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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

१६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास 'देवल पत्तन', 'देवगिरि²' और 'देवगढ़³' भी मिलते हैं । महारावत ˙˙˙अत्युग्रधामा जगदेकनामा तस्मादभूच्छ्रीहरिसिंहदेवः । श्रीदेवदुर्गस्य विराजमाने सिंहासने राजति तत्तनुजः ॥ महारावत प्रतापसिंह के समय के वि० सं० १७३३ माघ सुदि १५ के पाटण्यां गांव के संस्कृत ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । ( १ ) तस्मिन् देवलपत्तने परिलसत्युच्चैः स्फुरद्गोपुरं नानामङ्गलतूर्यनादनिर्वहैः संलक्षितं सर्वतः ॥˙˙˙५ ॥ यस्मिन् देवलपत्तने परिलसत्यभ्रंलिहोऽट्टालिका नृत्यन्त्यः प्रमदाः परं विदधते तत्राप्सरः संभ्रमम् । ˙˙˙८ ॥ गंगाराम; हरिभूषण महाकाव्यम्, सर्ग १ । ( २ ) पुराऽऽसकर्णः किल रावलोभूतप्रतापसिंहेन युयोध यत्र । वंशालयाधीश्वरधर्मबन्धुः समागतो देवगिरेर्महीशः ॥ ३ ॥ वही; सर्ग ६ । ( ३ ) ˙˙˙संवत् १७७२ वर्षे माघसुदि १३ श्रीदेवगढ़नगरे महा- रावत श्रीश्रीपृथ्वीसिंहजी विजयराज्ये˙˙˙˙˙˙ ॥ देवलिया के पार्श्वनाथ के मन्दिर की प्रशस्ति की प्रतिलिपि से । ˙˙˙संवत् १७७४ वर्षे शाके १६३६ प्रवर्तमाने माह(घ) सुदि १३ रवौ श्रीदेवगढ़नगरे महाराजधान्यां महाराजाधिराजमहारावतश्रीप्रथवीसिंहजी- विजयीराज्ये कुंवरश्रीपहाड़सिंहविराजमाने˙˙˙ । वही । ˙˙˙संवत् १७८८ वर्षे शाके १६५३ प्रवर्तमाने दक्षिणगोले उत्तरायणगते श्रीसूर्ये शिशिरऋतौ महामाङ्गल्यप्रदे मासोत्तमे मासे माघ- मांसे शुक्लपक्षे ६ तिथौ शुक्रवा[स]रे कायठलदेशे देवगढ़नगरे महाराजधान्यां सूर्यवंशे महाराजाधिराजमहारावतश्रीगोपालसिंहजीविराज- माने˙˙˙ । देवलिया की ताबूंतों की बावड़ी की प्रशस्ति की प्रतिलिपि से ।

