भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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२४—महर्षि उद्दालककी साधना, तपस्या और परमात्मप्राप्तिका कथन, सत्ता-सामान्य, समाधि और समाहितके लक्षण ... ३०६विचरणका वर्णन; जीवन्मुक्त महात्माओंके गुण, लक्षण और महिमा ... ३३७
२५—किरातराज सुरघुका वृत्तान्त—महर्षि माण्डव्यका सुरघुके महलमें पधारना और उपदेश देकर अपने आश्रमको लौट जाना, सुरघुके आत्म-विषयक चिन्तनका वर्णन तथा उसे परमपदकी प्राप्ति ... ३१०३६—चित्तके स्पन्दनसे होनेवाली जगत्‌की भ्रान्ति, चित्त और प्राण-स्पन्दनका स्वरूप तथा उसके निरोधरूप योगकी सिद्धिके अनेक उपाय ... ३३९
२६—किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णाद ( परिघ ) का संवाद ... ३१४३७—चित्तके उपशमके लिये ज्ञानयोगरूप उपाय एवं विवेक-विचारके द्वारा चित्तका विनाश होनेपर ब्रह्म-विचारसे परमात्माकी प्राप्ति ... ३४२
२७—आत्माका संसार-दुःखसे उद्धार करनेके उपायों-का कथन तथा भास और विलास नामक तपस्वियोंके वृत्तान्तका आरम्भ ... ३१८३८—वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना ... ३४४
२८—भास और विलासकी परस्पर बातचीत और तत्त्वज्ञानद्वारा उन्हें मोक्षकी प्राप्ति; देह और आत्माका सम्बन्ध नहीं है तथा आसक्ति ही बन्धनका हेतु है—इसका निरूपण ... ३२१३९—इन्द्रियों और मनके रहते समस्त दोषोंकी प्राप्ति तथा उनके शमनसे समस्त गुणोंकी और परमात्माकी प्राप्तिका वर्णन ... ३४६
२९—संसक्ति और असंसक्तिका लक्षण, आसक्तिके भेद उनके लक्षण और फलका वर्णन, आसक्तिके त्यागसे जीवात्मा कर्म-फलसे सम्बद्ध नहीं होता—इसका कथन ... ३२४४०—वीतहव्य महामुनिकी समाधि और उससे जागना, छः रात्रितक पुनः समाधि, चिरकालतक जीवन्मुक्त स्थिति, उनके द्वारा दुःख-सुकृत आदिको नमस्कार और उनका परमात्मामें विलीन हो जाना ... ३४८
३०—असङ्ग सुखमें परम शान्तिको प्राप्त पुरुषके व्यवहार-कालमें भी दुखी न होनेका प्रतिपादन, ज्ञानीकी 'तुर्यावस्था' तथा देह और आत्माके अन्तरका वर्णन ... ३२७४१—महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बन करके परमात्मप्राप्तिरूप मुक्तावस्थाका तथा मुक्त होनेपर उनके शरीर प्राणों और सब धातुओंका अपने-अपने उपादान कारणमें विलीन होकर मूल-प्रकृतिमें लीन होनेका वर्णन ३५०
३१—देहादिके संयोग-वियोगादिमें राग-द्वेष और हर्ष-शोकसे रहित शुद्ध आत्माके स्वरूपका विवेचन ३२९४२—ज्ञानी महात्माओंके लिये आकाश-गमन आदि सिद्धियोंकी अनावश्यकताका कथन ... ३५१
३२—दो प्रकारके मुक्तिदायक अहंकारका और एक प्रकारके बन्धनकारक अहंकारका एवं परमात्माके स्वरूपका वर्णन ... ३३१४३—जीवन्मुक्त और विदेह-मुक्त पुरुषोंके चित्तनाशका वर्णन ... ३५३
३३—मन, अहंकार, वासना और अविद्याके नाशसे मुक्ति तथा जीवन्मुक्त पुरुषके लक्षण और महिमाका प्रतिपादन ... ३३२४४—शरीरका कारण मन है तथा मनके कारण प्राण-स्पन्द और वासना इनका कारण विषय, विषयका कारण जीवात्मा और जीवात्माका कारण परमात्मा है—इस तत्त्वका प्रतिपादन .. ३५४
३४—मनुष्य, असुर, देव आदि योनियोंमें होनेवाले हर्ष-शोकादिसे रहित जीवन्मुक्त महात्माओंका वर्णन ... ३३५४५—तत्त्वज्ञान, वासनाक्षय और मनोनाशसे परमपदकी प्राप्ति तथा मनको वशमें करनेके उपायोंका वर्णन ... ३५७
३५—स्त्रीरूप तरङ्गसे युक्त संसाररूपी समुद्र, उससे तरनेके उपाय और तरनेके अनन्तर सुखपूर्वक४६—विचारकी प्रौढता, वैराग्य एवं सद्गुणोंसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति और जीवन्मुक्त महात्माओंकी स्थितिका वर्णन ... ३५९
निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध<br>१—श्रीवसिष्ठजीके कहनेपर श्रोताओंका सभासे उठकर दैनिक क्रिया करना तथा सुने गये विषयोंका चिन्तन करना .. ३६२

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२—श्रीरामचन्द्र आदिका महाराज वसिष्ठजीकी सभामें लाना तथा महर्षि वसिष्ठजीके द्वारा उपदेशका आरम्भ, चित्तके विनाशका और श्रीरामचन्द्रजीकी ब्रह्मरूपताका निरूपण \dots ३६३अभावका प्रतिपादन \dots \dots ३८५
३—ब्रह्मकी जगत्कारणता और ज्ञानद्वारा मायाके विनाशका तथा श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामकी महिमा एवं श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा अपने परमार्थ-स्वरूपका वर्णन \dots ३६५१३—प्राण-अपानकी गतिको तत्त्वतः जाननेसे मुक्ति ३८७
४—देह और आत्माके विवेकका एवं अज्ञानीको देहमें आत्मबुद्धि और विषयोंमें सुख-बुद्धि करनेसे दुःखकी प्राप्तिका प्रतिपादन \dots ३६६१४—पूरक, रेचक, कुम्भक प्राणायामका तत्त्व जानकर अभ्यास करनेसे मुक्ति और सर्वशक्तिमान् परमात्माकी उपासनाकी महिमा \dots ३८८
५—अज्ञानकी महिमा और विभूतियोंका सविस्तर वर्णन ३६८१५—भुशुण्डकी वास्तविक स्थितिका निरूपण, वसिष्ठजी-द्वारा भुशुण्डकी प्रशंसा, भुशुण्डद्वारा वसिष्ठजीका पूजन तथा आकाशमार्गसे वसिष्ठजीकी स्वलोकप्राप्ति ३९०
६—अविद्याके कार्य संसाररूप विष-वृक्ष, त्रिधा एवं अविद्याके स्वरूप तथा उन दोनोंमें रहित परमार्थ-वस्तुका वर्णन \dots ३६९१६—शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्ति-रूपताका वर्णन \dots \dots ३९२
७—अविद्यामूलक स्थावरयोनिके जीवोंके स्वरूपका तथा विवेकपूर्वक विचारसे अविद्याके नाशका प्रतिपादन \dots ३७११७—संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता और आत्माकी अविनाशिता एव अहङ्काररूपी चित्तके त्यागका वर्णन तथा श्रीमहादेवजीके द्वारा श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन \dots ३९४
८—परमात्मा सर्वात्मक और सर्वातीत है—इसका प्रतिपादन एव महात्मा पुरुषोंके लक्षण तथा आत्मकल्याणके लिये परमात्मविषयक यथार्थ ज्ञान और प्राण निरोधरूप योगका वर्णन३७२१८—चेतन परमात्माकी सर्वात्मता \dots \dots ३९८
९—देव-सभामें वायसराज भुशुण्डका वृत्तान्त सुनकर महर्षि वसिष्ठका उसे देखनेके लिये मेरुगिरिपर जाना, मेरु-शिखर तथा 'चूत' नामक कल्पतरुका वर्णन, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे मिलना भुशुण्डद्वारा उनका आतिथ्य-सत्कार, वसिष्ठजीका भुशुण्डसे उनका वृत्तान्त पूछना और उनके गुणोंका वर्णन करना \dots ३७५१९—शुद्धचेतन आत्मा और जीवात्माके स्वरूपका विवेचन \dots • ३९९
१०—भुशुण्डका वसिष्ठजीसे अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन करते हुए अपनी उत्पत्ति, ज्ञानप्राप्ति और उस घोंसलेमें आनेका वृत्तान्त कहना \dots ३७९२०—सङ्कल्प-त्यागसे द्वैतभावनाकी निवृत्ति और परम पदस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिका प्रतिपादन \dots ४००
११—'तुम्हारी कितनी आयु है और तुम किन-किन वृत्तान्तोंका स्मरण करते हो ?' वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए इन प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान \dots ३८२२१—सबके परम कारण परम पूजनीय परमात्माका वर्णन४०२
१२—जिसे मृत्यु नहीं मार सकती, उस निर्दोष महात्माकी स्थितिका, परमतत्त्वकी उपासनाका तथा तीनों लोकोंके पदार्थोंमें सुख-शान्तिके२२—परमशिव परमात्माकी अनन्त शक्तियां४०३
२३—सच्चिदानन्दघन परमदेव परमात्माके ध्यानरूप पूजनसे परमपदकी प्राप्ति \dots \dots ४०४
२४—शास्त्राभ्यास और गुरूपदेशकी सफलता, ब्रह्मके नामभेदोंका और स्वरूपका रहस्य एव दुःखनाशका उपाय • \dots ४०७
२५—समष्टि व्यष्ट्यात्मक जो संसार है, वह सब माया ही है—यह उपदेश देकर भगवान् श्रीशङ्करका अपने वासस्थानको जाना तथा श्रीवसिष्ठजी और श्रीरामजीके द्वारा अपनी-अपनी स्थितिका वर्णन \dots ४०८
२६—ज्ञानकी प्राप्तिके लिये वासना, आसक्ति और अज्ञानके नाशसे मनके विनाशका वर्णन \dots ४१०
२७—शिलाके रूपमें ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन \dots ४११
२८—परमात्माके स्वरूपका और अविद्याके अत्यन्त अभावका निरूपण • \dots ४१३

