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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

सूक्त—७४ देवता—अश्विनीकुमार इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना. अयं वामह्वेऽवसे शचीवसू विशंविशं हि गच्छथः.. (१) हे निवासदाता अश्विनीकुमारो! स्वर्ग चाहने वाले लोग तुम्हें बुलाते हैं. हे कर्मरूपी धन के स्वामी अश्विनीकुमारो! यह वसिष्ठ भी रक्षा के लिए तुम्हें बुलाता है, क्योंकि तुम सब प्रजाओं के पास जाते हो. (१) युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदेथां सूनृतावते. अर्वाग्रथं समनसा नि यच्छतं पिबतं सोम्यं मधु.. (२) हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारे पास जो उपभोग के योग्य धन है, उसे स्तोता के पास जाने की प्रेरणा दो. तुम समान रूप से प्रसन्न होकर अपना रथ हमारे सामने लाओ एवं मधुर सोमरस पिओ. (२) आ यातमुप भूषतं मध्वः पिबतमश्विना. दुग्धं पयो वृषणा जेन्यावसू मा नो मर्धिष्टमा गतम्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! आओ, हमारे पास बैठो एवं सोमरस पिओ. हे अभिलाषापूरक एवं धन जीतने वाले अश्विनीकुमारो! जल का दोहन करो, हमें मत मारो एवं जाओ. (३) अश्वासो ये वामुप दाशुषो गृहं युवां दीयन्ति बिभ्रतः. मक्षूयुभिर्नरा हयेभिरश्विना देवा यातमस्मयू.. (४) हे नेता अश्विनीकुमारो! जो घोड़े तुम्हें हव्यदाता यजमान के घर में धारण करते हुए पहुंचते हैं, उन्हीं तेज चलने वाले घोड़ों की सहायता से तुम हमारी कामना करते हुए आओ. (४) अधा ह यन्तो अश्विना पृक्षः सचन्त सूरयः. ता यंसतो मघवद्भ्यो ध्रुवं यशश्छर्दिरस्मभ्यं नासत्या.. (५) हे अश्विनीकुमारो! स्तुतियों के उच्चारण के साथ चलने वाला यजमान एवं बुद्धिमान् स्तोता बहुत सा अन्न धारण करते हैं. हम अन्नधारियों को स्थायी यश एवं घर दो. (५) प्र ये ययुरवृकासो रथा इव नृपातारो जनानाम्. उत स्वेन शवसा शूशुवुर्नर उत क्षियन्ति सुक्षितिम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! दूसरे का धन ग्रहण न करने वाले एवं मनुष्यों में ऋत्विजों का रक्षण करने वाले जो यजमान रथ के समान तुम्हारे समीप आते हैं, वे अपनी शक्ति से बढ़ते हैं एवं ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७५ देवता—उषा

शोभनघर में आश्रय पाते हैं. (६) सूक्त—७५ देवता—उषा व्यु१षा आवो दिविजा ऋतेनाऽऽविष्कृण्वाना महिमानमागात्. अप द्रुहस्तम आवरजुष्टमङ्गिरस्तमा पथ्या अजीगः.. (१) उषा ने अंतरिक्ष में उत्पन्न होकर प्रकाश फैलाया एवं वह अपने तेज से अपनी महिमा प्रकट करती हुई आई. उषा ने सबके अप्रिय शत्रुरूपी अंधकार को दूर भगाया एवं प्राणियों के व्यवहार के लिए अतिशय गंतव्य मार्गों को प्रकट किया. (१) महे नो अद्य सुविताय बोध्युषो महे सौभागाय प्र यन्धि. चित्रं रयिं यशसं धेह्यस्मे देवि मर्तेषु मानुषि श्रवस्युम्.. (२) हे उषा! आज हमारी महान् सुखप्राप्ति के लिए जागो एवं हमें महान् सौभाग्य दो. हे मानवहितकारिणी उषादेवी! हमें यशयुक्त विचित्र धन दो एवं हम मानवों को अन्न वाला पुत्र दो. (२) एते त्ये भानवो दर्शतायाश्चित्रा उषसो अमृतास आगुः. जनयन्तो दैव्यानि व्रतान्यापृणन्तो अन्तरिक्षा व्यस्थुः.. (३) दर्शनीय उषा की ये विशाल, आश्चर्यजनक एवं विनाशरहित किरणें देवसंबंधी यज्ञों का आरंभ करती हुई एवं अंतरिक्ष को व्याप्त करती हुई आती हैं एवं फैलती हैं. (३) एषा स्या युजाना पराकात्पञ्च क्षितीः परि सद्यो जिगाति. अभिपश्यन्ती वयुना जनानां दिवो दुहिता भुवनस्य पत्नी.. (४) स्वर्ग की पुत्री एवं भुवनों का पालन करने वाली उषा प्राणियों की पहचान करती है एवं दूर देश में स्थित होकर भी उद्योग करती हुई पांच वर्णों के पास जाती है. (४) वाजिनीवती सूर्यस्य योषा चित्रामघा राय ईशे वसूनाम्. ऋषिष्टुता जरयन्ती मघोन्युषा उच्छति वह्निभिर्गृणाना.. (५) अन्न की स्वामिनी सूर्य की पत्नी एवं विचित्र धन से युक्त उषा सभी धनों की अधिकारिणी है. ऋषियों द्वारा स्तुत, बुढ़ापे तक लंबी उम्र देने वाली एवं धनयुक्ता उषा यजमान की स्तुतियां सुनकर प्रकाश करती है. (५) प्रति द्युतानामरुषासो अश्वाश्चित्रा अदृश्रन्नुषसं वहन्तः. याति शुभ्रा विश्वपिशा रथेन दधाति रत्नं विधते जनाय.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

दीप्तिशालिनी उषा को वहन करने वाले, तेजस्वी एवं रंगबिरंगे घोड़े दिखाई दे रहे हैं. उज्ज्वल वर्ण वाली उषा अनेक रूपवाले रथ द्वारा सब जगह जाती है एवं अपने भक्त को रत्न देती है. (६) सत्या सत्येभिर्महती महद्भिर्देवी देवेभिर्यजता यजत्रैः. रुजद् दृळहानि दददुस्रियाणां प्रति गाव उषसं वावशन्त.. (७) सच्ची, महती एवं यज्ञपात्र उषादेवी अन्य सच्चे, महान् एवं यज्ञपात्र देवों के साथ मिलकर दृढ़तर अंधकार का नाश करती है एवं गायों के घूमने हेतु प्रकाश देती है. गाएं उषाओं की कामना करती हैं. (७) नू नो गोमद्वीरवद्वेहि रत्नमुषो अश्वावत्पुरुभोजो अस्मे. मा नो बर्हिः पुरुषता निदे कर्यूं पातं स्वस्तिभिः सदा नः.. (८) हे उषा! हमें गायों, वीरों एवं अश्वों से युक्त धन दो. तुम हमें बहुत सा अन्न दो. तुम पुरुषों के बीच हमारे यज्ञ की निंदा मत करना. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (८) सूक्त—७६ देवता—उषा उद् ज्योतिरमृतं विश्वजन्यं विश्वानरः सविता देवो अश्रेत्. क्रत्वा देवानाम्जनिष्ट चक्षुराविरकभुवनं विश्वमुषाः.. (१) सबके नेता सविता देव विनाशरहित एवं सर्वजन-हितकारी ज्योति का आश्रय लेकर ऊंचे उठते हैं. वे देवकर्मों अर्थात् यज्ञों के हेतु उत्पन्न हुए हैं. उषा ने सभी देवों का नेत्र बनकर सारे लोक को आविष्कृत किया है. (१) प्र मे पन्था देवयाना अदृश्रन्नमर्धन्तो वसुभिरिष्कृतासः. अभूदु केतुरुषसः पुरस्तात्प्रतीच्यागादधि हर्म्येभ्यः.. (२) मैंने हिंसा न करने वाले एवं तेजों द्वारा परिष्कृत देवयान मार्ग देखे हैं. उषा का ज्ञान कराने वाला प्रकाश पूर्व दिशा में था. वह उषा हमारे सामने ऊंचे स्थानों से आती है. (२) तानीदहानि बहुलान्यासन्‍या प्राचीनमुदिता सूर्यस्य. यतः परि जारइवाचरन्त्युषो ददृक्षे न पुनर्यतीव.. (३) हे उषा! तुम्हारा जो तेज सूर्य से पहले उदित होता है एवं जिस तेज के सामने तुम अपने पति सूर्य के समीप साध्वी नारी के समान दिखाई देती हो, तुम्हारा वह तेज अधिक मात्रा में है. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

