भारतकोश
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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

हे अग्नि! आप सभी अग्नियों के साथ हमारी प्रार्थनाओं को सुनिए व प्रार्थनाओं की महिमा बढ़ाइए. जो अग्नि स्वरूप हैं, जो मनुष्यों में हैं उन सब से हमारा अनुरोध है. (१) प्र स विश्वेभिरग्निभिरग्निः स यस्य वाजिनः. तनये तोके अस्मदा सम्यङ्वाजैः परीवृतः.. (२) यज्ञ की अग्नि शक्तिशाली है. उस में सभी हवि भेंट करते हैं. वे अग्नि अन्य सभी अग्नियों सहित शक्ति से घिर कर हमारे कल्याण हेतु पधारने व हमारे सज्जनों (पुत्रों) का भी कल्याण करने की कृपा करें. (२) त्वं नो अग्ने अग्निभिर्ब्रह्म यज्ञं च वर्धय. त्वं नो देवतातये रायो दानाय चोदय.. (३) हे अग्नि! आप अन्य देवताओं को हमें धनदान करने के लिए प्रेरित करने की कृपा कीजिए. आप अन्य अग्नियों सहित हमारे आत्म ज्ञान व यज्ञ की भी बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. (३) त्वे सोम प्रथमा वृत्तबर्हिषो महे वाजाय श्रवसे धियं दधुः. स त्वं नो वीर वीर्याय चोदय.. (४) हे सोम! प्रमुख यजमान अन्न बल के बारे में आप के लिए श्रेष्ठ बुद्धि धारण करते हैं. आप हम वीरों को (और अधिक) वीरता के लिए प्रोत्साहित करने की कृपा कीजिए. (४) अभ्यभि हि श्रवसा ततर्दिथोत्सं न कं चिज्जनपानमक्षितम्. शर्याभिर्न भरमाणो गभस्त्योः.. (५) हे सोम! आप का रस छनछन कर छलनी से टपकता हुआ द्रोणकलश को उसी तरह लबालब भर देता है, पीने वाले जल को चुल्लू से डालडाल कर जैसे पानी के हौज को पूरा भर देते हैं. (५) अजीजनो अमृत मर्त्याय कमृतत्य धर्मन्नमृतस्य चारुणः. सदासरो वाजमच्छा सनिष्यदत्.. (६) हे सोम! आप अमृतमय हैं. आप मनुष्यों के लिए सत्य और मंगलकारी तत्त्व धारण करते हैं. आप ने सूर्य को प्रकट किया, देवगण की सेवा की और सदैव यजमानों को अन्न, धन देने हेतु लालायित रहते हैं. (६) एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पिबाति सोम्यं मधु. प्र राधा ᳵ सि चोदयते महित्वना.. (७) हे यजमानो! आप इंद्र को सोमरस से सींचिए. वे मधुर सोम रस को पीते हैं. वे अपने महत्त्व से धनों को आप लोगों (के पास आने) के लिए प्रेरित करते हैं. (७) उपो हरीणां पतिं राधः पृञ्चन्तमब्रवम्. नून ᳵ श्रुधि स्तुवतो अश्व्यस्य.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! आप अश्वपति व धनपति हैं. हम आप के लिए प्रार्थनाएं बोलते हैं. आप स्तुति करते हुए अश्व्य ऋषि की स्तुति अवश्य ही सुनने की कृपा कीजिए. (८) न ह्यं ३ ग पुरा च न जज्ञे वीरतरस्त्वत्. न की राया नैवथा न भन्दना.. (९) हे इंद्र! आप से वीरतर कोई देव व धनदाता पहले नहीं हुआ है. आप से पहले न ही कोई आप जैसा उपासना योग्य देव हुआ है. (९) नदं व ओदतीनां नदं योयुवतीनाम्. पतिं वो अघ्न्यानां धेनूनामिषुध्यसि.. (१०) हे यजमानो! इंद्र युवती उषा को उपजाने वाले हैं, चंद्र किरणों को उत्पन्न करने वाले और गोपालक हैं. वे गाय के दूध को पोषक अन्न के रूप में प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं. इंद्र सब कुछ करने में समर्थ हैं. (१०) तीसरा खंड देवो वो द्रविणोदा:. पूर्णां विवष्ट्वासिचम्. उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्धो देव ओहते.. (१) हे यजमानो! धनदाता अग्नि को घी और सोमरस से सींचिए. उन्हें पूरी हवि दीजिए. वे आप का पालनपोषण करने वाले हैं. (१) त ऴ् होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत. दधाति रत्नं विधते सुवीर्यमग्निर्जनाय दाशुषे.. (२) देवताओं ने श्रेष्ठ बुद्धिमान अग्नि को अपना होता बनाया है. वे हवि से हवन करते हैं, यजमान के लिए रत्न धारते हैं, अच्छी संतान देते हैं, दानदाता यजमान को शक्ति प्रदान करते हैं. (२) अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधु:. उपो षु जातमार्थस्य वर्धनमग्निं नक्षन्तु नो गिर:.. (३) अग्नि में यजमान व्रत धारण करते हैं. अग्नि श्रेष्ठ पथप्रदर्शक हैं. वे श्रेष्ठ पथ दिखाते हैं. अग्नि आर्यों की बढ़ोतरी चाहते हैं. अग्नि को हमारी वाणी प्राप्त हो. (३) यस्माद्रेजन्त कृष्टयश्चर्कृत्यानि कृण्वत:. सहस्रसां मेधसाताविव त्मनाग्निं धीभिर्नमस्यत.. (४) हे यजमानो! आप बुद्धिपूर्वक अग्नि को नमन कीजिए. आप हजारों बुद्धिपूर्वक कार्यों से उन की उपासना कीजिए, जिस से अग्नि कर्तव्यपरायण यजमानों के लिए शत्रुपक्ष को बहुत पीड़ित कर सकें. (४) प्र दैवोदासो अग्निर्देव इन्द्रो न मज्पना. ebook converter DEMO Watermarks*

अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि.. (५) अग्नि उत्कृष्ट स्वर्गलोक में निवास करते हैं. वे इंद्र जैसी सामर्थ्य वाले हैं. वे पृथ्वी माता पर श्रेष्ठ यज्ञ कार्य पूर्ण कराते हैं. वे स्वर्गिक सुख प्रदान करते हैं. (५) अग्न आयू षि पवस आ सुवोर्जमिषं च न:. आरे बाधस्व दुच्छुनाम्.. (६) हे अग्नि! आप हमें दीर्घायु बनाइए. आप हमें श्रेष्ठ अन्न, बल दीजिए. आप दुष्टों को बाधित कीजिए. (६) अग्निर्र्ऋषि पवमान: पाञ्चजन्य: पुरोहित:. तमीमहे महागयम्.. (७) अग्नि ऋषि हैं. वे पवित्र, पुरोहित, पंच व सर्वद्रष्टा हैं. हम उन के गुण गाते हैं. (७) अग्ने पवस्व स्वपा अस्मे वर्च: सुवीर्यम्. दधद्रयिं मयि पोषम्.. (८) हे अग्नि! आप पोषक अन्न व धन धारण करिए. आप हमें शक्ति व श्रेष्ठ संतान दीजिए और पवित्र बनाइए. (८) अग्ने पावक रोचिषा मन्द्रया देव जिह्वया. आ देवान्वक्षि यक्षि च.. (९) हे अग्नि! आप पवित्र एवं देवताओं को खुश रखने वाले हैं. आप अपनी जिह्वाओं (लपटों) से देवताओं को बुलाइए और देवताओं के लिए यज्ञ कराइए. (९) तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्रभानो स्वर्द्दशम्. देवाँ आ वीतये वह.. (१०) हे अग्नि! आप सर्वद्रष्टा हैं. हम आप को घी से सींचते हैं. आप अद्भुत हैं. हम आप से देवताओं का आह्वान करने के लिए निवेदन करते हैं. (१०) वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्त समिधीमहि. अग्ने बृहन्तमध्वरे.. (११) हे अग्नि! आप बुद्धिमान, यज्ञप्रेमी हैं और द्युतिमान हैं. हम विशाल यज्ञ में आप को समिधाओं से प्रज्वलित करते हैं. (११) चौथा खंड अवा नो अग्न ऊतिभिर्गायत्रस्य प्रभर्मणि. विश्वासु धीषु वन्द्य.. (१) हे अग्नि! आप की सभी यज्ञों में बुद्धिपूर्वक वंदना की जाती है. आप गायत्री छंद में स्तुति गाने पर प्रसन्न होते हैं. आप अपने रक्षा साधनों से हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. (१) आ नो अग्ने रयिं भर सत्रासाहं वरेण्यम्. विश्वासु पृत्सु दुष्टरम्.. (२) हे अग्नि! आप भरपूर धन दीजिए. आप शत्रुनाशक श्रेष्ठ सामर्थ्य दीजिए. आप सभी ebook converter DEMO Watermarks*

दुष्टों को दूर कीजिए. आप सभी वैभव हमें प्रदान कीजिए. (२) आ नो अग्ने सुचेतुना रयिं विश्वायुपोषसम्. मार्डीकं धेहि जीवसे.. (३) हे अग्नि! आप सुचेतना संपन्न, संपूर्ण पोषण (आयु पर्यंत) दाता व सुखदाता हैं. आप हमें पूरे जीवन के लिए धन दीजिए. (३) अग्नि 𑗒 हिन्वन्तु नो धियः सप्तिमाशुमिवाजिषु. तेन जेष्म धनंधनम्.. (४) हे अग्नि! हमारी बुद्धियां आप को प्रेरित करें. युद्ध में घोड़े को प्रेरित करने की भांति हम आप को प्रेरित करते हैं, जिस से हम जीवन संग्राम में सारे वैभव जीत सकें. (४) यया गा आक्रामहै सेनायाग्ने तवोत्‍या. तां नो हिन्व मघत्तये.. (५) हे अग्नि! संरक्षण शक्ति से हमें रक्षित कीजिए. दिव्य ज्ञान हेतु हम आप को आमंत्रित करते हैं. आप हमें उत्तम कोटि का धन प्रदान कीजिए. (५) आग्ने स्थूर 𑗒 रयिं भर पृथुं गोमन्तमश्विनम्. अङ्घि खं वर्तया पविम्.. (६) हे अग्नि! आप हमें गोवान व अश्ववान बनाइए. आप हमें प्रचुर धन दीजिए. आकाश आप के तेज से पवित्र हैं. आप दुर्गुणों को दूर भगाइए. (६) अग्ने नक्षत्रमजरमा सूर्यं 𑗒 रोहयो दिवि. दधज्ज्योतिर्जनेभ्यः.. (७) हे अग्नि! आप लोगों के लिए ज्योति धारण कीजिए. आप स्वर्गलोक में सूर्य को स्थापित कीजिए. जर्जर न होने वाले सूर्य सर्वत्र प्रकाशदाता हैं. (७) अग्ने केतुर्विशामसि प्रेष्ठः श्रेष्ठ उपस्थसत्. बोधा स्तोत्रे वया दधत्.. (८) हे अग्नि! आप प्रिय, सर्वोत्तम व ज्ञानदाता हैं. आप हमारे स्तोत्र जगाइए. आप हमारे लिए आयु धारण करिए. (८) अग्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्. अपा 𑗒 रेता 𑗒 सि जिन्वति.. (९) हे अग्नि! आप मूर्धन्य, स्वर्गलोकवासी व पृथ्वी के पालनहार हैं. आप जलों को अपने में समाहित किए रहते हैं. (९) ईशिषे वार्यस्य हि दात्रस्याग्ने स्वः पतिः. स्तोता स्यां तव शर्मणि.. (१०) हे अग्नि! आप वरणीय हैं. आप स्वर्ग के ईश्वर हैं. आप दाता व अधिष्ठाता हैं. हम आप के सुख भोगें, सदैव आप के पूजक बने रहें. (१०) उदग्ने शुचयस्तव शुक्रा भ्राजन्त ईरते. तव ज्योती 𑗒 ष्यर्चयः.. (११) हे अग्नि! हम ज्योतिपूर्वक आप की अर्चना करते हैं. हम आप को पवित्र, चमकदार प्रकाशित ज्योति से भजते हैं. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

