राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
३५६ राजतरंगिणी उपेक्षितस्य निर्द्रोहैर्यतन्ताऽजितात्मनः । अथ लब्धबलास्तस्य नाशाय द्रोहिमन्त्रिणः ॥३६०॥ ३६०. शुभचिन्तकों द्वारा उपेक्षित एवं स्वच्छन्द इस राजा के नाशहेतु शक्तिशाली द्रोही मन्त्रियों ने यत्न किया । पादटिप्पणियाँ : ३६० (१) राजतन्त्र : प्राचीन भारत में राज- तन्त्र, कहीं वंशपरम्परागत उत्तराधिकार द्वारा ज्येष्ठ पुत्र अथवा प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार नियमानुसार सगोत्र सपिण्डादि को राज्य मिलता था । उनके अभाव में बन्धुओं को जाता था ; अथवा उसका निर्वाचन जनता किंवा मन्त्री एवं परिषदादि करती थी । कल्हण ने निर्वाचित राजा का वर्णन राज- तरंगिणी (७:७०३) में किया है । किस प्रकार परिषद् ने मिलकर कश्मीर के राजा का निर्वाचन किया था । कश्मीर राजा को कल्हण ने महाशार्वय की उपमा दी (८० १:१४१) है । श्री रणजीत सीताराम पण्डित राजतरंगिणी के अनुवाद में इस पर टिप्पणी लिखते हुए कहते हैं- 'इससे प्रकट होता है कि कश्मीर में राजाओं का मूलस्वरूप निर्वाचनीय था । उत्तराधिकार निर्वाचन पर निर्भर था।' सम्भवतः बौद्धो के संघ प्रथा का प्रभाव था । संघ में निर्वाचन द्वारा कार्य सम्पन्न होता था । संघ में पद निर्वाचन द्वारा प्राप्त होते थे । प्राचीन भारत में जनता दुर्बल राजाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली थी । अतएव प्राचीन संस्कृत वाङ्मय में राजाओं के राज्यच्युत, निर्वासित करने की अनेक घटनाएं मिलती हैं । शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है । धिज्यराज को जनता ने राज्यच्युत कर दिया था । उसके वंश ने दस पीढ़ियों तक राज्य किया था । पंचविंश ब्राह्मण में राजाओं के हटाने के दो उदा- हरण मिलते हैं । वे दीर्घश्रव तथा सिन्धुक्षित थे । (१२:१२, ६ तथा १५:३, २५) । विष्णुपुराण में राजा वेणु की कथा प्रसिद्ध है । वह राज्यच्युत कर मार डाला गया था । (विष्णु पुराण अंश १ अध्याय १३) । भारतीय राजनीति के सिद्धान्त का जहाँ तक मैं अध्ययन कर सका हूँ, वह जनता के विप्लव, एवं विद्रोह के अधिकार को, दुराचारी, आततायी, क्रूर, एवं प्रजाभक्षक, शोषक राजा के विरुद्ध स्वीकार करता है । यद्यपि यह सिद्धान्त भी स्वीकार करता है। राजा देवता का अंश है। किन्तु यह भी साधिकार घोषणा करता है। देवता बुरे कर्मों से राक्षस हो जाता है । ऋषि पुलस्त्य का नाती रावण था। ऋषि कुल में जन्म लेने पर भी बुरे कार्यों द्वारा राक्षस हो गया था । देवता उसी समय तक देवता है, जब तक उसमें देवत्व गुण वर्तमान रहता है । सद्गुण के कारण देवता होता है । देवत्व प्राप्त करता है । सद्गुण के अभाव में, प्रजा रंजन के अभाव में, न्याय प्रिय शासन के अभाव में, राष्ट्रसुरक्षा के अभाव में, राजा का सद्गुण और दैवी गुण लुप्त हो जाता है । पर- पीडा, परशोषण, दुराचार, एवं दूषित विचारों का आश्रय ग्रहण करते ही, उसका देवस्वरूप तथा देवत्व तिरोहित हो जाता है । अतएव उसे राज्यच्युत करना, उसे हटा देना, उसका वध कर देना, देव विरोधी कार्य नहीं कहा जायेगा । उसे असुर विरोधी कार्य, धर्म एवं शास्त्र सम्मत, कहकर पापहीन कहा गया है । जनता के कल्याण निमित्त इस प्रकार के राजा से पिण्ड छुड़ाना देशभक्ति की गणना में गिना जायेगा । शुक्राचार्य ने शुक्रनीति में स्वच्छन्द देशभक्ति किंवा स्वातन्त्र्य राजा के विषय में जो कहा है वही घटना इस राजा के सम्बन्ध में घटी । प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते । भिन्नराष्ट्रो भवेत्सद्यो भिन्नप्रकृतिरेव च ॥ २:४ ॥
प्रथम तरंग ३५७ प्रभोः संकोचिताज्ञैस्तैश्चरद्भिनिरवग्रहम् । राज्यं जिहीर्षवो भूपाश्चक्रिरे भूम्यनन्तराः ॥३६१॥ ३६१. प्रभु की आज्ञा संकुचित करने वाले तथा स्वच्छन्द, उन मन्त्रियों ने पार्श्ववर्ती भूपों को राज्य हरण हेतु उत्सुक कर दिया । तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते नानादिगाश्रयाः । आसन्नाज्यामिषं प्राप्तुं श्येना इव ससंभ्रमाः ॥३६२॥ ३६२ मन्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित, नाना दिशाओं के वे सब नृप, बाज की भांति राज्य रूप मांस की प्राप्ति हेतु समुद्यत हो गये थे । अथोत्पन्नभयो राजा न शशाक निजस्थितिम् । व्यवस्थापयितुं यन्त्रच्युतां कारुः शिलामिव ॥३६३॥ ३६३. भयभीत राजा अपनी स्थिति को यन्त्र च्युत शिला को शिल्पी की तरह व्यवस्थित रखने में असमर्थ हो गया ।
पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६१ में 'संकोचिता' का पाठभेद 'संकुचिता' मिलता है । श्लोकसंख्या ३६२ में 'तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते' का पाठभेद 'तदनुप्राणिता वैरि नृपा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ : ३६३ (१) यन्त्रः कश्मीर के मन्दिरों में लगे विशाल शिलाखण्डों को उठाने के लिए किसी प्रकार के यन्त्र का प्रयोग होता था । अन्यथा बड़े-बड़े शिलाखण्डों को कैसे उठाकर एक दूसरे पर रखा गया होगा । यह बात मन्दिरों के ध्वंसावशेषों के देखने से मालूम होती है । कल्हण इसी शिला उठाने वाले यन्त्र की उपमा यहाँ पर देता है। घिरारी किंवा चर्खी बड़े शहतीर में लगाकर शिला उठाने की क्रिया मन्दिरों के निर्माण निमित्त कश्मीर में प्रचलित थी । यह यन्त्र, आधुनिक शब्दावली में क्रेन था । श्री आर. एस. पण्डित इस यन्त्र का यहाँ अर्थ पानी उठाने वाले यन्त्र, अर्थात् ढेकली जिसके बांस के एक छोर में पत्थर दूसरे में बालटी की लम्बी रस्सी बंधी रहती है, और हाथ से पानी खींचते और सिंचाई करते हैं, लगाया है। यह ढेकली प्रथा बिहार, बंगाल, आसाम तथा कश्मीर में कुछ प्रचलित रही है । यहाँ पत्थर गिरने से सन्तुलन बिगड़ जायेगा इस ओर उक्त मत से संकेत किया गया है । कल्हण ने यहाँ-'यन्त्रच्युता कारुः शिलामिव' लिखा है। कारुः का अर्थ कारीगर होता है। 'कारुः' का अर्थ शिल्पी होता है। (अमर कोश २:१०:५) शिल्पी के साथ कारु का प्रयोग स्पष्ट प्रकट करता है कि कारु का अर्थ कारीगर से है। यह यन्त्र पत्थर उठाने वाला यन्त्र है। न कि रणजीत सीताराम पण्डित के शब्दों में ढेकली। ढेकली कूपक चलाता है। यदि यन्त्र का सम्बन्ध जल उठाने से होता है, तो कूपक अथवा कूपिसम्बन्धी शब्द का प्रयोग किया जाता। कारु शब्द के प्रयोग से मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। यह पत्थर उठाने का यन्त्र था। जिसके भार के सन्तुलन के लिए यन्त्र के चर्खी अथवा घिरारी के रस्सा या डोरी में एक तरफ पत्थर लगा रहता था। इस प्रकार का यन्त्र स्टेशनों पर कोयला ऊँचाई पर से जाकर रखने और वहाँ से इंजन में डालने के लिए मैंने पश्चिमी रेलवे में देखा है ।
