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सचित्र ज्योतिष शिक्षा (प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड) भाग १

Sachitra Jyotisha Shiksha (Prarambhika Gyan Khand) Vol 1

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished288 पृष्ठ

७६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

में दिये रहते हैं। किसी पंचाङ्ग में दैनिक, किसी में साप्ताहिक दिये रहते हैं। २३ नक्षत्र की एक राशि होती है, इससे नक्षत्रों के प्रमाण से ग्रहों की राशि भी निकल जाती है। पंचाङ्ग में स्पष्ट ग्रह के अतिरिक्त कुण्डली चक्र भी दिए रहते हैं। इस प्रकार ग्रहों के सम्बन्ध की प्रत्येक सूचनाएँ पंचाङ्ग में दी रहती है।

(४) योग

यह पंचाङ्ग का चौथा अंग है।

योग २७ है। चन्द्र और सूर्य की गति में जब १३°-२०" का अन्तर पड़ता है तब एक योग होता है। ३६०° ÷ २७ = १३°-२०" = १ (योग) परन्तु नक्षत्र के प्रमाण से इन थोड़ी का आकाश की स्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है। योग केवल सूर्य चन्द्र का अन्तर बतलाते हैं।

२७ योगों के नाम

१ विष्कम्भ८ धृति१५ वज्र२२ साध्य
२ प्रीति९ शूल१६ सिद्धि२३ शुभ
३ आयुष्मान१० गंड१७ व्यतीपात२४ शुक्ल
४ सोभाय११ वृद्धि१८ वरीयान२५ ब्रह्म
५ शोभन१२ ध्रुव१९ परिच२६ ऐन्द्र
६ अतिगंड१३ व्याघात२० शिव२७ वैधृति
७ सुकर्मा ( सुकर्म )१४ हर्षण२१ सिद्ध

(५) करण

यह पंचाङ्ग का पाँचवा अंग है।

करण यह तिथि का आधा भाग है ( १ ) तिथि के पूर्वार्द्ध अर्थात् पहिले आधे भाग में एक करण और उत्तरार्द्ध ( अन्त के आधे भाग में ) दूसरा करण होता है। इस प्रकार १ तिथि में २ करण होते हैं।

१ चान्द्रमास में ३० तिथि और ६० करण होते हैं। सूर्य और चन्द्र के बीच ६° का अन्तर पड़ने पर १ करण होता है। करण कुल ११ है उनके नाम ये हैं।

चर करण—( १ ) वव, ( २ ) बालव, ( ३ ) कौलव, ( ४ ) तैतिल, ( ५ ) गर, ( ६ ) वणिज, ( ७ ) विष्टि।

स्थिर करण—( ८ ) शकुनि, ( ९ ) चतुष्पद, ( १० ) नाग, ( ११ ) किस्तुन। पूर्वार्द्ध=पूर्व दल ( पहिला आधा भाग ) उत्तरार्द्ध=परदल ( अन्त का आधा भाग )।

पंचाङ्ग के अंग : ७७

किस करण में कौन-कौन तिथि होती है नीचे चक्र में दिया है

पक्ष | करण | किस्तुल | बव | वालव | कौलव | तैतिल | गरल | वणिज | विष्टि | शकुनि | चतुष्यद | नाग | ---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|--- शुक्ल पक्षापूर्वदश | | १ | ५,१२ | २,९ | ६,१३ | ३,१० | ७,४ | ४,११ | ८,१५ | ० | ० | ० | की तिथि उत्तर,, | ० | १,८,१५ | ५,१२ | २,९ | ६,१३ | ३,१० | ७,१४ | ४,११ | ० | ० | ० | | कृष्ण पक्षापूर्व,, | ० | ४,११ | १,८ | ५,१२ | २,९ | ६,१३ | ३,१० | ७,१४ | ० | ३० | ० | | की तिथि उत्तर,, | ० | ७ | ४,११ | १,८ | ५,१२ | २,९ | ६,१३ | ३,१० | १४ | ० | ३० | | तिथियाँ

चक्र में जो अच्छा दिष्ट है ये तिथियों के अच्छे हैं। १५ से पूर्णिमा, ३० से अमावस्या समझना। ऊपर के चक्र से प्रगट होगा कि शुक्ल प्रतिपदा को पहिले किस्तुल फिर बव करण होता है। शुक्ल द्वितीया को वालव फिर कौलव होता है। १५ पूर्णिमा को पहिले चतुष्यद फिर नाग होता है।

इसी को अच्छे प्रकार से समझाने के लिए किस तिथि में कौन करण होता है यह तिथि के अनुसार करण नीचे दिए हैं।

शुक्ल तिथि १ २-९ ३-१० ४-११ ५-१२ ६-१३ ७-१४ ८-१५ X X पूर्व दल किस्तुल वालव तैतिल वणिज बव कौलव गरल विष्टि विष्टि चतुष्यद पर दल बव कौलव गरल विष्टि वालव तैतिल वणिज बव शकुनि नाग कृष्ण तिथि X १-८ २-९ ३-१० ४-११ ५-१२ ६-१३ ७ १४ ३०

भद्रा—विष्टि करण का दूसरा नाम है, जो शुभ कार्यों में अनिष्ट कारक होती है। यह केवल मूहूर्त आदि में विचारणीय है।

पंचाङ्ग में किसी तिथि के पूर्वार्द्ध में जो करण होता है प्रायः वही किस समय तक रहेगा दिया रहता है। इसके बाद जो दूसरा करण आना चाहिए वह नहीं दिया रहता। इस चक्र से समझ में आ जावेगा कि किस तिथि के उत्तरार्द्ध में कौन करण होगा।

दिनमान—सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन की अवधि को दिनमान कहते हैं। इससे प्रगट होता है कि दिन कितने घड़ी पल तक है। अर्थात् दिन कितने घड़ी पल लम्बा है।

दिन रात में ६० घड़ी होती है—( ६० घटी—विनमान )—रात्रिमान।

प्रतिदिन विनमान घटता-बढ़ता रहता है। २१ मार्च से प्रतिदिन बढ़ते-बढ़ते ता० २१ जून को सबसे बड़ा दिन होता है। उसके उपरान्त घटना आरम्भ होता है। इसको पहिले समझा चुके हैं।

७८ : सचित्र ज्योतिष शिखा. प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

अक्षांश के अनुसार भी प्रत्येक स्थान में दिन छोटा बड़ा होता है। इसके विषय में भी यहाँ कुछ बतला देना है।

जब सूर्य उत्तर गोल में होता है तब पृथ्वी के ध्रुव प्रदेश में ६ मास तक बराबर सूर्य दिखलाई देता है। उस समय दक्षिण ध्रुव पर ६ मास बराबर अन्धकार रहता है। जब सूर्य दक्षिण गोल में होता है तो इसके विरुद्ध होता है अर्थात् दक्षिण ध्रुव में ६ महीने का दिन और उत्तर ध्रुव में ६ महीने की रात्रि रहती है।