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पंद्रहवां अध्याय

पंद्रहवां अध्याय पहला खंड कस्ते जामिर्जनानामग्ने को दाश्वध्वरः. को ह कस्मिन्नसि श्रितः.. (१) हे अग्नि! मनुष्यों में कौन आप का सगा, पथ प्रदर्शक, यज्ञकर्त्ता व आप के स्वरूप का ज्ञाता है? आप का आश्रय कहां है? (१) त्वं जामिर्जनानामग्ने मित्रो असि प्रियः. सखा सखिभ्य ईड्यः.. (२) हे अग्नि! मनुष्यों में कौन आप का मित्र है, प्रिय है? सखा सखियों में कौन आप को सर्वाधिक प्रिय है? (२) यजा नो मित्रावरुणा यजा देवाँ ऋतं बृहत्. अग्ने यक्षि स्वं दमम्.. (३) हे अग्नि! आप हमारे लिए मित्र और वरुण की पूजा करने की कृपा कीजिए. आप बहुत से देवताओं की पूजा करने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ की पूजा कीजिए. (३) ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमा २४ सि दर्शतः. समग्निरिध्यते वृषा.. (४) हे अग्नि! आप पूजनीय, नमन के योग्य, तमहारी व दर्शनीय हैं. आप को समिधाओं से भलीभांति प्रज्वलित किया जाता है. (४) वृषो अग्निः समिध्यते ऽ श्चो न देववाहनः. त २४ हविष्मन्त ईडते.. (५) हे अग्नि! आप शक्तिशाली हैं. घोड़े जैसे वाहन को ले जाते हैं, वैसे ही आप देवताओं के वाहन को ले जाते हैं. हे हविमान! आप हमारी प्रार्थनाएं स्वीकारिए. (५) वृषणं त्वा वयं वृषन्वृषणः समिधीमहि. अग्ने दीद्यतं बृहत्.. (६) हे अग्नि! आप शक्तिमान हैं. हम शक्तिमान आप को प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं. हम समिधाओं से आप को प्रज्वलित करते हैं. आप दीप्तिमान व विशाल हैं. (६) उत्ते बृहन्तो अर्चयः समिधानस्य दीदिवः. अग्ने शुक्रासि ईरते.. (७) हे अग्नि! हम समिधाओं से आप को प्रज्वलित करते हैं. हमारी अधिक अर्चना से आप ज्वालाओं से बढ़ोत्तरी प्राप्त करते हैं. (७) उप त्वा जुह्वो ३ मम घृताचीर्यन्तु हर्यत. अग्ने हव्या जुषस्व नः.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अग्नि! हमारी घी से भरी हुई हवि आप का मन हरे. वह आप तक पहुंचे. हे अग्नि! आप हमारी उपासना को स्वीकार करने की कृपा कीजिए. (८) मन्द्र ॐ होतारमृत्विजं चित्रभानुं विभावसुम्. अग्निमीळे स उ श्रवत्.. (९) हे अग्नि! आप देवताओं के होता, आनंददाता, अद्भुत, वैभववान व प्रकाशमान हैं. आप हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा कीजिए. (९) पाहि नो अग्न एकया पाहु ३ त द्वितीयया. पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जां पते पाहि चतसृभिर्वसो.. (१०) हे अग्नि! आप एक स्तुति सुन कर हमारी रक्षा कीजिए. आप दूसरी स्तुति सुन कर हमारी रक्षा कीजिए. आप तीसरी स्तुति सुन कर हमारी रक्षा कीजिए. आप चौथी स्तुति सुन कर हमारी रक्षा कीजिए. (१०) पाहि विश्वस्माद्रक्षसो अराव्णःप्र स्म वाजेषु नो ऽ व. त्वामिद्धि नेदिष्ठं देवतातय आपिं नक्षामहे वृधे.. (११) हे अग्नि! आप सारी राक्षसी व स्वार्थी प्रवृत्तियों से हमारी रक्षा कीजिए. आप हमारे हितैषी हैं. आप हमारे अभीष्ट देव हैं. हम आप की शरण में हैं. (११) दूसरा खंड इनो राजन्नरतिः समिद्धो रौद्रो दक्षाय सुषुमाँ अदर्शि. चिकिद्विभाति भासा बृहतासिक्र्नीमेति रुशतीमपाजन्.. (१) हे अग्नि! आप राजा और शत्रुओं के लिए भयानक हैं. आप यजमानों की मनोकामना पूरी करते हैं. आप चकित करने वाले आप भास्कर (प्रकाशमान) व विशाल हैं. आप रात्रि में हवन के लिए चमकते हैं. (१) कृष्णां यदेनीमभि वर्पसाभूज्जनयन्योषां बृहतः पितुर्जाम्. ऊर्ध्वं भानु ॐ सूर्यस्य स्तभायन् दिवो वसुभिररतिर्वि भाति.. (२) हे अग्नि! आप पिता (सूर्य) के जाए हैं. आप स्त्री रूप को प्रकट करते हैं. अंधेरी रात को अपनी ज्वालाओं से हटाते हैं (परास्त करते हैं). आप अपने दिव्य तेज से सूर्य का तेज ऊपर स्वर्गलोक में ही रोक लेते हैं. आप अपने ही तेज से तेजस्वी होते हैं. (२) भद्रो भद्रया सचमान आगात्स्वसारं जारो अभ्येति पश्चात्. सुप्रकेतैर्द्युभिरग्निर्वितष्ठन्नुशद्भिर्वर्णैरभि राममस्थात्.. (३) कल्याणकारी अग्नि की कल्याणकारिणी उषा सेवा करती हैं. अग्नि शत्रुनाशक हैं. वे अपनी प्रिय बहन उषा के पास पहुंचते हैं. वे अंधेरे का नाश करते हैं. वे सर्वत्र गमनशील हैं. वे ebook converter DEMO Watermarks*

