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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

१८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

चंद्र साधन करने का दूसरा उदाहरण

तारीख २५ मई के ६ बजे संध्या का चन्द्र स्पष्ट करना है; ज्येष्ठ कृष्ण पञ्चमी का।

२१ मई की सूर्य-मिथुन १ अंश गति ५८'=इष्ट-२५ मई को ६ बजे संध्या= चालन+ (२५ मई-२१ मई)=४ X ५८' गति=२३३'=३अंश—५२ चालन+। ६ बजे संध्या इष्ट है। मान लो सूर्योदय ६ बजे है, ६ बजे से १२ घण्टा हुआ। २४ घण्टा में ५८' तो १२ घण्टा में २९' गति हुई। इन सबको जोड़ा तो इष्ट कालीन सायन सूर्य स्पष्ट २ रा-५अंश-२१' हुआ।

सूर्य मिथुन १ अंश=रा-१अंश-०'

चार दिन का चालन+०-३-५२

१२ घण्टे का ,, +०-०-२९

इष्ट कालीन } =२-५-२१

सूर्य स्पष्ट }

तिथि ज्येष्ठ ५ है=शुक्ल पूर्णिमा=१५+कृष्ण पञ्चमी तक गत तिथि ४=१५+४=१९ दिन।

१ तिथि में १२' तो १९ तिथि में=१९ X १२ अंश=२२८ अंश=३ रा. १८ अंश रा ० ,,

सायन सूर्य-२-५-२१ १ दिन की चन्द्र की मध्यम गति (औसत गति) १४°

तिथि के अंश+७-१८-० है तो १२ घण्टा ( ३ दिन की ७°

=चन्द्र स्पष्ट=९-२३-२१=चतुर्थी के अन्त तक का।

आधे दिन का+२-०-७-०

इष्ट कालीन } =१-०-०-२१=कुंभ के ०°-२१' पर चन्द्र है।

सायन चंद्र स्पष्ट } =इष्ट कालीन सायन चन्द्र कुंभ के ०°-२१' पर है।

चंद्र साधन करने की दूसरी रीति—

चंद्र की मध्यम गति १२ अंश है कोई १४ अंश लेते हैं। रवि और चंद्र में १२° अंश का अन्तर पड़ने पर १ तिथि होती है, शेष २ अंश मध्यम गति के हैं। उसके मिला देने से चंद्र के अंश ज्ञात हो जाते हैं।

अधिक मध्यम गति का अन्तर इस प्रकार से होता है।

तिथि प्रतिपदा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पंचमी पञ्चमी से द्वादशी शेष तिथि में

अन्तर२°२°
तिथि पूर्णिमा सेएकादशी से
कृष्ण पञ्चमी तक अमावस्या तकचंद्र स्पष्ट करने के लिएसूर्य स्पष्ट में
अन्तर३ अंश३ अंशतिथि के अनुसार ये अंश मिला देने चाहिए। चंद्र की गति प्रति दिन १२ अंश के १५ तक २° बढ़ जाती है। इसी के

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८७

कारण साधारण रीति से अधिक बड़े हुए अंश ऊपर जोड़ना बताया है। इस रीति से चन्द्र स्पष्ट करने में १° के लगभग अन्तर पड़ जाता है, परन्तु ३° से अधिक अन्तर नहीं आता। तिथियाँ १ मास में पूरी ३० नहीं होती। इससे ये अंश बढ़ जाते हैं।

जैसे सन् १९४३ में २५ मई को तदनुसार ज्येष्ठ वद्यी ६ को १२ बजे दिन का चंद्र साधन करना है। १२ बजे दिन अर्थात् सूर्योदय से लगभग ६ घंटा हुआ।

२१ मई को सायन रवि=मिथुन १° गति ५८' इष्ट २५ मई का है। आगे का होने से चालन घन हुआ।

( २५ मई-२१ मई ) = ४ दिन X ५८' गति=२३२'=३° - ५२'=३° - ५२'-०'अंश २४ घटा में ५८' गति तो ६ घंटा में=५८'=१४३' +०-१४-३०

रा-०

२१ मई को सूर्य २-१°-०' + चालन ०-४-६३'

४-६॥ चालन +

=सायन सूर्य=२-५-६३'

रा ०

६ तिथि है=गति तिथि ५=५ X १२°=६०°=२-०° + पंचमी के अन्त =२-०-०

तक चन्द्र योग ४-५-६३'

+०-३-०

पंचमी की बढ़ती के अंश

+०-३-०

छठ ,, ,, "

योग=४-११-६३' ( क्योंकि छठ उदय है )

६ घंटा का + =३-३० २४ घंटा में चन्द्र १४ अंश चला तो ६ घंटा में

चन्द्र स्पष्ट=४-१५-३६५' ७ १४ X ६ ७° २४ = ३°-३०' ४२

∴ इष्ट कालीन सायन चन्द्र स्पष्ट ४-रा १४°-३६५°

यह कुछ मोटा हिसाब है। गणित से १-२ अंश का अन्तर पड़ जाता है। सायन चन्द्र से अयमांश घटा दो तो निरयन चन्द्र होगा।

चंद्र से नक्षत्र और उसका चरण साधन करना

चंद्र स्पष्ट की राशि आदि की कला बना कर १३ अंश-२०'=८००' का भाग दो तो लब्धिगत नक्षत्र होगा। शेष में ४ गुणाकर ८००' का भाग दो तो वर्तमान नक्षत्र का चरण निकलेगा। १ नक्षत्र में ४ चरण होते हैं। सायन नक्षत्र १३°-२०' का

१८८ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

होता है और अथिनी से आरम्भ होता है। जैसे चंद्र मकर का २९°-५२' है। = ९२-२९°-५२' = १७९९२" ÷ ८००' = २२ गत नक्षत्र (श्रवण) वर्तमान २३ वां नक्षत्र धनिष्ठा का २ चरण।

रा. अं. क.८००' ) १७९९२" ( २२ गत नक्षत्र
९-२९-५२१६००
× ३०१९९२
२७०१६००
+ २९३९२
२९९× ४
× ६०८०० ) १६६८ ( १ गत
१७९४०८०० चरण
+ ५२७६८ शेष
१७९९२ विकला= वर्तमान दूसरा चरण हुआ

