संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
( १७ )
| **९१—**निर्वाण अथवा परमपदका स्वरूप, ब्रह्ममें जगत्-की सत्ताका खण्डन, चिदाकाशके ही जगद्रूपसे स्फुरित होनेका कथन, ब्रह्मके उन्मेष और निमेष ही सृष्टि और प्रलय हैं, मन जिसमें रस लेता है वैसा ही बनता है, चिदाकाश अपनेको ही दृश्य-रूपसे देखता है तथा अज्ञानसे ही परमात्मामें जगत्की स्थिति प्रतीत होती है—इसका प्रतिपादन ... ६६१ | **१०३—**कर्मोंके त्याग और ग्रहणसे कोई प्रयोजन न रखते हुए भी जीवन्मुक्त पुरुषोंकी स्वभावतः सत्कर्मोंमें ही प्रवृत्तिका प्रतिपादन ... ६८० |
| **९२—**सृष्टिकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... ६६२ | **१०४—**सिद्धों और सभासदोंद्वारा श्रीवसिष्ठजीको साधु-वाद, देव-दुन्दुभियोंका नाद, दिव्य पुष्पोंकी वर्षा, गुरु-पूजन-महोत्सव, श्रीदशरथजी और श्रीरामजीके द्वारा गुरुदेवका सत्कार, सभ्यों और सिद्धोंद्वारा पुनः श्रीवसिष्ठजीकी स्तुति • ६८२ |
| **९३—**श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसङ्ग उपस्थित करना और वसिष्ठजीके पूछनेपर कुन्ददन्तका अपने संशयकी निवृत्ति तथा तत्त्व-ज्ञानकी प्राप्तिको स्वीकार करते हुए अपना अनुभव बताना ... ६६३ | **१०५—**गुरुके पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीका पुनः अपनी परमानन्दमयी स्थितिको बताना तथा वसिष्ठजी-का उन्हें कृतकृत्य बताकर विश्वामित्रजीकी आज्ञा एव भूमण्डलके पालनके लिये कहना, श्रीरामद्वारा अपनी कृतार्थताका प्रकाशन ... ६८५ |
| **९४—**सब कुछ ब्रह्म है, जगत् वस्तुतः असत् है, वह ब्रह्मका संकल्प होनेसे उससे भिन्न नहीं है, जीवात्माको अज्ञानके कारण ही जगत्की प्रतीति होती है—इसका प्रतिपादन ... ६६५ | **१०६—**मध्याह्नकालमें राजासे सम्मानित हो सबका आवश्यक कृत्यके लिये उठ जाना और दूसरे दिन प्रातःकाल सबके सभामें आनेपर श्रीरामका गुरुके समक्ष अपनी कृतकृत्यता प्रकट करना • ६८६ |
| **९५—**श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर ... ६६६ | **१०७—**श्रीवसिष्ठ और श्रीरामका संवाद, दृश्यका परि-मार्जन, सबकी चिदाकाशरूपताका प्रतिपादन, श्रीरामका प्रश्न और उसके उत्तरमें श्रीवसिष्ठ-द्वारा प्रश्रितिके उपाख्यानका आरम्भ ... ६८८ |
| **९६—**अज्ञानसे ब्रह्मका ही जगत्रूपसे भान होता है वास्तवमें जगत्का अत्यन्ताभाव है और एकमात्र ब्रह्म ही विराजमान है, इस तत्त्वका प्रतिपादन ६७२ | **१०८—**यह जगत् ब्रह्मका संकल्प होनेसे ब्रह्म ही है, इसका विवेचन ... ६८९ |
| **९७—**श्रीरामचन्द्रजीके मुखसे ज्ञानी महात्माकी स्थिति-का एवं अपने परब्रह्मस्वरूपका वर्णन ... ६७२ | **१०९—**राजा प्रश्रितिके प्रश्नोंपर श्रीवसिष्ठजीका विचार एव निर्णय ... ६९१ |
| **९८—**श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बोधके पश्चात् होनेवाली शान्त एवं संकल्पशून्य स्थितिका वर्णन ... ६७३ | **११०—**सिद्ध आदिके लोकोंकी संकल्परूपता बताते हुए इस जगत्को भी वैसा ही बताना और ब्रह्ममें अहम्भावका स्फुरण ही हिरण्यगर्भ है, उसका संकल्प होनेके कारण त्रिलोकी भी ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन ... ६९२ |
| **९९—**श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा जगत्की असत्ता एवं 'सर्वं ब्रह्म' के सिद्धान्तका प्रतिपादन ... ६७४ | **१११—**सभासदोंका कृतार्थता-प्रकाशन तथा वसिष्ठजीकी आज्ञासे महाराज दशरथका ब्राह्मणोंको भोजन कराना और सात दिनोंतक दान-मानसे सम्पन्न उत्सव मनाना ... ६९४ |
| **१००—**श्रीरामचन्द्रजीके प्रश्नके अनुसार उत्तम बोधकी प्राप्तिमें शास्त्र आदि कैसे कारण बनते हैं, यह बतानेके लिये श्रीवसिष्ठजीका उन्हें कीरको-पाख्यान सुनाना—लकड़ीके लिये किये गये उद्योगसे कीरकोंका सुखी होना ... ६७६ | **११२—**श्रीवाल्मीकि-भरद्वाज-संवादका उपसंहार, इस ग्रन्थकी महिमा तथा श्रोताके लिये दान, मान आदिका उपदेश ... ६९६ |
| **१०१—**कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र एवं गुरुपदेश आदिको कारण बताना ... ... ६७७ | |
| **१०२—**श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा ... ६७८ |
ग—
( १८ )
| ११३—अरिष्टनेमि, सुरुचि, कारुण्य तथा सुतीक्ष्णकी कृतकृत्यताका प्रकाशन, शिष्योंका गुरुजनोंके प्रति आत्मनिवेदन तथा ब्रह्मको एव ब्रह्मभूत वसिष्ठजीको नमस्कार ... ६९७ | १३—क्षमा प्रार्थना और नम्र निवेदन (हनुमानप्रसाद पोद्दार, चिम्मनलाल गोस्वामी) ... ६९९<br><br>१४—जीवन्मुक्तका स्वरूप और आचार (कविता) ... ७०० |
चित्र-सूची
| सादे | |
|---|---|
| १—तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरामचन्द्रजीका स्वागत (प्रसंग वैराग्य-प्रकरण सर्ग ४) ... ४८ | ६—राजा दशरथसे श्रीरामद्वारा तीर्थयात्राके लिये आज्ञा माँगना ... २४ |
| २—सुरुचि और देवदूत (प्रसंग वैराग्य-प्रकरण सर्ग १) ... ११२ | ७—तीर्थयात्रासे लौटे हुए श्रीरामका राजसभामें आना ... २५ |
| ३—राजा सिन्धुका राज्याभिषेक (प्रसंग उत्पत्ति-प्रकरण सर्ग ५१) ... १७६ | ८—श्रीरामकी खिन्नताके सम्बन्धमें राजा दशरथका श्रीवसिष्ठसे प्रश्न ... २६ |
| ४—दोनों लीलाओंके साथ राजा पद्मका राज्याभिषेक (प्रसंग उत्पत्ति-प्रकरण सर्ग ५९) ... २८० | ९—मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रका राजा दशरथद्वारा ड्योढ़ीपर स्वागत ... २७ |
| ५—जनकका तमालकी झाड़ीमें छिपे सिद्धोंके गीत-श्रवण (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ८) ... ३३६ | १०—विश्वामित्रका रोष ... ३० |
| ६—क्षीरसागरमें शेषशय्यापर विराजित भगवान्का जगत्की स्थितिको देखना (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ३८) ... ४१६ | ११—विश्वामित्रको वसिष्ठका समझाना ... ३१ |
| ७—भगवान्के द्वारा प्रह्लादका अभिषेक (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ४१) ... ४८० | १२—श्रीरामके सेवकका राजसभामें आना ... ३२ |
| ८—शेषनागपर भगवान् विष्णु, स्वर्गमें इन्द्र और पातालमें प्रह्लाद (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ४२) ५४८ | १३—श्रीरामका पिता दशरथके चरणमें प्रणाम करना ... ३४ |
| ९—राजा बलि और शुक्राचार्य (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ४५-४६) ... ६१२ | १४—श्रीरामका अपने भाइयोंसहित पृथ्वीपर आसन ग्रहण करना ... ३४ |
| १०—गन्धर्वों और विद्याधरियोंके द्वारा भोगोंका प्रलोभन देनेपर भी उद्दालकका उनकी ओर ध्यान न देना (प्रसंग उपशम-प्रकरण सर्ग ५४) ६८२ | १५—शरीरकी बाल्य, युवा और वृद्धावस्था ... ५६ |
| १६—विश्वामित्रका श्रीरामको तत्त्वज्ञान-सम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका वृत्तान्त उपस्थित करना ... ६५ | |
| रेखा-चित्र | १७—मेरुगिरिपर एकान्तमें बैठे शुकदेवको आत्मज्ञानी व्यासद्वारा उपदेश ... ६६ |
| १—वसिष्ठजीके द्वारा ज्ञानोपदेश ... १ | १८—राजा जनकके अन्तःपुरमें शुकदेवका युवतियोंके द्वारा सत्कार ... ६६ |
| २—अगस्तिद्वारा सुतीक्ष्ण ब्राह्मणसे मोक्षके कारणका प्रतिपादन ... १७ | १९—विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश देनेका अनुरोध ... ६८ |
| ३—अग्निवेश्यका अपने उदास पुत्र कारुण्यको समझाना ... १८ | २०—अपने पिता ब्रह्माजीसे उत्पन्न होते ही वसिष्ठजीका अभिशप्त होना ... ७८ |
| ४—वाल्मीकिके आश्रमपर देवदूतके साथ राजा अरिष्टनेमिका आना और उनसे संसार-बन्धनके दुःखकी पीड़ासे छूटनेका उपाय पूछना ... २० | २१—ब्रह्माजीकी सनकादिको और नारदको भारतवर्षमें जाकर वहाँके निवासियोंका उद्धार करनेकी प्रेरणा ... ७९ |
| ५—मेरुपर्वतपर भरद्वाजकी लोक-पितामह ब्रह्मासे वर-याचना ... २१ | २२—वसिष्ठजीके द्वारा राजा पद्म और उनकी |
( १९ )
| पत्नी लीलाका उपाख्यान-कथन ... ११५ | लीलाका सरस्वतीके साथ आक्रमणकारी राजा-द्वारा उपस्थित किया गया संग्राम-दृश्य देखना १३८ |
| २३-रानी लीलाद्वारा विद्वान्, ज्ञानी और तपस्वी ब्राह्मणोंकी पूजाके पश्चात् उनसे अमरत्व-प्राप्तिका साधन पूछा जाना ... ११६ | ४०-लीला और सरस्वतीका आकाशमें विमानपर स्थित होकर युद्धका अवलोकन करना ... १३९ |
| २४-लीलाद्वारा सरस्वती देवीकी आराधना ... ११७ | ४१-युद्धका बंद होना ... ... १४४ |
| २५-अन्तःपुरमें मृतपतिके शवके सम्मुख वियोग-विह्वल रानी लीला .. .. ११८ | ४२-राजा विदूरथके शयनागारमें गवाक्षरन्ध्रसे लीला और सरस्वतीका प्रवेश ... ... १४४ |
| २६-सरस्वतीका आकाशवाणीके रूपमें पतिके शवको फूलसे ढकनेका लीलाको आदेश देना ११८ | ४३-राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश और राजाद्वारा उनका पूजन ... १४६ |
| २७-आधी रातके समय लीलाके आवाहनपर सरस्वतीका प्रकट होकर उसे दर्शन देना ... ११९ | ४४-राजा पद्मका सरस्वतीसे अपने जीवनके अनेक वृत्तान्तोंके स्मरणका कारण पूछना ... १४७ |
| २८-निर्विकल्प समाधिद्वारा रानी लीलाका राज प्रासादके आकाशमें सिंहासनारूढ़ राजा पद्मका देखा जाना ... ... ११९ | ४५-राजा विदूरथद्वारा युद्धकी प्रलयाग्निमें भग्न नगरमें ग्रस्त प्राणियोंका करुणक्रन्दन श्रवण ... १५१ |
| २९-आकाशस्वरूपा लीलाद्वारा समाधि-अवस्थामें आकाशरूपिणी राजसभामें पतिके वासनामय स्वरूप और राजवैभवका दर्शन ... १२० | ४६-लीला और सरस्वतीसे आदेश लेकर राजा विदूरथका युद्धके लिये प्रस्थान ... १५१ |
| ३०-लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना और सरस्वतीद्वारा एक ब्राह्मण-दम्पतिके जीवन-वृत्तान्तका निरूपण ... १२१ | ४७-द्वितीय लीलाकी सरस्वती देवीसे वर याचना .. १५३ |
| ३१-वसिष्ठनाम-धारी ब्राह्मणका पर्वतशिखरपर बैठकर एक राजाको सपरिवार शिकार खेलनेकी इच्छासे जाते देखकर विचारमग्न होना .. ... १२३ | ४८-युद्धस्थलमें पराजित राजा विदूरथके गलेपर राजा सिन्धुका अस्त्रप्रहार और विदूरथका रथसहित राजप्रासादमें प्रवेश ... ... १५८ |
