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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

राजयोग : ३४५

मेष लग्न में सूर्य, ककं का गुरु, मकर का मंगल-छग्त १,४,७ से ३ भेद हुए

(४)

३४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

स--कक में गुरु, तुला में शनि, मकर का मंगल--४,७,१० लग्न से ३ भेद ।

(९) (१०)

३--अब २ ग्रह स्त्रगृही उच्चगत केन्द्र में हों और ककं का चन्द्र हो तो १२ राज

. योग । मेष में सूये, १ ककं में चन्द्र गुरु, लग्न १,४ से २ भेद ।

'राजयोग : ३४७

२--मेष का सूयं, कर्के का चन्द्र तुला का शनि लग्न १,७ से २ भेद ।

३ ४

४--कर्क का चन्द्र और गुरु, तुला का शनि लग्न ४,७ से २ भेद ।

छ |

३४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फॉलित खण्ड

` ५--कर्क का चन्द्र गुर, मकर का मंगळ लग्त ४७ से २ भेद ।

६, तुला का शनि, मकर का मंगल कर्क का गुरु, छर्न ७,१० से २ भेद ।

११ १२

४--छग्न १, चंद्र सूर्य लग्न (गुरु चंद्र) लग्न शनि चंद्र लग्न मंगल चंद्र

४ १४ ४ ७७४१० १० ४

२ क

राजयोग ! ३४९.

३--जन्म लग्न में वर्गोत्तम हो ( जो लग्न हो वही नवांश में भी हो ) और चन्द्र को छोड़कर ४,५ या ६ ग्रह देखें तो २२ प्रकार के राजयोग होते हैं । इसी प्रकार चन्द्र वर्गोत्तम हो और ४ आदि ग्रहों से दृष्ट हो तो २२ प्रकार के राजयोग होते हैं । इस प्रकार ४४ प्रकार के राजयोग हो जाते हैं । द्रष्टा ग्रहों की संख्या के अनुसार भेद नीचे दिये हैं :-- |

(अ) ४ द्रष्टा ग्रह के १५ भेद (१) सूर्य, मंगळ, बुध, गुरु (६) सूर्य मंगळ शुक्र शनि (११) मंगळ बुध गुरु शुक्र

(२) सूयं, मंगल, वुध, शुक्र (७) सूर्य बुध गुरु शुक्र (२२) मंगल बुध गुरु शनि (३) सूर्य, मंगल, बुध, शनि (८) सूर्य बुध गुरु शनि (१३) मंगल बुध शुक्र शनि (४) सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र (९) सूर्य बुध शुक्र शनि (१४) मंगल गुरु शुक्र शनि (५) सूर्य, मंगल, गुरु, शनि(१०) सूयं गुरु शुक्र शनि (१५) बुध गुरु शुक्र शनि

ब__५ द्रष्टा ग्रह के ६ भेद

१-सू्यं मंगल बुध गुरु शुक्रः २-सूयं मंगल बुध शुक्र शनि ५-सूर्यं बुध गुरु शुक्र शनि २-सूर्य मंगल बुध गुरु शनि ३-सूर्यं मंगल गुरु शुक्र शनि 5-मंगल, बुध गुरु शुक्र शनि क--६ द्रष्टा ग्रह का १ भेद

१- सूर्य, मंगल, बुघ, गुरु, शुक्र, शनि ।

इस प्रकार १५य- ६+ १=२२ भेद हुए ।

इसका उदाहरण आगे दिया है।

३५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

Page 361 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 361)

३५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जब चन्द्रमा लग्न में न हो और लग्न को न देखता हो और ४,५ या ६ ग्रह लग्न

को देखते हों तो इसी प्रकार के और २२ योग (राजयोग) होते हैं ।

४--शनि | सूर्य हि | बुध [गुरु | मंगल |भौर सूयं चन्द्र में सेलग्न ३ भेद

अ--हुंभ । मेष विष मिथुन [सिह |वृश्चिकएक ग्रह लग्न में हो ria

R isn nen aps dy

राजयोंग:. ३५३

ब--शनि चन्द्र | सूर्य बुध | शुक्र | मंगल | गुरु | लग्न २,७ से २ भेद उच्च | कन्या में। तुला | मेष | कर्के राजयोगके

इस प्रकार के ५ राजयोग हुए ।

उच्चादि ग्रह से राजयोग १--एक भी ग्रह उच्च का मित्र ग्रह से दुष्ट हो तो

राजा हो, बहुत धन एवं मित्र मण्डली से युक्त और अच्छी ख्याति हो (स? चि०) |

२-पाप ग्रह उच्च का हो तो पाप बुद्धि राजा हो, जीव शर्मा के मत से वह राजा

नहीं होता धनवान्‌ होता है (वृ. जा.) ।

३-यदि एक या दो ग्रह अपने उच्च या मूक त्रिकोण में हों तो धनवान्‌ हो.

(जा० सं०) ।

४-एक ग्रह उच्च का हो और अन्य सब ग्रह स्वगृही या मित्र गृही हों तो उसका

भाग्य राजा के समान हो (जा० पारि०)।

ए-अकेला ग्रह परमोच्च में हो और मित्र ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो राजा हो

(फल दीप०)। .

