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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

करो. हम उदित होते हुए सूर्य को बहुत समय तक देखें. हे अनुमति! अविनाश पाने के लिए हमारी रक्षा करो. (६) पुनर्नो असुं पृथिवी ददातु पुनर्द्यौर्देवी पुनरन्तरिक्षम्. पुनर्नः सोमस्तन्वं ददातु पुनः पूषा पथ्यां३ या स्वस्तिः.. (७) पृथ्वी हमें पुनः प्राण प्रदान करे. द्युलोक और अंतरिक्ष हमें पुनः प्राण दें. सोम हमें पुनः शरीर प्रदान करें. पूषा हमें स्वस्तिकारक वाक्य दें. (७) शं रोदसी सुबन्धवे यह्वी ऋतस्य मातरा. भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्.. (८) महान् द्यावा-पृथिवी सुबंधु का कल्याण करें. उदक का निर्माण करने वाली द्यावा- पृथिवी पाप को दूर करें. हे सुबंधु! द्यावा-पृथिवी के होते हुए कोई भी पाप तुम्हारी हिंसा न कर सकें. (८) अव द्वके अव त्रिका दिवश्चरन्ति भेषजा. क्ष्मा चरिष्ण्वेककं भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्.. (९) स्वर्ग में जो दो या तीन ओषधियां विचरण करती हैं, उन में से एक जो धरती पर विचरण करती है, वह सुबंधु की हिंसा दूर करे. हे सुबंधु! स्वर्ग एवं विस्तृत पृथ्वी तुम्हारे अमंगल दूर करें एवं किसी प्रकार का अनिष्ट न करें. (९) समिन्द्रेरय गामनड्वाहं य आवहदुशीनराण्या अनः. भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्ष्मा रपो मो षु ते किं चनाममत्.. (१०) हे इंद्र! जो बैल उशीनर की पत्नी की गाड़ी ले गया था, उसे प्रेरित करो. हे सुबंधु! स्वर्ग एवं विस्तृत पृथ्वी तुम्हारे अमंगल दूर करें एवं किसी प्रकार भी अनिष्ट न करें. (१०) सूक्त—६० देवता—राजा असमाति आदि आ जनं त्वेषसन्दृशं माहीनानामुपस्तुतम्. अगन्म बिभ्रतो नमः.. (१) हम असमाति राजा के दीप्त एवं महान् पुरुषों द्वारा प्रशंसित जनपद में नमस्कार धारण करते हुए गए. (१) असमातिं नितोशनं त्वेषं निययिनं रथम्. भजेरथस्य सत्पतिम्.. (२) हम शत्रुहंता, तेजस्वी, रथ के समान सबकी अभिलाषा पूर्ण करने वाले, भजेरथ को ebook converter DEMO Watermarks*

पराजित करने वाले एवं सज्जनपालक राजा असमाति के देश में गए. (२) यो जनान्महिषाँ इवातितस्थौ पवीरवान्. उतापवीरवान्युधा.. (३) वे राजा असमाति हाथ में तलवार लें अथवा न लें, पर युद्ध में अपने शत्रुओं को इस प्रकार पराजित कर देते हैं, जिस प्रकार सिंह भैंसों को मार डालता है. (३) यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान्मराय्येधते. दिवीव पञ्च कृष्टयः.. (४) जिस जनपद में इक्ष्वाकु राजा धनी, शत्रुसंहारक एवं रक्षाकार्य में नियुक्त होकर बढ़ते हैं, उस जनपद में रहने वाले पंचजन इस प्रकार सुखी होकर उन्नति करते हैं, जिस प्रकार स्वर्ग में रहने वाले बढ़ते हैं. (४) इन्द्र क्षत्रासमातिषु रथप्रोषेषु धारय. दिवीव सूर्यं दृशे.. (५) हे इंद्र! जिस प्रकार तुमने सूर्य को सबके दर्शन के लिए आकाश में स्थित किया है, उसी प्रकार वीरों को रथारूढ़ राजा असमाति का अनुगमन करने के लिए प्रेरित करो. (५) अगस्त्यस्य नद्भ्यः सप्ती युनक्षि रोहिता. पणींन्यक्रमीरभि विश्वाञ्राजन्नराधसः.. (६) हे राजा असमाति! तुम अगस्त्य ऋषि को प्रसन्न करने वाले बांधवों के लिए धनप्राप्ति हेतु लाल रंग के घोड़ों को रथ में जोड़ो. तुम यज्ञ न करने वाले एवं लोभी पणियों को भली प्रकार हराओ. (६) अयं मातायं पितायं जीवातुरागमत्. इदं तव प्रसर्पणं सुबन्धवेहि निरिहि.. (७) हे सुबंधु! जो अग्नि आए हैं, वे ही तुम्हारे माता, पिता एवं जीवनदाता हैं. तुम्हारा शरीर यही है. इस में स्थित होओ. (७) यथा युगं वरत्रया नह्यन्ति धरुणाय कम्. एवा दाधार ते मनो जीवतवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (८) जिस प्रकार रथ को धारण करने के लिए जुआ रस्सियों से बांधा जाता है, उसी प्रकार अग्नि ने जीवित रहने, अविनाशी बनने एवं मृत्यु से दूर रहने के लिए तुम्हारे मन को धारण कर लिया है. (८) यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान्वनस्पतीन्. एवा दाधार ते मनो जीवतवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (९) जिस प्रकार यह विस्तृत पृथ्वी इन बड़े-बड़े वृक्षों को धारण करती है, उसी प्रकार अग्नि ebook converter DEMO Watermarks*

ने जीवित रहने, अविनाशी बनने एवं मृत्यु से दूर रहने के लिए तुम्हारे मन को धारण कर लिया है. (९) यमादहं वैवस्वतात्सुबन्धोर्मन आभरम्. जीवातवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये.. (१०) मैंने विवस्वान् के पुत्र यम से सुबंधु का मन इसलिए छीन लिया है कि वे जीवित रहें, मृत्यु से दूर हों और अविनाशी बनें. (१०) न्यग्वातोऽव वाति न्यक्तपति सूर्य:. नीचीनमघ्न्या दुहे न्यग्भवतु ते रप:.. (११) हे सुबंधु! वायु द्युलोक से नीचे की ओर बहते हैं एवं सूर्य नीचे की ओर तपते हैं. जिस प्रकार गाय का दूध नीचे की ओर दुहा जाता है, उसी प्रकार तुम्हारा पाप तुमसे नीचे गिरे. (११) अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तर:. अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शन:.. (१२) मेरा यह हाथ सौभाग्यशाली ही नहीं, अतिशय सौभाग्यशाली है. यह सबके लिए ओषधि तुल्य एवं सबको छूकर कल्याण देने वाला है. (१२) सूक्त—६१ देवता—विश्वेदेव इदमित्था रौद्रं गूर्तवचा ब्रह्म क्रत्वा शच्यामन्तराजी. क्राणा यदस्य पितरा मंहनेष्ठा: पर्षत्पक्थे अहन्ना सप्त होतॄन्.. (१) हिस्सा बांटने वाले माता-पिता ने नाभानेदिष्ट का हिस्सा न देकर जो रुद्रस्तुति की, वही रुद्रस्तुति करके उद्यत-वचन नाभानेदिष्ट अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के यज्ञ में गए एवं भूली हुई बात सात होताओं को बताकर यज्ञ समाप्त किया. (१) स इद्दानाय दभ्याय वन्वञ्ज्यवान: सूदैर्मिमीत वेदिम्. तूर्वयाणो गूर्तवचस्तम: क्षोदो न रेत इतऊति सिञ्चत्.. (२) वे रुद्रदेव स्तोताओं को धन देने के लिए एवं शत्रुओं को नष्ट करने के लिए यज्ञवेदी पर प्रकट हुए एवं शत्रुनाशक अस्त्र उन्हें दिए. बादल जिस प्रकार जल बरसाते हैं, उसी प्रकार शीघ्र गमन वाले एवं उद्यत-वचन रुद्र ने चारों ओर अपनी शक्ति दिखाई. (२) मनो न येषु हवनेषु निग्मं विप: शच्या वनुथो द्रवन्ता. आ य: शर्याभिस्तुविन्मृणो अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ.. (३) हे अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हें बुलाता हूं. तुम उस स्तोता का यज्ञ संबंधी प्रयत्न देखकर मन के समान तीव्र गति से यज्ञ की ओर आते हो. जो हव्य लेकर सामने से मुझ यज्ञ में प्रवृत्त ebook converter DEMO Watermarks*