३५८ राजतरंगिणी चिरक्षुण्णे क्षमाभर्तुस्तस्मिन्राज्ये विसंस्थुले। उपायोऽस्य स्थितेर्हेतुर्नैकः कश्चन पप्रथे ॥३६४॥ ३६४. बहुत दिनों से उस राज्य के विश्रृंखालत होने पर, उसके स्थायित्व हेतु कोई उपाय उस राजा को नही सूझा । दृष्टदोषान्स्थितिं प्राप्तो हन्यादस्मानसंशयम्। विचिन्त्येति न सामास्य जगृहुर्निजमन्त्रिणः ॥३६५॥ ३६५. उसके अपने मन्त्रियों ने राजा की सन्धि को यह सोचकर स्वीकार नहीं किया कि; राजा ने उनके दोषों को देख लिया है, अतएव स्थिति सुदृढ़ होने पर, उन्हें निश्चय ही मरवा डालेगा । अथ निरुन्धुस्ते संनद्धा बलैर्नृपमन्दिरं व्यवहितजनाक्रन्दं भेरीरवैर्तिभैरवैः । मदकरिघटाकेतुच्छायानिरुद्धरविप्रभा भवनवलभीः संतन्वन्तो दिवाऽपि तमोवृताः ॥३६६॥ ३६६. उन सन्नद्ध मन्त्रियों ने सेनाओं से राजभवन घेर लिया। उस समय अति भयंकर भेरी ध्वनि से जन-क्रन्दन दब गया। मदमत्त गजसमूह की पताकाओं की छाया से सूर्य-प्रकाश अवरुद्ध हो गया और अट्टालिकायें दिन में भी तमोवृत हो गयीं ।
कल्हण ने यन्त्र शब्द का प्रयोग क्रेन जैसे यन्त्र बड़ी शिलाओ ओर पर्वतों को उखाड़कर यन्त्रों द्वारा के लिये यहाँ किया है। वह शिला उठाने के काम समुद्र तट पर लाते थे । ] में आता है। आज कल भी इमारत बनाने में ऊँचे क्रेन का प्रयोग शिला, ईंटा आदि उठाने के लिये श्लोक संख्या ३६४ में 'चिर' का 'चिरं' किया जाता है । 'कश्चन' का 'कस्य न' तथा 'पप्रथे' का पाठभेद 'प्रपथे' मिलता है । इस प्रकार के यन्त्र भारत मे कश्मीर से लेकर धुर दक्षिण रामेश्वरम् तक सुदूर प्राचीन काल से श्लोक संख्या ३६५ में 'प्राप्तो' का 'प्राप्तान्', प्रचलित थे । वाल्मीकीय रामायण में सेतु बाँधने के 'प्राप्ते' तथा 'प्राप्ता' और 'स्मान' का पाठभेद 'स्माद' समय इस प्रकार के यन्त्रों का प्रयोग किया गया था। तथा 'स्मान्न' मिलता है । हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । श्लोक संख्या ३६७ मे 'रजोद्धूराज' का 'रजोद्भू पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥२२:९०॥ राज', 'रजोद्धाराज'; 'नाधु' का 'नायु', 'नासु', [ महाकाय महाबली वानर हाथो के समान बड़ी और 'राजाध्यना' का पाठभेद 'राजाधुना' मिलता है ।
प्रथम तरंग ३५९ तैर्गन्तुं स्वभुवो निवारितरणैर्दत्तेऽवकाशे तत- स्त्यक्तश्रीनगरात्तरात्स नृपतिस्तात्पर्यतो निर्ययौ । आजानेयरजोऽङ्कुराजललनाप्रस्थानसंदर्शन- क्षुभ्यत्पौरजनाश्रुलाजकणिकाकीर्णेन राजाध्वना ॥३६७॥ ३६७. उन लोगों के, स्वभूमि से जाने हेतु युद्ध बन्द कर अवकाश प्रदान करने पर, वह राजा सम्पत्ति त्याग कर, राजमार्ग द्वारा नगर से निकल गया । उस समय उत्तम अश्व की धूल में राज ललनाओं का प्रस्थान देखकर, दुखित होते पुरजनों की अश्रु रूपी लाज¹ कणिका से वह राजमार्ग व्याप्त हो गया था । राज्याच्च्युतस्य बहुशः परिचाररामा- कोशादि तस्य रिपवो व्रजतोऽपजहुः । उर्वारुहो विगलितस्य नगेन्द्रशृङ्गा- द्वल्लीफलादि रभसादिव गण्डशैलाः ॥३६८॥ ३६८. राज्यच्युत एवं गमनशील उस राजा के बहुत से परिवार, कामिनियां और धनादि को शत्रुओं ने उसी प्रकार हरण कर लिया, जैसे गण्डशैल, पर्वत शिखर से पतित वृक्ष को उसके लताफलादि से वेगपूर्वक वंचित कर देता है । रम्यैः शैलपथैर्व्रजञ्छ्रमवशाच्छायां श्रितः शाखिना- मासीनप्रचलायितेन सुमहद् दुःखं विसस्मार सः । दूरात्पामरपूत्कृतैः श्रुतिपथप्राप्तैः प्रबुद्धस्त्वभूद् दृष्टो निर्झरवारिभिः सह मनाक् श्वभ्रे निमज्जन्निव॥३६६॥ ३६९. रम्य शैल पथ पर गमन करते हुए, क्लान्ति वश वृक्षों की छाया का आश्रय लेकर बैठने और पुनः चलने से, उसने महान् दुःख को विस्मृत कर दिया । दूर से सुने गये पामरों के कोलाहलो से, प्रबुद्ध राजा निर्झर वारि के साथ गर्त में डूबता हुआ सा देखा गया ।
पादटिप्पणियाँ : ३६७. (१) लाज : धान का भुना लावा तथा पुष्प का राजपथ तथा राजा की शोभा-यात्रा के समय अथवा शुभ अवसरों पर वर्षा किया जाना पुरानी परंपरा है। प्रायः समस्त भारतवर्ष में यह प्रचलित है। बंगाल में मृतकों की शव-यात्रा के समय लाज- वर्षा की जाती है। विवाह के समय भी लावा परछने की क्रिया हमारी तरफ प्रचलित है।
पाठभेद : श्लोकसंख्या ३६८ में 'रामा' का रामाः', 'दजहुः' का 'विजहुः', 'विगलितस्य' का 'विच- लितस्य' पाठभेद मिलता है । श्लोक संख्या ३६९ में 'मासीनप्रचलायितेन' का 'मासीनः प्रचलायिलेन' 'मासिन प्रचलायितेन' 'मामीनः प्रलयायितेन' 'मासीनप्रल्यायितेन' 'मासीन
३६० राजतरंगिणी नानाविरुत्तृणपरिमलैरुरुगन्धा वनोर्वी- रम्भःक्षोभप्रतिहतशिलाः पिच्छिलाश्चाद्रिकुल्याः । क्रान्त्वा श्रान्तैर्बिसकिसलयच्छायमुग्धाङ्गलेखै- रध्युत्सङ्गं निहिततनुभिर्मूच्छितं तस्य दारैः ॥३७०॥ ३७०. नाना प्रकार के वीरुत तृणों के परिमल से उग्र गन्धवती वनभूमि, जल के ठोकरों से प्रतिहत शिलाओं और फिसलों से युक्त कुल्याओं को पार करके, मृणाल सदृश मुग्ध अंगलेखाओं एवं उत्संग में निहित शरीरों वाली श्रान्त उसकी स्त्रियां मूच्छित हो गयीं । पर्यन्ताद्रितटाद्विलोक्य सुचिरं दूरीभवन्मण्डलं द्रागामन्त्रयितुं क्षिपत्सु नृपतेर्दारेषु पुष्पान्जलीन् । क्षोणीपृष्ठविकीर्णपक्षति नमतुण्डं स्वनीडस्थितैः सावेगं गिरिकन्दरासु पततां वृन्दैरपि क्रन्दितम् ॥३७१॥ ३७१. सीमान्त पर्वत तट से दूर होते मण्डल को देर तक देखकर शीघ्र विदा लेने के लिये नृपस्त्रियों के पुष्पांजलियों गिराने पर, वेग के साथ नीचे उतरते हुए, गिरिकन्दराओं के, स्वनीड स्थित पक्षिवृन्दों ने भी पृथ्वो तल पर पंख फैला, नमित चंचु हो क्रन्दन १ किया ।
प्रचलायितेन,' 'सुमहद्दुःख' का 'स्वमहद्दुःखः' जहाँ न जाने कितनी मिलनयामिनियों में अपनो महद्दुखः', 'पूत्कृतैः' का, पुत्कृतैः', 'फुत्कृतैः', 'हुत्कृतैः' सुखमय, रसमय, उल्लासमय समय व्यतीत किया तथा 'मनाक् श्वभ्रे' का पाठभेद 'मनः श्वभ्रे' 'पुनः था, उन सबको नमस्कार कर, उन्हें स्मृति के धवल श्वभ्रे' 'गवा श्वभ्रे' 'मनाः श्वभ्रे' 'मानाः श्वभ्रे' पटपर केवल लिखकर विदा हो रही थी । उस 'मनःश्वभ्रे' 'महच्छुव्वश्वभ्रे' पाठभेद मिलता है । कश्मीर मण्डल को उन्हो ने नमस्कार किया जहाँ श्लोकसंख्या ३७० में 'रध्युत्सङ्गं' का पाठभेद वे एक दिन रानी थी । आज रंक थी । करू ओर- 'रप्युत्सङ्गे' तथा 'रध्युरसङ्गे' मिलता है । छोर अज्ञात जगत् मे अनजाने भटकनेवाली थीं उस श्लोकसंख्या ३७१ में 'पर्यन्ताद्रि' का 'पर्य- पवित्र मातृभूमि का जिसे वे पुनः नही देख सकेंगी स्ताद्रि' तथा 'क्षिपत्सु' का पाठभेद 'जहत्सु' और जो केवल उनकी स्मृति मे शेष रह जायगी अन्तिम 'जहत्सु' मिलता है ।
