सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
हे इंद्र! हे वायु! आप बलवान व क्षमतावान हैं. आप नियुत्त घोड़े को रथ में जोत कर सोमपान हेतु आइए. (३) अध क्षपा परिष्कृतो वाजाँ अभि प्र गाहसे. यदी विवस्वतो धियो हरि ॐ हिन्वन्ति यातवे.. (४) हे सोम! आप पौष्टिक अन्न देते हैं. आधी रात के बीत जाने पर छने हुए सोम में जल मिलाया जाता है. यजमान की बुद्धि हरित सोमरस को कलश की ओर उन्मुख करती है. (४) तमस्य मर्जयामसि मदो य इन्द्रपातमः. यं गाव आसभिर्दधुः पुरा नूनं च सूरयः.. (५) सोमरस मददायी है. यह इंद्र के पीने योग्य है. इसे आज भी पीया जाता है. यह पहले भी पीया जाता था. सोम को गाएं भी खुशीखुशी खाती हैं. (५) तं गाथया पुराण्या पुनानमभ्यनूषत. उतो कृपन्त धीतयो देवानां नाम बिभ्रतीः.. (६) यजमान पुरानी गाथाओं से सोमरस की उपासना करते हैं. यज्ञ कर्म हेतु चमकता हुआ सोम देवताओं को आहुति के रूप में भी दिया जाता है. (६) अश्वं न त्वा वारवन्तं वन्दध्या अग्निं नमोभिः. सम्राजन्तमध्वराणाम्.. (७) हे अग्नि! आप यज्ञ के सम्राट हैं. घुड़सवार जैसे घोड़े से प्रेम करता है, उसी तरह हम आप से प्रेम व आप को नमस्कार करते हैं. (७) स घा नः सूनुः शवसा पृथुप्रगामा सुशेवः. मीढ्वाँ अस्माकं बभूयात्.. (८) हे अग्नि! हम आप के पुत्र हैं. हम विधिविधान से आप की उपासना करते हैं. आप बहुत शीघ्रगामी हैं. आप हमारे लिए सुखदायी हों. (८) स नो दूराच्चासाच्च नि मर्त्यादघायोः. पाहि सदमिद्विश्वायुः.. (९) हे अग्नि! आप मनुष्यों का भला चाहते हैं. आप दूर और पास दोनों दृष्टियों से शत्रुओं से हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. (९) त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः. अशस्तिहा जनिता वृत्रतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः.. (१०) हे इंद्र! आप युद्धों में स्पर्धा करने वाले सभी शत्रुओं को दूर करते हैं. आप विघ्नहारी हैं. (१०) अनु ते शुष्मं तुरयन्तमीयतुः क्षोणी शिशुं न मातरा. विश्वास्ते स्पृधः श्रथयन्त मन्यवे वृत्रं यदिन्द्र तूर्वसि.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! अंतरिक्षलोक और पृथ्वीलोक आप के बल का वैसे ही अनुसरण करते हैं, जैसे मातापिता बच्चे के पीछे चलचल कर उस की रक्षा करते हैं. जब आप वृत्रासुर से युद्ध करते हैं तो आप के सामने युद्ध के लिए तैयार शत्रु के भी हौसले पस्त हो जाते हैं. (११) तीसरा खंड यज्ञ इन्द्रमवर्धद्यद्भूमिं व्यवर्तयत्. चक्राण ओपशं दिवि.. (१) यज्ञ इंद्र की बढ़ोतरी व भूमि को विस्तृत करते हैं. वे स्वर्गलोक से मेघों को वर्षा के लिए प्रेरित करते हैं. (१) व्य ३ न्तरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना. इन्द्रो यदभिनद्वलम्.. (२) इंद्र मेघों को भेदते व अंतरिक्ष में विशेष शोभा बढ़ाते हैं. वे सोमरस से प्रसन्न होते हैं. (२) उद्गा आजदङ्गिरेाभ्य आविष्कृण्वन्गुहा सती:. अर्वाञ्चं नुनुदे वलम्.. (३) सूर्य ने गुफा की किरणों को बाहर निकाल कर उसे अंगिराओं (अंगधारियों) तक पहुंचाया. उन किरणों को छिपा कर रखने वाला राक्षस भाग गया. (३) त्यमु वः सत्रासाहं विश्वांसु गीर्ष्वायतम्. आ च्यावयस्यूतये.. (४) हे इंद्र! आप शत्रुओं को एक साथ मारते हैं. हम अपनी रक्षा के लिए स्तुतियों से आप को आमंत्रित करते हैं. (४) युध्म १७ं सन्तमन्वर्वाण १७ं सोमपामनपच्युतम्. नरमवार्यक्रतुम्.. (५) हे इंद्र! आप युद्ध करते हुए कभी नहीं हारते. सोमपान के लिए आप का मन दृढ़ निश्चय वाला है. हम यज्ञ में आप का सहयोग चाहते हैं. (५) शिक्षा ण इन्द्र राय आ पुरु विद्वां ऋचीषम. अवा नः पार्ये धने.. (६) हे इंद्र! आप सर्वज्ञाता व दर्शनीय हैं. आप हमारे लिए धन दीजिए. शत्रुओं से भी आप को जो धन मिले, वह हमें दीजिए. (६) तव त्यदिन्द्रियं बृहत्तव दक्षमृत क्रतुम्. वज्र १७ं शिशाति धिषणा वरेण्यम्.. (७) हे इंद्र! आप अपनी विशालता, दक्षता और श्रेष्ठ बुद्धि से यज्ञ और वज्र को तीक्ष्ण बनाते हैं. (७) तव द्यौरिन्द्र पौ १७ं स्यं पृथिवी वर्धति श्रवः. त्वामापः पर्वतासश्च हिन्विरे.. (८) हे इंद्र! स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक से आप के स्वरूप का विस्तार होता है. जल और पर्वत आप को अपना स्वामी मानते हैं. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