यजमान की उंगलियां पकड़कर एवं चरु पकाते हुए तुम्हारा नाम लेता है. (३) कृष्णा यद्गोष्वरुणीषु सीदद्दिवो नपाताश्विना हुवे वाम्. वीतं मे यज्ञमा गतं मे अन्नं ववन्वांसा नेषमस्मृतधू.. (४) हे स्वर्गपुत्र अश्विनीकुमारो! जिस समय काली रात लाल रंग वाली उषाओं में बदलने लगती है, उस समय मैं तुम्हारा आह्वान करता हूं. मेरे हव्य अन्न की अभिलाषा करने के लिए तुम मेरे यज्ञ में आओ. अश्वों के समान उसे ग्रहण करो और मेरे प्रति द्रोह को भुला दो. (४) प्रथिष्ट यस्य वीरकर्ममिष्णदनुष्ठितं नु नर्यो अपौहत्. पुनस्तदा वृहति यत्कनाया दुहितुरा अनुभृतमनर्वा.. (५) प्रजापति का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ वीर्य सर्वोत्तम है. प्रजापति ने अपने उस मानव- हितकारी वीर्य का त्याग किया, जिसे उन्होंने अपनी सुंदर उषा के शरीर में सिंचित किया था. (५) मध्या यत्कर्त्वमभवदभीके कामं कृण्वाने पितरि युवत्याम्. मनानग्रेतो जहतुर्वियन्ता सानौ निषिक्तं सुकृतस्य योनौ.. (६) जिस समय पिता ने अपनी युवती कन्या के साथ यथेच्छ कर्म किया, उस समय उनके संभोग कर्म के समीप ही थोड़ा वीर्य गिरा. परस्पर अभिगमन करते हुए उन दोनों ने वह वीर्य यज्ञ के ऊंचे स्थान योनि में छोड़ा था. (६) पिता यत्स्वां दुहितरमधिष्कन्क्ष्मया रेतः सज्जमानो नि षिञ्चत्. स्वाध्योऽजनयन्ब्रह्म देवा वास्तोष्पतिं व्रतपां निरतक्षन्.. (७) जिस समय पिता ने अपनी पुत्री के साथ संभोग किया उस समय धरती से मिलकर वीर्य त्याग किया. शोभन कर्म वाले देवों ने उसी वीर्य से व्रतरक्षक देव वास्तोष्पति का उत्पादन किया. (७) स ईं वृषा न फेनमस्यदाजौ स्मदा परैदप दभ्रचेताः. सरत्पदा न दक्षिणा परावृङ् न ता नु मे पृश्नयो जगृभ्रे.. (८) इंद्र ने नमुचि का वध करने के लिए संग्राम में जिस प्रकार फेन फेंका, उसी प्रकार वास्तोष्पति हमसे दूर जा रहे हैं. अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने दक्षिणा के रूप में हमें जो गाएं दी थीं, उन्हें अल्पमन वाले वास्तोष्पति ने स्वीकार नहीं किया, जबकि वे उन्हें ग्रहण करने में समर्थ थे. (८) मक्षू न वह्निः प्रजाया उपब्दिरग्निं न नग्न उप सीददूधः. सनितेध्मं सनितोत वाजं स धर्ता जज्ञे सहसा यवीयूत्.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

प्रजाओं को कष्ट पहुंचाने वाले और अग्नि के समान प्रजाओं को जलाने वाले राक्षस यज्ञ में शीघ्र नहीं आते. नंगे रहनेवाले राक्षस आदि रात में यज्ञ की अग्नि के पास नहीं आते. राक्षसों से युद्ध करने वाले एवं यज्ञ के धारक अग्नि काष्ठों और अन्न को स्वीकार करते हुए बलपूर्वक उत्पन्न हुए. (९) मक्षू कनायाः सख्यं नवग्वा ऋतं वदन्त ऋतुयुक्तिमग्मन्. द्विबर्हसो य उप गोपमागुरदक्षिणासो अच्युता दुदुक्षन्.. (१०) नौ मास के अनुष्ठान के द्वारा गाएं प्राप्त करने वाले अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने सत्य भाषण करते हुए एवं कमनीय स्तुतियां बोलते हुए यज्ञ समाप्त किया. वे इहलोक और परलोक में उन्नत होकर इंद्र के समीप पहुंचे एवं उन्होंने दक्षिणारहित यज्ञ करके अविनाशी फल प्राप्त किया. (१०) मक्षू कनायाः सख्यं नवीयो राधो न रेत ऋतमित्तुरण्यन्. शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः.. (११) हे इंद्र! अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने कमनीय गायों की मित्रता शीघ्र प्राप्त करके अमृततुल्य दूध देने वाली गाय का दूध यज्ञ में होम किया. उस समय नई संपत्ति के समान सिंचित करने वाला जल प्राप्त किया. (११) पश्चा यत्पश्चा वियुता बुधन्तेति ब्रवीति वक्तरी रराणः. वसोर्वसुत्वा कारवोऽनेहा विश्वं विवेष्टि द्रविणमुप क्षु.. (१२) स्तोता इस प्रकार कहते हैं कि इंद्र अपने स्तोता से बहुत अधिक प्रेम करते हैं. स्तोता पणियों द्वारा चुराई गई अपनी गायों को जान पावें, उससे पहले ही वे गायों को खोजकर ले आते हैं. (१२) तदिन्वस्य परिषद्दानो अग्मन्पुरू सदन्तो नार्षदं बिभित्सन्. वि शुष्णस्य संग्रथितमनर्वा विदत्पुरुप्रजातस्य गुहा यत्.. (१३) इंद्र के चारों ओर वर्तमान सेविका रश्मियां प्रकाश देने के लिए जाती हैं. इन परम शक्तिशाली इंद्रानुचरों ने नृषदपुत्र शुष्ण को नष्ट करने की इच्छा की. इंद्र अनेक प्रकार से प्रादुर्भूत शुष्ण का मर्म जानते हैं. उसका जो मर्म गुहा में छिपा है, उसे भी जानते हैं. (१३) भर्गो ह नामोत यस्य देवाः स्वर्ष्ण ये त्रिषधस्थे निषेदुः. अग्निर्ह नामोत जातवेदाः शृधी नो होतर्ऋतस्य होताध्रुक्.. (१४) जिस अग्नि संबंधी तेज के समीप कुशों पर देवगण स्वर्ग के समान बैठते हैं, अग्नि के उस तेज का नाम भर्ग है. अग्नि के तेज का नाम जातवेदा है. हे होम संपन्न करने वाले अग्नि! तुम्हीं यज्ञ संबंधी देवों को बुलाने वाले हो. तुम द्रोहरहित होकर हमारी पुकार सुनो. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

