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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग ४

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 4

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished280 पृष्ठ

१०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

मुद्दा में १ ..२ ३ ४ पू ६ ७ ८ ९ योग

ग्रह क्रम सूर्यं चंद्र मंगल राहु गुरु शनि वुध केतु शुक्र दिन

वर्ष दशा दिन १ ३० २१ ४ ४८ ५७ ५१ २१ ६०=३६०

मास दशा दिन १ २ १ ¥ ¥ ¥ ४ १ } ३०

घड़ी ३० ३० ४५ ३० ० ४५ १५ ४५

जैसे सूर्य के वर्ष के दिन १८ > १२८१३ दिन=१ दि.-३० घ. । यहाँ घड़ी बनाने

की ६० का गुणा कर १२ का भाग देना पड़ता-३३-४५ गुर्णांक । इस कारण शेप में

५ का -गुणा करने से घड़ी आ जाती है। जैसे शनि ५७% १२४ यहाँ शेष

९ > ५८४४ घड़ी और ४ दिन लब्धि के=४ दि.-४५ घ. । इसी प्रकार सब ग्रहों के

मास दशा के दिन घड़ी निकाल कर ऊपर दिये हैं ।

मुग्धा दशा की मासं दशा निकालना

पहली रीति=( मास प्रवेश में जो नक्षत्र हो+७ ) > ९=शेष दशा ग्रह की उपरोक्त क्रम से

जैसे मास प्रवेश का नक्षत्र हस्त १३ वाँ है। (१३+ ७) > ९-२० > ९=शेष २

चंद्र की दशा। विशोत्तरी दशा के समान नक्षत्रों के अनुसार दशा भी जानी जा

सकती है : जैसा नीचे चक्र में बताया है। इसी के अनुसार मास दशा भी जानी जा

सकती है ।

मास दशा प्रवेश के समय नक्षत्र से दशाज्ञान--

क्र्मा १ २ नि ति 5 gt SG ER

ग्रह सूर्यं चूंद्र मंगल राहु गुरु शनि वुध केतु शुक्र

नक्षत्र ३ कृतिका ४ रोह. ५ मृग, ६ आर्द्रा ७ पुनर. ८ पुष्य ९ इले. १० मघा ११ पू.फा.

१२उ.फा. १३हस्त १४चि. १५स्वा, १६ वि. १७ अ. १८ ज्ये. १९मूल २० पू षा.

२१उषा. २२श्र, २३धनि. २४दात. २९पूभा. २६उभा. २७रेव. १अश्वि, २ भरणी

  • यहाँ भी चक्र देखने से प्रकट हुआ कि हस्त में चंद्र की दशा आती है । मान लो

२७ नक्षत्र ( रेवती ) है ९७--७>३४ १८ ९-शेष ७ वुध की दशा आई ? दुसरी रीति=( नक्षत्र संख्या -२) > ९। हस्त १३-( १३-२ ) > ९- १द-शेष २-चंद्र (नक्षत्र रेवती २७-२) > ९-*३-शेष ७ बुध की दशा आई ।

अन्य रीति- -(ंगताव्द > १२) +(जन्म नक्षत्र +गत मास) -२

मान लो जन्म नक्षत्र धनिष्ठा २३ वाँ है। दूसरे मास की दशा निकालनी है तो

गत मास १ हुआ, गताब्द ५६ है । ( गताब्द ५६ १२ ) +धनिष्ठा २३+ गतमास १-२_ ६७२--२४-२ _

