राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
परिशिष्ट ख ८३ जाती थी । पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व ओर आबाद थी । अभिधर्म कोष शास्त्र - एवं सुमंगल विलासिनी का रचयिता बसुबन्धु पुष्करावती का निवासी था । गान्धार जातक में गान्धार कश्मीर का उल्लेख मिलता है । दरायुह के बेहिस्तुन अभिलेख ( ईसा पूर्व पाँच सो बाईस से चार सो छियासी वर्ष ) गान्धार का उल्लेख है। दरायुह ( दारियस ) के सूसा प्रासाद के भग्नावशेष के एक अभिलेख में गान्धार का उल्लेख मिला है । जम्बूद्वीप की सीमा वर्णन में उत्तर-पश्चिम गान्धार तथा कश्मीर का उल्लेख किया गया है । सोलह जनपदों में कम्बोज तथा गान्धार को उत्तरापथ में सम्मिलित किया गया है । खुद्दक निकाय के उत्तरखण्ड चुल्ल निद्देस में गान्धार जनपद के स्थान पर भोन अर्थात् भवन जनपद का उल्लेख किया गया है । मज्झिम निकाय की अट्ठ कथा तथा पपंचसूदनी में गान्धार राष्ट्र सीमान्त पर स्थित जनपद बताया गया है । यहाँ पर कश्मीर गान्धार का नाम साथ-साथ लिया गया है । ( जातक भाग २ : ३६५ ) । अनेक विद्वानों ने इसके आधार पर कश्मीर को गान्धार के अन्तर्गत बताया है । यह अप्रमाणित है । ठीक नहीं है । मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, मत्स्य तथा वामन पुराणों में 'गान्धारा यवनाश्चैव' का उल्लेख मिलता है । गान्धार, यवन शब्द एक साथ प्रयुक्त किया गया । उनसे यवन देश तथा गान्धार का समीप होना प्रतीत होता है । सिन्धु अर्थात् आधुनिक सिन्ध प्रदेश सिन्धु नदी के पश्चिम तथा पूर्व में सिन्धु नदी के अधोभाग के पूर्व था । सोवीर क्षेत्र झेलम-चनाव संगम से ५० मील अधोभाग में था । भद्र देश वर्तमान सियालकोट तथा उसका समीपवर्ती क्षेत्र है । कुणिन्द लोगों के विषय में कहा जाता है कि कुलू अंचल के आधुनिक कुलेतस हैं । प्राचीन काल में यह अंचल सहारनपुर तथा अम्बाला जिले तक विस्तृत था । इस क्षेत्र से तत्कालीन मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं । पारद लोग खुराशान क्षेत्र के निवासी थे । यवन अफगानिस्तान में थे । यूनानी जाति अफगानिस्तान में आबाद हो गयी थी । राज्य वही स्थापित कर लिया था । कुहून शब्द काबुल नदी जिसका प्राचीन नाम कुभा किंवा कुहू था उसकी उपत्यका के निवासियो के लिए आया है। 'गान्धारान् वरयान् हुन्दान्,' 'गान्धारान् ओरसान् कुहून्,' 'गान्धारान् रुरसान् (ओरसान्) कुहून्' आदि उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मार्कण्डेय पुराणों में मिलते हैं । इससे निष्कर्ष निकलता है । गान्धार कुभा अर्थात् काबुल नदी की उपत्यका तक विस्तृत था । 'शिवपौरान् इन्द्रहार्यान्', 'शिवपौरान् इन्द्रभरून्' का उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराणों में मिलता है । शिव पौरान् से अर्थ शिव नगर के पौरगण से है । शिवपुर अर्थात् वर्तमान शोरकोट जिला पश्चिमी पाकिस्तान के लिए व्यवहृत किया गया है । संम्मोह तन्त्र की तालिका ( २ : ४ ) में गान्धार देश का उल्लेख किया गया है । 'हूण कौरव गान्धार' अर्थात् हूणों के समीप देश की ओर संकेत किया गया है । गान्धार का दूसरा नाम दिहन्दास दिया गया है । दोनों शब्द समानार्थक माने गये हैं । दिहन्दास वास्तव में उदभाण्डपुर प्रतीत होता है । गान्धार को कन्धार में मिलाने का प्रयास किया गया है परन्तु यह खींचातानी तर्कसम्मत नहीं मालूम होती । गान्धार की जो स्थिति तथा सीमा बतायी गयी है उसमे वर्तमान कन्धार का मेल नहीं खाता । सम्भव है । गान्धार के नाम पर अफगानिस्तान के दक्षिण में गान्धार नगर बसाया गया होगा ! हो सकता है गान्धार का अपभ्रंश वर्तमान कन्धार हो गया । भारत में काशी नाम के कितने ही स्थान हैं । परन्तु वाराणसी को ही काशी वास्तविक काशी राज्य रही । अन्यथा, दक्षिण काशी, उत्तर काशी अनेक स्थान काशी के नाम पर है ।
८२ राजतरंगिणी धर्म स्थान खण्डहर हो गये थे। उसके अनुसार उत्तर दिशा में गान्धार का विस्तार १००० ली पूर्व में सिन्धु नदी तक था । राजधानी पुरुषपुर अर्थात् पेशावर ४० ली के क्षेत्र में फैला था । गान्धार राजवंश का लोप हो गया । कपिशा राज्य के अन्तर्गत उसका शासन होता था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे। परन्तु देश धनधान्य पूर्ण था। उपज खूब होती थी । भूमि उर्वरा थी । अनेक प्रकार के अन्न, फल तथा फूल होते थे । लोग लज्जालु तथा कोमल हृदय थे । लोगों में गान्धर्व के प्रति रुचि थी । कुछ ही बौद्ध धर्मानुयायी बच गये थे । शेष मूर्तिपूजक तथा धर्म भ्रष्ट हो गये थे । पाणिनि का गान्धार प्रदेश में जन्म हुआ था । गान्धार की राजधानी पुष्कलावती किंवा पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व की ओर था । गान्धार पहले सिन्धु के दोनों ओर फैला था किन्तु कालान्तर में सिन्धु नदी के पश्चिम ओर ही रह गया । पुष्करावती नगर की नींव भरत के पुत्र पुष्कर ने डाली थी । ( विष्णु पुराण ४ . ५ ) । आठवीं तथा नवी शताब्दी में मुसलमानों के उत्कर्ष के साथ ही साथ यह देश शनैः-शनैः उनके राज- नीतिक तथा सांस्कृतिक प्रभाव में आ गया । सन् ८७० ई० में अरब सरदार याकूब ने अफगानिस्तान पर आंशिक विजय प्राप्त की थी । अलप्तगीन तथा सुबुक्तगीन के आक्रमणों का यहाँ के हिन्दू नरेशों ने सामना किया था । सन् ९९० में लम्पक ( लमगान ) का दुर्ग हिन्दुओं के हाथों से निकल गया । काफिरिस्तान के अतिरिक्त समस्त अफगानिस्तान को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा । ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में हिंदू शाही वंशजो के हाथ में गान्धार प्रदेश का शासन-सूत्र आ गया था । सन् १०२१ ई० में सुलतान महमूद गजनी ने गान्धारराज त्रिलोचन पाल पर आक्रमण किया । राजा तोसी तट पर पराजित हो गया । गान्धार के हिन्दू धर्म तथा स्वतंत्रता दोनों का ही लोप हो गया । तत्पश्चात् केवल ५ वर्ष के लिए उसके पुत्र भीमपाल ने पुनः स्वतंत्रता प्राप्त की । परन्तु मुस्लिम शक्ति के सम्मुख गान्धार मुस्लिम धर्म तथा संस्कृति में लीन हो गया । मुस्लिम इतिहासकारों ने गान्धार की राज- धानी तक्षशिला का वर्णन नहीं किया है । तक्षशिला अपना पूर्व गौरव खो चुका था । खंडहरों का ढेर मात्र रह गया था । मुस्लिम इतिहासकारों ने उसका उल्लेख करना महत्वपूर्ण नहीं समझा । इस वैदिक काल से अठारहवीं शताब्दी तक गान्धार भारतीय राज्य का अंग होता और निकलता रहा है । उसका इतिहास भारतीय इतिहास से गुंथा है। उसे अलग रखना कठिन है। वहां भारतीय संस्कृति फली-फूली । वहाँ से बाहर गयी । ललित कलाएँ विकसित हुई । गान्धार का पुराना नाम, धर्मादि का लोप हो गया । उत्तर-पश्चिमीय सीमान्त प्रदेश के रूप में उसका अधिक क्षेत्र पाकिस्तान बनने के पूर्व भारत का अंग था । तक्षशिला का वर्णन करते हुए प्लिनी लिखता है कि नगर पर्वत मूल के उस स्थान पर आबाद था, जहाँ पर्वत भूमि में मिल जाता था । नगर समतल भूमि में बसा था । वह नगर की बड़ी प्रशंसा करता है कनिघम ने तक्षशिला मे ५५ स्तूप, २८ विहार तथा ९ मन्दिरों का ध्वंसावशेष देखा था । नागार्जुनो कोण्डा के वीरपुरुष दत्त के अभिलेख में गान्धारका उल्लेख आया है। गान्धार में १००० से अधिक बौद्ध विहार थे । युवान्चुवाग के समय में उनकी बुरी अवस्था थी । अनेक स्तूपों के शिखर खंडहर थे । लगभग १०० देव मन्दिर गान्धार में थे । पुष्करावती गान्धार की राजधानी थी । उसकी राजधानियाँ विभिन्न समयों में बदलती रही है । पुष्करावती किंवा पुष्कलावती तथा कभी तक्षशिला ही