उत त्या मे रौद्रावर्चिमन्ता नासत्याविन्द्र गूर्तये यजध्यै. मनुष्वद्वृक्तबर्हिषे रराणा मन्दू हितप्रयसा विक्षु यज्यू.. (१५) हे इंद्र! वे प्रसिद्ध रुद्रपुत्र एवं दीप्तिशाली अश्विनीकुमार मेरी स्तुति एवं यज्ञ को स्वीकार करें. वे मनु के यज्ञ के समान मेरे यज्ञ में भी प्रसन्न हों. वे प्रजाओं को धन दें तथा यज्ञ के योग्य बनें. (१५) अयं स्तुतो राजा वन्दि वेधा अपश्च विप्रस्तरति स्वसेतुः. स कक्षीवन्तं रेजयत्सो अग्निं नेमिं न चक्रमर्वतो रघुद्रु.. (१६) ये सबके विधाता सोम राजा सबके द्वारा प्रशंसित हैं. हमने भी उनकी प्रशंसा की है. जिस सोम की किरणें जगद्बंधक हैं, वे प्रतिदिन अंतरिक्ष को लांघते हैं. घोड़े जिस प्रकार रथ के पहिए की नेमि को कंपित करते हैं, उसी प्रकार सोम कक्षीवान् ऋषि और अग्नि को कंपाते हैं. (१६) स द्विबन्धुर्वेतरणो यष्टा सबर्धूँ धेनुमस्वं दुहध्यै. सं यन्मित्रावरुणा वृञ्ज उक्थैर्यैँष्ठेभिरर्यमणं वरूथैः.. (१७) वे अग्नि दोनों लोकों का कल्याण करने वाले हैं. वे विशेषरूप से तारक एवं यज्ञकर्त्ता हैं. अग्नि ने दुधारू गाय को उस समय दुहने योग्य बनाया, जब वह ब्याने योग्य नहीं थी. शंयु ऋषि ने महान् एवं प्रशंसनीय मंत्रों द्वारा मित्र, वरुण और अर्यमा की स्तुति की. (१७) तद्बन्धुः सूरिर्दिवि ते धियंधा नाभानेदिष्ठो रपति प्र वेनन्. सा नो नाभिः परमास्य वा घाहं तत्पश्चा कतिथश्चिदास.. (१८) हे स्वर्ग में स्थित सूर्य! तुम्हारा बंधु मैं नाभानेदिष्ट तुम्हारा कर्मधारण करता हूं एवं गायों की अभिलाषा करता हुआ तुम्हारी स्तुति करता हूं. स्वर्ग हमारा एवं सूर्य का उत्पत्तिस्थान है. मैं सूर्य से कुछ ही पीढ़ी पीछे हूं. (१८) इयं मे नाभिरिह मे सधस्थमिमे मे देवा अयमस्मि सर्वः. द्विजा अह प्रथमजा ऋतस्येदं धेनुरदुहज्जायमाना.. (१९) यह स्वर्ग ही मेरा उत्पत्तिस्थान है. यही मेरा निवासस्थान है. सभी देव मेरे हैं एवं मैं उनका हूं. द्विजगण सत्यरूप ब्रह्मा से पहले उत्पन्न हुए. यज्ञरूपिणी गाय ने स्वयं उत्पन्न होकर यह सब उत्पन्न किया. (१९) अधासु मन्द्रो अरतिर्विभावाव स्यति द्विवर्तनिर्वनेषाट्. ऊर्ध्वा यच्छ्रेणिर्न शिशुर्दन्मक्षू स्थिरं शेवृधं सूत माता.. (२०) वे अग्नि प्रसन्न, गतिशील, दोनों लोकों में जाने वाले एवं काष्ठों को पराजित करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*

हैं. ऊर्ध्वमुख, सेना के समान प्रशंसनीय, शत्रुओं का दमन करने वाले, स्थिर एवं सुखवर्धक अग्नि को अरणि ने उत्पन्न किया. (२०) अधा गाव उपमातिं कनाया अनु श्रान्तस्य कस्य चित्परेयुः. श्रुधि त्वं सुद्रविणो नस्त्वं याळाश्वघ्नस्य वावृधे सूनृताभिः.. (२१) स्तुतियां करते-करते थके हुए मुझ नाभानेदिष्ट की उत्तम स्तुतियां इंद्र के समीप जाती हैं. हे शोभन-धन वाले अग्नि! हमारी स्तुतियां इंद्र के समीप जाती हैं. हे शोभन-धन वाले अग्नि! हमारी स्तुतियां सुनो और हमारे इंद्र का यजन करो. तुम अश्वमेध यज्ञ करने वाले मुझ मनु के पुत्र को स्तुतियों से बढ़ाते हो. (२१) अध त्वमिन्द्र विद्ध्य१स्मान्महो राये नृपते वज्रबाहुः. रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीननेहसस्ते हरिवो अभिष्टौ.. (२२) हे वज्रबाहु एवं नरपालक इंद्र! हमने विशाल धन की अभिलाषा की है, उसे तुम जानो. तुम हम हव्यधारक एवं स्तुतिप्रेरकों की रक्षा करो. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम तुम्हारी दृष्टि में पापरहित बनें. (२२) अध यद्राजाना गविष्टौ सरत्सरण्युः कारवे जरण्युः. विप्रः प्रेष्ठः स ह्येषां बभूव परा च वक्षदुत पर्षदेनान्.. (२३) हे दीप्तिशाली मित्र व वरुण! अंगिरागोत्रीय ऋषि यज्ञ कर रहे थे, उस समय यम गाय पाने की इच्छा से गए. उनकी स्तुति करने का इच्छुक, ब्राह्मण नाभानेदिष्ट उनका अतिशय प्रिय हुआ उनका यज्ञ पूरा हो और उन्हें पार पहुंचावे. (२३) अधा न्वस्य जेन्यस्य पुष्टौ वृथा रेभन्त ईमहे तदू नु. सरण्युरस्य सूनुरश्वो विप्रश्चासि श्रवसश्च सातौ.. (२४) हम गौएं पाने की इच्छा से जयशील वरुण की शीघ्र स्तुति करते हुए उनके समीप अनायास याचना करते हैं. शीघ्रगामी अश्व इस वरुण का पुत्र है. हे वरुण! तुम ब्राह्मण के समान पूज्य एवं अन्न देने वाले हो. (२४) युवोर्यदि सख्यायास्मे शर्धाय स्तोमं जुजुषे नमस्वान्. विश्वत्र यस्मिन्ना गिरः समीचीः पूर्वीव गातुर्दाशत्सूनृतायै.. (२५) हे मित्र व वरुण! अन्न धारण करने वाला अध्वर्यु तुम दोनों की शक्तिशाली मित्रता के लिए तुम्हारी सेवा करता है. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके अंगिरागोत्रीय ऋषि को सभी स्थानों के अनुकूल वचन सुनाई देंगे. जिस प्रकार प्राचीन मार्ग चलने के लिए सुखकर होता है, उसी प्रकार तुम अपनी प्रिय और सत्य स्तुति हमें प्रदान करो. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

स गृणानो अद्भिर्देववानिति सुबन्धुर्नमसा सूक्तैः.

