सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
११. १. अग्नि की स्तुति १-१० धन की इच्छा ५ देवताओं की स्तुति ६ देवतागण ७ इंद्र की स्तुति ८-१० २. जाग्रत सोम १-१३ पवित्र सोम २ अभीष्ट साधक सोम ३ यजमानों को संबोधन ४ शत्रुनाशक इंद्र ५ इंद्र की अर्चना ६ विश्व व्याप्त इंद्र ७ सोम की स्तुति ८-१३ ३. प्रसारित सोम १-९ प्रेरक सोम २ दिव्य रूप सोम ३ नरों को संबोधन ४ अग्नि की स्तुति ५-७ सूर्य की स्तुति ८ तेजस्वी सूर्य ९ १२. १. अग्नि उपासना १-१० प्रकाशमान अग्नि २ कल्याणकारी अग्नि ३ शत्रुजित अग्नि ४ अग्नि स्तुति ५-७ सेव्य सोमरस ८ भ्राता समान सोम ९ पोषक सोम १० २. इंद्र की स्तुति १-७ यजमानों को संबोधन ६ सुखकारी सोमरस ७ ३. अग्नि की स्तुति १-९ प्रकाशमान सोम ४ सोम की स्तुति ५-६ इंद्र की स्तुति ७-९ ४. अग्नि की स्तुति १-१० सोम की स्तुति ४-६ इंद्र की स्तुति ७-८ ५. अग्नि की स्तुति १-११ दिव्य सोमरस ४ सर्वश्रेष्ठ सोमरस ५ ebook converter DEMO Watermarks*
बुद्धिमान सोम ६ इन्द्र की स्तुति ७-८ सोम उपासना ९ अमृत ग्राही सोमरस १० अमर सोम ११ ६. सोम की स्तुति १-९ इंद्र की स्तुति ४-९ १३. १. सोम की स्तुति १-९ पवित्र सोम ५ यजमानों को संबोधन ६-८ पुरोहितों को संबोधन ९ २. यजमानों को संबोधन १-९ सोम की स्तुति ४ मन के स्वामी इंद्र ५ धन याचना ६ इंद्र की स्तुति ७-९ ३. प्रजापालक सूर्य १-७ दुष्टनाशक सूर्य २ क्षमतावान सूर्य ३ इंद्र की स्तुति ४-७ ४. सरस्वती की स्तुति १-११ सविता की उपासना ३ ब्रह्मणस्पति की स्तुति ४ अग्नि की स्तुति ५ वरुण की स्तुति ६ सत्यपालक वरुण ७ मित्र की स्तुति ८ अग्निस্বরূপ सूर्य ९ इंद्र की स्तुति १० सूर्य की अभ्यर्थना ११ ५. इंद्र की स्तुति १-९ सोम की स्तुति ३ अग्नि की स्तुति ४-७ बलवान अग्नि ८ सर्वव्यापक ९ ६. देवताओं को संबोधन १-९ सरल सोम २ इंद्र और अग्नि ३ ब्रह्म ४ इंद्र की स्तुति ५-६ इंद्र हेतु सोम ७ ebook converter DEMO Watermarks*
इंद्र की स्तुति ८-९ १४. १. यजमानों को संबोधन १-१४ इंद्र के अश्व २ इंद्र का सोमरस पान ३ इंद्र की स्तुति ४-५ अमृत तुल्य सोमरस ६ भ्राता तुल्य सोम ७ सोम की स्तुति ८ अग्नि की स्तुति ९-१२ कण्व ऋषि १३ इंद्र की स्तुति १४ २. अग्नि की स्तुति १-१० सोम की स्तुति ४-६ यजमानों को संबोधन ७ इंद्र की स्तुति ८-९ ३. यजमानों को संबोधन १-११ होता अग्नि २ पथ प्रदर्शक अग्नि ३ यज्ञ कराने वाले अग्नि ५ अग्नि की स्तुति ६-११ ४. अग्नि की स्तुति १-११ १५. १. अग्नि की स्तुति १-११ २. अग्नि की स्तुति १-१० ३. अग्नि की स्तुति १-८ ४. अग्नि की स्तुति १-९ १६. १. इंद्र की स्तुति १-१२ अग्नि की स्तुति ११-१२ २. वरुण की स्तुति १-८ इंद्र की स्तुति २-५ सोम की स्तुति ६-८ ३. पूषा देव १-१२ मरुद्गणों की स्तुति २-३ स्वर्गलोक ४ देवी ५-६ इंद्र की स्तुति ७-९ गौएं १० सोमरस का विसर्जन ११ यजमानों की याचना १२ ४. इंद्र की स्तुति १-१२ ebook converter DEMO Watermarks*
सोम की स्तुति ७-८ सुख याचना ९ सर्वद्रष्टा इंद्र १० यजमानों को संबोधन ११-१२ १७. १. अग्नि की स्तुति १-११ यजमानों को संबोधन ४ इंद्र की स्तुति ५-६ विष्णु की स्तुति ९-११ २. वायु की स्तुति १-११ इंद्र की स्तुति २-३ सोम की स्तुति ४ मददायी सोमरस ५ सोम की उपासना ६ अग्नि की स्तुति ७-९ विघ्नहारी व रक्षक इंद्र १०-११ ३. यज्ञ १-९ इंद्र प्रशंसा २ सूर्य प्रशंसा ३ इंद्र की स्तुति ४-९ ४. अग्नि का आह्वान १-९ वृत्रासुरहंता इंद्र ५ ओजवान इंद्र ६ इंद्र स्तुति ७-८ यजमानों को संबोधन ९ १८. १. यजमानों को संबोधन १-१२ इंद्र की स्तुति २-७, ११-१२ अग्नि की स्तुति ८-९ २. विष्णु प्रशंसा १-१५ यजमानों को संबोधन ३ विष्णु ४ यजमान ५ प्रतिष्ठा स्थापित करना ६ इंद्र की स्तुति ७-८, १०-११, १४-१५ यजमानों को संबोधन ९ पराक्रमी सोमरस १२ मनोहर सोमरस १३ ३. यजमानों को संबोधन १-१५ इंद्र की स्तुति २-३, १०-१५ ब्राह्मण ५, ७ सोम की स्तुति ६
४. सोम की स्तुति १-१२ इंद्र की स्तुति ४-६ अग्नि की स्तुति ७-१२ १९. १. अग्नि की स्तुति १-१४ सोम की स्तुति ४-७ इंद्र की स्तुति ८-१४ २. सूर्य पुत्री उषा १-१२ उषा स्तुति ४, ७-९ अश्विनीकुमारों की स्तुति ५-६, १०-१२ ३. अग्नि स्तुति १-९ उषा स्तुति ४-६ अश्विनीकुमारों की स्तुति ७-९ ४. अग्नि की स्तुति १-९ उषा की स्तुति ४-५ उषा और रात्रि ६ अग्नि और उषा ७ अश्विनीकुमारों की स्तुति ८-९ ५. उषा की स्तुति १-१० यजमानों को प्रलोभन ३ अग्नि, सूर्य, उषा ४ अश्विनीकुमार ५ अश्विनीकुमारों को संबोधन ६ सोम की स्तुति ७-१० २०. १. सोम की स्तुति १-१५ इंद्र की स्तुति ४-९ अग्नि की स्तुति १०-१५ २. अग्नि की स्तुति १-१० यजमानों को संबोधन ३ इंद्र की स्तुति ४-५ सोम की स्तुति ६-७ सूर्य की स्तुति ९, १० ३. इंद्र की स्तुति १-११ ४. यजमानों को संबोधन १-१२ इंद्र की स्तुति २-८ सोम की स्तुति ९-१२ ५. अग्नि की स्तुति १-९ ६. अग्नि की स्तुति १-१२ जाग्रतों के मित्र सोम ५ जाग्रत अग्नि ६ देवताओं को नमस्कार ७ ebook converter DEMO Watermarks*
