संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सच्चिदानन्दघन परमदेव परमात्माके ध्यानरूप पूजनसे परमपदकी प्राप्ति * ४०५
छिपे हुए हैं। वह प्रकाशस्वरूप एवं तमसे परे है और उसके स्वरूपका कहीं पार भी नहीं पाया जा सकता। पूर्वोक्त नियतिके नाटकका साक्षी यह परमात्मा ही परमदेव है। यही समस्त पदार्थोंका आश्रय, सर्वव्यापक, चिन्मय और अनुभवरूप है। सभी सज्जनोंद्वारा यही सर्वदा पूजनीय है। यही परमदेव परमात्मा घटमें, पटमें, वटमें, दीवालमें, छकड़ेमें और वानर आदि प्राणियोंमें समभावसे स्थित है। यही परमात्मा शिव, हर, हरि, ब्रह्मा, इन्द्र, कुबेर और यमस्वरूप है। अनेक प्रकारकी घट-पट आदि आकृतियोंको लेकर असंख्य पदोंसे बोधित होनेवाली तथा उन आकृतियोंको छोड़नेपर एक पदसे बोधित होनेवाली सत्तारूप इस जगज्जालका उत्पादक महाकाल इस परमात्मदेवका द्वारपाल है। पर्वतों एवं चौदह भुवनोंके असीम विस्तारसे युक्त यह ब्रह्माण्ड-मण्डल इस परमात्मदेवके किसी एक देह-कोणमें स्थित होकर उसके अङ्गका अवयवरूप हो गया है।
महर्षे ! जिसके हजारों कान एवं आँखें हैं, हजारों मस्तक हैं और जो स्वयं हजारों भुजाओंसे विभूषित है, ऐसे शान्तस्वभाव महादेवका चिन्तन करना चाहिये। वह परमात्मा सभी जगह दर्शन-शक्तिसे परिपूर्ण है यानी सर्वत्र देखता है, सब ओर घ्राण-शक्तिसे समन्वित है, सर्वतः स्पर्शन-शक्तिसे युक्त है, सभी ओर रसन-शक्तिसे परिपूर्ण है, सर्वत्र श्रवण-शक्तिसे व्याप्त है, सर्वत्र मनन-शक्तिवाला है; तथापि वह सर्वथा संकल्पसे रहित है एवं सभी ओर सर्वश्रेष्ठ कल्याणस्वरूप है। उस परमात्मदेवका चिन्तन करना चाहिये। नित्य, सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, सबको अपने-अपने संकल्पके अनुसार समस्त पदार्थ प्रदान करनेवाले, सारे प्राणियोंके अन्तःकरण-में स्थित और सभीके लिये एकमात्र साध्य, सर्वरूप उस परमात्मदेवका चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार ध्यानके द्वारा उस देवाधिदेवकी पूजा करनी चाहिये। अनायास प्राप्त होने योग्य, शान्तिमय, अविनाशी, अमृतस्वरूप एकमात्र परमात्मस्वरूपके ज्ञानसे सदा इस देवकी पूजा की जा सकती है। जो यह हृदयप्रदेशमें स्थित शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमात्माका निरन्तर अनुभव है, यही श्रेष्ठ ध्यान है और यही परम पूजा कही गयी है। देखते-सुनते, स्पर्श करते सूँघते-खाते, चलते-सोते, श्वास-प्रश्वास लेते, बोलते, त्याग करते और ग्रहण करते—सभी समय मनुष्यको शुद्ध चिन्मय परमात्माके ध्यानमें ही तत्पर रहना चाहिये। इस परमात्माके लिये शुद्ध ज्ञानरूप ध्यान ही प्रियतम वस्तु है, अतः ध्यानसे ही उसके लिये उपहार है। ध्यान ही उसके लिये अर्घ्य, पाद्य और पुष्प है। मुने ! यह परमात्मदेव ध्यानसे ही प्रसन्न होता है। इस प्रकार आठों पहर ध्यानद्वारा पूजन करनेसे मनुष्य परमधाममें निवास करता है। महर्षे ! जो यह परमात्मदेवका उत्तम पूजन मैंने आपसे कहा है, यही परम योग है, यही वह उत्तम कर्म है। आत्मरूप वसिष्ठजी ! जो मनुष्य दुःख और विक्षेपसे रहित हो सारे पापोंके विनाशक एवं परम पवित्र इस ध्यानरूप पूजनको करेगा, उस समस्त बन्धनोंसे मुक्त और ब्रह्मतत्त्वको प्राप्त पुरुषकी जगत्में सुर एवं असुर वैसे ही वन्दना करेंगे, जैसे वे मेरी वन्दना करते हैं।
महर्षे ! यह ध्यान पवित्र करनेवालोंको भी पवित्र करनेवाला तथा सम्पूर्ण अज्ञानोंका नाशक है। अतः शरीरमें स्थित, समस्त ज्ञानोंके उत्पादक एवं बोधक परम कल्याणस्वरूप इस परमात्मदेवका अपने अन्तः-करणसे नित्य ही ध्यान करना चाहिये। सबके हृदयरूपी गुहामें स्थित, समस्त ज्ञान और ज्ञेयके ज्ञाता, सम्पूर्ण कर्मोंके कर्ता और समस्त ज्ञानोंके स्मर्ता, सम्पूर्ण प्रकाशों-से भी अधिक प्रकाशस्वरूप तथा सर्वव्यापी परम शिव परमात्माका ध्यान करना चाहिये। वह परमात्मा मनकी मननात्मिका शक्तिमें, प्राण एवं अपानके मध्यमें तथा हृदय, कण्ठ, तालु और भौंके मध्यमें स्थित (व्यापक) है। वह कथाओंकी कल्पनाओंसे रहित और देहके एक-
४०६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
देशभूत सुन्दर हृदय-कमलमें विशेषरूपसे और सम्पूर्ण देहमें समानरूपसे स्थित है। वह परमात्मा केवल चेतन और शुद्ध ज्ञानस्वरूप है। उसका चिन्तन करना चाहिये।
इसके सिवा ध्यानका एक दूसरा प्रकार यह है कि 'मैं जीवात्मा ही परिच्छेदशून्य आकारवाला, अनन्तरूप, सम्पूर्ण पदार्थोंसे परिपूर्ण, सब वस्तुओंका पूरक एवं अखण्ड अद्वितीय शिवस्वरूप परमात्मा हूँ'—इस प्रकार स्वच्छ और अलौकिक भावना करके देवभावसे परिपूर्ण यह जीवात्मा महान् परमात्मा बन जाता है। वह परमात्माको प्राप्त पुरुष सबमें सम रहता है। उसका व्यवहार भी समान होता है। उसका ज्ञान भी सम होता है। उसका भाव भी सम होता है। उस सौम्य पुरुषका उद्देश्य भी महान् सुन्दर होता है। वह देहपातपर्यन्त अखण्ड तत्त्वज्ञानसे युक्त होता हुआ चिरकालतक निरन्तर परमात्माका ध्यानरूप पूजन ही करता रहता है। इसलिये मनुष्यको उचित है कि सज्जनोंके हृदयमें रहनेवाली, चन्द्रमाकी भाँति शीतल, मधुर-स्वभाव, दृढ़ मैत्रीसे हृदय-प्रदेशमें स्थित उस परमात्मदेवकी ध्यानरूप पूजा करे। दुष्टोंकी उपेक्षा, दुखियोंपर दया, पुण्यात्माओंके प्रति हृदयकी नित्य मुदिता (प्रसन्नता) की भावनासे, शुद्ध सामर्थ्यकी पद्धतिसे और ज्ञानरूप ध्यानसे उस परमात्मदेवकी पूजा करे।
प्रारब्धसे प्राप्त सम्पूर्ण इष्ट एवं अनिष्ट पदार्थोंमें सर्वदा ही परम समताका आश्रय लेकर नित्य चेतन परमात्माका ध्यानरूप व्रत करना चाहिये। अनुकूल और प्रतिकूलकी प्राप्तिमें सम होकर नित्य चिन्मय परमात्माके ध्यानरूप व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। 'यह मैं हूँ और यह मैं नहीं हूँ'—इस प्रकारके भेदको छोड़ देना चाहिये तथा 'यह सब ब्रह्म ही है' इस प्रकार निश्चय करके नित्य चिन्मय परमात्माके ध्यानरूप व्रतका आचरण करना चाहिये। महर्षे! इस परमात्माके ध्यानरूप पूजाके विधानमें जो द्रव्य-सम्पत्तियाँ बतलायी गयी हैं, वे सब एकमात्र समतारूप रससे परिपूर्ण होनेके कारण मधुर-रसवती ही हो जाती हैं। रसमयी शक्ति-समता मधुर और अतीन्द्रिय है। उस समतासे जो भी दृश्य विषय भावित होगा, वह तत्क्षण ही अमृततुल्य मधुर हो जायगा। समतारूप अमृतसे जो-जो भावित होता है, वह सब परम मधुरताको प्राप्त होता है। ब्रह्मैक्य-दर्शनस्वरूप समतासे स्वयं आकाशकी तरह विकारशून्य होकर मनके लय होनेपर जो स्वाभाविक स्थिति है, वही परमात्माकी ध्यानरूप पूजा कही जाती है। महात्मा ज्ञानीको पूर्णचन्द्रकी भाँति परिपूर्ण, समताके द्वारा समान ज्ञानवान्, एक, चिन्मय, स्वच्छ और स्फटिक-शिलाकी तरह निर्मल एवं दृढ़ होना चाहिये। जो भीतर आकाशकी तरह विशाल और बाहर न्यायतःप्राप्त कार्योंको करनेवाला, आसक्तिसे रहित एवं परमात्माके यथार्थ तत्त्वका पूर्णतया ज्ञाता है, वही सच्चा उपासक है। अज्ञानरूप मेघोंके नष्ट होनेपर स्वप्नमें भी जिसमें राग-द्वेष आदि हृदय-विकार नहीं देखे जाते तथा जिसका अहंता-ममतारूप कुहरा शान्त हो चुका है, ऐसे निर्मल आकाशके समान वह तत्त्वज्ञ सुशोभित होता है।
महर्षे ! यथासमय और यथाशक्ति आप जो कुछ भी कर्म करते हैं अथवा नहीं करते, उसीको चिन्मय शिवस्वरूप परमात्माका अन्तःपूजन समझना चाहिये। इस प्रकारके पूजनसे ही साधक अपने पारमार्थिक निरतिशय आनन्दमय स्वरूपका अनुभव करता है। शिव, शान्त, अन्यसे प्रकाशित न होनेवाला, स्वप्रकाशरूप परमात्मा ही जगत्के रूपमें प्रतीत हो रहा है। ब्रह्मन् ! भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत्में व्यापक, परम विशुद्ध चेतन-परमात्मारूप ईश्वरके स्वरूपका वाणीसे वर्णन भी नहीं किया जा सकता। इसलिये वसिष्ठजी ! तुच्छ दृष्टिका परित्याग करके और अपनी अखण्ड दृष्टिका आश्रय लेकर सम,
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, दुःखनाशका उपाय * ४०७
निर्मलमना, शान्त, राग और दोषसे रहित तथा शोक-रहित बुद्धिसे युक्त होकर आप न्यायतःप्राप्त पदार्थोंसे परमात्मदेवकी पूजा करते हुए स्थित रहें।
(सर्ग ३८-४०)
शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, ब्रह्मके नाम-भेदोंका और स्वरूपका रहस्य एवं दुःखनाशका उपाय
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—देव ! शिव, परब्रह्म, आत्मा और परमात्मा किसके नाम कहे गये हैं? तीनों लोकोंके स्वामिन् ! भगवन् ! 'तत्', 'सत्', 'किंचित्', 'न किंचित्', 'शून्य' और 'विज्ञान' आदि भेद किसके कहे गये हैं ?
