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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

११८६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

तेज आदि सात स्वभावज कर्मोंके द्वारा और खाना-पीना आदि सभी कर्मोंके द्वारा क्षत्रिय सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें।

वैश्य यज्ञ करना, अध्ययन करना, दान देना और व्याज लेना तथा कृषि, गौरक्ष्य और वाणिज्य—इन शास्त्र-नियत और स्वभावज कर्मोंके द्वारा और शूद्र शास्त्रविहित तथा स्वभावज कर्म सेवा के द्वारा सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें अर्थात् अपने शास्त्रविहित, स्वभावज और खाना-पीना, सोना-जागना आदि सभी कर्मोंके द्वारा भगवान्की आज्ञासे, भगवान्की प्रसन्नताके लिये, भगवद्वृद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।

शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जो-जो कर्तव्य-कर्म बताये गये हैं, वे सब संसाररूप परमात्माकी पूजाके लिये ही हैं। अगर साधक अपने कर्मोंके द्वारा भावसे उस परमात्माका पूजन करता है, तो उसकी मात्र क्रियाएँ परमात्माकी पूजा हो जाती हैं। जैसे, पितामह भीष्मने (अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए) अर्जुनके सारथि बने हुए भगवान्की अपने युद्धरूप कर्मोंके द्वारा (बाणोंसे) पूजा की। भीष्मके बाणोंसे भगवान्का कवच टूट गया, जिससे भगवान्के शरीरमें घाव हो गये और हाथकी अंगुलियोंमें छोटे-छोटे बाण लगनेसे अंगुलियोंसे लगाम पकड़ना कठिन हो गया। ऐसी पूजा करके अन्तसमयमें शर-शय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्म अपने बाणोंद्वारा पूजित भगवान्का ध्यान करते हैं—‘युद्धमें मेरे तीखे बाणोंसे जिनका कवच टूट गया है, जिनकी त्वचा विच्छिन्न हो गयी है, परिश्रमके कारण जिनके मुखपर स्वेदकण सुशोभित हो रहे हैं, घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई रज जिनकी सुन्दर अलकावलियोंमें लगी हुई है, इस प्रकार बाणोंसे अलंकृत भगवान् कृष्णमें मेरे मन-बुद्धि लग जायँ।’

लौकिक और पारमार्थिक कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन तो करना चाहिये, पर उन कर्मोंमें और उनको करनेके करणों-उपकरणोंमें ममता नहीं रखनी चाहिये। कारण कि जिन वस्तुओं, क्रियाओं आदिमें ममता हो जाती

है, वे सभी चीजें अपवित्र हो जानेसे पूजा-सामग्री नहीं रहती (अपवित्र फल, फूल आदि भगवान्पर नहीं चढ़ते)। इसलिये ‘मेरे पास जो कुछ है, वह सब उस सर्वव्यापक परमात्माका ही है, मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्तिसे उनका पूजन करना है’—इस भावसे जो कुछ किया जाय, वह सब-का-सब परमात्माका पूजन हो जाता है। इसके विपरीत उन क्रियाओं, वस्तुओं आदिको मनुष्य जितनी अपनी मान लेता है, उतनी ही वे (अपनी मानी हुई) क्रियाएँ, वस्तुएँ (अपवित्र होनेसे) परमात्माके पूजनसे वंचित रह जाती हैं।

‘सिद्धि विन्दति मानवः’—सिद्धिको प्राप्त होनेका तात्पर्य है कि अपने कर्मोंसे परमात्माका पूजन करनेवाला मनुष्य प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर स्वतः अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर पहले जो परमात्माके समर्पण किया था, उस संस्कारके कारण उसका प्रभुमें अनन्यप्रेम जाग्रत् हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी पाना बाकी नहीं रहता।

यहाँ ‘मानवः’ पदका तात्पर्य केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—इन वर्णों और आश्रमों आदिसे ही नहीं है, प्रत्युत हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि सभी जातियों और सम्प्रदायोंसे है। किसी भी जाति, सम्प्रदाय आदिके कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, सब-के-सब ही परमात्माके पूजनके अधिकारी हैं; क्योंकि सभी परमात्माके अपने हैं। जैसे घरमें स्वभाव आदिके भेदसे अनेक तरहके बालक होते हैं, पर उन सबकी माँ एक ही होती है और उन बालकोंकी तरह-तरहकी जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, उन सब क्रियाओंसे माँ प्रसन्न होती रहती है; क्योंकि उन बालकोंमें माँका अपनापन होता है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख हुए मनुष्योंकी सभी क्रियाओंको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं और प्रसन्न हो जाते हैं।

इसी अध्यायके सतरवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि कोई भी मनुष्य हम दोनोंके संवादका अध्ययन

१-पशूनां रक्षणं दानमिष्याध्ययनमेव च। वाणिज्यं कुर्याद् च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ (मनु० १।१०)

२-एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनस्यया ॥ (मनु० १।११)

३-युधि तुगरजोविधूर्विष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये । मम निशितशरीरविभ्रद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥

(श्रीमद्भा० १।१।३४)

४-‘ममता मलं जरि जाइ’ (मानस ७।११७ क)

श्लोक ४६ ] * साधक-संजीवनी * ११८७

करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इससे

यह सिद्ध होता है कि कोई गीताका पाठ करे, अध्ययन

करे तो उसको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। ऐसे

ही जो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंसे विमुख होकर

भगवान्के सम्मुख हो जाता है, उसकी क्रियाओंको भगवान्

अपना पूजन मान लेते हैं।

विशेष बात

कर्मयोगमें कर्मोंके द्वारा जडतासे असंगता होती है और

भक्तियोगमें संसारसे असंगतापूर्वक परमात्माके प्रति पूज्यभाव

होनेसे परमात्माकी सम्मुखता रहती है।

कर्मयोगी तो अपने पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि

आदि जो कुछ संसारका जड-अंश है, उसको स्वार्थ,

अभिमान, कामनाका त्याग करके संसारकी सेवामें लगा

देता है। इससे अपनी मानी हुई चीजोंसे अपनापन छूटकर

उनसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, और जो स्वतः-

स्वाभाविक असंगता है, वह प्रकट हो जाती है।

भक्त अपने वर्णोचित स्वाभाविक कर्मों और समय-समयपर

किये गये पारमार्थिक कर्मों-(जप, ध्यान आदि-) के द्वारा

सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त परमात्माका पूजन करता है।

इन दोनोंमें भावकी भिन्नता होनेसे इतना ही अन्तर

हुआ कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह सबको

सुख पहुँचानेमें लग जाता है, तो क्रियाओंको करनेका वेग

मिटकर स्वयंमें असंगता आ जाती है; और भक्तकी सम्पूर्ण

क्रियाएँ परमात्माकी पूजन-सामग्री बन जानेसे जडतासे

विमुखता होकर भगवान्की सम्मुखता आ जाती है और प्रेम

बढ़ जाता है।

भक्त तो पहलेसे ही भगवान्के सम्मुख होकर अपने-

आपको भगवान्के अर्पित कर देता है। स्वयंके अनन्यता-

पूर्वक भगवान्के समर्पित हो जानेसे खाना-पीना, काम-

धंधा आदि लौकिक और जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय

आदि पारमार्थिक क्रियाएँ भी भगवान्के अर्पण हो जाती

हैं। उसकी लौकिक-पारमार्थिक क्रियाओंमें केवल

बाहरसे भेद देखनेमें आता है; परन्तु वास्तवमें कोई भेद

नहीं रहता।

कर्मयोगी और ज्ञानयोगी-ये दोनों अन्तमें एक हो

जाते हैं। जैसे, कर्मयोगी कर्मोंके द्वारा जडताका त्याग करता

है अर्थात् सेवाके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ संसारके अर्पण

हो जाती हैं और स्वयं असंग हो जाता है और ज्ञानयोगी

विचारके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् विचारके

द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो जाती हैं और

स्वयं असंग हो जाता है। तात्पर्य है कि दोनोंके अर्पण

करनेके प्रकारमें अन्तर है, पर असंगतामें दोनों एक हो

जाते हैं*। इस असंगतामें कर्मयोगी और ज्ञानयोगी-दोनों

स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके लिये किंचिन्मात्र भी कर्मोंका

बन्धन नहीं रहता। केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही

कर्तव्य-कर्म करनेसे कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म लीन हो जाते

हैं (गीता-चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), और

ज्ञानरूप अग्निसे ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते

हैं (गीता-चौथे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। परन्तु इस

स्वतन्त्रतामें भी जिसको संतोष नहीं होता अर्थात् स्वतन्त्रतासे

जिसको उपरति हो जाती है, उसमें भगवत्कृपासे प्रेम प्रकट

हो सकता है।

परिशिष्ट भाव-यहाँ 'यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्' पदोंमें आये 'प्रवृत्तिः' पदका अर्थ 'उत्पत्ति' लेना चाहिये; क्योंकि

परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति तो होती है, पर क्रिया नहीं होती। क्रिया रजोगुणसे होती है-'लोभः

प्रवृत्तिरारम्भः०' (गीता १४।१२) पन्द्रहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी 'प्रवृत्ति' पद 'उत्पत्ति' अर्थमें आया है-

'यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी'।

यह संसार भगवान्का पहला अवतार है-'आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य' (श्रीमद्भा० २।६।४१)। अतः यह

संसार भगवान्की ही मूर्ति है, श्रीविग्रह है। जैसे मूर्तिमें हम भगवान्का पूजन करते हैं, पुष्प चढ़ाते हैं, चन्दन लगाते

हैं तो हमारा भाव मूर्तिमें न होकर भगवान्में होता है अर्थात् हम मूर्तिकी पूजा न करके भगवान्की करते हैं,

ऐसे ही हमें अपनी प्रत्येक क्रियासे संसाररूपमें भगवान्का पूजन करना है। श्रोता सुनकर वक्ताका पूजन करे, वक्ता

सुनाकर श्रोताका पूजन करे-इस प्रकार सभी अपने-अपने कर्मोंके द्वारा एक-दूसरेका पूजन करें। दृष्टि भगवान्की

तरफ ही हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णकी तरफ नहीं। भगवान् श्रीरामको ऋषि-मुनि प्रणाम करते हैं तो भगवान्के

  • ऐसे तो संसारसे असंग होना कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-इन तीनों योगोंके साधकोंके लिये आवश्यक है।

गीतामें 'संगं त्यक्त्वा' (५।११) पदोंसे कर्मयोगीको, 'मुक्तसंगः' (१८।२६) पदसे ज्ञानयोगीको और 'संगवर्जितः' (११।५५)

पदसे भक्तियोगको संगरहित होनेके लिये कहा गया है।

११८८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

भावसे प्रणाम करते हैं, क्षत्रियके भावसे नहीं। पूजनमें खास बात है—सब कुछ भगवान्‌का और भगवान्‌के लिये ही है। जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन करते हैं, ऐसे ही भगवान्‌की वस्तुओंसे भगवान्‌का पूजन करना है। वास्तवमें सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्‌का ही पूजन हैं, हमें केवल अपनी भूल मिटानी है। भगवान्‌की ही वस्तु भगवान्‌के अर्पित करनेसे अपनी स्वार्थबुद्धि, भोगबुद्धि, फलेच्छा मिट जायगी तथा अपनेमें सामर्थ्य भी भगवान्‌का ही माननेसे कर्तृत्व भी मिट जायगा और भगवत्प्राप्तिका अनुभव हो जायगा।

वास्तवमें भगवद्भावसे संसारका पूजन मूर्तिपूजासे भी विशेष मूल्यवान्‌ है। कारण कि मूर्तिका पूजन करनेसे मूर्ति प्रसन्न होती हुई नहीं दीखती, पर प्राणियोंकी सेवा करनेसे वे प्रत्यक्ष प्रसन्न (सुखी) होते हुए दीखते हैं।

अगर व्यक्तियोंको भगवान्‌का स्वरूप मानकर कर्मोंसे और पदार्थोंसे उनकी सेवा की जाय तो संसार लुप्त हो जायगा और एकमात्र भगवान्‌ रह जायेंगे अर्थात् 'सब कुछ भगवान्‌ ही हैं'—इसका अनुभव हो जायगा। जैसे रस्सीमें साँपका भ्रम मिटनेपर साँप तो लुप्त हो जाता है, पर रस्सी तो रहती ही है, ऐसे ही भगवान्‌में जगत्‌का भ्रम मिटनेपर जगत्‌ जगत्‌रूपसे लुप्त हो जाता है और भगवद्रूपसे रहता है। कारण कि जगत्‌की तो मान्यता है, पर 'भगवान्‌ हैं' यह वास्तविकता है। श्रीमद्भगवतमें भगवान्‌ कहते हैं—

