श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
इसमें एक तात्त्विक बात और है। कर्मोंके फलरूपमें जो अनुकूल परिस्थिति आती है, उससे सुख ही होता है और प्रतिकूल परिस्थिति आती है, उससे दुःख ही होता है—ऐसी बात है नहीं। जैसे, अनुकूल परिस्थिति आनेपर मनमें अभिमान होता है, छोटोंसे घृणा होती है, अपनेसे अधिक सम्पत्तिवालोंको देखकर उनसे ईर्ष्या होती है, असहिष्णुता होती है, अन्तःकरणमें जलन होती है और मनमें ऐसे दुर्भाव आते हैं कि उनकी सम्पत्ति कैसे नष्ट हो तथा वरुपर उनको नीचा दिखानेकी चेष्टा भी होती है। इस तरह सुख-सामग्री और धन-सम्पत्ति पासमें रहनेपर भी वह सुखी नहीं हो सकता। परन्तु बाहरी सामग्रीको देखकर अन्य लोगोंको यह भ्रम होता है कि वह बड़ा सुखी है। ऐसे ही किसी विरक्त और त्यागी मनुष्यको देखकर भोग-सामग्रीवाले मनुष्यको उसपर दया आती है कि बेचारेके पास धन-सम्पत्ति आदि सामग्री नहीं है, बेचारा बड़ा दुःखी है! परन्तु वास्तवमें विरक्तके मनमें बड़ी शान्ति और बड़ी प्रसन्नता रहती है। वह शान्ति और प्रसन्नता धनके कारण किसी धनीमें नहीं रह सकती। इसलिये धनका होनामात्र सुख नहीं है और धनका अभावमात्र दुःख नहीं है। सुख नाम हृदयकी शान्ति और प्रसन्नताका है और दुःख नाम हृदयकी जलन और सन्तापका है।
पुण्य और पापका फल भोगनेमें एक नियम नहीं है। पुण्य तो निष्कामभावसे भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त हो सकता है; परन्तु पाप भगवान्के अर्पण करनेसे समाप्त नहीं होता। पापका फल तो भोगना ही पड़ता है; क्योंकि भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध किये हुए कर्म भगवान्के अर्पण कैसे हो सकते हैं? और अर्पण करनेवाला भी भगवान्के विरुद्ध कर्मोंको भगवान्के अर्पण कैसे कर सकता है? प्रत्युत भगवान्की आज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्के अर्पण होते हैं। इस विषयमें एक कहानी आती है।
एक राजा अपनी प्रजासहित हरिद्वार गया। उसके साथमें सब तरहके लोग थे। उनमें एक चमार भी था। उस चमारने सोचा कि ये बनिया लोग बड़े चतुर होते हैं। ये अपनी बुद्धिमानीसे धनी बन गये हैं। अगर हम भी उनकी बुद्धिमानीके अनुसार चलें तो हम भी धनी बन जायें! ऐसा विचार करके वह एक चतुर बनियेकी क्रियाओंपर निगरानी रखकर चलने लगा। जब हरिद्वारके ब्रह्मकुण्डमें पण्डा दान-पुण्यका संकल्प कराने लगा, तब उस बनियेने कहा—'मैंने अमुक ब्राह्मणको सौ रुपये उधार
दिये थे, आज मैं उनको दानरूपमें श्रीकृष्णार्पण करता हूँ!' पण्डेने संकल्प भरवा दिया। चमारने देखा कि इसने एक कौड़ी भी नहीं दी और लोगोंमें प्रसिद्ध हो गया कि इसने सौ रुपयोंका दान कर दिया, कितना बुद्धिमान् है! मैं भी इससे कम नहीं रहूँगा। जब पण्डेने चमारसे संकल्प भरवाना शुरू किया, तब चमारने कहा—'अमुक बनियेने मुझे सौ रुपये उधार दिये थे तो उन सौ रुपयोंको मैं श्रीकृष्णार्पण करता हूँ।' उसकी ग्रामीण बोलीको पण्डा पूरी तरह समझा नहीं और संकल्प भरवा दिया। इससे चमार बड़ा खुश हो गया कि मैंने भी बनियेके समान सौ रुपयोंका दान-पुण्य कर दिया!
सब घर पहुँचे। समयपर खेती हुई। ब्राह्मण और चमारके खेतोंमें खूब अनाज पैदा हुआ। ब्राह्मण देवताने बनियेसे कहा—'सेठ! आप चाहें तो सौ रुपयोंका अनाज ले लो, इससे आपको नफा भी हो सकता है। मुझे तो आपका कर्जा चुकाना है।' बनियेने कहा—'ब्राह्मण देवता! जब मैं हरिद्वार गया था, तब मैंने आपको उधार दिये हुए सौ रुपये दान कर दिये।' ब्राह्मण बोला—'सेठ! मैंने आपसे सौ रुपये उधार लिये हैं, दान नहीं लिये। इसलिये इन रुपयोंको मैं रखना नहीं चाहता, ब्याजसहित पूरा चुकाना चाहता हूँ।' सेठने कहा—'आप देना ही चाहते हैं तो अपनी बहन अथवा कन्याको दे सकते हैं। मैंने सौ रुपये भगवान्के अर्पण कर दिये हैं, इसलिये मैं तो लूँगा नहीं।' अब ब्राह्मण और क्या करता? वह अपने घर लौट गया।
अब जिस बनियेसे चमारने सौ रुपये लिये थे, वह बनिया चमारके खेतमें पहुँचा और बोला—'लाओ मेरे रुपये। तुम्हारा अनाज हुआ है, सौ रुपयोंका अनाज ही दे दो।' चमारने सुन रखा था कि ब्राह्मणके देनेपर भी बनियेने उससे रुपये नहीं लिये। अतः उसने सोचा कि मैंने भी संकल्प कर रखा है तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे? ऐसा सोचकर चमार बनियेसे बोला—'मैंने तो अमुक सेठकी तरह गंगाजीमें खड़े होकर सब रुपये श्रीकृष्णार्पण कर दिये, तो मेरेको रुपये क्यों देने पड़ेंगे?' बनिया बोला—'तरे अर्पण कर देनेसे कर्जा नहीं छूट सकता; क्योंकि तूने मेरेसे कर्जा लिया है तो तेरे छोड़नेसे कैसे छूट जायगा? मैं तो अपने सौ रुपये ब्याजसहित पूरे लूँगा; लाओ मेरे रुपये।' ऐसा कहकर उसने चमारसे अपने रुपयोंका अनाज ले लिया।
इस कहानीसे यह सिद्ध होता है कि हमारेपर दूसरोंका जो कर्जा है, वह हमारे छोड़नेसे नहीं छूट सकता। ऐसे ही हम
श्लोक १२ ]
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भगवदानुसार शुभकर्मोंको तो भगवान्के अर्पण करके उनके बन्धनसे छूट सकते हैं, पर अशुभकर्मोंका फल तो हमारेको भोगना ही पड़ेगा। इसलिये शुभ और अशुभ-कर्मोंमें एक कायदा, कानून नहीं है। अगर ऐसा नियम बन जाय कि भगवान्के अर्पण करनेसे त्रृण और पाप-कर्म छूट जायँ तो फिर सभी प्राणी मुक्त हो जायँ; परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। हाँ, इसमें एक मार्मिक बात है कि अपने-आपको सर्वथा भगवान्के अर्पित कर देनेपर अर्थात् सर्वथा भगवान्के शरण हो जानेपर पाप-पुण्य सर्वथा नष्ट हो जाते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका छाछठवों श्लोक)।
दूसरी शंका यह होती है कि धन और भोगोंकी प्राप्ति प्रारब्ध कर्मके अनुसार होती है—ऐसी बात समझमें नहीं आती; क्योंकि हम देखते हैं कि इनकम-टैक्स, सेल्स-टैक्स आदिकी चोरी करते हैं तो धन बच जाता है और टैक्स पूरा देते हैं तो धन चला जाता है तो धनका आना-जाना प्रारब्धके अधीन कहाँ हुआ? यह तो चोरीके ही अधीन हुआ!
इसका समाधान इस प्रकार है। वास्तवमें धन प्राप्त करना और भोग भोगना—इन दोनोंमें ही प्रारब्धकी प्रधानता है। परन्तु इन दोनोंमें भी किसीका धन-प्राप्तिका प्रारब्ध होता है, भोगका नहीं और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है, धन-प्राप्तिका नहीं तथा किसीका धन और भोग दोनोंका ही प्रारब्ध होता है। जिसका धन-प्राप्तिका प्रारब्ध तो है, पर भोगका प्रारब्ध नहीं है, उसके पास लाखों रुपये रहनेपर भी बीमारीके कारण वैद्य, डॉक्टरके मना करनेपर वह भोगोंको भोग नहीं सकता, उसको खानेमें रूखा-सूखा ही मिलता है। जिसका भोगका प्रारब्ध तो है, पर धनका प्रारब्ध नहीं है, उसके पास धनका अभाव होनेपर भी उसके सुख-आराममें किसी तरहकी कमी नहीं रहती। उसको किसीकी दयासे, मित्रतासे, काम-धंधा मिल जानेसे प्रारब्धके अनुसार जीवन-निर्वाहकी सामग्री मिलती रहती है।
अगर धनका प्रारब्ध नहीं है तो चोरी करनेपर भी धन नहीं मिलेगा, प्रत्युत चोरी किसी प्रकारसे प्रकट हो जायगी तो बचा हुआ धन भी चला जायगा तथा दण्ड और मिलेगा। यहाँ दण्ड मिले या न मिले, पर परलोकमें तो दण्ड जरूर मिलेगा। उससे वह बच नहीं सकेगा। अगर प्रारब्धवश चोरी करनेसे धन मिल भी जाय तो भी उस धनका उपभोग नहीं हो सकेगा। वह धन बीमारोंमें, चोरीमें, डाकेमें, मुकदमेमें, ठगाईमें चला जायगा। तात्पर्य यह है कि वह धन जितने दिन टिकनेवाला है, उतने ही दिन टिकेगा और फिर नष्ट हो जायगा। इतना ही नहीं, इनकम-टैक्स आदिकी चोरी करनेके जो संस्कार भीतर पड़े हैं, वे संस्कार जन्म-जन्मान्तरतक उसे चोरी करनेके लिये उकसाते रहेंगे और वह उनके कारण दण्ड पाता रहेगा।
अगर धनका प्रारब्ध है तो कोई गोद ले लेगा अथवा मरता हुआ कोई व्यक्ति उसके नामसे वसीयतनामा लिख देगा अथवा मकान बनाते समय नींव खोदते ही जमीनमें गड़ा हुआ धन मिल जायगा, आदि-आदि। इस प्रकार प्रारब्धके अनुसार जो धन मिलनेवाला है, वह किसी-न-किसी कारणसे मिलेगा ही। परन्तु मनुष्य प्रारब्धपर तो विश्वास करता नहीं, कम-से-कम अपने पुरुषार्थपर भी विश्वास नहीं करता कि हम मेहनतसे कमाकर खा लेंगे। इसी कारण उसकी चोरी आदि दुष्कर्मोंमें प्रवृत्ति हो जाती है, जिससे हृदयमें जलन रहती है, दूसरोंसे छिपाव करना पड़ता है, पकड़े जानेपर दण्ड पाना पड़ता है, आदि-आदि। अगर मनुष्य विश्वास और सन्तोष रखे तो हृदयमें महान् शान्ति, आनन्द, प्रसन्नता रहती है तथा आनेवाला धन भी आ जाता है और जितना जीनेका प्रारब्ध है, उतनी जीवन-निर्वाहकी सामग्री भी किसी-न-किसी तरह मिलती ही रहती है।
जैसे व्यापारमें घाटा लगना, घरमें किसीकी मृत्यु होना, बिना कारण अपयश और अपमान होना आदि प्रतिकूल
१-सर्वथा त्यागीको भी अनुकूल वस्तुएँ बहुत मिलती हुई देखी जाती हैं (यह बात अलग है कि वह उन्हें स्वीकार न करे)। त्यागमें तो एक और विलक्षणता भी है कि जो मनुष्य धनका त्याग कर देता है, जिसके मनमें धनका महत्त्व नहीं है और अपनेको धनके अधीन नहीं मानता, उसके लिये धनका एक नया प्रारब्ध बन जाता है। कारण कि त्याग भी एक बड़ा भारी पुण्य है, जिससे तत्काल एक नया प्रारब्ध बनता है।
धान नहीं धीगों नहीं, नहीं रूपयों रोक। जीमण बैठे रामदास, आन मिलें सब थोक॥
२-प्राप्तव्यमर्थ लभते मनुष्यो दैवोऽपि तं लङ्घयितुं न शक्तः। तस्मान् शोचाभि न विस्मयो मे यदस्मीदीयं न हि तत्परेषाम्॥
(पंचतन्त्र, मित्रसम्प्राप्ति ११२)
‘प्राप्त होनेवाला धन मनुष्यको मिलता ही है, दैव भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकता। इसलिये न तो मैं शोक करता हूँ और न मुझे विस्मय ही होता है; क्योंकि जो हमारा है, वह दूसरोंका नहीं हो सकता।’
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
परिस्थितिको कोई भी नहीं चाहता, पर फिर भी वह आती ही है, ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी आती ही है, उसको कोई रोक नहीं सकता। भागवतमें आया है—
सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गं नरक एव च । देहिनां यद् यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद् बुधः ॥
(११।८।१)
‘राजन्! प्राणियोंको जैसे इच्छाके बिना प्रारब्धानुसार दुःख प्राप्त होते हैं, ऐसे ही इन्द्रियजन्य सुख स्वर्गमें और नरकमें भी प्राप्त होते हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह उन सुखोंकी इच्छा न करे।’
जैसे धन और भोगका प्रारब्ध अलग-अलग होता है अर्थात् किसीका धनका प्रारब्ध होता है और किसीका भोगका प्रारब्ध होता है, ऐसे ही धर्म और मोक्षका पुरुषार्थ भी अलग-अलग होता है अर्थात् कोई धर्मके लिये पुरुषार्थ करता है और कोई मोक्षके लिये पुरुषार्थ करता है। धर्मके अनुष्ठानमें शरीर, धन आदि वस्तुओंकी मुख्यता रहती है और मोक्षकी प्राप्तिमें भाव तथा विचारकी मुख्यता रहती है।
एक ‘करना’ होता है और एक ‘होना’ होता है। दोनों विभाग अलग-अलग हैं। करनेकी चीज है—कर्तव्य और होनेकी चीज है—फल। मनुष्यका कर्म करनेमें अधिकार है, फलमें नहीं—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ’ (गीता २।४७)। तात्पर्य यह है कि होनेकी पूर्ति प्रारब्धके अनुसार अवश्य होती है, उसके लिये ‘यह होना चाहिये और यह नहीं होना चाहिये’—ऐसी इच्छा नहीं करनी चाहिये और करनेमें शास्त्र तथा लोक-मर्यादाके अनुसार कर्तव्य-कर्म करना चाहिये। ‘करना’ पुरुषार्थके अधीन है और ‘होना’ प्रारब्धके अधीन है। इसलिये मनुष्य करनेमें स्वाधीन है और होनेमें पराधीन है। मनुष्यकी उन्नतिमें खास बात है—‘करनेमें सावधान रहे और होनेमें प्रसन्न रहे।’ क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध—तीनों कर्मोंसे मुक्त होनेका क्या उपाय है?
