वही तो है । ५५

विषय हैं ।

प्रबोधसुधाकर ननु सगुणो दृश्यतनुस्तथैकदेशाधिवासश्च । स कथं भवेत्परात्मा प्राकृतवद्रागरोषयुतः ॥१६६॥ [ यदि कहो कि ] यह श्रीकृष्ण तो सगुण है, दृश्य शरीरधारी है, एकदेशी है तथा साधारण पुरुषोंके समान रागद्वेषयुक्त है; यह परमात्मा कैसे हो सकता है ? इतरे दृश्यपदार्था लक्ष्यन्तेऽनेन चक्षुषा सर्वे । भगवाननया दृष्ट्या न लक्ष्यते ज्ञानदृग्गम्यः ॥१६७॥ [ तो इस विषयमें यह विचारना चाहिये कि ] इन चर्म- चक्षुओंसे तो अन्य सब दृश्य-पदार्थ ही जाने जा सकते हैं, इनसे भगवान् दिखायी नहीं दे सकते; वे तो ज्ञान-दृष्टिके ही विषय हैं । यद्विश्वरूपदर्शनसमये पार्थाय दत्तवान्भगवान् । दिव्यं चक्षुस्तस्माददृश्यता युज्यते नृहरौ ॥१६८॥ भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखलाते समय अर्जुनको दिव्य- दृष्टि दी थी, इससे उन नररूप हरिकी अदृश्यता सिद्ध ही है; [ क्योंकि चर्म-चक्षुओंसे न देख सकनेके कारण ही तो उन्होंने अर्जुनको दिव्य-दृष्टि दी थी ] । साक्षाद्यथैकदेशे वर्तुलमुपलभ्यते रवेर्बिम्बम् । विश्वं प्रकाशयति तत्सर्वैः सर्वत्र दृश्यते युगपत् ॥ ५६

सगुण-निर्गुणकी एकता जिस प्रकार गोलाकार सूर्य-मण्डल साक्षात् एक देशमें ही दिखायी देता है, किन्तु वह सम्पूर्ण जगत्‌को प्रकाशित करता है और सबको एक साथ ही सब जगह दीखता भी है । यद्यपि साकारोऽयं तथैकदेशी विभाति यदुनाथः । सर्वगतः सर्वात्मा तथाप्ययं सच्चिदानन्दः ॥२००॥ उसी प्रकार यदुनाथ श्रीकृष्णचन्द्र यद्यपि साकार हैं और एकदेशी-से दिखायो देते हैं तथापि वे सर्वव्यापी, सर्वात्मा और सच्चिदानन्दस्वरूप ही हैं । एको भगवानरेमे युगपद्गोपीष्वनेकासु । अथवा विदेहजनकश्रुतदेवभूदेवयोर्हरिर्युगपत्॥२०१॥ देखो, एक ही भगवान्‌ने एक साथ अनेक गोपियोंके साथ रमण किया तथा विदेह जनक और श्रुतदेव ब्राह्मण दोनोंके घरोंमें एक ही साथ आतिथ्य ग्रहण किया । अथवा कृष्णाकारां स्वचमूं दुर्योधनोऽपश्यत् । तस्माद्व्यापक आत्मा भगवान्हरिरीश्वरः कृष्णः॥२०२॥ इनके अतिरिक्त दुर्योधनने भी अपनी समस्त सेनाको श्रीकृष्णरूप ही देखा था । इससे विदित होता है कि श्रीकृष्णचन्द्र व्यापक आत्मा ईश्वर हरि ही हैं । ७७

