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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

गिरा च श्रुष्टिः सभरा असन्नो नेदीय इत्सृण्यः पक्वमेयात्.. (३) हे मित्र ऋत्विजो! हलों में बैल जोड़ो, जुओं को विस्तृत करो व यहां प्रस्तुत खेत में बीज बोओ. हमारी स्तुतियों के साथ अन्न पर्याप्त मात्रा में हो. हमारा हंसिया समीप की पकी हुई फसल पर गिरे. (३) सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तन्वते पृथक्. धीरा देवेषु सुम्नया.. (४) बुद्धिमान् ऋत्विज् हल जोड़ते हैं एवं जुआ हल से अलग करते हैं. धीर पुरुष देवों का स्तोत्र बोलते हैं. (४) निराहावान्कृणोतन सं वरत्रा दधातन. सिञ्चामहा अवतमुद्रिणं वयं सुषेकमनुपक्षितम्.. (५) हे मित्रो! पशुओं के लिए प्याऊ एवं चमड़े की रस्सी बनाओ. हम जलयुक्त सींचने में समर्थ एवं क्षीण न होने वाले गड्ढे से पानी लेकर सींचते हैं. (५) इष्कृताहावमवतं सुवरत्रं सुषेचनम्. उद्रिणं सिञ्चे अक्षितम्.. (६) हम चमड़े की शोभन रस्सियों से युक्त भली प्रकार सिंचित, जल से भरे हुए एवं न सूखने वाले गड्ढे से जल लेकर सींचते हैं. (६) प्रीणीताश्वान्हितं जयाथ स्वस्तिवाहं रथमित्कृणुध्वम्. द्रोणाहावमवतमश्मचक्रमंसत्रकोशं सिञ्चता नृपाणम्.. (७) हे ऋत्विजो! बैलों को घास आदि खिलाकर तैयार करो, खेतों को जोतो एवं सरलता से धान्य ढोने वाला रथ तैयार करो. पशुओं की प्याऊ में एक द्रोण जल आता है. पत्थरों के घेरे से घिरे हुए दुर्भिक्ष के समय जल की रक्षा करने वाले तथा मानवों के जलपान के आधार अर्थात् कुएं को पानी से भरो. (७) व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्म सीव्यध्वं बहुला पृथूनि. पुरः कृणुध्वमायसीरधृष्टा मा वः सुस्रोच्चमसो दृंहता तम्.. (८) हे ऋत्विजो! गोशाला बनाओ. वही मानवों के जल पीने का स्थान है. तुम मानवों के कवचों को सिओ, जो अनेक एवं विस्तृत हों. तुम लोहे के मजबूत बरतन बनाओ तथा चमस को दृढ़ करो, जिससे पानी न टपके. (८) आ वो धियं यज्ञियां वर्त ऊतये देवा देवीं यजतां यज्ञियामिह. सा नो दुहीयद्यवसेव गत्वी सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (९) हे ऋत्विजो! मैं अपनी रक्षा के निमित्त तुम्हारा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता हूं. ebook converter DEMO Watermarks*

तुम्हारा ध्यान यज्ञयोग्य, दीप्त एवं पूज्य है. जिस प्रकार गाएं घास खाकर हजार धारों वाला दूध देती हैं, उसी प्रकार यह ध्यान हमारी इच्छा पूरी करे. (९) आ तू षिञ्च हरिमीं द्रोरुपस्थे वाशीभिस्तक्षताश्मन्मयीभिः. परि ष्वजध्वं दश कक्ष्याभिरुभे धुरौ प्रति वह्निं युनक्त.. (१०) हे अध्वर्युजनो! तुम काठ के बरतन में रखे हुए हरे रंग के सोमरस को सींचो. पत्थर की टंकियों से यह पात्र बनाओ. दस उंगलियां लपेटकर इस पात्र को पकड़ो तथा रथ के दोनों धुरों में बैल जोड़ो (१०) उभे धुरौ वह्निरापिब्दमानोऽन्तर्योनेव चरति द्विजानिः. वनस्पतिं वन आस्थापयध्वं नि षू दधिध्वमखनन्त उत्सम्.. (११) रथ को ढोने वाला बैल रथ की दोनों धुरों को शब्दपूर्ण करता हुआ इस प्रकार चलता है, जिस प्रकार दो पत्नियों का पति उनके साथ क्रम से क्रीड़ा करता है. लकड़ी के बने ढांचे को लकड़ी के पहियों पर इस प्रकार रखो कि रथ का ढांचा निराधार न रहे. (११) कपुन्नरः कपथमुद्दधातन चोदयत खुदत वाजसातये. निष्टिग्र्यः पुत्रमा च्यावयोतय इन्द्रं सबाध इह सोमपीतये.. (१२) हे ऋत्विजो! ये इंद्र सुख को पूरा करने वाले हैं. उन्हें प्रेरित करो, उनके साथ क्रीड़ा करो एवं सुख उठाओ. तुम अन्न पाने के लिए ऐसा करो. हे बाधा वाले ऋत्विजो! अदितिपुत्र इंद्र को अपनी रक्षा के उद्देश्य से सोमरस पीने के लिए बुलाओ. (१२) सूक्त—१०२ देवता—इंद्र प्र ते रथं मिथूकृतमिन्द्रोऽवतु धृष्णुया. अस्मिन्नाजौ पुरुहूत श्रवाय्ये धनभक्षेषु नोऽव.. (१) हे मुद्गल! युद्ध में असहाय बने हुए तुम्हारे रथ की शक्तिशाली इंद्र रक्षा करें. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! इस प्रसिद्ध युद्ध में धन की कामना करने वाले हम लोगों की रक्षा करो. (१) उत्स्म वातो वहति वासो अस्या अधिरथं यदजयत्सहस्रम्. रथीरभून्मुद्गलानी गविष्टौ भरे कृतं व्यचेदिन्द्रसेना.. (२) मुद्गलानी ने जिस समय रथ पर बैठकर हमारी गायों को जीता, उसी समय वायु ने उसका वस्त्र हिलाया. गायों के जीतने वाले इस युद्ध में वह रथ पर बैठी थी. इंद्रसेना नाम की वह मुद्गलपत्नी युद्ध में शत्रुओं से गाएं छीन लाई. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

अन्तर्यच्छ जिघांसतो वज्रमिन्द्राभिदासतः. दासस्य वा मघवन्नार्यस्य वा सनुतर्यवया वधम्.. (३) हे इंद्र! हमें मारने के इच्छुक शत्रुओं पर वज्र चलाओ. हे धनस्वामी! हमारा शत्रु दास हो या आर्य तुम गुप्त रूप से उसे मारो. (३) उद्नो हदमपिबज्जर्हृषाणः कूटं स्म तृंहदभिमातिमेति. प्र मुष्कभारः श्रव इच्छमानोऽजिरं बाहू अभरत्सिषासन्.. (४) इस बैल ने अत्यंत प्रसन्न होकर जल पिया है. यह अपने सींगों से मिट्टी के ढेर को खोदता हुआ शत्रु की ओर जाता है. लटकते हुए भारी अंडकोशों वाला यह बैल अन्न की इच्छा करता हुआ गमनशील शत्रु की बांहों पर प्रहार करता है. (४) न्यक्रन्दयन्नुपयन्त एनममेयन्व्ऋषभं मध्य आजेः. तेन सूभर्वं शतवत्सहस्रं गवां मुद्गलः प्रधने जिगाय.. (५) इस बैल के समीप जाते हुए मनुष्यों ने इसे गर्जन करने के लिए प्रेरित किया तथा युद्ध के बीच में इससे पेशाब कराया. इस बैल की सहायता से मुद्गल ने उत्तम आहार करने वाली सैकड़ों एवं हजारों गायों को जीता. (५) ककर्दवे वृषभो युक्त आसीदवावचीत्सारथिरस्य केशी. दुधेर्युक्तस्य द्रवतः सहानस ऋच्छन्ति ष्मा निष्पदो मुद्गलानीम्.. (६) बैल को शत्रुनाश के काम में लगाया गया. इसकी रस्सी थामने वाली मुद्गलानी गरजने लगी. न रुकने वाले रथ में जुड़े हुए एवं रथ के साथ दौड़ने वाले उस बैल के पीछे चलने वाले सैनिक मुद्गलानी के पीछे चले. (६) उत प्रधिमुदहन्नस्य विद्वानुपायुन्गवंसगमात्र शिक्षन्. इन्द्र उदावत्पतिमघ्न्यानामंरहत पद्याभिः ककुद्मान्.. (७) जानने वाले मुद्गल ने रथ के पहिए को बांध दिया तथा बैल को इस रथ के जुए में स्थापित किया. इंद्र ने गायों के पति उस बैल को बचाया. बैल तेजी से मार्ग पर चला. (७) शुनमष्ट्राव्यचरत्कपर्दी वरत्रायां दार्वानिह्यमानः. नृम्णानि कृण्वन्बहवे जनाय गाः पस्पशानस्तविषीरधत्त.. (८) चाबुक और कोड़े वाला व्यक्ति चमड़े की रस्सी से रथ के भागों को बांधकर सुखपूर्वक घूमने लगा. उसने अनेक लोगों का उद्धार किया तथा अनेक गायों की रक्षा की. (८) इमं तं पश्य वृषभस्य युञ्जं काष्ठाया मध्ये द्रुघणं शयानम्. ebook converter DEMO Watermarks*