६-नीच स्थित ग्रह, उच्च नवांश में हो तो राजा के समान भाग्य हो (जैमिनि),

यदि उच्च राशि में होकर नीच नवांश में हो तो छाभ कारक नहीं होते ।

३५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

७--कोई ग्रह नीच में हो उसके उच्च राशि का स्वामी या वह जिस राशि में

बैठा हो उत्तका स्वामी ठग्न से केन्द्र में हो तो वह धामिक चक्रवर्ती राजा हो

स० चिं० ू

2071 में नीच ग्रह पड़ा हो उस राशि का स्वामी उच्च राशि का स्वामी हो

और केन्द्र या त्रिकोण में हो तो धर्मवान्‌ चक्रवर्ती राजा हो ( छ० चं० ) ।

९--जन्म समय गुरु नीच में और नीच राशि का स्वामी या ग्रह के उच्च राशि

का स्वामी चन्द्र से या लग्न से केन्द्र में हो तो चक्रवर्ती राजा हो ( फल० ) ।

१०--जो ग्रह नीच में हो परन्तु उस राशि से दृष्ट हो तो प्रसिद्ध और पृथ्वी

पति बना देता है ( फछ० ) ।

११--अकेला ग्रह नीच का हो और उसकी किरणें तेज हों और गति में वक्री हो

यह ६,८,१२ घर छोड़कर और कहीं शुभ स्थान में हो तो राजा के तुल्य हो, यदि

२-३ ऐसे ग्रह हों तो राजा हो । यदि ऐसे कोई ग्रह न हों और शुभ राशि या अंश में

हो तो राज चिह्न सूचक जैप्ते मुकुट छत्र चौरी आदि से परिपूर्ण हो ( फछ० )।

१२--जन्म में केन्द्रवर्ती ग्रह नीच राशि में हो, उस राशि का स्वामी जो ग्रह है

यदि उसका उच्च राशि का स्वामी केन्द्र में हो तो राज कुल का उत्पन्न राजा होता

है ( जा० भ० ) ।

१३--नीच ग्रह जिस घर में हो उस राशि का स्वामी या ग्रह जो उसी स्थान में

उच्च का हो यदि चन्द्र से केन्द्र में हो तो नीच भंग राज योग होता है । वह रानी

और राजा का आदरपात्र होता है ( स० चिं० ) ।

१४--नीच गत का अंश स्वामी ग्रह केन्द्र त्रिकोण में होवे लग्न में चर राशि हो

लग्नेश चर राशि या चरांशक में हो तो राजा हो ( स० चिं० ) ।

१५--६.८,१२ भाव के स्वामी भी नीच में होकर छग्न को देखते हों तो राज￾योग होता है ( वृ० पा० ) । १६--३,६,८,११ भाव में नीच का ग्रह हो लग्न को देखता हो तो राजयोग होता है ( वृ पा० ) ।

१७--जब २, ३ या ४ ग्रह नीच में होकर शुभ षष्ठ्यंश में हों और सूर्य उच्च नवांश में हो तो राजा के बराबर हो ( स० चिं० ) ।

१८--एक भी शुभ ग्रह केन्द्र में उच्च का होकर बैठा हो जिस पर बलवान्‌ सूर्य

की दृष्टि हो और पंचम भाव में गुरु हो तो वह मनुष्यों का नायक हो (जा० भ०) । अन्यमत--उच्च का एक भी शुभ ग्रह तथा केन्द्रमै बली सूयं पर पंचम स्वामी

