भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ
३८२* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

'तुम्हारी कितनी आयु है और तुम किन-किन वृत्तान्तोंका स्मरण करते हो ?' वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए इन प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान

भुशुण्डने कहा—मुने ! मैं जो निर्विघ्नतापूर्वक आपका दर्शन कर रहा हूँ, इससे प्रतीत होता है कि चिरकालसे संचित किये गये मेरे पुण्योंका फल आज ही प्रकट हुआ है। मुनिराज ! आज आपके दर्शनसे यह घोंसला, यह शाखा, यह मैं और यह कल्पतरु—ये सब-के-सब पवित्र हो गये।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—पक्षिराज ! उस प्रकार बलवान् एवं अगाध बुद्धिसम्पन्न तुम्हारे भाई यहाँ दिखायी क्यों नहीं देते ? अकेले तुम्हीं क्यों दृष्टिगोचर हो रहे हो ?

भुशुण्डने कहा—निष्पाप महर्षे ! हमलोगोंको यहाँ रहते बहुत लम्बा समय व्यतीत हो गया, यहाँतक कि दिनकी भाँति युगोंकी पङ्क्तियाँ समाप्त हो गयीं। अतः इतना लंबा समय बीत जानेके कारण मेरे सभी छोटे भाई तृणकी तरह अपने शरीरोंका त्याग करके कल्याण-मय शिवपदमें लीन हो गये; क्योंकि चाहे कोई दीर्घायु हो, महान् हों, सज्जन हों, बलवान् हों—कैसे भी क्यों न हों, अलक्षितस्वरूपवाला काल सभीको निगल जाता है।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—प्यारे वायसराज ! जिस समय प्रलयवायु अनवरत वेगपूर्वक बहने लगती है, उस समय क्या तुम्हें खेद नहीं होता ? उदयाचल और अस्ताचलके अरण्यसमूहोंको भस्म करनेवाली सूर्यकी किरणोंसे क्या तुम्हें कष्ट नहीं होता ? यह कल्पवृक्ष जो स्वयं ही अत्यन्त ऊँचा है तथा ऊँचे-से-ऊँचे स्थानपर स्थित है, जागतिक विषम क्षोभोंसे क्षुब्ध क्यों नहीं होता ?

भुशुण्डने कहा—भगवन् ! हम सदा परमात्मामें ही संतोष मानकर स्थित रहते हैं, इसलिये भ्रमके अवसर आनेपर भी हमें कभी इस जगत्में भ्रम नहीं होता। ब्रह्मन् ! हम अपने स्वभावमात्रसे संतुष्ट रहते हैं और कष्ट-दायक विचारोंसे मुक्त होकर अपने इस घोंसलेमें रहकर केवल काल्यापन करते हैं। हमें न तो इस देहके जीवित रहनेसे किसी फलकी अभिलाषा है और न हम मरणद्वारा इसका विनाश ही चाहते हैं; क्योंकि हमलोग वर्तमान समयमें जिस प्रकार स्थित हैं, वैसे ही आगे भी स्थित रहेंगे। हमने प्राणियोंकी जन्म-मरण आदि दशाओंका अवलोकन कर लिया और हमारे मनने अपने चञ्चल स्वरूपका सर्वथा त्याग कर दिया है। निरन्तर शान्ति प्रदान करनेवाले अपने अविनाशी सच्चिदानन्दघनस्वरूप ज्ञानमें स्थित होकर मैं इस कल्पवृक्षके ऊपर बैठा हुआ सदा कालकी कलापूर्ण गतिको जानता रहता हूँ। ब्रह्मन् ! मैं रत्न-सदृश चमकीले पुष्प-गुच्छोंके प्रकाशसे युक्त इस कल्प लतागृहमें बैठकर प्राणायामके द्वारा योगबलसे सम्पूर्ण कल्पकी बात जान लेता हूँ। मैं इस ऊँचे शिखरपर बैठा हुआ अपनी बुद्धिसे लोकोंके कालक्रमकी स्थितिको जानता रहता हूँ। मुनिवर ! मेरा मन सार और असार वस्तुओंका विभाग करनेवाले ज्ञानकी प्राप्तिसे उत्तम शान्तिको प्राप्त हो गया है, अतः इसकी चञ्चलता नष्ट हो गयी है और अब यह शान्त होकर भलीभाँति स्थिर हो गया है। अगाध-बुद्धिसम्पन्न महर्षे ! सांसारिक व्यवहारोंसे उत्पन्न मिथ्या आशारूपी पाशोंसे बँधा हुआ भूलोकवासी साधारण कौआ जिस प्रकार सिसकारियोंसे भयभीत हो जाता है, उस प्रकार मैं भयभीत नहीं होता; क्योंकि उत्कृष्ट शान्तिरूप धर्मवाली तथा आत्मप्रकाशसे शीतल हुई बुद्धिद्वारा जागतिक मायाको देखते हुए हमलोग धैर्यसम्पन्न हो गये हैं, इसलिये भयंकर दशाओंमें भी हमारी बुद्धि पर्वतके समान स्थिर रहती है। परम ऐश्वर्यशाली मुने ! समस्त भूतसमुदाय व्यवहारदृष्टिसे आते और जाते हैं, परंतु परमार्थदृष्टिसे न कोई आता

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान * ३८३

है न जाता है; अतः इस विषयमें हमलोगोंको भय कैसा। क्योंकि प्राणि-समुदायरूपी तरङ्गोंसे युक्त तथा कालसागरमें प्रवेश करनेवाली संसार-सरिताके तटपर स्थित होते हुए भी हमलोग उसकी उपेक्षा कर रहे हैं। जिनके शोक, भय और आयास नष्ट हो चुके हैं तथा जो आत्मलाभसे संतुष्ट हैं—ऐसे आप-सरीखे उत्तम पुरुष हमलोगोंपर अनुग्रह करते रहते हैं; इसलिये हमलोग सारे दुःखोंसे मुक्त हो गये हैं। भगवन् ! हमलोगोंका मन यद्यपि व्यवहारार्थ इधर-उधर कार्योंमें व्यस्त रहता है, तथापि न तो वह राग आदि वृत्तियोंमें फँसता है और न तत्त्व-विचारसे शून्य ही होता है। क्योंकि हमारा आत्मा निर्विकार, क्षोभरहित और शान्त हो गया है, इसलिये चिद्रूप तरङ्गवाले हमलोग पूर्णिमाके पर्वकालमें बढ़नेवाले महासागरकी भाँति प्रबुद्ध हो गये हैं। ब्रह्मन् ! इस समय आपके आगमनसे हमलोगोंका अन्तःकरण हर्षसे प्रफुल्लित हो उठा है। समस्त एषणाओंका परित्याग कर चुकनेवाले संत-महात्मा अपने शुभागमनद्वारा जो हमपर अनुग्रह करते हैं, इससे बढ़कर कल्याणकारक मैं अपने लिये और कुछ नहीं समझता। भला, आपातरमणीय भोगोंसे कौन-सा लाभ मिल सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं। किंतु सत्सङ्गरूपी चिन्तामणिसे तो सबके सारभूत यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है। सज्जन-शिरोमणे ! आपकी वाणी स्नेहपूर्ण, गम्भीर, कोमल, मधुर, उदार और धीरतायुक्त है; मैंने परमात्माको जान लिया है और आपके दर्शनसे मैं पवित्र हो चुका हूँ। इसलिये मेरी तो ऐसी धारणा है कि आज मेरा जन्म सफल हो गया; क्योंकि साधु पुरुषोंका सङ्ग समस्त भयोंका अपहरण करनेवाला होता है।

मुनीश्वर ! युगान्तकालमें जब भीषण उपद्रव होने लगते हैं और प्रचण्ड वायु बहने लगती है, उस समय भी यह कल्पवृक्ष सुस्थिर रहता है। यह कभी भी कम्पित नहीं होता। अन्य लोकोंमें विचरण करनेवाले समस्त प्राणियोंके लिये यह अगम्य है, इसीलिये हमलोग यहाँ सुखपूर्वक निवास करते हैं। ऐसे उत्तम वृक्षपर निवास करनेवाले हमलोगोंके निकट भला, आपत्तियों कैसे फटक सकती हैं।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—महाबुद्धिमान् भुशुण्ड ! प्रलय-कालमें जब सूर्य और चन्द्रमाको भी गिरा देनेवाली उत्पातवायु बहने लगती है, उस समय तुम संतापरहित कैसे रह पाते हो ?

भुशुण्डने कहा—मुनिश्रेष्ठ ! कल्पान्तके समय जब सांसारिक व्यवहारका विनाश हो जाता है, उस समय जैसे कृतघ्न आपत्तिकालमें सन्मित्रको त्याग देता है, उसी तरह मैं इस घोंसलेको छोड़ देता हूँ और आकाशमें ही स्थित रहता हूँ। उस अवसरपर वासनाशून्य मनकी तरह मैं सारी कल्पनाओंसे रहित रहता हूँ और मेरा सारा शरीर निश्चल हो जाता है। फिर मैं ब्रह्माण्डके उस पार पहुँचकर समस्त तत्त्वोंके अन्तर्भूत एवं विशुद्ध परमात्मामें अचल सुषुप्तावस्थाके सदृश निर्विकल्पसमाधिमें तबतक स्थित रहता हूँ, जबतक कमलयोनि ब्रह्मा पुनः सृष्टिकर्ममें प्रवृत्त नहीं होते। सृष्टिरचना हो जानेके पश्चात् मैं ब्रह्माण्डमें प्रवेश करके पुनः अपने इस घोंसलेमें आ जाता हूँ।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—विहगराज ! कल्पान्तके अवसरोंपर जैसे तुम धारणा, ध्यान और समाधिके द्वारा अखण्डरूपसे स्थित रहते हो, वैसे अन्य योगी क्यों नहीं रहते ?

भुशुण्डने कहा—ब्रह्मन् ! यह तो परमेश्वरकी नियामिका शक्ति है, जो सबको नियमबद्ध रखती है। उसका उल्लङ्घन करना कठिन है। इसी कारण मुझे ऐसे रहना पड़ता है और दूसरे योगी दूसरी प्रकारसे रहते हैं। जो अवश्यम्भावी है, उसकी इदमित्थरूपसे अवधारणा नहीं की जा सकती; क्योंकि परमेश्वरकी नियामिका शक्तिरूप स्वभावका ऐसा निश्चय है कि जैसा होनहार होता है, वैसा ही होता है। इसीलिये प्रत्येक कल्पमें

३८४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

केवल मेरे संकल्पसे ही मेरुगिरिके इसी शिखरपर इस प्रकार यह कल्पवृक्ष बारंबार उत्पन्न होता है।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—कल्याणस्वरूप वायसराज ! तुम्हारी आयु अत्यन्त लंबी है। तुम भूतकालीन पदार्थोंका निर्देश करनेवालोंमें अग्रगण्य, ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न और धीर हो। तुम्हारी मनोगति योगसाधनके योग्य है। तुमने अनेक प्रकारकी असंख्य सृष्टियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय भी देखा है। अतः अब यह बताओ कि इस सृष्टि-क्रममें तुम्हें किस-किस आश्चर्यजनक सृष्टिका स्मरण है ?