किसी राशि के नाम पर से जन्म नक्षत्र और चरण जानना—

आगे होड़ा चक्र दिया है जिस पर से हिन्दुओं के नाम विचार कर रखे जाते हैं। प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण होते हैं और प्रत्येक चरण के लिए एक अक्षर नियुक्त है। जन्म समय जो नक्षत्र होता है उस नक्षत्र का जो चरण वर्तमान हो उसी चरण के अक्षर के अनुसार नाम रखा जाता है। जैसे किसी का जन्म शतभिषक नक्षत्र के तीसरे चरण में हुआ तो चक्र में देखने से प्रगट हुआ कि शतभिषक के तीसरे चरण का अक्षर 'सी' है। इसी अक्षर पर से सीताराम, शिगुपाल आदि नाम उस वालुक का रखा जावेगा। स अक्षर में श अक्षर भी लिया जा सकता है। वह ह्रस्व हो या दीर्घ हो उसका कुछ विचार नहीं होता। यहाँ सी अक्षर है इसमें "छोटी इ" की भी मात्रा हो तो कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। इसमें केवल अक्षर और मात्रा का विचार होता है। मात्रा ह्रस्व हो तो उसे दीर्घ भी ले सकते हैं जैसे कू और कु एक है। इसी प्रकार म और मा एक है। मचा के पहले चरण का जन्म होता है म अक्षर है तो मक्खन सिंह या माशती प्रसाद भी नाम रख सकते हैं।

कई अक्षर ऐसे भी हैं जिन पर से नाम नहीं रखा जा सकता है जैसे ड. ल. ण. जव ये अक्षर आते हैं तो नाम "न" अक्षर या किसी दूसरे अक्षर से रख देते हैं।

इसी प्रकार किसी राशि के नाम पर से नाम के आदि अक्षर का विचार कर जन्म नक्षत्र या राशि भी जान सकते हैं। जैसे किसी का नाम रामलाल है। नाम का आदि अक्षर रा है। चक्र देखा तो तुला राशि के आगे चित्रा के तीसरे चरण का जन्म है और तुला राशि है।

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १८९

इस चक्र से किसी ग्रह की राशि अंश कला आदि मालूम हो तो उसका नक्षत्र और चरण भी जाना जा सकता है।

जैसे जन्म समय चन्द्र स्पष्ट १२।२९°-५२' है तो यह जानने के लिए कि जन्म नक्षत्र और चरण क्या होगा, होड़ा चक्र का अन्तिम भाग देखो। १२।२६°-४०' तक धनिष्ठा का पहला चरण गत हो चुका, धनिष्ठा का दूसरा चरण १०।०°-०° तक है। अपना चन्द्र इन दोनों के भीतर है इससे यह प्रगट हुआ कि धनिष्ठा के दूसरे चरण का जन्म है।

नक्षत्र का चरण (जैसे नाम से प्रगट हो जाता है) जान लेने पर इसी चक्र द्वारा चन्द्र की राशि अंश आदि भी विदित हो सकता है।

जैसे किसी का जन्म धनिष्ठा के तीसरे चरण का है तो तीसरे चरण धनिष्ठा का १३।३°-२०' तक है। दूसरा चरण १०।०°-०' तक है। इस कारण चंद्र इन दोनों के बीच है ऐसा समझना। चंद्र की ठीक स्थिति तो गणित करने से ही प्रगट होती है। यहाँ केवल मोटा हिसाब बतलाया है। गणित खण्ड में इसका गणित दिया है।

होड़ा चक्र को अब कहड़ा चक्र या शतपद चक्र भी कहते हैं।

१ चरण (नक्षत्र का) ३°-२०' का होता है। आगे ३°-२० जोड़ते जाने से राशि के अंशादि का चक्र बन जाता है।

इसमें एक अक्षर को लेकर प्रत्येक चरण के लिए पृथक् मात्रा लगा कर चरण के अक्षर बनाये गये हैं। जैसे ल से ला, ली, लू, ले, लो इत्यादि जैसा नीचे के चक्र से प्रगट होगा।

१९० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

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०८९८-१८-००, ०-०९--४ ०४--१७--५ 2: pl (४

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साथन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १११

६ कल्या४० फा०टो पापी५-३-२०५-६-४०५-१०-०
हस्तपूव गठा५-१३-२०५-१६-४०५-२०-०५-२३-१०
चिनावेपो५-२६-४०६-०-०
७ तुलाचिनायारी६-३-२०६-६-४०
स्वातोरेता६-१०-०६-१३-२०६-१६-४०६-२०-०
विशाखातीतू तो६-२३-२०६-२६-४०७-०-०
८ वृश्चिकविशाखातो७-३-२०
बहुपाधानानी नूने७-६-४०७-१०-०७-१३-२०७-१६-४०
ज्येष्ठानोया गीयू७-२०-०७-२३-४०७-२६-४०८-०-०
९ धनमूलयेगो माभी८-३-२०८-६-४०८-१०-०८-१३-२०
पू० भा०भूच फा८-१६-४०८-२०-०८-२३-२०८-२६-४०
उ० भा०भे९-०-०
१० मकरउ० भा०भो जाजी९-३-२०९-३-२०९-६-४०९-१०-०
अनखीछू खेखो९-१३-२०९-१६-४०९-२०-०९-२३-२०
धनिष्ठागागी९-२६-४०१०-०-०
११ कुम्भधनिष्ठाने१०-३-२०१०-६-४०
शतभि०गो सासीसू१०-१०-०१०-१३-२०१०-१६-४०१०-२०-०
पू० भाद्र०सेसो वा१०-२३-२०१०-२६-४०११-०-०
१२ मीनपू० भाद्र०दो११-३-२०
उ० भा०डुब घ११-६-४०११-१०-०११-१३-२०११-१६-४०
रेवतीवेदो वाची११-२०-०११-२३-२०११-२६-४०१२-०-०

