ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सजोषासो दैव्येना सवित्रा सजोषासः सिन्धुभी रत्नधेभिः.. (८) हे ऋभुओ! तुम आदित्यों, पर्व के समय पूजे जाने वाले देवों एवं रत्नदान करने वाली नदियों के साथ मिलकर प्रसन्न बनो. (८) ये अश्विना ये पितरा य ऊती धेनुं ततक्षुर्ऋभवो ये अश्वा. ये अंसत्रा य ऋधग्रोदसी ये विभवो नरः स्वपत्यानि चक्रुः.. (९) जिन ऋभुओं ने रथनिर्माणरूपी सेवा से अश्विनीकुमारों को प्रसन्न किया, माता-पिता को बुढ़ापे की जीर्णता से युवा बनाकर प्रसन्न किया, जिन्होंने धेनु और घोड़े को बनाया, देवों के लिए कवच का निर्माण किया, धरती व आकाश को अलग-अलग किया, वे व्यापक, नेता एवं शोभन संतान प्राप्ति के लिए कार्य करने वाले हैं. (९) ये गोमन्तं वाजवन्तं सुवीरं रयिं धत्थ वसुमन्तं पुरुक्षुम्. ते अग्रेपा ऋभवो मन्दसाना अस्मे धत्त ये च रातिं गृणन्ति.. (१०) जो ऋभुगण गायों, अन्न, पुत्र-पौत्र, निवासस्थान युक्त तथा अधिक अन्न वाले धन के स्वामी हैं, वे सबसे पहले सोमरस पीने वाले, प्रसन्न एवं दान की प्रशंसा करने वाले हैं. वे हमें धन दें. (१०) नापाभूत न वोऽतीवृषामा निःशस्ता ऋभवो यज्ञे अस्मिन्. समिन्द्रेण मदथ सं मरुद्भिः सं राजभी रत्नधेयाय देवाः.. (११) हे ऋभुओ! तुम यहां से चले मत जाना. हम तुम्हें अधिक प्यासा नहीं रखेंगे. हे देवरूप ऋभुओ! तुम अनिंदित रूप में धन देने के लिए इंद्र, मरुद्गण एवं दीप्तिशाली देवों के साथ प्रसन्न बनो. (११) सूक्त—३५ देवता—ऋभुगण इहोप यात शवसो नपातः सौधन्वना ऋभवो माप भूत. अस्मिन्हि वः सवने रत्नधेयं गमन्तिवन्द्रमनु वो मदासः.. (१) हे बल के पुत्र एवं सुधन्वा की संतान ऋभुओ! तुम इस यज्ञ में आओ. तुम यहां से दूर मत जाओ. हमारे पास यज्ञ में रत्न देने वाले इंद्र के बाद मदकारक सोमरस तुम्हारे पास जावे. (१) आगन्न्ऋभूणामिह रत्नधेयमभूत्सोमस्य सुषुतस्य पीतिः. सुकृत्यया यत्स्वपस्यया चँ एकं विचक्र चमसं चतुर्धा.. (२) इस तृतीय-सवन नामक यज्ञ में ऋभुओं का रत्नदान मेरे पास आवे. तुम लोगों ने
निचोड़ा हुआ सोम पिया था. तुमने अपनी कुशलता एवं कर्म की इच्छा द्वारा एक चमस के चार भाग कर दिए थे. (२) व्यकृणोत चमसं चतुर्धा सखे वि शिक्षेत्यब्रवीत. अथैत वाजा अमृतस्य पन्थां गणं देवानाम्भवः सुहस्ताः.. (३) हे ऋभुओ! तुमने चमस के चार टुकड़े करके कहा था—“हे मित्र अग्नि! कृपा करो.” अग्नि ने उत्तर दिया—“हे वाजगण एवं ऋभुओ! तुम कुशल लोग स्वर्ग के मार्ग से जाओ.” (३) किंमयः स्विच्चमस एष आस यं काव्येन चतुरो विचक्र. अथा सुनुध्वं सवनं मदाय पात ऋभवो मधुनः सोम्यस्य.. (४) वह चमस कैसा था, जिसे तुमने कुशलता से चार भागों में विभक्त किया था? हे ऋत्विजो! ऋभुओं की प्रसन्नता के लिए सोम निचोड़ो. हे ऋभुओ! तुम मधुर सोमरस पिओ. (४) शच्याकर्त पितरा युवाना शच्याकर्त चमसं देवपानम्. शच्या हरी धनुतरावतष्टेन्द्रवाहावृभवो वाजरत्नाः.. (५) हे रमणीय सोम वाले ऋभुओ! तुमने अपने कर्म से माता-पिता को युवा बनाया था. तुमने कर्मकौशल से ही चमस को चार भागों में बांटकर देवों के पीने योग्य बनाया था. अपनी कुशलता से ही तुमने इंद्र को ढोने वाले दो शीघ्रगामी घोड़ों को बनाया था. (५) यो वः सुनोत्यभिपित्वे अह्नां तीव्रं वाजासः सवनं मदाय. तस्मै रयिमृभवः सर्ववीरमा तक्षत वृषणे मन्दसानाः.. (६) हे अन्न के स्वामी एवं कामवर्षी ऋभुओ! दिन की समाप्ति पर जो यजमान तुम्हारी प्रसन्नता के लिए तेज नशे वाला सोम निचोड़ता है, तुम प्रसन्न होकर उसे पुत्र-पौत्रों से युक्त संपत्ति देते हो. (६) प्रातः सुतमपिबो हर्यश्व माध्यन्दिनं सवनं केवलं ते. समृभुभिः पिबस्व रत्नधेभिः सखीँयाँ इन्द्र चकृषे सुकृत्या.. (७) हे हरि नामक अश्वों के स्वामी इंद्र! तुम प्रातःकाल निचोड़े गए सोम को पिओ. दोपहर का यज्ञ तुम्हारा ही है. हे इंद्र! तुमने उत्तम कर्मों द्वारा जिन ऋभुओं को अपना मित्र बनाया है उन रत्नदाता ऋभुओं के साथ तुम सोमपान करो. (७) ये देवासो अभवता सुकृत्या श्येना इवेदधि दिवि निषेद. ते रत्नं धात शवसो नपातः सौधन्वना अभवतामृतासः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
हे ऋभुओ! तुम शोभन कर्मों द्वारा देव बने थे एवं गिद्ध के समान स्वर्गलोक में बैठे थे. तुम बल, पुत्र एवं रत्नदान करो. हे सुधन्वा के पुत्रो! तुम मरणरहित हुए थे. (८) यत्तृतीयं सवनं रत्नधेयमकृणुध्वं स्वपस्या सुहस्ताः. तद्भवः परिषिक्तं व एतत्सं मदेभिरिन्द्रियेभिः पिबध्वम्.. (९) हे शोभन हाथों वाले ऋभुओ! तुमने रमणीय कर्म की इच्छा से तीसरे सवन को रमणीय सोमरस के दान से युक्त बनाया था, इसलिए तुम प्रमुदित इंद्रियों से भली प्रकार निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (९) सूक्त—३६ देवता—ऋभुगण अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्यो३ रथस्त्रिचक्रः परि वर्तते रजः. महत्तद्वो देव्यस्य प्रवाचनं द्यामृभवः पृथिवीं यच्च पुष्यथ.. (१) हे ऋभुओ! तुम्हारे द्वारा अश्विनीकुमारों को दिया हुआ तीन पहियों वाला रथ घोड़ों और रस्सियों के अभाव में भी आकाश में घूमता है. तुम्हारा यह काम प्रशंसा के योग्य है. यह कर्म तुम्हारे देवत्व को प्रसिद्ध करता है. इसके द्वारा तुम धरती और आकाश का पोषण करते हो. (१) रथं ये चक्रुः सुवृतं सुचेतसोऽविह्वरन्तं मनसस्परि ध्यया. ताँ ऊ न्व१स्य सवनस्य पीतय आ वो वाजा ऋभवो वेदयामसि.. (२) सुंदर अंतःकरण वाले ऋभुओं ने मन के ध्यान से भली प्रकार चलने वाले पहियों से युक्त एवं कुटिलताहीन रथ बनाया. हे वाजगण एवं ऋभुओ! इस