त इद्देवानां सधमाद आसन्नृतावानः कवयः पूर्व्यासः. गूह्ळं ज्योतिः पितरो अन्वविन्दन्सत्यमन्त्रा अजनयन्नुषासम्.. (४) जिन सत्ययुक्त, क्रांतदर्शी व पूर्वकाल में उत्पन्न पितरों ने अंधकार से ढके तेज को प्राप्त किया एवं सत्यमंत्र शक्ति वाला बनकर उषाओं को उत्पन्न किया, वे देवों के साथ-साथ प्रमुदित होते थे. (४) समान ऊर्वे अधि सङ्गतासः सं जानते न यतन्ते मिथस्ते. ते देवानां न मिनन्ति व्रतान्यमर्धन्तो वसुभिर्यादमानाः.. (५) वे पितर पणि द्वारा चुराई गायों को प्राप्त करने हेतु मिले थे एवं एक निश्चय पर पहुंचे थे. क्या उन्होंने मिलकर यत्न नहीं किया था? अर्थात् अवश्य किया था. वे देवसंबंधी यज्ञकर्मों का विनाश नहीं करते थे एवं हित न करते हुए उषा के वासदाता तेजों से मिलते थे. (५) प्रति त्वा स्तोमैरीळते वसिष्ठा उषर्बुधः सुभगते तुष्टुवांसः. गवां नेत्री वाजपत्नी न उच्छोषः सुजाते प्रथमा जरस्व.. (६) हे सुंदरी उषा! प्रातःकाल जगाने वाले वसिष्ठवंशीय ऋषि स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी बार-बार स्तुति करते हैं. हे गाएं प्राप्त कराने वाली एवं अन्नदात्री उषा! हमारे लिए प्रकाश करो. हे शोभनजन्म वाली उषा! तुम्हारी स्तुति सर्वप्रथम हो. (६) एषा नेत्री राधसः सूनृतानामुषा उच्छन्ती रिभ्यते वसिष्ठैः. दीर्घश्रुतं रयिमस्मे दधाना यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) स्तुतियों की नेत्री उषा अंधकार नष्ट करती हुई स्तोता को एवं हमें सर्वत्र प्रसिद्ध धन देती है. हम वसिष्ठगोत्रीय ऋषि इस की स्तुति करते हैं. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—७७ देवता—उषा उपो रुरुचे युवतिर्न योषा विश्वं जीवं प्रसुवन्त चरायै. अभूदग्निः समिधे मानुषाणामकर्ज्योतिर्बाधमाना तमांसि.. (१) यौवनप्राप्त नारी के समान उषा समस्त जीवों को संचार के लिए प्रेरित करती हुई सूर्य के पास प्रकाशित होती है. अग्नि मनुष्यों द्वारा प्रज्वलित करने योग्य हुए हैं एवं अंधकार मिटाने वाला प्रकाश फैलाते हैं. (१) विश्वं प्रतीची सप्रथा उदस्थादृशद्वासो बिभ्रती शुक्रमश्वैत्. हिरण्यवर्णा सुदृशीकसन्दृग्गवां माता नेत्र्यह्नामरोचि.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

सब ओर से सुडौल उषा सबके सामने उदित है एवं उज्ज्वल तेज को धारण करके बढ़ रही है. सुनहरे रंग वाली, देखने योग्य तेज वाली, वाणियों की माता एवं दिनों की नेत्री उषा सुशोभित है. (२) देवानां चक्षुः सुभगा वहन्ती श्वेतं नयन्ती सुदृशीकमश्वम्. उषा अदर्शि रश्मिभिर्व्यक्ता चित्रामघा विश्वमनु प्रभूता.. (३) देवों की आंख के समान तेज धारण करने वाली, सुंदरी, अपनी किरणों से प्रकाशित विचित्र धन वाली एवं जगद्व्यवहार के लिए उन्नत उषा सुदर्शन सूर्य को श्वेत करती हुई दिखाई दे रही है. (३) अन्तिवामा दूरे अमित्रमुच्छोर्वीं गव्यूतिमभयं कृधी नः. यावय द्वेष आ भरा वसूनि चोदय राधो गृणते मघोनि.. (४) हे उषा! तुम हमारे समीप धनयुक्त एवं शत्रु को दूर करती हुई प्रकाश करो. हमारी विस्तृत गोचर धरती को भयरहित बनाओ. शत्रुओं को अलग करो एवं शत्रुओं के धन हमें दो. हे धनस्वामिनी उषा! स्तोता के पास आने के लिए धन को प्रेरणा दो. (४) अस्मे श्रेष्ठेभिर्भानुभिर्वि भाह्युषो देवि प्रतिरन्ती न आयुः. इषं च नो दधती विश्ववारे गोमदश्वावद्रथवच्च राधः.. (५) हे उषादेवी! तुम हमारी आयु बढ़ाती हुई हमारे सामने उत्तम किरणों के साथ प्रकाशयुक्त बनो. हे सबकी कमनीया उषा! हमारे लिए अन्न, गायों, अश्वों एवं रथों से युक्त धन धारण करती हुई प्रकाश करो. (५) यां त्वा दिवो दुहितर्वर्धयन्त्युषः सुजाते मतिभिर्वसिष्ठाः. सास्मासु धा रयिमृष्वं बृहन्तं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) हे शोभनजन्म वाली स्वर्गपुत्री उषा! हम वसिष्ठगोत्रीय लोग तुम्हें स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं. तुम हमें प्रदीप्त एवं महान् धन दो. हे देवो! कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (६) सूक्त—७८ देवता—उषा प्रति केतवः प्रथमा अदृश्रन्नूर्ध्वा अस्या अञ्चयो वि श्रयन्ते. उषो अर्वाचा बृहता रथेन ज्योतिष्मता वाममस्मभ्यं वक्षि.. (१) हे उषा! तुमसे पहले उत्पन्न एवं तुम्हारा ज्ञान कराने वाले प्रकाश दिखाई दे रहे हैं. तुम्हें प्रकट करने वाली किरणें सब ओर फैल रही हैं. हमारे सामने वर्तमान ज्योतियुक्त एवं विशाल रथ द्वारा हमारे लिए उत्तम धन लाओ. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