| ३२-वसिष्ठ नामधारी ब्राह्मणकी पत्नी अरुन्धती-की सरस्वती-आराधना और पतिके अमरत्व-सम्बन्धी वरकी प्राप्ति ... ... १२३ | ४९-लीलाका अपने वासनामय शरीरसे पति पद्मसे मिलनेके लिये आकाशमार्गसे ऊपर जाना और मार्गमें सरस्वतीद्वारा प्रेषित अपनी कन्यासे मिलना ... ... १६१ |
| ३३-वसिष्ठनामधारी ब्राह्मणकी त्रिलोकविजयी नरेश-पदकी प्राप्ति ... ... १२४ | ५०-लीलाका अपने मृतपति पद्मका मुख देखना और अपनी प्रतिमाके प्रभावसे इस सत्यको समझना कि संग्राममें राजा सिन्धुद्वारा मारे गये ये मेरे पति ही हैं ... ... १६२ |
| ३४-रानी लीला और सरस्वतीका संवाद ... १२४ | ५१-संकल्परूपिणी देवियाँ लीला और सरस्वतीका जीवात्माके साथ राजा पद्मके नगरमें प्रवेश ... १६८ |
| ३५-सत्यकाम और सत्यसंकल्पसे युक्त लीला और सरस्वती देवीका ज्येष्ठशर्मा आदिको साधारण स्त्रीके रूपमें दर्शन ... ... १३२ | ५२-लीला और सरस्वतीद्वारा शवमण्डपमें राजा विदूरथकी शवशय्याके पार्श्वभागमें स्थित लीलाका देखा जाना जो पहले मृत्युको प्राप्त हो चुकी थी और पहले ही वहाँ आ गयी थी .. १६९ |
| ३६-लीला और सरस्वतीका आकाशमें भ्रमण ... १३३ | ५३-राजा पद्मकी सरस्वतीसे अभीष्ट वरकी प्राप्ति ... १७३ |
| ३७-लीलाका सरस्वतीसे अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तका निरूपण ... ... १३४ | ५४-वाल्मीकि और भरद्वाज ... ... २४९ |
| ३८-लीलाका गृहमण्डपमें प्रवेश कर सरस्वतीके साथ आकाशमें उड़ जाना .. ... १३५ | ५५-राजा दशरथका मुनिसमुदायका सत्कारकर उनसे विदा लेना ... ... २५० |
| ३९-जम्बूद्वीपमें भारतवर्षमें अपने पतिके राज्यमें |
| ( १० ) | |
|---|---|
| ५६—वसिष्ठजीद्वारा पञ्चमहायज्ञ-अनुष्ठानका सम्पादन २५० | ७४—शुक्राचार्यद्वारा बलिके समाधि-अवस्थासे न उठनेतककी अवधिमें कार्य करनेका दानवोंको आदेश ... ... ... २८० |
| ५७—श्रीराम, राजा दशरथ तथा वसिष्ठ आदिके द्वारा ब्राह्मणोंको गौ, भूमि, तिल, सुवर्ण, शय्या, आसन, वस्त्र और बर्तन आदिका दान ... २५१ | ७५—मनुष्य, नागराज, ग्रह, देववृन्द, पर्वत और दिक्पाल तथा वन-जीवोंका यथास्थान गमन ... २८० |
| ५८—श्रीरामद्वारा विष्णु, शंकर, अग्नि और सूर्य आदि देवताओंका पूजन ... ... २५१ | ७६—समाधिसे जगनेपर दैत्यराज बलिका अश्वमेध-अनुष्ठान ... ... २८१ |
| ५९—वसिष्ठजीको उनके निवासस्थानपर अपना कन्धा झुकाकर श्रीरामका प्रणाम करना ... २५१ | ७७—श्रीहरिद्वारा पैरोंसे त्रिलोकको नापना और बलिको वैभव-भोगसे वञ्चित करना ... २८२ |
| ६०—विश्वामित्र तथा अन्य मुनियोंके साथ रथपर आरूढ होकर वसिष्ठजीका राजा दशरथकी सभामें प्रवेश ... ... २५२ | ७८—प्रह्लादद्वारा भगवान् विष्णुकी मानसिक एवं बाह्यपूजा ... ... २८५ |
| ६१—राजा जनकका अपने ऊँचे महलपर चढकर एकान्तमें स्थित होकर संसारकी नश्वरता और आत्माके विवेक-विज्ञानको सूचित करनेवाले अनेक आन्तरिक उद्गार और निश्चय प्रकट करना ... ... २५७ | ७९—इन्द्र आदि देवता और मरुद्गणोंका क्षीर-सागरमें शेषनागकी शय्यापर विराजमान भगवान् श्रीहरिके पास गमन ... २८६ |
| ६२—राजा जनकद्वारा संसारकी विचित्र स्थितिपर विचार ... ... ... २६० | ८०—प्रह्लादद्वारा पूजागृहमें प्रत्यक्ष विराजमान भगवान् श्रीहरिका स्तवन ... ... २८७ |
| ६३—राजा जनककी जीवन्मुक्तरूपसे स्थिति ... २६१ | ८१—प्रह्लादका आत्मचिन्तन ... ... २८९ |
| ६४—दीर्घतपा मुनिका अपनी स्त्री तथा दोनों पुत्र पुण्य और पावनके साथ अपने गङ्गातटीय आश्रममें निवास ... ... २६९ | ८२—पातालमें आत्मचिन्तनलीन प्रह्लादको समाधिसे जगानेका प्रयत्न ... ... २९३ |
| ६५—दीर्घतपाका शरीर-त्याग ... ... २६९ | ८३—उद्दालक मुनिका परमार्थ-चिन्तन ... ३०१ |
| ६६—माता-पिताका और्ध्वदेहिक कर्म समाप्तकर पुण्यका अपने शोकाकुल बन्धु पावनके पास आगमन ... २७० | ८४—उद्दालक मुनिका गन्धमादन पर्वतकी रमणीय गुहामें प्रविष्ट होकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित होनेका प्रयत्न ... ... ३०२ |
| ६७—पुण्यके समझानेपर पावनको उत्कृष्ट बोधकी प्राप्ति और दोनोंका वन-प्रदेशमें विचरण ... २७१ | ८५—महर्षि माण्डव्यका किरातराज सुरघुके महलमें पधारना ... ... ३११ |
| ६८—दैत्यराज बलि ... ... २७३ | ८६—सुरघुद्वारा परमपदकी प्राप्ति ... ... ३१४ |
| ६९—राजा बलिके अन्तःकरणमें वैराग्य एवं विचार-का उदय ... ... २७३ | ८७—किरातराज सुरघु और राजर्षि पर्णादका संवाद ३१५ |
| ७०—विरोचनका बलिको भोगोंसे वैराग्य तथा विचारपूर्वक परमात्मसाक्षात्कारके लिये उपदेश २७४ | ८८—पिताओंकी और्ध्वदेहिक क्रियाकी समाप्तिके पश्चात् भास और विलासका विलाप ... ३२१ |
| ७१—शुक्राचार्यका ग्रहसमुदायसे भरे आकाश-मार्गसे देवलोकके लिये प्रस्थान ... ... २७८ | ८९—वृद्धावस्थाको प्राप्त भास और विलासकी परस्पर भेंट ... ... ३२२ |
| ७२—दैत्यराज बलिका समाधिस्थ होना ... २७९ | ९०—वीतहव्य मुनिका एकाग्रताकी सिद्धिके लिये इन्द्रिय और मनको बोधित करना ... ३४५ |
| ७३—समाधिमें मग्न दैत्यराज बलिके दर्शनके लिये असुरों आदिका आगमन ... ... २७९ | ९१—वीतहव्य महामुनिकी समाधि ... ३४८ |
| ९२—महामुनि वीतहव्यकी ॐकारकी अन्तिम मात्राका अवलम्बनकर परमात्मप्राप्तिरूप मुक्ता-वस्थाका निरूपण ... ... ३५१ | |
| ९३—देवराजकी सभामें मुनिवर गातातपद्वारा |
( २१ )
| वायसराज भुशुण्डकी कथाका वृत्तान्त-वर्णन··· ३७६ | दिनोंतक खोज करनेवाले किरातको चिन्तामणिकी प्राप्ति ··· ४४९ |
| ९४-वसिष्ठजीका भुशुण्डके निवास-स्थान मेरुगिरिपर जाना ··· ३७७ | ११५-राजा शिखिध्वजकी बढ़ती वैराग्य-वृत्ति ··· ४५० |
| ९५-वसिष्ठजी और भुशुण्डका संवाद—कुल-आयु आदिके सम्बन्धमें ··· ३७८ | ११६-राजा शिखिध्वजका चूडालासे अपने वैराग्य-कथन ··· ४५१ |
| ९६-वसिष्ठजीके सम्मुख भुशुण्डद्वारा महादेवजीके रूप और मातृकाओंका वर्णन ··· ३७९ | ११७-राजा शिखिध्वजका गृह-त्याग·· ··· ४५२ |
| ९७-मातृकाओंके महोत्सवमें ब्राह्मी देवीके रथमें जुतनेवाली हंसियों और अम्बुजादेवीके वाहन चण्ड नामक कौएका नृत्य ··· ··· ३८० | ११८-चूडालाका आकाश-मार्गसे उड़कर अपने पतिका अन्वेषण ··· ४५४ |
| ९८-समाधिसे विरत होनेपर ब्राह्मीदेवीकी अपनी माता हंसियोंके साथ भुशुण्ड आदिद्वारा आराधना ··· ३८० | ११९-ब्राह्मणकुमारके रूपमें चूडालाका शिखिध्वजद्वारा पूजन-सत्कार ··· ··· ४५५ |
| ९९-वसिष्ठजीसे भुशुण्डका मेरुपर्वतपर कल्पवृक्षकी शाखामें स्थित अपने घोसलेका वर्णन करना··· ३८१ | १२०-राजा शिखिध्वजकी देवपुत्रके वेषमें चूडालासे बातचीत ··· ··· ४५७ |
| १००-भुशुण्डद्वारा वसिष्ठका पूजन और आकाश-मार्गसे गमन ··· ३९१ | १२१-कुम्भ ( चूडाला ) की बात सुनकर सर्वस्व-त्यागके लिये उद्यत शिखिध्वज ··· ४६५ |
| १०१-कैलास पर्वतपर गङ्गातटस्थ आश्रममें तप करते हुए वसिष्ठजीको पार्वतीजीसहित भगवान् महादेवजीका दर्शन ··· ··· ३९६ | १२२-कुम्भ ( चूडाला ) के अन्तर्हित हो जानेपर राजा शिखिध्वजका विचार ··· ··· ४७७ |
| १०२-वसिष्ठजीद्वारा भगवान् नीलकण्ठ शंकरको पुष्पाञ्जलि-समर्पण ··· ··· ४०९ | १२३-कुम्भके वेषमें चूडालाका वनस्थलीमें उतरकर निर्विकल्प समाधिमें स्थित राजा शिखिध्वजको देखना ··· ··· ४७८ |
| १०३-वेताल और राजाका संवाद ··· ४३१ | १२४-राजा शिखिध्वजद्वारा कुम्भको पुष्पाञ्जलि-समर्पण ··· ··· ४७९ |
| १०४-अपने गुरु त्रितलके साथ राजा भगीरथकी बातचीत ··· ४३४ | १२५-महेन्द्रपर्वतपर अग्निके साक्ष्यमें मदनिका ( चूडाला ) और शिखिध्वजका विवाह ··· ४८४ |
| १०५-राजा भगीरथका सर्वस्व-त्याग··· ··· ४३५ | १२६-चूडालाद्वारा शिखिध्वजकी परीक्षाके हेतु अपनी मायाके बलसे वनस्थलीमें देवगणों और अप्सराओंके साथ पधारे हुए इन्द्रको उन्हें दिखलाना और राजा शिखिध्वजद्वारा देवराजकी विधिवत् पूजा ··· ··· ४८५ |
| १०६-राजा भगीरथका अपने ही नगरमें भिक्षाटन··· ४३६ | १२७-चूडालाका मदनिका वेषमेंमे ही अपने असली रूपमें प्राकट्य और राजा शिखिध्वजका आश्चर्यचकित होना ··· ··· ४८७ |
| १०७-राजा भगीरथका अन्य देशमें विद्यमान उत्तम नगरमें राज्याभिषेक ··· ··· ४३६ | १२८-अपनी पत्नी चूडालाको देखकर राजा शिखिध्वजका प्रसन्न होना ··· ··· ४८८ |
| १०८-भूतलपर गङ्गाजीको लानेके लिये राजा भगीरथकी तपस्या ··· ··· ४३७ | १२९-चूडालासहित शिखिध्वजका अपने नगरमें प्रवेश और स्वागत ··· ··· ४९१ |
| १०९-राजा शिखिध्वज और चूडालाका विवाह ··· ४३८ | १३०-कचका अपने पिता वृहस्पतिसे जीवन्मुक्तिके विषयमें प्रश्न करना ··· ··· ४९३ |
| ११०-राजा शिखिध्वजद्वारा चूडालाके रूप-सौन्दर्य-की प्रशंसा ··· ··· ४४१ | १३१-वसिष्ठजीद्वारा मूढ़बुद्धि आत्मज्ञानशून्य |
| १११-चूडालाकी खिन्नता ··· ··· ४४२ | |
| ११२-चूडालाका एकान्तमें योगाभ्यास ··· ४४३ | |
| ११३-चूडालाकी योगसिद्धि ··· ··· ४४८ | |
| ११४-विन्ध्याचलके जगली प्रदेशमें एक कौड़ीकी तीन |
( २२ )
| चिरञ्जीव पुरुषके स्मरणके विषयमें भुशुण्डसे प्रश्न ... ५२० | और मङ्किका समागम तथा संवाद ... ५३३ |
| १३२-विद्याधरकी भुशुण्डसे पावनपदविषयक उपदेश देनेकी प्रार्थना ... ५२० | १३५-सुन्दरी स्त्रीद्वारा अपनी स्तुति सुनकर वसिष्ठजीका उस रमणीकी उपेक्षा करना ... ५७५ |
| १३३-भुशुण्डके उपदेशसे विद्याधरकी समाधि ... ५२७ | १३६-वसिष्ठजीके पूछनेपर विद्याधरीके द्वारा अपने जीवन-वृत्तान्तका वर्णन ... ५७९ |
| १३४-मरुभूमिके मार्गमें मिले हुए महर्षि वसिष्ठ |
'कल्याण' के पंद्रहवर्षीय ग्राहक भी बनाये जाते हैं
पंद्रहवर्षीय सदस्यता-शुल्क रु० ५००.०० (सजिल्द विशेषाङ्कका रु० ६००.००) है। इस योजनाके अन्तर्गत फर्म, प्रतिष्ठान आदि संस्थागत ग्राहक भी बन सकते हैं। भगवद्भावोंके प्रचार-प्रसारहेतु 'कल्याण'-प्रेमी सभी सज्जन स्वयं ग्राहक बनें एवं अपने इष्ट-मित्रोंको भी प्रोत्साहित कर अधिकाधिक संख्यामें ग्राहक बनाकर इस योजनासे लाभ उठायें।
—व्यवस्थापक-'कल्याण'
**२—भगवान् श्रीरामको नमस्कार**<br>(वसिष्ठ, नि० प्र० पू० २ । ६०)
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादा[य...]