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देवलिया के राजमहल

भूगोल सम्बन्धी वर्णन १७ विक्रमसिंह (बीका) ने मेवाड़ छोड़ने के पीछे इधर आकर मीणों का दमन किया और प्रसिद्ध है कि वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) में देवलिया का क़सबा बसाकर वहां अपनी राजधानी स्थिर की¹। पहले इसके पूर्व-दक्षिण और पश्चिम के कुछ अंशों में दीवार बनी हुई थी, परंतु अब वह गिर गई है। युद्ध के अवसर पर यह स्थान सुरक्षित समझा जाता था, क्योंकि इसके चारों तरफ़ पहाड़ियां आ गई हैं और बीच में एक ऊंची पहाड़ी पर यह बसा हुआ है। यहां पुराने राज-महल हैं। भूत-पूर्व महारावत (१) प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों तथा उनके आधार पर बने हुए राजपूताना के गैजेटियर एवं अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों में महारावत विक्रमसिंह (बीका) का वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) में देवी मीणी के नाम पर देवलिया का क़सबा बसाने का उल्लेख है, परन्तु यह विश्वास-योग्य नहीं है। कर्नल टॉड लिखता है—"महारावत सूरजमल सादड़ी छोड़कर कांठल की तरफ़ बढ़ा, तब मार्ग में उसको कांठल के जंगल में एक स्थान पर यह दृश्य दीख पड़ा कि एक भेड़िया बकरी के बच्चे को उठाकर ले जाना चाहता है, किन्तु उसकी मा बार-बार प्रयत्न कर उसको उसके पंजे से बचाती है। निदान उसने उस स्थान को सब प्रकार से सुरक्षित समझ वहां पर अपना निवास रखना स्थिर किया और आस-पास के मीणों का दमन कर वहां देवलिया का क़सबा बसाया। चारणी की भविष्यवाणी के अनुसार फिर वह आस-पास के गांवों को दबाकर एक हज़ार गांवों का स्वामी हो गया और उसने अपने बाहुबल से अपने वंशजों के लिए स्वतन्त्र राज्य बना लिया, जो देवलिया-प्रतापगढ़ राज्य कहलाता है (जि० १, पृ० ३४७ क्रुक-संपादित) ।" ऊपर आई हुई भेड़िये और बकरी के बच्चे की कथा काल्पनिक है। ऐसी कथाएं ख्यातों आदि में अनेक स्थानों के सम्बन्ध में मिलती हैं, परन्तु वे विश्वास के योग्य नहीं है। उपर्युक्त कथन से इतना स्पष्ट है कि देवलिया का क़सबा महारावत सूरजमल ने बसाया था। उसका मेवाड़ की सीमा पर के कांठल प्रदेश पर अधिकार होने से चारणी देवी की भविष्यवाणी सत्य हुई, जिससे अनुमान होता है कि उसने देवी की स्मृति में वहां क़सबा आबाद कर उसका नाम देवलिया रक्खा। सूरजमल के पीछे बाघसिंह और रायसिंह, सादड़ी में ही रहे। वि० सं० १६१७ (ई० स० १५६१) के लगभग रावत विक्रमसिंह ने सादड़ी की जागीर का परित्याग कर देवलिया को ही अपनी राजधानी नियत किया, जो महारावत दलपतसिंह के समय तक बनी रही। इससे ख्यात-लेखकों ने इस क़सबे का विक्रमसिंह (बीका)-द्वारा आबाद होना मान लिया। वस्तुतः देवलियां का क़सबा महारावत सूरजमल ने बसाया था और उसकी उन्नति विक्रमसिंह के समय में हुई। ३

१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास

रघुनाथसिंह को प्रतापगढ़ की अपेक्षा यह स्थान अधिक पसंद था, इसलिए उसने यहां कुछ नये मकान बनवाये और पुराने महलों की मरम्मत करवा दी; क्योंकि वह स्वयं भी यहां रहा करता था। यहां कई तालाब हैं, जिनमें 'तेजसागर' (तेजोला) तालाब महारावत तेजसिंह का बनवाया हुआ है। उसके पास ही प्रतापगढ़ के नरेशों की श्मशान-भूमि है, जहां कई स्मारक छत्रियां बनी हुई हैं। तेजसागर के समीप ही एक हम्माम (स्नानागार) बना हुआ है, जिसके लिए ऐसी प्रसिद्धि है कि महारावत सिंहा के समय बादशाह जहांगीर की अप्रसन्नता से उसका सेनापति महावतखां, जब देवलिया में रहा था, उस समय वह बनवाया गया था। वहीं महारावत दलपतसिंह का बनवाया हुआ सोनेला तालाब है, जिसके बीच में उक्त महारावत का बनवाया हुआ छोटासा महल भी है। इस तालाब और महल को बनवाकर उक्त महारावत ने वि० सं० १६०४ (ई० स० १८४७) में उसकी प्रतिष्ठा की और उस अव- सर पर उसने चारण लखमणदान को लाख पसाव भी दिया। देवलिया में कई वैष्णव, शैव और जैन मंदिर हैं, परंतु वे सब इस क़सबे के आबाद होने के पीछे के बने हुए हैं। विष्णु के मंदिरों में गोवर्धननाथ का मंदिर महारा- वत हरिसिंह का बनवाया हुआ है और वहां वि० सं० १७०७ (ई० स० १६५०) की प्रशस्ति लगी है। महारावत सामंतसिंह का बनवाया हुआ यहां रघु- नाथ-द्वारा नामक विष्णु-मंदिर है, जिसके प्रबंध के लिए राज्य की तरफ़ से लगभग पांच हज़ार रुपये वार्षिक आय के गांव हैं और उक्त मंदिर का प्रबंध वहां के महंत के अधिकार में है, जिसकी प्रतिष्ठा इस राज्य में सर्वोपरि है। इस राज्य में इससे बड़ी आय का कोई राजकीय देव-मंदिर नहीं है। जैन मंदिरों में अधिकांश दिगंबर-संप्रदाय के हैं, जिनमें वि० सं० १७७२ (ई० स० १७१५) के पूर्व का कोई लेख नहीं है। यहां पाठशाला, अस्पताल तथा पोस्ट ऑफ़िस भी हैं और प्रतापगढ़ से देवलिया तक टेली- फोन भी लगा दिया गया है। पहले यहां अच्छी बस्ती थी, परंतु अब कम होती जाती है। प्रतापगढ़-देवलिया का जलवायु आरोग्यप्रद न होने से समथल प्रदेश :