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२९-जीवात्माका अपनी भावनासे लिङ्गदेहात्मक पुर्यष्टक बनकर अनेक रूप धारण करना ... ४१४गुरु त्रितलके साथ निवास, भगीरथको पुनः राज्यप्राप्ति और ब्रह्मा, रुद्र आदिकी आराधना करनेसे गङ्गाजीका भूतलपर अवतरण ४३५
३०-पुर्यष्टक बने हुए जीवात्माको तत्त्वज्ञानसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति होनेका कथन ... ४१५४५-शिखिध्वज और चूडालाके आख्यानका आरम्भ, शिखिध्वजके गुणोंका तथा चूडालाके साथ विवाह और क्रीडाका वर्णन ... ४३७
३१-श्रीकृष्णार्जुन-आख्यानका आरम्भ—अर्जुनके प्रति भगवान् श्रीकृष्णद्वारा आत्माकी नित्यताका प्रतिपादन ... ४१७४६-क्रमसे उन दोनोंकी वैराग्य एवं अध्यात्म-ज्ञानमें निष्ठा तथा चूडालाको यथार्थ ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति ... ४३९
३२-कर्तृत्वाभिमानसे रहित पुरुषके कर्मोंसे लिप्त न होनेका निरूपण एवं सङ्गत्याग, ब्रह्मार्पण, ईश्वरार्पण, संन्यास, ज्ञान और योगकी परिभाषा ... ४१८४७-चूडालाको अपूर्व शोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना और उससे वार्तालाप करना ... ४४१
३३-श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति कर्म और ज्ञानके तत्त्व-रहस्यका प्रतिपादन ... ४२१४८-राजा शिखिध्वजका चूडालाके वचनोंको अयुक्त बतलाना, चूडालाका एकान्तमें योगाभ्यास करना एवं श्रीरामचन्द्रजीके पूछने-पर श्रीवसिष्ठजीके द्वारा कुण्डलिनीशक्तिका तथा विभिन्न शरीरोंमें जीवात्माकी स्थितिका वर्णन ... ४४२
३४-श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनके प्रति देहकी नश्वरता, आत्माकी अविनाशिता, मनुष्योंकी मरण-स्थिति और स्वर्ग-नरकादिकी प्राप्ति एवं जीवात्माके संसारभ्रमणमें कारणरूप वासनाके नाशसे मुक्तिका प्रतिपादन ... ४२२४९-आधि और व्याधिके नाशका तथा सिद्धिका और सिद्धोंके दर्शनका उपाय ... ४४४
३५-श्रीमद्भगवान्‌के द्वारा अर्जुनके प्रति जीवन्मुक्त अवस्था और जगद्रूप चित्रका वर्णन एवं वासनारहित और ब्रह्मस्वरूप होकर स्थित रहनेका उपदेश तथा इस उपदेशको सुनकर तत्त्वज्ञानके द्वारा अर्जुनकी अविद्यासहित वासनाका और मोहका नाश हो जाना ... ४२४५०-ज्ञानसाध्य वस्तु और योगियोंकी परकाय-प्रवेश-सिद्धिका वर्णन ... ४४७
३६-परमात्माकी नित्य सत्ता, जगत्‌की असत्ता एवं जीवन्मुक्त अवस्थाका निरूपण ... ४२६५१-चूडालाकी सिद्धिका वैभव, गुरुपदेशकी सफलतामें किराटका आख्यान, शिखिध्वजका वैराग्य, चूडालाका उन्हें समझाना, राजा शिखिध्वजका आधी रातके समय राजमहलसे निकलकर चल देना और मन्दराचलके काननमें कुटिया बनाकर निवास करना ... ४४८
३७-परब्रह्म परमात्माके सत्ता-सामान्य स्वरूपका प्रतिपादन ... ४२७५२-सोकर उठी हुई चूडालाके द्वारा राजाकी खोज, वनमें राजाके दर्शन और राजाके भविष्यका विचार करके चूडालाका लौटना, नगरमें आकर राज्य-शासन करना; तदनन्तर कुछ समय बाद राजाको ज्ञानोपदेश देनेके लिये ब्राह्मणकुमारके वेषमें उनके पास जाना, राजाद्वारा उसका सत्कार और परस्पर वार्तालाप-के प्रसङ्गमें कुम्भद्वारा कुम्भकी उत्पत्ति, बुद्धि और ब्रह्माजीके साथ उसके समागमका वर्णन ४५२
३८-संसारके मिथ्यात्वका दिग्दर्शन तथा मोहसे जीवके पतनका कथन ... ४२८५३-राजा शिखिध्वजद्वारा कुम्भकी प्रशंसा, कुम्भका ब्रह्माजीके द्वारा किये हुए ज्ञान-और कर्मके
३९-चार प्रकारका मौन और उनमेंसे जीवन्मुक्त ज्ञानीके सुषुप्त मौनकी श्रेष्ठता ... ४२९
४०-सांख्ययोग और अष्टाङ्गयोगके द्वारा परमपदकी प्राप्ति ... ४२९
४१-वेताल और राजाका संवाद ... ४३१
४२-वेतालकृत छः प्रश्नोंका राजाद्वारा समाधान ... ४३२
४३-भगीरथके गुण, उनका विवेकपूर्वक वैराग्य और अपने गुरु त्रितलके साथ संवाद ... ४३३
४४-राजा भगीरथका सर्वस्वत्याग, भिक्षाटन और

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विवेचनको सुनाना, राजाद्वारा कुम्भका शिष्यत्व-स्वीकार ... ४५७६४-महेन्द्रपर्वतपर अग्निके साक्ष्यमें मदनिका (चूडाला) और शिखिध्वजका विवाह, एक सुन्दर कन्दरामें पुष्प-शय्यापर दोनोंका समागम, शिखिध्वजकी परीक्षाके लिये चूडालाद्वारा मायाके बलसे इन्द्रका प्राकट्य, इन्द्रका राजासे स्वर्ग चलनेका अनुरोध, राजाके अस्वीकार करनेपर परिवारसहित इन्द्रका अन्तर्धान होना ४८३
५४-चिरकालकी तपस्यासे प्राप्त हुए चिन्तामणिका त्याग करके मणिबुद्धिसे काँचको ग्रहण करनेकी कथा तथा विन्ध्यगिरिनिवासी हाथीका आख्यान ४५९६५-राजा शिखिध्वजके क्रोधकी परीक्षा करनेके लिये चूडालाका मायाद्वारा राजाको जारसमागम दिखाना और अन्तमें राजाके विकारयुक्त न होनेपर अपना असली रूप प्रकट करना ... ४८५
५५-कुम्भद्वारा चिन्तामणि और काँचके आख्यानके तथा विन्ध्यगिरिनिवासी हाथीके उपाख्यानके रहस्यका वर्णन ... ४६१६६-ध्यानसे सब कुछ जानकर राजा शिखिध्वजका आश्चर्यचकित होना और प्रशंसापूर्वक चूडालाका आलिङ्गन करना तथा उसके साथ रात बिताना, प्रातःकाल संकल्पजनित सेनाके साथ दोनोंका नगरमें आना और दस हजार वर्षोंतक राज्य करके विदेहमुक्त होना ... ४८८
५६-कुम्भकी बातें सुनकर सर्वत्यागके लिये उद्यत हुए राजा शिखिध्वजद्वारा अपनी सारी उपयोगी वस्तुओंका अग्निमें झोंकना, पुनः देहत्यागके लिये उद्यत हुए राजाको कुम्भद्वारा चित्त-त्यागका उपदेश ... ४६३६७-बृहस्पतिपुत्र कचकी सर्वत्याग-साधनसे जीवन्मुक्ति, मिथ्या पुरुषकी आख्यायिका और उसका तात्पर्य ... ४९१
५७-चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकनेका उपाय और अविद्यारूप कारणके अभावसे देह आदि कार्यके अभावका वर्णन ... ४६७६८-सब कुछ ब्रह्म ही है—इसका प्रतिपादन ... ४९६
५८-जगत्के अत्यन्ताभावका, राजा शिखिध्वजको परम शान्तिकी प्राप्तिका तथा जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन ... ४६९६९-भृङ्गीशके प्रति महादेवजीके द्वारा महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागीके लक्षणोंका निरूपण ४९७
५९-चित्त और संसारके अत्यन्त अभावका तथा परमात्माके भावका निरूपण ... ४७२७०-सर्वथा विलीन हुए या विलीन होते हुए अहंकार-रूप चित्तके लक्षण ... ४९८
६०-ब्रह्मसे जगत्की पृथक् सत्ताका निषेध तथा जन्म आदि विकारोंसे रहित ब्रह्मकी स्वतः सत्ताका विधान ... ४७४७१-महाराज मनुका इक्ष्वाकुके प्रति, 'मैं कौन हूँ, यह जगत् क्या है'—यह बताते हुए देहमें आत्मबुद्धिका परित्याग कर परमात्मभावमें स्थित होनेका उपदेश ... ४९९
६१-राजा शिखिध्वजकी ज्ञानमें दृढ़ स्थिति तथा जीवन्मुक्तिमें चित्तरहित्य एवं तत्त्वस्थितिका वर्णन ... ४७५७२-सात भूमिकाओंका, जीवन्मुक्त महात्मा पुरुषके लक्षणोंका एवं जीवको संसारमें फँसानेवाली और संसारसे उद्धार करनेवाली भावनाओंका वर्णन करके मनु महाराजका ब्रह्मलोकमें जाना ... ५००
६२-कुम्भके अन्तर्हित हो जानेपर राजा शिखिध्वजका कुछ कालतक विचार करनेके पश्चात् समाधिस्थ होना, चूडालाका घर जाकर तीन दिनके बाद पुनः लौटना, राजाके शरीरमें प्रवेश करके उन्हें जगाना और राजाके साथ उसका वार्तालाप ... ४७७७३-श्रीवसिष्ठजीके द्वारा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति जीवन्मुक्त पुरुषकी विशेषता, रागसे बन्धन और वैराग्यसे मुक्ति तथा तुर्यपद और ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन ... ५०३
६३-कुम्भ और शिखिध्वजका परस्पर सौहार्द, चूडालाका राजासे आज्ञा लेकर अपने नगरमें आना और उदास-मन होकर पुनः राजाके पास लौटना, राजाके द्वारा उदासीका कारण पूछनेपर चूडालाद्वारा दुर्वासाके शापका कथन और चूडालाका दिनमें कुम्भरूपसे और रातमें स्त्रीरूपसे राजा शिखिध्वजके साथ विचरण ४८०७४-योगकी सात भूमिकाओंका अभ्यासक्रम और लक्षण, योगभ्रष्ट पुरुषकी गति एवं महान्

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अनर्थकारिणी हथिनीरूप इच्छाके स्वरूप और उसके नाशके उपाय ... ... ५०५९-इन्द्र-कुलमें उत्पन्न हुए एक इन्द्रका विचार-दृष्टिसे परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करके इस त्रिलोकीके इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित होना तथा अहंभावनाके निवृत्त होनेसे संसार-भ्रमके मूलोच्छेदका कथन ... ... ५२६
७५-भरद्वाज मुनिके उत्कण्ठापूर्वक प्रश्न करनेपर श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा जगत्‌की असत्ता और परमात्माकी सत्ताका प्रतिपादन करते हुए कल्याणकारक उपदेश ... ... ५०९१०-शुद्ध चित्तमें थोड़ेसे ही उपदेशसे महान् प्रभाव पड़ता है, यह बतानेके लिये कहे गये भुशुण्डवर्णित विद्याधरके प्रसङ्गका उपसंहार, जीवन्मुक्त या विदेहमुक्तके अहंकारका नाश हो जानेसे उसे संसारकी प्राप्ति न होनेका कथन ... ... ... ५२७
७६-श्रीवाल्मीकिजीके द्वारा लय-क्रमका और भरद्वाजजीके द्वारा अपनी स्थितिका वर्णन, वाल्मीकिजीद्वारा मुक्तिके उपायोंका कथन, श्रीविश्वामित्रजीद्वारा भगवान् श्रीरामके अवतार ग्रहण करनेका प्रतिपादन एवं ग्रन्थश्रवणकी महिमा ... ... ५११११-मृत पुरुषके प्राणोंमें स्थित जगत्‌के आकाशमें भ्रमणका वर्णन तथा परब्रह्ममें जगत्‌की असत्ताका प्रतिपादन ... ... ५२८
निर्वाण-प्रकरण ( उत्तरार्ध )<br>१-कल्पना या संकल्पके त्यागका स्वरूप, कामना या संकल्पसे शून्य होकर कर्म करनेकी प्रेरणा, दृश्यकी असत्ता तथा तत्त्वज्ञानसे मोक्षका प्रतिपादन ... ... ... ५१६१२-जीवके स्वरूप, स्वभाव तथा विराट् पुरुषका वर्णन ... ... ... ५२९
२-समूल कर्मत्यागके स्वरूपका विवेचन ... ५१७१३-जगत्‌की सङ्कल्परूपता, अन्यथादर्शनरूप जीवभाव तथा अहम्भावरूप महाग्रन्थिके भेदनसे ही मोक्षकी प्राप्तिका कथन और ज्ञानबन्धुके लक्षणोंका वर्णन ... ... ५३०
३-संसारके मूलभूत अहंभावका आत्मबोधके द्वारा उच्छेद करके परमात्मस्वरूपसे स्थित होनेका उपदेश ... ... ५१८१४-ज्ञानीके लक्षण, जीवके बन्धन और मोक्षका स्वरूप, ज्ञानी और अज्ञानीकी स्थितिमें अन्तर, दृश्यकी असत्ता तथा परब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन ... ... ५३१
४-उपदेशके अधिकारीका निरूपण करते हुए वसिष्ठजीके द्वारा भुशुण्ड और विद्याधरके संवादका उल्लेख—विद्याधरका इन्द्रियोंकी विषयपरायणताके कारण प्राप्त हुए दुःखोंका वर्णन करके उनसे अपने उद्धारके लिये प्रार्थना करना ... ... ५१९१५-मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महान् वनमें महर्षि वसिष्ठ और मङ्किका समागम एवं संवाद ... ... ... ५३३
५-भुशुण्डजीद्वारा विद्याधरको उपदेश—दृश्य-प्रपञ्चकी असत्ता बताते हुए संसार-वृक्षका निरूपण ... ... ५२२१६-मङ्किके द्वारा संसार, लौकिक सुख, मन, बुद्धि और तृष्णा आदिके दोषों तथा उनसे होनेवाले कष्टोंका वर्णन और वसिष्ठजीसे उपदेश देनेके लिये प्रार्थना ... ... ५३५
६-संसार-वृक्षके उच्छेदके उपाय, प्रतीयमान जगत्‌की असत्ता, ब्रह्ममें ही जगत्‌की प्रतीति तथा सर्वत्र ब्रह्मकी सत्ताका प्रतिपादन ... ५२३१७-संसारके चार बीजोंका वर्णन और परमात्माके तत्त्वज्ञानसे ही इन बीजोंके विनाशपूर्वक मोक्षका प्रतिपादन ... ... ५३६
७-चिन्मय परब्रह्मके सिवा अन्य वस्तुकी सत्ताका निराकरण, जगत्‌की निःसारता तथा सत्सङ्ग, सत्‌-शास्त्र-विचार और आत्मप्रयत्नके द्वारा अविद्याके नाशका प्रतिपादन ... ५२४१८-भावना और वासनाके कारण संसार-दुःखकी प्राप्ति तथा विवेकसे उसकी शान्ति, सर्वत्र ब्रह्मसत्ताका प्रतिपादन एवं मङ्किके मोहका निवारण ... ... ५३७
८-त्रसरेणुके उदरमें इन्द्रका निवास और उनके गृह, नगर, देश, लोक एवं त्रिलोकके साम्राज्यकी कल्पनाका विस्तार ... ५२५