तीसरे सवन में सोमरस पीने के लिए हम तुम्हें बुलाते हैं. (२) तद्वो वाजा ऋभवः सुप्रवाचनं देवेषु विभवो अभवन्महित्वनम्. जिब्री यत्सन्ता पितरा सनाजुरा पुनर्युवाना चरथाय तक्षथ.. (३) हे वाजगण, ऋभुगण एवं विभुगण! तुम्हारी यह विशेषता देवों में प्रसिद्ध है कि तुमने अपने वृद्ध माता-पिता को दोबारा युवा एवं चलने-फिरने योग्य बनाया. (३) एकं वि चक्र चमसं चतुर्वयं निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभिः. अथा देवेष्वमृतत्वमानश श्रुष्टी वाजा ऋभवस्तद्व उक्थ्यम्.. (४) हे ऋभुओ! तुमने एक चमस को चार भागों में बांटा एवं अपनी कुशलता से बिना चमड़े वाली गाय को चमड़े से ढक दिया. यही तुम में अमरता पाई जाती है. हे वाजगण एवं ऋभुओ! तुम्हारा यह काम प्रशंसा करने योग्य है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
ऋभुतो रयिः प्रथमश्रवस्तमो वाजश्रुतासो यमजीजनन्नरः. विभवष्टष्टो विदथेषु प्रवाच्यो यं देवासोऽवथा स विचर्षणिः.. (५) वह प्रमुख एवं अन्नयुक्त धन ऋभुओं के पास से हमारे पास आवे, जिसे प्रसिद्ध नेता ऋभुओं ने वाजगण के साथ मिलकर उत्पन्न किया था. विभुओं द्वारा अश्विनीकुमारों के लिए बनाया रथ यज्ञ में विशेष प्रशंसनीय है. हे देवो! तुम जिसकी रक्षा करते हो, वह विशेष रूप से प्रशंसनीय बन जाता है. (५) स वाज्यर्वा य ऋषिर्वचस्यया स शूरो अस्ता पृतनासु दुष्टरः. स रायस्पोषं स सुवीर्यं दधे यं वाजो विब्वाँ ऋभवो यमाविषुः.. (६) वाजगण, ऋभु एवं विभु जिस मनुष्य की रक्षा करते हैं, वह बलवान्, रणकुशल, ऋषि, स्तुतियोग्य, शूर, शत्रुओं को हराने वाला, युद्ध में अपराजेय तथा धन, पुष्टि एवं पुत्र-पौत्रादि धारण करने वाला होता है. (६) श्रेष्ठं वः पेशो अधि धायि दर्शंतं स्तोमो वाजा ऋभवस्तं जुजुष्टन. धीरासो हि ष्ठा कवयो विपश्चितस्तान्व एना ब्रह्मणा वेदयामसि.. (७) हे वाजगण एवं ऋभुगण! तुम्हारे द्वारा धारण किया हुआ रूप दर्शनीय होता है. हमने तुम्हारे योग्य यह स्तोत्र बनाया है, तुम इसे स्वीकार करो. हम स्तोत्र द्वारा तुम बुद्धिमान् कवि और ज्ञानी देवों को अपनी प्रार्थना सुनाते हैं. (७) यूयमस्मभ्यं धिषणाभ्यस्परि विद्वांसो विश्वा नर्याणि भोजना. द्युमन्तं वाजं वृषशुष्ममुत्तममा नो रयिमृभवस्तक्षता वयः.. (८) हे ऋभुओ! हमारी स्तुति के बदले तुम मानव-हित करने वाली सभी उपभोग की वस्तुओं को जानकर बनाओ. हमारे निमित्त दीप्तिसंपन्न, शक्ति उत्पन्न करने वाला एवं बली शत्रुओं का नाश करने वाला अन्न उत्पन्न करो. (८) इह प्रजामिह रयिं रराणा इह श्रवो वीरवत्तक्षता नः. येन वयं चितयेमात्यन्यान्तं वाजं चित्रमृभवो ददा नः.. (९) हे ऋभुओ! तुम हमारे इस यज्ञ में प्रसन्न होकर पुत्र-पौत्रादि, धन एवं भृत्यों से युक्त यश संपादन करो. हमें ऐसा सुंदर अन्न दो, जिसे खाकर हम अन्य लोगों से श्रेष्ठ बन सकें. (९) सूक्त—३७ देवता—ऋभुगण उप नो वाजा अध्वरमृभुक्षा देवा यात पथिभिर्देवयानैः. यथा यज्ञं मनुषो विश्वा३ सु दधिध्वे रण्वाः सुदिनेष्वह्नाम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे सुंदर ऋभुओ एवं वाजगण! जिस प्रकार तुम दिवसों को शोभन बनाने के लिए मनुष्यों का यज्ञ धारण करते हो, उसी प्रकार देवमार्गों द्वारा हमारे यज्ञ में आओ. (१) ते वो हृदे मनसे सन्तु यज्ञा जुष्टासो अद्य घृतनिर्णिजो गुः. प्र वः सुतासो हरयन्त पूर्णाः क्रत्वे दक्षाय हर्षयन्त पीताः.. (२) आज हमारे वे सभी यज्ञ तुम्हारे मन को प्रसन्न करने वाले बनें एवं घी से मिला हुआ सोमरस तुम्हें प्राप्त हो. चमस में भरा हुआ सोमरस तुम्हारी इच्छा करता है. वह पीने के पश्चात् तुम्हें यज्ञकर्म के लिए प्रेरित करे. (२) त्र्युदायं देवहितं यथा वः स्तोमो वाजा ऋभुक्षणो ददे वः. जुह्वे मनुष्यदुपरासु विक्षु युष्मे सचा बृहद्दिवेषु सोमम्.. (३) हे वाजगण एवं ऋभुगण! तीनों सवनों में पीने योग्य एवं देवहितकारी सोम को जो लोग तुम्हें देते हैं, इसी प्रकार के लोगों के बीच एकत्र होकर एवं परम दिव्य प्रकाशयुक्त देवों के मध्य मनु के समान बनकर हम तुम्हारे उद्देश्य से सोम धारण करते हैं. (३) पीवोअश्वाः शुचद्रथा हि भूतायः शिप्रा वाजिनः सुनिष्काः. इन्द्रस्य सूनो शवसो नपातोऽनु वश्चेत्यग्रियं मदाय.. (४) हे ऋभुओ! तुम स्वस्थ घोड़ों एवं दीप्तियुक्त रथ वाले हो. तुम्हारी ठोड़ियां लोहे के समान हैं. तुम अन्न के स्वामी एवं उत्तम दानशील हो. हे इंद्र के पुत्रो एवं बल की संतानो! यह प्रातःकाल का यज्ञ तुम्हारी प्रसन्नता के लिए किया गया है. (४) ऋभुमृभुक्षणो रयिं वाजे वाजिन्तमं युजम्. इन्द्रस्वन्तं हवामहे सदासातममश्विनम्.. (५) हे ऋभुओ! हम अत्यंत रूप से बढ़ने वाले धन, संग्राम में परम शक्तिशाली रक्षक तथा सदा दानशील, अश्वों से युक्त एवं इंद्र से संबंधित तुम्हारे गण को पुकारते हैं. (५) सेद्भवो यमवथ यूयमिन्द्रश्च मर्त्यम्. स धीभिरस्तु सनिता मेधसाता सो अर्वता.. (६) हे ऋभुओ! तुम एवं इंद्र जिस व्यक्ति की रक्षा करते हो, वही श्रेष्ठ बुद्धियों से युक्त एवं यज्ञ में अश्वयुक्त बनता है. (६) वि नो वाजा ऋभुक्षणः पथश्चितन यष्टवे. अस्मभ्यं सूरयः स्तुता विश्वा आशास्तरीषणि.. (७) हे वाजगण एवं ऋभुओ! हमें यज्ञ का मार्ग बताओ. हे मेधावियो! हमें अपनी स्तुति के बदले सारी दिशाओं को जीतने वाला बल दो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—३८ देवता—द्यावा-पृथ्वी आदि
