रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७०७ इच्छाभेदी रसोऽयं तु नामतः परिकीर्तितः ॥३२३॥ शीततोयेन वटिकां सार्द्धगुञ्जैकसंमिताम् । मृदुकोष्ठे नागरिके सितया विनियोजयेत् ॥३२४॥ क्रूरकोष्ठेषु शूरेषु ग्रामीणेषु तु कोविदः । प्रयुञ्जीत सितोपेतां वटीं गुञ्जाद्वयोन्मिताम् ॥३२५॥ वटीं भुक्त्वा जलं शीतं यावद्वारं तु पीयते । तावद्वारं विरिच्यन्ते मनुजा नात्र संशयः ॥३२६॥ विरेचननिवृत्यर्थं काममुष्णोदकं पिबेत् । विरेकान्ते प्रयोक्तव्यं पथ्यं तक्रोदनं खलु ॥३२७॥ प्रशान्तरेचनः पुमान् प्रयत्नतस्तु यामकम् । पिबेन्न शीतलं जलं विरिच्यते पुनर्यतः ॥३२८॥ इच्छाभेदी रसः—विश्वभेषजं शुण्ठी । नागरिके नगरनिवासिनि । यावद्- वारन्तु शीतं जलं पीयते तावद्वारं विरेकः प्रभावात् । कामं यथेष्टम् ॥ ३२१–३२८ ॥ भा.टी.—शुद्ध सुहागा, कालीमिर्चचूर्ण, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सोंठ चूर्ण, प्रत्येक एक-एक तोला लेवें और शुद्ध जयपालबीजमज्जा तीन तोला लेवें । पहिले पारद गन्धक को कज्जली बनाकर उसमें शेष द्रव्यों को डाल- कर जल के साथ घोटकर इसकी दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । इसको इच्छाभेदी रस नाम से कहा जाता है । मृदु कोष्ठवाले नागरिक मनुष्य को इस रस की डेढ़ रत्ती मात्रा खांड और शीतल जल के साथ देवें । क्रूर कोष्ठी ( सख्त मेदावाला ) और बलवान ग्रामीण मनुष्य को इसकी दो रत्ती मात्रा खांड मिलाकर देनी चाहिए । इस रस की गोली खाकर ठंडा पानी जितनी बार पिलाया जायगा उतनी ही बार मनुष्य को दस्त आते हैं। यदि दस्त रोकने हों तो रोगी को पर्याप्त गरम जल पिला देना चाहिए । इसके द्वारा विरेचन पर पथ्य में तक्र के साथ भात खिलाना चाहिए । विरेचन आने और बन्द होने के बाद तीन घण्टे तक शीतल जल पीने में पूर्ण परहेज करना चाहिए; अन्यथा फिर दस्त होने का भय रहता है ॥३२१–३२८॥ जलोदरारिरसः सुमृतं रविलोहञ्च पिप्पली रसगन्धकम् । मरिचं रजनी चूर्णं पृथक् तोलकसंमितम् ॥३२६॥
७०८ रसतरङ्गिणी नवं विशुद्धं जैपालं युगतोलकसंमितम् । आदाय वारत्रितयं त्रिवृत्क्वाथेन भावयेत् ॥३३०॥ निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटिका रक्तिकोन्मिताः । जलोदरारिर्नाम्नायं रसः ख्यातो भिषग्वरैः ॥३३१॥ रसोऽयं रेचनकरो जलोदरहरस्तथा । विरेकस्तम्भनार्थञ्च हितं दध्योदनं मतम् ॥३३२॥ अथ जलोदरारिः—रविलोहं ताम्रम् । जयपालं युगतोलकसम्मितमिति द्वितोलकम् ॥ ३२६-३३२ ॥ भा.टी.—पञ्चामृतीकरण क्रिया युक्त ताम्रभस्म, पिप्पलीचूर्ण, शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, कालीमिर्चचूर्ण, हरिद्राचूर्ण, प्रत्येक एक-एक तोला लेवें । नूतन और शुद्ध जयपालमज्जा दो तोला लेकर पहिले पारद गन्ध की कज्जली बना लें । फिर इसमें अन्य द्रव्य मिलाकर त्रिवृत्क्वाथ की तीन भावना देवें । अन्त में गोली बनाने योग्य होने पर एक-एक रत्ती की गोली बना लें । इसको वैद्य लोग जलोदरारि रस कहते हैं । इस रस के सेवन करने से विरेचन होकर जलोदर रोग नष्ट होता है । यदि इसके सेवन से अधिक दस्त आ रहे हों और उनको रोकना हो तो रोगी को दही और भात पथ्य में देना चाहिए ॥३२६-३३२॥ ज्वरारिरसः हिंगुलं पिप्पली शुण्ठी मरिचं विश्वभेषजम् । सौभाग्यममृतं धात्री पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ३३३ ॥ जयपालं पलमितं नवं सुविमलीकृतम् । सम्पेण्यार्द्रकयोगेन वटीं गुञ्जैकसंमिताम् ॥ ३३४ ॥ निर्मापयेत्प्रयत्नेन ज्वरारिर्नामतो मतः । समाख्यातो विशेषेण नवज्वरनिबर्हणः ॥ ३३५ ॥ ज्वरारिरसः—सौभाग्यं टङ्कणम् , अमृतं वत्सनाभः, धात्री आमलकी । नव जयपालमिति पुरातनं हि न तथा गुणकरम् ॥ ३३३-३३५ ॥ भा.टी.—शुद्ध हिंगुल, पिप्पलीचूर्ण, शुण्ठीचूर्ण, मरिचचूर्ण, सोंठचूर्ण, सुहागा, शुद्ध वत्सनाभ, आँवलाचूर्ण प्रत्येक एक-एक तोला लें । शुद्ध जयपाल- बीजचूर्ण एक पल मात्रा में लेवें । इन सबको एकत्र खरल में अदरक के साथ पीसकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें । इसको ज्वरारिरस कहा जाता है । यह रस नवज्वर को नष्ट करता है ॥ ३३३-३३५ ॥
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७०९ अञ्जनभैरवरसः सूतगन्धकणाटङ्कं पृथगेकैकभागिकम् । जयपालं सुविमलं सर्वषामर्द्धभागिकम् ॥ ३३६ ॥ आद्राय निम्बुकद्रावैः पेषयेदतियत्नतः । छायायामथ संशोष्य काचकूप्यान्तु विन्यसेत् ॥ ३३७ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नाम्ना ह्यञ्जनभैरवः । अञ्जनाद्विनिहन्त्याशु सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ३३८ ॥ भा.टी.—शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, पिप्पलीचूर्ण, सुहागा; प्रत्येक एक-एक भाग लें । शुद्ध जयपालबीजचूर्ण सबका आधा भाग लेवें । पहिले पारे और गन्धक की अच्छी तरह कज्जली बनायें, फिर इसमें अन्यद्रव्यों को मिला- कर निम्बूस्वरस के साथ खूब अच्छी तरह से मर्दन करके छाया में सुखाकर इस चूर्ण को एक कांच की शीशी में भरकर रख लें । इसका नाम अञ्जनभैरव रस कहा जाता है । इस रस को सन्निपात रोगी के नेत्रों में अञ्जन करने से सन्निपात में आराम आता है ॥ ३३६-३३८ ॥ वृश्चिकविषहरः प्रलेपः जलपिष्टस्तु जैपालो यत्नतः परिलेपितः । विषं वृश्चिकदंशोत्थं विनिहन्ति विशेषतः ॥ ३३६ ॥ वृश्चिकविषहरः प्रलेपः—यत्नतः परिलेपित इति यावत् दंशस्थानं तावदेव प्रदेशमभिव्याप्येत्यर्थः ॥ ३३६ ॥ भा.टी.—जयपालबीज को पत्थर में जल के साथ घिसकर इसका वृश्चिक ( बिच्छू ) दंश पर लेप करने से दंश की पीड़ा मिट जाती है ॥ ३३६ ॥ जयपालयुक्तयोगानां निषेधः बाले वृद्धे कृशे क्षीणे गर्भिण्याञ्च गुदामये । प्रवाहिकायां शोथे च त्वामपक्वाशयाश्रिते ॥ ३४० ॥ गुदभ्रंशे चान्त्रशोथयुते बद्धगुदोदरे । तथान्त्रच्छ्रदशोथे च जयपालं न योजयेत् ॥ ३४१ ॥ जयपालयुक्तयोगानां विशेषतो निषेधः प्रचीनानुक्तोऽपि अज्ञमतिमलमोषाय मान्यैराम्नातः, मा भूद् बालादिषु जयपालयोगात् व्यापद्भयमिति ॥३४०, ३४१॥ भा.टी.—जयपाल अथवा जयपाल के योगों को छोटे-छोटे बच्चे, बूढ़े, कृश तथा क्षीण मनुष्यों को, गर्भिणी स्त्री, बवासीर, प्रवाहिका पीड़ितों को तथा
७१० रसतरङ्गिणी आमाशय तथा पक्वाशयशोथ पीड़ितों को और गुदभ्रंश, आँतों में शोथयुक्त बद्ध- गुदोदर, आन्त्रावरककलाशोथ रोग में सेवन नहीं कराना चाहिए ॥३४०, ३४१॥ अथ धत्तूरस्य नामानि धत्तूरः कितवोन्मत्तौ धूर्तश्च कनकाभिधः । शठश्च कण्टकफलः कीर्तितः शिवशेखरः ॥ ३४२ ॥ भा.टी.—धत्तूर, कितव, उन्मत्त, धूर्त, स्वर्ण-नामयुक्त, शठ, कण्टक- फल तथा शिवशेखर, ये सब नाम धत्तूरे कहे जाते हैं । धत्तूरस्य परिचयः धत्तूरः क्षुपजातीयः सेकण्टकफलस्तथा । सुलभो, भिद्यते चायं पुष्पवर्णविभेदतः ॥ ३४३ ॥ धत्तुराः सर्व एवैते मताः समगुणान्विताः । विशेषतस्तु सर्वेषु कृष्णपुष्पो गुणाधिकः ॥ ३४४ ॥ पत्रं मूलं फलं बीजं तथा मृदुदलद्रवः । प्रयुज्यते विशेषेण धत्तूरस्य भिषग्वरैः ॥ ३४५ ॥ अयन्तूत्तरोपक्रमः—कनकाभिधः सुवर्णनामा । शिवशेखरः शिवपूजासु तद्व्यवहारात् ॥ ३४३–३४५ ॥ भा.टी.—धत्तूरा क्षुप जाति की औषधि है । इसके फलों पर काँटे से उगे होते हैं और यह प्रायः सर्वत्र पाया जाता है । फूलों के रंग में भिन्नता के कारण इसके कई भेद होते हैं । परन्तु प्रायः सभी प्रकार के धत्तूरे एक ही गुण- वाले होते हैं, किन्तु काले फूलवाला धत्तूरा अन्यों की अपेक्षा अधिक गुण- वाला होता है । औषधिकार्य में वैद्य लोग धत्तूरे के पत्र, मूल, बीज तथा कोमल पत्रस्वरस को विशेष रूप से काम में लेते हैं ॥ ३४३–३४५ ॥ वक्तव्य—धत्तूरा गरम प्रदेशों में उगनेवाला १ से २ फुट ऊँचा वार्षिक एक क्षुप है । इसके पत्ते ३ से ६ इंच लम्बे, त्रिकोण, अण्डाकृति, मूल पर गोल, दोनों पार्श्वविषम, पूर्णाधार या कुछ दन्तुर होते हैं । इसके फूल सफेद या काले बड़े-बड़े घंटाकार, फल छोटे सेव जितने, काँटों से ढके हुए, बीज फल में बहुत भरे हुए होते हैं । इसका एक भेद बेलेडोना है । बेलेडोना तथा Hysocyamus के पत्तों से धत्तूर के पत्र बहुत मिलते हैं । इसमें भेद इतना है कि बेलेडोना का पत्ता कम झुर्रियों वाला तथा Hysocyamus का पत्ता लोमश होता है ।
विश्लेषण—धतूरे Hysocpamine, Hysocine तथा Atropine तीन क्षारीय तत्त्व होते हैं। ये तत्त्व अन्य भागों की अपेक्षा बीज में अधिक पाये जाते हैं। उक्त तीन तत्त्वों में से Atropine नामक तत्त्व मद्यसार, क्लोरोफार्म, ईथर में घुल जाता है, किन्तु जल में नहीं घुलता है। धत्तूरबीजानां प्रथमः शोधनप्रकारः धत्तूरबीजान्यदाय पोट्टल्यां रोधयेत्ततः । स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे गव्यदुग्धेन यामकम् ॥३४६॥ संस्वेद्य क्षालयेदुष्णतोयेन तु ततो भिषक् । इत्थं शुद्धानि बीजानि वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥३४७॥ गोदुग्धे गोमूत्रे वा यामैकं दोलया स्वेदनाच्छुध्यन्ति धत्तूरबीजानि । “धत्तूर- बीजं गोमूत्रे चतुर्र्यामोषितं पुनः कथितं निस्तुषं कृत्वा शुद्धं योगेषु योजयेत्” ऽइति हि स्मरन्ति प्राञ्चः ॥३४६, ३४७॥ भा.टी.—धतूरे के बीजों को एक कपड़े की पोटली में बांधकर दोलायन्त्र में गोदुग्ध भरकर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करें। तीन घंटे के बाद पोटली से धत्तूरबीजों को निकाल गरम पानी से धो लें। इस विधि से शुद्ध धत्तूरबीजों को निःशंक काम में ला सकते हैं ॥३४६, ३४७॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः नवानि धूर्त्तबीजानि दोलिकायन्त्रयोगतः । स्वेदयेद् गव्यमूत्रेण यामैकं पोट्टलीगतम् ॥३४८॥ खल्वेऽथ खलु सम्पेष्य वस्त्रपूतं तु कारयेत् । इत्थं शुद्धानि बीजानि वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥३४६॥ भा.टी.—नूतन धत्तूरे को लेकर गोमूत्र में दोला विधान से पकाकर धूप में सुखा कपड़े में छानकर रख लें। फिर इसे निर्भय होकर प्रयोग करें ॥३४८, ३४६॥ धत्तूरस्य गुणाः धत्तूरः कटुकश्चोष्णस्तथा शोथनिषूदनः । कृमिघ्नः कुष्ठशमनो विशेषाज्ज्वरनाशनः ॥३५०॥ परं त्वग्दोषशमनस्तथा कण्डूतिकापहः । भ्रमकृन्मोहजननः समाख्यातो भिषग्वरैः ॥३५१॥ धत्तूरगुणाः—मोहजनकः, मोहो वैचित्यं तज्जनकः। स्पष्टमन्यत् ॥३५०, ३५१॥