९ ९ सगली न ॐ == पन्सूर्य की दशा ।

विशोत्तरी मुद्दा दशा : १०९

मुग्धा दिन दशा निकालना

जिस प्रकार मुग्धा की मास दशा निकाली जाती है उसी प्रकार मुद्दा दशा कौ

दिन दशा भी. निकाली जाती है। ३६२ में ग्रह के उक्त दिन हैं तो ६० घड़ी में

उ११=१ घड़ी पल होगी । ग्रह के दिन में ६ का भाग देने से जो घड़ी पल आवे वही

दिन दशा में उसका समय होगा । जैसे सूयं १८ दिन > ६८३ घड़ी । यही नीचे चक्र

में दिया है।

मुग्धा दिन दशा चक्र

क्रम पे. २ ३ ४ १. ६ OSPR

ग्रह सूर्यं चंद्र मंगल राहु गुरु शनि वुध केतु .शुक्त योग

घड़ी ३ ५ ३ ९ ८ ९, छा 3 ४ १००३४६७

पल ° ° ३० ° ° ३० ३० ३० °

मुग्धा दिन दक्षा निकालना

(दिन प्रवेश नक्षत्र + लग्न-७) > ९=शेष=ग्रह की दिन दशा उपरोक्त क्रम से।

दिन प्रवेश के समय जो स्पष्ट लग्न हो उसमें दिन प्रवेश के नक्षत्र की संख्या

जोड़ कर और ७ मिला कर ९ का भाग देना जो शेष वचे उस ग्रह की दशा

उपरोक्त क्रम से हो गई । मुद्दा मास दशा के नक्षत्र का जो चक्क दिया है उसके

अनुसार ही कई दिन प्रवेश का नक्षत्र देखकर दिन दशा निकाल लेते हैं । जैसे उस

दिन स्वाती नक्षत्र हो तो चक्रानुसार राहु की दशा होगी क्योंकि उस नक्षत्र के ऊपर

राहु ग्रह चक्र में दिया है।

योणिनी मुद्दा दशा

जातक की योगिनी दशा के अनुसार ही इसका क्रम है। योगिनी दशा ३६ वर्षे

की होती है वह यहां एक वर्ष में भक्त हो जाती दै । ३६ वर्ष-३६० दिन के है तो १

वर्ष में =१० दिन । इस कारण योगिनी दक्षा के वपं में १० का गुणा करने से वर्ष

की योगिनी दशा के दिन निकल आते हैं । जैसे संकटा के वर्ष ८ हैं | ८2६ १०८८०

दिन=२ मास १० दिन हुए ।

योगिना मुद्दा दशा का समय

१ २ ३ ¥ Lh ६ ७ ८

मंगला पिंगला धान्या भ्रामरी भद्रा उल्का सिद्धा संकटा योग

वोगनी-दला-व्ष 4. २-४ =n ७८ नरपती

वपं दशा में मास ० ० १ १ १ २ २ २ १२मास

भोगने के दिन १० २० ० १० २० ० १० २० २

योगिनी दशा का समय निकालना

( जन्म नक्षत्र +३-+गताब्द ) ५ ८>शेष योगिनी दशा उपरोक्त क्रम से

उदाहुरण=जन्म नक्षत्र धनिष्ठा २३

५११० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

( गताब्द ५६-- ३ + २३ धनिष्ठा ) > ८८ औरस न २-पिगला

की दशा ।

` दक्षा का भोग्य समय निकालना

(नक्षत्र के भुक्त पल > योगिनी दशा दिन ) > भभोग परलू-भुक्त दिन

(योगिनी दशा के दिन-भुक्त दिन )-भोग्य दिन

उदाहरण-जन्म नक्षत्र धनिष्ठा भुक्त २२२३-५२ पळ भभोग ३९७०-० पछ पूर्वोक्त ।

पिंगला दशा=२० दिन

प्‌o वि०

भुक्त पल २२२३-५२ दि० घ० प०

पिंगला के २० विन ४४४७७-२०-- ३९७०=११--१२--१२ भुक्त पिंगला

४४४६० १०४० पूर्ण पिंगला दिन घ० प०

+१७ २२० २० ० ०

४४४७७-२० भुक्ता-- ,, १९--१२--१२

भोग्य,, ८ ४७ ४८

योगिनी मुद्दा दक्षा चक्र

योगिनी दक्षा मास दिन घड़ी पल सम्वत्‌ सुयंराशि अं. क, वि. दिनांक

२००२ ११ ५ ३३ ७ सेआरम्भ१९- ३-१९४६

पिंगला ० ८ ४७ ४८ १: ११ १४ २० ५५ तक २८- ३- ४६

धान्या १ ० ॥) 11 २००३ ० १४ २० ५५ तक २०० ४- ४६

भ्रामरी ११० ,, ,, १) १ २४ २० ५५ तक ८० ५- ४६

भद्रा ११० ,, » 1) ३ १४ २० ५५ तक ३१- ६- ४६

उल्का Rio 00 5 1) ५ १४ २० ५५ तक १-१०- ४६

सिद्धा २१० ,, „ „ ७ २४ २० ५५ तक - १०-११- ४६

संकटा २२० ,, » » १० १४ २० ५५तक २६- २- ४७

मंगा ० १० २२ ।१ १० २४ २० ५५ तक द- ३- ४७

. पिंगला भुक्त० ११ १११२ ,, ११ ५३३ ६ १९- ३- ४७

यहाँ वर्ष आरम्भ के सम्वत्‌ और सूये स्पष्ट में प्रत्येक योगिनी का समय जोड़कर

उनके अन्त होने का सम्वत और सूर्य स्पष्ट निकला है और पंचांग से देखकर उक्त सूर्य स्पष्ट की हुई तारीख लिख दी है ।

अध्याय १४

पत्यांशी दशा साधन

इसमें सूर्यं से शनि तक ७ ग्रह और लग्न मिलाकर ८ ग्रह लिए जाते हैं ।

पत्यांशी दशासाधन की रीति

(१) सातों ग्रह और लग्न के स्पष्ट का एक चक्र बनाना। यह ग्रह स्पष्ट और रूरन का चक्र हुआ।

(र) आठों ग्रह की राशि को छोड़कर केवल अंश कलादि लेकर दुसरे चक्र में रखना । यह अंश चक्र हुआ ।

(३) फिर दुसरे चक्र से देखना किमका अल्प मंदा है ।

जिसका सबसे अल्प अंश हो उसे सबसे पहिले ऊपर रखना उसके बाद क्रमानुसार

बड़े अंश बाले को रखना । इस प्रकार सबसे अधिक अंश वाला ग्रह अंत में रहेगा । ` तीसरा इसे हीनांश्च चक्र कहेंगे ।

यदि हीनांश चक्र में २ ग्रह समान अंश कलादि में हों तो (अ) उनमें से सबसे अधिक बलवान्‌ ग्रह सबसे पहिले रहेगा (व) यदि उनका बल भी समान हो तो अल्प गति वाला पहिले लेना ।

(४) होनांश चक्र पर से पत्यांश वनाकर चक्र ४ में रखा जाता है ।

(५) पत्यांश चक्र से दशा स्पष्ट लेकर पाँचवें चक्र में रखते हैं ।

(६) फिर दशा की अंतदंशा निकाल कर. प्रथम चक्र में रखते हैं । इन सबके

बनाने की रीति आगे दी है ।

हीनांश से पत्यांश बनाना

(१) हीनांश्च चक्र ३ में सबसे पहिले जो ग्रह या लग्न हो और उससे जितने अंश

कलादि हों उसे पहिले पत्यांश चक्र ४ में आरंभ में लिख लो । अर्थात्‌ सव में अल्प

अंश का ग्रह या लग्न एक कोई आरम्भ में लिखा जायगा ।

(२) फिर उससे कुछ वडा अंश वाला जो उसके नीचे दिया हो उसका और

आरम्भ में दिये हुए ग्रह का अंतर निकाल कर नीचे रखो अर्थात्‌ यह पहिले और

दुसरे ग्रह का अन्तर हुआ । फिर इसी प्रकार दुसरे. और तीसरे ग्रह का अन्तर

निकाल कर उसके नीचे लिख दो । ` पश्चात्‌ तीसरे और चोथे ग्रह का अन्तर फिर

चौथे और पाँचवें ग्रह का, इसीप्रकार आठौं ग्रह का अन्तर निकाल कर चक्र ४ पत्यांश

चक्र में एक दुसरे के नीचे रखते जाना । यह पत्याँश चक्र बन गया।

(३) पश्चात्‌ सबका योग कर नीचे लिख देना । यह पत्यांश योग हुआ । ध्यान

रहे कि चक्र ३ में दिये हीनांश चक्र के अंतिम ग्रह के अंश कलादि के समान यह योग

आता है।

११२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

पत्यांश को शुद्धांश भी कहते हैं। क्‍योंकि वह अंशों से शोधन कर निकाला जाता

है । पत्य श योग को सर्वाधिकांश भी कहते हैं 1 क्योंकि यह सबसे अधिक अंश वाले

ग्रह के बराबर होता है । 5

दक्षापाक समय 1 2 दशा के भुक्त होने का समय सौर वर्ष प्रमाण से १ वर्ष के ३६० दिन होते हैं