तं नो वाजा ऋभुक्षण इन्द्र नासत्या रयिम् समश्वं चर्षणिभ्य आ पुरु शस्त मघत्तये.. (८) हे वाजगण, ऋभुओ, इंद्र एवं अश्विनीकुमारो! तुम हम स्तुतिकर्त्ता लोगों को देने के निमित्त अधिक मात्रा में धन एवं अन्न का वचन दो. (८) सूक्त—३८ देवता—द्यावा-पृथ्वी आदि उतो हि वां दात्रा सन्ति पूर्वा या पूरुभ्यस्त्रसदस्युर्नितोशे. क्षेत्रासां ददथुरुर्वरासां घनं दस्युभ्यो अभिभूतिमुग्रम्.. (१) हे द्यावा-पृथ्वी! प्राचीन काल में त्रसदस्यु नामक राजा ने धन पाकर मांगने वाले लोगों को दिया था. तुमने उसे घोड़ा, पुत्र एवं दस्युजनों को नष्ट करने योग्य बल दिया था. (१) उत वाजिनं पुरुनिष्षिध्वानं दधिक्रामु ददथुर्विश्वकृष्टिम्. ऋजिप्यं श्येनं प्रुषितप्सुमाशुं चर्कृत्यमर्यो नृपतिं न शूरम्.. (२) हे द्यावा-पृथ्वी! तुम दोनों गमनशील, बहुत से शत्रुओं को रोकने वाली, समस्त प्रजाओं की रक्षा करने वाली, शोभन-गति वाली, दीप्तिशालिनी, तेज चलने वाली एवं राजा के समान शूर दधिक्रा को धारण करते हो. (२) यं सीमनु प्रवतेव द्रवन्तं विश्वः पूरुर्मदति हर्षमाणः. पद्भिर्गृध्यन्तं मेध्युं न शूरं रथतुरं वातमिव ध्रजन्तम्.. (३) धरती-आकाश उस दधिक्रा को धारण करते हैं, जिसकी स्तुति प्रसन्नतापूर्वक सभी मनुष्य किया करते हैं. जिस तरह जल नीचे बहता है, वे उसी तरह गतिशील, युद्ध की इच्छा करने वाले, वीर के समान दिशाओं को लांघने हेतु तत्पर, रथ पर बैठकर चलने वाले एवं हवा की तरह तेज चलने वाले हैं. (३) यः स्मारुन्धानो गध्या समत्सु सनुतरश्चरति गोषु गच्छन्. आविर्ऋजीको विदथा निचिक्यत्तिरो अरतिं पर्याप आयोः.. (४) जो देव मिले हुए पदार्थों को संग्राम में पृथक्-पृथक् करता हुआ उपभोग करने के लिए सभी दिशाओं में जाता है, जिसकी शक्ति प्रकट है, जो जानने योग्य बातों को जानता है एवं स्तुति करने वाले यजमान के शत्रुओं का तिरस्कार करता है. (४) उत स्सैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु. नीचायमानं जसुरिं न श्येनं श्रवश्चाच्छा पशुमच्च यूथम्.. (५) लोग संग्राम में दधिक्रा देव को देखकर उसी प्रकार चीखते-चिल्लाते हैं, जिस प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*
कोई मनुष्य वस्त्र चुराने वाले चोर को देखकर चिल्लाता है. जिस प्रकार नीचे की ओर उतरते हुए भूखे बाज को देखकर पक्षी भाग जाते हैं, उसी प्रकार अन्न एवं पशु समूह को नष्ट करने के विचार से चलने वाले दधिक्रा को देखकर लोग भाग उठते हैं. (५) उत स्मासु प्रथमः सरिष्यन्नि वेवेति श्रेणिभी रथानाम्. स्रजं कृण्वानो जन्यो न शुभ्वा रेणुं रेरिहत्किरणं ददश्वान्.. (६) दधिक्रा देव असुरों की सेनाओं में जाने के इच्छुक होकर उन में श्रेष्ठ स्थान पाते हुए रथ की पंक्तियों के साथ चलते हैं. वे मानव-हितकारी घोड़े के समान अलंकृत हैं, धूल उड़ाते हैं एवं लगाम को बार-बार चबाते हैं. (६) उत स्य वाजी सहुरिर्ऋतावा शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्य्ये. तुरं यतीषु तुरयन्नृजिप्योऽधि भ्रुवोः किरते रेणुमृञ्जन्.. (७) दधिक्रा देव इस प्रकार के घोड़ों के समान युद्ध में सहनशील, शत्रुओं के अन्न पर अधिकार करने वाले, अपने अंगों से ही अपनी सेवा करने वाले, सीधे चलने वाले, असुर सेनाओं में वेगपूर्ण, धूल उड़ाने वाले एवं उस धूल को अपनी ही भौंहों पर गिराने वाले हैं. (७) उत स्मास्य तन्यतोरिव द्योर्र्ऋघायतो अभियुजो भयन्ते. यदा सहस्रमभि भीमयोधीद्दुर्वर्तुः स्मा भवति भीम ऋञ्जन्.. (८) असुर दधिक्रा देव से इस प्रकार डरते हैं, जिस प्रकार लड़ने वाले लोग शब्द करते हुए वज्र से डरते हैं. वे चारों ओर हजारों लोगों से युद्ध करते हुए उत्तेजित अवस्था में अत्यंत भयंकर लगते हैं. कोई भी उन्हें रोकने का साहस नहीं कर पाता. (८) उत स्मास्य पनयन्ति जना जूतिं कृष्टिप्रो अभिभूतिमाशोः. उतैनमाहुः समिथे वियन्तः परा दधिक्रा असरत्सहस्रैः.. (९) मनुष्य इन दधिक्रा देव की सर्वाधिक गति की स्तुति करते हैं. वे मनुष्यों की अभिलाषा पूरी करने वाले एवं व्याप्त हैं. वे इनसे कहते हैं कि जब आप हजारों सैनिकों के साथ चलेंगे तो शत्रु हार जाएंगे. (९) आ दधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान. सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि.. (१०) सूर्य जिस प्रकार अपनी ज्योति से जल का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार दधिक्रा देव अपने बल से पांचों प्रकार की प्रजाओं की वृद्धि करते हैं. सैकड़ों और हजारों धन देने वाले वेगशाली दधिक्रा देव हमारी स्तुतियां सुनकर मधुर फल दें. (१०) सूक्त—३९ देवता—दधिक्रा ebook converter DEMO Watermarks*
आशुं दधिक्रां तमु नु ष्टवाम दिवस्पृथिव्या उत चर्चकिराम. उच्छन्तीर्मामुषसः सूदयन्त्वति विश्वानि दुरितानि पर्षन्.. (१) हम शीघ्र गति वाले दधिक्रा देव की जल्दी-जल्दी स्तुति करेंगे. हम धरती और आकाश से उनके सामने घास फेंकेंगे. अंधकार नाश करने वाली उषाएं हमारी रक्षा करें एवं सब सुखों से हमें पार लगावें. (१) महश्चर्कर्म्यर्वतः क्रतुप्रा दधिक्राव्णः पुरुवारस्य वृष्णः. यं पूरुभ्यो दीदिवांसं नाग्निं ददथुर्मित्रावरुणा ततुरिम्.. (२) यज्ञकर्म करने वाला मैं महान्, बहुतों द्वारा इच्छित एवं कामवर्षी दधिक्रा देव की स्तुति करता हूं. हे मित्र व वरुण! तुम दोनों रक्षा करने वाले एवं अग्नि की तरह प्रकाशयुक्त दधिक्रा देव को मानवों के कल्याण के लिए धारण करते हो. (२) यो अश्वस्य दधिक्राव्णो अकारीत्समिद्धे अग्ना उषसो व्युष्टौ. अनागसं तमदितिः कृणोतु स मित्रेण वरुणेना सजोषाः.. (३) जो यजमान उषा के फैलने एवं यज्ञाग्नि के प्रज्वलित होने पर अश्वरूपधारी दधिक्रा देव की स्तुति करते