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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

२३२ संस्कारविधिः इस प्रकार प्रमाणों के अनुसार जब घर बन चुके, तब प्रवेश करते समय क्या-क्या विधि करनी, वह नीचे लिखे प्रमाणे जानो— अथ विधि—जब घर बन चुके, तब उसकी अच्छे प्रकार शुद्धि करा, चारों दिशाओं के बाहरवाले द्वारों में चार वेदी और एक वेदी घर के मध्य बनावे, अथवा तांबे का वेदी के समान कुण्ड बनवा लेवे कि जिससे सब ठिकाने एक कुण्ड ही में काम हो जावे। सब प्रकार की सामग्री, अर्थात् पृष्ठ २३-२४ में लिखे प्रमाणे समिधा, घृत, चावल, मिष्ट, सुगन्ध, पुष्टिकारक द्रव्यों को लेके शोधन कर प्रथम दिन रख लेवे। जिस दिन गृहपति का चित्त प्रसन्न होवे, उसी शुभ दिन में गृहप्रतिष्ठा करे। वहाँ ऋत्विज्, होता, अध्वर्यु और ब्रह्मा का वरण करे, जोकि धर्मात्मा, विद्वान् हों। वे सब वेदी से पश्चिम दिशा में बैठें। उनमें से होता का आसन पश्चिम में और उसपर वह पूर्वाभिमुख, अध्वर्यु का आसन उत्तर में उसपर वह दक्षिणाभिमुख, उद्गाता का पूर्व दिशा में आसन उसपर वह पश्चिमाभिमुख बैठे और ब्रह्मा का दक्षिण दिशा में उत्तमासन बिछाकर उसे उत्तराभिमुख बैठावे। इस प्रकार चारों आसनों पर चारों पुरुषों को बैठावे और गृहपति सर्वत्र पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठा करे। ऐसे ही घर के मध्य वेदी के चारों ओर दूसरे आसन बिछा रक्खे। पश्चात् निष्क्रम्यद्वार, जिस द्वार से मुख्य करके घर से निकलना और प्रवेश करना होवे, अर्थात् जो मुख्य द्वार हो, उसी द्वार के समीप ब्रह्मा-सहित बाहर ठहर कर— ओम् अच्युताय भौमाय स्वाहा ॥ इससे एक आहुति देकर, ध्वजा का स्तम्भ जिसमें ध्वजा लगाई हो, खड़ा करे और घर के ऊपर चारों कोणों पर चार ध्वजा खड़ी करे तथा कार्यकर्त्ता गृहपति स्तम्भ खड़ा करके

गृहाश्रमप्रकरणम् २३३ उसके मूल में जल से सेचन करे, जिससे वह दृढ़ रहे। पुनः द्वार के सामने बाहर जाकर नीचे लिखे चार मन्त्रों से जलसेचन करे— ओ३म् इमामुच्छ्रयामि भुवनस्य नाभिं वसोर्द्धारां प्रतरणीं वसूनाम्। इहैव ध्रुवां निमिनोमि शालां क्षेमे तिष्ठतु घृतमुक्ष्‍यमाणा ॥ १ ॥ इस मन्त्र से पूर्व द्वार के सामने जल छिटकावे। अश्वावती गोमती सूनृतावत्युच्छ्रयस्व महते सौभगाय। आ त्वा शिशुराक्रन्दत्वा गावो धेनवो वाश्यमानाः ॥ २ ॥ इस मन्त्र से दक्षिण द्वार। आ त्वा कुमारस्तरुण आ वत्सो जगदैः सह। आ त्वा परिस्रुतः कुम्भ आ दध्नः कलशैरुप। क्षेमस्य पत्नी बृहती सुवासा रयिं नो धेहि सुभगे सुवीर्यम् ॥ ३ ॥ इस मन्त्र से पश्चिम द्वार। अश्वावद् गोमदूर्जस्वत् पर्णं वनस्पतेरिव। अभि नः पूर्यताँꣳ रयिरिदमनुश्रेयो वसानः ॥ ४ ॥ इस मन्त्र से उत्तर द्वार के सामने जल छिटकावे। तत्पश्चात् सब द्वारों पर पुष्प और पल्लव तथा कदली-स्तम्भ वा कदली के पत्ते भी द्वारों की शोभा के लिए लगाकर, पश्चात् गृहपति— हे ब्रह्मन्! प्रविशामीति। ऐसा वाक्य बोले। और ब्रह्मा— वरं भवान् प्रविशतु॥ ऐसा प्रत्युत्तर देवे। और ब्रह्मा की अनुमति से— ओ३म् ऋचं प्रपद्ये शिवं प्रपद्ये ॥ इस वाक्य को बोलके भीतर प्रवेश करे और जो घृत गरम कर, छान, सुगन्ध मिलाकर रक्खा हो, उसे पात्र में लेके जिस द्वार से प्रथम प्रवेश करे, उसी द्वार से प्रवेश करके, पृष्ठ २९- ३२ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान, जलप्रोक्षण,

