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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

हमारे पास आओ. हे अग्नि! हम जो हव्य तुम्हें दें, उसे तुम जानो. (६) अग्निश्च यन्मरुतो विश्ववेदसो दिवो वहध्व उत्तरादधि ष्णुभिः. ते मन्दसाना धुनयो रिशादसो वामं धत्त यजमानाय सुन्वते.. (७) हे सर्वज्ञ मरुतो! तुम और अग्नि स्वर्ग के श्रेष्ठ भाग में शिखरों पर स्थित बनो. तुम हमारी स्तुतियों एवं हव्यों से प्रसन्न होकर हमारे शत्रुओं को डराओ तथा मार डालो. तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को संपत्ति दो. (७) अग्ने मरुद्भिः शुभयद्भिर्ऋक्वभिः सोमं पिब मन्दसानो गणश्रिभिः. पावकेभिर्विश्वमिन्वेभिरायुभिर्वैश्वानर प्रदिवा केतुना सजूः.. (८) हे वैश्वानर अग्नि! तुम अपने पूर्ववर्ती ज्वालासमूह से युक्त होकर शोभासंपन्न, स्तुति- योग्य, समूहरूप में रहने वाले, पवित्र करने वाले, उन्नति के द्वारा प्रसन्न करने वाले एवं दीर्घ जीवनयुक्त मरुतों के साथ प्रसन्न बनो एवं सोमरस पिओ. (८) सूक्त—६१ देवता—मरुद्गण आदि के ष्ठा नरः श्रेष्ठतमा य एकएक आयय. परमस्याः परावतः.. (१) हे सर्वोत्तम नेताओ! तुम कौन हो? तुम दूरवर्ती आकाश से एक-एक करके आते हो. (१) क्व१ वोऽश्वाः क्वा३ भीशवः कथं शेक कथा यय. पृष्ठे सदो नसोर्यमः.. (२) हे मरुतो! तुम्हारे घोड़े और उनकी लगाम कहां है? तुम शीघ्र कैसे चल पाते हो एवं तुम्हारी गति कैसी है? तुम्हारे घोड़ों की पीठ पर जीन एवं दोनों नथनों में लगाम दिखाई देती है. (२) जघने चोद एषां वि सक्थानि नरो यमुः. पुत्रकृथे न जनयः.. (३) हे मरुतो! तुम्हारे घोड़ों की जंघाओं पर कोड़े लगते हैं. हे नेताओ! नारियां पुत्र को जन्म देने के लिए जिस प्रकार जांघें फैलाती हैं, उसी प्रकार तुम घोड़ों को जांघें फैलाने पर विवश करते हो. (३) परा वीरास एतन मर्यासो भद्रजानयः. अग्नितपो यथासथ.. (४) हे वीर! मानव हितकारी एवं शोभन जन्म वाले मरुतो! तुम्हारा रंग तपे हुए अग्नि के ebook converter DEMO Watermarks*

समान है. (४) सनत्साश्व्यं पशुमुत गव्यं शतावयम्. श्यावाश्वस्तुताय या दोर्वीरायोपबर्बृहत्.. (५) जिस रानी शशीयसी ने मुझ श्यावाश्व द्वारा स्तुत राजा तरंत को दोनों भुजाओं में भर लिया था, वही मुझे घोड़ा, गाय एवं मेषों के रूप में सैकड़ों प्रकार का पशु धन दें. (५) उत त्वा स्त्री शशीयसी पुंसो भवति वस्यसी. अदेवत्रादराधसः.. (६) देवों की स्तुति न करने वाले तथा धनदान न करने वाले पुरुष से स्त्री शशीयसी बहुत महान् है. (६) वि या जानाति जसुरिं वि तृष्यन्तं वि कामिनम्. देवत्रा कृणुते मनः.. (७) जो शशीयसी व्यथित, प्यासे एवं धनाभिलाषी को जानती है, वह अपने मन में देवों की प्रसन्नता के लिए दान का विचार करती है. (७) उत घा नेमो अस्तुतः पुमाँ इति ब्रुवे पणिः. स वैरदेय इत्समः.. (८) स्तुति करने वाला मैं कहता हूं कि शशीयसी के प्रति तरंत की उचित प्रशंसा नहीं हुई. वे देवों के उद्देश्य से दान करने में सदा समान हैं. (८) उत मेऽरपद्युवतिर्मन्दुषी प्रति श्यावाय वर्तनिम्. वि रोहिता पुरुमीळहाय येमतुर्विप्राय दीर्घयशसे.. (९) प्राप्तयौवना एवं प्रसन्नचित्त शशीयसी ने मुझ श्यावाश्व को मार्ग बताया. उसके दिए हुए लाल रंग के घोड़े मुझे परम यशस्वी एवं मेधावी पुरुमीढ के पास ले गए. (९) यो मे धेनूनां शतं वैददश्विर्यथा ददत्. तरन्तइव मंहना.. (१०) विददश्व के पुत्र पुरुमीढ ने भी तुरंत राजा के समान ही हमें सौ गाएं एवं अन्य बहुत सी संपत्तियां दी हैं. (१०) य ईं वहन्त आशुभिः पिबन्तो मदिरं मधु. अत्र श्रवांसि दधिरे.. (११) जो मरुद्गण तेज घोड़ों द्वारा लाए गए थे, वे मदकारक सोमरस पीते हुए यहां भांति- भांति की स्तुतियां सुनते हैं. (११) येषां श्रियाधि रोदसी विभ्राजन्ते रथेष्व्वा. दिवि रुक्मइवोपरि.. (१२) जिन मरुतों की शोभा से धरती और आकाश चमक उठते हैं, वे रथों पर इस प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*

