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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

उदयनिवास महल, प्रतापगढ़

में, जहां पहले घोघेरिया खेड़ा ( डोडेरिया का खेड़ा ) नामक गांव था, प्रताप- गढ़ नामक क़सबा महारावत प्रतापसिंह ने वि० सं० १७५५ (ई० स० १६९८) में आबाद किया, जो इस समय इस राज्य का मुख्य क़सबा और राजधानी है । बी० बी० एंड सी० आई० रेल्वे की मालवा लाइन के मंदसोर स्टेशन से २० मील दूर पश्चिम में स्थित प्रतापगढ़ का क़सबा समुद्र की सतह से १६६० फुट की ऊंचाई पर है। वि० सं० १८१५ (ई० स० १७५८) में महारावत सालिमसिंह ने इसके चौतरफ़ कोट बनवाया, जिसके सूरजपोल, भाटपुरा दरवाज़ा, बारी दरवाज़ा, देवलिया दरवाज़ा और धमोतर दरवाज़ा नामक ६ दरवाज़े हैं। इन दरवाज़ों के अतिरिक्त दो छोटे द्वार तालाब बारी और क़िला बारी भी हैं। आबादी के बीच में पश्चिम की तरफ़ महारावत के पुराने महल बने हुए हैं, जिनमें सरकारी दफ़्तर हैं तथा क़सबे के बाहर पश्चिम में क़िला बना हुआ है, जिसमें सामने की तरफ़ महारावत उदयसिंह का बनवाया हुआ 'उदयविलास' महल है। प्रतापगढ़ में हिंदू और जैन सम्प्रदायों के कई मंदिर हैं, परंतु वे अठारहवीं शताब्दी से पुराने नहीं है। यहां अंग्रेज़ी की उच्च शिक्षा के लिए 'पिन्हे हाईस्कूल' है, जिसमें मैट्रिक तक की शिक्षा दी जाती है। इसके अतिरिक्त संस्कृत-पाठशाला, राजकीय प्राइमरी स्कूल, कन्या-पाठशाला, ज़नाना-अस्पताल, रघुनाथ हॉस्पिटल, घासीराम डिस्पेंसरी, देशी दवाख़ाना, पोस्ट ऑफ़िस तथा तारघर, वाचनालय, धर्मशाला, उद्यान आदि लोकोपयोगी संस्थायें विद्यमान हैं। आबादी के बाहर महा- रावत उदयसिंह की बनवाई हुई कंपू (कैंप) कोठी बनी हुई है, जिसकी महारावत रघुनाथसिंह के समय महाराजकुमार मानसिंह ने बहुत कुछ अभि- वृद्धि की थी। वर्तमान महारावत सर रामसिंहजी ने वहां और भी नवीन भवन बनवाकर सुन्दर बगीचा लगवा दिया है, जिससे उसकी शोभा बढ़ गई है। अपने राज्याभिषेक के पीछे इन्होंने उसी स्थल को अपना निवास- स्थान बना लिया है, जिससे उसकी और भी उन्नति होने की आशा है। जानवरों से प्रेम होने के कारण कंपू-कोठी में इन्होंने जानवरों का छोटासा संग्रहालय बना रक्खा है, जो देखने योग्य है। कंपू कोठी के समीप सरकारी