उत्तर और दक्षिण ध्रुव के बीच में दोनों ध्रुवों से बराबर १०° पर पृथ्वी की मध्य रेखा होती है। मध्य रेखा के स्थान को निरक्ष देश भी कहते हैं, क्योंकि वहाँ पर अक्षांश शून्य होता है। निरक्ष देश में १२ घंटे का दिन और १२ घंटे की रात्रि होती है। मध्यरेखा से अक्षांशों की दूरी के अनुसार परम दिन रात्रि में अन्तर पड़ता है। मध्य रेखा से ६६° उत्तर के देश में सबसे बड़ा दिन २४ घण्टे का और ७०° पर सबसे बड़ा दिन २ मास का, ७८° पर ४ मास का और ९०° पर ( ध्रुव देश में ) परम दिन (सबसे बड़ा दिन) ६ मास का होता है। दूसरी ओर दक्षिण गोल में ठीक इसके विरुद्ध होता है अर्थात् जब उत्तर गोल में सबसे बड़ा दिन, जिस मान का होगा तो दक्षिण गोल में उसी मान की सबसे बड़ी रात्रि होगी।

सायन सूर्य भेष पर जब आता है तब दिन रात्रि बराबर होती है। जब सूर्य सायन कर्क पर आता है तो सबसे बड़ा दिन और सबसे छोटी रात्रि होती है। जब सूर्य सायन तुला पर जाता है तब फिर दिन रात्रि बराबर होती है, जब सायन मकर पर आता है तो सबसे बड़ी रात्रि और सबसे छोटा दिन होता है। यह उत्तर गोल में होता है और दक्षिण गोल में इसके विपरीत होता है।

अंशों के अनुसार देशों का परम दिन का प्रमाण छोटा बड़ा होता है। ज्यों-ज्यों अक्षांश बढ़ता जायगा महा दिन ( परम दिन ) का प्रमाण बढ़ता जायगा। महादिन का प्रमाण अक्षांशों के अनुसार नीचे चक्र में दिया है।

अक्षांश के अनुसार महादिन चक्र

लघुअक्षांशपरम दिन-लघुअक्षांशपरम दिन-
शू सेतकमानशू सेतकमान
मेखला अंशकला अंशकला घं० मि०मेखला अंशकला अंशकला घं० मि०
३४१२
३४१६४४१३
१६४४२४१२१३
२४१२३०४८१४
३०४८३६३११४
३६३१४१२४१५
४१२४४५३२१५
४५३२४९१६

अध्याय १७ : ७९

४९५१५९१६३०२४६६२९६६३२२४
१०५१५९५४३०१७२४६६३२६७१८महीना
११५४३०५६३८१७३०२६६७१८६९३३"
१२५६३८५८२७१८२७६९३३७३"
१३५८२७७९५९१८३०२८७३७७४०"
१४५९५९६११८१९२९७७४०८२५९"
१५६११८६२२६१९३०३०८२५९९०"

अध्याय १७

पंचाङ्ग में मुहूर्त आदि के सम्बन्ध से इतर विषय भी दिये रहते हैं उनके सम्बन्ध में संक्षिप्त ज्ञान यहाँ कराया जाता है।

पंचाङ्ग में सिद्ध योग ऋकच योग आदि दिये रहते हैं वे सब मुहूर्त से सम्बन्ध रखते हैं। मुहूर्त का स्वतंत्र विषय है यहाँ तो बहुत ही संक्षेप में आवश्यक बातें दी जाती हैं, जिनका उल्लेख कभी पंचांग में आता है तो नया विद्यार्थी विचार में पड़ जाता है कि ये क्या है, इस कारण यहाँ समझाया जाता है।

पंचक

जब चन्द्र कुंभ और मीन राशियों में होता है तो पंचक होता है। अर्थात् जब धनिष्ठा नक्षत्र का उत्तराद ( अन्त का आधा भाग ) और शतभिषा, पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद और रेवती नक्षत्र पर चन्द्र होता है तो पंचक कहलाता है।

इस पंचक में काम करने का फल पचगुना होता है अर्थात् पचगुनी हानि होती है। घर छाना, प्रेत दाह, घास लकड़ी आदि इकज करना, खाट बुनना, चूल्हा बनाना आदि कार्य पंचक में करना मना है, क्योंकि कहा जाता है कि पंचक में कोई काम करने से पाँच बार बड़ी काम करना पड़ेगा। आवश्यक कार्य प्रेत दाह आदि करना होता है तो उसका फल कम करने को-पूथक विधान बताया गया है। दक्षिण यात्रा में भी यह वर्जित है।

द्विपुष्कर और त्रिपुष्कर योग

मृत्यु, विनाश, वृद्धि आदि का फल इसमें दुगुना या त्रिगुना होता है जैसे त्रिपुष्कर में कोई वस्तु घूमें तो ३ वस्तु घूमेंगी। द्विपुष्कर में कोई हानि हो तो २ बार हानि होगी। इसी प्रकार सबका विचार होता है। अर्थात् द्विपुष्कर में हानि या लाभ दुगुना और त्रिपुष्कर में त्रिगुना होता है।

६०

८० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

द्विपुष्कर योगत्रिपुष्कर योग
तिथिवार
शनिवार
मंगलवार
१२रविवार
कृतिका, उत्तराषाढ़ा योग होते हैं ।

मुहूर्त—दिनमान—१५=१ मुहूर्त

मुहूर्त लगभग २ घड़ी का होता है। दिनमान के प्रमाण से उसका १५ वां भाग करना तब एक मुहूर्त होता है। दिनमान के प्रमाण से मुहूर्त २ घड़ी से कम या अधिक भी हो जाता है। दिन में १५, रात में १५, सब ३० मुहूर्त दिन रात में होते हैं।

मुहूर्त चक्र

वाररविवारचंद्रवारभौमवारबुधवारगुरुवारशुक्रवारशनिवार
कुलिक ( दुर्गुहूर्त )१४ वां१२१०
कालवेला१४१२१०
यमघंट१०१४१२
कंटक१४१२१०
यमाई१५

जैसे रविवार को १४ वां मुहूर्त कुलिक है, ८ वां मुहूर्त कालवेला है, १० वां यमघंट है इत्यादि इस चक्र के अनुसार जानो। इस चक्र में यह बताया है, कौन वार को गिनती में कौन से मुहूर्त का क्या नाम है।

मुहूर्त निकालना ।

वर्तमान वार से शनि तक गिनो२२=कुलिक} यं मुहूर्त शुभकार्य में वजित हैं ।
"बुधवार"
"गुरुवार"
"मंगल"