त्वां विष्णुर्बृहन्क्षयो मित्रो गृणाति वरुणः. त्वा २३ शर्द्धो मदत्यनु मारुतम्.. (९) हे इंद्र! आप विशाल व आश्रयदाता हैं. विष्णु, मित्र और वरुण आप की स्तुति गाते हैं. मरुद्गण आप को प्रसन्न करते हैं. (९) चौथा खंड नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः. अमैरमित्रमर्दय.. (१) हे अग्नि! हम बल प्राप्ति के लिए आप को आमंत्रित करते हैं. आप अमित्रों का मर्दन करने की कृपा कीजिए. (१) कुवित्सु नो गविष्टये ऽ ग्ने संवेषिषो रयिम्. उरुक्कृदुरु णस्कृधि.. (२) हे अग्नि! आप महान हैं. आप से हम महानता चाहते हैं. आप हम गौ इच्छुकों को प्रचुर गोधन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (२) मा नो अग्ने महाधने परा वगर्भर्भृद्याथा. संवर्ग २३ स २३ रयिं जय.. (३) हे अग्नि! आप हम से विमुख मत होइए. भारवाही जैसे बोझा ढोता है, वैसे ही आप शत्रु समूह से जीते हुए धन को हमारे लिए ढोइए. (३) समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः. समुद्रायेव सिन्धवः.. (४) नदियां जैसे समुद्र की ओर जाती हैं, वैसे ही सारे लोग आप के क्रोध के सामने नत हो जाते हैं. (४) वि चिद्वृत्रस्य दोधतः शिरो बिभेद वृष्णिना. वज्रेण शतपर्वणा.. (५) इंद्र ने अपनी शक्ति से सैकड़ों धार वाले वज्र से वृत्रासुर का सिर काट डाला. वृत्रासुर ने संसार को भयभीत कर रखा था. (५) ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत्समवर्तयत्. इन्द्रश्चर्मेव रोदसी.. (६) इंद्र ने अपने ओज से स्वर्गलोक और भूलोक को चमड़ी की तरह धारण कर रखा है. (६) सुमन्मा वस्वी रन्ती सूनरी.. (७) हे इंद्र! आप अच्छे मन वाले, वैभवशाली व रमणीय हैं. (७) सरूप वृषन्ना गहीमौ भद्रौ धुर्यावभि. ताविमा उप सर्पतः.. (८) हे इंद्र! कल्याणकारी सुंदर घोड़ों वाले रथ को धुरी पर चढ़ा कर हमारे पास पहुंचिए. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
नीव शीर्षाणि मृढ्वं मध्य आपस्य तिष्ठति. शृङ्गेभिर्दशभिर्दिशन्.. (९) हे यजमानो! अभीष्ट फलदायी इंद्र हमारे यज्ञ के मध्य उपस्थित हैं. हम सिर झुका कर उन दर्शनीय इंद्र का दर्शन करें. (९)
अठारहवां अध्याय
अठारहवां अध्याय पहला खंड पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय. सोमं वीराय शूराय.. (१) हे यजमानो! आप सोमरस तैयार करने में लगे हुए हो. आप शूरवीर इंद्र को सोमरस भेंट कीजिए. सोमरस मददायी है. आप जल्दीजल्दी दौड़ कर वह सोमरस इंद्र को भेंट कीजिए. (१) एह हरी ब्रह्मयुजा शग्मा वक्षतः सखायम्. इन्द्रं गीर्भिर्गिर्वणसम्.. (२) इंद्र के घोड़े वाणी के संकेत से ही रथ में जुत जाते हैं. इंद्र हमारे सखा व वाणी से उपास्य हैं. इंद्र के घोड़े उन्हें ले कर यज्ञ में आने की कृपा करें. (२) पाता वृत्रहा सुतमा घा गमन्नारे अस्मत्. नि यमते शतमूतिः.. (३) हे इंद्र! आप वृत्रासुर हंता व सोमपायी हैं. आप दुश्मनों को दूर भगाने व हमारे यज्ञ में अवश्य पधारने की कृपा कीजिए. (३) आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः. न त्वामिन्द्राति रिच्यते.. (४) हे इंद्र! आप के अतिरिक्त और कोई देव श्रेष्ठ नहीं हैं. आप को सोमरस वैसे ही प्राप्त हो, जैसे समुद्र को नदियां प्राप्त होती हैं. (४) विव्यक्थ महिना वृषन्भक्ष १७ सोमस्य जागृवे. य इन्द्र जठरेषु ते.. (५) हे इंद्र! आप जाग्रत व शक्तिमान हैं. सोम के कारण आप की ख्याति बहुत व्यापक है. आप के जठर (पेट) में पहुंचा हुआ सोम भी प्रशंसा प्राप्त करता है. (५) अरं त इन्द्र कुक्षये सोमो भवतु वृत्रहन्. अरं धामभ्य इन्दवः.. (६) हे इंद्र! आप ने वृत्रासुर का हनन किया. हम ने आप को जो सोमरस भेंट किया, वह आप के लिए भरपूर हो. वह सोमरस अन्य देवताओं के लिए भी भरपूर हो. (६) जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय. स्तोम १७ रुद्राय दृशीकम्.. (७) हे अग्नि! आप को प्रार्थनाओं से प्रज्वलित किया जाता है. आप बारबार यजमानों के कल्याण के लिए यज्ञ मंडप में प्रकट होने की कृपा कीजिए. यजमान रुद्र के लिए अच्छे स्तोत्र ebook converter DEMO Watermarks*
बोले. (७) स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः धिये वाजाय हिन्वतु.. (८) हे अग्नि! आप की ध्वजा बहुत ही धूम्रमय (धुएं वाली) है. आप महान व आनंददायी हैं. आप हमें बौद्धिक वैभव प्रदान करने की कृपा कीजिए. (८) स रेवाँ इव विशपतिर्दैव्यः केतुः शृणोतु नः. उक्थैरग्निबृहद्भानुः.. (९) हे अग्नि! आप विश्वपालक, दिव्य, दूरदर्शी व राजा जैसे हैं. आप वाणी से की गई हमारी स्तुति को सुनने की कृपा कीजिए. (९) तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने. शं यद्गवे न शाकिने.. (१०) हे यजमानो! आप इंद्र के लिए एकत्रित हो कर प्रार्थनाएं गाइए. इंद्र को स्तोत्र ऐसे प्रिय लगते हैं, जैसे गायों को घास. (१०) न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः. यत्सीमुपश्रवद्गिरः. (११) हे इंद्र! स्तुति से भरी हुई हमारी वाणियां जब आप के समीप पहुंचती हैं तो आप यजमान को धनवान और गोवान बनाने में नहीं चूकते हैं. (११) कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा ग्मत्. शचीभिरप नो वरत्.. (१२) हे इंद्र! चोर व डाकू जो गाएं चुराते हैं, आप उन गायों को अपने अधीन कर लेते हैं. आप उन गायों से हमें गोवान बना देते हैं. (१२) दूसरा खंड इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्. समूढमस्य पा ꣳ सुले.. (१) विष्णु ने अपने पैरों को तीन प्रकार से रखा. उन पैरों की पदधूलि में ही सारा संसार समा गया. (१) त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः. अतो धर्माणि धारयन्.. (२) विष्णु अपने तीन पैरों में धर्म को धारण करते हुए संसार को संचालित करते हैं. वे सर्वत्र व्याप्त हैं. (२) विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३) हे यजमानो! आप विष्णु के कर्मों को देखने की कृपा कीजिए. उन कर्मों के वे प्रेरक और इंद्र के योग्य मित्र हैं. (३) तद्विष्णोः परमं पद ꣳ सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