येन जिगाय शतवत्सहस्रं गवां मुद्गलः पृतनाज्येषु.. (९) बैल का साथ देने वाले एवं युद्ध की सीमा में पड़े हुए द्रुघण को देखो. मुद्गल ने द्रुघण की सहायता से युद्ध में सैकड़ों-हजारों गायों को जीता. (९) आरे अघा को न्वित्था ददर्श यं युञ्जन्ति तंम्वा स्थापयन्ति. नास्मै तृणं नोदकमा भरन्त्युत्तरो धुरो वहति प्रदेशित्.. (१०) किसी ने पास या दूर के स्थान में ऐसा देखा है कि जिसको रथों में जोतते हैं, उसीको ऊपर स्थापित करते हैं. इसे जल एवं घास नहीं दी जाती. यह धुरा धारण करता है एवं स्वामी को विजयी बनाता है. (१०) परिवृक्तेव पतिविद्यमानट् पीप्याना कूचक्रेणेव सिञ्चन्. एषैष्या चिद्रथ्या जयेम सुमङ्गलं सिनवदस्तु सातम्.. (११) मुद्गलानी ने परित्यक्ता स्त्री के समान शक्ति दिखाकर पति का धन प्राप्त किया. जिस प्रकार बादल धरती पर जल बरसाता है, उसी तरह मुद्गलानी ने बाण बरसाए. हम भी इसी प्रकार के सारथि द्वारा विजय प्राप्त करें. यह विजय हमें अन्न दे. (११) त्वं विश्वस्य जगतश्चक्षुरिन्द्रासि चक्षुषः. वृषा यदाजिं वृषणा सिषाससि चोदयन्वध्रिणा युजा.. (१२) हे इंद्र! तुम सारे संसार के नेत्र के समान हों. तुम नेत्र वालों के भी नेत्र हो. हे जलवर्षक इंद्र! तुम रस्सी द्वारा दो घोड़ों को रथ में बांधकर चलते हो एवं धन देते हो. (१२) सूक्त—१०३ देवता—इंद्र आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्. सङ्क्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतं सेना अजयत्साकमिन्द्रः.. (१) इंद्र व्यापक शत्रुनाशक बैल के समान भयानक शत्रुघातक एवं मानवों को क्षुब्ध करने वाले हैं. वे शत्रुओं को रुलाने वाले व निमेषरहित चक्षु वाले हैं. उन्होंने अकेले ही सैकड़ों सेनाओं को जीता है. (१) सङ्क्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना. तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा.. (२) हे योद्धा लोगो! शत्रुओं को रुलाने वाले, निमेषरहित युद्ध में जय पाने वाले युद्धकर्त्ता, अन्यों द्वारा विचलित न होने वाले, पराभवकारी, हाथ में बाण रखने वाले एवं जलवर्षक इंद्र की सहायता पाकर विजय पाओ एवं शत्रुओं के साथ युद्ध करो. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

स इषुहस्तैः स निषङ्गिभिर्वशी संस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन. संसृष्टजित्सोमपा बाहुशर्द्ध्यु१ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता.. (३) सबको वश में करने वाले इंद्र हाथ में बाण धारण करने वाले तथा तूणीरधारी लोगों से युक्त होकर युद्ध करते हैं एवं शत्रुसमूह से भिड़ जाते हैं. युद्ध में भिड़ने वालों को जीतने वाले, सोमपानकर्त्ता, भुजबल युक्त एवं उद्यत धनुष वाले इंद्र अपने बाणों से शत्रुओं का नाश करते हैं. (३) बृहस्पते परि दीया रथेन रक्षोहामित्राँ अपबाधमानः. प्रभञ्जन्त्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्.. (४) हे राक्षसहंता बृहस्पति! तुम शत्रुओं को जीतते हुए रथ पर बैठकर हमारे पास आओ. तुम शत्रुसेनाओं का नाश करो, विपक्षी योद्धाओं को मारो एवं हमारे रथों की रक्षा करके वृद्धि पाओ. (४) बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः. अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्.. (५) हे सब प्राणियों का बल जानने वाले, महान् उत्तम वीर, सामर्थ्यशाली, शीघ्र गति वाले, शत्रुपराभवकारी, उग्र, शक्तिशाली वीर पुत्रों वाले, बल प्राप्तकर्त्ता एवं शक्ति से उत्पन्न गायों को प्राप्त करने वाले इंद्र! तुम विजय प्राप्त करने वाले रथ पर चढ़ो. (५) गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा. इमं सजाता अनु वीरयध्वमिन्द्रं सखायो अनु सं रभध्वम्.. (६) हे एक साथ उत्पन्न योद्धाओं एवं मित्रो! तुम मेघभेदनकारी, जल प्राप्त करने वाले, हाथ में वज्रधारणकर्त्ता, जयशील व गतिशील शत्रुसेना को शक्ति से पराजित करने वाले इंद्र को आगे करके युद्ध करो एवं प्रसन्नता प्राप्त करो. (६) अभि गोत्राणि सहसा गाहमानोऽदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः. दुश्च्यवनः पृतनाषाळयुध्योऽस्माकं सेना अवतु प्र युत्सु.. (७) दयाहीन वीर अनेक यज्ञों के स्वामी, अन्यों द्वारा विचलित न होने वाले शत्रुसेना को हराने वाले दूसरों द्वारा प्रहार न करने योग्य एवं शक्ति द्वारा मेघों में प्रवेश करने वाले इंद्र युद्धों में हमारी सेनाओं की रक्षा करें. (७) इन्द्र आसां नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर एतु सोमः. देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम्.. (८) इंद्र इन सेनाओं के स्वामी हैं. बृहस्पति इनके दक्षिण भाग में एवं यज्ञोपयोगी सोम इनके ebook converter DEMO Watermarks*