११२ : सचित्र व्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इस चक्र में

अक्षर के आगे ठहर नक्षत्र का क्रम और नीचे चरण के अंक दिये हैं । नक्षत्र क्रम से

यहाँ दिये हुए नक्षत्र का नाम प्रकट हो जायगा ।

इनमें ये अक्षर बराबर हैं—

अ=आ ई=ई उ=ऊ ए=ऐ ओ=ओ अ=अः स=सा व=व

जो नहीं हैं अक्षर

घो घू घे घो

छो छू छे छो जो जो जो झो झू झे झो

ठो ठू ठे ठो

होड़ा चक्र के अक्षर और उनका नक्षत्र चरण सूचक चक्र

नक्षत्र

अक्षर जो हैं

क्रमनामअःसःवः
अश्वि.बा३/१३/२३/३३/४४/१
शरणीका५/३की५/४कू६/१के७/१को७/२
कृत्तिकाखी२२/१खू२२/२खे२२/३खो२२/४
रोहिणीगा२३/१गी२३/२गू२३/३गे२३/४गो२४/१
मृग.घा६/२
आर्द्रा६/३
पुन.चा२७/३ची२७/४चू१/१चे१/२चो१/३
पुष्य६/४
आश्ले.जा२१/३जी२१/४
१०मघा२६/३
११पू. फा२६/४
१२उ. फा.टा११/२टी११/३टू११/४टे१२/१टो१२/२
१३हस्त१३/४
१४चित्राडा६/४डी६/१डू६/२डे६/३डो६/४

सायन सूर्य जानने की स्थूल रीति : १९३

१५ स्वाता.ठ २०/४डी द ठे दो प=खजव हुस्त के
१६ विमल.प १२/४भी भू बे धो धोदूसरे चरण का
१७ मनु.क २४/३ ती १६/१ तु १६/२ ते १६/३ तो १६/४धी धू घे धीजन्म होता है तो
१८ कल.क २६/३व अक्षर होने से
१९ मृग.क २६/३ ती २४/४ दू २६/१ दे २७/१ दो २७/२उसे ख मालकर
२० मृ. घन.क २०/२नाम रख देते हैं
२१ ठ. मल.ता १७/१ ती १७/२ तु १७/३ ते १७/४ ती १८/१जीसे—
२२ खल.पा १२/१ ती १२/४ प्र १२/१ ते १४/१ ती १४/२पराराध=
२३ घति.पा २०/३फी फू फे फोखरागम
२४ शत.भ १८/३ भी १४/४ भू २०/१ ये २१/१ भी २२/२षडान्त=
२५ पू. पा.भा १०/१ भी १०/२ भू १०/३ ये १०/४ भी ११/१खंडान
२६ ल. भा.भा १५/२ ती १५/३ भू १५/४ ये १५/१ भी १५/३
२७ श्वतीरा १४/३ ही १४/४ क १४/१ दे १४/२ दो १४/३
ल १/४ लो २/१ लू २/२ ले २/३ लो २/४
वा ४/२ ली ४/३ लू ४/४ वे ४/१ लो ४/२
व १२/२
सा २४/२ ली २४/४ भू २४/२ वे २४/१ लो २४/२

क. अ. प्र. = इन अक्षरों से नाम नहीं बनता तो इसके बदले "न" या सौर कोई भी अक्षर नाम रख देते हैं।

१३

१६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अध्याय ३७

तारीख से तिथि निकालना

सुवर्णांक १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९ विशेषांक ० ११ २२ ३ १४ २५ ६ १७ २८ ९ २० १ १२ २३ ४ १५ २६ ७ १८ आरम्भ महीना=मार्च को पहिला गिनो।

आरम्भ में विशेषांक शून्य है जिसका श्रेपक ११ है अर्थात् प्रतिदिन ११ बढ़ता है। जैसे ११+११=२२+११=३३ इसका ३ ही लिया ३+११=१४, =१४+११=२५। इसी प्रकार ये विशेषांक ऊपर दिये हैं। ३० से अधिक तिथि होने पर ३० घटाने से जो बचता है वही ऊपर चक्र में .....। जैसे २२+११=३३ का ३० घटा कर ३ ही विशेषांक रखा है।

सुवर्णांक Golden number=सन ईस्वी+१=शेष सुवर्णांक का क्रम।

(शाका+७८)=सन ईस्वी।

जैसे शाका १८६५+७८=१९४३ सन्। १९४३+१=१९४४=शेष ६। शेष ६ बचा तो १९४३ सन का सुवर्णांक=६ हुआ। इस सुवर्णांक १९ ) १९४४ ( १०२ ६ के नीचे विशेषांक २५ दिया है। इस वर्ष भर के लिए

इसी विशेषांक से तिथि निकलेगी।

४४

३८

६ शेष

रीति—सन् ईस्वी में १ जोड़ कर १९ का भाग दो जो शेष बचे वह सुवर्णांक होगा। उस सुवर्णांक के नीचे जो विशेषांक मिले उसे लो। फिर जिस अंग्रेजी महीने की तारीख की तिथि जाननी हो, मार्च से उस अंग्रेजी महीने तक गिनो, गिनते समय मार्च को १ गिनो। गिनती में महीने की जो संख्या आवे उसे मास संख्या कहते हैं।

महीने की तारीख+विशेषांक=मास संख्या=तिथि।

महीने की तारीख, विशेषांक और मास संख्या जोड़ने से तिथि निकलती है। तिथि ३० से अधिक आवे तो ३० घटाने से जो बचे उसे लेना। पूर्णिमा को १५ और अमावस्या को ३० तिथि जानो।

सब योग १ से १५ तक आवे तो=शुक्ल पक्ष की तिथियाँ होंगी।

“ १६ से ३० “ “ “=कृष्ण “ “ “

जैसे सन् १९४३ ई० की ७ अप्रैल की तिथि जाननी है। सन् १९४३ का सुवर्णांक ६ निकला था, इसका विशेषांक २५ है, इष्ट मास अप्रैल है। मार्च से गिना, मार्च १, अप्रैल २, इस प्रकार मास संख्या २ हुई।