भुशुण्डने कहा—'मुनिश्रेष्ठ ! मुझे इस पृथ्वीके विषयमें ऐसा स्मरण है कि किसी समय यह शिला और वृक्षोंसे रहित थी। इसपर तृण और लता आदि भी नहीं थे; पर्वत, वन और भाँति-भाँतिके वृक्ष—ये कुछ भी नहीं थे और यह मेरुके नीचे स्थित थी। वहाँ यह ग्यारह हजार वर्षोंतक भस्मसे परिपूर्ण रही—ऐसा मुझे सम्यक् रूपसे स्मरण है। मुझे यह भी खूब याद है कि जब बल और ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हुए असुरोंका घोर संग्राम चल रहा था, उस समय इस पृथ्वीका भीतरी भाग क्षीण हो गया था और यह युद्धसे भागे हुए जनोंसे परिपूर्ण हो गयी थी। फिर एक चतुर्युगीतक यह उन मतवाले असुरोंके अधिकारमें रही, इसका भी मुझे पूर्ण स्मरण है। अन्य चतुर्युगीके दो युगोंतक यह भूमि वनैले वृक्षोंसे खचाखच भरी रही। उस समय उन वृक्षोंके अतिरिक्त और किसी पदार्थका निर्माण नहीं हुआ था—इसका भी मुझे ठीक-ठीक स्मरण है। एक समय यह वसुधा चारों युगोंसे भी अधिक कालतक घने पर्वतोंसे आच्छादित रही। उसपर मनुष्य चल-फिर भी नहीं सकते थे—यह भी मुझे स्मरण है। मुझे वह समय भी याद आता है, जब अन्तरिक्ष आदि लोकोंमें समस्त विमानचारी देवता भयके कारण अन्तर्धान हो गये थे और यह पृथ्वी वृक्षशून्य होकर अन्धकारसे आच्छादित हो गयी थी। इनका तथा इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-सी बातोंका मुझे स्मरण है; परंतु इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ। जो सार वस्तु है, उसे मैं संक्षेपसे कहता हूँ, सुनिये। ब्रह्मन् ! मुझे तो यहाँतक स्मरण है कि मेरे सामने सैकड़ों चतुर्युगियाँ बीत गयीं और ऐसे असंख्य मनु समाप्त हो गये, जो सब-के-सब प्रभावाधिक्यसे परिपूर्ण थे। मुझे एक ऐसी सृष्टिका स्मरण है, जिसमें पर्वत और भूमिका नाम-निशान भी नहीं था। चन्द्रमा और सूर्यके बिना ही पूर्ण प्रकाश छाया रहता था और देवता तथा सिद्ध मानव आकाशमें ही रहते थे। मुझे ऐसी ही एक और सृष्टिका स्मरण है, जिसमें न कोई इन्द्र था न भूपाल तथा उत्तम, मध्यम और अधमका भेद भी नहीं था। सब एकरूप था और दिशामण्डल अन्धकारसे व्याप्त था।

मुनिराज ! पहले सृष्टि-रचनाका संकल्प हुआ, फिर तीनों लोकोंका निर्माण हुआ। उस त्रिलोकीमें अवान्तर प्रदेशोंका विभाग होनेके बाद उनमें सात कुलपर्वतोंकी स्थापना हुई। उन्हीं प्रदेशोंमें जम्बूद्वीपकी पृथक् स्थापना हुई। ब्रह्माजीने उस जम्बूद्वीपमें ब्राह्मण आदि वर्ण, उनके धर्म और उन वर्णोंके लिये योग्य विधानविशेषोंकी सृष्टि की। तत्पश्चात् अवनिमण्डल एवं नक्षत्र-चक्रकी स्थिति और ध्रुवमण्डलका निर्माण किया। तात ! तदनन्तर चन्द्रमा और सूर्यकी उत्पत्ति, इन्द्र और उपेन्द्रकी व्यवस्था, हिरण्याक्षद्वारा पृथ्वीका अपहरण, वराहरूपधारी भगवान्-द्वारा उसका उद्धार, भूपालोंकी रचना, मत्स्यरूपधारी भगवान्द्वारा वेदोंका लाया जाना, मन्दराचलका उन्मूलन, अमृतके लिये क्षीरसागरका मन्थन, गरुड़का शैशव, जब कि उनके पंख नहीं जमे थे, और सागरोंकी उत्पत्ति आदि जो निकटतम सृष्टिकी स्मृतियाँ हैं, उन्हें तो मेरी अपेक्षा अल्प आयुवाले योगी भी स्मरण करते हैं; अतः उनमें मेरी क्या आदर-बुद्धि हो सकती है।

मुनिश्रेष्ठ ! हयग्रीव, हिरण्याक्ष, कालनेमि, बल, हिरण्यकशिपु, क्राथ, बलि और प्रह्लाद आदि असुरोंमें,

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * जिसे मृत्यु नहीं मार सकती, उस निर्दोष महात्माकी स्थिति * ३८५


शिबि, न्यङ्कु, पृथु, उलाघ्य, बैन्य, नाभाग, केलि, नल, मान्धाता, सगर, दिलीप और नहुष आदि नरेशोंमें तथा आत्रेय, व्यास, वाल्मीकि, शुक, वात्स्यायन, उपमन्यु, मणीमङ्गि और भगीरथ आदि महर्षियोंमें कुछ तो सुदूर भूतकालमें, कुछ निकटतम अतीतमें और कुछ इसी वर्तमान सृष्टिमें उत्पन्न हुए हैं; अतः इनके स्मरणकी तो बात ही क्या है। मुनिवर ! आप तो ब्रह्माके पुत्र हैं। आपके भी आठ जन्म हो चुके हैं। इस आठवें जन्ममें मेरा आपके साथ समागम होगा—यह मुझे पहलेसे ही ज्ञात था। यह वर्तमान सृष्टि जैसी है, इसके जैसे आचरण हैं और जैसा इसका अवयव-संस्थान एवं दिशागण है, ठीक इसी तरहकी तीन सृष्टियाँ पहले भी हो चुकी हैं, जिनका मुझे भलीभाँति स्मरण है। अमृतके लिये, जिसमें मन्दराचलके आकर्षण-के प्रयाससे देवता और दैत्य व्याकुल हो गये थे—ऐसा यह बारहवाँ समुद्र-मन्थन है, यह भी मुझे स्मरण है। मुने ! प्रत्येक युगमें अध्येता पुरुषोंकी बुद्धियोंके न्यूनाधिक होनेके कारण ब्रह्मचर्य आदि क्रियाओ, शिक्षा-कल्प आदि अङ्गों और स्वर आदिके उच्चारणपूर्वक पाठकी विचित्रतासे युक्त वेद भी मेरे स्मृतिपथमें वर्तमान हैं। निष्पाप महर्षे ! युग-युगमें जो एकार्थक, विस्तारयुक्त तथा बहुत-से पाठभेदवाले पुराण प्रवृत्त होते हैं, उन सबका भी मुझे स्मरण है। पुनः प्रत्येक युगमें वेद आदि शास्त्रोंके ज्ञाता व्यास आदि महर्षियोंद्वारा विरचित महाभारत आदि इतिहास भी मुझे याद हैं। इनके अतिरिक्त रामायण नामसे प्रसिद्ध जो दूसरा महान् आश्चर्यजनक इतिहास है; जिसकी श्लोक-संख्या एक लाख है, उस ज्ञान-शास्त्रका भी मुझे स्मरण है। उस शास्त्रमें बुद्धिमानोंके लिये हाथपर रखे हुए फलकी तरह 'श्रीरामकी तरह व्यवहार करना चाहिये, परंतु रावणके विलासी जीवनका अनुकरण नहीं करना चाहिये' ऐसा ज्ञान बतलाया गया है। उसके निर्माता महर्षि वाल्मीकि हैं। अब उनके द्वारा जगत्में जो (वसिष्ठ-राम-संवादरूप) दूसरे ज्ञानशास्त्रकी रचना की जायगी, उसका भी मुझे ज्ञान है और समयानुसार वह आपको भी ज्ञात हो जायगा। यह जगत्स्वरूप भ्रान्ति जलमें बुलबुलेके समान कभी स्थित-सी दीख पड़ती है, किंतु वास्तवमें इसका किसी भी कालमें अस्तित्व नहीं है। मेरे पिता चण्डके जीवनकालमें इस कल्पतरुकी जैसी शोभा और जैसा संगठन था, वह आज भी वैसा ही है; इसीलिये इस समय मैं यहाँ स्थित हूँ। (सर्ग २०-२१)


जिसे मृत्यु नहीं मार सकती, उस निर्दोष महात्माकी स्थितिका, परमतत्त्वकी उपासनाका तथा तीनों लोकोंके पदार्थोंमें सुख-शान्तिके अभावका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—महाबाहु श्रीराम ! तदनन्तर कल्पवृक्षके अग्रभागमें आसीन इस वायसराज भुशुण्डसे मैने जाननेके लिये यह पूछा—'पक्षियोंके श्रेष्ठ राजा ! जगत्में विचरण करनेवाले तथा व्यवहारमें लगे हुए प्राणियोंकी देहको मृत्यु कैसे बाधा नहीं पहुँचाती ?'

भुशुण्डने कहा—सर्वज्ञ ब्रह्मन् ! आप यद्यपि सब कुछ जानते हैं, फिर भी जो मुझसे जिज्ञासुकी तरह पूछते हैं, वह ठीक ही है; क्योंकि स्वामी प्रश्नोंद्वारा अपने सेवकोंकी वाक्पटुता प्रसिद्ध कराया करते हैं। फिर भी आप जो मुझसे पूछते हैं, उसका मैं उत्तर आपको देता हूँ; क्योंकि आज्ञाका पालन ही सज्जनोंकी सबसे बड़ी सेवा है, ऐसा मुनिलोग कहते है। महाराज ! पापरूप मोती जिसमें पिरोये गये हैं, ऐसी वासनारूपी तन्तुसंतति जिसके हृदय-कमलमें ग्रथित नहीं रहती अर्थात् जो वासना और पापसे रहित है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। जो

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शरीर-लताके घुनरूप मानसिक चिन्ताओंसे और आशाओंसे रहित है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। राग-द्वेषरूपी विषसे परिपूर्ण अपने मनरूपी बिलमें रहनेवाला लोभरूपी सर्प जिसको नहीं डँसता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। शरीररूपी समुद्रका वडवानलरूप अतएव समस्त विवेकरूपी जलको पी जानेवाला क्रोध जिसको दग्ध नहीं करता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। तिलोंकी बड़ी राशिको पेर देनेवाले कठिन कोल्हू-की तरह उग्रतापूर्वक कामदेव जिसे पीड़ा नहीं पहुँचाता, उसे मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। जिसका चित्त एक निर्मल परम पवित्र सच्चिदानन्दघन ब्रह्मरूप परमपदमें स्थित है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। शरीररूपी पुष्पित वनमें प्रवेशकर उछल-कूद मचानेवाला जिसका बलवान् मन वानरकी तरह चञ्चल नहीं है, उसको मृत्यु मारनेकी इच्छा नहीं करती। ब्रह्मन् ! ये पूर्वोक्त महान् दोष संसाररूपी व्याधिके कारण हैं। ये दोष विक्षेपरहित चित्तको तनिक भी नहीं झकझोरते। अज्ञानके कारण शारीरिक एवं मानसिक पीड़ाओसे उत्पन्न नाना प्रकारके दुःख विक्षेपरहित चित्तको छिन्न-भिन्न नहीं कर पाते।

जिसका चित्त परमात्माके स्वरूपमें सम्यक् प्रकारसे स्थित है, वह पुरुष शास्त्रानुसार व्यवहार करता हुआ भी वास्तवमें न कुछ देता है न लेता है, न कुछ त्याग करता है और न कुछ माँगता ही है। जिस महापुरुषका चित्त परमात्मामें स्थित है, उसे उपार्जन करनेके अयोग्य दुष्ट धनादि, बुरे आरम्भ, राग-द्वेष आदि दुर्गुण, कठोर वचन, दुराचार—ये सब विचलित नहीं कर सकते अर्थात् उसके निकट भी नहीं जा सकते। जिसका चित्त परमात्मामें स्थित है, उसके न चाहनेपर भी न्याय आदि गुणोंसे युक्त अनेक सम्पत्तियाँ उसके पीछे-पीछे दौड़ती हैं। इसलिये कल्याण-कामी मनुष्यको चाहिये कि जो परिणाममें हितकर, सत्य, अविनाशी, संशयरहित एवं विषयामित्रपरूपी दृष्टिसे रहित है, उसी एक परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करे। जो सदा ही परम ग्राह्य है एवं जो आदि, मध्य और अन्तमें सुन्दर, मधुर तथा हितकारक है, उस परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करना चाहिये। जो अविनाशी है, मनके लिये सदा हितकर है, वास्तविक ध्रुव सत्य है, आदि, मध्य एवं अन्तमें सदा-सर्वदा परिपूर्ण है तथा जिसकी सभी संतलोग प्रीतिपूर्वक उपासना करते हैं, उस परमात्म-तत्त्वमें मनको स्थिर करना चाहिये। जो बुद्धिसे परे है, ज्ञानस्वरूप है, सबका आदिकारण है, निरतिशय परम अमृतस्वरूप है तथा जिससे अधिक मङ्गलमय दूसरा कोई नहीं है, उस परमतत्त्व परमात्मामें मनको स्थिर करना चाहिये; क्योंकि देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, विद्याधरों, किंनरों तथा देवाङ्गनाओसे युक्त स्वर्गमें कुछ भी सुस्थिर एवं उत्तम तत्त्व नहीं है।

तात ! वृक्षोंसे, राजा-महाराजाओंसे, पर्वत, नगर एवं ग्वालोंकी आवास-भूमिसे तथा समुद्रसे युक्त भूमण्डलमें कुछ भी स्थायी और शोभन तत्त्व नहीं है। नागों, असुरों तथा असुरोंकी स्त्रियोंसे युक्त समस्त पाताल-लोकमें भी कोई स्थिर एवं मङ्गलदायक पदार्थ नहीं है। जिसमें स्वर्ग, देवलोक, पृथ्वीसहित पाताल एवं दसों दिशाएँ हैं, ऐसे इस सम्पूर्ण जगत्में कोई भी स्थिर और मङ्गलदायक पदार्थ नहीं है। तात्पर्य यह कि त्रिलोकमय सम्पूर्ण संसारमें आधि, व्याधि, चिन्ता, शोक ही भरे हैं; वास्तविक सुख-शान्तिका नामोनिशान भी नहीं है। इसलिये नाशवान् क्षणभङ्गुर संसारसे तीव्र वैराग्य करना चाहिये। अतएव सम्पूर्ण भूमण्डलका एकच्छत्र सम्राट् होना श्रेष्ठ नहीं, सबसे बड़े अभिन्द्र इन्द्र, बृहस्पति आदि देवता होना यानी स्वर्गका अधिपति होना भी श्रेष्ठ नहीं तथा पातालमें सम्पूर्ण पृथ्वीको