श्रीमहादेवजीने कहा—मुने ! आदि और अन्तसे रहित, प्रकाशान्तरकी अपेक्षा न रखनेवाली, स्वतःप्रकाश-स्वरूप जो सत् वस्तु अपनी महिमामें अपने-आप विद्यमान है, वही 'किंचित्' शब्दसे कही जाती है; और वह इन्द्रियोंके द्वारा जाननेमें नहीं आती, इसलिये 'न किंचित्' शब्दसे कही जाती है ।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—ईशान ! जो बुद्धि आदिसे युक्त चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रियोंके जाननेमें नहीं आता, उस परब्रह्मका संशयरहित अधिकारीद्वारा कैसे साक्षात्कार किया जाता है ?
श्रीमहादेवजीने कहा—महर्षे ! जिसमें अविद्याका नाममात्र अंश है, ऐसा केवल सात्त्विक और मोक्षकी चाह रखनेवाला साधक शास्त्राभ्यास आदि सात्त्विक उपायोंसे अविद्याका प्रक्षालन करता है, तब अविद्याका क्षय होनेपर वह अपने-आप ही अपनेद्वारा परमात्माका अनुभव करता है । आत्मा ही परमात्माको देखता है और आत्मरूपसे ही उसका विचार करता है । इस संसारमें एकमात्र परमात्मा ही सत् है, अविद्या नहीं; इसे ही अविद्याका क्षय कहते हैं। जो कुछ यह नाना-विध विनाशीशील दृश्य वस्तु है, इसे आप परमात्मा न समझिये; क्योंकि यह मिथ्या है । परब्रह्म परमात्मा तो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके क्षयसे प्राप्य है । जो वस्तु जिसका नाश होनेपर प्राप्त होती है, वह वस्तु उसके उपस्थित रहते कभी प्राप्त नहीं हो सकती । शिष्यके बोधके लिये किये गये गुरूपदेशसे अनिर्देश्य और अव्यक्त परमात्मा उसे स्वयं प्राप्त हो जाता है । गुरुके उपदेशों और शास्त्रार्थोंके बिना भी परमात्माका ज्ञान नहीं होता; क्योंकि इन सबके संयोगसे ही परमात्माका ज्ञान होता है । कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय आदिका नाश तथा सुख, दुःख आदिका अभाव होनेपर जो बच रहता है, वह शिवस्वरूप परमात्मा ही 'तत्'-'सत्' इत्यादि नामोंसे कहा गया है । वास्तवमें तो यह सम्पूर्ण जगत् है नहीं, बल्कि परमात्माका सङ्कल्प होनेके कारण यह उसका स्वरूप ही है । वह सत्-स्वरूप परमात्मा आकाशसे भी अत्यन्त बढ़कर निर्मल और अनन्त है । विशुद्ध अन्तःकरणवाले मुमुक्षु पुरुषोंने मोक्षके उपासकोंके बोधके लिये नाम-रूपरहित सच्चिदानन्द परमात्मामें चेतन, ब्रह्म, शिव, आत्मा, ईश, परमात्मा और ईश्वर आदि पृथक्-पृथक् नाम रूपोंकी कल्पना कर रखी है । वसिष्ठजी ! इस तरह जगतत्त्व एवं शिवनामक परमात्मतत्त्व ही सर्वदा सब तरहसे सब कुछ है। इसलिये आप इसे जानकर सुखपूर्वक स्थित हो जायें । प्राचीन मुमुक्षु लोगोंने शिव, आत्मा और परब्रह्म इत्यादि नामोंसे उस परमात्माकी भिन्न-भिन्न कल्पना की है; वस्तुतः एक परमात्मा ही है, उसमें कुछ भी भेद नहीं है । मुनिनायक ! इस प्रकार ज्ञानपूर्वक ध्यानरूप पूजा करनेवाला ज्ञानी पुरुष उस परमपदको प्राप्त हो जाता है ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—भगवन् ! मिथ्या होते हुए भी
४०८ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
यह जगत् किस प्रकार सद्-सा प्रतीत होता है, वह सब कुछ फिर संक्षेपमें मुझसे कहनेकी कृपा कीजिये।
**श्रीमहादेवजीने कहा—**मुने ! जो यह ब्रह्म, शिव, ईश्वर इत्यादि शब्दोंका अर्थ है, उसे ही विशुद्ध चिन्मय परमात्मा समझिये जैसे जलके आधारभूत समुद्रमें जल ही तरङ्गके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही परब्रह्म परमात्मामें केवल अद्वितीय सद्रूप ब्रह्म ही जगत्के रूपमें प्रकट हो रहा है; क्योंकि सारा जड दृश्यसमूह चेतन परमात्मरूप ही है, इस प्रकारका ज्ञान होनेपर वह दृश्यसमूह मनोराज्यके संकल्पनगरकी तरह हो जाता है। यह जगत् परमात्माका संकल्प है, इस यथार्थ अनुभवसे सम्पूर्ण दृश्य जगत् कल्याणमय परमात्मा ही बन जाता है।
**श्रीवसिष्ठजीने पूछा—**भगवन् ! इस जगत्की भले ही गन्धर्वनगरसे अथवा स्वप्नके मनुष्यसे उपमा दी जाय, फिर भी यह दुःखका कारण तो है ही। अतः दुःखके नाशके लिये यहाँ कौन-सी युक्ति है?
**श्रीमहादेवजीने कहा—**महर्षे ! वासनाके कारण दुःख उत्पन्न होता है और वह वासना सत् पदार्थमें हुआ करती है; किंतु यह जगत् तो मृगतृष्णाके जलकी तरङ्गके समान मिथ्या ही है। इसलिये वासना कैसे, किसमें, किसको, कहाँसे होगी? स्वप्नावस्थाका पुरुष भला कैसे मृगतृष्णाके जलका पान कर सकता है। द्रष्टाके सहित, अहंतासे युक्त और मन तथा मनन आदिके साथ इस जगत्का जब स्वप्नवत् अस्तित्व ही नहीं है, तब जो शेष रह जाता है, वही सद्रस्तु परमात्मा है। उस परमात्मामें न तो कोई वासना रहती है, न कोई वासना करनेवाला और न कोई वासनाका विषय ही रहता है। किंतु एकमात्र वह परमात्मा ही रहता है, जिसमें कल्पना-भ्रमका अत्यन्त अभाव है। प्रतीत होनेके कारण सत्य और वास्तवमें असत्य संसाररूप वेताल शून्यस्वरूप होनेके कारण जिस ज्ञानवान्की दृष्टिमें असत्य ही है, उसकी दृष्टिमें केवल परमात्माके सिवा और दूसरा क्या अवशिष्ट रह सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं। इस प्रकार शून्यमें ही वेतालकी तरह यह चित्त-वासना उत्पन्न हुई है, जिसका नाम जगत् है। उसकी शान्ति हो जानेपर अक्षय शान्ति ही अवशिष्ट रहती है। किंतु अहंतामें, जगत्में तथा मृगतृष्णाके जलमें जिस अज्ञानी मनुष्यकी आस्था (सत्तावुद्धि) बँधी हुई है, उसको बार-बार धिक्कार है ! वह अज्ञानी उपर्युक्त उपदेशके योग्य नहीं। इस जगत्में ज्ञानीलोग जिज्ञासु विवेकी मनुष्यको ही उपदेश दिया करते हैं, न कि उस बालवुद्धिवाले अविवेकीको, जो अनेक प्रकारकी भ्रान्तियोंसे ग्रस्त है, श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा त्याज्य है एवं देह आदिमें अभिमान रखता है।
(सर्ग ४१)
समष्टि-व्यष्ट्यात्मक जो संसार है, वह सब माया ही है—यह उपदेश देकर भगवान् श्रीशंकरका अपने वासस्थानको जाना तथा श्रीवसिष्ठजी और श्रीरामजीके द्वारा अपनी-अपनी स्थितिका वर्णन
**श्रीवसिष्ठजीने पूछा-**भगवन् ! सृष्टिके आदिमें देहके सम्बन्धसे संसारमें भ्रमण करनेवाला वह जीवात्मा मायारूप आकाशमें स्थित हुआ किस अवस्थाको प्राप्त करता है ?