२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास दफ़्तर भी हैं, और उसके सामने मेहमानों के ठहरने के लिए 'अतिथि-गृह' ( Guest House ) बना हुआ है। नगर की स्वच्छता का प्रबन्ध म्यून्सि- सिपैलिटो-द्वारा होता है। यहां छापाखाना, बिजली घर, कॉटन प्रेस तथा जिनिंग फ़ैक्टरी भी हैं। यहां की दस्तकारी में हरे रंग के कांच पर सुनहरी मीनाकारी का काम प्रसिद्ध है। इस राज्य में सागवान की लकड़ी की बहु- तायत होने से मकानों आदि के बनाने में उसका प्रचुरता से इस्तेमाल होता है। प्रतापगढ़ से दक्षिण की तरफ़ पहाड़ी नाले में तालाब के पीछे दीपनाथ महादेव का मन्दिर है, जिसको महारावत सामन्तसिंह के कुंवर दीपसिंह ने बनवाया था। वहां का दृश्य मनोहर है। वहां और भी कई मन्दिर तथा देवकुलिकाएं हैं, जिनपर वृक्षों का सुन्दर झुरमुट है। कार्तिक सुदि १५ को प्रति वर्ष वहां मेला भरता है। उसके पास ही राजकीय श्मशान है, जहां महारावत उदयसिंह तथा महाराजकुमार मानसिंह की स्मारक छत्रियां हैं। ई० स० १६३१ ( वि० सं० १६८७ ) की मनुष्य-गणना के अनुसार प्रतापगढ़ क़सबे की जन संख्या १०८४५ है। जानागढ़—प्रतापगढ़ से लगभग १० मील दूर दक्षिण-पश्चिम के पहाड़ी प्रदेश में जानागढ़ नामक पुराना क़िला है, जिसमें एक मसजिद, हम्माम और अस्तवल बना हुआ है। ऐसी प्रसिद्धि है कि जानआलम नामक कोई मुसलमान शाहज़ादा यहां रहा था और उसने ही यह क़िला तथा अन्य स्थान बनवाये थे। यहां कोई शिलालेख न होने से यह कहना कठिन है कि यह क़िला कब बना और जानआलम कहां का था। इसके आस-पास भीलों और मीणों की थोड़ीसी वस्ती है। गौतमेश्वर के वि० सं० १५६२ आषाढ वदि १४ ( ई० स० १५०५ ता० १ जून ) के शिलालेख' से अनुमान होता है ( १ ) संवत् १५६२ वासठा विषे (वर्षे) आसा (षा) ढ वदि १४ वा...; ...पातसा (शा) ह श्रीनासीरसा (शा) हविजयराज्ये ...... श्रीषां (खां) नः आजम मकबेलषां (खां) न मुकतकले गयासगीर मुतालिक सा (शा) ह जोइ (जय) चंद दामा देवश्रीगौतमेसर मुगतो कराय्यो जे काइ कर लागतो

प्रतापगढ़ के प्राचीन महल ५.

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भूगोल सम्बन्धी वर्णन २१ कि उक्त शिलालेख में उल्लिखित खान आलम मकवलखां, जो मालवे के मुसलमानों की तरफ़ से इस प्रदेश का शासन करता था और जान आलम एक ही व्यक्ति हों। संभव है कि उसने अपने रहने के लिए यह स्थान बनवाया हो। घोटार्सी—प्रतापगढ़ से ७ मील पूर्व में घोटार्सी नामक प्राचीन नगर है। संस्कृत में इसका नाम घोंटार्वषिका मिलता है। यहां दूर-दूर तक भूमि के भीतर से बड़ी-बड़ी ईंटें निकलती हैं और कई मंदिरों के अवशिष्ट चिन्ह भी दृष्टिगोचर होते हैं तथा बहुत से खुदाई के कामवाले पत्थर इधर-उधर बिखरे हुए मिलते हैं, जिनसे अनुमान होता है कि पहले यह स्थान बड़ा ही संपन्न था और यहां कई मंदिर आदि थे। यहां एक मंदिर है, जिसको भेरूंजी का मंदिर कहते हैं। उसके नीचे का भाग सुंदर खुदाई- वाला और प्राचीन है तथा ऊपरी भाग का समय-समय पर जीर्णोद्धार हुआ हो ऐसा पाया जाता है। उक्त मंदिर के चबूतरे पर तोरण के टुकड़े, देवी, विष्णु आदि की टूटी हुई मूर्तियां पड़ी हुई हैं, जो वहां के मंदिरों की होंगी। तालाब की पाल पर नवग्रह आदि की मूर्तियां एवं खुदाई के काम- वाले बहुत से पत्थर बिखरे पड़े हैं और अब तक कुछ ऐसे अंश विद्यमान हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि तालाब के निकट कई मंदिर बने हुए होंगे। यहां 'इन्द्रराजादित्यदेव' नामक सूर्य मंदिर था, जिसको 'तरुणादित्य- देव' भी कहते थे। इस सूर्य के मंदिर को चौहान-वंशीय इन्द्रराज ने, जो दुर्लभराज का पुत्र और गोविन्दराज का पौत्र था, बनवाया थौ। वि० सं० ९६६ श्रावण सुदि १ (ई० स० ६४२ ता० १७ जुलाई) को मेवाड़ के गुहिल- ते निकर कीयो जे कोइ मुसलमांन होइ कर लेयै तेकूं सुअर की गेड़ हीन्दु हो तो कर लेयै तेहे गाइ की साईगें (सौगंध) है। गौतमेश्वर के मूल शिलालेख की छाप से ! ( १ ) यस्माद्वि(द्वि)भ्यति विद्विषः किमपरं यस्माच्च लक्ष्मीनृणां[1] सोयं राजति राजचक्रनिलयः श्रीचाहमानान्वयः [॥ ५ ॥]