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति * ३८७


धारण करनेमें समर्थ शेषनाग होना यानी पातालका अधिपति होना भी श्रेष्ठ नहीं; क्योंकि ये सब क्षणभङ्गुर—नाशवान् हैं। जहाँ विवेकी पुरुषोंका मन पूर्णकाम होकर सुख-शान्ति पाता है, वैसी वास्तविक सुख-शान्ति वहाँ लेशमात्र भी नहीं है। आधि-व्याधियोंसे प्रचुर चिरजीविता भी श्रेष्ठ नहीं, समस्त व्याधियोंका विनाशरूप मरण भी अखिल दुःखोंकी निदान दृढ़ अज्ञतारूप होनेसे श्रेष्ठ नहीं है, नरक तथा स्वर्ग भी श्रेष्ठ नहीं; क्योंकि जहाँ विवेकी पुरुषोंका मन पूर्णकाम होता है, वैसा वहाँ कुछ भी नहीं है। उस प्रकारके सम्पूर्ण विविध सृष्टियोंके क्रम अज्ञानी मनुष्यकी बुद्धिकी मूढ़ताके कारण ही रमणीय प्रतीत होते हैं। इसलिये जो महान् संत हैं, वे अनित्य, क्षणभङ्गुर, नाशवान् मायिक पदार्थोंमें चिरविश्राम कैसे कर सकते हैं? क्योंकि उनमें वास्तविक सुख-शान्ति और विश्रामका अत्यन्त अभाव है। इसलिये विवेकी पुरुषोंको उनमें अत्यन्त वैराग्य करके उनसे उपरत हो जाना चाहिये। (सर्ग २३)


प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति

भुशुण्डने कहा— महाराज! कभी नष्ट न होनेवाली, संशयोंसे रहित एक परमात्मदृष्टि ही समस्त ज्ञानोंमें सबसे उन्नत और सबसे श्रेष्ठ है। ब्रह्मन्! परमात्मविषयक विचार समस्त दुःखोंका अन्त कर देनेवाला तथा अनादि-कालसे चले आते हुए अज्ञानसे परिपूर्ण, दुःस्वप्न-तुल्य संसाररूपी भ्रमका विनाश करनेवाला है। भगवन्! समस्त संकल्पोंसे रहित परमात्मविषयक भावनासे अज्ञानरूपी अन्धकारका, उसके कार्योंके साथ, भली प्रकार विनाश हो जाता है। किंतु सामान्य बुद्धिवाले प्राणी समस्त कल्पनाओंसे अतीत इस परमपदको कैसे प्राप्त कर सकते हैं? अर्थात् साधारण पुरुषोंके लिये वह पद प्राप्त होना कठिन है। इस परमात्मविषयक भावनाके अनेक भेद हैं। उनमेंसे सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली प्राणभावनाका मैंने आश्रय लिया है, वही यहाँ मेरे जीवनका आधार है।

श्रीवसिष्ठजी बोले— श्रीराम! जब मननशील भुशुण्ड इस प्रकार कह रहे थे, तब जानते हुए भी मैंने शान्त भावसे उनसे फिर कौतुकवश पूछा—'समस्त संदेहोंको काटनेवाले अत्यन्त दीर्घजीवी सज्जनस्वभाव भुशुण्ड! तुम मुझसे ठीक-ठीक कहो कि प्राणकी भावना किसे कहते हैं?'

भुशुण्डने कहा— मुने! आप समस्त वेदान्तके ज्ञाता हैं, समस्त संशयोंका विनाश करनेवाले हैं, तथापि केवल विनोदके लिये ही मुझ-जैसे कौएसे इस विषयका प्रश्न कर रहे हैं—ऐसा मैं मानता हूँ। महाराज! भुशुण्डको जिसने चिरजीवी बनाया है तथा जिसने भुशुण्डको आत्मस्वरूपकी प्राप्ति करायी है, उस प्राण-समाधिका निरूपण मैं कहता हूँ, सुनिये। मुनिराज! इड़ा और पिङ्गला नामकी दो अत्यन्त सूक्ष्म नाड़ियों इस देहरूपी घरके बीच दाहिने और बायें भागमें स्थित कोष्ठमें यानी कुक्षिमें रहती हैं। उनका किसीको भान नहीं होता, वे केवल नासापुटमें प्राणसंचारद्वारा प्रतीत होती हैं। उक्त देहमें यन्त्रके सदृश तीन कमलके जोड़े हैं। वे अस्थि-मांसमय एवं अत्यन्त मृदु हैं। उनमें ऊपर और नीचे दोनों ओरसे नालदण्ड लगे हुए हैं और वे सम्पुटित होकर एक दूसरेसे मिले हुए कोमल सुन्दर दलोंसे सुशोभित हैं। उन तीन हृदय-कमलयन्त्रोंमें प्राणकी समस्त शक्तियाँ ऊपर और नीचेकी ओर उसी प्रकार फैली हुई हैं, जिस प्रकार चन्द्र-बिम्बसे किरणें फैलती हैं। इन प्राणशक्तियोंसे ही शीघ्रगति, आगति, चिरनिर्णय, हरण, विहरण, उत्पतन एवं निपतनकी क्रियाएँ निष्पन्न होती हैं। मुने! हृदय-कमलमें स्थित यही वायु पण्डितों-द्वारा प्राणके नामसे कही जाती है। इसीकी कोई एक शक्ति नेत्रोंको स्पन्दित करती है यानी नेत्रोंमें निमेष-


सं० यो० व० अं० १४—

३८८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

उन्मेषकी क्रिया करती है। उसीकी कोई एक शक्ति स्पर्शका ग्रहण करती है, दूसरी कोई शक्ति नासिकाद्वारा श्वास-उच्छ्वासका निर्वाह करती है, कोई एक दूसरी शक्ति अन्नका परिपाक करती है तो कोई अन्य शक्ति वाक्योंका उच्चारण करती है। महाराज ! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ । शरीरमें जो कुछ क्रिया या व्यापार होता है, वह सब शक्तिसम्पन्न वायु ही कराती है, जिस प्रकार यन्त्रचालक कठपुतलीसे नृत्यादि चेष्टा कराता है। उसमें ऊर्ध्वगमन और अधोगमन—ये दो प्रकारके संकेतवाले जो दो वायु प्रसूत होते हैं, वे दोनों श्रेष्ठ वायु प्राण एवं अपान नामसे प्रसिद्ध एवं प्रकट हैं। मुने ! मैं उनकी गतिका सदा अनुसरण करता हुआ स्थित रहता हूँ। उनका स्वरूप सदा शीतल और उष्ण रहता है एवं वे दोनों निरन्तर शरीरके भीतर आकाश-मार्गकी यात्रा करते रहते हैं। उन प्राण और अपान नामक वायुओंकी—जो शरीरमें सदा संचरण करते हैं तथा जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्तिमें सदा समानरूप हैं—गतिका अनुसरण करते हुए मेरे दिन सुषुप्ति-अवस्थामें स्थित मनुष्यकी भाँति व्यतीत हो रहे हैं। एक हजार अंशोंमें विभक्त कमलतन्तुके लेशमात्रकी अपेक्षा भी अत्यन्त दुर्लक्ष्य ये नाड़ियाँ हैं, अतः उनमें विद्यमान इन प्राण और अपान दोनों वायुओंकी भी गति दुर्बोध है। महात्मन् ! हृदय आदि स्थानोंमें निरन्तर विचरण करनेवाले प्राण और अपान वायुओंकी गतिके तत्त्वको जानकर उसका अनुसरण करनेवाला प्रसन्नचित्त पुरुष जन्म-मरणरूपी फाँसीसे छूटकर सदाके लिये मुक्त हो जाता है। वह फिर इस संसारमें लौटकर नहीं आता। ('सर्ग २४)


पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति और सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासनाकी महिमा

भुशुण्डने कहा—ब्रह्मन् ! इस प्राणमें स्पन्दन-शक्ति तथा निरन्तर गतिक्रिया रहती है। यह प्राण बाह्य एवं आन्तर सर्वाङ्गोंसे परिपूर्ण देहमें ऊपरके स्थानमें—हृदय-देशमें स्थित रहता है। अपानवायुमें भी निरन्तर स्पन्द-शक्ति तथा सततगति रहती है। यह अपानवायु भी बाह्य एवं आन्तर समस्त अङ्गोंसे परिपूर्ण शरीरमें नीचेके स्थानमें—नाभिदेशमें स्थित रहता है। मुनिवर ! किसी प्रकारके यत्नके बिना प्राणोंकी हृदय-कमलके कोशसे होने-वाली जो स्वाभाविक बहिर्मुखता है, विद्वान्लोग उसे 'रेचक' कहते हैं। बारह अंगुलपर्यन्त बाह्य प्रदेशकी ओर नीचे गये हुए प्राणोंका लौटकर भीतर प्रवेश करते समय जो शरीरके अङ्गोंके साथ स्पर्श होता है, उसे 'पूरक' कहते हैं। अपानवायुके शान्त हो जाननेपर जबतक हृदयमें प्राणवायुका अभ्युदय नहीं होता, तबतक वह वायुकी कुम्भकावस्था (निश्चल स्थिति) रहती है, जिसका योगीलोग अनुभव करते हैं। इसीको आभ्यन्तर कुम्भक कहते हैं। ब्रह्मन् ! मृत्तिकाके अंदर असिद्ध घटकी स्थितिके सदृश बाहर नासिकाके अग्रभागसे लेकर बराबर सामने बारह अंगुलपर्यन्त आकाशमें जो अपानवायुकी निरन्तर स्थिति है, उसे पण्डितलोग 'बाह्य कुम्भक' कहते हैं। अतः बाहर प्राण-वायुके अस्तंगत होनेपर जबतक अपान-वायुका उद्गम नहीं होता, तबतक एकरूपसे स्थित पूर्ण (दूसरा) बाह्य कुम्भक रहता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं। प्राण और अपानवायुके स्वभावभूत ये जो बाह्य और आभ्यन्तर कुम्भकादि प्राणायाम हैं, उनका भली प्रकार तत्त्व-रहस्य जानकर निरन्तर उपासना करनेवाला पुरुष पुनः इस संसारमें उत्पन्न नहीं होता। प्राणायामके तत्त्व-रहस्यको जाननेवाले योगीके स्वभावतः अत्यन्त चञ्चल ये वायु चलते, बैठते, जागते या सोते—सभी अवस्थाओंमें उसके इच्छानुसार निरुद्ध हो जाते हैं। मनुष्य अपने भीतर बुद्धिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे इन कुम्भक आदि प्राणायामोंका स्मरण करता हुआ जो कुछ करता है या

निर्वाण-प्रकरण पू०] * पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति * ३८९


खाता है, उनमें वह कर्तृत्व आदिके अभिमानसे तनिक भी ग्रस्त नहीं होता।

महर्षे ! इस प्रकार प्राणायामका अभ्यास करनेवाले पुरुषका मन विषयाकार वृत्तियोंके होनेपर भी बाह्य विषयोंमें रमण नहीं करता। जो शुद्ध और तीक्ष्ण बुद्धि-वाले महात्मा इस प्राणविषयक दृष्टिका अवलम्बन करके स्थित हैं, उन्होंने प्रापणीय पूर्ण ब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया और वे ही समस्त खेदोंसे रहित हैं। बैठते, चलते, सोते और जागते—सदा-सर्वदा पुरुष यदि तत्त्व-रहस्य समझकर प्राणायामका अभ्यास करें तो वे कभी बन्धनको प्राप्त ही न हों। प्राण और अपानकी उपासना-द्वारा प्राप्त यथार्थ ज्ञानसे युक्त पुरुषोंका मन, जो मलरूप मोहसे रहित एवं स्वस्थ है, इस अन्तःस्थित परमात्मामें ही सदा-सर्वदा लगा रहता है। शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको सदा करता हुआ भी शुद्धान्तःकरण निष्कामी ज्ञानी पुरुष प्राणापानकी गतिको तत्त्वतः जानकर भली-भाँति स्वस्थ हो सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मन् ! हृदय-कमलसे प्राणका अभ्युदय होता है और बाहर बारह अंगुलपर्यन्त प्रदेशमें यह प्राण विलीन होकर रहता है। इसीको 'बाह्य कुम्भक' कहते हैं। महामुने ! बाह्य बारह अंगुलकी चरम सीमासे अपानका उदय होता है और हृदय-प्रदेशमें स्थित कमलमें उसकी गति अस्त हो जाती है; इसीको 'आभ्यन्तर कुम्भक' कहते हैं। जिस बारह अंगुलकी चरम सीमाके आकाश प्रदेशमें प्राणकी समाप्ति हो जाती है, उसी आकाश-प्रदेशसे यह अपान उसीके बाद उत्पन्न हो जाता है। यह प्राण-वायु अग्नि-शिखाकी भाँति बाह्य आकाशके सम्मुख होकर बहता है और अपान-वायु जलकी तरह हृदयाकाशके सम्मुख होकर निम्नभागमें बहता है। चन्द्रमारूप अपान-वायु शरीरको बाहरसे पुष्ट करता है और सूर्यरूप प्राण-वायु इस शरीरको भीतरसे परिपक्व कर देता है। प्राण वायु निरन्तर हृदया-काशको सन्तप्तकर पश्चात् मुखाग्रभागके आकाशको तपाता है; क्योंकि यह उत्तम सूर्य ही है। अपान-वायुरूप यह चन्द्रमा पहले मुखके अग्रभागको पुष्टकर तदनन्तर हृदया-काशका अपने अमृत-प्रवाहसे पोषण करता है। अपानरूप चन्द्रमाकी किरणका प्राणरूपी सूर्यके साथ आभ्यन्तर कुम्भकके समय जिस हृदयस्थ ब्रह्मसे सम्बन्ध होता है, उस ब्रह्मपदको प्राप्तकर पुरुष पुनः शोकको प्राप्त नहीं होता। इसी प्रकार प्राणरूपी सूर्यकी किरणका अपान-रूपी चन्द्रमाके साथ बाह्य-कुम्भकके समय जिस बाह्य-प्रदेशस्थित ब्रह्मसे सम्बन्ध होता है, उस ब्रह्मपदको प्राप्तकर मनुष्य पुनर्जन्म प्राप्त नहीं करता।