**भगवान् शंकरने कहा-**मुने ! जिस प्रकार स्वप्न-मनुष्य स्वप्नके संसारको देखता है, उसी प्रकार वह जीवात्मा भी परम सूक्ष्म मायामय आकाशमें कर्मानुसार शरीरोंको देखता है। जैसे आज भी स्वप्नमनुष्य चैतन्य-घन आत्माके सर्वत्र व्यापक होनेसे स्वप्नमें कार्य करता है, वैसे ही देहधारी जीवात्मा भी जाग्रदवस्थामें कार्य करता है। जिस तरह शून्यस्वरूप वेताल वास्तविक
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * समष्टि-व्यष्ट्यात्मक जो संसार है वह सब माया ही है * ४०९
दृष्टिसे असद्रूप है, किंतु भ्रमसे सद्रूप प्रतीत होता है, उसी प्रकार यह समस्त जगत् वास्तवमें असत् है, किंतु भ्रमसे सद्रूप प्रतीत होता है; इसलिये जगत्का कारण वास्तवमें अहंकार ही है। यह संसार वास्तवमें सत् नहीं है; न यह कल्पित है न क्षणिक है, न यह कुछ उत्पन्न ही होता है और न कुछ विनष्ट ही होता है। वास्तवमें इसका अत्यन्त अभाव है। चेतन जीवात्मा ही सम्पूर्ण प्रपञ्चकी संकल्परूपसे अपनेमें उसी प्रकार कल्पना करता है, जिस प्रकार मनुष्य स्वप्नमें नगरका निर्माण और विनाश करता है पर जागनेपर वास्तवमें उसका स्वप्नके देश और कालसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता। इस विनाशशील संसारका वास्तविक स्वरूप तत्त्वसे समझ लेनेपर इस मायारूप संसारकी भेदसत्ताका अभाव हो जाता है। तदनन्तर ज्ञानपूर्वक ध्यानके अभ्याससे कल्याणमय शिवरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। नहीं तो यह जीवात्मा अपने कर्मानुसार देह, इन्द्रिय आदिके संयोग-क्रमसे मृगी, लता, कीट, देव, असुर आदिरूप हो जाता है। नित्य, व्यापक, अनन्त दृढ और विश्वमें व्याप्त एवं विश्वके कर्ता जिस परब्रह्ममें यह जगत् कल्पित है, विवेक होनेपर वह जगत् न दूर है न समीप, न ऊपर न नीचे, न आपका है न मेरा, न पहले था न आज है, न प्रातःकालमें है न सत् है न असत् और न सत् और असत्के मध्यमें है अर्थात् वास्तवमें यह कल्पनामात्र ही है। मुने ! जैसा आपने पूछा; वैसा ही मैंने उत्तर दे दिया। आपका कल्याण हो। अब हमलोग अपनी अभिलषित दिशाकी ओर जा रहे हैं। पार्वती ! आओ, उठो।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! ऐसा कहकर वे नीलकण्ठ भगवान् शंकर जिनके ऊपर मैंने उस समय पुष्पाञ्जलि समर्पित की थी अपने परिवारके साथ आकाशकी ओर चले गये। तब पहलेसे ही शान्तस्वभाववाला मैं त्रिभुवनके अधिपति उमापतिके जानेके बाद क्षणभर चुप रहकर उनके स्मरणपूर्वक उनके द्वारा उपदिष्ट परमात्मदेवका ज्ञानपूर्वक ध्यानरूप पूजन नवीन (परिष्कृत) और श्रद्धा आदिसे पवित्र हुई बुद्धिसे करने लगा।
रघुनन्दन ! महादेव शंकरजीने सच्चिदानन्द परमात्माका ध्यानरूप यह सर्वोत्कृष्ट पूजन मुझसे कहा है और स्वयं मैं भी उसे तत्त्वसे जानता हूँ। जिस तरहका यह जगत्का स्वरूप है, उसे तुम भी तत्त्वसे जानते ही हो। जैसे जलका द्रवत्व स्वभाव है, जैसे वायुका स्पन्दत्व स्वभाव है और जैसे आकाशका शून्यत्व स्वभाव है, वैसे ही परमात्माका सर्गत्व (सृजन) स्वभाव है। श्रीराम ! तबसे लेकर आजतक उसी क्रमसे मैं शान्तिपूर्वक परमात्माका ध्यानरूप पूजन करता आ रहा हूँ। इसलिये मनुष्यको धन और बन्धुओंकी उत्पत्ति और विनाश होनेपर हर्ष
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और विषाद नहीं करना चाहिये; क्योंकि ये सभी संसारके अनुभव सदा विनश्वर ही हैं। श्रीराम ! प्रमथन-शील चित्र-विचित्र परिस्थितियाँ जिस प्रकार आती हैं, जाती हैं और पुरुषको पराजित करती हैं, यह सब तुम भी जानते ही हो। इसी प्रकार प्रेम और धन आते रहते हैं और यों ही चले भी जाते हैं। वे जगत्के व्यवहार वास्तवमें न तो तुम्हारे अंदर हैं और न तुम ही उनके अंदर हो। इस प्रकार यह जगत् तुच्छ ही है। केवल चेतनस्वरूप व्यापक देहवाले श्रीराम ! यह जगत् तुम्हारा संकल्प होनेके कारण तुम्हारा स्वरूप ही है। अतः तुम्हारे लिये हर्ष और शोकका प्रसङ्ग ही क्या है। तात ! तुम चिन्मात्र स्वरूप हो। यह जगत् तुमसे पृथक् नहीं है। इसलिये तुमको किस प्रकार और कहाँ हेय और उपादेयकी कल्पना हो सकती है ? तुम सम, ज्ञानस्वरूप और उदारधी होकर सदा ब्रह्मके ध्यानमे तत्पर होते हुए समुद्रकी तरह परिपूर्ण (परितृप्त) रूपसे स्थित रहो ! रघुनन्दन ! यह सब तुमने सुना और परिपूर्ण-बुद्धि होकर तुम स्थित भी हो; इस विषयमे और जो कुछ पूछना चाहो, पूछो। पहले जो तुमने प्रश्न किये थे, उनमेंसे यदि कोई उत्तरके बिना रह गया हो तो उसे भी आज पूछ लो।
श्रीरामजीने कहा—ब्रह्मन् ! न तो आत्मा उत्पन्न होता है न मरता है और न मायासे कलङ्कित ही है तथा 'यह सारा जगत् ब्रह्ममय है' इस प्रकारका निश्चय मेरा है। भगवन् ! मेरा मन शुद्ध और सब प्रकारके प्रश्नोंसे, संशयोंसे और इच्छित पदार्थोंसे निवृत्त है। इस चराचर संसारमें ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसकी मुझे इच्छा और अनिच्छा हो तथा ऐसी कोई वस्तु भी नहीं है, जो मेरे लिये त्याज्य और ग्राह्य हो। मुझे न स्वर्गकी आकांक्षा है और न नरकसे द्वेष है; किंतु मन्दराचलकी तरह संशयरहित हुआ मै अपने स्वरूपमें स्थित हूँ। यह जगत् जिस स्वरूपका दिखायी देता है, उसी स्वरूपका है, उससे भिन्न उसका कोई दूसरा स्वरूप नहीं है—यों जो मूर्ख जानता है, उसके हृदयमें ज्वालाके सदृश अधिक संतापदायिनी, कुत्सित संशय-समूहोंसे होनेवाली 'यह वस्तु है और यह अवस्तु है' इस प्रकारकी कल्पनाएँ पर्याप्तरूपसे उत्पन्न होती रहती है। मूढ पुरुष जिन धन आदि विषयोंके लिये कृपणता करता है, जगत्की वे वस्तुएँ वास्तवमें हैं ही नहीं। परमेश्वर ! हमने सम्पत्तियोंकी अवधि जान ली, आपत्तियोंकी सीमाका भी अन्त देख लिया। हम सर्वसार अपने स्वरूपमे दीनरहित और परिपूर्ण हुए स्थित है।
(सर्ग ४२-४३)
ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वासना, आसक्ति और अज्ञानके नाशसे मनके विनाशका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! आसक्तिसे तथा कर्तृत्वाभिमानसे रहित एवं न्याययुक्त व्यवहार करनेवाले अन्तःकरणसे इन्द्रियोंके साथ तुम जो कुछ करते हो, वह कर्म कर्म ही नहीं है। जिस तरह प्राप्तिकालमें विषय तुष्टिकारक होता है, उसी तरह उसके बाद दूसरे कालमें नहीं होता। इसलिये बालबुद्धि अविवेकी ही क्षणिक सुख देनेवाले विषयोंमें आसक्त होता है, विवेकी नहीं। श्रीराम ! तुम आत्मज्ञानी हो। इसलिये
अहंकार तुम्हारा पतन नहीं कर सकता; क्योंकि जिसने निरन्तर असीम सत्यस्वरूप ब्रह्मका स्मरण किया है और जो तत्त्वज्ञानरूप सुमेरु पर्वतके शिखरपर स्थित है, उस पुरुषका पुनर्जन्मरूप पतन नहीं हो सकता। श्रीराम ! तुम्हारा जो यह समता एवं सत्यतामय स्वभाव मुझे दिखायी देता है, इससे मै मानता हूँ कि तुम सङ्कल्प-विकल्प और अविद्यासे रहित हो, अपने स्वरूपमें भलीभाँति स्थित हुए तुम मानो मुझे यह
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शिलाके रूपमें ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन * ४११
प्रत्यक्ष करा रहे हो कि सागरके समान पूर्ण समता तुममें विद्यमान है । जिस-जिस वस्तुको तुम देख रहे हो, उस-उस वस्तुमें समानभावसे सत्तारूप सच्चिदानन्द-घन परमात्मा स्थित है ।
जिस प्रकार चित्रलिखित पुरुषमें संसारकी भावना नहीं हो सकती, उसी प्रकार दृश्य और दर्शनके सम्बन्धका अभाव होनेपर हृदयमें जगत्की भावना उत्पन्न नहीं हो सकती । चित्तके संकल्पसे उत्पन्न जगत् चित्तके संकल्पका अभाव होनेपर उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जिस प्रकार जलकी चञ्चलतासे उत्पन्न तरङ्ग जलकी चञ्चलताका अभाव होनेपर विलीन हो जाती है । वासनाके त्यागसे, परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे अथवा प्राणोंके निरोधसे चित्तके संकल्परहित हो जानेपर जगत् कहाँसे उत्पन्न होगा ? जब चित्त-संकल्पके अभावसे अथवा प्राणोंके निरोधसे चित्तका विनाश हो जाता है, तब जो बच रहता है, वही परमपद है । जहाँ चित्तका अभाव है, वहाँ वह सारा सुख स्वाभाविक ब्रह्मसुखरूप ही है । वह सुख स्वर्गादि भोगभूमियोंमें नहीं हो सकता । चित्तका विनाश होनेपर जो ब्रह्मविषयक सुख होता है, वह वाणीसे भी नहीं कहा जा सकता । वह सुख सब समय एकरस रहता है—न घटता है न बढ़ता है । परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे चित्तका अन्त ( अभाव ) हो जाता है । बालकल्पित वेतालकी तरह अज्ञानसे मोह घनरूपता प्राप्त करता है । उस अज्ञानसे ही चित्तकी सत्ता प्रतीत होती है । ज्ञानीका चित्त चित्त नामसे नहीं कहा जाता, किंतु सत्त्व नामसे कहा जाता है । चित्तका स्वरूप वास्तवमें किसी भी कालमें नहीं है । उसका स्वरूप भ्रान्तिसे प्रतीत होता है । इसलिये भ्रान्तिका नाश होनेपर उसका विनाश हो जाता है । वह मिथ्या भ्रान्ति तत्त्वज्ञानसे शान्त हो जाती है; क्योंकि जो सद् वस्तु है, उसका अभाव कभी नहीं होता । जैसे खरगोशके सींगकी सत्ताका अभाव है, वैसे ही विकल्परूप मन आदिका भी अभाव है । वे सब आत्मामें आरोपित हैं । इसलिये उनका परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे विनाश हो जाता है । ( सर्ग ४४-४५ )