परिशिष्ट ज्ञ ८३ जाती थी । पुष्करावती सिन्धु के पश्चिम तथा तक्षशिला के पूर्व ओर आबाद थी । अभिधर्म कोष शास्त्र - एवं सुमंगल विलासिनी का रचयिता वसुबन्धु पुष्करावती का निवासी था । गान्धार जातक में गान्धार कश्मीर का उल्लेख मिलता है। दरायुह के बेहिसुत अभिलेख ( ईसा पूर्व पाँच सौ बाईस से चार सौ छियासी वर्ष ) गान्धार का उल्लेख है। दरायुह ( दारियस ) के सूसा प्रासाद के भग्नावशेष के एक अभिलेख में गान्धार का उल्लेख मिला है। जम्बूद्वीप की सीमा वर्णन में उत्तर-पश्चिम गान्धार तथा कश्मीर का उल्लेख किया गया है। सोलह जनपदों में कम्बोज तथा गान्धार को उत्तरापथ में सम्मिलित किया गया है ! खुद्दक निकाय के उत्तरखण्ड चुल्ल निद्देस में गान्धार जनपद के स्थान पर भोन अर्थात् भवन जनपद का उल्लेख किया गया है। मज्झिम निकाय की अट्ठ कथा तथा पपंचसूदनी में गान्धार राष्ट्र सीमान्त पर स्थित जनपद बताया गया है। यहाँ पर कश्मीर गान्धार का नाम साथ-साथ लिया गया है। ( जातक भाग २ : ३६५ ) । अनेक विद्वानों ने इसके आधार पर कश्मीर को गान्धार के अन्तर्गत बताया है। यह अप्रमाणित है। ठीक नहीं है। मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड, मत्स्य तथा वामन पुराणों में 'गान्धारा यवनाश्चैव' का उल्लेख मिलता है । गान्धार, यवन शब्द एक साथ प्रयुक्त किया गया। उनसे यवन देश तथा गान्धार का समीप होना प्रतीत होता है । सिन्धु अर्थात् आधुनिक सिन्ध प्रदेश सिन्धु नदी के पश्चिम तथा पूर्व में सिन्धु नदी के अधोभाग के पूर्व था । सौवीर क्षेत्र झेलम-चनाब संगम से ५० मील अधोभाग में था । भद्र देश वर्तमान सियालकोट तथा उसका समीपवर्ती क्षेत्र है । कुणिन्द लोगों के विषय में कहा जाता है कि कुलू अंचल के आधुनिक कुलेत्त हैं। प्राचीन काल में यह अंचल सहारनपुर तथा अम्बाला जिले तक विस्तृत था । इस क्षेत्र से तत्कालीन मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं । पारद लोग खुराशान क्षेत्र के निवासी थे। यवन अफगानिस्तान में थे । यूनानी जाति अफगानिस्तान में आबाद हो गयी थी । राज्य वही स्थापित कर लिया था । कुहून शब्द काबुल नदी जिसका प्राचीन नाम कुभा किंवा कुहू था उसकी उपत्यका के निवासियों के लिए आया है। 'गान्धारांन् वश्यान् हूह्वान्,' 'गान्धारान् औरसान् कुह्हून्,' 'गान्धारान् रुरसान् ( औरसान् ) कुरून्' आदि उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मार्कण्डेय पुराणों में मिलते हैं। इससे निष्कर्ष निकलता है । गान्धार कुभा अर्थात् काबुल नदी की उपत्यका तक विस्तृत था । 'शिवपौरान् इन्द्रहाक्षान्', 'शिवपौरान् इन्द्रभक्षन्' का उल्लेख वायु, ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराणों में मिलता है । शिव पौरान् से अर्थ शिव नगर के पौरागण से है । शिवपुर अर्थात् वर्तमान शोरकोट जिला पश्चिमी पाकिस्तान के लिए व्यवहृत किया गया है । संम्मोह तन्त्र की तालिका ( २ : ४ ) में गान्धार देश का उल्लेख किया गया है ।'हूण कौरव गान्धार' अर्थात् हूणों के समीप देश की ओर संकेत किया गया है । गान्धार का दूसरा नाम दिह्न्दास दिया गया है। दोनों शब्द समानार्थक माने गये हैं । दिह्न्दास वास्तव में उदभाण्डपुर प्रतीत होता है । गान्धार को कन्धार में मिलाने का प्रयास किया गया है परन्तु यह खीचातानी तर्कसम्मत नहीं मालूम होती । गान्धार की जो स्थिति तथा सीमा बतायी गयी है उसमे वर्तमान कन्धार का मेल नहीं खाता । सम्भव है। गान्धार के नाम पर अफगानिस्तान के दक्षिण में गान्धार नगर बसाया गया होगा ! हो सकता है गान्धार का अपभ्रंश वर्तमान कन्धार हो गया । भारत मे काशी नाम के कितने ही स्थान हैं । परन्तु वाराणसी को ही काशी वास्तविक काशी राज्य रही । अगस्त्य, दक्षिण काशी, उत्तर काशी अनेक स्थान काशी के नाम पर हैं ।
८४ राजतरंगिणी पौराणिक परम्परा के अनुसार गान्धार में सिन्धु नदी के दोनों तटों पर दो नगर तक्षशिला तथा पुष्कलावती आबाद थे । तक्षशिला सराय कला रेल जंक्शन से रावलपिण्डी के उत्तर-पश्चिम २० मील पर हरो नदी की उपत्यका में आबाद है । यहाँ ३ नगरों के ध्वंसावशेष हैं। धुर दक्षिणी ध्वंसावशेष का स्थान उठती अधित्यका मीर टीला पर है । पुष्कलावती किंवा पुष्करावती नगर स्वात प्रदेश में परगना चारसद्दा मील डयारत अंचल में १७ मील उत्तर-पूर्व पेशावर में स्थित है । स्वात उपत्यका को प्राचीन काल में उड्डियान देश कहते थे । स्कन्द पुराण की तालिका में उसकी क्रम संख्या १३ तथा ग्राम-संख्या ९ लाख दी गयी है । सातवीं शताब्दी में हुएनसांग जिस समय उत्तरापथ में प्रवेश किया उस समय उदभाण्डपुर कपिशा के राजा की द्वितीय राजधानी थी । उस राज्य में लम्पक (लगमान) नगर, नगरहार (जलालाबाद), वर्ण (वन्नू) तथा जागूड़ अर्थात् दक्षिणी अफगानिस्तान गजनी पड़ता था । गजनी का नाम स्कन्द पुराण में गाजनक आया है । उसके ग्रामों की संख्या ७२ हजार दी गयी है । देशों की तालिका में उसकी क्रम-संख्या ७ है । गान्धार देश के विषय में हुएनसांग लिखता है । गान्धार की राजधानी पुरुषपुर थी । राजवंश लुप्त हो गया था । कपिशा राज्य के अन्तर्गत था । नगर तथा ग्राम उजड़ गये थे । बहुत थोड़े लोग वहाँ निवास करते थे । श्री लक्ष्मीधर ग्यारह पिशाच देशों में गान्धार को भी मानते हैं । यहाँ अर्थ यह लगाना चाहिए कि वहाँ के लोग पैशाची भाषा मानते थे । (कम्परेटिव ग्रामर आफ प्राकृत लेंगुवेज पैरा-२७) स्कन्द पुराण के देशों में तथा महावस्तु के जनपदों में गान्धार और कम्बोज जनपद का नाम नहीं है । किन्तु अंगुत्तर निकाय में १६ जनपदों में गान्धार, कम्बोज का नाम दिया गया है । महावंश में शिवि तथा दशार्ण दो अन्य जनपदों का उल्लेख किया गया है । महावस्तु में बुद्ध ज्ञान प्रचारार्थ दिये गये नामों में शिवि देश सम्मिलित है । शिवि स्कन्द पुराण के देशों की तालिका में ४५वाँ नाम है । उसके ग्रामों की संख्या १० हजार दी गयी है । कम्बोज जनपद का भी उल्लेख है । स्कन्द पुराण की तालिका में क्रमसंख्या १९ तथा ग्रामों की संख्या १० लाख दी गयी है । गान्धार जनपद स्कन्द पुराण तथा महावंश के रचना- काल में अपना महत्त्व खो चुका था । उसका महत्त्व शिवि एवं दशार्ण जनपदों को जो उसी क्षेत्र के थे मिल गया था । बौद्ध काल में शिवि देश अपने सुन्दर दुशालों के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध था । चण्डप्रद्योत अवन्ती के राजा ने जीवक को पाण्डु रोग से मुक्त होने पर शिवि का बना दुशाला दिया था । जीवक तक्षशिला का स्नातक था । यहाँ उसने आयुर्वेद तथा चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा प्राप्त की थी । तक्षशिला में उन दिनों भारतवर्ष के कोने-कोने से यथा लाट देश, कुरु देश तथा शिवि देश से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्ति निमित्त जाया करते थे । विनय पिटक में स्पष्ट उल्लेख है । जीवक ने इन दुशालों (सिवेयक दुस्स) को भगवान् बुद्ध को अर्पित किया था । शिवि जातक में कोशल के राजा प्रसेनजित ने भगवान् बुद्ध को १ लाख मूल्य के शिवि राज्य में बने वस्त्र अर्थात् सिवेयक वस्त्रं दिया था । मालूम होता है कि गान्धार क्षेत्र उन दिनों शिवि तथा दशार्ण देशों में मिल गया था । श्यान (थाईलैण्ड) के उत्तर स्थित यूनान प्रान्त का प्राचीन भारतीय नाम गान्धार था । ईसा से दो शती पूर्व वहाँ भारतीय आबाद हो गये थे । तेरहवीं शताब्दी तक यूनान का नाम गान्धार ही प्रचलित था। भारतीय गान्धार पश्चिमी पाकिस्तान का पेशावर तथा रावलपिण्डी का जिला था ।