जैसे रविवार हैं शनिवार तक गिना=७ X २=१४ वां मुहूर्त कुलिक हुआ ।

कालवेला में यात्रा करने से मृत्यु, विवाह में स्त्री विधवा हो, व्रतबन्ध में यह योग हो तो ब्रह्महत्या होती है। इससे सब कार्यों में कालवेला वजित है।

यमाई—वारवेला

दिन में ४ प्रहर होते हैं। १ प्रहर=लगभग ८ घड़ी का होता है।

यमाई=३ प्रहर=४ घड़ी

दिनमान—८=यमाई घटी दिन की

रात्रिमान—८= , रात्रि की

दिन मान कभी-कभी २, १६ घटी का होता है। इस कारण उपरोक्त विचार में यमाई ४ घटी का बताया है परन्तु दिन मान के ठीक विभाग करने से दिनमान की

अध्याय १७ : ८१

और रात्रिमान से रात्रि की यमाई की घटी निकल आती है। दिन रात में सब मिलाकर ८ यमाई होते हैं। यमाई को ही बारबेला कहते हैं। इसमें दिन और रात का पृथक् २ चौषडिया दिया रहता है और उस चौषडिया का नाम भी दिया रहता है। उसका फल नाम सद्रूष होता है। नीचे चौषडिया दिया है उसमें चौषडिया का नाम संकेताक्षर में दिया है वे ये हैं।

च=वर अ=अमृत शु=शुभ उ=उद्देश्य ला=लाभ का=काल रो=रोग ।

ये ७ ही हैं नाम सद्रूष इनका फल होता है। दिन में ७ यमाई होते हैं फिर आठवें यमाई में वही पहिला मुहूर्त आता है। इस प्रकार आगे क्रमानुसार सब मुहूर्त होते हैं।

दिन का चौषडिया

रविचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
वारवारवारवारवारवारवार
रोलाशुका
कारोलाशु
लाशुकारो
रोलाशुका
कारोलाशु
शुकारोला
रोलाशुका
रोलाशुका

रात का चौषडिया

रविचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
वारवारवारवारवारवारवार
कारोलाशु
लाशुकारो
रोलाशुका
कारोलाशु
शुकारोला
रोलाशुका
रोलाशुका
कारोलाशु

८२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

इतवार के दिन को पहिले यमाई में उद्देश्य, दूसरे में चर, तीसरे में लाभ इत्यादि क्रमानुसार मुहूर्त यमाई में शोभते हैं। जैसे मंगलवार को दिनमान २९ घ.-२० प. है \div ८ = १ यमाई ३ घ. ४० प. का हुआ। मान लो इष्ट ८ घड़ी है तो ७-२० तक २ यमाई पूरे होकर तीसरा यमाई वर्तमान है। मंगलवार को तीसरा=च=चर मुहूर्त हुआ। इसी प्रकार मुहूर्त निकाल लेना।

राहु वारवैला और कालवैला

यमाई पर से और भी विचार

वाररवि वारसोम वारमंगल वारबुध वारगुरु वारशुक्र वारशनि वार
यमाई-राहु का वारवैला४ चौथा
दिन का कालवैला५ वां१-८
रात्रि ,, ,,६ छठवां१-८

यहाँ बताया है कि किस दिन के कौन से यमाई में राहु का वारवैला होता है और दिन के या रात्रि के कौन से यमाई को कालवैला कहते हैं।

नक्षत्र विषघटी

४-४ घटी की विषघटी होती है।

नीचे नक्षत्रों के आगे विषघटी दी है उससे ४ घटी आगे तक विषघटी रहती है।

नक्षत्र विषघटी चक्र

क्रम नक्षत्रघटीक्रम नक्षत्रघटीक्रम नक्षत्रघटीक्रम नक्षत्रघटी
१ अश्विनी५०८ पुष्य२०१५ स्वाती१४२२ श्रवण१०
२ भरणी२४९ आश्लेषा३२१६ विशाखा१४२३ धनिष्ठा१०
३ कृत्तिका३०१० मघा३०१७ अनुराधा१०२४ शतभिषा१८
४ रोहिणी४०११ पू. फा.२०१८ ज्येष्ठा१४२५ पू. भा.१६
५ मृगशिर१४१२ उ. फा.१८१९ मूल५६२६ उ. भा.२४
६ आर्द्रा२११३ हस्त२१२० पू. वा.२४२७ रेवती३०
७ पुनर्वसु३०१४ चित्रा२०२१ उ. वा.२०

जैसे अश्विनी नक्षत्र में ५० घड़ी उपरांत ४५ घड़ी तक या रेवती में ३० घड़ी उपरांत ३४ घड़ी तक उस नक्षत्र में विषघटी होती है। इसका विचार नक्षत्र की घटियों पर से करना। नक्षत्र जब से आरम्भ हो उसके बाद ये घटियाँ गिन कर विष घटी निकाल लेना।

अध्याय १७ : ८३

वार विषष्टी

वारसूर्यवारचन्द्रवारमंगलवारबुधवारगुहवारशुक्रवारशनिवार
घटी२०१२१०२५

तिथि विषष्टी

तिथि१०१११२१३१४१५
घटी१५१११११३१४

विषष्टी नक्षत्र वार या तिथि में पूरी ४ घड़ी तक रहती है। ये शुभ कार्यों में वजित है।

यदि नक्षत्र आदि में पूरा ६० घटी का मान न हो तो अनुपात से (त्रैराशिक से) घटी निकाल लेनी चाहिये और तिथि या वार नक्षत्र आरम्भ होने के बाद इतनी घटी ( जो विषष्टी में बताई है ) गिनो, उसके आगे ४ घटी तक और विषष्टी रहेगी।

विषष्टी दोष नाश—यदि चंद्र केन्द्र या त्रिकोण में बली हो या लगनेश शुभ ग्रह युक्त हो तो विषष्टी का दोष नहीं लगता।

गंड

राशि चक्र में किसी राशि के साथ किसी नक्षत्र का भी अन्त होता हो तो उस स्थान को गंड कहते हैं अर्थात् जहाँ दोनों का अंत हो ( केवल १ का नहीं )।

जैसे—(१) मेष राशि के आरम्भ और मीन राशि के अन्त का सन्धि स्थल—गंड है।

(२) कर्क राशि और आश्लेषा के अन्त पर व सिंह राशि और मघा के प्रारम्भ में।

(३) वृश्चिक राशि और ज्येष्ठा के अन्त पर व धन राशि और मूल के आरम्भ

में। इन तीनों गंड का नाम १ संघ्या गंड, २ राशि गंड, ३ दिवा गंड।

गंडांत [ नक्षत्र ]