स गृणानो अद्भिर्देववानिति सुबन्धुर्नमसा सूक्तैः. वर्धदुक्थैर्वचोभि॒रा हि नूनं व्यध्वैति पयस उस्रियायाः.. (२६) देवों के परम बंधु वरुण नमस्कार और शोभन स्तुतियों से प्रशंसित होकर बढ़ें. दुधारू गाय के दूध की धारा उनके यज्ञ के लिए बहे. (२६) त ऊ षु णो महो यजत्रा भूत देवास ऊतये सजोषाः. ये वाजाँ अनयता वियन्तो ये स्था निचेतारो अमूराः.. (२७) हे यज्ञ के अधिकारी देवो! तुम हमारी महती रक्षा के लिए संगत बनो. हे अंगिरागोत्रीय ऋषियो! यज्ञ के लिए विविध प्रकार से प्रयत्न करते हुए तुम मेरे लिए अन्न लाओ. तुम इस समय मोहरहित होकर गाय प्राप्त करो. (२७) सूक्त—६२ देवता—विश्वेदेव ये यज्ञेन दक्षिणाया समक्ता इन्द्रस्य सख्यममृतत्वमानश. तेभ्यो भद्रमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (१) हे अंगिरागोत्रीय ऋषियो! तुम लोग यज्ञ संबंधी द्रव्यों एवं दक्षिणा के द्वारा सामूहिक रूप से इंद्र की मित्रता एवं अमरता प्राप्त कर चुके हो. तुम्हारा कल्याण हो. हे शोभन मेधा वाले अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (१) य उदाजन्पितरो गोमयं वस्वृतेनाभिन्दन्परिवत्सरे वलम्. दीर्घायुत्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (२) हे पितृतुल्य अंगिराओ! तुम हमारे पिता के समान हो. तुम पणियों द्वारा चुराई गई गायों को पर्वत से निकाल लाए थे. तुमने एक वर्ष तक यज्ञ करके बल नामक असुर को नष्ट किया. तुम्हें दीर्घायु प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (२) य ऋतेन सूर्यमारोहयन् दिव्यप्रथयन्पृथिवीं मातरं वि. सुप्रजास्त्वमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (३) हे अंगिराओ! तुम लोगों ने यज्ञ के द्वारा सूर्य को स्वर्गलोक में स्थापित किया एवं सबकी माता पृथ्वी को प्रसिद्ध किया. तुम्हें शोभन प्रजा प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (३) अयं नाभा वदति वल्गु वो गृहे देवपुत्रा ऋषयस्तच्छृणोतन. ebook converter DEMO Watermarks*

सुब्रह्मण्यमङ्गिरसो वो अस्तु प्रति गृभ्णीत मानवं सुमेधसः.. (४) हे देवपुत्र अंगिरा ऋषियो! यह नाभानेदिष्ट तुम्हारे यज्ञगृह के कल्याणकारी वचन बोलता है. तुम उसे सुनो. तुम्हें शोभन-ब्रह्मतेज प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (४) विरूपास इदृषयस्त इदगम्भीरवेपसः. ते अङ्गिरसः सूनवस्ते अग्नेः परि जज्ञिरे.. (५) ऋषिगण नानारूप वाले हैं एवं अंगिरा गंभीर कर्म वाले हैं. अग्नि के पुत्र के अंगिरा सभी ओर उत्पन्न हुए हैं. (५) ये अग्नेः परि जज्ञिरे विरूपासो दिवस्परि. नवग्वो नु दशग्वो अङ्गिरस्तमः सचा देवेषु मंहते.. (६) विविधरूप वाले जो अंगिरा द्युलोक से अग्नि के चारों ओर उत्पन्न हुए हैं, उन्होंने नौ अथवा दस मास तक यज्ञ करके गाय रूप धन प्राप्त किया है. अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवों के साथ हमें धन देते हैं. (६) इन्द्रेण युजा निः सृजन्त वाघतो व्रजं गोमन्तमश्विनम्. सहस्रं मे ददतो अष्टकर्ण्य१ः श्रवो देवेष्वक्रत.. (७) यज्ञकर्म करने वाले अंगिराओं ने इंद्र के साथ मिलकर गायों और अश्वों से युक्त पशुशाला का उद्धार किया. अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवों के साथ हमें धन देते हैं. (७) प्र नूनं जायतामयं मनुस्तोक्मेव रोहतु. यः सहस्रं शताश्वं सद्यो दानाय मंहते.. (८) वे सावर्णि मनु जल से भीगे बीज के समान शीघ्र बढ़ें. वे हजारों घोड़ों से युक्त सैकड़ों गौएं तुरंत देने के लिए तैयार हैं. (८) न तमश्नोति कश्चन दिव इव सान्वारभम्. सावर्ण्यस्य दक्षिणा वि सिन्धुरिव पप्रथे.. (९) मनु जब दानकर्म आरंभ करते हैं तो कोई भी उनकी समानता नहीं करता. वे सोने के पर्वत के समान स्थित हैं. सावर्णि मनु की दक्षिणा नदी के समान सब जगह बढ़ती है. (९) उत दासा परिविषे स्मद्दिष्ट्ी गोपरीणसा. यदुस्तुर्वश्च मामहे.. (१०) कल्याण करने वाले, गायों से युक्त एवं दास के समान यदु और तुर्वसु नामक राजा मनु के भोजन के लिए पशु देते हैं. (१०) सहस्रदा ग्रामणीर्मा रिषन्मनुः सूर्येणास्य यतमानैतु दक्षिणा. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६३ देवता—पथ्या और स्वस्ति

सावर्णेर्देवाः प्र तिरन्त्वायुर्यस्मिञ्श्रान्ता असनाम वाजम्.. (११) हजारों गौएं देने वाले एवं मनुष्यों के नेता मनु को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता. मनु की दक्षिणा सूर्य के साथ तीन लोकों में प्रसिद्ध हो. देवगण सावर्णि मनु की आयु बढ़ावें. यज्ञकर्मों में आलस्य न करने वाले हम मनु से अन्न प्राप्त करें. (११) सूक्त—६३ देवता—पथ्या और स्वस्ति परावतो ये दिधिषन्त आप्यं मनुप्रीतासो जनिमा विवस्वतः. ययातेर्ये नहुष्यस्य बर्हिषि देवा आसते ते अधि ब्रुवन्तु नः.. (१) जो देवगण दूर देश से आकर मनुष्यों के साथ मित्रता स्थापित करते हैं, मानवों द्वारा प्रसन्न होकर जो देव वैवस्वत मनु से उत्पन्न मनुष्यों को धारण करते हैं एवं जो देव नहुषपुत्र ययाति राजर्षि के यज्ञ में बैठते हैं, वे धन आदि देकर हमें पूजित करें. (१) विश्वा हि वो नमस्यानि वन्द्या नामानि देवा उत यज्ञियानि वः. ये स्थ जाता अदितेरद्भ्यस्परि ये पृथिव्यास्ते म इह श्रुता हवम्.. (२) हे देवो! तुम्हारे सभी नाम नमस्कार के योग्य, वंदनीय एवं यज्ञ के योग्य हैं. जो देव अदिति, जल एवं पृथ्वी से उत्पन्न हुए हैं, वे यहां हमारी पुकार को सुनें. (२) येभ्यो माता मधुमत्पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः. उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वप्रसस्ताँ आदित्याँ अनु मदा स्वस्तये.. (३) पृथ्वी माता जिन देवों के लिए मधुर दूध बहाती है और अदीन तथा बादलों से घिरा हुआ आकाश जिनके लिए अमृत धारण करता है, उन प्रशंसनीय शक्ति वाले, वर्षा करने वाले, शोभन कर्म वाले एवं अदितिपुत्र देवों के लिए स्तुति करो. (३) नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहद्देवासो अमृतत्वमानशुः. ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वर्म्माणं वसते स्वस्तये.. (४) बिना पलक गिराए यज्ञकर्म के नेताओं को देखने वाले देवों ने लोक की रक्षा के लिए विस्तृत अमृत प्राप्त किया था. तेजस्वी रथ वाले, विघ्नरहित यज्ञकर्मों वाले व पापरहित देवगण लोगों के कल्याण के लिए स्वर्ग के उन्नत प्रदेश में रहते हैं. (४) सम्राजो ये सुवृधो यज्ञमाययुरपरिह्वृता दधिरे दिवि क्षयम्. ताँ आ विवास नमसा सुवृत्तिभिर्महो आदित्याँ अदितिं स्वस्तये.. (५) अपने तेज से भली-भांति सुशोभित एवं भली प्रकार उन्नत जो देव यज्ञ में आते हैं एवं किसी के द्वारा भी अहिंसित होकर स्वर्ग में रहते हैं, उन महान् देवों और अदिति की सेवा ebook converter DEMO Watermarks*