( १४ )

१९-आत्मा या ब्रह्मकी समता, सर्वरूपता तथा द्वैतशून्यताका प्रतिपादन, जीवात्माकी ब्रह्म-भावनासे संसार-निवृत्तिका वर्णन ... ५३८३२-वैराग्यके दृढ़ हो जानेपर पुरुषकी स्थिति, आत्माद्वारा विवेक नामक दूतका भेजा जाना, विवेकज्ञानसम्पन्न पुरुषकी महिमा तथा जीवके सात रूपोंका वर्णन ... ५६४
२०-परमार्थ-तत्त्वका उपदेश और स्वरूपभूत परमात्म-पदमें प्रतिष्ठित रहते हुए व्यवहार करते रहनेका आदेश देते हुए वसिष्ठजीका श्रीरामके प्रश्नोंका उत्तर देना तथा संसारी मनुष्योंको आत्मज्ञान एवं मोक्षके लिये प्रेरित करना ... ५३९३३-दृश्य जगत्‌की असत्ता, सबकी एकमात्र ब्रह्म-रूपता तथा तत्त्वज्ञानसे होनेवाले लाभका वर्णन ५६६
२१-निर्वाणकी स्थितिका तथा 'मोक्ष स्वाधीन है' इस विषयका सयुक्तिकं वर्णन ... ५४२३४-सृष्टिकी असत्यता और एकमात्र अखण्ड ब्रह्म-सत्ताका प्रतिपादन ... ५६७
२२-जीवकी बहिर्मुखताके निवारणसे भ्रान्तिकल्पना-के निवर्तक उपाय तथा परलोककी चिकित्साका वर्णन ... ५४४३५-परमात्मामें सृष्टिभ्रमकी असम्भवता, पूर्णब्रह्मके स्वरूपका निरूपण तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... ५६८
२३-जगत्‌के स्वरूपका विवेचन और ब्रह्मके स्वरूपका सविस्तर वर्णन ... ५४६३६-ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना तथा जगत्‌का ब्रह्मसे अभेद, पाषाणोपाख्यानका आरम्भ—वसिष्ठजीका लोकगतिसे विरक्त हो सुदूर एकान्तमें कुटी बनाकर सौ वर्षोंतक समाधि लगाना ... ५७०
२४-जीवन्मुक्तिकी प्रशंसा तथा इच्छा ही बन्धन है और इच्छाका त्याग ही मुक्ति है, इसका सविस्तर वर्णन और उससे छूटनेके उपायका निरूपण ... ५४८३७-अहंकाररूपी पिशाचकी शान्तिका उपाय—सृष्टिके कारणका अभाव होनेसे उसकी असत्ता तथा चिन्मय ब्रह्मकी ही सृष्टिरूपताका प्रतिपादन ... ५७१
२५-तत्त्वज्ञान हो जानेपर इच्छा उत्पन्न होती ही नहीं और यदि कहीं उत्पन्न होती-सी दीखे तो वह ब्रह्मस्वरूप होती है—इसका सयुक्तिक वर्णन ... ५५०३८-समाधिकालमें वसिष्ठजीके द्वारा अनन्त चेतनाकाशमें असंख्य ब्रह्माण्डोंका अवलोकन ... ५७२
२६-चेतन ही जगत् है—इसका तथा तत्त्वज्ञानी और जगत्‌के स्वरूपका वर्णन ... ५५२३९-श्रीवसिष्ठजीका समाधिकालमें अपनी स्तुति करनेवाली स्त्रीका अवलोकन और उसकी उपेक्षा करके अनेक विचित्र जगत्‌का दर्शन करना तथा महाप्रलयके समय सब जीवोंके प्रकृति-लीन हो जानेपर पुनः किसको सृष्टिका ज्ञान होता है, श्रीरामके इस प्रश्नका उत्तर देना ... ५७३
२७-जीवन्मुक्तके द्वारा जगत्‌के स्वरूपका ज्ञान, स्वभावका लक्षण तथा विश्व और विश्वेश्वरकी एकता और स्वात्मभूत परमेश्वरकी पूजाका वर्णन ५५३४०-वसिष्ठजीके द्वारा चिदाकाशरूपसे देखे गये जगतोंकी अपनेसे अभिन्नताका कथन, आर्यापाठ करनेवाली स्त्रीके कार्य तथा सम्भाषण आदिके विषयमें श्रीरामके प्रश्न और वसिष्ठजीके उत्तर-का वर्णन ... ५७५
२८-जगत्‌की असारताका निरूपण करके तत्त्वज्ञानसे उसके विनाशका वर्णन ... ५५५४१-स्वप्नजगत्‌की भी ब्रह्मरूपता एवं सत्यताका प्रतिपादन ... ५७७
२९-प्राणियोंके श्रान्त हुए मनरूपी मृगके विश्रामके लिये समाधिरूपी कल्पद्रुमकी उपयोगिताका वर्णन ... ५५७४२-श्रीवसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन, अपनी युवावस्थाके व्यर्थ बीतनेका उल्लेख ... ५७८
३०-जीवात्माके ध्यान-वृक्षपर चढ़नेका और वास्तविक फलकी प्राप्तिका वर्णन ... ५६०४३-विद्याधरीका वैराग्य और अपने तथा पतिके लिये तत्त्वज्ञानका उपदेश देनेके हेतु उसकी वसिष्ठ मुनिसे प्रार्थना ... ५८०
३१-ध्यानरूपी कल्पद्रुमके फलके आस्वादनसे मनकी स्थितिका तथा मुक्तिके विभिन्न साधनोंका वर्णन ... ५६१

( १५ )

४४- श्रीवसिष्ठजीका विद्याधरीके साथ लोकालोक पर्वतपर पाषाणशिलाके पास पहुँचना; उस शिलामें उन्हें विद्याधरीकी बतायी हुई सृष्टिका दर्शन न होना, विद्याधरीका इसमें उनके अभ्यासाभावको कारण बताकर अभ्यासकी महिमाका वर्णन करना .. · ५८१
४५- श्रीवसिष्ठजीके द्वारा आतिवाहिक शरीरमें आधिभौतिकताके भ्रमका निराकरण ५८४
४६- विद्याधरीका पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना और उन्हें समाधिसे जगाना, उनके और देवतादिके द्वारा वसिष्ठजीका स्वागत-सत्कार, वसिष्ठजीके पूछनेपर ब्रह्माजीका उन्हें अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना और उस कुमारी नारीको वासनाकी देवी बताना... ५८५
४७- पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्‌की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्‌में जानेके लिये प्रेरित करना .. ५८७
४८- पाषाण-शिलाके भीतर बसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन तथा ब्रह्माके सङ्कल्पके उपसंहारसे सम्पूर्ण जगत्‌का संहार क्यों होता है, इसका विवेचन .. ५८८
४९- ब्रह्मा और जगत्‌की एकताका स्थापन तथा द्वादश सूर्योंके उदयसे जगत्‌के प्रलयका रोमाञ्चकारी वर्णन ... .. ५९०
५०- प्रलयकालके मेघोंद्वारा भयानक वृष्टि होनेसे एकार्णवकी वृद्धि तथा प्रलयाग्निका बुझ जाना ... ... ५९२
५१- बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन ... ... ५९३
५२- ब्रह्मलोकवासियों तथा द्वादश सूर्योंका निर्वाण, अहंकाराभिमानी रुद्रदेवका आविर्भाव, उनके अवयवों तथा आयुधका विवेचन, उनके द्वारा एकार्णवके जलका पान तथा शून्य ब्रह्माण्डकी चेतनाकाशरूपताका प्रतिपादन .. ५९५
५३- रुद्रकी छायारूपिणी कालरात्रिके स्वरूप तथा ताण्डव-नृत्यका वर्णन ... ... ५९७
५४- रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्मसत्ताकी ही स्फूर्तिका प्रतिपादन तथा सच्चिदानन्दघनका विलास ही रुद्रदेवका नृत्य है—इसका कथन ... ... ५९९
५५- शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन .. ६००
५६- प्रकृतिरूपा कालरात्रिके परमतत्त्व शिवमें लीन होनेका वर्णन ... ६०२
५७- रुद्रदेवका ब्रह्माण्डखण्डको निगलकर निराकार चिदाकाशरूपसे स्थित होना तथा वसिष्ठजीका उस पाषाणशिलाके अन्य भागमें भी नूतन जगत्‌को देखना और पृथ्वीकी धारणाके द्वारा पार्थिव जगत्‌का अनुभव करना · ६०३·
५८- श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त हुए अनुभवका उल्लेख ... ६०४
५९- धारणाद्वारा वायुरूपसे स्थित हुए वसिष्ठजीका अनुभव ... ६०६
६०- कुटीमें लौटनेपर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन, उनके सङ्कल्पकी निवृत्तिसे कुटीका उपसंहार, सिद्धका नीचे गिरना और वसिष्ठजीसे उसका अपने वैराग्यपूर्ण जीवनका वृत्तान्त बताना ... ६०७
६१- श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना, वसिष्ठजीका मनोमय देहसे सिद्धादि लोकोंमें भ्रमण करना, श्रीवसिष्ठजीका अपनी सत्यसङ्कल्पताके कारण सबके दृष्टिपथमें आना, व्यवहारपरायण होना तथा 'पार्थिव वसिष्ठ' आदि संज्ञाओंको प्राप्त करना, पाषाणोपाख्यानकी समाप्ति और सबकी चिन्मय ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... ... ६११
६२- परमपदके विषयमें विभिन्न मतवादियोंके कथनकी सत्यताका प्रतिपादन ... ६१४
६३- तत्त्वज्ञानी संतोंके शील-स्वभावका वर्णन तथा सत्सङ्गका महत्त्व .. ६१५
६४- सत्‌का विवेचन और देहात्मवादियोंके मतका निराकरण ... . ६१६
६५- सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन ... ... ६१७
६६- इस शास्त्रके विचारकी आवश्यकता तथा इससे होनेवाले लाभका प्रतिपादन, वैराग्य

( १६ )