` गुदकी दृष्टि हो तो नायक हो ।

१९--शुभ ग्रह उच्च के केन्द्र में हों तो राज लक्ष्मी का स्वामी, यदि पाप ग्रह

उचव के केन्द्र में हों तो क्यो के घर में राजा हो ( ल० च॑० ) ।

२०--२-३ ग्रह उच्च में हों चंद्र कक राशि का हो और छून पूर्ण बली हो तो

सवंत्र पूज्य राजा हो ( जा० पारि० ) ।

राजयोग : १५५

२१--मूछ त्रिकोण या मित्र राशि में या वक्री ग्रह किसी भाव में शेष ग्रह उच्च

राशि में हों परन्तु नीचांशक में न हों तो राजा के तुल्य हो ( स० चिं० ) |

२२--उच्च या मूल त्रिकोण के ३-४ ग्रह बलवान्‌ हों तो राजवंशी राजा हो

ठ 21301 हो। ग्रह यदि बलहीन हों तो राजा नहीं होता धनवान्‌ होता है

(वृ जा० ||

२३--तीन या अधिक ग्रह उच्च या स्वगृही हों तो प्रसिद्ध राजा हो (फल०) ।

२४--४ या ५ ग्रह स्वोच्च यां मूल त्रिकोण में हों तो हीन कुल का भी राजा

हो ( वृ० पा० )।

२५--५ या अधिक ग्रह उच्च या मूल त्रिकोण में हों तो अन्य वंशी भी राजा

हो परन्तु ग्रह बलहीन हों तो राजा के तुल्य हो ( वृ० जा० ) ।

८ २६--५ या अधिक ग्रह उच्च के या स्वगृही केन्द्र में हों तो चक्रवर्ती राजा हो

बु० पा० ) ।

२७--तीन या अधिक ग्रह उच्च स्वगृही या मूल त्रिकोण में हों तो राजवंशी

राजा हो अन्य राज कारवार में श्रेष्ठ अधिकारी हो ( प्रो० मो० ) ।

२८--नवम भाव में सब शुभ या अशुभ ग्रह उच्च में हों ओर शुभग्रह से दृष्ठ

हों तो शत्रु को जीतने वाला सुन्दर कांति वाला राजा हो ( जा० सं० ) ।

२९--वृष लग्न हो उच्च स्वगृही या मूल त्रिकोण में हो परन्तु नीय नवांश में

न हो तो राजा हो ( स० चिं० )।

३०--उच्छ या स्वक्षेत्री ३-४ ग्रह केन्द्र में हों अस्त न हों और कोई दुर्योग न

हो तो राज कुल में उत्पन्न मनुष्य राजा हो ( फल०)।

३१--३ या अधिक ग्रह स्वक्षेत्री या मूल त्रिकोण में हों तो राजवंश में उत्पन्न

राजा हो ( जैमिनी ) ।

३२--२३ ग्रह स्वगुही हों तो मंत्री हो ( मा० ) ।

३३--सभी ग्रह स्वक्षेत्री हों तो राजा के तुल्य हो ( स० चिं० ) ।

३४--वृष लग्न में चन्द्र हो और ७ ग्रह स्वगृही हों तो राजा के बराबर हो

{ स० चिं० ) । ८

३४--उच्च के ग्रह राजयोग करते हैं परन्तु वे नीचांशक क्रूर आदि षष्ठ्यंश में

न हों। उच्च के ग्रह पाप नवांश और पाप षष्ठ्यंश में हों तो राजशक्ति को नष्ट

कर नीचा करते हैं. साधारण फल देते हैं। इसी से राशि की अपेक्षा अंश अधिक

बलवान्‌ हे । इसी से बलवान्‌ ग्रह शुम षष्ठयंश में अधिक राजयोग करते हैं।

३४--ज्योतिष चक्र के पूर्वाढ में उच्च के एवं बलवान्‌ ग्रह हों तो जीवन के पूर्व

भाग में राजा के समान शक्ति और धन देते हैं। यदि पश्‍चिमादध में हों तो जीवन के

अन्तिम भाग में शक्ति और सफलता देते हैं। यदि दोनों भाग में हों तो जीवन भर

शक्ति और उन्नति देते हैं । खसन से ७ भाव तक पूर्वार्द पश्चात्‌ शेष पश्चिमार्द है या जीवन को ३ भाग में

३५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

बाँटो तो जिस खंड में अधिक उच्च के बलवान्‌ ग्रह या शुभ ग्रह हों वहाँ शक्ति और

सफलता मिले पाप ग्रह एवं बलहीन ग्रहों से दुःख शोक हानि मिले ।

(१) खंड--१२,१,२, रे भाव, (२) खंड-४,५,६,७ भाव, (३) खंड-८,९,१०,११

भाव समझना । न

३७---लरन या अन्य भाव से क्रम से ही जिसके सब ग्रह हों इध एकावली योग

में महाराजा होता है ( ० चं० )।

३८--लग्न से २,३,४,५,६ और १० इन्हीं घरों में सब ग्रह हों तो छोटे कुल का

भी राजा हो ( मान० ) ।

३९--दशम भाव से तीसरे भाव तक सब शुभ ग्रह हों तो राजा के समान हो

(स० चि० ) ।

४०--१२,११,१,२,३,१० इन भावों में शुभ ग्रह हों तो राजा के समान हो

( जा० पारि० ) ।

४१--५,६,८, ९,१२ स्थान में शुभ और ग्रह हों तो वह राजाओं में पूज्य हो पर: दुष्ट हो ( छ० चं० ) । ४२--५,६,९,१२ घर में शुभ और पाप ग्रह हों तो राज मान्य, शत्रु का नाशक

हो परन्तु साथ में झगड़े भी बहुत लगे रहें ( मान० ) ।

४३--१,५,६,७,११ राशि में सब ग्रह हों तो राजा हो ( जा० पारि० ) ।

४४---१,२,७,१२ राशियों में सब ग्रह हों तो भूमण्डल का स्वामी हो (जा.पारि.)

४५--२,३,५,६,९,११,१२ राशि में सब ग्रह हों तो सेना हाथी युक्त राजा हो

( जार पारि० ) ।

४६--१,२,३,१०,११,१२ राशियों में सब ग्रह हों तो हाथी आदि से युक्त विख्यात

राजा हो ( मान० )। *

४७--२,९,१२ राशि में सब ग्रह केन्द्र में हों तो राजा हो ( जा० पारि० )।

४८--१,२,३,४,५,७,९ भाव में सब ग्रह हों इन प्रत्येक भाव में ग्रह हो तो

घामिक हो ( जा० पारि० ) ।

४९--१,२,४,५,७,९,१०,१९ थर में गुरु शुक्र स्वगृही या उच्च में हों तो धन युक्त राज्यमान्य हो ( जैमिनि ) ।

५०--चन्द्र से ३,६,१०,११ घर में सब ग्रह हों तो धन वाहन युक्त राज्यमाभ्य हो ( जा० भ० ) ।