२३४ संस्कारविधिः आचमन करके पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे घृत की आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार, नवमी स्विष्टकृत् आज्याहुति एक, अर्थात् दिशाओं की द्वारस्थ वेदियों में अग्न्याधान से लेके स्विष्टकृत् आहुतिपर्यन्त विधि करके, पश्चात् पूर्वदिशा द्वारस्थ कुण्ड में— ओं प्राच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओम् दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से पूर्व द्वारस्थ वेदी में दो घृताहुति देवे। वैसे ही— ओं दक्षि॑णाया दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से दक्षिण द्वारस्थ वेदी में एक-एक मन्त्र करके दो आज्याहुति और— ओं प्र॒तीच्या॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इन दो मन्त्रों से दो आज्याहुति पश्चिम दिशा द्वारस्थ कुण्ड में देवे। ओं उदी॑च्या दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इनसे उत्तर दिशास्थ वेदी में दो आज्याहुति देवे। पुनः मध्यशालास्थ वेदी के समीप जाके स्व-स्व दिशा में बैठके— ओं ध्रुवाया॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑॥ इनसे मध्य वेदी में दो आज्याहुति।

गृहाश्रमप्रकरणम् २३५ ओं ऊ॒र्ध्वाया॑ दिशः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ इनसे भी दो आहुति मध्यवेदी में। और— ओं दि॒शोदि॑शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑। ओं दे॒वेभ्यः॒ स्वाहा॑भ्यः॒ स्वाहा॑ ॥ इनसे भी दो आज्याहुति मध्यस्थ वेदी में देके, पुनः पूर्व दिशास्थ द्वारस्थ वेदी में अग्नि को प्रज्वलित करके वेदी के दक्षिणभाग में ब्रह्मासन तथा होता आदि के आसन पूर्वोक्त प्रकार बिछवा, उसी वेदी के उत्तरभाग में एक कलश स्थापन कर, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक बनाके, प्रथम निष्क्रम्यद्वार के समीप जा, ठहरकर ब्रह्मादिसहित गृहपति मध्यशाला में प्रवेश करके ब्रह्मादि को दक्षिणादि आसन पर बैठा, स्वयं पूर्वाभिमुख बैठके संस्कृत घी, अर्थात् जो गरम कर, छान, जिसमें कस्तूरी आदि सुगन्ध मिलाया हो, पात्र में लेके सबके सामने एक- एक पात्र भरके रक्खे और चमसा में लेके— ओं वास्तो॑ष्पते॒ प्रति॑ जानीह्य॒स्मान्त्स्वा॑वे॒शो अ॑नमी॒वो भ॑वा नः । यत्त्वेम॑हे॒ प्रति॒ तन्नो॑ जुषस्व॒ शं नो॑ भव द्विपदे॒ शं चतु॑ष्पदे॒ स्वाहा॑ ॥ १ ॥ वास्तो॑ष्पते॒ प्रतर॑णो न एधि गय॒स्फानो॑ गोभि॒रश्वे॑भिरिन्दो । अ॒जरा॑सस्ते स॒ख्ये स्या॑म पि॒तेव॑ पु॒त्रान् प्रति॑ नो जुषस्व॒ स्वाहा॑ ॥ २ ॥ वास्तो॑ष्पते श॒ग्मया॑ सं॒सदा॑ ते सक्षीमहिं रण्वया॑ गा॒तुमत्या॑। पा॒हि क्षेम॑ उ॒त योगे॒ वरं॑ नो यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ —ऋ० मं० ७। सू० ५४ ॥