गेय ऋचाएं ८ अग्नि की स्तुति ९-१२ ७. इंद्र की स्तुति १-१५ जल की स्तुति ४-६ वायु की स्तुति ७-९ अग्नि की स्तुति १०-११ यजमानों को संबोधन १२ वेन की स्तुति १३-१५ २१. इंद्र की स्तुति १-२७ पाप को संबोधन १३ मनुष्यों को संबोधन १४ अभिमंत्रित बाण १५ देवगणों को संबोधन २६ सर्वदेव उपासना २७
पूर्वाचिक आग्नेय पर्व पहला अध्याय पहला खंड अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये. नि होता सत्सि बर्हिषि.. (१) हे अग्नि! हम सब आप की स्तुति (पूजा) करते हैं. यज्ञ में आप को आमंत्रित करते हैं. आप आ कर कुश (घास) के आसन पर बैठिए. आप हवि (अग्नि में डाली जाने वाली पवित्र चीजें) देवताओं तक पहुंचाइए. (यह माना जाता है कि हम अग्नि में जो पदार्थ डालते हैं, वे अग्नि के द्वारा मंत्र से संबंधित देवता तक पहुंचते हैं). (१) त्वमग्ने यज्ञाना १४ होता विश्वेषा १४ हितः. देवेभिर्मानुषे जने.. (२) हे अग्नि! आप यज्ञों के पुरोहित हैं. आप सब का कल्याण करने वाले हैं. देवताओं ने ही आप को मनुष्यों (जनों) के बीच में स्थापित किया है. (२) अग्निं दूत वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (३) हे अग्नि! आप सब कुछ जानने वाले हैं. आप धन के स्वामी हैं. इस यज्ञ को अच्छी तरह करने के लिए हम आप को दूत मान कर भेज रहे हैं. (हवि अग्नि के माध्यम से संबंधित देवता तक पहुंचती है, इसलिए अग्नि को देवता का दूत माना जाता है). (३) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया. समिद्धः शुक्र आहुतः.. (४) हे अग्नि! आप अपने पूजकों को धन देने वाले हैं. समिधा (जिस से यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित की जाती है) से आप को अच्छी तरह प्रकाशित किया गया है. आप हमारी स्तुति से प्रसन्न होइए. यज्ञ में विघ्न डालने वालों (राक्षसों एवं दुष्ट प्रवृत्तियों) को नष्ट कीजिए. (४) प्रेष्ठं वो अतिथि १४ स्तुषे मित्रमिव प्रियम्. अग्ने रथं न वेद्यम्.. (५) हे अग्नि! आप पूजकों को धन देने वाले हैं. उन्हें मित्र की तरह बहुत प्रिय हैं. मेहमान की तरह पूजा करने योग्य हैं. आप हमारी पूजा से प्रसन्न होइए. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः. उत द्विषो मर्त्यस्य.. (६) हे अग्नि! आप ईर्ष्याद्वेष करने वाले लोगों और दुश्मनों से हमें बचाइए. हे अग्नि! हमें बहुत सुखसंपन्नता प्रदान कीजिए. (६) एह्यू षु ब्रवाणि ते ऽग्न इत्थेतरा गिरः. एभिर्वर्धास इन्दुभिः.. (७) हे अग्नि! आप पधारिए. हम आप के लिए शुद्ध वाणी से मंत्र पढ़ रहे हैं. आप उन्हें सुनिए. सोमरस से आप समृद्ध बनिए. (७) आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्. अग्ने त्वां कामये गिरा.. (८) हे अग्नि! हम आप के पुत्र हैं. मन से आप को आमंत्रित करना चाहते हैं. आप श्रेष्ठ जगह से भी हमारे लिए आइए. हम वाणी (मंत्र पाठ) से आप को भजते हैं. (८) त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत. मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः.. (९) हे अग्नि! आप सर्वश्रेष्ठ और सारे संसार के धारक हैं. अथर्वा (ऋषि) ने कमल के पत्तों पर अरणि (लकड़ी) मथ कर आप को उत्पन्न (प्रकाशित) किया. (९) अग्ने विवस्वदा भरास्मभ्यमूतये महे. देवो ह्यसि नो दृशे.. (१०) हे अग्नि! आप हमारी रक्षा कीजिए. स्वर्ग देने वाले इस काम को सिद्ध करिए (साधिए). आप ही हमें राह दिखाने वाले हैं. (१०) दूसरा खंड नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः. अमैरमित्रमर्दय.. (१) हे अग्नि! बल चाहने वाले मनुष्य आप को नमस्कार करते हैं. मैं भी आप को नमस्कार करता हूं. आप अपने बल से दुश्मनों का नाश कीजिए. (१) दूतं वो विश्ववेदस ᳵ हव्यवाहममर्त्यम्. यजिष्ठमृञ्जसे गिरा.. (२) हे अग्नि! आप ज्ञान के स्वामी हैं. आप हवि को देवताओं तक ले जाने वाले हैं. आप देवताओं के दूत हैं. मैं आप की कृपा पाने के लिए प्रार्थना करता हूं. (२) उप त्वा जामयो गिरो देदिशतीरीहविष्कृतः. वायोरनीके अस्थिरन्.. (३) हे अग्नि! यजमान की वाणी से प्रकट होने वाली श्रेष्ठ स्तुतियां आप का गुणगान कर रही हैं. हम आप को वायु के पास स्थापित करते हैं. (३) उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्धिया वयम्. नमो भरन्त एमसि.. (४) हे अग्नि! हम आप के सच्चे भक्त हैं. दिनरात आप की पूजा करते हैं. दिनरात आप का ebook converter DEMO Watermarks*
