श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक ५७]
- साधक-संजीवनी *
१४५
श्रेष्ठ और महत्त्व-बुद्धि है, उसीको वासना, कामना आदि नामोंसे कहते हैं।]
‘स्थितधीर्मुनिरुच्यते’—ऐसे मननशील कर्मयोगीकी बुद्धि स्थिर, अटल हो जाती है। ‘मुनि’ शब्द वाणीपर लागू होता है, इसलिये भगवान्ने ‘किं प्रभाषेत्’ के उत्तरमें ‘मुनि’ शब्द कह दिया है। परंतु वास्तवमें ‘मुनि’ शब्द केवल वाणीपर ही अवलम्बित नहीं है। इसीलिये भगवान्ने सत्रहवें अध्यायमें ‘मौन’ शब्दका प्रयोग मानसिक तपमें किया है,
वाणीके तपमें नहीं (सत्रहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। कर्मयोगका प्रकरण होनेसे यहाँ मननशील कर्मयोगीको मुनि कहा गया है। मननशीलताका तात्पर्य है— सावधानीका मनन, जिससे कि मनमें कोई कामना-आसक्ति न आ जाय। निरन्तर अनासक्त रहना ही सिद्ध कर्मयोगीकी सावधानी है; क्योंकि पहले साधक-अवस्थामें उसकी ऐसी सावधानी रही है (गीता—तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) और इसीसे वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त हुआ है।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तप्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥
सर्वत्र = सब जगह अनभिस्नेहः = आसक्तिरहित हुआ यः = जो मनुष्य तत्, तत् = उस-उस
शुभाशुभम् = शुभ-अशुभको प्राप्य = प्राप्त करके न = न तो अभिनन्दति = प्रसन्न होता है (और)
न = न द्वेष्टि = द्वेष करता है, तस्य = उसकी प्रज्ञा = बुद्धि प्रतिष्ठिता = स्थिर है।
व्याख्या—[पूर्वश्लोकमें तो भगवान्ने कर्तव्यकर्म करते हुए निर्वाकार रहनेकी बात बतायी। अब इस श्लोकमें कर्मके अनुसार प्राप्त होनेवाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंमें सम, निर्वाकार रहनेकी बात बताते हैं।]
‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’—जो सब जगह स्नेहरहित है अर्थात् जिसकी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं स्त्री, पुत्र, घर, धन आदि किसीमें भी आसक्ति, लगाव नहीं रहा है।
वस्तु आदिके बने रहनेसे मैं बना रहा और उनके बिगड़ जानेसे मैं बिगड़ गया, धनके आनेसे मैं बड़ा हो गया और धनके चले जानेसे मैं मारा गया—यह जो वस्तु आदिमें एकात्मताकी तरह स्नेह है, उसका नाम ‘अभिस्नेह’ है। स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीका किसी भी वस्तु आदिमें यह अभिस्नेह बिलकुल नहीं रहता। बाहरसे वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिका संयोग रहते हुए भी वह भीतरसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है।
‘तत्तप्राप्य शुभाशुभं नाभिनन्दति न द्वेष्टि’—जब उस मनुष्यके सामने प्रारब्धवशात् शुभ-अशुभ, शोभनीय-अशोभनीय, अच्छी-मन्दी, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आती है, तब वह अनुकूल परिस्थितिको लेकर अभिनन्दित नहीं होता और प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर द्वेष नहीं करता।
अनुकूल परिस्थितिको लेकर मनमें जो प्रसन्नता आती है और वाणीसे भी प्रसन्नता प्रकट की जाती है तथा
बाहरसे भी उत्सव मनाया जाता है—यह उस परिस्थितिका अभिनन्दन करना है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर मनमें जो दुःख होता है, खिन्नता होती है कि यह कैसे और क्यों हो गया! यह नहीं होता तो अच्छा था, अब यह जल्दी मिट जाय तो ठीक है—यह उस परिस्थितिसे द्वेष करना है। सर्वत्र स्नेहरहित, निर्लिप्त हुआ मनुष्य अनुकूलताको लेकर अभिनन्दन नहीं करता और प्रतिकूलताको लेकर द्वेष नहीं करता। तात्पर्य है कि उसको अनुकूल-प्रतिकूल, अच्छे-मन्दे अवसर प्राप्त होते रहते हैं, पर उसके भीतर सदा निर्लिप्ता बनी रहती है।
‘तत्, तत्’ कहनेका तात्पर्य है कि जिन-जिन अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिसे विकार होनेकी सम्भावना रहती है और साधारण लोगोंमें विकार होते हैं, उन-उन अनुकूल-प्रतिकूल वस्तु आदिके कहीं भी, कभी भी और कैसे भी प्राप्त होनेपर उसको अभिनन्दन और द्वेष नहीं होता।
‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता’—उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है, एकरस और एकरूप है। साधनावस्थामें उसकी जो व्यवसायात्मिका बुद्धि थी, वह अब परमात्मामें अचल-अटल हो गयी है। उसकी बुद्धिमें यह विवेक पूर्णरूपसे जाग्रत् हो गया है कि संसारमें अच्छे-मन्देके साथ वास्तवमें मेरा कोई भी सम्बन्ध नहीं है। कारण कि ये अच्छे-मन्दे
१४६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २
अवसर तो बदलनेवाले हैं, पर मेरा स्वरूप न बदलनेवाला
है; अतः बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका सम्बन्ध
कैसे हो सकता है?
वास्तवमें देखा जाय तो फर्क न तो स्वरूपमें पड़ता
है और न शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें। कारण कि अपना
जो स्वरूप है, उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई परिवर्तन
नहीं होता और प्रकृति तथा प्रकृतिके कार्य शरीरादि
स्वाभाविक ही बदलते रहते हैं। तो फर्क कहाँ पड़ता है?
शरीरसे तादात्म्य होनेके कारण बुद्धिमें फर्क पड़ता है। जब
यह तादात्म्य मिट जाता है, तब बुद्धिमें जो फर्क पड़ता था,
वह मिट जाता है और बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।
दूसरा भाव यह है कि किसीकी बुद्धि कितनी ही तेज
क्यों न हो और वह अपनी बुद्धिसे परमात्माके विषयमें
कितना ही विचार क्यों न करता हो, पर वह परमात्माको
अपनी बुद्धिके अन्तर्गत नहीं ला सकता। कारण कि बुद्धि
सीमित है और परमात्मा असीम-अनन्त हैं। परन्तु उस
असीम परमात्मामें जब बुद्धि लीन हो जाती है, तब उस
सीमित बुद्धिमें परमात्माके सिवाय दूसरी कोई सत्ता ही नहीं
रहती-यही बुद्धिका परमात्मामें प्रतिष्ठित होना है।
कर्मयोगी क्रियाशील होता है। अतः भगवान्ने छप्पनवें
श्लोकमें क्रियाकी सिद्धि-असिद्धिमें अस्पृहा और उद्वेग-
रहित होनेकी बात कही तथा इस श्लोकमें प्रारब्धके
अनुसार अपने-आप अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त
होनेपर अभिनन्दन और द्वेषसे रहित होनेकी बात कहते हैं।
सम्बन्ध-अब भगवान् आगेके श्लोकसे 'स्थितप्रज्ञ कैसे बैठता है?' इस तीसरे प्रश्नका उत्तर आरम्भ करते हैं।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥
इव, च = जिस तरह
कूर्मः = कछुआ
अङ्गानि = (अपने)
अंगोंको
सर्वशः = सब ओरसे
संहरते = समेट लेता है,
(ऐसे ही)
यदा = जिस कालमें
अयम् = यह (कर्मयोगी)
इन्द्रियार्थेभ्यः = इन्द्रियोंके
विषयोंसे
इन्द्रियाणि = इन्द्रियोंको (सब
प्रकारसे हटा
लेता है, तब)
तस्य = उसकी
प्रज्ञा = बुद्धि
प्रतिष्ठिता = स्थिर हो
जाती है।
व्याख्या-'यदा संहरते.....प्रज्ञा प्रतिष्ठिता'-यहाँ
कछुएका दृष्टान्त देनेका तात्पर्य है कि जैसे कछुआ चलता
है तो उसके छः अंग दीखते हैं-चार पैर, एक पूँछ और
एक मस्तक। परन्तु जब वह अपने अंगोंको छिपा लेता
है, तब केवल उसकी पीठ ही दिखायी देती है। ऐसे ही
स्थितप्रज्ञ पाँच इन्द्रियाँ और एक मन-इन छहोंको अपने-
अपने विषयसे हटा लेता है। अगर उसका इन्द्रियों आदिके
साथ किंचिन्मात्र भी मानसिक सम्बन्ध बना रहता है, तो
वह स्थितप्रज्ञ नहीं होता।
यहाँ 'संहरते' क्रिया देनेका मतलब यह हुआ कि वह
स्थितप्रज्ञ विषयोंसे इन्द्रियोंका उपसंहार कर लेता है अर्थात्
वह मनसे भी विषयोंका चिन्तन नहीं करता।
इस श्लोकमें 'यदा' पद तो दिया है, पर 'तदा' पद
नहीं दिया है। यद्यपि 'यत्तदोर्नित्यसम्बन्धः' के अनुसार
जहाँ 'यदा' आता है, वहाँ 'तदा' का अध्याहार लिया जाता
है अर्थात् 'यदा' पदके अन्तर्गत ही 'तदा' पद आ जाता
है, तथापि यहाँ 'तदा' पदका प्रयोग न करनेका एक गहरा
तात्पर्य है कि इन्द्रियोंके अपने-अपने विषयोंसे सर्वथा हट
जानेसे स्वतःसिद्ध तत्त्वका जो अनुभव होता है, वह कालके
अधीन, कालकी सीमामें नहीं है। कारण कि वह अनुभव
किसी क्रिया अथवा त्यागका फल नहीं है। वह अनुभव
उत्पन्न होनेवाली वस्तु नहीं है। अतः यहाँ कालवाचक 'तदा'
पद देनेकी जरूरत नहीं है। इसकी जरूरत तो वहाँ होती
है, जहाँ कोई वस्तु किसी वस्तुके अधीन होती है। जैसे
आकाशमें सूर्य रहनेपर भी आँखें बंद कर लेनेसे सूर्य नहीं
दीखता और आँखें खोलते ही सूर्य दीख जाता है, तो यहाँ
सूर्य और आँखोंमें कार्य-कारणका सम्बन्ध नहीं है अर्थात्
आँखें खुलनेसे सूर्य पैदा नहीं हुआ है। सूर्य तो पहलेसे
ज्यों-का-त्यों ही है। आँखें बंद करनेसे पहले भी सूर्य वैसा
ही है और आँखें बंद करनेपर भी सूर्य वैसा ही है। केवल
आँखें बंद करनेसे हमें उसका अनुभव नहीं हुआ था। ऐसे
ही यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेसे स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका
जो अनुभव हुआ है, वह अनुभव मनसहित इन्द्रियोंका
विषय नहीं है। तात्पर्य है कि वह स्वतःसिद्ध तत्त्व
श्लोक ५९ ]
- साधक-संजीवनी *
१४७
भोगों-(विषयों-) के साथ सम्बन्ध रखते हुए और सम्बन्धरूप परदा रहनेसे उसका अनुभव नहीं होता और भोगोंको भोगते हुए भी वैसा ही है। परन्तु भोगोंके साथ यह परदा हटते ही उसका अनुभव हो जाता है।
सम्बन्ध—केवल इन्द्रियोंका विषयोंसे हट जाना ही स्थितप्रज्ञका लक्षण नहीं हैं—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥
| निराहारस्य | = निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) | रसवर्जम् | = रस निवृत्त नहीं होता। (परन्तु) | रसः | = रस |
|---|---|---|---|---|---|
| देहिनः | = मनुष्यके (भी) | परम् | = परमात्मतत्त्वका | अपि | = भी |
| विषयाः | = विषय तो | दृष्ट्वा | = अनुभव होनेसे | निवर्तते | = निवृत्त हो जाता है |
| विनिवर्तन्ते | = निवृत्त हो जाते हैं, | अस्य | = इस स्थितप्रज्ञ | अर्थात् उसकी संसारमें रसबुद्धि नहीं रहती। |
व्याख्या—‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः रसवर्जम्’ —मनुष्य निराहार दो तरहसे होता है—(१) अपनी इच्छासे भोजनका त्याग कर देना अथवा बीमारी आनेसे भोजनका त्याग हो जाना और (२) सम्पूर्ण विषयोंका त्याग करके एकान्तमें बैठना अर्थात् इन्द्रियोंको विषयोंसे हटा लेना।
यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले साधकके लिये ही ‘निराहारस्य’ पद आया है।
रोगीके मनमें यह रहता है कि क्या कर्तु, शरीरमें पदार्थोंका सेवन करनेकी सामर्थ्य नहीं है, इसमें मेरी परवशता है; परन्तु जब मैं ठीक हो जाऊँगा, शरीरमें शक्ति आ जायगी, तब मैं पदार्थोंका सेवन करूँगा। इस तरह उसके भीतर रसबुद्धि रहती है। ऐसे ही इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेपर विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर साधकके भीतर विषयोंमें जो रसबुद्धि, सुखबुद्धि है, वह जल्दी निवृत्त नहीं होती।