और आत्मबोधके लिये प्रेरणा तथा विचारद्वारा वासनाको क्षीण करनेका उपदेश ... ६२०८०—श्रीवसिष्ठजीके ध्यानसे उत्पन्न हुई अग्निमें मृगके प्रवेशका तथा उसके विपश्चित्-देहकी प्राप्तिका वर्णन ... ६४१
६७—मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण ... ६२१८१—प्राणियोंकी उत्पत्तिके दो भेद, मच्छरके मृग-योनिसे छूटकर व्याघ्ररूपसे उत्पन्न होनेपर उसे एक मुनिका ज्ञानोपदेश ... ६४३
६८—चिदाकाशके स्वरूपका प्रतिपादन तथा जगत्‌की चिदाकाशरूपताका वर्णन ... ६२२८२—पाण्डित्यकी प्रशंसा, चित् ही जगत् है—इसका युक्तिपूर्वक समर्थन ... ६४५
६९—राजा विपश्चित्‌के सामन्तोंका वध, उत्तर दिशाके सेनापतिका घायल होकर आना तथा शत्रुओंके आक्रमणसे राजपरिवार और प्रजामें घबराहट ... ६२३८३—मुनिका व्याघ्रके प्रति बहुतसे प्राणियोंको एक साथ सुख-दुःखकी प्राप्तिके निमित्तका निरूपण करना ... ६४६
७०—राजा विपश्चित्‌का अपने मस्तककी आहुतिसे अग्निदेवको संतुष्ट करके चार दिव्य रूपोंमें प्रकट होना ... ६२५८४—मुनिके उपदेशसे आत्मज्ञानकी प्राप्ति, पूर्वदेहमें गमनकी असमर्थताके विषयमें प्रश्न करनेपर देह आदिके भस्म होनेके प्रसङ्गमें मुनिके आश्रम और दोनों शरीरोंके जलने तथा वायुद्वारा उस अग्निके शान्त होनेका वर्णन ... ६४८
७१—चारों विपश्चितोंका शत्रुओंके साथ युद्ध, भागती हुई शत्रुसेनाका पीछा करते हुए उनका समुद्र-तटतक जाना ... ६२६८५—व्याध और उस मुनिके वार्तालापके प्रसङ्गमें जीवन्मुक्त ज्ञानीके स्वरूपका वर्णन तथा अभ्यास-की प्रशंसा ... ६५०
७२—विपश्चित्‌के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ, कुत्ते, कौए और कोकिल आदिको दिखाकर अन्योक्तियोंद्वारा विशेष अभिप्राय सूचित करना ... ६२७८६—मुनिको परमपदकी प्राप्ति, व्याधके महाशवका वर्णन, अग्निका स्वर्गलोक-गमन, भासद्वारा आत्मकथा-का वर्णन तथा बहुतसे आश्चर्योंका वर्णन करके आत्मतत्त्वका निरूपण ... ६५२
७३—सरोवर, भ्रमर और हंसविषयक अन्योक्तियाँ ... ६३१८७—राजा दशरथका विपश्चित्‌को पुरस्कार देनेकी आज्ञा देते हुए सभाको विसर्जित करना, दूसरे दिन सभामें वसिष्ठजीद्वारा कथाका आरम्भ, ब्रह्मके वर्णनद्वारा अविद्याके निराकरणके उपाय, जितेन्द्रियकी प्रशंसा और इन्द्रियोंपर विजय पाने-की युक्तियाँ ... ६५४
७४—बगुले, जलकाक, मोर और चातकसे सम्बन्ध रखनेवाली अन्योक्तियाँ ... ६३२८८—दृश्यजगत्‌की चैतन्यरूपता, अनिर्वचनीयता, असत्ता तथा ब्रह्मसे अभिन्नताका प्रतिपादन ... ६५७
७५—वायु, ताड़, पलाश, कनेर, कल्पवृक्ष, वनस्थली और चम्पकवनका वर्णन करते हुए सहचरोंका महाराजसे राजाओंकी भेंट स्वीकार करके उन्हें विभिन्न मण्डलोंकी शासनव्यवस्था सौंपनेके लिये अनुरोध करना तथा विपश्चितों-का अग्निसे वरदान प्राप्त करके दृश्यकी अन्तिम सीमा देखनेके लिये उद्यत होना ... ६३३८९—जीवन्मुक्त तथा परमात्मामे विश्रान्त पुरुषके लक्षण तथा आत्मज्ञानीके सुखपूर्वक शयनका कथन ६५८
७६—चारों विपश्चितोंका समुद्रमें प्रवेश और प्रत्येक दिशामें उनकी पृथक्-पृथक् यात्राका वर्णन ... ६३५९०—जीवन्मुक्तके स्वकर्म नामक मित्रके स्त्री, पुत्र आदि परिवारका परिचय तथा उस मित्रके साथ रहनेवाले उस महात्माके स्वभावसिद्ध गुणोंका उल्लेख, तत्त्वज्ञानीकी स्थिति, जगत्‌की ब्रह्मरूपता तथा समस्तवादियोंके द्वारा ब्रह्मके ही प्रति-पादनका कथन ... ६५९
७७—विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन ... ६३६
७८—मरे हुए विपश्चितोंके संसार-भ्रमणका तथा उत्तर दिशागामी विपश्चित्‌के भ्रमणका विशेष रूपसे वर्णन ... ६३८
७९—शेष दो विपश्चितोंके वृत्तान्तका वर्णन तथा मृगरूपमें श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त हुए एक विपश्चित्‌का राजसभामें लाया जाना ... ६४०

( १७ )

**९१—**निर्वाण अथवा परमपदका स्वरूप, ब्रह्ममें जगत्-की सत्ताका खण्डन, चिदाकाशके ही जगद्रूपसे स्फुरित होनेका कथन, ब्रह्मके उन्मेष और निमेष ही सृष्टि और प्रलय हैं, मन जिसमें रस लेता है वैसा ही बनता है, चिदाकाश अपनेको ही दृश्य-रूपसे देखता है तथा अज्ञानसे ही परमात्मामें जगत्‌की स्थिति प्रतीत होती है—इसका प्रतिपादन ... ६६१**१०३—**कर्मोंके त्याग और ग्रहणसे कोई प्रयोजन न रखते हुए भी जीवन्मुक्त पुरुषोंकी स्वभावतः सत्कर्मोंमें ही प्रवृत्तिका प्रतिपादन ... ६८०
**९२—**सृष्टिकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... ६६२**१०४—**सिद्धों और सभासदोंद्वारा श्रीवसिष्ठजीको साधु-वाद, देव-दुन्दुभियोंका नाद, दिव्य पुष्पोंकी वर्षा, गुरु-पूजन-महोत्सव, श्रीदशरथजी और श्रीरामजीके द्वारा गुरुदेवका सत्कार, सभ्यों और सिद्धोंद्वारा पुनः श्रीवसिष्ठजीकी स्तुति • ६८२
**९३—**श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसङ्ग उपस्थित करना और वसिष्ठजीके पूछनेपर कुन्ददन्तका अपने संशयकी निवृत्ति तथा तत्त्व-ज्ञानकी प्राप्तिको स्वीकार करते हुए अपना अनुभव बताना ... ६६३**१०५—**गुरुके पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीका पुनः अपनी परमानन्दमयी स्थितिको बताना तथा वसिष्ठजी-का उन्हें कृतकृत्य बताकर विश्वामित्रजीकी आज्ञा एव भूमण्डलके पालनके लिये कहना, श्रीरामद्वारा अपनी कृतार्थताका प्रकाशन ... ६८५
**९४—**सब कुछ ब्रह्म है, जगत् वस्तुतः असत् है, वह ब्रह्मका संकल्प होनेसे उससे भिन्न नहीं है, जीवात्माको अज्ञानके कारण ही जगत्‌की प्रतीति होती है—इसका प्रतिपादन ... ६६५**१०६—**मध्याह्नकालमें राजासे सम्मानित हो सबका आवश्यक कृत्यके लिये उठ जाना और दूसरे दिन प्रातःकाल सबके सभामें आनेपर श्रीरामका गुरुके समक्ष अपनी कृतकृत्यता प्रकट करना • ६८६
**९५—**श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर ... ६६६**१०७—**श्रीवसिष्ठ और श्रीरामका संवाद, दृश्यका परि-मार्जन, सबकी चिदाकाशरूपताका प्रतिपादन, श्रीरामका प्रश्न और उसके उत्तरमें श्रीवसिष्ठ-द्वारा प्रश्रितिके उपाख्यानका आरम्भ ... ६८८
**९६—**अज्ञानसे ब्रह्मका ही जगत्रूपसे भान होता है वास्तवमें जगत्‌का अत्यन्ताभाव है और एकमात्र ब्रह्म ही विराजमान है, इस तत्त्वका प्रतिपादन ६७२**१०८—**यह जगत् ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्म ही है, इसका विवेचन ... ६८९
**९७—**श्रीरामचन्द्रजीके मुखसे ज्ञानी महात्माकी स्थिति-का एवं अपने परब्रह्मस्वरूपका वर्णन ... ६७२**१०९—**राजा प्रश्रितिके प्रश्नोंपर श्रीवसिष्ठजीका विचार एव निर्णय ... ६९१
**९८—**श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बोधके पश्चात् होनेवाली शान्त एवं संकल्पशून्य स्थितिका वर्णन ... ६७३**११०—**सिद्ध आदिके लोकोंकी संकल्परूपता बताते हुए इस जगत्‌को भी वैसा ही बताना और ब्रह्ममें अहम्भावका स्फुरण ही हिरण्यगर्भ है, उसका संकल्प होनेके कारण त्रिलोकी भी ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन ... ६९२
**९९—**श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा जगत्‌की असत्ता एवं 'सर्वं ब्रह्म' के सिद्धान्तका प्रतिपादन ... ६७४**१११—**सभासदोंका कृतार्थता-प्रकाशन तथा वसिष्ठजीकी आज्ञासे महाराज दशरथका ब्राह्मणोंको भोजन कराना और सात दिनोंतक दान-मानसे सम्पन्न उत्सव मनाना ... ६९४
**१००—**श्रीरामचन्द्रजीके प्रश्नके अनुसार उत्तम बोधकी प्राप्तिमें शास्त्र आदि कैसे कारण बनते हैं, यह बतानेके लिये श्रीवसिष्ठजीका उन्हें कीरको-पाख्यान सुनाना—लकड़ीके लिये किये गये उद्योगसे कीरकोंका सुखी होना ... ६७६**११२—**श्रीवाल्मीकि-भरद्वाज-संवादका उपसंहार, इस ग्रन्थकी महिमा तथा श्रोताके लिये दान, मान आदिका उपदेश ... ६९६
**१०१—**कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र एवं गुरुपदेश आदिको कारण बताना ... ... ६७७
**१०२—**श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा ... ६७८

ग—

( १८ )

११३—अरिष्टनेमि, सुरुचि, कारुण्य तथा सुतीक्ष्णकी कृतकृत्यताका प्रकाशन, शिष्योंका गुरुजनोंके प्रति आत्मनिवेदन तथा ब्रह्मको एव ब्रह्मभूत वसिष्ठजीको नमस्कार ... ६९७१३—क्षमा प्रार्थना और नम्र निवेदन (हनुमानप्रसाद पोद्दार, चिम्मनलाल गोस्वामी) ... ६९९<br><br>१४—जीवन्मुक्तका स्वरूप और आचार (कविता) ... ७००
<br>