स्वर्गलोक में स्थित सूर्य को जैसे साधारण आंखों से आसानी से देख सकते हैं, वैसे ही बुद्धिमान यजमान विष्णु के परमपद को देख लेते हैं. (४) तद्विप्रासो विपन्युवो जागृवा ꣳ सः समिन्धते. विष्णोर्यत्परमं पदम्.. (५) जाग्रत यजमान अपने श्रेष्ठ यज्ञ कर्मों से विष्णु के श्रेष्ठ पद को प्राप्त करते हैं. (५) अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे. पृथिव्या अधि सानवि.. (६) विष्णु ईश्वर हैं. उन्होंने पृथ्वी के सब से ऊंचे स्थान से अपनी प्रतिष्ठा स्थापित की है. उस श्रेष्ठ लोक से देवता हमारी रक्षा करने की कृपा करें. (६) मो षु त्वा वाघतश्च नारे अस्मन्नि रीरमन्. आरात्ताद्वा सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि.. (७) हे इंद्र! आप हम से बहुत दूर हैं. फिर भी हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. हमारे मन की भावनाओं से हुई प्रार्थनाओं पर ध्यान देने की कृपा कीजिए. विद्वानों का ज्ञान भी आप को हम से दूर न कर सके. हमारा आप से यही अनुरोध है. (७) इमे हि ते ब्रह्मकृतः सु ते सचा मधौ न मक्ष आसते. इन्द्रे कामं जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः.. (८) हे इंद्र! हम आप के लिए सोमरस तैयार कर के उसी तरह बैठे हुए हैं, जिस तरह शहद पर मधुमक्खियां बैठती हैं. वीर जैसे धन की इच्छा से रथ पर पैर रखता है, वैसे ही हम भी धन की इच्छा से आप पर अपनी आशाएं केंद्रित कर रहे हैं. (८) अस्तावि मन्म पूर्व्यं ब्रह्मेन्द्राय वोचत. पूर्वीरृतस्य बृहतीरनूषत स्तोतुर्मेधा असृक्षत.. (९) हे यजमानो! आप इंद्र के लिए प्रार्थनाएं याद कीजिए, उन प्रार्थनाओं को गाइए. पहले यज्ञों में हम ने बृहती छंद में साम गाए. इस से यजमानों में बुद्धि उपजती है और वह बुद्धि मंजती है. (९) समिन्द्रो रायो बृहतीरधूनुत सं क्षोणी समु सूर्यम्. स ꣳ शुक्राः शुचयः सं गवाशिरः सोमा इन्द्रममन्दिषुः.. (१०) हे इंद्र! गाय के दूध में मिला हुआ सोमरस आप के लिए समर्पित है. यह मददायी है. आप इस से तृप्त होइए. आप हमें सूर्य जैसी प्रकाश वाली गाएं और धन प्रदान कीजिए. (१०) इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे. नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे.. (११) हे इंद्र! आप ने वृत्रासुर का नाश किया. आप दक्षिणा दाता हैं. आप को मद देने के लिए ebook converter DEMO Watermarks*
द्रोणकलश में स्थिर किया जाता है. यजमानों की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए सोमरस को सत्पात्र में रखा जाता है. (११) त ऽ४ सखायः पुरूरुचं वयं यूयं च सूरयः. अश्याम वाजगन्ध्य ऽ४ सनेम वाजपस्त्यम्.. (१२) हे यजमानो! तुम सब और हम सब सोमरस को प्राप्त करें. वह सोमरस दूधिया (सफेद), पराक्रमी, स्फूर्तिदायी, सुगंधमय और क्षमताशाली है. (१२) परि त्य ऽ४ हर्यत ऽ४ हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण. यो देवान् विश्वाँ इत् परि मदेन सह गच्छति.. (१३) सोमरस हरा, भूरा व मनोहर है. वह सभी देवताओं की प्रसन्नता के साथ द्रोणकलश में जाता है. (१३) कस्तमिन्द्र त्वा वसवा मर्त्यो दधर्षति. श्रद्धा इत् ते मघवन पार्ये दिवि वाजी वाजं सिषासति.. (१४) हे इंद्र! किस में इतनी सामर्थ्य है जो आप का तिरस्कार कर दे. आप ऐश्वर्यशाली हैं. आप के भक्त आप के प्रति श्रद्धा के कारण ही दुर्दिन में आप से शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त करते हैं. (१४) मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु. तव प्रणीती हर्यश्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता.. (१५) हे इंद्र! आप ऐश्वर्यशाली और अश्ववान हैं. आप वृत्रासुर जैसे अत्याचारियों को नष्ट करने की शक्ति दीजिए. यजमानों को देने के लिए आप प्रिय धनों को प्रेरित कीजिए. शूरवीर और ज्ञानी आप की कृपा से पापों से छुटकारा पाएं. (१५) तीसरा खंड एदु मधोर्मदिन्तर ऽ४ सिञ्चाध्वर्यो अन्धसः. एवा हि वीर स्तवते सदावृधः.. (१) हे यजमानो! सोमरस मधुर, सुखदायी व इंद्र के लिए आनंददायी है. आप इंद्र की स्तुति कीजिए. वे ही स्तुति के योग्य हैं. आप सोमरस भी उन्हीं की सेवा में समर्पित कीजिए. (१) इन्द्र स्थातर्हरीणां न किष्टे पूर्व्यस्तुतिम्. उदान ऽ४ श शवसा न भन्दना.. (२) हे इंद्र! आप अश्वपति हैं. ऋषियों ने आप के लिए प्रार्थनाएं रची हैं. उन प्रार्थनाओं को (आप द्वारा दी गई) सामर्थ्य के अलावा और किसी तरह नहीं प्राप्त किया जा सकता है. (२) तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः. अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम्.