२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वंशीय नृपति खुम्माण (तीसरा) के पुत्र भर्तृपट्ट (भर्तृभट्ट, दूसरा) ने पलाशकूपिका (पलाशिया, मेवाड़) नामक गांव का बंवूलिका नामक क्षेत्र, इस मंदिर के भेंट किया था¹। इस मंदिर के समीप 'वटयक्षिणी' गोविन्दराज इति तत्र बभूव भूपो । राकाशशाङ्ककिरणोत्करशुअ्रकीर्तिः । येन प्र[च]ण्डभुजदण्डतरण्डकेन । प्रोत्तारिता समरसागरतो जयश्रीः ॥ ६ ॥ लि(ल)क्ष्म्यालिंगितविग्रहो हरिरिव क्रोधाग्निदग्धाहितः । सर्वे[षां] च शरण्यतामुपगतो भास्वत्प्रतापोदयः ॥ श्रीमद्दुलर्भरा[ज]नामनृपतिस्तस्मादभूदंगजो । वक्रं येन कृतं नचार्थिनि जने वक्त्रं द्विषीवा[य]ति ॥ [८] तस्मादनेकसमरार्जितकीर्तिकोशः । चिंतामणिः प्रणयिनां प्रणतो द्विज[जा]तेः [।] यो योषितां तनुधरोभिनवो मनोभू- र्भूषा भुवः समभव[त्सु]त इन्द[न्द्र]राजः ॥ [६] तेनाकारि हिमाचलेन्द्रश[स]दृशं भासां प्रभोर्भासुरं [।] धामेदं ध्वजकिङ्किणीकलमिलत्कोलाहलांलंकृतं ॥[१०] प्रतापगढ़ से प्राप्त कन्नौज के प्रतिहारवंशी राजा महेंद्रपाल (दूसरा) का शिला- लेख (एपिग्राफ़िया इण्डिका; जि० १४, पृ० १८४-५) । (१) संवत् ९९६ श्रावण सुदि १ समस्तराजावलिपूर्व्वमग्रे- (षे) ह महाराजाधिराजश्रीभर्तृपट्टः श्रीखोम्माणसुतः स्वमातृपित्रो- रात्मनश्च धर्म्माभिवृद्धये घोट्टावर्षीयैन्द्रराजादित्यदेवाय पलासकूपिकाग्रामे वंवूलिकोन्ना(ना)मकन्(च्छः) ......। वही; जि० १४, पृ० १८७ ।

  • भूगोल सम्बन्धी वर्णन - २३

देवी' का मन्दिर और मठ भी था । उक्त देवी के मंदिर को वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ ( ई० स० ६४६ ता० २ नवम्बर ) को कन्नौज के रघुवंशी प्रतिहार राजा महेंद्रपाल ( दूसरा ) ने, जिसके अधिकार में यह देश भी था, घोटासीं के निकट का 'खर्परपद्रक' ( खैरोट ) गांव भेंट किया था¹ । ये सूर्य और देवी के मंदिर तथा मठ कहां थे, इसका अब तक निश्चय नहीं हो सका । संभव है, जिसको आज-कल भैरूंजी का मंदिर कहते हैं, वही प्राचीन सूर्य का मंदिरों हो । यहां के मंदिर आदि के पत्थर दूर-दूर तक पहुंचे हैं । मोहकमपुरा की छत्रियों और चबूतरों में यहां के पत्थर ही लगे हुए हैं । नंदवाणा बोहरा नाथू ने वसाड़ के पास पोह की बावड़ी बनवाई, जिसमें भी यहीं के पत्थर लगे हैं। इसी प्रकार प्रतापगढ़ के दरवाज़े के बाहर अग्रवाल चैनराम ने जो बावड़ी बनवाई, उसमें भी यहीं के पत्थर लगे हैं । उनके साथ वि० सं० १००३ मार्गशीर्ष वदि ५ (ई० स० ६४६ ता० २ नवंबर) की उपर्युक्त रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल ( दूसरा ) के समय की