आगे रहें. मरुद्गण शत्रुनाशक एवं जयशील देवसेनाओं के आगे-आगे चलें. (८) इन्द्रस्य वृष्णो वरुणस्य राज्ञ आदित्यानां मरुतां शर्ध उग्रम्. महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्.. (९) जलवर्षक इंद्र, राजा वरुण, आदित्यों एवं मरुद्गणों का बल भयानक है. महामनस्वी, भुवन को कंपित करने वाले एवं विजयी देवों का जयजयकार उत्पन्न हुआ. (९) उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्त्वनां मामकानां मनांसि. उद्वृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषा:.. (१०) हे इंद्र! हमारे आयुधों को तेज एवं हमारे सैनिकों का मन प्रसन्न करो. हमारे घोड़ों की शक्ति तथा हमारे विजयी रथ का शब्द बढ़े. (१०) अस्माकमिन्द्र: समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु. अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु.. (११) हमारी ध्वजाओं के फहराए जाने के समय इंद्र रक्षा करें. हमारे बाण विजय प्राप्त करें. हमारे वीर उत्तम हों. हे देवो! युद्धों में हमारी रक्षा करो. (११) अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्‍यप्वे परेहि. अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रस्तमसा सचन्ताम्.. (१२) हे अप्वा नामक पाप-देवता! तुम हमारे शत्रुओं का मन लुभाते हुए उनके अंगों को स्वीकार करो. उनके समीप जाओ और शोकों द्वारा उनके हृदयों को जलाओ. हमारे शत्रु अंधे तम से युक्त हों. (१२) प्रेता जयता नर इन्द्रो व: शर्म यच्छतु. उग्रा व: सन्तु बाहवोऽनाधृष्या यथासथ.. (१३) हे मानवो! आगे बढ़ो और विजयी बनो. इंद्र तुम्हें कल्याण प्रदान करें. तुम लोग जैसे अधृष्य हो, वैसी ही शक्तिशालीनी तुम्हारी भुजाएं हों. (१३) सूक्त—१०४ देवता—इन्द्र असावि सोम: पुरुहूत तुभ्यं हरिभ्यां यज्ञमुप याहि तूयम्. तुभ्यं गिरो विप्रवीरा इयाना दधन्विरे इन्द्र पिबा सुतस्य.. (१) हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ा गया है. तुम अपने घोड़ों द्वारा जल्दी यज्ञ में आओ. श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने स्तुतियां करते हुए तुम्हारे लिए यह सोमरस दिया है. तुम इसे पिओ. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

अप्सु धूतस्य हरिवः पिबेह नृभिः सुतस्य जठरं पृणस्व. मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाहः.. (२) हे हरि नाम के घोड़ों वाले इंद्र! यज्ञकर्म करने वाले मनुष्यों द्वारा निचोड़े गए और जलों में स्वच्छ किए गए सोमरस को पिओ तथा अपना पेट भरो. पत्थरों ने तुम्हारे लिए जो सोम सींचा है, उससे अपना मद बढ़ाओ तथा स्तुतियों को स्वीकार करो. (२) प्रोग्रां पीतिं वृष्ण इयर्मि सत्यां प्रयै सुतस्य हर्यश्व तुभ्यम्. इन्द्र धेनाभिरिह मादयस्व धीभिर्विश्वाभिः शच्या गृणानः.. (३) हे हरि नामक घोड़ों वाले एवं वर्षार्कर्त्ता इंद्र! तुम्हारे पीने के लिए निचोड़े गए सोम को यज्ञ में तुम्हारे आने का निश्चय जानकर तुम्हें भेंट करता हूं. तुम शक्ति से युक्त एवं प्रशंसित होकर इस यज्ञ में समस्त स्तुतियों एवं कर्मों से प्रसन्न बनो. (३) ऊती शचीवस्तव वीर्येण वयो दधाना उशिज ऋतज्ञाः. प्रजावदिन्द्र मनुषो दुरोणे तस्थुर्गृणन्तः सधमाद्यासः.. (४) हे शक्तिशाली इंद्र! तुम्हारी रक्षा से अन्न धारण करने वाले एवं प्रजाओं को धारण करने वाले उशिजवंशी यज्ञ करने की अभिलाषा से यजमानों के घरों में स्थित हुए. वे तुम्हारी स्तुति के साथ-साथ प्रसन्न हो रहे थे. (४) प्रणीतिभिषे हर्यश्व सुष्टोः सुषुम्नस्य पुरुरुचो जनासः. मंहिष्ठामूर्तिं वितिरे दधानाः स्तोतार इन्द्र तव सूनृताभिः.. (५) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी, शोभन स्तोत्र वाले, सुंदर धन वाले व विशाल दीप्ति वाले इंद्र! तुम्हारी शोभन स्तुतियों द्वारा स्तोताओं ने अपनी तथा दूसरों की रक्षा की है. (५) उप ब्रह्माणि हरिवो हरिभ्यां सोमस्य याहि पीतये सुतस्य. इन्द्र त्वा यज्ञः क्षममाणमानड् दाश्वाँ अस्यध्वरस्य प्रकेतः.. (६) हे हरि नाम के घोड़ों वाले इंद्र! तुम अपने घोड़ों द्वारा यज्ञों में निचोड़े हुए सोमरस को पीने जाओ. शक्तिशाली इंद्र को ही यज्ञ प्राप्त करते हैं. तुम यज्ञ का विषय समझकर दान करते हो. (६) सहस्रवाजमभिमातिषाहं सुतेरणं मघवानं सुवृक्तिम्. उप भूषन्ति गिरो अप्रतीतमिन्द्रं नमस्या जरितुः पनन्त.. (७) हे असीम अन्न वाले, शत्रुपराजयकारी, सोमरस में रमण करने वाले, धनयुक्त, शोभन स्तुति वाले एवं युद्ध में अन्यों द्वारा न ललकारे गए इंद्र को सुशोभित करते हैं. स्तोता नमस्कार पूर्वक इंद्र की स्तुति करते हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सप्तापो देवीः सुरणा अमृक्ता याभिः सिन्धुमतरा इन्द्र पूर्षित्. नवतिं स्रोत्या नव च स्रवन्तीर्देवेभ्यो गातुं मनुषे च विन्दः.. (८) हे शत्रुनगरियों का भेदन करने वाले इंद्र! तुमने शोभन-शब्द वाली एवं बाधारहित गंगा आदि सात नदियों द्वारा सागर को बढ़ाया, तुमने देवों और मानवों के कल्याण के लिए निन्यानवे नदियों को मार्ग प्राप्त कराया. (८) अपो महीरभिशस्तेरमुञ्चोऽजागरास्वधि देव एकः. इन्द्र यास्त्वं वृत्रतूर्ये चकर्थ ताभिर्विश्वायुस्तन्वं पुपुष्याः.. (९) हे इंद्र! तुमने वृत्र के पास से बहुत जल गिराया. इन मुक्त जलों के प्रति एकमात्र तुम्हीं सावधान थे. तुमने वृत्र को मारकर प्राप्त किए गए जलों से सारे संसार के प्राणियों का शरीर पुष्ट किया था. (९) वीरेण्यः क्रतुरिन्द्रः सुशस्तिरुतापि धेना पुरुहूतमीट्टे. आर्दयद्वृत्रमकृणोदु लोकं ससाहे शक्रः पृतना अभिष्टिः.. (१०) इंद्र अतिशय वीर, यज्ञकर्मों वाले एवं शोभन स्तुतियुक्त हैं. मेरी वाणी इंद्र की स्तुति करती है. इंद्र ने वृत्र को मारा, प्रकाश किया, शक्तिशाली बनकर शत्रु को हराया एवं शत्रुओं की सेनाओं को समाप्त किया. (१०) शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ. शृण्वन्तमूग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि सञ्जितं धनानाम्.. (११) हे इंद्र! अन्नप्राप्ति वाले युद्ध में मैं उत्साह से बढ़े हुए एवं धनस्वामी तुम्हें बुलाता हूं. तुम यज्ञ के कुशल नेता हो. तुम युद्धों में अपने सेवकों की रक्षा के लिए भयानक रूप धारण करते हो, शत्रुओं को मारते एवं उनका धन जीतते हो. (११) सूक्त—१०५ देवता—इंद्र कदा वसो स्तोत्रं हर्यत आव श्मशा रुधद्द्वाः. दीर्घं सुतं वाताप्याय.. (१) हे निवासस्थान देने वाले इंद्र! हमारा स्तोत्र तुझ कामना करने वाले को कब रोकेगा? जिस प्रकार खेत की नालियां जलपूर्ण होती हैं. उसी प्रकार जल प्राप्त करने के लिए अधिक सोमरस निचोड़ा गया है. (१) हरी यस्य सुयुजा विव्रता वेरर्वन्तानु शेपा. उभा रजी न केशिना पतिर्दन्.. (२) हरि नामक दो घोड़े दौड़ने में कुशल ठीक-ठीक से सिखाए गए एवं श्वेत केशों वाले हैं. इन घोड़ों के स्वामी इंद्र दान करने आवें. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