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे इंद्र! आप वैभवशाली, धनपति व फुर्तीले हैं. यजमान जो यज्ञ करते हैं, उन यज्ञों से आप बढ़ोत्तरी प्राप्त करते हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. (३) तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे. देवत्राहव्यमूहिषे.. (४) हे यजमानो! यज्ञ देवलोक का प्रतिनिधित्व करते हैं. आप इन यज्ञों की पूजा कीजिए. इन यज्ञों के माध्यम से यजमान दिव्य विभूतियां पाते हैं और धारण करते हैं. अग्नि हमारी हवियों को देवताओं तक पहुंचाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं. (४) विभूतरातिं विप्र चित्रशोचिषमग्निमीडिष्व यन्तुरम्. अस्य मेधस्य सोम्यस्य सोभरे प्रेमध्वराय पूर्व्यम्.. (५) हे ब्राह्मणो! आप अग्नि की उपासना कीजिए. यज्ञ की सफलता के लिए आप को यह उपासना करनी है. वे अतिशय वैभवदाता, प्रकाशमान, श्रेष्ठ और यज्ञ के प्रमुख हैं. (५) आ सोम स्वानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया. जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दध्रिषे.. (६) हे सोम! पत्थरों से कूट कर आप का रस निकाला गया है, छान कर उस रस को पवित्र किया गया है. हरा सोमरस वन की लकड़ी के बने पात्र में उसी तरह प्रवेश कर रहा है, जैसे शूरवीर अपनी वीरता से नगर में प्रवेश करने जाता है. (६) स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीढ्वांत्सप्तिर्न वाजयूः. अनुमाद्यः पवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेभिर्ऋक्वभिः.. (७) ब्राह्मण ऋत्विज् सोमरस को पवित्र कर रहे हैं. स्तोत्रों से वे इस की प्रशंसा कर रहे हैं. वे भेड़ के बाल से बनी छलनी से इसे छान रहे हैं. इसे छानने वाले ऋत्विज् शक्तिमान, हृष्टपुष्ट और घोड़े जैसे बलवान हैं. (७) वयमेनमिदा ह्यो ऽ पीपेमेह वज्रिणम्. तस्मा उ अद्य सवने सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते.. (८) हे यजमानो! हम वज्रधारी इंद्र को पहले से ही सोमरस पिलाते रहे हैं. आज भी हमें उन्हें यह सोमरस पिलाना चाहिए. वे सोमपान और स्तोत्र श्रवण (सुनने) हेतु हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा करें. (८) वृकश्चिदस्य वारण उरामथिरा वयुनेषु भूषति. सेमं न स्तोमं जुजुषाण आ गहीन्द्र प्र चित्रया धिया.. (९) हे यजमानो! भेड़िए जैसे भयंकर शत्रु भी इंद्र के सामने झुक जाते हैं. वे इंद्र हमारी प्रार्थना स्वीकार करने की कृपा करें. इंद्र हमें विवेक व अद्भुत बुद्धि प्रदान करने की कृपा करें. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः. तद्वां चेति प्र वीर्यम्.. (१०) हे इंद्र! हे अग्नि! यह दिव्य गुण आप दोनों के लिए वीरता का परिचायक है. आप गुण रूपी धन से स्वर्गलोक में शोभायमान और भूषित होते हैं. (१०) इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः. ऋतस्य पथ्या ३ अनु.. (११) हे इंद्र! हे अग्नि! होता ऋत् (सत्य) के पथ का अनुगमन कर के सिद्धि की ओर समीप जाते हैं. (११) इन्द्राग्नी तविषाणि वां सधस्थानि प्रयांसि च. युवोरप्तूर्यं हितम्.. (१२) हे इंद्र! हे अग्नि! आप दोनों की शक्ति और विद्या हितकारी भाव से कार्य करती है. आप शीघ्र कार्य करने की सामर्थ्य रखते हैं. (१२) क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद् वयो दधे. अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्यन्धसः.. (१३) इंद्र और उन की आयु को कौन जान सकता है? वे शत्रुओं के नगर को अपने ओज से नष्ट करने वाले हैं. वे मदमस्त रहते हैं और सुरक्षा कवचधारी हैं. (१३) दाना मृगो न वारणः पुरुत्रा च रथं दधे. न किष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महा श्चरस्योजसा.. (१४) हे इंद्र! आप महान, विचरण कर्ता और आदरणीय हैं. आप अपने बल सहित यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. आप को रथ ले कर यज्ञ में आने से भला कौन रोक सकता है? आप शत्रु को वैसे ही खोजते हैं, जैसे मतवाला हाथी अपने शत्रु को खोजता है. (१४) य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय स ᳵ स्कृतः. यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत्.. (१५) हे इंद्र! हमारी संस्कृत में रची हुई स्तुतियों को सुन कर आप अवश्य ही कहीं और नहीं जाएंगे. आप हमारे ही यज्ञ में आने की कृपा करेंगे. वे रण (युद्ध) में स्थिर, अस्त्रशस्त्र से सज्जित व उग्र रहते हैं. (१५) चौथा खंड पवमाना असृक्षत सोमाः शुक्रास् इन्दवः. अभि विश्वानि काव्या.. (१) हे सोम! आप का रस पवित्र व चमकीला है. उसे सभी काव्यों (वेद मंत्रों) के साथ संस्कारित किया जाता है. (१) पवमाना दिवस्पर्यन्तरिक्षादसृक्षत. पृथिव्या अधि सानवि.. (२)