चित्र-सूची

सादे
१—तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरामचन्द्रजीका स्वागत (प्रसंग वैराग्य-प्रकरण सर्ग ४) ... ४८६—राजा दशरथसे श्रीरामद्वारा तीर्थयात्राके लिये आज्ञा माँगना ... २४
२—सुरुचि और देवदूत (प्रसंग वैराग्य-प्रकरण सर्ग १) ... ११२७—तीर्थयात्रासे लौटे हुए श्रीरामका राजसभामें आना ... २५
३—राजा सिन्धुका राज्याभिषेक (प्रसंग उत्पत्ति-प्रकरण सर्ग ५१) ... १७६८—श्रीरामकी खिन्नताके सम्बन्धमें राजा दशरथका श्रीवसिष्ठसे प्रश्न ... २६
४—दोनों लीलाओंके साथ राजा पद्मका राज्याभिषेक (प्रसंग उत्पत्ति-प्रकरण सर्ग ५९) ... २८०९—मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रका राजा दशरथद्वारा ड्योढ़ीपर स्वागत ... २७
५—जनकका तमालकी झाड़ीमें छिपे सिद्धोंके गीत-श्रवण (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ८) ... ३३६१०—विश्वामित्रका रोष ... ३०
६—क्षीरसागरमें शेषशय्यापर विराजित भगवान्‌का जगत्‌की स्थितिको देखना (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ३८) ... ४१६११—विश्वामित्रको वसिष्ठका समझाना ... ३१
७—भगवान्‌के द्वारा प्रह्लादका अभिषेक (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ४१) ... ४८०१२—श्रीरामके सेवकका राजसभामें आना ... ३२
८—शेषनागपर भगवान् विष्णु, स्वर्गमें इन्द्र और पातालमें प्रह्लाद (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ४२) ५४८१३—श्रीरामका पिता दशरथके चरणमें प्रणाम करना ... ३४
९—राजा बलि और शुक्राचार्य (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ४५-४६) ... ६१२१४—श्रीरामका अपने भाइयोंसहित पृथ्वीपर आसन ग्रहण करना ... ३४
१०—गन्धर्वों और विद्याधरियोंके द्वारा भोगोंका प्रलोभन देनेपर भी उद्दालकका उनकी ओर ध्यान न देना (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ५४) ६८२१५—शरीरकी बाल्य, युवा और वृद्धावस्था ... ५६
१६—विश्वामित्रका श्रीरामको तत्त्वज्ञान-सम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका वृत्तान्त उपस्थित करना ... ६५
रेखा-चित्र१७—मेरुगिरिपर एकान्तमें बैठे शुकदेवको आत्मज्ञानी व्यासद्वारा उपदेश ... ६६
१—वसिष्ठजीके द्वारा ज्ञानोपदेश ... १८—राजा जनकके अन्तःपुरमें शुकदेवका युवतियोंके द्वारा सत्कार ... ६६
२—अगस्तिद्वारा सुतीक्ष्ण ब्राह्मणसे मोक्षके कारणका प्रतिपादन ... १७१९—विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश देनेका अनुरोध ... ६८
३—अग्निवेश्यका अपने उदास पुत्र कारुण्यको समझाना ... १८२०—अपने पिता ब्रह्माजीसे उत्पन्न होते ही वसिष्ठजीका अभिशप्त होना ... ७८
४—वाल्मीकिके आश्रमपर देवदूतके साथ राजा अरिष्टनेमिका आना और उनसे संसार-बन्धनके दुःखकी पीड़ासे छूटनेका उपाय पूछना ... २०२१—ब्रह्माजीकी सनकादिको और नारदको भारतवर्षमें जाकर वहाँके निवासियोंका उद्धार करनेकी प्रेरणा ... ७९
५—मेरुपर्वतपर भरद्वाजकी लोक-पितामह ब्रह्मासे वर-याचना ... २१२२—वसिष्ठजीके द्वारा राजा पद्म और उनकी

( १९ )

पत्नी लीलाका उपाख्यान-कथन ... ११५लीलाका सरस्वतीके साथ आक्रमणकारी राजा-द्वारा उपस्थित किया गया संग्राम-दृश्य देखना १३८
२३-रानी लीलाद्वारा विद्वान्, ज्ञानी और तपस्वी ब्राह्मणोंकी पूजाके पश्चात् उनसे अमरत्व-प्राप्तिका साधन पूछा जाना ... ११६४०-लीला और सरस्वतीका आकाशमें विमानपर स्थित होकर युद्धका अवलोकन करना ... १३९
२४-लीलाद्वारा सरस्वती देवीकी आराधना ... ११७४१-युद्धका बंद होना ... ... १४४
२५-अन्तःपुरमें मृतपतिके शवके सम्मुख वियोग-विह्वल रानी लीला .. .. ११८४२-राजा विदूरथके शयनागारमें गवाक्षरन्ध्रसे लीला और सरस्वतीका प्रवेश ... ... १४४
२६-सरस्वतीका आकाशवाणीके रूपमें पतिके शवको फूलसे ढकनेका लीलाको आदेश देना ११८४३-राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश और राजाद्वारा उनका पूजन ... १४६
२७-आधी रातके समय लीलाके आवाहनपर सरस्वतीका प्रकट होकर उसे दर्शन देना ... ११९४४-राजा पद्मका सरस्वतीसे अपने जीवनके अनेक वृत्तान्तोंके स्मरणका कारण पूछना ... १४७
२८-निर्विकल्प समाधिद्वारा रानी लीलाका राज प्रासादके आकाशमें सिंहासनारूढ़ राजा पद्मका देखा जाना ... ... ११९४५-राजा विदूरथद्वारा युद्धकी प्रलयाग्निमें भग्न नगरमें ग्रस्त प्राणियोंका करुणक्रन्दन श्रवण ... १५१
२९-आकाशस्वरूपा लीलाद्वारा समाधि-अवस्थामें आकाशरूपिणी राजसभामें पतिके वासनामय स्वरूप और राजवैभवका दर्शन ... १२०४६-लीला और सरस्वतीसे आदेश लेकर राजा विदूरथका युद्धके लिये प्रस्थान ... १५१
३०-लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना और सरस्वतीद्वारा एक ब्राह्मण-दम्पतिके जीवन-वृत्तान्तका निरूपण ... १२१४७-द्वितीय लीलाकी सरस्वती देवीसे वर याचना .. १५३
३१-वसिष्ठनाम-धारी ब्राह्मणका पर्वतशिखरपर बैठकर एक राजाको सपरिवार शिकार खेलनेकी इच्छासे जाते देखकर विचारमग्न होना .. ... १२३४८-युद्धस्थलमें पराजित राजा विदूरथके गलेपर राजा सिन्धुका अस्त्रप्रहार और विदूरथका रथसहित राजप्रासादमें प्रवेश ... ... १५८
३२-वसिष्ठ नामधारी ब्राह्मणकी पत्नी अरुन्धती-की सरस्वती-आराधना और पतिके अमरत्व-सम्बन्धी वरकी प्राप्ति ... ... १२३४९-लीलाका अपने वासनामय शरीरसे पति पद्मसे मिलनेके लिये आकाशमार्गसे ऊपर जाना और मार्गमें सरस्वतीद्वारा प्रेषित अपनी कन्यासे मिलना ... ... १६१
३३-वसिष्ठनामधारी ब्राह्मणकी त्रिलोकविजयी नरेश-पदकी प्राप्ति ... ... १२४५०-लीलाका अपने मृतपति पद्मका मुख देखना और अपनी प्रतिमाके प्रभावसे इस सत्यको समझना कि संग्राममें राजा सिन्धुद्वारा मारे गये ये मेरे पति ही हैं ... ... १६२
३४-रानी लीला और सरस्वतीका संवाद ... १२४५१-संकल्परूपिणी देवियाँ लीला और सरस्वतीका जीवात्माके साथ राजा पद्मके नगरमें प्रवेश ... १६८
३५-सत्यकाम और सत्यसंकल्पसे युक्त लीला और सरस्वती देवीका ज्येष्ठशर्मा आदिको साधारण स्त्रीके रूपमें दर्शन ... ... १३२५२-लीला और सरस्वतीद्वारा शवमण्डपमें राजा विदूरथकी शवशय्याके पार्श्वभागमें स्थित लीलाका देखा जाना जो पहले मृत्युको प्राप्त हो चुकी थी और पहले ही वहाँ आ गयी थी .. १६९
३६-लीला और सरस्वतीका आकाशमें भ्रमण ... १३३५३-राजा पद्मकी सरस्वतीसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति ... १७३
३७-लीलाका सरस्वतीसे अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तका निरूपण ... ... १३४५४-वाल्मीकि और भरद्वाज ... ... २४९
३८-लीलाका गृहमण्डपमें प्रवेश कर सरस्वतीके साथ आकाशमें उड़ जाना .. ... १३५५५-राजा दशरथका मुनिसमुदायका सत्कारकर उनसे विदा लेना ... ... २५०
३९-जम्बूद्वीपमें भारतवर्षमें अपने पतिके राज्यमें
( १० )
५६—वसिष्ठजीद्वारा पञ्चमहायज्ञ-अनुष्ठानका सम्पादन २५०७४—शुक्राचार्यद्वारा बलिके समाधि-अवस्थासे न उठनेतककी अवधिमें कार्य करनेका दानवोंको आदेश ... ... ... २८०
५७—श्रीराम, राजा दशरथ तथा वसिष्ठ आदिके द्वारा ब्राह्मणोंको गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, शय्या, आसन, वस्त्र और बर्तन आदिका दान ... २५१७५—मनुष्य, नागराज, ग्रह, देववृन्द, पर्वत और दिक्पाल तथा वन-जीवोंका यथास्थान गमन ... २८०
५८—श्रीरामद्वारा विष्णु, शंकर, अग्नि और सूर्य आदि देवताओंका पूजन ... ... २५१७६—समाधिसे जगनेपर दैत्यराज बलिका अश्वमेध-अनुष्ठान ... ... २८१
५९—वसिष्ठजीको उनके निवासस्थानपर अपना कन्धा झुकाकर श्रीरामका प्रणाम करना ... २५१७७—श्रीहरिद्वारा पैरोंसे त्रिलोकको नापना और बलिको वैभव-भोगसे वञ्चित करना ... २८२
६०—विश्वामित्र तथा अन्य मुनियोंके साथ रथपर आरूढ होकर वसिष्ठजीका राजा दशरथकी सभामें प्रवेश ... ... २५२७८—प्रह्लादद्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्यपूजा ... ... २८५
६१—राजा जनकका अपने ऊँचे महलपर चढकर एकान्तमें स्थित होकर संसारकी नश्वरता और आत्माके विवेक-विज्ञानको सूचित करनेवाले अनेक आन्तरिक उद्गार और निश्चय प्रकट करना ... ... २५७७९—इन्द्र आदि देवता और मरुद्गणोंका क्षीर-सागरमें शेषनागकी शय्यापर विराजमान भगवान् श्रीहरिके पास गमन ... २८६
६२—राजा जनकद्वारा संसारकी विचित्र स्थितिपर विचार ... ... ... २६०८०—प्रह्लादद्वारा पूजागृहमें प्रत्यक्ष विराजमान भगवान् श्रीहरिका स्तवन ... ... २८७
६३—राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति ... २६१८१—प्रह्लादका आत्मचिन्तन ... ... २८९
६४—दीर्घतपा मुनिका अपनी स्त्री तथा दोनों पुत्र पुण्य और पावनके साथ अपने गङ्गातटीय आश्रममें निवास ... ... २६९८२—पातालमें आत्मचिन्तनलीन प्रह्लादको समाधिसे जगानेका प्रयत्न ... ... २९३
६५—दीर्घतपाका शरीर-त्याग ... ... २६९८३—उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन ... ३०१
६६—माता-पिताका और्ध्वदेहिक कर्म समाप्तकर पुण्यका अपने शोकाकुल बन्धु पावनके पास आगमन ... २७०८४—उद्दालक मुनिका गन्धमादन पर्वतकी रमणीय गुहामें प्रविष्ट होकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित होनेका प्रयत्न ... ... ३०२
६७—पुण्यके समझानेपर पावनको उत्कृष्ट बोधकी प्राप्ति और दोनोंका वन-प्रदेशमें विचरण ... २७१८५—महर्षि माण्डव्यका किरातराज सुरघुके महलमें पधारना ... ... ३११
६८—दैत्यराज बलि ... ... २७३८६—सुरघुद्वारा परमपदकी प्राप्ति ... ... ३१४
६९—राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचार-का उदय ... ... २७३८७—किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णादका संवाद ३१५
७०—विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक परमात्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश २७४८८—पिताओंकी और्ध्वदेहिक क्रियाकी समाप्तिके पश्चात् भास और विलासका विलाप ... ३२१
७१—शुक्राचार्यका ग्रहसमुदायसे भरे आकाश-मार्गसे देवलोकके लिये प्रस्थान ... ... २७८८९—वृद्धावस्थाको प्राप्त भास और विलासकी परस्पर भेंट ... ... ३२२
७२—दैत्यराज बलिका समाधिस्थ होना ... २७९९०—वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना ... ३४५
७३—समाधिमें मग्न दैत्यराज बलिके दर्शनके लिये असुरों आदिका आगमन ... ... २७९९१—वीतहव्य महामुनिकी समाधि ... ३४८
९२—महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बनकर परमात्मप्राप्तिरूप मुक्ता-वस्थाका निरूपण ... ... ३५१
९३—देवराजकी सभामें मुनिवर गातातपद्वारा

( २१ )