परिशिष्ट 'ट' गुह्यक ( तरंग १ : १५६ पृष्ठ : २१३ ) गुह्यक दस देवयोनियों में यक्षों तुल्य एक योनि हैं। अमर कोश के अनुसार दस निम्नलिखित देवयोनियाँ हैं : विद्याधराप्सरो-यक्ष-रक्षो-गन्धर्व-किन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ॥ १:१:११ कुवेर को गुह्यकेश्वर तथा वैश्रवण भी कहा गया है । गुह्यक उस वर्ग के लिए प्रयुक्त किया गया है जो कुवेर के कोष की रक्षा करते थे । उनके स्वामी गुह्यकेश्वर थे । कुवेरस्त्र्यम्बकसखो यक्षराट् गुह्यकेश्वरः । १:२:७१ मनुष्यधर्मा धनदो राजराजो धनाधिपः । किन्नरेशो वैश्रवणः पौलस्त्यो नरवाहनः ॥ १:२:७२ बौद्ध भास्कर्य किंवा मूर्तिकला में कुबेर तथा यक्षों का प्रमुख स्थान है । कुवेर की अलकापुरी का बड़ा सुन्दर वर्णन मेघदूत में कालिदास ने किया है । यक्ष का स्वामी कुवेर है । बौद्ध मूर्तियों में कुवेर तथा यक्ष भगवान् की पूजा करते दिखाये गये हैं । गुह्यक शब्द का एक जाति के रूप में प्रयोग मिलता है । उन्हें देवयोनि के अन्तर्गत एक जाति महा- भारत ने माना है । ( आदि पर्व १८६ : ७ ) इस जाति के लोग द्रौपदी के स्वयंवर के समय उपस्थित थे । गुह्यकेश्वर अर्थात् कुवेर की सभा में गुह्यकों का स्थान था । ( सभा पर्व १० : ३ ) गन्धमादन पर्वत पर उनका निवास कहा गया है । भीमसेन ने उन्हें वहीं गदा से प्रहार किया था । ( शल्य पर्व ११ : ५५-५६ ) गुह्यक को यक्ष भी कहा गया है ( सभा पर्व १० : १५ ) । पुराणों में कुवेर के अनुयायी तथा दानव गुह्यक कहे गये हैं । ( भागवत पुराण १ : ९ : ३, १० : ३४ : २८, २ : १० : ३७, ४ : ४ : ३४ ) गुह्यक जाति हिमालय में निवास करती थी । ( भागवत ४ : ५ : २६, ४ : १० : ५ ) वे माया विद्या में निपुण थे । ( भागवत पुराण १० : ५५ : २३ ) गुह्यकों के देवता शिव थे । वे शिव के अनुयायी थे । ( भागवत पुराण ६३ : १० ) गुह्यको ने पुण्यात्माओं के संसर्ग से स्वर्ग प्राप्त किया था । ( भागवत पुराण ११ : १२ : ३, ११-१४ : ५, ) गुह्यकों को यक्षों तथा राक्षसों की श्रेणी में रखा गया है । ( ब्रह्माण्ड पुराण ३ : ७ : १६७-१६८, ४ : २ : २६, मत्स्य पुराण १३ : १७, १२१, २ ) गुह्यको के आचरण तथा कर्तव्यों का विशद वर्णन मत्स्य पुराण ( १८० : ९०, २४६ : ५३, ) तथा वायु पुराण ( अध्याय ६९ : तथा १०१ ) में मिलता है । गुह्यक वर्ग को वायु पुराण ( अध्याय ३० ) में हिमालयवासी कहा गया है । वे 'शंकर पार्वती के साथ विराजमान थे ।' उस समय आदित्यगण, वसुगण, अश्विनीकुमार, गुह्यकों को साथ लेकर वैश्रवण अर्थात् कुवेर, सनत्कुमार, अंगिरादि देवर्षि, विश्वावसु, गन्धर्व, नारद, कैलास निवासी यक्षराज महामुनि उशना तथा अप्सराऐं आदि उमा, शंकर की उपासना करने लगीं ।
८६ राजतरंगिणी हरिवंश पुराण में कैलाश शिखर पर गुह्यकों के साथ कुबेर के आगमन का वर्णन मिलता है। (८५:१०) यक्ष जाति को गुह्यक एक शाखा किंवा उपवर्ग थे। उनमें तथा यक्षों में यह भिन्नता थी। गुह्यक गणों की सम्पत्ति की रक्षा करते थे। उनका सैनिक वर्ग था। ये शक्तिशाली थे। काम साधारणतया शस्त्रोपजीवी किंवा पहरा, चोकी, रक्षादि करना और शस्त्रादि चलाना था। उन्होंने महाभारत युद्ध में भाग लिया था। यक्ष जाति के होते हुए भी उन्हें अलग गुह्यक संज्ञा उसी प्रकार दी गयी है जैसे हिन्दू होने पर भी क्षत्रियों की अपनी अलग जाति शस्त्राश्रयी होने के कारण हो गयी। वायु पुराण (अध्याय १०९) से प्रकट होता है कि गुह्यक लोग गन्ध अर्थात् ब्रह्म लोक में देवताओं के साथ रहते थे। सत्य लोक सातवां किंवा अन्तिम लोक है। उनमें समस्त देवगण गन्धर्वों, अप्सराओं, यक्षों तथा गुह्यको के साथ निवास करते हैं। वायु पुराण के (अध्याय ६९) में गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष तथा पिशाचों को असुरदेव की श्रेणी में रखा गया है। यहां पर सर्प, भूत, पिशाच, नाग एवं मनुष्यों को पृथ्वो लोक का निवासी बताया गया है। गुह्यकों की उत्पत्ति के विषय में वायु पुराण (अध्याय ९ १५, ३४) में क्या है-‘ब्रह्मा ने रजस्तम प्रधान दूसरा शरीर धारण किया। उस अन्धकार में क्षुधाकुल होकर उन्होंने दूसरी प्रजा उत्पन्न को। वह प्रजा जल को भक्षण करने के लिए कटिबद्ध हो गयी। हम जल की रक्षा करते हैं। कहते हुए जो उत्पन्न हुए वे क्रोधी निशाचर राक्षस हुए। जिन लोगों ने कहा कि हम जल को खा जायेंगे, नष्ट कर देंगे ये क्रूरकर्मा गुह्यक यक्ष कहलाये। भागवत (१ ९३) में श्रीकृष्ण, अर्जुन, युधिष्ठिर आदि के रथारूढ़ गमन करने की शोभा की तुलना गुह्यकों सहित कुबेर से की गयी है। गुह्यकों को कुबेर का साथी कहा गया है। भगवान् के स्थूल तथा सूक्ष्म रूपो का वर्णन करते हुए सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, गुह्यक, किन्नर, अप्सराएं, नाग, सर्प विपुरुष, उरग, मातृकाएं, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत, विनायक, कूष्माण्ड, उन्माद, वैताल, यातुधान के वर्ग में गुह्यको को रखा गया है (स्कन्द० २.१०.६७ ११:१२:३, तथा १४.५)। दक्ष यज्ञ में सती के प्राण विसर्जन काल में गुह्यक तथा प्रमथ गण उपस्थित थे। शिव के पार- पद गुह्यक तथा प्रमथगण सती के साथ दक्ष यज्ञ में गये थे। सती के प्राण विसर्जन के साथ ही गुह्यकों तथा प्रमथो ने क्रुद्ध होकर दक्ष यज्ञ में विघ्न उपस्थित किया। अस्त्र-शस्त्रो से आक्रमण किया। उनके भयंकर आक्रमण वेग को देखकर भृगु ने यज्ञ द्वारा सहस्रों ऋभु नामक देवों को उत्पन्न किया। उन्होंने जलती लक- डियो द्वारा प्रमथगण तथा गुह्यको पर आक्रमण किया। उन्हें भगाने में समर्थ हुए। दक्ष यज्ञ के प्रसंग में गुह्यकालय अर्थात् गुह्यकों के निवास स्थान का उल्लेख किया गया है। सती के प्राणाहुति से क्रुद्ध होकर वीरभद्र ने दक्ष के मस्तक को यज्ञ की दक्षिणाग्नि में डाल दिया। यज्ञ को विध्वंस कर गुह्यक गण गुह्यकालय लौट गये। यहां पर गुह्यकालय हिमालय स्थित कैलास के समीपस्थ स्थान होना चाहिए। वायु पुराण ने हिमालय का यही अंचल गुह्यकों का निवास-स्थान बताया है। उत्तम हिमालय मृगया निमित्त गया था। वहा उसकी हत्या कर दी गयी थी। ध्रुव अत्यन्त क्रुद्ध होकर त्रों के अनुचरों से सेवित उत्तर दिशा मे हिमालय की द्रोणी अर्थात् घाटी में गये। वहाँ नगर गुह्यकों से जनाकीर्ण थे। (भागवत ४:१०:५) यहा पर भी निर्देश किया गया है। गुह्यक गण उत्तर दिशा में हिमा- की घाटी किंवा द्रोणी में रहते थे।