हे सोम! आप का रस पवित्र और वह स्वर्गलोक से धरती के उच्च शिखर को स्पर्श करता हुआ बहता है. (२) पवमानास आशवः शुभ्रा असृग्रमिन्दवः. घ्नन्तो विश्वा अप द्विषः.. (३) हे सोम! आप का रस पवित्र और चमकीला है. वह (स्वास्थ्य संबंधी) सभी गड़बड़ियों का नाश करता है. आप जल्दी द्रोणकलश में पधारते हैं. (३) तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता. इन्द्राग्नी वाजसातमा.. (४) हे इंद्र! हे अग्नि! आप वृत्रनाश से संतोष करते हैं. आप को कोई पराजित नहीं कर सकता. आप उपासकों को प्रचुर धन देते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (४) प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः. इन्द्राग्नी इष आ वृणे.. (५) हे इंद्र! हे अग्नि! हम मनोकामना पूर्ति के लिए आप का वरण करते हैं. हम वैदिक मंत्रों से व साम गागा कर आप की उपासना करते हैं. (५) इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्. साकमेकेन कर्मणा.. (६) हे इंद्र! हे अग्नि! दासों और उन की पत्नियों के नगर आप ने एक साथ एक कार्य (युद्ध) से ही कंपकंपा कर नष्ट कर दिए. हम आप दोनों की स्तुति करते हैं. (६) उप त्वा रण्वसंदृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत. अग्ने ससृज्महे गिरः.. (७) हे अग्नि! आप (अरणियों में) रगड़ से पैदा होते हैं. आप दर्शनीय हैं. हम वाणी से आप की स्तुति करते हैं. हम आप की समीपता चाहते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (७) उप छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते वयम्. अग्ने हिरण्यसंदृशः.. (८) हे अग्नि! आप सोने की तरह चमकीले हैं. हम आप से उसी प्रकार सुख पाते हैं, जिस प्रकार लोग गरमी में छाया से पाते हैं. (८) य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न व ᳲष सगः. अग्ने पुरो रुरोजिथ.. (९) हे अग्नि! आप उग्र, वीर व धनुर्धर हैं. आप की ज्वालाएं (बैलों के) तीखे सींग की भांति हैं. आप ने दुश्मनों के ठिकानों को नष्ट किया है. (९) ऋतावानं वैश्वानरममृतस्य ज्योतिष्पतिम्. अजस्रं घर्ममीमहे.. (१०) हे अग्नि! आप सत्यवान हैं. सभी मनुष्यों के लिए अमृत जैसे कल्याणकारी हैं. आप ज्योति के स्वामी व अजस्र हैं. हम आप से यज्ञ की रक्षा करने का अनुरोध करते हैं. (१०) य इदं प्रतिपप्रथे यज्ञस्य स्वरुत्तिरन्. ऋतूनुत्सृजे वशी.. (११) हे अग्नि! आप सत्य के मार्ग में आने वाली रुकावटों को दूर हटाते हैं. संसार को ebook converter DEMO Watermarks*
वशीभूत रखते हैं. आप की कृपा से संसार विस्तृत होता है. आप ऋतुओं का सृजन करते हैं. (११) अग्निः प्रियेपु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य. सम्राडेको विराजति.. (१२) हे अग्नि! आप एकमात्र सम्राट् हैं. आप अपने प्रिय धामों में सुशोभित होते हैं. आप अतीत और भविष्य में चाहने वालों की इच्छा पूरी करते हैं. (१२)
उन्नीसवां अध्याय
उन्नीसवां अध्याय पहला खंड अग्निः प्रत्नेन जन्मना शुम्भानस्तन्व ३ २ स्वाम्. कविर्विप्रेण वावृधे.. (१) हे अग्नि! आप प्रकाशमान व मेधावी हैं. पुराने स्तोत्रों से यजमान आप को प्रज्वलित कर के आप का विस्तार करते हैं. (१) ऊर्जो नपातमा हुवे ऽ ग्निं पावकशोचिषम्. अस्मिन्यज्ञे स्वध्वरे.. (२) हे अग्नि! हम अपने इस यज्ञ में अग्नि को आमंत्रित करते हैं. आप पवित्र व प्रकाशमान हैं. आप ऊर्जा को नीचे नहीं गिरने देते हैं. (२) स नो मित्रमहस्त्वमग्ने शुक्रेण शोचिषा. देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (३) हे अग्नि! आप अपनी चमकीली लपटों से अन्य देवताओं के साथ कुश के आसन पर विराजिए. आप हमारे मित्र हैं. (३) उत्ते शुष्मासो अस्थू रक्षो भिन्दन्तो अद्रिवः. नुदस्व याः परिस्पृधः.. (४) हे सोम! पत्थरों से कूट कर आप का रस निकाला जाता है. आप की उमड़ती हुई लहरों से राक्षसों का नाश होता है. जो हम से प्रतिस्पर्धा करते हैं, आप उन शत्रुओं का नाश करने की कृपा कीजिए. (४) अया निजघ्निरोजसा रथसङ्गे धने हिते. स्तवा अभिभ्युषा हृदा.. (५) हे सोम! आप सामर्थ्यवान व शत्रुनाशक हैं, रथ को साथ ले कर शत्रुओं को नष्ट कीजिए. हम हृदय से आप से धन देने के लिए अनुरोध करते हैं. (५) अस्य व्रतानि नाधृषे पवमानस्य दूढ्या. रुज यस्तवा पृतन्यति.. (६) हे सोम! आप पवित्र हैं. आप के दृढ़ व्रतों से दुष्ट राक्षस प्रगति नहीं कर सकते. जो शत्रु युद्ध करना चाहते हैं, आप उन शत्रुओं का नाश कीजिए. (६) त २ हिन्वन्ति मदच्युत २ हरिं नदीषु वाजिनम्. इन्दुमिन्द्राय मत्सरम्.. (७) सोमरस मद बरसाने वाला, स्फूर्तिदायक व हरी कांति वाला है. इंद्र हेतु सोम को नदी के जल से प्रेरित किया जाता है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभिः. मा त्वा के चिन्नियेमुरिन्न पाशिनो ऽ ति धन्वेव ताँ इहि.. (८) हे इंद्र! आप के घोड़े मनोहर हैं. उन के बाल मोरपंख जैसे हैं. आप उन घोड़ों सहित यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. शिकारी आप की राह में जाल न फैला सकें, अतः आप उन्हें रेगिस्तान में पहुंचा दीजिए. (८) वृत्रखादो वलं रुजः पुरां दर्भो अपामजः. स्थाता रथस्य हर्योरभिश्वर इन्द्रो दृढा चिदारुजः.. (९) हे इंद्र! आप घोड़ों से सजे हुए रथ में बैठ कर बलवान शत्रुओं को भी हरा देते हैं. आप उन की नगरियों का भी नाश कर देते हैं. आप राक्षसों के बलनाशक हैं. आप दुष्टों की दुष्ट प्रवृत्तियों का भी नाश करते हैं. (९) गम्भीराँ उदधी २४ रिव क्रतुं पुष्यसि गा इव. प्र सुगोपा यवसं धेनवो यथा हृदं कुल्या इवाशत.. (१०) हे इंद्र! गंभीर समुद्र को जैसे छोटे तालाब अधिक जल दे कर पोसते हैं, वैसे ही आप यजमान की मनोकामना पूरी कर के