प्रकृति और पुरुष—ये दो हैं। प्रकृति सदा क्रियाशील है, पर पुरुषमें कभी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध माननेवाला ‘प्रकृतिस्थ’ पुरुष ही कर्ता-भोक्ता बनता है। जब वह प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है, तब उसपर कोई भी कर्म लागू नहीं होता।
प्रारब्ध-सम्बन्धी अन्य बातें इस प्रकार हैं—
(१) बोध हो जानेपर भी ज्ञानीका प्रारब्ध रहता है—
यह कथन केवल अज्ञानियोंको समझानेमात्रके लिये है। कारण कि अनुकूल या प्रतिकूल घटनाका घट जाना ही प्रारब्ध है। प्राणीको सुखी या दुःखी करना प्रारब्धका काम नहीं है, प्रत्युत अज्ञानका काम है। अज्ञान मिटनेपर मनुष्य सुखी-दुःखी नहीं होता। उसे केवल अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान होता है। ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत सुख-दुःखरूप विकार होना दोषी है। इसलिये वास्तवमें ज्ञानीका प्रारब्ध नहीं होता।
(२) जैसा प्रारब्ध होता है, वैसी बुद्धि बन जाती है। जैसे, एक ही बाजारमें एक व्यापारी मालकी बिक्की कर देता है और एक व्यापारी माल खरीद लेता है। बादमें जब बाजार-भाव तेज हो जाता है, तब बिक्की करनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नफा होता है; और जब बाजार-भाव मन्द हो जाता है, तब बिक्की करनेवाले व्यापारीको नफा होता है तथा खरीदनेवाले व्यापारीको नुकसान होता है। अतः खरीदने और बेचनेकी बुद्धि प्रारब्धसे बनती है अर्थात् नफा या नुकसानका जैसा प्रारब्ध होता है, उसीके अनुसार पहले बुद्धि बन जाती है, जिससे प्रारब्धके अनुसार फल भुगताया जा सके। परन्तु खरीदने और बेचनेकी क्रिया न्याययुक्त की जाय अथवा अन्याययुक्त की जाय—इसमें मनुष्य स्वतन्त्र है; क्योंकि यह क्रियमाण (नया कर्म) है, प्रारब्ध नहीं।
(३) एक आदमीके हाथसे गिलास गिरकर टूट गया तो यह उसकी असावधानी है या प्रारब्ध?
कर्म करते समय तो सावधान रहना चाहिये, पर जो (अच्छा या बुरा) हो गया, उसे पूरी तरहसे प्रारब्ध—होनहार ही मानना चाहिये। उस समय जो यह कहते हैं कि यदि तू सावधानी रखता तो गिलास न टूटता—इससे यह समझना चाहिये कि अब आगेसे मुझे सावधानी रखनी है कि दुबारा ऐसी गलती न हो जाय। वास्तवमें जो हो गया, उसे असावधानी न मानकर होनहार मानना चाहिये। इसलिये करनेमें सावधान और होनेमें प्रसन्न रहे।
(४) प्रारब्धसे होनेवाले और कुपथ्यसे होनेवाले रोगमें क्या फरक है?
कुपथ्यजन्य रोग दवाईसे मिट सकता है; परन्तु प्रारब्धजन्य रोग दवाईसे नहीं मिटता। महामृत्युंजय आदिका जप और यज्ञ-यागादि अनुष्ठान करनेसे प्रारब्धजन्य रोग भी कट सकता है, अगर अनुष्ठान प्रबल हो तो।
श्लोक १२ ]
- साधक-संजीवनी *
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रोगके दो प्रकार हैं—आधि (मानसिक रोग) और व्याधि (शारीरिक रोग)। आधिके भी दो भेद हैं—एक तो शोक, चिन्ता आदि और दूसरा पागलपन। चिन्ता, शोक आदि तो अज्ञानसे होते हैं और पागलपन प्रारब्धसे होता है। अतः ज्ञान होनेपर चिन्ता-शोकादि तो मिट जाते हैं, पर प्रारब्धके अनुसार पागलपन हो सकता है। हाँ, पागलपन होनेपर भी ज्ञानिके द्वारा कोई अनुचित, शास्त्रनिपिड्ड क्रिया नहीं होती।
(५) आकस्मिक मृत्यु और अकाल मृत्युमें क्या फरक है? कोई व्यक्ति साँप काटनेसे मर जाय, अचानक ऊपरसे गिरकर मर जाय, पानीमें डूबकर मर जाय, हार्टफेल होनेसे मर जाय, किसी दुर्घटना आदिसे मर जाय, तो यह उसकी 'आकस्मिक मृत्यु' है। स्वाभाविक मृत्युकी तरह आकस्मिक मृत्यु भी प्रारब्धके अनुसार (आयु पूरी होनेपर) होती है।
कोई व्यक्ति जानकर आत्महत्या कर ले अर्थात् फाँसी लगाकर, कुएँमें कूदकर, गाड़ीके नीचे आकर, छतसे कूदकर, जहर खाकर, शरीरमें आग लगाकर मर जाय, तो यह उसकी 'अकाल मृत्यु' है। यह मृत्यु आयुके रहते हुए ही होती है। आत्महत्या करनेवालेको मनुष्यकी हत्याका पाप लगता है। अतः यह नया पाप-कर्म है, प्रारब्ध नहीं। मनुष्यशरीर परमात्माप्राप्तिके लिये ही मिला है; अतः उसको आत्महत्या करके नष्ट करना बड़ा भारी पाप है।
कई बार आत्महत्या करनेकी चेष्टा करनेपर भी मनुष्य बच जाता है, मरता नहीं। इसका कारण यह है कि उसका दूसरे मनुष्यके प्रारब्धके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ रहता है; अतः उसके प्रारब्धके कारण वह बच जाता है। जैसे, भविष्यमें किसीका पुत्र होनेवाला है और वह आत्महत्या करनेका प्रयास करे तो उस (आगे होनेवाले) लड़केका प्रारब्ध उसको मरने नहीं देगा। अगर उस व्यक्तिके द्वारा भविष्यमें कोई विशेष अच्छा काम होनेवाला हो, लोगोंका उपकार होनेवाला हो अथवा इसी जन्ममें, इसी शरीरमें प्रारब्धका कोई उत्कट भोग (सुख-दुःख) आनेवाला हो, तो आत्महत्याका प्रयास करनेपर भी वह मरेगा नहीं।
(६) एक आदमीने दूसरे आदमीको मार दिया तो यह उसने पिछले जन्मके वैरका बदला लिया और मरनेवालेने पुराने कर्मोंका फल पाया, फिर मरनेवालेका क्या दोष? मारनेवालेका दोष है। दण्ड देना शासकका काम है, सर्वसाधारणका नहीं। एक आदमीको दस बजे फाँसी मिलनी है। एक-दूसरे आदमीने उस (फाँसीकी सजा
पानेवाले) आदमीको जल्लादोंके हाथोंसे छुड़ा लिया और ठीक दस बजे उसे कत्ल कर दिया! ऐसी हालतमें उस कत्ल करनेवाले आदमीको भी फाँसी होगी कि यह आज्ञा तो राज्यने जल्लादोंको दी थी, पर तुम्हें किसने आज्ञा दी थी?
मारनेवालेको यह याद नहीं है कि मैं पूर्वजन्मका बदला ले रहा हूँ, फिर भी मारता है तो यह उसका दोष है। दूसरेको मारनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मरना कोई भी नहीं चाहता। दूसरेको मारना अपने विवेकका अनादर है। मनुष्यमात्रको विवेकशक्ति प्राप्त है और उस विवेकके अनुसार अच्छे या बुरे कार्य करनेमें वह स्वतन्त्र है। अतः विवेकका अनादर करके दूसरेको मारना अथवा मारनेकी नीयत रखना दोष है।
यदि पूर्वजन्मका बदला एक-दूसरे ऐसे ही चुकाते रहें तो यह शृंखला कभी खत्म नहीं होगी और मनुष्य कभी मुक्त नहीं हो सकेगा।
पिछले जन्मका बदला अन्य (साँप आदि) योनियोंमें लिया जा सकता है। मनुष्ययोन बदला लेनेके लिये नहीं है। हाँ, यह हो सकता है कि पिछले जन्मका हत्याका व्यक्ति हमें स्वाभाविक ही अच्छा नहीं लगेगा, बुरा लगेगा। परन्तु बुरे लगनेवाले व्यक्तिसे द्वेष करना या उसे कष्ट देना दोष है; क्योंकि यह नया कर्म है।
जैसा प्रारब्ध है, उसीके अनुसार उसकी बुद्धि बन गयी, फिर दोष किस बातका?
बुद्धिमें जो द्वेष है, उसके वशमें हो गया—यह दोष है। उसे चाहिये कि वह उसके वशमें न होकर विवेकका आदर करे। गीता भी कहती है कि बुद्धिमें जो राग-द्वेष रहते हैं (तीसरे अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), उनके वशमें न हो—'तयोर्यं वशमागच्छेत्' (३।३४)।
(७) प्रारब्ध और भगवत्कृपामें क्या अन्तर है?
इस जीवको जो कुछ मिलता है, वह प्रारब्धके अनुसार मिलता है, पर प्रारब्ध-विधानके विधाता स्वयं भगवान् हैं। कारण कि कर्म जड़ होनेसे स्वतन्त्र फल नहीं दे सकते, वे तो भगवान्के विधानसे ही फल देते हैं। जैसे, एक आदमी किसीके खेतमें दिनभर काम करता है तो उसको शामके समय कामके अनुसार पैसे मिलते हैं, पर मिलते हैं खेतके मालिकसे।
पैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं, बिना काम किये पैसे मिलते हैं क्या?
पैसे तो काम करनेसे ही मिलते हैं; परन्तु बिना
११३२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८
मालिकके पैसा देगा कौन? यदि कोई जंगलमें जाकर
दिनभर मेहनत करे तो क्या उसको पैसे मिल जायें? नहीं
मिल सकते। उसमें यह देखा जायगा कि किसके कहनेसे
काम किया और किसकी जिम्मेदारी रही।
अगर कोई नौकर कामको बड़ी तत्परता, चतुरता और
उत्साहसे करता है, पर करता है केवल मालिककी
प्रसन्नताके लिये तो मालिक उसको मजदूरीसे अधिक पैसे
भी दे देता है और तत्परता आदि गुणोंको देखकर उसको
अपने खेतका हिस्सेदार भी बना देता है। ऐसे ही भगवान्
मनुष्यको उसके कर्मोंके अनुसार फल देते हैं। अगर कोई
मनुष्य भगवान्की आज्ञाके अनुसार, उन्हींकी प्रसन्नताके
लिये सब कार्य करता है, उसे भगवान् दूसरोंकी अपेक्षा
अधिक ही देते हैं; परन्तु जो भगवान्के सर्वथा समर्पित
होकर सब कार्य करता है, उस भक्तके भगवान् भी भक्त
बन जाते हैं!* संसारमें कोई भी नौकरको अपना मालिक
नहीं बनाता; परन्तु भगवान् शरणागत भक्तको अपना
मालिक बना लेते हैं। ऐसी उदारता केवल प्रभुमें ही है।
ऐसे प्रभुके चरणोंकी शरण न होकर जो मनुष्य प्राकृत-
उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंके पराधीन रहते हैं, उनकी
बुद्धि सर्वथा ही भ्रष्ट हो चुकी है। वे इस बातको समझ
ही नहीं सकते कि हमारे सामने प्रत्यक्ष उत्पन्न और नष्ट
होनेवाले पदार्थ हमें कहाँतक सहारा दे सकते हैं।
सम्बन्ध-जिस प्रकार कर्मयोगमें कर्मोंका अपने साथ सम्बन्ध नहीं रहता, ऐसे ही सांख्यसिद्धान्तमें भी कर्मोंका अपने
साथ किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता-इसका विवेचन आगे करते हैं।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥ १३॥
महाबाहो = हे
महाबाहो!