नक्षत्रमघा, आश्लेषामूल, ज्येष्ठाअश्विनी और रेवती
घटी२+२=४ घटी२+२=४ घटी२+२=४ घटी

इन नक्षत्रों के आदि की २ घटी और अन्त की २ घटी इस प्रकार ४ घटी का एक [ प्रत्येक ] गंडांत होता है।

मूल—जन्म समय में मूल लगे हैं या नहीं इसका विचार।

ऊपर जो ६ नक्षत्र गंडांत के बताये गये हैं उन्हीं में मूल लगते हैं। वे नक्षत्र ये हैं १ आश्लेषा, २ मघा, ३ ज्येष्ठा, ४ मूल, ५ रेवती, ६ अश्विनी।

इन नक्षत्रों में बालक का जन्म होने से मूल लगता है। मूल भी यदि प्रकार के हैं। गंडांत में बालक का जन्म हो तो पिता को कुछ समय तक बालक का मुख न

८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

देखना चाहिये। जब मूल की शान्ति करने का समय हो जावे तब शान्ति कराकर मुख देखने का विधान है। इसका विचार फलित और मूहूर्त खण्ड में विशेष प्रकार से मिलेगा।

भद्रा

विशिष्ट करण को भद्रा कहते हैं यह शुभ कार्य में वर्जित है। विष, घात, तान्त्रिक कार्य में भद्रा में कार्य करने का विचार होता है। युद्ध, राजदर्शन, दैव बुलाना, जल तरना, शत्रु उच्चाटन, स्त्री सेवन, यज्ञ कार्य में इसका विचार करना पड़ता है।

इन तिथियों में भद्रा होती है—

पक्षशुक्ल पक्षकृष्णपक्ष
तिथि८, १५४, ८
पूर्वाह्नपराह्न

तिथि के आधे भाग में ही भद्रा होती है। इसका मोटा प्रमाण ३० घटी का होता है। भद्रा के आरम्भ और अन्त समय [ घटी पल ] पंचाङ्ग में दिया रहता है।

अंग में भद्रा का वास इस प्रकार समझा जाता है।

अंगमुखकंठछातीनाभिकटिपुच्छ
घटी११
फलकार्यनाशसरणधननाशबुद्धिनाशकलहविजय

वृश्चिकी भद्रा=शुल्क पक्ष की भद्रा=कोई रात्रि की भद्रा को ही वृश्चिकी कहते हैं।

सर्पिणी " =कृष्ण " = ' दिन " " सर्पिणी "

आवश्यक कार्य में सर्प का मुख और वृश्चिक की पूँछ का एक भाग त्याग कर कार्य कर सकते हैं।

चन्द्र की राशि के अनुसार भद्रा का वास

चन्द्रराशिलोकफलविशेष
१, २, ३, ८,स्वर्गशुभधन धान्य मिले
६, ७, ९, १०पातालशुभधन प्राप्ति
४, ५, ११, १२,मृत्युअशुभकार्य सिद्ध नहीं हो।

तिथि और नक्षत्र आदि के योग—

योगति.१०१११२१३१४१५३०
१ तिथि स्वामीअनिब्रह्मागौरीगणेशशेवनागकातिकेयरविशिवअ.दुर्गाकालविश्वदेवाविष्णुकामशिवचन्द्रपितर
२ तिथि संज्ञानंदाभद्राजयारिक्तापूर्णानं.भ.धनअ.रिक्तापू.नंदाभ.जयारिक्तापूर्णा
३ शुन्य रुक्मदुलासिद्धमि.धनअ.कर्कधनवृष
(विवध तिथि में)भकरमकरकन्याकर्कअ.सिद्धमीनमीन
४ निमित्त नक्षत्रउ.वा.अनुतीनोंमघारो.हस्तपू.भा.कुरोहिणीअ.वि. स्वा.
उत्तरामूला
५ पक्षरुद्ध तिथितिथि१२१४
दोनों पक्ष की
वर्जित घटो...घटी(८)(९)(१४)(२५)(१०)
६ दग्ध तिथिधनवृषमेघमि.मि.कन्यासिद्धवृ.तुला
सूर्य राधाकीमीनकुम्भकर्कमकर
७ शुभ कार्य मेंहस्तमृगअ.अनु.पुष्यरेवतीरोहिणी
वर्जित योगरविसोममङ्गलबुधगुरुशुक्रशनि
न दग्ध योगमङ्गलगुरुशुक्रशनिशनिसोमरवि
९ विश्व योगबुधरविसोममं.गुरुशुक्रश.शुक्रश.
१० हूताशन योगसोममङ्गलबुधगुरुशुक्रशनिरवि
११ ज्वालागुढीअनु.उत्तरारोहिणीकु.

अध्याय १७ : ५२

८६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

ये योग शुभ कार्य में दक्षित हैं नाम सद्गुण फल होता है। पशुपक्ष की तिथि की दक्षित घटी छोड़कर उसकी शेष घटी ले सकते हैं।

मास तिथि नक्षत्र योग—

योगचैत्रवैशाखजेष्ठअषाढ़श्रावणभादोंकुंवारकार्तिकअगहनपुषमाघफाल्गुन
१ शून्य तिथि दोनोपक्षाकी ८-९१२२-३१-२१०-११७-८४-५
शून्यतिथि कृष्ण पक्ष१४
शून्यतिथि शुक्लपक्ष१३१४३-४
२ शून्य नक्षत्रअ. रो.चि. स्वा.च. वा.पू. वा.च. वा.श. रा.पू. भा.म. वि.आर्द्राश. भ.
पुष्यघ. मि.श. रे.कू.चि.अ. ह.मू. ल्ये.
३ शून्य राशिकुंभमीनवृषमि.मे.कन्यावृ.तुलाघनकर्कमकरसिंह
४ मन्वादि तिथिशुक्लशु.शु.शु.कू.शु.शु.शु.शु.शु.शु.शु.
३-१५१४१०-१५३०-८१५-१२१११५
५ युगादि तिथिशुक्ल ३कू. १३शु. ९कू. ३
शैलाद्वापरसप्तशुगकालशुग

शून्य तिथियों को मास दग्ध तिथि भी कहते हैं। शून्य नक्षत्र राशि और मन्वादि तिथि और युगादि तिथि शुभ कार्य में दक्षित हैं,