( १ ) ॰॰॰परममाहेश्वरो महाराजश्रीमहेन्द्रपालदेवः श्रीदशपुरपश्चिम- पथके तलवर्गिंगकहरिषडभुज्यमानखर्प्परपद्रकग्रामे घोट्टावर्षिकाप्रत्यासन्ने समुपगतान् सर्व्वांन्ने(नेव)यथास्थाननियुक्तान्प्रतिवासिनश्च समाज्ञापयत्यस्तु वः उपरलिखितग्रामः स्वसीमातृणप्रति[पूति]गोचरपर्यन्तो(न्तः)सर्व्वाद‌ाय- समेत आचन्द्रार्कक्षितिकालं पूर्व्वदत्तदेवब्रह्मदेयवर्ज्जितो 'मया पित्रोः पुन्या(ण्या)भिवृद्धये का[ह्नि]क्यां गंगायां स्नात्वा पुन्थे(ण्ये)हनि [ध]नशूर- प्रार्थनया श्रीदशपुरचातुर्वैद्यहरिर्षेश्वर(हर्षीश्वर)मठसंव(ब)ध्यमानश्रीवट- यक्षिणीदेव्यै शासनत्वेन प्रतिपादितः ( त इति) मत्वा भवद्भिः सा(स)- मनुमन्तव्यो(व्यः) प्रतिवासिजनपदैरप्याज्ञास्र(श्र)वणविधेयैर्भूत्वा यथा- दीयमानभागभोगकरहिरन्या(ण्या)दिकमस्योपनेतव्यमिति । श्रीजज्जनाग- प्रदत्तादेशात् । संवत्सो ( संवत्सरे ) १००३ मार्ग वदि ५ । पुरोहित- त्रिविक्रमात्ताच्च(नाथ) लिखितमिदम् । स्वहस्तोयं श्रीविदग्धस्य ।

वही; जि० १४, पृ० १८३-४ ।

२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास प्रशस्ति भी यहां से ले जाकर बावड़ी के पास एक चबूतरे में चुनी गई थी। उसको मैंने वहां से निकलवाकर राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित किया है' । 'वरमंडल' गांव के, जो घोटार्सी से दो मील दूर है, शिवालय के स्तम्भ आदि भी यहीं के हैं। उक्त मंदिर के बाहर एक चबूतरे पर सूर्य का एक-चक्र रथ जमा हुआ है, जो घोटार्सी के सूर्य मंदिर का ही रथ होना चाहिये । वहां ( वरमंडल ) के चबूतरे तथा मंदिर की दीवारों में जो बहुत से सुंदर खुदाईवाले पत्थर लगे हुए हैं, वे सब घोटार्सी से गये हैं । घोटार्सी में पहले कुछ जैन मंदिर भी थे । प्रतापगढ़ की संस्कृत पाठशाला के अध्यक्ष पंडित जगन्नाथ शास्त्री के परिश्रम से पार्श्वनाथ के मंदिर की प्रशस्ति का एक टुकड़ा अभी मिला है, जिसमें संवत् का भाग नहीं है, परन्तु दुर्लभराज का नाम² है, जिससे अनुमान होता है कि उक्त मन्दिर उपर्युक्त दुर्लभराज चौहान के समय बना होगा । वीरपुर—प्रतापगढ़ से लगभग दस मील दूर दक्षिण-पश्चिम में सुहांगपुर के समीप वीरपुर नामक गांव है। यहां एक टूटा हुआ जैन-मंदिर है। उसको लोग दो हज़ार वर्ष का प्राचीन बतलाते हैं, जो विश्वास के योग्य नहीं है, क्योंकि उसपर जो खुदाई का काम है, वह बारहवीं शताब्दी के पूर्व का नहीं है । पहले यह अच्छा क़सबा था, परन्तु अब तो भीलों और मीणों की थोड़ी सी बस्ती है। यहां दूर-दूर तक ईंटों के टुकड़े पड़े हुए मिलते हैं और खोदने पर बड़ी-बड़ी ईंटें तथा मिट्टी की नांदें मिलती हैं। यहां एक शिवालय भी है, जो पहले शिखर-सहित पत्थर का ही बना था, परन्तु शिखर तथा सभामंडप दोनों ही गिर गये हैं तथा नंदी के दो टुकड़े सभामंडप में पड़े हुए हैं। द्वार के ऊपर गणपति और उसके ऊपर नवग्रह की मूर्तियां बनी हैं । वि० सं० १६४१ ( ई० स० १५८४ ) में सुहागपुरे में दिगम्बर जैनमन्दिर बनने पर वीरपुर के प्राचीन जैनमंदिर ( १ ) राजपूताना म्यूज़ियम् ( अजमेर ) की ई० स० १९१३-१४ की रिपोर्ट; पृ० २ । ( २ ) मूललेख की छाप से ।