हैं, दधिक्रा देव अदिति, मित्र और वरुण के साथ मिलकर उसे पापरहित बनाते हैं. (३) दधिक्राव्ण इष ऊर्जो महो यदन्महि मरुतां नाम भद्रम्. स्वस्तये वरुणं मित्रमग्निं हवामह इन्द्रं वज्रबाहुम्.. (४) हम अन्न एवं बल के साधक, महान् एवं स्तुतिकर्त्ताओं के कल्याणकर्त्ता दधिक्रा देव की स्तुति करेंगे. हम वरुण, मित्र, अग्नि एवं वज्रधारी इंद्र को अपने कल्याण के लिए बुलाते हैं. (४) इन्द्रमिवेदुभये वि ह्वयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः. दधिक्रामु सूदनं मर्त्याय ददथुर्मित्रावरुणा नो अश्वम्.. (५) युद्ध के लिए उद्योग करने वाले एवं यज्ञ की तैयारी करने वाले, ये दोनों लोग इंद्र के समान ही दधिक्रा देव को भी बुलाते हैं. हे मित्र वरुण! तुम मनुष्यों को प्रेरणा देने वाले अश्वरूपी दधिक्रा देव को धारण करते हो. (५) दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः. सुरभि नो मुखा करतप्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६) हम जयशील, व्यापक एवं वेगशाली दधिक्रा देव की स्तुति करते हैं. वे हमारी चक्षु आदि इंद्रियों को आनंदित एवं हमारी आयु को अधिक करें. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४० देवता—दधिक्रा
सूक्त—४० देवता—दधिक्रा दधिक्राव्ण इदु न चर्किक्राम विश्वा इन्मामुषसः सूदयन्तु. अपामग्नेरुषसः सूर्यस्य बृहस्पतेराङ्गिरसस्य जिष्णोः.. (१) हम दधिक्रा देव की शीघ्र स्तुति करते हैं. समस्त उषाएं हमें यज्ञकर्म की प्रेरणा दें. हम जल, अग्नि, उषा, सूर्य, बृहस्पति एवं अंगिरापुत्र जिष्णु की स्तुति करेंगे. (१) सत्वा भरिषो गविषो दुवन्यसच्छ्रवस्यादिष उषसस्तुरण्यसत्. सत्यो द्रवो द्रवरः पतङ्गरो दधिक्रावेषमूर्जं स्वर्जनत्.. (२) चलने वाले, भरणकुशल, गायों को प्रेरित करने वाले एवं सेवा के इच्छुकों में रहने वाले दधिक्रा देव इच्छित उषाकाल में अन्न की कामना करें. शीघ्रता से चलने वाले, सत्यरूप से चलने वाले, वेगशाली एवं उछल-उछल कर चलने वाले दधिक्रा देव अन्न, बल एवं स्वर्ग को उत्पन्न करें. (२) उत स्मास्य द्रवतस्तुरण्यतः पर्णं न वेरनु वाति प्रगर्धिनः. श्येनस्येव ध्रजतो अङ्कसं परि दधिक्राव्णः सहोर्जा तरित्रतः.. (३) जिस प्रकार पक्षीसमूह पक्षियों के पीछे-पीछे उड़ता है, उसी प्रकार वेगवान् लोग शीघ्र चलने वाले एवं अधिक अभिलाषायुक्त दधिक्रा देव का अनुगमन करें. वे श्येन पक्षी के समान तेज उड़ने वाले एवं रक्षक हैं. सब लोग अन्न की इच्छा से इनके साथ चलते हैं. (३) उत स्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष आसनि. क्रतुं दधिक्रा अनु संतवीत्वत्पथामङ्कांस्यन्वापनीफणत्.. (४) अश्वरूपी दधिक्रा देव ग्रीवा, कक्षा एवं मुख में बंधे होकर भी चलने के लिए शीघ्रता करते हैं. ये अधिक बलशाली होकर यज्ञ की ओर जाने वाले टेढ़े रास्तों पर सब जगह शीघ्र चलते हैं. (४) हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्. नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम्.. (५) सूर्य दीप्तिशाली आकाश में रहते हैं. वायु अंतरिक्ष में निवास करते हैं. होता वेदी पर स्थित रहते हैं. अतिथि घर में निवास करते हैं. ऋत मनुष्यों में, उत्तम स्थान में, यज्ञ में एवं आकाश में निवास करते हैं तथा जल, सूर्यकिरणों, सत्य एवं पर्वतों में उत्पन्न हुए हैं. (५) सूक्त—४१ देवता—इंद्र एवं वरुण ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रा को वां वरुणा सुम्नमआप स्तोमो हविष्माँअमृतो न होता. यो वां हृदि क्रतुमाँ अस्मदुक्तः पस्पर्शदिन्द्रावरुणा नमस्वान्.. (१) हे इंद्र एवं वरुण! अमर होता अग्नि जिस प्रकार तुम्हें प्राप्त होता है, उसी प्रकार कौन सी हव्यसहित स्तुति तुम्हारी कृपा करेगी? हे इंद्र एवं वरुण! हमारे द्वारा कही गई स्तुतियां यज्ञ एवं हव्य से युक्त तुम दोनों को पसंद आवें। (१) इन्द्रा ह यो वरुणा चक्र आपी देवौ मर्तः सख्याय प्रयस्वान्. स हन्ति वृत्रा समिथेषु शत्रूनवोभिर्वा महद्भिः स प्र शृण्वे.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! जो व्यक्ति हव्यरूप में अन्न लेकर मित्रता के लिए तुम दोनों को भाई बनाता है, वह अपने पापों का नाश करता है. वह युद्ध में शत्रुओं को नष्ट करके महान् रक्षासाधनों के कारण प्रसिद्ध होता है. (२) इन्द्रा ह रत्नं वरुणा धेष्ठेत्था नृभ्यः शशमानेभ्यस्ता. यदी सखाया सख्याय सोमैः सुतेभिः सुप्रयसा मादयैते.. (३) हे इंद्र एवं वरुण! तुम इस प्रकार स्तुति करने वाले हम मनुष्यों के लिए रमणीय धन देने वाले बनो. यदि तुम दोनों मित्र यजमान के सखा हो एवं उसके द्वारा निचोड़े हुए सोमरस से प्रसन्न हो तो हमें धन दो. (३) इन्द्रा युवं वरुणा दिद्युमस्मिन्नोजिष्ठमुग्रा नि वधिष्टं वज्रम्. यो नो दुरेवो वृकतिर्दभीतिस्तस्मिन्निमाथामभिभूत्योजः.. (४) हे उग्र इंद्र एवं वरुण! तुम अपना तेजस्वी एवं दीप्त वज्र नामक आयुध शत्रुओं पर चलाओ. जो शत्रु हमारे द्वारा दमन नहीं किया जा सकता, दान नहीं देता एवं हिंसा करने वाला है, उसके प्रति तुम अपना शत्रुपराजयकारी बल प्रयोग करो. (४) इन्द्रा युवं वरुणा भूतमस्या धियः प्रेतारा वृषभेव धेनोः. सा नो दुहीयदद्यवसेव गत्वी सहस्रधारा पयसा मही गौः.. (५) हे इंद्र एवं वरुण! बैल जिस प्रकार गाय को प्रसन्न करता है, उसी प्रकार तुम स्तुति को प्रसन्न करो. जिस प्रकार गाय घास खाकर हजारों धारों के रूप में दूध देती हैं, उसी प्रकार स्तुतिरूपी गाय हमारी इच्छा पूरी करे. (५) तोके हिते तनय उर्वरासु सूरो दृशीके वृषणश्च पौंस्ये. इन्द्रा नो अत्र वरुणा स्यातामवोभिर्दस्मा परितक्म्यायाम्.. (६) हे इंद्र एवं वरुण! हमें पुत्र-पौत्र के साथ-साथ उपजाऊ भूमि की प्राप्ति कराने, बहुत समय तक सूर्य के दर्शन कराने एवं संतान उत्पत्ति की शक्ति प्रदान करने के लिए अंधेरी रात ebook converter DEMO Watermarks*