नरेष्वभीक्ष्णं मद्भ्रावं पुंसो भावयतोऽचिरात्। स्मर्थसूयातिरस्काराः साहङ्कारा वियन्ति हि ॥

(श्रीमद्भा० ११।२१।१५)

'जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है और उनमें मेरेको ही देखता है*, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषद्वष्टि, तिरस्कार आदि दोष अहंकारसहित दूर हो जाते हैं।'

गीतामें भगवान्‌ने कहा है—'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः' (१०।२०) 'सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित आत्मा भी मैं ही हूँ। अतः भगवद्भावसे किसी प्राणीकी सेवा, आदर-सत्कार करेंगे तो वह भगवान्‌की ही सेवा होगी। अगर किसी प्राणीका अनादर-तिरस्कार करेंगे तो वह भगवान्‌का ही अनादर-तिरस्कार होगा—'कशयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः०' (१७।६)।

जैसे ज्ञानमार्गमें गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ('गुणा गुणेषु वर्तन्ते'), ऐसे ही भक्तिमार्गमें भगवान्‌की वस्तुओंसे भगवान्‌का ही पूजन हो रहा है। परन्तु दोनोंमें बड़ा अन्तर है। 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' में जड़ताकी मुख्यता है, जिसका ज्ञानमार्गी त्याग करता है; परन्तु 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य' में चिन्मयताकी मुख्यता है, जिसका भक्तिमार्गी ग्रहण करता है। इसलिये भक्तिमार्गमें जड़ता मिट जाती है, संसार संसाररूपसे छिप जाता है और भगवत्स्वरूपसे प्रकट हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें भगवान्‌ ही हैं। साधक अगर जगत्‌को जगत्‌रूपसे देखे तो उसकी 'सेवा' करे और भगवद्रूपसे देखे तो उसका 'पूजन' करे। अपने लिये कुछ नहीं करे। मात्र कर्म अपने लिये करना बन्धन है, संसारके लिये करना सेवा है और भगवान्‌के लिये करना पूजन है।

सम्बन्ध—स्वभावज (सहज) कर्मोंको निष्कामभावपूर्वक और पूजाबुद्धिसे करते हुए उसमें कोई कमी रह भी जाय, तो भी उसमें साधकको हताश नहीं होना चाहिये—इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाज्जोति किल्विषम् ॥ ४७ ॥

  • स्त्री-पुरुषोंमें भगवान्‌को देखनेके लिये इसलिये कहा है कि हम अधिकतर स्त्री-पुरुषोंमें ही गुण-दोष देखते हैं, जिससे उनमें भगवद्भाव नहीं होता। अतः स्त्री-पुरुषोंमें गुण-दोष न देखकर केवल भगवान्‌को देखनेसे सम्पूर्ण प्राणियों और पदार्थोंमें सगमतासे भगवद्भाव हो जायगा।

श्लोक ४७ ]

  • साधक-संजीवनी *

११८९

स्वप्नुत्तितात् = अच्छी तरह अनुष्ठान किये हुएस्वधर्मः = अपना धर्मकर्म = स्वधर्मरूप
परधर्मात् = परधर्मसेश्रेयान् = श्रेष्ठ है। (कारण कि)कूर्वन् = करता हुआ (मनुष्य)
विगुणः = गुणरहित (भी)स्वभाव-नियतम् = स्वभावसे नियत किये हुएकिल्विषम् = पापको
न, आप्नोति = प्राप्त नहीं होता।

व्याख्या —‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्-स्वप्नुत्तितात्’—यहाँ ‘स्वधर्म’ शब्दसे वर्ण-धर्म ही मुख्यतासे लिया गया है।

परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाला मनुष्य ‘स्व’ को अर्थात् अपनेको जो मानता है, उसका धर्म (कर्तव्य) ‘स्वधर्म’ है। जैसे कोई अपनेको मनुष्य मानता है, तो मनुष्यताका पालन करना उसके लिये स्वधर्म है। ऐसे ही कर्मोंके अनुसार अपनेको कोई विद्यार्थी या अध्यापक मानता है तो पढ़ना या पढ़ाना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको साधक मानता है, तो साधन करना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको भक्त, जिज्ञासु और सेवक मानता है तो भक्ति, जिज्ञासा और सेवा उसका स्वधर्म हो जायगा। इस प्रकार जिसकी जिस कार्यमें नियुक्ति हुई है और जिसने जिस कार्यको स्वीकार किया है, उसके लिये उस कार्यको सांगोपांग करना स्वधर्म है।

ऐसे ही मनुष्य जन्म और कर्मके अनुसार अपनेको जिस वर्ण और आश्रमका मानता है, उसके लिये उसी वर्ण और आश्रमका धर्म स्वधर्म हो जायगा। ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है तो यज्ञ कराना, दान लेना, पढ़ाना आदि जीविका-सम्बन्धी कर्म उसके लिये स्वधर्म हैं। क्षत्रियके लिये युद्ध करना, ईश्वरभाव आदि; वैश्यके लिये कृषि, गौरक्षा, व्यापार आदि और शूद्रके लिये सेवा—ये जीविका-सम्बन्धी कर्म स्वधर्म हैं। ऐसा अपना स्वधर्म अगर दूसरोंके धर्मकी अपेक्षा गुणरहित है अर्थात् अपने स्वधर्ममें गुणोंकी कमी है, उसका अनुष्ठान करनेमें कमी रहती है तथा उसको कठिनतासे किया जाता है; परन्तु दूसरेका धर्म गुणोंसे परिपूर्ण है, दूसरेके धर्मका अनुष्ठान

सांगोपांग है और करनेमें बहुत सुगम है तो भी अपने स्वधर्मका पालन करना ही सर्वश्रेष्ठ है।

शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंका विधान किया है, उस वर्णके लिये वे कर्म ‘स्वधर्म’ हैं और उन्हीं कर्मोंका जिस वर्णके लिये निषेध किया है, उस वर्णके लिये वे कर्म ‘परधर्म’ हैं। जैसे यज्ञ कराना, दान लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये शास्त्रकी आज्ञा होनेसे स्वधर्म हैं; परन्तु वे ही कर्म क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये शास्त्रका निषेध होनेसे परधर्म हैं। परन्तु आपत्कालको लेकर शास्त्रोंने जीविका-सम्बन्धी जिन कर्मोंका निषेध नहीं किया है, वे कर्म सभी वर्णोंके लिये स्वधर्म हो जाते हैं। जैसे आपत्कालमें अर्थात् आपत्तिके समय वैश्यके खेती, व्यापार आदि जीविका-सम्बन्धी कर्म ब्राह्मणके लिये भी स्वधर्म हो जाते हैं*।

ब्राह्मणके शम, दम आदि जितने भी स्वभावज कर्म हैं, वे सामान्य धर्म होनेसे चारों वर्णोंके लिये स्वधर्म हैं। कारण कि उनका पालन करनेके लिये सभीको शास्त्रकी आज्ञा है। उनका किसीके लिये भी निषेध नहीं है।

मनुष्य-शरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इस दृष्टिसे मनुष्यमात्र साधक है। अतः दैवी-सम्पत्तिके जितने भी सदगुण-सदाचार हैं, वे सभीके अपने होनेसे मनुष्यमात्रके लिये स्वधर्म हैं। परन्तु आसुरी-सम्पत्तिके जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे मनुष्यमात्रके लिये न तो स्वधर्म हैं और न परधर्म ही हैं; वे तो सभीके लिये निषिद्ध हैं, त्याज्य हैं; क्योंकि वे अधर्म हैं। दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको धारण करनेमें और आसुरी-सम्पत्तिके पाप-कर्मोंका त्याग करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं, सभी सबल हैं, सभी अधिकारी हैं; कोई भी परतन्त्र, निर्बल तथा अनधिकारी नहीं है। हाँ,

  • आपत्तिके समय ब्राह्मण क्षात्रवृत्तिसे निर्वाह कर सकता है और ज्यादा आपत्ति (आफत) आ जाय तो वैश्यवृत्ति भी कर सकता है; परन्तु वैश्यवृत्तिमें फरक यह रहेगा कि ब्राह्मण खेती करे तो सुबह और शाम ठण्डे समय हल चलाये और दो बैलोंका ही हल चलाये, एक बैलका नहीं। ऐसे ही व्यापार करे तो रस-कसका व्यापार न करे अर्थात् चीनी, शक्कर, घी, तेल, नमक आदिका व्यापार न करे।

ऐसे ही आफतके समय क्षत्रिय वैश्यकी वृत्ति—गौरक्ष्य, कृषि और वाणिज्य कर सकता है और वैश्य शूद्रकी वृत्ति भी कर सकता है।

११९०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

यह बात अलग है कि कोई सदगुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है और कोई सदगुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है। जैसे, किसीके स्वभावमें दया मुख्य होती है और किसीके स्वभावमें उपेक्षा मुख्य होती है, किसीका स्वभाव स्वतः क्षमा करनेका होता है और किसीका स्वभाव माँगनेपर क्षमा करनेका होता है, किसीके स्वभावमें उदारता स्वाभाविक होती है और किसीके स्वभावमें उदारता विचारपूर्वक होती है, आदि। ऐसा भेद रह सकता है।

‘स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाजोति किल्वषम्’ —शास्त्रोंमें विहित और निषिद्ध—दो तरहके वचन आते हैं। उनमें विहित कर्म करनेकी आज्ञा है और निषिद्ध कर्म करनेका निषेध है। उन विहित कर्मोंमें भी शास्त्रोंने जिस वर्ण, आश्रम, देश, काल, घटना, परिस्थिति, वस्तु, संयोग, वियोग आदिको लेकर अलग-अलग जो कर्म नियुक्त किये हैं, उस वर्ण, आश्रम आदिके लिये वे ‘नियत कर्म’ कहलाते हैं।

सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंको लेकर जो स्वभाव बनता है, उस स्वभावके अनुसार जो कर्म नियत किये जाते हैं, वे ‘स्वभावनियत कर्म’ कहलाते हैं। उन्हींको स्वभावप्रभव, स्वभावज, स्वधर्म, स्वकर्म और सहज कर्म कहा है।

तात्पर्य यह है कि जिस वर्ण, जातिमें जन्म लेनेसे पहले इस जीवके जैसे गुण और कर्म रहे हैं, उन्हीं गुणों और कर्मोंके अनुसार उस वर्णमें उसका जन्म हुआ है। कर्म तो करनेपर समाप्त हो जाते हैं, पर गुण-रूपसे उनके संस्कार रहते हैं। जन्म होनेपर उन गुणोंके अनुसार ही उसमें गुण और पालनीय आचरण स्वाभाविक ही उत्पन्न होते हैं अर्थात् उनको न तो कहींसे लाना पड़ता है और न उनके लिये परिश्रम ही करना पड़ता है। इसलिये उनको स्वभावज और स्वभावनियत कहा है।

यद्यपि ‘सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनान्निरिवावृताः’ (गीता १८।४८) के अनुसार कर्मामात्रमें दोष आता ही है, तथापि स्वभावके अनुसार शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है, उन कर्मोंको अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे किया जाय, तो उस वर्णके व्यक्तिको उन कर्मोंका दोष (पाप) नहीं लगता। ऐसे ही जो केवल शरीर-निर्वाहके लिये कर्म करता है, उसको भी पाप नहीं लगता—‘शरीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाजोति किल्वषम्’ (गीता ४।२१)।

विशेष बात

यहाँ एक बड़ी भारी शंका पैदा होती है कि एक आदमी कसाईके घर पैदा होता है तो उसके लिये कसाईका कर्म सहज (साथ ही पैदा हुआ) है, स्वाभाविक है। स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता, तो क्या कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये? अगर उसको कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये, तो फिर निषिद्ध आचरण कैसे छूटेगा? कल्याण कैसे होगा?