तारीख से तिथि निकालना : १९५

=विशेषांक+तारीख+मास संख्या=२४—३०=४ शुक्ल पक्ष की तिथि ।

२५ ७ २

यह योग ३० से अधिक है, इस कारण ३० घटाया, शेष ४ रहे । १ से १५ तक शुक्ल पक्ष की तिथि होती है । इस प्रकार ४ शुक्ल पक्ष की तिथि तारीख ७ अग्रल को होगी ।

दूसरा उदाहरण—तारीख १८ मार्च सन १८९० की तिथि जाननी है ।

\begin{array}{r} १८९०+१ \\ \hline \text{सन् } १९ \end{array} = \begin{array}{r} १८९१ \text{ शेष } १० \text{ सुवर्णांक} \\ १९ \text{ विशेषांक } ९ \end{array} \left. \vphantom{\begin{array}{r} १८९१ \\ १९ \end{array}} \right\} \begin{array}{l} \text{मार्च से इष्ट मास} \\ \text{मार्च } १ \end{array}

\begin{array}{r} \text{विशेषांक} \\ ९ \end{array} + \begin{array}{r} \text{तारीख} \\ १८ \end{array} + \begin{array}{r} \text{मास} \\ १ \end{array} = (२८-१५) = १३ \text{ तिथि}

ऊपर बताये नियम से तारीख की तिथि निकलाने में कभी-कभी एक तिथि का अन्तर पड़ जाता है । क्योंकि कभी-कभी एक तारीख में २ तिथियाँ हो जाती हैं । कभी-कभी तिथियों की हानि वृद्धि भी होती है । इस कारण कभी १ तिथि का अन्तर पड़ जाता है । इस रीति से तिथि का अनुमान हो जाता है । (२) इसी रीति को अब दूसरी प्रकार से करते हैं ।

आगे तारीख से चन्द्र की तिथि निकालने की जंश दी है, उसको देखने की रीति यह है ।

सन्+६=विशेषांक ( सन में जोड़ कर १९ का भाग दो जो बचे वह शेषांक कहलाया )

इष्ट महीने के नीचे और शेषांक के आगे चक्र में जो अंक मिले वह मासांक होगा । मासांक+तारीख=तिथि (तिथि ३० से अधिक होने से ३० घटा देना)

जैसे सन् १९४२ में १५ दिसम्बर की तिथि जाननी है ।

\begin{array}{r} १९४२+१ \\ \hline १९ \end{array} = \begin{array}{r} १९४३ = \text{शेषांक} \\ १९ \quad ५ \end{array} \begin{array}{r} (१९) \quad १९४३ \quad (१०२) \\ \hline १९ \\ \hline ४३ \\ \hline ३८ \\ \hline ५ \text{ शेषांक} \end{array}

इष्ट मास दिसम्बर के नीचे और शेषांक ५ के आगे देखा तो २४ मिला । यही मासांक हुआ । मासांक + तारीख = ३९-३०=९ तिथि शुक्ल पक्ष की ।

दूसरा उदाहरण—

इसी सन् में दिसम्बर की तिथि जाननी है ।

१९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

उपयुक्त मासांक+- तारीख-२६ कृष्ण पक्ष की तिथि

२६ २ (२६-१५)=११ तिथि

पंचांग में उस दिन दशमी थी । एक तिथि वृद्धि होने से अन्तर आ गया ।

तारीख से चन्द्र को तिथि जानने की जंत्री FE | लक ८० हि, 9“1०४६६

२ ३ ४ ५ थ ८ ८ १० १०

१३ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १९ १९ ९१ २१

२४ २३ २४ २५ २६ २७ २९८ ० ० र रे

WISE ६ 5७८3५ ९. १० १ १३ १३

१६ १५ १६ १७ १८ १९ २० २२ २२ २४ २४

२७ २६ २७ १८ २९ ० १ ३ ३ ५ ५

८ ७ ८ ९ १० ११ १२ १४ १४ १६ 1६

१९ १८ १९ २० २१ २२ २३ २५ २५ २७ २७

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११ १० ११ १२ १३ १४ १५ १७ १७ १९ १९

२२९२ ER २३ HY 900 रद रद CE ०... 0

पद पे छै ERS RN ६... NR ९ ११.११

१३ १२ १४ १३ १४ १५ २६ १७ १८ २० २० २२ २२

१४ २३ २५ २४ २५ २६ २७ २८ २९ १ १ ३ रे

7 GQ ४ 0 ७, ८... ९ १० RS १२ २८. १४

१६ १५ १७ १६ १७ १८ १९ २० २१ २३ २५ २७ २७

१७ २६ २८ २७ २८ २९ ० १ २ ३ ४६ ६

१८ ७ ९ ८ ९ १० ११ १२ १३ १५ १५ १७ १८

१९ १८ २० १९ २० २१ २२ २३ २४ २६ १६ १८५ १५

ऊपर के अंक में ११ जोड़ने रो ३० से अधिक होने पर ३० घटा देने से यह

सारिणी बनी है । शुक्ल प्रतिपदा को तारीख जानना सन्‌ ईस्वी के मासांक को ३० से घटा दो तो शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा की तारीख निकल आवेगी। जैसे सन्‌ १९४३ के मई का मासांक २८ है। १९४३-१ १९४४ feo ६ शेषांक

सारिणी में ६ शेषांक के आगे और मई के नीचे २८ मासांक मिला। ई ०-२८ मासांक=२ तारीख हुई। मई को शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा ( पडिवा ) ॥

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तारीख से तिथि निकालना : ११७

पूर्णमासी की तारीख जानना

इष्ट सन के बाद मासिक को ३० में से घटा दो, शेष १५ रहे तो ३० तारीख को पूर्णिमा होगी। शेष १५ से अधिक हों तो १५ से जितने अधिक हों वही अधिक तारीख होगी। १५ से कम हों तो उसमें १५ और जोड़ना तो योग फल पूर्णिमा की तारीख होगी।