शिलाके रूपमें ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघवेन्द्र ! प्रेममय होनेसे स्निग्ध ( चिकनी ), स्वयम्प्रकाश होनेसे स्पष्ट, आनन्दमय होनेसे मृदुल स्पर्शवाली, अनन्त होनेके कारण महाविस्तारसे युक्त, प्रचुर होनेसे घन, नित्य विकाररहित एक ब्रह्मरूप महती शिला है । उस महाशिलाके भीतर मनःकल्पनाओसे अनन्त वे सभी भुवनादिरूप कमल विराज रहे हैं । यहाँपर मैंने यह कोई अपूर्व शिला ही दृष्टान्तरूपसे आपके समक्ष उपस्थित की है, जिसकी महाकुक्षिक भीतर यह सब जगत् प्रतीत होनेके कारण तो है, किंतु वास्तवमें नहीं है । तुमसे उस चिन्मय ब्रह्मरूप शिलाका ही मैंने कथन किया है, जिसके सङ्कल्पमें ये सारे जगत् विद्यमान हैं । इस सच्चिदानन्द ब्रह्ममें शिलाकी ज्यों घनता, एकरूपता आदि हैं । अत्यन्त घनीभूत अद्वैतांशी और पोलसे रहित इस सच्चिदानन्दघनरूप शिलाके अङ्दर यह जगत्-समूह कलित है । यद्यपि उस चेतनरूप शिलामें स्वर्ग, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियों और दिशाएँ विद्यमान प्रतीत होती हैं, तथापि उसमें वस्तुतः तनिक भी अवकाश नहीं है । इस चेतनरूप शिलामें घनीभूत अवयवोवाला जगद्रूपी कमल विकसित हो रहा है । वह यद्यपि उससे पृथक्-सा प्रतीत होता है, तथापि वास्तवमें उससे पृथक् नहीं है । श्रीराम ! जैसे पत्थरमें चित्रकारकी मनःकल्पनासे शङ्ख, खड्ग आदि चित्र निर्मित किये जाते हैं, वैसे ही एकमात्र मनकी कल्पनासे इस चेतनरूप शिलामें भूत, वर्तमान और भविष्यत्—सारा संसार चित्रित किया गया है । प्राकृत शिलामें
४१२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जैसे पुतली आदि वास्तविक-से प्रतीत होते हैं, पर वास्तविक हैं नहीं; अपितु शिलारूप ही हैं, वैसे ही चेतन शिलामें सभी पदार्थ वास्तविक-से प्रतीत होनेपर भी वास्तविक नहीं हैं, किंतु चिन्मय ब्रह्म ही हैं। भीतर स्थित शङ्ख, कमल आदि आकारोंसे युक्त शिला अनेकरूपसे प्रतीत होती हुई भी जैसे घनीभूत एक शिला ही है, वैसे ही कल्पित आकारोंसे युक्त होकर अनेक आकृतियोंके रूपमें प्रतीत होता हुआ भी वास्तवमें घनीभूत एक ब्रह्म ही है। जिस प्रकार पाषाण-शिलाके भीतर शिल्पीद्वारा लिखित कमल, उस शिला-कोशसे अभिन्न होनेपर भी, अपने परिच्छिन्न आकारसे युक्त होकर उससे भिन्न-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार चेतनके स्वरूपसे अभिन्न होनेपर भी यह सृष्टि उससे अन्य—परिच्छिन्न आकारवाली होकर उससे भिन्न-सी प्रतीत होती है, वास्तवमें भिन्न नहीं है। वास्तवमें ये प्रतीत होनेवाले भुवन आदि विकार विकारादि अर्थोंसे शून्य ब्रह्मरूप ही हैं। विषयोंका ग्रहण और अग्रहण भी ब्रह्मरूप ही हैं; क्योंकि ब्रह्म अनन्त है। विकार आदि रूपसे ब्रह्म ही अवस्थित है और ब्रह्म ही क्रमशः विकार आदिके रूपमें उत्पन्न हुआ है। इस चेतन शिलाके भीतर जो ये विकारादि पदार्थ प्रतीत हो रहे हैं, उन्हें तुम मृगतृष्णा-जलके सदृश समझो। जिस प्रकार रेखाओं एवं उपरेखाओंसे युक्त एक ही स्थूल शिला दीखती है, उसी प्रकार अद्वितीय ब्रह्म ही त्रैलोक्यसे युक्त प्रसिद्ध जगद्रूपसे दीखता है। जैसे इस लौकिक शिलाके भीतर सर्वदा स्थित शिल्पीके वासनास्वरूप कमल आदि वास्तवमें न उदित होते हैं और न अस्त ही होते हैं, वैसे ही इस चेतन शिलामें मनोरूप जगत्की गति भी वास्तवमें न उदित होती है और न अस्त ही होती है। जिस तरह शिलाके भीतरकी रेखा आदि शिलासे भिन्न नहीं हैं, किंतु शिलामय ही हैं, उसी तरह कर्तृत्व आदि जगत् चेतनका संकल्प होनेसे चिन्मय ब्रह्मसे भिन्न नहीं हैं, किंतु ब्रह्मरूप ही हैं।
रघुनन्दन ! देश, काल, क्रिया आदि भी ब्रह्मरूप ही हैं; अतः 'यह अन्य है', 'यह अन्य है' इस प्रकारकी कल्पना यहाँ नहीं बन सकती। जिस प्रकार चिन्तामणिके अन्तर्गत चिन्तकोंके अनन्त फल पर्याप्त-रूपसे रहते हैं, उसी प्रकार परम चेतन परमात्मरूप मणिमें अनन्त जगत् रहते हैं। समुद्रमें स्थित आवर्त, तरङ्ग आदिरूप जलस्पन्दनके विलासकी तरह और शिलाके भीतर अङ्कित कमलकी तरह यह अद्वितीय चेतन परमात्मा जगद्रूपसे नाना प्रतीत होता है। जो वर्तमान-कालिक जगत् है, वह चेतनमें एक तरहसे शिलामें खुदी गयी मूर्तिके सदृश है और जो जगत् वर्तमानकालमें नहीं है यानी भूत एव भविष्यत्कालिक जो जगत् है, वह एक तरहसे चेतन शिलामें न खोदी गयी मूर्तिके सदृश है। जैसे कमल आदि शब्द और उनके अनेकों अर्थ शिलाको छोड़कर नाना-से प्रतीत होते हैं, वास्तवमें शिलासे उनका पृथक् अस्तित्व नहीं है। वैसे ही अद्वय चेतन परमात्माको छोड़कर ये जगदादि शब्द और उनके अर्थ नाना-से प्रतीत होते हैं; वास्तवमें चिन्मय परमात्मासे पृथक् उनका अस्तित्व नहीं है, किंतु वे चिन्मय परमात्मा ही हैं। श्रीराम ! मरु-मरीचिका मृगकी दृष्टिमें तो निर्मल जलराशि ही है, किंतु विवेक-बुद्धिसे सम्पन्न विद्वानोंको स्थलपर सूर्यकी किरणें ही पडती हुई दिखायी देती हैं। वहाँ जैसे साक्षरूप किरणें ही असत् जलराशिके रूपमें दिखायी पड़ती हैं, वैसे ही सच्चिदानन्द-स्वरूप तुम ही असत् जगद्रूपसे प्रतीत होते हो। वास्तवमें तो तुम सच्चिदानन्द-स्वरूप हो। जैसे सच्चिदानन्दघन परमात्मामें उत्पत्ति-विनाशका अभाव है, वैसे ही जगत्में भी उत्पत्ति-विनाशका अभाव है; क्योंकि जिस प्रकार मरुभूमिमें सूर्यकी किरणें जलरूपसे प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्रह्म ही जगद्रूपसे प्रतीत होता है। जैसे सूर्यकी धूपसे बर्फ गलकर जलरूप ही हो जाता है,
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * परमात्माके स्वरूपका और अविद्याके अत्यन्त अभावका निरूपण * ४१३
वैसे ही मेरु, तृण, गुल्म, मन और जगत् आदि सारे पदार्थ परमात्माके यथार्थज्ञानसे परम विशुद्ध परमात्मा ही हो जाते हैं, यों ब्रह्मज्ञानी लोग जानते हैं। (सर्ग ५६-५७)
परमात्माके स्वरूपका और अविद्याके अत्यन्त अभावका निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! अपने अतिशय परमानन्दमय स्वरूपका अनुभव करनेवाले ज्ञानी मुनि, देवतागण, सिद्ध और महर्षिलोग सर्वदा तुरीय पदमें स्थित रहते हैं। व्यवहारमें लगे हुए जो लोग बाह्य दृश्य विषयोंमें सत्यताकी भावनासे रहित हैं, जो पुरुष विषयेन्द्रिय-सम्बन्धोंका परित्याग करके समाधिमें निरत हैं, चित्रलिखित देहधारियोंकी भाँति जो प्राणोंके स्पन्दनसे रहित हैं और उन्हींकी भाँति जो मनोगतिसे भी शून्य हैं, वे सब अपने उस परमपद-स्वरूप परमात्मामें—जहाँ मनका एव दृश्यकी आसक्तिका अभाव है—समानभावसे नित्य स्थित हैं। वह विशुद्ध चिन्मय परमात्मा न तो दृष्टिका विषय है और न उपदेशका ही विषय है। वह न तो अत्यन्त समीप है और न दूरवर्ती ही है; किंतु केवल अनुभवसे ही प्राप्य और सब जगह समानभावसे स्थित है। शुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मा न देहरूप है न इन्द्रिय एवं प्राणरूप है, न चित्तस्वरूप है न वासनारूप है, न स्पन्दस्वरूप है न ज्ञानरूप है और न जगद्रूप ही है, बल्कि इन सबसे अति परे महान् श्रेष्ठ है। वह न सद्रूप है न असद्रूप है और न सत् एव असत्के मध्यवर्ती ही है। वह न तो शून्यस्वरूप है और न अशून्य-स्वरूप ही है; वह देश, काल एवं वस्तु भी नहीं है; किंतु ब्रह्मस्वरूप ही है, उससे भिन्न कुछ नहीं। वह ब्रह्म देह आदि समस्त पदार्थोंसे रहित है और जिसके रहनेपर यह दृश्य जगत् आविर्भाव, तिरोभाव आदिरूपसे स्पन्दित होता है वह परमात्मपद ही है। ये हजारों देहरूप घड़े उत्पन्न होते हैं और नष्ट भी होते हैं; किंतु बाहर एव भीतर व्याप्त इस परमात्म-स्वरूप आकाशका नाश नहीं होता (अर्थात् जिस प्रकार घड़ोंका नाश होनेपर भी घटाकाशका नाश नहीं होता, उसी तरह देहका नाश होनेपर भी परमात्माका नाश नहीं होता। ) आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ श्रीराम ! उपर्युक्त देहादि सम्पूर्ण जगत् परमात्मरूप ही है, किंतु वह जगत् केवल अज्ञानवश ही परमात्मासे पृथक्-सा प्रतीत होता है। तुम्हें तो अपनी पवित्र बुद्धिसे यह ज्ञात ही है कि यह विश्व परमात्मस्वरूप है। स्थावर एवं जङ्गम-स्वरूप जो कुछ यह जगत् दीखता है, वह सब ब्रह्म ही है; किंतु वास्तवमें वह ब्रह्म लक्षणों और गुणोंसे, मलोंसे, विकारोंसे तथा आदि और अन्तसे रहित एवं नित्य, शान्त और समस्तरूप है।
श्रीराम ! दही बन जानेसे दूध पुनः अपने दूध-रूपमें नहीं आता। किंतु ब्रह्म-ऐसा नहीं है। आदि, मध्य और अन्त—किसी भी दशामें ब्रह्म तो निर्विकार ब्रह्मरूप ही ज्ञात होता है। इसलिये दूध आदिके समान ब्रह्ममें विकारिता नहीं है। समस्तरूप ब्रह्मका आदि और अन्तमें जो क्षणभरके लिये विकार दिखलायी पड़ता है, उसे तुम जीवात्माका भ्रम समझो; क्योंकि अविकारी ब्रह्ममें कोई विकार नहीं हो सकता। उस ब्रह्ममें दृश्य-दर्शनका अत्यन्त अभाव है। वास्तवमें वह ब्रह्म संसारके सम्बन्धसे रहित, सच्चिदानन्दघन कहा गया है। आदि और अन्तमें जिस वस्तुका जो स्वरूप है, वही उसका नित्य स्वरूप है। यदि मध्यमें उसका अन्य रूप दिखलायी पड़ता है तो वह केवल अज्ञानके कारण ही दिखायी देता है। वास्तवमें परमात्मा तो आदि, अन्त और मध्यमें सर्वत्र सदा एकरूप है; क्योंकि स्वरूप परमानन्दत्त्व कभी भी विषमभावको प्राप्त नहीं होता। निराकार, अद्वितीय