अपनी लपटों से सर्वत्र प्रकाशित हो रहे हैं. (३) कया ते अग्ने अङ्गिर ऊर्जो नपादुपस्तुतिम्. वराय देव मन्यवे.. (४) हे अग्नि! आप अंगों को प्रकाशित करते हैं. आप ऊर्जा बढ़ाते हैं. सब आप को अंगीकार करते हैं. हम आप के अलावा और किस को श्रेष्ठ देव मानें? (४) दाशेम कस्य मनसा यज्ञस्य सहसो यहो. कदु वोच इदं नमः.. (५) हे अग्नि! हम किस मन से आप का भजन करें? हम कब आप को नमन करें? कब हमारी वाणियां आप को प्राप्त करें? (५) अधा त्व ꣳ हि नस्करो विश्वा अस्मभ्य ꣳ सुक्षिती:. वाजद्रविणसो गिरः.. (६) हे अग्नि! आप हम पर सब कृपा कीजिए. हम अपनी प्रार्थनाओं से आप को अपने प्रति कृपालु बनाएं. आप हमें धनधान्यमय बनाइए. (६) अग्न आ याह्यग्निभिर्होतारं त्वा वृणीमहे. आ त्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं बर्हिरासदे.. (७) हे अग्नि! आप देवों को आमंत्रित करने वाले हैं. आप हमारी स्तुतियां सुनिए. आप अन्य अग्नियों के साथ हमारे यज्ञस्थान पर पधारिए, कुश का आसन ग्रहण कीजिए. हमारी हवि से युक्त आहुतियां स्वीकार करने की कृपा कीजिए. (७) अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः सुचश्चरन्त्यध्वरे. ऊर्जो नपातं घृतकेशमीमहे ऽ ग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम्.. (८) हे अग्नि! आप सर्वत्र भ्रमणशील और बलवर्द्धक हैं. आप के यजमान पुत्र आप के पास हवि पहुंचाने के लिए आतुर हैं. आप उन की आहुतियां अंगीकार कीजिए. आप ऊर्जा का नाश रोकते हैं. हम आप की यज्ञ में सर्वप्रथम आराधना करते हैं. आप घी से बढ़ते हैं. (८) अच्छा नः शीरशोचिषं गिरो यन्तु दर्शतम्. अच्छा यज्ञासो नमसा पुरूवसुं पुरुप्रशस्तमूतये.. (९) हे अग्नि! आप दर्शनीय व लपटों वाले हैं. हमारी वाणियां शीघ्र आप तक पहुंचें. आप यज्ञ में हमारा मार्ग प्रशस्त कीजिए. हम यज्ञ में आप को नमन करते हैं. आप बहुत प्रशंसनीय हैं. आप भलीभांति प्रज्वलित हैं. (९) अग्नि ꣳ सूनु ꣳ सहसो जातवेदसं दानाय वार्याणाम्. द्विता यो भूदमृतो मर्त्येष्वा होता मन्द्रतमो विशि.. (१०) हे अग्नि! आप अमर हैं. आप पृथ्वी पर अमृत स्वरूप हैं. आप यज्ञ को सफल बना कर आनंददायक हैं. आप को दान देने के लिए हम बारबार बुलाते हैं. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

तीसरा खंड अदाभ्यः पुरुरएता विशामग्निर्मानुषीणाम्. तूर्णी रथः सदा नवः.. (१) हे अग्नि! आप मनुष्यों के पथप्रदर्शक, आगे चलने वाले, रथ के समान वेगवान व युवा हैं. आप को कोई नहीं दबा सकता है. (१) अभि प्रया २९ सि वाहसा दाश्वाँ अश्नोति मर्त्यः. क्षयं पावकशोचिषः.. (२) हे अग्नि! आप पवित्र, प्रकाशमान व हविवाहक हैं. हम हविदाता मनुष्य आप से अच्छा घर मांगते हैं. (२) साह्वान्विश्वा अभियुजः क्रतुर्देवानामामृक्तः. अग्निस्तुविश्रवस्तमः.. (३) हे अग्नि! आप शत्रुओं की सेना को हराने वाले, दिव्यगुणदाता व भरपूर अन्नदाता हैं. हम आप को सभी अग्नियों सहित आमंत्रित करते हैं. (३) भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः. भद्रा उत प्रशस्तयः.. (४) हे अग्नि! हम आप को आहुति देते हैं. आप हमारा कल्याण कीजिए. आप सौभाग्यशाली हैं. आप की कृपा हमें प्राप्त हो. हम कल्याणकारी स्तुतियां गा रहे हैं. आप हमारा कल्याण कीजिए. (४) भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये येना समत्सु सासहिः. अव स्थिरा तनुहि भूरि शर्धतां वनेमा ते अभिष्टये.. (५) हे अग्नि! आप हमारा मन कल्याणकारी बनाइए, पापमय विचारों व बुरी प्रवृत्तियों को दूर कीजिए. हम कल्याण के लिए आप की स्तुति करते हैं. आप हमें स्थिर बनाइए और हमें बहुत सा धन दीजिए. (५) अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो. अस्मे देहि जातवेदो महि श्रवः.. (६) हे अग्नि! आप बलवान, ईश्वर व गायों के स्वामी हैं. आप सब कुछ जानते हैं. आप हमें भरपूर वैभव प्रदान करने की कृपा कीजिए. (६) स इधानो वसुष्कविरग्निरीडेन्यो गिरा. रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि.. (७) हे अग्नि! आप सब के लिए आवासदाता हैं. ज्ञान से भरी स्तुति से आप की उपासना की जाती है. आप प्रकाशमान हैं. आप हमें प्रकाशमान संपदा दीजिए. (७) क्षपो राजन्नुत त्मानाग्ने वस्तोरुतोषसः. स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति.. (८) हे अग्नि! आप प्रकाशमान हैं. आप दिनरात (हर समय) दुष्टों को पीड़ा पहुंचाइए. आप तेजस्वी हैं. आप राक्षसों को जला कर भस्म कर दीजिए. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

चौथा खंड विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम्. अग्निं वो दुर्यं वच स्तुषे शूषस्य मन्मभिः.. (१) हे अग्नि! आप मेहमान की तरह सत्कार के योग्य एवं सभी को प्रिय हैं. आप को सभी हवि प्रदान करते हैं. हम मन से और यज्ञवेदी में आप को स्थापित कर के आप की बारबार स्तुति करते हैं. (१) यं जनासो हविष्मन्तो मित्रं न सर्पिरासुतिम्. प्रश ॐ सन्ति प्रशस्तिभिः.. (२) हे अग्नि! हम हविदाता आप के मित्र हैं. आप बहुत पूजनीय हैं. हम वैदिक प्रशस्तियों से आप की प्रशंसा करते हैं. (२) पन्या ॐ सं जातवेदसं यो देवतात्युद्यता. हव्यान्यैरयद्दिवि.. (३) हे अग्नि! आप सारे ज्ञानों से परिपूर्ण हैं. आप हवि को स्वर्गलोक में पहुंचाते हैं. हम आप की स्तुति करते हैं. (३) समिद्धमग्निं समिधा गिरा गृणे शुचिं पावकं पुरो अध्वरे ध्रुवम्. विप्र ॐ होतारं पुरुवारमद्रुहं कवि ॐ सुम्नैरीमहे जातवेदसम्.. (४) हे अग्नि! आप पवित्र हैं. आप समिधाओं से प्रकट होते हैं. आप स्थिर व यज्ञ में अग्रस्थानी हैं. ब्राह्मण, होता, सर्वज्ञाता, विद्वान् आदि सभी को आप धन देते हैं. हम बहुत अच्छे मन से आप की उपासना करते हैं. (४) त्वां दूतमग्ने अमृतं युगेयुगे हव्यवाहं दधिरे पायुमीड्यम्. देवासश्च मर्तासश्च जागृविं विभुं विशपतिं नमसा नि षेदिरे.. (५) हे अग्नि! आप अमर हैं. हम युगों से आप को अपना दूत मानते हैं. आप हविवाहक हैं. आप देवताओं और मनुष्यों दोनों को जाग्रत करते हैं. आप संसार व धन के स्वामी हैं. हम आप को नमन एवं आप की स्तुति करते हैं. (५) विभूषन्नग्न उभयाँ अनु व्रता दूतो देवाना ॐ रजसी समीयसे. यत्ते धीति ॐ सुमति मावृणीमहे ऽ ध स्म नस्त्रिवरूथः शिवो भव.. (६) हे अग्नि! आप देव और मनुष्य दोनों की शोभा बढ़ाते हैं. आप व्रतप्रिय, देवों के दूत, हविवाहक व तीनों लोकों में भ्रमणशील हैं. हम आप की स्तुति करते हैं. हम आप से सुख चाहते हैं. आप कल्याणकारी होइए. (६) उपत्वा जामयो गिरो देदिशतीर्हविष्कृतः. वायोरनीके अस्थिरन्.. (७) हे अग्नि! हमारी स्तुतियां बहनों के समान आप का गुण गाती हैं. हम वायु की सहायता ebook converter DEMO Watermarks*