इसका समाधान है कि स्वभावनियत कर्म वह होता है, जो विहित हो, किसी रीतिसे निषिद्ध नहीं हो अर्थात् उससे किसीका भी अहित न होता हो। जो कर्म किसीके लिये भी अहितकारक होते हैं, वे सहज कर्ममें नहीं लिये जाते। वे कर्म आसक्ति, कामनाके कारण पैदा होते हैं। निषिद्ध कर्म चाहे इस जन्ममें बना हो, चाहे पूर्वजन्ममें बना हो, है वह दोषवाला ही। दोष-भाग त्याज्य होता है; क्योंकि दोष आसुरी-सम्पत्ति है और गुण दैवी-सम्पत्ति है। पहले जन्मके संस्कारोंसे भी दुर्गुण-दुराचारोंमें रुचि हो सकती है, पर वह रुचि दुर्गुण-दुराचार करनेमें बाध्य नहीं करती। विवेक, सद्ब्रचार, सत्संग, शास्त्र आदिके द्वारा उस रुचिको मिटाया जा सकता है।

युक्तिसे भी देखा जाय तो कोई भी प्राणी अपना अहित नहीं चाहता, अपनी हत्या नहीं चाहता। अतः किसीका अहित करनेका, हत्या करनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मनुष्य अपने लिये अच्छा काम चाहता है तो उसे दूसरोंके लिये भी अच्छा काम करना चाहिये। शास्त्रोंमें भी देखा जाय तो यही बात है कि जिसमें दोष होते हैं, पाप होते हैं, अन्याय होते हैं, वे कर्म ‘वैकृत’ हैं, ‘प्राकृत’ नहीं हैं अर्थात् वे विकारसे पैदा हुए हैं, स्वभावसे नहीं। तीसरे अध्यायमें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पाप-कर्म करता है? तो भगवान्ने कहा कि कामनाके वशमें होकर ही मनुष्य पाप करता है (तीसरे अध्यायका छत्तीसवर्ग-सैतीसवर्ग श्लोक)। कामनाको लेकर, क्रोधको लेकर, स्वार्थ और अभिमानको लेकर जो कर्म किये जाते हैं, वे कर्म शुद्ध नहीं होते, अशुद्ध होते हैं।

परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो कर्म किये जाते हैं, उन कर्मोंमें भिन्नता तो रहती है, पर वे दोषी नहीं होते। ब्राह्मणके घर जन्म होगा तो ब्राह्मणोचित कर्म होंगे, शूद्रके घर जन्म होगा तो शूद्रोचित कर्म होंगे, पर दोषी-भाग किसीमें भी

श्लोक ४८ ]

  • साधक-संजीवनी *

११११

नहीं होगा। दोषी-भाग सहज नहीं है, स्वभावनियत नहीं है। दोषयुक्त कर्म स्वाभाविक हो सकते हैं, पर स्वभावनियत नहीं हो सकते। एक ब्राह्मणको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय तो प्राप्ति होनेके बाद भी वह वैसी ही पवित्रतासे भोजन बनायेगा; जैसी पवित्रतासे ब्राह्मणको रहना चाहिये, वैसी ही पवित्रतासे रहेगा। ऐसे ही एक अन्त्यजको परमात्माकी प्राप्ति हो जाय तो वह जूठन भी खा लेगा; जैसे पहले रहता था, वैसे ही रहेगा। परन्तु ब्राह्मण ऐसा नहीं करेगा; क्योंकि पवित्रतासे भोजन करना उसका स्वभावनियत कर्म है, जबकि अन्त्यजके लिये जूठन खाना दोषी नहीं बताया गया है। इसलिये सिद्ध महापुरुषोंमें एक-एकसे विचित्र कर्म होते हैं, पर वे दोषी नहीं होते। उनका स्वभाव राग-द्वेषसे रहित होनेके कारण शुद्ध होता है।

पहलेके किसी पाप-कर्मसे कसाईके घर जन्म हो गया तो वह जन्म पापका फल भोगनेके लिये हुआ है, पाप करनेके लिये नहीं। पापका फल जाति, आयु और भोग बताया गया है, नया कर्म नहीं बताया गया—‘सति मूले तद्विपाको जाल्यायुर्भोगाः’ (योगदर्शन २।१३)। कर्म करनेमें वह स्वतन्त्र है। यदि उसका चित्त शुद्ध हो जाय तो वह कसाई आदिका कर्म कर नहीं सकेगा। एक सन्तसे किसीने कहा कि अगर कोई अपना धर्म पशुओंको मारना ही मानता है तो वह क्या करे? तो उन सन्तने बड़ी दृढ़तासे कहा कि यदि वह अपने धर्मके अनुसार ही लगातार तीन वर्षतक पवित्रतापूर्वक भगवान्के नामका, अपने इष्टके नामका जप करे, तो फिर वह मार नहीं सकेगा। कारण कि उसका पूर्वजन्मका अथवा यहाँका जो स्वभाव पड़ा हुआ है, वह स्वभाव दोषी है। यदि सच्चे हृदयसे ठीक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहेगा तो वह कसाईका काम नहीं कर सकेगा। उससे अपने-आप ग्लानि होगी, उपरति

होगी। बिना कहे-सुने उसमें सदगुण स्वाभाविक आयेगें। रामचरितमानसमें शबरीके प्रसंगमें आता है—भगवान् रामने शबरीसे कहा—‘नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥’ (३।३५।४) फिर नौ प्रकारकी भक्ति कहकर अन्तमें भगवान्ने कहा—‘सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें’ (३।३६।४)। तात्पर्य यह है कि भक्ति नौ प्रकारकी होती है, इसका शबरीको पता ही नहीं है; परन्तु शबरीमें सब प्रकारकी भक्ति स्वाभाविक ही थी। सत्संग, भजन, ध्यान आदि करनेसे जिन गुणोंका हमें ज्ञान नहीं है, वे गुण भी आ जाते हैं। जो केवल दूसरोंको सुनानेके लिये याद करते हैं, वे दूसरोंको तो बता देंगे, पर आचरणमें वे गुण तभी आयेगें, जब अपना स्वभाव शुद्ध करके परमात्माकी तरफ चलेगें। इसलिये मनुष्यको अपना स्वभाव और अपने कर्म शुद्ध, निर्मल बनाने चाहिये। इसमें कोई परतन्त्र नहीं है, कोई निर्बल नहीं है, कोई अयोग्य नहीं है, कोई अपात्र नहीं है। मनुष्यके मनमें ऐसा आता है कि मैं कर्तव्यका पालन करनेमें और सदगुणोंको लानेमें असमर्थ हूँ। परन्तु वास्तवमें वह असमर्थ नहीं है। सांसारिक भोगोंकी आदत और पदार्थिक संग्रहकी रुचि होनेसे ही असमर्थताका अनुभव होता है।

उद्धारके योग्य समझकर ही भगवान्ने मनुष्य-शरीर दिया है। इसलिये अपने स्वभावका सुधार करके अपना उद्धार करनेमें प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है, सबल है, योग्य है, समर्थ है। स्वभावका सुधार करना असम्भव तो है ही नहीं, कठिन भी नहीं है। मनुष्यको मुक्तिका द्वार कहा गया है—‘साधन धाम मोच्छ कर द्वार’ (मानस ७।४३।४)। यदि स्वभावका सुधार करना असम्भव होता तो इसे मुक्तिका द्वार कैसे कहा जा सकता? अगर मनुष्य अपने स्वभावका सुधार न कर सके, तो फिर मनुष्यजीवनकी सार्थकता क्या हुई?

परिशिष्ट भाव —स्वधर्मरूप कर्मको करनेसे पाप बन तो सकता है, पर लग नहीं सकता—‘कुर्वनान्मोति किल्विषम्’। पाप लगनेमें मुख्य कारण भाव है, क्रिया नहीं। अतः पाप कर्मोंसे नहीं लगता, प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान आनेसे लगता है।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!न, त्यजेत्= त्याग नहीं करनाअग्निः= अग्निकी
सदोषम्= दोषयुक्त होनेपरचाहिये;इव= तरह (किसी-न-
अपि= भीहि= क्योंकिकिसी)
सहजम्= सहजसर्वारम्भाः= सम्पूर्ण कर्मदोषेण= दोषसे
कर्म= कर्मकाधूमेन= धुएँसेआवृताः= युक्त हैं।

११९२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

व्याख्या —[पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो कर्म नियत किये हैं, उन कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि स्वभावनियत कर्मोंमें भी पाप-क्रिया होती है। अगर पाप-क्रिया न होती तो 'पापको प्राप्त नहीं होता' यह कहना नहीं बनता। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि 'जो सहज कर्म हैं, उनमें कोई दोष भी आ जाय तो भी उनका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सब-के-सब कर्म धुएँसे अग्निकी तरह दोषसे आवृत हैं।']

'सहजं कर्म कोनैतय सदोषमपि न त्यजेत्'— स्वभावनियत कर्म सहज-कर्म कहलाते हैं; जैसे—ब्राह्मणके शम, दम आदि; क्षत्रियके शौर्य, तेज आदि; वैश्यके कृषि, गौरक्ष्य आदि और शूद्रके सेवा-कर्म—ये सभी सहज-कर्म हैं। जन्मके बाद शास्त्रोंने पूर्वके गुण और कर्मोंके अनुसार जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है, वे शास्त्रनियत कर्म भी सहज-कर्म कहलाते हैं; जैसे—ब्राह्मणके लिये यज्ञ करना और कराना, पढ़ना और पढ़ाना आदि; क्षत्रियके लिये यज्ञ करना, दान करना आदि; वैश्यके लिये यज्ञ करना आदि; और शूद्रके लिये सेवा।

सहज कर्ममें ये दोष हैं—

(१) परमात्मा और परमात्माका अंश—ये दोनों ही 'स्व' हैं तथा प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर आदि—ये दोनों ही 'पर' हैं। परन्तु परमात्माका अंश स्वयं प्रकृतिके वश होकर परतन्त्र हो जाता है अर्थात् क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और उस क्रियाको यह अपनेमें मान लेता है तो परतन्त्र हो जाता है। यह प्रकृतिके परतन्त्र होना ही महान् दोष है।

(२) प्रत्येक कर्ममें कुछ-न-कुछ आनुषंगिक अनिवार्य हिंसा आदि दोष होते ही हैं।

(३) कोई भी कर्म किया जाय, वह कर्म किसीके अनुकूल और किसीके प्रतिकूल होता ही है। किसीके प्रतिकूल होना भी दोष है।

(४) प्रमाद आदि दोषोंके कारण कर्मके करनेमें कमी रह जाना अथवा करनेकी विधिमें भूल हो जाना भी दोष है।

अपने सहज-कर्ममें दोष भी हो, तो भी उसको नहीं छोड़ना चाहिये। इसका तात्पर्य है कि जैसे ब्राह्मणके कर्म जितने सौम्य हैं, उतने ब्राह्मणेश्वर वर्णोंके कर्म सौम्य नहीं हैं। परन्तु सौम्य न होनेपर भी वे कर्म दोषी नहीं माने जाते अर्थात् ब्राह्मणके सहज कर्मोंकी अपेक्षा क्षत्रिय, वैश्य

आदिके सहज कर्मोंमें गुणोंकी कमी होनेपर भी उस कमीका दोष नहीं लगता और अनिवार्य हिंसा आदि भी नहीं लगते, प्रत्युत उनका पालन करनेसे लाभ होता है। कारण कि वे कर्म उनके स्वभावके अनुकूल होनेसे करनेमें सुगम हैं और शास्त्रविहित हैं।

ब्राह्मणके लिये भिक्षा बतायी गयी है। देखनेमें भिक्षा निर्दोष दीखती है, पर उसमें भी दोष आ जाते हैं। जैसे किसी गृहस्थके घरपर कोई भिक्षुक खड़ा है और उसी समय दूसरा भिक्षुक वहाँ आ जाता है तो गृहस्थको भार लगता है। भिक्षुकोंमें परस्पर ईर्ष्या होनेकी सम्भावना रहती है। भिक्षा देनेवालेके घरमें पूरी तैयारी नहीं है तो उसको भी दुःख होता है। यदि कोई गृहस्थ भिक्षा देना नहीं चाहता और उसके घरपर भिक्षुक चला जाय तो उसको बड़ा कष्ट होता है। अगर वह भिक्षा देता है तो खर्चा होता है और नहीं देता है तो भिक्षुक निराश होकर चला जाता है। इससे उस गृहस्थको पाप लगता है और बेचारा उसमें फँस जाता है। इस प्रकार यद्यपि भिक्षामें भी दोष होते हैं, तथापि ब्राह्मणको उसे छोड़ना नहीं चाहिये।