मुने ! जो पुरुष हृदयाकाशमें स्थित प्राणरूप सूर्य-देवको उदय-अस्त, चन्द्रमा-रश्मि और गमनागमनसहित तत्त्वसे अनुभव करता है, वही यथार्थ अनुभव करता है। जैसे बाह्य अन्धकारके नष्ट हो जानेपर बाहरके पदार्थ प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उसी प्रकार हृदयस्थित अज्ञानके नष्ट हो जानेपर शुद्धस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार हो जाता है। प्राण-वायुके विलीन हो जानेपर और अपान-वायुके उदयके पूर्व बाह्य कुम्भकका चिरकालतक अभ्यास करनेसे योगी शोकसे रहित हो जाता है। अपान-वायुके विलीन होनेपर और प्राण-वायुके उदयसे पूर्व भीतरी कुम्भकका चिरकालतक अभ्यास करनेसे योगी शोकसे रहित हो जाता है। जिस हृदयवर्ती ब्रह्मरूप स्थानमें ये प्राण और अपान दोनों विलीन हो जाते हैं, उस शान्त, आत्मस्वरूप ब्रह्मरूप पदका अवलम्बन करनेसे योगी अनुतप्त नहीं होता। महर्षे ! जिस चिन्मय परब्रह्म परमात्मामें अपानके साथ प्राणका, प्राणके साथ अपानका तथा उन दोनोंके साथ बाह्य एवं आभ्यन्तर देश-कालका विलय हो जाता है, उसी परब्रह्मरूप पदका आप दर्शन कीजिये।

जिस समय अपानके प्राकट्यसे पूर्व प्राण विलीन हुआ रहता है, उस समय किसी प्रकारके यत्नके बिना स्वाभाविक सिद्ध हुई जो बाह्य-कुम्भक अवस्था है, उसीको योगीलोग 'परम पद' कहते हैं। किसी प्रकारके यत्नके बिना ही

३९० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

सिद्ध हुआ अन्तःस्थ कुम्भक सर्वातिशायी ब्रह्मरूप परमपद है। यह परमात्माका वास्तविक स्वरूप है और यही सदा प्रकाशमय परम विशुद्ध चेतन है। इसको प्राप्त कर मनुष्य शोकसे रहित हो जाता है। जो प्राण-विलयका और जो अपान-विनाशका समीप एवं अन्तमें रहकर प्रकाशक है तथा जो प्राण और अपानके अंदर रहता है, हमलोग उस चेतन परमात्माकी उपासना करते हैं। जिसकी सत्ता-स्फूर्तिसे मन मनन करता है, बुद्धि निश्चय करती है एवं अहंकार अहंताको प्राप्त है, उस सच्चिदानन्दघन परमात्माकी हमलोग उपासना करते हैं। जिस परमात्मामें समस्त पदार्थ विद्यमान हैं, जिससे समस्त जगत् उत्पन्न हुआ है, जो सर्वात्मक है, जो सब ओर स्थित है और जो सर्वमय है, हमलोग उस चिन्मय परमात्माकी निरन्तर उपासना करते हैं। जो सम्पूर्ण ज्योतियोंका प्रकाशक है, जो समस्त पवित्रोंका भी परम पवित्र है, जो सम्पूर्ण संकल्प-विकल्प आदि भावनाओंसे रहित है, उस चेतन परब्रह्म परमात्माकी हम उपासना करते हैं। जहाँपर प्राण विलीन हो जाता है; जहाँ अपान भी अस्त हो जाता है तथा जहाँ प्राण और अपान दोनों उत्पन्न भी नहीं होते, हमलोग उस चेतन तत्त्वरूप परमात्माकी उपासना करते हैं। बाह्य और आभ्यन्तर प्रदेशमें स्थित, योगियोंद्वारा अनुभूत होनेवाले जो दो प्राण और अपानकी उत्पत्तिके स्थान हैं, उन दोनोंके अधिष्ठानभूत चेतन तत्त्वकी हम उपासना करते हैं। जो प्राण और अपानके विवेकमें हेतु है, जो उनके अस्तित्वका ज्ञान करानेवाला है, जो स्वयं रूपरहित है एवं जो प्राणोपासनासे प्राप्तव्य है, उस चिन्मय विज्ञानानन्दघन परमात्माकी हम उपासना करते हैं। (सर्ग २५)

भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण, वसिष्ठजीद्वारा भुशुण्डकी प्रशंसा, भुशुण्डद्वारा वसिष्ठजीका पूजन तथा आकाशमार्गसे वसिष्ठजीकी स्वलोकप्राप्ति

भुशुण्डने कहा—महामुने ! मैंने प्राणसमाधिके द्वारा पूर्वोक्त रीतिसे विशुद्ध परमात्मामें यह चित्त-विश्रामरूप परम शान्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त की है। मैं इस प्राणायामका अवलम्बन करके दृढ़तापूर्वक स्थित हूँ। इसलिये सुमेरुपर्वतके विचलित होनेपर भी मैं चलायमान नहीं होता। चलते-बैठते, जागते या सोते अथवा स्वप्नमें भी मैं अखण्ड ब्रह्माकारवृत्तिरूप समाधिसे विचलित नहीं होता; क्योंकि तपस्वियोंमें महान् वसिष्ठजी ! प्राण और अपानके संयमरूप प्राणायामके अभ्याससे प्राप्त परमात्माके साक्षात् अनुभवसे मैं समस्त शोकोंसे रहित आदिकारण परमपदको प्राप्त हो गया हूँ। ब्रह्मन् ! महाप्रलयसे लेकर प्राणियोंकी उत्पत्ति एवं विनाशको देखता हुआ मैं ज्ञानवान् हुआ आज भी जी रहा हूँ। जो बात बीत चुकी और जो होनेवाली है, उसका मैं कभी चिन्तन नहीं करता। उपर्युक्त प्राणायामविषयक दृष्टिका अपने मनसे अवलम्बन करके इस कल्पवृक्षपर स्थित हूँ । न्याययुक्त जो भी कर्तव्य प्राप्त हो जाते हैं, उनका फलाभिलाषाओंसे रहित होकर केवल सुषुप्तिके समान उपरत बुद्धिसे अनुष्ठान करता रहता हूँ। प्राण और अपानके संयोगरूप कुम्भक-कालमें प्रकाशित होनेवाले परमात्मतत्त्वका निरन्तर स्मरण करता हुआ मैं अपने आपमें स्वयं ही नित्य संतुष्ट रहता हूँ। इसलिये मैं दोषरहित होकर चिरकालसे जी रहा हूँ। मैंने आज यह प्राप्त किया और भविष्यमें दूसरा सुन्दर पदार्थ प्राप्त करूँगा, इस प्रकारकी चिन्ता मुझे कभी नहीं होती । मैं अपने या दूसरे किसीके कार्योंकी किसी समय कहींपर कभी स्तुति और निन्दा नहीं करता। शुभकी प्राप्ति होनेपर मेरा मन हर्षित नहीं होता और अशुभकी प्राप्ति होनेपर कभी खिन्न नहीं होता; क्योंकि मेरा मन नित्य सम ही रहता है।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण * ३२१

सुने। मेरे मनकी चञ्चलता शान्त हो गयी है। मेरा मन शोकसे रहित, स्वस्थ, समाहित एवं शान्त हो चुका है। इसलिये मैं विकार-रहित हुआ चिरकालसे जी रहा हूँ। 'लकड़ी, रमणी, पर्वत, तृण, अग्नि, हिम, आकाश—इन सबको मैं समभावसे देखता हूँ। जरा और मरण आदिसे मैं भयभीत नहीं होता एवं राज्य-प्राप्ति आदिसे हर्षित नहीं होता। इसलिये मैं अनामय होकर जीवित हूँ। ब्रह्मन् ! यह मेरा बन्धु है, यह मेरा शत्रु है, यह मेरा है एवं यह दूसरेका है—इस प्रकारकी भेद-बुद्धिसे मैं रहित हूँ। ग्रहण और विहार करनेवाला, बैठने और खडा रहनेवाला, श्वास तथा निद्रा लेनेवाला यह शरीर ही है, आत्मा नहीं—यह मैं अनुभव करता हूँ। इसलिये मैं चिरजीवी हूँ। मैं जो कुछ किया करता हूँ, जो कुछ खाता-पीता हूँ, वह सब अहंता-ममतासे रहित हुआ ही करता हूँ। मैं दूसरोंपर आक्रमण करनेमें समर्थ हुआ भी आक्रमण नहीं करता, दूसरोंके द्वारा खेद पहुँचाये जानेपर भी दुःखित नहीं होता एवं दरिद्र होनेपर भी कुछ नहीं चाहता; इसलिये मैं विकार-रहित हुआ बहुत कालसे जी रहा हूँ। मैं आपत्तिकालमें भी चलायमान नहीं होता, वरं पर्वतकी तरह अचल रहता हूँ। जगत्-आकाश, देश-काल, परम्परा-क्रिया—इन सबमें चिन्मयरूपसे मैं ही हूँ, इस प्रकारकी मेरी बुद्धि है; इसलिये मैं विकाररहित हुआ बहुत कालसे स्थित हूँ। ज्ञानके पारंगत ब्रह्मन् ! एकमात्र आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये ही धृष्टतापूर्वक मैंने, जो और जैसा हूँ, वह सब आपसे यथार्थरूपसे बता दिया है।

श्रीवसिष्ठजीने कहा—'ऐश्वर्यपूर्ण पक्षिराज ! यह बड़े हर्षका विषय है, जो आपने कानोंके लिये भूषण-स्वरूप यह अत्यन्त आश्चर्यमयी अपनी अलौकिक स्थिति मुझसे कही है। वे महात्मा धन्य हैं, जो ब्रह्माजीके समान स्थित अत्यन्त दीर्घजीवी आपके दर्शन करते हैं। ये मेरे नेत्र भी धन्य हैं, जो बराबर आपके दर्शन कर रहे हैं। आपने मुझसे बुद्धिको पवित्र करनेवाला अपना सम्पूर्ण जीवन-वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों ठीक-ठीक कहा है। मैंने सब दिशाओंमें भ्रमण किया और देवताओं एवं बड़े-बड़े तत्त्ववेत्ताओंकी ज्ञान आदि विभूतियोंको देखा, परंतु इस जगत्‌में आपके समान दूसरे किसी महान् ज्ञानीको नहीं देखा। इस संसारमें भ्रमण करनेपर किसी-को किसी महान् पुरुषकी प्राप्ति हो भी सकती है; परंतु आप-जैसे ज्ञानी महात्माओंका प्राप्त होना तो इस जगत्में कहीं भी सुलभ नहीं है अर्थात् दुर्लभ है। पुण्य-देह एवं विमुक्तात्मा आपका अवलोकन करके मैंने तो आज अत्यन्त कल्याणकर एक बहुत बडा कार्य सम्पादन कर लिया है। पक्षिराज ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी शुभ गुफामें प्रवेश करो; क्योंकि मध्याह्न कर्तव्यके लिये मेरा समय हो गया है; अतः मैं भी देवलोकमें जा रहा हूँ।' श्रीराम ! यह सुनकर चिरंजीवी भुशुण्डने वृक्षसे उठकर अर्घ्य, पाद्य और पुष्पोंसे त्रिनेत्रधारी महादेवजीके समान मेरी पैरसे लेकर मस्तकपर्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा की। तदनन्तर 'आप मेरे पीछे चलनेके लिये अधिक श्रम न करें' इस प्रकार कहता हुआ मैं आसनसे उठकर आकाशमार्गसे चला गया। भुशुण्डका स्मरण करते हुए