घन नाशक हैं।

बध्याय १७ : ८७

तिथि वार नक्षत्र के योग=चर योग

योग | रवि. | सोम. | मंगल. | बुध. | गुरु. | शुक्र. | शनि. | ---|---|---|---|---|---|---|---|--- १ सिद्धि योग | | — तिथि | जया (३, ८, १३) | भद्रा (२, ७, १२) | पूर्णा (५, १०, १५) | नंदा (१, ६, ११) | रिक्ता (४, ९, १४) | सब दोषों का नाश करता है २ मृत्यु योग ] (अग्रमयोग] | नंदा | भद्रा | नंदा | जया | रिक्ता | भद्रा | पूर्णा | घातक है । शुभ कार्य में वजित है । ३ दग्ध नक्षत्र | भरणी | चित्रा | उ. वा. | धनि. | उ. फा. | ज्ये. | रेवती | शुभकार्यमें वजित। ४ क्रकच योग | ति. १२ | ११ | १० | ९ | ८ | ७ | ६ | तिथि वार मिलकर १३ होने में यह योग होता है शुभ में वजित है ५ सम्बर्तक योग | सप्तमी | — | — | प्रति. | — | — | — | सदा वजित ६ दग्ध योग | ति. १२ | ११ | ५ | ३ | ६ | ८ | ९ | ७ विष योग | ,, ४ | ६ | ७ | २ | ८ | ९ | ७ | ८ हृत्ताशन योग | ,, १२ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | ९ यमघंट योग | मघा | विशा. | आर्द्रा | मूल | कृति. | रोहि. | हस्त. | शुभ कार्य, यात्रा में वजित १० उत्प्रात योग | विशा. | शत. | धनि. | रेवती | रोहि. | पुष्य. | उ. फा. | ११ मृत्यु नक्षत्र | ज्ये. | उ. भा | पू. भा. | भर. | आर्द्रा | मघा | चित्रा. | १२ यमद्वन्द्व योग | मघा | मूल | कृ. | पू. पा. | रेव. | रोहि. | श्रवण | शुभ कार्य में वजित | धनि. | विशा. | म. | पुन० | श्रवि. | अनु. | शत. | १३ चर योग | पू. पा. | आर्द्रा. | वि. | रो. | पुष्य | म. | मूल | १४ मूसलवज्र योग | भरणी | चि. | उ. वा. | धनि. | उ. फा. | ज्ये. | रेव. | १५ अमृतसिद्धि,, | हस्त | मृग. | अश्वि | अनु. | पुष्य | रेवती | रोहि. | १६ सर्वार्थसिद्धि,, | हस्त | अ. | अश्वि | रोहि. | रेवती | रे. | अ. | | मूल | रोहि. | उ. भा. | अनु. | अनु. | अनु | रोहि. | इन में सब कार्य | तीनों | मृग. | कृ. | हस्त | अश्वि | अश्वि | स्वा. | की सिद्धि होती है | उत्तरा | पुष्य. | श्ले | कृ. | पुष्य | पुन. | | | अश्वि. | अनु. | | मृग. | पुन० | श्रवण | |

८८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

तिथि चार या नक्षत्र के योग से विशेष योग बनते हैं। सिद्धि योग को छोड़ कर और सब अशुभ योग हैं।

(१) सिद्धि योग, (१५) अमृत सिद्ध योग (१६) सर्वार्थ सिद्धि योग, सर्व दोष नाशक और कार्य सिद्ध करते हैं। (२) मृत्युयोग, घातक तिथियाँ हैं और सब अशुभयोग शुभ कार्यों में वर्जित हैं। (४) क्रूरक योग में तिथि और दिन मिलकर १३ होने से शुभ कार्य में वर्जित है।

(५) सम्बर्तक योग सदा वर्जित है।

उपरोक्त मृत्युयोग में १२ घटी और यम घंट में ८ घटी वर्जित करना १ उपर्युक्त अशुभ योगों में आवश्यक होने पर मध्याह्न के उपरान्त कार्य करने में अशुभता घट जाती है। यदि चन्द्र शुभ हो तो मृत्यु, क्रूरक, दग्ध आदि योगों का अशुभ फल नहीं होता। विशेष कर यात्रा में इसका विचार होता है। दुष्ट योग और सिद्ध योग एक साथ पड़े तो अच्छा योग होकर दुष्ट फल को नष्ट करता है।

आनन्द आदि योगों का ज्ञान और फल

आनन्द आदि २८ योग हैं

क्रमनामफलक्रमनामफल
आनन्दसिद्धि१५लुम्बधन क्षय
कालवृण्डमृत्यु१६उत्पातप्राण नाश
धूम्रअसुख१७मृत्युमृत्यु
घातासौभाग्य१८काणकलेश
सौम्यवृद्ध सुख१९सिद्धकार्यसिद्धि
ध्वंशधन नाश२०शुभकल्याण
केतुसौभाग्य२१अमृतराज सन्मान
श्रीवत्ससौभाग्य सम्पत्ति२२मुसलधन क्षय
वज्रक्षय२३गदअक्षय विद्या
१०मुद्गरलक्ष्मी क्षय२४यातंगकुलवृद्धि
११क्षत्रराज्यमान२५रक्ष (राक्षस)महाकष्ट
१२मित्रपुष्टि२६चरकार्यसिद्धि
१३मानससौभाग्य२७सुस्थिरग्रहार्भ
१४पद्मधनागम२८प्रवर्धमानविवाह

इन योगों को जानने की रीति

रवि को अश्विनी से, सोमवार को मृगशिर से, मंगल चार को आश्लेषा से, बुधवार को हस्त से, गुरुवार को अनुराधा से, शुकवार=३. वा., शनि=शतभिषा से गिने तो आनन्द आदि योग मिलता है। इसमें अभिजित भी गिना जाता है। नीचे चक्र में यही समझाया है।

अध्याय १७ : ८९

आनन्द आदि योग चक्र

योग

क्रमक्रमरविवारसोम०मंगलबुधगुरुशुक्रशनि
नक्षत्रन०न०न०न०न०न०
१-अश्विनी१३१७२१२५
२-भरणी१०१४१८२२२६
३-कृतिका१११५१९२३२७
४-रोहिणी१२१६२०२४२८
५-मृगशिर१३१७२१२५
६-आर्द्रा१०१४१८२२२६
७-पुनर्वसु१११५१९२३२७
८-पुष्य१२१६२०२४२८
९-आश्लेषा१३१७२१२५
१०१०-मघा१४१८२२२६
११११-पू० फा०१५१९२३२७
१२१२-उ० फा०१६२०२४२८
१३१३-हस्त१७२१२५
१४१४-चित्रा१८२२२६१०
१५१५-स्वाती१९२३२७११
१६१६-विशाखा२०२४२८१२
१७१७-अनुराधा२१२५१३
१८१८-ज्येष्ठा२२२६१०१४
१९१९-मूल२३२७१११५
२०२०-पू. वा.२४२८१२१६
२१२१-उ. वा.२५१३१७
२२२२-अभिजित२६१०१४१८
२३२३-श्रवण२७१११५१९
२४२४-धनिष्ठा२८१२१६२०
२५२५-शतभिषा१३१७२१
२६२६-पू. भा.१०१४१८२२
२७२७-उ. भा.१११५१९२३
२८२८-रेवती१२१६२०२४