जिनका स्वाभाविक ही विषयोंमें राग नहीं है और जो तीव्र वैराग्यवान् हैं, उन साधकोंकी रसबुद्धि साधनावस्थामें
ही निवृत्त हो जाती है। परन्तु जो तीव्र वैराग्यके बिना ही विचारपूर्वक साधनमें लगे हुए हैं; उन्हीं साधकोंके लिये यह कहा गया है कि विषयोंका त्याग कर देनेपर भी उनकी रसबुद्धि निवृत्त नहीं होती।
‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ —इस स्थितप्रज्ञकी रसबुद्धि परमात्माका अनुभव हो जानेपर निवृत्त हो जाती है। रसबुद्धि निवृत्त होनेसे वह स्थितप्रज्ञ हो ही जाता है—यह नियम नहीं है। परन्तु स्थितप्रज्ञ होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती—यह नियम है।
‘रसोऽप्यस्य’ पदसे यह तात्पर्य निकलता है कि रसबुद्धि साधककी अहंतामें अर्थात् ‘मैं’-पनमें रहती है। यही रसबुद्धि स्थूलरूपसे रागका रूप धारण कर लेती है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपनी अहंतासे ही रसको निकाल दे कि ‘मैं तो निष्काम हूँ; राग करना, कामना करना मेरा काम नहीं है’। इस प्रकार निष्कामभाव आ जानेसे अथवा निष्काम होनेका उद्देश्य होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती और परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे रसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है।
परिशिष्ट भाव— भोगोंकी सत्ता और महत्ता माननेसे अन्तःकरणमें भोगोंके प्रति एक सूक्ष्म खिंचाव, प्रियता, मिठास पैदा होती है, उसका नाम ‘रस’ है। किसी लोभी व्यक्तिको रुपये मिल जायँ और कामी व्यक्तिको स्त्री मिल जाय तो भीतर-ही-भीतर एक खुशी आती है, यही ‘रस’ है। भोग भोगनेके बाद मनुष्य कहता है कि ‘बड़ा मजा आया’—यह उस रसकी ही स्मृति है। यह रस अहम् (चिञ्चडग्रन्थि) में रहता है। इसी रसका स्थूल रूप राग, सुखासक्ति है।
जबतक संयोगजन्य सुखमें रसबुद्धि रहती है, तबतक प्रकृति तथा उसके कार्य (क्रिया, पदार्थ और व्यक्ति) की पराधीनता रहती ही है। रसबुद्धि निवृत्त होनेपर पराधीनता सर्वथा मिट जाती है, भोगोंके सुखकी परवशता नहीं रहती, भीतरसे भोगोंकी गुलामी नहीं रहती।
१४८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
जबतक अन्तःकरणमें किंचिन्मात्र भी भोगोंकी सत्ता और महत्ता रहती है, भोगोंमें रसबुद्धि रहती है, तबतक परमात्माका अलौकिक रस प्रकट नहीं होता। परमात्माके अलौकिक रसकी तो बात ही क्या, परमात्माकी प्राप्ति करनी है—यह निश्चय भी नहीं होता (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। बाहरसे इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर अर्थात् भोगोंका त्याग करनेपर भी भीतरमें रसबुद्धि बनी रहती है। तत्त्वबोध होनेपर यह रसबुद्धि सूख जाती है, निवृत्त हो जाती है—‘परं दृष्ट्वा निवर्तते ’। तात्पर्य है कि जब संसारसे अपनी भिन्नता तथा परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव हो जाता है, तब नाशवान् (संयोगजन्य) रसकी निवृत्ति हो जाती है। नाशवान् रसकी निवृत्ति होनेपर अविनाशी (अखण्ड) रसकी जागृति हो जाती है।
तत्त्वबोध होनेपर तो रस सर्वथा निवृत्त हो ही जाता है, पर तत्त्वबोध होनेसे पहले भी उसकी उपेक्षासे, विचारसे, सत्संगसे, संतकृपासे रस निवृत्त हो सकता है। जिनकी रसबुद्धि निवृत्त हो चुकी है, ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषके संगसे भी रस निवृत्त हो सकता है।
कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग—तीनों साधनोंसे नाशवान् रसकी निवृत्ति हो जाती है। ज्यों-ज्यों कर्मयोगमें सेवाका रस, ज्ञानयोगमें तत्त्वके अनुभवका रस और भक्तियोगमें प्रेमका रस मिलने लगता है, त्यों-त्यों नाशवान् रस स्वतः छूटता चला जाता है। जैसे बचपनमें खिलौनोंमें रस मिलता था, पर बड़े होनेपर जब रूप्योंमें रस मिलने लगता है, तब खिलौनोंका रस स्वतः छूट जाता है, ऐसे ही साधनका रस मिलनेपर भोगोंका रस स्वतः छूट जाता है।
रसबुद्धिके रहते हुए जब भोगोंकी प्राप्ति होती है, तब मनुष्यका चित्त पिघल जाता है तथा वह भोगोंके वशीभूत हो जाता है। परन्तु रसबुद्धि निवृत्त होनेके बाद जब भोगोंकी प्राप्ति होती है, तब तत्त्वज्ञ महापुरुषके चित्तमें किंचिन्मात्र भी कोई विकार पैदा नहीं होता (गीता २।७०)। उसके भीतर ऐसी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती, जिससे भोग उसको अपनी ओर खींच सकें। जैसे, पशुके आगे रूप्योंकी थैली रख दें तो उसमें लोभ-वृत्ति पैदा नहीं होती और सुन्दर स्त्रीको देखकर उसमें काम-वृत्ति पैदा नहीं होती। पशु तो रूप्योंको और स्त्रीको जानता नहीं, पर तत्त्वज्ञ महापुरुष रूप्योंको भी जानता है और स्त्रीको भी (गीता—दूसरे अध्यायका उनहत्तरवाँ श्लोक), फिर भी उसमें लोभ-वृत्ति और काम-वृत्ति पैदा नहीं होती। जैसे हम अंगुलीसे शरीरके किसी अंगको खुजलाते हैं तो खुजली मिटनेपर अंगुलीमें कोई फर्क नहीं पड़ता, कोई विकृति नहीं आती, ऐसे ही इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन होनेपर भी तत्त्वज्ञके चित्तमें कोई विकार नहीं आता, वह ज्यों-का-त्यों निर्वाकार रहता है। कारण कि रसबुद्धि निवृत्त हो जानेसे वह अपने सुखके लिये किसी विषयमें प्रवृत्त होता ही नहीं। उसकी प्रत्येक प्रवृत्ति दूसरोंके हित और सुखके लिये ही होती है। अपने सुखके लिये किया गया विषयोंका चिन्तन भी पतन करनेवाला हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक) और अपने सुखके लिये न किया गया विषयोंका सेवन भी बन्धनकारक नहीं होता (गीता—दूसरे अध्यायका चौसठवाँ-पैंसठवाँ श्लोक)।
नाशवान् रस तात्कालिक होता है, अधिक देर नहीं ठहरता। स्त्री, रुपये आदिकी प्राप्तिके समय जो रस आता है, वह बादमें नहीं रहता। भोजनके मिलनेपर जो रस आता है, वह प्रत्येक ग्रासमें कम होते-होते अन्तमें सर्वथा मिट जाता है और भोजनसे अरुचि पैदा हो जाती है। परन्तु अविनाशी रस कभी कम नहीं होता, प्रत्युत ज्यों-का-त्यों (अखण्ड) रहता है। नाशवान् रसका भोग करनेसे परिणाममें जड़ता, अभाव, शोक, रोग, भय, उद्देग आदि अनेक विकार पैदा होते हैं। इन विकारोंसे भोगी मनुष्य बच नहीं सकता; क्योंकि यह भोगोंका अवश्यम्भावी परिणाम है। इसलिये भगवान्ने दुःखोंका दर्शन करनेकी बात कही है—‘दुःखदोषानुदर्शनम् ’ (गीता १३।८)। कामादि दोषोंसे मुक्त होनेपर ही मनुष्य अपने कल्याणका आचरण करता है (गीता—सोलहवें अध्यायका इक्कीसवाँ-बाईसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—रसकी निवृत्ति न हो तो क्या आपत्ति है? इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥
श्लोक ६१ ]
- साधक-संजीवनी *
१४९
| हित | = कारण कि | विपश्चितः | = विद्वान् | इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ |
|---|---|---|---|---|---|
| कौन्तेय | = हे कुन्तीनन्दन ! | ||||
| (रसबुद्धि रहनेसे) | पुरुषस्य | = मनुष्यकी | मनः | = (उसके) मनको | |
| यतः | = यल करते हुए | अपि | = भी | प्रसभम् | = बलपूर्वक |
| प्रमाथीनि | = प्रमथनशील | हरन्ति | = हर लेती हैं। |
व्याख्या —‘यततो ह्यपि .... प्रसभं मनः’१—जो स्वयं यल करता है, साधन करता है, हरेक कामको विवेकपूर्वक करता है, आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करता है, दूसरोंका हित हो, दूसरोंको सुख पहुँचे, दूसरोंका कल्याण हो—ऐसा भाव रखता है और वैसी क्रिया भी करता है, जो स्वयं कर्तव्य-अकर्तव्य, सार-असारको जानता है और कौन-कौन-से कर्म करनेसे उनका क्या-क्या परिणाम होता है—इसको भी जाननेवाला है, ऐसे विद्वान् पुरुषके लिये यहाँ ‘यततो ह्यपि पुरुषस्य विपश्चितः’ पद आये हैं। प्रयत्न करनेवाले ऐसे विद्वान् पुरुषकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं, विषयोंकी तरफ खींच लेती हैं अर्थात् वह विषयोंकी तरफ खिंच जाता है, आकृष्ट हो जाता है। इसका कारण यह है कि
जबतक बुद्धि सर्वथा परमात्मत्वमें प्रतिष्ठित (स्थित) नहीं होती, बुद्धिमें संसारकी यत्किंचित् सत्ता रहती है, विषयेन्द्रिय-सम्बन्धसे सुख होता है, भोगे हुए भोगोंके संस्कार रहते हैं, तबतक साधनपरायण बुद्धिमान् विवेकी पुरुषकी भी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें नहीं होतीं। इन्द्रियोंके विषय सामने आनेपर भोगे हुए भोगोंके संस्कारोंके कारण इन्द्रियाँ मन-बुद्धिको जबर्दस्ती विषयोंकी तरफ खींच ले जाती हैं। ऐसे अनेक ऋषियोंके उदाहरण भी आते हैं, जो विषयोंके सामने आनेपर विचलित हो गये। अतः साधकको अपनी इन्द्रियोंपर कभी भी ‘मेरी इन्द्रियाँ वशमें हैं’, ऐसा विश्वास नहीं करना चाहिये२ और कभी भी यह अभिमान नहीं करना चाहिये कि ‘मैं जितेन्द्रिय हो गया हूँ।’
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बताया कि रसबुद्धि रहनेसे यल करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी इन्द्रियाँ उसके मनको हर लेती हैं, जिससे उसकी बुद्धि परमात्मामें प्रतिष्ठित नहीं होती। अतः रसबुद्धिको दूर कैसे किया जाय—इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥
| युक्तः | = कर्मयोगी साधक | मत्परः | = मेरे परायण | इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ |
|---|---|---|---|---|---|
| तानि | = उन | होकर | वशे | = वशमें हैं, | |
| सर्वाणि | = सम्पूर्ण | आसीत | = बैठे; | तस्य | = उसकी |
| इन्द्रियोंको | हि | = क्योंकि | प्रज्ञा | = बुद्धि | |
| संयम्य | = वशमें करके | यस्य | = जिसकी | प्रतिष्ठिता | = स्थिर है। |
व्याख्या —‘तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः’—जो बलपूर्वक मनका हरण करनेवाली इन्द्रियाँ हैं, उन सबको वशमें करके अर्थात् सजगतापूर्वक उनको कभी भी विषयोंमें विचलित न होने देकर स्वयं मेरे परायण हो
जाय। तात्पर्य यह हुआ कि जब साधक इन्द्रियोंको वशमें करता है, तब उसमें अपने बलका अभिमान रहता है कि मैंने इन्द्रियोंको अपने वशमें किया है। यह अभिमान साधकको उन्नत नहीं होने देता और उसे भगवान्से विमुख
१—यहाँ भगवान्ने इन्द्रियोंको ‘प्रमाथीनि’ कहा है और छठे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें अर्जुनने मनको ‘प्रमाथि’ कहा है। अतः इन्द्रियाँ और मन दोनों ही प्रमथनशील हैं। ऐसे ही यहाँ बताया कि इन्द्रियाँ मनको हर लेती हैं और आगे इसी अध्यायके सड़सठवें श्लोकमें बताया है कि मन बुद्धिको हर लेता है अर्थात् यहाँ तो इन्द्रियोंकी प्रबलता बताया और वहाँ मनकी प्रबलता बताया। तात्पर्य यह निकला कि साधकको इन दोनोंका संयमन करना चाहिये, तभी वह संयमी बन सकता है।
२—मात्रा स्वस्वा दुहिता वा न विविक्षासन्तो भवेत्। बलवान्जित्त्रियग्रामो विद्वान्समपि कर्षति ॥ (मनु २। २१५) ‘मनुष्यको चाहिये कि वह माता, बहन अथवा पुत्रीके साथ भी एकात्म्य न बैठे; क्योंकि बलवान् इन्द्रियसमूह विद्वान्को भी अपने वशमें कर लेता है।’
१५०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