७१२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—धतूरा रस में कटु, गुणों में गरम प्रकृति का होता है। यह बाह्याभ्यन्तर द्विविध शोथ को नष्ट करता है। उदरकृमि तथा बाह्यकृमियों को नष्ट करता है। कुष्ठ रोगों को शान्त करता और विशेषतः ज्वर को नष्ट करता है। त्वचा के रोगों को शान्त करने में उत्तम औषधि है और शरीर की कण्डू को मिटाता है। इसको कुछ अधिक मात्रा में खाने से शिर में चक्कर आते हैं और बेचैनी होने लगती है ॥३५०, ३५१॥ धत्तूरस्य विशिष्टा गुणाः धत्तूरः श्वासशमनः कफसंशोषणः परम् । आक्षेपोन्मादहरणः स्तम्भनो हर्षवर्द्धनः ॥३५२॥ अभिष्यन्दप्रशमनः कर्णशूलनिबर्हणः । सवेदनार्बुदहरो लसीकाग्रन्थिशोथहृत् ॥३५३॥ कृमिदन्तव्यथाहारी त्वामवातव्यथाहरः । स्तनशोथप्रशमनः प्रलापपरिकृन्तनः ॥३५४॥ भूतापहस्तथोन्मत्तसारमेयविषापहः । कटिव्यथाहरः कान्ताकामोन्मादविनाशनः ॥३५५॥ निम्ननिर्दिष्टरोगेषु धत्तूरोऽत्यल्पमात्रया । विशेषेण प्रयोक्तव्य इति सद्भिषजां मतम् ॥३५६॥ विविधस्थानसम्भूतां खलु शोथसमुत्थिताम् । वेदनां विविधाकारां विनिहन्ति विशेषतः ॥३५७॥ प्रासूतिकाज्वरोत्थं वा सन्निपातसमुत्थितम् । भृशदुर्गन्धपीताभकृष्णावर्णमलान्वितम् ॥३५८॥ सलिनाभं विशेषेण विनिहन्त्यतिसारकम् । कण्ठशुण्डीञ्च हन्त्याशु भृशदारुणवेदनाम् ॥३५६॥ मसूरिकादौ स्फोटानामस्फुटोद्गमहेतुजम् । आक्षेपं च प्रलापं च शमयत्यविकल्पतः ॥३६०॥ विसर्पोत्थं ज्वरोत्थं वा सन्निपातसमुत्थितम् । विनिहन्ति विशेषेण प्रलापादीनुपद्रवान् ॥३६१॥ सन्निपातसमुद्भूतां शय्यातः खलु रोगिणाम् । पलायनात्मिकां चेष्टां विनिवारयति द्रुतम् ॥३६२॥
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७१३ प्रसवोत्तरकाले वा सन्निपातज्वरे खलु । मूत्रानुत्पत्तिहेतूत्थं मूत्ररोधं व्यपोहति ॥ ३६३ ॥ नाडीदौर्बल्यजनितं वक्षस्याकुञ्चनान्वितम् । तारालापयुतं हन्ति श्वासं तु तमकाभिधम् ॥ ३६४ ॥ कफजान् कफपित्तोत्थान् रोगान् वा कफवातजान् । विनिहन्ति विशेषेण ह्यूर्ध्वजत्रुसमाश्रितान् ॥ ३६५ ॥ ग्रन्थिकज्वरसम्भूतं कक्षवङ्क्षणकण्ठजम् । ग्रन्थीनां श्वयथुं हन्ति ज्वरञ्चैव तदाश्रितम् ॥ ३६६ ॥ अथैतस्य गुणविशेषाः तन्त्रान्तरनिर्दिष्टाः अनुभूतचराः प्रकटीक्रियन्ते जगतो हिताय श्वासशमन इत्यादिना । आक्षेपो वातव्याधिविशेषः । अत्यल्पमात्रयेति गुञ्जापादांशादप्यत्यन्तं हीनया । कण्ठशुण्डी गलरोगविशेषः । तारालापयुतमिति तारः सुदीर्घोच्चो य आलापः तद्युतम् । जत्रूर्ध्वसमाश्रितानिति जत्रुः ग्रीवासन्धिः, तदूर्ध्वदेशाश्रितान् । ग्रन्थिकज्वरः ‘Plague’ इति ख्यातः ॥ ३५२–३६६ ॥ भा.टी.—धतूरा श्वास रोग को शान्त करता और कफ को सुखाने में उत्तम गुण रखता है। शरीर में होनेवाले आक्षेप और उन्माद रोग को नष्ट करता है। शरीर से होनेवाले स्रावों को रोकता और रतिशक्ति को बढ़ाता है। बाह्य- योग से नेत्राभिष्यन्द रोग, कर्णशूल, वेदनासहित अर्बुद रोग तथा लसीका-ग्रन्थियों के शोथ को मिटाता है। दाँतों में कीड़ा लगने से होनेवाली व्यथा को कम करता और आमवात रोग को नष्ट करता है। स्तनों में होनेवाले शोथ को शान्त करता और प्रलाप सन्निपात आदि को शान्त करता है। जीवाणुनाशक है और पागल कुत्ते के विष को नष्ट करता है। कमर की पीड़ा को कम करता है और स्त्री के कामोन्माद रोग को नष्ट करता है। उक्त गुण युक्त धतूरा को निम्नलिखित रोगों में वैद्य को विशेष रूप से बहुत ही अल्प मात्रा में प्रयोग करना चाहिये। धतूरा विशेष रूप से, शोथ के कारण होनेवाली शरीर के विविध प्रदेश की और विविध प्रकार की वेदना को शान्त करता है। सन्निपात ज्वर के कारण अथवा प्रसूति ज्वर के कारण होनेवाले अत्यन्त दुर्गन्धित पीत और कृष्णवर्ण मलमिश्रित जल सदृश पतले दस्तोंवाले अतीसार में धतूरा विशेष रूप से लाभ करता है। अत्यन्त भयंकर वेदनायुक्त कण्ठशुण्डी रोग को शीघ्र नष्ट करता है, मसूरिका आदि स्फोटज्वरों में दानों के न निकल सकने के कारण होनेवाले आक्षेप और प्रलाप को शीघ्र धतूरा शान्त करता है। इसी तरह वीसर्पजन्य, ज्वरजन्य
७१४ रस्तरङ्गिणी अथवा सन्निपातजन्य आक्षेप तथा प्रलाप में इसके सेवन से आराम आता है। सन्निपात ज्वर की अवस्था में जब रोगी बिछौने से उठ-उठकर भागने की चेष्टा करता है तो ऐसी दशा में धतूरा अथवा धतूरे के योग शीघ्र लाभ करते हैं। स्त्री को प्रसव होने के बादवाले मूत्ररोध अथवा सन्निपात ज्वर में होनेवाले मूत्ररोध में धतूरा योगों से शीघ्र लाभ होता है। वातिकनाड़ियों की दुर्बलता के कारण उत्पन्न तमकश्वास में जब श्वास लेने में रोगी की छाती में संकोच हो रहा हो और रोगी जोर-जोर से कराह रहा हो तो धत्तूरयोगों से शीघ्र लाभ दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त धत्तूर कफप्रकोपजन्य अथवा कफपित्तप्रकोपजन्य अथवा वातकफजन्य ऊर्ध्व जत्रु रोगों को विशेष रूप से नष्ट करता है। धतूरा ग्रन्थिक- ज्वर-( Plague ) जन्य, कक्ष-( बगल )-वंक्षण तथा कण्ठस्थ ग्रन्थियों की शोथ और ग्रन्थिकज्वर में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग से लाभ करता है ॥ ३५२-३६६ ॥ वक्तव्य—यदि त्वचा पर धत्तूर के लेप लगाये जावें तो स्थानिक शूल और शोथ कम हो जाते हैं। इसके लगाने से स्थानिक स्राव भी सूख जाते हैं। स्तनों पर इसके लगाने से स्तनों से दूध निकलना बन्द हो जाता है या कम हो जाता है। जिस स्थान पर स्वेद अधिक आता हो इसका लेप लगाने से स्वेद बन्द हो जाता है। शूल तथा स्रावों को कम करने का कारण यह है कि ये धत्तूरलेप संज्ञावाहिनियों तथा स्रावों को उत्तेजक वातनाड़ियों के सिरों को निश्चेष्ट कर देते हैं। ये यूका लिक्षा तथा दद्रु आदि कृमियों को भी नष्ट करते हैं। मुख द्वारा धत्तूर का प्रयोग करने से शरीर की सब्र संज्ञावाहिनियों के सिरे कुछ निःसंज्ञ हो जाते हैं। अतः यदि शरीर के किसी भाग पर शूल हो तो वह मन्द हो जाता है अर्थात् यदि आंत, मूत्रमार्ग आदि में किसी प्रकार की शूल हो तो वह मन्द हो जाती है। मुख द्वारा अन्तः प्रयोग में धत्तूर या धत्तूर के योग स्रावों को भी सुखाते हैं। मुख और गला सूख जाता त्वचा तथा शुक्र का स्राव भी बन्द हो जाता है। श्वासनलियों का उद्धर्त अर्थात् दमा हो तो वह शान्त हो जाता है। इसके देने से हृदय तथा नाड़ी की प्रतिमिनट शक्ति बढ़ती है तथा इनकी शक्ति भी कुछ बढ़ जाती है। अतः धत्तूर हृद्य है। धतूरे को नेत्रों में डालने से नेत्र का शूल शान्त होता है और पुतलियाँ फैल जाती हैं। धत्तूर का विष- मज्वर पर विशेष प्रभाव होता है। धत्तूर के अधिक मात्रा में खाये जाने पर मुख सूख जाता है। निगलने में कठिनता होती है, त्वचा सूख जाती और मूत्र का स्राव बन्द हो जाता है। पुतली
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७१५ फैल जाती है। अत्यधिक मात्रा में खाये जाने पर रोगी प्रलाप करता लड़-खड़ा कर चलता है और उसकी नाड़ी तथा हृदय भी तीव्रता से चलते हैं। इसके लिए प्रथम वमन करा दें। वमन के बाद रोगी को चाय या काफी का तीव्र घोल पिला दें। यदि विष का वेग अधिक हो जिससे हृदय तथा नाड़ी अत्यधिक तेज चले और मृत्यु का डर हो तो रोगी को उत्तेजनाशामक द्रव्य जैसे अफीम या अफीम के योग जैसे Morphine का सूचीवेध कर दें। मूत्र बन्द होने पर मूत्रशलाका से मूत्र को निकाल लें। धत्तूरस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जार्धं तु विशोधितम् । धत्तूरबीजचूर्णन्तु प्रयुञ्जीत विधानवित् ॥३६७॥ गुञ्जार्द्धतः समारभ्य सार्द्धगुञ्जैकसंमितम् । चूर्णं धत्तूरपत्राणां प्रणाचार्यः प्रयोजयेत् ॥३६८॥ धत्तूरबीजमात्रा गुञ्जाचतुर्थांशात् गुञ्जार्धं यावत् । चूर्णमात्रा तु गुञ्जार्धतः सार्धगुञ्जम् ॥३६७, ३६८॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण की मात्रा चौथाई रत्ती से लेकर आधी रत्ती तक समझनी चाहिए। यदि धत्तूरपत्रचूर्ण का प्रयोग करना हो तो इसकी मात्रा आधी रत्ती से लेकर डेढ़ रत्ती तक समझनी चाहिए। ३६७, ३६८॥ धत्तूरस्य आमयिकः प्रयोगः धत्तूरमूलं पत्रं वा सम्पेष्य विम्लाम्भसा । कवोष्णस्तूपनाहेन ब्रध्नशोथं व्यपोहति ॥३६६॥ धूर्तपत्रद्रवे पिष्टं निफेनं सरसाञ्जनम् । विनिहन्ति विशेषेण नेत्राभिष्यन्दमुल्बणम् ॥३७०॥ धत्तूरपत्रस्वरसः कवोष्णः स्वल्पमात्रया । निक्षिप्तं नाशयत्याशु कर्णशूलमसंशयम् ॥३७१॥ धूर्तबीजानि सम्पेष्य वटिका खलु निर्मिता । कृमिदन्तस्थरन्ध्रस्थां वेदनां हन्ति दारुणाम् ॥३७२॥ धूर्तपत्रं निशाफेनयुतं पिष्ट्वाम्लाम्भसा । प्रलेपान्नाशयत्याशु स्तनश्वयथुवेदनाम् ॥३७३॥ धत्तूरदलकल्केन तैलपाकविधानतः । साधितं सार्षपं तैलं हन्ति पेशीगतानिलम् ॥३७४॥
कटिवातव्यथां चैव सन्धिवातभवां व्यथाम् । यूकालिक्षादिकं चैव हन्ति केशेषु मर्दनात् ॥३७५॥ धत्तूरफलचूर्णं तु काकोदुम्बरिकान्वितम् । शीलितं तण्डुलाम्भोभिः सारमेयविषं हरेत् ॥३७६॥ सगुडः सार्कदुग्धश्च कृष्णधूतदलद्रवः । शीलितो विनिहन्त्येव सारमेयविषं द्रुतम् ॥३७७॥ धूर्तपत्रं साहिफेनं जलेन परिपेषितम् । लेपनान्नाशयत्याशु सर्वश्वयथुवेदनाम् ॥३७८॥ धत्तूरस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—ब्रध्नशोथं वंक्षणसन्धिग्रन्थिशोथम् । तन्नि- दानादि यथा—“अत्यभिष्यन्दिगुर्वन्नसेवनान्निचयं गतः । करोति ग्रन्थवच्छोथं दोषो वंक्षणसन्धिषु । ज्वरशूलाङ्गसादाढ्यं तं ब्रध्नमिति निर्दिशेत्” ॥ चरके तूक्तं “यस्य वायुः प्रकुपितः शोफशूलकरश्चरन् । वंक्षणाद् वृषणौ याति ब्रध्नस्त- स्योपजायते” । निफेनं अहिफेनम् , निशाफेनयुतमिति निशा हरिद्रा, अफेनम् अहिफेनमिति च्छेदः । निगद्व्याख्यातमन्यत् ॥३६६–३७८॥ भा.टी.—धतूरे की जड़ अथवा पत्तों को जल के साथ खूब पीसकर गरम करके पोलटिस बाँधने से ब्रध्नशोथ नष्ट हो जाती है । धतूरे के पत्तों के स्वच्छ रस में रसौंत और अफीम घोंटकर नेत्रों में डालने से भयंकर नेत्राभिष्यन्द में आराम आता है । कान के शूल में थोड़ा सा धतूरपत्रस्वरस को गरम करके कान में डालने से दर्द बन्द हो जाता है । धतूरे के बीजों को जल के साथ खूब पीस कर बनायी गोलियों को कृमिदन्त के छिद्र (खोड़) में रखने से दाँत की पीड़ा नष्ट हो जाती है । स्तनों में शोथ के कारण होनेवाली वेदना को शान्त करने के लिए धतूरे के पत्तों को हरिद्रा तथा अफीम के साथ जल से पीसकर लेप करने से शीघ्र आराम आता है । मांसपेशीगत वातप्रकोप को शान्त करने के लिये धतूर- पत्रकल्क से सिद्ध सरसों के तेल की मालिश से आराम आता है। इसी तैल को कमर की वातपीड़ा, सन्धिवातपीड़ा में भी मालिश करने से आराम आता है । यदि शिर में जूं और लीख हो गयी हों तो इसे शिर के बालों में लगाने से जूं और लीख मर जाती हैं । पागल कुत्ते के विष प्रभाव को नष्ट करने के लिए धतूरपत्रचूर्ण को काकोदुम्बरिकाचूर्ण में मिला चावलों के साथ सेवन कराया जाता है । इसी तरह काले धतूरे के पत्तों के स्वरस में आक का दूध तथा गुड़ मिलाकर कुछ काल उचित मात्रा में सेवन कराने से कुत्ते के विष का प्रभाव