२३६ संस्कारविधिः अमी॒वहा वास्तोष्पते॒ विश्वा॑ रू॒पाण्या॒विश॑न् । सखा॑ सु॒शेव॑ एधि न॒ः स्वाहा॑ ॥ ४ ॥ —ऋ० मं० ७ । सू० ५५ । मं० १ ॥ इन चार मन्त्रों से चार आज्याहुति देके, जो स्थालीपाक, अर्थात् भात बनाया हो, उसे दूसरे कांसे के पात्र में लेके, उसपर यथायोग्य घृत सेचन करके अपने-अपने सामने रक्खें और पृथक्-पृथक् थोड़ा-थोड़ा लेकर— ओम् अग्निमिन्द्रं बृहस्पतिं विश्वाँश्च देवानुपह्वये । सरस्वतीञ्च वाजीञ्च वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ १ ॥ सर्पदेवजनान्सर्वान् हिमवन्तः सुदर्शनम् । वसूँश्च रुद्रानादित्यानीशानं जगदैः सह । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ २ ॥ पूर्वाह्नमपराह्रं चोभौ मध्यन्दिना सह । प्रदोषमर्धरात्रं च व्युष्टां देवीं महापथाम् । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ३ ॥ ओं कर्तारञ्च विकर्तारं विश्वकर्माणमोषधींश्च वनस्पतीन् । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु मे दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ४ ॥ धातारं च विधातारं निधीनां च पतिः सह । एतान्सर्वान् प्रपद्येहं वास्तु में दत्त वाजिनः स्वाहा ॥ ५ ॥ स्योनः शिवमिदं वास्तु दत्तं ब्रह्मप्रजापती । सर्वांश्च देवताश्च स्वाहा ॥ ६ ॥ स्थालीपाक, अर्थात् घृतयुक्त भात की इन छह मन्त्रों से छह आहुति देकर कांस्यपात्र में उदुम्बर=गूलर और पलाश के पत्ते, शाड्वल=तृणविशेष, गोमय, दही, मधु, घृत, कुशा और यव को लेके उन सब वस्तुओं को मिलाकर— ओं श्रीश्च त्वा यशश्च पूर्वे सन्धौ गोपायेताम्। इस मन्त्र से पूर्व द्वार।