में रक्षासाधन लेकर तुम शत्रुओं के नाश को तैयार हो जाओ. (६) युवामिद्ध्यावसे पूर्व्याय परि प्रभूती गविषः स्वापी. वृणीमहे सख्याय प्रियाय शूरा मंहिष्ठा पितरेव शम्भू.. (७) हे इंद्र एवं वरुण! हम गाय पाने की इच्छा से तुम्हारे पास प्रसिद्ध रक्षा की प्रार्थना लेकर आए हैं. तुम शक्तिशाली, बंधुतुल्य, शूर एवं अतिशय पूज्य देवों से हम उसी प्रकार मित्र एवं प्रेम मांगते हैं, जिस प्रकार पुत्र पिता से याचना करता है. (७) ता वां धियोऽवसे वाजयन्तीराजिं न जग्मुर्युवयूँः सुदानू. श्रिये न गाव उप सोममस्थुरिन्द्रं गिरो वरुणं मे मनीषाः.. (८) हे शोभन फल देने वाले दोनों देवो! रत्न की अभिलाषा करती हुई हमारी स्तुतियां रक्षा के निमित्त उसी प्रकार तुम्हारे पास जाती हैं, जिस प्रकार वीर पुरुष संग्राम की अभिलाषा करता है. जिस प्रकार गाएं सोमरस की शोभा बढ़ाने के हेतु उसके समीप रहती हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां इंद्र और वरुण के समीप जाती हैं. (८) इमा इन्द्रं वरुणं मे मनीषा अगमन्नुप द्रविणमिच्छमानाः. उपेमस्थुर्जोष्टार इव वस्वो रघ्वीरिव श्रवसो भिक्षमाणाः.. (९) जिस प्रकार धन पाने की इच्छा से लोग धनी के पास जाते हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियां धन पाने की अभिलाषा से इंद्र और वरुण के पास जाती हैं. लोग भिखारिणी स्त्रियों के समान अन्न को मांगते हुए इंद्र के पास जाते हैं. (९) अश्वस्य त्मना रथस्य पुष्टेर्नित्यस्य रायः पतयः स्याम. ता चक्राणा ऊतिभिर्नव्यसीभिरस्मत्रा रायो नियतः सचन्ताम्.. (१०) हम लोग अपने-आप घोड़ों, रथों, पुष्टि एवं स्थायी संपत्ति के स्वामी बनें. वे दोनों गतिशील देव रक्षा के नवीन साधनों के साथ हमारे सामने घोड़े और धन उपस्थित करें. (१०) आ नो बृहन्ता बृहतीभिरूती इन्द्र यातं वरुण वाजसातौ. यद्विद्यवः पृतनासु प्रक्रीळान्तस्य वां स्याम सनितार आजेः.. (११) हे महान् इंद्र एवं वरुण! तुम दोनों विशाल रक्षा साधनों के साथ आओ. अन्न प्राप्ति के हेतु होने वाले जिस युद्ध में शत्रुओं के आयुध चमकते हैं, हम उस युद्ध में तुम्हारी कृपा से विजयी हों. (११) सूक्त—४२ देवता—त्रसदस्यु आदि मम द्विता राष्ट्रं क्षत्रियस्य विश्वायोर्विश्वे अमृता यथा नः. ebook converter DEMO Watermarks*
ऋतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः.. (१) क्षत्रिय जाति में उत्पन्न एवं समस्त प्रजाओं के स्वामी हम लोगों का राज्य दो प्रकार का है. समस्त देव हमारे हैं, जैसे कि सारी प्रजा हमारी है. रूपवान् एवं समस्त प्रजाओं के धारणकर्त्ता हम लोगों के यज्ञ की सेवा देव करते हैं. हम सबसे श्रेष्ठ हैं. (१) अहं राजा वरुणो मह्यं तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त. क्रतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः.. (२) हम ही राजा वरुण हैं. देवगण असुरनाशकारी श्रेष्ठ-बल हमारे लिए ही धारण करते हैं. रूपवान् एवं समस्त प्रजाओं के धारणकर्त्ता हम लोगों के यज्ञ की सेवा देव करते हैं. हम सबसे श्रेष्ठ हैं. (२) अहमिन्द्रो वरुणस्ते महित्वोर्वी गभीरे रजसी सुमेके. त्वष्टेव विश्वा भुवनानि विद्वान्तस्मैरयं रोदसी धारयं च.. (३) हम ही इंद्र और वरुण हैं. महत्ता के कारण विस्तृत, गंभीर एवं सुंदर रूप वाले धरती- आकाश भी हम हैं. विद्वान् हम त्वष्टा के समान समस्त प्राणियों को प्रेरणा देते हैं एवं धरती- आकाश को धारण करते हैं. (३) अहमपो अपिन्वमुक्षमाणा धारयं दिवं सदन ऋतस्य. ऋतेन पुत्रो अदितेर्ऋतावोत त्रिधातु प्रथयद्वि भूम.. (४) सींचने वाले जल को हमने ही बरसाया था एवं जल के स्थान आकाश को धारण किया था. जल के कारण ही हम अदिति-पुत्र अर्थात् यज्ञ के स्वामी बने थे. हमने ही व्याप्त आकाश को तीन भागों में बांटा था. (४) मां नरः स्वश्वा वाजयन्तो मां वृताः समरणे हवन्ते. कृणोम्याजिं मघवाहमिन्द्र इयर्मि रेणुमभिभूत्योजाः.. (५) सुंदर घोड़ों के स्वामी एवं युद्ध के अभिलाषी नेता हमारे ही पीछे चलते हैं एवं युद्धस्थल में एकत्र होकर हमें ही पुकारते हैं. हम ही इंद्र बनकर युद्ध करते हैं एवं शत्रुपराभवकारी बल से युक्त होकर धूल उड़ाते हैं. (५) अहं ता विश्वा चकरं नकिर्मा दैव्यं सहो वरते अप्रतीतम्. यन्मा सोमासो ममदन्यदुक्थोभे भयेते रजसी अपारे.. (६) सब प्रसिद्ध काम हमने ही किए हैं. देवों के न हारने वाले बल से युक्त होने के कारण हमें कोई नहीं रोक सकता. जब सोमरस एवं स्तुतियां हमें मतवाला कर देती हैं, तब विस्तृत धरती-आकाश भी डर जाते हैं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