प्रति षीमग्निरुजरते समिद्धः प्रति विप्रासो मतिभिर्गृणन्तः. उषा याति ज्योतिषा बाधमाना विश्वा तमांसि दुरिताप देवी.. (२) प्रज्वलित होकर अग्नि सब जगह बढ़ते हैं. विद्वान् ऋत्विज् स्तुतियों द्वारा उषा की प्रार्थना करते हैं. प्रकाश द्वारा अंधकारों को नष्ट करती हुई उषा देवी हमारे पाप समाप्त करती हुई आती है. (२) एता उ त्याः प्रत्यदृश्रन् पुरस्ताज्ज्योतिर्यच्छन्तीरुषसो विभातीः. अजीजनन्सूर्यं यज्ञमग्निमपाचीनं तमो अगादजुष्टम्.. (३) ये प्रसिद्ध, प्रभात करने वाली एवं तेज को बढ़ाने वाली उषाएं पूर्व दिशा में दिखाई देती हैं. उषाओं ने सूर्य, अग्नि और यज्ञ को जन्म दिया, जिससे नीचे जाने वाला एवं अप्रिय अंधकार नष्ट हो गया. (३) अचेति दिवो दुहिता मघोनी विश्वे पश्यन्त्युषसं विभातीम्. आस्थाद्रथं स्वधया युज्यमानमा यमश्वासः सुयुजो वहन्ति.. (४) स्वर्गपुत्री एवं धनस्वामिनी उषा को सब जानते हैं. प्रभात करने वाली उषा को सब लोग देखते हैं. उषा अन्नयुक्त रथ पर सवार है एवं भली प्रकार जुड़े हुए घोड़े इस रथ को वहन करते हैं. (४) प्रति त्वाद्य सुमनसो बुधन्तास्माकासो मघवानो वयं च. तिल्विलायध्वमुषसो विभातीर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) हे उषा! हमारे शोभनमन वाले तथा धनस्वामी लोग एवं हम आज तुम्हें जगाते हैं. हे प्रभातकारिणी उषाओ! तुम संसार को स्नेहयुक्त कर दो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—७९ देवता—उषा व्यु१षा आवः पथ्या३ जनानां पञ्च क्षितीर्मानुषीर्बोधयन्ती. सुसन्दृग्भिरुक्षभिर्भानुमश्रेद्वि सूर्यो रोदसी चक्षसावः.. (१) मनुष्यों का हित करने वाली उषा अंधकार मिटाती है, मानवों की पांच श्रेणियों को जगाती है एवं उत्तम तेज वाली किरणों द्वारा सूर्य का सहारा लेती है. सूर्य अपने तेज से द्यावा-पृथिवी को ढक लेता है. (१) व्यञ्जते दिवो अन्तेष्वक्तून्विशो न युक्ता उषसो यतन्ते. सं ते गावस्तम आ वर्तयन्ति ज्योतिर्यच्छन्ति सवितेव बाहू.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

उषाएं अंतरिक्ष के भाग में तेज फैलाती हैं एवं प्रजा के समान मिलकर अंधकारनाश के लिए प्रयत्न करती हैं. हे उषा! तुम्हारी किरणें अंधकार का नाश करती हैं एवं सूर्य के हाथों के समान सबको प्रकाश देती हैं. (२) अभूदुषा इन्द्रतमा मघोन्यजीजनत् सुविताय श्रवांसि. वि दिवो देवी दुहिता दधात्यङ्गिरस्तमा सुकृते वसूनि.. (३) सर्वश्रेष्ठ स्वामिनी एवं धनशालिनी उषा उत्पन्न हुई है एवं उसने सबके कल्याण के लिए अन्न पैदा किया है. स्वर्ग की पुत्री एवं अतिशय गतिशील उषा देवी शोभनकर्म करने वाले के लिए धन धारण करती है. (३) तावदुषो राधो अस्मभ्यं रास्व यावत्स्तोतृभ्यो अरदो गृणाना. यां त्वा जञ्जुर्वृषभस्य रवेण वि दृळ्हस्य दुरो अद्रेरौर्णोः.. (४) हे उषा! हमें भी तुम उतना धन दो, जितना तुमने प्राचीन स्तोताओं की स्तुति सुनकर दिया था. लोग वृषभ नामक स्तोत्र के स्वर से तुम्हें जानते हैं. तुमने पणियों द्वारा गायों की चोरी के समय मजबूत द्वार खोला था. (४) देवंदेवं राधसे चोदयन्त्यस्मद्र्यक्सूनृता ईरयन्ती. व्युच्छन्ती नः सनये धियो धा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) हे उषा! प्रत्येक स्तोता को धन के लिए प्रेरित करती हुई, शोभनवचनों को हमारी ओर भेजती हुई एवं अंधकार का नाश करती हुई तुम हमारे लिए धनदान हेतु अपनी बुद्धि स्थिर करो. हे देवी! तुम अपने कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (५) सूक्त—८० देवता—उषा प्रति स्तोमेभिरुषसं वसिष्ठा गीर्भिर्विप्रासः प्रथमा अबुध्रन्. विवर्तयन्तीं रजसी समन्ते आविष्कृण्वतीं भुवनानि विश्वाँ.. (१) वसिष्ठगोत्रीय विप्र स्तुतियों एवं मंत्रसमूहों द्वारा उषा को सभी लोगों से पहले जगाते हैं. उषा समान भागों वाली द्यावा-पृथिवी को ढक लेती है एवं सारे भुवनों को प्रकट करती है. (१) एषा स्या नव्यमायुर्दधाना गूढ्वी तमो ज्योतिषोषा अबोधि. अग्र एति युवतिरह्ऱयाणा प्राचिकितत्सूर्यं यज्ञमग्निम्.. (२) यह वही उषा है जो नवयौवन धारण करती हुई एवं अपने तेज द्वारा छिपे हुए अंधकार को नष्ट करती हुई सबको जगाती है. उषा लज्जाशील युवती के समान सूर्य के आगे-आगे