४१४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तथा नित्यस्वरूप होनेके कारण यह परब्रह्म परमात्मा कभी भाव-विकारोंसे युक्त नहीं होता ।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! अद्वितीय तथा अत्यन्त शुद्ध नित्य ब्रह्ममें जीवात्माके भ्रमरूप अविद्याका आगमन कैसे हुआ ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! विकार तथा आदि और अन्तसे रहित यह पूर्ण ब्रह्मसत्त्व पहले भी था, इस समय भी है और भविष्यमें भी सदा रहेगा । वास्तवमें अविद्याका किंचिन्मात्र भी अस्तित्व नहीं है, यह मेरा दृढ़ निश्चय है । 'ब्रह्म' इस शब्दसे जो वाच्य एवं वाचकका पृथक्-पृथक् वर्णन किया जाता है, उसका भी भेदमें तात्पर्य नहीं है, किंतु वह समझानेके लिये ही है । श्रीराम ! तुम और मैं, यह संसार और दिशाएँ, आकाश और पृथ्वी अथवा अनल आदि सब-के-सब आदि और अन्तसे रहित ब्रह्म ही हैं, अविद्या तो वास्तवमें है ही नहीं; क्योंकि मुनिलोग 'अविद्या'को भ्रममात्र और असत् कहते हैं । श्रीराम ! वास्तवमें जो वस्तु है ही नहीं, वह सच कैसे समझी जा सकती है । वेद-रूप वाणीका रहस्य जाननेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ विद्वानोंने 'यह अविद्या है और यह जीव है' इत्यादि कल्पना अज्ञानी जनोंको उपदेश देनेके लिये ही की है । केवल युक्तिसे ही बोध कराकर इस जीवको परमात्मामें नियुक्त किया जा सकता है; क्योंकि जो कार्य युक्तिसे सम्पादित होता है, वह सैकड़ों अन्य उपायोंसे नहीं होता । अज्ञानी दुर्मतिके सम्मुख उसे सुहृद् समझकर 'यह सब कुछ ब्रह्म है' यों जो पुरुष कहता है, उसका वह कथन एक ठूँठको दुःख निवेदन करनेके समान है । उससे कोई लाभ नहीं है । क्योकि मूर्ख युक्तिसे प्रबोधित होता है और प्राज्ञ तत्त्वसे । युक्तिसे बोध कराये बिना मूर्खको ज्ञान नहीं होता । श्रीराम ! मैं ब्रह्म हूँ, तीनो जगत् ब्रह्म हैं, तुम ब्रह्म हो और यह दृश्य पृथ्वी भी ब्रह्म ही है; ब्रह्मसे पृथक् कोई दूसरी कल्पना ही नहीं है । रघुनन्दन ! सोते जागते, चलते-फिरते, बैठते, श्वास लेते—सब समय अपने हृदयमें 'सर्वव्यापी सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही मैं हूँ' ऐसा समझना चाहिये । क्योंकि तुम वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित, शान्त, चिन्मय ब्रह्म हो यथा सर्वव्यापी, अद्वितीय, शुद्ध ज्ञान-स्वरूप, आदि और अन्तसे रहित, प्रकाशात्मक परम-पदस्वरूप हो एव ब्रह्म, तुरीय, आत्मा, अविद्या, प्रकृति—ये सब भी अभिन्न, अद्वितीय नित्य परमात्मस्वरूप ही हैं । जैसे मिट्टीसे घड़ा पृथक् नहीं है, वैसे ही परमात्मासे प्रकृति पृथक् नहीं है । जैसे वायु और उसका स्पन्दन एक ही पदार्थ हैं और नामसे दोनो भिन्न होते हुए भी वास्तवमें भिन्न नहीं हैं वैसे ही परमात्मा और प्रकृति—ये दोनों एक हैं और नामसे भिन्न होते हुए भी वास्तवमें भिन्न नहीं हैं । जैसे अज्ञानसे रज्जुमें सर्पकी प्रतीति होती है, वैसे ही अज्ञानसे इन दोनोमें भेद जान पड़ता है और वह भेद यथार्थ ज्ञानसे ही विनष्ट हो जाता है । तात्पर्य यह कि परमात्माके सिवा—उससे भिन्न कोई वस्तु नहीं है । (सर्ग ४८-४९.)
जीवात्माका अपनी भावनासे लिङ्गदेहात्मक पुर्यष्टक बनकर अनेक रूप धारण करना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ब्रह्मन् ! मुझे सम्पूर्ण ज्ञातव्य (जानने योग्य) वस्तुका ज्ञान है और अविनाशी द्रष्टव्य वस्तुका अनुभव है तथा मैं आपके सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मज्ञानरूप उपदेशामृतसे तृप्त हूँ । सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्म परमात्मासे यह पूर्ण संसार परिपूर्ण है । पूर्णब्रह्म परमात्मासे ही यह संसार उत्पन्न होता है, पूर्ण-ब्रह्म परमात्माद्वारा ही यह संसार पूरित है एवं पूर्णब्रह्म परमात्मामें ही यह संसार स्थित है; तथापि ब्रह्मन् ! बहुत लोगोंके ज्ञानकी अभिवृद्धिके लिये लीलासे मैं आपसे यह प्रश्न पूछता हूँ । मृत प्राणीके श्रोत्र, चक्षु, त्वचा,
निर्वाण प्रकरण पू० ] * पुर्यष्टक बने हुए जीवात्माको तत्त्वज्ञानसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति * ४१५
रसना और घ्राण—ये इन्द्रियगोलक प्रत्यक्ष विद्यमान रहते हुए भी अपने अपने विषयोंका ग्रहण क्यों नहीं करते और जीते हुए प्राणीकी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंका ग्रहण कैसे करती हैं ? जडरूप होती हुई भी ये इन्द्रियाँ शरीरके भीतर स्थित रहकर घटादि बाह्य पदार्थोंका अनुभव कैसे करती हैं और कैसे नहीं भी करतीं ? महर्षे ! यद्यपि मैं इन विशेषताओंको जान रहा हूँ, तथापि आपसे फिर पूछता हूँ, उसे आप कृपापूर्वक पूर्णरूपसे कहिये ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—श्रीराम ! इस संसारमें विशुद्ध सच्चिदानन्द ब्रह्मके सिवा इन्द्रिय, चित्त और घट आदि किसी भी अन्य पदार्थका पृथक् अस्तित्त्व नहीं है। अर्थात् एक विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही हैं। वह चिन्मय परमात्मा ही प्रकृति बन गया है। उसी प्रकृतिके अंशसे इन्द्रिय आदि एवं घट आदि उत्पन्न हुए हैं। किंतु आदि और अन्तसे रहित, विकार-रहित, प्रकाशस्वरूप, शुद्ध चैतन्यमात्र, जगत्-कारणरूप ब्रह्म वास्तवमें मायासे रहित हैं। यह अज्ञानी जीवात्मा ही अज्ञानके कारण अपनी भावनाके अनुसार संसारका रूप धारण करता है। यह अह-भावनासे 'अहंकार', मननसे 'मन', निश्चयकी भावनासे 'बुद्धि', इन्द्रियोंकी भावनासे 'इन्द्रिय', देहकी भावनासे 'देह' और घटकी भावनासे घट बन जाता है। इस प्रकार अपनी भावनाके कारण यह जीवात्मा पुर्यष्टक बन जाता है। ज्ञानेन्द्रियोंके व्यापारोंको लेकर 'मैं ज्ञाता हूँ', कर्मेन्द्रियोंके व्यापारोंको लेकर 'मैं कर्ता हूँ', उन ज्ञान-कर्मेन्द्रियों-के व्यापारोंसे जनित सुख-दुःखोंका आश्रय होनेसे 'मैं भोक्ता हूँ', उदासीन होकर सबका प्रकाशन करनेसे मैं 'साक्षी हूँ' इत्यादि अभिमानयुक्त जो चैतन्य है, वही 'जीव' कहा गया है। वही जीवात्मा अपनी भावनासे समय-समयपर स्वयं ही अनेकरूप हो जाता है। जैसे जल सींचनेसे बीजके पल्लव आदि आकार होते हैं, वैसे ही भावनाके अनुसार उस जीवके भी शरीर आदि, स्थावर आदि एवं जंगम आदि अनेक रूप होते हैं; क्योंकि यह जीवात्मा अज्ञानसे यह मान लेता है कि मैं चेतन आत्मा नहीं हूँ, किंतु शरीरादि हूँ। वासनाओंके वशीभूत हुआ यह जीव कर्मानुसार चिरकालतक स्वर्ग-नरकमें आवागमनोंद्वारा जगत्में घूमता ही रहता है। इनमेंसे कोई तो विशुद्ध जन्मके कारण पहले जन्ममें ही परमात्माको यथार्थ जानकर आदि-अन्तसे रहित परमपद परमात्माको प्राप्त हो जाता है। कोई बहुत कालतक अनेक योनियोंमें प्राप्त सुख-दुःखादि भोगोंके अनन्तर परमात्माके यथार्थ ज्ञानद्वारा परमपदको प्राप्त होता है। श्रीराम ! बाह्य विषयोंके ज्ञानमें इन्द्रिय-सम्बन्ध ही सदा कारण है और वह इन्द्रियोंका सम्बन्ध चित्तसे युक्त जीवित पुरुषमें ही सम्भव है, मृत पुरुषमें कभी नहीं। जब शानपर चढ़े हुए चमकीले नवीन रत्नके समान आँखोंके तारेमें बाह्य दृश्य पदार्थ प्रतिबिम्बित होता है, तब उस पदार्थका हृदयमें प्रतिबिम्ब पड़नेके कारण, देहाभिमानी जीवके साथ सम्बन्ध हो जाता है। इस रीतिसे बाह्य वस्तु जीवद्वारा हृदयमें जानी जाती है। (सर्ग ५०)
पुर्यष्टक बने हुए जीवात्माको तत्त्वज्ञानसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति होनेका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! व्यष्टि चेतन जीवात्मा गर्भमें चक्षु आदि इन्द्रियोंके प्रादुर्भावसे सम्पन्न पुर्यष्टकस्वरूप हो जानेपर जिस वस्तुकी जिस प्रकार भावना करता है, उसी प्रकार उसे अपनी भावनासे तत्काल ही अनुभव करने लगता है। किंतु वास्तवमें अद्वितीय, असीम और अभेद्य होनेसे निर्विकार शुद्ध आत्मामें दूसरे किसी पदार्थका अस्तित्व है ही नहीं। अतः वह चेतन आत्मा वास्तवमें दृश्यके सम्बन्धसे कभी भी मनोरूपता, जीवरूपता अथवा पुर्यष्टकरूपताको नहीं प्राप्त होता। श्रीराम ! परमात्मा तो वास्तवमें विद्या