क्षत्रियके लिये न्याययुक्त युद्ध प्राप्त हो जाय तो उसको करनेसे क्षत्रियको पाप नहीं लगता। यद्यपि युद्धरूप कर्ममें दोष हैं; क्योंकि उसमें मनुष्योंको मारना पड़ता है, तथापि क्षत्रियके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे दोष नहीं लगता। ऐसे ही वैश्यके लिये खेती करना बताया गया है। खेती करनेमें बहुत-से जन्तुओंकी हिंसा होती है। परन्तु वैश्यके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे हिंसाका इतना दोष नहीं लगता। इसलिये सहज कर्मोंको छोड़ना नहीं चाहिये।

सहज कर्मोंको करनेमें दोष (पाप) नहीं लगता—यह बात ठीक है; परन्तु इन साधारण सहज कर्मोंसे मुक्ति कैसे हो जायगी? वास्तवमें मुक्ति होनेमें सहज कर्म बाधक नहीं हैं। कामना, आसक्ति, स्वार्थ, अभिमान आदिसे ही बन्धन होता है और पाप भी इन कामना आदिके कारणसे ही होते हैं। इसलिये मनुष्यको निष्कामभावपूर्वक भगवत्प्रतिपक्ष सहज कर्मोंको करना चाहिये, तभी बन्धन छूटेगा।

'सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनागिरिवावृताः'— जितने भी कर्म हैं, वे सब-के-सब सदोष ही हैं; जैसे—आग सुलगायी जाय तो आरम्भमें धुआँ होता ही है। कर्म करनेमें देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिकी परतन्त्रता और दूसरोंकी प्रतिकूलता भी दोष है, परन्तु स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने आज्ञा दी है। उस आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक

श्लोक ४९ ]

  • साधक-संजीवनी *

११९३

कर्म करता हुआ मनुष्य पापका भागी नहीं होता। इसीसे भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि 'भैया! तू जिस युद्धरूप क्रियाको घोर कर्म मान रहा है, वह तेरा धर्म है;

क्योंकि न्यायसे प्राप्त हुए युद्धको करना क्षत्रियोंका धर्म है, इसके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयका साधन नहीं है' (गीता—दूसरे अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

परिशिष्ट भाव —निषिद्ध कर्ममें आसक्ति होनेसे अथवा निषिद्ध रीतिसे भोग भोगनेके कारण ही विहित कर्म कठिन प्रतीत होता है। वास्तवमें विहित कर्म सहज स्वाभाविक है, इसमें परिश्रम नहीं है।

इकतालिसवें श्लोकसे यहाँतक 'स्वकर्म', 'स्वधर्म' और 'सहजकर्म' शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इससे सिद्ध होता है कि गीता स्वकर्म और सहजकर्मको ही 'स्वधर्म' मानती है।

विहित कर्म करनेमें दोष तो होता है, पर कामना, सुखबुद्धि, भोगबुद्धि न रहनेसे दोष लगता नहीं। तात्पर्य है कि दोष लगना या न लगना कर्ताकी नीयतपर निर्भर है; जैसे—डॉक्टरकी नीयत ठीक हो, पैसोंका उद्देश्य न होकर सेवाका उद्देश्य हो तो ऑपरेशनमें रोगीका अंग काटनेपर भी उसको दोष नहीं लगता, प्रत्युत निःस्वार्थभाव और हितकी दृष्टि होनेसे पुण्य होता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले सांख्ययोगके अधिकारीका वर्णन करते हैं।

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।

नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥

सर्वत्र,वशमें कर रहा है,परमाम्= सर्वश्रेष्ठ
असक्तबुद्धिः = जिसकी बुद्धिविगतस्पृहः = जो स्पृहारहित हैनैष्कर्म्य-
सब जगह(वह मनुष्य)सिद्धिम्= नैष्कर्म्यसिद्धिको
आसक्तिरहित है,सन्यासेन = सांख्ययोगकेअधिगच्छति= प्राप्त हो
जितात्मा = जिसने शरीरकोद्वाराजाता है।

व्याख्या—संन्यास- (सांख्य-) योगका अधिकारी होनेसे ही सिद्धि होती है। अतः उसका अधिकारी कैसा होना चाहिये—यह बतानेके लिये श्लोकके पूर्वार्द्धमें तीन बातें बतायी हैं—

(१) 'असक्तबुद्धिः सर्वत्र'—जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है अर्थात् देश, काल, घटना, परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, पदार्थ आदि किसीमें भी जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती।

(२) 'जितात्मा'—जिसने शरीरपर अधिकार कर लिया है अर्थात् जो आलस्य, प्रमाद आदिसे शरीरके वशीभूत नहीं होता, प्रत्युत इसको अपने वशीभूत रखता है। तात्पर्य है कि वह किसी कार्यको अपने सिद्धान्तपूर्वक करना चाहता है तो उस कार्यमें शरीर तत्परतासे लग जाता है और किसी क्रिया, घटना, आदिसे हटना चाहता है तो वह वहाँसे हट जाता है। इस प्रकार जिसने शरीरपर विजय कर ली है, वह 'जितात्मा' कहलाता है।

(३) 'विगतस्पृहः'—जीवन-धारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है, उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम 'स्पृहा' है; जैसे—साग-पत्ती कुछ मिल जाय, रूखी-सूखी

रोटी ही मिल जाय, कुछ-न-कुछ खाये बिना हम कैसे जी सकते हैं! जल पीये बिना हम कैसे रह सकते हैं! ठण्डीके दिनोंमें कपड़े बिलकुल न हों तो हम कैसे जी सकते हैं! सांख्ययोगका साधक इन जीवन-निर्वाह-सम्बन्धी आवश्यकताओंकी भी परवाह नहीं करता।

तात्पर्य यह हुआ कि सांख्ययोगमें चलनेवालेको जड़ताका त्याग करना पड़ता है। उस जड़ताका त्याग करनेमें उपर्युक्त तीन बातें आयी हैं। असक्तबुद्धि होनेसे वह जितात्मा हो जाता है और जितात्मा होनेसे वह विगतस्पृह हो जाता है, तब वह सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है।

'नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्यासेनाधिगच्छति'—ऐसा असक्तबुद्धि, जितात्मा और विगतस्पृह पुरुष सांख्ययोगके द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धिको अर्थात् नैष्कर्म्यरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। कारण कि क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और जब स्वयंका उस क्रियाके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता, तब कोई भी क्रिया और उसका फल उसपर किंचिन्मात्र भी लागू नहीं होता। अतः उसमें जो स्वाभाविक, स्वतःसिद्ध निष्कर्माता—निलिप्तता है, वह प्रकट हो जाती है।

१९४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परिशिष्ट भाव —नैष्कर्म्यसिद्धिका अर्थ है—कर्म सर्वथा अकर्म हो जायें, कर्मोंके साथ बिलकुल सम्बन्ध न रहे, कर्म होते हुए भी लिप्तता न हो—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ’ (गीता ४।१८)। कर्मोंको न करना नैष्कर्म्य (निष्कर्मता) नहीं है (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक), प्रत्युत कर्म करना तो साधकके लिये आवश्यक है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)।

‘असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः’ —यह कर्मयोगकी सिद्धि है (गीता—दूसरे अध्यायका इकहत्तरवाँ श्लोक), जिसके होनेपर कर्मयोगी सांख्ययोगमें जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका छठाँ श्लोक) और सांख्ययोगसे नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त करता है। इस प्रकार कर्मयोगसे तो ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ होती है—‘न कर्मणामनारम्धानैष्कर्म्यं पुरुषोऽन्यन्ते ’ (गीता ३।४), पर भक्तियोगसे ‘परम नैष्कर्म्यसिद्धि’ होती है। कर्मयोग और ज्ञानयोग तो ‘निष्ठा’ है—‘लोकेऽस्मिन्निविधा निष्ठा० ’ (३।३), पर कर्मयोग-ज्ञानयोगकी ‘परा निष्ठा’ भक्तिसे ही होगी—‘निष्ठा ज्ञानस्य या परा ’ (१८।५०)। तात्पर्य है कि ‘परम नैष्कर्म्यसिद्धि’ और ‘परा निष्ठा’—दोनों भक्तिसे होती हैं।

सम्बन्ध—अब उस परम सिद्धिको प्राप्त करनेकी विधि बतानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाज्योति निबोध मे।

समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥५०॥

कौन्तेय= हे कौन्तेय!या= जो कितथा= उस प्रकारको
सिद्धिम्= सिद्धिज्ञानस्य= ज्ञानकी(तुम)
(अन्तःकरणकीपरा= परामे= मुझसे
शुद्धि)-कोनिष्ठा= निष्ठा है,समासेन= संक्षेपमें
प्राप्तः= प्राप्त हुआ साधकयथा= जिस प्रकारसेएव= ही
ब्रह्म= ब्रह्मकोआज्योति= प्राप्त होता है,निबोध= समझो।

व्याख्या —‘सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाज्योति निबोध मे ’—यहाँ ‘सिद्धि’ नाम अन्तःकरणकी शुद्धिका है, जिसका वर्णन पूर्वश्लोकमें आये ‘असक्तबुद्धिः ’, ‘जितात्मा ’ और ‘विगतस्पृहः ’ पदोंसे हुआ है। जिसका अन्तःकरण इतना शुद्ध हो गया है कि उसमें किंचिन्मात्र भी किसी प्रकारकी कामना, ममता और आसक्ति नहीं रही, उसके लिये कभी किंचिन्मात्र भी किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिकी जरूरत नहीं पड़ती अर्थात् उसके लिये कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसको सिद्धि कहा है। लोकमें तो ऐसा कहा जाता है कि मनचाही चीज मिल गयी तो सिद्धि हो गयी, अणिमादि सिद्धियाँ मिल गयीं तो सिद्धि हो गयी। पर वास्तवमें यह सिद्धि नहीं है; क्योंकि इसमें पराधीनता होती है, किसी बातकी कमी रहती है और किसी वस्तु, परिस्थिति आदिकी जरूरत पड़ती है। अतः जिस सिद्धिमें किंचिन्मात्र भी कामना पैदा न हो, वही वास्तवमें सिद्धि है। जिस सिद्धिके मिलनेपर कामना बढ़ती रहे, वह सिद्धि वास्तवमें सिद्धि नहीं है, प्रत्युत एक बन्धन

ही है।

अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। वह जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है, उसको मुझसे समझ—‘निबोध मे ’। कारण कि सांख्ययोगकी जो सार-सार बातें हैं, वे सांख्ययोगीके लिये अत्यन्त आवश्यक हैं और उन बातोंको समझनेकी बहुत जरूरत है।

‘निबोध’ पदका तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें क्रिया और सामग्रीकी प्रधानता नहीं है। किन्तु उस तत्त्वको समझनेकी प्रधानता है। इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भी सांख्ययोगीके विषयमें ‘निबोध ’ पद आया है।

‘समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा’ —सांख्ययोगीकी जो आखिरी स्थिति है, जिससे बढ़कर साधककी कोई स्थिति नहीं हो सकती, वही ज्ञानकी परा निष्ठा कही जाती है। उस परा निष्ठाको अर्थात् ब्रह्मको सांख्ययोगका साधक जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उसको मैं संक्षेपसे कहूँगा अर्थात् उसकी सार-सार बातें कहूँगा।

श्लोक ५१—५३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१११५

परिशिष्ट भाव —यहाँ 'सिद्धिम्' पदका अर्थ है—साधनरूप कर्मयोगसे होनेवाली अन्तःकरणकी पूर्ण शुद्धि, जिसकी प्राप्तिके बाद कर्मयोगी ज्ञानयोगमें अथवा भक्तियोगमें कहीं भी जा सकता है—

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता । मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन जायते ॥

(श्रीमद्भा० ११।२०।१)

'तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक भोगोंसे वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी लीला-कथाके श्रवण-कीर्तन आदिमें श्रद्धा न हो जाय।'

अगर कर्मयोगीके भीतर ज्ञानके संस्कार हैं तो वह ज्ञानमें चला जायगा और अगर भक्तिके संस्कार हैं तो वह भक्तिमें चला जायगा।