कल्याण के निमित्त नमस्कार एवं शोभन स्तुतियों द्वारा करो. (५) को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यति ष्ठन. को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये.. (६) हे देवो! मेरे अतिरिक्त कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है, जिसकी तुम सेवा करो? हे ज्ञाता देवो! तुम संतान वाले बनो. मेरे अतिरिक्त कौन यजमान स्तुतियों द्वारा तुम्हारा यज्ञ अलंकृत करता है. यज्ञ हमें पाप से बचाकर हमारा कल्याण करता है. (६) येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः. त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये.. (७) सबसे पहले मनु श्रद्धायुक्त मन से सात होताओं के साथ अग्नि प्रज्वलित करके स्तुतियों द्वारा जिन देवों का यजन करते हैं, वे देव हमें निर्भय करें, कल्याण दें एवं हमारी भलाई के लिए सभी मार्गों को सुगम बनावें. (७) य ईशिरे भुवनस्य प्रचेतसो विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च मन्तवः. ते नः कृतादकृतादेनसस्पर्रद्यद्या देवासः पिपृता स्वस्तये.. (८) उत्तम ज्ञान वाले एवं सर्वज्ञ देव समस्त जंगम लोक के स्वामी हैं. हे देवो! तुम हमें कृत अथवा अकृत पाप से बचाकर आज हमारे कल्याण को बढ़ाओ. (८) भरेष्विन्द्रं सुहवं हवामहेंऽहोमुचं सुकृतं दैव्यं जनम्. अग्निं मित्रं वरुणं सातये भगं द्यावापृथिवी मरुतः स्वस्तये.. (९) हम पाप से छुड़ाने वाले, शोभन-आह्वान वाले एवं शोभन कर्म वाले देवों के संबंधी इंद्र को सब यज्ञों में बुलाते हैं. हम अन्नलाभ और अविनाशी बनने के लिए अग्नि, मित्र, वरुण, भग, द्यावा-पृथिवी और मरुतों को बुलाते हैं. (९) सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम्. दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये.. (१०) हम भली प्रकार रक्षा करने वाली, विस्तृत, पापरहित, शोभन, सुखयुक्त, क्षयरहित, सुदृढ़ गठन वाली, शोभन आचरण युक्त, निष्पाप एवं विनाशरहित द्युलोकरूपी नाव पर कल्याण के लिए चढ़ें. (१०) विश्वे यजत्रा अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिद्रुतः. सत्यया वो देवहूत्या हुवेम शृण्वतो देवा अवसे स्वस्तये.. (११) हे यज्ञ के पात्र देवो! तुम रक्षा के निमित्त हमसे कहो एवं विनाश करने वाली दुर्गति से ebook converter DEMO Watermarks*

हमें बचाओ. हम सत्यरूप यज्ञ द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. रक्षा और कल्याण के लिए तुम हमारी पुकार सुनो. (११) अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपारातिं दुर्विदत्रामघायतः. आरे देवा द्वेषो अस्मद्युयोतनोरु णः शर्म यच्छता स्वस्तये.. (१२) हे देवो! हमारे रोगों और देवों का आह्वान न करने वाली दुर्बुद्धि को हमसे दूर करो. तुम लोभमय बुद्धि को हमसे अलग करो. तुम दुष्ट की पापमय बुद्धि हमसे दूर करो. तुम शत्रुओं को हमसे दूर कर दो. तुम हमें विशेष सुख और कल्याण प्रदान करो. (१२) अरिष्टः स मर्तो विश्व एधते प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि. यमादित्यासो नयथा सुनीतिभिरति विश्वानि दुरिता स्वस्तये.. (१३) हे अदितिपुत्र देवो! जिन्हें तुम शोभन-मार्गों से ले जाते हो एवं सभी पापों से दूर करके कल्याण प्रदान करते हो, वे सब लोग सभी अनिष्टों से सुरक्षित रहकर वृद्धि प्राप्त करते हैं एवं धर्मकार्यों के पश्चात् संतान की उन्नति पाते हैं. (१३) यं देवासोऽवथ वाजसातौ यं शूरसाता मरुतो हिते धने. प्रातर्यावाणं रथमिन्द्र सानसिमरिष्यन्तमा रुहेमा स्वस्तये.. (१४) हे देवो! अन्नलाभ के लिए तुम जिसकी रक्षा करते हो, हे मरुतो! युद्ध में संचित धन पाने के लिए तुम जिस रथ की रक्षा करते हो, हे इंद्र! उसी प्रातःकाल युद्ध में जाने वाले, सेवन करने योग्य एवं ध्वस्त न होने वाले रथ पर हम कल्याण के लिए चढ़ें. (१४) स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्य१प्सु वृजने स्वर्वति. स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन.. (१५) हे मरुतो! शोभन-पथ वाले देश एवं मरुस्थल दोनों में हमारा कल्याण हो. जल एवं आयुधों से युक्त युद्ध में हमारा कल्याण करो. पुत्रों को उत्पन्न करने वाली नारियों में हमारा कल्याण हो. तुम धनलाभ के लिए हमारा कल्याण करो. (१५) स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति. सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देवगोपा.. (१६) जो धरती मार्ग पर चलने के लिए कल्याणकारिणी है, सर्वोत्तम धनसंपन्न एवं यज्ञ की उत्तर वेदी पर प्राप्त होने वाली है, वह घर एवं वन दोनों में हमारी रक्षा करे. देवों द्वारा सुरक्षित वह धरती हमारे लिए सुखपूर्वक रहने योग्य हो. (१६) एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्धो विश्व आदित्या अदिते मनीषी. ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन.. (१७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६४ देवता—विश्वेदेव

हे अदितिपुत्र देवो एवं अदिति! प्लुति के पुत्र विद्वान् गय ऋषि ने तुम सब लोगों को बढ़ाया था. देवों की कृपा से मानवों को प्रभुता मिलती है. गय ऋषि ने देवसमूह की स्तुति की थी. (१७) सूक्त—६४ देवता—विश्वेदेव कथा देवानां कतमस्य यामनि सुमन्तु नाम शृण्वतां मनामहे. को मृळाति कतमो नो मयस्करत्कतम् ऊती अभ्या ववर्त्तति.. (१) यज्ञ में किस स्तुतियोग्य देव की हम भली प्रकार स्तुति करें? कौन हमारी रक्षा करता है? कौन हमें सुख प्रदान करता है? हमारी रक्षा के लिए कौन हमारे पास आता है. (१) क्रतूयन्ति क्रतवो हृत्सु धीतयो वेनन्ति वेनाः पतयन्त्या दिशः. न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधि कामा अयंसत.. (२) हमारे हृदयों में निहित बुद्धियां यज्ञ करने की इच्छा करती हैं. हमारी बुद्धियां देवों की कामना करती हैं. हमारी कामनाएं फलप्राप्ति के लिए देवों के पास जाती हैं. इन देवों के अतिरिक्त कोई भी हमारा सुखदाता नहीं है. हमारी अभिलाषाएं इंद्रादि देवों तक सीमित हैं. (२) नरा वा शंसं पूषणमगोह्यमग्निं देवेद्धमभ्यर्चसे गिरा. सूर्यामासा चन्द्रमसा यमं दिवि त्रितं वातमुषसमक्तुमश्विना.. (३) हे मेरे मन! मानवों द्वारा प्रशंसनीय, धनदान के द्वारा स्तोताओं का पोषण करने वाले एवं अन्यों द्वारा अगम्य पूषा देव एवं देवों द्वारा प्रज्वलित अग्नि देव की स्तुतियों द्वारा पूजा करो. तुम सूर्य, चंद्र, यम, द्युलोक में स्थित यम, तीनों लोकों में व्याप्त इंद्र, वायु, उषा, रात्रि तथा अश्विनीकुमारों की स्तुति करो. (३) कथा कविस्तुवीरवान्कया गिरा बृहस्पतिर्वावृधते सुवृक्तिभिः. अज एकपात्सुहवेभिरृक्वभिरहिः शृणोतु बुध्न्यो३ हवीमनि.. (४) विद्वान् अग्नि किस प्रकार अनेक स्तोताओं वाले एवं किस स्तुति से वृद्धियुक्त होते हैं? बृहस्पति देव शोभन स्तुतियों से बढ़ते हैं. अजएकपात् एवं अहिर्बुध्न्य नामक देव आह्वान के समय हमारे द्वारा रचित शोभन-स्तोत्रों को सुनें. (४) दक्षस्य वादिते जन्मनि व्रते राजाना मित्रावरुणा विवाससि. अतूर्त्तपन्थाः पुरुरथो अर्यमा सप्तहोता विषुरूपेषु जन्मसु.. (५) हे पृथ्वी! तुम सूर्य के जन्म के समय तेजस्वी मित्र एवं वरुण की सेवा करती हो. सूर्य ebook converter DEMO Watermarks*