करा देता है। अतः साधक इन्द्रियोंका संयमन करनेमें कभी अपने बलका अभिमान न करे उसमें अपने उद्योगको कारण न माने, प्रत्युत केवल भगवत्कृपाको ही कारण माने कि मेरेको इन्द्रियोंके संयमनमें जो सफलता मिली है, वह केवल भगवान्की कृपासे ही मिली है। इस प्रकार केवल भगवान्के परायण होनेसे उसका साधन सिद्ध हो जाता है।
यहाँ ‘मत्परः’ कहनेका मतलब है कि मानवशरीरका मिलना, साधनमें रुचि होना, साधनमें लगना, साधनका सिद्ध होना—ये सभी भगवान्की कृपापर ही निर्भर हैं। परन्तु अभिमानके कारण मनुष्यका इस तरफ ध्यान कम जाता है। कर्मयोगीमें तो कर्म करनेकी ही प्रधानता रहती है और उसमें वह अपना ही पुरुषार्थ मानता रहता है। अतः भगवान् विशेष कृपा करके कर्मयोगी साधकके लिये भी अपने परायण होनेकी बात कह रहे हैं।
भगवान्के परायण होनेका तात्पर्य है—केवल भगवान्में ही महत्त्वबुद्धि हो कि भगवान् ही मेरे हैं और मैं भगवान्का हूँ; संसार मेरा नहीं है और मैं संसारका नहीं हूँ। कारण कि भगवान् ही हरदम मेरे साथ रहते हैं; संसार मेरे साथ रहता ही नहीं। इस प्रकार साधकका ‘मैं-पन’ केवल भगवान्में ही लगा रहे।
परिशिष्ट भाव —कर्मयोगके साधकके लिये भी भगवान्ने ‘मत्परः’ पदसे अपने परायण होनेकी बात कही है, यह भक्तिकी विशेषता है! कारण कि भगवान्के परायण हुए बिना इन्द्रियोंका सर्वथा वशमें होना कठिन है।
कर्मयोगमें त्याग है और त्यागसे शान्ति, सुख मिलता है। परन्तु यह प्राप्तिका सुख नहीं है, प्रत्युत दुःख (अशान्ति) मिटनेका सुख है, जबकि भक्तिमें प्राप्तिका सुख मिलता है। अतः भक्तिका (प्रेमका) सुख मिले बिना इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें नहीं होतीं। दूसरी बात, कर्मयोगमें तो अत्यन्त वैराग्य होनेपर इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, पर भक्तिमें (भगवान्के परायण होनेसे) थोड़े वैराग्यसे भी इन्द्रियाँ सुगमतासे वशमें हो जाती हैं। इसलिये भगवान्ने ‘मत्परः’ पद दिया है।
सम्बन्ध—भगवान्के परायण होनेसे तो इन्द्रियाँ वशमें होकर रसबुद्धि निवृत्त हो ही जायगी, पर भगवान्के परायण न होनेसे क्या होता है—इसपर आगेके दो श्लोक कहते हैं।
ध्यायतो विषयान्युंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्समृतिविभ्रमः।
समृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥
| विषयान् | = विषयोंका | तेषु | = उन विषयोंमें | सङ्गात् | = आसक्तिसे |
|---|---|---|---|---|---|
| ध्यायतः | = चिन्तन करनेवाले | सङ्गः | = आसक्ति | कामः | = कामना |
| पुंसः | = मनुष्यकी | उपजायते | = पैदा हो जाती है | सञ्जायते | = पैदा होती है। |
श्लोक ६२-६३ ]
- साधक-संजीवनी *
१५१
| कामात् | = कामनासे (बाधा लगनेपर) | भवति | = हो जाता है। | बुद्धिनाशः | = बुद्धि (विवेक) का नाश हो जाता है। |
|---|---|---|---|---|---|
| क्रोधः | = क्रोध | सम्पोहात् | = सम्पोहसे | बुद्धिनाशात् | = बुद्धिका नाश होनेपर (मनुष्यका) |
| अभिजायते | = पैदा होता है। | स्मृतिविभ्रमः | = स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। | प्रणश्यति | = पतन हो जाता है। |
| क्रोधात् | = क्रोध होनेपर | स्मृतिभ्रंशात् | = स्मृति भ्रष्ट होनेपर | ||
| सम्पोहः | = सम्पोह |
व्याख्या—‘ध्यायतो विषयान्युसः सङ्गस्तेषूपजायते’— भगवान्के परायण न होनेसे, भगवान्का चिन्तन न होनेसे विषयोंका ही चिन्तन होता है। कारण कि जीवके एक तरफ परमात्मा हैं और एक तरफ संसार है। जब वह परमात्माका आश्रय छोड़ देता है, तब वह संसारका आश्रय लेकर संसारका ही चिन्तन करता है; क्योंकि संसारके सिवाय चिन्तनका कोई दूसरा विषय रहता ही नहीं। इस तरह चिन्तन करते-करते मनुष्यको उन विषयोंमें आसक्ति, राग, प्रियता पैदा हो जाती है। आसक्ति पैदा होनेसे मनुष्य उन विषयोंका सेवन करता है। विषयोंका सेवन चाहे मानसिक हो, चाहे शारीरिक हो, उससे जो सुख होता है, उससे विषयोंमें प्रियता पैदा होती है। प्रियतासे उस विषयका बार-बार चिन्तन होने लगता है। अब उस विषयका सेवन करे, चाहे न करे, पर विषयोंमें राग पैदा हो ही जाता है—यह नियम है।
‘संगतंजायते कामः’— विषयोंमें राग पैदा होनेपर उन विषयोंको (भोगोंको) प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है कि वे भोग, वस्तुएँ मेरेको मिलें।
‘कामाल्क्रोधोऽभिजायते’— कामनाके अनुकूल पदार्थकिल मिलते रहनेसे ‘लोभ’ पैदा हो जाता है और कामनापूर्तिकी सम्भावना हो रही है, पर उसमें कोई बाधा देता है, तो उसपर ‘क्रोध’ आ जाता है।
कामना एक ऐसी चीज है, जिसमें बाधा पड़नेपर क्रोध पैदा हो ही जाता है। वर्ण, आश्रम, गुण, योग्यता आदिको लेकर अपनेमें जो अच्छाईका अभिमान रहता है, उस अभिमानमें भी अपने आदर, सम्मान आदिकी कामना रहती है; उस कामनामें किसी व्यक्तिके द्वारा बाधा पड़नेपर भी क्रोध पैदा हो जाता है।
‘कामना’ रजोगुणी वृत्ति है, ‘सम्पोह’ तमोगुणी वृत्ति है और ‘क्रोध’ रजोगुण तथा तमोगुणके बीचकी वृत्ति है।
कहीं भी किसी भी बातको लेकर क्रोध आता है, तो उसके मूलमें कहीं-न-कहीं राग अवश्य होता है। जैसे, नीति-न्यायसे विरुद्ध काम करनेवालेको देखकर क्रोध आता है, तो नीति-न्यायमें राग है। अपमान-तिरस्कार
करनेवालेपर क्रोध आता है, तो मान-सत्कारमें राग है। निन्दा करनेवालेपर क्रोध आता है, तो प्रशंसामें राग है। दोषारोपण करनेवालेपर क्रोध आता है, तो निर्दोषताके अभिमानमें राग है; आदि-आदि।
‘क्रोधाद्भवति सम्पोहः’— क्रोधसे सम्पोह होता है अर्थात् मूढ़ता छा जाती है। वास्तवमें देखा जाय तो काम, क्रोध, लोभ और ममता— इन चारोंसे ही सम्पोह होता है; जैसे—
(१) कामसे जो सम्पोह होता है, उसमें विवेकशक्ति ढक जानेसे मनुष्य कामके वशीभूत होकर न करनेलायक कार्य भी कर बैठता है।
(२) क्रोधसे जो सम्पोह होता है, उसमें मनुष्य अपने मित्रों तथा पूज्यजनोंको भी उलटी-सीधी बातें कह बैठता है और न करनेलायक बर्ताव भी कर बैठता है।
(३) लोभसे जो सम्पोह होता है, उसमें मनुष्यको सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म आदिका विचार नहीं रहता और वह कपट करके लोगोंको ठग लेता है।
(४) ममतासे जो सम्पोह होता है, उसमें समभाव नहीं रहता, प्रत्युत पक्षपात पैदा हो जाता है।
अगर काम, क्रोध, लोभ और ममता—इन चारोंसे ही सम्पोह होता है, तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधका ही नाम क्यों लिया ? इसमें गहराईसे देखा जाय तो काम, लोभ और ममता—इनमें तो अपने सुखभोग और स्वार्थकी वृत्ति जाग्रत् रहती है, पर क्रोधमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी वृत्ति जाग्रत् रहती है। अतः क्रोधसे जो सम्पोह होता है, वह काम, लोभ और ममतासे पैदा हुए सम्पोहसे भी भयंकर होता है। इस दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधसे ही सम्पोह होना बताया है।
‘सम्पोहात्स्मृतिविभ्रमः’— मूढ़ता छा जानेसे स्मृति नष्ट हो जाती है अर्थात् शास्त्रोंसे, सद्विचारोंसे जो निश्चय किया था कि ‘अपनेको ऐसा काम करना है, ऐसा साधन करना है, अपना उद्धार करना है’ उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है, उसकी याद नहीं रहती।
श्रीमद्भगवद्गीता
‘स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाश:’—स्मृति नष्ट होनेपर बुद्धिमें प्रकट होनेवाला विवेक लुप्त हो जाता है अर्थात् मनुष्यमें नया विचार करनेकी शक्ति नहीं रहती।
‘बुद्धिनाशात्प्रणश्यति’—विवेक लुप्त हो जानेसे मनुष्य अपनी स्थितिसे गिर जाता है। अतः इस पतनसे बचनेके लिये सभी साधकोंको भगवान्के परायण होनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।
यहाँ विषयोंका ध्यान करनेमात्रसे राग, रागसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे सम्मोह, सम्मोहसे स्मृतिनाश, स्मृतिनाशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन—यह जो क्रम बताया है, इसका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है, पर इन सभी वृत्तियोंके पैदा होनेमें और उससे मनुष्यका पतन होनेमें देरी नहीं लगती। बिजलीके करंटकी तरह ये सभी वृत्तियाँ तत्काल पैदा होकर मनुष्यका पतन करा देती हैं।
सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें ‘स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है?’—इस चौथे प्रश्नका उत्तर देते हैं।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥ प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥
तु = परन्तु विधेयात्मा = वशीभूत अन्तःकरणवाला (कर्मयोगी साधक) रागद्वेषवियुक्तैः = राग-द्वेषसे रहित आत्मवश्यैः = अपने वशमें की हुई इन्द्रियैः = इन्द्रियोंके द्वारा विषयान् = विषयोंका चरन् = सेवन करता हुआ प्रसादम् = (अन्तःकरणकी) निर्मलताको अधिगच्छति = प्राप्त हो जाता है। प्रसादे = (अन्तःकरणकी) निर्मलता प्राप्त होनेपर अस्य = साधकके सर्वदुःखानाम् = सम्पूर्ण दुःखोंका हानिः = नाश उपजायते = हो जाता है (और ऐसे) प्रसन्नचेतसः = शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धिः = बुद्धि हि = निःसन्देह आशु = बहुत जल्दी पर्यवतिष्ठते = (परमात्मामें) स्थिर हो जाती है।
व्याख्या—‘तु’—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि आसक्ति रहते हुए विषयोंका चिन्तन करनेमात्रसे पतन हो जाता है और यहाँ कहते हैं कि आसक्ति न रहनेपर विषयोंका सेवन करनेसे उत्थान हो जाता है। वहाँ तो बुद्धिका नाश बताया और यहाँ बुद्धिका परमात्मामें स्थित होना बताया। इस प्रकार पहले कहे गये विषयसे यहाँके विषयका अन्तर बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद आया है।
‘विधेयात्मा’—साधकका अन्तःकरण अपने वशमें रहना चाहिये। अन्तःकरणको वशीभूत किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि नहीं होती, प्रत्युत कर्म करते हुए विषयोंमें राग होनेकी और पतन होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो अन्तःकरणको अपने वशमें रखना हरेक साधकके लिये आवश्यक है। कर्मयोगीके लिये तो इसकी विशेष आवश्यकता है।
‘आत्मवश्यैः रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः’—जैसे ‘विधेयात्मा’ पद अन्तःकरणको वशमें करनेके अर्थमें आया है, ऐसे ही ‘आत्मवश्यैः’ पद इन्द्रियोंको वशमें करनेके अर्थमें आया है। तात्पर्य है कि व्यवहार करते समय इन्द्रियाँ अपने वशीभूत होनी चाहिये और इन्द्रियाँ वशीभूत होनेके लिये इन्द्रियोंका राग-द्वेषरहित होना जरूरी है। अतः इन्द्रियोंसे किसी विषयका ग्रहण रागपूर्वक न हो और किसी विषयका त्याग द्वेषपूर्वक न हो। कारण कि विषयोंके ग्रहण और त्यागका इतना महत्त्व नहीं है, जितना महत्त्व इन्द्रियोंमें राग और द्वेष न होने देनेका है। इसीलिये तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने साधकके लिये सावधानी बतायी है कि ‘प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष रहते हैं। साधक इनके वशीभूत न हो; क्योंकि ये दोनों ही साधकके शत्रु हैं।’ पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि ‘जो साधक राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है, वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है।’