अप योरिन्द्रः पापज आ मर्तो न शश्रमाणो बिभीवान्. शुभे यद्युयुजे तविषीवान्.. (३) इंद्र पापी वृत्र के साथ युद्ध में मनुष्य के समान थककर एवं भयभीत होकर मरुतों के समान गतिशील घोड़े रथ में जोड़ें. उस समय वे शोभा प्राप्त करें. (३) सचायोरिन्द्रश्चर्कृष आँ उपानसः सपर्यन्. नदयोर्विव्रतयोः शूर इन्द्रः.. (४) मानवों की सेवा पाकर इंद्र ने सभी संपत्तियों को एकत्र किया. शूर इंद्र ने शब्द करने वाले एवं विशेषकर्म वाले घोड़ों को वश में किया. (४) अधि यस्तस्थौ केशवन्ता व्यचस्वन्ता न पुष्ट्यै. वनोति शिप्राभ्यां शिप्रिणीवान्.. (५) इंद्र शरीर पुष्ट करने के लिए केश वाले एवं विशाल घोड़ों पर चढ़े. इंद्र ने अपने दोनों जबड़ों को चलाकर भोजन मांगा. (५) प्रास्तौदृष्वौजा ऋष्वेभिस्ततक्ष शूरः शवसा. ऋभुर्न क्रतुभिर्मातरिश्वा.. (६) दर्शनीय शक्ति वाले एवं शूर इंद्र शक्ति के द्वारा मरुतों के साथ यजमान की प्रशंसा करते हैं. ऋभु के रथनिर्माण के समान इंद्र ने अनेक वीरकर्म किए हैं. (६) वज्रं यश्चक्रे सुहनाय दस्यवे हिरीमशो हिरीमान्. अरुतहनुरद्भुतं न रजः.. (७) हरी दाढ़ी वाले एवं हरे रंग के घोड़ों वाले इंद्र ने दस्यु को मारने के लिए वज्र तैयार किया. सुंदर जबड़ों वाले इंद्र आकाश के समान विचित्र हैं. (७) अव नो वृजिना शिशीह्यचा वनेमानृचः. नाब्रह्मा यज्ञ ऋधग्जोषति त्वे.. (८) हे इंद्र! हमारे पापों को समाप्त करो, जिससे हम तुम्हारी स्तुतियों द्वारा स्तुतिहीन लोगों को मार सकें. स्तुतिरहित यज्ञ तुम्हें स्तुति वाले यज्ञ के समान प्यारा नहीं होता. (८) ऊर्ध्वा यत्ते त्रेतिनी भूद्यज्ञस्य धूर्षु सद्मन्. सजूर्नावं स्वयशसं सचायोः.. (९) हे इंद्र! तुम्हारे ऋत्विजों ने यज्ञशाला में जिस समय तुमसे संबंधित यज्ञक्रिया आरंभ की, उस समय तुमने यजमान के साथ एक नाव पर सवार होकर उसका उद्धार किया. (९) श्रिये ते पृश्निरुपसेचनी भूच्छ्रिये दर्विररेपाः. यया स्वे पात्रे सिञ्चस उत्.. (१०) हे इंद्र! दूध देने वाली गाय तुम्हारे सोम हेतु दूध दे. तुम करछुली के द्वारा अपने पात्र में मधु लेते हो. वह स्वच्छ एवं कल्याणकर हो. (१०) शतं वा यदसुर्य प्रति त्वा सुमित्र इत्थास्तौद्दुर्मित्र इत्थास्तौत्. ebook converter DEMO Watermarks*

आवो यद्दस्युहत्ये कुत्सपुत्रं प्रावो यद्दस्युहत्ये कुत्सवत्सम्.. (११) हे शक्तिशाली इंद्र! सुमित्र ने तुम्हारे निमित्त इस प्रकार की सौ स्तुतियां बनाईं तथा दुर्मित्र ने भी सौ स्तुतियां बनाईं. तुमने दस्युहत्या के समय कुत्स के पुत्र की रक्षा की थी. (११) सूक्त—१०६ देवता—अश्विनीकुमार उभा उ नूनं तदिदर्थयेथे वि तन्वाथे धियो वस्त्रापसेव. सध्रीचीना यातवे प्रेमजीगः सुदिनेव पृक्ष आ तंसयेथे.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे हव्य की कामना करते हो. जुलाहा जिस प्रकार कपड़ा बुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को बढ़ाते हो. यजमान तुम दोनों के एक साथ आने के लिए स्तुति करता है. तुम सूर्य एवं चंद्रमा के समान अन्न को अलंकृत करो. (१) उष्टारेव फर्वरेषु श्रयेथे प्रायोगेव श्वात्र्या शासुरेथः. दूतेव हि ष्ठो यशसा जनेषु माप स्थातं महिषेवावपानात्.. (२) बैल जिस प्रकार घास के मैदान में चरते हैं, उसी प्रकार तुम यज्ञकर्त्ता लोगों के पास आते हो. रथ को चलाने वाले शीघ्रगामी अश्व के समान तुम धन देने के लिए स्तोता के पास आते हो. तुम दूत के समान यशस्वी बनो. जैसे भैंसे तालाब को नहीं छोड़ते, उसी प्रकार तुम भी सोमपान को मत छोड़ना. (२) साकंद्युजा शकुनस्येव पक्षा पश्वेव चित्रा यजुरा गमिष्टम्. अग्निरिव देवयोर्दीदिवांसा परिज्मानेव यजथः पुरुत्रा.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम चिड़ियों के पंखों के समान एक-दूसरे से मिले रहते हो. तुम इस यज्ञ में दो विचित्र पशुओं के समान आए हो. तुम यजमान के यज्ञ में अग्नि के समान दीप्तिशाली हो तथा पुरोहितों के समान स्थानों में देवों की पूजा करते हो. (३) आपी वो अस्मे पितरेव पुत्रोग्रेव रुचा नृपतीव तुर्ये. इर्येव पृष्ट्यै किरणेव भुज्यै शृष्टीवानेव हवमा गमिष्टम्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! तुम हमारे प्रति वही प्रेम रखो, जो माता-पिता पुत्र के प्रति रखते हैं. तुम अग्नि एवं सूर्य के समान तेजस्वी एवं राजा के समान शीघ्र काम करने वाले बनो. तुम धनी व्यक्ति के समान दूसरों का भला करने वाले व सूर्यकिरणों के समान योग देने वाले बनो तथा सुखी व्यक्ति के समान इस यज्ञ में आओ. (४) वंसगेव पूषर्या शिम्बाता मित्रेव ऋता शतरा शातपन्ता. वाजेवोच्चा वयसा घर्म्येष्ठा मेषेवेषा सपर्या३ पुरीषा.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अश्विनीकुमारो! तुम बैलों के समान स्वस्थ एवं सुखदाता तथा मित्र वरुण के समान यथार्थ-दर्शी, सैकड़ों सुख देने एवं शीघ्र स्तुति पाने वाले हो. तुम घोड़ों के समान हव्य से पुष्ट एवं सूर्यचंद्रमा के रूप में स्थित हो और मेढ़ों के समान भोज्य पदार्थ से पुष्ट अंग वाले बने हो. (५) सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू नैतोशेव तुर्फरी पर्फरीका. उदन्यजेव जेमना मदेरू ता मे जराय्वजरं मरायु.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम हाथी के अंकुश के समान लोगों को रोकने वाले एवं हनन करने वाले हो. तुम वधिक के समान शत्रुहंता एवं असुरविनाशक हो. तुम जल में उत्पन्न पदार्थ के समान उज्ज्वल व शक्तिशाली हो. तुम मरणधर्मा शरीर को यौवन दो. (६) पज्रेव चर्चंरं जारं मरायु क्षद्मेवार्थेषु तर्तरीथ उग्रा. ऋभू नापत्वखरमज्रा खरज्रुर्वायुर्न पर्फरत्क्षयद्रीयीणाम्.. (७) हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो! तुम वीर पुरुषों के समान मेरे घूमने वाले वृद्धावस्था से युक्त एवं मरणशील शरीर को विपत्तियों से उसी प्रकार पार करके अनुकूल स्थिति में पहुंचाओ, जिस प्रकार जल नीचे स्थान की ओर बहता है. तुम्हें ऋभु के समान शीघ्रगामी रथ मिला है. वायु के समान तेज चलने वाला तुम्हारा रथ उड़कर शत्रुओं का धन छीन लाया है. (७) घर्मेव मधु जठरे सनेरू भगेविता तुर्फरी फारिवारम्. पतरेव चचरा चन्द्रनिर्णिङ्मनऋङ्गा मनन्या३ न जग्मी.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुम महान् वीरों के समान सोमरस अपने पेट में भरते हो. तुम धन के रक्षक तथा शत्रुविदीर्णकारी आयुधों वाले हो. तुम पक्षियों के समान विचरण करने वाले, चंद्रमा के समान सुंदर, इच्छा मात्र से सुशोभित होने वाले एवं प्रशंसनीय व्यक्तियों के समान यज्ञ में जाने वाले हो. (८) बृहन्तेव गम्भरेषु प्रतिष्ठां पादेव गाधं तरते विदाथ:. कर्णेव शासुरनु हि स्मराथोंऽशेव नो भजतं चित्रमप्र:.. (९) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार लंबे पैर गहरे जल को पार करने में सहायता देते हैं, उसी प्रकार तुम विपत्ति से पार होने में मुझे सहारा दो. तुम कानों के समान स्तोता की स्तुति सुनते हो एवं यज्ञ के भागों के समान सुंदर यज्ञ में सम्मिलित होते हो. (९) आरङ्गरेव मध्वेरयेथे सारघेव गवि नीचीनबारे. कीनारेव स्वेदमासिष्विदाना क्षामेवोजां सूयवसात्सचेथे.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! गूंजती हुई मधुमक्खियां जिस प्रकार छत्ते में शहद भरती हैं, उसी ebook converter DEMO Watermarks*