और सावन मान से दिन ३६५ घ० १५ प० ३१ वि० ३० का होता है।

परन्तु सरलता के लिए कई लोग सौर मान के ३६० दिन के अनुसार ही दशा

साधन करते हैं क्योंकि दोनों रीतियों से ही से करने में बहुत थोड़ा अन्तर

पड़ता है ।

सौर मान से=३६० दिन=२१६०० घड़ी=१२९६००० पल होते हैं । सावन मान

से=दिन ३६५ घ० १५ पल० ३१ वि० ३०=१३१४९३१ पल ३० वि० होते है ।

पत्यांझ का ध्र.व निकालना

गणित की सुगमता के लिए ध्रुव निकाल लेना चाहिए-। पत्यांश दशा का योग

जितने अंशादि हों वह पूरा ३६० दिन में भुक्त होता है तो एक अंश में कितने होंगे

यह निकाळने को वर्ष के दिन प्रमाण में पत्यांश के योग का भाग देना तो घव

निकल आता है । भाग देने की सरलता के लिए अंश कलादिं सबके विकला वना

लेना । इसी प्रकार ३६० दिन के भी घड़ी पळ बना लेना । ३६०दिन=९६० ५ ६०८

२१६०० घड़ी या २१६०० > ६०=१२९६००० पल होते हैं । इस कारण १२९६०००

पल में प्रत्यांश योग की विकला बनाकर भाग देना तो उत्तर दिन घड़ी पल विपछ में

आयगा वही धव होगा 1

वषं दिन _ ३६० _ १२९००० पल _

प्याश योग पत्यांशयोग अंशादि पत्यांश योग विकला षः विन दती

पल विपल ।

ग्रह दशा--ध्रुव > ग्रह पत्यांश-दशा दिन आदि

जिस ग्रह की दशा निकालनी हो उसके चक्र ४ के अनुसार पत्यांश लेकर उसका

गुणा धव में करना तो उस ग्रह की दशा के दिन घड़ी पल आदि निकल आयेंगे ।

गोमुत्रिका क्रम से गुणनफल चक्र की सहायता से दोनों का गुणा कर गुणनफल निकाल

लेना सरळ है जिसकी रीति गणित खंड ज्योतिष शिक्षा भाग ३ में दी है। इसप्रकार

आठौं ग्रह की दशा निकाल कर सवका योग करना । यदि सवका योग ३६० आवे

तो गणित ठीक समझना ।

` इस प्रकार दशा निकाल कर चक्र ५ में रखना । फिर वर्ष प्रवेश के सूर्य में

प्रत्येक ग्रह की दक्षा के दिन जोडते जाना तो उस दशा का ठीक समय निकल आता

है । राशिमें+- मास । अंशमें + दिन । कलामें+घड़ी। विकलामें + पल जोड़कर प्रथम

चक्र बना लेना ।

OP "tro SRR

पत्यांशी दशा साधन का उदाहरण

पत्यांशी दशा साधन : ११३

सम्बत २००१ गताब्द ५५ का वर्ष प्रवेश निकाला । सम्वत्‌ २००२ चैत्र शुक्ल ६ सोमवार इष्ट २९घ०-४४प०-१२॥वि० प्र वर्ष प्रवेश हुआ। इस समय का ग्रह स्पष्ट किया जिस पर से पत्यांशी दशा का साधन करना है। चक १ चक्र २ अंश का

राशि छोड़कर शेष १ सूयं ११र-५९-२३/-९” १ सूर्य ५०-३३०९

२ चंद्र १ -१६-४४-२० २ चंद्र १६- ४४- २०

३ मंगल १०-२--४६-२१ ३ मंगल २- ४६- २१

४ बुध ११--२०-२३-१४ ४ बुध २०--२३- १४ ५ गुर ५--२--१८-३० ४५ गुरु २--१८- ३०

६ शुक्र ०---७--१९-४१ ६ शुक्र ७--१९- ४१ ७ शति २--१२-१-- १ ७ शनि १२-१-- १ ८ लग्न ५-१ ४--१३-१६ ८ लग्न ४-१३- १६

चक्र ३ ' हीनांश

अल्प अंश का पहिले

१ गुरु २०-१८-३०

२ मंगल २-४६ -२१

३ लग्न ४-१३ -१६ ४ सूर्यं ५-३३ -९

५ शुक्र ७-१९ -९१

६ शनि १२-१ --१

७ चन्द्र १६-४४ -२०

८ वुध २०-२३ -२४

हा

चक्र ४ पत्यांश या शुद्धांश चक्र चक्र ५ पत्यांश एक दूसरे से अन्तर की विकला

ग्रह ० 4 1

१ गुरु २-१८-२० =५३१०”

२ मंगल ०-२७-५१ =१६७१

, ३ ठग्न १-२६-५५ ५२१५

४ सुयं १-१९-५३ =४७९२

५ शुक्र १-४६-३२ =६३९२

६ शनि ४-४१-२० =१७८६०

७ चन्द्र ४-४३-१९ =१६९९९

८ बुध ३-३८-५४ =१३१३४

पत्यांश

योग २०-२३-१४ - =१३३९४

प्वुध-२०-२३-१४

¬ _ सर्वाधिकांश

यहाँ चक्र १ वर्ष प्रवेश समय

के ग्रह स्पष्ट दिये हैं ।

चक्र २=चक्र १ में जो ग्रह

स्पष्ट दिये हैं उनकी केवल राशि

छोड़कर शेष अंश कलादि चक्र २

में दिये हैं ।

चक्र ३=चक़् २ में खोजा

तो सबसे अल्प भंश वाला गुरु

२०-१८-३०“ है उसे चक्र ३ में

सवसे ऊपर रखा फिर उसके आगे

उससे कुछ बड़ा अंश वाला ग्रह

रखा इस प्रकार बढ़ती अंश क्रम से

सबसे अधिक अंश वाला ग्रह बुध

२०१०-२३-१४” है वह सबके

अंत में आ गया । इस चक्र में

सबसे कम अंश वाला सबसे ऊपर है भौर क्रमानुसार कुछ बड़े अंश वाले उसके नीचे

रखे गये हैं। यह हीनांश चक्र है 1

चक्र ४=पत्यांश चक्र । इसमें सबसे कम अंश वाला गुरु सबसे ऊपर रखा । फिर

चक्र ३ में देखकर उसके आगे दिये ग्रह का अंतर आगे निकाल कर रखा है । जैसे

चक्र में गुरु के नीचे मंगल है । मंगल और गुरु का अन्तर निकाल कर मंगल के आगे

चक्र ४ में रखा । फिर मंगल और लग्न का अन्तर लग्न के सामने रखा सूर्य और

[+ टर

११४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

लग्न का अन्तर सूर्य के सामने रखा, शुक्र और सूर्य का'अन्तर शुक्रं के सामने रखा।

इसी प्रकार उसके नीचे दिये प्रत्येक ग्रह का अन्तर निकाल करे चक्र ४ में रखा है।

यही पत्यांशं का गणित आगे दिया है। 2

सब पत्यांश का योग करने से २०"-२३/-१४” आया है । यह अंत का ग्रह बुध

के अंश २०१-२३'-१४” सर्वाधिकांश के बराबर आ'गया ।

ग्रह का धव. बनाना

अभी दित क म पछ = दि. घन पर विपलं

“पल योग २००२३१४7 ७३३९४ विकला १७--३९- २९-१३

यहाँ ध्रुव विपल तक-निकाला है -जिससे दशा'मान में अन्तर न पड़े परन्तु दशा

मान केवल दिन घड़ी पल तक लेता । *

ग्रह दशा साधन

ग्रह दक्षा<ध्रःव,> पत्यांश

दि घः पं. वि. दि. घ. प. वि.

(१) घ्रुव १७ ३९ २९ १३ (२) घ्व १७ ३९ २९ १३

गुरु पत्याश २ १८ ३० > मंगल गत्यांश ० २७ ११

६" ३० ११ ३

१४ २३० २४: ३९

१९ २० 3२ ७७-८४

८ ३० १४ २७

३ ५४ ५ १

८ ४२ १३ २

११४ ४२ १७ ३३

५" ६ ७ ३९

०-२६ ० ० ० °°

० ५८ . णत य UR VL

१५ दि, घः प. विः

ss 3.22 अट rs 5S He काला, मंगल दशा र्त : ११ RS वरे 4

१३० ११: ३०7 ३०.

दशा. दि.- घ. प.- वि. -

४० ४५ २३० ` ९६:

NNN SRSTOTD

(३) धव १७ ३९ २९ १३

लग्नपत्यांश _% १ २६ ४५ _

११ ५५

२६ २५

३५ ४५

१५ ३५

५..३८

१२ ३४

१६ ५४

७ २२

१७ ३९: २९ १३

२५३४ ४७ ४ २४ ५५

दि. घ. प, वि.

लग्न दशा २५ ३४ ४७ ४

(५) भव १७--३९--२९--१३

% शुक्र पत्यांश १--४६--३२

६ ५६.

१५ २८

२० ४८

  1. ५८

२२ १४

२९ ५४

१३ ३

१७ ३९ २९ १३

३१:२१ १० ` ४०" ३२ ५६ दि. घ. प. वि.