गुणगान करते हैं. आप हम पर कृपा करिए. (४) जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय. स्तोम २४ रुद्राय दृशीकम्.. (५) हे अग्नि! हम प्रार्थना कर के आप को आमंत्रित करते हैं. आप हम सब पर कृपा करने के लिए यज्ञ मंडप में आइए. दुष्टों का नाश करने वाले आप को हम सुंदर प्रार्थनाओं से बारबार आमंत्रित कर रहे हैं. (५) प्रति त्यं चारुमध्वरं गोपीथाय प्र हूयसे. मरुद्गिरग्न आ गहि.. (६) हे अग्नि! आप इस उत्तम यज्ञ में सोमपान के लिए बुलाए जाते हैं. आप मरुतों (देवताओं) के साथ आइए. (६) अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः. सम्राजन्तमध्वराणाम्.. (७) हे अग्नि! आप प्रसिद्ध (यज्ञ के) पूंछ वाले घोड़े के समान हैं. आप यज्ञ के रक्षक हैं. हम प्रार्थनाओं से आप की पूजा व नमस्कार कर रहे हैं. अर्थात् जैसे घोड़ा अपनी पूंछ से कष्ट देने वाले मच्छर आदि हटा देता है, वैसे ही आप अपनी लपटों (ज्वालाओं) से हमारे कष्ट दूर कीजिए. (७) और्वभृगुवच्छुचिमप्रवानवदा हुवे. अग्नि २४ समुद्रवाससम्.. (८) हे अग्नि! आप समुद्र में रहने वाले हैं. भृगु और अप्रवान जैसे ऋषियों ने जिस तरह सच्चे मन से आप की प्रार्थना की, उसी तरह हम भी सच्चे मन से आप की प्रार्थना करते हैं. (८) अग्निमिन्धानो मनसा धिय २४ सचेत मर्त्यः. अग्निमिन्धे विवस्वभिः.. (९) हे अग्नि! मनुष्य मन लगा कर आप को तथा अपनी श्रद्धा को जगाता है. सूर्य की किरणों के साथ आप को प्रकाशित करता है. (९) आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिः पश्यन्ति वासरम्. परो यदिध्यते दिवि.. (१०) हे अग्नि! स्वर्गलोक से ऊपर सूर्य रूप में अग्नि प्रकाशित होती है. तभी सब प्राणी उस प्रकाश वाले तेज का दर्शन करते हैं. (१०) तीसरा खंड अग्निं वो वृधन्तमध्वराणां पुरूतमम्. अच्छा नप्त्रे सहस्वते.. (१) हे ऋत्विजो (उपासको)! अग्नि तुम्हारे अहिंसक यज्ञों में सहायक, श्रेष्ठ (उत्तम), सब के हितकारी व बलशाली हैं. तुम ज्वालाओं (लपटों) से बढ़ते हुए अग्नि की सेवा में जाओ. (१) अग्निस्तिग्मेन शोचिषा य २४ सद्विश्वं न्य ३ त्रिणम्. अग्निर्नो व २४ सते रयिम्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अग्नि अपनी तेज लपटों से राक्षसों और अन्य विघ्नों को नष्ट करें. अग्नि हमें सब प्रकार का धन (सुख) प्रदान करें. (२) अग्ने मृड महाँ अस्यय आ देवयुं जनम्. इयेथ बर्हिरासदम्.. (३) हे अग्नि! आप हमें सुख दीजिए. आप महान व गतिशील यानी सामर्थ्यवान हैं. आप देवताओं के दर्शन के इच्छुक यजमान के पास कुश (घास) के आसन पर विराजने के लिए यहां पधारिए. (३) अग्ने रक्षा णो अ ॐ हसः प्रति स्म देव रीषतः. तपिष्ठैरजरो दह.. (४) हे अग्नि! आप पापों से हमारी रक्षा कीजिए. आप दिव्य तेज वाले हैं. आप अजर (बुढ़ापे से रहित) हैं. आप हमारा नुकसान करने की इच्छा रखने वाले शत्रुओं को अपने तेजताप से भस्म कर दीजिए. (४) अग्ने युङ्क्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः. अरं वहन्त्याशवः.. (५) हे अग्नि! अपने तेज गति वाले श्रेष्ठ और कुशल घोड़ों को (यहां पधारने के लिए) रथ में जोतिए. (५) नि त्वा नक्ष्य विशपते द्युमन्तं धीमहे वयम्. सुवीरमग्न आहुत.. (६) हे अग्नि! हम आप की शरण में हैं. यजमान आप को आमंत्रित करते हैं. आप की पूजा करते हैं. आप की पूजा से सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं. हम ने हृदय से आप को यहां स्थापित किया है. (६) अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्. अपा ॐ रेता ॐ सि जिन्वति.. (७) हे अग्नि! आप सर्वोच्च (सब से ऊंचे) हैं. आप स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक का पालन करने वाले हैं. आप इन के स्वामी हैं. आप जल के सारे जीवों को जीवन देते हैं और काम में लगाते हैं. (७) इमम् षु त्वमस्माक ॐ सनिं गायत्रं नव्य ॐ सम्. अग्ने देवेषु प्र वोचः.. (८) हे अग्नि! आप हमारी इस हवि को देवताओं तक पहुंचाइए. हम गायत्री छंद में आप की प्रार्थना कर रहे हैं. आप हमारी इन दोनों चीजों को देवताओं तक पहुंचा दीजिए. (८) तं त्वा गोपवनो गिरा जनिष्ठदग्ने अङ्गिराः. स पावक श्रुधी हवम्.. (९) हे अग्नि! गोपवन ऋषि ने आप को अपनी स्तुति से उत्पन्न किया है. आप अंगों में रस के रूप में निवास करते हैं. आप पवित्र करने वाले हैं. आप हमारी प्रार्थना सुनिए. (९) परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्. दधद्रत्नानि दाशुषे.. (१०) हे अग्नि! आप सर्वज्ञ व अन्नों के स्वामी हैं. आप हवि के रूप में दिए गए पदार्थों को ebook converter DEMO Watermarks*