अगर किसी एकका आग्रह न हो तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों 'साधन' रूपसे भी हैं और 'साध्य' रूपसे भी हैं। साधनरूपसे तो तीनों अलग-अलग हैं, पर साध्यरूपसे तीनों एक ही हैं। इसलिये गीतामें कहाँ तो भगवान्ने भक्तिके द्वारा ज्ञानकी प्राप्ति अर्थात् साधन-भक्तिसे साध्य-ज्ञानकी प्राप्ति बतायी है—'मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी' (१३।१०), 'मां च योऽव्यभिचारेण'……'ब्रह्मभूयाय कल्पते' (१४।२६), और कहीं ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति अर्थात् साधन-ज्ञानसे साध्य-भक्तिकी प्राप्ति बतायी है—'सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र'……'सर्वभूतहिते रताः' (१२।४), 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा'……'मद्भक्तिं लभते पराम्' (१८।५४)।

भगवान्ने पहले 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः' (१८।४६)—इन पदोंसे कर्मयोगके द्वारा भक्तिकी सिद्धि बतायी और यहाँ 'सिद्धिं प्राप्नो यथा ब्रह्म' पदोंसे कर्मयोगके द्वारा ज्ञानयोगकी सिद्धि बताते हैं। पाँचवें अध्यायमें भी साधनरूप कर्मयोगसे ज्ञानयोगकी शीघ्र सिद्धि बतायी है—'योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति' (५।६)।

सम्बन्ध—ज्ञानकी परा निष्ठा प्राप्त करनेके लिये किस साधन-सामग्रीकी आवश्यकता है, उसको आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।

बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।

शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।

ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।

विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥

विशुद्ध्या= (जो) विशुद्ध (सात्त्विकी)आत्मानम्= इन्द्रियोंकानित्यम्= निरन्तर
बुद्ध्या= बुद्धिसेनियम्य= नियमन करके,ध्यानयोगपरः= ध्यानयोगके परायण
युक्तः= युक्त,यतवाक्कायमानसः= शरीर-वाणी-
मनको वशमें करके,हो जाता है, (वह)
वैराग्यम्= वैराग्यकेशब्दादीन्= शब्दादिअहङ्कारम्= अहंकार,
समुपाश्रितः= आश्रित,विषयान्= विषयोंकाबलम्= बल,
विविक्तसेवी= एकात्मका सेवन
करनेवाला (और)त्यक्त्वा= त्याग करकेदर्पम्= दर्प,
लघ्वाशी= नियमित भोजन
करनेवाला (साधक)= औरकामम्= काम,
धृत्या= धैर्यपूर्वकरागद्वेषौ= राग-द्वेषकोक्रोधम्= क्रोध
व्युदस्य= छोड़कर= और
परिग्रहम्= परिग्रहसे

११९६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

विमुच्य= रहित होकरनिर्ममः= ममतरहित (तथा)ब्रह्मभूयाय= ब्रह्मप्राप्तिका
(एवं)शान्तः= शान्त होकरकल्पते= पात्र हो जाता है।

व्याख्या—‘बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तः’ —‘जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है, उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता—इसी अध्यायका तीसवाँ श्लोक) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफ-साफ हो, उसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह न हो।

इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है, वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।

‘वैराग्यं समुपाश्रितः’ —‘जैसे संसारीलोग रागपूर्वक वस्तु, व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं, उनको अपना आश्रय, सहारा मानते हैं, ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय, स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।

‘विवित्तसेवी’ —‘सांख्ययोगके साधकका स्वभाव, उसकी रुचि स्वतः-स्वाभाविक एकात्ममें रहनेकी होती है। एकात्म-सेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है, पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकात्म न मिलनेपर मनमें विश्लेष, हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकात्म न मिले, प्रत्युत समुदाय मिले, खूब हल्ला-गुल्ला हो, तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धि-असिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा, उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकात्ममें रहनेका ही होना चाहिये, पर एकात्म न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है, जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।

‘एकात्ममें रहनेसे साधन अधिक होगा, मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा; अन्तःकरण निर्मल बनेगा’—इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है, वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु ‘एकात्ममें हल्ला-गुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा; अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी, वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा, वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा, एकात्ममें रहनेसे लोग भी ज्यादा मान-बड़ाई, आदर करेंगे’—इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती

है, वह साधनमें बाधक होती है; क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुख-सुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये, प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।

‘लब्धाशी’ —साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित, मित और मध्य—ये तीन बातें बतायी गयी हैं। ‘हित’ का तात्पर्य है—भोजन शरीरके अनुकूल हो। ‘मित’ का तात्पर्य है—भोजन न तो अधिक करे और न कम करे, प्रत्युत जितने भोजनसे शरीर-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन करे (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा—ऐसे भावसे भोजन न करे, प्रत्युत केवल औषधकी तरह शुष्वा-निवृत्तिके लिये ही भोजन करे, जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। ‘मध्य’ का तात्पर्य है—भोजन पवित्र हो।

‘धृत्यात्मानं नियम्य च’ —सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना—ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता—इसी अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)—के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।

‘यतवाक्कायमानसः’ —शरीर, वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता—सत्रहवें अध्यायका चौदहवाँ, पंद्रहवाँ और सोलहवाँ श्लोक)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे, देखने-सुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे, आवश्यक होनेपर ही बोले, असत्य न बोले, निन्दा-चुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे, प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।

‘शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा’ —ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं, जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है, उन शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेगी और विषयोंका चिन्तन होगा।

श्लोक ५४ ]

  • साधक-संजीवनी *

११९७

‘रागद्वेषौ व्युदस्य च’—सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है, अपने काममें आनेवाली है, उपयोगी है—ऐसा जो भाव है, उसका नाम ‘राग’ है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है, वह ‘राग’ है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है, उसके प्रति द्वेष हो जाता है।

असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है—यह नियम है। जैसे, शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।

संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।

‘ध्यानयोगपरो नित्यम्’—साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही, व्यवहारके समय अर्थात् चलते-फिरते, खाते-पीते, काम-धंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता—इसी अध्यायका बीसवाँ श्लोक)।

‘अहंकारं बलं दर्पं ..... विमुच्य’—गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है, उसे ‘अहंकार’ कहते हैं। जबर्दस्ती करके, विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हट) होता है, उसे ‘बल’ कहते हैं। जमीन-जायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है, उसे ‘दर्प’ कहते हैं। भोग, पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय, इस इच्छाका नाम ‘काम’ है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट

करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसको ‘क्रोध’ कहते हैं। भोग-बुद्धिसे, सुख-आरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है, उसे ‘परिग्रह’ कहते हैं।

साधक उपर्युक्त अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह—इन सबका त्याग कर देता है।

‘निर्ममः’—अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर, इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं, उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो। अपना शरीर, वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं, उनके बने रहनेकी इच्छा न होना ‘निर्मम’ होना है।

जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं, वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी, उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं, पर उनको अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो ‘वे अपने नहीं हैं’ ऐसा माननेमें क्या बाधा है? उनको अपनी न माननेसे साधक निर्मम हो जाता है।

‘शान्तः’—असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति, हलचल आदि पैदा होते हैं। जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर राग-द्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।

‘ब्रह्मभूयाय कल्पते’—ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता, सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती।

सम्बन्ध—उपर्युक्त साधन-सामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।

समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥५४॥

१-ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी—इन सबके लिये तो स्वरूपसे ही परिग्रह-(संग्रह-) का त्याग है। अगर गृहस्थमें भी कोई सुख-भोगबुद्धिसे संग्रह न करे, केवल दूसरोंकी सेवा, हितके लिये ही संग्रह करे तो वह भी परिग्रह नहीं है।

२-केवल सांसारिक व्यवहारके लिये वस्तुओंमें अपनापन करना दोषी नहीं है, प्रत्युत उनको सदाके लिये अपना मान लेना दोषी है।

११८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८

ब्रह्मभूत: = (वह) ब्रह्मरूप बना

हुआ

प्रसन्नात्मा = प्रसन्न मनवाला

साधक

न = न तो (किसीके

लिये)

शोचति = शोक करता है

(और)

न = न (किसीकी)

काङ्क्षति = इच्छा ही करता है।

(ऐसा)

सर्वेषु = सम्पूर्ण

भूतेषु = प्राणियोंमें

सम: = समभाववाला

साधक

पराम्, मद्भक्तिम् = मेरी परभक्तिको

लभते = प्राप्त हो

जाता है।

व्याख्या—'ब्रह्मभूत:'—जब अन्तःकरणमें विनाश- शील

वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है, तब अन्तःकरणकी

अहंकार, घमंड आदि वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं अर्थात्

उनका त्याग हो जाता है। फिर अपने पास जो वस्तुएँ हैं,

उनमें भी ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे सुख और

भोग-बुद्धिसे वस्तुओंका संग्रह नहीं होता। जब सुख और

भोग-बुद्धि मिट जाती है, तब अन्तःकरणमें स्वतः-

स्वाभाविक ही शान्ति आ जाती है।

इस प्रकार साधक जब असत्‌से ऊपर उठ जाता है,

तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बन जाता है। पात्र बननेपर

उसकी ब्रह्मभूत-अवस्था अपने-आप हो जाती है। इसके

लिये उसको कुछ करना नहीं पड़ता। इस अवस्थामें 'मैं

ब्रह्मस्वरूप हूँ और ब्रह्म मेरा स्वरूप है' ऐसा उसको

अपनी दृष्टिसे अनुभव हो जाता है। इसी अवस्थाको यहाँ

(और गीता-पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी)

'ब्रह्मभूत:' पदसे कहा गया है।

'प्रसन्नात्मा'—जब अन्तःकरणमें असत्‌ वस्तुओंका

महत्त्व हो जाता है, तब उन वस्तुओंको प्राप्त करनेकी

कामना पैदा हो जाती है। कामना पैदा होते ही अन्तःकरणकी

शान्ति भंग हो जाती है और अशान्ति (हलचल) पैदा हो

जाती है। परन्तु जब असत्‌ वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता

है, तब साधकके चित्तमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता रहती है।

अप्रसन्नताका कारण मिट जानेसे फिर कभी अप्रसन्नता

होती ही नहीं। कारण कि सांख्ययोगी साधकके अन्तःकरणमें

अपनेसहित संसारका अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव

अटल रहता है।

'न शोचति न काङ्क्षति'—उस प्रसन्नताकी पहचान

यह है कि वह शोक-चिन्ता नहीं करता। सांसारिक कितनी

ही बड़ी हानि हो जाय, तो भी वह शोक नहीं करता और

अमुक परिस्थिति प्राप्त हो जाय-ऐसी इच्छा भी नहीं

करता। तात्पर्य है कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली तथा आने-

जानेवाली परिवर्तनशील परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ

आदिके बनने-बिगड़नेसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता।

जो परमात्मामें अटल रूपसे स्थित है, उसपर आने-

जानेवाली परिस्थितियोंका असर हो ही कैसे सकता है?

'सम: सर्वेषु भूतेषु'—जबतक साधकमें किंचिन्मात्र

भी हर्ष-शोक, राग-द्वेष आदि द्वन्द्व रहते हैं, तबतक वह

सर्वत्र व्याप्त परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव नहीं

कर सकता। अभिन्नताका अनुभव न होनेसे वह अपनेको

सम्पूर्ण भूतोंमें सम नहीं देख सकता। परन्तु जब साधक

हर्ष-शोकादि द्वन्द्वोंसे सर्वथा रहित हो जाता है, तब

परमात्माके साथ स्वतः-स्वाभाविक अभिन्नता (जो कि

सदासे ही थी)-का अनुभव हो जाता है। परमात्माके साथ

अभिन्नता होनेसे, अपना कोई व्यक्तित्व* न रहनेसे अर्थात्

'मैं हूँ' इस रूपसे अपनी कोई अलग सत्ता न रहनेसे वह

सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। जैसे परमात्मा सम्पूर्ण

प्राणियोंमें सम है-'समोऽहं सर्वभूतेषु' (गीता-नवें

अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक), ऐसे ही वह भी सम्पूर्ण

प्राणियोंमें सम हो जाता है।

वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम किस प्रकार होता है?