शुक्र दशा ३१२१-१०-४१

पत्यांशी दशा साधन': ११५

(४) घव १७ ३१ २९ १३

__% सुर्यं पत्यांश १ १९ ५२ _

११ २९

२५ ३७ ३४ २७

५ २३

१७ ३७ २९ १३

२३ ३० ३५ २० ५५ २९

दि... घ..- प..- विल

सूर्यं दशा २३ ३० ३५ २१

(६)' धव .१७--३९--९९--१३

२८ दानि पत्यांश / ४-5४१-२०

४ २०

९ ४०

१३. ०

५ ४०-

८. ५३:

१९ ४९-

२६ ३९% 2

११ ३७

० ५२ १

१ २१६

२ २६

६८ PE

` SE ESSER या दर ४७ ४८ ५९ ३७ २०

शनि दशा ८२-४७-४९ ०

दि. घः' प. वि.

११६ : सचित्रः:ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(७) धुव १७--३९--२९--१३ (८) ध्रुव १७--३९--२९--१३

% चंद्र पत्यांश ४--४३--१९ % बुध पत्यां ३-३८-५४ ;

¥ ७ ११ ४२

“९ ११ २६. ६

१२ २१ ३५ ६

५ २३ ३ १५ १८

९ १९ ८ १४ २० ४७ ११ २२

२७ ५७ २४ ४२

१२ ११ ; १० ४६

० ५२ ० ३९

१ ५६ १ २७

२ ३६ : १ २७

६८ ५१

८३ २२ ५० १८ ३४ ७ ६४ २५ २१ ४१ ३१ ४२

दि. घ. प. वि. बुध दशा ६४--२५--२१--४२

चंद्र दशा ५३-२२-५०१९

पत्यांशी दशा चक्र

ग्रह : दिन घटी पल विपल यहाँ दशा के गणित में विपछ के आगे

१गुरु , ४० ४५ ३८ ५६ ३० से अधिक वचा उसे १ मान लिया और

२ मंगळ ८ ११ ४६ ४३ २० से कम होने पर उसे छोड़ दिया ।

३ लग्त २५ ३४ ४७. ४ तिस पर भी ३६० दिन में ४ विपल कम

४सूये २३ ३० ३५ २१ जाते हैं। उसका कारण यह है कि ध्रूव

५ शुक्र ३१ २१ १० ४१ १७-३९-२९-१३ केवल लिया है विपल

६दशनि ८२ ४७ ४९ ० के आगे भाजक के आधे से अधिक शेष

७चंद्र ८३ २२ ५० १९ बचा है। यदि ध्रुव के १३ विपल के स्थान

८ बुघ ६४ २५ २१ ४२ में १४ मान कर गणित करते हैं तो २ |

योग ३५९ - ५९ ५९ ४६ विपल अधिक बढ़ जाता है। इस कारण ४

3 विपल का अंतर नहीं के बरावर है।

पत्यांश की अंतदंशा साधन

ग्रह दशा मान दशामान पळ

CS = ध्रुव दिन घटी पल

  • पृत्यांद योग पत्यांश योग विकला

अंतर्दशा समय=धव 2 अंतर्ग्रह पत्यांश

पर्त्यांशी दशा साधन : ११७

ग्रह पत्यांश चक्र ४ के अनुसार ही अंश कलादि लेना जेवा ग्रह की दशा निकालने में लिया था।

नीचे दिये चक्र में पत्यांशी दशामान की विपळ छोड़ कर केवल पल तक लिया

है! जह आधे से कम विपल है उसे छोड़ दिया और आधे से अधिक होने से १ मात या है।

जिस ग्रह की दशा होती है उसी ग्रह की अंतर्देशा पहिले होगी पइचात्‌ पत्यांशी

क्रम से आगे के ग्रहों की अंतर्देशा होगी

उदाहरण

पत्यांशी दशा गुरु की दशा आरंभ में है इस लिये गुरु

दिन घ. प. दशा पल की अंतदेशा निकालते को पहिले गुरु का व

१ गुरु ४०-४५-३९-१४६७३९ निकालते हैं।

२ मंगल ५-११-४७- २९५०७ गुरु दशा पल १४३७३९ घव

३लग्न २५-३४-४७=९२०८७ पत्यांश योग विकला ७३३९४

४ सूर्य २३-३०-३५=८४६३५ दिन घ. प. विः

५ शुक्र ३१-२१-११=११२७७१ १-५९-५७३५

६ शनि ८5२-४७-४९-२९८०६९ यहाँ गुरु के दशा पछ में पत्याश के ७ चंद्र ८३-२२-५०=३००१७० योग की विकला से भाग दिया तो उपरोक्त ८ बुध ६४-२५-२२=२३१९२२ ध्रुव गुरु का निकल आया । इस धुव में

योग ३६०-००० प्रत्येक ग्रह के पत्यांश का गुणा करने से गुरु के

पत्यांश योग २०९०-२३-११ "= ३३९४ अंतर में सब ग्रहों की अंतदेशा निकल आयेगी ।

गुरु धुव > अन्तर ग्रह पत्यांश चक्र ४ के अनुसार-अंतर्देशा भोग काल

दि. घ. प.

(१) गुरु धुव % गुरु पत्यांश २०-१८'-३०”=गुरु बंतर्दशा=४-३६-५४ १-५९-५७३५ (चक्र ४ के अनुसार )

दि. घ. प. विः

( ) १-५९”-५७/-३५ मंगल ,, ०=२७-५१=मंगल ,, =०-५५-४१

(३) गत १ > लग्न ,, १-२६-५५-लरन २१ +२-५३-४७

. (४) 1) n रै, सूये १-१९-५३सूय ॥ =९२-३९-४२

(५) # ४ शुक्र ॥, १-४६-३२-शुक्र , =३-३०¬०

(६) 1) 1) % श्नि `, ४-४१-२०शनि „ =९-२२-२९

(५) 5 गर > चन्द्र „ ४-४३-१९-शनि 77 २९-०२६-२७

(८) शा १ बुध - ,, रे-रै५-शे४-बुध ,, =७-१७-३९ ,

सब का योग ८४०-४५-३९

सब अंतर्देशाओं के समय का योग-महादशा के योग काळ के बरावर होता है ।

इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह का. ध्रुव निकाल कर अंतर्दशा निकालनी पडती है । ग्रह के

११८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

धव में प्रत्येक अहू के पत्यांश से .गुणा-करना-पड़ता है वह गौमूत्रिका-क्रम से गुणा | कर लेना चाहिए । प्रत्येक ग्रह के गुणन फल की क्रिया यहाँ देने से अधिक विस्तार

हो जाता. है. इससे .नहीं:दिथा ।

पत्यांश की अंतर्देशा निकालने की दुसरी रीति

( पत्यांश ग्रह दशा मान >९ अंतग्रेंह दशामान ) -:- ३६०८-अंतदेशा दिन घटी पल

जैसे गुरु में गुरु का अंतर “निकालना है तो गुरु. के दशा मान ४०-५५-३९ में गुरु के

दशा मान ४०-४५-३९ का गुणा कर ३६० का भाग देना । फिर गुरु में मंगल की

दशा मान ८-११-४७ का गुणा कर ३६० का भाग देना । इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह |

केः दशा मान का' गुणा गुरु के . दशा मान में कर ३६० का भाग देना तो गुरु की

अंतर्दशा का समय प्रत्येक ग्रह का निकल आयगा ।

उदाहरण ३६०)१६६१-२६-४५(४ दिन

गरु दशा ४०-४५-३९ १४४०

% गुरु मंतर ४०-४५-३८ २२१ २६० “गुरु की अंतर्दशा

२५ २१ १३२६० --२६ दिन घडी पल

२९ ` १५ ' ३६०)१३२८६(३६ घडी ४-३६-५४

२६ ० - , १०००

२९ १५ २४८६

  • ३३ '४७ २१६०

३० ० ३२६.५६०

२६ :० १९५६० +४५

३० ।.० ३६०)१९६०५(५४ पल

१६ ०० ` १८००

१६ ३१ २६ “४५ ५५ “२९ '१६०५

=१६६१-२६-४५-+ ३६० १४३०

१६५

` इसी प्रकार इस रीति से प्रत्येक ग्रह की मंतर्देशा निकाल कर तीतरी है। घ. प

(१) गुदःदशाः४०-४५-३९% गुरु अंतर ग्रह ४०-४५-३९ ¬+ ३६०=गुरु अंतर ४-३६-५४

(२) -.„ .» मंगल ,, .८-११-४७--३६०=मंगल ,, ०-५५-४१ (३) 0 „» 2छूग्त 9 २५-३४-४७--३६०अयग् ,, २-५३-४७ | (४) . „ ४ सुर्यं ,, २३-३०-३५ ३६०=सूये ,, २-३९-४२ _(४) ७ „ «८ शुक्र `, ३१-२१-११+ ३६०=शुक्र , ३-३३ ०

(६) ४, » श्नि. „ ५२-४७-४९ --३६०यशनि » ९-२२-२९ (७) र, „» : ?८चन्द्र „ ४६३-२२-४०--३६०-चन्द्र „९-२६-२७ (€) „» ७ ० ~बुध ` „ ६४२५-२२ ३६०यबुध ,, ७-१७-३९

» पृत्यांशी दशा साधन : ११९

इस प्रकार आया हुआ उत्तर पुवं प्राप्त उत्तर सेःमिछ जाता. है ।

तीसरी रीति पत्यांश की अंतर्देशा निकालने की

[ ग्रह पत्यांश योग काल ( द्रश्ञा समय ) » अन्तग्रेंह पत्यांश ) = पत्या योग

॥ >अंतर्देशा दिन आदि

इस रीति,से गणित.करने में कुछ अधिक अड्चन, होती है इस कारण इस रीति

को सरल: बनाने को पहिली रीति निकाली है। क्योंकि महादशा-या दशामान या

भोग, काल में . पत्यांश योग का भाग देकर पहिले ही ..वहाँ ध.व+निकाल -छिया है

जिससे बार २ भाग देना नहीं पड़ेगा । केवल ध्रव निकाल कर ध्रुव का गुणा अन्तग्रेह

के.पत्यांश में करते,जाने से; अन्तदेद्या का समय निकल आता है । जैसा पहिली रीति

देखने से. प्रगट होगा । उदाहरण--गुद में मंगळ का अन्तर निकालते हँ ।

[| गुरूपत्यांश भोग-काल अन्त्रे मंगल पत्यांश |... पत्यांश योग

४ [ ४०दि.-४५ घः-३९ प. ५ ०९२७-५१ |" ८५०९-२३-१४

= १८-५५-१२ २०-२३-१४ ==६६११२-७३३९४

-दिं. घ. प.

==०-५५-४१ मंगल की अन्तर्दशा

. गुरु की अन्तर्दशा निकाल चुके हैं अब शेष प्रहों की अन्त दंशा निकालते हैं:--

दि. घ. प￾मंगल दशा ८-११-४७-पत्यांश योग २००-२३'-१४'”

=२९५०७ पल ' =७३२९४''

(२) मंगळ का. ध्रुव साधन

मंगल दश्ञा.मानः २९५०७ परू = पत्यांदा- योग ७ ३३९४”=

=दिनःघटी. पल वि.=मंगल का ध्रव

o=२४-७-१ ९

दि. घ. पवि. दि. घः प.

(१): मंगल घव ०-२४-७-१९ %°मंगरू पत्यांश ०९-२७'-५१/=मंगल अंतर ०-११-१२

री... जक TR 0 NE

(३) , 99. 226सूयै », MH ०२२- ७

(४) नश 7) > शुक्र २: १-४६"३२-शुक्र १: ०-४२-५०

(५) 1 71 १८शनि „ ४-४१-२०=शनि „ १-५३८ ६

(६) ठ nt > चन्द्र ५ ४-४३-१९जचन्द्र . ॥ १-५३-५४

(७) गा 1) >खुघ | ` रर - :३-३८7५४्ब्‌घ 9 ३ १६१८" ०

(८) 17) 1s > गुरू. ॥,, २-१६-३०=गुर 11 ०-५५-४१ -योग-८-११-४७

१२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुथं वर्षफल खण्ड

(३) लग्न की अन्तर्देशा साधन

लग्न का धुव निकालना घ. प.

लग्न दशा २५-३४-४७ < पत्यांश योग २०९-२३”-१४”-प्र्‌ व दिनादि

दि. घ. प. वि.

» ११ ९२०८७ पलन ,, ७३३९४=ध्रुव १-१५-१६-५३

दि. घ. प. वि दि घ. प (4) लग्न घव १-१५-१६-५३ % लग्न पत्यांश १०-२६'-५५=कग्न अंतर१-४९-३

(२) 1) श्र > सुय 221 १-१९-५३=सुय २२ १-४०-१४ (३) ० २ _ शुक्र ,„ २-४६-३२नशुक्र , २-१३-४० (४) » „» »शनि , ४-४१-२०-शनि ,, ५-५२-५९ (४) र » श्चन्द्र ,, ४-४३-१९-चन्द्र ,, ५-५५-२८ (६) » » शबुध „ ३-३८-५४न्बुघ ,, ४-३४-३९ (७) 2 रु गुर. ,, २-१८-३०-्युरु ,, २-५३-४६

(६) ऱ्य 7 *मंगल ,, ०-२७-५१-मंगल ,, ०-३४-५७

_ योग-२५-२४-४७

(४) सूर्यं की अन्तदंशा

दि. घ. प. सूये धुव-सूर्यं दशा २३-३०-३५ = पत्यांश योग २००-२३/-१४” दि. घ. प.वि..

= „ ५४६३५पल+ `, ७३३९४'=१-९-११-२२ दि. घ. प. वि दि. घ प.

(१) सूर्यः -ध्रुव १-९-११-२२ > सूर्य पत्यांश १-१९-५३” =सूयं अन्तर १-३२-७

(२) १2 (1) > शुक्र शय १-४६-३०=शुक्र ,, २- २-५२ (३) „ „. शनि ,, ४-४१-३०-शनि , ५-२४-२५ 0000 007...) > चन्द्र , ४-४३-१९-चन्प्र ,, ५-२६-४२ (0) 5 बुध » ३-३८-५४-बुध , ४-१२-२६ WC) जगुर „» ` २-१५-३०गुरु ,, २-३९-४३

(७) ११ २२ > मंगल ,, ०-२७-५१-मंगल' ,, ०-३२- ७

५० i %रुग्न ,, १-२६-५५-७रन ,, १-४५-१४

| योग-२३-३०-३४५ (२) शुक्र अन्तर्दशा

दि०घ० प० . 6. 727४:

