रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
३३४ रसतरङ्गिणी रविमूलस्य चूर्णेन तण्डुलक्वथितेन वा । निपीतः सोरकः काममामवातं विनाशयेत् ॥ ४० ॥ विडाजमोदमिशिकाधात्रीचूर्णेन सोरकः । भक्षितो निम्बुनीरेण विदग्धाजीर्णकं जयेत् ॥ ४१ ॥ सोरकं द्रावयेत्तोये तेन सिञ्चेत्तु कर्गदम् । तद्धूमपानयोगेन श्वासस्त्व्राशु विनश्यति ॥ ४२ ॥ सुरानृसारकोपेतं सोरकं द्रावयेद् जले । तत्सिक्तवस्त्रं शीर्षस्थं प्रलापं ज्वरजं जयेत् ॥ ४३ ॥ ससितं सोरकं वारा गुञ्जापञ्चकसंमितम् । ज्वरदाहृतृषातैंस्तु रोगिभिः परिशीलितम् ॥ ४४ ॥ जनयेत्स्वेदमत्यर्थं मूत्ररोधञ्च नाशयेत् । दाहतृषादिकञ्चापि हत्वा कामं ज्वरं जयेत् ॥ ४५ ॥ सोरकं वटपर्णाञ्च संपिष्टन्तु शिलातले । बस्तिप्रदेशे लेपेन मूत्ररोधं विनाशयेत् ॥ ४६ ॥ कर्गदमिति मसीशोषणोपयुज्यमानं शुभ्रं कागदमित्यर्थः । स्पष्टमन्यत् ॥ ३८-४६ ॥ भा.टी.—भयंकर मूत्रकृच्छ्र और अश्मरी में सोरक को गोखुरु के क्वाथ के साथ सेवन करने से उक्त रोगों में मूत्र खुल कर आता है और अश्मरी गल कर निकलने लगती है । सोरे को फिटकरी-के साथ मिला कर जल अथवा अर्क सौंफ के साथ सेवन करने से आध्मान और मूत्रकृच्छ्र में आराम आता है । आमवात ( गठिया ) रोग में सोरे को आक की जड़ के चूर्ण के साथ अथवा चौलाई के क्वाथ के साथ प्रयोग करने से शीघ्र आराम आता है । विडलवण, अजमोद, सौंफ और आंवला चूर्ण के साथ निम्बूस्वरस अनुपान से सेवन करने पर विदग्धाजीर्ण नष्ट हो जाता है । सोरे को जल में घोल कर सान्द्र घोल बना लें, अब इससे कागज ( Blotting Paper ) को भिगोकर सुखा लें । अब इसकी सिगरेट बना कर इसका धूम्रपान करने से श्वास का दौरा शान्त होता है । शीर्षसांयुग्मज्वर या शीर्षावरण शोथज्वर ( Cerebro spinol fever or Meningilis ) में होनेवाले प्रलाप में सोरे और नौसादर के चूर्ण को सुरा में घोल कर इस द्रव में बारीक कपड़े को तर करके रोगी के सिर में रखने से प्रलाप शान्त हो जाता है । जब ज्वर में रोगी को अत्यन्त दाह और
चतुर्दशस्तरङ्गः ३३५ प्यास तथा बेचैनी गरमी मालूम पड़ती हो तो पाँच रत्ती सोरा और पाँच रत्ती खांड को मिला जल ( अथवा अर्क गाजवान ) के साथ देने से रोगी के शरीर में पर्याप्त मात्रा में पसीना आता है और मूत्र की रुकावट दूर होकर दाह तृष्णा आदि सब शान्त होकर ज्वर जाता है। सोरा और बड़ के पत्तों को एकत्र सिल पर पीस कर, इस कल्क को वस्ति प्रदेश (पेड़ू) में लेप करने से मूत्र की रुकावट दूर हो जाती है ॥ ३८-४६ ॥ अथ सोरकद्रावकस्य नामानि कथितः सोरकद्रावः सोरकद्रावकस्तथा । सोराद्रावश्च गदितो रसशास्त्रविशारदैः ॥ ४७ ॥ भा.टी.—सोरकद्राव, सोरकद्रावक, सोराद्राव, ये नाम रसशास्त्रज्ञों ने सोरकद्राव (Nitric acid) के बताये हैं ॥ ४७ ॥ सोरकद्रावस्य निर्माणप्रकारः विशोधिते सोरके तु सोरकस्यार्द्धभागिकम् । बलिद्रावन्तु निक्षिप्य काचकूप्यां निधापयेत् ॥ ४८ ॥ सुराप्रदीपे विन्यस्य नलिकां काचनिर्मिताम् । तोयस्थकाचघटिकालग्नां तस्यां निवेशयेत् ॥ ४९ ॥ पचेन्मन्दानलेनैव ततस्तिर्यङ् निपातितम् । सञ्चितं बाष्परूपेण तोयाभं द्रावकं हरेत् ॥ ५० ॥ अतितीक्ष्णतया आभ्यन्तरप्रयोगार्थं सोरकद्रावः सजलः कार्यः । स्पष्ट- मन्यत् ॥ ४८ ॥ भा.टी.—एक स्वच्छ कांच की शीशी में शुद्ध सोरा एक भाग डालकर उसी में सोरे से आधा भाग गन्धकद्राव डाल दें । अब कांचकूपी के मुख में एक कांच की नली जोड़ कर इस नली का दूसरा मुख एक दूसरी जल में रखी हुई कांच की शीशी या कूपी के मुख से जोड़ दें । अब सोरकवाली कांचकूपी को सुराप्रदीप के ऊपर त्रिपादिका पर रखकर मन्द-मन्द अग्नि से तपायें। इस प्रकार बाष्परूप से तिरछी नली से निकलकर दूसरी शीशी में इकट्ठे हुए जल सदृश सोरकद्रावक को सावधानी से लेवें। यह स्वच्छ वर्णरहित अम्लीय द्रव्य होता है ॥ ४८-५० ॥ सजलसोरकद्रावस्य निर्माणप्रकारः षड्भागसंमितं तत्र सोरकद्रावकं हरेत् । काचपात्रे निधायाथ क्षिपेत्तत्र शनैः शनैः ॥ ५१ ॥
३३६ | रसतरङ्गिणी परिश्रुतञ्च सलिलं पञ्चविंशतिभागिकम् । सजलः सोरकद्रावो जायते खलु शोभनः ॥ ५२ ॥ भा.टी.—एक साफ कांच के पात्र में छः भाग सोरकद्राव डाल कर उसके ऊपर धीरे-धीरे पच्चीस भाग शुद्ध परिश्रुत जल डालकर मिला लें । इस प्रकार उत्तम सजल (हल्का) सोरकद्राव तय्यार हो जाता है ॥५१-५२॥ सजलसोरकद्रावस्य गुणाः सोरकद्रावकः प्रोक्तो वह्निवीर्यः प्रदाहकः । विभिन्नदुष्टविक्ल्निन्नव्रणशोधनरोपणः ॥ ५३ ॥ फिरङ्गस्यादिमे घोरे व्रणे च परिशस्यते । सर्पकुक्कुरकादीनां विषदोषनिबर्हणः ॥ ५४ ॥ सोरकद्रावकगुणाः—वह्निवीर्यः दाहकत्वेन वह्निसमानः । फिरङ्गस्यादिमं व्रणं तृणाग्रेण परिस्पृष्टः हन्ति । विषदोषनिबर्हणः दाहकत्वाद् दंशस्थानस्य ॥५३-५४॥ भा.टी.