परिशिष्ट ट ८७ श्रीकृष्ण द्वारा गुह्यक शंखचूड़ के वध की कथा भागवत (१०:३४;२८) में दी गयी है । एक समय शंखचूड़ गुह्यक गोपियों को लेकर उत्तर दिशा की ओर भाग गया । श्रीकृष्ण उस अधम गुह्यक के पास पहुँचे । गुह्यक गोपियों को छोड़कर भाग गया । श्रीकृष्ण ने उसका पीछा किया । वध कर मणि लेकर वापस आये । इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं । गुह्यक दस्यु आदि अनुचित कार्य करते थे । उनका निवास स्थान उत्तर दिशा में था । मथुरा से उत्तर दिशा पंजाब, कश्मीर, हिमाचल की ओर पड़ता है । उत्तर दिशा का अर्थ प्रायः हिमालय का उत्तरीय पर्वतीय अंचल माना जाता रहा है । प्रद्युम्न तथा शम्बरासुर वधके प्रसंग में गुह्यकों का पुनः उल्लेख भागवत (१०:५५:२३) में किया गया है । तदनन्तर शम्बरासुर ने यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षसों की सैकड़ों माया का प्रयोग किया । गुह्यक मायावी थे । युद्ध में माया का प्रयोग करते थे । यह बात अन्य पुराणों में भी कही गयी है । शम्बर ने गुह्यकों की माया का प्रयोग किया । गुह्यकों ने युद्ध में भाग नहीं लिया था परन्तु उनकी युद्ध नीति का प्रयोग शम्बर ने प्रद्युम्न के विरुद्ध किया था । भागवत (११:१२:३) में पुनः दैत्य, राक्षस, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, सिद्ध, चारण, गुह्यक को एक ही वर्ग में रखा गया है । गुह्यकों के पूर्वज ब्रह्मर्षि थे । देव योनि वर्ग में थे । इसका उल्लेख भागवत (११- १४:५) में किया गया है । इन ब्रह्मर्षियों की संतान देवता, दानव, गुह्यक, मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण, किन्नर, नाग, राक्षस, और किम्पुरुष आदि थे । रामायण में कैलास के समीप गुह्यकों के रहने की बात कही गयी है । सुग्रीव ने उत्तर दिशा में माता सीता को खोजने के लिए जिन देशों तथा जातियों का नाम लिया है उनमें गुह्यक थे । वाल्मीकि रामा- यण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३ श्लोक ३ मे उल्लेख आता है—'वहाँ यक्षों के स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर, जो समस्त विश्व के लिए वन्दनीय है, धनदाता है, यक्षराज गुह्यको के साथ निवास करते हैं । गुह्यकों का उल्लेख यक्षो के साथ नीलमत पुराण में किया गया है : आश्रमानि तथा मध्वश्चकुस्तीर्थान्यनेकंशः । गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः शैलेन्द्राश्च सगुह्यकाः ॥ 186 = २५९-२६० × × × गुह्यकेश्वर का भी उल्लेख नीलमत में मिलता है : गुहेश्वरः शतमुखा यष्टिकापथ एव च । कदम्बेशस्तथा पुण्यः क्षेत्रं चैव समन्ततः ॥ 118 = १६०-१६१ यावच्छत सुखं तीर्थं पावतीर्थं गुह्येश्वरम् । तावत् क्षेत्रं समं पुण्यं चाराणस्याथवाधिकम् ॥ 119 = १६१-१६२ कल्हण के गुह्यक शब्द के व्यवहार से गुह्यक जाति की सत्यता तथा वास्तविकता पर विशेष प्रकाश पड़ता है । पुराणों में गुह्यकों को यक्षों की एक उपजाति माना है । कल्हण के इस वाक्य से कि राजा ने गुह्यको से सहायता ली (रा० १:१५६) इसका अर्थ है पुल निर्माण का कार्य उनसे लिया । इससे मालूम होता है । उस समय गुह्यक नाम की जाति कश्मीर में रहती थी । यह जाति परिश्रमी तथा निपुण थी । पुल
४८ राजतरंगिणी
बनाने का काम आज भी अलौकिक कार्य समझा जाता है । किन्तु कश्मीरी कलाकार की सहायता न लेकर गुह्यकों की सहायता पुल बनाने के लिए ली गयी । इसका अर्थ है कि यह जाति इस कला में निपुण थी । यक्ष नाम की भी एक जाति थी, जो कश्मीर में रहती थी । यक्षों को कालान्तर में मानव विशेष समझ लिया गया था । इसी प्रकार गुह्यकों को भी मानव विशेष समझा गया । परन्तु कल्हण के वर्णन से स्पष्ट हो जाता है गुह्यक एक जाति थी । उस जाति के लोग कश्मीर में आबाद थे । निर्माण कला में निपुण थे । कल्हण ने ( १:५९, १८४, ३ ३४९ ) से यक्ष का उल्लेख किया है । यक्षों के सन्दर्भ में कहा जाता है । उनका उपयोग सेतु अर्थात् पुल बनाने में किया गया था । पुराण, महाभारत में यक्ष के अन्तर्गत गुह्यक जाति मानी गयी है । अतएव राजा दामोदर ( ता० १:१५९ ) के काल तक यक्ष और गुह्यक दोनों जातियां कश्मीर में थीं ये परिश्रमी थीं । शिल्प उनका मुख्य कार्य था ।
परिशिष्ट 'ठ' यक्ष ( तरंग १ : १५९-पृष्ठ २१८ ) कल्हण कश्मीर में प्रचलित किवदन्ती की ओर संकेत करता है। प्राचीन विशाल इमारतों का निर्माण विशाल शिलाखण्डों से किया गया है। उन्हें यक्षों ने किया था। वे मानवीय शक्ति के परे की बात है। कल्हण ने जिन भव्य भवनों तुंग निर्माणों का वर्णन किया है उनमें बहुतों के ध्वंसावशेष वर्तमान हैं। कश्मीरी मुसलमान उक्त निर्माणों को जिन तथा परियों का बनाया मानते हैं। किसी ग्रामीण से पूछने पर उत्तर मिलता है। पाण्डवों ने बनाया था। यक्ष शब्द ऋग् तथा अथर्ववेद में अनेक स्थलों पर आया है। ( ऋग्वेद १:१९०:४, ४:३:१३, ५:१०:४, ७:५६:१६, १०:८८:१३, ७:६१:५, अथर्ववेद ८:९:२५ १०:२:३२, १०:७:३८, १०:८:४३ ११:२:४ ) वायु, मत्स्य, ब्रह्माण्ड पुराणों में यक्ष शब्द प्रायः गन्धर्व तथा किन्नर के साथ आया है। यह सब हिमालय प्रदेश की पर्वतीय जातियाँ थी। अलवेरूनी ने गन्धर्वों को गायक जाति में गिना है। उनका संगीत तथा नृत्य पेशा माना है। ( मत्स्य : ११४:८२; ब्रह्माण्ड : २:१८:३३ ) गन्धर्वान किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलायग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् खसान् ॥ हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व ( ३३:११ ) में महर्षि, वसु, अप्सरा, गन्धर्व के साथ यक्ष का उल्लेख किया गया है। उन्हें कुबेर के भवन में निवास करना दिखाया गया है। ( वायु : ३९:५७ ) ( नीलमत : 1007-8 ) अग्नि पुराण ( १९ : १८ ) में उन्हें 'कश्यपपत्नीखसाजाता :' अर्थात् कश्यप की पत्नी खसा से यक्षों की उत्पत्ति हुई थी। यक्षों का वर्णन महाभारत में प्रचुर रूप से मिलता है। गुह्यकों के सन्दर्भ में यक्षों का उल्लेख किया गया है। महाभारत मे उन्हें देव योनि में रखा है। विराट अण्ड द्वारा ब्रह्मादि के उत्पन्न होने के पश्चात् यक्षो की उत्पत्ति बताई गयी है। महाभारत आदि पर्व ( १ : ३५ ) में यक्षों को पुलस्त्य मुनि की सन्तान कहा गया है ( आदि पर्व ६६ : ७ )। राक्षस रावण पुलस्त्य का नाती था। अतएव यक्षों का सम्बन्ध राक्षसों से माना गया है। यक्ष मानव थे। श्री शुकदेवजी ने यक्षों को महाभारत की कथा सुनायी थी। ( आदि पर्व १ : १०८ )। यक्षों ने कुबेर का राजपद पर अभिषेक किया था। ( वन पर्व १ : १०-११ ) पाण्डव भीम ने यक्षों तथा राक्षसों को पराजित किया था। ( वन पर्व १६० : ५७-५८ । ) सुन्द उपसुन्द ने यक्षों को पराजित और पीड़ित किया था। ( वन पर्व २०८ : ७ )। यम ने यक्ष का रूप धारण कर युधिष्ठिर से प्रश्नोत्तर किया। यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देकर धर्म- राज युधिष्ठिर ने चारों भाइयों को यम से जीवित कराया था। ( वन पर्व ३१४ : १७ )। १२