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उदयनिवास महल, प्रतापगढ़

में, जहां पहले घोघेरिया खेड़ा ( डोडेरिया का खेड़ा ) नामक गांव था, प्रताप- गढ़ नामक क़सबा महारावत प्रतापसिंह ने वि० सं० १७५५ (ई० स० १६९८) में आबाद किया, जो इस समय इस राज्य का मुख्य क़सबा और राजधानी है । बी० बी० एंड सी० आई० रेल्वे की मालवा लाइन के मंदसोर स्टेशन से २० मील दूर पश्चिम में स्थित प्रतापगढ़ का क़सबा समुद्र की सतह से १६६० फुट की ऊंचाई पर है। वि० सं० १८१५ (ई० स० १७५८) में महारावत सालिमसिंह ने इसके चौतरफ़ कोट बनवाया, जिसके सूरजपोल, भाटपुरा दरवाज़ा, बारी दरवाज़ा, देवलिया दरवाज़ा और धमोतर दरवाज़ा नामक ६ दरवाज़े हैं। इन दरवाज़ों के अतिरिक्त दो छोटे द्वार तालाब बारी और क़िला बारी भी हैं। आबादी के बीच में पश्चिम की तरफ़ महारावत के पुराने महल बने हुए हैं, जिनमें सरकारी दफ़्तर हैं तथा क़सबे के बाहर पश्चिम में क़िला बना हुआ है, जिसमें सामने की तरफ़ महारावत उदयसिंह का बनवाया हुआ 'उदयविलास' महल है। प्रतापगढ़ में हिंदू और जैन सम्प्रदायों के कई मंदिर हैं, परंतु वे अठारहवीं शताब्दी से पुराने नहीं है। यहां अंग्रेज़ी की उच्च शिक्षा के लिए 'पिन्हे हाईस्कूल' है, जिसमें मैट्रिक तक की शिक्षा दी जाती है। इसके अतिरिक्त संस्कृत-पाठशाला, राजकीय प्राइमरी स्कूल, कन्या-पाठशाला, ज़नाना-अस्पताल, रघुनाथ हॉस्पिटल, घासीराम डिस्पेंसरी, देशी दवाख़ाना, पोस्ट ऑफ़िस तथा तारघर, वाचनालय, धर्मशाला, उद्यान आदि लोकोपयोगी संस्थायें विद्यमान हैं। आबादी के बाहर महा- रावत उदयसिंह की बनवाई हुई कंपू (कैंप) कोठी बनी हुई है, जिसकी महारावत रघुनाथसिंह के समय महाराजकुमार मानसिंह ने बहुत कुछ अभि- वृद्धि की थी। वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने वहां और भी नवीन भवन बनवाकर सुन्दर बगीचा लगवा दिया है, जिससे उसकी शोभा बढ़ गई है। अपने राज्याभिषेक के पीछे इन्होंने उसी स्थल को अपना निवास- स्थान बना लिया है, जिससे उसकी और भी उन्नति होने की आशा है। जानवरों से प्रेम होने के कारण कंपू-कोठी में इन्होंने जानवरों का छोटासा संग्रहालय बना रक्खा है, जो देखने योग्य है। कंपू कोठी के समीप सरकारी