—सोरकद्राव किसी स्थान ( शरीर प्रदेश ) में लगने पर अग्नि के समान प्रदाहक (जलानेवाला) है। अनेक प्रकार के खराब और बिगड़े हुए व्रणों को शुद्धकरने और भरने के काम में आता है । फिरंग के प्राथमिक भयंकर व्रण (पेट या मूत्रेन्द्रिय में बटन के समान कठोर व्रण ) को जलाने के लिये बहुत उत्तम द्रव्य है । इसी तरह के सर्पदंश, पागल कुत्ते के काटने पर उनके विषको जलाने या मारने के लिये यह सर्वोत्तम द्रव्य माना जाता है ॥ ५३-५४ ॥ सजलसोरकद्रावस्य गुणाः सोरकद्रावको बल्यो यकृद्दोषनिबर्हणः । वह्निमान्द्यहरः कामं मूत्रदोषनिषूदनः ॥ ५५ ॥ मधुमेहे प्लीहवृद्धौ चोपदांशिकविकृतौ । कामलायां पाण्डुरोगे विशेषेण प्रशस्यते ॥ ५६ ॥ विनाशयेच्चिरोद्भूतं कासं सातिकफोद्गमम् । अतीसारहरश्चैव पित्तघ्नश्च प्रकीर्तितः ॥ ५७ ॥ सजलसोरकद्रावः पानेन यकृद्दोषादीन् हन्ति । सातिकफोद्गमं अत्यन्तकफ- निर्गमयुक्तम् ॥ ५५-५७ ॥ भा.टी.—जलयुक्त (हल्का ) सोरकद्राव बलवर्धक और यकृत्दोष को दूर करनेवाला और अग्निमान्द्यहर है। इसके प्रयोग से मूत्र में होने वाली अनेक
प्रकार की विकृतियाँ दूर हो जाती हैं। यह द्राव विभिन्न अनुपान और द्रव्यांग से मधुमेह, प्लीहावृद्धि, उपदंशविकृति, कामला, पाण्डुरोग में विशेष रूप से लाभदायक होता है। अत्यन्त कफ निकलनेवाले पुराने कफ कास में भी लाभ करता है। इसके प्रयोग से अतीसार में लाभ होता है और पित्त शान्त होता है। सजल सोरकद्राव अग्निमान्द्यहर और यकृद्दोषनिवारक होने से पोषक रस उत्पन्न करता हुआ शरीर के लिये बल्य है। अथवा आमाशय के लिये बल्य है, यकृत्-उत्तेजक होने से यकृत्-दोष-निवारक है। परन्तु उक्त प्रभाव सजल- सोरकाम्ल का कुछ दिन लगातार प्रयोग करने पर समझना चाहिये ॥५५-५७॥ अस्य मात्रा आरभ्य शरबिन्दुभ्यस्त्रिशद्विन्दुमितं परम् । सजलं सोरकद्रावं नियुञ्जीत पलाम्बुना ॥ ५८ ॥ भा.टी.—सजल सोरकद्राव की पाँच बूंद से लेकर तीस बूंद तक एक पल ( आठ तोला ) जल में मिला प्रयोग करना चाहिये ॥ ५८ ॥ अथ सामान्येन क्षारनिर्माणप्रकारः क्षारवृक्षस्य काष्ठानि दग्ध्वा भूतिं समाहरेत् । विमले भाजने न्यस्य सलिलन्तु चतुर्गुणम् ॥ ५६ ॥ प्रक्षिप्य मर्दयेत्सम्यक् याममात्रं भिषग्वरः । त्रिगुणीकृतवस्त्रेण स्त्रावयेत्सलिलं ततः ॥ ६० ॥ स्रावितं सलिलञ्चाथ वह्नौ सन्तापयेत्ततः । निःशेषं सलिलं ज्ञात्वा निर्मलत्क्षारमाहरेत् ॥ ६१ ॥ क्षारनिर्माणप्रकारः—काष्ठानि इत्युपलक्षणम् । यवक्षारार्दौ शूकादीनामपि क्वचित् पञ्चाङ्गमपि दह्यते, अत्र तु पलाशक्षारादिनिर्माणे तत्काष्ठस्यैव प्रयोग इति काष्ठानीत्युक्तम् । स्रावितसलिलस्य कटाह् जलीयांशशोषणार्थं निक्षेपः । व्याख्या- समानमन्यत् ॥ ५६-६१ ॥ भा. टी.—जिस वृक्ष या वनस्पति का क्षार बनाना हो उसकी लकड़ियां जलाकर राख बना लें। अब इस राख को एक बड़े पात्र में डालकर उसमें राख से चतुर्गुण जल डाल दें और तीन घंटे तक इसको हाथों से अच्छी तरह मसलें अथवा किसी चीज से घोटें, फिर इसको तीन तहवाले वस्त्र से छान लें। इस छुने हुए साफ जल को एक स्वच्छ लोहे की कड़ाही में डालकर अग्नि में पकायें। जलीयांश सूखने पर पात्रतल में चूर्ण रूप में लगे हुए साफ़ क्षार को खुरचकर निकाल लें ॥ ५६-६१ ॥
३३८ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—क्षार, लकड़ियों के अतिरिक्त डंठलों और पुष्पों या पञ्चांग- युक्त वनस्पतियों के भी बनाये जाते हैं। जैसे तिल और जौ की डंठलों का, ताड़ और नारियल के पुष्पों का, अपामार्ग आदि के पञ्चांग का क्षार बनाया जाता है। यहाँ पर 'काष्ठ' शब्द साधारण अथवा उपलक्षण समझना चाहिये। क्षारनिर्माण में कहीं राख से आठ गुना जल लेने को भी कहा जाता है, कोई क्षारजल को इक्कीस बार वस्त्र से छानने को कहते हैं। और कई वैद्य राख में चतुर्गुणजल डालकर खूब मसलकर इसको बारह या चौबीस घंटे निश्चलरूप में रखने के बाद ऊपर आये हुए स्वच्छ जल को छानकर पकाने को कहते हैं। सारांश यह है कि छानने में जितना ही अधिक सावधानी स्वच्छ जल के विषय में की जायगी उतना ही स्वच्छ और सफेद वर्ण का क्षार प्राप्त होगा। सामान्येन क्षाराणां गुणाः क्षारास्तीक्ष्णा महोष्णाश्च दाहकर्मकराः परम्। गुल्मार्शोग्रहणीप्लीहमूत्रकृच्छ्राश्मरीहराः ॥ ६२ ॥ कृमिघ्नाः पाचनाश्र्चैव दारणाश्च विसर्पिणः। शोधना रोपणाश्चैव मूत्रलाश्र्च प्रकीर्तिताः ॥ ६३ ॥ सामान्यतः क्षारगुणवर्णनम्—दारणाः विद्रध्यादेः, विसर्पिणो व्याप्तिशीलाः ॥ ६२, ६३ ॥ भा.टी.—प्रायः सभी क्षार सामान्यतः तीक्ष्ण, अत्यन्त उष्णवीर्य और कोमल त्वचा, मांस तथा कलाओं को जलानेवाले होते हैं। क्षार से गुल्म, अर्श, ग्रहणीरोग, प्लीहावृद्धि, मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरीरोग नष्ट होते हैं। इनके प्रयोग से उदरकृमि तथा बाह्य दोनों प्रकार के कृमि नष्ट होते हैं। अन्तःप्रयोग में इनसे पाचक रस अधिक उत्पन्न होता है। बाह्य प्रयोग में इनसे व्रणशोथ पक जाता है। यह व्रण विद्रधि आदि में लगाने से वे फट जाते हैं। क्षार विसर्पी अर्थात् व्रणों को शुद्ध करने और उनको भरने के कार्य में भी आते हैं। उनके सेवन से वृक्कक्रिया उत्तेजित होने से मूत्र अधिक आता है, अतः क्षार मूत्रल भी होते हैं ॥ ६२, ६३ ॥ सामान्येन क्षाराणां मात्रा द्विगुञ्जातः समारभ्य रक्तिकाष्टकसंमितान्। क्षारास्तु विनियुंजीत साधारणतया भिषक् ॥ ६४ ॥