चलती है तथा सूर्य, अग्नि और यज्ञ को प्रकट करती है. (२) अश्वावतीर्गोमदीर्न उषासो वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्राः. घृतं दुहाना विश्वतः प्रपीता यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३) अश्वों एवं गायों से युक्त, पुत्र देने वाली तथा प्रशंसनीय उषाएं अंधकार को सदा दूर करें. उषाएं जल दुहती हुई सब जगह बढ़ती हैं. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (३) सूक्त—८१ देवता—उषा प्रत्यु अदर्श्यायत्यु१च्छन्ती दुहिता दिवः. अपो महि व्ययति चक्षसे तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी.. (१) स्वर्ग की पुत्री उषा अंधकार मिटाती हुई एवं आती हुई दिखाई देती है. सब लोग देख सकें, इस हेतु यह रात के महान् अंधकार का नाश करती है. मानवों की शोभन नेत्री उषा प्रकाश करती है. (१) उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचाँ उद्यन्नक्षत्रमर्चिवत्. तवेदुषो व्युषषि सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि.. (२) सूर्य अपनी किरणों को एक साथ बिखेरते हैं एवं स्वयं प्रकट होकर आकाश के नक्षत्रों को दीप्तिशाली बनाते हैं. हे उषा! तुम्हारे और सूर्य के चमकने पर हम अन्न से मिलें. (२) प्रति त्वा दुहितर्दिव उषो जीरा अभुत्स्महि. या वहसि पुरु स्पार्हं वनन्वनि रत्नं न दाशुषे मयः.. (३) हे स्वर्गपुत्री उषा! शीघ्रतापूर्वक कर्म करने वाले हम तुम्हें जगाएं. हे धनस्वामिनी उषा! तुम विशाल धन के समान ही यजमान के लिए रत्न एवं सुख का वहन करती हो. (३) उच्छन्ती या कृणोषि मंहना महि प्रख्यै देवि स्वर्दृशे. तस्यास्ते रत्नभाज ईमहे वयं स्याम मातुर्न सूनवः.. (४) हे अंधकारनाशिनी एवं महिमाशालिनी महादेवी उषा! तुम सब जग को जगाने एवं देखने में समर्थ बनाती हो. हे रत्नस्वामिनी! हम तुमसे याचना करते हैं. हम तुम्हें माता के लिए पुत्र के समान प्रिय हों. (४) तच्चित्रं राध आ भरोषो यद्दीर्घश्रुत्तमम्. यत्ते दिवो दुहितर्मर्तभोजनं तद्रास्व भुनजामहै.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे उषा! वह विचित्र धन हमें दो, जो दूरदूर तक प्रसिद्ध है. हे स्वर्गपुत्री! तुम्हारे पास मानवों के उपभोग के योग्य जो धन है, वह हमें दो. हम उसका उपभोग करेंगे. (५) श्रवः सूरिभ्यो अमृतं वसुत्वनं वाजाँ अस्मभ्यं गोमतः. चोदयित्री मघोनः सूनृतावत्युषा उच्छदप स्रिधः.. (६) हे उषा! स्तोताओं को नाशरहित एवं निवासयुक्त यश दो. हमें गायों वाला धन दो. यजमान को प्रेरणा देने वाली एवं सत्य से प्रेम करने वाली उषा शत्रुओं को दूर करें. (६) सूक्त—८२ देवता—इंद्र व वरुण इद्रावरुणा युवमध्वराय नो विशे जनाय महि शर्म यच्छतम्. दीर्घप्रयज्युमति यो वनुष्यति वयं जयेम पृतनासु दूढ्यः.. (१) हे इंद्र व वरुण! तुम हमारे परिचारक के लिए यज्ञ करने के निमित्त विशाल गृह दो. जो शत्रु हमारे अधिक समय तक यज्ञ करने वाले सेवक को मारना चाहता है, हम उस दुर्बुद्धि को युद्ध में जीतेंगे. (१) सम्राळन्यः स्वराळन्य उच्यते वां महान्ताविन्द्रावरुणा महावसू. विश्वे देवासः परमे व्योमनि सं वामोजो वृषणा सं बलं दधुः.. (२) हे महान् एवं परम धनी इंद्र एवं वरुण! तुम में से एक सम्राट् एवं दूसरे स्वराट् हैं. हे अभिलाषापूरको! सब देवों ने तुम्हें उत्तम आकाश में तेज के साथ ही बल प्रदान किया था. (२) अन्वपां खान्यतृन्मोजसा सूर्यमैरयतं दिवि प्रभुम्. इन्द्रावरुणा मदे अस्य मायिनोऽपिन्चतमपितः पिन्वतं धियः.. (३) हे इंद्र एवं वरुण! तुमने बलपूर्वक जल के द्वार खोले एवं आकाश में वर्तमान सूर्य को चलने के लिए प्रेरित किया. इस मादक सोम का नशा चढ़ने पर तुम जलरहित नदियों को जलपूर्ण करो एवं हमारे कर्मों को सफल बनाओ. (३) युवामिद्युत्सु पृतनासु वह्नयो युवां क्षमस्य प्रसवे मितज्ञवः. ईशाना वस्व उभयस्य कारव इन्द्रावरुणा सुहवा हवामहे.. (४) हे इंद्र एवं वरुण! युद्धभूमि में शत्रुसेना के मध्य फंसे हुए स्तोता एवं पैर सिकोड़कर बैठे हुए अंगिरागोत्रीय नौ ऋषि रक्षा के लिए तुम्हें ही बुलाते हैं. हे दिव्य एवं पार्थिव धन के स्वामियो एवं सुखपूर्वक बुलाने योग्यो! हम तुम्हें बुलाते हैं. (४) इन्द्रावरुणा यदिमानि चक्रथुर्विश्वा जातानि भुवनस्य मज्मना. ebook converter DEMO Watermarks*

क्षेमेण मित्रो वरुणं दुवस्यति मरुद्भिरुग्रः शुभमन्य ईयते.. (५) हे इंद्र एवं वरुण! तुमने लोक के समस्त प्राणियों को अपनी शक्ति से बनाया है. मित्र रक्षा के हेतु वरुण की सेवा करते हैं. इंद्र मरुतों के सहयोग से उग्र बनकर शोभन अलंकार प्राप्त करते हैं. (५) महे शुल्काय वरुणस्य नु त्विष ओजो मिमाते ध्रुवमस्य यत्स्वम्. अजामिमन्यः श्नथयन्तमातिरद्द्रभेभिरन्यः प्र वृणोति भूयसः.. (६) महान् धन पाने के लिए प्रकाश उपलब्ध करने हेतु इंद्र एवं वरुण को शीघ्र बल प्राप्त हो जाता है. इनका वह बल स्थायी है. इन में से एक स्तुति एवं यज्ञ न करने वाले की हिंसा करते हैं एवं दूसरे लघु उपायों से ही बहुत से शत्रुओं को बाधा पहुंचाते हैं. (६) न तमंहो न दुरितानि मर्त्यमिन्द्रावरुणा न तपः कुतश्चन. यस्य देवा गच्छथो वीथो अध्वरं न तं मर्तस्य नशते परिह्वृतिः.. (७) हे इंद्र एवं वरुणदेव! तुम जिस मनुष्य के यज्ञ में जाते हो एवं जिसकी कामना करते हो, उसके पास पाप, पाप के फल एवं संताप नहीं जाते. उसे किसी प्रकार की बाधा भी नहीं होती. (७) अर्वाङ्नरा दैव्येनावसा गतं शृणुतं हवं यदि मे जुजोषथः. युवोर्हि सख्यमुत वा यदाप्यं मार्डीकमिन्द्रावरुणा नि यच्छतम्.. (८) हे नेता इंद्र एवं वरुण! यदि तुम मुझसे प्रसन्न हो तो अपने दिव्य रक्षासाधनों के साथ आओ एवं मेरी पुकार सुनो. तुम्हारी मैत्री एवं बंधुता सुख का साधन है. उन्हें हमें प्रदान करो. (८) अस्माकमिन्द्रावरुणा भरेभरे पुरोयोधा भवतं कृष्ट्योजसा. यद्द्वां हवन्त उभये अध स्पृधि नरस्तोकस्य तनयस्य सातिषु.. (९) हे शत्रुओं को खींचने वाली शक्ति से युक्त इंद्र एवं वरुण! तुम प्रत्येक युद्ध में हमारे आगे लड़ने वाले बनो. प्राचीन एवं नवीन दोनों प्रकार के स्तोता पुत्र एवं पौत्र प्राप्ति वाले अवसरों पर तुम्हें बुलाते हैं. (९) अस्मे इन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा द्युम्नं यच्छन्तु महि शर्म सप्रथः. अवध्रं ज्योतिरदितेर्ऋतावृधो देवस्य श्लोकं सवितुर्मनामहे.. (१०) इंद्र, वरुण, मित्र एवं अर्यमा हमें धन एवं परम विस्तृत घर दें. यज्ञ की वृद्धि करने वाली अदिति की ज्योति हमारे लिए हानिकारक न हो. हम सविता देव की स्तुति करें. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—८३ देवता—इंद्र व वरुण युवां नरा पश्यमानास आप्यं प्राचा गव्यन्तः पृथुपर्शवो ययुः. दासा च वृत्रा हतमार्याणि च सुदासमिन्द्रावरुणावसावतम्.. (१) हे नेता इंद्र एवं वरुण! मोटे फरसे वाले यजमान तुम्हारी मित्रता चाहते हुए गाय पाने की अभिलाषा से पूर्व की ओर गए. तुम दासों, बाधकों एवं यज्ञपरायण शत्रुओं का नाश करो एवं रक्षासाधनों द्वारा सुदास की रक्षा करो. (१) यत्रा नरः समयन्ते कृतध्वजो यस्मिन्नाजा भवति किं चन प्रियम्. यत्रा भयन्ते भुवना स्वर्दृशस्तत्रा न इन्द्रावरुणाधि वोचतम्.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! उस युद्ध में तुम हमारे पक्षपात की बात करना, जिस में मनुष्य झंडे उठाकर लड़ने के लिए मिलते हैं, जिस में कुछ भी प्रिय नहीं होता एवं प्राणी जिस में स्वर्ग के दर्शन करते हैं. (२) सं भूम्या अन्ता ध्वसिरा अदृक्षतेन्द्रावरुणा दिवि घोष आरुहत्. अस्थुर्जनानामुप मामरातयोऽर्वागवसा हवनश्रुता गतम्.. (३) हे इंद्र एवं वरुण! धरती की सब फसलें सैनिकों द्वारा ध्वस्त दिखाई दे रही हैं एवं उनका कोलाहल अंतरिक्ष में फैल रहा है. मेरे योद्धाओं के समस्त विरोधी मेरे समीप आ गए हैं. हे पुकार सुनने वालो! रक्षासाधनों के साथ हमारे सामने आओ. (३) इन्द्रावरुणा वधनाभिरप्रति भेदं वन्वन्ता प्र सुदासमावतम्. ब्रह्माण्येषां शृणुतं हवीमनि सत्या तृत्सूनामभवत्पुरोहितिः.. (४) हे इंद्र एवं वरुण! तुमने आयुधों द्वारा वश में न होने वाले भेद को मारा एवं राजा सुदास की रक्षा की. तुमने मेरे यजमान तृत्सुवंशीय ऋषियों की स्तुतियां सुनीं एवं युद्धकाल में उनका पुरोहित कर्म सफल हुआ. (४) इन्द्रावरुणावभ्या तपन्ति माघान्यर्यो वनुषामरातयः. युवं हि वस्व उभयस्य राजथोऽध स्मा नोऽवतं पार्ये दिवि.. (५) हे इंद्र एवं वरुण! शत्रुओं के आयु मुझे घेर रहे हैं एवं हिंसकों के बीच फंसे मुझको शत्रु बाधा पहुंचा रहे हैं. तुम दोनों प्रकार की संपत्तियों के स्वामी हो, अतः युद्ध के दिन हमारी रक्षा करो. (५) युवां हवन्त उभयाय आजिष्विन्द्रं च वस्वो वरुणं च सातये. यत्र राजभिर्दशभिर्निबाधितं प्र सुदासमावतं तृत्सुभिः सह.. (६)