कल्याण
यतः सर्वाणि भूतानि प्रतिभान्ति स्थितानि च । यत्रैवोपरमं यान्ति [...]
यत्तत्सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति च स्फुटम् । श्रुत्वा हृदीयते स[...]
वर्ष ३५ } गोरखपुर, सौर माघ २०१७, जनवरी १९६[...]
| महर्षि वसिष्ठजीको नमस्कार | भगवान् |
|---|---|
| ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं<br>द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।<br>एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं<br>भावातीतं त्रिगुणरहितं श्रीवसिष्ठं नताः स्म ॥<br>—सुतीक्ष्ण (नि० प्र० उ० २१६। २६) | आद्यन्तवर्जितवि[...] <br>सम्पीड्यि[...] <br>स्वस्थो [...] <br>लीलास्थि[...] |
**३—योगवासिष्ठमें भगवान् श्रीरामके स्वरूप तथा माहात्म्यका प्रतिपादन**
२ * अविच्छिन्नसच्चिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *
योगवासिष्ठमें भगवान् श्रीरामके स्वरूप तथा माहात्म्यका प्रतिपादन
महर्षि वसिष्ठकी प्रेरणासे दशरथके दरबारमें समस्त ऋषि-मुनियों-महानुभावोंको सम्बोधन करके महर्षि विश्वामित्र भगवान् श्रीरामके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—
अत्रैव कुरु विश्वासमयं स पुरुषः परः।
विश्वार्थमथिताम्भोधिर्गम्भीरागमगोचरः ॥
परिपूर्णपरानन्दः समः श्रीवत्सलाञ्छनः।
सर्वेषां प्राणिनां रामः प्रदाता सुप्रसादितः ॥
अयं निहन्ति कुपितः सृजत्ययमत्सत्स्कान्।
विश्वादिर्विश्वजनको धाता भर्ता महासखः ॥
(नि० प्र० पूर्वार्ध १२८ । ८१-८३)
सजनो ! आप सब लोग यह विश्वास कीजिये कि ये श्रीरामचन्द्रजी ही परम पुरुष परमात्मा हैं। इन्होंने ही विश्वहितके लिये विष्णुरूपसे क्षीरसागरका मन्थन किया था। गम्भीर रहस्यसे भरे उपनिषदादि शास्त्रोंके तत्त्वगोचर साक्षात् परब्रह्म ये ही हैं। परिपूर्ण परमानन्द, सम-स्वरूप, श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित भगवान् श्रीरामचन्द्र जब भलीभाँति प्रसन्न हो जाते हैं, तब अपनी कृपासे सम्पूर्ण प्राणियोंको मोक्ष प्रदान कर देते हैं। यही भगवान् श्रीरामचन्द्रजी कुपित होकर रुद्र-रूपसे जगत्का संहार करते हैं, यही ब्रह्मारूपसे इस विनाशी जगत्का सृजन करते हैं। यही विश्वके आदि, विश्वके उत्पादक, विश्वके धाता, पालनकर्ता और महान् सखा भी हैं।
अयं त्रयीमयो देवस्त्रैगुण्यगहनातिगः।
जयत्यङ्गैरयं षड्भिर्वेदात्मा पुरुषोऽद्भुतः ॥
अयं चतुर्बाहुदयं विश्वस्रष्टा चतुर्मुखः।
अयमेव महादेवः संहर्त्ता च त्रिलोचनः ॥
अजोऽयं जायते योगाज्जागरूकः सदा महान्।
बिभर्ति भगवानेतद्विरूपो विश्वरूपवान् ॥
(नि० प्र० पूर्वार्ध १२८ । ८६-८८)
यही भगवान् श्रीराम ऋक्-यजु-सामवेदमय हैं, तीनों गुणोंसे अतीत अतिगहन यही हैं और छः अङ्गोंसे युक्त वेदात्मा अद्भुत पुरुष भी यही हैं। विश्वका पालन करनेवाले चतुर्भुज विष्णु यही हैं, विश्वके स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्मा यही हैं और समस्त विश्वका संहार करनेवाले त्रिलोचन भगवान् महादेव भी यही हैं। ये अजन्मा रहते हुए ही अपनी योग-माया-लीलासे अवतार लेते हैं, ये सर्वदा सबसे महान् हैं, ये सदा जागते रहते हैं, त्रिगुणात्मकरूपसे रहित हुए भी ये विश्वरूपवान् हैं। यही भगवान् इस विश्वको अपने सङ्कल्पसे धारण करते हैं।
अयं दशरथो धन्यः सुतो यस्य परः पुमान्।
धन्यः स दशकण्ठोऽपि चिन्त्यश्चित्तेन योऽमुना ॥
राम इत्यवतीर्णोऽयमर्णवान्तःशयः पुमान्।
चिदानन्दघनो रामः परमात्मायमव्ययः ॥
निगृहीतेन्द्रियग्रामा रामं जानन्ति योगिनः।
वयं त्ववरमेवास्य रूपं रूपयितुं क्षमाः ॥
(निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध १२८ । ९०, ९२, ९३)
ये महाराज दशरथ धन्य हैं, जिनके पुत्र परमपुरुष परमात्मा स्वयं हुए। यह दशकण्ठ रावण भी धन्य है, जिसका ये भगवान् अपने चित्तसे चिन्तन करेंगे। क्षीरसागरमें शयन करनेवाले श्रीविष्णु भगवान् ही श्रीरामचन्द्रके रूपमें अवतीर्ण हैं। ये श्रीराम साक्षात् सच्चिदानन्दघन अविनाशी परमात्मा हैं। मन इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त किये हुए योगीजन ही इन श्रीरामजीको यथार्थरूपमें जानते हैं। हमलोग तो इनके बाहरी स्वरूपके निरूपणकी ही क्षमता रखते हैं।
इसके पहले महर्षि विश्वामित्रजीने भगवान् श्रीरामकी भावी लीलाओंका वर्णन करते हुए समस्त ऋषि-मुनि, सिद्ध-देवताओंसे यहाँतक कह दिया था—
यैर्दृष्टो यैः स्मृतो वापि यैः श्रुतो बोधितस्तु यैः।
सर्वावस्थागतानां तु जीवन्मुक्तिं प्रदास्यति ॥
× × ×
अनेन रामचन्द्रेण पुरुषेण महात्मना।
नमोऽस्मै जितमेवैतै कोऽप्येवं चिरमेधताम् ॥
(निर्वाण-प्रकरण पूर्वार्ध १२८ । ७४-७६)
जो लोग भगवान् श्रीरामका दर्शन करेंगे, उनके लीला-चरित्रका स्मरण या श्रवण करेंगे और जो लोग इनके स्वरूप तथा लीलाचरित्रोंका परस्पर बोध करायेंगे, उन सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित पुरुषोंको भगवान् श्रीराम जीवन्मुक्ति प्रदान करेंगे।
× × ×
सजनो ! आप सब लोग इन भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार कीजिये। इनके नमस्कारसे ही आपलोग अनायास ही समस्त अज्ञानजनित जगत्पर विजय प्राप्त करेंगे। किसी भी दूसरे साधनकी आवश्यकता नहीं होगी। आपलोग चिर-कालतक प्रगति करें !
**४—कल्याण ('शिव')**
* कल्याण * ३
कल्याण
याद रक्खो—मैं, तुम, यह, वह, सृष्टि, संहार आदि रूपसे जो दृश्यप्रपञ्च दिखायी दे रहा है, वह एकमात्र अद्वितीय नित्य निर्मल शान्त चिन्मय ब्रह्मकी ही अभिव्यक्ति है। इन समस्त सत्-रूपसे दीखनेवाले असत् पदार्थोंमें एकमात्र सत् परमात्मा ही प्रकट है। वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही यह सम्पूर्ण जगत् है। उसके अतिरिक्त जगत् नामकी कोई सत् वस्तु कभी न थी, न है।
याद रक्खो—आकाशकी शून्यता आकाश ही है, जलकी द्रवता जल ही है, प्रकाशकी आभा प्रकाश ही है, वायुका स्पन्दन वायु ही है, समुद्रकी तरङ्गैं समुद्र ही हैं, बर्फकी शीतलता बर्फ ही है, काजलकी कालिमा काजल ही है—ठीक वैसे ही जैसे ब्रह्ममें दीखनेवाला यह समस्त जगत् भी ब्रह्म ही है।
याद रक्खो—जैसे स्वप्नमें दीखनेवाले दृश्य, बालकको दीखनेवाला वेताल, रज्जुमें दीखनेवाला सर्प, स्वर्णमें दीखने-वाले कड़े-बाजूबंद, प्रशान्त महासागरमें उठनेवाली तरङ्गों और आवर्त, मिट्टीमें दीखनेवाले घड़े-सिकोरे और आकाशमें दीखनेवाले नगर-घर आदि सब उपाधिमात्र हैं, भ्रममात्र हैं। वैसे ही ब्रह्ममें दीखनेवाला यह सम्पूर्ण जगत् भ्रममात्र है। वस्तुतः उसकी कोई भिन्न सत्ता है ही नहीं।
याद रक्खो—यह समस्त जगत् वस्तुतः भ्रान्तिसे ही जगद्रूप दीखता है। यथार्थ तत्त्वका ज्ञान होनेपर यह जगद्भ्रम वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे रस्सीका ज्ञान होनेपर सर्पकी भ्रान्ति नष्ट हो जाती है। अथवा आकार तथा नामकी व्यावहारिक विभिन्नता प्रतीत होते हुए भी जैसे स्वर्णका ज्ञान होनेपर स्वर्ण-भूषणोंके नाम-रूपके कारण होनेवाली विभिन्नता तथा भिन्नरूपता नष्ट हो जाती है—एकमात्र स्वर्ण ही दीखने लगता है, वैसे ही ब्रह्मका ज्ञान होनेपर विभिन्न नामरूपात्मक यह विशाल विश्व ब्रह्मरूप ही दीखने लगता है, कहीं भी कोई भिन्न सत्ता रहती ही नहीं।
वास्तवमें तो सच्चिदानन्दघन परमात्माके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।
याद रक्खो—यह समस्त दृश्य जगत् तथा इसमें होनेवाली सभी क्रियाएँ चिदानन्दघन ब्रह्मका ही संकल्प है। वह संकल्प भी ब्रह्म ही है। ब्रह्म जगत्का कारण नहीं है, क्योंकि जगत्रूपी कार्य सर्वथा असत् ही है। नित्य सत्य ब्रह्मसे अनित्य असत् जगत्की उत्पत्ति, नित्य निरतिशय दिव्य परमानन्दघन परमात्मासे दुःखपूर्ण जगत्की उत्पत्ति, प्रकाशमय परब्रह्मसे तमोमय जगत्की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं। अतएव ब्रह्म तथा जगत्में कारण-कार्यभाव नहीं है, ब्रह्म ही जगद्रूपमें भासित हो रहा है। उस चिदाकाशमे ही चिदाकाशसे यह सब खेल हो रहे हैं। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं।
याद रक्खो—जब एक ब्रह्मके अतिरिक्त कोई सत्ता ही नहीं रह जाती, तब भिन्न अहङ्कार कहाँ रहेगा और अहङ्कारका अभाव होते ही राग-द्वेष, ममता-मोह, मेरा-तेरा आदि सब मिथ्या विकार मिट जाते हैं जैसे स्वप्नसे जागते ही स्वप्नका सारा संसार सर्वथा मिट जाता है। फिर जगत्में रहता हुआ भी इस ज्ञानको प्राप्त जीवन्मुक्त पुरुष नित्य निरन्तर ब्रह्ममें ही स्थित रहता है। वह जगत्के आदि, मध्य, अन्त सभी अवस्थाओंमें समचित्त रहता है; क्योंकि तब उसका चित्त ही नहीं रह जाता। अतएव वह न तो प्राप्त हुई प्रिय कहलाने-वाली वस्तुका अभिनन्दन करता है, न अप्रियसे द्वेष करता है, न नष्ट हुई प्रिय वस्तुके लिये शोक करता है और न अप्राप्त वस्तुकी इच्छा ही करता है।
याद रक्खो—ऐसा परमतत्त्वको प्राप्त—परमात्मामे अभिन्नभावसे स्थित पुरुष जगत्की क्षणभंगुर अवस्थाको अपनी प्रशान्त ब्राह्मी स्थितिके अंदर हँसता हुआ देखता है। उसके लिये न कुछ पाना शेष रह जाता है, न कुछ करना रह जाता है। वह सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मस्वरूप ही बन जाता है यही योगवासिष्ठकी शिक्षा है।
'शिव'
**५—एकश्लोकी योगवासिष्ठ** (तत्त्वचिन्तक स्वामीजी श्रीअनिरुद्धाचार्यजी वेंकटाचार्यजी महाराज)
४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *
एकश्लोकी योगवासिष्ठ