चतुर्दशस्तरङ्गः ३३६ सामान्यतः द्विगुञ्जतः समारभ्य माषकं यावन्मात्रा ॥ ६४ ॥ भा.टी.—साधारणतः अन्तःप्रयोग में क्षारों को दो रत्ती प्रमाण से लेकर आठ रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग किया जाता है ॥ ६४ ॥ अथ अपामार्गक्षारस्य नामानि अपामार्गक्षार उक्तो मयूरक्षारकस्तथा । खरमञ्जरिकाक्षारः किणि क्षारश्च कीर्तितः ॥ ६५ ॥ अपामार्गक्षार, मयूरक्षार, खरमञ्जरिकाक्षार और किणि क्षार ये नाम अपा- मार्ग क्षार के हैं ॥ ६५ ॥ वक्तव्य—अपामार्गक्षार बनाने में अपामार्ग के पञ्चाङ्ग को लेकर सुखा लेना चाहिये । इसको लेने के लिये आश्विन या कार्तिक मास अच्छे रहते हैं । इन दिनों अपामार्ग में पत्र-पुष्पादि सब अङ्ग उपस्थित होते हैं । अस्य गुणाः खरमञ्जरिकाक्षारस्तीक्ष्णः श्वासनिवर्हणः । गुल्मशूलादिरोगघ्नः कामं बाधिर्यनाशनः ॥ ६६ ॥ भा.टी.—अपामार्ग का क्षार तीक्ष्णगुण होता है। यह विशेषतः श्वास रोग को दूर करता है, इसके अतिरिक्त गुल्म शूल आदि रोगों को नष्ट करता है । कान के बहरेपन को दूर करने के लिए इसको अनेक तैल आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है ॥ ६६ ॥ अपामार्गक्षारस्य आमयिकः प्रयोगः मयूरक्षारकः कामं मधुना परिशीलितः । विनाशयेच्चिरोद्भूतं श्वासं परमदारुणम् ॥ ६७ ॥ खरमञ्जरिकाक्षारचूर्णेन परिसाधितम् । तैलं कर्णे निषेकेण बाधिर्यं त्वाशु नाशयेत् ॥ ६८ ॥ सत्र्यूषणः किणि क्षारो यवानीचूर्णसंयुतः । निहन्ति शूलं त्वचिरादाध्मानञ्चातिदारुणम् ॥ ६९ ॥ खरमञ्जरिकाक्षारः सतालः परिलेपनात् । लिङ्गार्शसं निहन्त्याशु चिरोद्भूतं सुदारुणम् ॥ ७० ॥ अपामार्गक्षारचूर्णं सशिलं परिलेपितम् । गोमूत्रेणाचिरेणैव श्वित्रकुष्ठं विनाशयेत् ॥ ७१ ॥
।३४०। रसतरङ्गिणी अपामार्गक्षारचूर्णैर्यवाग्रजसमन्वितम् । शीलितं नाशयेदाशु मूत्रकृच्छ्रं तथाश्मरीम् ॥ ७२ ॥ खरमञ्जरिकाक्षारः सव्योषश्च ससैन्धवः । शीलितो नाशयेद् गुल्मं प्लीहानञ्चातिदारुणम् ॥ ७३ ॥ अपामार्गक्षारः क्षारसामान्यपरिभाषया निर्मितः । मयूरोऽपामार्गः खरमञ्ज- रिका किणिरिति पर्यायाः । सतालः हरितालयुक्तः । सशिलं मनःशिलायुक्तम् । यवाग्रजो यवक्षारः ॥ ६७–७३ ॥ भा.टी.—अपामार्गक्षार को उचित मात्रा में लेकर मधु के साथ कुछ दिन सेवन करने से भयंकर श्वास रोग में आराम आता है । अपामार्गक्षार का कल्क एक पाव, तिलतैल एक सेर और जल चार सेर, इन सब को एकत्र कर तैलपाक विधि से तैल तैयार करके कान में कुछ दिन लगातार प्रयोग से ( डालने से ) बहरापन दूर हो जाता है । अपामार्गक्षार में सोंठ, मिर्च, पीपल तथा अजवाइन का समभाग चूर्ण मिला गरम जल से सेवन करने पर शीघ्र ही उदर का शूल तथा भयंकर आध्मान रोग में आराम आता है। पुराने लिंगार्श को काटने या गलाने के लिये अपामार्गक्षार में समभाग हरताल मिला कर जल से लिंगार्श पर लेप करने से वे सब कट जाते हैं । सफेद कोढ़ में अपामा- र्गक्षारचूर्ण को समभाग मैनसिल में मिला गोमूत्र से लेप करने से वह कुछ दिनों में अच्छा हो जाता है । मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरी में अपामार्गक्षार को जवा- खार में मिलाकर शीतल जल से सेवन किया जाता है । अपामार्गक्षार को सोंठ, मिर्च, पीपल तथा सैन्धानमकचूर्ण में मिलाकर उचित अनुपान से प्रयोग करने पर भयंकर गुल्म तथा प्लीहा रोग में आराम आता है ॥ ६७-७३ ॥ अथ अर्कक्षारस्य नामानि अर्कक्षारो रविक्षारो भास्करक्षारकस्तथा । खज्जूर्घ्नक्षारकश्चाथ मित्रक्षारश्च कीर्तितः ॥७४॥ अर्कक्षार, रविक्षार, भास्करक्षारक, खज्जूर्घ्न और मित्रक्षार, ये सब नाम अर्क ( आक, मदार ) क्षार के कहे जाते हैं ॥ ७४ ॥ अर्कक्षारस्य गुणाः अर्कक्षारः स्मृतस्तीक्ष्णो गुल्मप्लीहादिनाशनः । पाचनो दीपनश्चापि कासश्वासप्रणाशनः ॥७५॥
चतुर्दशस्तरङ्गः ३४१ भा.टी.—अर्कक्षार तीक्ष्णगुण तथा अंतःप्रयोग में गुल्म प्लीहा आदि रोग नाशक, पाचक, रस-उत्पादक, अग्निवर्द्धक तथा श्वास-कास रोग को नष्ट करता है ॥ ७५ ॥ अर्कक्षारस्य आमयिकः प्रयोगः अर्कक्षारः सलवणो नरसारसमन्वितः । अजीर्णे नाशयेदाशु जाठराग्निश्च दीपयेत् ॥७६॥ ससैन्धवं त्वर्कपत्रं त्वन्तर्धूमं दहेद्भिषक् । क्षारः समस्तुना पीतो गुल्मप्लीहोदराञ्जयेत् ॥७७॥ सत्र्यूषणो रविक्षारो मधुना परिशीलितः । विनाशयेद्विशेषेण कासं श्वासञ्च दारुणम् ॥७८॥ मित्रक्षारः सलवणो यावशूकजसंयुतः । शीलितो ह्यचिरादेव यकृद्वृद्धिहरो मतः ॥७६॥ ससैन्धवन्त्वर्कपत्रमित्यर्कलवणनाम्ना वक्ष्यते प्रयोगः ॥ ७६–७६ ॥ भा.टी.