युद्ध के समय सुदास और तृत्सु दोनों धन पाने के लिए इंद्र एवं वरुण को बुलाते हैं. वहां तुमने दस राजाओं द्वारा पीड़ित सुदास के साथ तृत्सुओं को भी बचाया. (६) दश राजानः समिता अयज्यवः सुदासमिन्द्रावरुणा न युयुधुः. सत्या नृणामङ्ग्रसदामुपस्तुतिर्देवा एषामभवन्देवहूतिषु.. (७) हे इंद्र एवं वरुण! यज्ञ न करने वाले दस राजा मिलकर भी अकेले सुदास से युद्ध नहीं कर सके. हव्य धारण करने वाले नेतारूप ऋत्विजों की स्तुतियां भी सफल हुईं एवं उनके यज्ञों में सब देव उपस्थित हुए. (७) दाशराज्ञे परियत्ताय विश्वतः सुदास इन्द्रावरुणावशिक्षतम्. श्वित्यञ्चो यत्र नमसा कपर्दिनो धिया धीवन्तो अस्पन्त तृत्सवः.. (८) हे इंद्र एवं वरुण! जहां निर्मल, जटाधारी एवं यज्ञ-कर्म कर्त्ता तृत्सुओं ने हव्य अन्न एवं स्तुतियों से सेवा की, उसी दाशराज्ञ युद्ध में दस राजाओं द्वारा घिरे हुए सुदास को तुमने शक्तिशाली बनाया था. (८) वृत्राण्यन्यः समिथेषु जिघ्नते व्रतान्यन्यो अभि रक्षते सदा. हवामहे वां वृषणा सुवृक्तिभिरस्मे इन्द्रावरुणा शर्म यच्छतम्.. (९) हे इंद्र एवं वरुण! तुम में से एक संग्रामों में शत्रुओं का नाश करता है एवं दूसरा सदा यज्ञकर्मों की रक्षा करता है. हे अभिलाषापूरको! हम शोभनस्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमें सुख दो. (९) अस्मे इन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा द्युम्नं यच्छन्तु महि शर्म सप्रथः. अवध्रं ज्योतिरदितेरृतावृधो देवस्य श्लोकं सवितुर्मनामहे.. (१०) इंद्र, वरुण, मित्र एवं अर्यमा हमें धन एवं परम विस्तृत घर दें. यज्ञ की वृद्धि करने वाली अदिति की ज्योति हमारे लिए हानिकर न हो. हम सविता देव की स्तुति करें. (१०) सूक्त—८४ देवता—इंद्र व वरुण आ वां राजानावध्वरे ववृत्यां हव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः. प्र वां घृताची बाह्वोर्दधाना परि त्मना विषुरूपा जिगाति.. (१) हे सुशोभित इंद्र व वरुण! मैं इस यज्ञ में अन्न एवं स्तुतियों द्वारा तुम्हें बार-बार बुलाता हूं. हाथों में पकड़ी हुई व विविध रूप वाली जुहू (घी का चमचा) अपने आप तुम्हारी ओर जाती है. (१) युवो राष्ट्रं बृहदिन्वति द्यौर्यौ सेतुभिररज्जुभिः सिनीथः. ebook converter DEMO Watermarks*

परि नो हेळो वरुणस्य वृज्या उरुं न इन्द्रः कृणवदु लोकम्.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! तुम्हारा स्वर्गरूप विस्तृत राष्ट्र वर्षा द्वारा सबको प्रसन्न करता है. तुम पापियों को बिना रस्सी वाली बाधाओं अर्थात् रोगादि से बांधो. वरुण का क्रोध हमसे दूर जावे एवं इंद्र हमारे निवासस्थान को विस्तृत करें. (२) कृतं नो यज्ञं विदथेषु चारुं कृतं ब्रह्माणि सूरिषु प्रशस्ता. उपो रयिर्देवजूतो न एतु प्र णः स्पार्हाभिरूतिभिस्तिरेतम्.. (३) हे इंद्र एवं वरुण! हमारे घरों में होने वाले यज्ञ को शोभन बनाओ एवं हमारे स्तोताओं की स्तुतियां उत्तम करो. तुम्हारे द्वारा प्रेरित धन हमारे पास आवे. तुम स्पृहणीय रक्षासाधनों द्वारा हमें बढ़ाओ. (३) अस्मे इन्द्रावरुणा विश्ववारं रयिं धत्तं वसुमन्तं पुरुक्षुम्. प्र य आदित्यो अनृता मिनात्यामिता शूरो दयते वसूनि.. (४) हे इंद्र एवं वरुण! हमारे लिए ऐसा धन दो जो सबके वरण करने योग्य हो एवं अन्न से पूरित निवासस्थान दो. जो शूर एवं अदितिपुत्र वरुण असत्य का नाश करते हैं, वे ही स्तोताओं को असीमित धन देते हैं. (४) इयमिन्द्रं वरुणमष्ट मे गीः प्रावत्तोके तनये तुतुजाना. सुरत्नासो देववीतिं गमेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) मेरी यह स्तुति इंद्र एवं वरुण के पास पहुंचे. मेरी स्तुति पुत्र एवं पौत्र की रक्षा का कारण बने. हम शोभनरत्न वाले होकर यज्ञ प्राप्त करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—८५ देवता—इंद्र व वरुण पुनीषे वामरक्षसं मनीषां सोममिन्द्राय वरुणाय जुह्वत्. घृतप्रतीकामुषसं न देवीं ता नो यामन्नुरुष्यतामभीके.. (१) हे इंद्र एवं वरुण! मैं तुम्हारे उद्देश्य से अग्नि में सोम की आहुति फेंकता हुआ उषा देवी के समान प्रदीप्त अवयव वाली एवं राक्षसों से असंपृक्त स्तुति अर्पित करता हूं. इंद्र व वरुण युद्ध में हमारी रक्षा करें. (१) स्पर्धन्ते वा उ देवहूये अत्र येषु ध्वजेषु दिद्यवः पतन्ति. युवं ताँ इन्द्रावरुणावमित्रान्हतं पराचः शर्वा विषूचः.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! जिन युद्धों में शत्रु हमें ललकारते हैं एवं ध्वजाओं पर आयुध गिरते हैं, ebook converter DEMO Watermarks*