५१--छग्न या चन्द्र वर्गोत्तम हो, चन्द्र को छोड़कर ४,७.१० स्थान में सब ग्रह

हों तो राजा हो ( जा० पारि० ) । 4

५२--१,३,५,९ भाव में कहीं भी ४ ग्रह एकत्र हों यदि वह दासी पुत्र भी हो तो

भी राजा के समान हो ( मान० ) ।

५३--१,२,३,५,९,११ भाव में कहीं पाप या शुभ ४ ग्रह हों तो राजयोग हो ( जैमिनि० ) ।

राजयोग : ३५७

५४--३,४,५ भाव में सब ग्रह हों तो बहुत घन हो और देश का स्वामी हो

{ जा० पारि० ) ।

५५--४,५,९ भाव में सब ग्रह हों उसके पहिले हुए बाळक मर जायें पीछे के

जिये, दूसरी स्त्री से युक्त हो और जातक विख्यात दानी दीर्घायु राजा हो ( मान. ) ।

५६--२,६,८,१२ भाव में सब ग्रह हों तो सिंहासन प्राप्त हो (लू. चं, )।

५७--१,५,७,९ भाव में सब ग्रह हों यह हंस योग है अपने वंश का पालन कर्ता

हो ( ल. चं.)॥।

भ्ू८ध--राशि चक्र में ६ घर ग्रह रहित हों तो वह राजा हो या राजा के समान

हो अंत में स्वर्ग जाता है ।

केन्द्र त्रिकोण आदि के योग

५९--एक भी ग्रह जो अस्तंगत न हो स्वराशि या मित्र राशि में हो षडवगं

शुद्धि हो और केन्द्र त्रिकोण में हो तो चक्रवर्ती राजा हो ( शंभु ) ।

६०--पूर्वोक्त रीति से २ ग्रह षड वर्ग में शुद्धि होकर बैठ हों तो उस राजा का

आधिपत्य द्वीपान्तरों में पृथ्वी तक होता है ( जा. भ. ) शंभु ।

६१--३ ग्रह उच्च और मूल त्रिकोण के अधिकार से हीन होकर षड़वर्ग में शुद्ध

होकर बैठे हों तो वह राजा का मंत्री हो ( जा. भ. ) ।

६२--पूर्वोक्त रीति से ४ ग्रह हों तो राजा होता है ( जा. भ. ) 1

६३--यदि ५, ६ ग्रह षड़वर्ग में शुद्ध बैठे हों वह सावंभोम राजा हो (जा. भ.)

६४-न्रिकोण लक्ष्मी का स्थान है, केन्द्र विष्णु का स्थान है इन दोनों स्वामियों के

सम्बन्ध होने से चक्रवर्ती राजा हो ( म० परा० ) ।

६५-चारों केन्द्र में शुभ ग्रह हों और पाप ग्रह ६ या १२ भाव में हो तो संसार

अ विख्यात ध्वजा और छत्र से शोभित राजा होता है ( छ० चं० ) ।

६६-केन्द्र गत ग्रह पाप राशियों में होवे या सोम्य, राशियों में पाप ग्रह होवे तो

-वह शबर और चोरों का राजा होता है और धनवान्‌ होता है ( वृ० जा० ) ।

६७-शुभ ग्रह सम्बन्धी राशि वलवान्‌ होकर केन्द्र में हो और पाप ग्रह पाप

राशियों में हो तो भी उपरोक्त फल हो ( जा० सं० ) 1

६८-जिसका एक भी ग्रहं पंचम नवांश में हो वह भी राजा होता है (जा०भ०)।

६९-जन्म में कोई एक ग्रह पंचवर्गी शुद्ध हो तो राजा हो (शंभु०) ।

७०-सब शुभ ग्रह॒ केन्द्र त्रिकोण में हों पाप ग्रह ३, ६, ११ में हों तो राजा हो

{( बु० पा० )। ७१ ४254 भी पूर्ण बली ग्रह केन्द्र त्रिकोण में हो तो दीर्घायु निरोग हो सब दोष

'दूर हों ( मान० ) ।. |

७२-सब शुभ ग्रह शुभ क्षेत्र में होकर केन्द्र में हों तो सदा शुभ कर्म करने वाल ।

हो ( मान० ) । ७३-शुस ग्रह की राशि में बलिष्ठ ग्रह केन्द्र में हों इसी प्रकार पाप ग्रह की राशि

३५८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

के पाप ग्रह बलवान्‌ हों तो वह फौज का स्वामी, पुलिस कप्तान या जेल का ओहदे-

दार या चोर आदि का स्वामी होकर बड़ी सम्पत्ति वाळा हो ( प्रा० यो० )।

७४-उदय को प्राप्त स्वोच्च का ग्रह केन्द्र में हो तो राजा के समान प्रतापी हो

( जा० लं० ) ।

५37० में शुभ ग्रह और अष्टम में पाप ग्रह हो तो सवं सिद्धि प्राप्त हो राजाओं

में मान हो (जा० ळ॑० ) 1

७६-केन्द्र या त्रिकोण के स्वामियों का योग एक ही भाव में हो तो राजयोग

होता है । या वे परस्पर एक दुसरे से सम्बन्ध स्थापित करते हों या वे परस्पर स्थान

में हों तो राजयोग होता है परन्तु ३,११ या ६,८,१२ भाव के भावेश से इनका

सम्बन्ध न हो । यदि इनके भावेश केन्द्र में हों तो हानि नहीं है (ज्यो० रह०)।

७७-चारों केन्द्र में शुभ और पाप ग्रह दोनों हों तो राज्य और धन देते हैं

(ल० चं०) । र

गुरु ;

७८-उच्च का गुरु हो मेष लग्न में बुध हो तो राजा हो ( जा० पारि० ) ।

७९-उच्च का गुरु, केन्द्र में हो, दशम में शुक्र हो तो चक्रवर्ती राजा हो जिसका

सिक्का चले (शंभु०) ॥

८०-उच्चराशि में या स्वगृही गुरु शुक्र केन्द्र या त्रिकोण में हों तो राज कुछ:

का राजा हो अन्य कुल में उत्पन्न मंत्री हो (जा०भ०) ।

८१-गुरु, शुक्र, बुध या चन्द्र में से एक भी उच्च का हो पर द्वितीय भाव में हो

तो राजयोग होता है (वृ० जा०) ।

८२-उच्च का गुरु केन्द्र या त्रिकोण में हो चन्द्र बुध शुक्र इनसे युक्त या दृष्ट हो