विशाल रथ पर चढ़कर धीरे-धीरे जाते हैं. सात होता वाले सूर्य के अनेक रूप हैं. (५) ते नो अर्वन्तो हवनश्रुतो हवं विश्वे शृण्वन्तु वाजिनो मित्रद्रवः. सहस्रसा मेधसाताविव त्मना महो ये धनं समिथेषु जभ्रिरे.. (६) इंद्र के वे प्रसिद्ध घोड़े हमारा आह्वान सुनें जो सबकी पुकार सुनते हैं, मार्ग पर सधे हुए चरण रखते हैं, यज्ञ के समय हजारों की संख्या में धन देते हैं एवं युद्ध के समय शत्रुओं से स्वयं ही महान् धन ले आते हैं. (६) प्र वो वायुं रथयुजं पुरन्धिं स्तोमैः कृणुध्वं सख्याय पूषणम्. ते हि देवस्य सवितुः सवीमनि क्रतुं सचन्ते सचितः सचेतसः.. (७) हे स्तोताओ! रथ में घोड़े जोड़ने वाले वायु, अनेक कर्म करने वाले इंद्र एवं पूषा की स्तुति करके उनसे अपनी मित्रता स्वीकार कराओ. वे समान बुद्धि वाले एवं ज्ञानयुक्त होकर प्रातःकाल में सविता देव का यज्ञ करते हैं. (७) त्रिः सप्त सस्रा नद्यो महीरपो वनस्पतीन्पर्वताँ अग्निमूतये. कृशानुमस्तॄंस्तिष्यं सधस्थ आ रुद्रं रुद्रेषु रुद्रियं हवामहे.. (८) हम यज्ञ में सोम की रक्षा के निमित्त इक्कीस जल वाली विशाल वनस्पतियों, पर्वतों अग्नि, कृशानु नामक सोमपालक गंधर्व, बाण चलाने वाले गंधर्वों, नक्षत्रों व स्तुतियोग्य रुद्र को बुलाते हैं. (८) सरस्वती सरयुः सिन्धुरूर्मिभिर्महो महीरवसा यन्तु वक्षणीः. देवीरापो मातरः सूदयित्न्वो घृतवत्पयो मधुमन्नो अर्चत.. (९) परम महान् एवं तरंगों वाली सरस्वती, सरयू, सिंधु आदि इक्कीस नदियां रक्षा के लिए हमारे यज्ञ में आवें. जल बहाने वाली एवं माता के समान ये दिव्य नदियां हमें घी और मधु के समान जल प्रदान करें. (९) उत माता बृहद्दिवा शृणोतु नस्त्वष्टा देवेभिर्जन्निभिः पिता वचः. ऋभुक्षा वाजो रथस्पतिर्भगो रण्वः शंसः शशमानस्य पातु नः.. (१०) विशाल दीप्ति वाली देवमाता हमारी पुकार सुनें. त्वष्टा अपने पुत्र देवों तथा उनकी पत्नियों के साथ हमारा वचन सुनें. ऋभुक्षा, वाज, रथपति भग व रमणीय मरुद्गण हम स्तोताओं की रक्षा करें. (१०) रण्वः संदृष्टौ पितुमाँ इव क्षयो भद्रा रुद्राणां मरुतामुपस्तुतिः. गोभिः ष्याम यशसो जनेष्वा सदा देवास इळया सचेमहि.. (११) eBook converter DEMO Watermarks*

मरुद्गण अन्न वाले घर के समान देखने में सुंदर हैं. रुद्रपुत्र मरुतों की स्तुति कल्याणकारिणी है. हम गायों रूपी धन से युक्त होकर मानवों में यशस्वी बनें. हे देवो! हम सदा अन्न से युक्त हों. (११) यां मे धियं मरुत इन्द्र देवा अददात वरुण मित्र यूयम्. तां पीपयत पयसेव धेनुं कुविद्गिरो अधि रथे वहाथ.. (१२) हे मरुतो, इंद्र, देवगण, वरुण एवं मित्र! जिस प्रकार गाय दूध से भरी रहती है, उसी प्रकार तुम मेरे कर्म को फलयुक्त करो. तुम हमारी स्तुतियां सुनकर रथ के द्वारा यज्ञ में आए हो. (१२) कुविदङ्ग प्रति यथा चिदस्य नः सजात्यस्य मरुतो बुबोधथ. नाभा यत्र प्रथमं संनसामहे तत्र जामित्वमदितिर्दधातु नः.. (१३) हे मरुतो! तुमने पहले अनेक बार जैसा हमारी मैत्री को जाना है, उसी प्रकार इस बार भी जानो. धरती की नाभितुल्य जिस वेदी पर हम हव्य से मिलते हैं, वहां देवमाता अदिति हमारे साथ मित्रता करें. (१३) ते हि द्यावापृथिवी मातरा मही देवी देवाञ्जन्मना यज्ञिये इतः. उभे बिभृत उभयं भरीमभिः पुरू रेतांसि पितृभिश्च सिञ्चतः.. (१४) सबका निर्माण करने वाले, महान्, दिव्य एवं यज्ञ के योग्य द्यावा-पृथिवी जन्म के साथ ही देवों को प्राप्त करते हैं. ये द्यावा-पृथिवी नानाविध उपायों से देवों और मानवों की रक्षा करते हैं तथा पितृतुल्य देवों के साथ जल बरसाते हैं. (१४) वि षा होत्रा विश्वमश्नोति वार्यं बृहस्पतिररमतिः पनीयसी. ग्रावा यत्र मधुषुदुच्यते बृहदवीवश्नन्त मतिभिर्मनीषिणः.. (१५) बड़ों का पालन करने वाली, पर्याप्त स्तुति वाली, देवों की अधिक स्तुति करने वाली एवं सोमरस निचोड़ने के कारण महती वाणी सभी उत्तम धनों को व्याप्त करती हैं. विद्वान् स्तोता अपनी स्तुतियों से देवों को यज्ञ का अभिलाषी बनाते हैं. (१५) एवा कविस्तुवीरवाँ ऋतज्ञा द्रविणस्युर्द्रविणसश्चकानः. उक्थेभिरत्र मतिभिश्च विप्रोऽपीपयदगयो दिव्यानि जन्म.. (१६) कवि अनेक प्रकार की स्तुतियों वाले, यज्ञ के ज्ञाता, धन के इच्छुक, पशु आदि के अभिलाषी एवं मेधावी गय ऋषि ने धन की कामना करते हुए उक्थों और स्तोत्रों द्वारा देवों की स्तुति की थी. (१६) एवा प्लतेः सूनुरवीवृधद्वो विश्व आदित्या अदिते मनीषी. ebook converter DEMO Watermarks*