२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास दफ़्तर भी हैं, और उसके सामने मेहमानों के ठहरने के लिए 'अतिथि-गृह' ( Guest House ) बना हुआ है। नगर की स्वच्छता का प्रबन्ध म्यून्सि- सिपैलिटो-द्वारा होता है। यहां छापाखाना, बिजली घर, कॉटन प्रेस तथा जिनिंग फ़ैक्टरी भी हैं। यहां की दस्तकारी में हरे रंग के कांच पर सुनहरी मीनाकारी का काम प्रसिद्ध है। इस राज्य में सागवान की लकड़ी की बहु- तायत होने से मकानों आदि के बनाने में उसका प्रचुरता से इस्तेमाल होता है। प्रतापगढ़ से दक्षिण की तरफ़ पहाड़ी नाले में तालाब के पीछे दीपनाथ महादेव का मन्दिर है, जिसको महारावत सामन्तसिंह के कुंवर दीपसिंह ने बनवाया था। वहां का दृश्य मनोहर है। वहां और भी कई मन्दिर तथा देवकुलिकाएं हैं, जिनपर वृक्षों का सुन्दर झुरमुट है। कार्तिक सुदि १५ को प्रति वर्ष वहां मेला भरता है। उसके पास ही राजकीय श्मशान है, जहां महारावत उदयसिंह तथा महाराजकुमार मानसिंह की स्मारक छत्रियां हैं। ई० स० १६३१ ( वि० सं० १६८७ ) की मनुष्य-गणना के अनुसार प्रतापगढ़ क़सबे की जन संख्या १०८४५ है। जानागढ़—प्रतापगढ़ से लगभग १० मील दूर दक्षिण-पश्चिम के पहाड़ी प्रदेश में जानागढ़ नामक पुराना क़िला है, जिसमें एक मसजिद, हम्माम और अस्तवल बना हुआ है। ऐसी प्रसिद्धि है कि जानआलम नामक कोई मुसलमान शाहज़ादा यहां रहा था और उसने ही यह क़िला तथा अन्य स्थान बनवाये थे। यहां कोई शिलालेख न होने से यह कहना कठिन है कि यह क़िला कब बना और जानआलम कहां का था। इसके आस-पास भीलों और मीणों की थोड़ीसी वस्ती है। गौतमेश्वर के वि० सं० १५६२ आषाढ वदि १४ ( ई० स० १५०५ ता० १ जून ) के शिलालेख' से अनुमान होता है ( १ ) संवत् १५६२ वासठा विषे (वर्षे) आसा (षा) ढ वदि १४ वा...; ...पातसा (शा) ह श्रीनासीरसा (शा) हविजयराज्ये ...... श्रीषां (खां) नः आजम मकबेलषां (खां) न मुकतकले गयासगीर मुतालिक सा (शा) ह जोइ (जय) चंद दामा देवश्रीगौतमेसर मुगतो कराय्यो जे काइ कर लागतो

प्रतापगढ़ के प्राचीन महल ५.

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भूगोल सम्बन्धी वर्णन २१ कि उक्त शिलालेख में उल्लिखित खान आलम मकवलखां, जो मालवे के मुसलमानों की तरफ़ से इस प्रदेश का शासन करता था और जान आलम एक ही व्यक्ति हों। संभव है कि उसने अपने रहने के लिए यह स्थान बनवाया हो। घोटार्सी—प्रतापगढ़ से ७ मील पूर्व में घोटार्सी नामक प्राचीन नगर है। संस्कृत में इसका नाम घोंटार्वषिका मिलता है। यहां दूर-दूर तक भूमि के भीतर से बड़ी-बड़ी ईंटें निकलती हैं और कई मंदिरों के अवशिष्ट चिन्ह भी दृष्टिगोचर होते हैं तथा बहुत से खुदाई के कामवाले पत्थर इधर-उधर बिखरे हुए मिलते हैं, जिनसे अनुमान होता है कि पहले यह स्थान बड़ा ही संपन्न था और यहां कई मंदिर आदि थे। यहां एक मंदिर है, जिसको भेरूंजी का मंदिर कहते हैं। उसके नीचे का भाग सुंदर खुदाई- वाला और प्राचीन है तथा ऊपरी भाग का समय-समय पर जीर्णोद्धार हुआ हो ऐसा पाया जाता है। उक्त मंदिर के चबूतरे पर तोरण के टुकड़े, देवी, विष्णु आदि की टूटी हुई मूर्तियां पड़ी हुई हैं, जो वहां के मंदिरों की होंगी। तालाब की पाल पर नवग्रह आदि की मूर्तियां एवं खुदाई के काम- वाले बहुत से पत्थर बिखरे पड़े हैं और अब तक कुछ ऐसे अंश विद्यमान हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि तालाब के निकट कई मंदिर बने हुए होंगे। यहां 'इन्द्रराजादित्यदेव' नामक सूर्य मंदिर था, जिसको 'तरुणादित्य- देव' भी कहते थे। इस सूर्य के मंदिर को चौहान-वंशीय इन्द्रराज ने, जो दुर्लभराज का पुत्र और गोविन्दराज का पौत्र था, बनवाया थौ। वि० सं० ९६६ श्रावण सुदि १ (ई० स० ६४२ ता० १७ जुलाई) को मेवाड़ के गुहिल- ते निकर कीयो जे कोइ मुसलमांन होइ कर लेयै तेकूं सुअर की गेड़ हीन्दु हो तो कर लेयै तेहे गाइ की साईगें (सौगंध) है। गौतमेश्वर के मूल शिलालेख की छाप से ! ( १ ) यस्माद्वि(द्वि)भ्यति विद्विषः किमपरं यस्माच्च लक्ष्मीनृणां[1] सोयं राजति राजचक्रनिलयः श्रीचाहमानान्वयः [॥ ५ ॥]