प्रबोधसुधाकर वक्षसि यदा जघान श्रीवत्सः श्रीपतेः स किं द्वेष्यः । भक्तानामसुराणामन्येषां वा फलं सदृशम् ॥२०३॥ जब भृगुजीने भगवान्‌के वक्षःस्थलमें पाद-प्रहार किया था तो क्या वे उन श्रीपतिके द्वेष्य हो गये थे ? [ नहीं, उन्हें तो सभी समान हैं ] भक्त, असुर और अन्य पुरुषोंको भी वे एक-सा ही फल देते हैं । तस्मान्न कोऽपि शत्रुनों मित्रं नाप्युदासीनः । नृहरिः सन्मार्गस्थः सफलः शाखीव यदुनाथः॥२०४॥ इसलिये भगवान्‌का न कोई मित्र है, न शत्रु है और न उदासीन है । श्रीनृहरि तो सुन्दर मार्गपर लगे हुए एक फलयुक्त वृक्षके समान हैं । लोहशलाकानिवहैः स्पर्शाश्मनि भिद्यमानेऽपि । स्वर्णत्वमेति लौहं द्वेषादपि विद्विषां तथा प्राप्तिः॥२०५॥ पारसको यदि लोहेकी शलाकाओंसे भेदा भी जाय तो भी उनका लोहा सुवर्ण हो जाता है, इसी प्रकार शत्रुओंको द्वेषसे भी भगवान्‌की प्राप्ति हो जाती है । नन्वात्मनः सकाशादुत्पन्ना जीवसन्ततिश्रेयम् । जगतः प्रियतर आत्मा तत्प्रकृते नैव सम्भवति॥२०६॥ ५८

सगुण-निर्गुणकी एकता शंका—आत्मासे तो इन समस्त जीवोंकी उत्पत्ति हुई है और संसारमें सबसे अधिक प्रिय भी आत्मा ही है, किन्तु श्री- कृष्णचन्द्रमें यह बात नहीं मिल सकती । वत्साहरणावसरे पृथग्वयोरूपवासनाभूषान् । हरिरजमोहं कर्तुं स वत्सगोपान्विनिर्ममे स्वस्मात्॥२०७॥ समाधान—बछड़ोंको चुरा लेनेके समय ब्रह्माको मोहित करनेके लिये भगवान्‌ने पृथक्-पृथक् अवस्था, रूप, वासनाओं और भूषणोंसे युक्त गोप और बछड़ोंको अपने आपसे ही बना लिया था । अग्नेर्यथा स्फुलिङ्गाः क्षुद्रास्तु व्युच्चरन्तीति । श्रुत्यर्थं दर्शयितुं स्वतनोरतनोत्स जीवसन्दोहम्॥२०८॥ 'जिस प्रकार अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं उसी प्रकार आत्मासे विविध प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है'—इस श्रुतिके अर्थको सिद्ध करनेके लिये ही भगवान्‌ने अपने शरीरसे उस जीव-समूहको रचा था । यमुनातीरनिकुञ्जे कदाचिदपि वत्सकांश्च चारयति । कृष्णे तथार्यगोपेषु च वरगोष्ठेषु चारयत्स्वारात् ॥२०९॥ वत्सं निरीक्ष्य दूराद्गावः स्नेहेन सम्भ्रान्ताः । तदभिमुखं धावन्त्यः प्रययुर्गोपैश्च दुर्वाराः ॥२१०॥ ५९

प्रबोधसुधाकर एक दिन जब श्रीकृष्णचन्द्र यमुनाके तटपर एक कुञ्जमें बछड़ोंको चरा रहे थे और पास ही दूसरे गोष्ठमें वृद्ध गोपगण गौओंको चरा रहे थे तो गौएँ दूरसे ही अपने बछड़ोंको देखकर स्नेहसे व्याकुल हो उनकी ओर दौड़कर चलीं तथा गोपोंके बहुत कुछ रोकनेपर भी न रुक सकीं । प्रस्रवभरेण भूयः स्रुतस्तनाः प्राप्य पूर्ववद्वत्सान् । पृथुरसनया लिहन्त्यस्तर्णकवत्योऽप्यपाययन्प्रमुदा ॥ दूधके उमड़नेसे उनके स्तन पुनः-पुनः बहने लगे और जिनके नये बछड़ोंने जन्म ले लिया था उन्होंने भी उमङ्गमें भर- कर अपने बछड़ोंको पूर्ववत् लंबी-लंबी जीभोंसे चाटते हुए खूब दूध पिलाया । गोपा अपि निजबालाञ्जगृहुर्मूर्धानमाघ्राय । इत्थमलौकिकलाभस्तेषां तत्र क्षणं ववृधे ॥२१२॥ गोपोंने भी अपने-अपने बालकोंका सिर सूँघते हुए उन्हें उठा लिया । इस प्रकार उस समय एक क्षणके लिये वहाँ अलौकिक उत्साहकी वृद्धि हुई । गोपा वत्साश्चान्ये पूर्वं कृष्णात्मका ह्यभवन् । तेनात्मनः प्रियत्वं दर्शितमेतेषु कृष्णेन ॥२१३॥ ६०