श्लोक ६४-६५ ]
- साधक-संजीवनी *
१५३
‘विषयान् चरन्’—जिसका अन्तःकरण अपने वशमें है और जिसकी इन्द्रियाँ राग-द्वेषसे रहित तथा अपने वशमें की हुई हैं, ऐसा साधक इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन अर्थात् सब प्रकारका व्यवहार तो करता है, पर विषयोंका भोग नहीं करता। भोगबुद्धिसे किया हुआ विषय-सेवन ही पतनका कारण होता है। इस भोगबुद्धिका निषेध करनेके लिये ही यहाँ ‘विधेयात्मा’, ‘आत्मवश्यैः’ आदि पद आये हैं।
‘प्रसादमधिगच्छति’—राग-द्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन करनेसे साधक अन्तःकरणकी प्रसन्नता-(स्वच्छता-)को प्राप्त होता है। यह प्रसन्नता मानसिक तप है (गीता—सत्रहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक), जो शारीरिक और वाचिक तपसे ऊँचा है। अतः साधकको न तो रागपूर्वक विषयोंका सेवन करना चाहिये और न द्वेषपूर्वक विषयोंका त्याग करना चाहिये; क्योंकि राग और द्वेष—इन दोनोंसे ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है।
राग-द्वेषसे रहित इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन करनेसे जो प्रसन्नता होती है, उसका अगर संग न किया जाय, भोग न किया जाय, तो वह प्रसन्नता परमात्माकी प्राप्ति करा देती है।
‘प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते’—चित्तकी प्रसन्नता (स्वच्छता) प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है अर्थात् कोई भी दुःख नहीं रहता। कारण कि राग होनेसे ही चित्तमें खिन्नता होती है। खिन्नता होते ही कामना पैदा हो जाती है और कामनासे ही सब दुःख पैदा होते हैं। परन्तु जब राग मिट जाता है, तब चित्तमें प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नतासे सम्पूर्ण दुःख मिट जाते हैं।
जितने भी दुःख हैं, वे सब-के-सब प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीर-संसारके सम्बन्धसे ही होते हैं और शरीर-संसारसे सम्बन्ध होता है सुखकी लिप्सासे। सुखकी लिप्सा होती है खिन्नतासे। परन्तु जब प्रसन्नता होती है, तब खिन्नता मिट जाती है। खिन्नता मिटनेपर सुखकी लिप्सा नहीं रहती। सुखकी लिप्सा न रहनेसे शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है—‘सर्वदुःखानां हानिः।’
तात्पर्य है कि प्रसन्नतासे दो बातें होती हैं—संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद और परमात्मामें बुद्धिकी स्थिरता। यही बात भगवान्ने पहले तिरपनवें श्लोकमें ‘निश्चत्ता’ और ‘अचत्ता’ पदोंसे कही है कि उसकी बुद्धि संसारमें निश्चल और परमात्मामें अचल हो जाती है।
यहाँ ‘सर्वदुःखानां हानिः’ का तात्पर्य यह नहीं है कि उसके सामने दुःखदायी परिस्थिति आयेगी ही नहीं, प्रत्युत इसका तात्पर्य यह है कि कर्मोंके अनुसार उसके सामने दुःखदायी घटना, परिस्थिति आ सकती है; परन्तु उसके अन्तःकरणमें दुःख, सन्ताप, हलचल आदि विकृति नहीं हो सकती।
‘प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते’—प्रसन्न (स्वच्छ) चित्तवालेकी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है अर्थात् साधक स्वयं परमात्मामें स्थिर हो जाता है, उसकी बुद्धिमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता।
मार्मिक बात
भगवद्विषयक प्रसन्नता हो अथवा व्याकुलता हो—इन दोनोंमेंसे कोई एक भी अगर अधिक बढ़ जाती है, तो वह शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। जैसे, भगवान्के पास जाती हुई गोपियोंको माता-पिता, भाई, पति आदिने रोक दिया, मकानमें बंद कर दिया, तो उन गोपियोंमें भगवान्से मिलनेकी जो व्याकुलता हुई, उससे उनके रजोगुण-तमोगुण नष्ट हो गये और भगवान्का चिन्तन करनेसे जो प्रसन्नता हुई, उससे उनका सत्त्वगुण नष्ट हो गया। इस प्रकार गुणसंगसे रहित होकर वे शरीरको वहीं छोड़कर सबसे पहले भगवान्से जा मिलीं*। परन्तु सांसारिक विषयोंको लेकर जो प्रसन्नता और खिन्नता होती है, उन दोनोंमें ही भोगोंके संस्कार दृढ़ होते हैं अर्थात् संसारका बन्धन दृढ़ होता है। इसके उदाहरण संसारमात्रके सामान्य प्राणी हैं, जो प्रसन्नता और खिन्नताको लेकर संसारमें फँसे हुए हैं।
प्रसन्नता और व्याकुलता-(खिन्नता-) में अन्तःकरण द्रवित हो जाता है। जैसे द्रवित मोममें रंग डालनेसे मोममें वह रंग स्थायी हो जाता है, ऐसे ही अन्तःकरण द्रवित
- अन्तर्गृह्णातः काश्चिद् गोप्योऽलब्धविनिर्गमाः। कृष्णं तद्भावनायुक्ता दध्यूर्मीलितलोचनाः॥ दुःसहप्रेच्छविरहतीव्रतापधुताशुभाः। ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्वृत्या क्षीणमङ्गलाः॥ तमेव परमात्मानं जारबुद्ध्यापि सङ्गताः। जहर्गुणमयं देहं सद्यः प्रक्षीणबन्धनाः॥
( श्रीमद्भागवतम् १०।२१।१-११ )
(—इन श्लोकोंकी विस्तृत व्याख्याके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकके अन्तर्गत ‘अलौकिक प्रेम’ लेख पढ़ना चाहिये।)
१५४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
होनेपर उसमें भगवत्सम्बन्धी अथवा सांसारिक—जो भी भाव आते हैं, वे स्थायी हो जाते हैं। स्थायी होनेपर वे भाव उत्थान अथवा पतन करनेवाले हो जाते हैं। अतः साधकके
लिये उचित है कि संसारकी प्रिय-से-प्रिय वस्तु मिलनेपर भी प्रसन्न न हो और अप्रिय-से-अप्रिय वस्तु मिलनेपर भी उद्विग्न न हो।
परिशिष्ट भाव —एक विभाग भोगका है और एक विभाग योगका है। राग-द्वेषसे युक्त 'भोगी' मनुष्य अगर विषयोंका चिन्तन भी करे तो उसका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। परन्तु राग-द्वेषसे रहित 'योगी' मनुष्य अगर विषयोंका सेवन भी करे तो उसका पतन नहीं होता, प्रत्युत वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है।
राग-द्वेषसे रहित मनुष्य भोगबुद्धिसे विषयोंका सेवन नहीं करता अर्थात् भोगजन्म सुख (रस) नहीं लेता; क्योंकि यह उसका ध्येय नहीं है। वह भोगोंको रागपूर्वक न भोगकर त्यागपूर्वक भोगता है (गीता—तीसरे अध्यायका चौंतीसवाँ श्लोक)। इसलिये उसका अन्तःकरण निर्मल हो जाता है। त्यागपूर्वक भोग वास्तवमें भोग है ही नहीं। लोगोंकी दृष्टिमें उसके द्वारा भोगका आचरण दीखता है, इसीलिये यहाँ 'विषयान् चरन्' पद आये हैं।
राग-द्वेषसे रहित होनेपर 'प्रसाद' की प्राप्ति होती है। हृदय प्रसन्नता रहे, कभी खिन्नता न आये, नीरसता न आये—यह 'प्रसाद' है। इस प्रसादकी प्राप्तिमें भी सन्तोष न करे, इसका उपभोग न करे तो बहुत जल्दी परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें जो बात कही है, उसीको आगेके दो श्लोकोंमें व्यतिरेक रीतिसे पृष्ट करते हैं।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥
अयुक्तस्य | = जिसके मन- इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी | अयुक्तस्य | = (व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे) उस अयुक्त मनुष्यमें | होनेसे (उसको) ---|---|---|---|--- बुद्धिः | = (व्यवसायात्मिका) बुद्धि | भावना | = निष्कामभाव अथवा कर्तव्य- परायणताका भाव | शान्तिः | = शान्ति न | = नहीं | न | = नहीं होता। | न | = नहीं मिलती। अस्ति | = होती | अभावयतः | = निष्कामभाव न | च | = फिर च | = और | | | अशान्तस्य | = शान्तिरहित मनुष्यको | | | | सुखम् | = सुख | | | | कुतः | = कैसे (मिल सकता है) ?
व्याख्या —[यहाँ कर्मयोगका विषय है। कर्मयोगमें मन और इन्द्रियोंका संयम करना मुख्य होता है। विवेकपूर्वक संयम किये बिना कामना नष्ट नहीं होती। कामनाके नष्ट हुए बिना बुद्धिकी स्थिरता नहीं होती। अतः कर्मयोगी साधकको पहले मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये। परन्तु जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, उसकी बात इस श्लोकमें कहते हैं।]
'नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य '—जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे अयुक्त (असंयमी) पुरुषकी 'मेरेको केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है—ऐसी एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती'। कारण कि मन और इन्द्रियाँ संयमित न होनेसे वह उत्पत्ति-विनाशशील सांसारिक भोगों और संप्रहमें ही लगा रहता है। वह कभी मान चाहता है, कभी सुख-आराम चाहता है, कभी धन चाहता है, कभी भोग चाहता
- अहंता ('मैं'-पन) का परिवर्तन हुए बिना इन्द्रियाँ वशमें नहीं होतीं और इन्द्रियोंको वशमें किये बिना एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती। यदि अहंताका परिवर्तन हो जाय कि 'मैं साधक हूँ और साधन करना ही मेरा काम है' तो मन-इन्द्रियाँ अपने-आप वशमें हो जाती हैं, उनको वशमें करना नहीं पड़ता।
श्लोक ६७ ]
- साधक-संजीवनी *
१५५
है—इस प्रकार उसके भीतर अनेक तरहकी कामनाएँ होती रहती हैं। इसलिये उसकी बुद्धि एक निश्चयवाली नहीं होती। ‘न चायुक्तस्य भावना’ —जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका नहीं होती, उसकी ‘मेरेको तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है और फलकी इच्छा, कामना, आसक्ति आदिका त्याग करना है’—ऐसी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेमें कारण है—अपना ध्येय स्थिर न होना। ‘न चाभावयतः शान्तिः’ —जो अपने कर्तव्यके परायण नहीं रहता, उसको शान्ति नहीं मिल सकती। जैसे
साधु, शिक्षक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि यदि अपने-अपने कर्तव्यमें तत्पर नहीं रहते, तो उनको शान्ति नहीं मिलती। कारण कि अपने कर्तव्यके पालनमें दृढ़ता न रहनेसे ही अशान्ति पैदा होती है। ‘अशान्तस्य कुतः सुखम्’ —जो अशान्त है, वह सुखी कैसे हो सकता है ? कारण कि उसके हृदयमें हरदम हलचल होती रहती है। बाहरसे उसको कितने ही अनुकूल भोग आदि मिल जायें तो भी उसके हृदयकी हलचल नहीं मित सकती अर्थात् वह सुखी नहीं हो सकता।
सम्बन्ध—अयुक्त पुरुषकी बुद्धि एक निश्चयवाली क्यों नहीं होती—इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥
हि = कारण कि चरताम् = (अपने-अपने विषयोंमें) विचरती हुई इन्द्रियाणाम् = इन्द्रियोंमेंसे (एक ही इन्द्रिय)
यत् = जिस मनः = मनको अनुविधीयते = अपना अनुगामी बना लेती है, तत् = वह (अकेला मन)
अम्भसि = जलमें नावम् = नौकाको वायुः = वायुकी इव = तरह अस्य = इसकी प्रज्ञाम् = बुद्धिको हरति = हर लेता है।