२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वंशीय नृपति खुम्माण (तीसरा) के पुत्र भर्तृपट्ट (भर्तृभट्ट, दूसरा) ने पलाशकूपिका (पलाशिया, मेवाड़) नामक गांव का बंवूलिका नामक क्षेत्र, इस मंदिर के भेंट किया था¹। इस मंदिर के समीप 'वटयक्षिणी' गोविन्दराज इति तत्र बभूव भूपो । राकाशशाङ्ककिरणोत्करशुअ्रकीर्तिः । येन प्र[च]ण्डभुजदण्डतरण्डकेन । प्रोत्तारिता समरसागरतो जयश्रीः ॥ ६ ॥ लि(ल)क्ष्म्यालिंगितविग्रहो हरिरिव क्रोधाग्निदग्धाहितः । सर्वे[षां] च शरण्यतामुपगतो भास्वत्प्रतापोदयः ॥ श्रीमद्दुलर्भरा[ज]नामनृपतिस्तस्मादभूदंगजो । वक्रं येन कृतं नचार्थिनि जने वक्त्रं द्विषीवा[य]ति ॥ [८] तस्मादनेकसमरार्जितकीर्तिकोशः । चिंतामणिः प्रणयिनां प्रणतो द्विज[जा]तेः [।] यो योषितां तनुधरोभिनवो मनोभू- र्भूषा भुवः समभव[त्सु]त इन्द[न्द्र]राजः ॥ [६] तेनाकारि हिमाचलेन्द्रश[स]दृशं भासां प्रभोर्भासुरं [।] धामेदं ध्वजकिङ्किणीकलमिलत्कोलाहलांलंकृतं ॥[१०] प्रतापगढ़ से प्राप्त कन्नौज के प्रतिहारवंशी राजा महेंद्रपाल (दूसरा) का शिला- लेख (एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८४-५) । (१) संवत् ९९६ श्रावण सुदि १ समस्तराजावलिपूर्व्वमग्रे- (षे) ह महाराजाधिराजश्रीभर्तृपट्टः श्रीखोम्माणसुतः स्वमातृपित्रो- रात्मनश्च धर्म्माभिवृद्धये घोट्टावर्षीयैन्द्रराजादित्यदेवाय पलासकूपिकाग्रामे वंवूलिकोन्ना(ना)मकन्(च्छः) ......। वही; जि० १४, पृ० १८७ ।

  • भूगोल सम्बन्धी वर्णन - २३

देवी' का मन्दिर और मठ भी था । उक्त देवी के मंदिर को वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ ( ई० स० ६४६ ता० २ नवम्बर ) को कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहार राजा महेंद्रपाल ( दूसरा ) ने, जिसके अधिकार में यह देश भी था, घोटासीं के निकट का 'खर्परपद्रक' ( खैरोट ) गांव भेंट किया था¹ । ये सूर्य और देवी के मंदिर तथा मठ कहां थे, इसका अब तक निश्चय नहीं हो सका । संभव है, जिसको आज-कल भैरूंजी का मंदिर कहते हैं, वही प्राचीन सूर्य का मंदिरों हो । यहां के मंदिर आदि के पत्थर दूर-दूर तक पहुंचे हैं । मोहकमपुरा की छत्रियों और चबूतरों में यहां के पत्थर ही लगे हुए हैं । नंदवाणा बोहरा नाथू ने वसाड़ के पास पोह की बावड़ी बनवाई, जिसमें भी यहीं के पत्थर लगे हैं। इसी प्रकार प्रतापगढ़ के दरवाज़े के बाहर अग्रवाल चैनराम ने जो बावड़ी बनवाई, उसमें भी यहीं के पत्थर लगे हैं । उनके साथ वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ६४६ ता० २ नवंबर) की उपर्युक्त रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल ( दूसरा ) के समय की