१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

विवरण—

योग का क्रम आरम्भ में जो दिया है वह योग का क्रमानुसार अंक है। उस क्रम में कौन योग आता है ऊपर दिया है। दिन के नीचे जो अंक हैं वे नक्षत्र के क्रम के अंक हैं। इष्ट दिन जो चन्द्र नक्षत्र हो उस नक्षत्र के क्रम का अंक उस दिन के नीचे जहाँ मिलेगा उसके बाईं ओर जो योग का अंक होगा वही क्रम के अनुसार उस दिन योग होगा।

जैसे मंगलवार को पुष्य नक्षत्र है तो उस दिन कौन सा योग होगा जानना है।

पुष्य नक्षत्र के क्रम का अंक ८ है। मंगलवार के नीचे ८ अंक खोजने से प्रकट हुआ कि सब के अन्त में ८ दिया है। ८ के बाईं ओर योग देखा तो योग का क्रम २८ मिला। २८ वॉ योग प्रबर्द्धमान होता है, इससे प्रगट हुआ कि उस दिन यह योग था। उसका फल विवाह है अर्थात् अच्छा फल है, आनन्द का दिन है।

सूर्य नक्षत्र के विशेष नाम

अश्विनी से लेकर ४ नक्षत्र तक अंतरंग इसके उपरान्त ३ नक्षत्रों की बहिर्ग संज्ञा है। इसके उपरान्त ४ नक्षत्र फिर अंतरंग कहलावेगे। इसी क्रम से वर्तमान सूर्य नक्षत्र तक गिनकर देखना कि वर्तमान नक्षत्र अंतरंग है या बहिर्ग।

अंतरंग में बाहर से घर में जाना, बहिर्ग में घर से बाहर ले जाना। पशु आदि को अवर जाना या बाहर भेजना इसके अनुसार मुहूर्त में विचार होता है।

सूर्य नक्षत्र संख्या

संज्ञा नक्षत्र

अंतरंग नक्षत्र अश्वि. भ.कृ.रो. पुष्य श्ले.म.पूषा. स्वा.वि.अनु.ज्ये. अभि.अ.ध.शत. बहिर्ग ,, मृग,आर्द्रा पुन० उफा.ह. चित्रा मृ. पूषा. ञषा. पूषा. उषा. रे समय विभाग संज्ञा

१ दिन में=१५ मुहूर्त। १ मुहूर्त=लगभग २ घड़ी का।

दिन विभागप्रातःकालसंयममध्याह्नअपराह्नसायंकाल
घड़ी तकसूर्योदय सेउपरान्तउपरान्तउपरान्तउपरान्तउपरान्त
३ घड़ी तक३ मुहूर्त तक३ मुहूर्त तक३ मुहूर्त तक३ मुहूर्त तक३ मुहूर्त तक३ मुहूर्त तक
सूर्य अस्त से(सायं)संध्या प्रदोषमहानिशाउपाकालअरुणोदयप्रातः काल
समय३ घड़ी तकउपरान्त अर्द्ध रात्रि५५ घड़ी५७ घड़ी५८ घड़ी
३ मुहूर्त कीमध्यमेंमेंमें
तककी २ घड़ी

५८ घड़ी के उपरान्त सूर्योदय, सूर्योदय से ३ घड़ी तक प्रातः संध्या और सूर्यास्त से ३ घड़ी तक सायं संध्या भी कहलाती है।

अध्याय १८

पंचाङ्ग कैसे देखना और उपयोग

जिस सम्बत् का वह पंचाङ्ग होता है आरम्भ में ऊपर की ओर वह सम्बत् और शाका दिया रहता है। प्रत्येक पृष्ठ पर चांद्र मास पक्ष ऋतु अयन और गोल भी दिया रहता है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी महिने का नाम और सन् ऊपर दाहिनी ओर दिया रहता है।

चैत्र शुक्ल से वर्ष आरम्भ होता है। उसमें नीचे कई प्रकार की खड़ी पंक्तियाँ दी रहती हैं। उनमें से प्रत्येक को समझाते हैं।

(१) तिथि—आरम्भ में तिथि रहती है। शुक्ल पक्ष में १ से १५ तक और कृष्ण पक्ष में १ से १४ और ३० (अमावस्या) दी रहती है। बीच में जो तिथि होनि होती है वह पंचाङ्ग में नहीं दी रहती। जो तिथि वृद्धि होगी वह २ बार लिखी मिलेगी। १५ तिथि को पूर्णिमा और ३० को अमावस्या सर्वैव समझना।

(२) वार—उसके आगे की पंक्ति में वार दिया रहता है। वार का नाम सकेताक्षर में लिखा रहता है। र=रविवार या सूर्य=सूर्यवार ( रविवार=इतवार ), च=चंद्रवार ( सोमवार ), म=मंगलवार या भी=भीमवार, बु=बुधवार, ग=गुहवार या वृ=वृहस्पति-वार ( गुरुवार ), शु=शुक्रवार या भू=भृगुवार ( शुक्रवार ) शन=शनिवार; इस प्रकार दिन का नाम पढ़ लेना। उस तिथि को कौन वार है या वार के अनुसार उस दिन कौन तिथि है जान लेना।

(३) घड़ी पल—आगे की पंक्ति में तिथि की घड़ी पल दिया है। पहिली पंक्ति में जो तिथि दी है वह कितने घड़ी पल तक है इससे प्रगट होता है। सूर्योदय के उपरान्त उतने घड़ी पल तक वह तिथि रहेगी ऐसा समझना। जैसे ४१७०४-१२ दिया है, इससे प्रगट होता है कि शनिवार को चौथ सूर्योदय के उपरान्त ४ घड़ी ०२ पल तक है। उसके उपरान्त उसी दिन पंचमी लग जायगी। वह पंचमी कब तक रहेगी उसके आगे दिन में लिखा होगा जैसे ५१०८-४८ अर्थात् इतवार को सूर्योदय उपरान्त ८ घड़ी ४८ पल तक पंचमी रहेगी। इसके उपरान्त इतवार को ही छट लग जायगी।

१२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

पंचाङ्ग में जा बड़ी पल दिया रहता है उसके घंटा मिनट बना लो तो प्रगट हो जायगा कि सूर्योदय के उपरान्त उतने घण्टा मिनट तक वह तिथि रहेगी। उसमें सूर्योदय का समय जोड़ दो तो घड़ी के अनुसार उस तिथि के अन्त होने का समय जाना जा सकता है। पंचाङ्ग में ही सूर्योदय का समय दिया रहता है। जहाँ सूर्य उदय दिया है संकेताक्षर सू. उ. लिखा रहता है।