( लेखक—तत्त्वचिन्तक स्वामीजी श्रीमनिरुद्धाचार्यजी वेंकटाचार्यजी महाराज )
एक बार भगवान् रामने महर्षि वसिष्ठसे पूछा कि सार्थक एवं सफल जीवनवाले मानवकी पहचान क्या है ? इसके उत्तरमें रघुकुलगुरु ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठने जो अल्पाक्षरा किंतु अर्थबहुला, एकश्लोकी वाणी, जिसमें 'बीजे वृक्षमिव' सारा 'योगवासिष्ठ' भरा हुआ है, समुच्चारित की थी, वह सचमुच गागरमें सागरकी तरह योगवासिष्ठका समग्र उपादेय तत्त्व निचोड़कर एक श्लोकमे भर देती है। महर्षि-प्रवरकी अर्थ-भारवती वह वाणी इस प्रकार है—
तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः।
<div align="right">( योगवासिष्ठ )</div>
स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥
महर्षि वसिष्ठका अनुभूत कथन है कि जीवनतत्त्व, ( प्राणशक्ति ) जिसे 'वैशेषिकदर्शन' ने 'सञ्चाकर्म त्वसद्-विशिष्टाना लिङ्गम' इस सूत्रद्वारा 'अध्यात्म वायु' और सांख्यने 'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च' कहकर 'अन्तः-करण-क्रिया' की संज्ञा दी है, मानव, पशु-पक्षी आदि सबमें साधारणतया समान है। किंतु मनुष्यको मृगादि पशु-पक्षियोंसे विभक्तकर उच्चश्रेणीमें समासीन करनेवाली मनन-शक्ति ही है, जिसके विकसित होनेपर ही प्राणी 'मानव' कहला सकता है। महर्षि यास्कने भी निरुक्तमें 'मत्वा कर्माणि सीव्यन्ति इति मनुष्यः' कहकर वासिष्ठी उक्तिका समर्थन किया है।
वेदके मतमें जीवनका अर्थ है—प्राण। यह प्राणिमात्रमे सामान्य है। केवल इसीका विकास जबतक मानवमें है, तबतक मानव जन्तु ही है । संस्कृत भाषाने 'मानव और माणव' के भेदको व्यक्त करते हुए कहा है कि केवल प्राण-शक्तिका विकास-स्थल 'माणव' ( जन्तु-विशेष ) और प्राणशक्ति तथा मनन-शक्ति दोनोंका विकासकेन्द्र मानव है । मानवको द्विपादी जन्तुविशेषकी हीन कक्षासे निकालकर मानवताकी उच्चश्रेणीमें पहुँचानेवाली तो मननशक्ति ही है। वेदने भी मननशक्तिको ही 'मानवता' माना है। अतः 'योगवासिष्ठ' के मतसे मानवता-पालनपूर्वक जीवन-यापन करनेवाला ही मानव है। इसी विशिष्ट उपदेशको आत्मसात् करानेके उच्च उद्देश्यसे समग्र 'योगवासिष्ठ' प्रवृत्त हुआ है। प्रस्तुत विशिष्ट उपदेशको विश्वहितके लिये प्रसारित करनेके कारण ही ग्रन्थका नाम 'वासिष्ठ' रखा गया है। वैदिक भाषामें विशिष्टका बोधक वसिष्ठ शब्द है।
वासिष्ठ-बोध-सार
जग कहते हो जिसे जगमग् ब्रह्म ही है,
जन्मक़ा जगत्के न कारण है क्रम है ।
चित्से अचित्के विकासकी हो आस किसे,
होता कहीं प्रकट प्रकाशसे भी तम है ?
कैसे बना, किसने बनाया, किससे है बना—
यह सब जाननेका व्यर्थ सभी भ्रम है ।
मिथ्या कल्पनाका एक नूतन निकेतन है,
चेतन आकाशमें अचेतनका भ्रम है ॥
**७—योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता**<br>(पण्डित श्रीजानकीनाथजी शर्मा)
* योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता *
५
योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता
(लेखक—पं० श्रीजानकीनाथजी शर्मा)
योगवासिष्ठके अध्येता तथा मननकर्ताओंसे यह बात छिपी नहीं है कि यह ग्रन्थ भारत ही नहीं, विश्वसाहित्यमे ज्ञानात्मक, सूक्ष्मविचार-तत्त्वनिरूपक तथा श्रेष्ठ सदुक्तिपूर्ण ग्रन्थोंमें सर्व-श्रेष्ठ है। यह महारामायण, वासिष्ठरामायण आदि नामोंसे भी विख्यात है। स्वयं भगवान् वसिष्ठने ही कहा है कि 'संसार-सर्पके विषसे विकल तथा विषयविषूचिकासे पीड़ित मृतप्राय प्राणियोंके लिये योगवासिष्ठ परम पवित्र अमोघ गारुड़-मन्त्र है। इसे सुन लेनेपर जीवन्मुक्ति सुखका अनुभव होता है।'* स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे कि 'योगवासिष्ठ मेरे लिये सर्वाधिक आश्चर्य एवं चमत्कारपूर्ण ग्रन्थ है।'† डा० भगवानदासने 'मिस्टिक एक्सपेरियन्सेज' पुस्तककी प्रस्तावनामें लिखा है 'योगवासिष्ठ सिद्धावस्थाका ग्रन्थ है। इसके विचार, दर्शन, रहस्य, निरूपण-प्रणाली, भाषा, अलंकार—सब एक-से-एक आश्चर्यकर हैं।' लाला बैजनाथजीने इसके हिंदी-भाषान्तरकी भूमिकामें लिखा था कि 'वेदान्त-ग्रन्थोंमें योगवासिष्ठकी कोटिका कोई भी ग्रन्थ नहीं है' (भाग २ की भूमिका)। पिछले दिनों स्वामी भूमानन्दजी (जगद्गुरु आश्रम चटगाँव, बंगाल) डा० भीखनलालजी आत्रेय, श्रीक्षितीशचन्द्रजी चक्रवर्ती आदि महान् विद्वानोंने इसकी बड़ी प्रशंसा की तथा इसपर पर्याप्त मनन-अनुसंधान कर स्वतन्त्र पुस्तकें लिखी हैं।
तथापि आजके जगत्में कुछ ऐसे मतवादी भी हैं, जिनकी योगवासिष्ठके विरुद्ध स्वाभाविक उपेक्षा है। वे लोग कहते हैं कि योगवासिष्ठ १७ वीं शतीकी रचना है। कई लोगोंका मत है कि यह स्वामी विद्यारण्यजीकी कृति है। कुछ भावुक वैष्णवों-का कथन है कि इसमें श्रीरामचन्द्रको शोकविकल दिखलाया गया है; शिष्यरूपमें दिखलाया गया है; इसमें भक्तिकी महिमा नहीं है अतः सर्वथा उपेक्षणीय है। जे० एन० फक्यूहरका मत था कि 'योगवासिष्ठ ईसाकी १३वीं तथा १४वीं शतीके बीचमें लिखा गया था।'१ (Religious Lectures of India pp 228) प्रोफ़ेसर शिवप्रसाद भट्टाचार्यका मत है कि यह १० से १२ वीं शतीके मध्यकी कृति है (The Proceedings of the Madras Oriental Conference P 545)। जर्मन विद्वान् डा० विंटरनिट्जके मतानुसार 'यह शंकराचार्यके अनुयायियोंकी कृति है और ७से ८ शतीतक्की रचना है।‡।' डा० भीखनलाल आत्रेय इसे ईसाकी ६ ठी शतीकी रचना मानते हैं। उनका कथन है कि भर्तृहरिके वाक्यपदीयमें तथा योगवासिष्ठमें कुछ समान पद हैं। इनमें योगवासिष्ठ ही पुराना हो सकता है। अतः योगवासिष्ठ कालिदासके बाद और भर्तृहरिके पहलेकी रचना है; इसलिये लगभग ६ ठी शतीमें ही इसको रखना युक्तिसंगत होगा।§
शङ्काओंका समुचित समाधान
वस्तुतः ये सब शङ्काएँ आलस्य (योगवासिष्ठको तथा अन्य ग्रन्थोंको देखनेका कष्ट न करने) प्रमाद, मानसिक मतभेद तथा पाश्चात्यके प्रभावके कारण ही हैं। ये सब कथन एक प्रकारसे अयुक्तिपूर्णमात्र भी हैं। जो लोग कहते हैं कि योग-वासिष्ठ १७वीं शतीकी रचना है, उन्हें देखना चाहिये कि १७वीं शतीके आस-पासकी आनन्दबोधेन्द्र सरस्वतीकी वासिष्ठरामायण-तात्पर्य-प्रकाश नामकी टीका है१। इसीके आसपासकी अन्र्तयारण्य, आत्मसुख, आनन्दवर्धन, गङ्गाधरेन्द्र, माधव-सरस्वती तथा सदानन्द यतिकी टीकाएँ हैं। १६ वीं शतीके आचार्य श्रीमद्मधुसूदन सरस्वतीने अपने ग्रन्थ सिद्धान्तबिन्दु, अद्वैतरत्न-
*(क) दुःसहा राम संसारविषविषद्विषूचिका।
योगगारुडमन्त्रेण पावनेन प्रशाम्यति ॥ (२।१२।१०)
(ख) जीवन्मुक्तत्वसंसिद्धिस्तु श्रुते समनुभूयते ।
स्वयमेव यथा पीते नीरोगत्व वरौषधे ॥ (३।८।२५)
† One of the greatest books and the most wonderful according to me ever written under the sun is 'Yoga Vasistha'
(In the Woods of God-Realization, Delhi edition, Vol. 111, p 295)
‡ As Shankara does not mention the work, it is probably written by one of his contemporaries. (Geschichte der Indischen Literature-Vol. III, pp 44)
§ Hence we may place it after Kalidas and before Bhartrihari, is somewhere in the 6 th century A D. (Vasistha Darshanam, the Probable Date of Composition of Yoga Vasistha, p 18)
१. ऋतुरससुरगमही(१७६६)शकविकारियुगवत्सरस्य शिशिरर्तौ,
(तात्पर्यप्रकाशोपसंहार)
२. यह टीका १४ वीं शतीकी होनी चाहिये; क्योंकि इनकी 'रामार्चनचन्द्रिका'का उल्लेख 'निर्णयसिन्धु'आदिमें बार-बार हुआ है।
६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *
रक्षण, वेदान्तकल्पलतिका, संक्षेपशारीरक-व्याख्या तथा गीताकी 'गूढार्थदीपिका' व्याख्यामें—प्रायः सर्वत्र योगवासिष्ठके हजारों वचन उद्धृत किये हैं। केवल गीताके ६।३२ तथा ३६ वें श्लोकोंकी व्याख्यामें ही इन्होंने योगवासिष्ठके पच्चासों श्लोकोंको उद्धृत किया है। इनसे भी पूर्व चौदहवीं शताब्दी-के सर्वोपरि विद्वान् वेदान्ताचार्य श्रीविद्यारण्य स्वामीने अपने 'जीवन्मुक्ति-विवेक' तथा 'पञ्चदशी' ग्रन्थोंमें योगवासिष्ठके श्लोकों-को बड़े आदरसे बार-बार उद्धृत किया है³। इनके गुरु श्रीशंकरानन्द भी 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' (गीता १३।४) की व्याख्यामें लिखते हैं—'वासिष्ठविष्णुपुराणादिषु ऋषिभिर्वसिष्ठ-पराशरादिभिर्बहुप्रकारं प्रतिपादितम्'। यहाँ वसिष्ठनिर्मित
३. (क) अत एवाह वसिष्ठः—'द्वौ क्रमौ चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं च राघव।' (६।२३। पर मधुसूदनी)
(ख) वासिष्ठरामायणादिषु तदेव तत्त्वज्ञानं मनोनाशो वासना-क्षयश्चेति त्रयमभ्यसनीयम्। तदुक्तं वासिष्ठे—
तच्चिन्तनं तत्कथनमन्योन्यं तत्प्रबोधनम्।
एतदेकपरत्वं च ब्रह्माभ्यास विदुर्बुधाः ॥
(गीता ६।३२ पर मधुसूदन)
४. परास्य शक्तिर्विविधा क्रियाज्ञानफलात्मिका।
(क) इति वेदवचः प्राह वसिष्ठश्च तथाम्रवीत्।
सर्वशक्तिपरं ब्रह्म नित्यमापूर्णमद्वयम् ॥
ययोल्लसति शक्त्यासौ प्रकाशमधिगच्छति।
चिच्छक्तिर्ब्रह्मणो राम शरीरेषूपलभ्यते ॥
स आत्मा सर्वगो राम नित्योदितवपुर्महान्।
यन्मनाङ् मननीं शक्तिं धत्ते तन्मन उच्यते ॥
इत्यादि (पञ्चदशी १३।१४ से २८ वें श्लोकतक सब योगवासिष्ठके ही श्लोक हैं)
'वसिष्ठश्च तथाब्रवीत्' की व्याख्यामें रामकृष्णपण्डित लिखते हैं—'वासिष्ठाभिधे ग्रन्थे।'
(ख) वसिष्ठः—'अतएव हि राम त्वं श्रेय प्राप्नोषि शाश्वतम्।
स्वप्रयत्नोपनीतेन पौरुषेणैव नान्यथा ॥
(जीवन्मुक्तिविवेक पृष्ठ ३५)