प्रकार तुम गायों के थनों में दूध भरो. तुम मजदूरों के समान पसीने से भीग जाओ तथा चरागाह में आहार पाने वाली दुबली गाय के समान यज्ञ में अपना आहार प्राप्त करो. (१०) ऋध्याम स्तोमं सनुयाम वाजमा नो मन्त्रं सरथेहोप यातम्. यशो न पक्वं मधु गोष्वन्तरा भूतांशो अश्विनोः काममप्राः.. (११) हे अश्विनीकुमारो! हम स्तुतियों का विस्तार करते हैं एवं अन्न बांटते हैं. तुम रथ पर सवार होकर हमारे यज्ञ में आओ. गायों के थनों में विस्तृत यज्ञ के समान दूध है. भूतांश ऋषि ने अश्विनीकुमारों का यह स्तोत्र बनाकर अपनी अभिलाषा प्राप्त की. (११) सूक्त—१०७                   देवता—प्रजापति की पुत्री दक्षिणा आविर्भून्महि माघोनमेषां विश्वं जीवं तमसो निरमोचि. महि ज्योतिः पितृभिर्दत्तमागादुरुः पन्था दक्षिणाया अदर्शि.. (१) इन यजमानों का यज्ञ पूरा करने के लिए इंद्र का महान् तेज प्रकट हुआ. उसके बाद सभी जीव अंधकार से मुक्त हुए. पितरों द्वारा दी हुई महान् ज्योति हमारे सामने आई. उसी ने दक्षिणा का विस्तृत मार्ग दिखाया. (१) उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो अस्थुर्ये अश्वदाः सह ते सूर्येण. हिरण्यदा अमृतत्वं भजन्ते वासोदाः सोम प्र तिरन्त आयुः.. (२) दक्षिणा देने वाले स्वर्ग में ऊंचे स्थान पर बैठते हैं. घोड़ा दान करने वाले सूर्य के साथ स्थित होते हैं. सोम देने वाले अमरता पाते हैं तथा वस्त्र दान करने वाले सोम प्राप्त करके पूर्ण आयु पार करते हैं. (२) दैवी पूर्तिर्दक्षिणा देवयज्या न कवारिभ्यो नहि ते पृणन्ति. अथा नरः प्रयतदक्षिणासोऽवद्यभिया बहवः पृणन्ति.. (३) दक्षिणा यज्ञादि दिव्य कर्मों को पूर्ण करती है एवं देवपूजा का अंग है. देवगण यज्ञ न करने वालों के काम पूरे नहीं करते. जो लोग पवित्र दक्षिणा देते हैं व बदनामी से डरते हैं, वे अपने सभी काम पूरे करते हैं. (३) शतधारं वायुमर्कं स्वर्विदं नृचक्षसस्ते अभि चक्षते हविः. ये पृणन्ति प्र च यच्छन्ति सङ्‌गमे ते दक्षिणां दुहते सप्तमातरम्.. (४) सैकड़ों धाराओं में बहने वाले वायु, सूर्य, आकाश तथा अन्य मानवहितकारी देवों के लिए हव्य दिया जाता है. जो लोग सात अधिकारी पुरोहितों को प्रसन्न करते हैं, वे अपनी ebook converter DEMO Watermarks*