जैसे सन् १९४३ का शेषांक ६ है। जून के नीचे और ६ शेषांक के आगे जून का मासांक २९ दिया है। ३०-२९ मासांक=शेष १ यह १५ से कम है। इस कारण १+१५=१६ तारीख १६ को पूर्णिमा होगी।

इस रीति में भी १ का कभी कभी का अन्तर आ जाता है।

\frac{\text{सन् } १९४६ + १}{१९} = \frac{१९४७}{१९} = ९ \text{ शेषांक इसके आगे और मई के नीचे १ मासांक है।}

३०—१=२९ यह १५ से अधिक है। २९—१५ शेष=१४ तारीख को मई में पूनम होगी।

तिथि से तारीख निकालना

\text{तारीख} = \left( \frac{\text{शुक्ल पक्ष तिथि} + ३०}{\text{कृष्ण पक्ष तिथि} + १५} \right) - \left( \begin{array}{l} \text{चैत्र से १ गिनकर} \\ \text{इष्टमास तक संख्या} \end{array} \right) + \text{सन् विशेषांक}

सायन शेष संक्रान्ति को चैत्र जानो और इससे १ गिनो।

रीति—शुक्ल पक्ष की तिथि होतो ३० और कृष्ण पक्ष की तिथि हो तो १५ जोड़ना। योग फल को तिथि संख्या जानो।

मास संख्या—जिस मास में सायन शेष संक्रान्ति हो उसे चैत्र जानो और चैत्र को १ गिन कर इष्ट मास तक संख्या गिनो गिनने से जो संख्या आवे वह मासांक हुआ।

यहाँ नक्षत्र मान से जहाँ महीना पूरा हो उसे मास मानना आवश्यक नहीं है। केवल एक सायन शेष संक्रमण वाले मास को चैत्र मान कर इसी चैत्र से गिनना।

सन ईस्वी का सुवर्णांक और विशेषांक निकालना पहले बता चुके हैं। विशेषांक को माससंख्या में जोड़ो और इस योग को तिथि संख्या में घटाओ, जो शेष बचे वही तारीख होगी।

हिन्दी मास में जो अंग्रेजी महीना पड़ता है उस अंग्रेजी महीने की तारीख इस प्रकार निकालना। यदि ३० से अधिक तारीख आवे तो ३० दिन घटा देना। घटाने से जो बचे वह अगले महीने की तारीख होगी।

हिन्दी महीने में लगभग ये अंग्रेजी महीने पड़ते हैं।

चैत्र वैशाख जेठ आषाढ़ सावन भादो कुम्हार कार्तिक अग्रहन पूस माघ फाल्गुन मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितम्बर अक्टू० नव० दिस० जन० फर० कभी इन महीनों में कुछ अन्तर पड़ जाता है।

१९८ : सचित्र उद्योतिष शिक्षा, आरम्भिक ज्ञान खण्ड

उदाहरण (१)

सन् १९४३ ज्येष्ठ शुक्ल १४ की तारीख जाननी है—

(१९४३ + १) = १३३९ = शेष सुवर्णांक, इसका विशेषांक २५ इसी के नीचे दिया है।

तारीख = (शुक्ल १४ + ३०) — (चैत्र से ज्येष्ठ मास + ३ विशेषांक २५) = ४४-२८ = १६ तारीख हुई। इस तारीख में भी कभी-कभी १ का अन्तर पड़ जाता है। क्योंकि तिथि की हानि-वृद्धि होती है और कभी कभी एक तारीख में २ तिथि हो जाती हैं।

दूसरा उदाहरण—चैत्र कृष्ण १३ सन १८१० को तारीख जानना है— १८३० + १ = १८३१ = शेष १०, १० सुवर्णांक के नीचे ९ विशेषांक दिया है।

तारीख = (कृष्ण १३ + १५) — (चैत्र से चैत्र मास ४ + विशेषांक ९) = २८-१० = १८ तारीख आई। मार्च की १८ तारीख हुई।

अभावस्या की तारीख जानना

तारीख = ३० — (सन का विशेषांक + चैत्र से इष्ट मास तक मास संख्या) जैसे सन १९४२ के दिसम्बर में अभावस्या कौन तारीख पड़ेगी जानना है। १३३२ + १ = १३३३ = शेष ५ सुवर्णांक के नीचे १४ विशेषांक दिया है। तारीख = ३० — (विशेषांक + मार्च से दिसम्बर तक) = ३० - २४ = ६ तारीख।

१४ महीना १०

इसमें भी कभी कभी १ दिन का अन्तर पड़ जाता है। पंचांगों में ७ तारीख को अभावस्या दी है।

विशेष विचार—संक्रान्ति मान में वृद्धि

संक्रान्ति मान ७२ वर्ष में १ दिन आगे बढ़ता है। जनवरी और फरवरी की तिथि निकालने को इष्ट वर्ष के पिछले वर्ष का विशेषांक निकालो और इन दोनों महीनों की अभावस्या निकालने के लिए गत वर्ष का विशेषांक लो।

अभावस्या निकालने का विशेषांक और महीने का योग ३० से अधिक हो तो ३० से घटा देना; जहाँ ० शेष रहे उसे ३० तारीख समझना। तिथि की क्षय वृद्धि से कभी-कभी तारीख में १ दिन का अन्तर पड़ जाता है। इस कारण इष्ट बार पर से शुद्ध तारीख निकाल कर मिलान कर लेना चाहिए। बार से तारीख निकालने की रीति आगे दी है।

तारीख से दिन निकालना

यदि तिथि से तारीख निकालनी है और दिन भी मालूम करना है तो यह निश्चय कर लेना चाहिए कि उस दिन वह तारीख पड़ती है या नहीं। जानने की रीति आगे दी है।

तारीख से तिथि निकालना : १९९

मासांक और वारांक

अंक
मासजनवरीमईलीप-फरवरीजूनसितम्बरलीप--जनवरी
अक्टूबरफरवरीमार्चदिसम्बरअप्रैल
अगस्तनवम्बरजुलाई

दिन रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार

इस चक्र में महीने के ऊपर जो अंक दिए हैं वे मासांक हैं और दिन के ऊपर के अंक वारांक हैं।