उन्हें पोसते हैं. ग्वाले जैसे गायों को घास चारा डाल कर पोसते हैं, वैसे ही यजमान इंद्र को सोमरस भेंट कर के पोसते हैं. (१०) यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम्. आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब.. (११) हे इंद्र! आप हमारे दोस्त की तरह आइए. आप उसी ललक से आइए, जैसे प्यास से व्याकुल हिरण तालाब के पास जाता है. आप कण्वों के निकट सोमपान करने की कृपा कीजिए. (११) मन्दन्तु त्वा मघवन्निन्द्रन्दवो राधोदेयाय सुन्वते. आमुष्या सोममपिबश्चम्वू सुतं ज्येष्ठं तद्दधिषे सहः.. (१२) हे इंद्र! आप धनवान हैं. सोमरस आप को मदमस्त बना दे. आप इस सोमरस को पीजिए. आप हमें और हमारे बेटों को खूब धन दीजिए. (१२) त्वमङ्ग प्र श २४ सिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम्. न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः.. (१३) हे इंद्र! आप हमारी प्रशंसा करते हैं. आप सब से बढ़िया सुख देते हैं. हम आप ही से प्रार्थना करते हैं, क्योंकि आप के अतिरिक्त कोई दूसरा उतना धनवान और सुखदायक नहीं है. (१३) मा ते राधा २४ सि मा त ऊतयो वसो ऽ स्मान्कदा चना दभन्. ebook converter DEMO Watermarks*
विश्वा च न उपमिमीहि मानुष वसूनि चर्षणिभ्य आ.. (१४) हे इंद्र! आप के धन कभी भी हमारे लिए हानिकारक न हों. आप के रक्षा साधन भी कभी हमें हानि न पहुंचाएं. आप संसार के शरणदाता हैं. आप मनुष्यों को सभी धन देने की कृपा कीजिए. (१४) दूसरा खंड प्रति ष्या सूनरी जनी व्युच्छन्ती परि स्वसुः. दिवो अदर्शि दुहिता.. (१) उषा सूर्य की बेटी हैं. वे श्रेष्ठ नारी हैं. वे अपना प्रकाश चारों ओर फैलाती हुई जाती हैं. दिन के न दिखाई देने पर वे अपना प्रकाश फैलाती हैं. (१) अश्वेव चित्रारुषी माता गवामृतावरी. सखा भूदश्विनोरुषाः.. (२) उषा रश्मियों की मां हैं. वे रश्मियां अद्भुत और चमकीली हैं. वे अश्विनीकुमारों की मित्र हैं. (२) उत सखास्यश्विनोरुत माता गवामसि. उतोषो वस्व ईशिषे.. (३) उषा उपासना के योग्य हैं. वे रश्मियों की मां हैं और अश्विनीकुमारों की मित्र हैं. (३) एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः. स्तुषे वामश्विना बृहत्.. (४) हे अश्विनी! उषा अपूर्व, प्रिय व दिन लाती हैं. हम विशाल स्तोत्रों से उन की उपासना करते हैं. (४) या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम्. धिया देवा वसुविदा.. (५) हे अश्विनीकुमारो! आप बुद्धिमानों के धनदाता हैं. आप नदियों को पैदा करने वाले, मनोहर व धनवान हैं. (५) वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि. यद्वा रथो विभिष्पतात्.. (६) जब आप दोनों अश्विनीकुमारों का रथ पक्षी की भांति उड़ कर ऊपर जाता है तब आप दोनों के लिए स्वर्ग में भी स्तोत्र पढ़े जाते हैं. (६) उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति. येन तोकं च तनयं च धामहे.. (७) हे उषा! आप धनवती और यज्ञ कार्य भी आरंभ करने वाली हैं. आप अद्भुत वैभव दीजिए, जिस से हम संतान और अपने मित्रों का भरणपोषण करने में समर्थ हो सकें. (७) उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि. रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति.. (८) हे उषा! आप गोवती व अश्ववती हैं. आप रात्रि के बाद दिन लाने वाली हैं. आप हमें पुत्र ebook converter DEMO Watermarks*
और धन दीजिए. (८) युंक्ष्वा हि वाजिनीवत्यश्वाँ अद्यारुणाँ उषः. अथा नो विश्वा सौभगान्या वह.. (९) हे उषा! आप यज्ञ कार्य आरंभ कराने वाली व धनवती हैं. आप अपने रथ में लाल घोड़ों को जोतिए. हमें संसार में सौभाग्यवान बनाने की कृपा कीजिए. (९) अश्विना वर्तिरस्मदा गोमद्दस्रा हिरण्यवत्. अर्वाग्रथ ꣳ समनसा नि यच्छतम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! आप शत्रुओं का नाश करने वाले हैं. आप हमें गोवान बनाइए. आप अपने सुनहरे रथ को मन से हमारे यज्ञ में लाने की कृपा कीजिए. (१०) एह देवा मयोभुवा दस्रा हिरण्यवर्तनी. उषर्बुधो वहन्तु सोमपीतये.. (११) उषा के साथ उद्बुद्ध (जाग्रत) सुनहरी किरणें, इन सुखमय अश्विनीकुमारों को सोमपान करने के लिए हमारे यज्ञ में लाने की कृपा करें. (११) यावित्था श्लोकमा दिवो ज्योतिर्जनाय चक्रथुः. आ न ऊर्जं वहतमश्विना युवम्.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! आप स्वर्गलोक से यज्ञ के लिए ज्योति ला कर लोगों का हित करने की कृपा कीजिए. आप दोनों हमें अन्नवान व ऊर्जावान बनाने की कृपा कीजिए. (१२) तीसरा खंड अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः. अस्तमर्वन्त आशवो ऽ स्त॑ नित्यासो वाजिन इष ꣳ स्तोतृभ्य आ भर.. (१) हे अग्नि! आप सर्वव्यापक हैं. हम आप की उपासना करते हैं. घोड़े व गाएं जिन की शरण में हैं, हम यजमानों को भी आप अपनी शरण में लीजिए. हम नित्य नियम निभाने वाले और हवि देने वाले हैं. आप हमें अन्नदान कीजिए. हम आप की उपासना करते हैं. (१) अग्निंहिं वाजिनं विशे ददाति विश्वचर्षणिः. अग्नी राये स्वाभुव ꣳ स प्रीतो याति वार्यमिष ꣳ स्तोतृभ्य आ भर.. (२) हे अग्नि! आप यजमान को अन्नवान बनाने वाले, व्यापक दृष्टि वाले और पूजनीय हैं. आप प्रसन्न हो कर आसानी से यजमानों को धन देते हैं. आप उपासकों को भरपूर धन देने की कृपा कीजिए. (२) सो अग्निर्ये वसुर्गृणे सं यमायन्ति धेनवः. समर्वन्तो रघुद्रुवः स ꣳ सुजातासः सूरय इष ꣳ स्तोतृभ्य आ भर.. (३) हे अग्नि! सारी गौएं तेज गति वाले घोड़े व विद्वान् आप की शरण में हैं. आप पूजनीय ebook converter DEMO Watermarks*