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७१७ नष्ट हो जाता है । किसी प्रकार की बाह्यशोथजन्य पीड़ा को शान्त करने के लिए धत्तूरपत्र तथा अफीम को जल से पीसकर शोथ के ऊपर लेप करने से शीघ्र शान्त हो जाता है ॥ ३६६-३७८ ॥ प्रलापान्तकरसः धत्तूरबीजं विमलं नवमाषकसंमितम् । रसेश्वरं गन्धकं च पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ३७९ ॥ कटुत्रिकं च सौभाग्यं पृथक् तोलकसंमितम् । आदाय पेषयेद्यत्नात् कामं निम्बूकवारिणा ॥ ३८० ॥ निर्मापयेत्ततो युक्त्या वटिका रक्तिकोन्मिताः । रसोऽयं तु समाख्यातः प्रलापान्तकसंज्ञकः ॥ ३८१ ॥ विशेषतो मतोऽयं तु प्रलापपरिकृन्तनः । दीपनः पाचनश्चैव वह्निमान्द्यप्रणाशनः ॥ ३८२ ॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण नौ मासा, शुद्ध पारद छः मासा, शुद्ध गन्धक छः मासा, त्रिकटुचूर्ण तथा सुहागाचूर्ण पृथक्-पृथक् एक तोला लेकर पहिले पारे और गन्धक की कज्जली बना लें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों के चूर्ण मिला नींबू स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करें। जब गोली बनने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको प्रलापान्तक-रस कहते हैं। यह रस विशेष रूप से प्रलापोपद्रव को नष्ट करता है और दीपन- पाचन करता है तथा अग्निमान्द्य को भी नष्ट करता है ॥ ३७६-३८२ ॥ उन्मादगजांकुशः धूर्तबीजं रसं गन्धं वङ्गं रौप्यं च मारितम् । समाहरेद्भिषग्वर्यः सर्वं तु समभागिकम् ॥ ३८३ ॥ कन्याम्भसा विमर्द्याथ वटिका रक्तिकोन्मिताः । निर्मापयेत्प्रयत्नेन रसतन्त्रविशारदः ॥ ३८४ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो ह्युन्मादद्विरदांकुशः । हन्त्युन्मादं विशेषेण तथा ज्वरनिबर्हणः ॥ ३८५ ॥ उन्मादगजांकुशरसे—रौप्यं रजतम् , कन्याम्भसा कुमारीरसेन । उन्माद- द्विरदांकुश इति उन्माद एव द्विरदो हस्ती, तस्य वशीकरणाय अङ्कुश इवेति भावः ॥ ३८३-३८५ ॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण, शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, वंगभस्म, रजत- भस्म, प्रत्येक समभाग में लेवें। पहिले पारे और गन्धक की कज्जली बनायें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों के चूर्ण मिला घीकुंआर के स्वरस से अच्छी तरह मर्दन
७१८ रसतरङ्गिणी करके एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको उन्मादगजांकुश रस कहते हैं। यह रस विशेष रूप के उन्मादरोग में काम आता है और ज्वरों को भी नष्ट करता है ॥ ३८३-३८५ ॥ ग्रन्थिशोथनिवारिका वर्तिका धत्तूरस्य फलं त्वेकं तथैत्र विषतिन्दुकम् । तोलकं प्रमितञ्चैव चूर्णितं कृष्णजीरकम् ॥ ३८६ ॥ सह्रासारं मोचरसं कृष्णजीरकभागिकम् । समादाय स्नुहीपत्ररसन परिमर्दयेत् ॥ ३८७ ॥ वर्तिकाः कारयेद्वैद्यो माषकत्रयसंमिताः । ग्रन्थिकज्वरसम्भूतग्रन्थिशोथनिवारिकाः ॥ ३८८ ॥ वर्तिकैका शिलायां तु सङ्घृष्य विमलाम्भसा । प्रलिप्ता शमयत्याशु ग्रन्थिशोथं सुदारुणम् ॥ ३८९ ॥ दिने वारद्वयं वापि वारत्रयमथापि वा । सङ्घृष्य वर्तिकामेकां लेपयेद्विषजां वरः ॥३९० ॥ ग्रन्थिशोथनिवारिका वर्तिः—तथैवेत्येकसङ्ख्याकमेव । सहसारः कुमारीसारः “मुसव्वर” इति ख्यातः ॥ ३८६-३९० ॥ भा.टी.—धतूरे का एक फल, कुचलाबीज एक, कालाजीराचूर्ण एक तोला, एलुआ (मुसव्वर), मोचरस, प्रत्येक को एकं तोला लेकर सबको एकत्र सेहुँड़ के दूध के साथ खूब मर्दन करें। जब बत्ती बनाने योग्य हो जाय तो इसकी तीन-तीन मासे की बत्तियाँ लें। इसको ग्रन्थिशोथहर वर्तिका कहते हैं। एक बत्ती को लेकर साफ पत्थर में स्वच्छ जल के साथ घिसकर इसका लेप करने से शीघ्र ही भयंकर ग्रन्थिशोथ मिट जाता है। दिन में दो बार अथवा तीन बार एक बत्ती को जल से घिसकर लेप करना चाहिए ॥ ३८६-३९० ॥ वक्तव्य—धतूरबीज, कालीमिर्च, कपूर, अफीम तथा सोयाबीज, प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र खरल में बकरी के दूध से मर्दन करें। इसकी मोटी गाढ़ी पीठी सी बनाकर इसको बार-बार शिर के आधे भाग में लेप करने से भयंकर अर्धावभेदक शूल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। अथ भंगाया नामानि भङ्गा भङ्गी मातुलानी मादिनी मातिका तथा । मातुली विजया तन्द्राकारिणी बहुवादिनी ॥ ३९१ ॥