कृतान्ते = कर्मोंका
अन्त
करनेवाले
साङ्ख्ये = सांख्यसिद्धान्तमें
सर्वकर्मणाम् = सम्पूर्ण
कर्मोंकी
सिद्धये = सिद्धिके
लिये
एतानि = ये
पञ्च = पाँच
कारणानि = कारण
प्रोक्तानि = बताये
गये हैं,
मे = (इनको तू)
मुझसे
निबोध = समझ।
व्याख्या-'पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि'-हे महाबाहो!
जिसमें सम्पूर्ण कर्मोंका अन्त हो जाता है, ऐसे सांख्यसिद्धान्तमें
सम्पूर्ण विहित और निषिद्ध कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बताये
गये हैं। 'स्वयं' (स्वरूप) उन कर्मोंमें हेतु नहीं है।
'निबोध मे'-इस अध्यायमें भगवान्ने जहाँ सांख्य-
सिद्धान्तका वर्णन आरम्भ किया है, वहाँ 'निबोध' क्रियाका
प्रयोग किया है (इसी अध्यायका तेरहवाँ और पचासवाँ
श्लोक), जबकि दूसरी जगह 'शृणु' क्रियाका प्रयोग
किया है (इसी अध्यायका चौथा, उन्नीसवाँ, उनतीसवाँ,
छत्तीसवाँ, पैंतालीसवाँ और चौंसठवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह
है कि सांख्यसिद्धान्तमें तो 'निबोध' पदसे अच्छी तरह
समझनेकी बात कही है और दूसरी जगह 'शृणु' पदसे
सुननेकी बात कही है। अतः सांख्यसिद्धान्तको गहरी
रीतिसे समझना चाहिये। अगर उसे अपने-आप (स्वयं)-
से गहरी रीतिसे समझा जाय, तो तत्काल तत्त्वका अनुभव
हो जाता है।
'साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्'-
कर्म चाहे शास्त्रविहित हों, चाहे शास्त्रनिषिद्ध हों, चाहे
शारीरिक हों, चाहे मानसिक हों, चाहे वाचिक हों, चाहे
स्थूल हों और चाहे सूक्ष्म हों-इन सम्पूर्ण कर्मोंकी
सिद्धिके लिये पाँच हेतु कहे गये हैं। जब पुरुषका इन
कर्मोंमें कर्तृत्व रहता है, तब कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह दोनों
होते हैं और जब पुरुषका इन कर्मोंके होनेमें कर्तृत्व नहीं
रहता, तब कर्मसिद्धि तो होती है, पर कर्मसंग्रह नहीं होता,
प्रत्युत क्रियामात्र होती है। जैसे, संसारमात्रमें परिवर्तन होता
है अर्थात् नदियाँ बहती हैं, वायु चलती है, वृक्ष बढ़ते हैं
आदि-आदि क्रियाएँ होती रहती हैं, परन्तु इन क्रियाओंसे
कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् ये क्रियाएँ पाप-पुण्यजनक
- एवं स्वभक्तयो राजन् भगवान् भक्तभक्तिमान्। (श्रीमद्भा० १०।८६।५९)
श्लोक १४ ]
- साधक-संजीवनी *
११३३
अथवा बन्धनकारक नहीं होती। तात्पर्य यह हुआ कि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसिद्धि और कर्मसंग्रह होता है। कर्तृत्वाभिमान मिटनेपर क्रियामात्रमें अधिष्ठान, करण, चेष्टा और दैव—ये चार हेतु ही होते हैं (गीता—इसी अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)।
यहाँ सांख्यसिद्धान्तका वर्णन हो रहा है। सांख्यसिद्धान्तमें विवेक-विचारकी प्रधानता होती है, फिर भगवान्ने 'सर्वकर्माणां सिद्धये' वाली कर्मोंकी बात यहाँ क्यों छेड़ी? कारण कि अर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग है। क्षत्रिय होनेके नाते युद्ध उनका कर्तव्य-कर्म है। इसलिये कर्मयोगसे अथवा सांख्ययोगसे ऐसे कर्म करने चाहिये, जिससे कर्म करते हुए भी कर्मोंसे सर्वथा निलिप्त रहे—यह बात भगवान्को कहनी है। अर्जुनने सांख्यका तत्त्व पूछा है, इसलिये भगवान् सांख्यसिद्धान्तसे कर्म करनेकी बात कहना आरम्भ करते हैं।
अर्जुन स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करना चाहते थे; अतः
परिशिष्ट भाव —आत्माको अकर्ता बतानेके लिये पाँच कारणोंका वर्णन करते हैं। इन पाँचोंमें कर्तृत्वका त्याग होनेपर कर्मोंका सर्वथा अन्त (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है।
सम्बन्ध—सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु कौन-से हैं? अब यह बताते हैं।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १४ ॥
- साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे इस जीवकी परमात्माके साथ स्वतःसिद्ध आत्मीयता है। उस परमात्मासे विमुख होकर जीवने अहंताके साथ ममता कर ली, जिससे स्वयंको 'मैं संसारी हूँ, मैं त्यागी हूँ, मैं विवेकी हूँ, मैं पढ़ा-लिखा समझदार हूँ'—ऐसा व्यक्तित्व (मैंपन) प्रिय लगता है और यह छूट न जाय—इसका भय लगता है। यह अहंताके साथ ममता है। इसका त्याग करनेके लिये कर्मयोगमें 'मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिये और मेरे लिये कुछ नहीं करना है' इसी भावसे संसारके हितके लिये सब क्रियाएँ करे (कारण कि कर्मका सम्बन्ध 'पर'के प्रति है, 'स्व' के प्रति नहीं)। ऐसा करनेसे ममता छूट जायगी। ममता छूटते ही अहंता भी सर्वथा छूट जायगी।
कर्मयोगमें स्थूलशरीरसे क्रिया, सूक्ष्मशरीरसे परहितचिन्तन और कारणशरीरसे स्थिरता (एकाग्रता)—ये तीनों ही संसारके हितार्थ होते हैं। इसलिये दूसरोंके हितके लिये कर्म करते-करते सबके हितका चिन्तन होता है। हितका चिन्तन होते-होते स्वतः ही स्थिरता आती है, उस स्थिरतामें अहंता और ममता दोनोंका त्याग होता है और त्याग होनेसे शान्ति मिलती है।
संसारके त्यागसे जो शान्ति मिलती है, वह स्वरूप अथवा साध्य नहीं है, प्रत्युत वह तो एक साधन है—'योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते' (गीता ६।३)। परन्तु परमात्माकी प्राप्तिसे जो शान्ति मिलती है, वह साध्य है अर्थात् परमात्माका स्वरूप है—'शान्ति निर्वाणपरमाम्' (गीता ६।१५)।
अब साधकको सावधानी यह रखनी है कि वह उस साधनजन्य शान्तिका भोग न करे। भोग न करनेसे स्वतः वास्तविकताकी अनुभूति हो जायगी और यदि भोग करेगा तो वहींपर अटक जायगा।
११३४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
अत्र | = इसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) | च | = और पृथिविधम् | = अनेक प्रकारके | पृथक् | = अलग-अलग ---|---|---|---|---|---|--- अधिष्ठानम् | = अधिष्ठान | करणम् | = करण | च, एव | = और वैसे ही | चेष्टा | = चेष्टाएँ तथा | = तथा | च | = एवम् | | पञ्चमम् | = पाँचवाँ कारण कर्ता | = कर्ता | विविधाः | = विविध प्रकारकी | | दैवम् | = दैव (संस्कार) है।
व्याख्या—‘अधिष्ठानम्’ —शरीर और जिस देशमें यह शरीर स्थित है, वह देश—ये दोनों ‘अधिष्ठान’ हैं।
‘कर्ता’ —सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्योंके द्वारा ही होती हैं। वे क्रियाएँ चाहे समष्टि हों, चाहे व्यक्ति हों; परन्तु उन क्रियाओंका कर्ता ‘स्वयं’ नहीं है। केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसको चेतन और जडका ज्ञान नहीं है—ऐसा अविवेकी पुरुष ही जब प्रकृतिसे होनेवाली क्रियाओंको अपनी मान लेता है, तब वह ‘कर्ता’ बन जाता है*। ऐसा ‘कर्ता’ ही कर्मोंकी सिद्धिमें हेतु बनता है।
‘करणं च पृथिविधम्’ —कुल तरह करण हैं। पाणि, पाद, वाक्, उपस्थ और पायु—ये पाँच कर्मन्द्रियाँ और श्रोत्र, चक्षु, त्वक्, रसना और घ्राण—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—ये दस ‘बहिःकरण’ हैं तथा मन, बुद्धि और अहंकार—ये तीन ‘अन्तःकरण’ हैं।
‘विविधाश्च पृथक्चेष्टाः’ —उपर्युक्त तरह करणोंकी अलग-अलग चेष्टाएँ होती हैं; जैसे—पाणि (हाथ)—आदान-प्रदान करना, पाद (पैर)—आना-जाना, चलना-फिरना, वाक् —बोलना, उपस्थ —मूत्रका त्याग करना, पायु (गुदा)—मलका त्याग करना, श्रोत्र —सुनना, चक्षु —
देखना, त्वक् —स्पर्श करना, रसना —चखना, घ्राण —सूँघना, मन —मनन करना, बुद्धि —निश्चय करना और अहंकार —‘मैं ऐसा हूँ’आदि अभिमान करना।
‘दैवं चैवात्र पञ्चमम्’ —कर्मोंकी सिद्धिमें पाँचवें हेतुका नाम ‘दैव’ है। यहाँ दैव नाम संस्कारोंका है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही संस्कार उसके अन्तःकरणपर पड़ता है। शुभ-कर्मका शुभ संस्कार पड़ता है और अशुभ-कर्मका अशुभ संस्कार पड़ता है। वे ही संस्कार आगे कर्म करनेकी स्फुरणा पैदा करते हैं। जिसमें जिस कर्मका संस्कार जितना अधिक होता है, उस कर्ममें वह उतनी ही सुगमतासे लग सकता है और जिस कर्मका विशेष संस्कार नहीं है, उसको करनेमें उसे कुछ परिश्रम पड़ सकता है। इसी प्रकार मनुष्य सुनता है, पुस्तके पढ़ता है और विचार भी करता है तो वे भी अपने-अपने संस्कारोंके अनुसार ही करता है। तात्पर्य है कि मनुष्यके अन्तःकरणमें शुभ और अशुभ— जैसे संस्कार होते हैं, उन्हींके अनुसार कर्म करनेकी स्फुरणा होती है।
इस श्लोकमें कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताये गये हैं—अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव। इसका कारण यह है कि आधारके बिना कोई भी काम कहाँ किया
- सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं—इसका वर्णन गीतामें कई रीतियोंसे आता है; जैसे— (१) सब कर्म प्रकृतिके द्वारा ही किये जाते हैं—‘प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः’ (१३।२९), सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं—‘प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः’ (३।२७)।
(२) गुण ही गुणोंमें भरते हैं—‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ (३।२८); द्रष्टा गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता—‘नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति’ (१४।१९)।
(३) सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों-(विषयों)- में भरती हैं—‘इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते’ (५।९)।
(४) यहाँ (१८।१४ में) कर्मोंकी सिद्धिमें अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं।
इन सबका तात्पर्य यह है कि प्रकृति और पुरुष—इन दोनोंमेंसे केवल प्रकृतिमें ही क्रियाएँ होती हैं, पुरुषमें नहीं। प्रकृतिके साथ तादात्म्य करनेसे ही पुरुष उन क्रियाओंको अपनी मान लेता है। जैसे, कोई मनुष्य वायुयानमें बैठकर यह मान लेता है कि मैं वायुयानद्वारा जा रहा हूँ, जबकि वास्तवमें वायुयान ही चलता है, मनुष्य नहीं। ऐसे ही पुरुष अपनेको प्रकृतिकी क्रियाओंका कर्ता मान लेता है—‘अहंकारविमुद्वात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (३।२७)।
तत्त्वको जाननेवाला विवेकी पुरुष ऐसा अनुभव करता है कि सब क्रियाएँ प्रकृति और प्रकृतिके कार्यमें ही हो रही हैं, इनमें मैं कुछ भी नहीं करता हूँ—‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित्’ (५।८)।
श्लोक १५ ]
- साधक-संजीवनी *
११३५
जायगा ? इसलिये 'अधिष्ठान' पद आया है। कर्ताके बिना क्रिया कौन करेगा ? इसलिये 'कर्ता' पद आया है। क्रिया करनेके साधन (करण) होनेसे ही तो कर्ता क्रिया करेगा, इसलिये 'करण' पद आया है। करनेके साधन होनेपर भी क्रिया नहीं की जायगी तो कर्मसिद्धि कैसे होगी ?