हैं. आप यजमानों को भरपूर अन्न प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३) महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती. यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (४) हे उषा! आप प्रकाशवती हैं. आप हम सभी को पहले की तरह आज भी बोधित (जाग्रत) करने की कृपा कीजिए. आप हम पर भी वैसी ही कृपा कीजिए, जैसी आप ने व्यय के पुत्र सत्यश्रवा पर की. जैसा आप ने उन्हें (सत्यश्रवा को) जाग्रत किया, वैसे ही हमें भी जाग्रत करने की कृपा कीजिए. (४) या सुनीथे शौचद्रथे व्यौच्छो दुहितर्दिवः. या व्युच्छ सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (५) हे उषा! आप स्वर्गलोक की दुहिता (पुत्री) हैं. आप शुचद्रथ के पुत्र सुनीथ हेतु अंधेरे को भगा कर प्रकट हुईं. आपने सुनीथ पर जैसी कृपा की, वैसी ही आप व्यय के पुत्र सत्यश्रवा पर भी कीजिए. (५) सा नो अद्याभरद्वसुर्व्युच्छा दुहितर्दिवः. यो व्यौच्छः सहीयसि सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते.. (६) हे उषा! आप स्वर्गलोक की दुहिता (बेटी) हैं. आप हमें भरपूर धन देने व आज हमारे अंधेरे (प्राकृतिक और अज्ञान रूप दोनों) को नष्ट करने की कृपा कीजिए. आप सत्यस्वरूपा हैं. आप व्यय के पुत्र सत्यश्रवा पर अपनी कृपा कीजिए. (६) प्रति प्रियतम ꣳ रथं वृषणं वसुवाहनम्. स्तोता वामश्विनावृषि स्तोमेभिर्भूषति प्रति माध्वी मम श्रुत ꣳ हवम्.. (७) हे अश्विनीकुमारो! आप का रथ वैभव व पराक्रम धारण करता है. आप का रथ उपासकों की प्रार्थना से सुशोभित होता है. आप हमारी प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा कीजिए. (७) अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अह ꣳ सना. दस्रा हिरण्यवर्तनी सुषुम्णा सिन्धुवाहसा माध्वी मम श्रुत ꣳ हवम्.. (८) हे अश्विनीकुमारो! आप दूसरों का अतिक्रमण कर के (लांघ कर) हमारे पास पधारने की कृपा कीजिए. आप शत्रुनाशक हैं. आप की कृपा से हम अपने शत्रु पर विजय पा सकें. आप सोने के रथ वाले हैं. आप धनवान हैं. आप नदी के समान बहते हैं. आप हमारी प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा कीजिए. (८) आ नो रत्नानि बिभ्रतावश्विना गच्छतं युवम्. रुद्रा हिरण्यवर्तनी जुषाणा वाजिनीवसू माध्वी मम श्रुत ꣳ हवम्.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*
हे अश्विनीकुमारो! आप सोने के रथ वाले, शत्रुनाशी, धनधारी, धनधान्य वाले व यज्ञ प्रेमी हैं. आप हमारे यज्ञ में पधारिए और प्रतिष्ठित होइए. आप हमारी प्रार्थनाओं को सुनने की कृपा कीजिए. (९) चौथा खंड अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्. यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ.. (१) हे अग्नि! आप लोगों (यजमानों) की समिधा से प्रदीप्त होते हैं. नींद से उठ कर गौएं जैसे जाग्रत होती हैं, वैसे ही आप जाग्रत हैं. पेड़ों की शाखाएं जैसे आकाश की ओर फैलती हैं, वैसे ही आप की लपटें स्वर्ग की ओर फैलती हैं. (१) अबोधि होता यजथाय देवानूर्ध्वो अग्निः सुमनाः प्रातरस्थात्. समिद्धस्य रुशददर्शि पाजो महान् देवस्तमसो निरमोचि.. (२) हे अग्नि! आप यज्ञ के प्रबल आधार हैं. देवों के लिए (हवि पहुंचाने हेतु) आप को प्रज्वलित किया जाता है. आप ऊर्ध्वगामी हैं व सुबह अच्छे मन से ऊपर की ओर जाते हैं. आप महान हैं. आप को हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं. आप देवताओं व संसार को अंधकार से दूर करते हैं. (२) यदीं गणस्य रशनामजीगः शुचिरङ्क्ते शुचिभिर्गोभिरग्निः. आदक्षिणा युज्यते वाजयंत्युत्तानामूर्ध्वो अधयज्जुहूभिः.. (३) हे अग्नि! आप बाधाएं व अंधेरे को दूर करते हैं. आप संसार को प्रकाशमान व यजमान घी की आहुतियों से बलवान बनाते हैं. आप ऊर्ध्वगामी हो कर उस घी वाली आहुतियों को स्वीकारते हैं. (३) इद ॐ श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरागाच्चित्रः प्रकेतो अजनिष्ट विश्वा. यथा प्रसूता सवितुः सवायैवा रात्र्युषसे योनिमारैक्.. (४) हे उषा! आप सभी ज्योतियों से श्रेष्ठ ज्योति वाली हैं. आप की ज्योति सर्वत्र फैलती है. सभी वस्तुओं को ज्योतिर्मय बना देती हैं. सविता के अस्त होने के बाद रात्रि उषा को उत्पन्न होने के लिए जगह देती हैं. (४) रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्यस्याः. समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्णं चरत आमिनाने.. (५) हे उषा! आप सूर्य का चमकीला स्वरूप ले कर पैदा हुई और रात्रि काले रंग का. सूर्य दोनों के समान रूप से बंधु हैं, दोनों अमर हैं. स्वर्गलोक में एक के बाद एक आतीजाती हैं. दोनों एकदूसरे का प्रभाव समाप्त करती हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*