यह श्लोक योगवासिष्ठ, मुमुक्षु-व्यवहारप्रकरणका है।
सच्ची बात तो यह है कि 'जीवन्मुक्तिविवेक' यागवासिष्ठपर ही आधारित है। इसमें योगवासिष्ठको वाल्मीकिलिखित भी बतलाया है—'वासनाभेदो वाल्मीकिना दर्शितः वासिष्ठे—वासना द्विविधा प्रोक्ता शुद्धा च मलिना तथा' इत्यादि' ये सब योगवासिष्ठके ही श्लोक हैं। इसमें प्रायः आधे ग्रन्थमें योगवासिष्ठके श्लोक ही हैं।
५. नमः श्रीशंकरानन्दगुरुपादाम्बुजन्मने। (पञ्चदशी १।१)
'योगवासिष्ठ' का सुस्पष्ट उल्लेख है। इनसे भी बहुत पहलेके १२ वीं शतीके विद्वान् श्रीश्रीधर स्वामीने अपनी सुबोधिनी नामक गीता-व्याख्यामें योगवासिष्ठके श्लोकोंको कई बार उद्धृत किया है⁶। इससे भी पूर्व गौड़ अभिनन्द नामक काश्मीरी विद्वान्ने जिसका समय ९वीं शतीका मध्यकाल माना जाता है, 'योगवासिष्ठसार' नामका ग्रन्थ लिखा था। इसमें उसने प्रायः ६ सहस्र श्लोकोंमें ही द्वात्रिंशत्सहस्रात्मक (३२००० वाले) योगवासिष्ठ ग्रन्थके सारभूत श्लोकोंका संग्रह किया है। इससे सिद्ध है कि योगवासिष्ठ इससे भी बहुत पहलेका ग्रन्थ है।
श्रीशंकराचार्य और योगवासिष्ठ
जो लोग कहते हैं कि शंकराचार्यके अनुयायियोंमेंसे ही किसी एकने 'योगवासिष्ठ' बना दिया, वह भी केवल उनका अविचारित निर्णय मात्र है। जिस प्रकार शंकरानन्द, नीलकण्ठ, श्रीधरस्वामी, मधुसूदन सरस्वती आदिने गीताके १३।४ श्लोकके 'ऋषिभिर्बहुधा गीतम्' की व्याख्यामें 'वसिष्ठादिभिः प्रतिपादितम्' लिखा है, उसी प्रकार शंकराचार्य भी लिखते हैं—ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्। मधुसूदन सरस्वती तथा भाष्योत्कर्षदीपिकाकारने इन्हीं शब्दोंकी व्याख्या करते हुए लिखा है—'वसिष्ठाभिधे योगशास्त्रे'
इतना ही नहीं, 'श्वेताश्वतरोपनिषद्' (१।८) के भाष्यमें वे सुस्पष्ट शब्दोंमें लिखते हैं—
तथा च वासिष्ठे योगशास्त्रे प्रश्नपूर्वकं दर्शितम्—
यथाऽऽत्मा निर्गुणः शुद्धः सदानन्दोऽजरोऽमरः ॥
संसृतिः कस्य तात स्यान्मोक्षो वा विद्यया विभो।
और लगातार दो श्लोकोंमें प्रश्न करके पुनः 'वसिष्ठः' लिखकर 'तस्यैव नित्यशुद्धस्य सदानन्दमयात्मनः' आदि योगवासिष्ठके दो श्लोकोंको उत्तररूपमे लिखते हैं। इसी प्रकार वे 'सनत्सुजातीयभाष्य' (१।१५) में भी लिखते हैं—तथा चाह भगवान् वसिष्ठः –
६. (क) तदुक्तं वसिष्ठेन—
प्राणे गते यथा देह सुखदुःखे न विन्दति।
तथा चेत् प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् ॥
(५।२३ गीता-व्याख्या)
(ख) वसिष्ठेन चोक्तम्—'न कर्माण्ये त्यजेद् योगी कर्म-भिस्त्यज्यते ह्यसौ।' (गीता १८।२ की व्याख्या)
(ग) ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्योगशास्त्रेषु निरूपितम्'
(गीता १३।४ की व्याख्या)
* योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता * ७
चतुर्वेदोऽपि यो विप्रः सूक्ष्मं ब्रह्म न विन्दति ।
वेदभारभराक्रान्तः स वै ब्राह्मणगर्दभः ॥
वे पुनः इसी ग्रन्थके इसी अध्यायके ३१ वें श्लोकके भाष्यमें लिखते हैं—तथा चाह भगवान् वसिष्ठः —
यत्र सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम् ।
न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित् स ब्राह्मणः ॥
यह भी नहीं कहा जा सकता कि ये ग्रन्थ शंकराचार्यकृत नहीं हैं, क्योंकि 'शंकरदिग्विजयकार' ने भी लिखा है—
समत्सृजातीयमसत्सु दूरं ततो नृसिंहस्य च तापनीयम् ।
स्वामी भूमानन्दजीने Influence of the Yoga-vasistha on Shankaracharya नामकी पुस्तिकामें तुलनात्मक अध्ययनद्वारा यह भी दिखलाया है कि शंकराचार्यकी विवेकचूड़ामणि, सारतत्त्वोपदेश, लघुवाक्यवृत्ति, प्रबोधानुभूति, प्रबोधसुधाकर आदि वृत्तियोंपर योगवासिष्ठके किन-किन श्लोकोंकी छाप या प्रभाव है । उदाहरणार्थ—'प्राणस्पन्दविरोधाद् सत्सङ्गाद् वासनात्यागात् । हरिचरणभक्तियोगान्मनः स्ववेगं जहाति शनैः ॥' इस प्रबोधसुधाकर ( ७७ ) के श्लोक पर 'अध्यात्मविद्याधिगमः साधुसंगम एव च । वासनासम्परित्यागः प्राणस्पन्दनिरोधनम् ॥ एतास्ता युक्तयः पुष्टाः सन्ति चित्तजये किल ।' योगवासिष्ठ ( ५ । ९२ । ३५ ) इस श्लोककी छाप है । इससे सिद्ध है कि योगवासिष्ठ शंकराचार्यके समय इस समयसे कही अधिक निर्भ्रान्त तथा समादरणीय ग्रन्थ था । यह स्मरर्णाई है कि शंकराचार्यका समय आजसे २३ सौ वर्ष पूर्व है । देखिये 'कल्याण' वर्ष ११, अङ्क ८, 'सिद्धान्त' ७ । २७ ।
श्रीरामका तिरस्कार नहीं
कुछ वैष्णवजनोंको यह आपत्ति है कि श्रीरामका इसमें शोकाकुल होना—शोकसे पीला पड़ना बतलाया गया है, परमात्मा शोकयुक्त या शिष्य नहीं बनता । इसके उत्तरमें नम्र निवेदन है कि श्रीरामका शोक जैसा वाल्मीकि आदि रामायणोंमें सीताहरण या लक्ष्मणमूर्च्छा आदिके बाद है, वैसी तो योगवासिष्ठमें कोई बात भी नहीं है । योगवासिष्ठमें राम संसारसे खिन्न होकर खाना-पीना छोड़ रहे हैं, एकान्तवास करते हैं । यह भोगोंसे वैराग्य उत्तम अधिकारीका लक्षण है । भोजन छोड़नेसे उनका पीला हो जाना स्वाभाविक है । बाल्यावस्थामें विद्याग्रहणार्थ उनके द्वारा भगवान् वसिष्ठका शिष्यत्व स्वीकार करना सभी रामायणोंमें वर्णित है, उसी बाल्यावस्थामें विश्वामित्रके यागसंरक्षणके पूर्व ही इनका योगवासिष्ठका ग्रहण, तदुचित अधिकारसम्पादन, सम्पूर्ण विश्वको एकदम चकित कर देनेवाले प्रश्न-भाषण योगवासिष्ठद्वारा मन्त्रविद्या रामके माहात्म्याधिक्यके प्रतिपादक तथा साधक ही हैं, बाधक नहीं ।
योगवासिष्ठमें श्रीरामका महाविष्णुत्व-निरूपण
योगवासिष्ठमें महर्षि वाल्मीकिने बार-बार श्रीरामको महाविष्णु बतलाया है । कुछ थोड़े प्रसङ्ग यहाँ उदाहरणस्वरूप उपस्थित किये जा रहे हैं—
चिदानन्दस्वरूपे हि रामे चैतन्यविग्रहे ।
( १ । १ । ५६ )
शापव्याजवशादेव राजवेशधरो हरिः ।
( १ । १ । ५५ )
वृन्दया शापितो विष्णुस्तेन मानुषतां गतः ।
( १ । १ । ६५ )
अहं वेद्मि महात्मानं रामं राजीवलोचनम् ।
वसिष्ठश्च महातेजा ये चान्ये दीर्घदर्शिनः ॥
( १ । ७ । २१ )
बालक रामके ज्ञानपूर्ण भाषण सुनकर सभी मुनि अनेकानेक लोकोंसे दौड़ पड़ते हैं और आश्चर्यचकित होकर कहने लग जाते हैं—
न रामेण समोऽस्तीह दृष्टो लोकेषु कश्चन ।
विवेकानुदारात्मा न भावी चेति नो मतिः ॥
( योग० १ । ३३ । ४५ )
अर्थात् तीनों लोकोंमें आजतक श्रीरामके समान ज्ञानी एवं उदार व्यक्ति न तो कोई हुआ और न भविष्यमें होनेवाला है ऐसी हमलोगोंकी बुद्धि कहती है,—हमारा निश्चय है ।
इतना ही नहीं, श्रीरामके अमृतमय प्रवचनको सुनकर घोड़े घास खाना छोड़ देते हैं, रानियाँ गवाक्षमे देखती हुई चित्रलिखित-सी खड़ी रह जाती हैं, देरतक लगातार पुष्पवृष्टि होती रहती है, सभी मन्त्री, सामन्त, नागरिक, राजकुमार एकटक देखते रह जाते हैं । पिंजरेके पक्षी, रानमहलके क्रीडामृग भी कान खड़े करके ध्यानसे सुनते रह जाते हैं । सिद्धमुनियोंकी परम्परा सभाभवनमें सुदूरसे दौड़ पड़ती है—
सामन्तैः राजपुत्रैश्च ग्राहगणैर्गृहवादिभिः ।
तथा भृत्यैरमात्यैश्च पञ्जरस्थैश्च पक्षिभिः ॥
क्रीडामृगैर्गतस्पन्दैस्तुरङ्गैस्त्यक्तचर्वणैः ।
कौसल्याप्रमुखैश्चैव निजवातायनस्थितैः ॥
संशान्तभूषणारावैरस्पन्दैर्वनितागणैः ।
८
* अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् *
सिद्धैर्नभश्चरैश्चैव तथा गन्धर्वकिन्नरैः।
रामस्य ता विचित्रार्था महोदारा गिरः श्रुताः ॥
( १ । ३० । ७–११ )
श्रीरामके शिष्यत्वका भी उत्तर है। योग्य अधिकारी श्रीरामसे दूसरा कौन मिलता ? अतः स्वयं प्रश्न करके वसिष्ठके हृदयमें प्रविष्ट होकर उन्होंने यह ज्ञान प्रकट किया। देखिये वासिष्ठमहारामायण-तात्पर्यटीकाका उपोद्घात, श्लोक ११—
आविश्यान्तर्वसिष्ठं बहिरपि कलयन् शिष्यभावं वितेने।
यः संवादेन शास्त्रामृतजलधिममुं रामचन्द्रं प्रपद्ये ॥
योगवासिष्ठके अन्तमें भी 'नारायण' कहकर श्रीरामको नमस्कार किया गया है।
योगवासिष्ठमें भक्ति
योगवासिष्ठमें भक्तिकी बात भी बहुत है । यों तो उपरिनिर्दिष्ट प्रकरण भी, जिसकी छाया सम्भवतः भागवतकारके वेणुगीतपर पड़ती है और जिसमें कहा गया है कि 'श्रीकृष्णके वेणुगीतको श्रवणकर बछड़े दूध पीना भूल जाते हैं, नदियोंका वेग भग्न हो जाता है, गौएँ कवल नहीं लेतीं, कम भक्ति-रससे ओतप्रोत नहीं है। तथापि इस तरहके अन्य भी कई प्रसङ्ग योगवासिष्ठमें हैं। उपशम-प्रकरणके ३३ वें अध्यायकी प्रह्लादकृत विष्णुस्तुति संस्कृतसाहित्यकी अद्भुत निधि है। वह सब स्तुतियोंको एक बार मात कर देती है। श्रीवसिष्ठकी भगवान् शङ्करसे मिलनेके वादकी प्रार्थना भी अत्यद्भुत भक्ति-रससे परिपूर्ण है। कई स्थानोंपर भगवत्स्मरणकी बडी महिमा है। ध्यानकी प्रशंसा तो सर्वत्र है ही।
भक्तशिरोमणि तुलसीदासजीको भी योगवासिष्ठ मान्य था। उनके उत्तरकाण्डके भुशुण्डिचरित्रपर भुशुण्डोपाख्यान (योग-वासिष्ठ-निर्वाणप्रकरण पूर्वार्द्ध १४ से २८ अध्याय) की छाया है। भुशुण्डके दीर्घजीवित्वका क्रम, कारणादि यहाँ बड़े विस्तारसे निरूपित है। विनयपत्रिकाके २०५ वें पदमें वे लिखते हैं—
जौ मन भज्यो चहै हरि सुरतरु ।
सम, संतोष, विचार, विमल अति सतसंगति, ये चारि दृढ़ करि धरू
इसपर योगवासिष्ठके 'शमो विचारः संतोषश्चतुर्थः साधु-संगमः ।' ( २ । ११ । ६० ) 'तथा संतोषः साधुसङ्गमश्च विचारोऽथ शमस्तथा ।' ( २ । १६ । १८) आदि मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरणके १२ से १६ वें अध्यायतकतके उपदेशोका ही प्रभाव है। 'वेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥' आदिसे भी इसका समर्थन-सा होता है।
योगवासिष्ठ किसकी रचना ?