से आप को प्रज्वलित करते हैं. हम यज्ञ स्थान में आप की स्थापना करते हैं. (७) यस्य त्रिधात्ववृतं बर्हिस्तस्थावसन्दिनम्. आपश्चिन्न्रि दधा पदम्.. (८) हे अग्नि! आप में जल भी विद्यमान हैं. आप के चारों ओर यज्ञकुंड के पास कुश के आसन बिछे हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (८) पदं देवस्य मीढुषो ऽ नाधृष्टाभिरूतिभिः. भद्रा सूर्य इवोषदृक्.. (९) हे अग्नि! आप प्रकाशवान, सराहनीय, शत्रुहीन और धैर्यशाली हैं. आप का दर्शन करना सूर्य के दर्शन के समान कल्याणकारी है. (९)

सोलहवां अध्याय

सोलहवां अध्याय पहला खंड अभि त्वा पूर्वपीतये इन्द्र स्तोमेभिरायवः. समीचीनास ऋभवः समस्वरन्नुदा गृणन्त पूर्व्यम्.. (१) हे इंद्र! यजमान चाहते हैं कि आप सब से पहले सोमरस पीजिए. यजमान वैदिक मंत्रों से आप की स्तुति कर रहे हैं. आप उचित दृष्टि वाले हैं. रुद्र और ऋभुगण आप की गणना सर्वप्रथम करते हैं. वे भी आप ही की स्तुति करते हैं. (१) अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्य २४ शवो मदे सुतस्य विष्णवि. अद्या तमस्य महिमानमायवो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा.. (२) हे इंद्र! आप सोमरस पी कर प्रसन्न होते हैं. आप यजमान का वीर्य और शक्ति दोनों बढ़ाते हैं. आप महिमावान हैं. यजमान आप की उसी महिमा का बखान करते हैं. (२) प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः. इन्द्राग्नी इष आ वृणे.. (३) हे इंद्र! हे अग्नि! यजमान आप की अर्चना करते हैं. सामगायक आप के गुण गा रहे हैं. अन्न धन हेतु हम भी आप को आमंत्रित करते हैं. (३) इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्. साकमेकेन कर्मणा.. (४) हे इंद्र! हे अग्नि! आप ने एक ही बार एक साथ नब्बे नगरों को कंपकंपा दिया. (४) इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः. ऋतस्य पथ्या ३ अनु.. (५) हे इंद्र! हे अग्नि! यज्ञ के होता आदि पुरोहित सत्य के मार्ग से हमारे यज्ञ के पास उपस्थित होते हैं. (५) इन्द्राग्नी तविषाणि वा २४ सधस्थानि प्रया २४ सि च. युवोरप्तूर्य २४ हितम्.. (६) हे इंद्र! हे अग्नि! आप हित साधने वाले हैं. आप के प्रयास सदैव शुभ कार्यों की ओर लगे रहते हैं. (६) शग्ध्यू ३ षु शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः. भगं न हि त्वा यशसं वसुविद्मनु शूर चरामसि.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे इंद्र! आप शचीपति, शक्तिमान, धनवान, सौभाग्यवान और यशस्वी हैं. हम आप का अनुगमन करते हैं. (७) पौरो अश्वस्य पुरुकृद्गवामस्युत्सो देव हिरण्ययः. न किर्हि दानं परि मर्धिषत्वे यद्यद्यामि तदा भर.. (८) हे इंद्र! आप अश्व, गौ आदि पशुओं का पालन करते हैं. स्वर्णमयी मुद्रा से जैसे प्रसन्नता होती है, वैसे ही आप को देख कर प्रसन्नता होती है. कोई भी आप के दान को भूल नहीं सकता. आप हमें भरपूर धन दीजिए. (८) त्व २३ होहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये. उद्वावृषस्व मघवन्गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये.. (९) हे इंद्र! आप हमें धन देने के लिए पधारिए. आप सन्मार्ग पर चलने वाले को सौभाग्यवान बनाइए. आप हमारी गौ संबंधी इच्छाओं को पूरा कीजिए. (९) त्वं पुरू सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय म २३ हसे. आ पुरंदरं चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तो ऽ वसे.. (१०) हे इंद्र! आप सैकड़ोंहजारों गायों के झुंड देने व शत्रु नगरियों को नष्ट करने की सामर्थ्य रखते हैं. यजमान अपनी रक्षा के लिए साम मंत्र गा रहे हैं. इंद्र ब्राह्मणों के वचनों से युक्त हैं. हम उन को आमंत्रित करते हैं. (१०) यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम्. मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये.. (११) हे अग्नि! आप धनदाता, होता व आनंददाता हैं. सोमरस से भरे पात्र आप तक पहुंचें. सर्वप्रथम हम आप की स्तुति करते हैं. वे स्तुतियां भी आप तक पहुंचें. (११) अश्वं न गीर्भी रथ्य २३ सुदानवो मर्मृज्यन्ते देवयवः. उभे तोके तनये दस्म विश्पते पर्षि राधो मघोनाम्.. (१२) हे अग्नि! सारथी जैसे रथ में जोते गए घोड़ों को जोश दिलाने के लिए बोलता रहता है, वैसे ही यजमान आप के लिए स्तुतियां बोलते हैं. आप राक्षसों से धन छीन कर अपने उपासकों को देने की कृपा कीजिए. आप उत्तम कोटि के दानदाता हैं. (१२) दूसरा खंड इमं मे वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय. त्वामवस्युरा चके.. (१) हे वरुण! आप हमारी इन स्तुतियों पर कान (ध्यान) दीजिए. आप हमें सुख दीजिए. हम आप से अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