—आक के क्षार में समभाग सैन्धानमक तथा नौसादरचूर्ण मिला कर गरम जल अथवा अर्क सौंफ आदि से सेवन करने से अजीर्ण नष्ट होकर पाचक अग्नि की वृद्धि होती है । आक में पत्रों के समभाग सैन्धानमक दोनों को एकत्र मिलाकर हाँडी में बन्द करके अन्तर्धूम रूप से पुट में फूक दें । इस प्रकार प्राप्त कृष्णवर्ण के क्षार को दही के जल के साथ सेवन करने से गुल्म, प्लीहा आदि उदररोग नष्ट होते हैं । अर्कक्षार में सोंठ, मिर्च तथा पिप्पलीचूर्ण मिलाकर मधु से चटाने पर भयंकर श्वास, कास रोग में विशेष रूप से आराम आता है । अर्कक्षार, सैन्धानमक तथा जवाखार तीनों को समभाग में लेकर एकत्र उचित अनुपान, घीकुआर के रसादि से सेवन कराने पर यकृत्-वृद्धि नष्ट हो जाती है ॥ ७६–७६ ॥ अथ तिलक्षारस्य नामानि तिलक्षारः समाख्यातस्तिलभूतिस्तथैव च । होमधान्यविभूतिश्च पवित्रक्षारकस्तथा ॥८०॥ भा.टी.—तिलों के डंठल सहित पञ्चांग की राख के क्षार को तिलक्षार, तिलभूति, होमधान्यभूति, पवित्रक्षारक इन नामों से ग्रहण किया जाता है॥८०॥ तिलक्षारस्य गुणाः तिलक्षारः स्मृतस्तीक्ष्णो मूत्ररोधनिबर्हणः । अश्मरीनाशनश्चैव प्लीहघ्नो व्रणदारणः ॥८१॥
३४२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—तिलक्षार तीक्ष्ण होता है और मूत्र की रुकावट या कमी को दूर करता है । अश्मरी को गलाने में यह अच्छा कार्य करता है । प्लीहावृद्धि को हटाता है और व्रणशोथ को फोड़ने का काम करता है ॥ ८१ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सत्र्यूषणस्तिलक्षारः सैन्धवेन समन्वितः । शीलितो ह्यचिरादेव जाठराग्निप्रदीपनः ॥८२॥ अङ्कोलक्षारसंयुक्तस्तिलक्षारस्तु शीलितः । मधुनाऽन्ते तोयपानान्मूत्ररोधं विनाशयेत् ॥८३॥ तिलक्षारः सयवजः शीलितो निम्बुकाम्बुना । वृक्कशूलं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥८४॥ तिलक्षारः सयवजः कदलीक्षारमिश्रितः । शीलितो मधुना काममश्मरीमाशु नाशयेत् ॥८५॥ तिलभूतिर्माषमिता रुचकेन समन्विता । तक्रेण मधुना वापि शीलित। त्वश्मरीं जयेत् ॥८६॥ होमधान्यविभूतिस्तु धात्रीक्षारसमन्विता । गोक्षुरक्वाथसंयुक्ता नाशयेन्मूत्रशर्कराम् ॥८७॥ पवित्रक्षारचूर्णन्तु यवजेन प्रलेपितम् । व्रणशोथे करोत्याशु दारणं परमोत्तमम् ॥८८॥ होमधान्यविभूतिस्तु शीलिता माषकोन्मिता । मासाशनभवाजीर्णनाशिनी परिकीर्तिता ॥८६॥ शरपुङ्खक्षारयुतस्तिलक्षारस्तु शीलितः । माषकप्रमितं तूर्णं गुल्ममुन्मूलयेद्भृशम् ॥६०॥ तिलक्षारः अश्मरीनाशनो विशेषात् । अङ्कोलक्षारेण तदाख्यवृक्षभस्मना, होमधान्यविभूतिः तिलक्षारः । पवित्रक्षारोऽपि तिलक्षार एव ॥ ८२–६० ॥ भा.टी.—साँठ, मिर्च, पिप्पली तथा सैन्धानमकचूर्ण के साथ तिलक्षार मिलाकर सेवन करने से जठराग्नि तेज हो जाती है । मूत्ररोध (मूत्र की रुकावट) में तिलक्षार को अंकोल ( ढेरा ) क्षार में मिलाकर मधु से चटायें और थोड़ी देर में शीतलजल पिलायें तो मूत्ररोध हट जाता है । अर्थात् मूत्र खुलकर आने लगता है । तिलक्षार और जवाखार दोनों को समभाग में लेकर निम्बूस्वरस से
चतुर्दशस्तरङ्गः ३४३ सेवन करने पर वृक्कशूल शीघ्र नष्ट हो जाता है । तिलक्षार को जवाखार तथा कदलीक्षार में मिला शहद से कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से शीघ्र ही अश्मरी गलकर निकल जाती है । एक मासा तिलक्षार और एक मासा विडनमक दोनों को एकत्र करके तक्रानुपान या मधु सहपान से सेवन करने पर अश्मरी नष्ट होती है । तिलक्षार को आंवलाक्षार में मिला कर गोखुरुकषाय अनुपान से सेवन करने से मूत्र में आनेवाली शर्करा बन्द हो जाती है । तिलक्षार को जवाखार में मिलाकर जल से व्रणशोथ पर लेप करने से शीघ्र ही वह फट जाता है । यदि मांस अधिक खाने से अजीर्ण हो गया हो तो एक मासा मात्रा में तिलक्षार को जल से अथवा सहंजने के स्वरस से खिलाने पर वह अजीर्ण नष्ट हो जाता है । सरपोंका के क्षार में तिलक्षार एक मासा मात्रा में मिला गरम जल अथवा गुल्महर द्रव्यों के कषाय से सेवन करने पर गुल्मरोग शीघ्र ही समूल नष्ट हो जाता है ॥ ८२-६० ॥ अथ स्नुहीक्षारस्य नामानि स्नुहिक्षारः स्नुहीक्षारः स्नुक्क्षारश्च तथा मतः । वज्रक्षारोऽथ सेहुण्डक्षारश्च परिकीर्तितः ॥ ६१ ॥ भा.टी.—स्नुहिक्षार, स्नुहीक्षार, स्नुक्क्षार, वज्रक्षार, सेहुण्डक्षार, ये सब नाम सेहुड़ क्षार के कहे जाते हैं ॥ ६१ ॥ अस्य गुणाः स्नुहीक्षारः स्मृतस्तीक्ष्णः सर्वोदरविनाशनः । गुल्मप्रशमनो वह्निदीपनः शोफनाशनः ॥ ६२ ॥ विषूचिकाहरोऽजीर्णनाशनः शूलसूदनः । यकृद्दाषप्रशमनः श्वासातङ्कप्रभञ्जनः ॥ ६३ ॥ भा.टी.—सेहुड़ का क्षार तीक्ष्ण और सब उदररोगनाशक है । इसके प्रयोग से गुल्म शान्त होता है,अग्नि दीप्त होती है और यकृत् अथवा जलोदर के कारण होनेवाला शोथ नष्ट होता है । विसूचिका, अजीर्ण तथा उदरशूल को नष्ट करता है, यकृत्दोष को मिटाता है और श्वास रोग को समूल नष्ट करता है ॥ ६२,६३ ॥ अस्य ग्रामयिकः प्रयोगः स्नुहिक्षारः शङ्खभूतिः सर्जिका यवजान्वितः । विषूचिकां निहन्त्याशु त्वजीर्णञ्चातिदारुणम् ॥ ६४ ॥ चिरोत्थितानां गुल्मानां पञ्चानां पञ्चतां नयेत् । ग्रहणीं नाशयेदाशु तथा शूलञ्च दारुणम् ॥ ६५ ॥