परिशिष्ट भाव—‘कर्ता’ —अहंकार अपरा प्रकृति है और जीव परा प्रकृति है। जीवका सम्बन्ध (सजातीयता) परमात्माके साथ है, पर वह अहंकारके साथ सम्बन्ध जोड़कर अपनेको कर्ता मान लेता है।
‘दैवम्’ —अच्छे-बुरे संस्कार सबके भीतर रहते हैं—‘सुमति कुमति सब के उर रहहीं’ (मानस, सुन्दर० ४०।३)। संग, शास्त्र और विचार—इन तीनोंसे अच्छे या बुरे संस्कारोंको बल मिलता है, जिससे नये कर्म होते हैं।
शरीरवाइमनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
| नरः | = मनुष्य | विपरीतम् | = शास्त्रविरुद्ध | तस्य | = उसके |
|---|---|---|---|---|---|
| शरीरवाइमनोभिः | = शरीर, वाणी और मनके द्वारा | यत् | = जो कुछ | एते | = ये (पूर्वोक्त) |
| न्याय्यम् | = शास्त्रविहित | वा | = भी | पञ्च | = पाँचों |
| वा | = अथवा | कर्म | = कर्म | हेतवः | = हेतु होते हैं। |
| प्रारभते | = आरम्भ करता है, |
व्याख्या—‘शरीरवाइमनोभिर्यत्कर्म’ —‘पञ्चैते तस्य हेतवः’—पीछेके (चौदहवें) श्लोकमें कर्मके होनेमें जो अधिष्ठान आदि पाँच हेतु बताये गये हैं, वे पाँचों हेतु इन पदोंमें आ जाते हैं; जैसे—‘शरीर’ पदमें अधिष्ठान आ गया, ‘वाक्’ पदमें बहिःकरण और ‘मन’ पदमें अन्तःकरण आ गया, ‘नरः’ पदमें कर्ता आ गया और ‘प्रारभते’ पदमें सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी चेष्टा आ गयी। अब रही ‘दैव’ की बात। यह दैव अर्थात् संस्कार अन्तःकरणमें ही रहता है; परन्तु उसका स्पष्ट रीतिसे पता नहीं लगता। उसका पता तो उससे उत्पन्न हुई वृत्तियोंसे और उसके अनुसार किये हुए कर्मोंसे ही लगता है।
मनुष्य शरीर, वाणी और मनसे जो कर्म आरम्भ करता है अर्थात् कहीं शरीरकी प्रधानतासे, कहीं वाणीकी प्रधानतासे और कहीं मनकी प्रधानतासे जो कर्म करता है, वह चाहे न्याय्य—शास्त्रविहित हो, चाहे विपरीत—शास्त्र-विरुद्ध हो, उसमें ये (पूर्वश्लोकमें आये) पाँच हेतु होते हैं।
शरीर, वाणी और मन—इन तीनोंके द्वारा ही सम्पूर्ण कर्म होते हैं। इनके द्वारा किये गये कर्मोंको ही कायिक, वाचिक और मानसिक कर्मकी संज्ञा दी जाती है। इन तीनोंमें अशुद्धि आनेसे ही बन्धन होता है। इसीलिये इन
इसलिये ‘चेष्टा’ पद आया है। कर्ता अपने-अपने संस्कारोंके अनुसार ही क्रिया करेगा, संस्कारोंके विरुद्ध अथवा संस्कारोंके बिना क्रिया नहीं कर सकेगा, इसलिये ‘दैव’ पद आया है। इस प्रकार इन पाँचोंके होनेसे ही कर्मसिद्धि होती है।
तीनों—(शरीर, वाणी और मन—) की शुद्धिके लिये सत्रहवें अध्यायके चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें क्रमशः कायिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया गया है। तात्पर्य यह है कि शरीर, वाणी और मनसे कोई भी शास्त्रनिषिद्ध कर्म न किया जाय, केवल शास्त्रविहित कर्म ही किये जायें, तो वह ‘तप’ हो जाता है। सत्रहवें अध्यायके ही सत्रहवें श्लोकमें ‘अफलाकाइक्षिभिः’ पद देकर यह बताया है कि निष्कामभावसे किया हुआ तप सात्त्विक होता है। सात्त्विक तप बाँधनेवाला नहीं होता, प्रत्युत मुक्ति देनेवाला होता है। परन्तु राजस-तामस तप बाँधनेवाले होते हैं।
इन शरीर, वाणी आदिको अपना समझकर अपने लिये कर्म करनेसे ही इनमें अशुद्धि आती है, इसलिये इनको शुद्ध किये बिना केवल विचारसे बुद्धिके द्वारा सांख्यसिद्धान्तकी बातें तो समझमें आ सकती हैं; परन्तु ‘कर्मके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है’—ऐसा स्पष्ट बोध नहीं हो सकता। ऐसी हालतमें साधक शरीर आदिको अपना न समझे और अपने लिये कोई कर्म न करे तो वे शरीरादि बहुत जल्दी शुद्ध हो जायेंगे; अतः चाहे कर्मयोगकी दृष्टिसे इनको शुद्ध करके इनसे सम्बन्ध तोड़ ले, चाहे सांख्ययोगकी
११३६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
दृष्टिसे प्रबल विवेकके द्वारा इनसे सम्बन्ध तोड़ ले। दोनों ही साधनोंसे प्रकृति और प्रकृतिके कार्यके साथ अपने माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है।
जिस समष्टि-शक्तिसे संसारमात्रकी क्रियाएँ होती हैं, उसी समष्टि-शक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी स्वाभाविक होती हैं। विवेकको महत्त्व न देनेके कारण 'स्वयं' उन क्रियाओंमेंसे खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जगना आदि जिन क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है, वहाँ कर्मसंग्रह होता है अर्थात् वे क्रियाएँ बाँधनेवाली हो जाती
हैं। परन्तु जहाँ स्वयं अपनेको कर्ता नहीं मानता, वहाँ कर्मसंग्रह नहीं होता। वहाँ तो केवल क्रियामात्र होती है। इसलिये वे क्रियाएँ फलोत्पादक अर्थात् बाँधनेवाली नहीं होतीं। जैसे, बचपनसे जवान होना, श्वासका आना-जाना, भोजनका पाचन होना तथा रस आदि बन जाना आदि क्रियाएँ बिना कर्तृत्वाभिमानके प्रकृतिके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक होती हैं और उनका कोई कर्मसंग्रह अर्थात् पाप-पुण्य नहीं होता। ऐसे ही कर्तृत्वाभिमान न रहनेपर 'सभी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं'—ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जाता है।
परिशिष्ट भाव —मनमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि होना मानसिक कर्म हैं।
'न्याय्यम् ' पदका अर्थ है—सात्त्विक कर्म, शास्त्रविहित कर्म अथवा शुभ कर्म। 'विपरीतम् ' पदका अर्थ है—राजस-तामस कर्म, शास्त्रनिषिद्ध कर्म अथवा अशुभ कर्म। 'न्याय्यं वा विपरीतं वा ' पदोंका तात्पर्य है—मात्र कर्म।
सम्बन्ध—भगवान्ने सांख्यसिद्धान्त बतानेके लिये जो उपक्रम किया है, उसमें कर्मोंके होनेमें पाँच हेतु बतानेका क्या आशय है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
| तु | = परन्तु | केवलम् | = केवल (शुद्ध) | न, पश्यति | = ठीक नहीं |
|---|---|---|---|---|---|
| एवम् | = ऐसे पाँच हेतुओंके | आत्मानम् | = आत्माको | देखता; | |
| सति | = होनेपर भी | कर्तारम् | = कर्ता | अकृतबुद्धित्वात्= | (क्योंकि) उसकी |
| यः | = जो | पश्यति | = देखता है, | बुद्धि शुद्ध नहीं है | |
| तत्र | = उस (कर्मोंके) विषयमें | सः | = वह | अर्थात् उसने | |
| दुर्मतिः | = दुष्ट बुद्धिवाला | विवेकको महत्त्व नहीं दिया है। |
व्याख्या —'तत्रैवं सति '.....'पश्यति दुर्मतिः —' जितने भी कर्म होते हैं, वे सब अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव—इन पाँच हेतुओंसे ही होते हैं, अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु ऐसा होनेपर भी जो पुरुष अपने स्वरूपको कर्ता मान लेता है, उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है—'अकृतबुद्धित्वात् ' अर्थात् उसने विवेक-विचारको महत्त्व नहीं दिया है। जड़ और चेतनका, प्रकृति और पुरुषका जो वास्तविक विवेक है, अलगाव है, उसकी तरफ उसने ध्यान नहीं दिया है। इसलिये उसकी बुद्धिमें दोष आ गया है। उस दोषके कारण वह अपनेको कर्ता मान लेता है।
यहाँ आये 'अकृतबुद्धित्वात् ' और 'दुर्मतिः ' पदोंका समान अर्थ दीखते हुए भी इनमें थोड़ा फरक है।
'अकृतबुद्धित्वात् ' पद हेतुके रूपमें आया है और 'दुर्मतिः ' पद कर्ताके विशेषणके रूपमें आया है अर्थात् कर्ताके दुर्मति होनेमें अकृतबुद्धि ही हेतु है। तात्पर्य है कि बुद्धिको शुद्ध न करनेसे अर्थात् बुद्धिमें विवेक जाग्रत् न करनेसे ही वह दुर्मति है। अगर वह विवेकको जाग्रत् करता, तो वह दुर्मति नहीं रहता।
केवल (शुद्ध) आत्मा कुछ नहीं करता—'न करोति न लिप्यते ' (गीता १३।३१); परन्तु तादात्म्यके कारण 'मैं नहीं करता हूँ'—ऐसा बोध नहीं होता। बोध न होनेमें 'अकृतबुद्धि ' ही कारण है अर्थात् जिसने बुद्धिको शुद्ध नहीं किया है, वह दुर्मति ही अपनेको कर्ता मान लेता है; जब कि शुद्ध आत्मामें कर्तृत्व नहीं है।
श्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
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‘केवलम्’ पद कर्मयोग और सांख्ययोग—दोनोंमें ही आया है। प्रकृति और पुरुषके विवेकको लेकर कर्मयोग और सांख्ययोग चलते हैं। कर्मयोगमें सब क्रियाएँ शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही होती हैं, पर उनके साथ सम्बन्ध नहीं जुड़ता अर्थात् उनमें ममता नहीं होती। ममता न होनेसे शरीर, मन आदिकी संसारके साथ जो एकता है, वह एकता अनुभवमें आ जाती है। एकताका अनुभव होते ही स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें ‘केवलैः’ पद शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ दिया गया है—‘कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि’ (गीता ५।११)।
सांख्ययोगमें विवेक-विचारकी प्रधानता है। जितने भी कर्म होते हैं, वे सब पाँच हेतुओंसे ही होते हैं, अपने स्वरूपसे नहीं। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला
परिशिष्ट भाव—सब कारकोंमें कर्ता मुख्य है। कर्तामें चेतनकी झलक आती है, अन्य कारकोंमें नहीं। वास्तवमें ‘कर्ता’ नाम चेतनका नहीं है। यह माना हुआ कर्ता है—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३।२७)। इसलिये भगवान्ने यहाँ अपने वास्तविक स्वरूपको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की है कि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है, वह दुर्मीत है। कारण कि स्वरूपमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों ही नहीं हैं—‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३।३१)। मूलमें ये नहीं हैं, तभी इनका त्याग होता है। ये कर्तृत्व-भोक्तृत्व न भगवान्के बनाये हुए हैं, न प्रकृतिके, प्रत्युत जीवके बनाये हुए हैं।
वास्तवमें कर्ता कोई नहीं है; न तो चेतन कर्ता है और न जड़ कर्ता है। अगर कर्ता मानना ही पड़े तो वह जड़में ही माना जायगा। इसको भगवान्ने गीतामें कई प्रकारसे बताया है; जैसे—सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं अर्थात् प्रकृति कर्ता है (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक); सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंके द्वारा होती हैं; गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं अर्थात् गुण कर्ता है (तीसरे अध्यायका सताईसवाँ-अट्ठाईसवाँ और चौदहवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं अर्थात् इन्द्रियाँ कर्ता हैं (पाँचवें अध्यायका नवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि कर्तृत्व प्रकृतिमें ही है, स्वरूपमें नहीं। इसीलिये अपने चेतन स्वरूपमें स्थित तत्त्व महापुरुष ‘मैं कुछ भी नहीं करता हूँ’ ऐसा अनुभव करता है—‘नैव किञ्चिक्करोमीति युक्तो मन्यते तत्त्ववित्’ (गीता ५।८)। भगवान् भी कहते हैं कि जब मनुष्य गुणोंके सिवाय अन्य किसीको कर्ता नहीं देखता अर्थात् वह क्रियामात्रमें ऐसा अनुभव करता है कि गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है और अपनेको गुणोंसे बिलकुल असम्बद्ध अनुभव करता है, जो वास्तवमें है*, तब वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है (चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