के स्तम्भ आदि ले जाकर वहां के मंदिर में लगा दिये गये । खेरोट—प्रतापगढ़ से लगभग ७ मील दूर दक्षिण-पूर्व में खेरोट नामक प्राचीन गांव है । संस्कृत लेखों में इसका नाम 'खर्परपद्रक' लिखा हुआ मिलता है । यह गांव रघुवंशी प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल (दूसरा) ने घोटार्सों गांव की 'वटयक्षिणीदेवी' के मंदिर को वि० सं० १००३ ( ई० स० ६४६ ) में भेंट किया था¹। खेरोट गांव में भी प्राचीनता के कई चिन्ह अब तक विद्यमान हैं, जिससे कहा जा सकता है कि पहले यह सुसंपन्न रहा होगा । अरणोद—प्रतापगढ़ से दक्षिण में ११ मील की दूरी पर अरणोद नाम का क़सबा है । इस समय यह क़सबा दूसरे नंबर पर है और महारावत के समीपी बांधवों का प्रमुख ठिकाना है । गांव के बाहिर पाठशाला के सामने की बावड़ी में शेषशायी विष्णु की सुंदर मूर्ति दीवार में चुनी हुई है। बाग के पास की बावड़ी में भी कई मूर्तियां और खुदाई के कामवाले पत्थर चुने हुए हैं, जिनमें से श्वेतांबर पार्श्वनाथ की खड़ी हुई मूर्ति बड़ी सुंदर है। भूतपूर्व महारावत रघुनाथसिंह अरणोद से ही जाकर प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हुआ था । वि० सं० १६५७ ( ई० स० १६०० ) में उक्त महारावत के द्वितीय महाराजकुमार गोवर्धनसिंह का जन्म होने पर अरणोद के ठिकाने पर उसको नियत किया गया, जो वहां का वर्तमान स्वामी है । अरणोद में पाठशाला और डाकखाना भी है । गौतमेश्वर—अरणोद से लगभग दो मील के अंतर पर गौतमेश्वर नामक तीर्थ है, जो प्रतापगढ़ राज्य में बड़ा पवित्र माना जाता है। यहां का गौतमेश्वर नामक शिवालय एक पहाड़ के नीचे के मध्य-भाग में बना है, जहां कुछ चौड़ाई आ गई है। मंदिर के ऊपर पहाड़ का अंश छज्जे की भांति है। गौतमेश्वर के मंदिर के पास और भी कई मंदिर हैं, जहां साधु लोग आकर ठहरते हैं। पहाड़ के ऊपर तालाब है, जिसका जल टपककर गौतमेश्वर ( १ ) देखो ऊपर पृष्ठ २३, टिप्पण संख्या १ । ४

२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास के सामने के कुंड में प्रपात के रूप में गिरता है । नीचे की तरफ बहुत गहराई में नदी बहती है । यहां का दृश्य बड़ा ही सुंदर है। प्रतिवर्ष वैशाख सुदि १५ को यहां बड़ा मेला लगता है और दूर-दूर से हज़ारों यात्री आकर मेले में सम्मिलित होते हैं। मंदिर के बाहर वि० सं० १५६२ आषाढ वदि १४ ( ई० स० १५०५ ता० १ जून) का शिलालेख है', जिससे पाया जाता है कि यह प्रदेश मांडू के सुलतान नासिरशाह के अधीन था और खानआलम मक़वलखां यहां का शासक था, जिसके समय में शाह, जैचंद ने यहां पर लगनेवाला यात्रियों का कर छुड़वाया । भचूंडला—प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग १६ मील की दूरी पर भचूंडला नामक प्राचीन गांव है, जिसकी बस्ती अब कम रह गई है। उसके बाहर युद्ध में काम आनेवाले वीरों के स्मारक स्तम्भ खड़े हुए हैं, जिनमें से एक पर वि० सं० १३३८ ( ई० स० १२८१.) का लेख है । इन स्तंभों से थोड़ी ही दूर पर एक प्राचीन मंदिर है, जो सारा पत्थरों से बना है । इस मंदिर के द्वार पर गरुड़ारूढ़ विष्णु की मूर्ति और भीतर की दीवार के सहारे मूर्ति की वेदी बनी है । आज-कल इसमें शिव-लिङ्ग है, परन्तु यह पहले विष्णु का मंदिर था । इस मंदिर के बहुतसे पत्थरों की खुदाई तथा स्तम्भ आदि बेमेल हैं, जिससे अनुमान होता है कि किसी अन्य मंदिर के पत्थर इस मंदिर के बनाने में काम में लाये गये हों। जो भी हो यह मंदिर १४ वीं शताब्दी के आस-पास का बना हुआ प्रतीत होता है और इसके अधिकांश पत्थर शेवना से लाये गये जान पड़ते हैं । नीनोर— प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग २४ मील की दूरी पर नीनोर नामक प्राचीन गांव है । यहां के दिगंबर जैन मंदिर के 'निजमंदिर का द्वार शेवना के शिव-मंदिर से लाकर खड़ा किया गया है। उसके मध्य में शिव और दोनों किनारों पर विष्णु और ब्रह्मा की मूर्तियां हैं । द्वार के दोनों पाश्र्वों में तीन-तीन स्त्री-पुरुषों की पास-पास खड़ी हुई मूर्तियां हैं । यहां का लक्ष्मीनारायण का मंदिर नागर ब्राह्मण गेमल और विश्वनाथ का ( १ ) देखो ऊपर पृ० २०, टिप्पण संख्या १ ।