सगुण-निर्गुणकी एकता ये सब ग्वालबाल और बछड़े पहले श्रीकृष्णरूप ही तो थे; इसलिये ऐसा करके श्रीकृष्णचन्द्रने इनमें अपनी प्रियतमताको दिखा दिया। प्रेयः पुत्राद्वित्तात्प्रेयोऽन्यस्माच्च सर्वस्मात् । अन्तरतरं यदात्मेत्युपनिषदः सत्यतामभिहिता॥२१४॥ उपनिषदोंने जो कहा है कि आत्मा पुत्रसे, वित्तसे तथा अन्य समस्त वस्तुओंसे भी प्रियतर और आन्तरिक है, उसको भगवान्‌ने सत्य करके दिखा दिया। नन्वूच्चावचभूतेष्वात्मा सम एव वर्ततेऽथ हरिः। दुर्योधनेऽर्जुने वा तरतमभावं कथं नु गतवान्सः।२१५। शंका—आत्मा तो ऊँच-नीच सभी प्राणियोंमें समान है, फिर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुन और दुर्योधन आदिमें विषमभाव क्यों किया ? बधिरान्धपङ्‌गुमूका दीर्घाः खर्वाः सरूपाश्च । सर्वे विधिना दृष्टाः सवत्सगोपाश्चतुर्भुजास्तेन ॥२१६॥ समाधान—ब्रह्माने वहरे, अन्धे, पङ्गु, मूक, छोटे, बड़े सभी वछड़ोंको और ग्वालोंको चतुर्भुजरूप ही देखा था। भूतसमत्वं नृहरेः समो हि मशकेन नागेन । लोकैः समस्त्रिभिर्वेत्युपनिषदा भाषितः साक्षात्।२१७। ६१

प्रबोधसुधाकर उपनिषदोंने भी मच्छरसे लेकर हाथीपर्यन्त त्रिलोकीके समस्त जीवोंमें भगवान्‌की समता साक्षात् बतायी है । आत्मा तावदभोक्ता तथैव ननु वासुदेवश्चेत् । नानाकैतव्यनैः पररमणीभिः कथं रमते ॥२१८॥ शंका—आत्मा तो अभोक्ता है; यदि वासुदेव भी साक्षात् आत्मा ही हैं तो उन्होंने नाना प्रकारके छल-छन्दोंसे पर-स्त्रियोंके साथ रमण क्यों किया ? सुन्दरमभिनवरूपं कृष्णं दृष्ट्वा विमोहिता गोप्यः । तमभिलषन्त्यो मनसा कामाद्विरहव्यथां प्रापुः ॥२१९॥ समाधान—उन अति मनोहर, अभिनवरूप श्रीकृष्णचन्द्र- को देखकर मोहित हुई गोपियाँ ही उनकी मन-ही-मन इच्छा करती थीं और [ उनके न मिलनेपर ] कामातुरा होकर अत्यन्त विरहाकुला हो जाती थीं । गच्छन्त्यस्तिष्ठन्त्यो गृहकृत्यपराश्च भुञ्जानाः । कृष्णं विनान्यविषयं समक्षमपि जातु नाविन्दन्।२२०। चलते-फिरते, उठते-बैठते, घरके कामोंको करते तथा भोजनादि करते हुए हर समय श्रीकृष्णचन्द्रके अतिरिक्त उन्हें सामने पड़ी हुई भी कोई वस्तु दिखायी नहीं देती थी । [ उन्हें सभी पदार्थ श्रीकृष्णमय प्रतोत होते थे । ] ६२