विषयटिप्पणियाँ : इस ३१ (१) नमितं चंचु : कल्हण ने करुण धुर दक्षिण २.को यहाँ पराकाष्ठा कर दी है। मूल प्रचलित ये । वाल समझने पर ही पदलालित्य का रस समग्र इस प्रकार के ३ । हस्तिमात्रान् महाकायाःरन्त करुण दृश्य कल्हण ने पर्वतांश्च समुत्पाटय यन्त्रैः अपनो जन्मभूमि जहाँ उन [ महाकाय महाबली कां। जहाँ युवती हुई थी । वोल घोरज देन करुणा दृश्य का हो गया । वे बैठे- गये । अपने घोपलों से रामाः', का 'विच- 'मासीनप्रचलायितेन' 'मासिन प्रचलायितेन' 'सासीनप्रल्यायितेन' 'मासीन सम्मुख पंख फैलाकर नमस्कार किया ।
प्रथम तरंग ३६१ स्तनयुगललग्नस्रस्तमूर्धांशुकानां त्रिकवलनविलोलं वीक्ष्य दूरात्स्वदेशम् । अवहत रुदतीनां मौलिविन्यस्तहस्तं पथि नृपवनितानामश्रुभिर्निर्झराम्भः ॥३७२॥ ३७२. पीछे मुड़कर दूर से स्वदेश को देखकर, शिर से गिरे वस्त्र को स्तन युगल पर सम्हालती, तथा मस्तक पर हाथ रख कर रुदन करती, नृपवनिताओ के अश्रुओं से, मार्ग में निर्झर जल बहने लगा । प्रीतिस्थैर्यैरुचितवचनाप्तिभया शोकशान्त्या निर्व्याजाज्ञाग्रहणगुरुभिस्तैश्च तैश्चोपचारैः । तस्य स्नेहादुपगतवतो राज्यविभ्रंशदुःखं मन्दीचक्रुः स्वभुवि सुजना भूपतेर्भूमिपालाः ॥३७३॥ ३७३. स्थिर प्रीतियों से, उचित वचन प्रयोग से, शोक शान्ति से, अकारण आज्ञा ग्रहण करने की गम्भीरता से, स्नेह से तथा और भी उन-उन उपचारों द्वारा अपनी भूमि में आये इस भूपति के राज्य विभ्रंश के दुःख को सज्जन भूमिपालों ने मन्द कर दिया। दी और स्वयं नमित चंचु होने लगे किन्तु दैव का हृदय उनके दुर्दिन को देखकर भी नहीं पसीजा। मानव हृदय उनके भाग्य विपर्यय पर इस विदाई के समय उन्हें बिदाकर दो बूँद आँसू भी नही बहा सका । वह काम किया पक्षियों ने। पाठभेद : श्लोकसंख्या ३७२ ये 'तलनग्न' का 'बलनद्ध'; 'विलोलं' की 'विलोमं'; 'नृपवनितानां' का 'प्लवलानां वलं कृत' पाठभेद मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ३७२ (१) श्लोक संख्या ३६८ से ३७८ तक करुण रस से ओत प्रोत संस्कृत साहित्य एवं काव्य में उत्कृष्ट माने जायेगा। कल्हण करुण रस व्यक्त करने की प्रतिभा का स्वयं एक उदाहरण उपस्थित करता है । इसी प्रकार का उदाहरण स्पेन के इतिहास में मिलता है । स्पेन का अन्तिम मूर राजा बोअबदिल को सन् १४९२ ई० में फेस्टिलियन ने निर्वासित कर दिया। वह जब अपने राज परिवार के साथ ४६ पदुल पर्वत पर पहुँचा तो अन्तिम बार उसने करुण दृष्टि से ग्रनडा को देखा । जहाँ पर बोअबदिल ने पर्वत पर अन्तिम बार ग्रनडा को देखा था और स्पेन से विदाई ली थी उसे आज भी 'एल डलटियों सीसपिरो-डेल-मोरो' अर्थात् 'मूर की अन्तिम आह' कहते हैं । राजा युधिष्ठिर किस दिशा में गया था, किस मार्ग, संकट किंवा द्वार से कश्मीर का त्याग किया था, किस स्थान से रानियों ने अपनी मातृभूमि कश्मीर मण्डल का अन्तिम दर्शन कर उसे पुष्पांजलि अर्पित की थी । पता नही चलता । कल्हण इस घटना स्थल के विषय में शान्त है । उसको यह शान्ति इस बात को प्रकट करती है। उसने किसी प्रचलित श्रुति के आधार पर अथवा पूर्व इतिहासकारों के अत्यन्त गूढम सूत्र के आधार- पर उक्त वर्णन लिखा है । राजा युधिष्ठिर तथा उसके राज्य की परिस्थिति, विद्रोह, भ्रष्टशासन, मन्त्रियों के कुमन्त्र आदि घटनाओं का वर्णन 'दशकुमारचरित' में कवि
३६२ राजतरंगिणी
दण्डो ने अवन्तिवर्मा तथा अश्मकदेशाधिपति के सन्दर्भ में किया है। (८:५-३०) पाठभेद : श्लोक संख्या २७३ में 'शान्त्या' का 'कान्त्या' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ३७३. (१) भूमिपाल और अलकसुन्दर (सिकन्दर) : हसन लिखता है कि अन्धयुधिष्ठिर बाहर जाने पर बाहरी राजाओं द्वारा मार डाला गया था। यह नितान्त कपोलकल्पना है। कल्हण इसका ठीक उलटा वर्णन करता है। बाहरी राजाओं के सुव्यवहार के कारण वह अपने राज्य त्याग का दुःख भूल गया था। (२) राज्यपाल : कल्हण ने राजतरंगिणी में इस राजा का राज्यकाल नहीं दिया है। किन्तु उसने प्रथम तरंग के राजाओं के राज्यकाल का कुल योग गोनन्द (प्रथम) से युधिष्ठिर (प्रथम) तक २२६८ वर्ष दिया है। उसके अनुसार गणना करने पर युधिष्ठिर का राज्यकाल ३४ वर्ष ३ मास १ दिन आता है। आईने अकबरी ने राज्यकाल ४८ वर्ष १० दिन दिया है। यह काल गलत गणना के कारण त्रुटिपूर्ण है। पाठभेद के आधार पर गणना की जाय तो ३३ वर्ष ९ मास तथा ७ दिन आता है। गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर प्रथम तक २१ राजाओं का वर्णन कल्हण करता है। गोनन्द तृतीय का राज्याभिषेक लौकिक संवत् १८१४ में हुआ था। गोनन्द तृतीय से नरेन्द्रदित्य अर्थात् २० राजाओं का राज काल ९६७ वर्ष ८ मास तथा २३ दिन होता है। श्लोक संख्या ३४५ में ६ मास के स्थान पर ६ दिन की गणना करने से अवश्य अन्तर पड़ जाता है। वह होता है। ९६८ वर्ष २ मास २३ दिन। गोनन्द प्रथम का राज्याभिषेक लौकिक संवत् ६२८ में हुआ था। गोनन्द से लेकर अभिमन्यु तक के राजाओं का राज्य काल १२६६ वर्ष होता है। अर्थात् लौकिक संवत् ६२८ से १८९४ है। श्लोक संख्या ४८ में कल्हण लिखता है-'गोनन्द प्रथम तथा उसके उत्तराधिकारियों ने २२६८ वर्ष कलियुग में शासन किये। यह गणना कुछ लेखकों के मत से त्रुटिपूर्ण लगती है। उन्होंने माना है कि भारत युद्ध द्वापर के अन्त में हुआ था। श्लोक संख्या ५४ में कल्हण कुल ५२ राजाओं का राज्य काल १२६६ वर्ष देता है। इस प्रकार २२६८ में से यदि १२६६ वर्ष घटा दिया जाय तो केवल १००२ वर्ष बचता है। यह काल गोनन्द तृतीय से युधिष्ठिर तक का होता है। गोनन्द तृतीय से नरेन्द्रदित्य का शासन काल ९६७ वर्ष ८ मास २३ दिन होता है। यदि इस काल को १००२ वर्ष में से घटा दिया जाय तो युधिष्ठिर प्रथम का राज्यकाल ३४ वर्ष ३ मास १ दिन आता है। श्री एस. पी. पण्डित ने गोनन्द वंश के प्रथम तरंग के राजाओं के राज्यकाल की गणना १०१४ वर्ष ६ मास ९ दिन दी है। इसमे राजा युधिष्ठिर का राज्य काल न दिया गया है केवल लिख दिया गया कोई समय नहीं दिया गया है। गोनन्द तृतीय का राज्याभिषेक ईसापूर्व ११८४ वर्ष दिया गया है। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक ईसा पूर्व २१७ वर्ष दिया है। युधिष्ठिर का राज्यकाल का समय न सम्मिलित करने पर इस गणना के अनुसार ९६७ वर्ष आता है। यदि प्रत्येक राजा का, शासन काल का समय गोनन्द तृतीय से नरेन्द्रदित्य अर्थात् युधिष्ठिर के राज्याभिषेक दिन तक का समय जोड़ा जाय तो ९६६ वर्ष १६ दिन होता है। गोनन्द वंश के प्रथम तरंग के राजाओं का जो जोड़ दिया गया है वह १०१४ वर्ष ९ माह ९ दिन दिया गया है। यदि १०१४ वर्ष ९ माह ९ दिन मे से ९६६ वर्ष १६ दिन निकाल दिया जाय तो ४८ वर्ष ८ मास २३ दिन बचता है। किन्तु श्री स्टीन की कल्हण आधारित गणना मानी जाय तो वास्तव में ३४ वर्ष ३ मास १ दिन आता है। श्री एस. पी. पण्डित के अनुसार ईसा पूर्व २१७ वर्ष में युधिष्ठिर सिंहासन पर बैठा था। श्री स्टीन के अनुसार यह दिन लौकिक संवत् २८६१ वर्ष ८ मास २९ दिन होना चाहिए।