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शेवना के प्राचीन शिवमंदिर का भीतरी भाग

भूगोल सम्बन्धी वर्णनः २७ बनवाया हुआ है, जिसमें वि० सं० १८२६ शक सं० १६६४ ज्येष्ठ वदि ५ (ई० स० १७७२ ता० २१ मई) गुरुवार का शिलालेख है। इस मंदिर का द्वार तथा स्तंभों के सिरे शेवना से लाकर लगाये गये हैं। गांव के बाहर पाषाण का बना हुआ एक छोटासा शिव-मंदिर तथा पद्मावती (देवी) का मंदिर है, जिनको वहां के नागर ब्राह्मणों ने बनवाया था। तालाब की पाल पर का शिव-मंदिर वि० सं० १८१६ (ई० स० १७६२) में महारावत सालिम- सिंह के समय नागर ब्राह्मण हरनाथ ने बनवाया था । गांव के आस-पास दूर-दूर तक पुरानी ईंटें निकलती हैं। पहले यहां विसनगरे नागरों की अच्छी बस्ती थी, परन्तु अब केवल १०-१५ घर रहे हैं। शेवना—प्रतापगढ़ से दक्षिण में लगभग २० मील की दूरी पर शेवना नामक गांव है, जो पहले संपन्न था । यह प्रसिद्ध है कि यहां शिवनगरी नामक राज्य की राजधानी थी । इसमें कितनी सत्यता है, यह कहा नहीं जा सकता, परन्तु इतना निश्चित है कि पहले यह नगर विशाल रहा होगा, क्योंकि इसके खंडहर दूर-दूर तक दृष्टिगोचर होते हैं । एक क़िले के अतिरिक्त यहां पर अब तक कई मंदिरों के भग्नावशेष विद्यमान हैं, जिनमें एक शिवालय बहुत सुन्दर है। यहां ज़मीन के भीतर बना हुआ महाकाल का पुराना मंदिर है। कई मूर्तियां इधर-उधर टूटी-फूटी दशा में मिलती हैं, जिनमें से त्रिविक्रम (वामन) की मूर्ति राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित है¹। यहां से कई मंदिरों के द्वार, स्तम्भ आदि लेजाकर अचूंडला, नीनोर आदि के मंदिर बनाये गये हैं। अब तो इसके आस-पास थोड़ीसी भीलों (मीणों) की बस्ती रह गई है। उपर्युक्त स्थानों के अतिरिक्त इस राज्य में बोरदिया, धमोतर, बमोतर, गयासपुर, सुहागपुर, बसाड़ आदि और भी कई प्राचीन स्थान हैं । उनमें से कई में मंदिरों आदि के चिन्ह पाये जाते हैं। गयासपुर मालवे के सुलतान गयासुद्दीन के नाम पर बसा हुआ है, जो पहले (१) राजपूताना म्यूज़ियम् (अजमेर) की ई० स० १६२२-२३ की रिपोर्ट; पृ० ५ ।