चतुर्विंशस्तरङ्ग ७१६ भा.टी.—भंगा, भंगी, मातुलानी, मादिनी, मातिका, मातुली, विजया, तन्द्राकारिणी तथा बहुवादिनी, ये सब नाम भांग के कहे जाते हैं ॥३६१॥ वक्तव्य—भांग का काश्मीर और पश्चिमी हिमालय में तथा सर्वत्र मैदानों में होनेवाला एक ऊंचा सीधा वार्षिक क्षुप होता है। इसका तना ४ से ८ फुट लम्बा, पत्ते सात अंगुलियोंवाले होते हैं। इनका प्रत्येक पद्म लम्बा, दन्तुर और नोकीला होता है। फूल छोटे पत्तों के पद्म में लगते हैं जिन में छोटे-छोटे फल लगते हैं। एक-एक फल में एक-एक बीज होता है। फूल तथा फलों की मञ्जरी, बीज, पत्र या इन पर लगा हुआ Resin काम आता है। मादाक्षुप के Resin से युक्त अपक्वपुष्पों को "गांजा" कहते हैं। अपक्वपुष्पों में मादकपदार्थ अधिक रहता है और पक जाने पर कम हो जाता है। गांजे में Cannabis Resin २०% होता है। क्षुप के तरुण पत्रों और फलों को "भांग" कहते हैं। भांग में Resin १०% होता है। पत्तों और फलों पर स्वभावतः उत्पन्न हुए Resin को इकट्ठा किया जाता है और इसे "चरस" कहते हैं। यह Resin प्रायः ६००० फुट ८००० फुट की ऊंचाई पर होनेवाले क्षुपों पर अधिक आता है। इस चरस में Cannabine Resin ४०% होता है। इसे तम्बाकू के साथ मिलाकर कई साधु और गृहस्थ लोग पीते भी हैं। भांग में एक Resin होता है जो इसका क्रियाशील तत्व है और Can- nabis Resin कहाता है। भांग की अधिक मात्रा खायी जाने पर रोगी का शरीर शिथिल हो जाता है और वह बेहोश हालत में पड़ा रहता है। इसके लिए निम्बू का रस या और कोई वानस्पतिक खटाई खिलानी चाहिए। तीव्रावस्था में कुचला, Stri Chinine आदि उत्तेजक औषधियाँ देनी चाहिए। भङ्गायाः परिचयः भङ्गा तु क्षुपजातीया सर्वत्र सुलभा मता । अतः परिचयस्तस्या विस्तरान्न प्रदर्शितः ॥३६२॥ दलद्रवो दलं बीजं मातुलान्या विशेषतः । प्रयुज्यते भेषजेषु कामं रसचिकित्सकैः ॥३६३॥ भा.टी.—भांग एक क्षुप जाति का पौधा है, प्रायः सभी देश में पाया जाता है, इसीलिए इसका विस्तार नहीं बताया गया है। इसकी पत्ती का रस, पत्ती और बीज का व्यवहार प्रायः वैद्यसमुदाय करता है ॥३६२, ३६३॥
७२० रसतरङ्गिणी भङ्गायाः प्रथमः शोधनप्रकारः मातुलानीं शुष्कपत्रां सलिले तु निमज्जयेत् । निष्पीड्य शुष्कां गव्याज्ये भर्जयेन्मन्दवह्निना ॥३६४॥ सुभृष्टामथ विज्ञाय सत्वरं तु समाहरेत् । इत्थं विशोधितां भङ्गां सर्वत्र विनियोजयेत् ॥३६५॥ भा.टी.—सूखी हुई भांग के पत्रों को जल में भिगोकर निचोड़ लें । अब इन पत्तों को धूप में सुखाकर गोघृत में मन्द-मन्द अग्नि से भून लें । जब अच्छी तरह भुन जायँ तो इन्हें नीचे उतार रख लें । इस तरह भांग के पत्ते शुद्ध हो जाते हैं । इन्हें सर्वत्र भांग के प्रयोगों में काम लायें ॥३६५॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः भङ्गां विशुष्ककामादाय बब्बूलत्वक्कषायतः । स्वेदयेद् घटिकार्द्धं तु मध्यमप्रानलयोगतः ॥३६६॥ विज्ञाय विजयां स्विन्नां घर्मे खलु विशाषयेत् । एवं संस्वेदिता भङ्गां शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥३६७॥ एवं विशोधितां भङ्गां पिष्ट्वा गोदुग्धयोगतः । कामोद्दीपनयोगेषु विशेषेण नियोजयेत् ॥३६८॥ भङ्गा तिक्ता लघुस्तीक्ष्णा ग्राहिणी कफहारिणी । दीपना पाचनी चैव पित्तला मदकारिणी ॥३६९॥ भा.टी.—सूखे हुए भांग के पत्तों को लेकर उन्हें बबूर की छाल के क्वाथ में २५ या तीस मिनट तक मध्यम अग्नि में स्वेदन करें । जब अच्छी तरह से उबल जायँ तो क्वाथ से निकालकर धूप में सुखा लें । इस प्रकार बबूर के क्वाथ में उबाली हुई भांग उत्तम रूप से शुद्ध हो जाती है । उक्त विधि से शुद्ध की हुई भांग को गोदुग्ध के साथ पीसकर कामोद्दीपक योगों में विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है । भांग के पत्ते रस में कड़वे, लघुगुण और तीव्र प्रभावक होते हैं । इसका शरीर में, विशेषतः महास्रोतों में ग्राही प्रभाव होता है । इसके सेवन से कफप्रकोप शान्त हो जाता है, अग्नि दीप्त होती तथा आमरस का परिपाक होता है । इसके सेवन से शरीर में पित्त की वृद्धि होती है और नशा आता है ॥३६६–३६६॥ भङ्गाया विशिष्टगुणाः भङ्गा ह्युद्दीपनी चैव ध्वजभङ्गहरा परम् ।
स्वप्नमेहहरा चैव शुक्रस्तम्भनकारिणी ॥४००॥ निद्राप्रदायिनी कामं कामोद्दीपनकारिणी । प्रलापनाशिका चैव धनुःस्तम्भहरा तथा ॥४०१॥ आन्त्रशूलहरा चैव वृक्कशूलप्रणाशिनी । पित्तशोषजशूलघ्नी त्वामाशयबलप्रदा ॥४०२॥ अजीर्णजातिसारघ्नी तथाजीर्णनिवारिणी । उन्मादनाशिनी चैव वृक्कशोथंव्यथाहरा ॥४०३॥ मूत्रला रक्तसंयुक्तमूत्रस्रावनिवारिका । विचित्रानन्दजननस्वप्नसन्तानकारिका ॥४०४॥ अर्शोव्यथाहरा चैव किञ्चिज्ज्वरनिवारिका । व्रणमेहसमुद्भूतशिश्नोत्थानव्यथाहरा ॥४०५॥ नाडीदौर्बल्यसम्भूतं तथाक्षेपसमुत्थितम् । रजःशूलं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥४०६॥ आमाशयोत्थशूलघ्नी यक्ष्मकासहरा परम् । बस्त्याक्षेपहरा चैव साक्षेपतमकापहा ॥४०७॥ दारुणाक्षेपसंयुक्तमतिकष्टप्रदायिनम् । परं सङ्क्रामकं कासं विनिहन्ति विशेषतः ॥४०८॥ रजोनिवृत्तिकाconsumerलोत्थां प्रौढावस्थाक्षये तथा । शीर्षव्यथां तु नारीणां विनिहन्ति सुदारुणाम् ॥४०६॥ गर्भस्रावसमुद्भूतां मासिकस्रावकालजाम् । रक्तप्रदरजां वापि वृद्धां रक्तस्रुतिं जयेत् ॥४१०॥ आलपन् विस्मरेद् यन्त्रं स्वकीयं पूर्वभाषितम् । दौर्बल्यं मानसोद्भूतं विनाशयति सत्वरम् ॥४११॥ अन्नजातं तु निखिलं भुक्तं यत्र न जीर्यति । अजीर्णं नाशयत्याशु सारुचिं क्षुद्विवर्जितम् ॥४१२॥ अर्द्धावभेदकोपेताकाचरोगनिवारिका । सङ्कोचनी तथा श्रोत्रदृष्टिशक्तिविवर्द्धिनी ॥४१३॥ भङ्गायाः गुणाः—क्षुद्दीपनो क्षुधावृद्धिकरी, पित्तशोषजशूललक्षणं नारि- केललवणस्य गुणव्याख्याने द्रष्टव्यम् । अजीर्णजातिसारघ्नीति अजीर्णजातमती- सारं हन्ति । विचित्रानन्दजननेत्यादि—अस्याः प्रयोगात् निद्राविष्टः पुरुषः