विदुष्टे विश्वा भुवनानि तस्य ता प्र ब्रवीषि वरुणाय वेधः. त्वं वृत्राणि शृण्विषे जघन्वान्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून्.. (७) हे वरुण! तुम्हारे कामों को सारा संसार जानता है. हे स्तोता! वरुण के निमित्त स्तुति बोलो. हे इंद्र! ऐसा सुना जाता है कि तुमने बैरियों का वध किया था. तुमने ढकी हुई नदियों को प्रवाहित किया था. (७) अस्माकमत्र पितरस्त आसन्सप्त ऋषयो दौर्गहे बध्यमाने. त आयजन्त त्रसदस्युमस्या इन्द्रं न वृत्रतुरमर्धदेवम्.. (८) दुर्गह के पुत्र पुरुकुत्स जब कैद कर लिए गए तो सप्तऋषि हमारे इस राज्य के पालनकर्त्ता बने थे. उन्होंने पुरुकुत्स की पत्नी के कल्याण के लिए यज्ञ करके त्रसदस्यु को पाया था. वह इंद्र के समान शत्रुनाशक एवं आधा देव था. (८) पुरुकुत्सानी हि वामदाशद्धव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः. अथा राजानं त्रसदस्युमस्या वृत्रहणं दथुरर्धदेवम्.. (९) हे इंद्र एवं वरुण! सप्तऋषियों की प्रेरणा से पुरुकुत्स की पत्नी ने हव्य एवं स्तुतियों द्वारा तुम्हें प्रसन्न किया था. इसके बाद तुमने उसे शत्रुनाशकारी एवं आधे देव त्रसदस्यु को प्रदान किया था. (९) राया वयं ससवांसो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः. तां धेनुमिन्द्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमनपस्फुरन्तीम्.. (१०) हम तुम दोनों की स्तुति करके धन द्वारा प्रसन्न हों. देवगण हव्य द्वारा एवं गाएं घास से संतुष्ट हों. हे इंद्र एवं वरुण! विश्व का नाश करने वाले तुम दोनों हमें हिंसारहित धन दो. (१०) सूक्त—४३ देवता—अश्विनीकुमार क उ श्रवत्कतमो यज्ञियानां वन्दारु देवः कतमो जुषाते. कस्वेमां देवीममृतेषु प्रेष्ठां हृदि श्रेषाम सुष्टुतिं सुहव्याम्.. (१) यज्ञ के योग्य देवों में कौन देव इस स्तुति को सुनेगा? कौन वंदनशील देव इसे स्वीकार करेगा? हम इस अतिशय प्रिय, द्युतियुक्त, शोभन-अन्न से युक्त, इस उत्तम स्तुति को किस देव के हृदय में स्थान दिलाएं? (१) को मृळाति कतम आगमिष्ठो देवानामु कतमः शम्भविष्ठः. रथं कमाहुर्द्रवदश्वमाशुं यं सूर्यस्य दुहितावृणीत.. (२) हमें कौन सा देवता सुखी करेगा? कौन देवता हमारे यज्ञ में सबसे पहले आएगा? देवों ebook converter DEMO Watermarks*
के मध्य कौन सा देव हमारा अधिक कल्याण करेगा? शीघ्र दौड़ने वाला रथ कौन सा है, जिसने सूर्य की पुत्री का वरण पाया है? तात्पर्य यह है कि उक्त गुण केवल अश्विनीकुमारों में ही हैं। (२) मक्षू हि ष्मा गच्छथ ईवतो द्यूनिन्द्रो न शक्तिं परितक्म्यायाम्. दिव आजाता दिव्या सुपर्णा कया शचीनां भवथः शचिष्ठा.. (३) रात्रि बीतने पर इंद्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों उसी प्रकार गतिशील होकर सोम निचोड़ने वाले दिवसों में शीघ्र आओ. स्वर्ग से आए हुए, दिव्य गुणयुक्त एवं शोभन गति वाले तुम दोनों के कर्मों में कौन सा कर्म श्रेष्ठ है? (३) का वां भूदुपमातिः कया न आश्विना गमथो हूयमाना. को वां महश्चित्यजसो अभीक उरुष्यतं माध्वी दसा न ऊती.. (४) कौन सी स्तुति तुम दोनों के गुणों की सीमा हो सकती है? हे अश्विनीकुमारो! किस स्तुति द्वारा बुलाए जाने पर तुम दोनों हमारे पास आओगे? तुम्हारे महान् क्रोध को समीप में कौन सह सकता है? हे जल निर्माता एवं शत्रुनाशकारी अश्विनीकुमारो! हमारी रक्षा करो. (४) उरु वां रथः परि नक्षति द्यामा यत्समुद्रादभि वर्तते वाम्. मध्वा माध्वी मधु वां पृषायन्त्सीं वां पृक्षो भुरजन्त पक्वाः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों का रथ स्वर्गलोक के चारों ओर भली प्रकार चलता है एवं समुद्र से तुम्हारे पास आता है. हे जल-निर्माता एवं शत्रुविनाशक अश्विनीकुमारो! अध्वर्यु लोग मधुर दूध के साथ सोमरस मिलाते हुए भुने हुए जौ लेकर उपस्थित हैं. (५) सिन्धुर्ह वां रसया सिञ्चदश्वान्घृणा वयोऽरुषासः परि ग्मन्. तदू षु वामजिरं चेति यानं येन पती भवथः सूर्यायाः.. (६) बादल ने अपने जल से तुम दोनों के घोड़ों को भिगोया था. तुम्हारे दीप्तियुक्त घोड़े पक्षियों के समान तेज चलते हैं. तुम्हारा वह रथ भली प्रकार प्रसिद्ध है, जिस पर तुम सूर्यपुत्री को बैठाकर लाए थे. (६) इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना. उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७) हे समान मन वाले अश्विनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७) सूक्त—४४ देवता—अश्विनीकुमार ebook converter DEMO Watermarks*
तं वां रथं वयमद्या हुवेम पृथुज्रयम्श्विना सङ्गतिं गोः. यः सूर्या वहति वन्धुरायुर्र्गिर्वाहसं पुरुतमं वसूयुम्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे शीघ्र चलने वाले एवं गायों से मिलाने वाले रथ को पुकारते हैं. वह रथ सूर्यकन्या को धारण करने वाला, बैठने के निमित्त काष्ठ आसन से युक्त, स्तुतियां प्राप्त करने वाला एवं अधिक संपत्ति युक्त है. (१) युवं श्रियमश्विना देवता तां दिवो नपाता वनथः शचीभिः. युवोर्र्वपुरभि पृक्षः सचन्ते वहन्ति यत्ककुहासो रथे वाम्.. (२) हे स्वर्गपुत्र अश्विनीकुमारो! तुम दोनों देव अपने कर्मों द्वारा प्रसिद्ध शोभा प्राप्त करते हो. जब महान् अश्व तुम्हें रथ में ढोते हैं, तब सोमरस तुम्हारे शरीर को प्राप्त करता है. (२) को वामद्या करते रातहव्य ऊतये वा सुतपेयाय वार्कैः. ऋतस्य वा वनुषे पूर्य्याय नमो येमानो अश्विना ववर्त्तत्.. (३) आज सोम देने वाला कौन सा यजमान अपनी रक्षा, सोमरसपान अथवा यज्ञ की पूर्ति के लिए स्तुतियों द्वारा प्रशंसा करता है? हे अश्विनीकुमारो! नमस्कार करने वाला कौन व्यक्ति तुम्हें अपने यज्ञ की ओर खींचता है? (३) हिरण्ययेन पुरुभू रथेनेमं यज्ञं नासत्योप यातम्. पिबाथ इन्मधुनः सोम्यस्य दधथो रत्नं विधते जनाय.. (४) हे अनेक रूपधारी अश्विनीकुमारो! तुम दोनों अपने स्वर्णनिर्मित रथ द्वारा इस यज्ञ में आओ, मधुर सोमरस पिओ एवं सेवा करने वाले यजमान को रमणीय धन दो. (४) आ नो यातं दिवो अच्छा पृथिव्या हिरण्ययेन सुवृता रथेन. मा वामन्ये नि यमन्देवयन्तः सं यद्ददे नाभिः पूर्व्या वाम्.. (५) तुम दोनों स्वर्णनिर्मित एवं भलीप्रकार घूमने वाले रथ द्वारा स्वर्ग से हमारे पास आते हो. तुम्हारी अभिलाषा करने वाले अन्य यजमान तुम्हें रोक न लें, इसीलिए हमने पहले तुम्हारी स्तुति कर ली है. (५) नू नो रयिं पुरुवीरं बृहन्तं दसा मिमाथामुभयेष्वस्मे. नरो यद्वामश्विना स्तोममावन्सधस्तुतिमाजमीळहासो अगमन्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम अनेक पुत्र-पौत्रों से युक्त महान् धन शीघ्र दो. पुरुमीढ के ऋत्विजों ने तुम्हारी स्तुति की है और अजमीढ के ऋत्विजों ने उसका साथ दिया है. (६) इहेह यद्वां समना पपृक्षे सेयमस्मे सुमतिर्वाजरत्ना. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४५ देवता—अश्विनीकुमार