३४४ रसतरङ्गिणी स्नुहिक्षारस्त्रिलवणः क्षारत्रिकसमन्वितः । निहन्ति शोफप्लीहानमुदराणि च नाशयेत् ॥ ६६ ॥ सत्र्यूषणः स्नुहीक्षारो मधुना परिशीलितः । नाशयेदचिरादेव श्वासं परमदारुणम् ॥ ६७ ॥ स्नुहीक्षारो वरोपेतः सैन्धवाग्निसमन्वितः । निहन्ति वह्निमान्द्यं तु यकृत्प्लीहोदराणि च ॥ ६८ ॥ स्नुहीक्षारो विशेषात् शोकोदरहरः । शङ्खभूतिः शङ्खभस्म । गुल्मानां पञ्चानां पञ्चविधानां गुल्मानां पञ्चतां विनाशमित्यर्थः । वरा त्रिफला ॥ ६४-६८ ॥ भा.टी.—सेहुड़ का क्षार, शंखभस्म, सज्जीखार तथा जवाखार को मिला प्रयोग करने से विसूचिका तथा अतिभयंकर अजीर्ण में शीघ्र आराम आता है। इसी योग से पाँचों प्रकार के पुराने गुल्म, ग्रहणी रोग तथा भयंकर उदरशूल शीघ्र ही शान्त होते हैं। सेहुड़क्षार में सैन्धानमक, सौंचरनमक तथा विडनमक जवाखार, सज्जीखार और टंकणक्षार मिलाकर कुछ काल सेवन करने से शोथ, प्लीहावृद्धि तथा उदररोग नष्ट हो जाते हैं। सेहुड़ के क्षार को सोंठ, मिर्च, तथा पिप्पलीचूर्ण में मिलाकर शहद से चाटने से कुछ समय में भयंकर श्वास रोग नष्ट हो जाता है। सेहुड़ के क्षार में त्रिफलाचूर्ण, सैन्धानमक तथा चित्रक- मूलचूर्ण मिलाकर सेवन करने से अग्निमान्द्य, यकृत् तथा प्लीहा रोगों में आराम आता है ॥ ६४-६८ ॥ अथ पलाशक्षारस्य नामानि पलाशक्षारकश्चैव किंशुकक्षारकस्तथा । पर्णक्षारश्च कथितस्त्रिपर्णक्षारकस्तथा ॥ ९६ ॥ भा.टी.—पलाशक्षार, किंशुकक्षार, पर्णक्षार और त्रिपर्णक्षार, ये सब नाम पलाश (ढाक) क्षार के कहे जाते हैं ॥ ६६ ॥ अस्य गुणाः पर्णक्षारोऽग्निजननो गुल्मप्लीहादिनाशनः । यकृद्वृद्धिप्रशमनो मूत्रकृच्छ्राश्मरीहरः ॥ १०० ॥ पलाशक्षारो गुल्मघ्नी शुक्रशोधनश्चापि ॥ १०० ॥ भा.टी.—पलाश क्षार सेवन करने पर क्षुधावृद्धि करता है और गुल्म, प्लीहा आदि रोगों को नष्ट करता है। इसके प्रयोग से यकृत्वृद्धि दूर हो जाती है और मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरी रोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ १०० ॥
चतुर्दशस्तरङ्गः ३४५ अस्य आमयिकः प्रयोगः पर्णाक्षारस्तु मधुना कणाचूर्णसमन्वितः । वह्निदीप्तिकरः कामं गुल्मप्लीहोदरापहः ॥ १०१ ॥ पलाशक्षारसलिलैर्गव्यमाज्यं विपाचितम् । शीलितं नाशयत्याशु रक्तगुल्मं सुदारुणम् ॥ १०२ ॥ कदलीक्षारसंयुक्तः पर्णाक्षारस्तु शीलितः । अश्मरीं नाशयत्याशु दारुणां मूत्रशर्कराम् ॥ १०३ ॥ किंशुकक्षारतोयेन घृतं गव्यं विपाचितम् । निहन्ति शुक्रदोषन्तु ग्रन्थिभूताभिधं द्रुतम् ॥ १०४ ॥ यवक्षाररजोयुक्तः क्षारः खलु पलाशजः । निषेवितो निहन्त्याशु प्लीहानमतिदारुणम् ॥ १०५ ॥ मयूरक्षारसंयुक्तः पर्णाक्षारस्तु शीलितः । अग्रमांसं सुकठिनीभूतं प्रशमयत्यलम् ॥ १०६ ॥ अग्रमांसं उदरोध्वर्भागमध्यवर्तिमांसवृद्धिरूपरोगविशेषम् ॥ १०१-१०६ ॥ भा.टी.—पलाशक्षार और पिप्पलीचूर्ण को मधु में मिलाकर सेवन करने से क्षुधावृद्धि होती है और गुल्म, प्लीहोदर शान्त होते हैं। पलाशक्षार के जल से गोघृत को स्नेहपाकविधि से सिद्ध करके नियमपूर्वक सेवन करने से स्त्री का रक्त- गुल्म नष्ट हो जाता है। ढाक के क्षार में कदली (केला) क्षार मिला कर उचित अनुपान से सेवन करने पर अश्मरी (पथरी) तथा भयंकर मूत्रशर्करा नष्ट हो जाती है। पलाशक्षार के जल से गोघृत को स्नेहपाकविधि के अनुसार सिद्ध करके सेवन करने से शुक्र धातु की सब विकृतियाँ विशेषतः उसका ग्रन्थि- दोष (सुश्रुतोक्त) दूर हो जाता है। पलाशक्षार और जवाखार को मिला कर कुमारीस्वरस से कुछ काल सेवन करने से अत्यन्त बढ़ी हुई प्लीहा भी शीघ्र शांत हो जाती है। पलाशक्षार को अपामार्गक्षार से मिलाकर सेवन करने से शरीर में किसी स्थान पर बढ़े हुए कठिन मांस (अग्रमांस) में आराम आता है ॥ १०१-१०६ ॥ अथ चिञ्चाक्षारस्य नामानि चिञ्चाक्षारोऽम्लिकाक्षारश्चिञ्चिकाक्षारकस्तथा । आम्लीकाक्षारकश्चैव चिञ्चाभूतिश्च कथ्यते ॥ १०७ ॥
३४६ रसतरङ्गिणी चिञ्चिकाभसितञ्चैव चिञ्चाभस्म तथैव च । अम्लिकाभसितञ्चापि तिन्तिडीभसितं तथा ॥ १०८ ॥ चिञ्चाक्षार, अम्लिकाक्षार, चिञ्चिकाक्षार, अम्लीकाक्षार, चिञ्चाभूति, चिञ्चिकाभसित, चिञ्चाभस्म, अम्लिकाभसित तथा तिन्तिडीभसित, ये सब नाम इमलीक्षार के कहे जाते हैं ॥ १०७, १०८ ॥ अस्य गुणाः अम्लिकाक्षारकः प्रोक्तो वह्निमान्द्यविनाशनः । शूलगुल्महरश्चापि मूत्रकृच्छ्राश्मरीहरः ॥ १०६ ॥ अम्लिकाक्षारकः विशेषतोऽग्निमान्द्यहरः ॥ १०६ ॥ भा.टी.— इमली का क्षार अग्निमान्द्य को नष्ट करता है, गुल्म तथा शूल में आराम पहुँचाता है और मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरी को दूर करता है ॥१०६॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः स्नुगर्कक्षारसहितो मृतशङ्खसमन्वितः । चिञ्चाक्षारोऽशनादाशु नाशयेत्तु विषूचिकाम् ॥ ११० ॥ शूलमुन्मूलयेत्कामं वह्निमान्द्यविनाशनः । अजीर्णं क्षपयत्येव गुल्मबाधां विशेषतः ॥ १११ ॥ पटुपञ्चकसंयुक्तो जरणत्र्यूषणान्वितः । शीलितस्त्वम्लिकाक्षारो हरेद् ग्रहणीकारुजम् ॥ ११२ ॥ अरोचकं निहन्त्याशु तथा शूलं सुदारुणम् । आध्मानं पक्तिशूलञ्च विष्टब्धाजीर्णकं तथा ॥ ११३ ॥ चिञ्चिकाभसितं द्राक्षाशर्कराभ्यां समन्वितम् । अवलीढं विशेषेण तन्नरोचकहरं परम् ॥ ११४ ॥ अम्लिकाभसितं व्योषचूर्णेन परिशीलितम् । वह्निमान्द्यं निहन्याशु वाताजीर्णञ्च दारुणम् ॥ ११५ ॥ चिञ्चाक्षारः समरिचः शङ्खभूतिसमन्वितः । अतिसारे ग्रहण्याञ्च शिशूनान्तु प्रशस्यते ॥ ११६ ॥ रोगप्रयोगपाठे स्नुगर्कक्षारसहितः स्नुहीक्षारार्कक्षाराभ्यां सहितः । पटुपञ्चकं लवणपञ्चकम् ॥ ११०–११६ ॥ भा.टी.— इमलीक्षार में थोहरक्षार, आकक्षार, शंखभस्म मिलाकर अर्क अजवाइन या पलाण्डुस्वरस से देने पर विसूचिका में शीघ्र ही आराम
चतुर्दशस्तरङ्गः ३४७ आता है। इसी तरह इस योग से शूल, अग्निमान्द्य, अजीर्ण तथा गुल्मरोग में भी आराम आता है। इमली के क्षार में पाँचों नमक, जीरा सफेद, सोंठ, मिर्च, पीपलचूर्ण मिलाकर ग्रहणीहर द्रव्यों के कषाय आदि के अनुपान से सेवन करने पर ग्रहणीरोग, अरुचि, भयंकर उदरशूल, उदराध्मान, परिणामशूल, विष्टब्धाजीर्ण रोगों में बहुत लाभ होता है। अन्न में अरुचि को दूर करने के लिये इमलीक्षार को मुनक्का और खाँड़ की चटनी मिलाकर चटाया जाता है। इमलीक्षार को सोंठ, मिर्च, पिप्पलीचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र ही अग्निमान्द्य और भयंकर वाताजीर्ण रोग में लाभ होता है। छोटे-छोटे बालकों के अतीसार तथा ग्रहणी में इमलीक्षार में काली मिर्च और शंखभस्म मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र ही लाभ होता है ॥ ११०-११६ ॥ अथ सैन्धवस्य नामानि सैन्धवः सिन्धुलवणं सिन्धूत्थं सिन्धुदेशजम् । सिन्धूपलं सिन्धुभवं सैन्धवं सिन्धुमन्थजम् ॥ ११७ ॥ शोतशीवं शीतशिवं नादेयञ्च शिलीत्मकम् । शिवं सितशिवञ्चैव वशिरञ्च निगद्यते ॥ ११८ ॥ भा.टी.-सैन्धव, सिन्धुलवण, सिन्धूत्थ, सिन्धुदेशज, सिन्धूपल, सिन्धुभव, सैन्धव,सिन्धुमन्थज, शीतशीव, शीतशिव, नादेय, शिलात्मक, शिव, सितशिव और वशिर; ये सब नाम सैन्धानमक के कहे जाते हैं ॥ ११७, ११८ ॥ अस्य गुणाः सैन्धवं लवणं हृद्यं वृष्यं नेत्र्यं रुचिप्रदम् । पाचनं दीपनञ्चैव त्रिदोषशमनं परम् ॥ ११९ ॥ व्रणदोषहरं शीतं स्निग्धं लघु विबन्धजित् । मृदुवीर्यं पित्तहरं विबुधैः परिकीर्तितम् ॥ १२० ॥ भा.टी.-- सैन्धानमक अन्य लवणों की अपेक्षा स्वादिष्ट होता है अथवा हृदय के लिए लाभदायक है। इसके प्रयोग से शरीर में धातुओं की पुष्टि होती है। यह नेत्रों के लिये तथा नेत्ररोगों में लाभदायक हैं। सैन्धानमक के प्रयोग से पाचकरस (आमाशयिक रस) उत्पन्न होते हैं और क्षुधावृद्धि होती है। यह सामान्यतः त्रिदोषप्रकोपशामक है, व्रणों में होनेवाली विकृतियों को दूर करता है। उपयोग करने पर यह वीर्य में शीतगुण उत्पादक है। इसके प्रयोग से श्लेष्मिक रस की उत्पत्ति होने से पाचक अंगों तथा सन्धियों की खरता दूर हो
३४८ रसतरङ्गिणी जाती है अथवा स्पर्श में स्निग्ध (चिकना) है। यह शीघ्र ही पच जाता है अथवा इसके प्रयोग से स्थानिक कफप्रकोपजन्य गौरव दूर हो जाता है अतः यह लघुगुण कहा जाता है। इसके प्रयोग में स्राव उत्पन्न होने के कारण मलबन्ध (कब्ज) नहीं होने पाता है। सैन्धानमक वीर्य में मृदु तथा पित्तहर माना जाता है ॥ ११६, १२० ॥ सैन्धवस्य उत्पत्तिस्थानम् पञ्चाम्बुवर्तिनः सिन्धोः पूर्वभागे विशेषतः । शिलोच्चयखनौ सिन्धूपलं समुपलभ्यते ॥ १२१ ॥ पञ्चाम्बुः पञ्चाबदेशः । शिलोच्चयखनौ इति स्वभावतः खनिजोऽयं लवणो न कृत्रिम इति भावः ॥ १२१ ॥ भा.टी.—पञ्जाब प्रान्त की सिन्धुनदी के पूर्वी भाग में विशेष रूप से पर्वतीय खानों से सैन्धानमक प्राप्त किया जाता है ॥ १२१ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सैन्धवं खलु धत्तूरशिफया परिपेषितम् । उष्णीकृत्य प्रलिप्तं तु व्रणशोथहरं परम् ॥ १२२ ॥ धत्तूरशिफा धत्तूरमूलम् ॥ १२२ ॥ भा.टी.—व्रणशोथ को बैठाने के लिये सैन्धानमक को धत्तूरे की मूल के साथ पीसकर गरम करके शोथ पर लेप किया जाता है जिससे शोथ और वेदना दोनों ही शान्त हो जाते हैं ॥ १२२ ॥ नारिकेललवणः सुविपक्वं ससलिलं नारिकेलं समाहरेत् । अपनीय जटां वृद्धिपत्रेण स्फोटयेद् दृशम् ॥ १२३ ॥ जातरन्ध्रान्नारिकेलात्नीरं सर्वं परित्यजेत् । सुचूर्णितं सैन्धवन्तु दशतोलकसंमितम् ॥ १२४ ॥ निक्षिप्य रन्ध्रमार्गेण ततो रन्ध्रं निरोधयेत् । वसनेन समाच्छाद्य परितो लेपयेन्मृदा ॥ १२५ ॥ रौद्रयन्त्रे विशोष्याथ पुटयेत्तु महापुटे । तद्गोलकं स्वाङ्गशीतं प्रयत्नेन समाहरेत् ॥ १२६ ॥ सैन्धवं कज्जलीवर्णं कपालांशोज्झितं हरेत् । लवणो नारिकेलाख्यः समाख्यातो भिषग्वरैः १२७ ॥