रीति सन् ईस्वी का उत्तरार्द्ध अर्थात् इकाई और दहाई को लेकर उस उत्तरार्द्ध का चतुर्थांश भी उसी में जोड़ दो। चतुर्थांश निकालते समय आधा या पौन अंक मिले उसे जोड़ते समय छोड़ देना चाहिए। उस योग फल में तारीख और अंग्रेजी महीने का अंक ( मासांक ) भी जोड़ दो और ७ का भाग दो जो शेष बचे वही बार उपर्युक्त क्रम से होगा।

जैसे सन् १९४३ में २३ मई का दिन जानना है, सन् १९४३ का उत्तरार्द्ध ४३ हुआ=४३ + ४३=४३ + १०३=५३ (यहाँ जोड़ते समय ३ छोड़ दिया)=५३+तारीख २३+मई का मासांक २=७५। ७५+७=शेष १ रविवार। यहाँ मई के ऊपर २ अंक लिखा हैं इससे मई का मासांक २ हुआ। सब का योग ७५ था, ७ का भाग देने से १ बचा, १ के नीचे इतवार लिखा है। इससे प्रकट हुआ कि २३ मई सन् १९४३ को इतवार का दिन था।

बीसवीं सदी में उपर्युक्त नियम से तारीख का दिन निकालना है। परन्तु इसके पहिले की गत सदी की तारीख जानने के लिए प्रति सदी में २ अधिक जोड़ना और भविष्य की सदी में २ अंक घटा देना होगा, तब ठीक तारीख निकलेगी।

लीप फरवरी हो तो लीप वर्ष में जनवरी और फरवरी की तारीख से दिन निकालने में कुछ सावधानी की आवश्यकता है। ऊपर चक्र में लीप फरवरी और लीप जनवरी जहाँ लिखा है उस वर्ष उसके ऊपर लिखा मासांक को अर्थात् लीप जनवरी का निकालने को लीप जनवरी का विशेषांक ० या ७ लेना और लीप फरवरी के लिए मासांक ३ लेना। क्योंकि लीप फरवरी के ऊपर ३ अंक लिखा है। यदि लीप वर्ष न हो तो साधारण जनवरी का अंक १ और फरवरी का साधारण अंक ४ लेना जैसा पहिले चक्र में बता चुके हैं।

लीप वर्ष ( Leap year )=प्लुत वर्ष। जिस वर्ष में सन् ईस्वी में ४ का पूरा २ भाग चला जाय या पूर्ण सदी हो तो उसमें ४०० का भाग पूरा २ चला जाय अर्थात् भाग देने से शेष कुछ न बचे तो वह लीप इयर (प्लुतवर्ष) कहलाता है। जैसे ४, ८, १२, ८८, १२, १६ में ४ का भाग पूरा २ चला जाता है। शेष कुछ नहीं बचता ता ये सब लीप वर्ष होंगे। और ४००, ८००, १२००, १६००, २०००, इत्यादि इन ईस्वी में जिसमें सदी शेष कुछ नहीं बचता तो ये सब लीप वर्ष कहलायेंगे,

२०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

सन् १९०० ईसवी यह पूरी सदी तो है (अर्थात् सैकड़ा के २ शून्य इसमें तो हैं) परन्तु ४०० का भाग पूरा पूरा नहीं जाता, ४०० का भाग देने से शेष बचता है। इससे यह लीप वर्ष नहीं है। १९१६ में ४ का भाग देने से कुछ नहीं बचता, इस कारण लीप वर्ष होगा।

लीप वर्ष में फरवरी २६ दिन की होती है। साधारण फरवरी में २८ दिन होते हैं शेष महीनों में कोई ३० दिन का कोई ३१ दिन का होता है। जनवरी, मार्च, मई, जुलाई, अगस्त, अक्टूबर और दिसम्बर में ३१ दिन, शेष महीनों में ३० दिन होते हैं।

आगे इसी को सरल अंश अनन्त वर्षों की बनाई गई है, जिससे किसी भी सन् की तारीख से दिन या दिन से तारीख सरलता से जान सकते हो।

अनन्त वर्षों की जन्त्री

अंग्रेजी महीनासन् ईस्वी का नम्बर
लीप जनवरी, अग्रेल, जुलाई
सितम्बर, दिसम्बर
जून
फरवरी, मार्च, नवम्बर
लीप फरवरी अगस्त
मई
जनवरी, अक्टूबर
१०
११
१२
१३
१४

तारीख

दिन

जन्त्री रखने की रीति

इस जन्त्री से किसी भी सन् की तारीख या दिन जान सकते हो। जिस सन् ईस्वी की तारीख खोजना हो उसका नम्बर आगे बताई हुई रीति से निकालो। साल में एक बार सन् का नम्बर खोज लेने से वह नम्बर वर्ष भर काम देता है।

जिस महीने की तारीख जाननी है वह अंग्रेजी महीना बाईं ओर खोजो। ऊपर अंग्रेजी महीना लिखा है, उसके नीचे छप्ट महीना मिलेगा। उस महीने के सीध में

तारीख से तिथि निकालना : २०१

दाहिनी ओर प्रथम सप्त् भा नम्बर खोजो । सन् ईस्वी का नम्बर जहाँ लिखा है उसो के नीचे सन् ईसवी भा नम्बर मिलेगा । जहाँ सन् ईस्वी का नम्बर निचे उसके नीचे उसी खड़ी पंक्ति में दिन की पंक्ति है । उसी दिन की पंक्ति में सबसे ऊपर कौन बार है इसका ध्यान रखो । क्योंकि अपनी तारीख इसी बार पंक्ति के अनुसार निकलेगी । दिन पंक्ति के बाई ओर तारीख की पंक्तियाँ हैं । जहाँ तारीख लिखा है उसके ऊपर तारीखें दी हैं और जहाँ दिन लिखा है उसके ऊपर दिन की पंक्तियाँ हैं ।