बैठते हैं, जैसे स्वर्ग में सूर्य विराजता है. (१२) युवा स मारुतो गणस्त्वेषरथो अनेद्यः. शुभंयावाप्रतिष्कुतः.. (१३) वे मरुद्गण युवक, तेजस्वी रथ वाले, निंदारहित, शोभनगति वाले एवं बाधारहित गति वाले हैं. (१३) को वेद नूनमेषां यत्रा मदन्ति धूतयः. ऋतजाता अरेपसः.. (१४) मरुतों के उस स्थान को कौन जानता है, जहां शत्रुओं को भय से कंपित करने वाले, यज्ञ के निमित्त उत्पन्न एवं पापरहित मरुत् प्रसन्न होते हैं. (१४) यूयं मर्तं विपन्यवः प्रणेतार इत्था धिया. श्रोतारो यामहूतिषु.. (१५) हे स्तुति की अभिलाषा करने वाले मरुतो! तुम यजमानों की स्तुति सुनकर उन्हें स्वर्ग प्रदान करते हो एवं यज्ञों में उनका आह्वान सुनते हो. (१५) ते नो वसूनि काम्या पुरुश्चन्द्रा रिशादसः. आ यज्ञियासो ववृत्तन.. (१६) हे शत्रुनाशक, यज्ञ के पात्र एवं प्रमुदितकारक धन वाले मरुतो! तुम लोगों को मनचाहा धन दो. (१६) एतं मे स्तोममूर्ये दाभ्र्याय परा वह. गिरो देवि रथीरिव.. (१७) हे रात्रिदेवी! तुम मेरी इस स्तुति को मेरे पास से रथवीति के पास ले जाओ. रथस्वामी जिस प्रकार रथ पर सामान ले जाता है, उसी प्रकार तुम इन्हें पहुंचाओ. (१७) उत मे वोचतादिति सुतसोमे रथवीतौ. न कामो अप वेति मे.. (१८) हे रात्रिदेवी! सोमरस निचोड़ने वाले रथवीति से तुम यह कहना कि उसकी पुत्री के प्रति मुझ श्यावाश्व का लगाव कम नहीं हुआ है. (१८) एष क्षेति रथवीतिर्मघवा गोमतीरनु. पर्वतेष्वपश्रितः.. (१९) वह धनवान् रथवीति गोमती के किनारे रहता है. उसका घर हिमालय के समीप है. (१९) सूक्त—६२ देवता—मित्र व वरुण ऋतेन ऋतमपिहितं ध्रुवं वां सूर्यस्य यत्र विमुचन्त्यश्वान्. दश शता सह तस्थुस्तदेकं देवानां श्रेष्ठं वपुषामपश्यम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हम सूर्य के उस मंडल को देखते हैं जो सत्यरूप, जल से आच्छादित एवं शाश्वत है. जहां तुम दोनों की स्थिति है, वहां के घोड़ों को स्तोता मुक्त करता है. वहां एक हजार किरणें रहती हैं एवं वही तेजस्वी देवों में एकमात्र उत्तम है. (१) तत्सु वां मित्रावरुणा महित्वमीर्मा तस्थुषीरहभिर्दुदुहे. विश्वाः पिन्वथः स्वसरस्य धेना अनु वामेकः पविरा ववर्त.. (२) हे मित्र एवं वरुण! तुम्हारा महत्त्व इसलिए प्रसिद्ध है कि उसके द्वारा सदा घूमने वाले सूर्य ने वर्षा ऋतु के स्थावर जलों को दुहा था. तुम गतिशील सूर्य की सभी किरणों को चमकीला बनाते हो. तुम्हारा अकेला रथ धीरेधीरे चले. (२) अधारयतं पृथिवीमुत द्यां मित्रराजाना वरुणा महोभिः. वर्धयतमोषधीः पिन्वतं गा अव वृष्टिं सृजतं जीरदानू.. (३) हे स्तोताओं को राजा बनाने वाले मित्र एवं वरुण! तुम अपने तेजों से धरती-आकाश को धारण किए हो. हे शीघ्र दान करने वाले मित्र व वरुण! तुम ओषधियों को विस्तृत करो. गायों की संख्या बढ़ाओ तथा जल बरसाओ. (३) आ वामश्वासः सुयुजो वहन्तु यतरश्मय उप यन्तूर्वाक्. घृतस्य निर्णिगनु वर्तते वामुप सिन्धवः प्रदिवि क्षरन्ति.. (४) हे मित्र एवं वरुण रथ में ठीक तरह से जुड़े हुए तुम्हारे घोड़े तुम दोनों को ढोवें एवं सारथि द्वारा लगाम खींचने पर शीघ्र रुकें. जल स्वयं तुम्हारे पीछे चलता है एवं तुम्हारी कृपा से ही पुरानी नदियां बहती हैं. (४) अनु श्रुताममतिं वर्धदुवीं बर्हिरिव यजुषा रक्षमाणा. नमस्वन्ता धृतदक्षाधि गर्ते मित्रासाथे वरुणेळास्वन्तः.. (५) हे शरीर के प्रसिद्ध तेज को बढ़ाने वाले, अन्न के स्वामी एवं शक्तिशाली मित्र व वरुण! जिस प्रकार मंत्रों से यज्ञ की रक्षा की जाती है, उसी प्रकार तुम यज्ञ के द्वारा धरती की रक्षा करो. तुम यज्ञशाला में स्थित रथ पर बैठो. (५) अक्रविहस्ता सुकृते परस्पा यं त्रासाथे वरुणेळास्वन्तः. राजाना क्षत्रमहृणीयमाना सहस्रस्थूणं बिभृथः सह द्वौ.. (६) हे उदार हाथों वाले एवं यज्ञकर्त्ता यजमान की पाप से रक्षा करने वाले मित्र व वरुण! तुम यज्ञभूमि में यजमान की रक्षा करते हो. तुम दोनों सुशोभित एवं क्रोधरहित होकर संपत्ति एवं हजार खंभों वाला भवन धारण करते हो. (६) हिरण्यनिर्णिगयो अस्य स्थूणा वि भ्राजते दिव्य१ श्वाजनीव. ebook converter DEMO Watermarks*

भद्रे क्षेत्रे निर्मिता तिल्विले वा सनेम मध्वो अधिगर्तस्य.. (७) मित्र एवं वरुण का रथ सोने का बना हुआ है. उसके खंभे भी सोने के हैं. वह आकाश में बिजली के समान चमकता है. हम घृत, सोम आदि से सुशोभित यज्ञभूमि में रथ के ऊपर सोमरस स्थापित करें. (७) हिरण्यरूपमुषसो व्युष्टावयः स्थूणमुदिता सूर्यस्य. आ रोहथो वरुण मित्र गर्तमतश्चक्षाथे अदितिं दितिं च.. (८) हे मित्र एवं वरुण! तुम उषाकाल होने एवं सूर्योदय के पश्चात् अपने लोहे की कीलों वाले स्वर्ण निर्मित रथ में बैठकर चलो. तुम दिति और अदिति दोनों को देखो. (८) यद्द्रंहिष्ठं नातिविधे सुदानू अच्छिद्रं शर्म भुवनस्य गोपा. तेन नो मित्रावरुणावविष्टं सिषासन्तो जिगीवांसः स्याम.. (९) हे शोभन दान वाले एवं विश्व की रक्षा करने वाले मित्र व वरुण! तुम दोनों अतिशय महान्, बाधारहित एवं निर्दोष सुख धारण करते हो. उसी सुख के द्वारा तुम हमारी रक्षा करो. हम इच्छित धन को पाने वाले एवं शत्रु को जीतने वाले बनें. (९) सूक्त—६३ देवता—मित्र व वरुण ऋतस्य गोपावधि तिष्ठथो रथं सत्यधर्माण परमे व्योमनि. यमत्र मित्रावरुणावथो युवं तस्मै वृष्टिर्मधुमत्पिन्वते दिवः.. (१) हे जल के रक्षक एवं सत्यधर्म से युक्त मित्र एवं वरुण! तुम विस्तृत आकाश में स्थित अपने रथ में बैठते हो. हे मित्र व वरुण! इस यज्ञ में तुम जिस यजमान की रक्षा करते हो, उसके लिए आकाश से मधुर वर्षा होती है. (१) सम्राजावस्य भुवनस्य राजथो मित्रावरुणा विदथे स्वर्दृशा. वृष्टिं वां राधो अमृतत्वमीमहे द्यावापृथिवी वि चरन्ति तन्यवः.. (२) हे स्वर्ग को देखने वाले मित्र एवं वरुण! तुम इस यज्ञ में सुशोभित होकर संसार पर शासन करते हो. हम तुमसे धन, वर्षा एवं स्वर्ग की प्रार्थना करते हैं. तुम्हारी किरणें धरती एवं आकाश में फैलती हैं. (२) सम्राजा उग्रा वृषभा दिवस्पती पृथिव्या मित्रावरुणा विचर्षणी. चित्रेभिरभ्रैरुप तिष्ठथो रवं द्यां वर्षयथो असुरस्य मायया.. (३) हे परम सुशोभित, उग्र, जल बरसाने वाले, धरती तथा आकाश के स्वामी एवं सबको देखने वाले मित्र व वरुण! तुम सुंदर मेघों के साथ हमारी स्तुति सुनने को आओ एवं मेघ के ebook converter DEMO Watermarks*