जैसे शनिवार को चौथ ४ घं १२ पं है४ घड़ी X ३६ = १४०
मान लो उस दिन ६ बजे सूर्योदय था तो ४१२ पल X ३६ = ४३२
घं १२ पं के १ घं ४ मि० ४८ से०योग १४०-४८
हुए। इसमें सूर्योदय के ६ घंटा जोड़े तो ७+ सूर्योदय ६-०-०
घं ४० मि ४८ से० हुए। इस समय तकयोग ७-४०-४८
उस दिन चौथ तिथि रहेगी।

घड़ी पल के घण्टा मिनट और घण्टा मिनट के घड़ी पल बनाने का अभ्यास कर लेना चाहिए, क्योंकि इनका अधिक काम पड़ता है। घड़ी पल के घण्टा मिनट या घण्टा मिनट के घड़ी पल बनाने का चक्र आगे दिया है। इस चक्र में घड़ी आदि के घण्टा आदि बनाने का एक चक्र है और घण्टा आदि के घड़ी पल बनाने का दूसरा चक्र है। पहिले चक्र में जो घड़ी दिया है उसका उत्तर घंटा मिनट में आयगा, यदि पल है तो उत्तर मिनट सेकण्ड में आयगा। विपल है तो सेकण्ड में उत्तर आयगा।

इसी प्रकार दूसरे चक्र में दिया हुआ घण्टा का उत्तर दिन घड़ी पल में, मिनट का घड़ी पल में और सेकण्ड का पल विपल में उत्तर आयगा।

जैसे ११ घंटा १० मिनट ८ से०३१ घड़ी ४० पल ५ विपल
११ घंटा= दिन-घड़ी-पल वि०३१ घड़ी=घं मि० से०
०-२७-३०-०१२-२४-०
१० मिनट= ०-२५-०४० पल= १६-०
८ सेकण्ड= ०-२०-०५ विपल= २-०
योग=०-२७-५५-००-०योग=१२-४०-२
८ दिन २७ घड़ी २५ पल २० विपल=१२ घंटा ४० मि० ० से०

यदि अपने पास यह तुलनात्मक चक्र बना कर रख लीं तो अच्छा होगा।

घंटा और घडी का तुलनात्मक चक्र--

वि.=से.

~~ 0-0

क्र 9 XN 6«0 २०॥ ० 99 24

~ -2 ७ ०० 3

“0 0८“090 ० 4

“0 x

“0 -८००,०७ NGM OW २८ उ 2.०“. 3 22 “० ० ९० खा ७४०८१6 २१ मद७३८ण 7

घड़े: के घंटा

x

२४

वि.ऱसे. > सेकेण्ड=पल वि.

३१ १२ २४ १ ० २

३२ १२ ४८ २ ० श्र

३३ १३१२ ३ ० ७

३४ १३ ३६ ४ ० १०

३५ १४ ० ५ ० १२

३६ १४ २४ ६ ० १५

३७ १४ अद ७ ० १७

३८ १५१२ ८ ० २०

३९ १५३६ ९ ० २२

४० १६ ० १० ० २५

४१ १६ २४ ११ ० २७

४२ १६ ४८ १२ ० ३०

४३ १७ १२ १३ ० ३२

४४ १७३६ १४ ० ३५

४५ १८ ० १५ ० ३७

४६ १८ २४ १६ ० ४०

४७ पृष ४८ १७ ० ४२

४८ १९१२ १८ ० ४५

४९ १९३६ १९ ० ४७

५० २० ० २० ० ४५०

पप २०२४ २१ ५२

५२ २० ४८ २२ शश

५३ २११२ २३ ० ५७

५४ २१ ३६ २४ १ °

५५ २२ ० २५ १ २

५६ २२२४ २६ १ ५

५७ २२ ४८ २७ १ ७

५८ २३ १२ २८ १ १०

५९ २३ ३६ २९ १ १२

२४५ ० ३० १ १५

पचांग कसे देखना और उपयोग : ९३

घंटा की घड़ी

घड़ी=घंटा मिनट घड़ी=घंटा मिनट घंटा=दिन घड़ी पल घंटा=दिन घड़ी

पल=मिनट सेकेण्ड पल=मिनट सेकेण्ड मिनट=घटी पल विपल मि.=घड़ पल

% से.=पल वि.

३० ३११ १७

० ३२१ २०

३० ३३१ २२

० ३४१ २५

३० ३५१ २७

० ३६१ ३०

३० ३७ १ ३२

० ३८ १ ३५

३० ३९१ २७

० ४० १ ४०

३० ४१ १ ४२

० ४२१ ४५

३० ४५३ १ ४७

० ४५४१ ५०

३० ४५१ ५२

० ४६१ ५५

३० ४७१ ५७

० ४५८२ ०

३० ४९ २ २ ० ५०२ ५

३० ५१२ ७

० ५२२ १०

३० ५३ २ १२

० ५४२ १५

३० ५५२ १७

० ५६२ २०

३० ५७२ २२

० श८ २ २५

३० ५९२ २७

० ६०२ २०

१४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, प्रारम्भिक ज्ञान खण्ड

(४) नक्षत्र-इसके उपरान्त नक्षत्र दिये रहते हैं। नक्षत्रों के नाम संकेताक्षरों में दिये रहते हैं। जैसे अ=अश्विनी, भ=भरणी, क=कृतिका इत्यादि। इन नक्षत्रों के नाम अच्छे प्रकार स्मरण रखना चाहिए। सब के नाम क्रम पूर्वक दिये रहते हैं। इसमें अभिजित नहीं रहता, २७ ही नक्षत्र दिये रहते हैं।

कभी-कभी एक ही संकेताक्षर के २ नक्षत्र होते हैं, परन्तु किसके बाद कौन नक्षत्र आता है स्मरण रखोगे तो भूल नहीं होगी। जैसे आ=आर्द्रा के बाद पु=पुनर्वसु, इसके बाद पु=पुष्य। इसी प्रकार पूर्वा और उत्तरा ३ बाद आता है। कहीं-कहीं पूर्वा को पू० और उत्तरा को उ० ही दिया रहता है। यदि क्रम स्मरण रहे तो कभी भूल नहीं होगी। जैसे माघ के बाद फाल्गुन आता है उसी प्रकार म=मघा के उपरान्त पू=पूर्वा फाल्गुनी, उ=उत्तरा फाल्गुनी आते हैं। जिस प्रकार जेठ के बाद असाढ़ आता है उसी प्रकार ज्येष्ठा और मूल के बाद पूर्वाषाढ़ा आता है। ज्ये=ज्येष्ठा, मू=मूल के बाद, पू=पूर्वाषाढ़ा, उ=उत्तराषाढ़ा होगा। श्रावण के बाद भाद्रपद मास आता है उसी प्रकार श्रवण धनिष्ठा शतभिषा के उपरान्त पूर्वा भाद्रपद आयगा। श्र=श्रवण, ध=धनिष्ठा श=शतभिषा, पू=पूर्वाभाद्रपद, उ=उत्तरा भाद्रपद है। अन्त में रे=रेवती आती है, अश्विनी और अनुराधा दोनों के लिए म० लिखते हैं। रेवती के बाद अ=अश्विनी, विशाखा के बाद अ=अनुराधा होता है। कभी-कभी अनुराधा को अनु भी लिख देते हैं।