यों योगवासिष्ठको वाल्मीकिकी रचना बतलाया गया है । कई लोग इसमें 'उवाच' आदि अलङ्कारोंकी भरमार देखकर अन्यकी कृति समझते हैं । पर जो हो, यह तो उन्हे भी मानना पड़ेगा कि पदमाधुर्य, भावगाम्भीर्य, निरूपणशैली, तत्त्वप्रदर्शन, सूक्ष्मेक्षिका, प्रखरविचार, सर्वत्र नवीनता तथा अमृतोपम पवित्रतम साधु उपदेशोंकी शृङ्खला देखते हुए यह वाल्मीकि-रामायण या विश्वके किसी भी ग्रन्थसे निम्नकोटिका नहीं है। अतः इसका रचयिता जो भी हो, साक्षात् ईश्वर है या ईश्वरप्राप्त है। ग्रन्थ सर्वथा निर्दोष है। कई प्रकरण तो वाल्मीकिसे मिलते भी हैं। विश्वामित्र-दशरथ-संवादमें प्रायः वाल्मीकिके ही श्लोक हैं। जो अधिक हैं, वे रम्यतर हैं। 'उवाच' आदि लिखना—भिन्न शैली अपनाना भी एक लेखकद्वारा सम्भव है ही। अतः वाल्मीकिरचित मानना युक्तिसंगत ही है।
उपसंहार
ध्यानसे देखा जाय तो भागवत, वाल्मीकिरामायण तथा अन्य पुराणोंसे योगवासिष्ठका वर्णन अधिक ही मिलता है। वस्तुतः भाषा, छन्दरचना तथा विचार-प्रवणताकी दृष्टिसे योग-वासिष्ठ सर्वोत्तम ग्रन्थ प्रतीत होता है। इसलिये श्रेष्ठ साधक इसके कालनिर्णयके चक्करमें न पड़कर इससे वास्तविक लाभ उठानेके प्रयत्नमें लग जाते हैं। यही होना भी चाहिये। किंतु साधारण व्यक्ति इससे वञ्चित न रह जायँ तथा व्यापक भ्रान्त धारणा शान्त हो जाय, इसीलिये यह यत्किंचित् प्रयास किया गया है।
वस्तुतः योगवासिष्ठ भारतीय ज्ञानरविकों एक अनुपम रश्मि है। इसमें ससार, उसके तरनेके उपाय, दैव, पुरुषार्थ, तत्त्वज्ञान एव उसके साधनोंके प्रत्येक अङ्गपर इतना क्रम-क्रमसे विचार किया गया है कि देखते हुए आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। कल्याणकामी मनुष्योंको इससे अवश्य लाभ उठाना चाहिये यही प्रार्थना है।
**८—योगवासिष्ठकी आजके आत्मशान्ति, विश्व-शान्तिके इच्छुक विश्वको चुनौती तथा इस क्षणका ज्ञान-बन्धुत्व एवं शमाभास**<br>(श्रीरामनिवासजी शर्मा)
* योगवासिष्ठकी आजके आत्म-शान्ति, विश्व-शान्ति के इच्छुक विश्वको चुनौती * ९
योगवासिष्ठकी आजके आत्म-शान्ति, विश्व-शान्ति के इच्छुक विश्वको चुनौती
तथा इस क्षणका ज्ञान-बन्धुत्व एवं ज्ञानाभास
(लेखक—प० श्रीरामनिवासी शर्मा)
शास्त्र कहते हैं ज्ञानके बिना मुक्ति नहीं।^१ आधुनिक विद्वान् भी प्रकारान्तरसे यही कहते हैं— Knowledge is power परंतु ज्ञान और ज्ञान-शक्तिमें अन्तर है। ज्ञानसे शक्ति तभी प्राप्त होती है जब कि मनुष्य ज्ञानार्थमें ढल जाता है। क्रियाहीन ज्ञान तो शक्तिहीन ही होता है। यह भी न भुलाना चाहिये कि ज्ञानसे शक्ति और मुक्ति तभी प्राप्त होती है, जब कि वह अध्यात्म हो। आजका ज्ञान तो— १—भौतिक है २—तर्कमात्र है ३—शिल्पिवत् है ४—अवास्तविक है ५—केवल प्रवृत्तप्राण है ६—यश और जीविकाका साधन है आजका ऐसा सारहीन अनात्म-ज्ञान योगवासिष्ठके मतसे ज्ञानाभास है और ऐसे ज्ञानका धनी व्यक्ति ज्ञानबन्धु है तथा ज्ञानशिल्पी। वह वास्तविक ज्ञानी नहीं, उससे तो अज्ञानी ही अच्छा है—
आत्मज्ञानं विदुर्ज्ञानं ज्ञानान्यन्यानि यानि तु।
तानि ज्ञानावभासानि सारस्यानवबोधनात् ॥
\hfill (यो० वा० ६।२१।७)
अज्ञातारं वरं मन्ये न पुनर्ज्ञानबन्धुताम् ॥
व्याचष्टे यः पठति च शास्त्रभोगार्थ शिल्पिवत् ॥
\hfill (यो० वा० ६।२१।१-३)
हम देखते हैं आज भारत भी ज्ञान-बन्धुता और ज्ञाना-भासका शिकार हो रहा है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनोंके ही मतसे यह चरित्रहीन होता जा रहा है। भारतेतर देशोंकी दशा तो इससे भी बुरी है। वे तो इस दिशाके गुरु ही हैं, अतः उनका जीवन एकमात्र प्रवृत्ति-प्रधान है एव सर्वाधिक भोगप्रधान।
योगवासिष्ठकारके मतसे तो ज्ञानी वही है जो जानने योग्य वस्तुको जानकर वासनामुक्त तथा कर्मतत्पर होता है—
ज्ञात्वा सम्यगनुष्ठानं दृश्यते येन कर्मसु ।
निर्वासनात्मकं ज्ञस्य स ज्ञानीत्यभिधीयते ॥
\hfill (यो० वा० ६।२२।२)
योगवासिष्ठकार यह भी कहते हैं कि जिसकी इच्छाएँ शान्त हो गयी हों एवं जिसकी शीतलता कृत्रिम न होकर वास्तविक हो तथा जिसका पुनर्जन्मका खटका मिट गया हो, वही ज्ञानी है, अन्यथा खाना-पहनना और लेना-देना आदि तो शिल्पीकी जीविकामात्र है—
अन्तःशीतलतेहासु प्राज्ञैर्यस्यावलोक्यते।
अकृत्रिमैकशान्तस्य स ज्ञानीत्यभिधीयते ॥
\hfill (यो० वा० ६।२२।१)
अपुनर्जन्मने यः स्याद्बोधः स ज्ञानशब्दभाक् ।
वसनाशनदा शेषा व्यवस्था शिल्पजीविका ॥
\hfill (यो० वा० ६।२१।४)
योगवासिष्ठकारका यह भी मत है कि जो मनुष्य कामना तथा संकल्प-विकल्पसे मुक्त होकर शान्तचित्तसे अवसरानुसार कार्य करता है वही पण्डित है—
प्रवाहपतिते कार्ये कामसंकल्पवर्जितः ।
तिष्ठत्याकाशहृदयो यः स पण्डित उच्यते ॥
\hfill (यो० वा० ६।२७।५)
योगवासिष्ठके मतसे सच्चा आर्यपुरुष वही है जो कर्तव्यका पालन करता है और अकर्तव्यसे बचता है एव प्रकृत आचारविचारमें संलग्न रहता है—
कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन् ।
तिष्ठति प्राकृताचारो यः स आर्य इति स्मृतः ॥
\hfill (यो० वा० ६।१२६।५४)
योगवासिष्ठकारकी आर्यपुरुषलक्षण-विषयक यह भी समुद्घोषणा है कि जो व्यक्ति शास्त्र-सदाचार एव परिस्थिति-सम्मत तथा मनःपूत व्यवहार करता है वही आर्य है—
यथाचारं यथाशास्त्रं यथाचित्तं यथास्थितम् ।
व्यवहारमुपादत्ते यः स आर्य इति स्मृतः ॥
\hfill (यो० वा० ६।१७६।१७)
किस विज्ञसे यह बात छिपी हुई है कि आजका मानव आर्योचित योगवासिष्ठ-अभिमत व्यक्तित्वसे सर्वथा दूर होता जा रहा है अपितु वह मानवोचित व्यक्तित्वसे न पहचाना जाकर विद्वान, प्रशासक, बाबू, हाकिम, वकील आदि विशेषणोंसे पहचाना और पुकारा जाता है। पाश्चात्य देशोंमें भी बाइबलके इस वाक्यका सम्मान दृष्टिगोचर नहीं होता—
१. ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः।
**९—भगवान् वसिष्ठकी जय** (श्रीसूरजचंदजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी')
१० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *
Man it does not mean this or that but humanity.