जैसे-मनोराज्य और स्वप्नमें जो नाना सृष्टि होती है,

उसमें मन ही अनेक रूप धारण करता है अर्थात् वह सृष्टि

मनोमय होती है। मनोमय होनेसे जैसे सब सृष्टिमें मन

है और मनमें सब सृष्टि है, ऐसे ही सब प्राणियोंमें

(आत्मरूपसे) वह है और उसमें सम्पूर्ण प्राणी हैं (गीता-

छठे अध्यायका उनतीसवाँ श्लोक)। इसको यहाँ 'सम:

सर्वेषु भूतेषु' कहा है।

'मद्भक्तिं लभते पराम्'—जब समरूप परमात्माके

साथ अभिन्नताका अनुभव होनेसे साधकका सर्वत्र समभाव

हो जाता है, तब उसका परमात्मामें प्रतिक्षण वर्धमान एक

विलक्षण आकर्षण, खिंचाव, अनुराग हो जाता है। उसीको

यहाँ पराभक्ति कहा है।

  • व्यक्तित्व उसे कहते हैं, जिसमें मनुष्य अपनी सत्ता अलग मानता है और जिससे बन्धन होता है।

श्लोक ५५ ]

  • साधक-संजीवनी *

११११

पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जैसे ब्रह्मभूत-अवस्थाके बाद ब्रह्मनिर्वाणकी प्राप्ति बतायी है—‘स योगी

ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ’, ऐसे ही यहाँ ब्रह्मभूत-अवस्थाके बाद पराभक्तिकी प्राप्ति बतायी है।

परिशिष्ट भाव —ज्ञानयोगके जिस साधकमें भक्तिके संस्कार होते हैं, जो अपने मतका आग्रह नहीं रखता, मुक्ति अर्थात् संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदको ही सर्वोपरि नहीं मानता और भक्तिका खण्डन, निन्दा नहीं करता, उसको मुक्तिमें सन्तोष नहीं होता। अतः उसको मुक्ति प्राप्त होनेके बाद भक्ति (प्रेम)-की प्राप्ति हो जाती है।

जो अपनी दृष्टिसे अर्थात् अपनी मान्यतासे ब्रह्मरूप बना हुआ है, ब्रह्म हुआ नहीं है, उसके लिये यहाँ ‘ब्रह्मभूतः ’ पद आया है। ब्रह्मभूत होनेके बाद जीवका ब्रह्मके साथ तात्त्विक सम्बन्ध (साधर्म्य) हो जाता है—‘मम साधर्म्यमागताः ’ (गीता १४।२)। तात्त्विक सम्बन्ध होना ही मुक्ति है। फिर सर्वत्र परिपूर्ण अनन्तब्रह्माण्डनायक परमात्मामें अपने-आपको विलीन (समर्पित) कर देनेसे परमात्माके साथ आत्मीय सम्बन्ध (अभिन्मता) हो जाता है—‘ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ’ (गीता ७।१८)। आत्मीय सम्बन्ध होना ही पराभक्ति (प्रेम)-की प्राप्ति है।

ज्ञानमार्गमें जड़ताका त्याग मुख्य है। जड़ताका त्याग विवेकसाध्य है। विवेकपूर्वक जड़ताका त्याग करनेपर त्याज्य वस्तुका संस्कार शेष रह सकता है, जिससे दार्शनिक मतभेद पैदा होते हैं। परन्तु प्रेमकी प्राप्ति होनेपर त्याज्य वस्तुका संस्कार नहीं रहता; क्योंकि भक्त त्याग नहीं करता, प्रत्युत सबको भगवान्का स्वरूप मानता है—‘सदसच्चाहम् ’ (गीता १।१९)। प्रेमकी प्राप्ति विवेकसाध्य नहीं है, प्रत्युत विश्वाससाध्य है। विश्वासमें केवल भगवत्कृपापर ही भरोसा है। इसलिये जिसके भीतर भक्तिके संस्कार होते हैं, उसको भगवत्कृपा मुक्तिमें सन्तुष्ट नहीं होने देती, प्रत्युत मुक्तिके रस (अखण्डरस)-को फीका करके प्रेमका रस (अनन्तरस) प्रदान कर देती है।

संसारके सम्बन्धसे अशान्ति होती है, इसलिये कर्मयोगमें संसारसे सम्बन्ध छूटनेपर ‘शान्त आनन्द’ मिलता है। ज्ञानयोगमें निजस्वरूपमें स्थिति होनेसे निजानन्द अर्थात् ‘अखण्ड आनन्द’ मिलता है। भक्तियोगमें भगवान्से अभिन्मता होनेपर परमानन्द अर्थात् ‘अनन्त आनन्द’ (प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम) मिलता है।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें पराभक्तिका फल बताते हैं।

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥

भक्त्या= (उस) पराभक्तिसेअस्मि= हूँ—(इसको)तत्त्वतः= तत्त्वसे
माम्= मुझे,तत्त्वतः= तत्त्वसेज्ञात्वा= जानकर
यावान्= (मैं) जितना हूँअभिजानाति= जान लेता है,तदनन्तरम्= तत्काल
= औरततः= फिरविशते= (मुझमें) प्रविष्ट हो
यः= जोमाम्= मुझेजाता है।

व्याख्या —‘भक्त्या मामभिजानाति ’—जब परमात्-तत्त्वमें आकर्षण, अनुराग हो जाता है, तब साधक स्वयं उस परमात्माके सर्वथा समर्पित हो जाता है, उस तत्त्वसे अभिन्म हो जाता है। फिर उसका अलग कोई (स्वतन्त्र) अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् उसके अहंभावका अतिसूक्ष्म अंश भी नहीं रहता। इसलिये उसको प्रेमस्वरूपा प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाती है। उस भक्तिसे परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है। ब्रह्मभूत-अवस्था हो जानेपर संसारके सम्बन्धका तो

सर्वथा त्याग हो जाता है, पर ‘मैं ब्रह्म हूँ, मैं शान्त हूँ, मैं निर्वाकार हूँ’, ऐसा सूक्ष्म अहंभाव रह जाता है। यह अहंभाव जबतक रहता है, तबतक परिच्छिन्मता और पराधीनता रहती है। कारण कि यह अहंभाव प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति ‘पर’ है; इसलिये पराधीनता रहती है। परमात्माकी तरफ आकृष्ट होनेसे, पराभक्ति होनेसे ही यह अहंभाव मिटता है*। इस अहंभावके सर्वथा मिटनेसे ही तत्त्वका वास्तविक बोध होता है।

  • प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥ (मानस ७।४१।३)

१२००

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

‘यावान्’—सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको ‘समग्र’-रूप सुननेकी आज्ञा दी कि मेरेमें जिसका मन आसक्त हो गया है, जिसको मेरा ही आश्रय है, वह अनन्यभावसे मेरे साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध रखते हुए मेरे जिस समग्ररूपको जान लेता है, उसको तुम सुनो। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके अन्तमें कही कि जरा-मरणसे मुक्ति पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म और सम्पूर्ण कर्मको अर्थात् सम्पूर्ण निर्गुण-विषयको जान लेते हैं और अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझको अर्थात् सम्पूर्ण सगुण-विषयको जान लेते हैं।

इस प्रकार निर्गुण और सगुणके सिवाय राम, कृष्ण, शिव, गणेश, शक्ति, सूर्य आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होकर परमात्मा लीला करते हैं, उनको भी जान लेना—यही पराभक्तिये ‘यावान्’ अर्थात् समग्ररूपको जानना है।

‘यश्चास्मि तत्त्वतः’—वे ही परमात्मा अनेक रूपोंमें, अनेक आकृतियोंमें, अनेक शक्तियोंको साथ लेकर, अनेक कार्य करनेके लिये बार-बार प्रकट होते हैं, और वे ही परमात्मा अनेक सम्प्रदायोंमें अपनी-अपनी भावनाके अनुसार अनेक इष्टदेवोंके रूपमें कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्मा एक ही हैं। इस प्रकार मैं जो हूँ—इसे तत्त्वसे जान लेता है।

‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’—ऐसा मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल’ मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् मेरे साथ भिन्नताका जो भाव था, वह सर्वथा मिट जाता है।

तत्त्वसे जाननेपर उसमें जो अनजानपना था, वह सर्वथा मिट जाता है और वह उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है। यही पूर्णता है और इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है।

विशेष बात

जीवका परमात्मामें प्रेम (रति, प्रीति या आकर्षण)

स्वतः है। परन्तु जब यह जीव प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब वह परमात्मासे विमुख हो जाता है और उसका संसारमें आकर्षण हो जाता है। यह आकर्षण ही वासना, स्मृहा, कामना, आशा, तुष्णा आदि नामोंसे कहा जाता है।

इस वासना आदिका जो विषय (प्रकृतिजन्य पदार्थ) है, वह क्षणभंगुर और परिवर्तनशील है तथा यह जीवात्मा स्वयं, नित्य और अपरिवर्तनशील है। परन्तु ऐसा होते हुए भी प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे यह परिवर्तनशीलमें आकृष्ट हो जाता है। इससे इसको मिलता तो कुछ नहीं, पर ‘कुछ मिलेगा’—इस भ्रम, वासनाके कारण यह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा हुआ महान् दुःख पाता रहता है। इससे छूटनेके लिये भगवान्ने योग बताया है। वह योग जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव करा देता है।

गीतामें मुख्यरूपसे तीन योग कहे हैं—कर्मयोग, ज्ञान-योग और भक्तियोग। इन तीनोंपर विचार किया जाय तो भगवान्का प्रेम तीनों ही योगोंमें है। कर्मयोगमें उसको ‘कर्तव्यरति’ कहते हैं अर्थात् वह रति कर्तव्यमें होती है—‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः’ (१८।४५)। [कर्मयोगकी यह रति अन्तमें आत्मरतिमें परिणत हो जाती है (गीता—दूसरे अध्यायका पचपनवाँ और तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक) और जिस कर्मयोगीमें भक्तिके संस्कार हैं, उसकी यह रति भगवद्व्रतिमें परिणत हो जाती है।] ज्ञानयोगमें उसी प्रेमको ‘आत्मरति’ कहते हैं अर्थात् वह रति स्वरूपमें होती है—‘योऽन्तःसुखोऽन्तरागमः’ (५।२४)। और भक्ति-योगमें उसी प्रेमको ‘भगवद्व्रति’ कहते हैं अर्थात् वह रति भगवान्में होती है—‘तुष्यन्ति च रमन्ति च’ (१०।१९)। इस प्रकार इन तीनों योगोंमें रति होनेपर भी गीतामें ‘भगवद्व्रति’ की विशेषरूपसे महिमा गायी गयी है।

तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी—इन तीनोंसे भी योगी

१-जानने और प्राप्त करनेमें काल-भेद नहीं होता।

२-भगवान्में रति या प्रियता प्रकट होती है—अपनेपनसे। परमात्माके साथ जीवका अनादिकालसे स्वतःसिद्ध सम्बन्ध है। अपनी चीज स्वतः प्रिय लगती है। अतः अपनापन प्रकट होते ही भगवान् स्वतः प्यारे लगते हैं। प्रियतामें कभी समाप्त न होनेवाला अलौकिक, विलक्षण आनन्द है। वह आनन्द प्राप्त होनेपर मनुष्यमें स्वतः निर्विकारता आ जाती है। फिर काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर आदि कोई भी विकार पैदा हो ही नहीं सकता। पारमार्थिक आनन्द न मिलनेसे ही कामादि विकार पैदा होते हैं अर्थात् आनन्द न मिलनेसे नाशवान् वस्तुओंसे सुख लेनेकी इच्छा होती है, जिससे सब विकार पैदा होते हैं।

उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंके साथ अपनापन करनेसे ही यह जीव भगवान्से विमुख हो जाता है। विमुखता होनेपर भी भगवान्की प्रियता कभी मिट नहीं सकती। नास्तिक-से-नास्तिक भी आफत पड़नेपर पुकार उठता है कि कोई ईश्वर है तो रक्षा करे!