दिन की प्राप्त पंक्ति के बाई ओर जो तारीखें दी हैं उनमें से इष्ट दिन की तारीख या इष्ट तारीख का दिन खोज लो । दिन की प्राप्त पंक्ति का उपयोग करते समय शेष दी हुई दिन की पंक्तियों पर कोई ध्यान मत दो । यह पंक्ति महीना भर काम देगी । दूसरे महीने की उसी सप्त् के नम्बर के नीचे दूसरी पंक्ति निकलती है ।

उदाहरण—सन् १९४३ का नम्बर ५ है (सन् का नम्बर निकालना आगे बताया है) जून के महीने की तारीख और दिन देखना है । बाई ओर ऊपर अंग्रेजी महीनों के नीचे तीसरी पंक्ति में जून दिया है, उसके आगे सन् के नम्बर के नीचे सन् का नम्बर ५ खोजा (क्योंकि इष्ट सन् का नम्बर ५ है) यह तीसरी खड़ी पंक्ति में मिला, इसके ठीक नीचे दिन की पंक्ति में दिन खोजने से दिन की पंक्ति मिलेगी । उसमें सबसे ऊपर मंगल लिखा है तो मंगलवार को पहली तारीख होगी । दिन के बाई ओर इष्ट दिन की तारीख खोज लो । उसी दिन की पंक्ति से जिसमें वादित्यवार मंगलवार है दिन से तारीख या इष्ट तारीख का दिन निकाल लेना चाहिए । जैसे ३० तारीख कौन दिन पड़ेगा देखना है तो ३० के सीध में बुधवार है । इससे प्रगट हुआ ३० तारीख को बुधवार होगा । इसी प्रकार जून की १० तारीख गुस्वार को पड़ेगी । तारीख १७थी गुस्वार को होगी । सोमवार की तारीख देखनी है तो सोमवार के आगे ७, १४, २१ और २८ तारीखें दी हैं इनमें से जिस तारीख की आवश्यकता हो ले लेना । यहाँ तारीख २१ तक दी है, परन्तु जून महीने में केवल ३० दिन होते हैं । इस कारण ३० तारीख तक इस महीने में लगे बाकी छोड़ देंगे ।

सन् का नम्बर जानने का चक्र

सन् का नम्बरशेषसदी पंक्ति
सन्
का
नम्बर

२०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

शेष वर्ष ( सन् के इकाई वहाई के अंक )

सन् ÷ ४००
१०११शेष जो बचे
१२१३१४१५१६=शेष सदी ।
१७१८१९२०२१२२शेष सदी की
२३२४२५२६२७२८इकाई वहाई
२८२९३०३१३२३३=शेष वर्ष ।
३४३५३६३७३८३९संकड़ा का
४०४१४२४३४४अंक + १ =
४५४६४७४८४९५०पंक्ति ।
५१५२५३५४५५५६पंक्ति के साथ
५६५७५८५९६०६१में और शेष
६२६३६४६५६६६७वर्ष के ऊपर
६८६९७०७१७२सन् का
७३७४७५७६७७७८नम्बर
७९८०८१८२८३८४मिलेगा ।
८५८६८७८८८९
९०९१९२९३९४९५
९६९७९८९९१००

शेष वर्ष ( सन् के इकाई वहाई के अंक )

सन् ईसवी का नम्बर निकालने की रीति ।

सन् ÷ ४०० = शेष सदी । सन् ईसवी यदि ४०० से अधिक हो तो ४०० का भाग दो जो शेष बचे उसे लो । जो इस प्रकार का शेष बचता है उसे शेष सदी कहते हैं । यदि ४०० से कम सन् हो तो चक्र के अनुसार ही पंक्ति का नम्बर होगा, जैसे:—

  • शेष ० से ९९ तक = पंक्ति १
  • शेष १०० से १९९ तक = पंक्ति २
  • शेष २०० से २९९ तक = पंक्ति ३
  • शेष ३०० से ३९९ तक = पंक्ति ४

४०० का भाग देने पर जो शेष सदी मिले उसमें फिर १०० का भाग दो जो शेष बचे वह = शेष वर्ष हुआ । और उसमें जितने बार १०० का भाग जाय वह लम्बि हुई । इस लम्बि में १ और जोड़ना तो वह पंक्ति का नम्बर होगा । अर्थात् उस सदी के इकाई वहाई के अंक शेष वर्ष कहलाये जो शेष वर्ष चक्र में दिया है और उस संकड़ा के अंक में १ और जोड़ो तो वह पंक्ति का नम्बर होगा ।

तारीख से तिथि निकालना : २०३

ऊपर चक्र में पंक्ति का नम्बर अन्त में १ से ४ तक दिया है। अपने इष्ट सन् के शेष वर्ष के ऊपर और इष्ट पंक्ति में जो सन् का नम्बर मिले वही इष्ट सन् का नम्बर होगा।

वर्तमान सदी की पंक्ति ४ है। इस कारण वर्तमान सदी में सबसे नीचे की पंक्ति ४ के सन् का नम्बर लेना।

उदाहरण—

(१) सन् १९०० ÷ ४०० = ४ \frac{300}{400} = \text{शेष } ३०० हुआ। शेष ३०० ÷ १०० = ३ वार भाग गया—लब्धि ३+१=४ पंक्ति हुई, शेष ० बचा तो शेष वर्ष ० हुआ। अब शेष वर्ष चक्र में ० के ऊपर और ४ पंक्ति की सीध में देखा तो सन् का नम्बर १ मिला। सन् का नम्बर १ हुआ।

(२) सन् २०० ÷ ४०० = \frac{300}{400} = \text{शेष } २०० ÷ १००+लब्धि २+१=३ पंक्ति, शेष, शेष वर्ष ० पंक्ति ३। यहाँ इकाई दहाई में शून्य है १०० का भाग देने से शेष ० रहेगा। इस कारण शेष वर्ष ० हुआ। शेष वर्ष चक्र में ० के ऊपर पंक्ति ३ के सीध में खोजने से सन् का नम्बर ३ मिला।