तो शत्रु को जीतने वाला चक्रवर्ती राजा हो (जा० सं०) ।

८३-उच्च का गुरु लग्न में हो, मेष को सूर्य हो और शनि बुध शुक्र ग्यारहवेँ

भाव में हों तो वह बलवान्‌ राजा होता है (जा० भ०) ।

घ४-उच्च का गुरु शुक्र सूर्यं हो चन्द्र भी उच्च राशि गत शनि से दुष्ट हो तो

राजा हो (जा० भ०) ।

८५-गुरु शुक्र या बुध इनमें एक भी उच्च में हो और अन्य शुभ ग्रह केन्द्र में हों

तो निश्चय राजा हो (बु० पा०) ।

८६-नीच का गुरु लग्न या अष्टम में हो और नवमेश पारावतांश में हो तो राजाओं का राजा कुवेर सम होवे (स० चि०) ।

८७-छरन में नीच का गुरु हो अष्टम भाव पाप ग्रह युक्त हो और उस अष्टम भाव के नवांश से युक्त हो तो राजाधिराज हो जंसे.मकर लग्न में तृतीय नवांश में गुरु हो, अष्टम भाव में तृतीय नवांश गत सूर्य हो तो वह राजयोग होगा (जा.पारि.)। : ८८-गुरु नीचांश में न हो, चन्द्रमा उत्तरांश में हो, सूर्यं शुभ षष्ठ्धंश मे हो तो , राजा के तुल्य हो (स० चि०)।

राजयोग : ३५९

८९-गुरु नीच नवांश में न हो, बळी शनि उत्तभ वर्ग में हो, सूर्यं शुभ ग्रह से दृष्ट हो या शुभ ग्रह के नवांश में हो तो राजा का प्रिय या राजा के समान हो (जा० पारि०) ।

९०-कर्क का गुरु लग्न में हो मेष का मंगळ हो तो बलवान्‌ राजा हो या कले-

क्टर इंजीनियर आदि हो (वृ० जा०)।

९१-ककं का गुरु चन्द्र केन्द्र में हो तो वह काश्मीर का राजा हो (जा० भ०) ।

९२--कर्क का गुरु लग्न में हो तो वह मकान बावली नगर आदि बनाने वाळा

होता है (जा० म०) ।

९३--कर्क लग्न में गुरु और चन्द्र हो शुक्र बली होकर केन्द्र में हो शेष सब ग्रहः ११,३,६ भाव में हों तो धनवान्‌ दीर्घायु चक्रवर्ती राजा हो (मान०) ।

९४--कर्क लग्न में गुरु हो या मेष का मंगल हों तो इन दोनों योगों में शत्रुओं

को जीतने वाला राजनीति शास्त्र में निपुण राजा हो (जा० भ०) ।

९५--कर्क का गुरु लग्न में हो, सप्तम शुक्र, चतुर्थ शनि, दशम मंगल हो तो

राजा हो (जा० भ०) । १

९६--ककं का गुरु हो, तुला में शनि चन्द्र, मेष का सूर्य लग्न में हो तो बड़ा

राजा हो (शभु०) ।

९७--कर्क का चन्द्र गुरु हो शुक्र मीन लग्न में, सूर्य मंगल मेष में हो तो इन्द्र

समान राजा हो (जा० म०) ।

९८--कक लग्न में गुरु, लाभ में वृष का चन्द्र शुक्र बुध तीनों हों, मेष का सूर्य

दशम हो तो पराक्रमी राजा हो (वृ० जा०) ।

९९---कर्क का गुरु लग्न में, लाभ में बुध, शुक्र मेष का दशम हो (मान०) ।

१००--कर्क का गुरु, मीन या मिथुन में चन्द्र, कुंभ में शुक्र । अन्यमत कर्के का

गुरु मीन का चन्द्र, कुम्भ में शुक्र हो तो हाथियों से युक्त राजा हो (शंभु०) ।

१०१--कर्क में गुरु, मेष या मीन में चन्द्र, कुम्भ में शुक्र हो तो वाहन युक्त

समृद्ध भोगी राजा हो (जा० भ०) ।

१०२--कर्के में गुर चन्द्र हों, उच्च में जाने वाला सूर्य त्रिकोण में हो तो रत्नों

से परिपूर्ण भूमि का राजा हो (जा० पारि०)।

१०३--ककं में गुरु चन्द्र या मेष में सूर्य मंगळ, या वृष में चन्द्र शुक्र या मकर

में शनि मंगल या कन्या में राहु बुध, या तुला में शनि शुक्र हो, या मीन में गुरु

शुक्र या.मिथुन में राहु बुध हों इन योगों में राजा या घनी हो (जैमिनि) ।

१०४--कक॑ का गुरु हो, मीन का सूर्य त्रिकोण में हो, या मेष का चन्द्र त्रिक

में हो तो पृथ्वी को रक्त से परिपूर्ण करे अर्थात्‌ बड़ा योद्धा हो (मान०) सूर्य या चन 5

यहाँ उच्चाभिलाषी अर्थात्‌ उच्च की ओर जाने वाला हो यहाँ मीन का सूयं या मेक

या चन्द्र उच्चाभिलाषी है ।

३६० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अन्य - केन्द्र में गुरु, मीन का सूर्य लग्न से त्रिकोश में हो या चन्द्रमा लग्न में हो

तो रक्त पूर्ण पृथ्वी का पालक हो (मान०) ।

१०५-केद्धमे गुरु हो तो अनेक कुयोगों को दूर करता है (मान०) केन्द्रमै गुरु भी

न हो, लग्न में शुक्र बुध न हो,दशम में मंगळ भी न हो तो जातक कुछ न कर सकेगा ।

अकेला गुरु केन्द्र या त्रिकोण में हो या लग्न में या लाभ में हो तो सब कार्य करने

में समर्थ हो और दीघं जीवो हो (मान०) ।

१०६--कोई बलो शुभ ग्रह केन्द्र में हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो सव दुःख दूर कर