सामर्थ्य से आकाश से जल बरसाओ. (३) माया वां मित्रावरुणा दिवि श्रिता सूर्यो ज्योतिश्चरति चित्रमायुधम्. तमभ्रेण वृष्ट्या गूहथो दिवि पर्जन्य द्रप्सा मधुमन्त ईरते.. (४) हे मित्र एवं वरुण! आकाश में यह तुम्हारी माया है, जो शोभन रूप वाले तुम्हारे आयुध के रूप में तेजस्वी सूर्य विचरण करता है. तुम बादल और वर्षा द्वारा आकाश में सूर्य की रक्षा करते हो. हे बादल! तुम मित्र एवं वरुण की प्रेरणा से मधुर जल बरसाते हो. (४) रथं युञ्जते मरुतः शुभे सुखं शूरो न मित्रावरुणा गविष्टिषु. रजांसि चित्रा वि चरन्ति तन्यवो दिवः सम्राजा पयसा न उक्षतम्.. (५) हे मित्र व वरुण! युद्धार्थी शूर के समान मरुद्गण जलवर्षा करने के लिए तुम्हारी कृपा से सुंदर द्वारों वाले रथ में घोड़े जोड़ते हैं एवं विभिन्न लोकों में घूमते हैं. हे भली प्रकार सुशोभित मित्र एवं वरुण! तुम मरुतों के साथ हमारे कल्याण के लिए आकाश से वर्षा करो. (५) वाचं सु मित्रावरुणाविरावतीं पर्जन्यश्चित्रां वदति त्विषीमतीम्. अभ्रा वसत मरुतः सु मायया द्यां वर्षयतमरुणामरेपसम्.. (६) हे मित्र व वरुण! तुम्हारी कृपा से बादल अन्न का साधक, मनोहर एवं तेजस्वी गर्जन करता है. मरुद्गण अपनी शोभन यात्रा द्वारा बादलों को ढक लेते हैं. तुम मरुद्गण के साथ आकाश से लाल रंग की तथा दोषरहित वर्षा करते हो. (६) धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेथे असुरस्य मायया. ऋतेन विश्वं भुवनं वि राजथः सूर्यमा धत्थो दिवि चित्र्यं रथम्.. (७) हे बुद्धिसंपन्न मित्र व वरुण! तुम वर्षा द्वारा यज्ञ की रक्षा करते हो एवं बादलों की माया के कारण जल के द्वारा सारे संसार को सुशोभित बनाते हो. तुम गतिशील एवं पूज्य सूर्य को आकाश में धारण करो. (७) सूक्त—६४ देवता—मित्र व वरुण वरुणं वो रिशादसमृचा मित्रं हवामहे. परि व्रजेव बाह्वोर्जगन्वांसा स्वर्णरम्.. (१) हम इस मंत्र द्वारा शत्रुनाशक, स्वर्ग के नेता एवं बाहुबल से गोसमूह के समान आगे बढ़ने वाले मित्र एवं वरुण का आह्वान करते हैं. (१) ता बाहवा सुचेतुना प्र यन्तमस्मा अर्चते. शेव हिजार्यं वां विश्वांसु क्षासु जोगुवे.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों अपनी अतिशय बुद्धि द्वारा मनोयोग के साथ स्तुति करने वाले मुझ स्तोता को वांछित सुख दो. तुम्हारे द्वारा दिया हुआ प्रशंसनीय सुख सारी धरती पर गमन करता है. (२) यन्नूनमश्यां गतिं मित्रस्य यायां पथा. अस्य प्रियस्य शर्मण्यहिंसानस्य सश्चिरे.. (३) जब हमें निश्चित रूप से गति प्राप्त हो, तब हम मित्र द्वारा दिखाए मार्ग से चलें एवं प्रिय मित्र का सुख हमें अपने घर में मिले. (३) युवाभ्यां मित्रावरुणोपमं धेयामृचा. यद्ध क्षये मघोनां स्तोतॄणां च स्पूर्धसे.. (४) हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों की स्तुति द्वारा हम ऐसा धन प्राप्त करेंगे, जिसके कारण धनस्वामियों एवं स्तोताओं के घरों में स्पर्धा होने लगे. (४) आ नो मित्र सुदीतिभिर्वरुणश्च सधस्थ आ. स्वे क्षये मघोनां सखीनां च वृधसे.. (५) हे मित्र एवं वरुण! तुम शोभन दीप्ति से युक्त होकर हमारे यज्ञ में आओ, हम धनस्वामी, हव्य देने वाले एवं तुम्हारे मित्र हैं. तुम हमारे घरों को संपन्न बनाओ. (५) युवं नो येषु वरुण क्षत्रं बृहच्च बिभृथः. उरु णो वाजसातये कृतं राये स्वस्तये.. (६) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपनी स्तुतियों के कारण हमारे लिए शक्ति एवं पर्याप्त अन्न धारण करते हो. तुम हमारे लिए अन्न, धन एवं कल्याण प्रदान करो. (६) उच्छन्त्यां मे यजता देवक्षत्रे रुशद्गवि. सुतं सोमं न हस्तिभिरा पद्भिर्धावतं नरा बिभ्रतावर्चनानसम्.. (७) हे नेता मित्र व वरुण! उषाकाल की सुंदर किरणों वाले प्रातः सवन में एवं देवयज्ञ में निचोड़े गए सोमरस के कारण प्रसन्न होकर तुम अपने घोड़ों की सहायता से मुझ अर्चनाना के पास आओ. (७) सूक्त—६५ देवता—मित्र व वरुण यश्चिकेत स सुक्रतुर्देवत्रा स ब्रवीतु नः वरुणो यस्य दर्शतो मित्रो वा वनते गिरः.. (१) जो शोभन कर्म वाला स्तोता देवों में श्रेष्ठ तुम दोनों की स्तुति जानता है एवं सुंदर तुम दोनों—मित्र व वरुण—जिसकी स्तुतियों को स्वीकार करते हो, वही हमें स्तुति के विषय में बतावे. (१) eBook converter DEMO Watermarks*