ऐसा क्यों हो रहा है । इसका एकमात्र कारण यही है कि हमारे विश्वविद्यालयोंका आमूल-चूल परिवर्तन नहीं हो पाता । सभी सुधार-योजनाओंपर भी अमल नहीं किया जाता और न घर और बाहर बालकोंकी शिक्षा-दीक्षापर ही समुचित ध्यान दिया जाता है । ऐसी दशामें तथाकथित आर्य-व्यक्तित्व बालकोंमें कैसे उत्पन्न हो सकता है ? इसी सत्यपर प्रकारान्तरसे राष्ट्रपति डा० राजेन्द्रप्रसादजीके ये शब्द पूर्णतः चरितार्थ होते हैं—
हम अपने सामने कितने भी महान् व उच्च आदर्शोंको लेकर जिस-किसी तरहकी राज-व्यवस्था क्यों न स्थापित कर लें, हमारी आर्थिक व सामाजिक विचारधारा कितनी भी समान व उदार क्यों न हो, पर जबतक हमारी अगली पीढ़ीका शारीरिक एवं मानसिक सौष्ठव व गठन शिशु-जीवनमें ही ठीक न होगा, तबतक देशमें हम सुख व शान्ति स्थापित करनेमें सफल नहीं हो सकते ।
यहाँ योगवासिष्ठ-सम्मत यह बात भी विचारणीय है कि ज्ञान-विकास और आत्म-ज्ञानप्राप्ति न केवल शास्त्र और गुरु-वचन-साध्य ही है प्रत्युत स्वानुभवका भी विषय है—
शास्त्रार्थे बुध्यते नात्मा गुरुवचनतो न च ।
बुध्यते स्वयमेवैष स्वबोधवशतस्ततः ॥
\hfill (यो० वा०)
इस समय हम देखते हैं हमारे विद्यार्थी आत्मनिर्भर नहीं हो पाते । वे केवल पुस्तक-कीट और परप्रत्ययनेय मति ही बने रहते हैं । वे यह भी नहीं समझते कि पेड़ भीतरसे बढ़ता है, माली और उपकरण तो उसके निमित्तमात्र होते हैं । वे प्रायः इस वैदिक सत्यसे भी अनभिज्ञ-से ही रहते हैं—
‘आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत् ।’
एतद्विषयक योगवासिष्ठकी तो यह सम्मति है कि आत्म-शान्ति और विश्व-शान्ति आत्म-विकास और आत्म-ज्ञानसे ही प्राप्त होती है, दूसरे किसी उपायसे नहीं । अतएव सर्वदुःखहर्त्ता आत्मावलोकनमें ही भूति-विभूतिके इच्छुक व्यक्ति लगा रहे—
करोतु भुवने राज्यं विशत्वम्भोदमम्बुवत् ।
आत्मलाभादृते जन्तुर्विश्रान्तिमधिगच्छति ॥
\hfill (यो० वा० ५ । ५ । २४)
आत्मावलोकने यत्नः कर्त्तव्यो भूतिमिच्छता ।
सर्वदुःखशिरश्छेद आत्मालोकेन जायते ॥
\hfill (यो० वा० ५ । ७५ । ४६)
योगवासिष्ठसम्मत आत्मावलोकनसे न केवल आत्म-शान्ति प्राप्त होती है अपितु योगवासिष्ठके बार-बारके पाठ और अवलोकनसे विश्वबन्धुता—प्राणस्पृहणीय नागरिकता भी प्राप्त होती है, जो आजकी अत्यधिक वाञ्छनीय वस्तु है—
एतच्छास्त्राभ्यासात् पौनःपुन्येन वीक्षणात् ।
परा नागरतोदेति महत्त्वगुणशालिनी ॥
\hfill (यो० वा० २ । १८ । ३६, ८)
योगवासिष्ठकारके मतसे योगवासिष्ठ-ग्रन्थावलोकनका एकान्त फल यह भी है—
बोधस्यापि परं बोधं बुद्धिरिति न संशयः ।
जीवन्मुक्तत्वमस्मिंस्तु श्रुतिः समनुभूयते¹ ॥
\hfill (यो० वा० ३ । ८ । १३ । १५)
भगवान् वसिष्ठकी जय
(लेखक—पं० श्रीसूरजचन्दजी सत्यप्रेमी (डाँगीजी))
योगवासिष्ठके प्रवक्ता भगवान् वसिष्ठका परिचय कराना अत्यन्त कठिन है, फिर भी उनके पारमार्थिक स्वरूपका मनन करना हो तो उनका भगवान्के अवतारोंके साथ क्या सम्बन्ध है ? उसे स्मरण किया जाना अनिवार्य आवश्यक है ।
मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् रामके गुरु, भगवान् परशुरामके पिता महर्षि जमदग्नि और भगवान् दत्तात्रेयके मौसा, परम सिद्ध भगवान् कपिल और परमहंस नवयोगेश्वर तथा जड़-भरतके पिता भगवान् ऋषभदेवके दादा, राजर्षि आग्नीध्रके बहनोई, भगवान् मनुके पुत्र, आद्य नरेन्द्र प्रियव्रतकी बहन देवी देवहूतिके जामाता भगवान् वसिष्ठकी सदा काल जय हो, विजय हो, जिन्होंने संसार-चक्रको छेदन करनेके लिये पुण्य-कर्मका चक्र बताया और पुण्यकर्मके चक्रको भंग करनेके लिये धर्मचक्र चलाया और फिर गुरुचक्रका प्रवर्त्तन करके सिद्धचक्रमें प्रवेश करा दिया—अजातवादके परम रहस्यमय सिद्धान्तके आद्य प्रणेता भगवान् वसिष्ठ ही हैं ।
इस अद्वैत, तुरीय और अज तत्त्वमे भी परं तुरीयातीत, द्वैताद्वैतातीत और अवाच्यपदगांभीर्य परमतत्त्वके प्रणेता भगवान् वसिष्ठ सर्वत्र सर्वथा, सर्वदा सम्पूर्ण आराध्य बनें ।
१. इस ग्रन्थके श्रवणसे परम ज्ञान प्राप्त होता है, फिर जीवन्मुक्तिका अनुभव होने लगता है ।
**१०—योगवासिष्ठका साध्य-साधन**
* योगवासिष्ठका साध्य-साधन *
११
योगवासिष्ठका साध्य-साधन
योगवासिष्ठ महारामायणका प्रारम्भ होता है—देवराज इन्द्रके द्वारा, महर्षि वाल्मीकिके पास राजा अरिष्टनेमिके भेजे जानेके प्रसङ्गसे । अरिष्टनेमि महर्षि वाल्मीकिसे मोक्षका साधन पूछते हैं । उसके उत्तरमें वाल्मीकिजी महाराज अपने शिष्य भरद्वाजके साथ हुए संवादका वर्णन करते हुए भगवान् रामके प्राकट्यकी बात सुनाते हैं । तदनन्तर महर्षि विश्वामित्र-के दशरथ-दरबारमें आकर यज्ञरक्षार्थ रामको माँगनेका प्रसङ्ग सुनाकर रामके वैराग्य तथा राम-वसिष्ठ-संवादके रूपमें छः प्रकरणोंमें 'योगवासिष्ठ' नामक विशाल ग्रन्थका श्रवण कराते हैं ।
योगवासिष्ठ अजातवाद या केवल ब्रह्मवादका ग्रन्थ है । इसके सिद्धान्तानुसार एकमात्र चेतनतत्त्व परब्रह्मके अतिरिक्त कोई अन्य सत्ता ही नहीं है । जैसे समुद्रमें अनन्त तरङ्गों उठती-मिटती रहती हैं, वे समुद्रसे भिन्न नहीं हैं, इसी प्रकार नित्य समरूप अनादि अनन्त सच्चिदानन्दघन परमात्म-चैतन्यरूप समुद्रमें नाना प्रकारके अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाशकी लीला-तरङ्गें दीखती रहती हैं । चित्त या अहंकार—जो वास्तवमें चेतन-ब्रह्मसे अभिन्न तथा ब्रह्मरूप ही है—इस दृश्य-प्रपञ्चका—सृष्टि, स्थिति-विनाशका कारण है । अहङ्कारका नाश होते ही, जो अहंकारकी सत्ता न माननेसे ही नाश हो जाता है, केवल एक ब्रह्म-चैतन्य ही रह जाता है । इसी एक तत्त्वका विभिन्न आख्यानों, इतिहासों, कथाओंके द्वारा इस विशाल ग्रन्थमें प्रतिपादन किया गया है । यह ग्रन्थ पुनरुक्तिपूर्ण है । एक ही सत्य तत्त्वको दृढ़ता-पूर्वक हृदयमें जमा देनेके लिये, एक ही सत्य तत्त्वकी अनुभूति या प्राप्ति करा देनेके लिये बार-बार विभिन्न रूपोंसे एक-सी ही युक्तियों तथा उपमाओंका उल्लेख किया गया है ।
सृष्टि न कभी हुई, न है—एकमात्र ब्रह्म ही है । इस प्रकार सृष्टिका अभाव प्रतिपादन करनेपर भी इस ग्रन्थमें कहीं भी यथेच्छाचार, शास्त्रनिषिद्ध व्यवहार, रागद्वेष-कामक्रोधादि-जनित अनाचार, भ्रष्टाचार, दुष्ट-सङ्ग आदिका समर्थन नहीं किया गया है; वरं बड़ी कड़ाईके साथ शास्त्राज्ञापालन-रूप सदाचारपरायणता एवं त्यागमय पुण्यमय जीवनकी आवश्यकता बतायी गयी है । राग, ममता, कामना, तृष्णा, इच्छा और इनके मूल अहंकारके त्यागकी महत्ता स्थान-स्थानपर बतलायी गयी है । इन्द्रियभोगोंमें फँसे हुए मनुष्योंकी घोर दुर्दशाका वर्णन करते हुए वैराग्यकी अत्यन्त प्रयोजनीयताका प्रतिपादन किया गया है । साधक पुरुषको अहम्भावनारूप ग्रन्थिका यथार्थ ब्रह्मज्ञानके द्वारा भेदन करके सच्चा ज्ञानी बननेका उपदेश दिया गया है; केवल ज्ञानका कथनमात्र करनेवाले 'ज्ञानबन्धु' ( नकली ज्ञानी ) बननेका नहीं । महर्षि वसिष्ठने यहाँतक कहा है कि 'वे ज्ञानबन्धु ( नकली ज्ञानी ) से तो अज्ञानीको अच्छा समझते हैं ( क्योंकि वह बेचारे अपनेको तथा दूसरोंको धोखा तो नहीं देते । ) महर्षि कहते हैं—
ज्ञानिनैव सदा भाव्यं राम न ज्ञानबन्धुना ।
अज्ञातारं वरं मन्ये न पुनर्ज्ञानबन्धुताम् ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २१ । १ )
फिर भगवान् श्रीरामके पूछनेपर नकली ज्ञानी ( ज्ञान-बन्धु ) के लक्षण बतलाते हैं ।
व्याचष्टे यः पठति च शास्त्रं भोगाय शिल्पिवत् ।
यतते न त्वनुष्ठाने ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥
कर्मस्पन्देषु नो बोधः फलितो यस्य दृश्यते ।
बोधशिल्पोपजीवित्वाज्ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥
वसनाशनमात्रेण तुष्टाः शास्त्रफलानि ये ।
जानन्ति ज्ञानबन्धूंस्तान्विद्याच्छास्त्रार्थदृष्टिरिनः ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २१ । ३–५ )
'जैसे शिल्पी जीविकाके लिये ही शिल्पकला सीखता है, वैसे ही जो मनुष्य केवल भोगप्राप्तिके लिये ही शास्त्रोंको पढ़ता और उसकी व्याख्या करता है, स्वयं शास्त्रके अनुसार आचरणके लिये प्रयत्न नहीं करता, वह ज्ञानबन्धु कहलाता है । शास्त्राध्ययनसे जिसको शाब्दिक बोध हो गया है, परन्तु उस बोधका फल जो विनाशशील भोगों—दृश्याकारोंसे वैराग्य होना चाहिये, सो नहीं हुआ तो उसका यह शास्त्रज्ञान शिल्पमात्र है—तत्त्वज्ञानकी बातें बनाकर दूसरोंको ठगनेके लिये चातुर्यपूर्ण कलामात्र है ।, उस कलासे केवल जीविका चलानेवाला होनेके कारण वह मनुष्य ज्ञानबन्धु कहलाता है । जो केवल भोजन-वस्त्रमें ही संतुष्ट रहकर भोजनादिकी प्राप्तिको ही शास्त्राध्ययनका फल समझते हैं, वे शास्त्रोंके अर्थको एक
१२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *
शिल्पकला ही मानते हैं। ऐसे लोगोंको ज्ञानबन्धु जानना चाहिये।' फिर कहते हैं—
अपुनर्जन्मने यः स्याद् बोधः स ज्ञानशब्दभाक् ।
वसनाशनदा शेषा व्यवस्था शिल्पजीविका ॥
( निर्वाण-प्रकरण उ० २२ । ४ )
'जिससे मोक्षकी प्राप्ति होती है, पुनर्जन्मकी नहीं, उसीका नाम ज्ञान है। उसके अतिरिक्त दूसरा जो शब्दज्ञानका चातुर्य है, वह तो रोटी-कपड़ा प्राप्त करनेकी कलामात्र है। उसे केवल भोजन-वस्त्र जुटानेवाली व्यवस्था समझना चाहिये।'
इस परम ज्ञानकी प्राप्तिके लिये शम ( मनकी स्ववशता ), दम (इन्द्रियनिग्रह), शास्त्रीय सदाचारका सेवन, दैवी सम्पत्ति-के गुणोंका अर्जन तथा भोग-वैराग्यपूर्वक ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे सद्गुरुके शरणमें जाना आवश्यक है। सद्गुरु वही है, जो शिष्यके अज्ञानान्धकारको अपने निर्मल स्वप्रकाश ज्ञानकी विमल ज्योतिसे हर ले और शिष्य वही है, जो विनय तथा सेवापरायण होकर ज्ञानी गुरुसे प्रश्न करे और उनके आज्ञा-अनुसार अपना जीवन निर्माण करे। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—
अतत्त्वज्ञमनादेयवचनं वाग्विदांवर ।
यः पृच्छति नरं तस्मान्नास्ति मूढतरोऽपरः ॥
प्रामाणिकस्य तज्ज्ञस्य वक्तुः पृष्टस्य यत्नतः ।
नानुतिष्ठति यो वाक्यं नान्यस्तस्मान्नराधमः ॥
( मुमुक्षु प्रकरण ११ । ४५-४६ )
"वाग्नेत्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! जो तत्त्वका ज्ञान नहीं रखता, उसके वचन मानने योग्य नहीं हैं। ऐसे तत्त्वज्ञानहीन मनुष्यसे जो तत्त्वविषयक प्रश्न करता है, उससे बढ़कर दूसरा कोई 'मूर्ख' नहीं है।" (साथ ही, जो मनुष्य किसी सच्चे ज्ञानी महात्मासे) "पूछकर भी उस प्रमाणकुशल तथा तत्त्वज्ञानी वक्ताके उपदेशके अनुसार यत्नपूर्वक आचरण नहीं करता, उससे बढ़कर 'नराधम' भी दूसरा कोई नहीं है।"