हसन—'अन्ध युधिष्ठिर के राज्यकाल में सिकन्दर का आना हसन लिखता है। मै उसे यहां उद्धृत इसलिए करना चाहता हूँ कि कम से कम इस एक घटना के उल्लेख के कारण रत्नाकर पुराण, उसके मुतरजम तथा हसन तीनो को इतिहास के साक्षियों तथा प्रमाणों के सम्मुख कही खड़े होने की जगह नही मिल सकेगी। हसन—'मुतरजम रत्नाकर लिखता है कि अन्ध युधिष्ठिर के आखिर दौर हकूमत के सिकन्दर फील कौस जिसे मशरिके वाशिन्दे महायोन कहते थे, बड़ी भारी लश्कर के साथ हिंदुस्तान की तसखीर के लिए आया । जब दरिया नीलाब से गुजरा तो हिंदुस्तान के तमाम राजे-महाराजाओं में जलजला पड गया। राजा युधिष्ठिर का भाई जिसका नाम अभीसतर और कश्मीर के बाहर वाले कोहिस्तानी इलाके का हुक्मरां था सिकन्दर की खिदमत मे तोहफे ले जाकर मुअजिज व मुकरम हुआ । सिकन्दर से अपने भाई के बर खिलाफ मदद मांगी । चुनाचः सिकन्दर ने एक भारी फौज उसकी इमदाद के लिए मुकर्रर कर दी । अन्ध युधिष्ठिर मुकाबला की नाव न लाकर हिन्दुस्तान की तरफ भाग खडा हुआ और उसकी जगह अभीसतर मुल्क कश्मीर का हाकिम क़रार पाया। दूसरी तरफ अन्ध युधिष्ठिर ने भी राजा पूरन से इमदाद मांगी। चूंकि पूरन खुद सिकन्दर के साथ मसरूफ जंग था। इस बिना पर युधिष्ठिर की इमदाद से कासिर रहा । यह देखकर अन्य युधिष्ठिर पूरन की तरफ से सिकन्दर के साथ मसरूफ पैकार हुआ । और नतीजतन दौरान जंग मारा गया। इस वाकया के बाद ही सिकन्दर ने कश्मीर के जनूबी पहाड़ी इलाके से खुद कश्मीर मे नजूल किया और कुछ अरसा सैल-शिकार में मसरूफ रहा । एक दिन खुदा के करने से मौक़ा पर एक तीर सिकन्दर के बाजू पर लगा । जब तीरन्दाज को गिरफ्तार कर लाये तो मालूम हुआ कि यह अबेस्तर का पढ़ाया आदमी था । और सिकन्दर के मारने पर मुतमइन था । सिकन्दर पर जब यह हाल खुला तो उसकी आतिश गजब की कोई हद न रही। और उसने जुर्म की पादाश मे अभीसतर को मय उसके रिश्तेदारों के क़तल कर डाला । इसके बाद मुल्क की हकूमत राजा परताप को जो मालवा के राजो में से था और राजा विक्रमाजीत अजदाद में से है अता करके खुद अपने मुल्क को वापस चला गया । वाल्हा आलम । सिकन्दर कश्मीर में नही आया था । (पृष्ठ ५० तथा ५१ ) इस विषय पर भारतीय इतिहासकारों की आलोचना करता हुआ हसन लिखता है : हिन्दुस्तानी तारीखदाँ लिखते है कि सिकन्दर फिलकोश ईसा की पैदा build-up/पैदाइश से साढ़े तीन सो साल कबल रूम के दारुल खलाफा से निकला और थोडे से मुद्दत में इराक, रूम, अरब और फिदगिस्तान वगैरह मुमालिक फतह कर लिए । ईसा से ३३१ साल पेस्तर फारस पर फ़तह करने की गरज से हमला किया और तीसरे हमले में वहाँ के बादशाह दारासन, दाराव बिन बहमन को क़तल करके ईरान और खुरासान की सलतनतें अपने क़ब्जा इकतदार में ले आया । और चूंकि हिन्दुस्तानी राजे-महाराजे दाराव के अहद हकूमत में सल्तनत ईरान के बाज गुजार थे इस ख़याल के पेश नजर सिकन्दर ने फतह हिन्द भी लाजमी और जरूरी समझे । चुनांचे : ३२७ क़बल मसीह में एक भारी लश्कर के हमराह दरयाए नीलम अबूर करके हिन्दुस्तान हुक्मरान राजे-महाराजों में संहलक मचा दिया । अरसा चार साल से सिकन्दर की शाही फौजो ने बर्फानी पहाड़ो में सफर की सख्तियां बरदास्त की थीं। इसके साथ ही लड़ाइयो और मुसलसल जंग व जदाल के बाथश थककर, चूर हो गयी थीं, और गरमियों में पंजाब में रहने की वजह से उनमें से अक्सर बुखार में मुवतिला हो गये थे । इस वजह से उन्होने हिन्दुस्तान पर हमला करने में जल्दी न की । उन दिनों हिन्दुस्तान में तीन राजे मशहूर थे । अभीसतर कश्मीर और उसके आसपास के पहाड़ी
३६४ राजतरंगिणी
इलाके का फरमान रहा। दूसरा दोआब सिन्धु और झेलम का महाराजा टेकसिला। तीसरा हस्तिनापुर का राजा पोर। अबीसतर ने बेशुमार तोहफे व तहायक के जरिये सिकन्दर का इस्तकबाल किया। राजा टेकसिला ने सिर्फ बारयाबी हासिल करके सिकन्दर की अपने घर दावत की और पूरी शान व शौकत से दावत फराज बजा लाया। बादशाह ने अपनी थकी हुई फौजों को वहाँ छोड़कर खुद दरयाए झेलम के किनारे डेरे डाल दिये। लेकिन उस तरफ से राजा पौर एक भारी फौज के साथ आया और दरया के उस किनारे मोरचा बना लिया। इन दिनों दरया झेलम शिद्दत बरसात के बाइस तफ पानी पर था। सिकन्दर के लिए दरया का अबूर करना बहुत मुश्किल हो गया। आखिरकार दस मील ऊपर की तरफ जाकर रात को दरया पार किया। राजा पोर एक जबरदस्त लड़ाई के बाद सिकन्दर के हाथ कैदी हुआ। लेकिन सिकन्दर ने इन्तहाई रहम से काम लेकर राजा पोर को उसका मुल्क मौरूशी वापस कर दिया। बाद भजोई वकील मुसन्निफ वकाअ कश्मीर को सैर को रवाना हुआ। लेकिन हिन्दुस्तानी वकाअ निगार सिकन्दर के कश्मीर जाने के मुतल्लिक बिलकुल खामोश हैं। लेकिन वकाअ काश्मीर के मुसन्निफ का बयान हकीकत से खाली नहीं है। मुख्तसर यह कि सिकन्दर दोआब व चज का मुल्क राजा पोर को सौंप दिया और खुद रावी और चिनाव को पार करके मुकाम सागला में कौम तातार के १९ हजार आदमी मौत के घाट उतार दिये। यहाँ से मुल्क बिहार के फतह करने का इरादह उसके दिल में था लेकिन उसके सिपाही हिन्दुस्तान में मजीद आगे बढ़ने से मुनकर हो गये। इसलिए लाचार सिकन्दर को हिन्दुस्तान के मुकम्मल तसखीर दूसरे मौका पर छोड़नी पड़ी। और अपने मुल्क के वापस का इरादह कर लिया। दो हजार किश्तियाँ फिल अल फौरन बनवाई गईं। एक लाख बीस हजार पैदल सिपाही। दो सौ हाथी किश्तयो में बैठाकर दरियाए सिन्धके जरिये रवाना कर दिये। बाकी फौज दरया के दोनों किनारे खुश्की से चलती रही। पांच सौ कोस तै करने के बाद यह तमाम किश्तियां समुन्दर के दहाना पर पहुँच गयीं। वहाँ से सिकन्दर जो खुश्की के रास्ते रवाना हुआ था और नयारकंस ने जो उसके बाहरी बेड़े का अफसर था दरया का सफ़र कुल सात महीने में तै किया। सिकन्दर ने ३२३ बरस कब्ल मसीह के वफ़ात पायी। (पृष्ठ ५१-५२।) हसन तथा वकाअ कश्मीर के लिखने का कुल तात्पर्य यह है कि कश्मीर के इतिहास पर एक खास रंग चढ़ाने के लिए सिकन्दर को 'कश्मीर के अन्दर दाखिल' करते हैं। हज़रत नूह, हज़रत सुलेमान तथा हज़रत ईसा का नाम कश्मीर के इतिहास से जोड़कर उस पर विदेशी रंग चढ़ाने की कोशिश की गयी है। सिकन्दर को काश्मीर जैसे दुर्गम स्थान में आना, उसकी यात्रा तथा कश्मीर का वर्णन यूनानी इतिहासकारों का नहीं करना, जब कि उन्होंने छोटी-से-छोटी बातें लिखी हैं, आश्चर्यजनक तथा असम्भव कही जायेगी। हसन तथा वाकए कश्मीर के लेखकने कुछ नही बताया है कि उन्होंने सिकन्दर के कश्मीर में दाखिल करने की बात कहाँ से पाई है। यदि सिकन्दर कश्मीर में प्रवेश किया होता तो उसका समय अशोक के काल के पूर्व हसन की गणना तथा राजाओं की तालिका के अनुसार होना चाहिए। राजा शचीनर का काल हसन के अनुसार क० संवत् १२३३ बैठता है। राजा स्वर्ण का समय क० संवत् ११६६ होता है। हसन राजा शचीनर का राज्यकाल नही देता। परन्तु तीनों का समय मिलाकर १०४ वर्ष अर्थात् कलयुग १२७३ होता है। हसन राजा शचीनर के पश्चात् राजा गल- गन्दर जिसे शचीनर का भतीजा कहता है कलि संवत् १३४३ मे राज्य करना बताता है। राजा अशोक का राज्यकाल क० संवत् १६५५ लिखता है यह भी लिखता है कि अशोक राजा शचीनर वल्द