अभिलाषाएं पूरी करते हैं. (४) दक्षिणावान्प्रथमो हूत एति दक्षिणावान्ग्रामणीरग्रमेति. तमेव मन्ये नृपतिं जनानां यः प्रथमो दक्षिणामाविवाय.. (५) ऋत्विजों द्वारा बुलाया गया यजमान सबसे प्रमुख होता है एवं गांव का मुखिया होकर आगे चलता है. जो सबसे पहले दक्षिणा देता है, उसीको हम मानवों का पालक मानते हैं. (५) तमेव ऋषिं तमु ब्रह्माणमाहुर्यज्ञन्यं सामगामुक्थशासम्. स शुक्रस्य तन्वो वेद तिस्रो यः प्रथमो दक्षिणया रराध.. (६) जो सबसे पहले दक्षिणा देता है, उसीको ऋषि, ब्रह्मा, यज्ञ के नेता सामगानकर्त्ता एवं स्तोता जानते हैं. वे अग्नि की तीनों मूर्तियों को जानते हैं. (६) दक्षिणाश्वं दक्षिणा गां ददाति दक्षिणा चन्द्रमुत यद्धिरणयम्. दक्षिणात्नं वनुते यो न आत्मा दक्षिणां वर्म कृणुते विजानन्.. (७) दक्षिणा घोड़े, गाएं एवं मन को प्रसन्न करने वाला सोना देती है. दक्षिणा ही आत्मारूपी अन्न को देती है. विद्वान् व्यक्ति दक्षिणा को कवच के समान रक्षा का साधन बनाते हैं. (७) न भोजा ममुर्न न्यर्थमीयुर्न रिष्यन्ति न व्यथन्ते ह भोजा:. इदं यद्विश्वं भुवनं स्वश्चैतत्सर्वं दक्षिणेभ्यो ददाति.. (८) दक्षिणा देने वाले मरते नहीं, अपितु देव बनकर अमरता पा लेते हैं. वे न दरिद्र बनते हैं और न व्यथा अथवा क्लेश भोगते हैं. यह सारा विश्व एवं स्वर्ग जो है, वह सब दक्षिणा हमें देती हैं. (८) भोजा जिग्युः सुरभिं योनिमग्रे भोजा जिग्युर्वध्वं१ या सुवासा:. भोजा जिग्युरन्तः पेयं सुराया भोजा जिग्युर्ये अह्रुताः प्रयन्ति.. (९) दक्षिणा देने वाले लोग दूध देने वाली गाय सबसे पहले प्राप्त करते हैं तथा वे ही शोभन वस्त्रों वाली वधू प्राप्त करते हैं. दाता लोग पेय के रूप में शराब पाते हैं एवं चढ़ाई करने वाले शत्रु को जीतते हैं. (९) भोजायाश्वं सं मृजन्त्याशुं भोजायास्ते कन्या३ शुम्भमाना. भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म परिष्कृतं देवमानेव चित्रम्.. (१०) दक्षिणा देने वाले को शीघ्र ही घोड़ा दिया जाता है. उसीको वस्त्र अलंकार से शोभित कन्या मिलती है. उसे पुष्करिणी के समान साफ और देवालय के समान विचित्र घर दिया जाता है. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१०८ देवता—पणि एवं सरमा

भोजमश्वाः सुष्टुवाहो वहन्ति सुवृद्रथो वर्तते दक्षिणायाः. भोजं देवासोऽवता भरेषु भोजः शत्रून्त्समनीकेषु जेता.. (११) भली प्रकार बोझ ढोने वाले घोड़े दक्षिणादाता को वहन करते हैं. उसीके लिए सुनिर्मित रथ मिलता है, युद्ध में देवगण दाता की रक्षा करते हैं. वह शत्रुओं को जीतता है. (११) सूक्त—१०८ देवता—पणि एवं सरमा किमिच्छन्ती सरमा प्रेदमानड् दूरे ह्यध्वा जगुरिः पराचैः. कास्मेहितिः का परितक्म्यासीत्कथं रसाया अतरः पयांसि.. (१) पणि बोले—“हे सरमा! तुम क्या अभिलाषा करती हुई यहां आई हो? इधर यह मार्ग बहुत दूर का एवं चक्कर वाला है, इस पर चलना कठिन है. हमारे पास ऐसी कौन सी वस्तु है, जिसके लिए तुम आई हो? तुम्हें आने में कितनी रातें लगीं और तुमने नदी कैसे पार की?” (१) इन्द्रस्य दूतीरिषिता चरामि मह इच्छन्ती पणयो निधीन्वः. अतिष्कदो भियसा तन्न आवत्तथा रसाया अतरं पयांसि.. (२) सरमा बोली—“हे पणियो! मैं इंद्र की दूती हूं और उन्हीं के भेजने से आई हूं. मैं तुम्हारे द्वारा एकत्रित गायों रूपी निधि को लेने की इच्छा से आई हूं. मेरी छलांग से डरकर नदी के जल ने मुझे बचाया. इस प्रकार मैंने नदी का जल पार किया.” (२) कीदृङ्ङिन्द्रः सरमे का दृशीका यस्येदं दूतीरसरः पराकात्. आ च गच्छान्मित्रमेना दधामाथा गवां गोपर्तिनों भवाति.. (३) पणियों ने कहा—“हे सरमा! तुम जिस इंद्र की दूती बनकर इतनी दूर आई हो, वह कैसा है और उसकी सेना कैसी है? इंद्र यहा आवें. हम उन्हें मित्र स्वीकार करेंगे. वे हमारी गायों के स्वामी बन जावें.” (३) नाहं तं वेद दभ्यं दभत्स यस्येदं दूतीरसरं पराकात्. न तं गूहन्ति स्रवतो गभीरा हता इन्द्रेण पणयः शयध्वे.. (४) सरमा बोली—“हे पणियो! मैं उन इंद्र के हराने वाले को नहीं जानती. वे सबका नाश करते हैं. गहरी नदियां भी उन्हें नहीं रोक पातीं. वे तुम्हें मारकर धरती पर सुला देंगे.” (४) इमा गावः सरमे या ऐच्छः परि दिवो अन्तान्त्सुभगे पतन्ती. कस्त एना अव सृजादय्युध्युतास्माकमायुधा सन्ति तिग्मा.. (५) पणियों ने कहा—“हे स्वर्ग की अंतिम सीमा से आने वाली सुंदरी सरमा! इन गायों में से ebook converter DEMO Watermarks*

तुम जिन्हें चाहो, उन्हें ले सकती हो. युद्ध के बिना ये गाएं तुम्हें कौन देता? वैसे हमारे पास भी तीखे आयुध हैं.” (५) असेन्या वः पणयो वचांस्यनिषव्यास्तन्वः सन्तु पापीः. अधृष्टो व एतवा अस्तु पन्था बृहस्पतिर्व उभया न मृळात्.. (६) सरमा बोली—“हे पणियो! तुम्हारी बातें सैनिकों की बातों के समान नहीं हैं. तुम्हारे पापी शरीर कहीं इंद्र के बाणों के शिकार न हो जावें? कहीं तुम्हारा मार्ग आक्रमणकारी देवों द्वारा पददलित न हो जाए? मेरी बात न मानने पर कहीं बृहस्पति तुम्हें कष्ट न दें.” (६) अयं निधिः सरमे अद्रिबुध्नो गोभिरश्वेभिर्वसुभिर्न्युष्टः. रक्षन्ति तं पणयो ये सुगोपा रेकु पदमलकमा जगन्थ.. (७) पणियों ने कहा—“हे सरमा! हमारी गायरूपी संपत्ति पर्वतों द्वारा सुरक्षित है. यह गायों, घोड़ों और धनों से प्राप्त है. रक्षणसमर्थ पणि इस संपत्ति की रक्षा करते हैं. गायों के रंभाने के शब्द से सुशोभित हमारे इस स्थान पर तुम व्यर्थ आई हो.” (७) एह गमन्नृषयः सोमशिता अयास्यो अङ्गिरसो नवग्वाः. त एतमूर्वं वि भजन्त गोनामथैतद्वचः पणयो वमन्निन्.. (८) सरमा बोली—“सोमपान करके मतवाले अंगिरागोत्रीय अयास्य ऋषि एवं नवगु ऋषियों का समूह यहां आएगा. वे इस गोधन का विभाग करके ले जावेंगे. उस समय तुमको यह अभिमान भरा वचन छोड़ना पड़ेगा.” (८) एवा च त्वं सरम आजगन्थ प्रबाधिता सहसा दैव्येन. स्वसारं त्वा कृणवै मा पुनर्गा अप ते गवां सुभगे भजाम.. (९) पणियों ने कहा—“हे सरमा! तुम देवों की शक्ति से डरकर यहां आई हो. हम तुम्हें अपनी बहिन बनाते हैं. तुम यहां से मत जाओ. हे सुंदरी! हम तुम्हें अपनी गायों का भाग देते हैं.” (९) नाहं वेद भ्रातृत्वं नो स्वसृत्वमिन्द्रो विदुरङ्गिरसश्च घोराः. गोकामा मे अच्छदयन्दायमपात इत पणयो वरीयः.. (१०) सरमा ने कहा—“हे पणियो! मैं बहिन और भाई का संबंध नहीं जानती. इस संबंध को तो भयानक इंद्र एवं अंगिराओं का समूह जानता है. गायों के अभिलाषी देवों ने मुझे सुरक्षित रूप में भेजा है. इसी कारण मैं आई हूं. तुम इस गोसमूह को छोड़कर दूर भाग जाओ. (१०) दूरमित पणयो वरीय उद्गावो यन्तु मिनतीरृतेन. बृहस्पतिर्या अविन्दन्निगूळ्हाः सोमो ग्रावाण ऋषयश्च विप्राः.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—१०९ देवता—विश्वेदेव