२८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास देवलिया (देवगढ़) परगने का मुख्य स्थान था । अब तो यह स्थान ऊजड़ होता जाता है और केवल थोड़ी सी वस्ती रह गई है। इसी प्रकार वसाड़ भी प्रतापगढ़ परगने का मुख्य स्थान था और उसके नाम पर यह वसाड़ का परगना कहलाता था। अब यहां (वसाड़) की वस्ती भी थोड़ी ही रह गई है। वसाड़ में ब्रह्मा की एक प्राचीन मूर्ति है, जो देखने योग्य है।

शेवना के प्राचीन देवी-मन्दिर का भीतरी भाग

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दूसरा अध्याय सीसोदियों से पूर्व के राजवंश

प्रतापगढ़ राज्य की गणना पहले मालवा के अन्तर्गत होती थी,
इसलिए वहां पर पहले मौर्य, मालव, क्षत्रप, गुप्त और हूणों का राज्य रहना
संभव है। अनन्तर प्रतापी राजा यशोधर्मन् और बैसवंशी राजा श्रीहर्ष ने
क्रमशः मालवे पर अधिकार कर लिया तब प्रतापगढ़ राज्य भी उनके अधि-
कार में चला गया होगा, किन्तु अब तक प्रतापगढ़ राज्य से उनका कोई
शिलालेख, ताम्रपत्र या सिक्का नहीं मिला है¹। श्रीहर्ष की मृत्यु के पीछे
कन्नौज के महाराज्य में अव्यवस्था फैल गई। ऐसे समय में भीनमाल के
रघुवंशी प्रतिहारों ने बढ़कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उस समय
मालवा भी प्रतिहारों के अधिकार में चला गया और वे वहां के स्वामी हुए।
प्रतापगढ़ राज्य के घोटार्सों (घोंटवार्षिका) नामक गांव के वि० सं० १००३
(ई० स० ९४६) के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (दूसरा) के समय के
शिलालेख से वहां रघुवंशी प्रतिहार नरेशों का राज्य रहना निश्चित है²।
इसलिए यहां पर उनका उल्लेख करना आवश्यक है।
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(१) उपर्युक्त वंशों के इतिहास के लिए देखो मेरा राजपूताने का इतिहास;
जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ६८-१६२।
(२) राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर की ई० स० १९१५-१६ की वार्षिक रिपोर्ट;
पृ० २। यह शिलालेख राजपूताना म्यूज़ियम् अजमेर में सुरक्षित है। मैंने इसका
'एपिग्राफ़िया इंडिका' (जि० १४ पृ० १७६-८८) में संपादन किया है। प्रतापगढ़ राज्य
से प्राप्त ऐतिहासिक सामग्री में वहां के प्राचीन इतिहास के लिए यह बड़ा उपयोगी है
एवं रघुवंशी प्रतिहारों का राजपूताने में राज्य होने का समुचित प्रमाण है।

३० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास रघुवंशी प्रतिहार 'प्रतिहार' नाम वंशकर्त्ता के नाम से चला हुआ नहीं, किन्तु राज्या- धिकार के पद से बना हुआ शब्द है। राज्य के भिन्न-भिन्न अधिकारियों में एक अधिकारी प्रतिहार होता था, जिसका काम राजा के बैठने के स्थान या रहने के महल के द्वार (ड्योढ़ी) पर रहकर उसकी रक्षा करना था। इस पद के लिए किसी खास जाति या वर्ण का विचार नहीं किया जाता था, प्रत्युत राजा के विश्वसनीय पुरुष ही इस पद पर नियत होते थे। इसी से प्राचीन शिलालेखादि में ब्राह्मण¹, गुर्जर² (गूजर), ( १ ) विप्रः श्रीहरिचन्द्राख्य ऽ पत्नी भद्रा च क्षत्(त्रि)या ।... तेन श्रीहरिचन्द्रेण परिणीता द्विजात्मजा । द्वितीया क्षत्(त्रि)या भद्रा महाकुलगुणान्विता ॥ प्रतीहारा द्विजा भूता ब्राह्मण्यां येभवन्सुताः । राज्ञी भद्रा च यान्सूते ते भूता मधुपायिनः ॥****** नन्दावल्लं प्रहत्वा रिपुबलमतुलं भूभ्रकूपप्रयातं दृष्ट्वा भग्नां(न्) स्वपक्षां(न्) द्विजनृपकुलजां(न्) सत्प्रतीहारभूपां(न्) मंडोर के राजा बाउक की वि० सं० ८६४ ( ई० स० ८३७ ) की प्रशस्ति । मेरा राजपूताने का इतिहास; जि० १ (द्वितीय संस्करण), पृ० १४-५, १६६ । ( २ )***परमभट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर श्रीक्षितिपालदेवपादानु- ध्यातपरमभट्टारकमहाराजाधिराजपरमेश्वर श्रीविजयपालदेवपादानामभिप्रव- र्द्धमानकल्याणविजयराज्ये संवत्सरशतेषु दशसु षोडशोत्तरकेषु माघमास- सितपक्षत्रयोदश्यां शनियुक्तायामेवं सं० १०१६ माघसुदि १३ शनावद्य श्रीराज्यपुरावस्थितो महाराजाधिराजपरमेश्वरश्रीमथनदेवो महाराजाधिराज- श्रीसावटसूनुर्गूज्जरप्रतिहारान्वयः कुशली । राजोरगढ़ (अलवर राज्य) से मिला हुआ गूजर प्रतिहारों का शिलालेख । एपिग्राफ़िया इंडिका; जि० ३, पृ० २६६ । नागरी प्रचारिणी पत्रिका; जिल्द ६ (वि० सं० १६८५), पृ० ३१६-७ । महामहोपाध्याय पं० दुर्गाप्रसाद (जयपुर); प्राचीन लेखमाला (प्रथम भाग); पृ० ५३-५।