वायसराज भुशुण्डकी कथाका वृत्तान्त-वर्णन··· ३७६दिनोंतक खोज करनेवाले किरातको चिन्तामणिकी प्राप्ति ··· ४४९
९४-वसिष्ठजीका भुशुण्डके निवास-स्थान मेरुगिरिपर जाना ··· ३७७११५-राजा शिखिध्वजकी बढ़ती वैराग्य-वृत्ति ··· ४५०
९५-वसिष्ठजी और भुशुण्डका संवाद—कुल-आयु आदिके सम्बन्धमें ··· ३७८११६-राजा शिखिध्वजका चूडालासे अपने वैराग्य-कथन ··· ४५१
९६-वसिष्ठजीके सम्मुख भुशुण्डद्वारा महादेवजीके रूप और मातृकाओंका वर्णन ··· ३७९११७-राजा शिखिध्वजका गृह-त्याग·· ··· ४५२
९७-मातृकाओंके महोत्सवमें ब्राह्मी देवीके रथमें जुतनेवाली हंसियों और अम्बुजादेवीके वाहन चण्ड नामक कौएका नृत्य ··· ··· ३८०११८-चूडालाका आकाश-मार्गसे उड़कर अपने पतिका अन्वेषण ··· ४५४
९८-समाधिसे विरत होनेपर ब्राह्मीदेवीकी अपनी माता हंसियोंके साथ भुशुण्ड आदिद्वारा आराधना ··· ३८०११९-ब्राह्मणकुमारके रूपमें चूडालाका शिखिध्वजद्वारा पूजन-सत्कार ··· ··· ४५५
९९-वसिष्ठजीसे भुशुण्डका मेरुपर्वतपर कल्पवृक्षकी शाखामें स्थित अपने घोसलेका वर्णन करना··· ३८११२०-राजा शिखिध्वजकी देवपुत्रके वेषमें चूडालासे बातचीत ··· ··· ४५७
१००-भुशुण्डद्वारा वसिष्ठका पूजन और आकाश-मार्गसे गमन ··· ३९११२१-कुम्भ ( चूडाला ) की बात सुनकर सर्वस्व-त्यागके लिये उद्यत शिखिध्वज ··· ४६५
१०१-कैलास पर्वतपर गङ्गातटस्थ आश्रममें तप करते हुए वसिष्ठजीको पार्वतीजीसहित भगवान् महादेवजीका दर्शन ··· ··· ३९६१२२-कुम्भ ( चूडाला ) के अन्तर्हित हो जानेपर राजा शिखिध्वजका विचार ··· ··· ४७७
१०२-वसिष्ठजीद्वारा भगवान् नीलकण्ठ शंकरको पुष्पाञ्जलि-समर्पण ··· ··· ४०९१२३-कुम्भके वेषमें चूडालाका वनस्थलीमें उतरकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित राजा शिखिध्वजको देखना ··· ··· ४७८
१०३-वेताल और राजाका संवाद ··· ४३११२४-राजा शिखिध्वजद्वारा कुम्भको पुष्पाञ्जलि-समर्पण ··· ··· ४७९
१०४-अपने गुरु त्रितलके साथ राजा भगीरथकी बातचीत ··· ४३४१२५-महेन्द्रपर्वतपर अग्निके साक्ष्यमें मदनिका ( चूडाला ) और शिखिध्वजका विवाह ··· ४८४
१०५-राजा भगीरथका सर्वस्व-त्याग··· ··· ४३५१२६-चूडालाद्वारा शिखिध्वजकी परीक्षाके हेतु अपनी मायाके बलसे वनस्थलीमें देवगणों और अप्सराओंके साथ पधारे हुए इन्द्रको उन्हें दिखलाना और राजा शिखिध्वजद्वारा देवराजकी विधिवत् पूजा ··· ··· ४८५
१०६-राजा भगीरथका अपने ही नगरमें भिक्षाटन··· ४३६१२७-चूडालाका मदनिका वेषमेंमे ही अपने असली रूपमें प्राकट्य और राजा शिखिध्वजका आश्चर्यचकित होना ··· ··· ४८७
१०७-राजा भगीरथका अन्य देशमें विद्यमान उत्तम नगरमें राज्याभिषेक ··· ··· ४३६१२८-अपनी पत्नी चूडालाको देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना ··· ··· ४८८
१०८-भूतलपर गङ्गाजीको लानेके लिये राजा भगीरथकी तपस्या ··· ··· ४३७१२९-चूडालासहित शिखिध्वजका अपने नगरमें प्रवेश और स्वागत ··· ··· ४९१
१०९-राजा शिखिध्वज और चूडालाका विवाह ··· ४३८१३०-कचका अपने पिता वृहस्पतिसे जीवन्मुक्तिके विषयमें प्रश्न करना ··· ··· ४९३
११०-राजा शिखिध्वजद्वारा चूडालाके रूप-सौन्दर्य-की प्रशंसा ··· ··· ४४११३१-वसिष्ठजीद्वारा मूढ़बुद्धि आत्मज्ञानशून्य
१११-चूडालाकी खिन्नता ··· ··· ४४२
११२-चूडालाका एकान्तमें योगाभ्यास ··· ४४३
११३-चूडालाकी योगसिद्धि ··· ··· ४४८
११४-विन्ध्याचलके जगली प्रदेशमें एक कौड़ीकी तीन

( २२ )

चिरञ्जीव पुरुषके स्मरणके विषयमें भुशुण्डसे प्रश्न ... ५२०और मङ्किका समागम तथा संवाद ... ५३३
१३२-विद्याधरकी भुशुण्डसे पावनपदविषयक उपदेश देनेकी प्रार्थना ... ५२०१३५-सुन्दरी स्त्रीद्वारा अपनी स्तुति सुनकर वसिष्ठजीका उस रमणीकी उपेक्षा करना ... ५७५
१३३-भुशुण्डके उपदेशसे विद्याधरकी समाधि ... ५२७१३६-वसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन ... ५७९
१३४-मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महर्षि वसिष्ठ

'कल्याण' के पंद्रहवर्षीय ग्राहक भी बनाये जाते हैं

पंद्रहवर्षीय सदस्यता-शुल्क रु० ५००.०० (सजिल्द विशेषाङ्कका रु० ६००.००) है। इस योजनाके अन्तर्गत फर्म, प्रतिष्ठान आदि संस्थागत ग्राहक भी बन सकते हैं। भगवद्भावोंके प्रचार-प्रसारहेतु 'कल्याण'-प्रेमी सभी सज्जन स्वयं ग्राहक बनें एवं अपने इष्ट-मित्रोंको भी प्रोत्साहित कर अधिकाधिक संख्यामें ग्राहक बनाकर इस योजनासे लाभ उठायें।

व्यवस्थापक-'कल्याण'

**२—भगवान् श्रीरामको नमस्कार**<br>(वसिष्ठ, नि० प्र० पू० २ । ६०)

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादा[य...]


कल्याण

यतः सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च । यत्रैवोपरमं यान्ति [...]
यत्तत्सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति च स्फुटम् । श्रुत्वा हृदीयते स[...]


वर्ष ३५ } गोरखपुर, सौर माघ २०१७, जनवरी १९६[...]


महर्षि वसिष्ठजीको नमस्कारभगवान्
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं<br>द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।<br>एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं<br>भावातीतं त्रिगुणरहितं श्रीवसिष्ठं नताः स्म ॥<br>सुतीक्ष्ण (नि० प्र० उ० २१६। २६)आद्यन्तवर्जितवि[...] <br>सम्पीड्यि[...] <br>स्वस्थो [...] <br>लीलास्थि[...]

**३—योगवासिष्ठमें भगवान् श्रीरामके स्वरूप तथा माहात्म्यका प्रतिपादन**

२ * अविच्छिन्नसच्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *


योगवासिष्ठमें भगवान् श्रीरामके स्वरूप तथा माहात्म्यका प्रतिपादन

महर्षि वसिष्ठकी प्रेरणासे दशरथके दरबारमें समस्त ऋषि-मुनियों-महानुभावोंको सम्बोधन करके महर्षि विश्वामित्र भगवान् श्रीरामके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—

अत्रैव कुरु विश्वासमयं स पुरुषः परः।
विश्वार्थमथिताम्भोधिर्गम्भीरागमगोचरः ॥
परिपूर्णपरानन्दः समः श्रीवत्सलाञ्छनः।
सर्वेषां प्राणिनां रामः प्रदाता सुप्रसादितः ॥
अयं निहन्ति कुपितः सृजत्ययमत्सत्स्कान्।
विश्वादिर्विश्वजनको धाता भर्ता महासखः ॥
(नि० प्र० पूर्वार्ध १२८ । ८१-८३)

सजनो ! आप सब लोग यह विश्वास कीजिये कि ये श्रीरामचन्द्रजी ही परम पुरुष परमात्मा हैं। इन्होंने ही विश्वहितके लिये विष्णुरूपसे क्षीरसागरका मन्थन किया था। गम्भीर रहस्यसे भरे उपनिषदादि शास्त्रोंके तत्त्वगोचर साक्षात् परब्रह्म ये ही हैं। परिपूर्ण परमानन्द, सम-स्वरूप, श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित भगवान् श्रीरामचन्द्र जब भलीभाँति प्रसन्न हो जाते हैं, तब अपनी कृपासे सम्पूर्ण प्राणियोंको मोक्ष प्रदान कर देते हैं। यही भगवान् श्रीरामचन्द्रजी कुपित होकर रुद्र-रूपसे जगत्‌का संहार करते हैं, यही ब्रह्मारूपसे इस विनाशी जगत्‌का सृजन करते हैं। यही विश्वके आदि, विश्वके उत्पादक, विश्वके धाता, पालनकर्ता और महान् सखा भी हैं।

अयं त्रयीमयो देवस्त्रैगुण्यगहनातिगः।
जयत्यङ्गैरयं षड्भिर्वेदात्मा पुरुषोऽद्भुतः ॥
अयं चतुर्बाहुदयं विश्वस्रष्टा चतुर्मुखः।
अयमेव महादेवः संहर्त्ता च त्रिलोचनः ॥
अजोऽयं जायते योगाज्जागरूकः सदा महान्।
बिभर्ति भगवानेतद्विरूपो विश्वरूपवान् ॥
(नि० प्र० पूर्वार्ध १२८ । ८६-८८)

यही भगवान् श्रीराम ऋक्-यजु-सामवेदमय हैं, तीनों गुणोंसे अतीत अतिगहन यही हैं और छः अङ्गोंसे युक्त वेदात्मा अद्भुत पुरुष भी यही हैं। विश्वका पालन करनेवाले चतुर्भुज विष्णु यही हैं, विश्वके स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्मा यही हैं और समस्त विश्वका संहार करनेवाले त्रिलोचन भगवान् महादेव भी यही हैं। ये अजन्मा रहते हुए ही अपनी योग-माया-लीलासे अवतार लेते हैं, ये सर्वदा सबसे महान् हैं, ये सदा जागते रहते हैं, त्रिगुणात्मकरूपसे रहित हुए भी ये विश्वरूपवान् हैं। यही भगवान् इस विश्वको अपने सङ्कल्पसे धारण करते हैं।

अयं दशरथो धन्यः सुतो यस्य परः पुमान्।
धन्यः स दशकण्ठोऽपि चिन्त्यश्चित्तेन योऽमुना ॥
राम इत्यवतीर्णोऽयमर्णवान्तःशयः पुमान्।
चिदानन्दघनो रामः परमात्मायमव्ययः ॥
निगृहीतेन्द्रियग्रामा रामं जानन्ति योगिनः।
वयं त्ववरमेवास्य रूपं रूपयितुं क्षमाः ॥
(निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध १२८ । ९०, ९२, ९३)

ये महाराज दशरथ धन्य हैं, जिनके पुत्र परमपुरुष परमात्मा स्वयं हुए। यह दशकण्ठ रावण भी धन्य है, जिसका ये भगवान् अपने चित्तसे चिन्तन करेंगे। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले श्रीविष्णु भगवान् ही श्रीरामचन्द्रके रूपमें अवतीर्ण हैं। ये श्रीराम साक्षात् सच्चिदानन्दघन अविनाशी परमात्मा हैं। मन इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किये हुए योगीजन ही इन श्रीरामजीको यथार्थरूपमें जानते हैं। हमलोग तो इनके बाहरी स्वरूपके निरूपणकी ही क्षमता रखते हैं।

इसके पहले महर्षि विश्वामित्रजीने भगवान् श्रीरामकी भावी लीलाओंका वर्णन करते हुए समस्त ऋषि-मुनि, सिद्ध-देवताओंसे यहाँतक कह दिया था—

यैर्दृष्टो यैः स्मृतो वापि यैः श्रुतो बोधितस्तु यैः।
सर्वावस्थागतानां तु जीवन्मुक्तिं प्रदास्यति ॥
× × ×
अनेन रामचन्द्रेण पुरुषेण महात्मना।
नमोऽस्मै जितमेवैतै कोऽप्येवं चिरमेधताम् ॥
(निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध १२८ । ७४-७६)

जो लोग भगवान् श्रीरामका दर्शन करेंगे, उनके लीला-चरित्रका स्मरण या श्रवण करेंगे और जो लोग इनके स्वरूप तथा लीलाचरित्रोंका परस्पर बोध करायेंगे, उन सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित पुरुषोंको भगवान् श्रीराम जीवन्मुक्ति प्रदान करेंगे।

× × ×

सजनो ! आप सब लोग इन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार कीजिये। इनके नमस्कारसे ही आपलोग अनायास ही समस्त अज्ञानजनित जगत्‌पर विजय प्राप्त करेंगे। किसी भी दूसरे साधनकी आवश्यकता नहीं होगी। आपलोग चिर-कालतक प्रगति करें !