प्रथम तरंग ३६५ इति श्रीकाश्मीरकमहामात्यचम्पकप्रभुसूनोः कल्हणस्य कृतौ राजतरङ्गिण्यां प्रथमस्तरङ्गः ॥ इस प्रकार श्री कश्मीर के महामात्य चम्पक प्रभु के पुत्र कल्हण कृत राजतरंगिणी में प्रथम तरंग समाप्त हुआ ।
शकुनी के पोतों में से था । हसन ने इसी प्रकार अशोक के पूर्व राजा भगवन्त का कलि संवत् १६४१ में होना बताया है । इतिहास सिकन्दर का आक्रमण काल ३२७ वर्ष पूर्व ईसा देता है । यह समय अनेक साक्षियों से प्रमाणित हो चुका है । ईरान का काल उक्त संवतो के कारण उलझन में पड़ जाता है। सिकन्दर का आना अशोक के पूर्व होता है । हसन रत्नाकर पुराण के आधार पर उसका उल्लेख कर अशोक के पश्चात् ३५ राजाओं के वर्णन के पश्चात् सिकन्दर का कश्मीर मे आना लिखता है। अशोक का काल हसन ने १२५५ क० संवत् तथा राजा अन्ध युधिष्ठिर का समय कलि संवत् २८२८ देता है । बात यही नही समाप्त होती । उसने मिहिरकुल तथा सम्राट् कनिष्क के पश्चात् अन्ध युधिष्ठिर का समय रखता है । तथा उसी के समय सिकन्दर का आना लिखता है । कनिष्क के पूर्व वर्ष, मिहिरकुल के पूर्व वर्ष सिकन्दर का आना प्रमाणित हो चुका है। अतएव हसन का संवत्, उनका दिया काल, राजाओ की तालिका आदि भ्रामक अनुमान पर आधारित, इतिहास को एक विशेष जमाना देने की गरज से लिखा गया है । हसन ने पुनः अपने पुराने सिद्धान्त की पुनरावृत्ति की है कि उसका आधार रत्नाकर पुराण का अनुवाद है। वह अनुवाद जैनुल आबदीन के समय में किया गया था। उसे अनुवाद मिला । वितस्ता में वहू यात्रा कर रहा था । नाव डूब गयी ।
रत्नाकर पुराण भो डूब गया । मैं कह सकता हूँ कि या तो रत्नाकर पुराण मिथ्या है अथवा इतिहास को अपने रंग में रंगने के लिए रत्नाकर पुराण का सहारा लिया गया है । यदि कभो कोई रत्नाकर पुराण था भी तो वह तर्क के आधार पर मिथ्या प्रतीत होता है । प्रमाणों की कसौटी पर हसन तथा मटरजप रत्नाकर पुराण तथा पुराण तीनो ही सत्य नहीं उतरते । पुराणों का मैने अध्ययन किया है। पुराण गणना में भूल नही करते । असंगत बात नही लिखते । प्रमाण के लिए किसी ऋषि आदि के वाक्यौ का आश्रय लेते हैं। उनको वर्णन शैली मौलिक और निराली होती है । रत्नाकर पुराण का वर्णन केवल कपोलकल्पना मात्र है । पाठभेद : इति पाठ में 'काश्मीरक' का 'काश्मीरिक' 'चम्पक' का 'श्री चापाकं' पाठभेद मिलता है । इतिपाठ : पादटिप्पणी : 'इति' पाठ के पश्चात् पाण्डुलिपियों में निम्न- लिखित श्लोक लिखा मिलता है : 'चतुर्दशाधिकं वर्षं सहस्रं नव वासराः । मासाश्च विगता ह्यस्मिन्नेकविंशतिराजसु ॥ पाठभेद : उक्त श्लोक में 'चतुर्दशाधिकं' का 'चतुर्विशा- धिकं' तथा 'ह्येकविशति' का 'भ्रष्टान्विशति' पाठभेद मिलता है । इससे कल्हण के यह लिखने का समय स्थिर हो जाता है ।
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अथ श्री कल्हण कृतायां राजतरङ्गिण्याम् द्वितीयस्तरङ्गः
द्वितीय तरंग के राजा नाम राजा राज्य काल वर्ष लौकिक संवत् कलि संवत् राज्याभिषेक (१) प्रतापादित्य ३२ २८९६ २६२१ (प्रथम) (२) जलोकस ३२ २९२८ २९५३ (३) तुंजीन (प्रथम) ३६ २९६० २९८५ (४) विजय ८ २९९६ २०२१ (५) जयेन्द्र ३७ ३००४ ३०२९ (६) सन्धिमति (आर्य राज) ४७ ३०४१ ३०६६
१९२ वर्ष
द्वितीय तरंग विहितमजगोशृङ्गाग्राभ्यां धनुर्घटितं नरकरटिनोर्देहार्धाभ्यां गणं प्रतिगृह्णतः । द्विविधघटनावल्लभ्यानां निधेश्चिता विभो- र्जयति लटभापुंभागाभ्यां शरीरविनिर्मितिः ॥१॥ अज एवं गो के शृङ्गाग्र द्वारा विनिर्मित धनुष¹ तथा मानव एवं मातंग के देहार्ध द्वारा निर्मित गणेश² को साथ में रखने वाले, द्विविध घटना प्रियता-निधि, भगवान् के नर एवं नारी³ अंश से शरीर का निर्माण सर्वोत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है।
पाठभेद: 'ओ' तथा 'ओ श्रीगणेशायनमः' का भी पाठ प्रारम्भ में मिलता है। श्लोक संख्या १ में 'गोशृङ्गा' वा 'अजशृङ्गा' 'गोः शृङ्गा'; 'गण' का 'गणे', 'गणैः'; 'प्रति- गृह्णतः' का 'प्रतिगृह्णतः', 'प्रतिगूह्णतः' ; 'द्विविध' का 'विविध' ; 'उचिता' का 'अभ्यरस्ता' और 'लटभा', का पाठभेद 'ललना' मिलता है। शैली : कह्लण ने द्वितीय तरंग में नूतन उपमा, नवीन शब्दावली तथा सुगठित पदों की रचना की है। प्रथम तरंग में कह्लण ने प्रचलित शब्दों, प्रचलित उपमाओं एवं सरल भाषा का आश्रय लिया है। प्रथम तरंग के ३७३ श्लोकों की रचना के पश्चात् अभिव्यक्ति एवं भाव व्यंजना अधिक परिष्कृत तथा प्रौढ़ हो गयी है। उसके विचारों में कल्पना के स्थान पर गम्भीरता एवं प्रौढ़ता के मुकुलित स्वरूप का दर्शन होता है। प्रथम तरंग में घटनावली, काल गणना, तथा राजाओं के वर्णन के समय उसमें एक प्रकार की झिझक मालूम होती है। वह इतिहास लिख रहा था। परन्तु सामग्री पर्याप्त न होने पर वह विश्रृंखलांत और टूटी कड़ियों को इधर उधर से लाकर जोड़ रहा था।, किसी प्रकार ग्रन्थ को इतिहास का रूप दे रहा था। इस तरंग में वह झिझक कम हो गयी है। उसकी भाषा संयत हो गयी है। वह किंचित् आत्मविश्वास के साथ वर्णन करता है जिसका अभाव प्रथम तरंग में स्पष्ट मिलता है। श्री रणजीत सीताराम पण्डित के अनुवाद में पृष्ठ ५८१ पर इस तरंग में वर्णित ६ राजाओं का वर्गीकरण विक्रमादित्य वंश दिया गया है। श्री स्टीन इस वर्ग का कोई नामकरण नहीं करते। इस वर्ग के राजा एक ही वंश के नहीं थे। अतएव उनका वर्गीकरण किसी नाम से करना उचित नहीं होगा। कह्लण प्रशंसा द्वारा ही द्वितीय तरंगका प्रारम्भ करता है। अर्ध नारीश्वर भगवान् शिव की वन्दना करता है। यह श्लोक द्विविध घटनापूर्ण है। अर्ध नारीश्वर का शरीर पुरुष एवं स्त्री से बना है, और धनुष भी अज एवं गो शृंग से बना है। इस प्रकार कह्लण ने तीन द्विविध घटनाओं का वर्णन कर भगवान् का जय किया है। १ (१) धनुष : शृंगधनुष का कह्लण ने उल्लेख किया है। चाणक्य चार प्रकार के धनुषों का वर्णन करता है। चौथे प्रकार का धनुपदण्ड हड्डी, सींग किंवा शृंग का बनता था। श्रीकृष्ण का धनुष सींग अर्थात् शृंग का था। बाँस, सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा, इस्पात तथा ४७