सगुण-निर्गुणकी एकता दुःसहविरहभ्रान्त्या स्वपतीन्ददृशुस्तरून्नरांश्च पशून् । हरिरयमिति सुप्रीताः सरभसमालिङ्गयाञ्चक्रुः॥२२१॥ दुःसह विरह-व्यथाके कारण उत्पन्न हुए भ्रमसे अपने पति, वृक्ष, मनुष्य और पशु आदिको भी 'ये हरि ही हैं' ऐसा जानकर वे प्रेमविभोर होकर अति वेगसे आलिङ्गन कर लेती थीं । कापि च कृष्णायन्ती कस्याश्चित्पूतनायन्त्याः । अपिबत्स्तनमिति साक्षाद्व्यासो नारायणः प्राह॥२२२॥ साक्षात् नारायण भगवान् व्यासने भी कहा है कि कोई गोपी कृष्ण बनकर पूतना बनी हुई दूसरी गोपीका स्तन-पान करती थी । तस्मान्निजनिजदयितान्कृष्णाकारान्व्रजस्त्रियो वीक्ष्य । स्वपरनृपतिपत्नीनामन्तर्यामी हरिः साक्षात् ॥२२३॥ अतः यह सिद्ध होता है कि व्रजबालाएँ अपने-अपने पतियोंको कृष्णरूप देखकर उन्हींको आलिङ्गन करती थीं और यह समझती थीं कि यह श्रीकृष्ण ही अपने-पराये समस्त मानव पति-पत्नियोंके साक्षात् अन्तर्यामी हैं । परमार्थतो विचारे गुडतन्मधुरत्वदृष्टान्तात् । नश्वरमपि नरदेहं परमात्माकारतां याति ॥२२४॥ ६३

प्रबोधसुधाकर वास्तवमें विचार किया जाय तो गुड़ और उसकी मधुरताके अभेदके समान यह नाशवान् मनुष्य-शरीर भी परमात्मारूप ही प्रतीत होगा। किं पुनरनन्तशक्तेर्लीलावपुरीश्वरस्येह । कर्माण्यलौकिकानि स्वमायया विदधतो नृहरेः॥२२५॥ फिर अपनी मायासे अलौकिक कर्म करनेवाले अनन्तशक्ति ईश्वर नृहरिके लीलामय शरीरकी तो बात ही क्या है ? मृद्भक्षणेन कुपितां विकसितवदनां स्वमातरं वक्त्रे । विश्वमदर्शयदखिलं किं पुनरथ विश्वरूपोऽसौ ॥२२६॥ मिट्टी खानेपर कुपित होकर माता यशोदाने जब मुँह खोला तो जिन्होंने उस (मुख) में ही सारा ब्रह्माण्ड दिखा दिया, वे ही यदि स्वयं विश्वरूप हो गये तो क्या आश्चर्य है ? अनुग्रह विषविषमस्तनयुगलं पाययितुं पूतना गृहं प्राप्ता । तस्याः पृथुभाग्याया आसीत्कृष्णार्पणो देहः ॥२२७॥ देखो, पूतना स्तनोंमें विषम विष लगाकर उन्हें पिलानेके लिये घरमें आयी थी, किन्तु उस बड़भागिनीका शरीर श्रीकृष्णके अर्पण हो गया ! ६४