कया त्वं न ऊत्याभि प्र मन्दसे वृषन्. कया स्तोतृभ्य आ भर.. (२) हे इंद्र! आप किन साधनों से हमारी रक्षा करते हैं? आप हमें किस प्रकार बहुत प्रसन्नता देते हैं? आप कैसे यजमानों (स्तोताओं) की इच्छापूर्ति करते हैं? (२) इन्द्रमिद्देवतातय इन्द्रं प्रयत्यध्वरे. इन्द्र २४ समीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये.. (३) हे इंद्र! हम यज्ञ में व वीर भक्तगण संग्राम में आप को आमंत्रित करते हैं. हम धन हेतु आप का आह्वान करते हैं. (३) इन्द्रो मह्ना रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्यमरोचयत्. इन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिरे इन्द्रे स्वानास इन्दवः.. (४) हे इंद्र! आप महान हैं. आप ने स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक का फैलाव किया. आप ने सूर्य को प्रकाश से चमकाया. आप ने सकल भुवनों को शरण दी. हम आप के लिए सोमरस भेंट करते हैं. (४) विश्वकर्मन्हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व तन्व ३ २४ स्वा हि ते. मुह्यन्त्वन्ये अभितो जनास इहास्माकं मघवा सूरिरस्तु.. (५) हे इंद्र! आप हवि से बढ़ोतरी पाते हैं. आप सभी कर्म साधते हैं. हम संसार के कल्याण के लिए अपने को न्योछावर करते हैं. यज्ञ से विरोध रखने वाले लोगों का मनोबल टूटे. इंद्र हमारे हो जाएं. बुद्धिजीवी लोग हमारे हो जाएं. (५) अया रुचा हरिण्या पुनानो विश्वा द्वेषा २४ सि तरति सयुग्वभिः सूरो न सयुग्वभिः धारा पृष्ठस्य रोचते पुनानो अरुषो हरिः. विश्वा यद्रूपा परियास्यृक्वभिः सप्तास्येभिर्ऋक्वभिः.. (६) हे सोम! आप का रस रुचिपूर्ण है व हरित आभा वाला है. आप उस से द्वेषियों का वैसे ही संहार करते हैं, जैसे सूर्य अपनी किरणों से अंधेरे का संहार करते हैं. आप का रस प्रकाशमान है. छलनी पर आप की धारा प्रकाशमान है. आगेपीछे सब ओर आप की धारा शोभित होती है. आप अपने सात मुखों से निकलने वाली सात किरणों से कहीं ज्यादा प्रकाशमान व उत्तम हैं. (६) प्राचीमनु प्रदिशं याति चेकितत्स २४ रश्मिभिर्यतते दर्शतो रथो दैव्यो दर्शतो रथः. अग्मन्नुक्थानि पौ २४ स्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन्. वज्रश्च यद्भवथो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता.. (७) हे सोम! आप पूर्व दिशा में प्रस्थान करते हैं. तब आप का रथ बहुत चमकता है. आप का रथ दिव्य व दर्शनीय है. यजमान मंत्र गागा कर अपनी स्तुतियां आप और इंद्र तक पहुंचाते हैं. यजमान विजय पाने की इच्छा से आप को प्रसन्न करते हैं. वे आप से वज्र प्राप्त ebook converter DEMO Watermarks*

करते हैं. आप दोनों मिल कर किसी भी युद्ध में यजमान को हारने नहीं देते हैं. (७) त्व ॐ ह त्यत्पणीनां विदो वसु सं मातृभिर्मर्जयसि स्व आ दम ऋतस्य धीतिभिर्दमे. परावतो न साम तद्यत्रा रणन्ति धीतयः. त्रिधातुभिरुषीभिर्वयो दधे रोचमानो वयो दधे.. (८) हे सोम! आप ने व्यापारियों से धन पाया. आप मातृ जल से पवित्र किए जाते हैं. आप के लिए गाए जाने वाले सामगान यज्ञ स्थान से बहुत दूर दूर तक गूंजते हैं. आप स्वर्गलोक, अंतरिक्षलोक एवं पृथ्वीलोक तीनों ही जगह सुशोभित होते हैं. आप हमें दीर्घायु कीजिए. (८) तीसरा खंड उत नो गोषणिं धियमश्वसां वाजसामुत. नृवत्कृणुहूतये.. (१) हे पूषा! आप हमारी बुद्धि की रक्षा कीजिए. हमारी बुद्धि हमें गोधन, अश्वधन व धन प्राप्त कराती है. (१) शशमानस्य वा नरः स्वेदस्य सत्यशवसः. विदाकामस्य वेनतः.. (२) हे मरुद्गण! सत्य हमारा बल है. हम यज्ञ करते हुए पसीने से तर हो गए हैं. आप ऐसे उपासकों की मनोकामनाएं पूरी करने की कृपा कीजिए. (२) उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये. सुमृडीका भवन्तु नः.. (३) हे मरुद्गण! आप प्रजापति के पुत्र हैं. आप अमर हैं. आप हमें सुखी बनाने की कृपा कीजिए. आप स्तुतियां सुनने की कृपा कीजिए. (३) प्र वां महि द्यावी अभ्युपस्तुतिं भरामहे. शुची उप प्रशस्तये.. (४) हे स्वर्गलोक! हे पृथ्वीलोक! हम स्तुतियों से आप के समीप पहुंचते हैं. हम आप दोनों लोकों के लिए भरपूर स्तुतियां उच्चारते हैं. (४) पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः. ऊह्याथे सनादृतम्.. (५) हे देवी! आप स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक को पवित्र करती हैं. आप प्रकाशवती हैं. आप यज्ञ की परिपाटियों का निर्वाह करती हैं. (५) मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्. परिं यज्ञं निषेधथुः.. (६) हे देवियो! हे अंतरिक्षलोक! यजमान आप के सखा हैं. आप यजमान की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. आप यज्ञ को पूर्ण कराते हैं. आप यज्ञ को पूरा सहयोग देते हैं. (६) अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम्. वचस्तच्चिन्न ओहसे.. (७) हे इंद्र! हमारी स्तुतियां स्नेह से आप के पास उसी तरह पहुंचती हैं, जैसे कबूतर प्रेम से ebook converter DEMO Watermarks*