सकेगा (छ० च०) ।

१०७--चंद्र सहित गुरु केन्द्र में हो, शुक्र से दृष्ट हो और कोई ग्रह नीच का न

हो तो यशस्वो राजा हो (शंभु०) ।

१८-बली होकर गुरु शुक्र या लग्नेश केन्द्र में होकर दीर्घायु और राजवल्लभ

होता है (मान०) । :

१०९-- गुरु बुध शुक्र इनमें से एक भी ग्रह केन्द्र में हो तो दीर्घायु गुणवान्‌ और

राजप्रिय हो (जैमिनि) ।

११०--बली गुर केन्द्र में हो तो सुवर्ण वस्त्र सम्पत्ति युक्त सुखी सत्कर्मी हो

जा० सं०) ।

११२--चारों केन्द्र में गुरु बुध शुक्र और शनि से युक्त राहु हो तो लक्ष्मी आरोग्य,

पुत्र, मान, आदि प्राप्त हों (मान०) ।

( Co बुध) शुक्र, शनि चारों ग्रह सहित राहु हो तो उपरोक्त फल

ल० च०) ।

११३--तीनों केन्द्रों में शुक्र बुध गुरु हो ओर दशम में मंगल हो तो कुछ दीपक

हो (मान०) ।

केन्द्र में गुरु लग्न में बुध या शुक्र, दशम मंगल हो तो कुल दीपक हो ।

११४--ग्रुरु केन्द्र त्रिकोण या उच्च में, चन्द्र बुध, शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो

सार्व भौम राजा हो (मान० ) ।

११५--गुरु बुध शुक्र केन्द्र और त्रिकोण में हो तो वह धर्म अर्थ विद्या कीर्ति युक्त शांत सुशील राजा हो (जा० सं०) 1

११६--गुरु शुक्र या नवमेश केन्द्र कोण या लाभ में हों तो अनेक वाहन युक्‍त

संडळ का राजा हो (जा० पारि०) ।

११७--गुरु शुक्र या चतुर्थेश केन्द्र या लाभ में हो तो वाहनों का स्वामी और

राजा हो (छ० चं०) । ११८--गुरु शुक्र बुध केन्द्र त्रिकोण में हो ३, ६, ११ भाव में बुध शनि हो, सप्तम में पूर्ण बली चन्द्र हो तो राजा के समान हो ( मान० ) ( जा० सं० ) |

र १ | ९ गुरु सूर्य बुघ शनि त्रिकोण में मंगल दशम में हो तो राजयोग होता है

मान०) ।

'राजयोग : ३६१

१२०--त्रिकोण में गुरु सूर्य, लर्न में शनि चंद्र, दशम मंगल हो तो राज योग होता है (छ० चं०) । १२१-गुरु स्वक्षेत्री हो तो बन में भी मित्र मिले (जैमिनि) ।

१२२-गुरु बुध शनि तीनों स्वक्षेत्री हों तो दीर्घायु हो अपने-अपने पद में धन

सम्पादन करने वाला हो ( छ० चं० ) ।

१२३-गुरु शुक्र मंगल वर्गोत्तम में हों और पाप ग्रह केन्द्र में हो तो राजा हो

(जा० पा०) ।

१२४-वर्गोत्तम या पुष्करांश में गुरु मंगल चंद्र साथ हों तो राजां हो (जा.पा.) ।

१२६-गुरु लाभेश हो ओर चंद्र से केन्द्र में धनेश नवमेश लाभेश में से कोई एक

हो तो राजा हो ( जा० पा० )।

१२७-गुरु पर मंगल की दृष्टि हो और मंगल पर गुरु की दृष्टि हो तो देव

पूजित परोपकारी मंत्री हो ( जैमिनि ) ।

१२८-बुध गुरु युक्त या दुष्ट हो तो उसकी आज्ञा राजा लोग माने (स०चि० )॥

गुर विद्या का कारक है.और वुध ज्ञान का कारक है । दोनों का योग प्रभावशाली

होता है परन्तु भिन्त-भिन्न राशियों में भिन्न-भिन्न फल देगा जैसे मकर में जहाँ गुरु