ता हि श्रेष्ठवर्चसा राजाना दीर्घश्रुत्तमा. ता सत्पती ऋतावृध ऋतावाना जनेजने.. (२) प्रशंसनीय तेज वाले, स्वामी, बहुत दूर से पुकार सुनने वाले, यजमानों के रक्षक एवं यज्ञ की वृद्धि करने वाले मित्र व वरुण सभी स्तोताओं के कल्याण के लिए घूमते हैं. (२) ता वामियानोऽवसे पूर्वा उप ब्रुवे सचा. स्वश्वासः सु चेतुना वाजाँ अभि प्र दावने.. (३) हे पुरातन मित्र एवं वरुण! मैं तुम्हारे समीप पहुंचकर अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करता हूं. तुम शोभन ज्ञान वालों की स्तुति मैं उत्तम घोड़े एवं विविध अन्न पाने के लिए करता हूं. (३) मित्रो अंहोश्चिदादुरु क्षयाय गातुं वनते. मित्रस्य हि प्रतूर्वतः सुमतिरस्ति विधतः.. (४) मित्र पापी स्तोता को भी गृहस्वामी बनने का उपाय बताते हैं. यदि सेवक हिंसा करने वाला हो, तब भी मित्र शोभन बुद्धि रखते हैं. (४) वयं मित्रस्यावसि स्याम सप्रथस्तमे. अनेहसस्त्वोतयः सत्रा वरुणशेषसः.. (५) हम यजमान मित्र की परम प्रसिद्ध रक्षा के अंतर्गत हों. हे मित्र! पापरहित हम तुम्हारे द्वारा रक्षित होकर शीघ्र ही वरुण को पुत्र तुल्य प्रिय बनें. (५) युवं मित्रेमं जनं यथथः सं च नयथः. मा मघोनः परि ख्यतं मो अस्माकमृषीणां गोपीथे न उरुष्यतम्.. (६) हे मित्र व वरुण! तुम मुझ स्तोता के पास आकर मेरी इच्छा पूरी करो. मुझ हव्य धारण करने वाले का तुम त्याग न करना एवं हम ऋषियों तथा पुत्रों को मत छोड़ना. सोमयज्ञ में हमारी रक्षा करना. (६) सूक्त—६६ देवता—मित्र व वरुण आ चिकितान सुक्रतू देवौ मर्त रिशादसा. वरुणाय ऋतपेशसे दधीत प्रयसे महे.. (१) हे ज्ञानी व्यक्ति! तुम शोभन कर्म वाले एवं शत्रुनाशक मित्र व वरुण को पुकारो तथा जलरूप, अन्न के स्वामी एवं महान् वरुण को हव्य दो. (१) ता हि क्षत्रमविह्रुतं सम्यगसुर्य१ माशाते. ebook converter DEMO Watermarks*

अध व्रतेव मानुषं स्वर्णी धायि दर्शतम्.. (२) हे मित्र व वरुण! तुम्हारी शक्ति असुर विनाशिनी एवं विरोधरहित है. तुम्हारा महान् बल व्याप्त है. सूर्य जैसे आकाश में दीखता है, वैसे ही तुम अपनी दर्शनीय शक्ति यज्ञ में स्थापित करो. (२) ता वामेषे रथानामुर्वी गव्यूतिमेषाम्. रातहव्यस्य सुष्टुतिं दधृक्स्तोमैर्मनामहे.. (३) हे रातहव्य ऋषि की स्तुतियां सुनने वाले मित्र व वरुण! हम इसलिए तुम्हारी स्तुति करते हैं कि तुम दूर तक फैले मार्ग में चलने वाले हमारे रथों की रक्षा के लिए चलते हो. (३) अधा हि काव्या युवं दक्षस्य पूर्भिरद्भुता. नि केतुना जनानां चिकेथे पूतदक्षसा.. (४) हे स्तुतियोग्य, शुद्ध बलसंपन्न एवं मुझ चतुर यजमान की स्तुति से चकित मित्र व वरुण! तुम अनुकूल मन से यजमानों की स्तुति सुनते हो. (४) तदृ॒तं पृथिवि बृहच्छ्रव एष ऋषीणाम्. ज्यसानावरं पृथ्वति क्षरन्ति यामभिः.. (५) हे धरती! हम ऋषियों की अन्न की अभिलाषा पूरी करने के लिए तुम्हारे ऊपर बहुत सा जल है. गतिशील मित्र व वरुण गमनों द्वारा बहुत सा जल बरसाते हैं. (५) आ यद्वामीयचक्षसा मित्र वयं च सूरयः. व्यचिष्ठे बहुपाय्ये यतेमहि स्वराज्ये.. (६) हे दूर तक देखने वाले मित्र व वरुण! हम यजमान एवं स्तोतागण तुम्हारे परम विस्तृत एवं बहुतों से आकृष्ट करने वाले स्वराज्य में पहुंचें. (६) सूक्त—६७ देवता—मित्र व वरुण बळित्था देव निष्कृतमादित्या यजतं बृहत्. वरुण मित्रार्यमन्वर्षिष्ठं क्षत्रमाशाथे.. (१) हे अदितिपुत्र मित्र, वरुण एवं अर्यमा देव! तुम वास्तविक रूप में वर्तमान, यज्ञ के लिए हितकारक, विस्तृत एवं विशाल बल धारण करते हो. (१) आ यद्योनिं हिरण्ययं वरुण मित्र सदथः. धर्तारा चर्षणीनां यन्तं सुम्नं रिशादसा.. (२)

हे मानवरक्षक एवं शत्रुनाशक मित्र व वरुण! तुम कल्याणकारी एवं रमणीय यज्ञभूमि में जब आते हो तो हमें सुख देते हो. (२) विश्वे हि विश्ववेदसो वरुणो मित्रो अर्यमा. व्रता पदेव सश्चिरे पान्ति मर्त्यं रिषः.. (३) सब कुछ जानने वाले मित्र, वरुण, एवं अर्यमा अपने-अपने पद के अनुरूप हमारे यज्ञ में सम्मिलित होते हैं एवं हिंसकों से भक्तों की रक्षा करते हैं. (३) ते हि सत्या ऋतस्पृश ऋतावानो जनेजने. सुनीथासः सुदानवाँऽहोश्चिद्रुरुचक्रयः.. (४) सत्यफल देने वाले, जलवर्षक एवं यज्ञ के स्वामी मित्र व वरुण प्रत्येक यजमान को सच्चा मार्ग दिखाते हैं, शोभन दान देते हैं एवं पापी स्तोता को भी विशाल धन देते हैं. (४) को नु वां मित्रास्तुतो वरुणो वा तनूनाम्. तत्सु वामेषते मतिरत्रिभ्य एषते मतिः.. (५) हे मित्र एवं वरुण! तुम दोनों में कोई स्तुति न करने योग्य नहीं है. हम अत्रि गोत्रोत्पन्न ऋषि तुम्हारी शरण जाते हैं. (५) सूक्त—६८ देवता—मित्र व वरुण प्र वो मित्राय गायत वरुणाय विपा गिरा. महिक्षत्रावृतं बृहत्.. (१) हे ऋत्विजो! तुम दूर तक फैलने वाली वाणी से मित्र और वरुण की स्तुति करो. हे महाबली मित्र व वरुण! इस विशाल यज्ञ में आओ. (१) सम्राजा या घृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च. देवा देवेषु प्रशस्ता.. (२) मित्र व वरुण सबके स्वामी, जल को जन्म देने वाले, दीप्तिशाली एवं देवों में प्रशंसनीय हैं. (२) ता नः शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य. महि वां क्षत्रं देवेषु.. (३) वे मित्र व वरुण हमें पार्थिव एवं दिव्य धन अधिक मात्रा में देने में समर्थ हैं. हे मित्र व वरुण! तुम्हारा बल स्तुत्य एवं देवों में प्रसिद्ध है. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