( १ ) ॰॰॰परममाहेश्वरो महाराजश्रीमहेन्द्रपालदेवः श्रीदशपुरपश्चिम- पथके तलवर्गिंगकहरिषडभुज्यमानखर्प्परपद्रकग्रामे घोट्टावर्षिकाप्रत्यासन्ने समुपगतान् सर्व्वांन्ने(नेव)यथास्थाननियुक्तान्प्रतिवासिनश्च समाज्ञापयत्यस्तु वः उपरलिखितग्रामः स्वसीमातृणप्रति[पूति]गोचरपर्यन्तो(न्तः)सर्व्वाद‌ाय- समेत आचन्द्रार्कक्षितिकालं पूर्व्वदत्तदेवब्रह्मदेयवर्ज्जितो 'मया पित्रोः पुन्या(ण्या)भिवृद्धये का[ह्नि]क्यां गंगायां स्नात्वा पुन्थे(ण्ये)हनि [ध]नशूर- प्रार्थनया श्रीदशपुरचातुर्वैद्यहरिर्षेश्वर(हर्षीश्वर)मठसंव(ब)ध्यमानश्रीवट- यक्षिणीदेव्यै शासनत्वेन प्रतिपादितः ( त इति) मत्वा भवद्भिः सा(स)- मनुमन्तव्यो(व्यः) प्रतिवासिजनपदैरप्याज्ञास्र(श्र)वणविधेयैर्भूत्वा यथा- दीयमानभागभोगकरहिरन्या(ण्या)दिकमस्योपनेतव्यमिति । श्रीजज्जनाग- प्रदत्तादेशात् । संवत्सो ( संवत्सरे ) १००३ मार्ग वदि ५ । पुरोहित- त्रिविक्रमात्ताच्च(नाथ) लिखितमिदम् । स्वहस्तोयं श्रीविदग्धस्य ।

वही; जि० १४, पृ० १८३-४ ।

२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रशस्ति भी यहां से ले जाकर बावड़ी के पास एक चबूतरे में चुनी गई थी। उसको मैंने वहां से निकलवाकर राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित किया है' । 'वरमंडल' गांव के, जो घोटार्सी से दो मील दूर है, शिवालय के स्तम्भ आदि भी यहीं के हैं। उक्त मंदिर के बाहर एक चबूतरे पर सूर्य का एक-चक्र रथ जमा हुआ है, जो घोटार्सी के सूर्य मंदिर का ही रथ होना चाहिये । वहां ( वरमंडल ) के चबूतरे तथा मंदिर की दीवारों में जो बहुत से सुंदर खुदाईवाले पत्थर लगे हुए हैं, वे सब घोटार्सी से गये हैं । घोटार्सी में पहले कुछ जैन मंदिर भी थे । प्रतापगढ़ की संस्कृत पाठशाला के अध्यक्ष पंडित जगन्नाथ शास्त्री के परिश्रम से पार्श्वनाथ के मंदिर की प्रशस्ति का एक टुकड़ा अभी मिला है, जिसमें संवत् का भाग नहीं है, परन्तु दुर्लभराज का नाम² है, जिससे अनुमान होता है कि उक्त मन्दिर उपर्युक्त दुर्लभराज चौहान के समय बना होगा । वीरपुर—प्रतापगढ़ से लगभग दस मील दूर दक्षिण-पश्चिम में सुहांगपुर के समीप वीरपुर नामक गांव है। यहां एक टूटा हुआ जैन-मंदिर है। उसको लोग दो हज़ार वर्ष का प्राचीन बतलाते हैं, जो विश्वास के योग्य नहीं है, क्योंकि उसपर जो खुदाई का काम है, वह बारहवीं शताब्दी के पूर्व का नहीं है । पहले यह अच्छा क़सबा था, परन्तु अब तो भीलों और मीणों की थोड़ी सी बस्ती है। यहां दूर-दूर तक ईंटों के टुकड़े पड़े हुए मिलते हैं और खोदने पर बड़ी-बड़ी ईंटें तथा मिट्टी की नांदें मिलती हैं। यहां एक शिवालय भी है, जो पहले शिखर-सहित पत्थर का ही बना था, परन्तु शिखर तथा सभामंडप दोनों ही गिर गये हैं तथा नंदी के दो टुकड़े सभामंडप में पड़े हुए हैं। द्वार के ऊपर गणपति और उसके ऊपर नवग्रह की मूर्तियां बनी हैं । वि० सं० १६४१ ( ई० स० १५८४ ) में सुहागपुरे में दिगम्बर जैनमन्दिर बनने पर वीरपुर के प्राचीन जैनमंदिर ( १ ) राजपूताना म्यूज़ियम् ( अजमेर ) की ई० स० १९१३-१४ की रिपोर्ट; पृ० २ । ( २ ) मूललेख की छाप से ।