(३) सन् १९४८ ÷ ४०० शेष सदी ३४४ हुई। इसमें इकाई दहाई में ४४ है तो शेष वर्ष ४४ हुए। शेष ३४४ के सैकड़ा के स्थान में ३ हैं ३+१=४ पंक्ति या ३४४ ÷ १००=३ लब्धि+१=४ पंक्ति। शेष ४४=शेष वर्ष ४४ हुए। शेष वर्ष ४४ के ऊपर और पंक्ति ४ के सीध में सन् का नम्बर ७ मिला।

(४) सन् १८०१ ÷ ४००=शेष सदी २०१, इकाई दहाई में ०१ है तो शेष वर्ष ०१ अर्थात् १ हुआ। २०१ में सैकड़ा के स्थान में २ है। २+१=३ पंक्ति हुई। या २००+१००=लब्धि+१=३ पंक्ति। शेष १=शेष वर्ष १ हुआ। शेष वर्ष १ के ऊपर पंक्ति ३ के सीध में खोजा तो सन् का नम्बर ४ मिला।

यहाँ ४०० का भाग देने के उपरान्त जो शेष सदी प्राप्त होती है उसमें फिर १०० का भाग देना बताया है, परन्तु यदि ऊपर पंक्ति का चक्र देखो तो वहाँ ही लिखा है कि शेष कितने से कितने के बीच में बचने पर कौन पंक्ति होती है। इस कारण सुविधा के लिए ऊपर ही चक्र के दाहिनी ओर लिख दिया है। सन् में केवल ४०० का भाग देकर शेष सदी निकाल लो। शेष सदी के इकाई दहाई के अंक शेष वर्ष होते हैं। उसी शेष वर्ष के ऊपर इष्ट पंक्ति की सीध में सन् का नम्बर मिल जाता है। वर्ष में केवल १ वार सन् का नम्बर निकालना पड़ता है और वह नम्बर उसी वर्ष भर काम देता है।

२०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

कुछ निकाले हुए सन्‌ के नम्बर

सन्‌ के नं. १ २ ३

१७९८ १७९९ १८००

१८०४ १८०५ १५०६

१८१० १८११ +

  • १८१६ १24

१८२१ १८२२ १८२३

१२२७ + १८२८

१८३२ १८३३ १८३४

१८३८ १५३९ +

  • १८४४ १८४५

१८४९ १८५० १८५१

१८५५ -F- १८५६

१८६० १८६१ १८६२

१८६६ १८६७ +

पे + १८७२ १८७३

FE १८७७ १८७८ | पृ८७९

[प्र 1००३ + १८८४

१८८८ १८८९ १८९०

१८९४ १८९५ +

१९०० १९०१ १९०२

१९०६ १९०७ +

  • १९१२ १९१३

१९१७ १९१८ १९१९

१९२३ + १९२४

१९२८ १९२९ १९३०

१९३४ १९३५ पः

  • १९४० १९४१

१९४५ १९४६ १९४७

१९५१ + १९५२

१९५६ १९५७ १९५३

१९६२ १९६३ +

तारीख से तिथि निकालना : २०५

सप्ताह सं. क्र. सं.
सप्ताह सं. क्र. सं.+१९६८१९६९१९७०१९७१+१९७२
१९७३१९७४१९७५+१९७६१९७७१९७८
१९७९+१९८०१९८११९८२१९८३+
१९८४१९८५१९८६१९८७+१९८८१९८९
१९९०१९९१+१९९२१९९३१९९४१९९५
  • | १९९६ | १९९७ | १९९८ | १९९९ | + | २००० २००१ | २००२ | २००३ | + | २००४ | २००५ | २००६ २००७ | + | २००८ | २००९ | २०१० | २०११ | + २०१२ | २०१३ | २०१४ | २०१५ | + | २०१६ | २०१७

जंत्री बनाने की रीति

यह जंत्री बनाना कठिन नहीं है स्वतः बना सकते हो। इस ढंग से यह बनाई गई है जिससे अपनी स्मरण शक्ति से ही जब आवश्यकता हो वड़ी सरलता से कोई भी इसे बना सके।

आरम्भ में मास के अंक उलटे क्रम से बाईं ओर रखो अर्थात् पहिले ७ फिर उसके नीचे ६ फिर ५ इत्यादि और उस मासांक के आगे उस नम्बर के महीने लिख दो। पहिले बता चुके हैं कि कौन महीने का क्या नम्बर होता है। उनको कटस्थ कर लेना कोई कठिन नहीं है। इस प्रकार ७ पंक्तियों में सब १२ महीने (लीप जनवरी और लीप फरवरी भी) आ जाते हैं।

महीने की पंक्ति के आगे दाहिनी ओर सन् के नम्बर की पंक्तियाँ हैं। इसका भरना बहुत सरल है। खड़ी पंक्ति में ऊपर से नीचे १, २, ३, ४ आदि क्रम पूर्वक ७ अंक तक लिख लो। फिर सबसे ऊपर की पंक्ति में भी बाईं ओर से १ के आगे २, ३, ४ आदि क्रम पूर्वक लिखते जाओ और ७ अंक तक लिख लो। शेष कोठों में उसके आगे के अंक लिख कर सब कोठे भर दो। ७ अंक के बाद फिर १ अंक लिख कर उसके आगे के अंक क्रमानुसार लिखना पड़ता है।

सन् के नम्बर के कोठों के नीचे दिन की पंक्तियाँ हैं। इसमें रविवार से आरम्भ कर शनिवार तक आड़े ओर खड़े कोठों में दिन भर दो। जिस प्रकार सन् का नम्बर भरा था उसी रीति से क्रमानुसार दिन सब कोठों में लिख दो।

इसके बाईं ओर महीने की पंक्ति के नीचे तारीख की पंक्तियाँ हैं, उनमें १ से लेकर ३१ तक क्रमानुसार तारीख के अंक भर दो। वस, इस प्रकार अन्त बर्यो की जंत्री तैयार हो गई। जंत्री बनाने की इतनी सरल रीति और कहीं न मिलेगी।

सन् का नम्बर निकालने का भी चक्र बनाना बहुत सरल है। पंक्ति ४ में १ से लेकर ७ कोठों में क्रमानुसार ७ अंक लिख लो, और उसके ऊपर तीसरी पंक्ति में