शुक्र श्रुव-शुक्रदशा २१-२१-११-- पत्यांश योग २०-२३-१४

दि०्घ० प्‌० वि० ie ११२८७१ पल ,, ७३३९४=१-३२-१६-२१

पत्यांथ दया साचत : ३२३

दि० घ० प० वि० इदेळचरळ

(१) शुक्र ध्रुव १-३२-१६-२१ > शुक्र पत्यांशझ._ १-४६-३२-श्वक्त अंतर २-४३-३०

(९) ७ 12 शति ,, ४-४१-२०य्यनि ,, ५-१२-३९

(३) 7? „» श्चन्द्र „ ४-४३-१९यबन्ः ,, ७-११-४२

(४) ` # » वृध. „ ३-३८-५४बुध „ ५-३६-२९

(५) (1 (11) > गुरु (1 २-१५-३०-गुर १1 २-३३-०

६) ७ ह > मंगल ,, ०-२७-५१-मंगल ,, ०-४२-५०

(७) - १, „. हल र», १-२६-१५-छरन ,, २-१३-४०

(५) ' # ,॥/ >सूर्य ,, १-१९-५३चसूर्य__,, २-२-५१

योग=३१-२१-११

(६) शनि अंतर्दशा

दि घ० प० | 11)

शनि ध्र वन्ञनि दशा ८२-४८-४९ ॐ पत्याँश्च योग २०-२३-१४ दि०घ०प०वि०

= „ २९८०६९पल-ॐ » ७३३९४=४-३-४०-२२

ह दि०घ०प०वि० `) दि०घ०प्‌०

| | शनि ध्रुव ४-३-४०-२२ > शनि पत्यांश ४-४१-२०-शनि अंतर १९- २-३२

२ | 2] > चंद्र 22 ४-४२३-१९-्चन्द्र ,, १९-१ ०-३७

३ i 11 *वुध' ।, ३-३८-५४-बुध „ १४-४९-०

(४) „» „ > गुरु ` „ २-१८-३०ब्र ,, ९-२२-५९

iy ती „» *%मंगल _, ०-२७-५१-मंगल , १-५३-९

(६ 9) „ र?८लग्न , १-२६-५५ , ५०५२०१७

(७) र „ >सूर्य ७ १-१९-५३न्सूर्यं ,, ५०२४-२६

(ब) रा 1 शुक्र ,, '१-४६-२रऱ्शुक्र_,,__७-१२०२९

योग. ८२-४७-४९

(७) चन्द्र अन्तर्दशा

चन्द्र ध्रुव=चन्द्रदशा ८३ दि० २२ घ० ५० ५० न पत्यादा योग २०-२३ १४ दि०्घ०प०वि०

३००१७० पल + = ,, ७३३९४/-४-५-२३-२६

दि०्घ०प०वि० 2१ दि० घ० प०

(१) चन्द्र ध्रुव ४-५-२३-२६ ? चन्द्र पत्यांश ४-४३-१९=चब्द्र अंतर १९-१८-४३

(२) १ 1) % बुध „» ३-३८-५४-बुध A

(३ शां 1) x गुरु र २-१८-३ ण्न्युर 2 ९-२६२७

  1. गर 1? % मंगल गा ०-२७-५१-मगल £ १-५३-२४

(५) हि कः %लग्न » १-२६-५३-छगत्‌ » शशरर

£) कश, १ (सूर्य ,, १-१९श्क्न्सूय. ५ ५-२६-४२

७) छ क > शुक्र #„ १-४६-३२-शुक्र ?ः ७-१५-४२

८) 07 [7] २८ शनि 11 ४-४१-२०-शनि 1) ११-१०-३६

| योग-५८३-०२ २-५०

१२२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

(८) बुध की अन्तदंशा

`;दि० घ० प० 2८०४१४

  • खुध-श्वुव-बुघावशा -९४-२५-२२ -+ पत्यांदा! योग २०-२३-१४

८ दिण्घ०प०वि०

=, २३१९२२ पल पः » ७३३९४=३-९-३५-५१

दि०्घ०प०वि० Be दि० घ०' पळ

(3 वुध ध्रुव ३-९-३५-५१ > बुध पत्यां ३-३८-५३=बुध अंतर ` ११-३१-४३

॥ 12 FT) > गुरु 1) १-१८-३०-गुरु 127 ७-१७-३९. (३) ..,, ,, > मगर, ०-२७-५१=मगलू „, ` १-२८-० (४) , » >रूरन ,, १-२६-५५-छग्न , ४-३४-३९.

00017... />८सूर्य 5, १-१९-५३=सूयं „` ४-१२-२६

६ 22 ‘1 >< शुक्र [2] १-४१-३२ऱशुक्र गा ५-३६-३९ (७ 0 हँ % शनि ,, ४-४१-२०-दनि ,, १४-४९-० [12 (20 NE, ४-४३-१९-चंद्र __, १४-५५-१६

योग=६४-२५-२२ पत्यांश अन्तर्दशा चक्र

(१) .गुरु.की अन्तर्दशा

अन्तर्‌ ग्रह दिन .घटी प्र. सम्वत: सू-रा.अंश कला-वि ० दिन तारीख

२००२ ११ ,५ ३३ ९ से आरम्भ

१'गुर ४ ३६५५४ , “११ १० १० ३ “तक शनि० २४३ १९४५

२.मगल ० ५५ ३१ ,, ११ ११ ५ ४४ «तक इत २५३ १९४५ ३.लग्न २ ५३ ४७ ,, ११ १३ ५९ ३१ “तक मं० २७ ३ १९४५ ,४.सुयं २३९१२ ,, ११ १६ ३९ १३ “तक .. शुक्र ३० ३ १९४५

शशुक्र ३३३ ० ,, ११२० १२१३ तक मं. ३ ४ १९५५ ६ शनि ९२२२९ ११ २९ ३४ ४२ तक गु० १२४१९४५

७ चंद्र ९.२६१७ «० ९.१५९ तक ::इत ..२२ ४ १९४५ _प्खुध ४७१७३९ _ ० १६ १८ ४५ तक सोम० ३० ४ १९४५

“योग ४० ४५ ३९

(२) मंगल की अन्तर्दशा अन्तर ग्र हुः दिन 'घटी' पलः “सम्वत (्सूयें।राशि:अं० क०-वि० (दिन - “तारीख

१ मंगल ०,११ १२ * २००२ ००१६ ३० ० सो० ३० ४ ४५

० ३४ १७ ०:१७ ४ , ५ सो० ३० ४ ४५

०.३२ : ७ :०-१७ ३७ ४ मं) १ ५ ४५ ०.. ४२ ५० ० १८ १९ ५४ बुध २ ५ ४५

१. ५३ ६ ०.२० १३ .० शुक्र ४ ५ ४५ द्र १,५३ ५४ ०२२ ६ ५४ इत. ६ ५ ४५ ७ बुध १.२८ ' ० १०:२४ ३० ३५ मं० ८ ५४५

` योग ८:११ ४७

(३) लग्न की अन्तदेशा

अन्तर ग्रह दिन घटी पलः सम्वत

पत्यांचा दशा: साधन : १२२

राशि अं० क०वि० तक दिन दिनांक

“१ लग्न १ ४९ ३. २००२ ० २६-१९ ३८ .गुरु”:१० ५. ४९.

२-सूर्य १ ४० १४ ० २७ ५९ ५२ शनि'१२ ५ ४५

३-शुक्र २ १३ ४० १ ०१३ ३२ सोम.१४ ५ ४५

४ शनि २-५२ ५९ १ ६ ६ ३१ 'इत.' २० ५ ४५

५-चंद्र ५ ५५ २८ १ १२ १ ५९ शनि. २६ ५ ४५

६ वुध ४ ३४ ३९ १ १६ ३६ ३८ गुरु, ३१ ५ ४५

७ गुरु २ ५३ ४७ १ १९३० २५ इत. ३६ है 8.