ईशानासो नरो अमर्त्येनास्तावि जनो दिव्यो गयेन.. (१७) हे अदितिपुत्र देवो और देवमाता अदिति! प्लुति के पुत्र एवं विद्वान् गय ऋषि ने तुम सब लोगों को बढ़ाया था. देवों की कृपा से मानवों को प्रभुता मिलती है. गय ऋषि ने देवसमूह की स्तुति की थी. (१७) सूक्त—६५ देवता—विश्वेदेव अग्निरिन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा वायुः पूषा सरस्वती सजोषसः. आदित्या विष्णुर्मरुतः स्वबृहत् सोमो रुद्रो अदितिर्ब्रह्मणस्पतिः.. (१) अग्नि, इंद्र, मित्र, अर्यमा, वायु, पूषा, सरस्वती, आदित्यगण, विष्णु, मरुद्गण, स्वर्ग, विशाल स्वर्ग, सोम, रुद्र, अदिति और ब्रह्मणस्पति सब मिलकर अपनी महिमा से अंतरिक्ष को पूर्ण करते हैं. (१) इन्द्राग्नी वृत्रहत्येषु सत्पती मिथे हिन्वाना तन्वा३ समोकसा. अन्तरिक्षं मह्या पप्रुरोजसा सोमो घृतश्रीर्महिमानमीरयन्.. (२) सज्जनों के पालक, युद्ध में एकत्र होकर शरीरबल से शत्रुओं का नाश करने वाले एवं महान् आकाश को अपने तेज से पूर्ण करने वाले इंद्र अग्नि के बल को घृतमिश्रित सोमरस से बढ़ाते हैं. (२) तेषां हि मह्ना महतामनर्वणां स्तोमाँ इयर्म्यृतज्ञा ऋतावृधाम्. ये अप्सवमर्णवं चित्रराधस्ते नो रासन्तां महये सुमित्र्याः.. (३) यज्ञ का ज्ञाता मैं अपने महत्त्व से महान् शत्रुओं द्वारा अपराजेय एवं यज्ञ की वृद्धि करने वाले देवों की स्तुति करता हूं. विचित्र धन से युक्त वे देव मेघों से जल बरसाते हैं. शोभन मैत्री वाले वे देव हमें धन देकर मानवों में श्रेष्ठ बनावें. (३) स्वर्णरमन्तरिक्षाणि रोचना द्यावाभूमी पृथिवीं स्कम्भुरोजसा. पृक्षा इव महयन्तः सुरातयो देवाः स्तवन्ते मनुषाय सूरयः.. (४) उन्हीं देवों ने अपनी शक्ति से सबके नेता सूर्य, आकाश में स्थित तेजस्वी नक्षत्रों, द्युलोक एवं धरती को स्थित किया है. दरिद्रों को धन दान करने के समान स्तोताओं को धन से सम्मानित करने वाले देव मानवों को श्रेष्ठ बनाते हैं. हम यज्ञों में ऐसे देवों की स्तुति करते हैं. (४) मित्राय शिक्ष वरुणाय दाशुषे या सम्राजा मनसा न प्रयुच्छतः. ययोर्धाम धर्मणा रोचते बृहद् ययोरुभे रोदसी नाधसी वृतौ.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

स्तोताओं को धन देने वाले मित्र और वरुण को हव्य दो. भली प्रकार सुशोभित ये दोनों मन से कभी असावधान नहीं होते. इनका शरीर अपने तेज से प्रकाशित होता है. विस्तृत द्यावा-पृथिवी याचना करती हुई इनके समीप उपस्थित होती है. (५) या गौर्वर्तनिं पर्येति निष्कृतं पयो दुहाना व्रतनीरवारतः. सा प्रब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे देवेभ्यो दाशद्धविषा विवस्वते.. (६) मेरी जो दुधारू व यज्ञसंपादिका गाय बिना प्रार्थना के यज्ञ में आती है, वह वरुण को हव्य देने वाले तथा अन्न द्वारा अन्य देवों की सेवा करने वाले मेरी रक्षा करें. मैं उस गाय की स्तुति करता हूं. (६) दिवक्षसो अग्निजिह्वा ऋतावृध ऋतस्य योनिं विमृशन्त आसते. द्यां स्कभित्व्य१ प आ चक्रुरोजसा यज्ञं जनित्वी तन्वी३ नि मामृजुः.. (७) अपने तेज से आकाश को पूर्ण करने वाले, अग्निरूपी जिह्वा वाले व यज्ञ की वृद्धि करने वाले देव यज्ञ में अपना-अपना स्थान पहचान कर बैठते हैं. आकाश को धारण करके अपनी शक्ति से जल निकालते हैं एवं यज्ञ के द्रव्यों को अपने शरीर में सुशोभित करते हैं. (७) परिक्षिता पितरा पूर्वजावरी ऋतस्य योना क्षयतः समोकसा. द्यावापृथिवी वरुणाय सव्रते घृतवत्पयो महिषाय पिन्वतः.. (८) सर्वत्र व्याप्त, सबके माता-पिता के समान, सबसे पहले उत्पन्न होने वाले एवं समान स्थान वाले द्यावा-पृथिवी यज्ञस्थल में रहते हैं. समान कर्म वाले द्यावा-पृथिवी पूज्य वरुण को बहने वाले जल से सींचते हैं. (८) पर्जन्यावाता वृषभा पुरीषिणेन्द्रवायू वरुणो मित्रो अर्यमा. देवाँ आदित्याँ अदितिं हवामहे ये पार्थिवासो दिव्यासो अप्सु ये.. (९) अभिलाषापूरक तथा जलयुक्त मेघ एवं वायु को व इंद्र, वरुण, अर्यमा, अदितिपुत्र देवों एवं देवमाता अदिति को हम बुलाते हैं. हम पृथ्वी, आकाश एवं जल में स्थित देवों को भी बुलाते हैं. (९) त्वष्टारं वायुमृभवो य ओहते दैव्या होतारा उषसं स्वस्तये. बृहस्पतिं वृत्रखादं सुमेधसमिन्द्रियं सोमं धनसा उ ईमहे.. (१०) हे ऋभुओ! हम उन्हीं सोम से धन की याचना करते हैं जो तुम्हारे कल्याण के निमित्त देवों को बुलाने वाले त्वष्टा, वायु एवं उषा के पास जाते हैं, जो बृहस्पति एवं शोभन मेधा वाले इंद्र के समीप पहुंचते हैं एवं इंद्र को प्रसन्न करते हैं. (१०) ब्रह्म गामश्वं जनयन्त ओषधीर्वनस्पतीन्पृथिवीं पर्वताँ अपः. ebook converter DEMO Watermarks*

सूर्यं दिवि रोहयन्तः सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तो अधि क्षमि.. (११) देवों ने अन्न, गाय, घोड़े, वृक्षों, वनस्पतियों, पृथ्वी, पर्वतों और जलों को उत्पन्न किया है एवं सूर्य को आकाश में चढ़ाया है. शोभन दान वाले देवों ने धरती पर उत्तम कार्य किए हैं. (११) भुज्युमंहसः पिपृथो निरश्विना श्यावं पुत्रं वध्रिमत्या अजिन्वतम्. कमद्युवं विमदायोहथुर्युवं विष्णाप्वं विश्वकायाव सृजथः.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! तुमने भुज्यु को उपद्रवकारी समुद्र से बचाया, वध्रिमती को सोने के रंग वाला पुत्र दिया, विमद ऋषि को कामोद्दीपक पत्नी दी तथा विश्वक ऋषि को विष्णाप्व नामक पुत्र दिया. (१२) पावीरवी तन्यतुरेकपादजो दिवो धर्ता सिन्धुरापः समुद्रियः. विश्वे देवासः शृणवन्वचांसि मे सरस्वती सह धीभिः पुरन्ध्या.. (१३) आयुधों वाली एवं गर्जन करने वाली मध्यम वाणी, द्युलोक को धारण करने वाले अजएकपात्, सिंधु, सागर का जल, विश्वेदेव एवं कर्मों के साथ अनेक प्रकार की बुद्धियों से युक्त सरस्वती मेरे वचनों को सुनें. (१३) विश्वे देवाः सह धीभिः पुरन्ध्या मनोर्र्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः. रातिषाचो अभिषाचः स्वर्विदः स्वर्णिगरो ब्रह्म सूक्तं जुषेरत.. (१४) कर्मों एवं ज्ञानों से युक्त, मानवीय यज्ञों में सत्कार के पात्र, मरणरहित, सत्य को जानने वाले, हव्यग्रहणकर्त्ता, सामने से यज्ञ में सम्मिलित होने वाले एवं सब कुछ प्राप्त करने वाले इंद्रादि देव हमारी स्तुतियों एवं अन्न को ग्रहण करें. (१४) देवान्वसिष्ठो अमृतान्ववन्दे ये विश्वा भुवनाभि प्रतस्थुः. ते नो रासन्तामुरुगायमद्य यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१५) वसिष्ठ वंश में उत्पन्न ऋषि ने मरणरहित देवों की वंदना की है. वे देव सभी लोकों में स्थित हैं. वे हमें आज अधिक यशस्कर अन्न दें. हे देवो! तुम कल्याणकारी साधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (१५) सूक्त—६६ देवता—विश्वेदेव देवान्हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तये ज्योतिष्कृतो अध्वरस्य प्रचेतसः. ये वावृधुः प्रतरं विश्ववेदस इन्द्रज्येष्ठासो अमृता ऋतावृधः.. (१) मैं अधिक अन्न वाले, आदित्यतेज के कर्त्ता, उत्तम ज्ञान वाले, इंद्रप्रमुख, मरणरहित व ebook converter DEMO Watermarks*