अतएव न तो बिना जाने-समझे किसीसे पूछना चाहिये तथा न तत्त्वज्ञ महात्माका उपदेश प्राप्त करके उसकी अवहेलना ही करनी चाहिये। साथ ही तत्त्वज्ञ पुरुषको भी चाहिये कि वे यथार्थ अधिकारीको ही तत्त्वका उपदेश दें। महर्षि कहते हैं—
पूर्वापरसमाधानक्षमबुद्धावनिन्दिते ।
पृष्टं प्राज्ञेन वक्तव्यं नाधमे पशुधर्मिणी ॥
प्रामाणिकार्थयोग्यत्वं पृच्छकस्याविचार्य च ।
यो वक्ति तमिह प्राज्ञाः प्राहुर्मूढतरं नरम् ॥
( मुमुक्षु-प्रकरण ११ । ४९-५० )
'ज्ञानी महात्माको चाहिये कि पूर्वापरका विचार करके यथार्थ निश्चय करनेमें जिसकी बुद्धि समर्थ हो, जिसके आचरण निन्दनीय न हों, ऐसे ही पुरुषको उसके पूछे हुए तत्त्वका उपदेश दे। जो आहार-निद्रा, भय-मैथुन आदि पशुधर्मसे संयुक्त है, ऐसे अधमको उपदेश न दे। प्रश्नकर्त्तामें श्रुति आदि प्रमाणोंके द्वारा निर्णय किये हुए तत्त्व-पदार्थको ग्रहण करनेकी योग्यता है या नहीं, इसका विचार किये बिना ही जो वक्ता उसे उपदेश देता है, उसको ज्ञानीजन इस लोकमें महान् मूढ़ बतलाते हैं।'
इसीलिये महर्षि वसिष्ठ आदर्श गुरु हैं तथा भगवान् रामचन्द्र आदर्श शिष्य हैं। गुरु-शिष्यको इन्हींका अनुसरण करनेवाले होना चाहिये।
मुमुक्षुके जीवनमें सहज ही शास्त्रानुकूल आचरण, संयम, सत्य, शम, दम, विषय-वैराग्य और मोक्षकी तीव्र इच्छा होनी ही चाहिये। महर्षि वसिष्ठ तो शम, दम, सत्यादि गुणोंसे रहित मनुष्यको मनुष्य ही नहीं मानते। वे कहते हैं—
येषां गुणेष्वसंतोषो रागो येषां श्रुतं प्रति ।
सत्यव्यसनिनो ये च ते नराः पशवोऽपरे ॥
( स्थिति-प्रकरण ३२ । ४० )
'जिनका (इन शम-दमादि) गुणोंके विषयमें संतोष नहीं है (इनको जो बढ़ाना ही चाहते हैं), जिनका शास्त्रके प्रति अनुराग है तथा जिनको सत्यके आचरणका ही व्यसन है, वे ही वास्तवमें मनुष्य हैं, दूसरे तो पशु ही हैं।'
अतएव सच्चे कल्याणकामी पुरुषोंको इन शास्त्रानुमोदित गुणोंसे सम्पन्न होकर परमात्माके यथार्थ ज्ञानकी प्राप्तिके लिये पूर्णरूपसे साधनाभ्यास करना चाहिये। इसके लिये सच्चे महात्मा पुरुषोंका सङ्ग तथा सेवन (उनके कथनानुसार जीवन-निर्माण) आवश्यक है। इसके बिना कोरे तप, तीर्थ या शास्त्राध्ययनसे सफलता नहीं मिलती। पर महात्मा सच्चे होने चाहिये। और कुछ न हो तो इतना अवश्य देख ले कि हम जिनका सङ्ग करते हैं, उनकी संगतिसे दुर्गुणों-दुराचारोंका
* योगवासिष्ठका साध्य-साधन * १३
नाश होता है या नहीं। उनके जीवनगत सहस्र शास्त्रप्रतिपादित आचरणोंसे हमें दुराचार-दुर्गुणोंके त्याग और सदाचार-सद्गुणोंके ग्रहणके लिये प्रेरणा मिलती है या नहीं। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—
लोभमोहरुषां यस्य तनुतानुदिनं भवेत्।
यथाशास्त्रं विहरति स्वकर्मसु स सज्जनः॥
(स्थिति-प्रकरण ३३।१५)
'जिसके सङ्गसे लोभ, मोह और क्रोध प्रतिदिन क्षीण होते हैं और जो शास्त्रके अनुसार अपने कर्मोंका आचरण करनेमें लगा रहता हो, वह सत् पुरुष है।'
मोक्षके द्वारपर निवास करनेवाले ये चार द्वारपाल बतलाये गये हैं—शम, विचार, संतोष और साधुसङ्ग । इन चारोंकी भलीभाँति सेवा की जाती है तो ये मोक्षरूपी राज-प्रासादका द्वार खोल देते हैं।
ऐसे सैकड़ों, हजारों वचन इस महान् ग्रन्थमें हैं, जिनमें शास्त्रोक्त आचरण, संयम, नियम आदि साधनोंकी उपादेयता और नितान्त प्रयोजनीयताका उपदेश भरा है।
योगवासिष्ठमें दैवकी बड़ी निन्दा तथा पौरुषकी प्रशंसा की गयी है। एवं निष्कामभावसे सावधानीके साथ शास्त्रानुकूल सत्कर्म करनेपर बहुत जोर दिया गया है। महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—
यस्तूदारचमत्कारः सदाचारविहारवान्।
स निर्याति जगन्मोहान्मृगेन्द्रः पञ्जरादिव॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ६।२८)
व्यवहारसहस्राणि यान्युपायान्ति यान्ति च।
यथाशास्त्रं विहर्तव्यं तेषु त्यक्त्वा सुखासुखे॥
यथाशास्त्रमनुच्छिन्नां मर्यादां स्वामनुज्झतः।
उपतिष्ठन्ति सर्वाणि रत्नान्यम्बुनिधाविव॥
स्वार्थप्रापककार्यैकप्रयत्नपरता बुधैः।
प्रोक्ता पौरुषशब्देन सा सिद्धयै शास्त्रयन्त्रिता॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ६।३०-३२)
'जो पुरुष उदार-स्वभाव तथा सत्कर्मके सम्पादनमें कुशल है, सदाचार ही जिसका विहार है, वह जगत्के मोह-पाशसे
सं० यो० व० अं० २—
वैसे ही निकल जाता है, जैसे पिंजरेसे सिंह । संसारमें आने-जानेवाले सहस्रों व्यवहार हैं। उनमें सुख और दुःख-बुद्धिका त्याग करके शास्त्रानुकूल आचरण करना चाहिये । शास्त्रके अनुकूल और कभी उच्छिन्न न होनेवाली अपनी मर्यादाका जो त्याग नहीं करता, उस पुरुषको समस्त अभीष्ट वस्तुएँ वैसे ही प्राप्त हो जाती हैं, जैसे सागरमें गोता लगानेवालेको रत्नोंका समूह । जिसमें अपना मानव-जीवनका प्रधान कार्य—स्वार्थ सधता हो, उस स्वार्थकी प्राप्ति करानेवाले साधनोंमें ही तत्पर हो रहनेको विद्वान्लोग 'पौरुष' कहते हैं'।
ये समुद्योगमुत्सृज्य स्थिता दैवपरायणाः।
ते धर्ममर्थं कामं च नाशयन्त्यात्मविद्विषः॥
(मुमुक्षु प्रकरण ७।३)
'जो लोग उद्योगका त्याग करके केवल दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोका नाश कर डालते हैं। वे आलसी मनुष्य आप ही अपने शत्रु हैं।'
अशुभेषु समाविष्टं शुभेष्वेवावतारयेत्।
प्रयत्नाच्चित्तमित्येष सर्वशास्त्रार्थसंग्रहः॥
यच्छ्रेयो यदनुच्छं च यदपायविवर्जितम्।
तत्तदाचर यत्नेन पुत्रेति गुरवः स्थिताः॥
(मुमुक्षु-प्रकरण ७।१२-१३)
'अशुभ कर्मोंमें लगे हुए मनको वहाँसे हटाकर प्रयत्नपूर्वक शुभ कर्मोंमें लगाना चाहिये। यह सब शास्त्रोंके सारका संग्रह है। जो वस्तु कल्याणकारी है, वह तुच्छ नहीं है (वही सबसे श्रेष्ठ है)। तथा जिसका कभी नाश नहीं होता, उसीका यत्नपूर्वक आचरण करना चाहिये—गुरुजन यही उपदेश देते हैं।'
जीवनमुक्तके लक्षण बतलाते हुए महर्षि वसिष्ठ कहते हैं—
यथास्थितमिदं यस्य व्यवहारवतोऽपि च।
अस्तं गतं स्थितं व्योम जीवन्मुक्तः स उच्यते॥
नोदैत्यनिष्टतां यातो जाग्रत्येव सुषुप्तवत्।
य आस्ते व्यवहर्तैव जीवन्मुक्तः स उच्यते॥
नोदेति नास्तमायाति सुखे दुःखे मुखप्रभा।
यथाप्राप्तस्थितेर्यस्य जीवन्मुक्तः स उच्यते॥
१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *
यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते । यस्य निर्वासनो बोधो जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ यस्य नाहंकृतो भावो यस्य बुद्धिर्न लिप्यते । कुर्वतोऽकुर्वतो वापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ यस्योन्मेषनिमेषार्द्धाद्विदः प्रलयसम्भवौ । पश्येत् त्रिलोक्याः स्वसमः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोन्मुक्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ( उत्पत्ति-प्रकरण ९ । ४-७, ९-१२ )
'यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषकी दृष्टिमें यह जगत् ज्यों-का-त्यों बना हुआ ही विलीन हो जाता है और आकाशके समान शून्य प्रतीत होने लगता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो व्यवहारमें लगा हुआ ही एकमात्र बोधनिष्ठा-को प्राप्त होकर जाग्रद्-अवस्थामें भी सुषुप्त पुरुषकी भाँति राग-द्वेष, हर्ष-शोकादिसे रहित हो जाता है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं। जिसके मुखकी कान्ति सुखमें उदित नहीं होती-जगमगाती नहीं और दुःखमें अस्त-फीकी नहीं हो जाती और जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तोषपूर्वक जो जीवन-निर्वाह करता है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो निर्विकार आत्मामें सुषुप्तिकी तरह स्थित रहता हुआ भी अविद्यारूप निद्राका निवारण हो जानेसे सदा जागता रहता है, पर जो जाग्रत् भी नहीं है, भोग-जगत्में सदा सोया हुआ है अर्थात् भोगबुद्धिसे जो किसी भी पदार्थका उपभोग नहीं करता और जिसका ज्ञान वासनारहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसमें अहङ्कारका भाव नहीं है, जिसकी बुद्धि कर्म करते समय कर्तृत्वके और कर्म न करते समय अकर्तृत्वके अभिमानसे लिप्त नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप परमात्माके किञ्चित् उन्मेष तथा निमेषमें ही तीनों लोकोंकी प्रलय तथा उत्पत्ति देखता है और जिसका सबके प्रति समान आत्मभाव है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। न तो जिससे लोगोंको उद्वेग होता है और न लोगोंसे जिसको उद्वेग होता है तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे रहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिसकी संसारके प्रति सत्यता-बुद्धि नहीं रही है, जो अवयवयुक्त दीखनेपर भी वस्तुतः अवयव-
रहित है। जो चित्तयुक्त होकर भी वास्तवमें चित्तसे रहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है।' जीवन्मुक्तकी इस स्वरूप-व्याख्यासे पता लगता है कि यथार्थ ज्ञान ही जीवन्मुक्तका स्वरूप होता है। केवल मौखिक ज्ञान तो प्रदर्शनमात्र तथा ढोंगकी चीज है।
योगवासिष्ठमें योगके साधन तथा योगसिद्धियोंका एवं योगभूमिकाओंका भी महत्त्वपूर्ण प्रतिपादन है। उनका मर्म बिना अनुभवी योगसिद्ध गुरुके समझमें आना बहुत कठिन है। योगवासिष्ठमें दर्शन तथा योगसम्बन्धी ऐसे-ऐसे शब्द आये हैं, जिनका अर्थ समझना केवल भाषाज्ञानसाध्य नहीं, परन्तु साधन-साध्य है।
योगवासिष्ठमें कर्म और भक्तिका कहीं निषेध नहीं है। कर्मकी तो परमावश्यकता ही बतलायी है। पौरुष कर्ममय ही होता है। अवश्य ही वह कर्म होना चाहिये कामना, आसक्ति तथा अहंकारसे रहित। यद्यपि भक्तिका वैष्णवशास्त्रों-जैसा वर्णन नहीं है, तथापि सदाचार-सत्सङ्गमूलक उपासनाका जगह-जगह प्रतिपादन है। प्रह्लादके प्रसङ्गसे भक्तिकी भी बहुत बातें आयी हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्रको पूर्णब्रह्म बतलाकर स्वयं वसिष्ठने नमस्कार किया है। महर्षि भरद्वाजने अपने तथा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीमें भेद बतलाते हुए महर्षि वाल्मीकिजीसे कहा है—
श्रीरामचन्द्रजी तो परम योगी, समस्त विश्वके वन्दनीय, देवताओंके ईश्वर, अजन्मा, अविनाशी, विशुद्ध ज्ञान-स्वभाव, समस्त गुणोंके निधान, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके आधार एव तीनों लोकोंके उत्पादन, संरक्षण और अनुग्रह करनेवाले हैं—
स खलु परमयोगी विश्ववन्द्यः सुरेश्वरो जननमरणहीनः शुद्धबोधस्वभावः। सकलगुणनिधानं सन्निधानं रमाया- स्त्रिजगदुदयरक्षानुग्रहाणामधीशः ॥ नि० प्र० पूर्वार्ध ० १२७ । २)
महर्षि विश्वामित्रने भगवान श्रीरामचन्द्रकी बहुत बड़ी महिमाका गान किया है और वसिष्ठादि सभी उसे सुनकर अत्यन्त आह्लादित हुए हैं।
.. इसी श्रीरामचन्द्रजीका अज्ञानी बनकर ज्ञान प्राप्त करनेकी