के स्तम्भ आदि ले जाकर वहां के मंदिर में लगा दिये गये । खेरोट—प्रतापगढ़ से लगभग ७ मील दूर दक्षिण-पूर्व में खेरोट नामक प्राचीन गांव है । संस्कृत लेखों में इसका नाम 'खर्परपद्रक' लिखा हुआ मिलता है । यह गांव रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल (दूसरा) ने घोटार्सों गांव की 'वटयक्षिणीदेवी' के मंदिर को वि० सं० १००३ ( ई० स० ६४६ ) में भेंट किया था¹। खेरोट गांव में भी प्राचीनता के कई चिन्ह अब तक विद्यमान हैं, जिससे कहा जा सकता है कि पहले यह सुसंपन्न रहा होगा । अरणोद—प्रतापगढ़ से दक्षिण में ११ मील की दूरी पर अरणोद नाम का क़सबा है । इस समय यह क़सबा दूसरे नंबर पर है और महारावत के समीपी बांधवों का प्रमुख ठिकाना है । गांव के बाहिर पाठशाला के सामने की बावड़ी में शेषशायी विष्णु की सुंदर मूर्ति दीवार में चुनी हुई है। बाग के पास की बावड़ी में भी कई मूर्तियां और खुदाई के कामवाले पत्थर चुने हुए हैं, जिनमें से श्वेतांबर पार्श्वनाथ की खड़ी हुई मूर्ति बड़ी सुंदर है। भूतपूर्व महारावत रघुनाथसिंह अरणोद से ही जाकर प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ था । वि० सं० १६५७ ( ई० स० १६०० ) में उक्त महारावत के द्वितीय महाराजकुमार गोवर्धनसिंह का जन्म होने पर अरणोद के ठिकाने पर उसको नियत किया गया, जो वहां का वर्तमान स्वामी है । अरणोद में पाठशाला और डाकखाना भी है । गौतमेश्वर—अरणोद से लगभग दो मील के अंतर पर गौतमेश्वर नामक तीर्थ है, जो प्रतापगढ़ राज्य में बड़ा पवित्र माना जाता है। यहां का गौतमेश्वर नामक शिवालय एक पहाड़ के नीचे के मध्य-भाग में बना है, जहां कुछ चौड़ाई आ गई है। मंदिर के ऊपर पहाड़ का अंश छज्जे की भांति है। गौतमेश्वर के मंदिर के पास और भी कई मंदिर हैं, जहां साधु लोग आकर ठहरते हैं। पहाड़ के ऊपर तालाब है, जिसका जल टपककर गौतमेश्वर ( १ ) देखो ऊपर पृष्ठ २३, टिप्पण संख्या १ । ४