समानो अध्वा स्वस्रोरनंतस्तमन्यान्या चरतो देवशिष्टे. न मेथेते न तस्थतुः सुमेके नक्तोषासा समनसा विरूपे.. (६) दोनों बहनों (उषा और रात्रि) की एक ही राह है. वह राह अनंत है. उसी राह पर ये दोनों एकदूसरे के पीछे चलती हैं, भले ही इन के स्वरूप एकदूसरे से अलग हैं पर इन के मन समान हैं. ये दोनों अपनेअपने कार्यों में लगी रहती हैं. (६) आ भात्यग्निरुषसामनीकमुद्विप्राणां देवया वाचो अस्थुः. अर्वाञ्चा नून १४ रथ्येह यातं पीपिवा १४ समश्विना घर्ममच्छ.. (७) अग्नि प्रज्वलित हो गए हैं. उषा के प्रकट होते ही अग्नि प्रज्वलित हो जाते हैं. दिव्य प्रार्थनाएं शुरू हो गई हैं. अश्विनीकुमार रथ में विराज गए हैं. हम उन से सोमरस पीने के लिए यज्ञ में पधारने का अनुरोध करते हैं. (७) न स १४ स्कृतं प्र मिमीतो गिमष्ठान्ति नूनमश्विनोपस्तुतेह. दिवाभिपित्वे ऽ वसागमिष्ठा प्रत्यवतिं दाशुषे शम्भविष्ठा.. (८) हे अश्विनीकुमारो! आप परिष्कृत पदार्थों को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. यज्ञस्थान के समीप आने वाले आप के लिए उपासना की जाती है. दिन के आते ही आप प्रतिष्ठित हो जाते हैं. आप यजमान को प्रतिष्ठा प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. (८) उता यात १४ संगवे प्रातरह्नो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य. दिवा नक्तमवसा शन्तमेन नेदानीं पीतिरश्विना ततान.. (९) हे अश्विनीकुमारो! सूर्य उगने के समय, दिन के मध्य में, शाम और दिन रात में आप पधारिए. आप अपने रक्षा साधनों सहित पधारने की कृपा कीजिए. आप के ये साधन दिनरात सुखदायी हैं. अभी तक आप के बिना सोमरस पीने का कार्य शुरू नहीं किया गया है. (९) पांचवां खंड एता उ त्या उषसः केतुमक्रत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमञ्जते. निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णवः प्रति गावो ऽ रुषीर्यन्ति मातरः.. (१) हे उषा! आप उजाला फैलाती हैं. आप के आने से पूर्व दिशा में प्रकाश हो जाता है. वीर अपने आयुधों को जैसे चमकाते हैं, वैसे ही आप संसार को चमचमा देती हैं. माता उषा प्रतिदिन आती और जाती हैं. (१) उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्त. अक्रन्नुषासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्रयुः.. (२) उषा के आते ही लाल किरणें आकाश में छा गई हैं. अपनेआप जुते हुए रथ से वे चेतना ebook converter DEMO Watermarks*
फैलाती हैं तथा सूर्य की सेवा करती हैं. (२) अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभिः समानेन योजनेना परावतः. इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते.. (३) जो यजमान अर्चना करते हैं, सोमरस को परिष्कृत करते हैं, अच्छे कार्य करते हैं, दान करते हैं, उन यजमानों को उषा अन्न व बल देती हैं और प्रकाशमान बना देती हैं. युद्ध में सज्जित वीर की भांति वे आकाश की शोभा बढ़ा देती हैं. (३) अबोध्यग्निर्ज्म उदेति सूर्यो व्यु ३ षाश्चन्द्रा मह्यावो अर्चिषा. आयुक्षातामश्विना यातवे रथं प्रासावीद्देवः सविता जगत्पृथक्.. (४) अग्नि वेदी में प्रज्वलित हो गए हैं. सूर्य आकाश में उदित हो गए हैं. उषा महान हैं. वे अपनी तेजस्विता से सब को प्रसन्न कर देती हैं. हे अश्विनीकुमारो! आप अपने घोड़े रथ में जोतिए, यहां प्रस्थान करिए. सूर्य सभी को अलगअलग कार्य करने की प्रेरणा दे रहे हैं. (४) युङ्गुञ्जाथे वृषणमश्विना रथं घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम्. अस्माकं ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि.. (५) हे अश्विनीकुमारो! आप अपने रथ में घोड़े जोत कर हमारे यज्ञ में पहुंचिए. हमें घृत से पुष्ट करिए, हमें आत्मज्ञान दीजिए, हमें शत्रुओं को जीतने की क्षमता दीजिए. हम धन पा सकें. हम आप को भजते हैं. (५) अर्वाङ् त्रिचक्रो मधुवाहनो रथो जीराश्वो अश्विनोर्यातु सुष्टुतः. त्रिबन्धुरो मघवा विश्वसौभगः शं न आ वक्षद्द्विपदे चतुष्पदे.. (६) हे अश्विनीकुमारो! आप रथ पर विराज कर यज्ञ में पधारिए. आप का रथ तीन पहियों वाला, मधुर अमृतधारी, द्रुतगामी, अश्वजुत, सराहनीय व तीन लोगों के बैठने की जगह वाला है. वह प्रचुर ऐश्वर्यवान और सौभाग्यवान है. आप सब के प्रति कल्याणकारी भावना रख कर हमारे यज्ञ स्थान में पधारने की कृपा कीजिए. (६) प्र ते धारा असश्चतो दिवो न यन्ति वृष्टयः. अच्छा वाज ᳵ सहस्रिणम्.. (७) हे सोम! आप की झरने वाली धाराएं वैसे ही बरसती हैं, जैसे स्वर्गलोक से बरसात होती है. आप की धाराएं अन्न बरसाती हैं. (७) अभि प्रियाणि काव्या विश्वा चक्षाणो अर्षति. हरिस्तुञ्जान आयुधा.. (८) हे सोम! आप सर्वप्रिय, सर्वद्रष्टा व हरिताभ हैं. आप शत्रुओं पर आयुधों से प्रहार करते हैं. (८) स मर्मृजान आयुभिर्विभो राजेव सुव्रतः. श्येनो न व ᳵ सु षीदति.. (९) हे सोम! आप श्रेष्ठकर्मा (अच्छे कार्य करने वाले) हैं. यजमान आप को परिष्कृत करते ebook converter DEMO Watermarks*