स्वीकार करते हैं. उन हवियों को व्याप्त करते हैं यानी देवताओं तक पहुंचाते हैं. आप दानशील लोगों को धनधान्य प्रदान करते हैं. (१०) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. (११) सारे भुवनों को देखने के लिए सूर्य की किरणें जिस से उत्पन्न हुई हैं, ऐसे सूर्य के रूप में वे अग्नि को भलीभांति धारण किए रहती हैं. (११) कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे. देवममीवचातनम्.. (१२) हे ऋत्विजो (यज्ञ करने वालो)! इस यज्ञ में आप सब ज्ञान वाले अग्नि की स्तुति कीजिए. वे सत्य धर्म से युक्त हैं. वे शत्रुओं का (रोगों का) नाश करने वाले हैं. (१२) शं नो देवीरभिष्टये शं नो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु नः.. (१३) हमारा कल्याण हो. दिव्य जल हमारे पीने के लिए कल्याणकारी हो. जल रोग शांत करने वाला हो. जल सुखशांति देते हुए अमृत रूप में प्रवाहित हो. (१३) कस्य नूनं परीणसि धियो जिन्वसि सत्पते. गोषाता यस्य ते गिरः.. (१४) हे अग्नि! आप सत्य (सज्जन) के पालनहार हैं. आप इस समय किस तरह के मानव के कर्मों को सत्य मार्ग (ब्रज) तक पहुंचा रहे हैं. किस कर्म से आप की कृपा गौओं को प्राप्त कराने वाली होगी. (१४) चौथा खंड यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा व दक्षसे. प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न श ॐ सिषम्.. (१) हे अग्नि! आप सब कुछ जानने वाले व अमर हैं. आप मित्र की तरह सहयोग करने वाले हैं. हम आप की स्तुति करते हैं. हे श्रोताओ! आप भी ऐसे अग्नि की स्तुति कीजिए. (१) पाहि नो अग्न एकया पाह्यू ३ त द्वतीयया. पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जा पते पाहि चतसृभिर्वसो.. (२) हे अग्नि! आप पहली स्तुति से हमारी रक्षा कीजिए. दूसरी स्तुति से हमें संरक्षण प्रदान कीजिए. तीसरी स्तुति से हमारी रक्षा (पालनपोषण रूप) कीजिए. चौथी स्तुति से आप हमारी सब प्रकार से रक्षा कीजिए. हे अग्नि! आप सब को संरक्षण देने वाले हैं. (२) बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा. भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवत्पावक दीदिहि.. (३) हे अग्नि! आप बड़ी ज्वालाओं वाले व युवा हैं. आप संपन्नता व पवित्रता देने वाले हैं. ebook converter DEMO Watermarks*
आप अपने प्रखर तेज से भरद्वाज (ऋषि) के लिए अत्यंत तेजस्वी रूप में प्रज्वलित होइए. (३) त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः. यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वं दयन्त गोनाम्.. (४) हे अग्नि! यजमान भलीभांति हवन करते हैं. वे आप को प्रिय हों. जो धन देने वाले और प्रजा की देखभाल करने वाले हैं, वे भी आप को प्रिय हों. गौओं का पालन करने वाले आप को प्रिय हों. (४) अग्ने जरितर्विशपतिस्तपानो देव रक्षसः. अप्रोषिवान् गृहपते महाँ असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः.. (५) हे अग्नि! आप ज्ञानी, प्रजा का पालनपोषण करने वाले, राक्षसों (कष्ट देने वालों) का नाश करने वाले, घर के स्वामी, उपासकों के घर को नहीं छोड़ने वाले व स्वर्गलोक के रक्षक हैं. आप हमारे घर में सदा निवास करिए. (५) अग्ने विवस्वदुषसश्चित्र १७ राधो अमर्त्य. आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः.. (६) हे अग्नि! आप अमर, प्राणिमात्र को जानने वाले और उषा (उषाकाल) से प्राप्त होने वाला विशेष धन दानदाता यजमान को दीजिए. आप सब कुछ जानने वाले हैं. आप उषाकाल में जागे हुए देवताओं को भी यहां आमंत्रित कीजिए. (६) त्वं नश्चित्र ऊत्या वसो राधा १७ सि चोदय. अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विदा गाधं तुचे तु नः.. (७) हे अग्नि! आप सर्वव्यापक, अद्भुत शक्ति वाले, दर्शनीय, अपार व बहुत क्षमतावान हैं. आप समृद्धि (वैभव) लाने में समर्थ हैं. आप हमें समृद्धि दीजिए. आप हमारी संतानों को भी समृद्धि एवं प्रतिष्ठा दीजिए. (७) त्वमित्सप्रथा अस्यग्ने त्रातर्ऋतः कविः. त्वां विप्रासः समिधान दीदिव आ विवासन्ति वेधसः.. (८) हे अग्नि! आप रक्षक हैं. आप (अपने गुण तथा धर्म के लिए) बहुत प्रसिद्ध हैं. आप सत्यवान और ज्ञानी हैं. हे तेजस्वी अग्नि! प्रज्वलित (प्रकाशित) हो जाने पर ज्ञानी जन आप की उपासना व सेवा करते हैं. (८) आ नो अग्ने वयोवृध १७ रयिं पावक श १७ स्यम्. रास्वा च न उपमाते पुरुस्पृह १७ सुनीती सुयशस्तरम्.. (९) हे अग्नि! आप पवित्र करने वाले व धनधान्य की समृद्धि करने वाले हैं. आप हमें यश ebook converter DEMO Watermarks*