अनुग्रह अनयत्पृथुतरशकटं निजनिकटं वा कृतापराधमपि। कण्ठाश्लेषविशेषादवधीद्बाल्येऽसुरं कृष्णः ॥२२८॥ शकटासुर बड़ा अपराधी था तथापि भगवान् कृष्णने उसे अपने निकट बुला लिया [अर्थात् उसे मारकर अपना धाम दिया], और बाल्यावस्थामें ही उन्होंने [तृणावर्त] असुरको गला घोंटकर मार डाला। यमलार्जुनौ तरू उन्मूल्योलूखलगतश्चिरं खिन्नौ। रिङ्गन्नङ्गणभूमौ स्वमालयं प्रापयन्नृहरिः ॥२२९॥ चिरकालसे दुःखी यमलार्जुन-वृक्षोंको ऊखलमें बँधे-बँधे ही अपने घरके आँगनमें रेंगते हुए श्रीकृष्णने उखाड़कर अपने लोक- को भेज दिया। नित्यं त्रिदशद्वेषी येन च मृत्योर्वशीकृतः केशी। काकः कोऽपि वराको बकोऽप्यशोकं गतो लोकम् ॥ उन श्रीकृष्णचन्द्रने ही देवताओंसे नित्य द्वेष करनेवाले केशीका वध किया और [उन्हींकी कृपासे] बेचारे तुच्छ काकासुर और बकासुर भी शोकरहित लोकोंको गये। गोगोपीगोपानां निकरमहिं पीडयन्तमतिवेगात्। अनघमघासुरमकरोत्पृथुतरमुरगेश्वरं भगवान्॥२३१॥ ६५

प्रबोधसुधाकर बड़े भारी अजगर-रूप अघासुरको, जो गौवों, गोपों और गोपियोंको अपने पेटमें डालकर अति पीड़ा पहुँचा रहा था, मारकर भगवान्ने अनघ (निष्पाप) कर दिया । पीत्वारण्यहुताशनमसह्यतत्तेजसो हेतोः । दग्धान्मुग्धानखिलाञ्जुगोप गोपान्कृपासिन्धुः ॥२३२॥ जो अपने तेजके कारण अति असह्य था, वनमें लगे हुए उस दावानलको पीकर उसके कारण दग्ध और मुग्ध हुए समस्त गोपोंकी कृपासागर भगवान्ने रक्षा की । पातुं गोकुलमाकुलमशनितडिद्वर्षणैः कृष्णः । असहाय एकहस्ते गोवर्धनमुद्धधारोच्चैः ॥२३३॥ वज्र, बिजली और वर्षासे व्याकुल गोकुलकी रक्षा करनेके लिये कृष्णचन्द्रने बिना किसीकी सहायताके ही एक हाथपर गोवर्धन-पर्वतको उठा लिया । वासोलोभाकलितं धावद्रजकं शिलातलैर्हत्वा । विस्मृत्य तदपराधं वैकुण्ठवासोऽर्पितस्तस्मै ॥२३४॥ वस्त्रोंके लोभसे भागते हुए धोबीको पत्थरोंसे मारकर भगवान्ने उसके अपराधको भूलकर उसे वैकुण्ठ-वास दिया । त्रेधा वक्रशरीरामतिलम्बोष्ठीं स्खलद्द्रुपूर्वचनाम् । स्रक्चन्दनपरितोषात्कुब्जामृज्वाननामकरोत् ॥२३५॥ ६६

अनुग्रह तीन ओरसे टेढ़े शरीरवाली और अति लंबे-लंबे होठों- वाली कुब्जाको जिसके शरीर और वाणी प्रेमवश कम्पायमान हो रहे थे, केवल माला और चन्दनसे ही सन्तुष्ट होकर, सुन्दरी सुमुखी बना दिया । निहतः पपात हरिणा हरिचरणाग्रेण कुवलयापीडः । तुङ्गोन्मत्तमतङ्गः पतङ्गवद्दीपकस्याग्रे ॥२३६॥ बड़ा ऊँचा और मदोन्मत्त कुवलयापीड हाथी भगवान् हरिके चरणकी ठोकरसे मारा जाकर इस प्रकार गिरा जैसे दीपकके सामने पतङ्ग गिरता है। युद्धमिषात्सह रङ्गे श्रीरङ्गेनाङ्गसङ्गमं प्राप्य । मुष्टिकचाणूराख्यौ ययतुर्निःश्रेयसं सपदि ॥२३७॥ युद्धके मिषसे ही रङ्गभूमिमें श्रीरमानाथका अङ्ग-सङ्ग पाकर मुष्टिक और चाणूर नामके पहलवान तुरन्त मोक्षपदको प्राप्त हो गये। देहकृतादपराधाद्वैकुण्ठोत्कण्ठितान्तरात्मानम् । यदुवरकुलावतंसः कंसं विध्वंसयामास ॥२३८॥ अपने देहकृत अपराधोंसे ही वैकुण्ठ-प्राप्तिकी उत्कण्ठावाले कंसको यदुकुलभूषण कृष्णचन्द्रने नष्ट कर दिया । हरिसन्दर्शनयोगात्पृथुरणतीर्थे निमज्जते तस्मै । भगवान्नु प्रदद्याद्यः सद्यश्रैद्याय सायुज्यम् ॥२३९॥ ६७