व्याख्या —[मनुष्यको यह जन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः मुझे तो केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है, चाहे जो हो जाय—ऐसा अपना ध्येय दृढ़ होना चाहिये। ध्येय दृढ़ होनेसे साधककी अहंतामेंसे भोगोंका महत्त्व हट जाता है। महत्त्व हट जानेसे व्यवसायात्मिका बुद्धि दृढ़ हो जाती है। परन्तु जबतक व्यवसायात्मिका बुद्धि दृढ़ नहीं होती, तबतक उसकी क्या दशा होती है—इसका वर्णन यहाँ कर रहे हैं।]
‘इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते’ —जब साधक कार्यक्षेत्रमें सब तरहका व्यवहार करता है, तब इन्द्रियोंके सामने अपने-अपने विषय आ ही जाते हैं।
उनमेंसे जिस इन्द्रियका अपने विषयमें राग हो जाता है, वह इन्द्रिय मनको अपना अनुगामी बना लेती है, मनको अपने साथ कर लेती है। अतः मन उस विषयका सुखभोग करने लग जाता है अर्थात् मनमें सुखबुद्धि, भोगबुद्धि पैदा हो जाती है; मनमें उस विषयका रंग चढ़ जाता है, उसका महत्त्व बैठ जाता है। जैसे, भोजन करते समय किसी पदार्थका स्वाद आता है तो रसनेन्द्रिय उसमें आसक्त हो जाती है। आसक्त होनेपर रसनेन्द्रिय मनको भी खींच लेती है, तो मन उस स्वादमें प्रसन्न हो जाता है, राजी हो जाता है।
‘तदस्य हरति प्रज्ञाम्’ —जब मनमें विषयका महत्त्व बैठ जाता है, तब वह अकेला मन ही साधककी बुद्धिको हर
- इस श्लोकके पूर्वार्धमें कर्मकर्तृ-प्रयोग करनेके पहले कर्तृवाच्य था अर्थात् ‘चरताम् इन्द्रियाणाम् इन्द्रियम् यत् मनः अनुविदधाति’ ऐसा वाक्य था। इस वाक्यमें इन्द्रिय कर्ता थी और मन कर्म था। परन्तु जब वाक्यको सरल बनानेके लिये ‘कर्मकर्तृ’ का प्रयोग किया जाता है अर्थात् कर्मको कर्ता बनाया जाता है, तब वहाँ उस कर्ताको कर्मबद्धाव किया जाता है। इससे कर्मको लेकर जो कार्य होते हैं, वे सभी कार्य कर्ताको लेकर हो जाते हैं। यहाँ मनकी मुख्यता दिखानेके लिये अर्थात् इन्द्रियोंके बिना मन ही सब कुछ करता है—यह दिखानेके लिये कर्मरूप मनको कर्ता बना दिया गया है। मन प्रथम पुरुष होनेसे प्रथम पुरुष ‘अनुविधीयते’ क्रियाका प्रयोग हुआ है। अब जो कर्तृवाच्यका कर्ता इन्द्रिय थी, उसकी आवश्यकता न होनेसे वह कर्ता हट गया, तो पूरा वाक्य बना—‘इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते’ जो कि उपर्युक्त श्लोकमें है। इस कर्मकर्तृका प्रयोग करनेका तात्पर्य यह हुआ कि इन्द्रियाँ जिन विषयोंमें विचरती हैं, उन विषयोंमेंसे मन जिस किसी विषयमें खिंच जाता है, रस लेने लग जाता है, वह अकेला मन ही बुद्धिको हर लेता है अर्थात् मनमें विषयभोगकी प्रधानता हो जाती है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
लेता है अर्थात् साधकमें कर्तव्य-परायणता न रहकर भोगबुद्धि पैदा हो जाती है। वह भोगबुद्धि होनेसे साधकमें 'मुझे परमात्माकी ही प्राप्ति करनी है'—यह व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं रहती। इस तरहका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है, पर बुद्धि विचलित होनेमें देरी नहीं लगती अर्थात् जहाँ इन्द्रियने मनको अपना अनुगामी बनाया कि मनमें भोगबुद्धि पैदा हो जाती है और उसी समय बुद्धि मारी जाती है।
'वायुनोवमिवाभ्मसि' —वह बुद्धि किस तरह हर ली जाती है—इसको दृष्टान्तरूपसे समझाते हैं कि जलमें चलती हुई नौकाको वायु जैसे हर लेती है, ऐसे ही मन बुद्धिको हर लेता है। जैसे, कोई मनुष्य नौकाके द्वारा नदी या समुद्रको पार करते हुए अपने गन्तव्य स्थानको जा रहा है। यदि उस समय नौकाके विपरीत वायु चलती है तो वह वायु उस नौकाको गन्तव्य स्थानसे विपरीत ले जाती है। ऐसे ही साधक व्यवसायात्मिका बुद्धिरूप नौकापर आरूढ़ होकर संसार-सागरको पार करता हुआ परमात्माकी तरफ चलता है, तो एक इन्द्रिय जिस मनको अपना
अनुगामी बनाती है, वह अकेला मन ही बुद्धिरूप नौकाको हर लेता है अर्थात् उसे संसारकी तरफ ले जाता है। इससे साधककी विषयोंमें सुखबुद्धि और उनके उपयोगी पदार्थोंमें महत्त्वबुद्धि हो जाती है।
वायु नौकाको दो तरहसे विचलित करती है—नौकाको पथभ्रष्ट कर देती है अथवा जलमें डुबा देती है। परन्तु कोई चतुर नाविक होता है तो वह वायुको क्रियाको अपने अनुकूल बना लेता है, जिससे वायु नौकाको अपने मार्गसे अलग नहीं ले जा सकती, प्रत्युत उसको गन्तव्य स्थानतक पहुँचानेमें सहायता करती है—ऐसे ही इन्द्रियोंके अनुगामी हुआ मन बुद्धिको दो तरहसे विचलित करता है—परमात्मप्राप्तिके निश्चयको दबाकर भोगबुद्धि पैदा कर देता है अथवा निषिद्ध भोगोंमें लगाकर पतन करा देता है। परन्तु जिसका मन और इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, उसकी बुद्धिको मन विचलित नहीं करता, प्रत्युत परमात्माके पास पहुँचानेमें सहायता करता है (दूसरे अध्यायका चौसठवाँ-पैंसठवाँ श्लोक)।
परिशिष्ट भाव —यहाँ शंका हो सकती है कि प्रस्तुत श्लोकमें आये 'यत्' और 'तत्' पदोंसे इन्द्रियोंको न लेकर मनको क्यों लिया गया है अर्थात् इन्द्रियको बुद्धिका हरण करनेवाली न बताकर मनको बुद्धिका हरण करनेवाला क्यों बताया गया है? इसका समाधान है कि इसी अध्यायके साठवें श्लोकमें इन्द्रियोंको मनका हरण करनेवाली बताया है और तीसरे अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें इन्द्रियोंसे मनको और मनसे बुद्धिको पर (सूक्ष्म, श्रेष्ठ, बलवान्) बताया है। इससे सिद्ध होता है कि इन्द्रियाँ मनका हरण करती हैं और मन बुद्धिका हरण करता है। दूसरी बात, बुद्धिको हरनेके विषयमें मन ही मुख्य है, इन्द्रियाँ नहीं। कारण कि जबतक किसी इन्द्रियके साथ मन नहीं रहता, तबतक उस इन्द्रियको अपने विषयका भी ज्ञान नहीं होता—'अधिष्ठाय मनश्चार्च विषयानुपसेवते ' (गीता १५।१)। श्रीमद्भागवतमें दत्तात्रेयजी महाराज कहते हैं—
तद्वैमात्मन्यवरुद्धचित्तो न वेद किञ्चिद् बहिरन्तरं वा। यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्तमिषौ गतात्मा न ददर्श पाश्वं॥
(श्रीमद्भा० ११।१।१३)
'जिसका चित्त आत्मामें ही निरुद्ध हो जाता है, उसको बाहर-भीतर कहीं किसी पदार्थका भान नहीं होता। मैंने देखा था कि एक बाण बनानेवाला कारीगर बाण बनानेमें इतना तन्मय हो रहा था कि उसके पाससे ही दलबलके साथ राजाकी सवारी निकल गयी और उसको पतातक न चला।'
बाण बनानेवालेकी कर्णेंद्रिय भी थी और उसका विषय शब्द भी था, पर मन उस तरफ न रहनेसे वह सुनायी नहीं दिया। तात्पर्य है कि मन साथ रहनेसे ही इन्द्रियको अपने विषयका ज्ञान होता है। जब मन साथ न रहनेसे इन्द्रियको अपने विषयका भी ज्ञान नहीं होता, फिर वह इन्द्रिय बुद्धिको कैसे हर सकती है? नहीं हर सकती।
सम्बन्ध —अयुक्त पुरुषकी निश्चयात्मिका बुद्धि क्यों नहीं होती, इसका हेतु तो पूर्वश्लोकमें बता दिया। अब जो युक्त होता है, उसकी स्थितिका वर्णन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥
श्लोक ६९ ]
- साधक-संजीवनी *
१५७
| तस्मात् | = इसलिये | इन्द्रियार्थभ्यः | = इन्द्रियोंके | हुई हैं, |
|---|---|---|---|---|
| महाबाहो | = हे महाबाहो ! | विषयोंसे | तस्य | |
| यस्य | = जिस मनुष्यकी | सर्वशः | = सर्वथा | प्रज्ञा |
| इन्द्रियाणि | = इन्द्रियाँ | निगृहीतानि | = वशमें की | प्रतिष्ठिता |
व्याख्या— 'तस्माद्यस्य ..... प्रज्ञा प्रतिष्ठिता'—साठवें श्लोकसे मन और इन्द्रियोंको वशमें करनेका जो विषय चला आ रहा है, उसका उपसंहार करते हुए 'तस्मात्' पदसे कहते हैं कि जिसके मन और इन्द्रियोंमें संसारका आकर्षण नहीं रहा है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।
यहाँ 'सर्वशः' पद देनेका तात्पर्य है कि संसारके साथ व्यवहार करते हुए अथवा एकात्ममें चिन्तन करते हुए—किसी भी अवस्थामें उसकी इन्द्रियाँ भोगोंमें, विषयोंमें प्रवृत्त नहीं होतीं। व्यवहारकालमें कितने ही विषय उसके सम्पर्कमें क्यों न आ जायें, पर वे विषय उसको विचलित नहीं कर सकते। उसका मन भी इन्द्रियके साथ मिलकर उसकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकता। जैसे पहाड़को कोई डिंगा नहीं सकता, ऐसे ही उसकी बुद्धिमें इतनी दृढ़ता आ जाती है कि उसको मन किसी भी अवस्थामें डिंगा नहीं
सकता। कारण कि उसके मनमें विषयोंका महत्त्व नहीं रहा।
'निगृहीतानि' का तात्पर्य है कि इन्द्रियाँ विषयोंसे पूरी तरहसे वशमें की हुई हैं अर्थात् विषयोंमें उनका लेशमात्र भी राग, आसक्ति, खिंचाव नहीं रहा है। जैसे साँपके दाँत निकाल दिये जायें, तो फिर उसमें जहर नहीं रहता। वह किसीको काट भी लेता है तो उसका कोई असर नहीं होता। ऐसे ही इन्द्रियोंको राग-द्वेषसे रहित कर देना ही मानो उनके जहरीले दाँत निकाल देना है। फिर उन इन्द्रियोंमें यह ताकत नहीं रहती कि वे साधकको पतनके मार्गमें ले जायें।
इस श्लोकका तात्पर्य यह है कि साधकको दृढ़तासे यह निश्चय कर लेना चाहिये कि मेरा लक्ष्य परमात्माकी प्राप्ति करना है, भोग भोगना और संग्रह करना मेरा लक्ष्य नहीं है। अगर ऐसी सावधानी साधकमें निरन्तर बनी रहे, तो उसकी बुद्धि स्थिर हो जायगी।
सम्बन्ध—जिसकी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें हैं उसमें और साधारण मनुष्योंमें क्या अन्तर है—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ ६९ ॥
| सर्वभूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंकी | जागर्ति | = जागता है | रहते हैं), |
|---|---|---|---|---|
| या | = जो | (और) | सा | |
| निशा | = रात (परमात्मासे विमुखता) है, | यस्याम् | = जिसमें | मुनेः |
| तस्याम् | = उसमें | भूतानि | = सब प्राणी | पश्यतः |
| संयमी | = संयमी मनुष्य | जाग्रति | = जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे | निशा |
व्याख्या— 'या निशा सर्वभूतानाम्'—जिनकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं हैं, जो भोगोंमें आसक्त हैं, वे सब परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। परमात्मा क्या है? तत्त्वज्ञान क्या है? हम दुःख क्यों पा रहे हैं? सन्ताप-जलन क्यों हो रही है? हम जो कुछ कर रहे हैं, उसका परिणाम क्या होगा?—इस तरफ बिलकुल न देखना ही उनकी रात है, उनके लिये बिलकुल अंधेरा है।
यहाँ 'भूतानाम्' कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पशु-पक्षी आदि दिनभर खाने-पीनेमें ही लगे रहते हैं, ऐसे ही जो मनुष्य रात-दिन खाने-पीनेमें, सुख-आराममें, भोगों
और संग्रहमें, धन कमानेमें ही लगे हुए हैं, उन मनुष्योंकी गणना भी पशु-पक्षी आदिमें ही है। कारण कि परमात्मतत्त्वसे विमुख रहनेमें पशु-पक्षी आदिमें और मनुष्योंमें कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। हाँ, अगर कोई अन्तर है तो वह इतना ही है कि पशु-पक्षी आदिमें विवेक-शक्ति इतनी जाग्रत् नहीं है, इसलिये वे खाने-पीने आदिमें ही लगे रहते हैं और मनुष्योंमें भगवान्की कृपासे वह विवेक-शक्ति जाग्रत् है, जिससे वह अपना कल्याण कर सकता है, प्राणिमात्रकी सेवा कर सकता है, परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है। परन्तु उस
१५८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