उरुष्यतं जरितारं युवं ह श्रितः कामो नासत्या युवद्रिक्.. (७) हे समान मन वाले अश्विनीकुमारो! हम जो स्तुति तुम्हारे समीप भेजते हैं, वह हमारे लिए फल देने वाली हो. हे सुंदर अन्न वाले अश्विनीकुमारो! तुम स्तुति करने वाले की रक्षा करो. हे नासत्यो! हमारी कामना तुम्हारे ही आश्रित है. (७) सूक्त—४५ देवता—अश्विनीकुमार एष स्य भानुरुदियर्ति युज्यते रथः परिज्मा दिवो अस्य सानवि. पृक्षासो अस्मिन्मिथुना अधि त्रयो दृतिस्तुरीयो मधुनो वि रपशते.. (१) यह सूर्य उदय होता है. तुम दोनों का रथ सभी ओर चलता है एवं चमकते हुए सूर्य के साथ ऊंचे स्थान में पहुंचता है. इस रथ के ऊपरी भाग में तीन प्रकार का अन्न मिला हुआ है तथा चौथी संख्या सोमरस से भरे हुए चमड़े के पात्र की है. (१) उद्वां पृक्षासो मधुमन्त ईरते रथा अश्वास उषसो व्युष्टिषु. अपोर्णुवन्तस्तम आ परीवृतं स्वर्णा शुक्लं तन्वन्त आ रजः.. (२) तीन प्रकार के अन्न से युक्त, सोमरस-सहित एवं घोड़ों वाला तुम्हारा रथ उषा के आरंभकाल में ही चारों ओर फैले हुए अंधकार को नष्ट करता हुआ एवं सूर्य के समान तेज को फैलाता हुआ सामने की ओर जाता है. (२) मध्वः पिबतं मधुपेभिरासभिरुत प्रियं मधुने युञ्जाथां रथम्. आ वर्तनिं मधुना जिन्वथस्पथो दृतिं वहेथे मधुमन्तमश्विना.. (३) तुम सोम पीने वाले मुखों से सोम पिओ. सोम पाने के लिए तुम अपना प्रिय रथ अश्वयुक्त करके यजमान के घर तक लाओ. हे अश्विनीकुमारो! तुम सोमरसपूर्ण चमड़े का पात्र धारण करके अपने मार्ग सोमरस द्वारा प्रसन्नतापूर्ण बनाओ. (३) हंसासो ये वां मधुमन्तो अस्रिधो हिरण्यपर्णा उहुव उषर्बुधः. उदप्रुतो मन्दिनो मन्दिनिस्पृशो मध्वो न मक्षः सवनानि गच्छथः.. (४) तुम्हारे पास मार्ग में शीघ्र चलने वाले, माधुर्ययुक्त, द्रोह न करने वाले, सुनहरे रंग के पंखों से युक्त, ढोने वाले, प्रातःकाल में जागने वाले, जल फैलाने वाले, प्रसन्नतादाता एवं सोम का स्पर्श करने वाले घोड़े हैं. उन घोड़ों द्वारा तुम हमारे यज्ञों में उसी प्रकार आओ, जिस प्रकार शहद की मक्खी शहद के पास जाती है. (४) स्वध्वरासो मधुमन्तो अग्नय उस्रा जरन्ते प्रति वस्तोरश्विना. यन्निहस्तस्तरणिर्विचक्षणः सोमं सुषाव मधुमन्तमद्रिभिः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
मंत्रयुक्त जल से हाथ धोने वाले, यज्ञकर्म के पूरक एवं सभी बातों को देखने वाले अध्वर्यु पत्थरों की सहायता से जब सोमरस निचोड़ते हैं, तब उत्तम यज्ञ के साधन एवं सोमयुक्त गार्हपत्य आदि अग्नि एक साथ रहने वाले अश्विनीकुमारों की प्रतिदिन स्तुति करते हैं. (५) आकेनिपासो अहभिर्द्विध्वतः स्वर्ष्ण शुक्रं तन्वतः आ रजः. सूरश्चिदश्वान्युयुजान ईयते विश्वाँ अनु स्वधया चेतथस्पथः.. (६) किरणें दिवस के द्वारा अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य के समान उज्ज्वल तेज का विस्तार करती हैं. हे अश्विनीकुमारो! सूर्य अपने रथ में घोड़े जोड़कर चलते हैं. तुम दोनों सोमरस लेकर चलते हुए उनका रास्ता बताओ. (६) प्र वामवोचमश्विना धियन्धा रथः स्वश्वो अजरो यो अस्ति. येन सद्यः परि रजांसि याथो हविष्मन्तं तरिणं भोजमच्छ.. (७) हे अश्विनीकुमारो! यज्ञकर्म करने वाले हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम्हारा रथ शोभन अश्वों वाला एवं नित्य तरुण है. उसके द्वारा तुम तुरंत तीनों लोकों में घूम आते हो. उसीसे तुम हमारे हव्ययुक्त, शीघ्रगामी एवं भोजयुक्त यज्ञ में आओ. (७) सूक्त—४६ देवता—वायु एवं इंद्र अग्रं पिबा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु. त्वं हि पूर्वपा असि.. (१) हे वायु! स्वर्ग प्राप्त कराने वाले यज्ञों में तुम सबसे पहले निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. तुम सबसे पहले सोम पीने वाले हो. (१) शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः. वायो सुतस्य तृम्पतम्.. (२) हे वायु! तुम नियुत अर्थात् लोककल्याण वाले हो एवं इंद्र तुम्हारे सारथि हैं. तुम अगणित अभिलाषाएं पूर्ण करने हेतु आओ एवं निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (२) आ वां सहस्रं हरय इन्द्रवायू अभि प्रयः. वहन्तु सोमपीतये.. (३) हे इंद्र एवं वायु! सोमरस पीने के लिए हजारों घोड़े तुम्हें यहां लावें. (३) रथं हिरण्यवन्धुरमिन्द्रवायू स्वध्वरम्. आ हि स्थाथो दिविस्पृशम्.. (४) हे इंद्र एवं वायु! तुम स्वर्णनिर्मित आसन वाले, शोभन-यज्ञ-युक्त एवं स्वर्ग को छूने वाले रथ पर बैठो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