७९२ रसतरङ्गिणी स्वप्ने विचित्राण्यानन्दजननानि रूपाणि पश्यति । शिश्नोत्थानं ध्वजहर्षः । वस्त्याक्षेपः मूत्राशये जायमानः आक्षेपः ॥३६६-४१३॥ आ.टी.—भांग क्षुधा बढ़ानेवाली और उत्तम ध्वजभंगरोगहर है । इसके सेवन से स्वप्नप्रमेह (Night-discharge) में आराम आता है और वीर्य की स्तम्भनशक्ति बढ़ जाती है। इसके सेवन से अच्छी नींद आती है और कामोद्दीपन होता है। यदि रोगी अधिक प्रलाप आदि करता हो तो इसके योग देने से वह निद्रा में बदल जाते हैं। धनुःस्तम्भ रोग में इसके सेवन से लाभ होता है। आन्त्रशूल तथा वृक्कों में शूल होने पर इसके योग को दिया जाता है। पित्तशोष के कारण होनेवाले शूल को यह नष्ट करती है और आमाशय के बल को बढ़ाती है। अजीर्ण के कारण होनेवाले अतीसार तथा अजीर्ण रोग को नष्ट करती है। इसके योगों को उन्माद रोग में दिया जाता है और इससे वृक्कशोथजन्य पीड़ा भी शान्त हो जाती है। यह मूत्र को अधिक मात्रा में लाती है और रक्तमिश्रित मूत्रस्राव को रोकती है। स्वस्थावस्था में इसके सेवन से विचित्र आनन्ददायक निद्रा की वृद्धि होती है। बाह्यप्रयोग में बवासीर के मस्सों का कष्ट दूर होता है। साधारण रूप से ज्वर को भी मिटाती है। सुजाक में होनेवाली मेढ़ेन्द्रिय-स्तब्धता की पीड़ा को इसके लेप आदि से शान्ति मिलती है। इसके सेवन से नाड़ियों की दुर्बलता के कारण आक्षेपयुक्त माहवारी की पीड़ा अति शीघ्र दूर हो जाती है। आमाशय में शोथ के कारण होनेवाले शूल तथा राजयक्ष्मा के कास में इसके सेवन से शीघ्र आराम आता है। यदि किसी कारण वस्ति में आक्षेप हो अथवा शरीर में आक्षेपयुक्त तमक श्वास हो तो इसके योगों से लाभ होता है। अत्यन्त कष्टदायक तथा तीव्र आक्षेपयुक्त संक्रामक कास (हूपिंग कफ) में इससे विशेष लाभ देखा जाता है। स्त्री की प्रौढावस्था के अन्त में जब उसकी माहवारी बन्द हो जाती है तो इसके कारण शिर में कभी-कभी या हर समय तीव्र वेदना होती है। इस वेदना के लिए भांग के योग लाभकारी होते हैं। गर्भस्राव या गर्भपात के कारण होनेवाली अधिक रक्तप्रवृत्ति अथवा मासिक स्राव के समय, या रक्त- प्रदरजन्य अधिक रक्तप्रवृत्ति में भी इसके योगों के सेवन से आराम आता है। इस प्रकार की मानसिक दुर्बलता में जब मनुष्य बात करते हुए अपनी पहलो बात को भूल जाय तो इसके कुछ काल तक बहुत अल्प मात्रा में सेवन करने से यह मानसिक दुर्बलता मिट जाती है। ऐसे अजीर्ण में जहाँ किसी प्रकार का खाना-पीना हजम न होता हो और भोजन में अरुचि के साथ भूख भी नहीं
लगती हो तो इसके योगों के सेवन से आराम आता है। आधे शिर में पीड़ा के साथ होनेवाला काच रोग (मोतिया बिन्द) अर्थात् नीला मोतिया में इसके सेवन से आराम आता है। इसके सेवन से अथवा बाह्यप्रयोग से स्था- निक रक्तवाहिनी में संकोच हो जाता है और कर्ण एवं नेत्रों को श्रवण एवं दर्शन शक्ति बढ़ती है ॥३६६-४१३॥ वक्तव्य—विजया थोड़ी मात्रा में अग्निदीपक एवं क्षुधावर्धक है। अहिफेन के समान अतीसार प्रवाहिकाहर है, किन्तु मलबन्धक नहीं है। इसका विशेष प्रभाव मस्तिष्क पर होता है। थोड़ी मात्रा में यह हर्षजनक, मध्यम मात्रा में प्रलापक और अति मात्रा में निद्राजनक है। प्रथमावस्था में खानेवाले को शारीरिक और मानसिक परिश्रम का स्मरण नहीं रहता है और वह बहुत प्रसन्नचित्त प्रतीत होता है। उसे समय और व्यक्ति का ठीक ठीक ज्ञान नहीं रहता है। दूसरी अवस्था में अर्थात् जब विजया की मात्रा कुछ अधिक हो तो मादक (नशा) प्रभाव होता है। मनुष्य प्रत्येक बात पर खूब हँसता और उच्छृङ्खल होकर बोलता है। यदि अधिक मात्रा दी जाय तो मनुष्य निद्रित और शिथिल हो जाता है। मस्तिष्क के अतिरिक्त वातनाड़ियों पर भी इसका प्रभाव होता है। संज्ञावाहिनियों के निःसंज्ञ हो जाने से संज्ञानाशक प्रभाव त्वचा पर होता है। शरीर की शूल न्यून हो जाती या लुप्त हो जाती है। अतः विजया शूलहर है। यद्यपि विजया का शूलहर प्रभाव अहिफेन और धतूर की अपेक्षा कुछ निर्बल है। यदि मांसपेशियों में तीव्र उद्धर्त आक्षेप हो तो वे भी विजया के द्वारा शान्त हो जाते हैं, जिससे आक्षेप रोग, हनुस्तम्भ- रोग तथा अन्य वातरोग में आराम आता है। थोड़ी मात्रा में देने से यह उत्पादक अंगों का बल बढ़ाने के कारण बाजीकरण भी है। भंगाया मात्रा द्विगुञ्जातः समारभ्य चतुर्गुञ्जमितां परम्। भङ्गां खलु प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥४१४॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बलाबल देखकर, देश, काल आदि का निश्चय करके विजया को दो रत्ती से लेकर चार रत्ती की मात्रा तक प्रयोग करना चाहिये। ४१४॥ भंगाया आग्रिमकः प्रयोगः आर्द्रा विशुष्का वा भङ्गा त्वजादुग्धेन पेषिता। प्रलिप्ता पादतलयोः निद्रां जनयति द्रुतम् ॥४१५॥