उन में तुम सब शत्रुओं को आयुधों से दूर भगाओ एवं उनका नाश करो. (२) आपश्चिद्धि स्वयशसः सदःसु देवीरिन्द्रं वरुणं देवता धुः. कृष्टीरन्यो धारयति प्रविक्ता वृत्राण्यन्यो अप्रतीनि हन्ति.. (३) स्वाधीन यशवाले एवं द्योतमान समस्त सोम घरों में इंद्र एवं वरुण देव को धारण करते हैं. इन में एक प्रजाओं को विभक्त करके पालन करता है एवं दूसरा अपराजित शत्रुओं को मारता है. (३) स सुक्रतुर्ऋतचिदस्तु होता य आदित्य शवसा वां नमस्वान्. आवर्वतदवसे वां हविष्मान्सदित्स सुविताय प्रयस्वान्.. (४) हे शक्तिशाली एवं अदितिपुत्र मित्रावरुण! जो नमस्कार के द्वारा तुम्हारी सेवा करता है, वही होता शोभन कर्मवाला एवं यज्ञदाता हो. जो व्यक्ति हव्ययुक्त होकर तुम्हें बार-बार बुलाता है, वह यजमान अन्न का स्वामी होकर फल पाने वाला बने. (४) इयमिन्द्रं वरुणमष्ट मे गीः प्रावत्तोके तनये तूतुजाना. सुरत्नासो देववीतिं गमेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) मेरी यह स्तुति इंद्र एवं वरुण के पास पहुंचे. मेरी स्तुति पुत्र एवं पौत्र की रक्षा का कारण बने. हम शोभनरत्न वाले होकर यज्ञ प्राप्त करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—८६ देवता—वरुण धीरा त्वस्य महिना जनूंषि वि यस्तस्तम्भ रोदसी चिदुर्वी. प्र नाकमृष्वं नुनुदे बृहन्तं द्विता नक्षत्रं पप्रथच्च भूम.. (१) वरुण के जन्म उनकी महिमा से स्थिर होते हैं. वरुण ने विस्तृत द्यावा-पृथिवी को धारण किया है, महान् आकाश और दर्शनीय नक्षत्रों को दो बार प्रेरणा दी है तथा धरती को विशाल बनाया है. (१) उत स्वया तन्वा३ सं वदे तत्कदा न्व१न्तर्वरुणे भुवानि. किं मे हव्यमहृणानो जुषेत कदा मृळीकं सुमना अभि ख्यम्.. (२) क्या मैं अपने शरीर के साथ अथवा वरुण के साथ स्थिर रहूं? क्या मैं वरुण में अपना मन संलग्न करूं? वरुण क्रोध न करते हुए मेरे हव्य को क्यों स्वीकार करेंगे? मैं शोभनमन से सुंदर वरुण को कब देखूंगा. (२) पृच्छे तदेनो वरुण दिदृक्षूपो एमि चिकितुषो विपृच्छम्. ebook converter DEMO Watermarks*

समानमिन्मे कवयश्चिदाहुरयं ह तुभ्यं वरुणो हृणीते.. (३) हे वरुण! तुम्हारे दर्शन का इच्छुक होकर मैं वह पाप पूछता हूं. मैं विविध प्रश्न पूछने के लिए विद्वानों के समीप गया हूं. सब विद्वानों ने मुझसे एक ही बात कही है कि वरुण तुमसे नाराज हैं. (३) किमाग आस वरुण ज्येष्ठं यत्स्तोतारं जिघांससि सखायम्. प्र तन्मे वोचो दूळभ स्वधावोऽव त्वानेना नमसा तुर इयाम्.. (४) हे वरुण! मेरा ऐसा क्या महान् अपराध है कि तुम मेरे मित्र स्तोता को मारना चाहते हो? हे अपराजेय एवं तेजस्वी वरुण! मुझे वह अपराध बताओ जिससे मैं उसका प्रायश्चित्त करके निरपराध बनूं एवं नमस्कार के साथ शीघ्र तुम्हारे समीप आऊं. (४) अवि द्रुग्धानि पित्र्या सृजा नोऽव या वयं चकृमा तनूभिः. अव राजन्पशुतृपं न तायुं सृजा वत्सं न दाम्नो वसिष्ठम्.. (५) हे वरुण! हमारी पैतृक द्रोहभावना को हमसे अलग करो. हमने अपने शरीर से जो अपराध किया है, उससे भी हमें मुक्त करो. हे सुशोभित वरुण! मुझ वसिष्ठ की दशा चुराकर लाए पशु को प्रायश्चित्तरूप में घास खिलाने अथवा रस्सी से बंधे बछड़े के समान है. तुम मुझे पाप से छुड़ाओ. (५) न स स्वो दक्षो वरुण ध्रुतिः सा सुरा मन्युर्विभीदको अचित्तिः. अस्ति ज्यायान्कनीयस उपारे स्वप्नश्चनेदनृतस्य प्रयोता.. (६) हे वरुण! वह पाप हमारे बल के कारण नहीं है. प्रमाद, क्रोध, जुआ अथवा अज्ञान के रूप में देवगति ही उसका कारण है. छोटे को पाप की ओर प्रवृत्त करने में बड़ा कारण बनता है. स्वप्न भी पाप से मिलाने वाला है. (६) अरं दासो न मीळहुषे कराण्यहं देवाय भूर्णयेऽनागाः. अचेतयदचितो देवो अर्यो गृत्सं राये कवितरो जुनाति.. (७) मैं पापरहित होकर अभिलाषापूरक एवं विश्वपालक वरुण की सेवा दास के समान पर्याप्तरूप में करूंगा. सबके स्वामी वरुण देव, मुझ ज्ञानरहित को ज्ञान संपन्न करें. अतिशय विद्वान् वरुण स्तोता को धन पाने के लिए प्रेरित करें. (७) अयं सु तुभ्यं वरुण स्वधावो हृदि स्तोम उपश्रितश्चिदस्तु. शं नः क्षेमे शमु योगे नो अस्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८) हे अन्नस्वामी वरुण! तुम्हारे निमित्त बनाया हुआ यह स्तोत्र तुम्हारे मन में समा जाए. हमारा क्षेत्र और योग मंगलमय हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—८७ देवता—वरुण