३९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अरुन्धतीसे पूजित मैंने भी सप्तर्षि-मण्डलको प्राप्तकर मुनियोंका दर्शन किया।

श्रीराम ! सत्ययुगके प्रथम दो शतक जब व्यतीत हो चुके थे, तब मेरु पर्वतके उस कल्पवृक्षपर भुशुण्डके साथ मैंने पहले-पहल भेंट की थी। इस समय सत्ययुगके क्षीण हो जानेपर त्रेतायुग चल रहा है और इस त्रेतायुगके मध्यमें आप प्रकट हुए हैं। आजसे आठ वर्ष पहले सुमेरु पर्वतके उसी शिखरके ऊपर ज्यों-का-त्यों अजररूपधारी वह भुशुण्ड मुझसे फिर मिला था। इस प्रकारका विचित्र उत्तम भुशुण्ड-वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा, इसका श्रवण और विचार करके जैसा उचित समझो, वैसा करो।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! बुद्धिमान् भुशुण्डकी इस उत्तम कथाका जो विशुद्धबुद्धि मनुष्य भली प्रकार विवेक-पूर्वक विचार करेगा, वह इसी शरीरमें जन्मादि भयोंसे परिपूर्ण इस माया-नदीको पार कर जायगा। (सर्ग २६-२७)


शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपताका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निष्पाप श्रीराम ! इस प्रकार यह भुशुण्ड-वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। इस विवेक-युक्त यथार्थ बुद्धिसे भुशुण्ड मोह-संकटसे तर गया था। पूर्वोक्त प्राण और अपानकी उपासना करनेवाले सभी अनासक्तबुद्धि मनुष्य भुशुण्डकी तरह परमपदरूप परमात्मामें स्थिति प्राप्त करते हैं । श्रीराम ! इन सब विचित्र विज्ञानोपासनाओंका तुमने श्रवण किया। अब बुद्धिका अवलम्बन करके जैसा उचित समझो, वैसा करो।

श्रीरामजीने कहा—भगवन् ! आपने जो भुशुण्डका उत्तम, यथार्थ तत्त्वका बोधक और आश्चर्यजनक श्रेष्ठ चरित्र कहा, उससे मुझे अत्यन्त हर्ष हुआ। ब्रह्मन् ! मांस, चर्म और अस्थिसे निर्मित शरीररूपी घरका जो आपने वर्णन किया है, उसकी किसने रचना की, कहाँसे वह उत्पन्न हुआ, किस तरहसे स्थित हुआ और उसमें कौन रहता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघव ! परब्रह्मरूप परमार्थ-तत्त्वको जाननेके लिये तथा संसारके कारणरूप अनेक दोषोंके विनाशके लिये मेरे द्वारा तत्त्वतः कहे जानेवाले इस उपदेशको तुम सुनो । श्रीराम ! इस शरीररूपी घरका—जिसमें हड्डियाँ ही खंभे हैं, मुख आदि नौ दरवाजे हैं और जो रक्त और मांससे लीपा गया है—वास्तवमें किसीने भी निर्माण नहीं किया है। यह शरीर केवल आभासरूप (झलकमात्र) ही है—बिना निर्माताके ही अज्ञानसे भासित होता है। यह देह प्रतीत होता है, इसलिये इसे सत् कहा गया है और वास्तवमें यह नहीं है, इसलिये असत् कहा गया है । जैसे स्वप्नकालमें ही स्वाप्निक पदार्थ सत्-से प्रतीत होते हैं, किंतु जाग्रत्कालमें वे असत् हैं—उनका अत्यन्त अभाव है, तथा जैसे मृगतृष्णिकाका जल भी मृगतृष्णिकाकी प्रतीति होनेपर ही सत्-सा रहता है, अन्य विचारकालमें वह असत् रहता है, वैसे ही देहकी प्रतीति होनेपर देह सत्य-सी है और आत्माका यथार्थ ज्ञान होनेपर असत्य है, अर्थात् उसका अत्यन्त अभाव है। इसलिये ये शरीर आदि, जो केवल आभासरूप ही हैं, अज्ञानकालमें ही प्रतीत होते हैं।

श्रीराम ! भला, बतलाओ तो सही कि सुख-शय्यापर सोये हुए तुम जिस स्वप्न-देहसे विविध दिशाओंमें परिभ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह किस स्थानमें स्थित है। स्वप्नमें भी जो दूसरा स्वप्न आता है, उस स्वप्नमें जिस देहसे बड़े-बड़े पृथिवी-तटोंपर तुम परिभ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह कहाँ स्थित है ? मनोराज्यके भीतर कल्पित दूसरे मनोराज्यमें बड़े-बड़े वैभवपूर्ण स्थानोंमें

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपताका वर्णन * ३९३


संकल्पद्वारा जिस देहसे तुम भ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह कहाँ स्थित है अर्थात् कहीं नहीं। श्रीराम ! ये शरीर जिस प्रकार मानसिक संकल्पसे उत्पन्न—अतएव सत् और असद्रूप हैं, ठीक उसी प्रकार यह प्रस्तुत शरीर भी मानसिक संकल्पसे उत्पन्न—अतएव सद्रूप और असद्रूप हैं। यह मेरा धन है, यह मेरा शरीर है, यह मेरा देश है—इस प्रकारकी जो भ्रमजनित प्रतीति होती है, वह भी अज्ञानसे ही होती है; क्योंकि धन आदि सब कुछ चित्तजनित सङ्कल्पका ही कार्य है । रघुनन्दन ! इस संसारको एक तरहका दीर्घ स्वप्न, दीर्घ चित्तभ्रम या दीर्घ मनोराज्य ही समझना चाहिये। स्वप्न और संकल्पोंसे ( मनोराज्योंसे ) जैसे एक विलक्षण बिना हुए ही जगत्की प्रतीति होती है, वैसे ही यह व्यावहारिक जगत्की स्थिति भी एक प्रकारसे सङ्कल्पजनित एवं विलक्षण ( अनिर्वचनीय ) ही है; क्योंकि वह बिना हुए ही प्रतीत होती है । श्रीराम ! पौरुष-प्रयत्नसे मनको अन्तर्मुख बनानेपर जब परमात्माके तत्त्वका यथार्थ साक्षात्कार हो जाता है, तब यह जगदाकार सङ्कल्प चिन्मय परमात्मरूप ही अनुभव होने लगता है, किंतु यदि उसकी विपरीत रूपसे भावना की जाय तो विपरीत ही अनुभव होने लगता है ( भावनाके अनुसार ही संसार है ) । क्योकि 'यह वह है', 'यह मेरा है' और 'यह मेरा संसार है'—इस प्रकारकी भावना करनेपर देहादि जगद्रूप संकल्प जो सत्य-सा प्रतीत होता है, वह केवल सुदृढ भावनासे ही होता है । दिनके व्यवहारकालमें मनुष्य जैसा अभ्यास करता है, वैसा ही स्वप्नमें उसे दिखलायी पडता है। उसी प्रकार बार-बार जैसी भावना की जाती है, वैसा ही यह संसार दिखलायी देता है । जैसे स्वप्नकालमें थोड़ा-सा समय भी अधिक समय प्रतीत होता है, वैसे ही यह संसार अल्पकालस्थायी और विनाशशील होनेपर भी स्थिर प्रतीत होता है ।

जैसे सूर्यकी किरणोंसे मरुभूमिमें मृगतृष्णा-नदी दिखायी देती है, वैसे ही ये पृथिवी आदि पदार्थ वास्तविक न होनेपर भी संकल्पसे सत्य-से दिखायी देते हैं । जिस प्रकार नेत्रोंके दोषसे आकाशमें मोरपंख दिखायी देते हैं, वैसे ही बिना हुए ही यह जगत् मनके भ्रमसे प्रतीत होता है । किंतु दोषरहित नेत्रसे जैसे आकाशमें मोरपंख नहीं दिखायी देते, वैसे ही यथार्थ ज्ञान होनेपर यह जगत् दिखलायी नहीं पडता । श्रीराम ! जिस प्रकार डरपोक मनुष्य भी अपने कल्पित मनोराज्यके हाथी, बाघ आदिको देखकर भयभीत नहीं होता, क्योकि वह समझता है कि यह मेरी कल्पनाके सिवा और कुछ नहीं है, वैसे ही यथार्थ ज्ञानी पुरुष इस संसारको कल्पित समझकर भयभीत नहीं होता; क्योंकि ये भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनो जगत् प्रतीतिमात्र ही है । वे वास्तवमें नही है, इसलिये सत् नहीं हैं और उनकी प्रतीति होती है, इसलिये उनको सर्वथा असत् भी नहीं कह सकतेः अतएव अन्य कल्पनाओंका अभाव ही परमात्माका यथार्थ ज्ञान है । इस संसारमें व्यवहार करनेवाले सभी मनुष्योंको अनेक प्रकारकी आपदाएँ स्वाभाविक ही प्राप्त हुआ करती हैं । क्योकि यह जगत्-समूह वैसे ही उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विकसित होता है, जैसे समुद्रमें बुद्बुदोंका समूह; फिर इस विषयमें शोक ही क्या । परमात्मा जो सत्य वस्तु है, वह सदा सत्य ही हैं और यह दृश्य जो असत्य वस्तु हैं, वह सदा असत्य ही हैं; इसलिये मायारूप विकृतिके वैचित्र्यसे प्रतीयमान इस प्रपञ्चमे ऐसी दूसरी कौन वस्तु हैं, जिसके विषयमें शोक किया जाय ?

इसलिये असत्यभूत इस संसारमे तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये; क्योकि जैसे रज्जुसे बैल दृढ बँध जाता है, वैसे ही आसक्तिसे यह मनुष्य दृढ बँध जाता है । अत निष्पाप श्रीराम ! 'यह सब ब्रह्मरूप ही है' इस प्रकार समझकर तुम आसक्तिरहित हुए इस संसारमें विचरण करो । मनुष्यको विवेक-बुद्धिसे आसक्ति और

३९४* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

अनासक्तिका परित्याग करके अनायास ही शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये, शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंका कभी नहीं। अर्थात् उनकी सर्वथा उपेक्षा कर देनी चाहिये। यह दृश्यमान प्रपञ्च केवल प्रतीतिमात्र है, वास्तवमे कुछ नहीं है—यों जिस मनुष्यको भलीभाँति अनुभव हो जाता है, वह अपने भीतर परम शान्तिको प्राप्त कर लेता है। अथवा 'मैं और यह सारा प्रपञ्च चैतन्यात्मक परब्रह्मस्वरूप ही है'—इस प्रकार अनुभव करनेपर अनर्थकारी यह व्यर्थ जगद्रूपी आडम्बर प्रतीत नहीं होता। श्रीराम ! जो कुछ भी आकाशमें या स्वर्गमें या इस संसारमें सर्वोत्तम परमात्म-वस्तु है, वह एकमात्र राग-द्वेष आदि-के विनाशसे ही प्राप्त हो जाती है। किंतु राग-द्वेष आदि दोषोंसे आक्रान्त हुई बुद्धिके द्वारा जैसा जो कुछ किया जाता है, वह सब कुछ मूढोंके लिये तत्काल ही विपरीत रूप (दुःखरूप) हो जाता है। जो पुरुष शास्त्रोंमें निपुण, चतुर एवं बुद्धिमान् होकर भी राग-द्वेष आदिसे परिपूर्ण हैं, वे संसारमें शृगालके तुल्य हैं। उन्हें धिक्कार है। धन, बन्धुवर्ग, मित्र—ये सब बार-बार आते और जाते रहते हैं; इसलिये उनमें बुद्धिमान् पुरुष क्या अनुराग करेगा। कभी नहीं, उत्पत्ति-विनाशशील भोग-पदार्थोंसे परिपूर्ण संसारकी रचनारूप यह परमेश्वरकी माया आसक्त पुरुषोंको ही अनर्थ गर्तोंमें ढकेल देती है। राघव ! वास्तवमें धन, जन और मन सत्य नहीं हैं, किंतु मिथ्या ही दीख पड़ते हैं। क्योंकि आदि और अन्तमें सभी पदार्थ असत् हैं और बीचमें भी क्षणिक एवं दुःखप्रद है; इसलिये बुद्धिमान् पुरुष आकाश-वृक्षके सदृश कल्पित इस संसारसे कैसे प्रेम करेगा। (सर्ग २८)


संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता और आत्माकी अविनाशिता एवं अहंकाररूपी चित्तके त्यागका वर्णन तथा श्रीमहादेवजीके द्वारा श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब केवल संकल्परूपी नाभिका भली प्रकार अवरोध कर दिया जाता है, तभी यह संसाररूपी चक्र घूमनेसे रुक जाता है। किंतु संकल्पात्मक मनोरूप नाभिको राग-द्वेष आदिसे क्षोभित करनेपर यह संसाररूपी चक्र रोकनेकी चेष्टा करनेपर भी वेगके कारण चलता ही रहता है। इसलिये परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर श्रवण, मनन, निदिध्यासनकी युक्तियोंके द्वारा ज्ञानरूपी बलसे चित्तरूपी संसार-चक्रकी नाभिका अवश्य अवरोध करना चाहिये। क्योंकि कहींपर ऐसी कोई वस्तु उपलब्ध है ही नहीं, जो उत्तम बुद्धि तथा सौजन्यसे परिपूर्ण शास्त्रसम्मत परम पुरुषार्थसे प्राप्त न की जा सके।* श्रीराम ! आधि और व्याधिसे निरन्तर दुःखित, अश्रु आदिसे क्लिन्न तथा स्वयं विनाशशील इस शरीरमें उस प्रकारकी भी स्थिरता नहीं रहती, जिस प्रकारकी चित्रलिखित पुरुषमे रहती है। चित्रित मनुष्यकी यदि भलीभाँति रक्षा की जाय तो वह दीर्घकालतक सुशोभित रहता है; किंतु उसका बिम्बरूप शरीर तो अनेक यत्नोंसे रक्षित होनेपर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। स्वप्न आदिका शरीर स्वप्नकालीन संकल्पसे जनित होनेके कारण दीर्घकालीन सुख-दुःखोंसे आक्रान्त नहीं होता। यह शरीर तो दीर्घकालीन संकल्पसे उत्पन्न होनेके कारण दीर्घकालके दुःखोंसे आक्रान्त रहता है। संकल्पमय यह शरीर स्वयं भी नहीं है और न आत्माके साथ इसका सम्बन्ध ही है; अतः इस शरीरके लिये यह अज्ञानी जीव निरर्थक क्लेशका भाजन क्यों बनता है ? अर्थात् इसमें एकमात्र अज्ञान ही हेतु हैं। जिस प्रकार चित्रलिखित पुरुषका क्षय या विनाश हो जानेपर बिम्बरूप देहकी हानि नहीं होती, उसी प्रकार संकल्पजनित पुरुषका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी


* प्रज्ञामौजन्ययुक्तेन शास्त्रसवलितेन च।
पौरुषेण न यत्प्राप्तं न तत्क्वचन लभ्यते ॥
(नि० पू० २९ । ८)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता * ३९५


हानि नहीं होती। जिस प्रकार मनोराज्यमें उत्पन्न शरीर आदि पदार्थोंका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी हानि नहीं होती, जिस प्रकार स्वप्नमें उत्पन्न पदार्थोंका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी हानि नहीं होती अथवा जिस प्रकार मृगतृष्णिका-नदीके जलका क्षय या विनाश हो जानेपर वास्तविक जलकी कुछ भी हानि नहीं होती, उसी प्रकार एकमात्र सङ्कल्पसे उत्पन्न, स्वभावतः विनाशशील इस शरीररूपी यन्त्रका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी हानि नहीं होती। अतः शरीरके लिये शोक करना निरर्थक ही है। चित्तके संकल्पसे कल्पित तथा दीर्घकालीन स्वप्नमय इस देहके अलङ्कारोंसे भूषित या आधि-व्याधिसे दूषित हो जानेपर चेतन आत्माकी कुछ भी हानि नहीं है। श्रीराम ! देहका विनाश होनेपर चेतन आत्मा विनष्ट नहीं होता।

अज्ञानरूपी चक्रके ऊपर स्थित हुआ जीवात्मा जिस देहके जन्म-मरणरूपी चक्रको देखता रहता है, वह उत्तरोत्तर अधिक भ्रान्तिको देनेवाला, स्वयं भ्रान्तिरूप, पतनोन्मुख खड्गसे ग्रस्त, भली प्रकार अनर्थ-गर्तमें गिराया गया, हत एवं हन्यमान ही दीख पड़ता है। इसलिये मनुष्यको उत्तम धैर्यका भली प्रकार आश्रय लेकर इस अनादि दृढ़ीभूत भ्रमका परित्याग कर देना चाहिये। मिथ्या अज्ञानके द्वारा एकमात्र सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ यह शरीर सत्य-सा होनेपर भी वास्तवमें असत्य ही है; क्योंकि जो वस्तु अज्ञानसे उत्पन्न हुई है, वह किसी समय भी सत्य नहीं हो सकती। श्रीराम! जड पदार्थके द्वारा जो कुछ किया जाता है, वह किया हुआ नहीं माना जाता, इसलिये यह देह कार्य करता हुआ भी कहीं कुछ भी नहीं करता। जड देह तो इच्छासे रहित है और इस निर्विकार आत्मामें इच्छा रहती नहीं, इसलिये कोई कर्ता है ही नहीं। आत्मा शरीरका द्रष्टामात्र है। अपने शरीररूपी घरसे चित्तरूपी वेतालको हटा देनेपर इस मसाररूपी शून्य नगरमें पुरुष कभी भी नहीं डरता। विमल बुद्धिसे अहंकारकी वासना छोड़कर और अहंकारको सर्वथा भूलकर शीघ्रातिशीघ्र अपनी आत्माका ही अवलम्बन करना चाहिये। अहंकारसे युक्त बुद्धिसे जो क्रिया की जाती है, विषवल्लीके सदृश उसका फल मरणरूप ही होता है। विवेक एवं धैर्यसे रहित जिस मूर्खने अपने अहंकाररूपी महोत्स्रवका अवलम्बन किया, उसे तुम तत्काल विनष्ट हुआ ही समझो। राघव ! जिन बेचारोंको अहंकाररूपी पिशाचने अपने अधीन बना लिया, वे सब नरकरूपी अग्नियोंके इन्धन ही बन गये अर्थात् वे नरककी ज्वालासे जलते रहते हैं। पापशून्य राघव ! 'हा ! हा ! मैं मर गया हूँ', 'मै जल गया हूँ' इत्यादि जो दुःखवृत्तियाँ हैं, वे अहंकाररूपी पिशाचकी ही शक्तियाँ हैं, दूसरेकी नहीं। जिस प्रकार सर्वत्र व्यापक आकाश यहाँ किसीसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र व्यापक आत्मा भी अहंकारसे लिप्त नहीं होता। श्रीराम ! प्राणवायुसे युक्त यह चञ्चल देहरूपी यन्त्र जो कुछ करता एव जो कुछ लेता है वह सब अहंकारकी ही चेष्टा है।

श्रीराम ! जड चित्तका, जो आत्मासे सर्वथा पृथक् है, चेतन आत्माके साथ कभी सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। चित्त ही आत्मा है—यो अज्ञानसे ही प्रतीत होता है। यह जो आत्मा है, वह ज्ञानस्वरूप (चैतन्यरूप), अविनाशी, सर्वत्र विद्यमान और व्यापक है, जब कि अहंकाररूप चित्त तो मूर्ख और हृदयवर्ती सबसे बड़ा अज्ञान है। जिस पुरुषका चित्तरूपी वेताल शान्त हो चुका है, ऐसे पुरुषका गुरु, शास्त्र, धन और बन्धु उसी प्रकार उद्धार करनेमें समर्थ हैं, जिस प्रकार अल्प कीचड़में फँसे हुए पशुका मनुष्य उद्धार करनेमें समर्थ हों। इस जगत्रूपी महान् अरण्यमें अपनेद्वारा ही स्वयं दृढ़तासे धैर्य धारणकर अपना उद्धार कर लेना चाहिये। श्रीराम ! मनुष्यको उचित है कि विषयरूपी सर्पोंका बहिष्कार कर दे, आर्योंके मार्गका अनुसरण करे और महावाक्योंके अर्थका भली प्रकार विचार करके अपनी अद्वितीय आत्माका ही आश्रय ले। मनुष्यको अपवित्र, तुच्छ, भाग्यहीन तथा दुष्ट आकृतिवाले इस शरीरके आरामके लिये विषयभोगमें कभी नहीं फँसना चाहिये; क्योंकि इसमें फँसे हुए पुरुषोंकी चिन्तारूपी

३९६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

क्रूर राक्षसी खा डालती है। जैसे पत्थरका पत्थरपन अथवा जैसे घटका घटपना सामान्य सत्तारूप परमात्मा-से अभिन्न ही है, वैसे ही समष्टि-व्यष्टि मन आदि भी परमात्मासे अभिन्न ही हैं। श्रीराम ! इस विषयमें आगे कही जानेवाली महान् अज्ञानकी नाशक मानस-शिवपूजा-रूप यह दूसरी बात तुम श्रवण करो, जो चन्द्रमौलि भगवान् शंकरने कैलास पर्वतकी कन्दरामें जन्म-मरणरूप दुःखकी शान्तिके लिये मेरे समक्ष कही थी।

कैलासनामक एक पर्वतोंका राजा है। वह अपनी ऊँचाईसे स्वर्गलोकको भी पार कर गया है और वह उमापति भगवान् श्रीशंकरका निवासस्थान है। वहाँपर स्वयं प्रकाशमान भगवान् महादेवजी रहते हैं। पहले किसी समय उसी पर्वतपर उन देवाधिदेवकी पूजा करता हुआ मैं गङ्गाजीके किनारे आश्रम बनाकर रहता था। तपके लिये वहाँपर मैने दीर्घकालतक तपस्वियोंके आचरणका अनुसरण किया। वहाँपर मेरे चारो ओर सिद्धोंके समूह रहते थे। मैं उनसे विचार-विनिमय करके शास्त्रीय दुरूह तत्त्वोंका अनुशीलन करता था। मैने फूल चुननेके लिये एक डलिया रख छोड़ी थी और अनेक शास्त्रीय पुस्तकें भी जुटा रखी थीं। श्रीराम ! उस तरहके गुणोंसे सम्पन्न कैलासवनके कुञ्जोंमें तपश्चर्या करते हुए मेरा बहुत समय व्यतीत हो गया। इसके अनन्तर किसी एक समयकी बात है—श्रावणके कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथि थी और रात्रिका प्रथम भाग यानी प्रदोषकाल पूजा, जप, ध्यान आदिमें व्यतीत हो चुका था। उस समय उस अरण्यमें मैने तत्काल ही उत्पन्न हुआ एक बड़ा तेज देखा। वह तेज सैकड़ों बादलोंके तुल्य सफेद एवं असंख्य चन्द्रबिम्बोंके सदृश चमकीला था, उस तेजकी चकाचौंधसे दिशाओंके समस्त कुञ्ज चमक उठे। उसे देखकर मैने भीतरकी प्रकाशमान दिव्य-दृष्टिसे उसके विषयमें विचार किया और तदनन्तर फिर बाह्यदृष्टिसे विशेष अवयवोंके अनुसंधानपूर्वक उसका अवलोकन किया। विचारकर ज्यों ही मैं सामनेका शिखर-प्रदेश देखता हूँ, त्यों ही चन्द्रकलाधर महादेवजी उपस्थित हो गये। वहाँ अर्घ्यपात्र लेकर सावधान एवं प्रसन्न-मन मैं उन गौरीपतिके निकट गया। तदनन्तर चन्द्रज्योत्स्ना-के समान कोमल, शीतल तथा समस्त संतापोंका अपहरण करनेवाली उस महादेवजीकी दृष्टिका मैं दीर्घकाल-तक भाजन बना रहा। पुष्पोंके शिखरपर उपविष्ट तीनों लोकोंके साक्षी उन देवाधिदेवको मैने समीप जाकर अर्घ्य, पुष्प तथा पाद्य समर्पण किया। उनके सामने मैने अनेक मन्दार-पुष्पोंकी अञ्जलियाँ बिखेर दीं और नानाविध नमस्कार एवं स्तोत्रोंसे शिवजीका अभ्यर्चन किया। तदनन्तर मैने शिवजीकी पूजाके सदृश ही पूजासे सखियोंसे युक्त तथा गणमण्डलसे परिवेष्टित भगवती गौरीका उत्तम रीतिसे पूजन किया। पूजाकी समाप्ति होनेपर उनकी आज्ञासे पुष्पमय शिखर-पर बैठे हुए मुझसे अर्धचन्द्रकी कला धारण करनेवाले भगवान् उमापति परिपूर्ण हिमांशुकी किरणके सदृश शीतल वाणीसे कहने लगे।

निर्वाण-प्रकरण पू० ]श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन३१७


भगवान् उमापतिने कहा—ब्रह्मन् ! शान्तिसे युक्त, परमात्मामें विश्राम लेनेवाली तथा कल्याण करनेवाली तुम्हारी चित्तवृत्तियाँ अपने स्वरूपमें अवस्थित तो हैं ? तुम्हारा कल्याणकारी तप निर्विघ्नरूपसे बराबर चल रहा है न ? तुमने प्राप्तव्य वस्तु प्राप्त कर ली है न ? और सांसारिक भय शान्त हो रहे हैं न ?