हे पणियो! तुम इस स्थान से दूर भाग जाओ. घेरने वाले पर्वत को टक्करें मारती हुई गाएं इस सत्याश्रित पर्वत से लौट जावें. बृहस्पति, सोम, पत्थर, ऋषि एवं ब्राह्मण इस गुप्त स्थान को जान गए हैं.” (११) सूक्त—१०९ देवता—विश्वेदेव तेऽवदन्प्रथमा ब्रह्मकिल्बिषेऽकूपारः सलिलो मातरिश्वा. वीळुहरास्तप उग्रो मयोभूरापो देवीः प्रथमजा ऋतेन.. (१) बृहस्पति द्वारा पत्नीत्यागरूपी पाप किए जाने पर आदित्य, वरुण, वायु, जलती हुई अग्नि, सुखदायी सोम, दिव्य जलों एवं प्रजापति द्वारा पहले उत्पादित संतानों ने कहा. (१) सोमो राजा प्रथमो ब्रह्मजायां पुनः प्रायच्छदहृणीयमानः. अन्वर्तिता वरुणो मित्र आसीदग्निर्होता हस्तगृह्या निनाय.. (२) राजा सोम ने लज्जा का त्याग करके बृहस्पतिपत्नी जुहू को सबसे पहले उसे दिया. मित्र और वरुण इस में मध्यस्थ बने. देवों को बुलाने वाले अग्नि उसे हाथ पकड़कर लाए. (२) हस्तेनैव ग्राह्य आधिरस्या ब्रह्मजायेयमिति चेदवोचन्. न दूताय प्रह्ये तस्थ एषा तथा राष्ट्रं गुप्तितं क्षत्रियस्य.. (३) उन लोगों ने बृहस्पति से कहा—“यह तुम्हारी विवाहिता पत्नी है. तुम्हें इसका शरीर हाथ से ग्रहण करना चाहिए. इन्हें खोजने को दूत गया था, उसके प्रति इसने समर्पण नहीं किया था. यह शक्तिशाली राजा के राष्ट्र के समान सुरक्षित है. (३) देवा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तऋषयस्तपसे ये निषेदुः. भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धा दधाति परमे व्योमन्.. (४) देवों एवं तपस्या के लिए बैठे हुए सप्तऋषियों ने इस पत्नी की पवित्रता के विषय में कहा है. बृहस्पति द्वारा विवाहिता यह नारी शुद्ध चरित्र वाली है. तप का प्रभाव बुरे पदार्थ को भी आकाश में पहुंचा देता है. (४) ब्रह्मचारी चरति वेविषद्विषः स देवानां भवत्येकमङ्गम. तेन जायामन्वविन्दद् बृहस्पतिः सोमेन नीतां जुह्वं१ न देवाः.. (५) स्त्री के अभाव में ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले जैसे बृहस्पति ने देवों की सेवा करके यज्ञ के एक भाग के रूप में इसे प्राप्त किया, उसी प्रकार इस समय देवों से पाया. (५) पुनर्वे देवा अददुः पुनर्मनुष्या उत. राजानः सत्यं कृण्वाना ब्रह्मजायां पुनर्ददुः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

देवों और मानवों ने जुहू नामक पत्नी बृहस्पति को पुनः प्रदान की. शपथ लेते हुए राजाओं ने ब्रह्मपत्नी को प्रदान किया. (६) पुनर्दाय ब्रह्मजायां कृत्वी देवैर्निकिल्बिषम्. ऊर्जं पृथिव्या भक्तवायोरुगायमुपासते.. (७) देवों ने पत्नी पुनः बृहस्पति को दी एवं इस प्रकार उन्हें पापरहित बनाया. इसके बाद सब लोग धरती का धन आपस में बांटकर सुख से रहने लगे. (७) सूक्त-११० देवता-आप्री समिद्धो अद्य मनुषो दुरोणे देवो देवान्यजसि जातवेदः. आ च वह मित्रमहश्चिकित्वान्त्वं दूतः कविरसि प्रचेताः.. (१) हे जातवेद अग्नि! तुम आज मानवों के घर में प्रज्वलित होकर इंद्रादि देवों की पूजा करते हो. स्तोता मित्रों की पूजा करने वाले अग्नि! तुम स्तोताओं द्वारा की हुई स्तुतियां जानते हुए देवों को बुलाओ. तुम बुद्धिमान् एवं कार्यकुशल हो. (१) तनूनपात्पथ ऋतस्य यानान्मध्वा समञ्जन्त्स्वदया सुजिह्व. मन्मानि धीभिरुत यज्ञमृन्धन्देवत्रा च कृणुह्यध्वरं नः.. (२) हे अग्नि! यज्ञ के जो मार्ग अर्थात् हवि हैं, उन्हें मधु से मिलाकर अपनी शोभन-ज्वाला रूपी जीभ से उनका स्वाद लो. तुम सुंदर भावों द्वारा हमारी स्तुतियों और यज्ञ को उन्नत बनाओ एवं हमारे यज्ञ को देवों के भाग के योग्य बनाओ. (२) आजुह्वान ईड्यो वन्द्यश्चा याह्यग्ने वसुभिः सजोषाम्. त्वं देवानामसि यह्व होता स एनान्यक्षीषितो यजीयान्.. (३) हे देवों को बुलाने वाले, प्रार्थनीय एवं वंदना के योग्य अग्नि! तुम वसुओं के साथ पधारो. हे महान् अग्नि! तुम देवों के होता हो. हे अतिशय यज्ञकर्त्ता अग्नि! तुम हमारी प्रार्थना सुनकर इन देवों का यजन करो. (३) प्राचीनं बर्हिः प्रदिशा पृथिव्या वस्तोरस्या वृज्यते अग्रे अह्नाम्. व्यु प्रथते वितरं वरीयो देवेभ्यो अदितये स्योनम्.. (४) प्रातः वेदी को आच्छादित करने के लिए कुशों को पूर्व की ओर मुख करके बिछाया जाता है. यह सुंदर कुश अधिक फैलाया जाता है. यह अदिति तथा अन्य देवों के बैठने के लिए है. (४) व्यचस्वतीरूर्विया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः. ebook converter DEMO Watermarks*

देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुपायणा:.. (५) सुंदर पत्नियां अच्छे कपड़े पहनती हैं एवं पतियों के सामने जिस प्रकार अपना शरीर प्रकट करती हैं, उसी प्रकार यज्ञशाला के सभी द्वारों पर देवियां प्रकट हों. हे द्वारदेवियो! द्वार इतने खुल जावें कि देवगण उन में होकर सरलता से जा सकें. (५) आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्ता सदतां नि योनौ. दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रियं शुक्रपिशं दधाने.. (६) यज्ञ भाग की अधिकारिणी एवं शोभन-गति वाली उषा व रात्रि यज्ञशाला में बैठें. ये दिव्य नारी के समान शोभन दीप्ति वाली अत्यंत सुंदर एवं तेज को धारण करने वाली हैं. (६) दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै. प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७) देवों के होता अर्थात् अग्नि और सूर्य सबसे पहले शोभन स्तुतियां बोलते हुए यज्ञकर्त्ता मनुष्य के लिए यज्ञ पूर्ण करने का काम करते हैं. ये दोनों पुरोहितों को यज्ञ कर्म में लगाते हैं. ये क्रियाकुशल हैं एवं पूर्व दिशा में प्राचीन प्रकाश उत्पन्न करते हैं. (७) आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विळा मनुष्यदिह चेतयन्ती. तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं स्योनं सरस्वती स्वपसः सदन्तु.. (८) सूर्यदीप्ति हमारे यज्ञ में शीघ्र आवें. इळादेवी इस यज्ञ का ज्ञान करके यहां मनुष्य के समान पधारें. इन दोनों के साथ सरस्वती देवी मिलें एवं तीनों देवियां इस सुखकर यज्ञ में बैठें. (८) य इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपिंशद्भुवनानि विश्वा. तमद्य होतरिषितो यजीयान्देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (९) हे होता! जिन त्वष्टा देव ने देवों की माता के समान द्यावा-पृथिवी को बनाकर उन्हें भांति-भांति के प्राणियों से युक्त किया है, उन्हीं त्वष्टा देव की तुम पूजा करो. तुम आज अन्न वाले हो, विद्वान् हो एवं सर्वश्रेष्ठ यज्ञकर्त्ता हो. (९) उपावसृज त्मन्या समञ्जन्देवानां पाथ ऋतुथा हवींषि. वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (१०) हे यूप! तुम ऋतु के अनुकूल अन्न एवं होमद्रव्य अर्पण करो. वनस्पति शमिता नाम का देव एवं अग्नि मधु तथा घी के साथ होम के द्रव्यों का स्वाद लें. (१०) सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानामभवत्पुरोगाः. ebook converter DEMO Watermarks*

अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहाकृतं हविरदन्तु देवाः.. (११) अग्नि तुरंत उत्पन्न होते ही यज्ञ का निर्माण करने लगे एवं देवों के अग्रगामी दूत बने. यज्ञ संबंधी अग्नि के वचन में मंत्र पढ़े जावें, स्वाहा शब्द बोला जावे एवं देव इव्य का भक्षण करें. (११) सूक्त—१११ देवता—इंद्र मनीषिणः प्र भरध्वं मनीषां यथायथा मतयः सन्ति नृणाम्. इन्द्रं सत्यैरैरयामा कृतेभिः स हि वीरो गिर्वणस्युर्विदानः.. (१) हे स्तोताओ! ज्यों-ज्यों तुम्हारी बुद्धि का उदय हो, वैसे-वैसे ही तुम स्तुतियां पढ़ो. सत्यकर्मों के अनुष्ठान द्वारा हम इंद्र को बुलाते हैं. वीर इंद्र स्तुतियों को जानकर स्तोताओं को प्यार करते हैं. (१) ऋतस्य हि सदसो धीतिरद्यौत्सं गार्ष्टेयो वृषभो गोभिरानट्. उदतिष्ठत्तविषेणा रवेण महान्ति चित्सं विव्याचा रजांसि.. (२) जल के आधार आकाश को धारण करने वाले इंद्र प्रकाशित होते हैं. तुरंत जन्मा बछड़ा जिस प्रकार गाय से मिला रहता है, उसी प्रकार इंद्र सर्वत्र व्याप्त हैं. इंद्र महान् शब्द के साथ उत्पन्न होते हैं तथा विस्तृत जलों का निर्माण करते हैं. (२) इन्द्रः किल श्रुत्या अस्य वेद स हि जिष्णुः पथिकृत्सूर्याय. आन्मेनां कृण्वन्नच्युतो भुवद्गोः पतिर्दिवः सनजा अप्रतीतः.. (३) इंद्र ही इस स्तुति को सुनना जानते हैं. जयशील इंद्र ने सूर्य का मार्ग बनाया है. अच्युत इंद्र ने सेना को प्रकट किया है. इंद्र गायों और स्वर्ग के प्रति सनातन एवं विरोधहीन हैं. (३) इन्द्रो महा महतो अर्णवस्य व्रतामिनादङ्गिरोभिर्गृणानः. पुरूणि चिन्नि तताना रजांसि दाधार यो धरुणं सत्यताता.. (४) अंगिरागोत्रीय ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर इंद्र ने अपनी महिमा से विशाल मेघ का कार्य समाप्त किया था. उन्होंने अनेक जल बनाए तथा सत्यरूप स्वर्ग में बल संचार किया. (४) इन्द्रो दिवः प्रतिमानं पृथिव्या विश्वा वेद सवना हन्ति शुष्णम्. महीं चिद्द्यामातनोत्सूर्येण चास्कम्भ चित्कम्भनेन स्कभीयान्.. (५) द्यावा-पृथिवी के बराबर इंद्र सभी सोम यज्ञों को जानते एवं सबका संताप नष्ट करते हैं. उन्होंने सूर्य के द्वारा विस्तृत आकाश को प्रकाशित किया. अतिशय धारणकर्त्ता इंद्र ने खंभा ebook converter DEMO Watermarks*

बनकर आकाश को धारण किया है. (५) वज्रेण हि वृत्रहा वृत्रमस्तरदेवस्य शूशुवानस्य मायाः. वि धृष्णो अत्र धृषता जघन्थाथाभवो मघवन्बाह्वोजाः.. (६) हे इंद्र! तुमने वज्र से वृत्र को मारा. यज्ञविरोधी कार्य करने वाले वृत्र की सारी मायाओं को भयानक वज्र से समाप्त किया. हे धनस्वामी इंद्र! इसके बाद तुम अधिक शक्तिशाली बने. (६) सचन्त यदुषसः सूर्येण चित्रामस्य केतवो रामविन्दन्. आ यन्नक्षत्रं ददृशे दिवो न पुनर्यतो नकिरद्धा नु वेद.. (७) जब उषाएं सूर्य से मिलीं, तब इसकी किरणों ने विचित्र शोभा प्राप्त की. आकाश में जब कोई नक्षत्र दिखाई नहीं दिया था, तब सूर्य की सर्वत्रगामी किरणों को कोई नहीं जान पाया. (७) दूरं किल प्रथमा जग्मुरासामिन्द्रस्य याः प्रसवे सस्रुरापः. क्व स्विद्रग्रं क्व बुध्न आसामापो मध्यं क्व वो नूनमन्तः.. (८) इंद्र की आज्ञा से पहली बार जो जल बहा था, वह बहुत दूर गया. उस जल का अग्रभाग एवं मस्तक कहां है? हे जलो! तुम्हारा मध्य भाग कहां है? (८) सृजः सिन्धूँरहिना जग्रसानाँ आदिदेताः प्र विविज्रे जवेन. मुमुक्षमाणा उत या मुमुग्धेऽधेदेता न रमन्ते नितिक्ताः.. (९) हे इंद्र! तुमने मेघ के द्वारा ग्रसित जल को छुड़ाकर वेग से बहाया. इंद्र ने जब जलों को मुक्त करने की इच्छा की, उस समय अत्यंत शुद्ध जल एक स्थान पर नहीं रहे. (९) सध्रीचीः सिन्धुमुशतीरिवायन्त्सनाज्जार आरितः पूर्विदासाम्. अस्तमा ते पार्थिवा वसून्यस्मे जग्मुः सूनृता इन्द्र पूर्वीः.. (१०) सारे जल मिलकर अभिलाषिणी नारी के समान सागर की ओर बढ़े. शत्रुनगरियों को नष्ट करने वाले एवं शत्रुओं को दुर्बल बनाने वाले इंद्र सभी जलों के स्वामी हैं. हे इंद्र! धरती पर स्थित प्राचीन यज्ञरूपी धन एवं प्रसन्नतादायक स्तुतियां तुम्हारे पास गईं. (१०) सूक्त—११२ देवता—इंद्र इन्द्र पिब प्रतिकामं सुतस्य प्रातः सावस्तव हि पूर्वपीतिः. हर्षस्व हन्तवे शूर शत्रूनुक्थेभिष्ठे वीर्या ३ प्र ब्रवाम.. (१)