(८) सूक्त—८७ देवता—वरुण रदत्पथो वरुणः सूर्याय प्राणॉंसि समुद्रिया नदीनाम्. सर्गो न सृष्टो अर्वतीर्ऋतायञ्चकार महीरवनीरहभ्यः.. (१) वरुण ने सूर्य के लिए अंतरिक्ष में मार्ग दिया व सागर का जल सरिताओं को प्रदान किया. घोड़ा जिस प्रकार घोड़ी के समीप जाता है, उसी प्रकार शीघ्रगमन के लिए वरुण ने दिन से महान् रातों को अलग किया. (१) आत्मा ते वातो रज आ नवीनोत्पशुर्न भूर्णिर्यवसे ससवान्. अन्तर्मही बृहती रोदसीमे विश्वा ते धाम वरुण प्रियाणि.. (२) हे वरुण! तुम्हारे द्वारा प्रेरित वायु जगत् की आत्मा है एवं जल को सब ओर भेजता है. जैसे घास डालने पर पशु बोझा ढोता है, उसी प्रकार वायु अन्न पाकर विश्व का भरण करता है. विस्तृत द्यावा-पृथिवी के मध्य में स्थित तुम्हारे सभी स्थान प्रिय हैं. (२) परि स्पशो वरुणस्य स्मदिष्टा उभे पश्यन्ति रोदसी सुमेके. ऋतावानः कवयो यज्ञधीराः प्रचेतसो य इषयन्त मन्म.. (३) प्रशंसनीय गति वाले वरुण के सब सहायक शोभनरूप वाली द्यावा-पृथिवी को भली- भांति देखते हैं. वे कर्मयुक्त, यज्ञ करने के लिए दृढ़, बुद्धिमान् एवं वरुण की स्तुति करने वाले कवियों को भी देखते हैं. (३) उवाच मे वरुणो मेधिराय त्रिः सप्त नामाघ्न्या बिभर्ति. विद्वान्पदस्य गुह्या न वोचद्युगाय विप्र उपराय शिक्षन्.. (४) वरुण ने मुझ मेधावी से कहा था कि धरती इक्कीस नाम धारण करती है. विद्वान् एवं मेधावी वरुण ने मुझ अंतेवासी को उपदेश देते हुए ब्रह्मलोक की गुप्त बातों को भी बताया है. (४) तिस्रो द्यावो निहिता अन्तरस्मिन्तिस्रो भूमीरुपराः षड्विधानाः. गृत्सो राजा वरुणश्चक्र एतं दिवि प्रेङ्खं हिरण्ययं शुभे कम्.. (५) इन वरुण में तीन स्वर्ग, तीन भूमियां एवं छः दशाएं निहित हैं. प्रशंसनीय स्वामी वरुण ने सुनहरे झूले के समान सूर्य को प्रकाश के लिए बनाया है. (५) अव सिन्धुं वरुणो द्यौरिव स्थाद् द्रप्सो न श्वेतो मृगस्तुविष्मान्. गम्भीरशंसो रजसो विमानः सुपारक्षत्रः सतो अस्य राजा.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूर्य के समान दीप्त, पानी की बूंद के समान श्वेत, हरिण के समान शक्तिशाली, महान् स्तोत्रों वाले, जल के रचयिता, दुःख से छुटकारा दिलाने की शक्ति से युक्त एवं इस संसार के स्वामी वरुण ने सागर को स्थिर बनाया है. (६) यो मृळयाति चक्रुषे चिदागो वयं स्याम वरुणे अनागाः. अनु व्रतान्यदितेर्ऋधन्तो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) वरुण अपराध करने वाले पर भी दया करते हैं. मैं दीनतारहित वरुण से संबंधित व्रतों को बढ़ाता हुआ पापरहित बनूंगा. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—८८ देवता—वरुण प्र शुन्ध्युवं वरुणाय प्रेष्ठां मतिं वसिष्ठ मीळहुषे भरस्व. य ईमर्वाञ्चं करते यजत्रं सहस्रामघं वृषणं बृहन्तम्.. (१) हे वसिष्ठ! तुम अभिलाषापूरक वरुण के प्रति स्वयं शुद्ध एवं प्रिय लगने वाली स्तुति उच्चारित करो. वे यज्ञ योग्य, अनेक धनों के स्वामी, अभिलाषापूरक एवं विस्तृत सूर्य को हमारे सामने लाते हैं. (१) अधा न्वस्य सन्दृशं जगन्वानग्नेरनीकं वरुणस्य मंसि. स्वर्यदृशमन्निधिपा उ अन्धोऽभि मा वपुर्दृशये निनीयात्.. (२) मैं इस समय शीघ्रता से वरुण के दर्शन करके अग्नि की ज्वालाओं की स्तुति करता हूं. जिस समय वरुण पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए शोभन सोमरस को अधिक मात्रा में पी लेते हैं, उस समय मुझे अपने शोभनरथ के दर्शन कराते हैं. (२) आ यद्रुहाव वरुणश्च नावं प्र यत्समुद्रमीरयाव मध्यम्. अधि यदपां स्नुभिश्चराव प्र प्रेङ्ख ईङ्खयावहै शुभे कम्.. (३) जिस समय मैं और वरुण नाव पर सवार हुए थे. नाव को हमने सागर के बीच चलाया था एवं जल पर तैरती हुई नाव पर हम थे, उस समय हमने नावरूपी झूले पर सुख के निमित्त क्रीड़ा की थी. (३) वसिष्ठं ह वरुणो नाव्याधादृषिं चकार स्वपा महोभिः. स्तोतारं विप्रः सुदिनत्वे अह्नां यान्नु द्यावस्ततन्वन्द्यादुषासः.. (४) मेधावी वरुण ने रात एवं दिन का विस्तार करते हुए उत्तम दिनों में स्तोता मुझ वसिष्ठ को नाव पर चढ़ाया था एवं रक्षासाधनों द्वारा शोभनकर्म वाला बनाया था. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

क्व१ त्यानि नौ सख्या बभूवुः सचावहे यदवृकं पुरा चित्. बृहन्तं मानं वरुण स्वधावः सहस्रद्वारं जगमा गृहं ते.. (५) हे वरुण! हमारी पुरातन मित्रता कहां हुई थी? हम उसी पुरानी एवं विनाशरहित मित्रता को निभा रहे हैं. हे अन्नस्वामी वरुण! मैं तुम्हारे अति विस्तृत एवं द्वारों वाले घर में जाऊं. (५) य आपिर्नित्यो वरुण प्रियः सन्त्वामागांसि कृणवत्सखा ते. मा त एनस्वन्तो यक्षिन् भुजेम यन्धि ष्मा विप्रः स्तुवते वरूथम्.. (६) हे वरुण! जो वसिष्ठ तुम्हारा सगा पुत्र है, जिसने पूर्वकाल में तुम्हारा प्रिय बनकर अपराध किए हैं, वह इस समय तुम्हारा मित्र हो. हे यज्ञस्वामी वरुण! हम पापयुक्त होकर भोगों को न भोगें. हे मेधावी वरुण! तुम स्तोता को घर दो. (६) ध्रुवासु त्वासु क्षितिषु क्षियन्तो व्य१स्मत् पाशं वरुणो मुमोचत्. अवो वन्वाना अदितेरुपस्थाद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः... (७) हम ध्रुवभूमि पर निवास करते हुए स्तुति बोलते हैं. वरुण हमारे फंदों को छुड़ाएं. हम टुकड़े न होने वाली धरती के पास से वरुण के रक्षासाधनों का भोग करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—८९ देवता—वरुण मो षु वरुण मृन्मयं गृहं राजन्नहं गमम्. मृळा सुक्षत्र मृळय.. (१) हे स्वामी वरुण! मैं तुम्हारे द्वारा दिया हुआ मिट्टी का घर प्राप्त न करूं. हे शोभनधन वाले वरुण! मुझे सुखी बनाओ एवं मुझ पर दया करो. (१) यदेमि प्रस्फुरन्निव दृतिर्न ध्मातो अद्रिवः. मृळा सुक्षत्र मृळय.. (२) हे आयुधों वाले वरुण! तुम्हारे द्वारा बंधा हुआ मैं ठंड से कांपता हुआ एवं वायुप्रेरित बादल के समान आता हूं. हे शोभनधन वाले वरुण! मुझे सुखी बनाओ एवं मुझ पर दया करो. (२) क्रत्वः समह दीनता प्रतीपं जगमा शुचे. मृळा सुक्षत्र मृळय.. (३) हे धनस्वामी एवं निर्मल वरुण! मैं असमर्थता के कारण कर्त्तव्य कर्मों का विरोधी बना हूं. हे शोभनधन वाले वरुण! मुझे सुखी बनाओ एवं मुझ पर दया करो. (३) अपां मध्ये तस्थिवांसं तृष्णाविदज्जरितारम्. मृळा सुक्षत्र मृळय.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