९० परिशिष्ट ठ प्रायः देवताओं की मूर्तियों पर यक्षगण नभोपय से उन्हें माला पहनाते, उनपर पुष्प वर्षा करते दिखाये जाते हैं। भगवान् बुद्ध की मूत्ति में भी शिरोभाग दोनों पाश्र्वों में उड़ते यक्ष माला सहित उत्कीर्ण किये मिलते हैं। ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों के अनुसार ये राक्षस तथा खसा की सन्तान थे। ये अपनी माता को खा जाना चाहते थे। अतएव उनका नाम यक्ष पड़ा। उनके आकार का वर्णन किया है। उन्हें चार हाथ तथा चार पैर होते हैं। रात्रि में आहार निमित्त विचरण करते हैं। यमु दनि का रूप धारण कर अप्सरा क्रथस्थला के साथ नन्दन में निवास किया था। उससे रजत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था। यक्ष अपने पुत्र के साथ हिमालय में निवास निमित्त आया। ब्रह्माण्ड पुराण (२·१८ : ३३२ · ३ : ७ : ६०, १००-१७, २२:१४, ४१ : ३०, ७१ : १:१) तथा भागवत आदि पुराणों में यक्षों की उत्पत्ति की एक और कथा है। कश्यप पिता तथा खशा माता का पुत्र यक्ष था। (भागवत २:६:१३, ६:८:२४, १०:६:२७, ६२:१९, ८५:४१; ब्रह्माण्ड पुराण २:३२ : १-२, ३५· १९१, ३६ : ११८।) पुराणों में उन्हें रुद्र के अनुयायी रूप से चित्रित किया गया है। उनके स्वामी का नाम कुबेर है। (भागवत पुराण ११ १६. १६)। मत्स्य पुराण (८.५) के अनुसार ब्रह्मा ने यक्षों का अधिनायकत्व शूलपाणि को दिया था। यक्षों ने कच्चे पात्र में वसुधा का दोहन किया था। मत्स्य पुराण (१० : २२,) के अनुसार वृत्र की सहायता इन्द्र के विरोध में यक्षों ने की थी। दक्ष के यज्ञ में सती के साथ गये थे। यक्ष वृत्र के पक्ष से देवताओं से युद्ध कर रहे थे। (भागवत ६:१०:२० ४:४:४) उनके खेलों का वर्णन भागवत पुराण (१०:९०:९) में किया गया है। हरि की भक्ति के कारण यक्षों का मंगल होता है। (भागवत ७:७:५०)। यक्ष देवों के साथ भगवान् कृष्ण को देखने आये थे। (भागवत ७.८:३८,) रावण ने यक्षों को परास्त किया था। (ब्रह्माण्ड पुराण ३:७:२१५,) यक्ष पित्रों की पूजा करते थे। (भागवत पुराण ३:१०:२८,) मत्स्य पुराण (अध्याय २३) में वर्णन मिलता है। देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के कारण शंकर तथा चन्द्रमा में युद्ध हुआ। उसमें यक्षों के स्वामी कुबेर ने वैशाल, यक्ष, नाग तथा किन्नरों की सेना के साथ शंकर की ओर से युद्ध में भाग लिया था। मत्स्य पुराण (अ० १८०) में यक्षों के विषय में एक रोचक कथा दी गयी है। उससे यक्षों के व्यवहार, आचरण तथा धर्म पर प्रकाश पड़ता है। इसका सम्बन्ध हरिकेश यक्षसे है। पूर्णभद्र यक्षो का राजा था। उसका पुत्र हरिकेश था। हरिकेश शिव का उपासक था। पूर्णभद्र ने अपनी पुरातन परम्परा पर पुत्र का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा—रुद्र की उपासना उचित नहीं है। हमारे धाम मानवों से भिन्न हैं। यक्ष स्वभाव से क्रूर होते हैं। कच्चा मांस खाते हैं। कुत्सित जीवों का भक्षण करते हैं। हिंसक होते हैं। न हि यक्षकुलीनानां मूढ वृत्तं भवत्युत । गुह्यका यत यूयं वै स्वभावात्क्रूरचेतसः ॥ क्रव्यादाश्चैव किंमक्षा हिंसाशीलाइच पुत्रक । मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मना ॥
, परिशिष्ट ४ ९१ पिता की बात न मानकर, हरिकेश काशी आकर, तपस्या करने लगा । तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने हरिकेश से वर मांगने के लिए कहा । हरिकेश ने शिव भक्ति का वर मांगा । शिव ने प्रसन्न होकर यक्ष को वरदान दिया—'यक्ष, तुम पूज्यगणों के स्वामी तथा धनपति होगे । प्राणियों से अजेय होगे । अन्नदाता होगे । क्षेत्रपाल होगे । उद्भ्रम तथा संभ्रम नामक दो गण तुम्हारे सेवक होंगे । तुम दण्डपाणि होगे ।' काशी तथा मथुरा दोनों स्थानों पर यक्ष लोग अपने पुरातन धार्मिक परम्परा के स्थान पर शिव उपासना करने लगे । यक्षों ने लौकिक किंवा जातीय धर्म तथा रीतियों के स्थान पर शैव मत स्वीकार कर लिया । उन्हें कालान्तर में शिव के गणों में सम्मिलित कर लिया गया । वे शिव के भक्त तथा अनुयायी हो गये । भागवत ( २ : ६ : १३ ) में विराट् पुरुष के वर्णन के प्रसंग में देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, यक्ष, मृग, गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, भूत, प्रेत, विद्याधर सर्पादि को एक वर्ग में रखकर उन्हें विराट् पुरुष माना है। भागवत ( ६ : ८ २४ ) में नारायण कवच के वर्णन में—कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेतादि को कौमोदकी गदा से नष्ट करने की प्रार्थना की गयी है । देवराज इन्द्र के विरुद्ध आते हुए यक्षों का वर्णन मिलता है । दैत्य, दानव, यक्ष, राक्षस सुवर्ण के साज सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की सेना की बाढ़ रोकने के लिए आ गये थे । ( भा० : १० : २० । ) नृसिंह अवतार के समय भगवान् के समीप जय-जयकार करने आने वालों में—सिद्ध विद्याधर महा- नाग, मनु, प्रजापति, गन्धर्व, अप्सराऐं, चारण, यक्ष, किंपुरुष, वैताल, सिद्ध, किन्नर और सुनन्द तथा कुमुद आदि विष्णु के सभी पार्षद यहाँ आये । ( भागवत ७ : ८ : ३८ ) यहाँ पर विष्णु के पार्षद रूप में यक्षों का वर्णन किया गया है । रेवत ने कुशस्थली नामक नगर बसाया था । वहाँ से वे आनर्तादि देशों पर राज्य करते थे । उनके पुत्र ककुद्मी थे । शारपाणि के पुत्र अनर्त थे । अनर्त के पुत्र रेवत थे । रेवत के एक शत पुत्र थे । उनमें ककुद्मी ज्येष्ठ था । ककुद्मी की कन्या रेवती थी । रेवती का विवाह दोपावतार स्वरूप बलदेव के साथ किया गया था । वे ब्रह्मा से भेंट करने गये थे । लौटकर अपने नगर में आये । देखा कि उनके वंशजों ने यक्षों के भय से नगर त्याग कर दिया था । ( भागवत पुराण ९ : ३ : ३५ । ) भागवत ( १० : ६ : २७ ) में यक्षों को भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस और विनायक के वर्ग में रखा गया है । भागवत पुराण ( १० : ३२ : १६ ) में यक्षों को पुनः देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, पन्नग, दैत्य, विद्याधर तथा मनुष्य के साथ वर्णन किया गया है । भागवत पुराण ( १० : ९० : ९ ) में भगवान् अपनी पत्नियों के साथ विहार करने की उपमा यक्षराज कुबेर का यक्षिणियों के साथ विहार करने से दी गयी है । उद्धव के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कृष्ण ने अपने विराट् स्वरूप का वर्णन किया है । 'मैं दैत्यों में दैत्यराज प्रह्लाद, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ओषधियों में सोमरस एवं यक्ष राक्षस में कुबेर हूँ ।' ( भागवत ११ : १६ : १६ ) यक्षों को धनकृपण कहा गया है ? 'जो मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति, भाई, कुटुम्बी और धन के भागीदारों को उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उपभोग करता है वह यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला कृपण है ।' ( भा० ११ : २३ : २४ ) ।