२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास के सामने के कुंड में प्रपात के रूप में गिरता है । नीचे की तरफ बहुत गहराई में नदी बहती है । यहां का दृश्य बड़ा ही सुंदर है। प्रतिवर्ष वैशाख सुदि १५ को यहां बड़ा मेला लगता है और दूर-दूर से हज़ारों यात्री आकर मेले में सम्मिलित होते हैं। मंदिर के बाहर वि० सं० १५६२ आषाढ वदि १४ ( ई० स० १५०५ ता० १ जून) का शिलालेख है', जिससे पाया जाता है कि यह प्रदेश मांडू के सुलतान नासिरशाह के अधीन था और खानआलम मक़वलखां यहां का शासक था, जिसके समय में शाह, जैचंद ने यहां पर लगनेवाला यात्रियों का कर छुड़वाया । भचूंडला—प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग १६ मील की दूरी पर भचूंडला नामक प्राचीन गांव है, जिसकी बस्ती अब कम रह गई है। उसके बाहर युद्ध में काम आनेवाले वीरों के स्मारक स्तम्भ खड़े हुए हैं, जिनमें से एक पर वि० सं० १३३८ ( ई० स० १२८१.) का लेख है । इन स्तंभों से थोड़ी ही दूर पर एक प्राचीन मंदिर है, जो सारा पत्थरों से बना है । इस मंदिर के द्वार पर गरुड़ारूढ़ विष्णु की मूर्ति और भीतर की दीवार के सहारे मूर्ति की वेदी बनी है । आज-कल इसमें शिव-लिङ्ग है, परन्तु यह पहले विष्णु का मंदिर था । इस मंदिर के बहुतसे पत्थरों की खुदाई तथा स्तम्भ आदि बेमेल हैं, जिससे अनुमान होता है कि किसी अन्य मंदिर के पत्थर इस मंदिर के बनाने में काम में लाये गये हों। जो भी हो यह मंदिर १४ वीं शताब्दी के आस-पास का बना हुआ प्रतीत होता है और इसके अधिकांश पत्थर शेवना से लाये गये जान पड़ते हैं । नीनोर— प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग २४ मील की दूरी पर नीनोर नामक प्राचीन गांव है । यहां के दिगंबर जैन मंदिर के 'निजमंदिर का द्वार शेवना के शिव-मंदिर से लाकर खड़ा किया गया है। उसके मध्य में शिव और दोनों किनारों पर विष्णु और ब्रह्मा की मूर्तियां हैं । द्वार के दोनों पाश्र्वों में तीन-तीन स्त्री-पुरुषों की पास-पास खड़ी हुई मूर्तियां हैं । यहां का लक्ष्मीनारायण का मंदिर नागर ब्राह्मण गेमल और विश्वनाथ का ( १ ) देखो ऊपर पृ० २०, टिप्पण संख्या १ ।

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शेवना के प्राचीन शिवमंदिर का भीतरी भाग

भूगोल सम्बन्धी वर्णनः २७ बनवाया हुआ है, जिसमें वि० सं० १८२६ शक सं० १६६४ ज्येष्ठ वदि ५ (ई० स० १७७२ ता० २१ मई) गुरुवार का शिलालेख है। इस मंदिर का द्वार तथा स्तंभों के सिरे शेवना से लाकर लगाये गये हैं। गांव के बाहर पाषाण का बना हुआ एक छोटासा शिव-मंदिर तथा पद्मावती (देवी) का मंदिर है, जिनको वहां के नागर ब्राह्मणों ने बनवाया था। तालाब की पाल पर का शिव-मंदिर वि० सं० १८१६ (ई० स० १७६२) में महारावत सालिम- सिंह के समय नागर ब्राह्मण हरनाथ ने बनवाया था । गांव के आस-पास दूर-दूर तक पुरानी ईंटें निकलती हैं। पहले यहां विसनगरे नागरों की अच्छी बस्ती थी, परन्तु अब केवल १०-१५ घर रहे हैं। शेवना—प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग २० मील की दूरी पर शेवना नामक गांव है, जो पहले संपन्न था । यह प्रसिद्ध है कि यहां शिवनगरी नामक राज्य की राजधानी थी । इसमें कितनी सत्यता है, यह कहा नहीं जा सकता, परन्तु इतना निश्चित है कि पहले यह नगर विशाल रहा होगा, क्योंकि इसके खंडहर दूर-दूर तक दृष्टिगोचर होते हैं । एक क़िले के अतिरिक्त यहां पर अब तक कई मंदिरों के भग्नावशेष विद्यमान हैं, जिनमें एक शिवालय बहुत सुन्दर है। यहां ज़मीन के भीतर बना हुआ महाकाल का पुराना मंदिर है। कई मूर्तियां इधर-उधर टूटी-फूटी दशा में मिलती हैं, जिनमें से त्रिविक्रम (वामन) की मूर्ति राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित है¹। यहां से कई मंदिरों के द्वार, स्तम्भ आदि लेजाकर अचूंडला, नीनोर आदि के मंदिर बनाये गये हैं। अब तो इसके आस-पास थोड़ीसी भीलों (मीणों) की बस्ती रह गई है। उपर्युक्त स्थानों के अतिरिक्त इस राज्य में बोरदिया, धमोतर, बमोतर, गयासपुर, सुहागपुर, बसाड़ आदि और भी कई प्राचीन स्थान हैं । उनमें से कई में मंदिरों आदि के चिन्ह पाये जाते हैं। गयासपुर मालवे के सुलतान गयासुद्दीन के नाम पर बसा हुआ है, जो पहले (१) राजपूताना म्यूज़ियम् (अजमेर) की ई० स० १६२२-२३ की रिपोर्ट; पृ० ५ ।