सीसोदियों से पूर्व के राजवंश ३१ चावड़े¹, परमार², रघुवंशी³ आदि प्रतिहारों के उदाहरण मिलते हैं। विक्रम की आठवीं शताब्दी से रघुवंशी-प्रतिहारों का उत्कर्ष होने लगा और वे बड़े पराक्रम- (१) द्योणिकल्पतरुः समीकसुभ(ग)श्चापोत्कटग्रामणीः योगीन्द्रो नवचंद्रनिर्मलगुणः स्फूर्जत्कलानैपुणः ॥ श्रीचौलुक्यनरेन्द्रवेत्रितिलकः श्रीसोमराजः स्वयं विद्वन्मण्डलमंडनाय तनुते संगीतरत्नावलीम् ॥ ५ ॥ संगीत रत्नावली; ना० प्र० प०, जि० ६, पृ० ३१६ । (२) श्रीमदुत्पलराजादिवंशे प्रामारभूभुजां । अस्ति त्रैलोक्यविख्यातो धारावर्षो महीपतिः ॥ २ ॥ द्वास्थः तस्याभवत् पूर्वं वीरो वारडवंशजः । नरपा[लस]मुद्भूतो हरिपाल इति श्रुतः ॥ ३ ॥ पुत्रस्तस्यास्ति विख्यातो भुवने लब्धविक्रमः । श्रीमत्साहणपालाह्वः वैरिवर्गक्षयंकरः ॥ ४ ॥...... संवत् १२६४ वर्षे चैत्र शुदि १३ गुरौ । म० जालाकप्रेरितेन स्वश्रेयोर्थं प्रती० साहणपालेन देवश्रीवैद्यनाथस्य मंडपः कारितः ॥...। ईडर राज्य के वढाली गांव के वैद्यनाथ शिवालय की प्रशस्ति । पुरातत्व (गुजराती, अहमदाबाद); जि० ४, पृ० २८१ । 'वारड' परमारों की एक शाखा का नाम है और दांता के राणा 'वारड' शाखा के परमार हैं । (३) मन्विद्वाकुकुकुस्थ(त्स्थ)मूलपृथवः दमापालकल्पद्रुमाः ॥ २ ॥ तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रेषु घोरं रामः पौलस्त्यहिन्श्रं (हिंस्रं) क्षतविहितसमित्कर्म्म चक्रे पलाशैः । श्लाघ्यस्तस्यानुजोसौ मघवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये सौमित्रिस्तीव्रदण्डः प्रतिहरणविधेर्य्यः प्रतीहार आसीत् ॥३॥ कन्नौज के प्रतिहार राजा भोजदेव के समय की ग्वालियर की प्रशस्ति । ऐन्युअल रिपोर्ट ऑव् दि आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑव् इण्डिया, ई० स० १६०३-४; पृ० २८० । नागरी प्रचारिणी पत्रिका (नवीन संस्करण); भाग ६, पृ० ३१७ । मेरा राजपूताने का इतिहास; जिल्द १ (द्वितीय संस्करण), पृ० ७४ ।