नीच का है या मौन में जहाँ बुध नीच का है या करं का गुरु जो उच्च का हैया `

कन्या का बुध जो उच्च का है।

१२९-लगन में गुरु हो, बुध कोई केन्द्र में हो दोनों पर नवमेश और लाभेश की

दृष्टि हो तो राजा के समान हो ( स० चि० )।

१३०-लन में गुरु, केन्द्र में वुध हो नवमेश से दृष्ट हो तो राजा के बराबर

धनी हो ( जा० पा० ) ।

१३१-छरन में गुरु, दशम या पंचम में चन्द्र हो तो राजमान्य, महा वुद्धिमान्‌,

और तेजस्वी हो (मान०) ।

१३२-लग्न या पंचम में गुर हो, द्वादश में चन्द हो तो राजमान्य विशाळ बुढि,

तेजस्वी, जितेन्द्रिय हो (जा० सं०) ।

१३३-लग्न या पञ्चम में गुरु हो दशम में चन्द्र हो तो इन्द्रियजित्‌ बुद्धिमान्‌

राजा हो (जा० सं०) |

१३४-मकर राशि छोड़कर और कोई राशि में लग्न में गुरु हो तो मतवाले

हाथी युक्त राजा हो (जा० भ०) ।

१३४-गुर, बुध, या शुक्र चन्द्र के साथ लग्न में हो तो राज लक्षण से युक्त हो ।

१३६-छरन में गुरु और व्यय में शनि हो बीच में सब ग्रह हों तो कुटुम्ब ओर

चल्धुक्त राजा होता है (मान०) ।

१३७-छरन में गुरु, तीसरे चन्द्र, नवम बुध, लाभ में शुक्र, मकर का शनि हो तो

चक्रवर्ती राजा हो (जा० भ०) ।

१३८-छू्न में गुरु, ढितीय बुध मंगल, चतुर्थ में शुक्र सूयं दोनों हाँ दशम में

३६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

चन्द्र, लाभ में शनि हो तो राजपुत्र राजा हो अन्य धनी हो (जा० सं०) ।

१३९-छरन में मकर राशि छोड़कर और किसी राशि में गुरु हो और शुक्र पर

गुरु की दृष्टि हो तो राज घरों में उत्पन्न हाथियों से युक्त राजा हो (फल०) ।

१४०-छरन में गुरु बुध या शुक्र में से कोई हो शनि सप्तम हो सूर्यं दशम हो तो

भोग वाले का जन्म जानो (जा० सं०) ।

अन्यमत-गुरु, बुध शुक्र, की राशियाँ लग्न में हों सप्तम शनि दशम सूर्य हो तो

धन हीन मनुष्य को भोगवान्‌ वनाता है (वृ० जा०) ।

१४१-दूसरे भाव में गुरु शुक्र युक्त हो तो शत्रु को जीतने वाला भूप॑ति हो

(जा० पारि०) ।

१४२-द्वितीय भाव में गुरु बुध शुक्र हो सप्तम में शनि चन्द्र मंगल हो तो बड़ा राजा हो शत्रु का नाश करता हो (जा० भ०) ।

१४३-सू्यं से दूसरे भाव में गुरु बुध शुक्र हो अस्त न हो और शत्रु ग्रह की दृष्टि न हो तो उस राजा के सामने शत्रु की फोज भाग जाती है (शंभु०) ।

१४४-तीसरे भाव में गुरु, अष्टम में शुक्र हो बीच में द अन्त में और २ ग्रह हों तो निश्‍चय राजा हो । अन्यप्रत-तीसरे में गुरु अष्टम में शुक्र हो शेष ग्रह बीच में हों तो निश्चय राजा हो (जैमिनि) ।

१४५-तीसरे गुरु छाभ में चन्द्र हो तो कुछ दीपक प्रसिद्ध राजा हो (मांन०) ! ड

१४६-छरन से तृतीय भाव में गुरु हो या चन्दर सूये से पञ्चम नवम में हो तो राजा हो।

१४७-अंगल से ३,५,९ भाव में गुरु सूर्य चन्द्र हो तो अनेक सम्पदा और वाहुन युक्त राजमान्य हो (जा० भ०) ।

अन्यमत-३,५,९ भाव मे गुरु सूयं बली हों तो अनेक सम्पदा और वाहन युक्‍त राजा हो ।

अन्यमत--३,५,९ भाव में शुक्र सूये चन्द्र हो तो उपरोक्त फल (शंभु०) ।

१४८-चतुथं भाव में गुरु शुक्र बलवान्‌ हो तो राजा हो (जा० भ०) । १४९-चतुर्थ में गुर चन्द्र शुक्र, पञ्चम में मंगल शनि हो, कन्या लग्न में बुध. हो तो गुणवान्‌ राजा हो (जा० सं०)।

१५०-चतुथं में गुरु, छन्त में शनि, दशम में सूर्य चंद्र, लाभ में मंगळ बुध शुक्र हो तो राजपुत्र राजा हो अन्य धनी हो (बु जा०) । अन्यमत-शनि मकर छनन में हो (प्रा० यो०) । १५१-चतुथं में गुरु शुक्र मंगल चंद्र ये चारों सूयं चंद्र से युक्त हों तो राजा हो (मान०) ।

जतांतर-तु्थं में गुर शुक्र मंगळ चंद्र ये सुयं शनि इनसे युक्त हों (० चं०) ।

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राजोगय : ३६३

१५२--चतु्े में गुरु हो, लग्न में मेष का सूयं, दशम में मंगल हो तो संसार का स्वामी हो (ल. चं.) ।

1१५३--चतुर्थ में गुरु, लग्न में चन्द्र, दशम शुक्र हो और शनि अपने उच्च का या | स्वक्षेत्री हो तो राजा के तुल्य हो ( स. चि. ) ।

१५४--चतुर्थ में गुरु, लग्न में उच्च का सूर्य, दुसरे में चन्द्र, तीसरे शुक्र और राहु, बारहरवे बुध हो, लाभ या छठे घर में शनि हो तो चक्रवर्ती राजा हो (मान०) ।

१५५--चतुर्थ में उदय गुरु हो, वृष में शुक्र हो और ग्रह नीच शत्रु नवांश से

(व न प्रकाशवान्‌ कांति वाले हों तो देव तुल्य बलवान्‌ क्रोध रहित हो जा. भ. ) ।

१५६--पंचम में गुरु और दशम में चन्द्र हो तो बड़। बुद्धिमान्‌, तपस्वी, जितेन्द्रिय राजा हो ( मान.) ।

१५७--लग्न से पंचम में गुरु नवम में चन्द्र तृतीय में सूयं हो तो कुबेर समान राजा हो ( जा. सं. ) । ५