हे शोभनधन वाले वरुण! सागर में रहकर भी प्यासे मुझ स्तोता को सुखी बनाओ एवं मुझ पर दया करो. (४) यत्किं चेदं वरुण दैव्ये जनेऽभिद्रोहं मनुष्या३श्चरामसि. अचित्ती यत्तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः.. (५) हे वरुण! हम मनुष्य देवों के प्रति जो द्रोह करते हैं अथवा अज्ञानता के कारण तुम्हारे जिस यज्ञकर्म को भूल जाते हैं, उन पापों के कारण हमें मत मारना. (५) सूक्त—९० देवता—वायु प्र वीरया शुचयो दद्रिरे वामध्वर्युभिर्मधुमन्तः सुतासः. वह वायो नियुतो याह्यच्छा पिबा सुतस्यान्धसो मदाय.. (१) हे वीर वायु! अध्वर्युगण द्वारा तुम्हारे लिए शुद्ध एवं मधुर सोमरस दिया जाता है. तुम अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो, हमारे सामने आओ एवं मादकता के हेतु हमारा निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (१) ईशानाय प्रहुतिं यस्त आनट् शुचिं सोमं शुचिपास्तुभ्यं वायो. कृणोषि तं मर्त्येषु प्रशस्तं जातोजातो जायते वाज्यस्य.. (२) हे सबके स्वामी वायु! तुम्हें जो उत्तम आहुति देता है एवं हे सोमपानकर्त्ता वायु! जो तुम्हें पवित्र सोमरस देता है, उसे तुम सभी मनुष्यों में प्रसिद्ध बनाते हो. वह सर्वत्र प्रसिद्ध होकर धन का पात्र बनता है. (२) राये नु यं जज्ञतू रोदसीमे राये देवी धिषणा धाति देवम्. अध वायुं नियतः सश्चत स्वा उत श्वेतं वसुधितिं निरेके.. (३) इस द्यावा-पृथिवी ने वायु को धन के लिए उत्पन्न किया है एवं प्रकाशयुक्त स्तुति धन के लिए ही वायु देव को धारण करती है. इस समय वायु के अश्व उनकी सेवा करते हैं एवं दरिद्रता की स्थिति में वे घोड़े धनप्रदाता वायु को हमारे यज्ञ में लाते हैं. (३) उच्छन्नुषसः सुदिना अरिप्रा उरु ज्योतिर्विविदुद्दीध्यानाः. गव्यं चिदूर्वमुशिजो वि वव्रुस्तेषामनु प्रदिवः सस्रुरापः.. (४) शोभन दिन लाने वाली पापरहित उषाएं अंधकार मिटाएं एवं दीप्तिसंपन्न होकर वायु की कृपा से विस्तृत प्रकाश पावें. वायु की स्तुति करने वाले अंगिराओं ने गोधन प्राप्त किया. प्राचीन जल अंगिराओं के पीछे बहे. (४) ते सत्येन मनसा दीध्यानाः स्वेन युक्तासः क्रतुना वहन्ति. ebook converter DEMO Watermarks*

इन्द्रवायू वीरवाहं रथं वामीशानयोरभि पृक्षः सचन्ते.. (५) हे सबके स्वामी इंद्र एवं वायु! प्रसिद्ध यजमान सच्चे मन से स्तुति करते हुए एवं दीप्तिसंपन्न बनकर अपने कर्मों द्वारा तुम्हारे उस रथ को अपने यज्ञों में खींचते हैं, जो वीरों द्वारा खींचने योग्य हैं. यज्ञ में हव्यरूप अन्न तुम्हारी सेवा करते हैं. (५) ईशानासो ये दधते स्वर्णो गोभिरश्वेभिर्वसुभिर्हिरण्यैः. इन्द्रवायू सूरयो विश्वमायुर्वद्भिर्वीरैः पृतनासु सह्युः.. (६) हे इंद्र एवं वायु! जो सामर्थ्य वाले लोग हमें गांवों, घोड़ों, निवासस्थानों एवं स्वर्ण आदि धन के साथ सुख देते हैं, वे ही दाता युद्ध में घोड़ों एवं वीर पुरुषों की सहायता के सर्वत्र व्याप्त अन्न जीत लेते हैं. (६) अर्वन्तो न श्रवसो भिक्षमाणा इन्द्रवायू सुष्टुतिभिर्वसिष्ठाः. वाजयन्तः स्ववसे हुवेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) घोड़ों के समान हव्य-वहन करने वाले, अन्न की प्रार्थना करने वाले एवं बल के इच्छुक वसिष्ठगण शोभनरक्षा के निमित्त उत्तम स्तुतियों द्वारा इंद्र एवं वायु को बुलाते हैं. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (७) सूक्त—९१ देवता—वायु कुविदङ्ग नमसा ये वृद्धासः पुरा देवा अनवद्यास आसन्. ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण.. (१) प्राचीन काल में जिन वयोवृद्ध स्तोताओं ने वायु देव के हेतु शीघ्र बनाए गए बहुत से स्तोत्रों द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त की, उन्होंने विपत्ति में पड़े मनुष्यों की रक्षा के निमित्त वायु को हव्य देने के लिए सूर्य के साथ उषा को संगत किया. (१) उशन्ता दूता न दभाय गोपा मासश्च पाथः शरदश्च पूर्वीः. इन्द्रवायू सुष्टुतिर्वामियाना मार्डीकमीट्‍टे सुवितं च नव्यम्.. (२) हे कामना करने योग्य, गतिशील एवं रक्षक इंद्र व वायु! तुम हमारी हिंसा न करके अनेक मासों एवं वर्षों तक हमारी रक्षा करना. हमारी शोभनस्तुति समीप जाती हुई तुमसे सुख एवं प्रशंसायोग्य उत्तम धन की याचना करती है. (२) पीवोअन्नाँ रयिवृधः सुमेधाः श्वेतः सिषक्ति नियुतामभिश्रीः. ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेन्नरः स्वपत्यानि चक्रुः.. (३) शोभनबुद्धि वाले एवं अपने घोड़ों को आश्रय देने वाले श्वेतवर्ण वायु अधिक अन्न के