प्रबोधसुधाकर हरिके दर्शनका सुयोग मिल जानेसे अति महान् युद्ध-तीर्थमें डूब जानेवाले उस चेदिराज शिशुपालको भगवान्ने तुरन्त सायुज्य- मुक्ति दे दी। मीनादिभिरवतारैर्निहताः सुरविद्विषो बहवः । नीतास्ते निजरूपंतत्र च मोक्षस्य का वार्ता ॥२४०॥ मत्स्यादि अवतारोंमें भगवान्ने जिन-जिन अनेकों देव- द्रोहियोंको मारा उन सभीको अपना ही रूप दे दिया, मोक्षकी तो बात ही क्या है ? ये यदुनन्दननिहतास्ते तु न भूयः पुनर्भवं प्रापुः । तस्मादवताराणामन्तर्यामी प्रवर्तकः कृष्णः ॥२४१॥ यदुनन्दनने जिन-जिनका वध किया उनको तो फिर पुनर्जन्मकी प्राप्ति हुई नहीं; अतः समस्त अवतारोंके प्रवर्तक अन्तर्यामी श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं। ब्रह्माण्डानि बहूनि पङ्कजभवान्प्रत्यण्डमत्यद्भुता- न्गोपान्वत्सयुतानदर्शयदजं विष्णूनशेषांश्च यः । शम्भुर्यच्चरणोदकं स्वशिरसा धत्ते च मूर्तित्रया- त्कृष्णो वै पृथगस्ति कोऽप्यविकृतः सच्चिन्मयो नीलिमा जिन्होंने ब्रह्माजीको अनेक ब्रह्माण्ड, प्रत्येक ब्रह्माण्डमें जुदे- जुदे अति अद्भुत ब्रह्मा, वत्सोंके सहित समस्त गोपों तथा [भिन्न- भिन्न ब्रह्माण्डोंके] समस्त विष्णु दिखाये; और जिनके चरणोदकको ६८

अनुग्रह श्रीशङ्कर अपने शिरपर धारण करते हैं वे श्रीकृष्ण त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) से भिन्न कोई अविकारिणी सच्चिदानन्द- मयी नीलिमा हैं। कृपापात्रं यस्य त्रिपुररिपुरम्भोजवसतिः सुता जह्नोः पूता चरणनखनिर्णेजनजलम् । प्रदानं वा यस्य त्रिभुवनपतित्वं विभुरपि निदानं सोऽस्माकं जयति कुलदेवो यदुपतिः ॥२४३॥ त्रिपुरारि शिव और कमलासन ब्रह्मा जिनकी कृपाके पात्र हैं, परमपावन श्रीगंगाजी जिनके चरण-नखका धोवन हैं तथा त्रिलोकीका राज्य जिनका दान है वे सर्वव्यापक और हम सबके आदि- कारण तथा कुलदेव श्रीयदुनाथ सदा विजयी हो रहे हैं। मायाहस्तेऽर्पयित्वा भरणकृतिकृते मोहमूलोद्भवं मां मातः कृष्णाभिधाने चिरसमयमुदासीनभावं गतासि । कारुण्यैकाधिवासे सकृदपि वदनं नेक्षसे त्वं मदीयं तत्सर्वज्ञे न कर्तुं प्रभवति भवती किं नु मूलस्य शान्तिम् हे कृष्णनाम्नी मातेश्वरि ! मोहरूपी मूलनक्षत्रमें उत्पन्न हुए मुझ पुत्रको भरण-पोषणके लिये मायाके हाथोंमें सौंपकर तू बहुत दिनोंसे मेरी ओरसे उदासीन हो गयी है । अरी एकमात्र करुणा- मयी माँ ! तू एक बार भी मेरा मुख नहीं देखती ? हे सर्वज्ञे ! क्या तू उस मोहरूपी मूलकी शान्ति करनेमें समर्थ नहीं है ? ६९