बढ़ाने वाला धन दीजिए. आप हमें सही रास्ते से आने वाला धन प्रदान करें. आप हमें ऐसा धन प्रदान करें जिसे अनेक लोग चाहते हों. (९) यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम्. मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये.. (१०) यजमानों को सब प्रकार की समृद्धि दे कर आनंदित करने वाले अग्नि की हम पहले स्तुति करते हैं, जैसे उन्हें सब से पहले सोमरस का पात्र समर्पित किया जाता है. (१०) पांचवां खंड एना वो अग्निं नमसोजो नपातमा हुवे. प्रियं चेतिष्ठमरति ॐ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्.. (१) हे उपासको! अन्न से शक्ति देने वाले (बल के पुत्र), पूर्णज्ञानी, स्नेह देने वाले, सुंदर यज्ञ वाले देवताओं के दूत अग्नि को मैं नमस्कारपूर्वक प्रार्थना से आमंत्रित करता हूं. (१) शेषे वनेषु मातृषु सं त्वा मर्तास इन्धते. अतन्द्रो हव्यं वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि.. (२) हे अग्नि! आप वनों में व्याप्त हैं. आप माताओं में गर्भ के रूप में व्याप्त हैं. आप शेष पदार्थों में भी फैले हैं. हम मनुष्य समिधाओं द्वारा आप को प्रज्वलित करते हैं. आप आलस्य रहित हैं. आप यजमान की हवि देवताओं तक पहुंचाते हैं. आप देवताओं के मध्य (बीच में) सुशोभित होते हैं. (२) अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधुः. उपो षु जातमार्यस्य वर्धनमग्निं नक्षन्तु नो गिरः.. (३) धर्म के मार्ग को पूरी तरह जानने वाले अग्नि प्रकट हो रहे हैं. इन के माध्यम से यज्ञ के नियम पूरे किए जाते हैं. अग्नि आर्यों को प्रगति देने वाले हैं. वे वाणी रूप में की जा रही हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार करने की कृपा करें. (३) अग्निरुक्थे पुरोहितो ग्रावाणो बर्हिरध्वरे. ऋचा यामि मरुतो ब्रह्मणस्पते देवा अवो वरेण्यम्.. (४) स्तोत्र वाले हिंसा रहित यज्ञ में सब से पहले अग्नि देवता की स्थापना की जाती है. सोमलता से रस निकालने वाले पत्थर एवं आसन भी स्थापित किए जाते हैं. हे मरुतो! हे ब्रह्मणस्पति! हे देव! हम वेदमंत्रों द्वारा अपनी रक्षा का अनुरोध करते हैं. (४) अग्निमीडिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्. अग्नि ॐ राये पुरुमीढ श्रुतं नरो ऽ ग्निः सुदीतये छर्दिः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे उपासको! अपनी रक्षा के लिए विस्तृत तथा विकराल स्वरूप वाले अग्नि की स्तुति करो. धन प्राप्ति के लिए अग्नि की स्तुति करो. (५) श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः. आ सीदतु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावभिरध्वरे.. (६) हे अग्नि! आप समर्थ कानों वाले हैं. आप हमारी प्रार्थना स्वीकार कीजिए. अग्नि के साथ मित्र और अर्यमा आदि देवता भी यज्ञ के कुशासन पर विराजमान हों. (६) प्र दैवोदासो अग्निर्देव इन्द्रो न मन्मना. अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि.. (७) अग्नि इंद्र के समान शक्तिशाली हैं. अग्नि दिव्य (अच्छे) कार्य करने वालों के लिए पृथ्वी पर प्रकट हुए. हवि पहुंचाने के अपने श्रेष्ठ कामों से वे स्वर्ग में रहने लगे. (७) अध ज्मो अध वा दिवो बृहतो रोचनादधि. अया वर्धस्व तन्वा गिरा ममा जाता सुक्रतो पृण.. (८) हे अग्नि! आप उत्तम यज्ञ के आधार हैं. आप स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक में अपनी आभा फैलाएं. आप हमारी तथा हमारे संबंधियों की मनोकामनाएं पूरी कीजिए. (८) कायमानो वना त्वं यन्मातृरजगन्नपः. न तत्ते अग्ने प्रमृषे निवर्तनं यद् दूरे सन्निहाभुवः.. (९) हे अग्नि! आप वन की इच्छा करने वाले हो कर भी माता के समान जल के पास गए. आप का जाना हम से नहीं सहा गया. आप अदृश्य हो कर भी हमारे आसपास प्रकट हो जाते हैं. (९) नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते. दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः.. (१०) हे अग्नि! मननशील मनुष्य आप को धारण करते हैं. अनंत काल से मानव जाति के लिए आप का प्रकाश प्रकाशित है. आप ज्ञानी ऋषियों के आश्रम में प्रकाशित होते हैं. प्रजापति ने यजमान के लिए आप को देव यज्ञ स्थान में स्थापित किया. हम सब आप को नमस्कार करते हैं. (१०) छठा खंड देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम्. उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्धो देव ओहते.. (१) अग्नि धन देने वाले हैं. इसलिए हे होताओ! यज्ञ में अच्छी तरह भरे हुए स्रुक (एक