श्लोक ५५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०१

(समतावाला) श्रेष्ठ है (गीता—छठे अध्यायका छिथालीसवों श्लोक)। तात्पर्य यह है कि जड़तासे सम्बन्ध रखते हुए बड़ा भारी तप करनेपर, बहुत-से शास्त्रोंका (अनेक प्रकारका) ज्ञान-सम्पादन करनेपर और यज्ञ, दान, तीर्थ आदिके बड़े-बड़े अनुष्ठान करनेपर जो कुछ प्राप्त होता है, वह सब अनित्य ही होता है, पर योगीको नित्य-तत्त्वकी प्राप्ति होती है। अतः तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी—इन तीनोंसे ‘योगी’ श्रेष्ठ है। इस प्रकारके कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, हठयोगी, लययोगी आदि सब योगियोंमें भी भगवान्ने ‘भक्तियोगी’ को सर्वश्रेष्ठ बताया है (गीता—छठे अध्यायका सैंतालीसवों श्लोक)। यही भक्तियोगी भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सांख्ययोगी भी पराभक्तिके द्वारा उस समग्ररूपको जान लेता है। उसी समग्ररूपका वर्णन यहाँ ‘यावान्’ पदसे हुआ है।

इस प्रकरणके आरम्भमें ‘अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त होता है’—यह कहनेकी प्रतिज्ञा की और बताया कि ध्यानयोगके परायण होनेसे वह वैराग्यको प्राप्त होता है। वैराग्यसे अहंकार आदिका त्याग करके ममतारहित होकर शान्त होता है। तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है। पात्र होते ही उसकी ब्रह्मभूत-अवस्था हो जाती है। ब्रह्मभूत-अवस्था होनेपर संसारके सम्बन्धसे जो राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि दृढ़ होते थे, वे सर्वथा मिट जाते हैं तो वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। सम होनेपर पराभक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पराभक्ति ही वास्तविक प्रीति है। उस प्रीतिसे परमात्माके समग्ररूपका बोध हो जाता है। बोध होते ही उस तत्त्वमें प्रवेश हो जाता है—‘विशते तदनन्तरम्।’

१-गीतामें ‘यावान्’ को ही ‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९) कहा है। उसी तत्त्वको सत्-असत्, परा-अपरा, पुरुष-प्रकृति, क्षेत्रज्ञ-क्षेत्र आदि दो रूपोंमें बताया है और उसी तत्त्वको सत्-असत्से पर भी बताया है—‘त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्’ (११।३७)। उस तत्त्वको गीतामें तीन रूपोंसे भी बताया है—अपरा, परा और अहम् (७।५-६), क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और माम् (१३।१-२) एवं क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम (१५।१६-१७)। इन तीनोंके (आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनके पूछनेपर) भगवान्ने छः भेद बताये हैं—‘अपरा’—क्रिया और पदार्थ, ‘परा’—सामान्य जीव और कारक पुरुष, एवं ‘अहम्’—निर्गुण और सगुण।

इन छः भेदोंको दृष्टान्तके रूपमें इस तरह समझें—जल-तत्त्व एक होनेपर भी उसके छः भेद हैं; उसमें परमाणुरूपसे जल निर्गुण ब्रह्म है, भायरूपसे जल सगुण परमात्मा है, बादलरूपसे जल कारक पुरुष (ब्रह्म) है, बूँदोंके रूपसे जल सामान्य जीव है, वर्षारूपसे जल सृष्टि-रचनारूप क्रिया है, और बर्फरूपसे जल (पृथ्वी, जल, तेज, वायु आदि) पदार्थ है।

२-गुणरहित कामनारहित प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं सूक्ष्मतमनुभवरूपम्। (नारदभक्तिसूत्र ५४) यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर है और अनुभवरूप है।

अनन्यभक्तिके तो मनुष्य भगवान्को तत्त्वसे जान सकता है, उनमें प्रविष्ट हो सकता है और उनके दर्शन भी कर सकता है (गीता—ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); परन्तु सांख्ययोगी भगवान्को तत्त्वसे जानकर उनमें प्रविष्ट तो होता है, पर भगवान् उसको दर्शन देनेमें बाध्य नहीं होते। कारण कि उसकी साधना पहलेसे ही विवेक-प्रधान रही है, इसलिये उसको दर्शनकी इच्छा नहीं होती। दर्शन न होनेपर भी उसमें कोई कमी नहीं रहती; अतः कमी माननी नहीं चाहिये।

यहाँ उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाना ही अनिवर्चनीय प्रेमकी प्राप्ति है। इसी प्रेमको नारदभक्तिसूत्रमें प्रतिक्षण वर्धमान कहा है। इस प्रेममें सर्वथा पूर्णता हो जाती है अर्थात् उसके लिये करना, जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये न करनेका राग रहता है, न जाननेकी जिज्ञासा रहती है, न जीनेकी आशा रहती है, न मरनेका भय रहता है और न पानेका लालच ही रहता है।

जबतक भगवान्में पराभक्ति अर्थात् परम प्रेम नहीं होता, तबतक ब्रह्मभूत-अवस्थामें भी ‘मैं ब्रह्म हूँ’ यह सूक्ष्म अहंकार रहता है। जबतक लेशमात्र भी अहंकार रहता है, तबतक परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु ‘मैं ब्रह्म हूँ’ यह सूक्ष्म अहंभाव तबतक जन्म-मरणका कारण नहीं बनता, जबतक उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंका संग नहीं होता; क्योंकि गुणोंका संग होनेसे ही बन्धन होता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनजन्मसु’ (गीता १३।२१)। उदाहरणार्थ—गाढ़ नींदसे जगनेपर साधारण मनुष्यमात्रको सबसे पहले यह अनुभव होता है कि ‘मैं हूँ।’ ऐसा अनुभव होते ही जब नाम, रूप, देश, काल, जाति आदिके साथ

१२०२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

स्वर्यका सम्बन्ध जुड़ जाता है, तब 'मैं हूँ' यह अहंभाव शुभ-अशुभ कर्मोंका कारण बन जाता है, जिससे जन्म-मरणका चक्कर चल पड़ता है। परन्तु जो ऊँचे दर्जोंका साधक होता है अर्थात् जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूत-अवस्था रहती है, उसके सात्त्विक ज्ञान (इसी अध्यायका बीसवाँ श्लोक)-में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। परन्तु जबतक साधकका सत्त्वगुणके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक नींदसे जगनेपर तत्काल 'मैं ब्रह्म हूँ' अथवा 'सब कुछ एक परमात्मा ही है'—ऐसी वृत्ति पकड़ी जाती है और मालूम होता है कि नींदमें यह वृत्ति छूट गयी थी, मानो उसकी भूल हो गयी थी और अब पीछे उस तत्त्वकी जागृति हो गयी है, स्मृति आ गयी है।

परिशिष्ट भाव— 'मैं जितना हूँ और जो हूँ, (यावान् यश्चास्मि)—यह बात सगुणकी ही है; क्योंकि 'यावान्-तावान्' निर्गुणमें हो सकता ही नहीं, प्रत्युत सगुणमें ही हो सकता है। चतुःश्लोकी भागवतमें भी भगवान्ने 'यावान्' पदका प्रयोग करते हुए ब्रह्माजीसे कहा है—

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः। तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्॥

(श्रीमद्भा० २।१।३१)

'मैं जितना हूँ, जिस भाववाला हूँ, जिन रूप, गुण और कर्मोंवाला हूँ, उस मेरे (समग्ररूपके) तत्त्वका यथार्थ अनुभव तुम्हें मेरी कृपासे ज्यों-का-त्यों हो जाय।'

'यावान् यश्चास्मि' का वर्णन भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें 'साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः' पदोंमें किया था। इससे सगुणकी विशेषता तथा मुख्यता सिद्ध होती है।

ज्ञानमार्गसे चलनेवालेको जब (ज्ञानोत्तरकालमें) भक्ति प्राप्त होती है तब उसमें तत्त्वसे जानना (ज्ञात्वा) और प्रविष्ट होना (विशते)—ये दो ही होते हैं, दर्शन नहीं होते। उनमें कोई कमी तो नहीं रहती, पर दर्शनकी इच्छा उनमें नहीं होती। परन्तु आरम्भसे ही भक्तिमार्गसे चलनेवालेको तत्त्वसे जानने (ज्ञातुम्) और प्रविष्ट होने (प्रवेष्टुम्)-के सिवाय भगवान्के दर्शन (द्रष्टुम्) भी होते हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। इसलिये ज्ञानमार्गी सन्तोंमें भगवत्प्रेम (भक्ति)-की बात तो आती है, पर दर्शनकी बात नहीं आती।

जैसे विभिन्न मार्गोंसे आनेवाले व्यक्ति दरवाजेंमें प्रविष्ट होनेपर एक साथ मिल जाते हैं, ऐसे ही विभिन्न योग-मार्गोंपर चलनेवाले साधक भगवान्में प्रविष्ट होनेपर (विशते) एक हो जाते हैं अर्थात् अहम्की सूक्ष्म गन्ध भी न रहनेसे उनमें कोई मतभेद नहीं रहता।

प्रेमकी दो अवस्थाएँ होती हैं—(१) कभी भक्त प्रेममें डूब जाता है, तब प्रेमी और प्रेमास्पद दो नहीं रहते, एक हो जाते हैं और (२) कभी भक्तमें प्रेमका उछाल आता है, तब प्रेमी और प्रेमास्पद एक होते हुए भी लीलाके लिये दो हो जाते हैं। यहाँ पहली अवस्थाको बतानेके लिये 'विशते' पद आया है।

सम्बन्ध— पहले श्लोकमें अर्जुनने सन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालिसवेंसे अड़तालिसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया; और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उनचासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यान-प्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।

सर्वकर्माण्यपि सदा कूर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥ ५६ ॥

श्लोक ५६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०३

मद्व्यापश्रयः = मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा = सदा सर्वकर्माणि = सब कर्म

कुर्वाणः = करता हुआ अपि = भी मत्प्रसादात् = मेरी कृपासे शाश्वतम् = शाश्वत

अव्ययम् = अविनाशी पदम् = पदको अवाज्नेति = प्राप्त हो जाता है।

व्याख्या—‘मद्व्यापश्रयः’ —‘कर्मिका, कर्मिक फलका, कर्मिक पूरा होने अथवा न होनेका, किसी घटना, परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति आदिका आश्रय न हो। केवल मेरा ही आश्रय (सहारा) हो। इस तरह जो सर्वथा मेरे ही परायण हो जाता है, अपना स्वतन्त्र कुछ नहीं समझता, किसी भी वस्तुको अपनी नहीं मानता, सर्वथा मेरे आश्रित रहता है, ऐसे भक्तको अपने उद्धारके लिये कुछ करना नहीं पड़ता। उसका उद्धार मैं कर देता हूँ (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक); उसको अपने जीवन-निर्वाह या साधन-सम्बन्धी किसी बातकी कमी नहीं रहती; सबकी मैं पूर्ति कर देता हूँ (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)—यह मेरा सदाका एक विधान है, नियम है, जो कि सर्वथा शरण हो जानेवाले हरेक प्राणीको प्राप्त हो सकता है (गीता—नवें अध्यायके तीसवेंसे बत्तीसवें श्लोकतक)।

‘सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणः’ —‘यहाँ ‘कर्मणि’ पदके साथ ‘सर्व’ और ‘कुर्वाणः’ पदके साथ ‘सदा’ पद देनेका तात्पर्य है कि जिस ध्यानपरायण सांख्ययोगीने शरीर, वाणी और मनका संयमन कर लिया है अर्थात् जिसने शरीर आदिकी क्रियाओंको संकुचित कर लिया है और एकान्तमें रहकर सदा ध्यानयोगमें लगा रहता है, उसको जिस पदकी प्राप्ति होती है, उसी पदको लौकिक, पारलौकिक, सामाजिक, शारीरिक आदि सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको हमेशा करते हुए भी मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त मेरी कृपासे प्राप्त कर लेता है।

हरेक व्यक्तिको यह बात तो समझमें आ जाती है कि जो एकान्तमें रहता है और साधन-भजन करता है, उसका कल्याण हो जाता है; परन्तु यह बात समझमें नहीं आती कि जो सदा मशीनकी तरह संसारका सब काम करता है, उसका कल्याण कैसे होगा? उसका कल्याण हो जाय, ऐसी कोई युक्ति नहीं दीखती; क्योंकि ऐसे तो सब लोग कर्म करते ही रहते हैं। इतना ही नहीं, मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं, पर उन सबका कल्याण होता हुआ दीखता नहीं और शास्त्र भी ऐसा कहता नहीं! इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—‘मत्प्रसादात् ’। तात्पर्य यह है कि जिसने केवल मेरा ही आश्रय ले लिया है, उसका कल्याण मेरी कृपासे हो जायगा, कौन है मना करनेवाला!