प्रबोधसुधाकर उदासीनः स्तब्धः सततमगुणः सङ्गरहितो भवांस्तातः कातः परमिह भवेज्जीवनगतिः । अकस्मादस्माकं यदि न कुरुते स्नेहमथ त- द्वसस्व स्वीयान्तर्विमलजठरेऽस्मिन्पुनरपि ॥२४५॥ आप हमारे पिता तो उदासीन, निष्क्रिय, सदा निर्गुण और असंग ठहरे; अतः अब हमारे जीवनकी और क्या गति होगी। अच्छा यदि आप हमसे अकारण ही स्नेह नहीं कर सकते तो अपने निर्मल निवास-स्थानरूप इस अन्तःकरणमें तो बसो । लोकाधीश त्वयीशे किमिति भवभवा वेदना स्वाश्रितानां सङ्कोचः पङ्कजानां किमिह समुदिते मण्डले चण्डरश्मेः। भोगः पूर्वार्जितानां भवति भुवि नृणां कर्मणां चेदवश्यं तन्मे दृष्टैर्नृपुष्टैर्ननु दनुजनृपैरूर्जितं निर्जितं ते ॥२४६॥ आप लोकाधीश स्वामीके रहते हुए आपके आश्रितोंको संसारजन्य क्लेश क्यों उठाना पड़ता है ? क्या सूर्यमण्डलके उदय होनेपर भी कमल कभी मुरझाते हैं ? यदि कहो कि संसारमें मनुष्योंको अपने पूर्वकृत कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है, तो मनुष्योंके मांससे पुष्ट हुए उन मेरे जाने हुए दैत्यराजोंने अवश्य आपके बलको जीत लिया था । ७०

अनुग्रह नित्यानन्दसुधानिधेरधिगतः सन्नीलमेघः सता- मौत्कण्ठ्यप्रबलप्रभञ्जनभरैराकर्षितो वर्षति । विज्ञानामृतमद्भुतं निजवचोधाराभिरारादिदं चेतश्चातक चेन्न वाञ्छसि मृषाक्रान्तोऽसि सुप्तोऽसि किम् नित्यानन्दरूपी अमृतके समुद्रसे निकला हुआ और सज्जनों- की उत्कण्ठारूप प्रबल वायुसे उड़ाकर लाया हुआ सत्स्वरूप नीलमेघ तेरे पास ही अद्भुत विज्ञानामृतकी अपने वचनरूपी धाराओंमें वर्षा कर रहा है। अरे चित्तरूपी पपीहे ! यदि तुझे उसे पीनेकी इच्छा नहीं होती तो तुझे व्यर्थ ही किसीने पकड़ रक्खा है, या तू सो गया है ? चेतश्चञ्चलतां विहाय पुरतः सन्धाय कोटिद्वयं तत्रैकत्र निधेहि सर्वविषयानन्यत्र च श्रीपतिम् । विश्रान्तिर्हितमप्यहो क्व नु तयोर्मध्ये तदालोच्यतां युक्त्या वानुभवेन यत्र परमानन्दश्च तत्सेव्यताम् ॥ अरे चित्त ! चञ्चलताको छोड़कर अपने सामने तराजूके दोनों पलड़ोंको रख; उनमेंसे एकमें समस्त विषयोंको और दूसरेमें भगवान् श्रीपतिको रख। उन दोनोंमेंसे किसमें अधिक शान्ति और हित है इसका विचार कर, और युक्ति तथा अनुभवसे जिसमें परमानन्दकी प्रतीति हो उसीका सेवन कर। ७१