३७० राजतरंगिणी
अन्य धातुओ से भी धनुष बनाये जाते थे । धनुष का दण्ड बनाने में भैस, गंडा, शरभ की सींग तथा चन्दन, शाल, बेंत, ककुभ अथवा धवल की लकड़ी का भी प्रयोग होता था। अग्निपुराण में धनुष का विशद वर्णन किया गया है। धनुष की डोरी को प्रत्यंचा कहते हैं। प्रत्यंचा तांत, बाँस या अन्य रेशेदार पदार्थों से बनायी जाती थी। चाणक्य ने मुर्वी, मुंज, पास, अर्क, सन, गवेधु तथा स्नायु तन्तुओ से प्रत्यंचा बनाने का वर्णन किया है। धनुष का दण्ड ६ फुट का उत्तम माना जाता है। उससे कम का निम्न श्रेणी का होता है। आर्ष काव्य कालीन धनुष का दण्ड ५॥ फुट तथा बाण ३ फिट का होता था। धनुष का दण्ड दो प्रकार का होता था। साधारण धनुष में दण्ड के दोनों छोरों को प्रत्यचा से सम्बन्धित कर दिया जाता है। यह सुगमता से बन जाता है। दूसरा प्रकार दण्ड में दोनों छोर अर्ध वृत्ताकार धनुष के दोनों ओर दण्ड वैदिक आर्यों का मुख्य आयुध धनुष था। उसका इतना महत्त्व था कि मृतक के दाहिने हाथ में धनुष रख दिया जाता था। दाह क्रिया के पूर्व, उसके हाथ से धनुष ले लिया जाता था ताकि वह भस्म न हो जाय। उसे मृतक द्वारा प्रदत्त थाती समझते थे। धनुर्ज्या को रूप देने पर धनुष के दोनों अग्र भागों को अर्त्नी कहते थे। अप्रयोगावस्था में प्रत्यंचा उतार देते थे। चलाने के समय रूप दिया जाता था। (ऋ० १० : १६६ : ३) कान के समीप तक धनुर्ज्या को खींचकर छोड़ते थे। अतएव उसे कर्णयोनि कहा जाता था। ऋ० ६:७५ : २ तथा ऋ० : २:२४ :८ ग्रीक अर्थात् यूनानी कवि होमर के वर्णन के अनुसार धनुष को वक्षस्थल तक खींचकर छोड़ते थे। अर्थात् भारतीय तथा पाश्चात्य धनुष चलाने में यह भेद था। (इलियाड :४:१२५) धनुष भारत से विश्व में चारों ओर फैला था। भारत से ईरान होता पश्चिमी एशिया तथा वहाँ से यूनान, रोम, मिस्र तथा यूरोप में पहुँचा था।
प्रथम तरंग ३७१ एक अनुवादकर्ता ने शिव के धनुष का नाम 'अजगव' दे दिया है। किन्तु शिव के धनुष अर्थ में यहाँ यह शब्द बैठता नहीं। गणेश तथा धनुष दोनों शिव के पास थे। इसे हम एक रूपक भी इस प्रकार मान सकते हैं कि भगवान् शिव के पार्श्व में बुद्धि के प्रतीक गणेश तथा शक्ति का प्रतीक धनुष दोनो उपस्थित हैं। वह शास्त्र एवं शस्त्र दोनो से समन्वित हैं। शिव ने किरात रूप में अर्जुन से युद्ध कर अपनी अपार शक्ति का परिचय दिया था। बुद्धि अर्थात् गणेश तो उनके पुत्र ही हैं। गणेश : गणेश वैदिक शब्दो में ब्रह्मणस्पति भी है। वह शंकर तथा पार्वती की सन्तान होने पर भी अयोनिज है। (ब्रह्म वै० पु० ८ तथा लिंग० १०२, पार्वती ने अपने शरीर के उबटन की मूर्ति बनाकर उसे सजीव किया था। (पद्म० सृः ४३ ; स्कन्द० ७:१:३८ ; मत्स्य० १५३) । प्रत्येक युगों में गणेश के अवतार, उनका नामादि भिन्न माना गया है। कृत अर्थात् सत्युग में गणेश कश्यप पुत्र विनायक थे। उनका वाहन सिंह था। इस अवतार काल में देवांतक नरांतक का दलन किया था। त्रेतायुग में शिवपुत्र मयूरेश्वर तथा वाहन मयूर था। सिंधू का संहार किया था। द्वापर युग में शिवपुत्र गजानन हुए थे। सिंदूर का विनाश किया था। अरण्य राजा को गणेश गीता सुनाया था। कलियुग में अश्वारूढ धूम्रकेतु नाम नाग में अदिति के गर्भ से जन्म लेंगे। महोत्कट रूप में म्लेच्छों का संहार करेंगे। (गणेशः २:१-६)। गणेश के एकदंत होने का कारण दिया गया है। भगवान् परशुराम ने शंकर-द्वारा प्रदत्त परशु गणेश पर फेंका। परशु शंकर का था। पिता का था अतएव उसका प्रतिकार नही किया जा सकता था। दाँत पर आक्रमण सह लिया। एक दाँत टूट गया। परशु हाथ में ले लिया। उस समय से उनका एक आयुध हो गया। यही कारण है। गणेश के हाथों में परशु आयुध बना मिलता है। कश्मीर में प्राप्त मूर्तियों में परशु आयुध दिखाया गया है। हाथी का मस्तक लगने की भी एक कथा है। भगवती पार्वती स्नान कर रही थी। गणेश द्वार पर बैठे थे। गणेश द्वारपाल किंवा रक्षक का कार्य कर रहे थे। शंकर का प्रवेश रोक दिया। शंकर क्रुद्ध हो गये। पिता-पुत्र का संघर्ष होने लगा। शंकर ने गणेश का मस्तक तोड दिया। पार्वती के आग्रह पर, शंकर ने मानव मस्तक के स्थान पर इन्द्र के गज का मस्तक लाकर, लगा दिया। उस समय से उनका नाम गजानन हो गया। (शिव० कु० १६) एक कथा और है। शनि के दृष्टिपात से गणपति का मस्तक भस्म हो गया। देवताओं ने उसके स्थान पर हाथी का मस्तक लगा दिया। (ब्रह्मवै० ३:१८ भवि०, प्रति० ४:१२) गणपति को सिंदूर प्रिय है। हनुमान की मूर्ति के समान उनकी मूर्ति पर सिंदूर का लेपन किया जाता है। गणपति वध करेंगे, यह कल्पना उठते ही, सिन्दूरासुर ने गणपति को उठाकर नर्मदा में डाल दिया। गणपति के रक्त से नर्मदा का जल रक्तिम हो गया। कालान्तर में गणपति ने सिन्दूरा- सुर का वध किया। उसका लाल रक्त शरीर में लेप किया। उनका समस्त शरीर सिन्दूर के रक्त से रक्त वर्ण हो गया। (गणेश० २:१३७) गणेश की सिद्धि तथा बुद्धि दो पत्नियां हैं। (गणेश० : १:१५) इनकी उपासना से कार्तवीर्य अद्यंग हुआ था। (गणेश० : २ : ७३-८३) गणेश चतुर्भुज है। उनका वाहन मूषक है। गणपति का एक रूप निकुंभ है। वाराणसी स्थित निकुंभ की उपासना करने पर भी दिवोदास की पत्नी सुयशा को पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। दिवोदास क्रोधित हो गया। निकुंभ मन्दिर ध्वस्त करा दिया।
३७० राजतरंगिणी अन्य धातुओं से भी धनुष बनाये जाते थे। धनुष का दण्ड बनाने में भैंस, गंडा, शरभ की सींग तथा चन्दन, शाल, बेंत, ककुभ अथवा धवल की लकड़ी का भी प्रयोग होता था। अग्निपुराण में धनुष का विशद वर्णन किया गया है। धनुष की डोरी को प्रत्यंचा कहते हैं। प्रत्यंचा तांत, बाँस या अन्य रेशेदार पदार्थों से बनायी जाती थी। चाणक्य ने मुर्वी, मुंज, घास, अर्क, सन, गवेधु तथा स्नायु तन्तुओं से प्रत्यंचा बनाने का वर्णन किया है। धनुष का दण्ड ६ फुट का उत्तम माना जाता है। उससे कम का निम्न श्रेणी का होता है। आर्ष काव्य कालीन धनुष का दण्ड ५॥ फुट तथा बाण ३ फिट का होता था। धनुष का दण्ड दो प्रकार का होता था। साधारण धनुष में दण्ड के दोनों छोरों को प्रत्यंचा से सम्बन्धित कर दिया जाता है। यह सुगमता से बन जाता है। दूसरा प्रकार दण्ड में दोनों छोर अर्ध वृत्ताकार धनुष के दोनों ओर दण्ड अर्धचन्द्राकार से उठे रहते थे। उनके छोर पर प्रत्यंचा लगा दी जाती थी। धनुष छोड़ते समय प्रत्यंचा दोनों छोरों पर घूमे अर्धचन्द्राकार दण्ड पर शक्ति से चढ़ायी जाती थी। इसे प्रत्यंचा का चढ़ाना कहते हैं। यह धनुष दण्ड बाँस का भी बनता था। उसे अग्नि से सिकाकर अर्धवृत्ताकार दोनों छोरों पर बना देते थे। किन्तु इस प्रकार का धनुष धातु का अधिक होता था। मध्ययुग में इस प्रकार धातु निर्मित धनुष बहुत प्रचलित थे। धनुष के झुकाव अर्थात् चाप का भी वर्णन मिलता है। चाप के अनुसार प्रत्यंचा भारी या हल्की होती थी। 