९२ राजतरंगिणी रामायण में सुग्रीव ने बन्दरों को सीता के खोजने के लिए जिन देशों तथा जातियों का नाम लिया था उनमें यक्ष का भी नाम है। यह जाति कैलास के समीप उत्तर में निवास करती थी । ( वाल्मीकि रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३ श्लोक २१-२३ । ) मत्स्य पुराण ( अध्याय १२१ ) में यक्षों के निवासस्थान के सम्बन्ध में उल्लेख मिलता है—'कैलास पर्वत के पूर्व और उत्तर दिशा में दिव्य सुवेल नामक पर्वत तक फैला रत्नों की तरह जाज्वल्यमान गन्धप्रभ गिरि है। उसके समीप अच्छोद सरोवर है। उस सर से अच्छोद नदी निकली है। नदी के तट पर के चैत- रथ वन है। उसके समीपस्थ पर्वत पर मणिभद्र क्रूरकर्मा यक्ष सेनापति गुह्यकों से रक्षित निवास करता है।' 'कैलास के दक्षिण और पूर्व दिशा में हेमशृङ्ग दिवा लोहित नामक एक महान् पर्वत है। उसके तट पर विशोक वन है। वहाँ मणिधर यक्ष परम धार्मिक एवं सौम्य गुह्यकों द्वारा रक्षित निवास करता है। ककुद्मी कैलास के पश्चिम ककुद्मान पर्वत पर रुद्र के यूप (अग्निवेश्वर) की उत्पत्ति हुई थी। त्रिककुद के सम्मुख त्रैककुद कज्जल तुल्य शैल है। वहाँ वैद्युत पर्वत है। उसके पाद में दिव्य मानस सरोवर है। उससे सरयू नदी निकली है। उसके तट पर नैभ्राज दिव्य वन है। यहां प्रहेति का पुत्र कुबेर का सेवक ब्रह्मघाती पौरुषशाली राक्षस निवास करता है। वायु पुराण अध्याय ३९ में यक्षों का निवास स्थान दिया गया है। शतशृंग पर्वत पर अत्यन्त यशो यक्षो के सौ पुर हैं। वायु पुराण अध्याय ६९ में यक्षों के विषय में उल्लेख है— 'पुण्यजन नामक यक्ष, गुह्यक नाम से प्रसिद्ध यक्ष, एवं देवजन नामक यक्षादि गुह्यकों के अन्तर्गत हैं। अगस्त्य, पौलस्त्य तथा विश्वामित्र के गोत्रों में उत्पन्न होने वाले राक्षस तथा यक्षों के राजा कुबेर हैं। अलका नगरी के कुबेर अधीश्वर हैं। यक्ष केवल आँखों से देखकर रक्त मास एवं चर्बी पी जाते हैं। राक्षस शरीर के भीतर प्रवेश कर पी जाते हैं। पिशाच पीडित कर पीते हैं। सभी लक्षणों से सम्पन्न देवताओं के समान अधिकारी, तेजस्वी, बलवान, ऐश्वर्यशाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, शक्तिशाली, विक्रमी, लोकों द्वारा पूजनीय, सूक्ष्म स्वरूप धारण करने वाले, तेजस्वी, यक्षादि के योग्य वरदान देने वाले, यज्ञ परा- यण एवं देवताओ के समान धर्मात्मा होते हैं, उन्हें असुर कहा जाता है। गन्धर्वों का प्रभाव देवताओ की अपेक्षा हीन-चौथाई हीन होता है। अर्थात् गन्धर्कों में देवताओं का चतुर्थांश प्रभाव है। गुह्यक का प्रभाव गन्धर्वों के प्रभाव का चतुर्थांश होता है। अर्थात् गुह्यकों में केवल सोलहवां भाग देवताओ का प्रभाव शेष रहता है। राक्षसों का प्रभाव गुह्यकों अर्थात् यक्षों तुल्य होता है। पिशाचों का प्रभाव यक्षों से तीन गुना हीन होता है। रूप, आयु, बल, धर्म, ऐश्वर्य, बुद्धि, तपस्या, शास्त्र, बल एवं पराक्रम में गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच चार देवयोनियों में उत्पन्न होने वाले वर्ग सुर तथा असुरों की अपेक्षा हीन होते हैं। उक्त उद्धरणों से यक्षों के सम्बन्ध में कुछ बातें स्पष्ट होती हैं। (१) यक्ष देवयोनि मे थे। ये मानव थे। (२) उन्हें गन्धर्व, राक्षस तथा पिशाचों के वर्ग में रखा गया है। (३) सुरों की अपेक्षा असुरों के वर्ग में उन्हें रखा गया है। (४) वे हिमालय निवासी थे। (५) उनका आवास कैलास के समीप था। (६) उनका आसुरी आचरण मांसादि खाने तथा रक्तपात करने का था। (७) किन्तु कालान्तर में वे शिव के अनुयायी होकर शैवमतावलम्बी हो गये थे । (८) कुबेर उनका राजा था। (९) वे युद्ध में भाग लेते थे। (१०) क्रूरकर्मा थे। (११) मत परिवर्तन के कारण शिव के गण बन गये
परिशिष्ट ठ ९३ थे । ( १२ ) गुह्यक लोग यक्षों की एक शाखा थे । ( १३ ) उनका सम्बन्ध भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा तथा पर्वतीय भागों में रहने के कारण असुरों से होना स्वाभाविक था । उनका आचार-विचार प्रारम्भ से ही असुरों से मिलता था । ( १४ ) यक्ष कश्मीर के सीमान्त मेरु के दक्षिण तथा कैलास के पश्चिम अर्थात् कश्मीर की उत्तरी-पूर्वी तथा उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर रहते थे । कल्हण ने यक्षों का विवेचन यहाँ शिल्पी के रूप में किया है । वे सेतु निर्माण करने में निपुण थे । पुराणों में यक्षों को वस्तुपरक माना गया है । कहीं-कहीं उन्हें इतर योनि भी माना गया है । उन्हें आंखों में पड़नेवालों के रूप में भी चित्रित किया गया है । कल्हण ने इन सब कपोल कल्पनाओं को न मानते हुए वास्तविकता का परिचय दिया है । उसने यक्षों को एक जाति के रूप में चित्रित किया है । जिनका मुख्य काम शिल्प था । राज्य में जलाभाव को दूर करने के लिए राजा ने यक्षों द्वारा शासन स्थिर बनाने की योजना बनायी थी । उसका अर्थ बांध बनाना भी माना जाता है । यक्ष राजा दामोदर के समय गुह्यकों के साथ कश्मीर में आबाद थे । गुह्यक और यक्ष दोनों शिल्पी थे । कल्हण ने गुह्यकों का विवरण केवल सेतु निर्माण के सम्बन्ध में किया है और यक्षों का बांध बनाने के सम्बन्ध में किया है । अतएव गुह्यक यदि सेतु बनाने में प्रवीण थे तो यक्ष जलाभाव दूर करने के लिए बांध बनाने में चतुर थे । नीलमत पुराण में यक्षों का उल्लेख निम्न श्लोकों में मिलता है— दनायुषाया वृत्रस्तु भद्रास्तु सुरभेः सुताः । यक्षाश्च राक्षसाश्चैव खसायास्तनयाः स्मृताः ॥ 48 = ७१-७२ × × × देवपत्न्यस्तथा सर्वा देवानां याश्च मातरः । विद्याधरगणा यक्षाः सागरा सरितस्तथा ॥ 152 = २०४ × × × आश्रयानि तथा नद्यश्चक्रस्तीर्थान्यनेकंशः । गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः शैलेन्द्राश्च सगूह्यकाः ॥ 106 = २३९ २४० × × × दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह । वर्जयन्ति च ते मांसं मांसादा दिनपञ्चकम् ॥ 447 = ५५८ × × × वेदोपवेदवेदाङ्गविद्यास्थानानि कृत्स्नशः । नागा यक्षाः पिशाचाश्च तथैव गरुदारुणौ ॥ 586 = ७०७ × × × विद्याधराश्च यक्षाश्च विरमः मत्स्यवर्धनः । मन्द्राशो गजनेत्राश्च कण्टारः कुमुदस्तथा ॥ 922 = १०८८-१०८९
९४ राजतरंगिणी तीर्थैर्देवैश्च ऋषिभिर्गन्धर्वैर्यक्षराक्षसैः । अभिगच्छेत मेधावी जन्मसांपद्वयंशालान् ॥ १३८० - १५९८ वात्स्यायन कामसूत्र में यक्षरात्रि का उल्लेख करता है । यशोधर उस पर भाष्य करते यक्षरात्रि को सुख रात्रि कहता है । वर्ष क्रिया कौमुदी, कृत्य तत्त्व, तथा धर्म सिन्धु दीपमाला नाम सुखरात्रि देते हैं । हेम- चन्द्र देशी नाममाला में जक्खरत्ति को दीपावली का समानार्थक मानता है । दीवाली ही दीपावली है । दीपमाला है । यह नीलमत में वर्णित यक्षरात्रि है । नीलमत दीपमाला अर्थात् दीपावली को यक्षरात्रि अभि- हित कर उस दिन यक्षो की पूजा का विधान किया है । वाराणसी क्षेत्र में नगर से दस मील दूर जखिनी ग्राम है । मैने उसपर पहले ध्यान नही दिया । कुछ चलने पर एक मन्दिर मिला । उसमे दखिनी देवी स्थापित थी । जखिनी शब्द यक्षिणी का अपभ्रंश है । कालान्तर में यक्ष लोगों के मूल स्वरूप को लोग भूलकर उन्हें मायाकालीन देवता मानने लगे ।