१५८--गुरु पंचम भाव में हो चन्द्र उससे केन्द्र में हो और यदि लग्न स्थिर राशि में हो और दशम हो तो राजा हो (स. चि.) ।

१५९--पंचम भाव में गुरु शुक्र हो अस्त न हो, सूर्य से रहित मकर में मंगल हो, नवम में शनि हो तो प्रतापी राजा हो ( शंभु. ) ।

१६०--लग्न से पंचम या नवम गुरु व सूर्य हो अष्टम में मंगल हो तो घनवानु राजा हो ( लू. चं. )।

१६१--छठे भाव में गुरु हो, ककं में सूर्य चन्द्र हो, बुध उच्च का हो लग्न में कोई ग्रह बली हो तो राजाधिराज हो (जा. भ. ) ।

१६:--छठे भाव में गुरु लग्न में चन्द्र हो तो विख्यात कुछ दीपक हो (मान.) ।

१६३--गुरु सप्तम हो साथ में त्रिकोणेश भी हो और लग्नेश की दृष्टि हो तो राजा के तुल्य हो ( स. चि. )।

१६४--सप्तम गुरु, लग्न में मेष का बुध, चतुर्थ चन्द्र, दशम शुक्र हो तो कीतिमान्‌ राजा हो ( शंभू. ) ।

१६५--सप्तम गुरु, लग्न में वृष का चन्द्र, चतुर्थ में सूयं, दशम में शनि हो तो बडी सेना युक्त राजा हो ( जा. भ. ) ।

१६६--सप्तम में गुरु, लग्न में कन्यो का वुध, तीसरे सूर्य मंगल, छठे शनि,

चतुर्थं शुक्र हो तो महाराजा हो उसे सब मस्तक नवावें ( शंभु ) ।

१६७--सप्तम में गुरु चन्द्र हो, लग्न में कन्या का बुध हो, पंचम शनि मंगल,

दशम शुक्र हो तो राजा हो ( वृ. जा. ) ।

१६८--सप्तम गुरु, लग्न में मंगल शनि, चतुर्थं चन्द्र, नवम शुक्र, दशभ सूर्य, लाभ में बुध हो तो राज वंशी राजा हो अन्य धनी हो ( वृ. जा. ) ।

: ३६४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१६९--सप्तम में गुरु, लर्न में बुध, चतुर्थ में पूर्ण चन्द्र कर्क का, दशम में शुक्र

हो तो पृथ्वी का राजा हो (जा. पारि. ) ।

१७०--गुरु अष्टम में हो और शनि दशम में हो तो ३० वर्षं में राज्य धन प्राप्त

करे ( जा. सं.) ।

१७१--गुरु नवम स्थान में हो तो मंत्री या राजा तुल्य हो ( शंभु ) ।

१७२--गुरु नवम म हो सूर्य से दृष्ट हो तो उपरोक्त फल ( जा. स. ) ।

१७३--बली गुरु व शुक्र नवम में हो, वली बुध ठग्न में हो अन्य कोई ग्रह चतुर्थ में हो शेष ग्रह ९,२,३,६,१०,११ भाव में से किसी में हो तो राजपुत्र धर्मात्मा राजा

हो अत्य धनी हो ( व. जा. ) ।

१७४--चेष्टाबली गुरु बुध शुक्र नवम में हो मित्र ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो प्रतापी राजा हो ( ज॑मिनि. )। |

अन्यमत--नवम में चेष्टावली गुरु बुध शुक्र चन्द्र मित्र ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो 'तो प्रतापी राजा हो ।

अन्यमत--नवम में गुरु बुध शुक्र चन्द्र प्रकाशित किरणों वाले हों अस्त न हों, मित्र ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो वड़ा राजा हो जनता देव तुल्य पुजे ( फल. ) । १७५-नवम में गुरु, पंचम में बुध, ककं में चन्द्र हो तो राजयोग होता है (जैमिनि) । अन्यमत-नवम में कोई शुभ ग्रह हो पंचम में बुध, ककं में चन्द्र हो तो राजयोग होता है ( मान. ) ।

१७३--नबम या चतुर्थ में गुरु शुक्र और नवमेश हो तो राजा, सेनापति या धनी हो ( जा. सं. ) ।

१७७ -दशम में गुरु शुक्र बुध चन्द्र चारों हों तो उसके सवं कार्य सिद्ध हों राज मान्य हो, राजाओं में पुज्य हो ( मान. ) ।

१७८-दशम में गुरु स्वगृही हो या बुध या शुक्र स्वगृही हो और पूर्ण चन्द्र भी हो तो कुलानुमान राजा हो ( शंभु. ) ।

१७९--दशम में गुर, घन भाव में शुक्र, छठे राहु हो तो पराक्रमी राजा हो ( मान. ) |

१५०--दशम ओर लग्न में गुरु शुक्र हो या लाभ में बुध शुक्र दोनों हों और मेष का सूर्य हो तो राजा हो (जा. सं. ) | > १८१--दशम में गुरु या शुक्र हो कन्या लग्न में बुध, सप्तम में चन्द्र पंचम में मंगल हो तो राजा हो या रानी का कामदार हो (प्रा. यो. ) । १८२--दशम या लाभ में गुरु चन्द्र शनि, लग्न में बुध, तृतीय मंगल, चतुर्थ सूर्य ` शुक्र हो तो साहुकार या राजा के घर का कार्यवाही हो ( प्रा. यो. ) । १८३--व्यय में गुरु, तृतीय में चन्द्र, षष्ट में शुक्र, लाभ में बुध हो लग्न में मकर का शदि हो तो एक छत्र राज्य भोगे ( शंभु. ) ।