प्रबोधसुधाकर पुत्रान्पौत्रमथ स्त्रियोऽन्ययुवतीर्वित्तान्यथोऽन्यद्धनं भोज्यादिष्वपि तारतम्यवशतो नालं समुत्कण्ठया । नैतादृग्यदुनायके समुदिते चेतस्यनन्ते विभौ सान्द्रानन्दसुधार्णवे विहरति स्वैरं यतो निर्भयम् ॥ पुत्र, पौत्र, स्त्रियाँ, अन्य युवतियाँ, विभव तथा अन्य प्रकार- के धन और भोज्य आदि पदार्थोंमें तारतम्य होनेसे इनमें कभी उत्कण्ठाकी शान्ति नहीं होती; किन्तु अनन्त और अति गम्भीर आनन्दामृतसिन्धु श्रीयदुनायकके चित्तमें उदय होकर स्वच्छन्द विहार करनेपर ऐसा नहीं होता, क्योंकि उस समय चित्त स्वच्छन्द एवं निर्भय हो जाता है। काम्योपासनयार्थयन्त्यनुदिनं किञ्चित्फलं स्वेप्सितं केचित्स्वर्गमथापवर्गमपरे योगादियज्ञादिभिः । अस्माकं यदुनन्दनाङ्घ्रियुगलध्यानावधानार्थिनां किं लोकेन दमेन किं नृपतिना स्वर्गापवर्गैश्च किम् ॥ कोई लोग तो सकाम उपासनाके द्वारा नित्यप्रति अपने किसी अभीष्ट फलकी प्रार्थना किया करते हैं, और कोई योग तथा यज्ञादि अन्य साधनोंसे स्वर्ग और अपवर्गकी याचना करते हैं। किन्तु श्रीयदुनाथके चरण-कमलोंके ध्यानमें ही सावधान रहनेके इच्छुक हमलोगोंको लोकसे, दमसे, राजासे, स्वर्गसे और अपवर्गसे क्या काम है ? ७२

अनुग्रह आश्रितमात्रं पुरुषं स्वाभिमुखं कर्षति श्रीशः । लोहमपि चुम्बकाश्मा सम्मुखमात्रं जडं यद्वत् ॥२५१॥ भगवान् श्रीपति अपने आश्रितमात्र पुरुषको अपनी ओर इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे सामने आये हुए जड लोहेको चुम्बक खींच लेता है । अयमुत्तमोऽयमघमो जात्या रूपेण सम्पदा वयसा । श्लाघ्योऽश्लाघ्यो वेत्थं न वेत्ति भगवाननुग्रहावसरे ॥ भगवान् कृपा करते समय यह नहीं देखते कि जाति, रूप, सम्पत्ति और अवस्थाके विचारसे अमुक पुरुष तो उत्तम है और अमुक अधम । अन्तःस्थभावभोक्ता ततोऽन्तरात्मा महामेघः । खदिरश्चम्पक इव वा प्रवर्षणं किं विचारयति ॥२५३॥ यह अन्तर्यामी परमात्मारूप महामेघ पुरुषके आन्तरिक भावका ही भोक्ता है । वर्षाके समय मेघ यह कब विचारता है कि यह तो खदिर (खैर) है और यह चम्पा है । यद्यपि सर्वत्र समस्तथापि नृहरिस्तथाप्येते । भक्ताः परमानन्दे रमन्ति सदयावलोकेन ॥२५४॥ यद्यपि भगवान् सर्वत्र समान हैं तथापि वे नृहरि (मनुष्यरूप हरि) भी हैं; तथा ये भक्तजन उनकी दयामयी दृष्टिसे नित्य परमानन्दमें मग्न रहते हैं । ७३