कबूतरी के पास पहुंचता है. (७) स्तोत्र ॐ राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते. विभूतिरस्तु सूनृता.. (८) हे इंद्र! आप धनों के स्वामी व वीर हैं. आप वाणी से स्तुति योग्य, अच्छे ऋत (सत्य) वाले और वैभववान हैं. (८) ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतये ऽ स्मिन् वाजे शतक्रतो. समन्येषु ब्रवावहै.. (९) हे इंद्र! आप सैकड़ों कार्य करने वाले हैं. आप हमारे संरक्षण के लिए प्रयास कीजिए. आप उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित हैं. हम आप से कुछ अन्य बातों के बारे में भी परामर्श (निवेदन) करते रहें. (९) गाव उप वदावटे मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (१०) हे गौओ! यज्ञ स्थान के पास आप को बुलाया जा रहा है. आप रंभा कर आवाज कीजिए. आप यज्ञ फल देने वाली हैं. आप के दोनों ही कान सोने के हैं. (१०) अभ्यारमिदद्रयो निषिक्तं पुष्करे मधु. अवटस्य विसर्जने.. (११) हम पत्थर से कूट कर निकाला गया, बचा हुआ सोमरस परम वीर इंद्र के विसर्जन पर भेंट करने के लिए द्रोणकलश में स्थापित करते हैं. (११) सिञ्चन्ति नमसावटमुच्चाचक्रं परिज्मानम्. नीचीनबारमक्षितम्.. (१२) हम यजमान उस परम शक्ति को नमस्कार करते हैं, नमनपूर्वक यज्ञ विधान करते हैं. उस परम शक्ति का चक्र ऊपर (लोक) स्थित है, नीचे का द्वार चारों ओर झुका हुआ है. वह द्वार अक्षत है. (१२) चौथा खंड मा भेम मा श्रमिष्मोग्रस्य सख्ये तव. महत्ते वृष्णो अभिचक्ष्यं कृतं पश्येम तुर्वशं यदुम्.. (१) हे इंद्र! हम आप के मित्र हैं, इस कारण हम कभी भी श्रम से थके नहीं, कभी भी किसी से डरे नहीं. आप महान हैं. आप की कृपा सराहनीय है. तुर्वश और यदु दोनों ही प्रसन्न दिखाई देते हैं. (१) सव्यामनु स्फिग्यं वावसे वृषा न दानो अस्य रोषति. मध्वा संपृक्ताः सारघेण धेनवस्तूयमेहि द्रवा पिब.. (२) हे इंद्र! आप क्षमतावान हैं. आप बाएं हाथ से ही (आसानी से) सब को शरण दे देते हैं. अत्यंत क्रूर भी आप का कुछ बिगाड़ नहीं सकते. मीठे दूध वाली गायों के समान सुखदायी ebook converter DEMO Watermarks*

आप की स्तुति हम करते हैं. आप उन्हीं के समान सुखद हैं. आप जितनी जल्दी हो सके हमारे यज्ञ स्थान पर पधारिए व सोमपान करिए. (२) इमा उत्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम. पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितो ऽ भि स्तोमैरनूषत.. (३) हे इंद्र! हमारी स्तुतियां आप का यशवर्धन करें. हमारी स्तुतियां श्रेष्ठ ज्ञानमय हैं. ज्ञानी और तेजस्वी यजमान आप की स्तुति करते हैं. (३) अय ॐ सहस्रमृषिभिः सहस्कृतः समुद्र इव पप्रथे. सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये.. (४) हे इंद्र! आप समुद्र की भांति विस्तृत हैं. आप हजारों ऋषियों जैसे बलवान हैं. आप सत्यवान व शक्तिमान हैं. ब्रह्मज्ञानी लोगों के निर्देशन में आप की स्तुतियां गाई जाती हैं. (४) यस्यायं विश्व आर्यो दासः शेवाधिपा अरिः. तिरश्चिदर्ये रुशमे पवीरवि तुभ्येत्यो अज्यते रयिः.. (५) हे इंद्र! यह सारा विश्व आप का है. आर्य दास की भांति आप की सेवा करते हैं. आप शत्रुओं के अधीश हैं. रुश्म और पवि शक्तिमान हो कर भी आप की पूजा करते हैं. (५) तुरण्यवो मधुमन्तं घृतश्चुतं विप्रासो अर्कमानृचुः. अस्मे रयिः पप्रथे वृष्ण्य ॐ शवो ऽ स्मे स्वानास इन्दवः.. (६) हे इंद्र! हम आप की अर्चना करते हैं. यजमान ब्राह्मण यज्ञ करते हैं. वे यज्ञ में शहद और घी से भरी हुई आहुतियां व हम हवि रूपी धन देते हैं. सोम प्रसिद्धि प्राप्त करें. (६) गोमन्न इन्दो अश्ववत्सुतः सुदक्ष धन्विव. शुचिं च वर्णमधि गोषु धारय.. (७) हे सोम! आप हमें गोवान व अश्ववान बनाइए. आप गाय के दूध में मिल कर पवित्र सफेद रंग प्राप्त करते हैं. (७) स नो हरीणां पत इन्दो देवप्सरस्तमः. सखेव सख्ये नर्यो रुचे भव.. (८) हे सोम! आप हरे हैं. आप देवताओं द्वारा ईप्सिततम (सब से ज्यादा चाहे गए) हैं. आप उसी तरह हम में रुचि लेते हैं, जैसे एक मित्र दूसरे मित्र का सहयोग करने के लिए रुचि लेता है. (८) सनेमि त्वमस्मदा अदेवं कं चिदत्रिणम्. साह्वां इन्दो परि बाधो अप द्वयुम्.. (९) हे इंद्र! आप प्राचीन काल से चले आ रहे सुख हमें दीजिए. आप सुख में बाधा पैदा करने वाले शत्रुओं, दोगले व्यवहार वालों व स्वार्थियों का भी नाश कीजिए. (९) अज्जते व्यज्जते समज्जते ऋतु ॐ रिहन्ति मध्वाभ्यज्जते. ebook converter DEMO Watermarks*

सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षण २४ हिरण्यपावाः पशुमप्सु गृभ्णते.. (१०) हे सोम! सोमरस में यजमान गाय का दूध मिलाते हैं. उसे पी कर प्रसन्न होते हैं, अनेक प्रकार से उसे अनेक रूपों में तैयार करते हैं. उसे मीठे दूध व सोने जैसे चमकते हुए जल में मिलाते हैं. सोम ऊंचे स्थान से, जल के ऊंचे भाग से गिरते हैं. वे सर्वद्रष्टा हैं. (१०) विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति. अहिर्न जूर्णामिति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीडन्नसरद्वृषा हरिः.. (११) हे यजमानो! आप सोम के गुण गाइए. सोम ज्ञानी व हरे हैं. वे विशाल धाराएं धारण करते हैं. सांप के केंचुली बदलने की तरह वे अपनी पुरानी छाल बदल देते हैं. वे घोड़े जैसे खेलते हुए द्रोणकलश में जाते हैं. (११) अग्रेगो राजाप्यस्तविष्यते विमानो अह्नां भुवनेष्वर्पितः. हरिर्घृतस्नुः सुदृशीको अर्णवो ज्योतीरथः पवते राय ओक्यः.. (१२) सोम अग्रगामी हैं, राजा हैं, जल में मिलते हैं और प्रशंसा प्राप्त करते हैं. वे लोकों में दिन के (समय के) मापक, सुंदर व हरे हैं. वे जलवासी, ज्योतिर्मय रथ वाले व धन का भंडार हैं. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

सत्रहवां अध्याय

सत्रहवां अध्याय पहला खंड विश्वेभिरग्ने अग्निभिरिमं यज्ञमिदं वचः. चनो धाः सहसो यहो.. (१) हे अग्नि! आप समस्त अग्नियों के साथ यज्ञ में पधारिए. आप इस यज्ञ में हमारे वचन सुनिए. आप हमें अन्न प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१) यच्चिद्धि शश्वता तना देवं देवं यजामहे. त्वे इद्धूयते हविः.. (२) हे अग्नि! हम इंद्र, वरुण और अन्य देवताओं को हवि दे कर भजन करते हैं. वह सब आप तक पहुंचता है. (२) प्रियो नो अस्तु विश्पतिर्होता मन्द्रो वरेण्यः. प्रियाः स्वग्नयो वयम्.. (३) अग्नि हमें प्रिय हैं. वे विश्वपति, होता और वरेण्य हैं. उन्हें हम सब प्रिय हों. (३) इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः. अस्माकमस्तु केवलः.. (४) हे यजमानो! इंद्र सभी लोकों से ऊपर हैं. लोगों के कल्याण के लिए हम उन का आह्वान करते हैं. आप की कृपा से हम सब का कल्याण हो. (४) स नो वृषन्नमुं चरु २४ सत्रादावन्नपा वृधि. अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः.. (५) हे इंद्र! हमारे द्वारा समर्पित हवि ग्रहण कीजिए. हमारी इच्छाओं को खाली न लौटाएं. आप जल्दी से जल्दी फल देने वाले हैं. (५) वृषा यूथेव व २४ सगः कृष्टीरियर्त्योजसा. ईशानो अप्रतिष्कुतः.. (६) हे इंद्र! आप बलवान हैं. आप उसी तरह उपासकों की इच्छा पूरी करने जाते हैं, जैसे गायों के झुंड में बैल जाता है. आप ईश्वर हैं. आप हमारे विरोधी नहीं हो सकते. (६) त्वं नश्चित्र ऊत्या वसो राधा २४ सि चोदय. अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विदा गाधं तुचे तु नः.. (७) हे अग्नि! आप हमें संरक्षण दीजिए. आप जो धन अपने रथ से ले जाते हैं, वह हमें दीजिए. आप विलक्षण हैं. हमारी पीढ़ियां भी यशस्वी हों. (७) पर्षि तोकं तनयं पर्तृभिष्वमदब्धैरप्रयुत्वभिः ebook converter DEMO Watermarks*

अग्ने हेडा ꣲ सि दैव्या युयोधि नो ऽ देवानि हृरा ꣲ सि च.. (८) हे अग्नि! आप सहयोगी व स्वतंत्र हैं. आप अपने रक्षा साधनों से हमारी व पीढ़ियों की रक्षा कीजिए. आप प्राकृतिक प्रकोपों और दुष्ट प्रवृत्तियों से हमें बचाइए. (८) किमित्ते विष्णो परिचक्षि नाम प्र यद्ववक्षे शिपिविष्टो अस्मि. मा वर्पो अस्मदप गूह एतद्यदन्यरूपः समिथे बभूथ.. (९) हे विष्णु! आप सर्वत्र व्याप्त हैं. आप अपना यह विराट् और व्यापक स्वरूप हम से छिपा कर (गुप्त) न रखिए. आप कितने ही रूप क्यों न धारण कर लें फिर भी आप हमारी रक्षा अवश्य करते हैं. (९) प्र तत्ते अद्य शिपिविष्ट हव्यमर्यः श ꣲ सामि वयुनानि विद्वान्. तं त्वा गृणामि तवसमत्यान्-क्षयन्त मस्य रजसः पराके.. (१०) हे विष्णु! आप रश्मिवान व आदरणीय हैं. मैं व विद्वान् भी आप की प्रशंसा करते हैं. हम आप के विष्णुलॊक से दूर हैं, फिर भी हम अपने लोक से आप की वैसे ही प्रशंसा करते हैं, जैसे कोई छोटा भाई करता है. (१०) वषट् ते विष्णवास आ कृणोमि तन्मे जुषस्व शिपिविष्ट हव्यम्. वर्धन्तु त्वा सुष्टुतयो गिरो मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (११) हे विष्णु! वषट्कार से हम आप को आमंत्रित करते हैं. आप रश्मिवान हैं. आप हमारी हवि को स्वीकारिए. हमारी अच्छी स्तुतियां आप की बढ़ोतरी करें. आप मंगलकारी आशीर्वादों से हमारा कल्याण करने की कृपा कीजिए. (११) दूसरा खंड वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु. आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता.. (१) हे वायु! हम यज्ञ में सब से पहले आप को सोमरस चढ़ाते हैं. आप आदरणीय हैं. हे देव! आप नियुत नामक घोड़े के साथ सोमपान के लिए आ जाइए. (१) इन्द्रश्च वायवेषा ꣲ सोमानां पीतिमर्हथः. युवा ꣲ हि यन्तीन्दवो निम्नमापो न सध्र्यक्.. (२) हे इंद्र! हे वायु! आप सोमपान के योग्य हैं. जलधार जैसे नीचे की ओर जाती है, वैसे ही आप दोनों के लिए सोमरस की धारा पहुंचती है. (२) वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथ ꣲ शवसस्पती. नियुत्वन्ता न ऊतय आ यात ꣲ सोमपीतये.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*