✕ परिशिष्ट 'ङ' पिशाच ( तरंग १ : १८४ पृष्ठ १२५ ) नीलमतपुराण पिशाचों का कश्मीर में निवास बताता है। आज कल पिशाच का अर्थ भूत, प्रेत तथा राक्षस लगाया जाता है । पिशाच शब्द का यह अर्थ भ्रामक है । : नीलमत बालुकार्णव में पिशाचों के निवास का वर्णन करता है। उनके राजा का नाम निकुम्भ था । ✕ : ✕ ✕ ✕ " निकुम्भो नाम धर्मात्मा कुबेरेण तु योजितः । चैत्र्यां याति सदा योद्धं पिशाचैर्बहुभिः सह ॥ 205 = २७८ ✕ ✕ ✕ ✕ पञ्चकोटयः पिशाचानां निकुम्भस्यानुयायिनाम् । गत्वा निकुम्भस्तैः सार्धं षण्मासान् योध्यते सदा ॥ 207 = २७८ ✕ ✕ ✕ ✕ तत्रापि कोटयः पञ्चैव पिशाचानां दुरात्मनाम् ॥ 207 = २८० ✕ ✕ ✕ ✕ निकुम्भः पुनरायाति पञ्चकोटिवृतो बली । शुक्लाश्वयुक्पञ्चदश्यां नित्यं देवप्रसादतः ॥ 201 = २८२ ✕ ✕ ✕ ✕ दत्तेति सहितस्तेन ससैन्येनेह वत्स्यथ । षण्मासान् मानवैः सार्धं निकुम्भो निसंते सदा ॥211 = २८४ ✕ ✕ ✕ ✕ रज्जुबद्धेन तु यथा पक्षिणा नृपदारकाः । कल्पमानाः पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ॥ 327 = ४२७-४२८ ✕ ✕ ✕ ✕ एतस्मिन्नेव काले तु नीलो नागपतिर्विभुः । सेव्यमानो निकुम्बेन पिशाचेन महात्मना ॥ 330 = ४३१ ✕ ✕ ✕ ✕ अश्वयुज्यां निकुम्भस्तु निर्भयमायाति काश्यप । हत्वा पिशाचान् संग्रामे बालुकार्णवगान् बहून् ॥ 376 = ४८३ ४८४ : ✕ ✕ ✕
९६ राजतरंगिणी ततः पूजा निकुम्भस्य कर्तव्या पूजारेण तु । आदित्यपुत्रो रेवन्तः साश्वैः पूज्यश्च मानवैः ॥ ३४२ = ४८९ x x x x तस्मिन्नहनि पूर्णार्द्धे निकुम्भस्यानुयायिनः । आविशन्ति नरान् सर्वान् पिशाचा घोरदर्शनाः ॥ ३१२ = ४९९-५०० x x x x तस्यां विप्र चतुर्दश्यां निकुम्भः शंकरं सदा । संपूजयति धर्मात्मा सानुयात्रो महाबलः ॥ 553 = ९०५-१०६ x x x x पूजनीयो निकुम्भस्तु पिशाचाधिपतिर्बली । पिशाचानां च दातव्या बलयश्च सुसंस्कृताः ॥ 355 = ६०७-१०८ x x x x चैत्रमासि सिते पक्षे पञ्चदश्यां द्विजोत्तम । योद्धुं याति निकुम्भस्तु पिशाचान्वालुकार्णवे ॥ 659 = ७८१ x x x x पिशाचं मृण्मयं कृत्वा काक्षं च द्विजसत्तमः गन्धैर्माल्यैस्तथा वस्त्रैरलङ्कारैश्च पूजयेत् ॥ भक्ष्यैश्च लोपिकापूपैर्मांसैः पानैस्तथैव च ॥ 66 = ७८३-७८४ x x x x निकुम्भे निर्गते ह्यद्य तथा चैवाप्यनागते । षण्मासमध्ये कर्तव्या यात्रा देवगृहे नृपैः ॥ 810 = १०१२-१०१३ x x x x अक्षोटनागपटकश्च श्येनो वह्लिकाध्वरी । क्षीरकुम्भो निकुम्भश्च विकुम्भः समरप्रियः ॥ 953 = ११०१-११०२ वर्णन आता है कि ये ६ मास हिमालय तथा ६ मास शाद्वल अर्थात् हरित भूमि में रहते थे । पिशाच का दैत्यों से सहयोग था । वे ६ योजन लम्बे बालुकार्णव के ओसिस में रहते थे । वर्णन किया गया है कि कुबेर ने पिशाचराज निकुम्भ को उक्त पिशाचों को नियन्त्रण में रखने के लिये आदेश दिया । निकुम्भ अपने पाँच कोटि पिशाचों के साथ उनसे युद्ध करता था । शेष समय वह हिमालय पर निवास करता था । कश्यप के शाप के कारण पिशाच ६ मास तक कश्मीर उपत्यका में निवास करते थे । चारों युगों के बीत जाने के पश्चात् वे कश्मीर उपत्यका से उत्पाटित हो गये और यहां नाग तथा मानव निवास करने लगे । हिमाचले तु षण्मासान् स सदा वसते सुखी । नी० ११० = २८३ नानादेशसमुत्थैस्तु ततः प्रभृति मानवैः । षण्मासान् वसते देशः षण्मासान् पिशिताशनैः । नी० २२७ = ३०२-३०३ राजतरंगिणी (४ : ७१०) में आश्वयुज का उल्लेख कल्हण ने किया है । पूर्णमासी के दिन करता
परिशिष्ट ङ ९७ हैं। नीलमत में इस दिन के सम्बन्ध में एक प्रथा मिलती है। इस दिन लोग एक दूसरे पर कीचड़ फेंककर परिहास उत्सव मनाते थे कि पिशाच भय से भाग जाय। क्योंकि पिशाच इस दिन मानव घर में प्रवेश करना चाहता है। यह प्रथा लोग भूल गये हैं। लोप हो गयी है। कल्हण ने अश्वाज गाली प्रथा का उल्लेख (७ : १५५१) में किया है। अलबेरूनी ने एक प्रथा का उल्लेख किया है। इसको 'पुहपो' कहते थे। उस दिन लोग परस्पर परिहास करते थे। पशुओं से खेलते थे। श्री स्टीन ने प्रकट किया है। 'पुहपो' शायद पिशाच का अपभ्रंश बन गया है। ऋग्वेद में पिशाची शब्द का उल्लेख एक बार किया गया है। अथर्व वेद में पिशाच शब्द का उल्लेख प्रेत के अर्थ में किया गया है। उसे मानव शत्रु रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया है। (२:१८:१-५; २:१८:४; ४२०:६-९; ४: ३६ : ४; ४ : ३७ : १०; ५: २९: ४, ५, १४; ६ : ३२: २; ८ : २ : १२; १२ : १ : ५०) अथर्व वेद (१ : २५ : ९) में पिशाचों को मांस भोजी बताया गया है। गोपाद ब्राह्मण ( : १: १ : १०) में पिशाचों के सम्बन्ध में पिशाच वेद तथा आश्वलायन श्रौत सूत्र (१० : ७:६) में पिशाच विद्या का उल्लेख है। उन्हें किमिदिन तथा यातुधान अथर्व वेद में कहा गया है। तैत्तिरीय संहिता में वर्णन मिलता है। पिशाचों का उल्लेख असुरों तथा राक्षसों के साथ किया गया है। काठक संहिता (२७ : २४) में भी इसी प्रकार उल्लेख मिलता है। उन्हें देवों, मनुष्यों तथा पितरों का विरोधी बताया गया है। देवा मनुष्याः पितरस्तेऽन्यत आसन्न सुर । रक्षांसि पिशाचास्तेऽन्यतः । — तैत्तिरीय संहिता काण्ड २ प्रपाठक ४ अनुवाक १ जैमिनी ब्राह्मण में पिशाच को स्पष्ट मानव रूप की संज्ञा दी गयी है। इक्ष्वाकु राजा त्रयारुण की माता पिशाच कन्या थी। पिशाची वा इयं त्र्यारुणस्य जाया। यही बात पंचविंश ब्राह्मण तथा शातायन ब्राह्मण में मिलती है। बृहद्देवता में उन्हें मानव माना गया है। ये आर्यों के साथ विवाह सम्बन्ध करते थे : अविन्दन्त पिशाची तां जाया तस्य च भूपतेः। ५:१० पिशाचीमदहत्त्वां स यत्र चोपविवेश ॥ ५:२२ पुराणों में पिशाच वर्णन मिलता है। उन्हें राक्षस गन्धर्व और नाग जाति के साथ रखा गया है। ब्रह्माण्ड पुराण में उनके रूप तथा चरित्र का वर्णन किया गया है : कपिशायाञ्च कूष्माण्डाज्जज्ञिरे च पुनः पुनः । मिथुनेन पिशाचांश्च वर्णेन कपिशेन तु ॥ कपिशत्वात् पिशाचास्ते सर्वे च पिशिताशना.। युग्मानि षोडशाद्यानि चक्ष्मानस्तदन्यः ॥ (ब्रह्माण्डपुराण : ३ : ७ : ३, ४५) मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराण में नदियों के उल्लेख के। समय एक 'पिशाचिका' नदी का भी उल्लेख आया है। यह नदी कहां थी अभी निश्चय नहीं हो सका है। राक्षस, गन्धर्व, दैत्य एवं १३
५८ राजतरंगिणी पिशाच एक वर्ग के माने जाते थे । उनमें तथा आर्य मानव में मुख्य भेद उनके रहन-सहन तथा व्यवहार में था । पिशाच जाति घुमन्तू जाति थी । उसका कोई निश्चित स्थान नही था । वे पशुओ के खाल पहनते थे । उनके केश लम्बे होते थे । वे खानाबदोश पर्वतीय जाति थे । उनके आचरण के विषय में ब्रह्माण्ड पुराण में उल्लेख मिलता है । हीना देवैस्त्रिभिः पादैर्गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः । गन्धर्वैस्त्र्यस्त्रिभिः पादैर्हीना गुह्यकराक्षसाः । ऐश्वर्यहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः । एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ।। ( ३ : ७ : १६७-१६८ ) पिशाचों ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था । पिशाचा दरदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह । मद्रका लडकाश्चैव सगणाः परतंगणाः । बाह्लिकाश्चिनिराश्चैव चोलाः पाण्ड्याश्च भारत । एते जनपदा राजन् दक्षिणं पक्षमाश्रिता ।। ६ : ५६ : ४९-५० । राजा दुर्योधन के पक्ष में पिशाच