'कोदण्ड मण्डन' में १८ प्रकार के धनुषों का उल्लेख मिलता है। चाप का विभिन्न भार भी दिया गया है। योगिन् के धनुष का भार २०० पल तथा दूर प्रहार वाले धनुष का भार ९५० या १००० पल दिया गया है। नीति प्रकाशिका में १४ प्रकार के चापों का वर्णन मिलता है। वैदिक आर्यों का मुख्य आयुध धनुष था। उसका इतना महत्त्व था कि मृतक के दाहिने हाथ में धनुष रख दिया जाता था। दाह क्रिया के पूर्व, उसके हाथ से धनुष ले लिया जाता था ताकि वह भस्म न हो जाय। उसे मृतक द्वारा प्रदत्त धातो समझते थे। धनुर्ज्या को कस देने पर धनुष के दोनों अग्र भागों को अर्त्नी कहते थे। अप्रयोगावस्था में प्रत्यंचा उतार देते थे। चलाने के समय कस दिया जाता था। (ऋ० १० : १६६ : ३) कान के समीप तक धनुर्ज्या को खींचकर छोड़ते थे। अतएव उसे कर्णयोनि कहा जाता था। ऋ० ६:७५ : २ तथा ऋ० : २ : २४ : ८ ग्रीक अर्थात् यूनानी कवि होमर के वर्णन के अनुसार धनुष को वक्षस्थल तक खींचकर छोड़ते थे। अर्थात् भारतीय तथा पाश्चात्य धनुष चलाने में यह भेद था। ( इलियड ४:१२५ ) धनुष भारत से विश्व में चारों ओर फैला था। भारत से ईरान होता पश्चिमी एशिया तथा वहाँ से यूनान, रोम, मिश्र तथा यूरोप में पहुँचा था। भारतीय सैन्य विज्ञान का नाम ही धनुर्वेद दे दिया था। यूनानियों के साथ पर्शिया का युद्ध प्राचीन काल में कई बार हुआ था। उसमें भारतीय धनुष विद्या विशारदों ने भाग लिया था। उन्हें सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर माना गया था। धनुष विद्या भारत में अत्यन्त विकसित थी। कल्हण यहाँ पर धनुष के अग्र भाग में अज तथा गाय के सींग अर्थात् श्रृंग लगने का उल्लेख करता है। प्राचीन काल में धनुष के दोनों सिरों को दृढ़ और मजबूत बनाने के लिए, सींग तथा किसी धातु को जड़ कर, उसे अधिक टिकाऊ बना देते थे। डोरी अथवा प्रत्यंचा को चढ़ाने के लिये उसमें खाँचा बना रहता था। उसमें प्रत्यंचा लगा दी जाती थी। कश्मीर में गाय तथा अज का सींग, भैस, भैंसा, गैंडा तथा शरभ की अपेक्षा छोटा होता था। वह धनुष दण्ड बनाने के अयोग्य था। अतएव उसे दोनों छोरों पर लगाया जाता था।
प्रथम तरंग ३७१ एक अनुवादकर्ता ने शिव के धनुष का नाम 'अजगव' दे दिया है। किन्तु शिव के धनुष अर्थ में यहाँ यह शब्द बैठता नही। गणेश तथा धनुष दोनो शिव के पास थे। इसे हम एक रूपक भी इस प्रकार मान सकते है कि भगवान् शिव के पार्श्व मे बुद्धि के प्रतीक गणेश तथा शक्ति का प्रतीक धनुष दोनो उपस्थित है। वह शास्त्र एवं शस्त्र दोनो से समन्वित है। शिव ने किरात रूप में अर्जुन से युद्ध कर अपनी अपार शक्ति का परिचय दिया था। बुद्धि अर्थात् गणेश तो उनके पुत्र ही है। गणेश : गणेश वैदिक शब्दो में ब्रह्मणस्पति भी है। वह शंकर तथा पार्वती की सन्तान होने पर भी अयोनिज है। (ब्रह्म वै० पु० ८ तथा लिंग० १०२) पार्वती ने अपने शरीर के उबटन की मूर्ति बनाकर उसे सजीव किया था। (पद्म० सृः ४३ ; स्कन्द० ७:१:३८; मत्स्य० १५३ ।) प्रत्येक युगों मे गणेश के अवतार, उनका नामादि भिन्न माना गया है। कृत अर्थात् सत्ययुग में गणेश कश्यप पुत्र विनायक थे। उनका वाहन सिंह था। इस अवतार काल में देवांतक नरातक का दलन किया था। त्रेतायुग मे शिवपुत्र मयूरेश्वर तथा वाहन मयूर था। सिन्धू का संहार किया था। द्वापर युग मे शिवपुत्र गजानन हुए थे। सिंदूर का विनाश किया था। वरेण्य राजा को गणेश गीता सुनाया था। कलियुग में अश्वारूढ धूमकेतु नाम भाग में अदिति के गर्भ से जन्म लेंगे। महोत्कट रूप में म्लेच्छो का सहार करेंगे। (गणेशः २:५-६)। गणेश के एकदंत होने का कारण दिया गया है। भगवान् परशुराम ने शंकर-द्वारा प्रदत्त परशु गणेश पर फेंका। परशु शंकर का था। पिता का था अतएव उसका प्रतिकार नही किया जा सकता था। दाँत पर आक्रमण सह लिया। एक दाँत टूट गया। परशु हाथ में ले लिया। उस समय से उनका एक आयुध हो गया। यही कारण है। गणेश के हाथों मे परशु आयुध बना मिलता है। कश्मीर में प्राप्त मूर्तियों में परशु आयुध दिखाया गया है। हाथी का मस्तक लगने की भी एक कथा है। भगवती पार्वती स्नान कर रही थी। गणेश द्वार पर बैठे थे। गणेश द्वारपाल किंवा रक्षक का कार्य कर रहे थे। शंकर का प्रवेश रोक दिया। शंकर क्रुद्ध हो गये। पिता-पुत्र का संघर्ष होने लगा। शंकर ने गणेश का मस्तक तोड दिया। पार्वती के आग्रह पर, शंकर ने मानव मस्तक के स्थान पर इन्द्र के गज का मस्तक लाकर, लगा दिया। उस समय से उनका नाम गजानन हो गया। (शिव० कु० १६) एक कथा और है। शनि के दृष्टिपात से गणपति का मस्तक भस्म हो गया। देवताओं ने उसके स्थान पर हाथी का मस्तक लगा दिया। (ब्रह्मवै० ३:१८ भवि०, प्रति० ४:१२) गणपति को सिंदूर प्रिय है। हनुमान की मूर्ति के समान उनकी मूर्ति पर सिंदूर का लेपन किया जाता है। गणपति वध करेंगे, यह कल्पना उठते ही, सिन्दूरासुर ने गणपति को उठाकर नर्मदा में डाल दिया। गणपति के रक्त से नर्मदा का जल रक्तिम हो गया। कालान्तर में गणपति ने सिन्दूरा- सुर का वध किया। उसका लाल रक्त शरीर में लेप किया। उनका समस्त शरीर सिन्दूर के रक्त से रक्त वर्ण हो गया। (गणेश० २:१३७) गणेश की सिद्धि तथा बुद्धि दो पत्नियां हैं। (गणेश० : १ : १५) इनकी उपासना से कार्तवीर्य अव्यंग हुआ था। (गणेश० : २:७३-८३) गणेश चतुर्भुज हैं। उनका वाहन मूषक हैं। गणपति का एक रूप निकुंभ है। वाराणसी स्थित निकुंभ की उपासना करने पर भी दिवोदास की पत्नी सुयशा को पुत्र प्राप्ति नही हुई। दिवोदास क्रोधित हो गया। निकुंभ मन्दिर ध्वस्त करा दिया।