ऋतमृतेन सपन्तेषिरं दक्षमाशाते. अद्रुहा देवौ वर्धेते.. (४) मित्र व वरुण जल के द्वारा यज्ञ को सिंचित करते हुए प्रवृद्ध यजमान को घेरते हैं. हे द्रोहरहित मित्र व वरुण! तुम दोनों बढ़ते हो. (४) वृष्टिद्यावा रीत्यापेषस्पती दानुमत्या:. बृहन्तं गर्तमाशाते.. (५) आकाश से जल बरसाने वाले, मनचाहा फल देने वाले, अन्न के स्वामी एवं दाता के प्रति अनुकूल मित्र व वरुण यज्ञ में आने के लिए महान् रथ पर बैठते हैं. (५) सूक्त—६९ देवता—मित्र व वरुण त्री रोचना वरुण त्रीँरुत द्यून्त्रीणि मित्र धारयथो रजांसि. वावृधानावामतिं क्षत्रियस्य़ानु व्रतं रक्षमाणावजुर्यम्.. (१) हे मित्र व वरुण! तुम चमकते हुए तीन स्वर्गों, तीन अंतरिक्षों एवं तीन भूलोकों को धारण करते हो एवं क्षत्रिय यजमान के रूप तथा कर्म की सदा रक्षा करते हो. (१) इरावतीर्वरुण धेनवो वां मधुमद्द्वां सिन्धवो मित्र दुहे. त्रयस्तस्थुर्वृषभासस्तिसृणां धिषणानां रेतोधा वि द्युमन्तः.. (२) हे मित्र व वरुण! तुम्हारी आज्ञा से गाएं दुधारू होती हैं एवं नदियां मधुर जल देती हैं. तुम्हारी कृपा से जल बरसाने वाले, जल धारण करने वाले एवं तेजस्वी अग्नि, वायु, आदित्य देव धरती, आकाश एवं स्वर्ग के स्वामी बनते हैं. (२) प्रातर्देवीमदितिं जोहवीमि मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य. राये मित्रावरुणा सर्वतातॆळे तोकाय तनयाय शं योः.. (३) हम ऋषि प्रातःकाल एवं माध्यंदिन यज्ञ के समय अदितिदेवी को बार-बार बुलाते हैं. हे मित्र व वरुण! हम धन, पुत्र-पौत्र, सुख एवं शांति के लिए तुम दोनों की स्तुति करते हैं. (३) या धर्तारा रजसो रोचनस्योतादित्या दिव्या पार्थिवस्य. न वां देवा अमृता आ मिनन्ति व्रतानि मित्रावरुणा ध्रुवाणि.. (४) हे दिव्य, अदितिपुत्र एवं स्वर्ग तथा भूलोक को धारण करने वाले मित्र व वरुण! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम्हारे ध्रुवकार्यों को मरणरहित इंद्र आदि देव भी नष्ट नहीं कर सकते हैं. (४) सूक्त—७० देवता—मित्र व वरुण ebook converter DEMO Watermarks*

पुरूरूणा चिद्ध्यस्त्यवो नूनं वां वरुण. मित्र वंसि वां सुमतिम्.. (१) हे मित्र व वरुण! तुम दोनों का रक्षा कार्य निश्चय ही सबसे अधिक विशाल है. हम तुम्हारी सुमति प्राप्त करें. (१) ता वां सम्यग्द्रुह्वाणेषमश्याम धायसे. वयं ते रुद्रा स्याम.. (२) हे द्रोहरहित एवं दुःख से बचाने वाले मित्र व वरुण! हम तुम्हारे स्तोता भोजन हेतु अन्न प्राप्त करें एवं संपन्न बनें. (२) पातं नो रुद्रा पायुभिरुत त्रायेथां सुत्रात्रा. तुर्याम दस्युन्तनूभिः.. (३) हे दुःख से बचाने वाले मित्र व वरुण! तुम अपने रक्षा साधनों द्वारा हमारी रक्षा करो तथा अपनी पालनशक्ति द्वारा हमारा पालन करो. हम अपने पुत्रों की सहायता से शत्रुओं को समाप्त करें. (३) मा कस्याद्भुतक्रतू यक्षं भुजेमा तनूभिः. मा शेषसा मा तनसा.. (४) हे अद्भुत कर्म करने वाले मित्र व वरुण! हम किसी के पवित्र धन का भी उपभोग न करें. तुम्हारी कृपा से हम स्वयं एवं हमारे पुत्र-पौत्र अन्य के धन पर न पलें. (४) सूक्त—७१ देवता—मित्र व वरुण आ नो गन्तं रिशादसा वरुण मित्र बर्हणा. उपेम चारुमध्वरम्.. (१) हे शत्रुनाशक एवं शत्रुप्रेरक मित्र व वरुण! तुम हमारे इस अहिंसक यज्ञ में आओ. (१) विश्वस्य हि प्रचेतसा वरुण मित्र राजथः. ईशाना पिप्यतं धियः.. (२) हे उत्तम ज्ञान संपन्न मित्र व वरुण! तुम सारे जगत् के अधिकारी हो. हे स्वामियो! तुम अपनी कृपा द्वारा हमारे कर्म सफल बनाओ. (२) उप नः सुतमा गतं वरुण मित्र दाशुषः. अस्य सोमस्य पीतये.. (३) हे मित्र व वरुण! हम हव्यदाताओं द्वारा निचोड़े गए सोम को पीने के लिए आओ. (३) सूक्त—७२ देवता—मित्र व वरुण आ मित्रे वरुणे वयं गीर्भिर्जुहुमो अत्रिवत्. नि बर्हिषि सदतं सोमपीतये.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