थे । त्रीणि सादिसहस्राणि दुर्योधनपुरोगमाः । शकाः काम्बोजबाह्लीका यवनाः पारदास्तथा । कुणिन्दास्तंगणाश्चैवाः पैशाचाश्च समन्दराः । अभ्यद्रवन्त शैनेयं शलभाः पावकं यथा । युक्ताश्च पर्वतीयानां रथाः पाषाणयोधिनाम् । शूरा पञ्चशते राज्ञा शैनेयं समुपाद्रवन् ।। ८ : ९० : १३ : १५ । द्वितीये दिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवो युधि । आसुरानकरोद् व्यूहान् पैशाचानथ राक्षसान् ।। ६ : १०४-११८ । प्रश्न उत्पन्न होता है । पिशाचों का जन्म स्थान तथा उनका प्रदेश कहाँ था । उनके निवास स्थान और जन्म भूमि के विषय में यथेष्ट प्रमाण प्राप्त हैं । उनसे उनके देश किंवा प्रदेश का निश्चित रूप प्रकट हो जाता है । वायु पुराण पिशाचों का स्थान मेरु पर्वत के दक्षिण दिशाचक्र निश्चित करता है : उनका सम्बन्ध कुबेर से स्थापित किया गया है । तामेरू, फारमोरक औरमिक के साथ पिशाचों का उल्लेख इसे प्रमाणित करता है कि ये इन्हीं क्षेत्रों के समीप के रहने वाले थे । एष शृंगो महा... गन्धर्वैर्पिशाचकाः । यक्षशैलोऽथ वै... । इत्येते देवचरिता... । दिक्पाला दक्षिणे .. ।। वायु पुराण ।
परिशिष्ट ड ९९ पिशाचके गिरिवरे हर्म्यप्रासादमण्डितम् । यक्षगन्धर्वचरितं कुबेरभवनं महत् ॥ वायु० ३९ : ५० मत्स्य पुराण भी महाभारत के समान पिशाचों का स्थान हिमवत् अर्थात् हिमालय मानता है । महा- भारत उन्हें पंजाब तथा उत्तरीय हिमालय का निवासी मानता है । रक्षःपिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमवतस्तु ते । ११४ : ८२ मत्स्य पुराण पिशाचों को कश्यप एवं कद्रू की सन्तान मानता है । ( मत्स्य १७१ : ६१ ) पाणिनि सूत्र के परिशिष्ट गण पाठ में अन्य ग्यारह जातियों के साथ पिशाचों का उल्लेख किया गया है । एक मत है कि राक्षस लोग उत्तरी बलूचिस्तान के चगायी जिला के रहने वाले राशनीस है । भरूत जाति इसी प्रकार बन्नू जिले की तहसील मरावत के निवासी थे । अशनी तथा कर्पपाण जातियाँ शिनिवारी तथा करशबुन पूर्वीय हिन्दुकुश क्षेत्र की रहने वाली कही गयी हैं । ब्रह्माण्ड पुराण तथा वायु पुराण क्रोधा की कन्या कपिशा का उल्लेख करता है । उसका अपर नाम क्रोधवशा है । वह पुलह की पत्नी थी । उसी की सन्तान पिशाच हैं । पिशाचों का स्थान ब्रह्माण्ड पुराण भी हैमवत मानता है । पिशाचों के सोलह गणों का वर्णन मिलता है । किन्तु उनका वर्णन काल्पनिक प्रतीत होता है । ( ब्रह्माण्ड ३ ७:३८१ ) उनके आकृति वर्णन से वे पर्वतीय प्रतीत होते हैं । ( वायु : ५९ : २९२-९६ ) पुराणों में राक्षस, दैत्य, गन्धर्व, नाग जातियों के साथ उनका उल्लेख किया गया है ( मत्स्य: १५२ : ८ ) वे राक्षसों से हीन श्रेणी के धन, सौन्दर्य, आदि में कहे गये हैं । ( ब्रह्माण्ड : ३ ७ १६७-१६८ ) महाभारत उनके स्थान के विषय में कहता है कि पिशाच लोग सरस्वती तट पर तपस्या निमित्त ठहर गये । यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशांपते । एते चान्ये च बहवो योगसिद्धाः सहस्रशः । तस्मिंस्तीर्थे सरस्वत्याः शिवे पुण्ये वत्तियः । महाभारत युद्ध में पिशाच कौरव तथा पाण्डव दोनों के पक्षो से युद्ध किये थे । उनके एक युद्ध का नामकरण उन्हीं के नामपर हुआ था । उनके विवाह प्रथा की महाभारत ने निन्दा की है । उनके धार्मिक कर्म काण्ड की भी निन्दा की गयी है जिसमें जीवित प्राणियों का वध किया जाता था । कुछ पिशाचों ने सरस्वती के तटपर तपस्या कर हिंसक प्रवृत्ति का त्याग किया था । महाभारत से प्रतीत होता है कि वे पंजाब तथा उत्तरी हिमालय क्षेत्र में रहते थे । पिशाचों के साथ महाभारत में वर्णित सभी जातियों का ऐतिहासिक अस्तित्व ऐतिहासिकों ने मान लिया है । कोई कारण नहीं प्रतीत होता कि पिशाचों को भी क्यों न ऐतिहासिक जाति माना जाय । पिशाचों के साथ दरद, पुण्ड्र, तंगण, परतंगण, बाह्लीक, चोल, पाण्ड्य, शक, कम्बोज, यवन, पारद, कुनिन्द, अम्बष्ठ आदि जातियों का उल्लेख मिलता है । राजतरंगिणी ( ५ : ४६९ ) में उल्लेख मिलता है कि उनके नाम पर पिशाचपुर स्थान था निस्सन्देह उक्त स्थान पर पिशाचों की प्रचुर आबादी रही होगी । उक्त प्रमाणों से निश्चय होता है कि ये मेरु पर्वत के दक्षिण में रहते थे। उनका निवास स्थान हिमालय पर्वतीय खण्ड था। ब्रह्माण्ड पुराणसे पता चलता है कि पिशाचक पर्वत मेरु के दक्षिण में है। मेरु वर्तमान पामीर
१०० राजतरंगिणी है। कश्मीर का पुराण इस दिशा का नीलमत है। अतएव उसमें वहां के रहने वाले पिशाचों का अत्यधिक मौलिक वर्णन होना स्वाभाविक है। इसलिये नीलमत के पिशाच मानव थे।' अन्य प्रमाणों ने उन्हें गाथा कालीन तथा काल्पनिक व्यक्ति अनभिज्ञता के कारण बना दिया है। मेरु पर्वत के विषय में तीन पर्वतों का नाम लिया जाता है। वर्तमान पामीर पर्वत, अफगानिस्तान का मरव पहाड़ी प्रदेश तथा उत्तरी ध्रुव । मरुत को मरवत कहते हैं। यह जिला बन्नू में मरवत तहसील है। हिन्दुकुश के पूर्वीय भाग में मरुत जाति का रहना कहा जाता है। मरवत तहसील की मरवत जाति प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित मरुत जाति है। राक्षसों का निवास स्थान धड़की जिला बलूचिस्तान की उत्तर दिशा में था। उत्तरी बलूचिस्तान में रक्षानी एक बड़ा कबीला है। प्राचीन राक्षस वंश की संतानें हैं। कपिशा पिशाचों की मातृ-भूमि कही जाती है। काफिरिस्तान तथा उसके समीपवर्ती देश में उनके निवास का वर्णन मिलता है। यशई काफिरिस्तान का एक कबीला है। यशई शब्द पिशाच का अपभ्रंश मालूम होता है। पंजाब के वाहीक पिशाचों के वंशज माने जाते हैं। मिलिन्द पन्ह से भी प्रकट होता है कि पिशाचों का निवास स्थान गान्धार कश्मीर उत्तर-पश्चिम भारत था। उनके निवास स्थान के विषय में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उत्तर कुरु, हिमवन्त, काश्मीर, पंजाब, काफिरिस्तान, पामीर पर्वत के दक्षिण तथा पूर्वीय हिन्दूकुश पर्वत माला में रहते थे। पिशाच मानव थे। सुर तथा असुर योनियों में पिशाच जाति को 'देवयोनयः' अमर कोशकार ने माना है । विद्याधराप्सरो - यक्ष - रक्षो - गन्धर्व - किन्नराः । पिशाचो गुह्यको सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः । अमरकोश १ : १ : ११ देवताओं की जाति के १० भेद माने गये हैं। वे हैं— ( १ ) विद्याधर, ( २ ) अप्सरस्, ( ३ ) यक्ष, ( ४ ) रक्षस्, ( ५ ) गन्धर्व, ( ६ ) किन्नर, ( ७ ) पिशाच, ( ८ ) गुह्यक, ( ९ ) सिद्ध, ( १० ) भूत । असुरों के १० भेद माने गये हैं : असुरा दैत्य-दैतेय-दनुजेन्द्रारि-दानवाः । शुक्रशिष्या दितिसुताः पूर्वदेवाः सुरद्विषः । अमरकोश १:१:१२ ( १ ) असुर, ( २ ) दैत्य, ( ३ ) दैतेय, ( ४ ) दनुज, ( ५ ) इन्द्रारि, ( ६ ) दानव, ( ७ ) शुक्रशिष्य, ( ८ ) दितिसुत, पूर्व देव, ( १० ) सुरद्विप । पिशाचों को असुर वर्ग में नहीं मानकर उन्हें देव वर्ग में रखा गया है। प्रश्न उपस्थित होता है। मानव मे पिशाच लोग हीन क्यों माने जाने लगे । ( १ ) पिशाच लोगों की विवाह प्रथा तिरस्कृत मानी गयी है। उसे दूषित कहा गया है। आठ प्रकार के विवाह—ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, तथा पिशाच—स्मृतियों ने माना