४१६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आदिद्वारा नहीं जाना जा सकता और वह सदा विद्यमान होते हुए भी अश्रद्धालु विश्वासहीन पुरुषोंके लिये नहीं है। वही 'परमात्मा' इस नामसे कहा गया है तथा वही पाँचों इन्द्रिय और छठे मनसे अतीत है अर्थात् इनके द्वारा वह जाना नहीं जा सकता। 'उस परमात्मासे चेतन जीव उत्पन्न होता है' इत्यादि मननात्मक कल्पना एकमात्र शिष्योंको समझानेके लिये ही कही गयी है। वास्तवमें परमात्मासे भिन्न अन्य कुछ है ही नहीं। जैसे मृगतृष्णा-जलको प्रयत्नसे भी किसीने कहीं नहीं पाया, उसी प्रकार प्रतीत होनेपर भी जो अभावरूप पदार्थ हैं, वे प्रयत्नसे भी किस तरह पाये जा सकते हैं। क्योंकि असत् पदार्थ ही सत् प्रतीत होता है। उसकी सत्यता असद्रूप अविद्यासे ही है। ज्ञानसे तो जो वस्तु वास्तवमें जिस प्रकारकी रहती है, वह उसी प्रकारकी अनुभूत हो जाती है और भ्रान्ति नष्ट हो जाती है। ये इन्द्रिय, मन, प्राण आदि आन्तरिक पदार्थ हैं और ये घट आदि बाह्य पदार्थ हैं—ऐसे विचारवाला जीवात्मा जिसकी जैसी भावना कर लेता है, उसे वैसी ही प्रतीति होने लगती है। द्वैत एवं अद्वैतरूप यह सम्पूर्ण जगत् उसी प्रकार परमात्मासे ही बना है, जैसे ईंखके रससे खाँड और मिट्टीसे महान् घट। खाँड, घट आदिमें—देश, काल आदिसे परिच्छिन्न होनेके कारण—अवयव-विन्यास, विकार आदि हो सकते हैं; परंतु ब्रह्म तो देश, काल आदिसे परिच्छिन्न नहीं है; सुतरां उसमें वे विकार आदि वास्तवमें हो ही नहीं सकते। केवल ब्रह्ममें जगत्की कल्पनामात्र है। क्योंकि जिस प्रकार भूषणमें स्थित सुवर्णमें यानी सुवर्णके आभूषणमें सत्य एव असत्यरूप सुवर्णत्व और कटकत्व दोनों रहते हैं, उसी प्रकार परमात्मामें भी चेतनता और जड़ता दोनों रहती हैं। तात्पर्य यह कि जैसे स्वर्ण ही आभूषणके रूपमें प्रतीत होता है, वैसे ही चेतन ब्रह्म ही जड़ जगत्के रूपमें प्रतीत होता है।
जैसे मनुष्य स्वप्नमें शीघ्र ही दीवाल बनकर घट बन जाता है, वैसे ही मरणकालमें जीवात्मा दूसरा शरीर अपने-आप बन जाता है। स्वप्नमें अपने संकल्पसे ही जीवात्मा जन्मता-मरता है। वास्तवमें यह सब मिथ्या है। इस जीवकी अपनी वासना ही पाञ्चभौतिक देह होकर उसी प्रकार आगे खड़ी हुई-सी रहती है, जिस प्रकार बालकके आगे कल्पित असत्य महान् प्रेत खड़ा हुआ-सा रहता है। मन, बुद्धि, अहंकार एवं पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ—इन आठोंका समूह पुर्यष्टक कहा गया है और यही 'आतिवाहिक' देह कहा गया है।* सजीव पहाड़, वृक्षरूप स्थावर आदि अवस्थाओंमें तथा कल्पवृक्षकी अवस्थाओंमें भी पाषाण-शिलाके समान घनीभूत जड़तावाली (तमोयुक्त) यह आतिवाहिक देह (लिङ्गशरीर) सुषुप्ति-अवस्थामें स्थितकी ज्यों ही स्थित रहती है। जीवात्माके यथार्थ ज्ञानसे ही मुक्ति होती है और उसी ज्ञानसे वह परमात्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है। जीवात्माके यथार्थ ज्ञानसे जो मुक्ति प्राप्त होती है, वह शास्त्रोंमें दो प्रकारकी बतलायी गयी है—एक जीवन्मुक्ति और दूसरी विदेहमुक्ति। जीवन्मुक्ति ही तुरीयावस्था है। उसके परे तुरीयातीत परम ब्रह्मपद है। यथार्थ ज्ञान होनेसे यह जीव प्रबोधस्वरूप हो जाता है यानी उत्कृष्ट चैतन्यात्मक ब्रह्मरूप हो जाता है और वह यथार्थज्ञान या बोध पुरुष-प्रयत्नसे साध्य है। जो जीवात्मा अपने सर्वव्यापी स्वरूपको यथार्थ जान जाता है, वह सच्चिदानन्दमय ही हो जाता है। किंतु जो जीव उपर्युक्त ज्ञानसे शून्य है, वह अज्ञानवश शिलाकी तरह दृढ़ीकृत अपने हृदयमें दीर्घतम संसारस्वप्न-भ्रान्तिरूप तीव्र भयका अनुभव करता रहता है। जीवके
* इन्हींको योगदर्शन (२। १९) और सांख्यकारिका (३) में शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धरूप पञ्चविषयात्मक सूक्ष्म तन्मात्राएँ कहा गया है, एवं गीतामें आकाश-वायु-तेज-जल-पृथ्वीरूप सूक्ष्म महाभूत बताया गया है (७।४; १३।५)।
कल्याण
क्षीरसागरमें शेष-शय्यापर विराजित भगवान्का जगत्की स्थितिको देखना
(उपशम-प्रकरण सर्ग ३८)
कोई OCR पाठ नहीं।
३९-चार प्रकारका मौन और उनमेंसे जीवन्मुक्त ज्ञानीके सुषुप्त मौनकी श्रेष्ठता
निर्वाण-प्रकरण पू०] * श्रीकृष्णार्जुन-आख्यानका आरम्भ, श्रीकृष्णद्वारा आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन * ४१७
भीतर चिन्मय आत्माके सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। पर यह अज्ञानके कारण उसी चेतन आत्माको जड देहके रूपमें समझकर व्यर्थ ही शोक किया करता है। जीवात्माके भीतर परमब्रह्मके सिवा दूसरा कुछ भी नहीं है। अहो ! जहाँ-तहाँ यह जो जगत् प्रतीत होता है, वह मायाका ही परिणाम है।
श्रीराम ! वासनाओंका बन्धन ही इस जीवात्माके लिये बन्धन है, वासनाओंका अभाव ही इसका मोक्ष है और वासनाओंका लय ही सुषुप्ति-अवस्था है; और वही वासना स्वप्नमें नाना प्रकारसे प्रकट होती है। जब यह जीव वासनाओंकी घनतासे मोहित होता है, तब वह स्थावर आदि योनियोंको प्राप्त होता है; जब मध्यम प्रकारकी वासनाओंसे युक्त होता है, तब पशु-पक्षी आदि योनियोंको प्राप्त होता है और जब क्षीण वासनाओंसे समन्वित होता है, तब मनुष्य-देव-गन्धर्व आदि योनियोंको प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि वासनाओंके क्षयके तारतम्यसे उत्तरोत्तर शुभयोनिकी प्राप्ति होती है। किंतु परमात्मा तो वास्तवमें न किसीका त्याग करता है और न किसीका ग्रहण ही करता है। वास्तवमें परमात्मासे भिन्न किसीका अस्तित्व ही नहीं। अतः यहाँ बाह्य और आन्तर कलात्मक जगत्के रूपमें वह परमात्मा ही अपने संकल्पसे प्रकाशित होता है, अतः परमात्माके सिवा और कुछ नहीं है। ये तीनों जगत् चिन्मय परमात्माका सङ्कल्प ही हैं। इसलिये भेदके विकल्पोंसे प्रयोजन ही क्या रहा। अब हम सच्चिदानन्द परमात्मामें नित्य स्थित हैं। इस बाह्य-आन्तर जगत्का भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों कालोंमें ही अत्यन्त अभाव है। अर्थात् वास्तवमें यह जगत् न पहले था, न अभी है और न भविष्यमें ही कायम रहेगा। जैसे समुद्र तरङ्ग आदि समस्त भेदोंसे रहित, सम्पूर्णरूपसे केवल विशुद्ध द्रवात्मक जलस्वरूप ही है, वैसे ही यह जगत् भी समस्त भेदों और विकारोंसे रहित केवल परमपद ब्रह्मस्वरूप ही है।
( सर्ग ५१ )
श्रीकृष्णार्जुन-आख्यानका आरम्भ—अर्जुनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णद्वारा आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! अब कमल-नयन भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा कहे हुए उस शुभ अनासक्ति-योगको तुम सुनो, जिसका अवलम्बन करके मनुष्य जीवन्मुक्त महामुनि बन जाता है। उस उपदेशको सुनकर महाराज पाण्डुका पुत्र अर्जुन जीवन्मुक्तिरूप सुखसे युक्त हुआ अपना जीवन बितायेगा।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! कृपाकर आप मुझे यह बतलाइये कि वह पाण्डुनन्दन इस पृथ्वीपर कब उत्पन्न होगा और उसके प्रति अनासक्तिका वर्णन भगवान् श्रीकृष्ण किस तरह करेंगे ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! एक समय यह पृथ्वी द्युलोकमें आये हुए भारस्वरूप पापी प्राणियोंसे व्याप्त, वन-गुल्मोंसे संकीर्ण-सी और दीन हो जायगी। उस समय पापी मनुष्योंके भारसे पीडित यह दीन पृथ्वी शरण पानेके लिये भगवान् विष्णुके समीप उसी तरह जायेगी, जिस तरह लुटेरोंसे लूटी गयी कातर स्त्री अपने पतिके समीप जाती है। तब सम्पूर्ण देवांशोंके साथ भगवान् श्रीहरि नर और नारायणके अवताररूपमें दो शरीरोंसे पृथ्वीपर प्रकट होंगे। उनमेंसे श्रीहरिके नारायणस्वरूपका साक्षात् अवतार एक तो 'श्रीवासुदेव' इस नामसे विख्यात होगा और दूसरा अंशावतार नरस्वरूप पाण्डुपुत्र 'अर्जुन' इस नामसे विख्यात होगा और चारों समुद्रोंसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका अधिपति एवं धर्मका पुत्र 'युधिष्ठिर' इस नामसे प्रसिद्ध होगा। वह पाण्डुपुत्र धर्मज्ञ होगा, उसका
स० यो० व० अं० १५—
४१८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त-योगवासिष्ठ
चचेरा भाई 'दुर्योधन' नामसे विख्यात होगा और उस दुर्योधनका 'भीम' नामक द्वितीय पाण्डु-पुत्र वैसा ही प्रतिद्वन्द्वी होगा, जैसे सर्पका प्रतिद्वन्द्वी नकुल। पृथ्वीको अपने-अपने अधिकारमें करनेके लिये परस्पर युद्ध करनेमें तत्पर उन दोनोंकी भयंकर अठारह अक्षौहिणी सेना कुरुक्षेत्रमें होनेवाली महाभारतकी लड़ाईमें इकट्ठी होगी। रघुनन्दन ! महान् गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुनकी देहसे उन सेनाओंको नष्टकर श्रीविष्णुभगवान् (श्रीकृष्ण) पृथ्वीको भारसे मुक्त कर देंगे। युद्धके प्रारम्भमें भगवान् विष्णुका अंश अर्जुन प्राकृतभावमें स्थित होकर हर्ष और शोकसे युक्त मनुष्य-धर्मवाला बन जायगा। दोनों सेनाओंमें पहुँचे हुए और मरनेके लिये तैयार अपने बन्धुओंको देखकर वह अर्जुन विषादको प्राप्त हो जायगा और युद्ध करना अस्वीकार कर देगा। राघव ! उस समय अर्जुनको उपस्थित कार्यकी सिद्धिके लिये श्रीविष्णुभगवान् अपने ज्ञानमय श्रीकृष्णस्वरूपसे इस प्रकार उपदेश देंगे—
'यह आत्मा किसी कालमें भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता। जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है और न किसीके द्वारा मारा जाता है। अनन्त, एकरूप, सत्स्वरूप और आकाशसे भी अत्यन्त सूक्ष्म प्रभावशाली परम शुद्ध आत्माका किससे किस तरह क्या नष्ट होता है ? अर्थात् उसका किसी प्रकार कभी विनाश नहीं होता। अतएव ज्ञानस्वरूप अर्जुन ! तुम आदि और मध्यसे रहित, अनन्त एवं अव्यक्त अपने वास्तविक स्वरूपका अवलोकन करो। तुम अप्रमेय, दोषरहित, चैतन्यस्वरूप, अज, नित्य और विशुद्ध हो।' (सर्ग ५२)