यज्ञ के द्वारा प्रवृद्ध देवों को इसलिए बुलाता हूं कि मेरा यज्ञ बिना विघ्नों के समाप्त हो सके. (१) इन्द्रप्रसूता वरुणप्रशिष्टा ये सूर्यस्य ज्योतिषो भागमानशुः. मरुद्गणे वृजने मन्म धीमहि माघोने यज्ञं जनयन्त सूरयः.. (२) हम इंद्र द्वारा प्रेरित, वरुण द्वारा अनुमोदित, ज्योतिर्मय सूर्य के मार्ग को व्याप्त करने वाले एवं शत्रुनाशक मरुतों की स्तुति करते हैं. हे विद्वान् यजमान! उन्हीं इंद्र पुत्र मरुतों के लिए हम यज्ञ की तैयारी करते हैं. (२) इन्द्रो वसुभिः परि पातु नो गयमादित्यैर्नो अदितिः शर्म यच्छतु. रुद्रो रुद्रेभिर्देवो मृळयाति नस्त्वष्टा नो ग्नाभिः सुविताय जिन्वतु.. (३) इंद्र वसुओं के साथ हमारे घर की रक्षा करें. अदिति देवों के साथ हमारा कल्याण करें. रुद्रदेव मरुतों के साथ हमें सुखी करें. त्वष्टा अपनी पत्नियों के साथ हमें अभ्युदय के लिए प्रसन्न करें. (३) अदितिर्द्यावापृथिवी ऋतं महदिन्द्राविष्णू मरुतः स्वर्बृहत्. देवाँ आदित्याँ अवसे हवामहे वसून् रुद्रान्तस्वितारं सुदंससम्.. (४) अदिति, द्यावा-पृथिवी, महान् सत्य, इंद्र, विष्णु, मरुत्, विस्तृत स्वर्ग, देवों, आदित्यों, वसुओं, रुद्रों और उत्तम दान करने वाले सूर्य को हम अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (४) सरस्वान्धीभिर्वरुणो धृतव्रतः पूषा विष्णुर्महिमा वायुरश्विना. ब्रह्मकृतो अमृता विश्ववेदसः शर्म नो यंसन् त्रिवरूथमंहसः.. (५) बुद्धि से युक्त सागर, व्रत धारण करने वाले वरुण, पूषा, महत्त्वयुक्त विष्णु, वायु, अश्विनीकुमार व स्तोता को अन्न देने वाले, मरणरहित, सर्वज्ञ व पापनाशक देवगण हमें तीन मंजिल वाला मकान दें. (५) वृषा यज्ञो वृषणः सन्तु यज्ञिया वृषणो देवा वृषणो हविष्कृतः. वृषणा द्यावापृथिवी ऋतावरी वृषा पर्जन्यो वृषणो वृषस्तुभः.. (६) यज्ञ हमारी कामनाएं पूरी करें. यज्ञ के पात्र देवगण हमारी अभिलाषा पूरी करने वाले हों. देवगण, हव्य संग्रह करने वाले, यज्ञयुक्त ऋतावरी, पर्जन्य और स्तोता सब हमारी कामना करें. (६) अग्नीषोमा वृषणा वाजसातये पुरुप्रशस्ता वृषणा उप ब्रुवे. यावीजिरे वृषणो देवयज्यया ता नः शर्म त्रिवरूथं वि यंसतः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

अभीष्टदाता एवं बहुतों द्वारा प्रशंसित अग्नि व सोम की स्तुति मैं अन्न पाने के लिए करता हूं. ऋत्विज् यज्ञ में हव्यों द्वारा उनकी पूजा करते हैं. वे हमें तीन मंजिल वाला मकान दें. (७) धृतव्रताः क्षत्रिया यज्ञनिष्कृतो बृहद्दिवा अध्वराणामभिश्रियः. अग्निहोतार ऋतसापो अद्रुहोऽपो असृजन्ननु वृत्रतूर्ये.. (८) व्रतपालन में तत्पर, शक्तिशाली, यज्ञ को अलंकृत करने वाले, महान् तेजस्वी, यज्ञ में सम्मिलित होने वाले, अग्नि द्वारा बुलाए हुए एवं सत्य के पात्र देवों ने वृत्रयुद्ध के समय जल की रचना की. (८) द्यावापृथिवी जनयन्नभि व्रताप ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया. अन्तरिक्षं स्व१रा पप्रूरतये वशं देवासस्तन्वी३ नि मामृजुः.. (९) इंद्रादि देवों ने द्यावा-पृथिवी को लक्ष्य करके अपने कर्म से जल, ओषधियां, यज्ञ के उपयोग में आने वाली पलाश आदि की लकड़ियां बनाकर शत्रुओं से रक्षा के लिए स्वर्ग और आकाश को अपने तेज द्वारा पूर्ण कर दिया. देवों ने अभिलषित यज्ञ को अपने शरीरों में अलंकृत किया. (९) धर्तारो दिव ऋभवः सुहस्ता वातापर्जन्या महिषस्य तन्यतोः. आप ओषधीः प्र तिरन्तु नो गिरो भगो रातिर्वाजिनो यन्तु मे हवम्.. (१०) सुंदर हाथों वाले ऋभु स्वर्ग को धारण करने वाले हैं. वायु और बादल महान् शब्द करते हैं. जल और वनस्पतियां हमारी स्तुतियों को बढ़ावें. धन देने वाले भग एवं सूर्य हमारे यज्ञ में आवें. (१०) समुद्रः सिन्धु रजो अन्तरिक्षमज एकपात्तनयित्नुरर्णवः. अहिर्बुध्न्यः शृणवद्वचांसि मे विश्वे देवास उत सूर्यो मम.. (११) सागर, सरिता, धूल से भरी धरती, अंतरिक्ष, अजएकपात्, गरजने वाला मेघ और अहिर्बुध्न्य मेरी पुकार सुनें. सभी देव एवं विद्वान् मेरी स्तुति सुनें. (११) स्याम वो मनवो देववीतये प्राञ्चं नो यज्ञं प्र णयत साधुया. आदित्या रुद्रा वसवः सुदानव इमा ब्रह्म शस्यमानानि जिन्वत.. (१२) हे देव! हम मानव तुम्हें यज्ञ अर्पण करने वाले बनें. हमारे प्राचीन यज्ञ को तुम पूर्ण करो. हे आदित्यो, रुद्रपुत्र मरुतो एवं शोभन-दान वाले वसुओ! तुम इन उच्चरित स्तोत्रों को सुनो. (१२) दैव्या होतारा प्रथमा पुरोहित ऋतस्य पन्थामन्वेमि साधुया. ebook converter DEMO Watermarks*