(श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—) रघुनन्दन ! समस्त लोकोंके एकमात्र हेतु देवाधिदेव महादेवजीके उस प्रकार कहनेके अनन्तर विनययुक्त वाणीसे मैने उनसे निवेदन किया—'महेश्वर ! देवाधिदेव ! त्रिलोचन ! आपकी निरन्तर स्मृतिसे प्राप्त हुए उत्तम कल्याणसे सम्पन्न पुरुषोंके लिये इस संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है और न किसी तरहके भय ही है । आपके निरन्तर स्मरणसे जनित आनन्दके कारण जिनका चित्त चारो ओरसे मुग्ध हो गया है, ऐसे पुरुषोंको इस जगत्कोशमें सभी प्राणी प्रणाम करते हैं । एकमात्र आपके अनुस्मरणमें निरन्तर जिनका मन लगा रहता है, ऐसे पुरुष जहाँ स्थित रहते हैं, वे ही देश, वे ही जनपद, वे ही दिशाएँ और वे ही पर्वत प्रशस्ततम हैं । प्रभो ! आपका अनुस्मरण पूर्व-संचित, वर्तमान और भविष्यके पुण्यसमूहकी वृद्धि करता है । आपका अनुस्मरण ज्ञानरूपी अमृतका एकमात्र आधारभूत कलश है, धृतिरूपी ज्योत्स्नाके लिये चन्द्रमा है और मोक्षरूपी नगरका द्वार है । समस्त भूतोंके अधिपते ! आपके निरन्तर चिन्तनरूपी उदार चिन्तामणिसे शोभित मैने समस्त वर्तमान और भविष्यत्कालीन आपत्तियोंको पैरसे ठुकरा दिया है ।' श्रीराम ! सुप्रसन्न उन भगवान् शंकरजीसे यों कहकर फिर नतमस्तक हो मैने जो कुछ कहा, उसे तुम सुनो ! 'भगवन् ! यद्यपि आपकी अनुकम्पासे मेरे लिये समस्त दिशाएँ अभीष्ट पदार्थोंसे परिपूर्ण हैं, तथापि देवेश ! मुझे जो एक सन्देह है, उसके विषयमें आपसे निर्णय पूछता हूँ । प्रभो ! वह देवार्चन-विधान किस तरहका है, जो उद्वेगका नाशक, विकाररहित, समस्त पापोंका विनाशकारी तथा समस्त कल्याणोंका अभिवर्धक है ? उसे प्रसन्नमतिसे आप मुझसे कहिये ।'

श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मज्ञानियोंमें अग्रगण्य मुनिवर ! मै तुमसे सर्वश्रेष्ठ वह देवार्चनका विधान कहता हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे तत्काल ही मनुष्य मुक्त हो जाता है । जो आदि और अन्तसे रहित, वास्तविक ज्ञानस्वरूप है, वही 'देव' कहा जाता है । सबको सत्ता-स्फूर्ति देनेवाला सत्-स्वरूप सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही 'देव' शब्दका वाच्य है, इसलिये उसीकी पूजा करनी चाहिये । कौन पूज्य है, इस विषयका तात्त्विक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि एकमात्र निर्गुण निराकार विज्ञानानन्दघन विशुद्ध परमात्मा शिव ही पूज्य है और उसकी पूजन-सामग्रीमें ज्ञान, समता और शान्ति—ये सबसे श्रेष्ठ पुष्प हैं । महर्षे ! ज्ञानस्वरूप परमात्मदेवकी ज्ञान, समता और शान्तिरूप पुष्पोंसे जो पूजा की जाती है, उसीको आप वास्तविक देवार्चन जानिये । परमात्मा ही विज्ञानस्वरूप देव, भगवान् शिव और परम कारणस्वरूप है । अतः ज्ञानरूप पूजन-सामग्रीसे उसीकी सदा-सर्वदा पूजा करनी चाहिये । वसिष्ठजी ! आप जीवात्माको चिन्मय आकाशस्वरूप अविनाशी अकृत्रिम सच्चिदानन्द परमात्मस्वरूप ही जानिये । एकमात्र वह परमात्मा ही पूज्य है, उसके सिवा दूसरा कोई पूज्य नहीं है । अतः उस विज्ञानानन्दघन परमात्माकी पूजा ही पूजा है । महर्षे ! जो परमार्थतः सबसे श्रेष्ठ है, जो आपका—'तत्' पदार्थका, मेरा तथा समस्त जगत्‌का स्वरूपभूत है, एव जो स्वय परिपूर्णस्वरूप है, ज्ञानरूप सामग्रीसे पूजा करने योग्य उस देवका मैने आपसे वर्णन कर दिया । सभी वस्तुओंका, समस्त जगत्‌का. दूसरेका, आपका और मेरा सर्वव्यापी चिन्मय परमात्मा ही पारमार्थिक स्वरूप है, दूसरा नहीं ।

(सर्ग २९)

३९८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चेतन परमात्माकी सर्वात्मता

श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मन् ! इस रीतिसे यह समस्त संसार एकमात्र परमात्मस्वरूप ही है। ब्रह्म ही परम आकाश है और यही सबसे बड़ा देव कहा गया है। इस परमदेवका पूजन सबमे कल्याणकर है। उसीसे सब कुछ प्राप्त होना है। वही समस्त जगत्-सृष्टिके आरोपका अधिष्ठान है और उसीमें यह सब व्यवस्थित है। स्वाभाविक आदि-अन्तसे रहित, अद्वितीय, अखण्ड नित्य परमानन्द उसी एकमात्र देवके अर्चनसे प्राप्त होता है। वह सच्चिदानन्द कल्याणस्वरूप शिव समस्त गुणोंसे अतीत और सम्पूर्ण सङ्कल्पोंसे रहित है। मुने ! देश और काल आदि परिच्छेदोंसे रहित, समस्त संसारका प्रकाश करनेवाला विशुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मा ही देव कहा जाता है। वही परब्रह्म परमात्मा 'ॐ', 'तत्', 'सत्' —इन नामोंसे कहा गया है। वह स्वभावतः महान्, ध्रुव, सत्यस्वरूप है, सर्वत्र समभावसे व्यापक है; वही महान् चेतन और परमार्थस्वरूप कहा जाता है। पापशून्य मुने ! अरुन्धतीका और आपका जो चैतन्य तत्त्व है, पार्वतीजी-का, मेरा और गणोंका जो चैतन्य तत्त्व है तथा जो चैतन्य तत्त्व तीनो जगत्में परिपूर्ण है, उत्तममति तत्त्वज्ञ लोग उसे ही परमदेव परमात्मा समझते हैं। एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही इस दृश्य संसारका सार है; इसलिये सकल-सारभूत वस्तुओंकी भी साररूपताको प्राप्त हुआ वह सर्वरूप परम देव परमात्मा मे हूँ। ब्रह्मन् ! वह परमात्मा सर्वव्यापी होनेसे किसीके लिये भी दूर नहीं है; अत वह किसीके लिये दुष्प्राप्य भी नहीं है। वह शरीरके बाहर-भीतर—सर्वत्र स्थित है। वही यह परमात्मा चिन्मय, सूक्ष्म, सर्वव्यापी और मायारहित है। देव, दानव और गन्धर्वों तथा पर्वत, समुद्र आदिसे युक्त यह सम्पूर्ण जगत् उस चैतन्यमें स्थित होकर कर्मानुसार उसी प्रकार घूमता रहता है, जिस प्रकार जल-भँवरमें जल।

ब्रह्मन् ! चिन्मय परमात्माने ही गदा, चक्र आदि आयुधोंसे युक्त चतुर्भुज विष्णुरूपसे समस्त असुर-समूहका उसी प्रकार विनाश कर दिया था, जिस प्रकार वर्षाऋतु इन्द्रधनुषसे युक्त मेघरूपसे आतपका विनाश कर देती है। चेतन परमात्माने ही वृषभ और चन्द्रमाके चिह्नोंसे युक्त त्रिनेत्र रूप धारण कर गौरीको प्राप्त किया है। चेतन परमात्मा ही भगवान् विष्णुके नाभि-कमलमें भ्रमरके समान ध्यानमे तल्लीन एवं वेदत्रयीरूपी कमलिनीका महान् सरोवरस्वरूप ब्रह्माजीका रूप धारण करता है। इसी महाचैतन्य परमात्माके सकाससे सूर्य-चन्द्रमा आदि सदा प्रकाशित होते है। निर्मल चेतनरूपी चन्द्रबिम्बमें खरगोश-की तरह सम्बन्ध प्राप्तकर यह जगत्में स्थित पदार्थोंकी शोभा सर्वत्र दिखायी पड़ती है। भद्र ! सुनो, यद्यपि इस देह-रूपी वृक्षमें हाथ, पैर आदि अपने अङ्ग ही शाखाएँ हैं और केशोंका समूह ही सुन्दर लताओंका समूह है, तथापि यह वृक्ष क्या पर्याप्तरूपसे चेतनके सम्बन्धके बिना किसी तरह शोभित हो सकता है ? चराचर पदार्थोंका निर्माण करनेवाला भी यह चेतन ही है, दूसरा नहीं। इसलिये एकमात्र चेतन ही अपने सङ्कल्पसे जगतरूपमे प्रकट है। ब्रह्मन् ! वस्तुतः इस जगत्में दो प्रकारका सर्वभूत-स्वरूप चेतन है—एक तो चञ्चलस्वभाव 'जीवात्मा और दूसरा निर्विकल्प परम चेतन परमात्मा। वह चेतन परमात्मा ही अपने सङ्कल्पसे जीवात्माके रूपमें अपनेसे भिन्न-सा होकर स्थित है। वह चेतन परमात्मा ही अपने संकल्पसे आकाश आदि पाँच भूतो, शब्दादि पाच विषयो, प्राणा-पानादि पाँच प्राणों और देश-कालके रूपमें परिणत होता है। सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही नारायण होकर समुद्रमे शयन करता हे, ब्रह्मा होकर ब्रह्मलोकमें ध्यानस्थित रहता है, हिमालय पर्वतपर पार्वतीके सहित महादेवजीका रूप धारण कर निवास करता है और वैकुण्ठमे देवेश्रेष्ठ विष्णुका रूप धारणकर रहता है। वह परमात्मा ही सूर्य बनकर

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * शुद्ध चेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन * ३९९

दिवसका निर्माण करता है, मेघ बनकर जल बरसाता है, वायु बनकर बहता है। सबका आत्मा, सर्वत्र व्यापक एवं अपनी समस्त संकल्पशक्तिके प्रभावसे सर्वस्वरूप होनेके कारण वह चिन्मय ब्रह्म जगत्-रूप हो जाता है। वास्तवमें तो वह विज्ञानानन्द परमात्मा आकाशसे भी बढ़कर निर्मल और सूक्ष्म है। वह परमात्मा जब-जब जहाँपर जिस भावसे जिस तरह संकल्प करता है, तब-तब वहाँ वैसा ही बन जाता है। (सर्ग ३०)

शुद्ध चेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन

श्रीमहादेवजीने कहा—ब्रह्मन्! चेतन जीवात्मा अज्ञानके कारण 'मैं दुखी हूँ' इस भावनासे व्यर्थ ही दुखी होता है और 'मै नष्ट हो गया; मै मर गया' यों भावना करता हुआ रोता रहता है। किंतु जिस प्रकार पत्थरमें तेल नहीं रहता, उसी प्रकार शुद्ध चेतन आत्मामें दृश्य, दर्शन और द्रष्टाकी त्रिपुटी नहीं रहती। जैसे चन्द्रमामें कालिमा नहीं रहती, वैसे ही शुद्ध आत्मामें कर्त्ता, कर्म और करण नहीं रहते। जिस प्रकार आकाशमें नवीन अङ्कुरका अभाव है, उसी प्रकार आत्मा-में प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण—इन तीनोंका अभाव है। जिस प्रकार नन्दन-वनमें खैरके वृक्षका अभाव है, उसी प्रकार शुद्ध आत्मामें मन, मनन और दृश्य विषयका अभाव है। जैसे आकाशमें पर्वतका अभाव है, वैसे ही शुद्ध चेतनमें मै-पना, तू-पना और वह-पना आदि नहीं है। जैसे काजलमें सफेदी नहीं रहती, वैसे ही चेतनमें अपनी देह तथा परायी देहका भाव नहीं रहता। वह शुद्ध चेतन आत्मा केवल, निर्विकल्प, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण तेजोंको भी प्रकाशित करनेवाला, स्वच्छ और परम श्रेष्ठ है। वह सम्पूर्ण पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला, सर्वव्यापक, नित्य शुद्ध, नित्य प्रकाशरूप, मनसे रहित, निर्विकार और निरञ्जन है। एक वही घट और पटमें, वट और दीवाल-में, शकट और वानरमें, गदहे और असुरमें, सागर और आकाशादि भूतोंमें तथा नर और नागमें—सर्वत्र व्यापक होकर स्थित है। वह शुद्ध हुआ भी मलिन-सा, निर्विकल्प हुआ भी सविकल्प-सा, चेतन हुआ भी जड-सा और सर्वव्यापी हुआ भी एकदेशीय-सा प्रतीत होता है।