विवेक-शक्तिका दुरुपयोग करके मनुष्य पदार्थोंका संग्रह करनेमें एवं उनका भोग करनेमें लग जाते हैं, जिससे वे संसारके लिये पशुओंसे भी अधिक दुःखदायी हो जाते हैं। कारण कि पशु-पक्षी तो बेचारे जितनेसे पेट भर जाय, उतना ही खाते हैं, संग्रह नहीं करते; परन्तु मनुष्यको कहीं भी जो कुछ पदार्थ आदि मिल जाता है, वह उसके काममें आये चाहे न आये, उसका तो वह संग्रह कर ही लेता है और दूसरोंके काममें आनेमें बाधा डाल देता है।
‘तस्यां जागर्ति संयमी’—मनुष्योंकी जो रात है अर्थात् परमात्माकी तरफसे, अपने कल्याणकी तरफसे जो विमुखता है, उसमें संयमी मनुष्य जागता है। जिसने इन्द्रियों और मनको वशमें किया है, जो भोग और संग्रहमें आसक्त नहीं है, जिसका ध्येय केवल परमात्मा है, वह संयमी मनुष्य है। परमात्मतत्वको, अपने स्वरूपको और संसारको यथार्थरूपसे जानना ही उसका रातमें जागना है।
‘यस्यां जागर्ति भूतानि’—जो भोग और संग्रहमें बड़े सावधान रहते हैं, एक-एक पैसेका हिसाब रखते हैं, जमीनके एक-एक इंचका खयाल रखते हैं; जितने रुपये अधिकारमें आ जायें वे चाहे न्यायपूर्वक हों अथवा अन्यायपूर्वक, उसमें वे बड़े खुश होते हैं कि इतनी पूँजी तो हमने ले ही ली है, इतना लाभ तो हमें हो ही गया है—इस तरह वे सांसारिक क्षणभंगुर भोगोंको बटरनेमें और आदर-सत्कार, मान-बड़ाई आदि प्राप्त करनेमें ही लगे रहते हैं, उनमें बड़े सावधान रहते हैं, यही उन लोगोंका जागना है।
‘सा निशा पश्यतो मुनेः’—जिन सांसारिक पदार्थोंका भोग और संग्रह करनेमें मनुष्य अपनेको बड़ा बुद्धिमान्, चतुर मानते हैं और उसीमें राजी होते हैं, संसार और परमात्मतत्वको जाननेवाले मननशील संयमी मनुष्यकी दृष्टिमें वह सब रातके समान है; बिलकुल अंधेरा है। जैसे, बच्चे खेलते हैं तो वे कंकड़-पत्थर, काँचके लाल-पीले टुकड़ोंको लेकर आपसमें लड़ते हैं। अगर वह मिल
परिशिष्ट भाव—सांसारिक मनुष्य रात-दिन भोग और संग्रहमें ही लगे रहते हैं, उनको ही महत्ता देते हैं, सांसारिक कार्योंमें बड़े सावधान और निपुण होते हैं, तरह-तरहके कला-कौशल सीखते हैं, तरह-तरहके आविष्कार करते हैं, लौकिक वस्तुओंकी प्राप्तिमें ही अपनी उन्नति मानते हैं, सांसारिक वस्तुओंकी बड़ी महिमा गाते हैं, सदा जीवित रहकर सुख भोगनेके लिये बड़ी-बड़ी तपस्या करते हैं, देवताओंकी उपासना करते हैं, मन्त्र-जप करते हैं आदि-आदि। परन्तु जीवनमुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष तथा सच्चे साधकोंकी दृष्टिमें वह बिलकुल रात है, अन्धकार है, उसका किंचिन्मात्र भी महत्त्व नहीं है। कारण कि उनकी दृष्टिमें ब्रह्मलोकतक सम्पूर्ण संसार विद्यमान है ही नहीं—‘नासतो विद्यते भावः’ (गीता २।१६), ‘आब्रह्मभुवनल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन’ (गीता ८।१६)।
सांसारिक लोग तो संसारमें ही रचे-पचे रहते हैं और ऐसा मानते हैं कि जो कुछ है, वह यही है—‘नायदस्तीति
जाता है तो राजी होते हैं कि मैंने बहुत बड़ा लाभ उठा लिया और अगर वह नहीं मिलता तो दुःखी हो जाते हैं कि मेरी बड़ी भारी हानि हो गयी। परन्तु जिसके मनमें कंकड़-पत्थर आदिका महत्त्व नहीं है, ऐसा समझदार व्यक्ति समझता है कि इन कंकड़-पत्थरोंके मिलनेसे क्या लाभ हुआ और मिलनेसे क्या हानि हुई ? इन बच्चोंको अगर कंकड़-पत्थर मिल भी जायेंगे, तो ये कबतक उनके साथ रहेंगे ? इसी तरह भोग और संग्रहमें लगे हुए मनुष्य भोगोंके लिये लड़ाई-झगड़ा, झूठ-कपट, बेईमानी आदि करते हैं और उनको प्राप्त करके राजी होते हैं, खुशी मनाते हैं कि हमने बहुत लाभ ले लिया। परन्तु संसारको और परमात्मतत्वको जाननेवाला मननशील संयमी मनुष्य साफ देखता है कि भोग मिल गये, आदर-सत्कार हो गया, सुख-आराम हो गया, खा-पी लिया, खूब शृंगार कर लिया तो क्या हो गया ? इसमें मनुष्योंको क्या मिला ? इनमेंसे इनके साथ क्या चलेगा ? ये कबतक इन भोगोंको साथमें रखेंगे ? इन भोगोंसे होनेवाली वृत्ति कितने दिनतक ठहरेगी ? इस तरह उसकी दृष्टिमें प्राणियोंका जागना रातके समान है।
वह मननशील संयमी मनुष्य परमात्माको, अपने स्वरूपको और संसारके परिणामको तो जानता ही है, वह पदार्थोंको भी अच्छी तरहसे जानता है कि कौन-सा पदार्थ किसके हितमें लग सकता है, इससे दूसरोंको कितना लाभ होगा। वह पदार्थोंका अपनी-अपनी जगह ठीक तरहसे सदुपयोग करता है। उनको दूसरोंकी सेवामें लगाता है।
जैसे नेत्रोंमें दोष होनेपर जब हम आकाशको देखते हैं, तब उसमें जाले-से दीखते हैं और आँखें मीच लेनेपर भी मोर-पंखकी तरह वे जाले दीखते हैं; परन्तु उनके दीखनेपर भी हमारी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि आकाशमें जाले नहीं हैं। ऐसे ही इन्द्रियों और अन्तःकरणके द्वारा संसार दीखनेपर भी मननशील संयमी मनुष्यकी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि वास्तवमें संसार नहीं है, केवल प्रतीतिमात्र है।
श्लोक ७० ]
- साधक-संजीवनी *
१५९
वादिनः (गीता २।४२)। ‘कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः’ (गीता १६।११)। पारमार्थिक विषयमें उनकी बुद्धि जाती ही नहीं। परन्तु पारमार्थिक साधक पारमार्थिक विषयके साथ-साथ संसारको भी जानते हैं, इसलिये उनके लिये ‘पश्यतः’ पद दिया है। संसारी लोग तो केवल रातको ही देखते हैं, दिनको देखते ही नहीं, पर योगी दिनको भी देखता है और रातको भी—यह दोनोंमें फर्क है। उदाहरणार्थ बालकने केवल बालकपना ही देखा है, जवानी नहीं, पर वृद्ध पुरुषने वृद्धावस्थाके साथ-साथ बालकपना भी देखा है और जवानी भी! रुपये रखनेवाला व्यक्ति रुपयोंके त्यागको नहीं जानता, पर रुपयोंका त्याग करनेवाला रुपयोंके संग्रहको भी जानता है और त्यागको भी जानता है। यह सिद्धान्त है कि संसारमें लगा हुआ मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही वह संसारको जान सकता है; क्योंकि वास्तवमें वह संसारसे अलग है। इसी तरह परमात्माके साथ एक होकर ही मनुष्य परमात्माको जान सकता है; क्योंकि वास्तवमें वह परमात्माके साथ एक है।
जो ‘है’ में स्थित है, वह ‘है’ और ‘नहीं’—दोनोंको जानता है, पर जो ‘नहीं’ में स्थित है, वह ‘नहीं’ को भी यथार्थरूपसे अर्थात् ‘नहीं’-रूपसे नहीं जान सकता, फिर वह ‘है’ को कैसे जानेगा ? नहीं जान सकता। उसमें जानेकी सामर्थ्य ही नहीं है। ‘है’ को जाननेवालेका तो ‘नहीं’ को माननेवालेके साथ विरोध नहीं होता, पर ‘नहीं’ को माननेवालेका ‘है’ को जाननेवालेके साथ विरोध होता है।
सम्बन्ध—मननशील संयमी मनुष्यको संसार रातकी तरह दीखता है। इसपर यह प्रश्न उठता है कि क्या वह सांसारिक पदार्थोंके सम्पर्कमें आता ही नहीं? अगर नहीं आता तो उसका जीवन-निर्वाह कैसे होता है? और अगर आता है तो उसकी स्थिति कैसे रहती है? इन बातोंका विवेचन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्भूत।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥ ७० ॥
| यद्भूत | = जैसे | अचलप्रतिष्ठम् | = (समुद्र अपनी मर्यादामें) अचल स्थित रहता है, | ही) | प्रविशन्ति | = प्राप्त होते हैं, |
|---|---|---|---|---|---|---|
| आपः | = (सम्पूर्ण नदियोंका) जल | तद्वत् | = ऐसे ही | सः | = वही मनुष्य | |
| आपूर्यमाणम् | = चारों ओरसे जलद्वारा | सर्वे | = सम्पूर्ण | शान्तिम् | = परमशान्तिको | |
| परिपूर्ण | कामाः | = भोग-पदार्थ | आप्नोति | = प्राप्त होता है, | ||
| समुद्रम् | = समुद्रमें | यम् | = जिस संयमी | कामकामी | = भोगोंकी कामनावाला | |
| प्रविशन्ति | = आकर मिलता है, (पर) | मनुष्यको (विकार उत्पन्न किये बिना | न | = नहीं। |
व्याख्या—‘आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्भूत’ —वर्षाकालमें नदियों और नदोंका जल बहुत बढ़ जाता है, कई नदियोंमें बाढ़ आ जाती है; परन्तु जब वह जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, तब समुद्र बढ़ता नहीं, अपनी मर्यादामें ही रहता है। परन्तु जब गरमीके दिनोंमें नदियों और नदोंका जल बहुत कम हो जाता है, तब समुद्र घटता नहीं। तात्पर्य है कि नदी-नदोंका जल ज्यादा आनेसे अथवा कम आनेसे या न
आनेसे तथा बड़वानल (जलमें पैदा होनेवाली अग्नि) और सूर्यके द्वारा जलका शोषण होनेसे समुद्रमें कोई फर्क नहीं पड़ता, वह बढ़ता-घटता नहीं। उसको नदी-नदोंके जलकी अपेक्षा नहीं रहती। वह तो सदा-सर्वदा ज्यों-का-त्यों ही परिपूर्ण रहता है और अपनी मर्यादाका कभी त्याग नहीं करता।
‘तद्वत्कामा’* यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्ति-माप्नोति’—ऐसे ही संसारके सम्पूर्ण भोग उस परमात्म-
- यहाँ ‘कामाः’ पद कामनाओंका वाचक नहीं है, प्रत्युत जिन पदार्थोंकी कामना की जाती है, उन भोग-पदार्थोंका वाचक है।
१६०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
तत्त्वको जाननेवाले संयमी मनुष्यको प्राप्त होते हैं, उसके सामने आते हैं, पर वे उसके कहे जानेवाले शरीर और अन्तःकरणमें सुख-दुःखरूप विकार पैदा नहीं कर सकते। अतः वह परमात्मतत्त्वके कारणसे है, भोग-पदार्थोंके कारणसे नहीं (गीता—दूसरे अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)।
यहाँ जो समुद्र और नदियोंके जलका दृष्टान्त दिया गया है, वह स्थितप्रज्ञ संयमी मनुष्यके विषयमें पूरा नहीं घटता। कारण कि समुद्र और नदियोंके जलमें तो सजातीयता है अर्थात् जो जल समुद्रमें भरा हुआ है, उसी जातिका जल नद-नदियोंसे आता है और नद-नदियोंसे जो जल आता है, उसी जातिका जल समुद्रमें भरा हुआ है। परन्तु स्थितप्रज्ञ और सांसारिक भोग-पदार्थोंमें इतना फर्क है कि इसको समझानेके लिये रात-दिन, आकाश-पातालका दृष्टान्त भी नहीं बैठ सकता! कारण कि स्थितप्रज्ञ मनुष्य जिस तत्त्वमें स्थित है, वह तत्त्व चेतन है, नित्य है, सत्य
परिशिष्ट भाव —अपनी कामनाके कारण ही यह संसार जड़ दीखता है, वास्तवमें तो यह चिन्मय परमात्मा ही है—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९), ‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९।१९)। अतः जब मनुष्य कामनारहित हो जाता है, तब उससे सभी वस्तुएँ प्रसन्न हो जाती हैं। वस्तुओंके प्रसन्न होनेकी पहचान यह है कि उस निष्काम महापुरुषके पास आवश्यक वस्तुएँ अपने-आप आने लगती हैं। उसके पास आकर सफल होनेके लिये वस्तुएँ लालायित रहती हैं। परन्तु कामना न रहनेके कारण वस्तुओंके प्राप्त होनेपर अथवा न होनेपर भी उसके भीतर कोई विकार (हर्ष आदि) उत्पन्न नहीं होता। उसकी दृष्टिमें वस्तुओंका कोई मूल्य (महत्त्व) है ही नहीं। इसके विपरीत कामनावाले मनुष्यको वस्तुएँ प्राप्त हों अथवा न हों, उसके भीतर सदा अशान्ति बनी रहती है।
सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें ‘स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है?’ इस प्रश्नके उत्तरका उपसंहार करते हैं।
विहाय कामान्यः सर्वाण्युमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥
| यः | = जो | विहाय | = त्याग करके | चरति | = आचरण करता है, |
|---|---|---|---|---|---|
| पुमान् | = मनुष्य | निःस्पृहः | = स्पृहारहित, | सः | = वह |
| सर्वाण् | = सम्पूर्ण | निर्ममः | = ममतरहित (और) | शान्तिम् | = शान्तिको |
| कामान् | = कामनाओंका | निरहङ्कारः | = अहंतरहित होकर | अधिगच्छति | = प्राप्त होता है। |
व्याख्या —‘विहाय कामान्यः सर्वाण्युमांश्चरति निःस्पृहः’—अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम ‘कामना’ है। स्थितप्रज्ञ महापुरुष सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है। कामनाओंका त्याग कर देनेपर भी शरीरके निर्वाहमात्रके लिये देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी जो आवश्यकता दीखती है अर्थात् जीवन-निर्वाहके लिये प्राप्त और अप्राप्त वस्तु आदिकी जो जरूरत दीखती है, उसका
है, असीम है, अनन्त है और सांसारिक भोग-पदार्थ जड़ हैं, अनित्य हैं, असत् हैं, सीमित हैं, अन्तवाले हैं।
दूसरा अन्तर यह है कि समुद्रमें तो नदियोंका जल पहुँचता है, पर स्थितप्रज्ञ जिस तत्त्वमें स्थित है, वहाँ से सांसारिक भोग-पदार्थ पहुँचते ही नहीं, प्रत्युत केवल उसके कहे जानेवाले शरीर अन्तःकरणतक ही पहुँचते हैं। अतः समुद्रका दृष्टान्त केवल उसके कहे जानेवाले शरीर और अन्तःकरणकी स्थितिको बतानेके लिये ही दिया गया है। उसके वास्तविक स्वरूपको बतानेवाला कोई दृष्टान्त नहीं है।
‘न कामकामी’—जिनके मनमें भोग-पदार्थकी कामना है, जो पदार्थोंको ही महत्त्व देते हैं, जिनकी दृष्टि पदार्थोंकी तरफ ही है, उनको कितने ही सांसारिक भोगपदार्थ मिल जायें, तो भी उनकी तृप्ति नहीं हो सकती; उनकी कामना, जलन, सन्ताप नहीं मिट सकते; तो फिर उनको शान्ति कैसे मिल सकती है? कारण कि चेतन स्वरूपकी तृप्ति जड़ पदार्थोंसे हो ही नहीं सकती।
नाम ‘स्पृह’ है। स्थितप्रज्ञ पुरुष इस स्पृहाका भी त्याग कर देता है। कारण कि जिसके लिये शरीर मिला था और जिसकी आवश्यकता थी, उस तत्त्वकी प्राप्ति हो गयी, वह आवश्यकता पूरी हो गयी। अब शरीर रहे चाहे न रहे, शरीर-निर्वाह हो चाहे न हो—इस तरफ वह बेपरवाह रहता है। यही उसका निःस्पृह होना है।
निःस्पृह होनेका अर्थ यह नहीं है कि वह निर्वाहकी
श्लोक ७१ ] * साधक-संजीवनी * १६१
वस्तुओंका सेवन करता ही नहीं। वह निर्वाहकी वस्तुओंका
सेवन भी करता है, पथ्य-कुपथ्यका भी ध्यान रखता है
अर्थात् पहले साधनास्थामें शरीर आदिके साथ जैसा
व्यवहार करता था, वैसा ही व्यवहार अब भी करता है;
परन्तु शरीर बना रहे तो अच्छा है, जीवन-निर्वाहकी वस्तुएँ
मिलती रहें तो अच्छा है—ऐसी उसके भीतर कोई परवाह
नहीं होती।
इसी अध्यायके पचपनवें श्लोकमें 'प्रजहाति यदा
कामान्सर्वान्' पदोंसे कामना-त्यागकी जो बात कही थी,
वही बात यहाँ 'विहाय कामान्यः सर्वान्' पदोंसे कही है।
इसका तात्पर्य है कि कर्मयोगमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग
किये बिना कोई स्थितप्रज्ञ नहीं हो सकता; क्योंकि
कामनाओंके कारण ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ
है। कामनाओंका सर्वथा त्याग करनेपर संसारके साथ
सम्बन्ध रह ही नहीं सकता।
'निर्ममः'—स्थितप्रज्ञ महापुरुष ममताका सर्वथा त्याग
कर देता है। मनुष्य जिन वस्तुओंको अपनी मानता है, वे
वास्तवमें अपनी नहीं हैं, प्रत्युत संसारसे मिली हुई हैं। मिली
हुई वस्तुको अपनी मानना भूल है। यह भूल मिट जानेपर
स्थितप्रज्ञ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, शरीर, इन्द्रियाँ आदिमें
ममतारहित हो जाता है।
'निरहङ्कारः'—यह शरीर मैं ही हूँ—इस तरह शरीरसे
तादात्म्य मानना अहंकार है। स्थितप्रज्ञमें यह अहंकार नहीं
रहता। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सभी किसी
प्रकाशमें दीखते हैं और जो 'मैं'-पन है, उसका भी किसी
प्रकाशमें भान होता है। अतः प्रकाशकी दृष्टिसे शरीर,
इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंता ('मैं'-पन)—ये सभी दृश्य हैं।
द्रष्टा दृश्यसे अलग होता है—यह नियम है। ऐसा अनुभव
हो जानेसे स्थितप्रज्ञ निरहंकार हो जाता है।
'स शान्तिमधिगच्छति'—स्थितप्रज्ञ शान्तिको प्राप्त
होता है। कामना, स्पृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर
शान्ति आकर प्राप्त होती है—ऐसी बात नहीं है, प्रत्युत
शान्ति तो मनुष्यमात्रमें स्वतःसिद्ध है। केवल उत्पन्न एवं
नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे सुख भोगनेकी कामना करनेसे,
उनसे ममताका सम्बन्ध रखनेसे ही अशान्ति होती है। जब
संसारकी कामना, स्पृहा, ममता और अहंता सर्वथा छूट
जाती है, तब स्वतःसिद्ध शान्तिका अनुभव हो जाता है।
इस श्लोकमें कामना, स्पृहा, ममता और अहंता—इन
चारोंमें अहंता ही मुख्य है। कारण कि एक अहंताके
निषेधसे सबका निषेध हो जाता है अर्थात् यदि 'मैं'-पन
ही नहीं रहेगा, तो फिर 'मेरा'-पन कैसे रहेगा और कामना
भी कौन करेगा और किसलिये करेगा?
जब 'निरहङ्कारः' कहनेमात्रसे कामना आदिका त्याग
उसके अन्तर्गत आ जाता था, तो फिर कामना आदिके
त्यागका वर्णन क्यों किया? इसका उत्तर यह है कि कामना,
स्पृहा, ममता और अहंता—इन चारोंमें कामना स्थूल है।
कामनासे सूक्ष्म स्पृहा, स्पृहासे सूक्ष्म ममता और ममतासे
सूक्ष्म अहंता है। अतः साधक पहले कामना, स्पृहा और
ममताका त्याग कर दे तो अहंताका त्याग करना उसके लिये
सुगम हो जायगा।
शास्त्रीय दृष्टिसे पहले कामनाका त्याग, फिर स्पृहा,
ममता और अहंकारका त्याग बताया जाता है। परन्तु
साधककी दृष्टिसे पहले ममताका त्याग, फिर कामना,
स्पृहा और अहंकारका त्याग करना ही ठीक है। ममता
प्राप्त वस्तुकी और कामना अप्राप्त वस्तुकी होती है। सबसे
पहले ममताका त्याग करना सुगम पड़ता है। मनुष्य पहले
ममतासे अर्थात् प्राप्त वस्तुके सम्बन्धसे ही फँसता है। पहले
ममताका त्याग करनेसे निष्काम होनेकी सामर्थ्य आ जाती
है, कामनाका त्याग करनेसे निःस्पृह होनेकी सामर्थ्य आ
जाती है और स्पृहाका त्याग करनेसे निरहंकार होनेकी
सामर्थ्य आ जाती है। शास्त्रीय दृष्टिके अनुसार चलनेसे
मनुष्य पण्डित हो जाता है और साधककी दृष्टिके अनुसार
चलनेसे मनुष्यको अनुभव हो जाता है।
अहंता-ममतासे रहित होनेका उपाय
कर्मयोगकी दृष्टिसे—'मेरा कुछ नहीं है'; क्योंकि मेरा
किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, अवस्था आदिपर
स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं है तो 'मेरेको
कुछ नहीं चाहिये'; क्योंकि अगर शरीर मेरा है तो मेरेको
अन्न, जल, वस्त्र आदिकी आवश्यकता है, पर जब शरीर
मेरा है ही नहीं, तो मेरेको किसीकी कुछ भी आवश्यकता
नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं और मेरेको कुछ नहीं चाहिये,
तो फिर 'मैं' क्या रहा? क्योंकि 'मैं' तो किसी वस्तु,
शरीर, स्थिति आदिको पकड़नेसे ही होता है।
मेरे कहलानेवाले शरीर आदिका संसारके साथ
सर्वथा अभिन्न सम्बन्ध है। इसलिये अपने कहलानेवाले शरीर
आदिसे जो कुछ करना है, वह सब केवल संसारके हितके
लिये ही करना है; क्योंकि मेरेको कुछ चाहिये ही नहीं। ऐसा
भाव होनेपर 'मैं'-का एकदेशीयपना आप-से-आप मिट
१६२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
जाता है और कर्मयोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।
सांख्ययोगकी दृष्टिसे —प्राणिमात्रको 'मैं हूँ' इस प्रकार अपने स्वरूपकी स्वतःसिद्ध सत्ता-(होनापन-) का ज्ञान रहता है। इसमें 'मैं' तो प्रकृतिका अंश है और 'हूँ' सत्ता है। यह 'हूँ' वास्तवमें 'मैं' को लेकर है। अगर 'मैं' न रहे, तो 'हूँ' नहीं रहेगा, प्रत्युत 'है' रहेगा।
'मैं हूँ', 'तू है', 'यह है' और 'वह है'—ये चारों व्यक्ति और देश-कालको लेकर हैं। अगर इन चारोंको अर्थात् व्यक्ति और देश-कालको न पकड़ें तो केवल 'है' ही रहेगा—'है' में ही स्थिति रहेगी। 'है' में स्थिति होनेसे
परिशिष्ट भाव —पहले 'सोऽमृतत्वाय कल्पते' (२।१५) कहकर ज्ञानयोगकी सिद्धि (पूर्णता) बतायी थी, अब 'स शान्तिमधिगच्छति' कहकर कर्मयोगकी सिद्धि बताते हैं। तात्पर्य है कि चिन्मयता (स्वरूप) में स्थिति होनेसे अमृतकी प्राप्ति होती है और जड़ता (अहंता) के त्यागसे शान्तिकी प्राप्ति होती है।
अहंता अपने स्वरूपमें मानी हुई है, वास्तवमें है नहीं। अगर यह वास्तवमें होती तो हम कभी निरहंकार नहीं हो सकते थे और भगवान् भी निरहंकार होनेकी बात नहीं कहते। परन्तु भगवान् 'निरहङ्कारः' कहते हैं, अतः हम अहंकाररहित हो सकते हैं। हमारा अनुभव भी है कि वास्तवमें स्वरूप अहंकाररहित है। सुषुप्तिके समय अहम्के अभावका और स्वयं (अपनी सत्ता) के भावका अनुभव सबको होता है, जिसका स्पष्ट बोध जगनेपर होता है। सुषुप्तिमें अहम् अविद्यामें लीन हो जाता है, पर स्वयं रहता है। इसलिये सुषुप्तिसे जगनेपर (उसकी स्मृतिसे) हम कहते हैं कि 'मैं ऐसे सुखसे सोया कि मेरेको कुछ पता नहीं था।' इस स्मृतिसे सिद्ध होता है कि सुखका अनुभव करनेवाला और 'कुछ पता नहीं था' यह कहनेवाला तो था ही! नहीं तो सुखका अनुभव किसको हुआ और 'कुछ पता नहीं था'—यह बात किसने जानी? अतः 'कुछ पता नहीं था'—यह अहम्का अभाव है और इसका ज्ञान जिसको है, वह अहंरहित स्वरूप है।
एक स्त्रीकी नथ कुर्पमें गिर गयी। उसको निकालनेके लिये एक आदमी कुर्पमें उतरा और जलके भीतर जाकर उस नथको ढूँढने लगा। ढूँढते-ढूँढते वह नथ उसके हाथ लग गयी तो उसको बड़ी प्रसन्नता हुई। परन्तु उस समय वह कुछ बोल नहीं सका; क्योंकि वाणी (अग्नि) और जलका आपसमें विरोध है। अतः जलसे बाहर आनेपर ही वह बोल सका कि 'नथ मिल गयी।' ऐसे ही सुषुप्तिमें अहम्के लीन होनेपर मनुष्य सुखका अनुभव तो करता है, पर उसको व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि बोलनेका साधन नहीं रहा। सुषुप्तिसे जगनेपर ही उसको सुषुप्तिके सुखकी स्मृति होती है। स्मृति अनुभवजन्य होती है—'अनुभवजन्य ज्ञानं स्मृतिः'।
इस प्रकार सुषुप्तिमें अहम्के अभावका अनुभव तो सबको होता है, पर अपने अभावका अनुभव किसीको कभी नहीं होता। अहंकार हमारे बिना नहीं रह सकता, पर हम (स्वयं) अहंकारके बिना रह सकते हैं और रहते ही हैं। हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है। इस नित्य सत्ताको किसीकी अपेक्षा नहीं है, पर सत्ताकी अपेक्षा सबको है। अगर हम अहम्से अलग न होते, अहंकाररूप ही होते तो सुषुप्तिमें अहंकारके लीन होनेपर हम भी नहीं रहते। अतः अहंकारके बिना भी हमारा होनापन सिद्ध होता है। जाग्रत् और स्वप्नमें अहम् प्रकट रहता है और सुषुप्तिमें अहम् लीन हो जाता है, पर हम स्वयं निरन्तर रहते हैं। जो प्रकट और लीन नहीं होता, वही हमारा स्वरूप है।