साधक खाने-पीने, सोने-जागने आदि लौकिक क्रियाओंको तो विचारद्वारा प्रकृतिमें होनेवाली सुगमतासे मान सकता है, पर वह जप, ध्यान, समाधि आदि पारमार्थिक क्रियाओंको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये मानता है तो यह वास्तवमें साधकके लिये बाधक है। कारण कि ज्ञानयोगकी दृष्टिसे क्रिया चाहे ऊँची-से-ऊँची हो अथवा नीची-से-नीची, है वह एक जातिकी (प्राकृत) ही। लाठी घुमाना और माला फेरना—दोनों क्रियाएँ अलग-अलग होनेपर भी प्रकृतिमें ही हैं। तात्पर्य है कि खाने-पीने, सोने-जागने आदिसे लेकर जप, ध्यान, समाधितक सम्पूर्ण लौकिक-पारमार्थिक क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं। प्रकृतिका सम्बन्ध किये बिना क्रिया सम्भव ही नहीं है। अतः साधकको चाहिये कि वह पारमार्थिक
- स्वरूप (आत्मा) गुणोंसे सर्वथा रहित है—‘निर्गुणत्वात्’ (गीता १३।३१)। गुण प्रकाश्य है, स्वरूप प्रकाशक है। गुण परिवर्तनशील हैं, स्वरूप अपरिवर्तनशील है। गुण अनित्य हैं, स्वरूप नित्य है। स्वरूप निर्गुण होते हुए भी जब यह गुणोंका संग कर लेता है, तब जन्म-मरणमें पड़ जाता है—‘कारणं गुणसंयोगस्य सदसद्योजिनजन्मसु’ (गीता १३।२१)।
११३८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
क्रियाओंका त्याग तो न करे, पर उनमें अपना कर्तृत्व न माने अर्थात् उनको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये न माने। क्रिया चाहे लौकिक हो, चाहे पारमार्थिक हो, उसका महत्त्व वास्तवमें जड़ताका ही महत्त्व है। शास्त्रविहित होनेके कारण पारमार्थिक क्रियाओंका अन्तःकरणमें जो विशेष महत्त्व रहता है, वह भी जड़ताका ही महत्त्व होनेसे साधकके लिये बाधक है*। पारमार्थिक क्रियाओंका उद्देश्य परमात्मा रहनेसे वे कल्याणकारक हो जाती हैं। ज्यों-ज्यों क्रियाकी गौणता और भगवत्सम्बन्धकी मुख्यता होती है, त्यों-त्यों अधिक लाभ होता है। क्रियाकी मुख्यता होनेपर वर्षातिक साधन करनेपर भी लाभ नहीं होता। अतः क्रियाका महत्त्व न होकर भगवान्में प्रियता होनी चाहिये। प्रियता ही भजन है, क्रिया नहीं।
जिसकी बुद्धि विवेकरहित है अर्थात् जिसने विवेकको महत्त्व नहीं दिया है, वह दुर्मीत है। बोधमें विवेक कारण है, बुद्धि नहीं। बुद्धि विवेकसे शुद्ध होती है। बुद्धिकी शुद्धिमें शुभ कर्म भी कुछ सहायक होते हैं, पर विवेक-विचारसे बुद्धिकी जैसी शुद्धि होती है, वैसी शुभ कर्मोंसे नहीं होती। विवेकको महत्त्व न देना जितना दोषी है, उतने मल-विक्षेप-आवरण दोषी नहीं हैं। विवेक अनादि और नित्य है। इसलिये मल-विक्षेप-आवरणके रहते हुए भी विवेक जाग्रत् हो सकता है। पापसे विवेक नष्ट नहीं होता, प्रत्युत विवेक जाग्रत् नहीं होता। विवेकको महत्त्व न देनेमें कारण है—क्रिया और पदार्थका महत्त्व। क्रिया और पदार्थको महत्त्व देनेवाला ही 'दुर्मीत' है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बताया कि शुद्ध स्वरूपको कर्ता देखनेवाला दुर्मीत ठीक नहीं देखता। तो ठीक देखनेवाला कौन है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥
| यस्य | = जिसका | यस्य | = जिसकी | हत्वा | = मारकर |
|---|---|---|---|---|---|
| अहङ्कृतः, | बुद्धिः | = बुद्धि | अपि | = भी | |
| भावः | = अहंकृतभाव | ||||
| (‘मैं कर्ता हूँ’— | |||||
| ऐसा भाव) | न, लिप्यते | = लिप्त नहीं होती, | न | = न | |
| न | = नहीं है (और) | सः | = वह (युद्धमें) | हन्ति | = मारता है (और) |
| इमान् | = इन | न | = न | ||
| लोकान् | = सम्पूर्ण प्राणियोंको | निबध्यते | = बँधता है। |
व्याख्या —‘यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते’—जिसमें ‘मैं करता हूँ’—ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें ‘मेरको फल मिलेगा’—ऐसे स्वार्थ-भावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये—जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध—ये सभी क्रियाएँ एक प्रकारशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं; परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका ‘कर्ता’ नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओंको न करनेवाला है और न करनेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सताके बिना विहित और निषिद्ध—कोई भी क्रिया नहीं होती; परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करनेवाली है—ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है, उसमें ‘मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ’—
ऐसा अहंकृतभाव नहीं रहता और ‘अमुक चीज चाहिये, अमुक चीज नहीं चाहिये’; ‘अमुक घटना होनी चाहिये, अमुक घटना नहीं होनी चाहिये’—ऐसा बुद्धिमें लेप (द्रष्टमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व—दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व—ये दोनों ही नहीं हैं, इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है।
प्रकृतिका कार्य स्वतः-स्वाभाविक ही चल रहा है, परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है—ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है, उसमें ‘मैं करता हूँ’ ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता; क्योंकि अहंकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार
- भगवान्के लिये की गयी उपासनामें भगवान्की कृपा प्रधान होती है; अतः इसमें साधकका कर्तृत्व नहीं है। क्रिया, कर्म, उपासना और विवेक—चारों अलग-अलग हैं। ‘क्रिया’ किसीके भी साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ती। ‘कर्म’ अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति (फल)-के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। ‘उपासना’ भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ती है। ‘विवेक’ जड़-चेतनका सम्बन्ध-विच्छेद करता है।
श्लोक १७ ]
- साधक-संजीवनी *
११३९
करनेसे ही होता है। अहंकृतभाव सर्वथा मिटनेपर उसकी बुद्धिमें 'फल मेरेको मिले' ऐसा लेप भी नहीं होता अर्थात् फलकी कामना नहीं होती।
अहंकृतभाव एक मनोवृत्ति है। मनोवृत्ति होते हुए भी यह भाव स्वयं-(कर्ता-)-में रहता है; क्योंकि कर्तृत्व और अकर्तृत्व भाव स्वयं ही स्वीकार करता है।
'हत्वापि स इमाल्लोकान् हन्ति न निबध्यते' —वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको एक साथ मार डाले, तो भी वह मारता नहीं; क्योंकि उसमें कर्तृत्व नहीं है और वह बंधता भी नहीं; क्योंकि उसमें भोक्तृत्व नहीं है। तात्पर्य यह है कि उसका न क्रियाओंके साथ सम्बन्ध है और न फलके साथ सम्बन्ध है।
वास्तवमें प्रकृति ही क्रिया और फलमें परिणत होती है। परन्तु इस वास्तविकताका अनुभव न होनेसे ही पुरुष (चेतन) कर्ता और भोक्ता बनता है। कारण कि जब अहंकारपूर्वक क्रिया होती है, तब कर्ता, करण और कर्म—तीनों मिलते हैं और तभी कर्मसंग्रह होता है। परन्तु जिसमें अहंकृतभाव नहीं रहा, केवल सबका प्रकाशक, आश्रय, सामान्य चेतन ही रहा, फिर वह कैसे किसको मारे? और कैसे किससे बंधे? उसका 'मारना' और 'बंधना' सम्भव ही नहीं है (गीता—दूसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।
सम्पूर्ण प्राणियोंको मारना क्या है? जिसमें अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लेप नहीं है—ऐसे मनुष्यका शरीर जिस वर्ण और आश्रममें रहता है, उसके अनुसार उसके सामने जो परिस्थिति आ जाती है, उसमें प्रवृत्त होनेपर उसे पाप नहीं लगता। जैसे, किसी जीवन्मुक्त क्षत्रियके लिये स्वतः युद्धकी परिस्थिति प्राप्त हो जाय तो वह उसके अनुसार सबको मारकर भी न तो मारता है और न बंधता है। कारण कि उसमें अभिमान और स्वार्थभाव नहीं है।
यहाँ अर्जुनके सामने भी युद्धका प्रसंग है। इसलिये भगवान्ने 'हत्वापि' पदसे अर्जुनको युद्धके लिये प्रेरणा की है। 'अपि' पदका भाव है—'कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः' (गीता ४।२०) 'कर्मोंमें अच्छी तरह प्रवृत्त होनेपर भी वह कुछ नहीं करता।' 'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१) 'सर्वथा बर्ताव करता हुआ भी वह योगी मेरेमें रहता है।' 'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' (गीता १३।३१) 'शरीरमें स्थित होनेपर भी न करता है और न लिप्त होता है।' तात्पर्य यह है कि कर्मोंमें सांगोपांग
प्रवृत्त होनेके समय और जिस समय कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं है, उस समय भी स्वरूपकी निर्विकल्पता ज्यों-की-त्यों रहती है अर्थात् क्रिया करनेसे अथवा क्रिया न करनेसे स्वरूपमें कुछ भी फरक नहीं पड़ता। कारण कि क्रिया विभाग प्रकृतिमें है, स्वरूपमें नहीं।
वास्तवमें यह अहंभाव (व्यक्तित्व) ही मनुष्यमें भिन्नता करनेवाला है। अहंभाव न रहनेसे परमात्माके साथ भिन्नताका कोई कारण ही नहीं है। फिर तो केवल सबका आश्रय, प्रकाशक सामान्य चेतन रहता है। वह न तो क्रियाका कर्ता बनता है और न फलका भोक्ता ही बनता है। क्रियाओंका कर्ता और फलका भोक्ता तो वह पहले भी नहीं था। केवल नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर जिस अहंभावको स्वीकार किया है, उसी अहंभावसे उसमें कर्तापन और भोक्तापन आया है।
'अहम्' दो प्रकारका होता है—'अहंस्फूर्ति और अहंकृति। गाढ़ नींदसे उठते ही सबसे पहले मनुष्यको अपने होनेपन-(सत्तामात्र-)-का भान होता है, इसको 'अहंस्फूर्ति' कहते हैं। इसके बाद वह अपनेमें 'मैं अमुक नाम, वर्ण, आश्रम आदिका हूँ'—ऐसा आरोप करता है, यही असत्का सम्बन्ध है। असत्के सम्बन्धसे अर्थात् शरीरके साथ तादात्म्य माननेसे शरीरकी क्रियाको लेकर 'मैं करता हूँ'—ऐसा भाव उत्पन्न होता है, इसको 'अहंकृति' कहते हैं।
'अहम्' को लेकर ही अपनेमें परिच्छिन्नता आती है। इसलिये अहंस्फूर्तिमें भी किञ्चित् परिच्छिन्नता (व्यक्तित्व) रह सकती है। परन्तु यह परिच्छिन्नता बन्धनकारक नहीं होती अर्थात् परिच्छिन्नता रहनेपर भी अहंस्फूर्ति दोषी नहीं होती। कारण कि अहंकृति अर्थात् कर्तृत्वके बिना अपनेमें गुण-दोषका आरोप नहीं होता। अहंकृति आनेसे ही अपनेमें गुण-दोषका आरोप होता है, जिससे शुभ-अशुभ कर्म बनते हैं। बोध होनेपर अहंस्फूर्तिमें जो परिच्छिन्नता है, वह जल जाती है और स्फूर्तिमात्र रह जाती है। ऐसी स्थितिमें मनुष्य न मारता है और न बंधता है।
'न हन्ति न निबध्यते' (न मारता है और न बंधता है) का क्या भाव है? एक निर्विकल्प-अवस्था होती है और एक निर्विकल्प-बोध होता है। निर्विकल्प-अवस्था साधन-साध्य है और उसका उत्थान भी होता है अर्थात् वह एकरस नहीं रहती। इस निर्विकल्प-अवस्थासे भी असंगता होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्प-बोधका अनुभव होता है। निर्विकल्प-बोध साधन-साध्य नहीं है और उसमें निर्विकल्पता किसी