पात्र) से बारबार आहुति दो. सोमरस से पात्र को सींचो. इस तरह अग्नि आहुति पहुंचा कर यजमान की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. (१) प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता. अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.. (२) हमें ब्रह्मणस्पति देवता प्राप्त हों (यानी हमारे पास पहुंचें). सत्य और प्रिय देवी एवं वाग् देवता (वाणी के देवता) हमें प्राप्त हों. सभी देवगण हमारे शत्रुओं का नाश करें. कल्याणकारी यश देने वाले वीर को सब देवता श्रेष्ठ मार्ग से ले जाएं. (२) ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता. ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे.. (३) हे अग्नि! हमारे संरक्षण के लिए आप ऊंचे आसन पर विराजिए. सूर्य के समान उन्नत हो कर हमें अन्न आदि प्रदान कीजिए. हम इसीलिए अच्छे स्तोत्रों से स्तुति करते हुए आप को आमंत्रित करते हैं. (३) प्र यो राये निनीषति मर्तो यस्ते वसो दाशत्. स वीरं धत्ते अग्न उक्थश ꣳ सिनं त्मना सहस्रपोषिणम्.. (४) हे अग्नि! आप व्यापक हैं. हम आप के भक्त धन के लिए आप को प्रसन्न करना चाहते हैं. जो मनुष्य आप को हवि प्रदान करता है, वह स्तुति करने वाले हजारों मनुष्यों का पालनपोषण करने वाले वीर पुत्र को प्राप्त करता है. (४) प्र वो यह्वं पुरूणां विशां देवयतीनाम्. अग्नि ꣳ सूक्तेभिर्वचोभिर्वृणीमहे य ꣳ समिदन्य इन्धते.. (५) हे अग्नि! आप मनुष्य में देवत्व का विकास करने वाले हैं. हम अपनी स्तुतियों से आप की महानता का वर्णन करते हैं. हे अग्नि! आप को अन्य ऋषियों ने भी अच्छी तरह दीप्त (प्रसन्न) किया है. (५) अयमग्निः सुवीर्यस्येशे हि सौभाग्यस्य. राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम्.. (६) अग्नि संपत्ति और सौभाग्य के ईश हैं. वे गौ आदि पशुओं के स्वामी हैं. संतान और धन के स्वामी हैं. शत्रुओं का नाश करने वालों के भी स्वामी हैं. (६) त्वमग्ने गृहपतिस्त्व ꣳ होता नो अध्वरे. त्वं पोता विश्ववार प्रचेता यक्षि यासि च वार्यम्.. (७) हे अग्नि! आप घर के स्वामी हैं. हमारे हिंसा रहित यज्ञ के होता (पुरोहित) हैं. आप की आराधना सभी कर सकते हैं. आप पवित्र करने वाले हैं. आप श्रेष्ठ हवि का यज्ञ कीजिए. हमें ebook converter DEMO Watermarks*
धनादि (सुख) प्रदान कीजिए. (७) सखायस्त्वा ववृमहे देवं मर्तास ऊतये. अपां नपात ॐ सुभग ॐ सुद सम ॐ सुप्रतूर्तिमनेहसम्.. (८) हे अग्नि! आप हमारे सखा हैं. आप श्रेष्ठ कर्म करने वाले हैं. मनुष्य की शीघ्र इच्छा पूर्ति करते हैं. आप धन के स्वामी व जल को धारण करने वाले हैं. हम समान बुद्धि वाले सभी साधक आप से अपने संरक्षण की प्रार्थना करते हैं. (८) सातवां खंड आ जुहोता हविषा मर्चयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम्. इडस्पदे नमसा रातहव्य ॐ सपर्यता यजतं पस्त्यानाम्.. (१) हे ऋत्विजो (यजमानो)! आप अग्नि देव को आमंत्रित कीजिए. आप सब ओर शुद्धता फैलाने वाली हवि अग्नि देव को प्रदान कीजिए. गृहपति गृह की रक्षा करने वाली अग्नि की स्थापना करें. हवन की चीजों के साथसाथ आप स्तुति कर के उन का स्वागतसत्कार करें. (१) चित्र इच्छिशोस्तरुणस्य वक्षथो न यो मातरावन्वेति धातवे. अनूधा यदजीजनदधा चिदा ववक्षत्सद्यो महि दूत्यां ३ चरन्.. (२) हे अग्नि! बाल एवं तरुण (युवा) रूप आप का हवि पहुंचाना बहुत आश्चर्य वाला है. आप पैदा होने के बाद दूध पीने के लिए अपनी दोनों ही माताओं (पृथ्वी और अरणियों) के पास नहीं जाते, बल्कि अच्छे दूत की भूमिका निभाते हुए देवताओं के पास हवि पहुंचाने जाते हैं. (२) इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व. संवेशनस्तन्वे ३ चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे.. (३) हे मृत्यु धर्म वाले मनुष्य! अग्नि तुम्हारा एक भाग है. वायु तुम्हारा दूसरा भाग (शरीर) है. सूर्य रूप तीसरे भाग (तेज) से तुम मिलते हो. उन से मुक्त हो कर मुनष्य तेजस्वी रूप प्राप्त करता है. अर्थात् मनुष्य को पावन स्थान में जन्म ले कर देव शक्तियों के लिए प्रिय तथा श्रेष्ठ बनना चाहिए. (पिछले मंत्र में मृत्यु के बाद पुनः प्रकृति में मिलने की क्रिया बताई है). (३) इम ॐ स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषा. भद्रा हि नः प्रमतिरस्य स ॐ सद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (४) हे अग्नि! आप सब कुछ जानने वाले हैं. हम स्तोत्र रूप को रथ के समान उत्तम बुद्धि से तैयार करते हैं. हे अग्नि! हम आप के मित्र हैं. हमें किसी प्रकार का कोई कष्ट न हो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरग्ने जनयन्त देवाः.
मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्. कवि ॐ सम्राजमतिथिं जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः.. (५) हे अग्नि! आप सब से ऊपर (सर्वोपरि) हैं. आप स्वर्गलोक के वासी हैं. आप भूलोक के स्वामी हैं. आप यज्ञ में उत्पन्न हैं. आप ज्ञानी मनुष्यों में मेहमान की तरह पूजनीय हैं. मुख की तरह मुख्य हैं. आप को देवताओं ने उत्पन्न किया है. (५) वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरग्ने जनयन्त देवाः. तं त्वा गिरः सुष्टुतयो वाजयन्त्याजिं न गिर्वाहणो जिग्युरश्वाः.. (६) हे अग्नि! जैसे पर्वत के ऊपरी भाग से जल उत्पन्न होता है, वैसे ही विद्वान् यजमान आप को अपनी स्तुतियों से प्रकट करते हैं. जैसे घोड़े युद्ध में विजय पाते हैं, वैसे ही आप हमारी स्तुतियों से संचालित होते हैं. इस से हमें विजय (कामना सिद्धि) मिलती है. (६) आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं ॐ होतारं ॐ सत्ययजं ॐ रोदस्योः. अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्.. (७) हे अग्नि! आप यज्ञ के स्वामी हैं. आप देवताओं को बुलाने वाले हैं. आप शत्रुओं को रुलाने वाले हैं. आप स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक के अन्नदाता हैं. आप आनंद एवं सत्य रूप को प्राप्त कराने वाले हैं. आप स्वर्ण के समान चमक वाले हैं. ऐसे स्वरूप वाले अग्नि को स्वाभाविक रूप से विद्युत् से पहले संरक्षण के लिए उत्पन्न किया है. (७) इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन. नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि.. (८) हे अग्नि! आप श्रेष्ठ हैं. आप राजा हैं. आप को अन्नों से प्रज्वलित किया जाता है. आप को घी से बढ़ाया जाता है. सभी मिल कर हवन से आप की पूजा करते हैं. इस प्रकार अग्नि उषा काल के पूर्व (यानी माता के गर्भ से ही) उत्पन्न हुए हैं. (८) प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति. दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध.. (९) हे अग्नि! आप महान प्रकाश के साथ प्रकट होते हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में बलवान हो कर गर्जना करते हैं. बिजली के गर्जन और जल मेघों के बीच बढ़ते हैं. (९) अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम्. दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम्.. (१०) हे अग्नि! आप प्रशंसा के योग्य हैं. आप दूर से दिखाई देते हैं. आप घर के रक्षक हैं. यजमान ने अग्नि को अरणि मथ कर प्रकट किया. (यानी अंगुलियों में अरणियों को पकड़ कर, घिस कर प्रकट किया है). (१०) ebook converter DEMO Watermarks*
आठवां खंड अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्. यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ.. (१) हे अग्नि! आप यजमानों की श्रद्धा से प्रज्वलित हैं. जैसे अग्निहोत्र (सुबह यज्ञ करने वाले) के लिए पाली हुई गाय प्रातःकाल उठ जाती है, वैसे ही प्रातःकाल आप प्रज्वलित होते हैं (किए जाते हैं). पेड़ की फैली हुई शाखाओं के समान आप की किरणें भी दूरदूर तक फैलती हैं. (१) प्र भूर्जयन्तं महां विपोधां मूरैरमूरं पुरां दर्माणम्. नयन्तं गीर्भिर्वना धियं धा हरिश्मश्रुं न वर्मणा धनर्चिम्.. (२) हे अग्नि! आप राक्षसों को जीतने वाले हैं. आप विद्वानों को धारण करने वाले हैं. मूर्खों के आश्रय (स्थान) का नाश करने वाले हैं. आप स्तुति करने वाले को ऐश्वर्य देने वाले हैं. आप कवच के समान रक्षा करने वाले हैं. आप सुनहरी ज्वालाओं वाले हैं. हे मनुष्य! तुम ऐसे अग्नि की आराधना करो. (२) शुक्रं ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि. विश्वा हि माया अवसि स्वधावन्भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु.. (३) हे पूषा! आप का तेजस्वी रंग वाला दिन अलग है. उसी तरह काले रंग वाली रात्रि अलग है. आप की महिमा से ये अलगअलग रंग वाले भाग एक ही दिनरात के हैं. आप पोषण करने वाले हैं. आप सारे जग की रक्षा करने वाले हैं. आप कल्याण करने वाले हैं. आप हमारा कल्याण करें. (३) इडामग्ने पुरुद ꣳ स ꣳ सनिं गोः शश्वत्तम ꣳ हवमानाय साध. स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (४) हे अग्नि! आप अनेक कामों में उपयोगी सुमति हमें दीजिए. आप गायों को देने वाली स्तुति हमें दीजिए. आप हमें पुत्रपौत्र प्रदान कीजिए. आप उत्तम बुद्धि वाले हैं. कृपया भली प्रकार आराधना करने वाले यजमान को ये सब प्रदान कीजिए. (४) प्र होता जातो महान्नभोविन्नृषद्मा सीददपां विवर्ते. दधद्यो धायी सुते वया ꣳ सि यन्ता वसूनि विधते तनूपाः.. (५) हे अग्नि! आप सभी घरों में मौजूद रहते हैं. आप बादलों के बीच बिजली के रूप में रहते हैं. इस समय आप यज्ञ में मौजूद हैं. आप महान हैं. आप अंतरिक्ष को जानने वाले हैं. हवि को धारण करने वाले हैं. आप हमें अन्न, धन व संरक्षण प्रदान कीजिए. (५) प्र सम्राजममुरस्य प्रशस्तं पु ꣳ सः कृष्टीनामनुमाद्यस्य. ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रस्येव प्र तवसस्कृतानि वन्दद्वारा वन्दमाना विवष्टु.. (६) हे अग्नि! आप बलवान और वीर मनुष्य के स्तुति योग्य हैं. आप बल में इंद्र के समान हैं. आप के इस प्रशंसनीय स्वरूप की स्तुति करते हैं. हे यजमान! स्तुति और आराधना से अग्नि की उपासना करो. (६) अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इवेत्सुभृतो गर्भिणीभि:. दिवेदिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्नि:.. (७) हे अग्नि! आप सब प्रकार के ज्ञान वाले हैं. आप अच्छी तरह गर्भ धारण करने वाली स्त्री के समान अरणियों द्वारा धारण किए जाते हैं. यज्ञ के लिए जागरूक रहने वाले यजमानों द्वारा प्रतिदिन आप वंदनीय हैं. (७) सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षा ᳪ सि पृतनासु जिग्यु:. अनु दह सहमूरान्क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्याया:.. (८) हे अग्नि! आप हमेशा शत्रुओं को बाधा देने वाले हैं. आप को युद्ध में राक्षस नहीं जीत सकते. आप मांस खाने वाले राक्षसों को अपने तेज से भस्म कर दीजिए. आप के इस हथियार से कोई शत्रु न बचे. (८) नौवां खंड अग्न ओजिष्ठमा भर द्युम्नमस्मभ्यमध्रिगो. प्र नो राये पनीयसे रत्सि वाजाय पन्थाम्.. (१) हे अग्नि! आप हमें खूब बल तथा धन दीजिए. आप बेरोकटोक गति वाले हैं. धन का मार्ग हमें दिखाइए. आप अन्न और बल वाला मार्ग हमें दिखाइए. (१) यदि वीरो अनु ष्यादग्निमिन्धीत मर्त्य:. आजुह्वद्धव्यमानुषक् शर्म भक्षीत दैव्यम्.. (२) हे अग्नि! मनुष्य वीर पुत्र को पाने के लिए आप को प्रज्वलित करे. हवन के पदार्थों से सदा हवन करे. आप की कृपा से सदा परम सुख प्राप्त करे. (२) त्वेषस्ते धूम ऋण्वति दिवि सञ्छुक्र आतत:. सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे.. (३) हे अग्नि! प्रज्वलित होने के बाद आप का धुआं आकाश में फैलता है. बादल रूप में बदल जाता है. आप पवित्र करने वाले हैं. स्तुति के प्रभाव से आप सूर्य के समान प्रकाशित होते हैं. (३) त्व ᳪ हि क्षैतवद्यशो ऽ ग्ने मित्रो न पत्यसे. ebook converter DEMO Watermarks*
त्वं विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टिं न पुष्यसि.. (४) हे अग्नि! निश्चय ही आप सूखी समिधा रूप में अन्न को ग्रहण करते हैं. आप उसे (अन्न को) बहुत ज्यादा मात्रा में बढ़ाते हैं (पुष्ट करते हैं). आप सूर्य के समान तेजस्वी हैं. आप सभी को शरण (आश्रय) देने वाले व सब कुछ देखने वाले हैं. (४) प्रातरग्निः पुरुप्रियो विश स्तवेतातिथिः. विश्वे यस्मिन्नमर्त्ये हव्यं मर्तास इन्धते.. (५) हे अग्नि! आप अनेक लोगों को प्रिय लगने वाले हैं. आप यजमानों के घर धन स्थापित करने वाले हैं. आप यजमानों के घर मेहमान के समान आने वाले हैं. आप प्रातःकाल स्तुति किए जाने वाले हैं. आप अमर हैं. सभी मनुष्य आप को पवित्र हवन सामग्री प्रदान करें. (५) यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्च विभावसो. महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा उदीरते.. (६) हे अग्नि! शीघ्र पहुंचने वाले स्तोत्र से हम आप की आराधना करते हैं. आप तेजस्वी हैं. हमें बहुत सा अन्न और धन प्रदान कीजिए क्योंकि आप ही से बहुत सा धन और अन्न प्राप्त होता है. (६) विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम्. अग्निं वो दुर्यं वचः स्तुषे शूषस्य मन्मभिः.. (७) हे यजमानो! आप अन्न और बल की इच्छा करते हुए अग्नि की स्तुति करो. वे सब के प्रिय व पूजनीय हैं. हे अग्नि! हम गृहपति आप की सुखदायी स्तोत्रों से आराधना करते हैं. (७) बृहद्वयो हि भानवे ऽ र्चा देवायाग्नये. यं मित्रं न प्रशस्तये मर्तासो दधिरे पुरः.. (८) हे अग्नि! आप तेजस्वी हैं. आप के लिए बहुत सा हवि का अन्न दिया जाता है. हम प्रकाश वाले आप की पूजा करते हैं. हम आप को मित्र के समान मानते हैं. हम उत्तम स्तुति करने के लिए आप को आगे कर के स्थापित करते हैं. (८) अगन्म वृत्रहन्तमं ज्येष्ठमग्निमानवम्. यः स्म श्रुतर्वन्नार्क्षे बृहदनीक इध्यते.. (९) हे अग्नि! आप पापों का नाश करने वाले व प्रशंसनीय मनुष्यों के हितकारी हैं. ऋक्ष पुत्र श्रुतर्वा के लिए हम बड़ीबड़ी ज्वालाओं के साथ आप को प्रकट करते हैं. (९) जातः परेण धर्मणा यत्सवृद्धिः सहाभुवः. पिता यत्कश्यपस्याग्निः श्रद्धा माता मनुः कविः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*