कर्तृत्वभिमानसे रहित पुरुषके कर्मोंसे लिप्त न होनेका निरूपण एवं सङ्गत्याग, ब्रह्मार्पण, ईश्वरार्पण, संन्यास, ज्ञान और योगकी परिभाषा
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन ! तुम स्वयं जरा-मरणसे रहित नित्य चिन्मय आत्मस्वरूप हो। तुम 'मारने-वाले' नहीं हो, अतः इस अभिमानरूप दोषका त्याग कर दो। क्योंकि जिस पुरुषके अन्त:करणमें 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोंमें लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मारता है और न पापसे बँधता है। इसलिये 'अयम्' यानी यह संसार 'सोऽहम्' यानी वह मारनेवाला मैं, 'इदम्' यानी यह देह और 'तन्मे' यानी वे बन्धु आदि मेरे हैं—इस तरहकी अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई वृत्तिका त्याग कर दो। क्योंकि भारत ! इसी बुद्धिवृत्तिके कारण 'मैं पापोंसे युक्त हूँ', 'मैं विनाशशील हूँ' इत्यादि भ्रान्तियोंके अधीन होकर तुम चारों ओर सुख-दुःखोंसे संतप्त हो रहे हो। वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म अपनी आत्माके अंशरूप गुणोंके द्वारा ही विभागपूर्वक किये जाते हैं; तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकारसे मोहित हो रहा है, वह अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है। महात्मा पुरुषके अन्तःकरणमें 'मैं' नामकी कोई वस्तु नहीं है; फिर तुम्हारे लिये कौन पदार्थ क्लेशकारक है ? अर्थात् कोई नहीं। भारत ! बहुतोंने मिलकर एक साथ जिस कार्यका सम्पादन किया हो, उसमें यदि किसी एकको 'मैंने ही यह किया है' यों अभिमान-जन्य दुःख होता है तो वह हास्यास्पद ही है। क्योंकि कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीरद्वारा भी आसक्तिको त्यागकर अन्त-करणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। तथा जिसका शरीर
४१-वेताल और राजाका संवाद
निर्वाण-प्रकरण पू०] * कर्तृत्वाभिमानसे रहित पुरुषके कर्मोंसे लिप्त न होनेका निरूपण * ४१९
अहंतारूपी विषसे दूषित नहीं हुआ वह रागादिरूपी हैजेसे मुक्त योगी कर्म करते हुए और न करते हुए भी लिप्त नहीं होता। जैसे विवेकी और लौकिक विषयोंका ज्ञाता होनेपर भी दुष्ट-प्रकृति पुरुष कहीं शोभा नहीं पाता, वैसे ही ममतारूपी दोषसे दूषित मनुष्य कहीं भी शोभा नहीं पाता। जो ममता और अहंकारसे रहित, सुख और दुःखोंकी प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है, वह मनुष्य कर्म करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता। पाण्डुपुत्र ! यह शास्त्रविहित उत्तम क्षात्रकर्म तुम्हारा स्वकर्म है। वह बन्धु-वधरूप होनेसे क्रूर होनेपर भी कर्तव्यबुद्धिसे किये जानेपर सुख, अभ्युदय और कल्याणका जनक है।
धनंजय ! तुम आसक्तिको त्यागकर योग—समतामें स्थित हुए कर्तव्यकर्मोंको करो। क्योंकि आसक्तिरहित होकर न्यायसे प्राप्त कर्म करनेवाला मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता। तुम शान्तिमय ब्रह्मस्वरूप होकर कर्मको ब्रह्ममय बना दो। अपने सत्कर्मोंको ब्रह्मार्पण कर देनेपर तुम शीघ्र ब्रह्म ही हो जाओगे। अपने सम्पूर्ण कार्योंको परमेश्वरमें समर्पितकर तथा अपने-आपको भी परमेश्वरमें समर्पितकर पापरहित हुए एवं सर्वभूतोंका आत्मा बनकर इस भूतलको विभूषित करते हुए तुम परमात्मा बन जाओ। तुम सभी संकल्पोंसे रहित हो; इसलिये अब समस्वरूप, शान्तचित्त मुनि बनकर कर्मफलत्यागरूपी संन्यासयोगमें आत्माको युक्त करके कर्म करते हुए ही मुक्त हो जाओ।
अर्जुनने पूछा—भगवन् ! सङ्ग-त्याग, ब्रह्मार्पण, ईश्वरार्पण, सर्वथा संन्यास तथा ज्ञान और योगका विभाग क्या है ? प्रभो ! मेरे मोहकी निवृत्तिके लिये यह सब कहिये।
श्रीभगवान्ने कहा—सारे संकल्पोंकी भलीभाँति शान्ति हो जानेपर सम्पूर्ण वासनाओं और भावनाओंसे रहित जो विशुद्ध केवल चेतनतत्त्व है, वही परब्रह्म परमात्मा कहा गया है। संस्कारके द्वारा पवित्र बुद्धिवाले पुरुषोंने उस परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके साधनको ही ज्ञान कहा है और उसीको योग कहा है तथा 'सम्पूर्ण संसार ब्रह्म ही है', और 'मैं भी ब्रह्मरूप ही हूँ'—इस प्रकार अपने आपको ब्रह्ममें अर्पण कर देनेको ब्रह्मार्पण कहा है एवं सम्पूर्ण कर्मफलोंके त्यागको ज्ञानियोंने संन्यास कहा है। संकल्प-समूहोंका जो त्याग है, वही असङ्ग (आसक्तिका अभाव) कहा गया है। आसक्तिके अभावका नाम ही सङ्गत्याग है। सभी संकल्प-विकल्प समूहोंमें जो एक ईश्वरकी भावना है तथा जीव और ईश्वरके एकत्वकी भावना है, उसीको जीवात्माका ईश्वरमें अर्पण कहा गया है। क्योंकि अज्ञानके कारण ही चेतन परमात्मामें इन जीव और जगत् आदिका नाममात्र ही भेद है। वास्तवमें यह नाम-रूपात्मक सम्पूर्ण जगत् ज्ञान-स्वरूप है; अतः जगत् एक ब्रह्ममय ही है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। अर्जुन ! दिशाएँ मैं हूँ, जगत् मैं हूँ, आत्मा मैं हूँ और कर्म भी मैं ही हूँ। काल मैं हूँ, अद्वैत और द्वैत—सब मैं ही हूँ। इसलिये मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरे पूजक बनो, मुझको प्रणाम करो। इस प्रकार आत्माको मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तुम मुझको ही प्राप्त होओगे।
अर्जुनने पूछा—देवेश्वर ! आपके पर और अपर—दो रूप किस प्रकारके हैं और परमपदरूप सिद्धिके लिये किस समय किस रूपका आश्रय लेकर मैं स्थित रहूँ ?
श्रीभगवान्ने कहा—निष्पाप अर्जुन ! यह जान लो कि मेरे दो रूप हैं—एक तो सामान्य रूप और दूसरा परम रूप। शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाला चतुर्भुज साकारस्वरूप तो मेरा सामान्य रूप है और जो मेरा विकाररहित, अद्वितीय, आदि और अन्तसे रहित निर्गुण निराकार स्वरूप है, वह परम रूप है; वही ब्रह्म, शुद्ध आत्मा, परमात्मा आदि शब्दोंसे कहा जाता है। तुम सम्प्रबुद्ध होकर परम उत्कृष्ट, आदि और अन्तसे रहित मेरे उस रूपको जान जाओगे, जिसके ज्ञानसे प्राणी इस संसारमें फिर उत्पन्न नहीं होता। अरिमर्दन ! यदि
४२-वेतालकृत छः प्रश्नोंका राजाद्वारा समाधान
४२० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
तुम ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त करनेके योग्य हो तो मुझ परमेश्वर-की आत्माको और अपनी आत्माको एकरसकर अखण्ड परिपूर्णात्माका तत्काल आश्रय ले लो। 'यह मैं हूँ' और 'यह भी मैं हूँ' इत्यादि जो कुछ मैं कहता हूँ, वह सब इस आत्मतत्त्वका ही उपदेश मैं तुम्हें देता हूँ। मैं समझता हूँ कि मेरे उपदेशसे तुम भली प्रकार प्रबुद्ध हो चुके हो, ब्रह्मपदमें विश्रान्ति पा चुके हो और सर्व-संकल्पोंसे भी मुक्त हो चुके हो। अब तुम सत्य एवं अद्वितीय आत्मस्वरूप होकर स्थित रहो एवं सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त और सबको समभावसे देखनेवाले तुम आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखो—अर्थात् एक परमात्माके सिवा और कुछ नहीं है, ऐसा समझो। क्योंकि जो पुरुष 'सब कुछ ब्रह्म ही है' 'मैं भी ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार एकीभावका आश्रय लेकर सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित परमात्माको भजता है, वह सब प्रकारसे व्यवहार करता हुआ भी पुनः इस संसारमें उत्पन्न नहीं होता, अर्थात् वह परमपदको प्राप्त हो जाता है। 'सर्व' शब्दका अर्थ है—एकत्व और वह एकत्व परमात्माका वाचक है। वह परमात्मा प्रत्यक्ष प्रतीत न होनेके कारण सत् भी नहीं कहा जा सकता और ध्रुव सत्य भावरूप होनेके कारण असत् भी नहीं कहा जा सकता; अतः वह सत्-असत्से विलक्षण है। वह जिसके अनुभवमें आ जाता है, उसे शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। जो तीनों लोकोंके अन्तःकरणके भीतर स्थित हुआ प्रकाश देता है और जो ज्ञानियोंके अनुभवमें प्रत्यक्ष है, निश्चय ही वही मैं परमात्मा हूँ।