८ मंगल ० ३४ ५७ १ २० ५ २२ सोम. ४ ६ ४५

योग २५ ३४ ४७

(४) सूर्य की अन्तर्दशा

अन्तर ग्रह दिनः घटी परू सम्वत राशि अं०'क०'वि० बार:दिनांक

१सू्यं १३२ ७२००२ १ २१? ३७:२९ तक मंगल ५ जून ४५.

२शुक्र २ २५० १ २३ ४० १९ “गुरु. ७ जून ४५

३शनि २२४-२५ -१ २९ ४ ४४ बुध. १३ जून४५

४ चंद्र ५ २६ ४३ २ ४ ३१ २७ “मंगल १९ जून ४५

५ बुध ४ १२ २६ २ ८ ४३ ५३ "शनि २३ जून ४५

६ गुरु २-३९ ४४३ २ ११ २३ ३६ ' चंद्र २६ जून ४५

७ मंगल ० ३२०७ २ ११ ५५ ४३. बुध २७जून ४५

८ लग्न १ ४० १४ २ १३ १५ १७ गुरु रण्जून है. 1.4

योग २२ ३० ३५

(५) शुक्र अन्तदेशा ;

अन्तर ग्रह दिन घटी पल सम्वत सय राशि अं ०'क० वि० बार दिनांक

२ १६ १९ ४७ तक इतवार १ जुलाई ४५

२२३ ३२२६ सोम. ९ जुलाई ४५

३ ०४८ ८ मं० “१७ जुलाई ४५

३ ६२४४७ ` इत. २२ जुलाई ४५

३ ९ ५७ ४७ गुरु. २६ जुलाई ४५

१ शुक्र २ ४३ ५० २००२

२ शनि ७ १२ ३९

३ चंद्र ७१५४२

४ बुध ५ ३६ ३९

५ गुरु ३३३ ०

६ मं० ० ४२ ५० ३ १० ४७ ३७ शुक्र २७ जुलाई ४५

७ लग्न २ १३ ४० ३ १२५४१७ इत. २९ जुलाई ४५

८ सूये २ २ ५१ ३ १४५७ ८ _३१ जुलाई ४५

nemo oon

योग ३१ २१ ११

se क्क,

१२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, चतुर्थ वर्षफल खण्ड

१६) शनि अन्तदंशा

अन्तर ग्रह दिन घटी पल सम्वत

१ शनि १९ २ ३३ २००२

२ चंद्र १९ १० ३७:

३ वुध १४ ४९ ०

१४ गुरु ९ २२ २९

५ मंगल १ ५३ ६

३ लगन ५ ५२ ५९

७ सूयं ५ २४ २६

८ शुक्र ७ १२ ३९

योग ८२ ४७ ४९

(७) चन्द्र की अन्तदेशा

अत्तर ग्रह दिन घ. प. सम्वत्‌

७ शति १४ ४९ ०

. १४ ५५ १६

. योग ६४ २५ २२

५ १ चंद्र १९ १८ ४३ २००२ -

२ वुध १४ ५५ १६ हे गुद ९२६२७

४ मंगल १ ५३ ५४

५ लत ५५५२९ ६ सूयं ५ २६ ४३

७ शुक्र ७ १५ ४२

= शनि १९ १० ३६

योग ८३ २२ ५०

९८) बुध अन्तदंशा

अन्तर ग्रह दिन घ० प० सम्बत्‌

१ बुध ११. ३१ ४३ २००२ -

२ गुरु | ७ १७ ३९: ::

है मंगळ १ २८ ०

४ लग्न ४ ३९ २९ + सूर्य ४ १२ २६

& शुक्र ५ ३६ ३९

सूर्य राशि अंग क० वि० वार दिनांक

४ ३ ४५९ ४१ तक सोम. २० अगस्त४५

४ २३ १० १८

५ ७ ५९ १८

४ १७ २१ ४३

५१९ १४ ५२

५२५ ७ ५२

६ ० ३२ १८

६ ७ ४४ ५७

इत. ९ सितंबर४५

सोम.२४ सितंबर४५

गुरु. ४ अक्टूवरई५

शनि ६ अक्टूबर४५

शुक्र १२ अक्टूबर४५

बुध १७ अक्दूबर४५

बुध २४ अक्टूवर४५

सूर्य राशि अं० क० वि० ` वार. दिनांक

६ २७ ३-४० तक मंगल १३--११-४५

७ ११ ५८ ५६ मंगल २७-११-४५ `

७ २१ २५ २३ शुक्रवार ७-१२-४५

७ २३ १९ १७ इतवार « ९-१२-४५

७ २९ १४ ४६ ` शुक्रवार १४-१२, ५ .

८ ४ ४१२९ गुरुवार २०-१२-४५

८ ११ ५७ ११ गुरुवार २७-१२-४५

९ १ ७ ४७ सोमवार १४- १-४६

सूये राशि अं क० विष बार दिनांक

९ १२ ३९ ३० तक शनि० २६-१-४६

९ १९ ५७ ९ शनि० २-२-४६

९ २१२५ ९ इतवार ३-२-४६

९ २५ ५९ ४८ शुक्रवार ८-२-४६

१० ०१२१४ मंगल १२-२-४६

१० ५४८ ५३ सोम० १८-२-४६

१० २० ३७ ५३ सोम° ४-३-४६

११ ५३३ ९ मंगल १९-३-४६

न्यु

पत्यांशी दशा साधन : १२%

मात प्रवेश की पत्यांशी दशा साधन

वर्ष प्रवेश के सदृश मास प्रवेश में भी पत्यांश दशा निकाली जाती है ।

रीति-( मास के दिन ३०१८ पत्यांश ) + पत्यांश योग

जैसे वर्ष में ३६० दिन में पत्यांश योग का” भाग देकर ध्रुव निकालते हैं उसी

प्रकार यहाँ ३० दिन में ही पत्यांश योग का भाग देकर जो दिन घड़ी पल आता है

वही धव होता है ।

जिस ग्रह की मास पत्यांश दशा निक्रालनी हो इसी धुव में उस ग्रह के पत्यांशः

का गुणा करने से उस ग्रह की मास दशा का पाक समय निकल आता है। इन सब

ग्रहों की दशा का योग ३० दिन होना चाहिए । तब समझना गणित ठीक है।

रीति-३० दिन = पत्यांश योग=ध्रुव । घव > ग्रह पत्यांश-ग्रह दशा

इस दशा को साधन करने के निमित्त मास प्रवेश काल के इष्ट कालीन ग्रह

और लग्न पहले साधन कर लेना आवश्यक है । जैसा कि वर्ष प्रवेश. काल के इष्ट

काल के ग्रह और लग्न साधन कर उस पर से वषे की पत्यांश दशा निकाली गई थी

उसी प्रकार मास प्रवेश काल के इष्ट पद से ग्रह और लग्न पर से मास की पत्यांशी

दशा निकाली जाती है। ,

उदाहरण के लिए मान लो जैसे यहाँ वषे प्रवेश में ग्रह स्पष्ट आदि लिए हैं

वही प्रथम मास प्रवेश में ग्रह स्पष्ट छर्ने आदि हैं जिस पर से मास की पत्यांशी

दशा साधन करते हैं ।

३० दिन=१०८००० पल-:-पत्यांश २०”-१३'-१४/-७३३९४”

दिन घ० प० विर १०८०००--७३३९४=ध्र्‌ब १-२८-१७-२६

मास पत्यांश दशा

दिन घ० प० वि० OSA दि० घ० प०

(१) धुव १-१८-१७-२६ गुरु पत्यांश २-१८-३०=गु दशा ३-२३-४९.