पंचाङ्ग में कभी-कभी एक नक्षत्र ६० घड़ी से अधिक रहने के कारण दूसरे दिन भी दिया रहता है। नक्षत्र के आगे घड़ी पल दिए हैं जिससे प्रगट होता है कि सूर्योदय उपरान्त वह नक्षत्र उस दिन उतने घड़ी पल तक रहेगा उसके बाद आगे के नक्षत्र का भोग समझना। जैसे सोमवार को मघा ६-५७ है तो सूर्योदय से ६ घ० ५७ प० बाद तक मघा नक्षत्र रहेगा, उसके बाद आगे का नक्षत्र पूर्वा फाल्गुनी उसी दिन लग जायगा। दिन रात के ६० घड़ी में से ६-५७ घटा दो तो शेष ५३ घ० ३ पल तक उस दिन पूर्वा फाल्गुनी रहेगा। अब देखना है कि पूर्वा फाल्गुनी कब तक और है। उसके आगे दिन मंगलवार को देखा तो पूर्वा फा० १३।२४ लिखा है अर्थात् मंगलवार को पू० फा० इतना और है। पू० फा० सोमवार को (५३-३) + मंगलवार को (१३-२४) = योग ६६ घ० २७ प० यह पूर्वा फाल्गुनी के पूरे भाग का मान हुआ। इसे भभोग अर्थात् पूर्ण नक्षत्र का भोग कहते हैं। पूर्ण नक्षत्र की जितने घड़ी पल भोग हो उसे भभोग या सर्वर्ध भी कहते हैं। जितना नक्षत्र व्यतीत हो चुका अर्थात् भूक्त हो चुका उसे भयात (भभूक्त) या भूक्तर्ध या गतर्ध कहते हैं। भोगने को जो घड़ी पल शेष रहे उसे भोग्य या भोग्यर्ध कहते हैं। श्रद्धा=नक्षत्र। भूक्त + भोग्य=भगंभग्य=सर्वर्ध=पूरा नक्षत्र। भूक्त=भयात भूक्तर्ध=गतर्ध=जितनी घड़ी व्यतीत हो गई। भोग्य=भोग्यर्ध=जितनी घड़ी व्यतीत होने को शेष रही।

(५) योग—इसके आगे योगों के नाम दिये रहते हैं। योगों के नाम पहिले दे

पंचांग कैसे देखना और उपयोग : ९५

चुके हैं। पंचांग में योग के नाम का संकेताक्षर दिया रहता है। उनका क्रम स्मरण रखने से जाना जा सकता है कि संकेताक्षर किस नाम का सूचक है। इसमें कई जगह भूल हो जाना संभव है—जैसे हर्षण के बाद वन्वच्च, ध्यतीपात के बाद व वरीयान। साध्य के बाद शु=गुभ, फिर शु=शुक्ल। वच्च के बाद सि=सिद्धि, शिव के बाद सि=सिद्ध। ८३ अतिगंड। ऐसी अवस्था में आगे पीछे के संकेताक्षर देखकर बीच में कौन योग है जान सकते हैं।

पंचांग में क्रम देखते समय इसका भी ध्यान रहे कि बीच के कोई योग तो नहीं छूट गये। क्योंकि जो योग सूर्योदय पर होगा वही पंचांग में बताया जाता है। उसके आगे का और कोई योग भुक्त हुआ हो तो नहीं दिया रहता। परन्तु कोई कोई पंचांग वाले उसकी घड़ी पल भी दे देते हैं। जैसे शनिवार को वं० २-३९। इतवार को वि० १-९ सोमवार को आ० ४८-५७। अर्थात् शनिवार को वैधृति योग २-३९ है। इतवार को विष्कंभ १-९ है। इसके बाद प्रीति योग लगा, परन्तु पंचांग में प्रीति योग नहीं दिया केवल ५३-१५ दिया है। इससे प्रगट होता है कि प्रीति योग ५३-१५ तक है, उपरान्त आयुष्मान् योग लगा और सोमवार को वही आयुष्मान् ४८-५७ तक है। इन घड़ियों के पिछली बताई रीति से घण्टा मिनट बनाकर घड़ी का समय बना लो।

(६) करण—किसी-किसी पंचांग में दोनों करण दिए रहते हैं। पूर्व में जो करण है उसका नाम फिर उसकी घड़ी पल उपरान्त दूसरा करण (जो उत्तरार्द्ध में आता है) वह भी दिया रहता है और उसके घड़ी पल दिये रहते हैं। परन्तु अधिकतर पञ्चांगों में एक ही करण दिया रहता है। सूर्योदय पर जो तिथि होती है उसी तिथि का करण चाहे वह परार्द्ध या पूर्वार्द्ध का हो दिया रहता है। जैसे पञ्चांग में शुक्ल ७ (सप्तमी) ०—९ दिया है तां सप्तमी के अन्त का (उत्तरार्द्ध) करण वणिज होता है वह व. १०—९ दिया रहेगा। क्योंकि ०-९ पर तो तिथि का ही अन्त होने से करण का भी अन्त हो जायगा। मान लो कृष्ण ३ मंगलवार ४४-३७ तिथि दी है तो तीज को पूर्वार्द्ध में वणिज है वह दिया है व० १२-३५= वणिज करण का भोग्यपूर्ण तिथि का आधा दिया है वह इस प्रकार है। द्वितीया ४०-३९ सोमवार को थी ६०-(४०-३९)=१९-२१ तीज सोमवार को+४४-३७ तीज मंगल को=६३-५८ पूरी तीज=आधा ३१-५९ हुआ। मंगलवार को शेष तीज पञ्चांग में (४४-३७)-(३१-५९) आधा १ करण=शेष १२-३८। यह १२-३८ पहिले करण का और शेषने को रहा। इस कारण पञ्चांगमें व. १२-३८ दिया है —४४-३७

१२-३८ भुक्त करण

शेष ३१-५९=आगे का विष्टि करण परार्द्ध में होगा।

(७) दिनमान—इसके आगे पञ्चांग में दिनमान दिया रहता है। किसी-किसी पञ्चांग के अन्त में और किसी में पहिले इसे दे देते हैं। सूर्योदय से सूर्य अस्त तक