कामनाका त्याग होनेपर भी शरीरनिर्वाहमात्रके लिये कुछ-न-कुछ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिकी आवश्यकता रह जाती है, जिसको 'सृष्टा' कहते हैं। स्थितप्रज्ञ महापुरुषमें शरीरनिर्वाहमात्रकी आवश्यकताका तो कहना ही क्या, शरीरकी भी आवश्यकता नहीं रहती। कारण कि शरीरकी आवश्यकता ही मनुष्यको पराधीन बनाती है। आवश्यकता तभी पैदा होती है, जब मनुष्य उस वस्तुको स्वीकार कर लेता है, जो अपनी नहीं है। कर्मयोगी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये नहीं मानता, प्रत्युत संसारकी और संसारके लिये ही मानता है। इसलिये उसको किसी भी वस्तुकी आवश्यकता नहीं रहती।
सांख्ययोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।
भक्तियोगकी दृष्टिसे —जिसको 'मैं' और 'मेरा' कहते हैं, वह सब प्रभुका ही है। कारण कि मेरी कहलानेवाली वस्तुपर मेरा किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है; परन्तु प्रभुका उसपर पूरा अधिकार है। वे जिस तरह वस्तुको रखते हैं, जैसा रखना चाहते हैं वैसा ही होता है। अतः यह सब कुछ प्रभुका ही है। इसको प्रभुकी ही सेवामें लगाना है। मेरे पास जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि है, यह भी उन्हींकी है और मैं भी उन्हींका हूँ। ऐसा भाव होनेपर भक्तियोगी अहंता-ममतासे रहित हो जाता है।
श्लोक ७२ ]
- साधक-संजीवनी *
१६३
‘कामना’ और ‘स्मृहा’—दोनोंका त्याग करनेका तात्पर्य है कि वस्तुओंकी कामना भी न हो और निर्वाहमात्रकी कामना (शरीरकी आवश्यकता) भी न हो। कारण कि निर्वाहमात्रकी कामना भी सुखभोग ही है। इतना ही नहीं, शान्ति, मुक्ति, तत्त्वज्ञान आदिको प्राप्त करनेकी इच्छा भी कामना है। अतः निष्कामभावमें मुक्तितककी भी कामना नहीं होनी चाहिये।
इस श्लोकमें अपरा प्रकृतिका निषेध है। जीवने अहंकारके कारण अपरा प्रकृति (जगत्) को धारण किया है—‘ययेदं धारयते जगत्’ (गीता ७।५)। अतः निरहंकार होनेपर अपरा प्रकृतिका निषेध (सम्बन्ध-विच्छेद) हो जाता है और जीव जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जाता है। सबका त्याग होनेपर भी अहंकार शेष रह जाता है, पर अहंकारका त्याग होनेपर सबका त्याग हो जाता है।
सम्बन्ध—कामना, स्मृहा, ममता और अहंतासे रहित होनेपर उसकी क्या स्थिति होती है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हुए इस विषयका उपसंहार करते हैं।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ ७२ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | कोई) | अपि | = भी |
|---|---|---|---|---|
| एषा | = यह | न, विमुह्यति | = मोहित नहीं | स्थित्वा |
| ब्राह्मी | = ब्राह्मी | होता । | (तो) | |
| स्थितिः | = स्थिति है । | अस्याम् | = इस स्थितिमें | ब्रह्मनिर्वाणम् |
| एनाम् | = इसको | (यदि) | ब्रह्मकी | |
| प्राप्य | = प्राप्त होकर (कभी | अन्तकाले | = अन्तकालमें | ऋच्छति |
व्याख्या—‘एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ’— यह ब्राह्मी स्थिति है अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हुए मनुष्यकी स्थिति है। अहंकाररहित होनेसे जब व्यक्तित्व मिट जाता है, तब उसकी स्थिति स्वतः ही ब्रह्ममें होती है। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही व्यक्तित्व था। उस सम्बन्धको सर्वथा छोड़ देनेसे योगीकी अपनी कोई व्यक्तिगत स्थिति नहीं रहती।
अत्यन्त नजदीकका वाचक होनेसे यहाँ ‘एषा’ पद पूर्वश्लोकमें आये ‘विहाय कामान्’, ‘निःस्मृहः’, ‘निर्ममः’ और ‘निरहङ्कारः’ पदोंका लक्ष्य करता है।
भगवान्के मुखसे ‘तेरी बुद्धि जब मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिसे तर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा’—ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि वह स्थिति क्या होगी ? इसपर अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें चार प्रश्न किये। उन चारों प्रश्नोंका उत्तर देकर भगवान्ने यहाँ वह स्थिति बतायी कि वह ब्राह्मी स्थिति है। तात्पर्य है कि वह व्यक्तिगत स्थिति नहीं है अर्थात् उसमें व्यक्तित्व
नहीं रहता। वह नित्ययोगकी प्राप्ति है। उसमें एक ही तत्त्व रहता है। इस विषयकी तरफ लक्ष्य करनेके लिये ही यहाँ ‘पार्थ’ सम्बोधन दिया गया है।
‘नैनां प्राप्य विमुह्यति’— जबतक शरीरमें अहंकार रहता है, तभीतक मोहित होनेकी सम्भावना रहती है। परन्तु जब अहंकारका सर्वथा अभाव होकर ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव हो जाता है, तब व्यक्तित्व टूटनेके कारण फिर कभी मोहित होनेकी सम्भावना नहीं रहती।
सत् और असत्को ठीक तरहसे न जानना ही मोह है। तात्पर्य है कि स्वयं सत् होते हुए भी असत्के साथ अपनी एकता मानते रहना ही मोह है। जब साधक असत्को ठीक तरहसे जान लेता है, तब असत्से उसका सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है* और सत्में अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। इस स्थितिका अनुभव होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता (गीता—चौथे अध्यायका पैंतीसवाँ श्लोक)।
‘स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति’— यह मनुष्य-शरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है।
- असत्को जाननेसे असत्को निवृत्ति हो जाती है; क्योंकि असत्की स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। सत्से ही असत्को सत्ता मिलती है। अगर असत्को जाननेसे असत्की निवृत्ति न हो तो वास्तवमें असत्को जाना ही नहीं है; प्रत्युत सीखा है। सीखे हुए ज्ञानसे असत्की निवृत्ति नहीं होती; क्योंकि मनमें असत्की सत्ता रहती है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
इसलिये भगवान् यह मौका देते हैं कि साधारण-से-साधारण और पापी-से-पापी व्यक्ति ही क्यों न हो, अगर वह अन्तकालमें भी अपनी स्थिति परमात्मामें कर ले अर्थात् जड़तासे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर ले, तो उसे भी निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जायगी, वह जन्म-मरणसे मुक्त हो जायगा। ऐसी ही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कही है कि 'अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ एक भगवान् ही हैं—ऐसा प्रयाणकालमें भी मेरेको जो जान लेते हैं, वे मेरेको यथार्थरूपसे जान लेते हैं अर्थात् मेरेको प्राप्त हो जाते हैं।' आठवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा कि 'अन्तकालमें मेरा स्मरण करता हुआ कोई प्राण छोड़ता है, वह मेरेको ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।'
दूसरी बात, उपर्युक्त पदोंसे भगवान् उस ब्राह्मी स्थितिकी महिमाका वर्णन करते हैं कि इसमें यदि अन्तकालमें भी कोई स्थित हो जाय, तो वह शान्त ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जैसे समबुद्धिके विषयमें भगवान्ने कहा था कि इसका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान महान् भयसे रक्षा कर लेता है (दूसरे अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि अन्तकालमें भी ब्राह्मी स्थिति हो जाय, जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाय, तो निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इस स्थितिका अनुभव होनेमें जड़ताका राग ही बाधक है। यह राग अन्तकालमें भी कोई छोड़ देता है तो उसको अपनी स्वतःसिद्ध वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। यहाँ यह शंका हो सकती है कि जो अनुभव उभ्रभरमें नहीं हुआ, वह अन्तकालमें कैसे होगा? अर्थात् स्वस्थ अवस्थामें तो साधककी बुद्धि स्वस्थ होगी, विचार-शक्ति होगी, सावधानी होगी तो वह ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कर लेगा; परन्तु अन्तकालमें प्राण छूटते समय बुद्धि विकल हो जाती है, सावधानी नहीं रहती—ऐसी अवस्थामें ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कैसे होगा? इसका समाधान यह है कि मृत्युके समयमें जब प्राण छूटते हैं, तब शरीर आदिसे स्वतः ही सम्बन्ध-विच्छेद होता है। यदि उस समय उस स्वतःसिद्ध तत्त्वकी तरफ लक्ष्य हो जाय, तो उसका अनुभव सुगमतासे हो जाता है। कारण कि निर्विकल्प अवस्थाकी प्राप्तिमें तो बुद्धि, विवेक आदिकी आवश्यकता है, पर अवस्थातीत तत्त्वकी प्राप्तिमें केवल लक्ष्यकी आवश्यकता है।* वह लक्ष्य
चाहे पहलेके अभ्याससे हो जाय, चाहे किसी शुभ संस्कारसे हो जाय, चाहे भगवान् या सन्तकी अहेतुकी कृपासे हो जाय, लक्ष्य होनेपर उसकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है।
यहाँ 'अपि' पदका तात्पर्य है कि अन्तकालसे पहले अर्थात् जीवित-अवस्थामें यह स्थिति प्राप्त कर ले तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है; परन्तु अगर अन्तकालमें भी यह स्थिति हो जाय अर्थात् निर्मम-निरहंकार हो जाय तो वह भी मुक्त हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि यह स्थिति तत्काल हो जाती है। स्थितिके लिये अभ्यास करने, ध्यान करने, समाधि लगानेकी किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है।
भगवान्ने यहाँ कर्मयोगके प्रकरणमें 'ब्रह्मनिर्वाणम्' पद दिया है। इसका तात्पर्य है कि जैसे सांख्ययोगीको निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है (गीता—पाँचवें अध्यायके चौबीसवेंसे छठ्ठीसवें श्लोकतक), ऐसे ही कर्मयोगीको भी निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। इसी बातको पाँचवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा है कि सांख्ययोगीद्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है, वही स्थान कर्मयोगीद्वारा भी प्राप्त किया जाता है।
विशेष बात
जड़ और चेतन—ये दो पदार्थ हैं। प्राणिमात्रका स्वरूप चेतन है, पर उसने जड़का संग किया हुआ है। जड़की तरफ आकर्षण होना पतनकी तरफ जाना है और चिन्मय-तत्त्वकी तरफ आकर्षण होना उत्थानकी तरफ जाना है, अपना कल्याण करना है। जड़की तरफ जानेमें 'मोह' की मुख्यता होती है और परमात्मतत्त्वकी तरफ जानेमें 'विवेक' की मुख्यता होती है।
समझनेकी दृष्टिसे मोह और विवेकके दो-दो विभाग कर सकते हैं—(१) अहंता-ममतायुक्त मोह एवं कामनायुक्त मोह, (२) सत्-असत्का विवेक एवं कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक।
प्राप्त वस्तु, शरीरादिमें अहंता-ममता करना—यह अहंता-ममतायुक्त मोह है और अप्राप्त वस्तु, घटना, परिस्थिति आदिकी कामना करना—यह कामनायुक्त मोह है। शरीरी (शरीरमें रहनेवाला) अलग है और शरीर अलग है, शरीरी सत् है और शरीर असत् है, शरीरी चेतन
- निर्विकल्प-अवस्थाकी प्राप्तिमें ही अभ्यास, विचार, निदिध्यासन आदि काम करते हैं, पर निर्विकल्प बोध (अवस्थातीत ब्राह्मी स्थिति) की प्राप्तिमें बुद्धि काम नहीं करती। उसमें बुद्धि छूट जाती है। कारण कि निर्विकल्प बोध करण-निरपेक्ष है अर्थात् उसमें करणकी किंचिन्मात्र भी अपेक्षा नहीं है। उसकी प्राप्तिमें करणसे सम्बन्ध-विच्छेद ही कारण है।