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
भी अवस्थामें किंचिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्प-बोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्प-बोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते, यही 'न हन्ति न निबध्यते' का भाव है।
अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है? क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और
परिशिष्ट भाव —अहंकृतभाव नहीं होनेका तात्पर्य है—अहंतारहित होना और बुद्धि लिप्त नहीं होनेका तात्पर्य है—कामना, ममता और स्वार्थभावसे रहित होना।
अर्जुनने कहा था कि इन आततायियोंको मारनेसे हमारेको पाप लगेगा—'पापमेवाश्रयेदस्माद्भूतैतानातातयिनः' (गीता १।३६) और गुरुजनोंको मारनेसे पाप लगेगा—'गुरुन्हन्त्वा हि महानुभावान्' (गीता २।५)। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि इनको मारनेसे पाप लगनेकी तो बात ही क्या है, सम्पूर्ण प्राणियोंको मारनेसे भी पाप नहीं लगेगा, क्योंकि पाप लगनेमें हेतु अहंता और बुद्धिकी लिप्तता है। बुद्धि कामना, ममता और स्वार्थभावसे लिप्त होती है। गंगाजीमें कोई डूबकर मर जाता है तो गंगाजीको पाप नहीं लगता और कोई उसका जल पीता है, स्नान करता है, खेती करता है तो उससे गंगाजीको पुण्य नहीं लगता है। वर्षासे कई जीव मर जाते हैं और कड़ियोंको जीवन मिल जाता है, पर वर्षाको पाप-पुण्य नहीं लगते। कारण कि गंगाजीमें और वर्षामें अहंकृतभाव और बुद्धिका लेप नहीं है। अगर डॉक्टरमें कामना, ममता और स्वार्थबुद्धि न हो तो ऑपरेशनमें अंग काटनेपर भी उसको पाप नहीं लगता। अगर उसमें अहंकृतभाव भी न हो तो फिर पाप लगनेकी बात ही क्या है।
ज्ञानयोगसे 'अहंकृतभाव' का नाश होता है और कर्मयोगसे 'बुद्धिकी लिप्तता' नष्ट होती है। दोनोंमेंसे किसी एकका नाश होनेपर दूसरा भी नष्ट हो जाता है। अहंकृतभावके कारण ही जीवमें भोग और मोक्षकी इच्छा पैदा होती है। अहंकृतभाव मिटनेसे भोगेच्छा भी मिट जाती है—'बुद्धिर्यस्य न लिप्यते'। भोगेच्छा मिटनेपर मोक्षकी इच्छा स्वतः पूरी हो जाती है; क्योंकि मोक्ष स्वतःसिद्ध है।
सम्बन्ध—ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते, प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है; क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है—यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तैति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥
| ज्ञानम् | = ज्ञान, | कर्मचोदना | = कर्मप्रेरणा होती है | कर्ता | = कर्ता— |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्ञेयम् | = ज्ञेय (और) | (तथा) | इति | = इन | |
| परिज्ञाता | = परिज्ञाता | करणम् | = करण, | त्रिविधः | = तीनोंसे |
| त्रिविधा | = इन तीनोंसे | कर्म | = कर्म (और) | कर्मसङ्ग्रहः | = कर्मसंग्रह होता है। |
व्याख्या —[इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मके बननेमें पाँच हेतु बताये—अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव (संस्कार)। इन पाँचोंमें भी मूल हेतु है—कर्ता। इसी मूल हेतुको मिटानेके लिये भगवान्ने सोलहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव रखनेवालेकी बड़ी निन्दा की और सत्रहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव न रखनेवालेकी बड़ी प्रशंसा की। कर्तृत्वभाव बिलकुल न रहे,
यह साफ-साफ समझानेके लिये ही अठारहवाँ श्लोक कहा गया है।]
'ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना'—ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता—इन तीनोंसे कर्म-प्रेरणा होती है। 'ज्ञान' को सबसे पहले कहनेमें यह भाव है कि हरेक मनुष्यकी कोई भी प्रवृत्ति होती है तो प्रवृत्तिसे पहले ज्ञान होता है। जैसे, जल पीनेकी प्रवृत्तिसे पहले प्यासका ज्ञान
श्लोक १९ ]
- साधक-संजीवनी *
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होता है, फिर वह जलसे प्यास बुझाता है। जल आदि जिस विषयका ज्ञान होता है, वह 'ज्ञेय' कहलाता है और जिसको ज्ञान होता है, वह 'परिज्ञाता' कहलाता है। ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता— तीनों होनेसे ही कर्म करनेकी प्रेरणा होती है। यदि इन तीनोंमेंसे एक भी न हो तो कर्म करनेकी प्रेरणा नहीं होती।
'परिज्ञाता' उसको कहते हैं, जो 'परितः' ज्ञाता है अर्थात् जो सब तरहकी क्रियाओंकी स्फुरणाका ज्ञाता है। वह केवल 'ज्ञाता' मात्र है अर्थात् उसे क्रियाओंकी स्फुरणामात्रका ज्ञान होता है, उसमें अपने लिये कुछ चाहनेका अथवा उस क्रियाको करनेका अभिमान आदि बिलकुल नहीं होता।
कोई भी क्रिया करनेकी स्फुरणा एक व्यक्तिविशेषमें ही होती है। इसलिये शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध— इन विषयोंको लेकर सुननेवाला, स्पर्श करनेवाला, देखनेवाला, खचनेवाला और सृष्टिनेवाला—इस तरह अनेक 'कर्ता' हो सकते हैं; परन्तु उन सबको जाननेवाला एक ही रहता है, उसे ही यहाँ 'परिज्ञाता' कहा है।
'करणं कर्म कर्तौति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः'— कर्मसंग्रहके तीन हेतु हैं—करण, कर्म तथा कर्ता। इन तीनोंके सहयोगसे कर्म पूरा होता है। जिन साधनोंसे कर्ता कर्म करता है, उन क्रिया करनेके साधनों—(इन्द्रियों
आदि- )को 'करण' कहते हैं। खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-फिरना, आना-जाना आदि जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनको 'कर्म' कहते हैं। कारण और क्रियासे अपना सम्बन्ध जोड़कर कर्म करनेवालेको 'कर्ता' कहते हैं। इस प्रकार इन तीनोंके मिलनेसे ही कर्म बनता है।
भगवान्को यहाँ खास बात यह बतानी है कि कर्मसंग्रह कैसे होता है? अर्थात् कर्म बाँधनेवाला कैसे होता है? कर्म बननेके तीन हेतु बताते हुए भगवान्का लक्ष्य मूल हेतु 'कर्ता' को बतानेमें है; क्योंकि कर्मसंग्रहका खास सम्बन्ध कर्तासे है। यदि कर्तापन न हो तो कर्मसंग्रह नहीं होता, केवल क्रियामात्र होती है।
कर्म-संग्रहमें 'करण' हेतु नहीं है; क्योंकि कारण कर्ताके अधीन होता है। कर्ता जैसा कर्म करना चाहता है, वैसा ही कर्म होता है, इसलिये 'कर्म' भी कर्मसंग्रहमें खास हेतु नहीं है। सांख्यसिद्धान्तके अनुसार खास बाँधनेवाला है—अहंकृतभाव और इसीसे कर्मसंग्रह होता है। अहंकृतभाव न रहनेसे कर्मसंग्रह नहीं होता अर्थात् कर्म फलजनक नहीं होता। इस मूलका अर्थात् अहंकृतभावका ज्ञान करानेके लिये ही भगवान्ने कारण और कर्मको पहले रखकर कर्ताको कर्मसंग्रहके पासमें रखा है, जिससे यह खयालमें आ जाय कि बाँधनेवाला 'कर्ता' ही है।
परिशिष्ट भाव —अर्जुनने ज्ञानयोग और कर्मयोगका तत्त्व जाननेकी इच्छा प्रकट की थी (अठारहवें अध्यायका पहला श्लोक), इसलिये भगवान्ने बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका वर्णन किया। फिर भगवान्ने ज्ञानयोगकी दृष्टिसे कर्मोंका विवेचन करते हुए पहले कर्मोंकी सिद्धिके लिये पाँच हेतु बताये (अठारहवें अध्यायका तेरहवाँ, चौदहवाँ तथा पन्द्रहवाँ श्लोक)। उसी बातको अब प्रकारान्तरसे कर्मप्रेरणा और कर्मसंग्रहके रूपमें वर्णन करते हैं।
जब मनुष्यके भीतर अहंकार और लिप्तता रहती है, तब ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेयरूप त्रिपुटीसे 'कर्मप्रेरणा' अर्थात् कर्म करनेमें प्रवृत्ति होती है कि मैं अमुक कार्य करूँगा तो मेरेको अमुक फल मिलेगा। कर्मप्रेरणा होनेसे 'कर्मसंग्रह' अर्थात् पाप और पुण्यका संग्रह होता है। वे पाप और पुण्य-कर्म कैसे होते हैं—यह आगे बीसवें श्लोकसे विस्तारपूर्वक बतायेंगे।
सम्बन्ध—गुणातीत होनेके उद्देश्यसे अब आगेके श्लोकसे त्रिगुणात्मक पदार्थोंका प्रकरण आरम्भ करते हैं।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥
| गुणसङ्ख्याने | = गुणोंका विवेचन करनेवाले शास्त्रमें | कर्म | = कर्म | प्रोच्यते | = कहे जाते हैं, |
|---|---|---|---|---|---|
| गुणभेदतः | = गुणोंके भेदसे | च | = तथा | तानि | = उनको |
| ज्ञानम् | = ज्ञान | कर्ता | = कर्ता | अपि | = भी (तुम) |
| च | = और | त्रिधा | = तीन-तीन प्रकारसे | यथावत् | = यथार्थरूपसे |
| एव | = ही | शृणु | = सुनो। |
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
व्याख्या—‘प्रोच्यते गुणसङ्ग्रह्याने’ —जिस शास्त्रमें गुणोंके सम्बन्धसे प्रत्येक पदार्थके भिन्न-भिन्न भेदोंकी गणना की गयी है, उसी शास्त्रके अनुसार मैं तुम्हें ज्ञान, कर्म तथा कर्ताके भेद बता रहा हूँ।
‘ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः’ —पीछेके श्लोकमें भगवान्ने कर्मकी प्रेरणा होनेमें तीन हेतु बताये तथा तीन ही हेतु कर्मके बननेमें बताये। इस प्रकार कर्मसंग्रह होनेतकमें कुल छः बातें बतायीं*। अब इस श्लोकमें भगवान् ज्ञान, कर्म तथा कर्ता—इन तीनोंका विवेचन करनेकी ही बात कहते हैं। कर्म-प्रेरक-विभागमेंसे विवेचन करनेके लिये केवल ‘ज्ञान’ लिया गया है, क्योंकि किसी भी कर्मकी प्रेरणामें पहले ज्ञान ही होता है। ज्ञानके बाद ही कार्यका आरम्भ होता है। कर्मसंग्रह-विभागमेंसे केवल ‘कर्म’ और ‘कर्ता’ लिये गये हैं। यद्यपि कर्मके होनेमें कर्ता मुख्य है, तथापि साथमें कर्मको भी लेनेका कारण यह है कि कर्ता जब कर्म करता है, तभी कर्मसंग्रह होता है। अगर कर्ता कर्म न करे तो कर्मसंग्रह होगा ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि कर्मप्रेरणामें ‘ज्ञान’ तथा कर्मसंग्रहमें ‘कर्म’ और ‘कर्ता’ मुख्य हैं। इन तीनों—(ज्ञान, कर्म और कर्ता—)-के सात्त्विक होनेसे ही मनुष्य निर्लिप्त हो सकता है, राजस और तामस होनेसे नहीं। अतः यहाँ कर्मप्रेरक-विभागमें ‘ज्ञाता’ और ‘ज्ञेय’ को तथा कर्मसंग्रह-विभागमें ‘करण’ को नहीं लिया गया है।
कर्मप्रेरक-विभागके ‘ज्ञाता’ और ‘ज्ञेय’ का विवेचन क्यों नहीं किया? कारण कि ज्ञाता जब क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है, तब वह ‘कर्ता’ कहलाता है और उस कर्ताके तीन (सात्त्विक, राजस और तामस) भेदोंके अन्तर्गत ही ज्ञाताके भी तीन भेद हो जाते हैं। परन्तु ज्ञाता जब ज्ञपिमात्र रहता है, तब उसके तीन भेद नहीं होते; क्योंकि उसमें गुणोंका संग नहीं है। गुणोंका संग होनेसे ही उसके तीन भेद होते हैं। इसलिये वृत्ति-ज्ञान ही सात्त्विक, राजस तथा तामस होता है।
जिसे जाना जाय, उस विषयको ‘ज्ञेय’ कहते हैं। जाननेके विषय अनेक हैं, इसलिये इसके अलग भेद नहीं किये गये। परन्तु जाननेयोग्य सब विषयोंका एकमात्र लक्ष्य ‘सुख’ प्राप्त करना ही रहता है। जैसे, कोई विद्या पढ़ता है, कोई धन कमाता है, कोई अधिकार पानेकी चेष्टा करता