३७२ राजतरंगिणी निकुंभ ने वाराणसी नष्ट होने का शाप दिया । तालजंघादि दैत्यों ने वाराणसी नगर ध्वस्त किया । दिवोदास पलायन कर गया । अन्त में निकुंभ की पुनः स्थापना की गयी । वाराणसी समृद्धिशाली हो गयी । इस कथा में वर्णित निकुंभ ही गणपति नाम से प्रख्यात हुए । ( वायु० : ९२ : ३९-५१ ) गणेश ओंकार स्वरूप हैं । उनकी उपासना का अर्थ ब्रह्म की उपासना मानी गयी है । (गणेश० : १ : १३-१५ ) एतदर्थ सर्व विद्या एवं कलाओं का उन्हें अधिपति माना जाता है । किसी भी देवता की उपासना के पूर्व सर्वप्रथम गणेश की पूजा की जाती है । (पद्म० : सृ० : ९३ ) अ-उ-म् से ओंकार बनता है । यह प्रणव है । तुरीय नाम चतुर्थ भाग भी ॐ कार में समाविष्ट है । जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय चारों अवस्थाओं का ॐ कार द्योतक है । वाच्य तथा वाचक दोनों रूपों से ॐ कार वर्णित है । अतएव वेदों का ॐ कार से प्रारम्भ करने की प्रथा प्रचलित हुई थी । कालान्तर में गजमुख गणेश का स्वरूप ॐ कार से ही विकसित हुआ । ॐ कार तथा गणेश की प्रचलित एवं प्राचीन मूर्तियों के रूपों में साम्य मिलता है । गणेश की गजमुख मूर्ति अबतक पांचवीं शताब्दी के पूर्व की नहीं प्राप्त हो सकी है । सन्त ज्ञानेश्वर ने गीता की ज्ञानेश्वरी टीका में गजमुख तथा ॐ कार की एकता स्पष्ट की है । इस एकता के कारण उपनिषद् प्रतिपादित ॐ कार वेद एवं सार्वत्रिक, सर्व कार्यारम्भ में आद्य स्थान प्राप्त कर लिया । बाल गणपति, तरुण गणपति, भक्ति विघ्नेश्वर, शक्ति गणेश, उच्छिष्ट गणपति, नृत्त गणपति, हेरंब गणपति, प्रसन्न गणपति आदि रूपों में गणपति की मूर्तियाँ मिलती हैं । इसी प्रकार विनायक के आठ रूपों की कल्पना की गयी है । (३) अर्धनारीश्वर : एक कथा है । बाइबिल के आदम तथा हौवा की कथा से मिलती है । बाइ- बिल के अनुसार सर्व प्रथम आदम को भगवान् ने बनाया । तत्पश्चात् उसकी एक पसली से हौवा को बनाया । इस प्रकार मानव एक ही मनुष्य का अंग है । शिव पुराण में कथा मिलती है । ब्रह्मा ने प्रजा उत्पत्ति निमित्त तपस्या की । शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गये । उनके शरीर से अर्द्ध- नारी-नरेश्वर उत्पन्न हुए । ( शिव० स० १०१ ) स्कन्द पुराण में एक और कथा का वर्णन है । महिषासुरमर्दिनी ने महिषासुर का वध किया । शिव संतुष्ट हुए । प्रसन्न हुए । मन्दराचल पर पार्वती तपस्या कर रही थीं । पार्वती को वामांग पर शिव ने ले लिया । शंकर के इस प्रेम प्रदर्शन से प्रफुल्लित होकर, पार्वती भगवान् शंकर के वामांग में लीन हो गयीं । शंकर एवं पार्वती एक ही शरीर के दक्षिण तथा वामांग हो गये । शिव का शुद्ध दक्षिणांग शुक्लवर्ण रह गया । पार्वती का शरीर वामांग ताम्रवर्ण युक्त हो गया । अर्धभाग में कंचुकी तथा हार आदि आभूषण रह गये और यथावत् पुरुष स्वरूप रह गया । यह शिव पार्वती का अर्ध नारीश्वर किंवा अर्धनारी-नरेश्वर रूप हो गया । (स्कन्द० १ : २ : ३-२१; मत्स्य० २६०) मनुस्मृति में भी इसी प्रकार की एक कथा दी गयी है । हिरण्यगर्भ को सृष्टि रचना की इच्छा हुई । उसने अपने शरीर को दो भाग किये । अर्ध भाग से स्त्री तथा दूसरे अर्ध भाग से पुरुष शरीर की रचना हुई । एक ही शरीर के दो अंश थे । मिलने पर, अर्ध नारीश्वर रूप अर्थात् पुरुष तथा स्त्री एक में हो गये । ( मनु० : १ : ३२ ) देवी भागवत में और एक कथा इसी से मिलती- जुलती दी गयी है । ईश्वर अपनी स्वेच्छा से विविध रूप हो गये । दायां भाग पुरुष तथा वाम भाग स्त्री का हो गया । उसने यह कार्य सृष्टि रचना की दृष्टि एवं इच्छा से किया । (दे० भा० २ : २७ ) किष्किन्धा काण्ड वाल्मीकीय रामायण में इस
सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है कि स्त्री का मूल पुरुष से भिन्न नहीं है। (कि० : ३४ : ३८) ऋग्वेद में यद्यपि अर्धनारीश्वर शब्द का उल्लेख नहीं मिलता, तथापि उसकी कल्पना मिलती है। पुरुष एवं प्रकृति इस सृष्टि प्रक्रिया के केन्द्र बिन्दु हैं। प्रतीकात्मक स्वरूप हैं। इसकी व्यंजना स्पष्ट प्रतीत होती है। द्यावा-पृथ्वी लोक की मध्यवर्ती सृष्टि हैं। माता-पिता, योषा-वृषा प्राण हैं। अग्नि-सोम, पुरुष-स्त्री हैं। पति-पत्नी के द्वन्द्व द्वारा प्राणी जगत् का सृजन होता है। पुरुष में अग्नि तत्त्व तथा स्त्री में सोम तत्त्व प्रधान है। स्त्री के आभ्यंतर में अर्धभाग पुरुष का विद्यमान रहता है। जहाँ अग्नि है। वहीं अर्धभाग सोम है। अतएव ऋग्वेद (१ : १६४ : १६) कहता है—'स्त्रियः सतींस्वा उ मे पुंस आहुः।' स्त्री का शोणित आग्नेय एवं पुरुष का शुक्र सौम्य भाव से युक्त रहता है। शुक्र एवं शोणित ही वैज्ञानिक भाषा में वृषा एवं योषा अर्थात् नर-नारी है। स्त्री तथा पुंलिंग हैं। सृष्टि के इस आदि भूत मातृत्व एवं पितृत्व को प्रतीक रूप में पुराणों में पार्वती एवं परमेश्वर कहा गया है। शिव पार्वती ही रुद्र एवं अम्बिका हैं। शतपथ ब्राह्मण (५ : ३ : १ : १०) में उल्लेख है—'अग्निर्वै श्नितः।' इसी को तैत्तिरीय ब्राह्मण दुहराता है—'एवं रुद्र. यदग्निः।' (१:१:५:८-६) ऋग्वेद कितनी वैज्ञानिक भाषा में कहता है - 'अग्निर्जगतितमयं सोम आह तवाह्मस्मि सहर् न्योकाः।' (५ : ४४ : १५) अग्नि एवं सोम जगत् के माता पिता है। अग्नि अन्नाद है। सोम उसका अन्नरूप द्वारा संभरण करता है। सृष्टि रचना के लिये पुरुष एवं स्त्री दोनों तत्त्व अनिवार्य हैं। वनस्पति से लेकर समस्त प्राणधारियों की उत्पत्ति इन दोनों तत्त्वों के मिलन का परिणाम हैं। पुरुष नारी में बीज वपन करता है। नारी गर्भ में पुरुष के अग्निकण को लेकर सम्वर्धन करती है। वह बीज विराट रूप धारण करता है। बीज की शक्ति के अनुसार, जो मात्रा का आधान करती है, वही माता है। वही पिता एवं माता शिव एवं शक्ति के प्रतीक हैं। शक्ति विहीन शिव रुद्र हैं। उनका स्वरूप घोर हो जाता है। शक्ति के साथ मिलने पर उनका स्वरूप शिव होता हैं। इसे दूसरी तरह से समझे तो अर्थ होगा। यदि अग्नि को सोम स्वरूप अन्न प्राप्त नही होता, तो वह जिसमें रहती हैं, उसी को भस्म करती हैं। यह रुद्र रूप है। यह संहार का स्वरूप है। किन्तु अग्नि में सोम की आहुति याग है। इस यज्ञ का स्वस्ति भाव होता है। वह स्वस्ति भाव शिव-शक्ति किंवा अग्नि-सोम का समन्वित रूप है। यही अर्धनारीश्वर है। वैदिक साहित्य में नैसर्गिक एवं व्याधि-जनित उत्पात-संहारक देवता को रुद्र कहा गया है। किन्तु उन्हीं उत्पातों का शमनकारी देवता शिव बन गया है। अतएव रुद्र एवं शिव एक ही देव के रौद्र एवं शान्त स्वरूप हैं। कालान्तर में रुद्र के नाम, रुद्र, भव, शर्व (शिव) पशुपति, भीम, ईशान, उग्र एवं महादेव पड़ गये। रुद्र की पत्नी सुवर्चला किंवा सती, पुत्र शनिश्चर तथा निवास स्थान सूर्य, भव की पत्नी उमा (उषा) पुत्र शुक्र निवास स्थान जल; शर्व (शिव) की पत्नी विकेशी, पुत्र मंगल, निवास स्थान मही, पशुपति की पत्नी शिवा, पुत्र मनोजव, निवास स्थान वायु, भीम की पत्नी स्वाहा (स्वधा) पुत्र स्कन्द निवास स्थान अग्नि; ईशान की पत्नी दिशा, पुत्र स्वर्ग, निवास स्थान आकाश; उग्र की पत्नी दीक्षा, पुत्र संतान, निवास स्थान यशीय ब्राह्मण तथा महादेव की पत्नी रोहिणी, पुत्र बुध और निवास स्थान चन्द्र कहा गया है। यही अष्ट रुद्र हैं। (विष्णु० १:८; माव० ४९; पद्म०, सृ० ३; वायु, २७; स्कन्द ७ : १ : ८७) इस रूप में प्रत्येक के साथ शक्ति स्वरूप पत्नी है। सभी पार्वती किंवा आदि शक्ति की प्रतीक हैं।