**४—कल्याण ('शिव')**

* कल्याण * ३


कल्याण

याद रक्खो—मैं, तुम, यह, वह, सृष्टि, संहार आदि रूपसे जो दृश्यप्रपञ्च दिखायी दे रहा है, वह एकमात्र अद्वितीय नित्य निर्मल शान्त चिन्मय ब्रह्मकी ही अभिव्यक्ति है। इन समस्त सत्-रूपसे दीखनेवाले असत् पदार्थोंमें एकमात्र सत् परमात्मा ही प्रकट है। वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही यह सम्पूर्ण जगत् है। उसके अतिरिक्त जगत् नामकी कोई सत् वस्तु कभी न थी, न है।

याद रक्खो—आकाशकी शून्यता आकाश ही है, जलकी द्रवता जल ही है, प्रकाशकी आभा प्रकाश ही है, वायुका स्पन्दन वायु ही है, समुद्रकी तरङ्गैं समुद्र ही हैं, बर्फकी शीतलता बर्फ ही है, काजलकी कालिमा काजल ही है—ठीक वैसे ही जैसे ब्रह्ममें दीखनेवाला यह समस्त जगत् भी ब्रह्म ही है।

याद रक्खो—जैसे स्वप्नमें दीखनेवाले दृश्य, बालकको दीखनेवाला वेताल, रज्जुमें दीखनेवाला सर्प, स्वर्णमें दीखने-वाले कड़े-बाजूबंद, प्रशान्त महासागरमें उठनेवाली तरङ्गों और आवर्त, मिट्टीमें दीखनेवाले घड़े-सिकोरे और आकाशमें दीखनेवाले नगर-घर आदि सब उपाधिमात्र हैं, भ्रममात्र हैं। वैसे ही ब्रह्ममें दीखनेवाला यह सम्पूर्ण जगत् भ्रममात्र है। वस्तुतः उसकी कोई भिन्न सत्ता है ही नहीं।

याद रक्खो—यह समस्त जगत् वस्तुतः भ्रान्तिसे ही जगद्रूप दीखता है। यथार्थ तत्त्वका ज्ञान होनेपर यह जगद्भ्रम वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे रस्सीका ज्ञान होनेपर सर्पकी भ्रान्ति नष्ट हो जाती है। अथवा आकार तथा नामकी व्यावहारिक विभिन्नता प्रतीत होते हुए भी जैसे स्वर्णका ज्ञान होनेपर स्वर्ण-भूषणोंके नाम-रूपके कारण होनेवाली विभिन्नता तथा भिन्नरूपता नष्ट हो जाती है—एकमात्र स्वर्ण ही दीखने लगता है, वैसे ही ब्रह्मका ज्ञान होनेपर विभिन्न नामरूपात्मक यह विशाल विश्व ब्रह्मरूप ही दीखने लगता है, कहीं भी कोई भिन्न सत्ता रहती ही नहीं।

वास्तवमें तो सच्चिदानन्दघन परमात्माके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।

याद रक्खो—यह समस्त दृश्य जगत् तथा इसमें होनेवाली सभी क्रियाएँ चिदानन्दघन ब्रह्मका ही संकल्प है। वह संकल्प भी ब्रह्म ही है। ब्रह्म जगत्‌का कारण नहीं है, क्योंकि जगत्रूपी कार्य सर्वथा असत् ही है। नित्य सत्य ब्रह्मसे अनित्य असत् जगत्‌की उत्पत्ति, नित्य निरतिशय दिव्य परमानन्दघन परमात्मासे दुःखपूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति, प्रकाशमय परब्रह्मसे तमोमय जगत्‌की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं। अतएव ब्रह्म तथा जगत्‌में कारण-कार्यभाव नहीं है, ब्रह्म ही जगद्रूपमें भासित हो रहा है। उस चिदाकाशमे ही चिदाकाशसे यह सब खेल हो रहे हैं। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं।

याद रक्खो—जब एक ब्रह्मके अतिरिक्त कोई सत्ता ही नहीं रह जाती, तब भिन्न अहङ्कार कहाँ रहेगा और अहङ्कारका अभाव होते ही राग-द्वेष, ममता-मोह, मेरा-तेरा आदि सब मिथ्या विकार मिट जाते हैं जैसे स्वप्नसे जागते ही स्वप्नका सारा संसार सर्वथा मिट जाता है। फिर जगत्‌में रहता हुआ भी इस ज्ञानको प्राप्त जीवन्मुक्त पुरुष नित्य निरन्तर ब्रह्ममें ही स्थित रहता है। वह जगत्के आदि, मध्य, अन्त सभी अवस्थाओंमें समचित्त रहता है; क्योंकि तब उसका चित्त ही नहीं रह जाता। अतएव वह न तो प्राप्त हुई प्रिय कहलाने-वाली वस्तुका अभिनन्दन करता है, न अप्रियसे द्वेष करता है, न नष्ट हुई प्रिय वस्तुके लिये शोक करता है और न अप्राप्त वस्तुकी इच्छा ही करता है।

याद रक्खो—ऐसा परमतत्त्वको प्राप्त—परमात्मामे अभिन्नभावसे स्थित पुरुष जगत्‌की क्षणभंगुर अवस्थाको अपनी प्रशान्त ब्राह्मी स्थितिके अंदर हँसता हुआ देखता है। उसके लिये न कुछ पाना शेष रह जाता है, न कुछ करना रह जाता है। वह सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मस्वरूप ही बन जाता है यही योगवासिष्ठकी शिक्षा है।

'शिव'

**५—एकश्लोकी योगवासिष्ठ** (तत्त्वचिन्तक स्वामीजी श्रीअनिरुद्धाचार्यजी वेंकटाचार्यजी महाराज)

४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *


एकश्लोकी योगवासिष्ठ

( लेखक—तत्त्वचिन्तक स्वामीजी श्रीमनिरुद्धाचार्यजी वेंकटाचार्यजी महाराज )

एक बार भगवान् रामने महर्षि वसिष्ठसे पूछा कि सार्थक एवं सफल जीवनवाले मानवकी पहचान क्या है ? इसके उत्तरमें रघुकुलगुरु ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठने जो अल्पाक्षरा किंतु अर्थबहुला, एकश्लोकी वाणी, जिसमें 'बीजे वृक्षमिव' सारा 'योगवासिष्ठ' भरा हुआ है, समुच्चारित की थी, वह सचमुच गागरमें सागरकी तरह योगवासिष्ठका समग्र उपादेय तत्त्व निचोड़कर एक श्लोकमे भर देती है। महर्षि-प्रवरकी अर्थ-भारवती वह वाणी इस प्रकार है—

तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः।
स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥

<div align="right">( योगवासिष्ठ )</div>

महर्षि वसिष्ठका अनुभूत कथन है कि जीवनतत्त्व, ( प्राणशक्ति ) जिसे 'वैशेषिकदर्शन' ने 'सञ्चाकर्म त्वसद्-विशिष्टाना लिङ्गम' इस सूत्रद्वारा 'अध्यात्म वायु' और सांख्यने 'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च' कहकर 'अन्तः-करण-क्रिया' की संज्ञा दी है, मानव, पशु-पक्षी आदि सबमें साधारणतया समान है। किंतु मनुष्यको मृगादि पशु-पक्षियोंसे विभक्तकर उच्चश्रेणीमें समासीन करनेवाली मनन-शक्ति ही है, जिसके विकसित होनेपर ही प्राणी 'मानव' कहला सकता है। महर्षि यास्कने भी निरुक्तमें 'मत्वा कर्माणि सीव्यन्ति इति मनुष्यः' कहकर वासिष्ठी उक्तिका समर्थन किया है।

वेदके मतमें जीवनका अर्थ है—प्राण। यह प्राणिमात्रमे सामान्य है। केवल इसीका विकास जबतक मानवमें है, तबतक मानव जन्तु ही है । संस्कृत भाषाने 'मानव और माणव' के भेदको व्यक्त करते हुए कहा है कि केवल प्राण-शक्तिका विकास-स्थल 'माणव' ( जन्तु-विशेष ) और प्राणशक्ति तथा मनन-शक्ति दोनोंका विकासकेन्द्र मानव है । मानवको द्विपादी जन्तुविशेषकी हीन कक्षासे निकालकर मानवताकी उच्चश्रेणीमें पहुँचानेवाली तो मननशक्ति ही है। वेदने भी मननशक्तिको ही 'मानवता' माना है। अतः 'योगवासिष्ठ' के मतसे मानवता-पालनपूर्वक जीवन-यापन करनेवाला ही मानव है। इसी विशिष्ट उपदेशको आत्मसात् करानेके उच्च उद्देश्यसे समग्र 'योगवासिष्ठ' प्रवृत्त हुआ है। प्रस्तुत विशिष्ट उपदेशको विश्वहितके लिये प्रसारित करनेके कारण ही ग्रन्थका नाम 'वासिष्ठ' रखा गया है। वैदिक भाषामें विशिष्टका बोधक वसिष्ठ शब्द है।


वासिष्ठ-बोध-सार

जग कहते हो जिसे जगमग् ब्रह्म ही है,
जन्मक़ा जगत्के न कारण है क्रम है ।
चित्से अचित्के विकासकी हो आस किसे,
होता कहीं प्रकट प्रकाशसे भी तम है ?
कैसे बना, किसने बनाया, किससे है बना—
यह सब जाननेका व्यर्थ सभी भ्रम है ।
मिथ्या कल्पनाका एक नूतन निकेतन है,
चेतन आकाशमें अचेतनका भ्रम है ॥

<div align="right">—पाण्डेय रामनारायणदत्त शास्त्री 'राम'</div>

**७—योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता**<br>(पण्डित श्रीजानकीनाथजी शर्मा)

* योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता *


योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता

(लेखक—पं० श्रीजानकीनाथजी शर्मा)