चतुर्दशस्तरङ्गः २४६ नारिकेललवणनिर्माणप्रकारः—ससलिलमिति शुष्कफलपरिहाराय । जटां उपरितनशुष्कप्रायतृणौघद्वयम् । रौद्रयन्त्रे आतपे इत्यर्थः कपालं नारिकेलमजोपरि कठिनकाष्ठरूपमावरणम् ॥ १२३-१२७ ॥ भा.टी.—एक सुपरिपक्व जलयुक्त नारियल को लेकर उसकी बाहरी जटाओं को चाकू से साफ करलें । अब इस कच्चे दूधिया गोले को जहाँ पर आंख सी बनी हुई होती है उस स्थान पर छेद करके भीतर का सारा जल निकाल दें और उसी छेद से गोले के भीतर दस तोला सैन्धानमक का सूक्ष्मचूर्ण भरदें और छेद को बन्द करके गोले के चारों तरफ अच्छी तरह कपड़मिट्टी कर धूप में सुखा लें । अच्छी तरह सूखने पर इस गोले को महापुट में रख कर फूँक दें । पुट के शान्त होने पर स्वांगशीत उक्त गोले को सावधानी से बाहर निकाल लें । इसमें से नारियल के बाहरी कठिन भाग की काली और कठिन भस्म को छोड़ कर भीतरी काले वर्ण के लवण को लेलें । इसी को नारिकेललवण कहा जाता है ॥ १२३-१२७ ॥ अस्य गुणाः लवणो नारिकेली यः पाचनः पित्तनाशनः, अम्लपित्तहरः कामं पित्तशोषजशूलनुत् ॥ १२८ ॥ वातजं पित्तजं शूलं श्लेष्मजं सन्निपातजम् । शूलञ्च परिणामोत्थं नाशयेद्विकल्पतः ॥ १२६॥ मारुतकोपात् पित्ताशये पित्तशोषस्तस्माज्जातं शूलमपनयतीति विशेषः । पित्तशोषलक्षणं यथा—"पित्ताशयगतं पित्तं शुष्कं मारुतकोषतः । कुर्यात् शूलादिकं घोरं पित्तशोपं तदुच्यते” ॥ १२८, १२६ ॥ भा.टी.—नारिकेललवण पाचक और पित्तशामक होता है । यह अम्ल- पित्त को दूर करने तथा पित्तशोषजन्य शूल को शान्त करने के लिये सर्वोत्तम औषधि है । इसके अतिरिक्त नारिकेललवण वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक तथा सन्निपातिक शूल और परिणामशूल को भी निःसंदेह नष्ट करता है ॥१२८, १२६॥ वक्तव्य—वायुप्रकोप से जब पित्ताशय में शोप हो जाता है अर्थात् पित्ता- शय में पहिले शोथ होकर उसका मुख बन्द हो जाने से पित्त प्रणाली में पित्त जमकर पथरी का रूप धारण कर लेता है तो इसके कारण पित्ताशय में तीव्र शूल होने लगती है । इसी को "पित्ताशयगतं पित्तं शुष्कं मारुतकोषतः । कुर्यात् शूलादिकं घोरं पित्तशोथं तदुच्यते ॥” लिखा है ।
३५० रसतरङ्गिणी अस्य आमयिकः प्रयोगः लवणो नारिकेलाख्यो माषकद्वयसंमितः । नृसारयवजोपेतः पित्तशोषजशूलनुत् ॥ १३० ॥ भा.टी.—दो मासे नारिकेललवण को समभाग नौसादर और जवाखार चूर्ण में मिला जल अनुपान से देने पर पित्तशोषजन्य शूल में आराम आता है ॥ १३० ॥ अर्कलवणम् सुचूर्णितं सैन्धवन्तु समार्कदलसंयुतम् । अन्तर्धूमं पचेद्धीमान् स्वाङ्गशीतमथोद्धरेत् ॥ १३१ ॥ जायते खल्वसम्पिष्टं लवणं कज्जलप्रभम् । आयुर्वेदाचार्यवयैर्नाम्नार्क लवणं मतम् ॥१३२॥ अर्कलवणम्—समार्कदलसंयुतं तुलायां लवणसमानार्कपत्रसंयुक्तम् ॥१३१,१३२॥ भा.टी.—सैन्धानमक को अच्छी तरह पीसकर चूर्ण कर लें, फिर उसमें समभाग आक के पत्ते मिलाकर एक हांड़ी में भर कर उसका मुख किसी सकोरे से अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूंक दें जिससे वह सम्पुट अन्तर्धूम अच्छी तरह पक जाय । स्वांगशीत होने पर सम्पुट को निकाल उसमें कुछ काले से वर्ण के लवण को निकाल खरल से पीसकर रख लें । इस विधि से बनाये हुए लवण को आयुर्वेद के आचार्य लोग अर्कलवण के नाम से व्यवहार में लाते हैं ॥ १३१, १३२ ॥ अस्य गुणाः यकृत्प्लीहोदरहरं रुचिरं मलभेदनम् । विशेषतः समाख्यातं तन्त्रेऽर्कलवणं बुधैः ॥१३३॥ भा.टी.—अर्कलवण के प्रयोग से यकृत् तथा प्लीहोदर रोग दूर होता है। अन्न में रुचि पैदा होती है। कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से मल पतला होकर आता है और कब्ज नहीं रहता है ॥ १३३ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः माषकार्द्धमितं त्वर्कलवणं कोष्णवारिणा । पथ्याशिभिस्तु पुरुषैः सततं परिशीलितम् ॥ १३४ ॥ वातिकं श्लैष्मिकं वापि सज्ज्वरं वापि विज्वरम् । सकोष्ठबद्धं व्यथया चीत्कारयुतयापि वा ॥ १३५ ॥
चतुर्दशस्तरङ्गः ३५१ संयुक्तं कठिनस्पर्शं ह्यतीसारादिवर्जितम् । यकृद्दाल्युदरं नूतनं प्लीहोदरमलं हरेत् ॥१३६॥ यकृत् प्लीहाहरं विशेषतः । कोष्णवारिणा प्रयोगः चीत्कारयुतया व्यथया इति असह्यतीव्रपीडयेति यावत् । प्लीहोदरं अलम् इति च्छेदः । अलमत्य- र्थम् ॥ १३४-१३६ ॥ भा.टी.-आधे मासे अर्कलवण को गुनगुने जल से प्रतिदिन सेवन करते हुये यदि मनुष्य (रोगी) अच्छी तरह पथ्य भोजनादि को ग्रहण करता रहे तो इसके प्रयोग से वातिक या श्लैष्मिक यकृत् (लीवर) की खराबी और नवीन प्लीहोदर में जिनमें ज्वर हो या न हो, मलबन्ध हो, यकृत् में पीड़ा के कारण रोगी चिल्लाता पुकार करता हो और स्पर्श में यकृत् अतिकठिन हो और अतिसार आदि लक्षण न हो तो ऐसी अवस्था में उक्त अर्कलवण अवश्य लाभ करता है॥१३४-१३६॥ अथ सामुद्रलवणस्य नामानि सामुद्रं लवणं ख्यातं समुद्रजलसम्भवम् । समुद्रजं सागरजं मतं सामुद्रकञ्च तत् ॥१३७॥ भा.टी.-समुद्रलवण को समुद्रजलसम्भव, समुद्रज, सागरज, सामुद्रक, नाम से व्यवहार किया जाता है ॥ १३७ ॥ अस्य गुणाः समुद्रलवणं हृद्यं रुच्यं स्निग्धञ्च दीपनम् । साक्षारं भेदि वातघ्नं नात्युष्णं नातिशीतलम् ॥ १३८ ॥ भा.टी.-समुद्रलवण हृदय के लिये लाभकारी, अन्न में रुचि उत्पन्न करनेवाला, स्निग्ध, अग्निदीपक, क्षारीय स्वाद युक्त, पतला दस्त लानेवाला, वातशामक और न गरम नाति शीतल अर्थात् समशीतोष्ण प्रकृति का होता है ॥ १३ ॥ समुद्रलवणस्य परिचयः समुद्रजलसंशोषाल्लवणं जायते तु यत् । सामुद्रं लवणं तत्तु समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ १३६ ॥ अथ समुद्रलवणपरिचय—ख्यातं प्रसिद्धम् । समुद्रजलसंशोषादिति तस्यो- त्पत्तिपरिचयः ॥ १३६ ॥ भा.टी.—क्योंकि इस समुद्रनमक को समुद्रीयजल को एक लोहपात्र में भरकर अग्नि पर चढ़ा कर जलीयांश को सुखाकर तैयार किया जाता है, अतः वैद्य लोग इसको समुद्रलवण कहते हैं ॥ १३६ ॥
३५२ रसतरङ्गिणी अथ विडलवणस्य नामानि विडं कृत्रिमकञ्चैव सुपाक्यं द्राविडन्तथा । आसुरञ्च विटञ्चाथ धूर्त्तञ्च कृतकं मतम् ॥१४०॥ अथ विडलवणपरिचयः—कृत्रिमकं न स्वाभाविकमपि तु योगविशेषजात- मित्यर्थः ॥ १४० ॥ भा.टी.—विडलवण को विड, कृत्रिमक ( बनावटी ), सुपाक्य, द्राविड, आसुर, विट, धूर्त्त तथा कृतक नाम से व्यवहार किया जाता है ॥ १४० ॥ वक्तव्य—विडलवण सैन्धानमक की भाँति स्वाभाविक रूप से कहीं खान आदि से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु इसे बनाया जाता है, अतः इसको कृतक- लवण या कृत्रिमकलवण कहा जाता है । अस्य गुणाः विडं रुच्यञ्च तीक्ष्णोष्णं सूक्ष्मं लघु च दीपनम् । सक्षारं हृद्यमूर्ध्वाधः कफवातानुलोमनम् ॥१४१॥ अजीर्णानाहविष्टम्भहरं शूलविबन्धजित् । हृद्गौरवप्रशमनं वातघ्नञ्च प्रकीर्त्तितम् ॥१४२॥ कफवातयोरुपर्य्यधो यथामार्गप्रवर्त्तनात् अनुलोमकम् । वातघ्नञ्च प्रकीर्त्तितं पूर्वतनैरिति शेषः ॥ १४०–१४२ ॥ भा.टी.—विडलवण खाने में अच्छा लगता है और अन्न में रुचि उत्पन्न करता है । तीक्ष्ण तथा उष्ण गुण युक्त, सूक्ष्म (क्षार के समान सूक्ष्म भाग व स्थानों मे सरलता से प्रवेश करनेवाला ), लघु ( शीघ्र पच जानेवाला या हल्कापन करनेवाला ) अग्निदीपक और क्षारीय रसयुक्त होता है । इसके अन्तः- प्रयोग से ऊपर की तरफ कफ प्रवृत्ति ( निकला ) और नीचे गुदा की तरफ अपानवायु की प्रवृत्ति होती है । अजीर्ण, आध्मान, विष्टब्धाजीर्ण मिट जाते हैं । इसके प्रयोग से साधारण उदरशूल, मलबन्ध, अजीर्णजन्य हृदय रोग और वायु का शमन होता है ॥ २४१, १४२ ॥ बिडलवणस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः वस्वृत्तिसेरकमितं लवणं रोमकाभिधम् । पञ्चाशत्तोलकमितं चूर्णमामलकोद्भवम् ॥ १३ ॥ समादाय भिषग्वर्य्यस्ततः सम्मेलयेद् भृशम् । ततः खल्वस्य चूर्णस्य चतुर्थांशं विधानवित् ॥ १४४ ॥
२३ चतुर्दशस्तरङ्गः ३५३ मृल्लिप्तायां क्षुद्रकण्ठ्यां हण्डिकायां तु विन्यसेत् । चुल्लिकायां निधायाथ विधानज्ञो भिषग्वरः ॥१४५॥ प्रज्वाल्य तीव्रज्वलनं पच्चेद्वोराद्वयं भिषक् । हण्डिकाया मध्यभागो यावदायाति रक्तताम् ॥१४६॥ क्षिपेत्ततः क्रमेणैव शेषं चूर्णं भिषग्वरः । प्रखरेणानलेनाथ यामद्वितयमात्रकम् ॥१४७॥ विपचेदविरतं रसतन्त्रविधानवित् । स्वतः शीते च लवणं बिडाख्यन्तु समाहरेत् ॥१४८॥ चतुर्विंशतिसङ्ख्याकसेरकप्रमितं शुभम् । ततः सर्वेषु योगेषु योजयेद्भिषजां वरः ॥१४९॥ निर्माणप्रकारः कृत्रिमत्वादस्य निर्दिष्टः-रोमकलवणं २८ सेरकम्, आम- लकचूर्णम् ५० तोलकम्, यथानिर्देशं पाकः, पूर्वे चतुर्थांशमात्रपाकः । अत्र च लवणजलांशशोषात् आमलकीचूर्णभस्मीभावाच्च २४ सेरकमितं लवणमात्रमव- शिष्यते इति विशेषः । स्पष्टमन्यत् ॥१४३-१४६॥ भा.टी.-अट्ठाईस सेर सांभरनमक को अच्छी तरह पीस कर इसमें पचास तोले सूखे हुए आँवलों का चूर्ण मिलाकर रखलें । अब इस चूर्ण में से चतु- र्थांश चूर्ण लेकर एक अच्छी तरह कपड़मिट्टी की हुई मिट्टी की संकुचित मुख- वाली हाँड़ी में डालकर इस हाँड़ी को चूल्हे पर चढ़ाकर दो घण्टे तक बहुत तेज अग्नि से पकायें । जब अग्नितप से हाँड़ी का मध्यभाग खूब लाल दीखने लगे तो उस हाँड़ी में फिर धीरे-धीरे सब अवशिष्ट चूर्ण को डालकर छः घण्टे तक तेज अग्नि से लगातार पकायें, जब अग्नि देना बन्द करने पर हाँड़ी स्वांगशीत हो जाय तो उसे नीचे उतार उसमें से बिडलवण को निकाल लें । उक्त विधान से बनाया हुआ बिडलवण द्रव्य परिमाण के अनुसार पूरी तौल में न होकर चौबीस सेर तौल में प्राप्त होता है । इस प्रकार बनाये हुए बिड- लवण को लिखित योगों में प्रयुक्त करना चाहिये ॥१४३-१४६॥ वक्तव्य -अट्ठाईस सेर और पचास तोले के स्थान पर केवल चौबीस सेर नमक तय्यार होने का कारण यह है कि तीव्र अग्नि से पकाने से साँभरनमक तथा आमलकी चूर्ण में होनेवाला जलीयांश (चार से पचास तोला) सूख जाता है और आमलकी चूर्ण की भस्म हो जाती है ।