है तो इन सब विषयोंको जानने, पानेकी चेष्टाका लक्ष्य एकमात्र ‘सुख’ ही रहता है। विद्या पढ़नेमें यही भाव रहता है कि ज्यादा पढ़कर ज्यादा धन कमाऊँगा, मान पाऊँगा और उनसे मैं सुखी होऊँगा। ऐसे ही हरेक कर्मका लक्ष्य परम्परासे सुख ही रहता है। इसलिये भगवान्ने ज्ञेयके तीन भेद सात्त्विक, राजस और तामस ‘सुख’ के नामसे आगे (छत्तीसवेंसे उन्नतालीसवें श्लोकतक) किये हैं।
ऐसे ही भगवान्ने करणके भी तीन भेद नहीं किये; क्योंकि इन्द्रियाँ आदि जितने भी करण हैं, वे सब साधनमात्र हैं। इसलिये उनके तीन भेद नहीं होते। परन्तु इन सभी करणोंमें ‘बुद्धि’ की ही प्रधानता है; क्योंकि मनुष्य करणोंसे जो कुछ भी काम करता है, उसको वह बुद्धिपूर्वक (विचारपूर्वक) ही करता है। इसलिये भगवान्ने करणके तीन भेद सात्त्विक, राजस और तामस ‘बुद्धि’ के नामसे आगे (तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक) किये हैं।
बुद्धिको दृढ़तासे रखनेमें ‘धृति’ बुद्धिकी सहायक बनती है। ज्ञानयोगकी साधनामें भगवान्ने दो जगह (छठे अध्यायके पचीसवें तथा अठारहवें अध्यायके इक्यावनवें श्लोकमें) बुद्धिके साथ ‘धृति’ पद भी दिया है। इससे यह मालूम देता है कि ज्ञानमार्गमें बुद्धिके साथ धृतिकी विशेष आवश्यकता है। इसलिये भगवान्ने धृतिके भी तीन भेद (तैंतीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक) बताये हैं।
‘त्रिधैव’ पदमें यह भाव है कि ये भेद तीन (सात्त्विक, राजस और तामस) ही होते हैं, कम और ज्यादा नहीं होते अर्थात् न दो होते हैं और न चार होते हैं। कारण कि सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही प्रकृतिसे उत्पन्न हैं—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः’ (गीता १४।५)। इसलिये इन तीनों गुणोंको लेकर तीन ही भेद होते हैं।
‘यथावत्’ —गुणसंख्यान-शास्त्रमें इस विषयका जैसा वर्णन हुआ है, वैसा-का-वैसा तुम्हें सुना रहा हूँ; अपनी तरफसे कुछ कम या अधिक करके नहीं सुना रहा हूँ।
‘शृणु’ —इस विषयको ध्यानसे सुनो। कारण कि सात्त्विक, राजस और तामस—इन तीनोंमेंसे ‘सात्त्विक’ चीजें तो कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्मतत्त्वका बोध करानेवाली हैं, ‘राजस’ चीजें जन्म-मरण देनेवाली हैं; और ‘तामस’ चीजें पतन करनेवाली अर्थात् नरकों और नीच योनियोंमें ले जानेवाली हैं। इसलिये इनका वर्णन सुनकर
- कर्मप्रेरणा तो सूक्ष्म है और कर्मसंग्रह स्थूल है अर्थात् ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता—ये तीनों सूक्ष्म सामग्री हैं तथा कर्म, करण और कर्ता—ये तीनों स्थूल सामग्री हैं।
श्लोक २० ] * साधक-संजीवनी * ११४३
सात्त्विक चीजोंका ग्रहण तथा राजस-तामस चीजोंका त्याग करना चाहिये।
'तानि'—इन ज्ञान आदिका तुम्हारे स्वरूपके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा स्वरूप तो सदा निर्लेप है।
'अपि'—इनके भेदोंको जाननेकी भी बड़ी भारी आवश्यकता है; क्योंकि इनको ठीक तरहसे जाननेपर 'यस्य नाहंकृतो भावो ...... न हन्ति न निबध्यते' (१८।१७)—इस श्लोकका ठीक अनुभव हो जायगा अर्थात् अपने स्वरूपका बोध हो जायगा।
सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक ज्ञानका वर्णन करते हैं।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ २०॥
येन = जिस ज्ञानके द्वारा (साधक) विभक्तेषु, सर्वभूतेषु = सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें
अविभक्तम् = विभागरहित एकम् = एक अव्ययम् = अविनाशी भावम् = भाव (सत्ता) को ईक्षते = देखता है,
तत् = उस ज्ञानम् = ज्ञानको (तुम) सात्त्विकम् = सात्त्विक विद्धि = समझो।
व्याख्या—'सर्वभूतेषु येनैकं .......... अविभक्तं विभक्तेषु'—व्यक्ति, वस्तु आदिमें जो 'है' पन दीखता है, वह उन व्यक्ति, वस्तु आदिका नहीं है, प्रत्युत सबमें परिपूर्ण परमात्माका ही है। उन व्यक्ति, वस्तु आदिकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है; क्योंकि उनमें प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। कोई भी व्यक्ति, वस्तु आदि ऐसी नहीं है, जिसमें परिवर्तन न होता हो; परन्तु अपनी अज्ञता-(बेसमझ-)से उनकी सत्ता दीखती है। जब अज्ञता मिट जाती है, ज्ञान हो जाता है, तब साधककी दृष्टि उस अविनाशी तत्त्वकी तरफ ही जाती है, जिसकी सत्तासे यह सब सत्तावान् हो रहा है।
ज्ञान होनेपर साधककी दृष्टि परिवर्तनशील वस्तुओंको भेदकर परिवर्तनरहित तत्त्वकी ओर ही जाती है (गीता—तेरहवें अध्यायका सत्ताइसवाँ श्लोक)। फिर वह विभक्त अर्थात् अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना आदिमें विभागरहित एक ही तत्त्वको देखता है (गीता—तेरहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति आदिका अलग-अलग ज्ञान और यथायोग्य अलग-अलग व्यवहार होते हुए भी वह इन विकारी वस्तुओंमें उस स्वतःसिद्ध निर्विकार एक तत्त्वको देखता है। उसके देखनेकी यही पहचान है कि उसके अन्तःकरणमें राग-द्वेष नहीं होते।
'तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्'—उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान। परिवर्तनशील वस्तुओं, वृत्तियोंके सम्बन्धसे ही इसे 'सात्त्विक ज्ञान' कहते हैं। सम्बन्धरहित होनेपर यही ज्ञान 'वास्तविक बोध' कहलाता है, जिसको भगवान्ने सब साधनोंसे जाननेयोग्य ज्ञेय-तत्त्व बताया है—'ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते' (गीता १३।१२)।
मार्मिक बात
संसारका ज्ञान इन्द्रियोंसे होता है, इन्द्रियोंका ज्ञान बुद्धिसे होता है और बुद्धिका ज्ञान 'मैं'से होता है। वह 'मैं' बुद्धि, इन्द्रियाँ और विषय—इन तीनोंको जानता है। परन्तु उस 'मैं' का भी एक प्रकाशक है, जिसमें 'मैं'का भी भान होता है। वह प्रकाश सर्वदेशीय और असीम है, जबकि 'मैं' एकदेशीय और सीमित है। उस प्रकाशमें जैसे 'मैं'का भान होता है, वैसे ही 'तू', 'यह' और 'वह' का भी भान होता है। वह प्रकाश किसीका भी विषय नहीं है। वास्तवमें वह प्रकाश निर्गुण ही है; परन्तु व्यक्ति-विशेषमें रहनेवाला होनेसे (वृत्तियोंके सम्बन्धसे) उसे 'सात्त्विक ज्ञान' कहते हैं।
इस सात्त्विक ज्ञानको दूसरे ढंगसे इस प्रकार समझना चाहिये—'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों ही किसी प्रकाशमें काम करते हैं। इन चारोंके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी आ जाते हैं, जो विभक्त हैं; परन्तु इनका जो प्रकाशक है, वह अविभक्त (विभागरहित) है।
बोलनेवाला 'मैं', उसके सामने सुननेवाला 'तू' और पासवाला 'यह' तथा दूरवाला 'वह' कहा जाता है अर्थात् बोलनेवाला अपनेको 'मैं' कहता है, सामनेवालेको 'तू'
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
कहता है, पासवालेको 'यह' कहता है और दूरवालेको 'वह' कहता है। जो 'तू' बना हुआ था, वह 'मैं' हो जाय तो 'मैं' बना हुआ 'तू' हो जायगा और 'यह' तथा 'वह' वही रहेंगे। इसी प्रकार 'यह' कहलानेवाला अगर 'मैं' बन जाय तो 'तू' कहलानेवाला 'यह' बन जायगा और 'मैं' कहलानेवाला 'तू' बन जायगा। 'वह' परोक्ष होनेसे अपनी जगह ही रहा। अब 'वह' कहलानेवाला 'मैं' बन जायगा तो उसकी दृष्टिमें 'मैं', 'तू' और 'यह' कहलानेवाले सब 'वह' हो जायेंगे*। इस प्रकार 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें चारों ही बन सकते हैं।
इससे यह सिद्ध हुआ कि 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये सब परिवर्तनशील हैं अर्थात् टिकनेवाले नहीं हैं, वास्तविक नहीं हैं। अगर वास्तविक होते तो एक ही रहते। वास्तविक तो इन सबका प्रकाशक और आश्रय है, जिसके प्रकाशमें 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह' का भान हो रहा है। उस प्रकाशकमें 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—ये चारों ही
नहीं हैं, प्रत्युत उसीसे इन चारोंको सत्ता मिलती है। अपनी मान्यताके कारण 'मैं', 'तू', 'यह', 'वह' का तो भान होता है, पर प्रकाशकका भान नहीं होता। वह प्रकाशक सबको प्रकाशित करता है, स्वयंप्रकाश-स्वरूप है और सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह'—यह सब विभक्त प्राणियोंका स्वरूप है और जो वास्तविक प्रकाशक है, वह विभागरहित है। यही वास्तवमें 'सात्त्विक ज्ञान' है।
विभागवाली, परिवर्तनशील और नष्ट होनेवाली जितनी वस्तुएँ हैं, यह ज्ञान उन सबका प्रकाशक है और स्वयं भी निर्मल तथा विकाररहित है—'तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्' (गीता १४। ६)। इसलिये इस ज्ञानको 'सात्त्विक' कहा जाता है।
वास्तवमें यह 'सात्त्विक ज्ञान' प्रकाशयकी दृष्टि—(सम्बन्ध—)से 'प्रकाशक' और विभक्तकी दृष्टिसे 'अविभक्त' कहा जाता है। प्रकाश और विभक्तसे रहित होनेपर तो यह निर्गुण, निरपेक्ष 'वास्तविक ज्ञान' ही है।
परिशिष्ट भाव —जैसे साधारण मनुष्य शरीरमें अपनेको व्यापक मानता है, ऐसे ही साधक संसारमें परमात्माको व्यापक मानता है। जैसे शरीर और संसार एक हैं, ऐसे ही स्वयं और परमात्मा एक हैं।
साधककी दृष्टिमें प्राणियोंकी भी सत्ता रहनेके कारण यह 'सात्त्विक ज्ञान' (विवेक) कहा गया है। अगर उसकी दृष्टिमें प्राणियोंकी सत्ता न रहे, केवल अविनाशी सत्ता ही रहे तो यह गुणातीत 'तत्त्वज्ञान' (ब्रह्मकी प्राप्ति) ही है। वह अविनाशी सत्ता सब जगह समानरूपसे विद्यमान है। उस सत्ताके साथ हमारी स्वाभाविक एकता है।
सम्बन्ध—अब राजस ज्ञानका वर्णन करते हैं।
पृथक्त्वेन तु यज्ञानं नानाभावान्युत्थगिधान् । वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥
| तु | = परन्तु | भूतेषु | = प्राणियोंमें | तत् | = उस |
|---|---|---|---|---|---|
| यत् | = जो | पृथक्त्वेन | = अलग-अलग | ज्ञानम् | = ज्ञानको |
| ज्ञानम् | = ज्ञान अर्थात् जिस | ||||
| ज्ञानके द्वारा मनुष्य | नानाभावान् | = अनेक भावोंको | (तुम) | ||
| सर्वेषु | = सम्पूर्ण | पृथगिधान् | = अलग-अलग रूपसे | राजसम् | = राजस |
| वेत्ति | = जानता है, | विद्धि | = समझो। |
- उदाहरणके रूपमें—राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल—ये चार व्यक्ति हैं। राम और श्याम एक-दूसरेके सामने हैं, गोविन्द उनके पास है और गोपाल उनसे दूर है। राम अपनेको 'मैं' कहता है, अपने सामनेवाले श्यामको 'तू' कहता है, पासवाले गोविन्दको 'यह' कहता है और दूरवाले गोपालको 'वह' कहता है। अब यदि श्याम अपनेको 'मैं' कहे तो रामको वह 'तू' कहेगा, गोविन्दको 'यह' कहेगा तथा गोपालको 'वह' कहेगा। इसी तरह अगर गोविन्द अपनेको 'मैं' कहे तो वह श्यामको 'यह' कहेगा और रामको 'तू' कहेगा अथवा श्यामको 'तू' और रामको 'यह' कहेगा, तथा दूरवाले गोपालको 'वह' कहेगा। अब अगर गोपाल अपनेको 'मैं' कहे तो वह राम, श्याम और गोविन्द—तीनोंको 'वह' कहेगा। इस प्रकार राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल—ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें 'मैं', 'तू', 'यह' और 'वह' बन सकते हैं।