योगवासिष्ठके अध्येता तथा मननकर्ताओंसे यह बात छिपी नहीं है कि यह ग्रन्थ भारत ही नहीं, विश्वसाहित्यमे ज्ञानात्मक, सूक्ष्मविचार-तत्त्वनिरूपक तथा श्रेष्ठ सदुक्तिपूर्ण ग्रन्थोंमें सर्व-श्रेष्ठ है। यह महारामायण, वासिष्ठरामायण आदि नामोंसे भी विख्यात है। स्वयं भगवान् वसिष्ठने ही कहा है कि 'संसार-सर्पके विषसे विकल तथा विषयविषूचिकासे पीड़ित मृतप्राय प्राणियोंके लिये योगवासिष्ठ परम पवित्र अमोघ गारुड़-मन्त्र है। इसे सुन लेनेपर जीवन्मुक्ति सुखका अनुभव होता है।'* स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे कि 'योगवासिष्ठ मेरे लिये सर्वाधिक आश्चर्य एवं चमत्कारपूर्ण ग्रन्थ है।'† डा० भगवानदासने 'मिस्टिक एक्सपेरियन्सेज' पुस्तककी प्रस्तावनामें लिखा है 'योगवासिष्ठ सिद्धावस्थाका ग्रन्थ है। इसके विचार, दर्शन, रहस्य, निरूपण-प्रणाली, भाषा, अलंकार—सब एक-से-एक आश्चर्यकर हैं।' लाला बैजनाथजीने इसके हिंदी-भाषान्तरकी भूमिकामें लिखा था कि 'वेदान्त-ग्रन्थोंमें योगवासिष्ठकी कोटिका कोई भी ग्रन्थ नहीं है' (भाग २ की भूमिका)। पिछले दिनों स्वामी भूमानन्दजी (जगद्गुरु आश्रम चटगाँव, बंगाल) डा० भीखनलालजी आत्रेय, श्रीक्षितीशचन्द्रजी चक्रवर्ती आदि महान् विद्वानोंने इसकी बड़ी प्रशंसा की तथा इसपर पर्याप्त मनन-अनुसंधान कर स्वतन्त्र पुस्तकें लिखी हैं।

तथापि आजके जगत्‌में कुछ ऐसे मतवादी भी हैं, जिनकी योगवासिष्ठके विरुद्ध स्वाभाविक उपेक्षा है। वे लोग कहते हैं कि योगवासिष्ठ १७ वीं शतीकी रचना है। कई लोगोंका मत है कि यह स्वामी विद्यारण्यजीकी कृति है। कुछ भावुक वैष्णवों-का कथन है कि इसमें श्रीरामचन्द्रको शोकविकल दिखलाया गया है; शिष्यरूपमें दिखलाया गया है; इसमें भक्तिकी महिमा नहीं है अतः सर्वथा उपेक्षणीय है। जे० एन० फक्यूहरका मत था कि 'योगवासिष्ठ ईसाकी १३वीं तथा १४वीं शतीके बीचमें लिखा गया था।'१ (Religious Lectures of India pp 228) प्रोफ़ेसर शिवप्रसाद भट्टाचार्यका मत है कि यह १० से १२ वीं शतीके मध्यकी कृति है (The Proceedings of the Madras Oriental Conference P 545)। जर्मन विद्वान् डा० विंटरनिट्जके मतानुसार 'यह शंकराचार्यके अनुयायियोंकी कृति है और ७से ८ शतीतक्की रचना है।‡।' डा० भीखनलाल आत्रेय इसे ईसाकी ६ ठी शतीकी रचना मानते हैं। उनका कथन है कि भर्तृहरिके वाक्यपदीयमें तथा योगवासिष्ठमें कुछ समान पद हैं। इनमें योगवासिष्ठ ही पुराना हो सकता है। अतः योगवासिष्ठ कालिदासके बाद और भर्तृहरिके पहलेकी रचना है; इसलिये लगभग ६ ठी शतीमें ही इसको रखना युक्तिसंगत होगा।§

शङ्काओंका समुचित समाधान

वस्तुतः ये सब शङ्काएँ आलस्य (योगवासिष्ठको तथा अन्य ग्रन्थोंको देखनेका कष्ट न करने) प्रमाद, मानसिक मतभेद तथा पाश्चात्यके प्रभावके कारण ही हैं। ये सब कथन एक प्रकारसे अयुक्तिपूर्णमात्र भी हैं। जो लोग कहते हैं कि योग-वासिष्ठ १७वीं शतीकी रचना है, उन्हें देखना चाहिये कि १७वीं शतीके आस-पासकी आनन्दबोधेन्द्र सरस्वतीकी वासिष्ठरामायण-तात्पर्य-प्रकाश नामकी टीका है१। इसीके आसपासकी अन्र्तयारण्य, आत्मसुख, आनन्दवर्धन, गङ्गाधरेन्द्र, माधव-सरस्वती तथा सदानन्द यतिकी टीकाएँ हैं। १६ वीं शतीके आचार्य श्रीमद्मधुसूदन सरस्वतीने अपने ग्रन्थ सिद्धान्तबिन्दु, अद्वैतरत्न-


*(क) दुःसहा राम संसारविषविषद्विषूचिका।
योगगारुडमन्त्रेण पावनेन प्रशाम्यति ॥ (२।१२।१०)
(ख) जीवन्मुक्तत्वसंसिद्धिस्तु श्रुते समनुभूयते ।
स्वयमेव यथा पीते नीरोगत्व वरौषधे ॥ (३।८।२५)

† One of the greatest books and the most wonderful according to me ever written under the sun is 'Yoga Vasistha'
(In the Woods of God-Realization, Delhi edition, Vol. 111, p 295)

‡ As Shankara does not mention the work, it is probably written by one of his contemporaries. (Geschichte der Indischen Literature-Vol. III, pp 44)

§ Hence we may place it after Kalidas and before Bhartrihari, is somewhere in the 6 th century A D. (Vasistha Darshanam, the Probable Date of Composition of Yoga Vasistha, p 18)

१. ऋतुरससुरगमही(१७६६)शकविकारियुगवत्सरस्य शिशिरर्तौ,
(तात्पर्यप्रकाशोपसंहार)

२. यह टीका १४ वीं शतीकी होनी चाहिये; क्योंकि इनकी 'रामार्चनचन्द्रिका'का उल्लेख 'निर्णयसिन्धु'आदिमें बार-बार हुआ है।

६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *


रक्षण, वेदान्तकल्पलतिका, संक्षेपशारीरक-व्याख्या तथा गीताकी 'गूढार्थदीपिका' व्याख्यामें—प्रायः सर्वत्र योगवासिष्ठके हजारों वचन उद्धृत किये हैं। केवल गीताके ६।३२ तथा ३६ वें श्लोकोंकी व्याख्यामें ही इन्होंने योगवासिष्ठके पच्चासों श्लोकोंको उद्धृत किया है। इनसे भी पूर्व चौदहवीं शताब्दी-के सर्वोपरि विद्वान् वेदान्ताचार्य श्रीविद्यारण्य स्वामीने अपने 'जीवन्मुक्ति-विवेक' तथा 'पञ्चदशी' ग्रन्थोंमें योगवासिष्ठके श्लोकों-को बड़े आदरसे बार-बार उद्धृत किया है³। इनके गुरु श्रीशंकरानन्द भी 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' (गीता १३।४) की व्याख्यामें लिखते हैं—'वासिष्ठविष्णुपुराणादिषु ऋषिभिर्वसिष्ठ-पराशरादिभिर्बहुप्रकारं प्रतिपादितम्'। यहाँ वसिष्ठनिर्मित

३. (क) अत एवाह वसिष्ठः—'द्वौ क्रमौ चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं च राघव।' (६।२३। पर मधुसूदनी)
(ख) वासिष्ठरामायणादिषु तदेव तत्त्वज्ञानं मनोनाशो वासना-क्षयश्चेति त्रयमभ्यसनीयम्। तदुक्तं वासिष्ठे—
तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्।
एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यास विदुर्बुधाः ॥
(गीता ६।३२ पर मधुसूदन)

४. परास्य शक्तिर्विविधा क्रियाज्ञानफलात्मिका।
(क) इति वेदवचः प्राह वसिष्ठश्च तथाम्रवीत्।
सर्वशक्तिपरं ब्रह्म नित्यमापूर्णमद्वयम् ॥
ययोल्लसति शक्त्यासौ प्रकाशमधिगच्छति।
चिच्छक्तिर्ब्रह्मणो राम शरीरेषूपलभ्यते ॥
स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्।
यन्मनाङ् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥
इत्यादि (पञ्चदशी १३।१४ से २८ वें श्लोकतक सब योगवासिष्ठके ही श्लोक हैं)
'वसिष्ठश्च तथाब्रवीत्' की व्याख्यामें रामकृष्णपण्डित लिखते हैं—'वासिष्ठाभिधे ग्रन्थे।'
(ख) वसिष्ठः—'अतएव हि राम त्वं श्रेय प्राप्नोषि शाश्वतम्।
स्वप्रयत्नोपनीतेन पौरुषेणैव नान्यथा ॥
(जीवन्मुक्तिविवेक पृष्ठ ३५)
यह श्लोक योगवासिष्ठ, मुमुक्षु-व्यवहारप्रकरणका है।
सच्ची बात तो यह है कि 'जीवन्मुक्तिविवेक' यागवासिष्ठपर ही आधारित है। इसमें योगवासिष्ठको वाल्मीकिलिखित भी बतलाया है—'वासनाभेदो वाल्मीकिना दर्शितः वासिष्ठे—वासना द्विविधा प्रोक्ता शुद्धा च मलिना तथा' इत्यादि' ये सब योगवासिष्ठके ही श्लोक हैं। इसमें प्रायः आधे ग्रन्थमें योगवासिष्ठके श्लोक ही हैं।

५. नमः श्रीशंकरानन्दगुरुपादाम्बुजन्मने। (पञ्चदशी १।१)


'योगवासिष्ठ' का सुस्पष्ट उल्लेख है। इनसे भी बहुत पहलेके १२ वीं शतीके विद्वान् श्रीश्रीधर स्वामीने अपनी सुबोधिनी नामक गीता-व्याख्यामें योगवासिष्ठके श्लोकोंको कई बार उद्धृत किया है⁶। इससे भी पूर्व गौड़ अभिनन्द नामक काश्मीरी विद्वान्ने जिसका समय ९वीं शतीका मध्यकाल माना जाता है, 'योगवासिष्ठसार' नामका ग्रन्थ लिखा था। इसमें उसने प्रायः ६ सहस्र श्लोकोंमें ही द्वात्रिंशत्सहस्रात्मक (३२००० वाले) योगवासिष्ठ ग्रन्थके सारभूत श्लोकोंका संग्रह किया है। इससे सिद्ध है कि योगवासिष्ठ इससे भी बहुत पहलेका ग्रन्थ है।

श्रीशंकराचार्य और योगवासिष्ठ

जो लोग कहते हैं कि शंकराचार्यके अनुयायियोंमेंसे ही किसी एकने 'योगवासिष्ठ' बना दिया, वह भी केवल उनका अविचारित निर्णय मात्र है। जिस प्रकार शंकरानन्द, नीलकण्ठ, श्रीधरस्वामी, मधुसूदन सरस्वती आदिने गीताके १३।४ श्लोकके 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' की व्याख्यामें 'वसिष्ठादिभिः प्रतिपादितम्' लिखा है, उसी प्रकार शंकराचार्य भी लिखते हैं—ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्। मधुसूदन सरस्वती तथा भाष्योत्कर्षदीपिकाकारने इन्हीं शब्दोंकी व्याख्या करते हुए लिखा है—'वसिष्ठाभिधे योगशास्त्रे'

इतना ही नहीं, 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' (१।८) के भाष्यमें वे सुस्पष्ट शब्दोंमें लिखते हैं—

तथा च वासिष्ठे योगशास्त्रे प्रश्नपूर्वकं दर्शितम्—
यथाऽऽत्मा निर्गुणः शुद्धः सदानन्दोऽजरोऽमरः ॥
संसृतिः कस्य तात स्यान्मोक्षो वा विद्यया विभो।

और लगातार दो श्लोकोंमें प्रश्न करके पुनः 'वसिष्ठः' लिखकर 'तस्यैव नित्यशुद्धस्य सदानन्दमयात्मनः' आदि योगवासिष्ठके दो श्लोकोंको उत्तररूपमे लिखते हैं। इसी प्रकार वे 'सनत्सुजातीयभाष्य' (१।१५) में भी लिखते हैं—तथा चाह भगवान् वसिष्ठः –

६. (क) तदुक्तं वसिष्ठेन—
प्राणे गते यथा देह सुखदुःखे न विन्दति।
तथा चेत् प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥
(५।२३ गीता-व्याख्या)
(ख) वसिष्ठेन चोक्तम्—'न कर्माण्ये त्यजेद् योगी कर्म-भिस्त्यज्यते ह्यसौ।' (गीता १८।२ की व्याख्या)
(ग) ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्योगशास्त्रेषु निरूपितम्'
(गीता १३।४ की व्याख्या)