हम अत्रि ऋषि के समान मंत्रों द्वारा मित्र व वरुण को बुलाते हैं. वे सोमरस पीने के लिए कुशों पर बैठें. (१) व्रतेन स्थो ध्रुवक्षेमा धर्मणा यातयज्जना. नि बर्हिषि सदतं सोमपीतये.. (२) हे मित्र व वरुण! तुम विश्व को धारण करने वाले व्रतों के कारण अपने स्थान पर स्थित रहते हो. ऋत्विज् तुम्हारे यज्ञकर्मों में लगे रहते हैं. तुम दोनों सोमरस पीने के लिए कुशों पर बैठो. (२) मित्रश्च नो वरुणश्च जुषेतां यज्ञमिष्टये. नि बर्हिषि सदतां सोमपीतये.. (३) हे मित्र व वरुण! तुम दोनों हमारे यज्ञों को अपनी इच्छापूर्ति के लिए स्वीकार करो. तुम दोनों सोमरस पीने के लिए कुशों पर बैठो. (३) सूक्त—७३ देवता—अश्विनीकुमार यदद्य स्थः परावति यदर्वावत्यश्विना. यद्वा पुरु पुरुभुजा यदन्तरिक्ष आ गतम्.. (१) हे अनेक यज्ञों के भोगने वाले अश्विनीकुमारो! आज चाहे तुम दूरवर्ती स्वर्ग में हो, चाहे पहुंचने योग्य आकाश में हो और चाहे अनेक स्थानों में हो, तुम सभी स्थानों से यहां आओ. (१) इह त्या पुरुभूतमा पुरु दंसांसि बिभ्रता. वरस्या यामयद्भिगू हुवे तुविष्टमा भुजे.. (२) हे बहुत से यजमानों को संतुष्ट करने वाले, अनेक यज्ञकर्मों को धारण करने वाले, वरण करने योग्य तथा अन्यों द्वारा न रोके जाने वाले अश्विनीकुमारो! मैं तुम्हारे समीप आता हूं. मैं तुम दोनों को अपनी रक्षा के लिए अपने यज्ञ में बुलाता हूं. (२) ईर्मान्यद्वपुषे वपुश्चक्रं रथस्य येमथुः. पर्यन्‍या नाहुषा युगा मह्ना रजांसि दीयथः.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों ने सूर्य का रूप तेजस्वी बनाने के लिए अपने रथ का एक पहिया स्थिर कर लिया है एवं अपनी शक्ति से मानवों के काल को निश्चित करने के लिए रथ के दूसरे पहिए के सहारे लोकों में घूमते हो. (३) तद् षु वामेना कृतं विश्वा यद्धामनु ष्टवे. नाना जातावरेपसा समस्मे बन्धुमेयथुः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अश्विनीकुमारो! जिस स्तोत्र द्वारा मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं, वह भली प्रकार पूरा हो. हे अलग-अलग उत्पन्न एवं पापरहित देवो! मुझे अधिक मात्रा में अन्न दो. (४) आ यद्वां सूर्या रथं तिष्ठद्रघुष्यदं सदा. परि वामरुषा वयो घृणा वरन्त आतपः.. (५) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारी पत्नी सूर्या जब तुम्हारे साथ शीघ्र चलने वाले रथ पर बैठती है, तब चमकीली, दीप्त एवं फैलने वाली किरणें तुम्हारे सब ओर बिखरती हैं. (५) युवोरन्त्रिऋकेतति नरा सुम्नेन चेतसा. घर्मं यद्वामरेपसं नासत्यास्ना भुरण्यति.. (६) हे नेता अश्विनीकुमारो! हमारे पिता अत्रि ने आग बुझ जाने के सुख से कृतज्ञमन होकर तुम दोनों की स्तुति की थी. तुम्हारे स्तोत्र द्वारा उन्होंने उस अग्नि को सुखकर समझा, जो असुरों ने उन्हें जलाने को लगाई थी. (६) उग्रो वां ककुहो ययिः शृण्वे यामेषु सन्वनिः. यद्वां दंसोभिरश्विनात्रिर्नर्राववर्तति.. (७) हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारा उग्र, ऊंचा, गतिशील एवं सदा घूमने वाला रथ यज्ञों में प्रसिद्ध है. तुम्हारे रक्षा प्रयत्न द्वारा ही हमारे पिता अत्रि जीवित रहे थे. (७) मध्व ऊ षु मधुयुवा रुद्रा सिषक्ति पिप्युषी. यत्समुद्राति पर्षथः पक्वाः पृक्षो भरन्त वाम्.. (८) हे सोमरस मिलाने वाले एवं दयालुचित्त अश्विनीकुमारो! हमारी मधुर रस से भिगोने वाली स्तुति तुम्हारी सेवा करती है. तुम जब अंतरिक्ष के पार चले जाते हो तो हमारे द्वारा प्रदत्त हव्य तुम्हारा भरण करता है. (८) सत्यमिद्वा उ अश्विना युवामाहुर्मयोभुवा. ता यामन्यामहूतमा यामन्ना मृळयत्तमा.. (९) हे अश्विनीकुमारो! प्राचीन लोगों ने जो तुम्हें सुख देने वाला कहा है, वह सत्य है. तुम यज्ञ में बुलाने योग्य एवं सुख देने योग्य बनो. (९) इमा ब्रह्माणि वर्धनाश्विभ्यां सन्तु शन्तमा. या तक्षाम रथाँइवावोचाम बृहन्नमः.. (१०) ये महान् स्तुतियां अश्विनीकुमारों को अतिशय सुख देने वाली हों. बढ़ई जिस प्रकार रथ बनाता है, उसी प्रकार हमने ये महान् स्तुतियां कही हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७४ देवता—अश्विनीकुमार कूष्ठो देवावश्विनाद्या दिवो मनावसू. तच्छ्रवथो वृषण्वसू अत्रिर्वामा विवासति.. (१) हे स्तुतिरूपी धन के स्वामी एवं कामवर्षी अश्विनीकुमारो! आज तुम धरती पर स्थित होकर उस स्तुति समूह को सुनो, जिसके द्वारा अत्रि तुम्हारी सेवा करते हैं. (१) कुह त्या कुह नु श्रुता दिवि देवा नासत्या. कस्मिन्ना यतथो जने को वां नदीनां सचा.. (२) वे देव अश्विनीकुमार आज कहां हैं? आज वे स्वर्ग में कहां निवास कर रहे हैं? तुम किस यजमान के पास आते हो? कौन तुम्हारी स्तुतियों का सहायक होगा? (२) कं याथः कं ह गच्छथः कमच्छा युञ्जाथे रथम्. कस्य ब्रह्माणि रण्यथो वयं वामुश्मसीष्टये.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम किस यजमान के प्रति गमन करते हो, किसके पास पहुंचते हो एवं किसके सामने जाने के लिए रथ में घोड़े जोड़ते हो? तुम किसकी स्तुतियों से प्रसन्न होते हो? हम तुम्हें पाने की इच्छा करते हैं. (३) पौरं चिद्ध्युदप्रुतं पौर पौराय जिन्वथः. यदीं गृभीततातये सिंहमिव द्रुहस्पदे.. (४) हे पौर द्वारा स्तुत अश्विनीकुमारो! तुम जल बरसाने वाले बादल को पौर ऋषि के पास भेजो. शूर जिस प्रकार गरजते हुए सिंह को मार गिराता है, उसी प्रकार यज्ञकार्य में व्यस्त पौर के निकट तुम बादल को बरसाओ. (४) प्र च्यवानाज्जुजुरुषो वव्रिमत्कं न मुञ्चथः. युवा यदी कृथः पुनरा काममृण्वे वध्वः.. (५) तुमने जराजीर्ण च्यवन ऋषि के शरीर से त्याज्य बुढ़ापे को इस प्रकार अलग कर दिया था, जिस प्रकार योद्धा अपना कवच उतार देता है. जब तुमने उन्हें दोबारा युवा बनाया तो उन्होंने वधू द्वारा चाहने योग्य रूप पाया. (५) अस्ति हि वामिह स्तोता स्मसि वां सन्दृशि श्रिये. नू श्रुतं म आ गतमवोभिर्वाजिनीवसू.. (६) हे देव अश्विनीकुमारो! हम तुम्हारे स्तोता तुम्हारे सामने रहें. हे अन्नयुक्त देवो! तुम हमारी पुकार सुनकर रक्षासाधनों सहित आओ. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