श्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
११४५
व्याख्या—'पृथक्त्वेन तु' यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान्'—राजस ज्ञानमें 'राग' की मुख्यता होती है—'रजो रागात्मकं विद्धि' (गीता १४। ७)। रागका यह नियम है कि वह जिसमें आ जाता है, उसमें किसीके प्रति आसक्ति, प्रियता पैदा करा देता है और किसीके प्रति द्वेष पैदा करा देता है। इस रागके कारण ही मनुष्य, देवता, यक्ष-राक्षस, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-लता आदि जितने भी चर-अचर प्राणी हैं, उन प्राणियोंकी विभिन्न आकृति, स्वभाव, नाम, रूप, गुण आदिको लेकर राजस ज्ञानवाला मनुष्य उनमें रहनेवाली एक ही अविनाशी आत्माको तत्त्वसे अलग-अलग समझता है। 'वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्'—इसी तरह जिस ज्ञानसे मनुष्य अलग-अलग शरीरोंमें अन्तःकरण, स्वभाव, इन्द्रियाँ, प्राण आदिके सम्बन्धसे प्राणियोंको भी अलग-अलग मानता है, वह ज्ञान 'राजस' कहलाता है। राजस ज्ञानमें जड-चेतनका विवेक नहीं होता।
परिशिष्ट भाव—क्रिया और पदार्थ—दोनोंको सत्ता देकर उनके साथ रागपूर्वक सम्बन्ध जोड़नेके कारण सब अलग-अलग दीखते हैं।
सम्बन्ध—अब तामस ज्ञानका वर्णन करते हैं।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥ २२॥
तु = किन्तु, यत् = जो (ज्ञान), अर्थात्, जिस ज्ञानके द्वारा, मनुष्य, एकस्मिन् = एक, कार्ये = कार्यरूप, शरीरमें ही, कृत्स्नवत् = सम्पूर्णकी तरह, सक्तम् = आसक्त रहता है, च = तथा (जो), अहैतुकम् = युक्तिरहित, अतत्त्वार्थवत् = वास्तविक, ज्ञानसे, रहित, (और), अल्पम् = तुच्छ है, तत् = वह, तामसम् = तामस, उदाहृतम् = कहा गया है।
व्याख्या—'यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तम्'—तामस मनुष्य एक ही शरीरमें सम्पूर्णकी तरह आसक्त रहता है अर्थात् उत्पन्न और नष्ट होनेवाले इस पांचभौतिक शरीरको ही अपना स्वरूप मानता है। वह मानता है कि मैं ही छोटा बच्चा था, मैं ही जवान हूँ और मैं ही बूढ़ा हो जाऊँगा; मैं भोगी, बलवान् और सुखी हूँ; मैं धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ; मेरे समान दूसरा कौन है; इत्यादि। ऐसी मान्यता मूढ़ताके कारण ही होती है—'इत्यज्ञानविमोहिताः' (१६। १५)। 'अहैतुकम्'—तामस मनुष्यकी मान्यता युक्ति और शास्त्रप्रमाणसे विरुद्ध होती है। यह शरीर हरदम बदल रहा है, शरीरादि वस्तुमात्र अभावमें परिवर्तित हो रही है, दृश्यमात्र अदृश्य हो रहा है और इनमें तू सदा ज्यों-का-त्यों रहता है; अतः यह शरीर और तू कैसे हो सकते हैं?—इस प्रकारकी युक्तियोंको वह स्वीकार नहीं करता। 'अतत्त्वार्थवदल्पं च'—यह शरीर और मैं दोनों अलग-अलग हैं—इस वास्तविक ज्ञान-(विवेक) से वह रहित है। उसकी समझ अत्यन्त तुच्छ है अर्थात् तुच्छताकी प्राप्ति करानेवाली है। इसलिये इसको 'ज्ञान' कहनेमें भगवान्को संकोच हुआ है। कारण कि तामस पुरुषमें मूढ़ताकी प्रधानता होती है। मूढ़ता और ज्ञानका आपसमें विरोध है। अतः भगवान्ने 'ज्ञान' पद न देकर 'यत्' और 'तत्' पदसे ही काम चलाया है।
१-यहाँ 'तु' पद राजस ज्ञानको सात्त्विक ज्ञानसे भिन्न बतानेके लिये आया है। २-इस श्लोकमें राजस ज्ञानसे भी तामस ज्ञानको भिन्न बतानेके लिये 'तु' पद आया है।
११४६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
‘ततामसमुदाहृतम्’—युक्तिरहित, अल्प और अत्यन्त तुच्छ समझको ही महत्त्व देना ‘तामस’ कहा गया है। जब तामस समझ ‘ज्ञान’ है ही नहीं और भगवान्को भी इसको ‘ज्ञान’ कहनेमें संकोच हुआ है, तो फिर इसका
परिशिष्ट भाव —तामस ज्ञानमें आसुरी सम्पत्ति विशेष है। इस श्लोकमें ‘ज्ञान’ शब्द न देनेका तात्पर्य है कि वास्तवमें यह ज्ञान नहीं है, प्रत्युत अज्ञान ही है। यह तामस मनुष्योंकी बुद्धि है, जिसको ‘पशुबुद्धि’ कहा गया है— त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि। न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नृश्यसि॥
(श्रीमद्भा० ११।५।२)
(श्रीशुकदेवजी बोले—) ‘हे राजन्! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा। जैसे शरीर पहले नहीं था, पीछे पैदा हुआ और फिर मर जायगा, ऐसे तुम पहले नहीं थे, पीछे पैदा हुए और फिर मर जाओगे—यह बात नहीं है।’
सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विक कर्मका वर्णन करते हैं।
नियतं सद्गुरुहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
| यत् | = जो | सद्गुरुहितम् | = कर्तृत्वाभिमानसे रहित | अरागद्वेषतः | = बिना राग-द्वेषके |
|---|---|---|---|---|---|
| कर्म | = कर्म | ही (तथा) | कृतम् | = किया हुआ हो, | |
| नियतम् | = शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ (और) | अफलप्रेप्सुना | = फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा | तत् | = वह |
| सात्त्विकम् | = सात्त्विक | ||||
| उच्यते | = कहा जाता है। |
व्याख्या —‘नियतं सद्गुरुहितम्’……‘सात्त्विक-मुच्यते’—जिस व्यक्तिके लिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जिस परिस्थितिमें और जिस समय शास्त्रोंने जैसा करनेके लिये कहा है, उसके लिये वह कर्म ‘नियत’ हो जाता है।
यहाँ ‘नियतम्’ पदसे एक तो कर्मिका स्वरूप बताया है और दूसरे, शास्त्रनिषिद्ध कर्मका निषेध किया है।
‘सद्गुरुहितम्’ पदका तात्पर्य है कि वह नियत-कर्म कर्तृत्वाभिमानसे रहित होकर किया जाय। कर्तृत्वाभिमानसे रहित कहनेका भाव है कि जैसे वृक्ष आदिमें मूढ़ता होनेके कारण उनको कर्तृत्वका भान नहीं होता, पर उनकी भी वृद्धि आनेपर पत्तीका झड़ना, नये पत्तीका निकलना, शाखा कटनेपर घावका मिल जाना, शाखाओंका बढ़ना, फल-फूलका लगना आदि सभी क्रियाएँ समष्टि शक्तिके द्वारा
अपने-आप ही होती हैं; ऐसे ही इन सभी शरीरोंका बढ़ना-घटना, खाना-पीना, चलना-फिरना आदि सभी क्रियाएँ भी समष्टि शक्तिके द्वारा अपने-आप ही रही हैं। इन क्रियाओंके साथ न अभी कोई सम्बन्ध है, न पहले कोई सम्बन्ध था और न आगे ही कोई सम्बन्ध होगा। इस प्रकार जब साधकको प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है, तो फिर उसमें कर्तृत्व नहीं रहता। कर्तृत्व न रहनेपर उसके द्वारा जो कर्म होता है, वह संगरहित अर्थात् कर्तृत्वाभिमानरहित ही होता है।
यहाँ सांख्य-प्रकरणमें कर्तृत्वका त्याग मुख्य होनेसे और आगे ‘अरागद्वेषतः कृतम्’ पदोंमें भी आसक्तिके त्यागकी बात आनेसे यहाँ ‘सद्गुरुहितम्’ पदका अर्थ कर्तृत्व-अभिमानरहित लिया गया है*।
‘अरागद्वेषतः कृतम्’ पदोंका तात्पर्य है कि राग-द्वेषसे
- यहाँ संन्यास-(सांख्ययोग-) में ‘सद्गुरुहितम्’ पदसे कर्तृत्व-अभिमानसे रहित होनेकी बात आयी है और त्याग-(कर्मयोग-) में ‘सद्गुरुत्वका फलं चैव’ (१८।१) पदोंसे आसक्ति तथा फलेच्छासे रहित होनेकी बात आयी है। इसका तात्पर्य यह है कि सांख्ययोगीका शरीरमें थोड़ा भी अभिमान रहेगा तो उसका शरीरके साथ सम्बन्ध बना रहेगा, जो कि
श्लोक २४ ] * साधक-संजीवनी * ११४७
रहित हो करके कर्म किया जाय अर्थात् कर्मका ग्रहण
रागपूर्वक न हो और कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक न हो तथा
कर्म करनेके जितने साधन (शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण
आदि) हैं, उनमें भी राग-द्वेष न हो।
'अरागद्वेषतः' पदसे वर्तमानमें रागका अभाव बताया
है और 'अफलप्रेप्सुना' पदसे भविष्यमें रागका अभाव
बताया है। तात्पर्य यह है कि भविष्यमें मिलनेवाले फलकी
इच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा कर्म किया जाय अर्थात् क्रिया
और पदार्थोंसे निर्लिप्त रहते हुए असंगतापूर्वक कर्म किया
जाय तो वह सात्त्विक कहा जाता है।
इस सात्त्विक कर्ममें सात्त्विकता तभीतक है, जबतक
अत्यन्त सूक्ष्मरूपसे भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है। जब
प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब यह कर्म
'अकर्म' हो जाता है।
सम्बन्ध-अब राजस कर्मका वर्णन करते हैं।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
तु = परन्तु | वा = अथवा | क्रियते = किया जाता है,
यत् = जो | साहङ्कारेण = अहंकारसे | तत् = वह
कर्म = कर्म | पुनः = और | राजसम् = राजस
कामेप्सुना = भोगोंकी इच्छासे | बहुलायासम् = परिश्रमपूर्वक | उदाहृतम् = कहा गया है।
व्याख्या-'यत्तु* कामेप्सुना कर्म'-हम कर्म करेंगे
तो हमें पदार्थ मिलेंगे, सुख-आराम मिलेगा, भोग मिलेंगे,
आदर-सम्मान-बड़ाई मिलेगी आदि फलकी इच्छासे कर्म
किया जाय।
अपनी विशेषताको लेकर (अहंकारपूर्वक) कर्म किया
जाय-इन दोनों भावोंमेंसे एक भाव होनेपर भी वह
कर्म राजस हो जाता है, यह बतानेके लिये यहाँ 'वा
पुनः' पद आये हैं। तात्पर्य है कि फलेच्छा और
अहंकार-इन दोनोंमेंसे जब एक भाव होनेपर भी कर्म
'राजस' हो जाता है, तब दोनों भाव होनेपर वह कर्म राजस
हो ही जायगा।
'साहंकारेण'-लोगोंके सामने कर्म करनेसे लोग
देखते हैं और वाह-वाह करते हैं तो अभिमान आता है
और जहाँ लोग सामने नहीं होते, वहाँ (एकान्तमें) कर्म
करनेसे दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विलक्षणता, विशेषता
देखकर अभिमान आता है। जैसे-दूसरे आदमी हमारी
तरह सुचारुरूपसे सांगोपांग कार्य नहीं कर सकते; हमारेमें
काम करनेकी जो योग्यता, विद्या, चतुरता आदि है, वह
हरेक आदमीमें नहीं मिलेगी; हम जो भी काम करते हैं,
उसको बहुत ही ईमानदारीसे और जल्दी करते हैं, आदि-
आदि। इस प्रकार अहंकारपूर्वक किया गया कर्म राजस
कहलाता है।
'क्रियते बहुलायासम्'-कर्म करते समय हरेक
व्यक्तिके शरीरमें परिश्रम तो होता ही है, पर जिस व्यक्तिमें
शरीरके सुख-आरामकी इच्छा मुख्य होती है, उसको कर्म
करते समय शरीरमें ज्यादा परिश्रम मालूम देता है।
जिस व्यक्तिमें कर्मफलकी इच्छा तो मुख्य है, पर
शारीरिक सुख-आरामकी इच्छा मुख्य नहीं है, अर्थात् सुख-
आराम लेनेकी स्वाभाविक ही प्रकृति नहीं है, उसको कर्म
करते हुए भी शरीरमें परिश्रम नहीं मालूम देता। कारण कि
'वा पुनः'-आगे भविष्यमें मिलनेवाले फलको
लेकर (फलेच्छापूर्वक) कर्म किया जाय अथवा वर्तमानमें
भीतरमें भोगों और संग्रहकी जोरदार कामना होनेसे उसकी
वृत्ति कामनापूर्तिकी तरफ ही लगी रहती है; शरीरकी तरफ
तत्त्वप्राप्तिमें बाधक होगा; परन्तु कर्मयोगीका शरीरमें थोड़ा अभिमान रह भी जायगा तो वह सांख्ययोगीकी तरह उतना बाधक
नहीं होगा। कारण कि (कोई भी कर्म अपने लिये न करनेसे) कर्मयोगीका कर्तृत्व-अभिमान केवल कर्तव्य-पालनके लिये
ही होता है अर्थात् वह जिस समय जो कार्य करता है, उसी समय उसमें तात्कालिक कर्तृत्व-अभिमान रहता है। कार्यका अन्त
होनेपर वह कर्तृत्व-अभिमान उसी कार्यमें लीन हो जाता है।
- राजस कर्मको सात्त्विक कर्मसे भिन्न बतानेके लिये यहाँ 'तु' पदका प्रयोग हुआ है।