७२४ रसतरङ्गिणी भङ्गा सुश्लक्ष्णसंपिष्टा शिलायां विमलाम्भसा । कोष्णोपनाहयोगेन कथिताशोर्व्यथाहरा ॥४१६॥ धूम्रपानविधानेन भङ्गा युक्त्याथवाशिता ॥ साक्षेपं तमकश्वासं कासं संक्रामकं हरेत् ॥४१७॥ आमयिकप्रयोगे—धूम्रपानविधानेन प्रयुक्ता अथवा अशिता भङ्गिता साक्षेपं तमकश्वासं तथा सङ्क्रामकं कासं “Whooping Cough” इति ख्यातं हरति ॥ भा.टी.—गीली या सूखी भांग की पत्तियों को खरल में बकरी के दूध के साथ पीस कर पैरों के तलवों पर लेप करने से शीघ्र ही नींद आने लगती है। बवासीर के मस्सों में अधिक पीड़ा होने पर भांग की पत्तियों को सिल पर जल के साथ पीसकर इसकी गुनगुनी पुलटिस गुदा पर बाँधने से पीड़ा शान्त हो जाती है। आक्षेप युक्त तमकश्वास ( दमा ) में भांग का धूम्रपान करने से दमा का दौरा कम हो जाता है। संक्रामक कास ( Whooping Cough ) में थोड़ी सी भांग खिलाने अथवा भांग के योग देने से कास का आक्षेपयुक्त कष्ट कम हो जाता है ॥४१५-४१७॥ मदनोदयमोदकः जातीपत्रीफले मांसी लवङ्गं चन्द्रकुङ्कुमम् । एला दारुसिता व्योषं वङ्गं जीरकमभ्रकम् ॥४१८॥ लोहं च रससिन्दूरं पृथक् तोलकसंमितम् । शतावरी गोक्षुरको द्राक्षा कर्कटशृङ्गिका ॥४१९॥ बलात्मगुप्ता कुष्ठं च वृद्धदारकबीजकम् । चूर्णीकृतं सर्वमेतत् पृथक कर्षद्वयोन्मितम् ॥४२०॥ भङ्गा विशोधिता चैव पूर्वचूर्णांर्द्धसंमिता । सितां सर्वद्विगुणितां दत्त्वा रसविशारदः ॥४२१॥ आरभ्य माषत्रितयाद्रसमाषकसंमितान् । निर्मापयेन्मोदकांस्तु खलु मोदकपाकवित् ॥४२२॥ नामतोऽयं समाख्यातो मदनोदयमोदकः । मदनोद्दीपनकरो विशेषात्परिकीर्तितः ॥४२३॥ शृतं परं घनीभूतं सितैलासंयुतं पयः । अनुपाने प्रयोक्तव्यं तदतीव हि बृंहणम् ॥४२४॥
चतुर्विंशस्तरङ्गः ७२५ मोदकस्यास्य सततं मासत्रयनिषेवणात् । कामरूपो भवेन्मर्त्यस्तथा भीमपराक्रमः ॥४२५॥ स्मरस्मयस्मेरदृशो नवयौवनघूर्णिताः । प्रमदास्तोषयत्यस्य सेवकोऽपतितध्वजः ॥४२६॥ मदनोदयमोदकः-जातिपत्रीफले इति जातिपत्री जातिफलञ्चेति । मांसी जटा- मांसी, चन्द्रः कर्पूरम्, दारुसिता गुडत्वक् । विशोधिता भंगा जातिपत्यादीनां चूर्णादर्द्धपरिमाणा ग्राह्या । रसमाषकसंमितानीति षएमाषकप्रमितान्॥४१८-४२६॥ भा.टी. - जावित्री, जायफल, जटामांसी, लौंग, कपूर, काश्मीरी केसर, छोटी इलायची बीज, दालचीनी, सोंठ, मिर्च, पीपल, बंगभस्म, अभ्रक (कृष्ण) भस्म, लोहभस्म, रससिन्दूर, प्रत्येक एक-एक तोला, शतावर चूर्ण, गोखरूचूर्ण, मुनक्का या किसमिस, काकड़ासिंगीचूर्ण, खरेटीमुलचूर्ण, कौंचबीजचूर्ण, बीज- बन्द, कूट, विधाराबीजचूर्ण, प्रत्येक दो-दो तोला लें । भांग का चूर्ण इन सब से आधा भाग, खांड़ भांगसहित सब औषधियों से दुगुनी लें । अब सबको एकत्र अच्छी तरह पीसकर (खांड को छोड़कर) रख लें । खांड की चाशनी बना उसमें जावित्री आदि अन्य सब औषधियों को मिलाकर ३ मासे से लेकर छः मासे तक के मोदक (लड्डू) बना लें । इन मोदकों को 'मदनोदय मोदक' कहा जाता है । यह मोदक सेवन करने पर विशेष रूप से कामशक्ति को बढ़ाते हैं । इन मोदकों को उचित मात्रा में खाकर अनुपान में खूब औटाये हुए गाढ़े दूध में खांड और इलायची चूर्ण मिला पीना चाहिए । इस दूध के अनुपान से ये मोदक शरीर को बृंहण (मोटा) करते हैं । इन मोदकों को विधिपूर्वक उक्त दूध के साथ निरन्तर तीन मास तक सेवन करने से मनुष्य का शरीर कामदेव के सदृश हो जाता है और उसमें भीम के समान बल आ जाता है ॥४१८-४२६॥ त्रैलोक्यविजया वटी भङ्गासत्त्वं भागिकं तु पूर्वोक्तविधिसोधितम् । तुगाक्षीरीरजश्चैव भागत्रितयसम्मितम् ॥४२७॥ संमर्द्य वारिणा खल्वे वाटिका रक्तिकोन्मिताः । निर्मापयेत्प्रयत्नेन रसतन्त्रविचक्षणः ॥४२८॥ वटिकैयं समाख्याता त्रैलोक्यविजयाभिधा । प्रलापोन्मादशमनी वृक्कशूलप्रणाशिनी ॥४२६॥ रजःशूलहरा चैव यक्ष्मकासनिवारिका !
७२६ रसतरङ्गिणी अतीसारप्रशमनी स्वप्नमेहनिषूदनी ॥४३०॥ त्रैलोक्यविजया वटी-भङ्गासत्त्वं पूर्वोक्तेन विधिनेति वन्यौषधिसत्त्वनिर्माणसाध- नेन यन्त्रविज्ञानीयोक्तेन बाष्पस्वेदनयन्त्रेण साधनीयम्। स्पष्टमन्यत्॥४२७-४३०॥ भा.टी.—वन्य-औषधि-सत्व-साधन-विधि से बनाया हुआ भांग का सत्व तीन भाग, वंशलोचनचूर्ण तीन भाग लेकर दोनों एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करके अच्छी तरह सावधानी से एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इन गोलियों को त्रैलोक्यविजया वटी कहा जाता है। यह वटी सेवन करने पर प्रलाप, उन्माद को शान्त करती और वृक्क शूल को नष्ट करती है। माहवारी के समय होनेवाले रजःकष्टजन्य शूल को दूर करती और राजयक्ष्मा के कास को मिटाती है। इसके सेवन से पुरातन अतीसार नष्ट हो जाता है और स्वप्नदोष होना बन्द हो जाता है ॥४२७-४३०॥ त्रैलोक्यसंमोहनरसः त्रैलोक्यविजयां शुद्धां भानुतोलकसंमिताम् । हिंगुलं रससिन्दूरं घनसारं लवंगकम् ॥४३१॥ अभ्रकं शङ्खभसितं पृथक् तोलकसंमितम् । गोक्षुरो वानरीबीजं तथा कर्कटशृङ्गिका ॥४३२॥ चूर्णीकृतं पृथक् चैतत्तोलकद्वयसंमितम् । समादाय भिषग्वर्यः सप्तधा सुविधानतः ॥४३३॥ भङ्गायाः शतपुत्र्याश्च स्वरसेन विभावयेत् । निर्मापयेत्तु वटिका रक्तित्रितयसंमिताः ॥४३४॥ यतः स्मरस्यापि कटाक्षपातैः स्त्रीणां तु संमोहनकारिणीनाम् । संमोहनं वै विदधाति तस्मात् त्रैलोक्यसंमोहनसंज्ञकोऽयम् ॥४३५॥ वामावश्यकरः परं रुचिकरः क्लैब्यापहारी पर हर्षोत्साहकरो धृतिस्मृतिकरः शुक्रातिसंस्तम्भनः । पुत्रोत्पत्तिकरो रतिप्रियकरः सर्वत्र सौख्याकरः सेव्योऽयं खलु कामिभी रसवरस्त्रैलोक्यसंमोहनः ॥४३६॥ त्रैलोक्यसंमोहनः—भङ्गा शुद्धा १२ तोलकप्रमिता। वानरीबीजं आत्मगुं- प्ताबीजम्। शतपुत्री शतावरी ॥४३२-४३६॥ भा.टी.—शुद्ध भांग की पत्ती बारह तोला, शुद्ध हिंगुल, रससिन्दूर, कपूर तथा लौंग का चूर्ण, कृष्णाभ्रकभस्म, प्रत्येक एक-एक तोला। गोखरूबीजचूर्ण,