को वामद्य पुरूणामा वन्वे मर्त्यानाम्. को विप्रो विप्रवाहसा को यज्ञैर्वाजिनीवसू.. (७) हे अन्नस्वामी अश्विनीकुमारो! आज कौन मनुष्य तुम्हारी सबसे अधिक सेवा करता है? हे ज्ञानियों द्वारा शिरोधार्य! तुम्हें यज्ञों द्वारा कौन प्रसन्न करता है. (७) आ वां रथो रथानां येष्ठो यात्वश्विना. पुरू चिदस्मयुस्तिर आङ्गूषो मर्त्येष्वा.. (८) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा रथ इस स्थान पर आवे. वह अन्य देवों के रथों से तेज चलने वाला, हमारी हितकामना करने वाला, हमारे विरोधियों का तिरस्कार करने वाला एवं सभी यजमानों में स्तुति का विषय है. (८) शम् षु वां मध्यूयुवास्माकमस्तु चर्कृतिः. अर्वाचीना विचेतसा विभिः श्येनेव दीयतम्.. (९) हे सोमरस युक्त अश्विनीकुमारो! तुम्हारी बार-बार की गई स्तुति हमें सुख देने वाली हो. हे विशिष्ट ज्ञान वालो! तुम हमारे सामने बाज पक्षी के समान आओ. (९) अश्विना यद्ध कर्हि चिच्छ्रुयातमिमं हवम्. वस्वीरू षु वां भुजः पृच्छन्ति सु वां पृचः.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! तुम जहां कहीं भी हो, हमारी इस पुकार को सुनो. तुम्हारे समीप जाने के इच्छुक उत्तम-हव्य तुम्हें प्राप्त हो. (१०) सूक्त—७५ देवता—अश्विनीकुमार प्रति प्रियतमं रथे वृषणं वसुवाहनम्. स्तोता वामश्विनावृषिः स्तोमेन प्रति भूषति माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (१) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा स्तोता ऋषि तुम्हारे अतिशय प्रिय, कामवर्षी एवं धन ढोने वाले रथ को स्तुतियों द्वारा सुशोभित करता है. हे मधु-विद्या जानने वाले! तुम हमारी पुकार सुनो. (१) अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अहं सना. दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्ना सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम अन्य यजमानों को छोड़कर हमारे पास आओ, जिससे हम अपने सभी विरोधियों का सदा तिरस्कार कर सकें. हे शत्रुओं का नाश करने वाले, सोने के रथ वाले, शोभन-धन के स्वामी एवं नदियों को प्रवाहित करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम

मधुविद्या विशारद हो. तुम हमारी पुकार सुनो. (२) आ नो रत्नानि बिभ्रतावश्विना गच्छतं युवम्. रुद्रा हिरण्यवर्तनी जुषाणा वाजिनीवसू माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम रत्नों को धारण करते हुए हमारे पास आओ. हे स्तुति योग्य, सोने के रथ के स्वामी, अन्नरूपी धन से युक्त एवं मधुविद्या जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम हमारी पुकार सुनो. (३) सुष्टुभो वां वृषण्वसू रथे वाणीच्याहिता. उत वां ककुहो मृगः पृक्षः कृणोति वपुषो माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (४) हे धन बरसाने वाले अश्विनीकुमारो! मुझ उत्तम स्तोता की वाणीरूपी स्तुति तुम्हारे लिए बनाई गई है. तुम दोनों को खोजने वाला महान् यजमान तुम्हें हव्य प्रदान करता है. हे मधुविद्या जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मेरी पुकार सुनो. (४) बोधिन्मनसा रथेषिरा हवनश्रुता. विभिश्च्यवानमश्विना नि याथो अद्धयाविनं माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (५) हे ज्ञानयुक्त मन वाले, रथस्वामी, शीघ्र गतिशील एवं आह्वान को जल्दी सुनने वाले अश्विनीकुमारो! तुम अपने घोड़े पर चढ़कर कपटरहित च्यवन ऋषि के समीप पहुंचे थे. हे मधुविद्या जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मेरी पुकार सुनो. (५) आ वां नरा मनोयुजोऽश्वासः पृषितप्सवः. वयो वहन्तु पीतये सह सुम्नेभिरश्विना माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (६) हे नेता अश्विनीकुमारो! तुम्हारी इच्छा मात्र से रथ में जुड़ने वाले, विचित्र रूप वाले एवं शीघ्र चलने वाले घोड़े तुम्हें ठाट-बाट के साथ सोमरस पीने के लिए यहां लावें. हे मधुविद्या जानने वाले अश्विनीकुमारो! तुम मेरी पुकार सुनो. (६) अश्विनावेह गच्छतं नासत्या मा वि वेनतम्. तिरश्चिदर्यया परि वर्तिर्यातमदाभ्या माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (७) हे अश्विनीकुमारो! इस यज्ञ में आओ. हे सत्य-स्वरूप वालो! तुम हमारे प्रति अभिलाषारहित मत होना. हे अपराजितो एवं स्वामियो! तुम छिपे हुए स्थान से भी हमारे यज्ञ में आओ. हे मधुविद्या जानने वालो! तुम हमारी पुकार सुनो. (७) अस्मिन्यज्ञे अदाभ्या जरितारं शुभस्पती. अवस्युमश्विना युवं गृणन्तमुप भूषथो माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अपराजेय एवं जल के स्वामी अश्विनीकुमारो! तुम इस यज्ञ में स्तुति करने वाले अवस्यु ऋषि पर कृपा करो। हे मधुविद्या जानने वालो! तुम हमारी पुकार सुनो। (८) अभूदुषा रुशत्पशुरग्निरधाय्यृत्वियः। अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम्.. (९) उषाकाल हो गया है। उज्ज्वल किरणों वाली अग्नि वेदी पर स्थापित कर दी गई है। हे धन बरसाने वाले एवं शत्रुनाशक अश्विनीकुमारो! तुम्हारा नाशहीन रथ घोड़ों से युक्त है। हे मधुविद्या जानने वालो! तुम मेरी पुकार सुनो। (९) सूक्त—७६ देवता—अश्विनीकुमार आ भात्यग्निरुषसामनीकमुद्विप्राणां देवया वाचो अस्थुः. अर्वाञ्चा नूनं रथ्येह यातं पीपिवांसमश्विना घर्ममच्छ.. (१) सुखदायक अग्नि प्रातःकाल प्रज्वलित होते हैं। मेधावी स्तोताओं की देवसंबंधी स्तुतियां गाई जाती हैं। हे रथस्वामी अश्विनीकुमारो! तुम इस यज्ञ में मेरे सामने आओ एवं यज्ञ को भली-भांति विस्तृत करो। (१) न संस्कृतं प्र मिमीतो गमिष्ठान्ति नूनमश्विनोपस्तुतेह. दिवाभिपित्वेडवसागमिष्ठा प्रत्यवर्तिं दाशुषे शम्भविष्ठा.. (२) हे अश्विनीकुमारो! तुम मेरे सुरुचिसंपन्न यज्ञ का नाश मत करो, अपितु स्तुति सुनकर इसके समीप आओ. तुम प्रातःकाल रक्षासाधनों सहित आओ एवं विरोधियों को समाप्त करके हव्यदाताओं को सुखी बनाओ। (२) उता यातं सङ्गवे प्रातरह्नो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य. दिवा नक्तमवसा शन्तमेन नेदानीं पीतिरश्विना ततान.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम दोनों ब्रह्ममुहूर्त में, प्रातः, दोपहर के समय, अपराह्णकाल में, रात में, दिन में अथवा किसी भी सुविधाजनक समय में आकर सुख देने वाली रक्षा करो. इस समय अश्विनीकुमारों के अतिरिक्त कोई सोमरस नहीं पी सकता। (३) इदं हि वां प्रदिवि स्थानमोक इमे गृहा अश्विनेदं दुरोणम्. आ नो दिवो बृहतः पर्वतादाद्भ्यो यातमिषमूर्जं वहन्ता.. (४) हे अश्विनीकुमारो! यह यज्ञवेदी का प्राचीन स्थान तुम्हारा घर है. हे अश्विनीकुमारो! यह घर एवं निवास स्थान तुम्हारा ही है. तुम हमारे लिए अंतरिक्षचारी बादल से जल लेकर आओ. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७७ देवता—अश्विनीकुमार