यद्यपि प्राणिमात्रपर भगवान्का अपनापन और कृपा सदा-सर्वदा स्वतःसिद्ध है, तथापि यह मनुष्य जबतक असत् संसारका आश्रय लेकर भगवान्से विमुख रहता है, तबतक भगवत्कृपा उसके लिये फलीभूत नहीं होती अर्थात् उसके काममें नहीं आती। परन्तु यह मनुष्य भगवान्का आश्रय लेकर ज्यों-ज्यों दूसरा आश्रय छोड़ता जाता है, त्यों-ही-त्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता चला जाता है, और ज्यों-ज्यों भगवान्का आश्रय दृढ़ होता जाता है, त्यों-ही-त्यों भगवत्कृपाका अनुभव होता जाता है। जब सर्वथा भगवान्का आश्रय ले लेता है, तब उसे भगवान्की कृपाका पूर्ण अनुभव हो जाता है।

‘अवाज्नेति शाश्वतं पदमव्ययम्’ —स्वतःसिद्ध परमपदकी प्राप्ति अपने कर्मोंसे, अपने पुरुषार्थसे अथवा अपने साधनसे नहीं होती। यह तो केवल भगवत्कृपासे ही होती है। शाश्वत अव्ययपद सर्वोत्कृष्ट है। उसी परमपदको भक्तिमार्गमें परमधाम, सत्यलोक, वैकुण्ठलोक, गोलोक, साकेतलोक आदि कहते हैं और ज्ञानमार्गमें विदेह-कैवल्य, मुक्ति, स्वरूपस्थिति आदि कहते हैं। वह परमपद तत्त्वसे एक होते हुए भी मार्गों और उपासनाओंका भेद होनेसे उपासकोंकी दृष्टिसे भिन्न-भिन्न कहा जाता है (गीता—आठवें अध्यायका इक्कीसवाँ और चौदहवें अध्यायका सत्ताईसवाँ श्लोक)। भगवान्का चिन्मय लोक एक देश-विशेषमें होते हुए भी सब जगह व्यापकरूपसे परिपूर्ण है। जहाँ भगवान् हैं, वहाँ उनका लोक भी है; क्योंकि भगवान् और उनका लोक तत्त्वसे एक ही हैं। भगवान् सर्वत्र विराजमान हैं; अतः उनका लोक भी सर्वत्र विराजमान (सर्वव्यापी) है। जब भक्तकी अनन्य निष्ठा सिद्ध हो जाती है, तब परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव हो जाता है और वही लोक उसके सामने प्रकट हो जाता है अर्थात् उसे यहाँ जीते-जी ही उस लोककी दिव्य लीलाओंका अनुभव होने लगता है। परन्तु जिस भक्तकी ऐसी धारणा रहती है कि वह दिव्य लोक एक देश-विशेषमें ही है, तो उसे उस लोककी प्राप्ति शरीर छोड़नेपर ही होती है। उसे लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं और कहीं-कहीं स्वयं भगवान् भी आते हैं।

१२०४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परिशिष्ट भाव —ज्ञानयोगीके लिये तो भगवान्ने बताया कि वह सब विषयोंका त्याग करके संयमपूर्वक निरन्तर ध्यानके परायण रहे, तब वह अर्हता, ममता, काम, क्रोध आदिका त्याग करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है (अठारहवें अध्यायका इक्यावनवाँ, बावनवाँ और तिरपनवाँ श्लोक)। परन्तु भक्तके लिये यहाँ बताया कि वह अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार सब विहित कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे परमपदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि उसने मेरा आश्रय लिया है—‘मद्व्यपाश्रयः ’। तात्पर्य है कि भगवान्के चरणोंका आश्रय लेनेसे सुगमतासे कल्याण हो जाता है। भक्तको अपना कल्याण खुद नहीं करना पड़ता, प्रत्युत अपने बल, विद्या आदिका किंचिन्मात्र भी आश्रय न रखकर केवल विश्वासपूर्वक भगवान्का ही आश्रय लेना पड़ता है। फिर भगवत्कृपा ही उसका कल्याण कर देती है—‘मत्प्रसादादावप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ’। भगवान् भी केवल भक्तके आश्रयको देखते हैं* उसके दोषोंको नहीं देखते। रामायणमें आया है—

रहित न प्रभु चित् चूक किए की। करत सुरति सय बार किए की॥

(बाल० २९।३)

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥

(उत्तर० १।३)

मद्व्यपाश्रयः ’ का अर्थ है—मेरा विशेष आश्रय अर्थात् अनन्य आश्रय, जिसमें दूसरे किसीका किंचिन्मात्र भी आश्रय न हो।

एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥

(मानस, अरण्य० १०।४)

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपना सामान्य विधान (नियम) बताकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके लिये विशेषरूपसे आज्ञा देते हैं।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य मत्परः।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७॥

चेतसा= चित्तसेमत्परः= मेरे परायण होकरसततम्= निरन्तर
सर्वकर्माणि= सम्पूर्ण कर्म(तथा)मच्चित्तः= मुझमें
मयि= मुझमेंबुद्धियोगम्= समताकाचित्वाला
सन्यस्य= अर्पण करके,उपाश्रित्य= आश्रय लेकरभव= हो जा।

व्याख्या —[इस श्लोकमें भगवान्ने चार बातें बतायी हैं—

(१) ‘चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य ’—सम्पूर्ण कर्मोंको चित्तसे मेरे अर्पण कर दे।

(२) ‘मत्परः ’—स्वयंको मेरे अर्पित कर दे।

(३) ‘बुद्धियोगमुपाश्रित्य ’—समताका आश्रय लेकर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद कर ले।

(४) ‘मच्चित्तः सततं भव ’—निरन्तर मेरेमें चित्वाला हो जा अर्थात् मेरे साथ अटल सम्बन्ध कर ले।]

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य ’—चित्तसे कर्मोंको अर्पित करनेका तात्पर्य है कि मनुष्य चित्तसे यह दृढ़तासे मान ले कि मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि और संसारके

व्यक्ति, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदि सब भगवान्के ही हैं। भगवान् ही इन सबके मालिक हैं। इनमेंसे कोई भी चीज किसीकी व्यक्तिगत नहीं है। केवल इन वस्तुओंका सदुपयोग करनेके लिये ही भगवान्ने व्यक्तिगत अधिकार दिया है। इस दिये हुए अधिकारको भी भगवान्के अर्पण कर देना है।

शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिसे जो कुछ शास्त्रविहित सांसारिक या पारमार्थिक क्रियाएँ होती हैं, वे सब भगवान्की मरजीसे ही होती हैं। मनुष्य तो केवल अहंकारके कारण उनको अपनी मान लेता है। उन क्रियाओंमें जो अपनापन है, उसे भी भगवान्के अर्पण कर देना है; क्योंकि वह अपनापन केवल मूर्खतासे माना हुआ है, वास्तवमें है नहीं। इसलिये

  • ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता ४।११)

श्लोक ५७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०५

उनमें अपनेपनका भाव बिलकुल उठा देना चाहिये और उन सबपर भगवान्की मुहर लगा देनी चाहिये।

'मत्यरः' —भगवान् ही मेरे परम आश्रय हैं, उनके सिवाय मेरा कुछ नहीं है, मेरेको करना भी कुछ नहीं है, पाना भी कुछ नहीं है, किसीसे लेना भी कुछ नहीं है अर्थात् देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिसे मेरा किंचिन्मात्र कोई प्रयोजन नहीं है—ऐसा अनन्यभाव हो जाना ही भगवान्के परायण होना है।

एक बात खास ध्यान देनेकी है—रुपये-पैसे, कुटुम्ब, शरीर आदिको मनुष्य अपना मानते हैं और मनमें यह समझते हैं कि हम इनके मालिक बन गये, हमारा इनपर आधिपत्य है; परन्तु वास्तवमें यह बात बिलकुल झूठी है, कोरा वहम है और बड़ा भारी धोखा है। जो किसी चीजको अपनी मान लेता है, वह उस चीजका गुलाम बन जाता है और वह चीज उसका मालिक बन जाती है। फिर उस चीजके बिना वह रह नहीं सकता। अतः जिन चीजोंको मनुष्य अपनी मान लेता है, वे सब उसपर चढ़ जाती हैं और वह तुच्छ हो जाता है। वह चीज चाहे रुपया हो, चाहे कुटुम्बी हो, चाहे शरीर हो, चाहे विद्या-बुद्धि आदि हो। ये सब चीजें प्राकृत हैं और अपनेसे भिन्न हैं, पर हैं। इनके अधीन होना ही पराधीन होना है।

भगवान् स्वकीय हैं, अपने हैं। उनको मनुष्य अपना मानेगा, तो वे मनुष्यके वशमें हो जायेंगे। भगवान्के हृदयमें भक्तका जितना आदर है, उतना आदर करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है। भगवान् भक्तके दास हो जाते हैं और उसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं—'मैं तो हूँ भगतनका दास भगत मेरे मुकुटमणि' , परन्तु संसार मनुष्यका दास बनकर उसे अपना मुकुटमणि नहीं बनायेगा। वह तो उसे अपना दास बनाकर पददलित ही करेगा। इसलिये केवल भगवान्के शरण होकर सर्वथा उन्हींके परायण हो जाना चाहिये।

'बुद्धियोगमुपाश्रित्य' —गीताभरमें देखा जाय तो समताकी बड़ी भारी महिमा है। मनुष्यमें एक समता आ गयी तो वह ज्ञानी, ध्यानी, योगी, भक्त आदि सब कुछ बन गया। परन्तु यदि उसमें समता नहीं आयी तो अच्छे-अच्छे लक्षण आनेपर भी भगवान् उसको पूर्णता नहीं मानते। वह समता मनुष्यमें स्वाभाविक रहती है। केवल आने-जानेवाली परिस्थितियोंके साथ मिलकर वह सुखी-दुःखी हो जाता है। इसलिये उनमें मनुष्य सावधान रहे कि आने-जानेवाली

परिस्थितिके साथ मैं नहीं हूँ। सुख आया, अनुकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और सुख चला गया, अनुकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। ऐसे ही दुःख आया, प्रतिकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और दुःख चला गया, प्रतिकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। अतः सुख-दुःखमें, अनुकूलता-प्रतिकूलतामें, हानि-लाभमें मैं सदैव ज्यों-का-त्यों रहता हूँ। परिस्थितियोंके बदलनेपर भी मैं नहीं बदलता, सदा वही रहता हूँ। इस तरह अपने-आपमें स्थित रहे। अपने-आपमें स्थित रहनेसे सुख-दुःख आदिमें समता हो जायगी। यह समता ही भगवान्की आराधना है—'समत्वमाराधनमच्युतस्य' (विष्णुपुराण १। १७। ९०)। इसीलिये यहाँ भगवान् बुद्धियोग अर्थात् समताका आश्रय लेनेके लिये कहते हैं।

'मच्चित्तः सततं भव' —जो अपनेको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है, उसका चित्त भी सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित हो जाता है। फिर उसपर भगवान्का जो स्वतः-स्वाभाविक अधिकार है, वह प्रकट हो जाता है और उसके चित्तमें स्वयं भगवान् आकर विराजमान हो जाते हैं। यही 'मच्चित्तः' होना है।

'मच्चित्तः' पदके साथ 'सततम्' पद देनेका अर्थ है कि निरन्तर मेरेमें (भगवान्में) चित्तवाला हो जा। भगवान्का निरन्तर चिन्तन तभी होगा, जब 'मैं भगवान्का हूँ' इस प्रकार अहंता भगवान्में लग जायगी। अहंता भगवान्में लग जानेपर चित्त स्वतः-स्वाभाविक भगवान्में लग जाता है। जैसे, शिष्य बननेपर 'मैं गुरुका हूँ' इस प्रकार अहंता गुरुमें लग जानेपर गुरुकी याद निरन्तर बनी रहती है। गुरुका सम्बन्ध अहंतामें बैठ जानेके कारण इस सम्बन्धकी याद आये तो भी याद है और याद न आये तो भी याद है; क्योंकि स्वयं निरन्तर रहता है। इसमें भी देखा जाय तो गुरुके साथ उसने खुद सम्बन्ध जोड़ा है; परन्तु भगवान्के साथ इस जीवका स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसारके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्य सम्बन्धकी विस्मृति हुई है। उस विस्मृतिको मिटानेके लिये भगवान् कहते हैं कि निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा।

साधक कोई भी सांसारिक काम-धंधा करे, तो उसमें यह एक सावधानी रखे कि अपने चित्तको उस काम-धंधेमें द्रवित न होने दे, चित्तको संसारके साथ घुलने-मिलने न दे अर्थात् तदाकार न होने दे, प्रत्युत उसमें अपने चित्तको कठोर रखे। परन्तु भगवान्नामका जप, कीर्तन, भगवत्कथा,