(२) ,, ,, %मंगल पत्यांश ०-२७-५१=मंगल दशा ०-४०-५९

(३) „ „ > लर्न पत्यां्च १-२६-५५-७रग्न दशा २- ७-५४

` (४) » ,, सूर्य पत्यांश १-१९-५३स्सूर्य दशा १-५७-३३

(५) „ „ %शुक्र पत्यांश १-४६-२र-शुक्र दशा २-३३-४६

(६) 1s 11 X दानि पत्याश ४-४१-२०=शनि दशा ६-५३-५९

(७) ,, „ > चंद्र पत्यांश ४-४३-१९ऱ्चंद्र दशा ६-५६-५४

(८) » ,, > वुध पत्यांश ३-२८-४४-बुध दशा ५०२२- ६

योग=३०- ०- ०

ह इसका समय सम्वत आदि सूर्य राशि अंश आदि में जोड कर पुर्व बताई हुई

.रीति से निकाल लेना चाहिए । र ७

अध्याय १५

सहम विचार

सृहमज्पारशीय पद सद्य वाची है। समर सिंह के मत से ४८ सहम है .। यवन

मत से ५० हैं. परन्तु कहीं. अधिक भी कहे गये है ।

सहम साधन : -

(१) सहम साधन के लिए ग्रह-स्पष्ट और भाव स्पष्ट लेना। ग्रह और लग्न के

अतिरिक्त. सहम साधन के लिए. कभी-कभी” और भी भाव की आवश्यकता पड़

जाती है।

(२) सहम-जन्म समय के. या वर्ष प्रवेश के समय का या कोई प्रश्‍न काळ का

बनाया जाता है । न

(३) जन्म दिन का है या रात्रि का या वर्ष प्रवेश दिन में हुआ या रात्रि में इस

चात का ध्यान रख कर सहम साधन करना पड़ता है । क्योंकि रात्रि या दिन के

विचार से क्रिया में परिवर्तन हो जाता है 1

(४) सहम निकालने के लिए किसी ग्रह या लग्न आदि से किसी दुसरे ग्रह या

भाव को घटाना पड़ता है * फिर: लगन “आदि जोड़ना पड़ता है। प्रत्येक सहम बनाने

की पृथक-पृथक क्रिया होती है जो आगे दी है ।

(५) उपरोक्त क्रिया के अतिरिक्त शोध्यक्ष संस्कार भी प्रत्येक सहम साधन करते

समय करना पड़ता है ।

(अ) शुद्धघा श्रय--शोधक-जिसमें से कोई संख्या घटाई जाती है ।

(ब) शोध्यर्क्ष-शोध्य-जिस संख्या. को. घटाते हैं ।

(क) यदि शोध्य ग्रह की राशि में. शोधक ग्रह तक ळग्न न हो तो एक राशि

और जोड़नी पड़ती है। यदि बीच में लग्न हो तो १ नहीं जोड़ना पड़ता । इसीको

शुद्धाय संस्कार कहते हैं । ३

(ख) कहीं-कहीं शोध्य और शुद्धाश्वय ( शोधक') के बीच लग्न का विचार नहीं

होता, किसी मोर ग्रह का विचार होता है। ऐसे अवसर परं वहाँ स्पष्ट बता दिया

८ डे कि शुद्धाश्वय संस्कार में .छग्न का विचार न कर किसका विचार करना चाहिये। . ` (६) शुदाभय-संस्कार - (म) शोध्ये से शृद्धाश्रय तक लग्न न हो तो १ राशि जोड़ना अन्यथा नहीं । क हु (ब) यां शुद्धांश्रय से शोध्य तक करने हो तो १ राशि जोड़ना अन्यथा नहीं थाँतु जो शोध्य और शोधक तक के बीच लग्न हो तो १ नहीं जोड़ना पड़ता । या

=

UR LN

सहम विचार : १२७

शोधक से शोध्य तक के. बीच लग्नं न हो तो १ नहीं जोड़नां पड़ता ' यदि बीच में

रूग्न हो तो १ जोड़ना पड़ता है।

उदाहरण--मान लो पुण्य सहम निकालना है । दिन का वर्ष प्रवेश है।

सूयं स्पष्ट ७रा-1००-१५-४ पुण्य सहम = दिन-( चंद्र स्पष्टनसूयं. स्पष्ट )+लग्न

चंद्र स्पष्ट ९ -. ६-८ -१०- चंद्र ९- ६० ८-१० से स्शुद्धाश्यच्शोधक

खरत्‌ १०-११- ४-१ है -सूयं ७--१०--१५--४ घटायाऱशोध्यक्षं-शोध्य

शेषः १-२५--५३--६ लग्न १०८-११-४-१

योग ०-६-५७-७

०. पुण्य सहम शुद्धाश्रय 'संस्कार--१

१रा-६०-५७'-७'” = १— ६-५७-७

यहाँ शोध्य सूर्यं वृश्चिक राशि का है इसके आगे शोधक चंद्र मकरं राशि का है।

क्योंकि लग्ने कुम्भ राशि है । इससे १ राशि जोड़ना पड़ा ।

जब छग्न शोष्य और शोधक के बीचे में नहीं है तो अवश्य शोधक और शोध्य के

बीच में होगा । यहां शोधक मकर राशि का है इसके आगे लग्न कुम्भ राशि है । आगे

शोध्य सूर्य कुम्भ मीन के उपरांत मेष वृष आदि को पार करके वृश्चिक का है। इस

कारण शोधक और शोध्य के बीच लग्न होने से १ राशि जोड़ना पड़ाः। इसके विरुद्ध

होता तो:१ नहीं जोड़ना पड़ता । इस-१ को- जोड़ने से स+ ऐक्य=सैक्य करना भी

कहते हैं । (७) आगे सहम की क्रिया देखने: से! प्रगठ है शकि सव सहमों के अन्त में लग्न नहीं

जोडा जाता किसी में बुध किसी में मंगळ किसी में शनि।आदिः ग्रह/या किसी में

षष्ठं भाव या सूर्य या चंद्र की' राशिं'आदि जोड़ी जाती है । जब लग्न नहीं जोड़ा

जांतौ तो जो कुछ भी जोड़ा जाता है उसी के सम्वन्ध में विचार करना होगा

कि वह शोधक और शोध्य के बीच में क्या है? यदि हो तो १ राशि अंत में

जोड़ना पड़ेगा । यह सव सहम के उदाहरण में दिये हैं जिनको देखने से समझ

में आ जायगा। पर ५

(८) एक सहम के कई नांम हैं या कई समय की एक ही क्रिया है । इससे उनकी

पृथक पृथक गणना करने से सहम की संख्या बढ़ जाती है।.

(९) सहम के विचार में पहिले यह देखना कि किस विषय के निमित्त सहम का

विचार करना है। फिर उसी सम्बन्धी भाव से सहम की कल्पना करना, जैसे

भाइयों के लिए तृतीय भाव को, स्त्री के लिए सप्तम भाव को लग्न जानकर

पुण्य आदि सहम कल्पना करना ऐसा किसी का मत है ।

(१०) क्षेपकञ्शोधक और शोध्य से घटाने के पश्चात्‌ जो जोडा जाता दै उसे क्षेपक

कहते हैं । बहुधा क्षेपक लग्न होता है । जिनमें क्षेपक नहीं कहा' वहाँ लग्न को