रथेन पृथुपाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्. इन्द्रवायू इहा गतम्.. (५) हे इंद्र एवं वायु! तुम अधिक शक्तिशाली रथ द्वारा हव्य देने वाले यजमान के समीप पहुंचने के लिए इस यज्ञ में आओ. (५) इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषासा. पिबतं दाशुषो गृहे.. (६) हे इंद्र और वायु! तुम दोनों अन्य देवों के साथ मैत्रीपूर्ण बनकर हव्य देने वाले यजमान के घर में इस सोम को पिओ. (६) इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्रवायू विमोचनम्. इह वां सोमपीतये.. (७) हे इंद्र और वायु! तुम यहां आओ और सोमरस पीने के लिए यहां अपने घोड़े रथ से अलग करो. (७) सूक्त—४७ देवता—इंद्र, वायु वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु. आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता.. (१) हे वायु! मैं व्रतचर्यादि द्वारा पवित्र होकर सबसे पहले तुम्हारे निमित्त मधुर सोमरस लाता हूं, क्योंकि मैं स्वर्ग में जाना चाहता हूं. हे अभिषवणीय देव! तुम अपने अश्वों द्वारा सोमपान के लिए यहां आओ. (१) इन्द्रश्च वायवेषां सोमानां पीतिमर्हथः. युवां हि यन्तीन्दवो निम्नमापो न सध्र्यक्.. (२) हे वायु! तुम और इंद्र इन सोमों को पीने की योग्यता रखते हो. इस तरह सोम तुम दोनों के पास जाते हैं, जैसे जल नीचे स्थान की ओर चलता है. (२) वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथं शवसस्पती. नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातं सोमपीतये.. (३) हे वायु! तुम और इंद्र बल के स्वामी हो एवं घोड़ों से युक्त एक ही रथ पर चढ़ते हो. हम लोगों की रक्षा एवं सोमपान करने के लिए यहां आओ. (३) या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा. अस्मे ता यज्ञवाहसेन्द्रवायू नि यच्छतम्.. (४) हे नेता एवं यज्ञपूर्णकर्त्ता इंद्र व वायु! तुम्हारे पास बहुतों द्वारा अभिलषित अश्व हैं, उन्हें ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—४८ देवता—वायु
हम हव्यदाताओं को दे दो. (४) सूक्त—४८ देवता—वायु विहि होत्रा अवीता विपो न रायो अर्यः. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (१) हे वायु! तुम शत्रुओं को भयकंपित करने वाले राजाओं के समान दूसरों द्वारा बिना पिया हुआ सोम सबसे पहले पिओ एवं स्तुतिकर्त्ता को धनसंपन्न करो. हे वायु! तुम सोमरस पीने के लिए प्रसन्नतादायक रथ द्वारा आओ. (१) निर्यूवाणो अशस्तीर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (२) हे वायु! तुम सभी प्रशंसाओं से युक्त, घोड़ों के स्वामी एवं इंद्र के सहायक बनकर अपने अन्नदाता रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (२) अनु कृष्णे वसुधिती येमाते विश्वपेशसा. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (३) हे वायु! काले रंग वाले, धनों को धारण करने वाले एवं विश्वयुक्त धरती-आकाश तुम्हारे पीछे चलते हैं. तुम आनंददायक रथ द्वारा सोम पीने हेतु आओ. (३) वहन्तु त्वा मनोजुजो युक्तासो नवतिर्नव. वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये.. (४) हे वायु! मन के समान तीव्र गति वाले एवं एक-दूसरे से मिलकर चलने वाले निन्यानवे घोड़े तुम्हें लाते हैं. हे वायु! तुम अपने आनंदप्रद रथ द्वारा सोम पीने के लिए आओ. (४) वायो शतं हरीणां युवस्व पोष्याणाम्. उत वा ते सहस्रिणो रथ आ यातु पाजसा.. (५) हे वायु! तुम सौ स्वस्थ अश्वों को अपने रथ में जोड़ो अथवा हजार को. उनसे युक्त तुम्हारा रथ शीघ्रता से आवे. (५) सूक्त—४९ देवता—इंद्र, बृहस्पति इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती. उक्थं मदश्च शस्यते.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र एवं बृहस्पति! तुम दोनों के मुख में सोम रूप हवि डालने के साथ-साथ तुम्हें आनंद देने वाली स्तुतियां भी बोली जा रही हैं. (१) अयं वां परि षिच्यते सोम इन्द्राबृहस्पती. चारुर्मदाय पीतये.. (२) हे इंद्र एवं बृहस्पति! यह सोमरस पीने के निमित्त एवं तुम्हें प्रसन्नता देने के लक्ष्य से तुम्हारे मुंह में डाला जाता है. (२) आ न इन्द्राबृहस्पती गृहमिन्द्रश्च गच्छतम्. सोमपा सोमपीतये.. (३) हे सोमपानकर्त्ता इंद्र एवं बृहस्पति! तुम दोनों सोमरस पीने के लिए हमारे घर आओ. (३) अस्मे इन्द्राबृहस्पती रयिं धत्तं शतग्विनम्. अश्वावन्तं सहस्रिणम्.. (४) हे इंद्र एवं बृहस्पति! हमें सौ गायों एवं हजार घोड़ों से युक्त धन दान करो. (४) इन्द्राबृहस्पती वयं सुते गीर्भिर्हवामहे. अस्य सोमस्य पीतये.. (५) हे इंद्र एवं बृहस्पति! हम सोम निचूड़ जाने पर सोमरस पीने के लिए स्तुतियों द्वारा तुम दोनों को बुलाते हैं. (५) सोममिन्द्राबृहस्पती पिबतं दाशुषो गृहे. मादयेथां तदोकसा.. (६) हे इंद्र एवं बृहस्पति! तुम हव्य देने वाले यजमान के घर में सोम पिओ एवं वहीं निवास करके प्रसन्न बनो. (६) सूक्त—५० देवता—बृहस्पति आदि यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान्बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण. तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम्.. (१) यज्ञ का पालन करने वाले एवं शब्द के द्वारा तीनों स्थानों में वर्तमान बृहस्पति ने अपनी शक्ति द्वारा दसों दिशाओं को स्थिर किया है. प्रसन्नतादायक जीभ वाले बृहस्पतियों को प्राचीन ऋषियों एवं मेधावियों ने सबसे आगे स्थापित किया था. (१) धुनेतयः सुप्रकेतं मदन्तो बृहस्पते अभि ये नस्ततस्रे. पृषन्तं सृप्रमदब्धमूर्वं बृहस्पते रक्षतादस्य योनिम्.. (२) हे शोभन बुद्धि वाले बृहस्पति! तुम उन ऋत्विजों के लिए फलदाता, उन्नति करने वाले एवं अहिंसक बनकर उनके विशाल यज्ञ की रक्षा करते हो जो तुम्हें प्रसन्न करते हैं, तुम्हारी ebook converter DEMO Watermarks*