समश्विनोरवसा नूतनेन मयोभुवा सुप्रणीती गमेम. आ नो रयिं वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि.. (५) हम अश्विनीकुमारों की रक्षा एवं शोभन आगमन को प्राप्त करें. हे मरणरहितो! तुम हमें सब संपत्ति, संतान तथा सभी प्रकार का सौभाग्य दो. (५) सूक्त—७७ देवता—अश्विनीकुमार प्रातर्यावाणा प्रथमा यजध्वं पुरा गृध्रादरुषः पिबात:. प्रातर्हि यज्ञमश्विना दधाते प्र शंसन्ति कवयः पूर्वभाज:.. (१) हे ऋत्विजो! यज्ञ में प्रातःकाल उपस्थित होने वाले अश्विनीकुमारों का सबसे पहले यजन करो. वे लालची एवं दान न करने वाले राक्षसों से पहले ही सोम पीते हैं. अश्विनीकुमार प्रातःकाल ही यज्ञ धारण करते हैं, इसलिए प्राचीन ऋषिगण उनकी प्रशंसा करते थे. (१) प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति देवया अजुष्टम्. उतान्यो अस्मद्यजते वि चावः पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान्.. (२) हे ऋत्विजो! तुम प्रातःकाल ही अश्विनीकुमारों की पूजा करो एवं उन्हें हव्य दो. संध्याकाल दिया गया हव्य असेव्य होता है, इसलिए देव उसे स्वीकार नहीं करते. हमसे पहले जो भी यज्ञ करता है अथवा सोम से उन्हें तृप्त करता है, वही यजमान देवों का अधिक प्रिय होता है. (२) हिरण्यत्वङ्मधुवर्णो घृतस्नुः पृक्षो वहन्ना रथो वर्तते वाम्. मनोजवा अश्विना वातरंहा येनातियाथो दुरितानि विश्वा.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारा सोने से मढ़ा हुआ, आकर्षक रंग वाला, जल बरसाने वाला, मन के समान शीघ्रगामी एवं वायु के सदृश चलने वाला रथ अन्न धारण करके आता है. उस रथ द्वारा तुम सभी दुर्गम मार्गों को पार करते हो. (३) यो भूयिष्ठं नासत्याभ्यां विवेष चनिष्ठं पित्वो ररते विभागे. स तोकमस्य पीपरच्छमीभिरनूर्ध्वभासः सदमित्तुतुर्यात्.. (४) जो यजमान यज्ञ का हव्य विभक्त करते समय अश्विनीकुमारों को अधिक अन्न देता है, वह यज्ञकर्मों द्वारा अपनी संतान का पालन करता है. अग्नि अप्रज्वलित रहने पर सदा हिंसा करते हैं. (४) समश्विनोरवसा नूतनेन मयोभुवा सुप्रणीती गमेम. आ नो रयिं वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७८ देवता—अश्विनीकुमार

हम अश्विनीकुमारों की रक्षा एवं शोभन आगमन को प्राप्त करें. हे मरणरहितो! तुम हमें सब संपत्ति, संतान तथा सभी प्रकार का सौभाग्य दो. (५) सूक्त—७८ देवता—अश्विनीकुमार अश्विनावेह गच्छतं नासत्य मा वि वेनतम्. हंसाविव पततमा सुताँ उप.. (१) हे अश्विनीकुमारो! इस यज्ञ में आओ. हे नासत्यो! तुम हमारे प्रति उदासीन मत बनो. हंस जिस प्रकार निर्मल पानी के पास आता है, उसी प्रकार तुम हमारे सोमरस के पास आओ. (१) अश्विना हरिणाविव गौराविवानु यवसम्. हंसाविव पततमा सुताँ उप.. (२) हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार हिरण एवं गौरमृग घास तथा हंस साफ पानी के पास आते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे सोमरस के पास आओ. (२) अश्विना वाजिनीवसू जुषेथां यज्ञमिष्टये. हंसाविव पततमा सुताँ उप.. (३) हे अन्नप्राप्ति के लिए घर देने वाले अश्विनीकुमारो! हमारी इच्छा पूरी करने के लिए इस यज्ञ में आओ. हंस जैसे साफ पानी के पास जाते हैं, वैसे ही तुम हमारे सोमरस के पास आओ. (३) अत्रिर्यद्वामवरोहन्नृबीसमजोहवीन्नाधमानेव योषा. श्येनस्य चिज्जवसा नूतनेनागच्छतमश्विना शन्तमेन.. (४) हे अश्विनीकुमारो! हमारे पिता अत्रि ने तुम्हारी स्तुति की. यदि स्त्री की मनुहार की जाए तो वह पति की इच्छा पूर्ण करती है, उसी प्रकार अत्रि ऋषि ने अग्निदाह से छुटकारा पाया. हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने सुखदायक रथ द्वारा बाज पक्षी की अद्वितीय चाल द्वारा हमारी रक्षा करने आओ. (४) वि जिहीष्व वनस्पते योनिः सूष्यन्त्वा इव. श्रुतं मे अश्विना हवं सप्तवध्रिं च मुञ्चतम्.. (५) हे लकड़ी के बने संदूक! तुम बच्चा जन्मती नारी की योनि के समान खुल जाओ. हे अश्विनीकुमारो! तुम मुझ सप्तवध्रि ऋषि की पुकार सुनकर इस संदूक से मुझे छुड़ाओ. (५) भीताय नाधमानाय ऋषये सप्तवध्रये. मायाभिरश्विना युवं वृक्षं सं च वि चाचथः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*