सम्पूर्ण शरीरोंके भीतर जो दृश्य संसारसे रहित और सूक्ष्मरूपसे व्यापक अनुभवस्वरूप है, वही यह सर्वव्यापी परमात्मा है। बाहर-भीतर प्रकाश करनेवाला तेजस्वरूप मैं देहोंके भीतर प्रत्यक्ष विद्यमान रहता हुआ भी प्रतीत नहीं होता। जिस तरह हजारों घड़ोंके बाहर और भीतर आकाश समभावसे व्यापक है, उसी तरह भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनों जगत्में स्थित शरीरोंके भी बाहर और भीतर मैं व्यापक हूँ; किंतु लाखों देहोंके भीतर सम-भावसे व्यापक हुआ भी यह परमात्मा सूक्ष्म होनेके कारण प्रतीत नहीं होता। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जितना भी पदार्थ-समूह है, उसमें जो समभावसे नित्य स्थित है, विद्वान्लोग उसे ही नित्य चिन्मय परमात्मा जानते हैं। विनाशशील पदार्थोंमें साक्षीकी भाँति समभावसे स्थित अविनाशी परमात्माको जो देखता है, वही यथार्थ देखता है। पाण्डुनन्दन ! 'समस्त शरीरोंमें चेतन ही मैं हूँ, शरीर मैं नहीं हूँ' इस प्रकार जो मैं कहता हूँ, वह अद्वितीय परमात्मा मैं सबका आत्मा हूँ। तुम मुझे इस प्रकार तत्त्वतः जानो। जिस प्रकार पर्वतोंका वास्तविक स्वरूप पाषाण ही है, वृक्षोंका स्वरूप काष्ठ ही है और तरङ्गोंका स्वरूप जल ही है, उसी प्रकार सम्पूर्ण पदार्थोंका वास्तविक स्वरूप परमात्मा ही है। जो पुरुष परमात्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको परमात्मामें कल्पित देखता है एवं आत्माको अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है। अर्जुन ! नाना प्रकारके आकार-विकारों-वाले तरङ्गोंमें जैसे जल व्यापक है या कडे-कुण्डल आदिमें सुवर्ण व्यापक है, वैसे ही विविध प्रकारके समस्त प्राणियोंमें परमात्मा समभावसे व्यापक है। तथा जिस प्रकार जलमें नाना प्रकारके चञ्चल तरङ्ग-समूह हैं या सुवर्णमें कडे-कुण्डल आदि हैं, उसी प्रकार परमात्मामें ये समस्त भूत-प्राणी भी हैं। इसलिये भारत ! सम्पूर्ण पदार्थ और भूत-प्राणी एवं परम ब्रह्म—इन सबको एकरूप ही जानो, इनमें लेशमात्र भी पृथक्त्व नहीं है। इस प्रकारके उपदेशोंको सुनकर और निश्चयपूर्वक भीतर अभय ब्रह्मकी भलीभाँति भावना करके समबुद्धि महात्मालोग जीवन्मुक्त होकर इस संसारमें विचरा करते हैं। जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्तिरूप दोषको जीत लिया है, जिनकी
४३-भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य और अपने गुरु त्रितलके साथ संवाद
निर्वाण-प्रकरण पू० ] * श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति कर्म और ज्ञानके तत्त्वका प्रतिपादन * ४२१
परमात्माके स्वरूपमें नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्णरूपसे नष्ट हो गयी हैं—वे सुख-दुःखनामक द्वन्द्वोंसे विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपदको प्राप्त होते हैं।
( सर्ग ५३ )
श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति कर्म और ज्ञानके तत्त्व-रहस्यका प्रतिपादन
श्रीभगवान्ने कहा—महाबाहो अर्जुन ! तुम फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचनको सुनो, जिसे मैं अतिशय प्रेम रखनेवाले तुम्हारे लिये हितकी इच्छासे कहूँगा। कुन्तीपुत्र ! सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखको देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं; इसलिये भारत ! उनको तुम सहन करो। इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंका विषय-संसर्ग, सुख-दुःख आदि द्वन्द्व या इनसे भिन्न जो कुछ भी पदार्थ हैं, वे सब-के-सब एक सच्चिदानन्दघन परमात्मासे तनिक भी पृथक् नहीं हैं अर्थात् सब कुछ परमात्मा ही है। अतः फिर, सुख और दुःख कहाँ ? आदि-अन्तसे रहित तथा अवयवहीन परमात्मामें पूर्णता और अपूर्णता कैसे हो सकती है । इसलिये जो पुरुष सुख-दुःखमें समान और धीर है, वह अमृतमय ब्रह्मपदको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। वास्तवमें सभी तरहसे सुख-दुःखोंका अस्तित्व तनिक भी नहीं है। परमात्मतत्त्व ही सर्वरूप है, इसलिये अनात्मारूप संसारकी सत्ता कैसे स्थिर होगी। क्योंकि असत् वस्तुकी तो सत्ता है नहीं और सत्का अभाव नहीं है अतएव सुख-दुःख आदि हैं ही नहीं, केवल एक सर्वव्यापी परमात्मा ही है। अर्जुन ! यद्यपि आत्मा दृश्य पदार्थोंका साक्षीरूपसे साक्षात्कार करनेवाला चेतनस्वरूप है और शरीरके अंदर रहता भी है, तथापि वह सुखोंसे न तो हर्षित होता है और न दुःखोंसे दुखित ही । परमात्मासे पृथक् देह आदि कुछ भी नहीं है और न दुःख आदि ही हैं; अतः वास्तवमें कौन किसका अनुभव करेगा ? क्योंकि एक परमात्माके सिवा दूसरी वस्तु है ही नहीं। भारत ! यह दुःख अज्ञानसे उत्पन्न एक प्रकारकी भ्रान्ति ही है
अतः परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे वह सर्वथा विनष्ट हो जाता है। जिस प्रकार रज्जुका यथार्थ तत्त्व न जाननेसे उत्पन्न हुआ रज्जुमें सर्पका भय रज्जुके यथार्थ ज्ञानसे नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञानसे उत्पन्न हुए देह एवं दुःखादिका अस्तित्व परमात्माके तात्त्विक ज्ञानसे नष्ट हो जाता है। यह विश्व नित्य एवं पूर्ण ब्रह्म ही है। वह ब्रह्म न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न ही होता है, इसे ही ध्रुव सत्य जानो। यही यथार्थ बोध है।
अर्जुन ! तुम मान, मद, शोक, भय, इच्छा, सुख, दुःख—इस सम्पूर्ण असद्रूप जड द्वैत-प्रपञ्चसे रहित हो जाओ और एकमात्र अद्वितीय चिन्मय सत्यरूप परमात्मामें तद्रूप हो जाओ। भारत ! सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय और पराजयके ज्ञानसे रहित होकर तुम एकमात्र शुद्ध ब्रह्मरूप हो जाओ; क्योंकि तुम ब्रह्मरूप ही हो। अर्जुन ! तुम जो कर्म करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और भविष्यमें जो कुछ शास्त्रानुकूल अनुष्ठान करोगे, वह सब परमात्म-रूप ही है—इस प्रकारके ज्ञानमें स्थिर रहो। जो पुरुष अपने अन्तःकरणमें जिस पदार्थका संकल्प करता है, वह निस्संदेह उसी रूपमें बदल जाता है। इसलिये अर्जुन ! सत्यस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त करनेके लिये तुम सत्यस्वरूप ब्रह्म हो जाओ । क्योंकि जो पुरुष विनाशशील क्रियारूप संसारमें अक्रिय सच्चिदानन्द ब्रह्मको स्थित देखता और अक्रिय सच्चिदानन्द ब्रह्ममें विनाशशील क्रियारूप संसारको कल्पित देखता है, वह मनुष्योंमें ज्ञानवान् है और सम्पूर्ण कर्मोंको कर चुका है—ऐसा कहा गया है—इसलिये अर्जुन ! तुम कर्मोंमें वासना तथा कर्त्तापनके अभिमानसे रहित हो
४२२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जाओ । तुम्हारी कर्मोंको न करनेमें आसक्ति न हो और तुम योगमें स्थित हुए अनासक्तभावसे शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंका आचरण करो । मूढ़ता, अकर्मण्यता तथा कर्मोंमें आसक्तिके आश्रयसे रहित हुए सबमें समभाव होकर स्थित रहो । जो पुरुष समस्त कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिका सर्वथा त्याग करके संसारके आश्रयसे रहित हो गया है और परमात्मामें नित्य तृप्त है, वह कर्मोंको भलीभाँति करता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता ।
परमात्माके यथार्थ तात्त्विक ज्ञानका आश्रय लेनेवाले आसक्तिरहित महात्माके हृदयमें सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी कहीं कभी कर्तृत्वाभिमान नहीं होता । कर्तृत्वाभिमान न रहनेसे अभोक्तृत्वकी सिद्धि होती है और भोक्तृत्वके अभावसे समता और एकताकी सिद्धि होती है । उस समता और एकतासे अनन्तताकी सिद्धि होती है तथा उससे अनन्त नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है । जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्पके होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं । जो सम, सौम्य, स्थिर, स्वस्थ, शान्त और सब पदार्थोंसे निःस्पृह होकर स्थित रहता है, वह कर्म करता हुआ भी वास्तवमें कुछ नहीं करता । इसलिये अर्जुन ! तुम हर्ष-शोकादि द्वन्द्वोंसे रहित, नित्य वस्तु परमात्मामें स्थित, योग-क्षेमको न चाहनेवाले और स्वाधीन अन्तःकरणवाले हो जाओ एवं न्यायसे प्राप्त शास्त्रोक्त कर्मोंको करते हुए पृथ्वीको विभूषित करनेवाले आदर्श पुरुष बन जाओ । जो मूढबुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है । किंतु अर्जुन ! जो पुरुष मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियोंद्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है । जैसे नाना नदियोंके जल सब ओरसे परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठावाले समुद्रमें उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंको चाहनेवाला नहीं । (सर्ग ५४)
श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति देहकी नश्वरता, आत्माकी अविनाशिता, मनुष्योंकी मरणस्थिति और स्वर्ग-नरकादिकी प्राप्ति एवं जीवात्माके संसारभ्रमणमें कारणरूप वासनाके नाशसे मुक्तिका प्रतिपादन
श्रीभगवान्ने कहा—पार्थ ! बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि प्रारब्धानुसार न्यायसे प्राप्त भोगोंका त्याग न करे और अप्राप्त भोगोंको पानेकी इच्छा न करे एवं न्यायसे प्राप्त भोगोंका शास्त्रानुकूल उपभोग करते हुए भी समभाव- से स्थित रहे। महाबाहु अर्जुन ! जन्मादि विकारस्वभाव- वाले अनात्मरूप जड देहमें मै-पनकी भावना मत करो, अपितु जन्मादि विकारसे रहित सत्य चिन्मय आत्मामें ही आत्माकी भावना करो । देहका नाश होनेपर अविनाशी आत्माका नाश नहीं होता । इसलिये सम्पूर्ण परिग्रहोंसे रहित, चित्तरहित पुरुषका पतन नहीं होता । वह कर्मोंको करता हुआ भी कुछ नहीं करता; क्योंकि परमात्माके यथार्थ तात्त्विक ज्ञानका आश्रय लेनेवाले आसक्तिरहित महात्माके हृदयमें सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी कहीं कभी कर्तृत्वाभिमान नहीं होता । अर्जुन ! यह आत्मा अविनाशी, आदि और अन्तसे रहित, अजर कहा गया है; इसलिये 'आत्माका नाश होता है' यह दुःखदायी दुर्बोध तुम-जैसे मनुष्यको नहीं होना चाहिये । उत्तम आत्मज्ञानी लोग 'आत्मा नाशवान् है' इस रूपसे आत्माको नहीं देखते । देहाभिमानी