कर्मेन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें तत्परता संकल्पसे होती है। वह संकल्प मननजनित है। वह मनन चित्तकी अशुद्धिके कारण होता है और उन सबका साक्षी आत्मरूप चेतन सर्वविध मलोंसे रहित है। जिस प्रकार स्फटिक-शिलामें अरण्य, पर्वत, नदी आदिका प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार अपने स्वरूपमें ही स्थित प्रकाशस्वरूप नित्य चेतन-के अन्तःकरणमें इस जगत्का प्रतिबिम्ब पड़ता है। इस जगत्को अपने संकल्पमें धारण करनेवाला अद्वितीय, निर्विकार चेतन न उत्पन्न होता है न विनष्ट होता है, न क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। अर्थात् वह सब प्रकारके विकारोंसे रहित है। असत्स्वरूप यह जगत् अज्ञानके कारण विशाल खमकी तरह आत्मामें ही प्रतीत होता है। किंतु वास्तवमें मृगतृष्णिका-जलके सदृश प्रतीत होनेवाला यह जगत् तनिक भी सत्य नहीं है। मुने! यह परम चेतन आत्मा अपने पुर्यष्टकमें* ही प्रतिबिम्बित होता है, जैसे स्वच्छ दर्पणमें ही प्रतिमा दिखलायी पड़ती है। महर्षे! अनेक प्रकारकी कल्पनाओं-से ग्रस्त यह पुर्यष्टकरूप दृश्यसमूह शुद्ध चिन्मय आत्मा-से ही उत्पन्न होता है, उसीमें स्थित और विलीन हो जाता है। इसलिये यह सम्पूर्ण विश्व विशुद्ध चेतन आत्मस्वरूप ही है, दूसरा नहीं—यह जानिये।


* मनो बुद्धिरहंकारस्तथा तन्मात्रपञ्चकम् ।
इति पुर्यष्टकं प्रोक्तं देहोऽसावातिवाहिकः ॥
(नि० पू० ५१ । ५०)
'मन, बुद्धि, अहंकार एव पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ—इन आठोंका समूह 'पुर्यष्टक' कहा गया है और यही 'आतिवाहिक' देह कहा गया है।'

४०० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जिस प्रकार जड लोहा लोह-चुम्बकके सान्निध्यसे संचरणशील होता है, उसी प्रकार सर्वव्यापी सत्स्वरूप परमात्माके सान्निध्यसे यह जीवात्मा संचरणशील होता है। अर्थात् सर्वत्र स्थित परमात्मशक्तिसे ही यह जीव चेष्टा करता है। यह जीव अज्ञानसे अपने वास्तविक स्वरूपको भूल जानेके कारण देहके सम्बन्धसे जड-सा हो गया है तथा अपना विशुद्ध चैतन्यरूप स्वभाव भूल जानेके कारण ही यह चेतन चित्त-सा बन गया है। ब्रह्मन् ! परमात्माने ही शरीररूपी गाड़ी खींचनेके लिये मनःशक्ति और प्राण-शक्ति—ये दो सुदृढ़ बैल उत्पन्न किये है। सच्चिदानन्दघन निर्विकार परमात्माके सकाशसे ही यह जीव जीवन धारण करता है, जिस प्रकार दीपकके सकाशसे घर शोभा देता है। अज्ञानके कारण इस जीवकी आधियाँ एवं व्याधियाँ उसी प्रकार उत्तरोत्तर स्थूलता प्राप्त करती हैं, जिस प्रकार जलका तरङ्गरूप और उस तरङ्गरूपका फेनरूप उत्तरोत्तर स्थूलता प्राप्त करता है। सर्वशक्तिरूप होनेपर भी वही चेतन जीवात्मा अज्ञानके कारण 'मैं चेतन नहीं हूँ' इस भावनासे इस देहमें परवशता प्राप्त करता है, किंतु अपने स्वरूपके ज्ञानसे मोह-रहित हो जाता है। हृदयरूप कमल-पत्रके चेष्टा-रहित हो जानेपर ये प्राण शान्त हो जाते हैं, जिस प्रकार पंखेके कम्पनशून्य हो जानेपर पवनकी शक्तियाँ विलीन हो जाती है। हृदयरूप कमल-पत्रके स्फुरणसे यह पुर्यष्टक विस्पष्ट हो जाता है और हृदय-कमलरूप यन्त्र जब चलनेसे रुक जाता है यानी निश्चल हो जाता है, तब वह भी विनष्ट हो जाता है। द्विजवर ! जबतक देहमें पुर्यष्टक विद्यमान रहता है, तबतक देह जीवित रहती है और जब देहमेंसे पुर्यष्टक विलीन हो जाता है, तब देह 'मृत' कही जाती है। किंतु जब शरीरका हृदय-कमलरूपी यन्त्र सदा चलता रहता है, तब यह जीव अपने संकल्पवश प्रकृतिके अधीन हुआ कर्म करता रहता है। पर राग-द्वेषरहित विशुद्ध वासना जिनके हृदयमें रहती है, वे अटल एवं एकरूप रहनेवाले मनुष्य जीवन्मुक्त हैं। हृदय-कमलरूपी यन्त्रके रुक जाने तथा प्राणके शान्त हो जानेपर यह देह पृथ्वीपर लकड़ी और ढेले आदिकी भाँति गिर जाती है। मुने ! ज्यो ही हृदयाकाशके वायुमें अर्थात् प्राणमें यह पुर्यष्टक लीन हो जाता है, त्यों ही मन भी प्राणमें ही विलीन हो जाता है। जिस प्रकार घरके लोगोंके घर छोड़कर दूर चले जानेपर घर शून्य हो जाता है, उसी प्रकार मन एवं प्राणसे शून्य हुआ यह शरीर शवरूप हो जाता है। जिस प्रकार नाना प्रकारके पत्ते उत्पन्न हो-होकर समय पाकर वृक्षसे झड़ जाते हैं, उसी प्रकार प्राणियोंके ये शरीर भी झड़ जाते हैं—विनष्ट हो जाते हैं। जीवोंके ये शरीर और वृक्षोंके पत्ते उत्पन्न और नष्ट होते ही रहते हैं, अतः उनके विषयमें शोक ही क्या है। चैतन्य-समुद्र परमात्मामें ये देहरूपी बुद्बुद कहीं एक प्रकारके तो कहीं दूसरे प्रकारके उत्पन्न होते रहते हैं। बुद्धिमान् जन विनाशशील समझकर इनपर विश्वास नहीं करते।

( सर्ग ३१-३२ )


संकल्पत्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परमपद-स्वरूप परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—मस्तकमें अर्धचन्द्र धारण करनेवाले महादेव ! व्यापकरूप अनन्त एवं अद्वितीय चेतन ब्रह्म-तत्त्वमें द्वित्व ( भेद ) कैसे प्राप्त हुआ ? एवं उसका बुद्धिसे निवारण कैसे हो, ताकि जीवके दुःखोंका सर्वथा नाश हो जाय ?

श्रीमहादेवजीने कहा—जब वह ब्रह्म सत्स्वरूप, अद्वितीय और सर्वशक्तिमान् है, तब उसमे यह भेद और अभेदकी कल्पना ही निर्मूल है। जैसे तरङ्ग, कण, कल्लोल और जलप्रवाह जलसे विभक्त नहीं रहते, वैसे ही ब्रह्मकी सर्वशक्ति वास्तवमें ब्रह्मसे विभक्त नहीं रहती।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * संकल्पत्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन * ४०१


जिस प्रकार फूल, कोंपल, पत्ते आदि लतासे वास्तवमें भिन्न नहीं हैं, वैसे ही द्वित्व, एकत्व, जगत्त्व, तू-पन, मैं-पन आदि भी चेतनसे भिन्न नहीं हैं। चेतनका देश, काल, क्रिया आदिरूप जो भेद किया गया है, वह भेद चेतनस्वरूप ही है। 'वास्तवमें चेतनमें द्वैत (भेद) है ही नहीं, तब उसमें भेद आया कहाँसे ?'—यह प्रश्न ही नहीं बनता; क्योंकि देश, काल और क्रियाकी सत्ता एवं नियति आदि शक्तियाँ स्वयं चेतनकी सत्तासे ही सत्तायुक्त होकर स्थित हैं, इसलिये वे सब चेतनस्वरूप परमात्मा ही हैं। वही यह चेतन तत्त्व परम ब्रह्म, सत्य, ईश्वर, शिव तथा निराकार, एक परमात्मा आदि अनेक नामोंसे कहा जाता है। इन नामों एवं रूपोंसे अतीत जो परमात्माका स्वरूप है तथा जो सम्पूर्ण मलोंसे रहित आत्मपदार्थ है, वह वाणी और मनका विषय नहीं है। जो यह संसार दिखायी दे रहा है, वह उस महाचेतन परमात्मारूपी लताके फल, पल्लव तथा पुष्प आदिरूप ही है, अतः उससे भिन्न नहीं। किंतु अज्ञानी जीवको अपने ही द्वैतसंकल्पसे एकमें ही द्वैतकी इसी प्रकार प्रतीति होती है, जैसे पुरुषकी वेताल-कल्पनासे उसे भयंकर वेतालकी प्रतीति होने लगती है। जैसे 'मैं कुछ नहीं करता' इस तरहके संकल्पसे पुरुषका कर्तृत्व निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार जीवात्मामें प्रतीत होनेवाला द्वैत भी अद्वैत-भावनासे निवृत्त हो जाता है।

द्वैत-संकल्पसे तो एक ही वस्तुमें द्वित्वकी प्राप्ति होती है, पर अद्वैतभावनासे अनेकात्मक जगत्का भी द्वित्व नष्ट हो जाता है। क्योंकि विकार आदिसे शून्य, सदा सर्वगामी तथा परमात्माका स्वरूपभूत होनेसे आत्मामें कभी द्वैतभाव नहीं रहता। मुने ! अपने संकल्पसे निर्मित मनोराज्य और गन्धर्वनगरकी तरह जो वस्तु अपने संकल्पसे बनायी गयी है, वह संकल्पके अभावसे नष्ट हो जाती है। केवल दृढ़ संकल्पसे जो यह संसाररूपी दुःख प्राप्त हुआ है, वह केवल संकल्पके अभावसे ही नष्ट हो जायगा, फिर इस विषयमें क्लेश ही क्या ? क्योंकि तनिक भी संकल्प करके मनुष्य दुःखमें डूब जाता है और कुछ भी संकल्प न करके वह अविनाशी सुख पाता है। अतः मुने ! अपने विवेकरूपी पवनसे संकल्परूप मेघोंका विनाश करके शरत्कालमें आकाश-मण्डलकी भाँति तुम उत्तम निर्मलता प्राप्त करो। अविवेकरूप प्रबल प्रवाहसे उमड़ती हुई उन्मत्त संकल्प-रूप नदीको तुम मणिमन्त्रसे सुखा दो और उसमें बहते हुए अपने-आपको धैर्य देकर मनसे रहित हो जाओ एवं अपने-आप अपने संकल्पात्मक कालुष्यका विनाश करके आत्माकी उत्तम विशुद्धता प्राप्त कर अविनाशी आनन्दरूप हो जाओ। यह आत्मा समस्त शक्तियोंसे परिपूर्ण है, अतः जब कभी वह किसी वस्तुकी जैसी भी भावना करता है, अपने संकल्पसे रचित उस वस्तुको उसी समय वैसी ही देखता है। ब्रह्मन् ! यह उत्पन्न हुआ मिथ्यारूप जगत् एकमात्र संकल्पात्मक ही है; अतः केवल संकल्पके अभावसे ही कहीं भी विलीन हो जाता है। इसलिये संकल्परूप जड़को उखाड़कर अत्यन्त दृढ़ताको प्राप्त हुई इस तृणारूपी करंजलताको आप सुखा डालिये। जिस प्रकार गन्धर्वनगरकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीतिमात्र ही हैं, उसी प्रकार यह संसाररूप भ्रमकी उत्पत्ति और विनाश भी प्रतीतिमात्र ही हैं। मुने ! मैं एक हूँ, मैं परमात्मा हूँ—इस प्रकारकी भावना कीजिये। इस भावनासे आप परमात्मा ही हो जायेंगे।

महर्षे ! चेतन जीवात्माने अज्ञानके कारण अपने संकल्पसे संसाररूपता प्राप्त की है; किंतु वास्तवमें मोहरूपी कलङ्कसे रहित वह असंसारी है तथा वह ब्रह्मसे अभिन्न और अद्वैत ब्रह्मरूप है। मैं दृश्य देहादि-स्वरूप हूँ—इस प्रकार मोहको प्राप्त हुआ चेतन जीवात्मा संसारमें फँस जाता है; पर वही शुद्ध चिन्मय