गृहाश्रमप्रकरणम् २३७ यज्ञश्च त्वा दक्षिणा च दक्षिणे सन्धौ गोपायेताम्॥ इससे दक्षिण द्वार। अन्नञ्च त्वा ब्राह्मणश्च पश्चिमे सन्धौ गोपायेताम्॥ इससे पश्चिम द्वार। ऊर्कू चत्वा सूनृता चोत्तरे सन्धौ गोपायेताम्॥ इससे उत्तर द्वार के समीप उनको बिखेरे और जलप्रोक्षण भी करे। केता च मा सुकेता च पुरस्ताद् गोपायेतामित्यग्निर्वै केताऽऽदित्यः सुकेता तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मा पुरस्ताद् गोपायेताम्॥१॥ इससे पूर्व दिशा में परमात्मा का उपस्थान करके दक्षिण द्वार के सामने दक्षिणाभिमुख होके- दक्षिणतो गोपायमानं च मा रक्षमाणा च दक्षिणतो गोपायेतामित्यहर्वै गोपायमानःरात्री रक्षमाणा ते प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु ते मा दक्षिणतो गोपायेताम्॥२॥ इस प्रकार जगदीश का उपस्थान करके पश्चिम द्वार के सामने पश्चिमाभिमुख होके- दीदिविश्च मा जागृविश्च पश्चाद् गोपायेतामित्यन्नं वै दीदिविः प्राणो जागृविस्तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मा पश्चाद् गोपायेताम्॥३॥ इस प्रकार पश्चिम दिशा में सर्वरक्षक परमात्मा का उपस्थान करके उत्तर दिशा में उत्तर द्वार के सामने उत्तराभिमुख खड़े रहके- अस्वप्नश्च माऽनवद्राणश्चोत्तरतो गोपायेतामिति चन्द्रमा वा अस्वप्नो वायुरनवद्राणस्तौ प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मोत्तरतो गोपायेताम्॥४॥ धर्मस्थूणाराइजथं श्रीसूर्य्यामहोरात्रे द्वारफलके। इन्द्रस्य गृहा वसुमन्तो वरूथिनस्तानहं प्रपद्ये सह प्रजया पशुभिस्सह। यन्मे किञ्चिदस्त्युपहूतः सर्वगणः सखा यः साधुसंमतस्तां त्वा शाले अरिष्टवीरा गृहा नः सन्तु सर्वतः॥५॥

२३८ संस्कारविधिः इस प्रकार उत्तर दिशा में सर्वाधिष्ठाता परमात्मा का उपस्थान करके सुपात्र, वेदवित्, धार्मिक होता आदि सपत्नीक ब्राह्मण तथा इष्ट-मित्र और सम्बन्धियों को उत्तम भोजन कराके, यथायोग्य सत्कार करके दक्षिणा दे, पुरुषों को पुरुष और स्त्रियों को स्त्री प्रसन्नतापूर्वक विदा करें और वे जाते समय गृहपति और गृहपत्नी आदि को— 'सर्वे भवन्तोऽत्राऽनन्दिताः सदा भूयासुः॥' इस प्रकार आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को जावें। इसी प्रकार आराम आदि की भी प्रतिष्ठा करें। इसमें इतना ही विशेष है कि जिस ओर का वायु बगीचे को जावे, उसी ओर होम करे कि जिसका सुगन्ध वृक्ष आदि को सुगन्धित करे। यदि उसमें घर बना हो तो शाला के समान उसकी भी प्रतिष्ठा करे। इति शालादिसंस्कारविधिः ॥ इस प्रकार गृहादि की रचना करके गृहाश्रम में जो-जो अपने-अपने वर्ण के अनुकूल कर्त्तव्य कर्म हैं, उन-उनको यथावत् करें। अथ ब्राह्मणस्वरूपलक्षणम् अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहश्चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥ १॥ —मनु० ॥ शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ २॥ —गीता ॥ अर्थ—एक—निष्कपट होके प्रीति से पुरुष पुरुषों को और स्त्री स्त्रियों को पढ़ावें। दो—पूर्ण विद्या पढ़ें। तीन—अग्निहोत्रादि यज्ञ करें। चौथा—यज्ञ करावें। पाँच—विद्या अथवा सुवर्ण आदि का सुपात्रों को दान देवें। छठा—न्याय से धनोपार्जन

गृहाश्रमप्रकरणम् २३९ करनेवाले गृहस्थों से दान लेवें भी। इनमें से तीन कर्म—पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना धर्म* हैं और तीन कर्म—पढ़ाना, यज्ञ कराना, दान लेना जीविका हैं। परन्तु— प्रतिग्रहः प्रत्यवरः ॥ —मनु० जो दान लेना है वह नीच कर्म है, किन्तु पढ़ाके और यज्ञ कराके जीविका करनी उत्तम है ॥ १ ॥ (शमः) मन को अधर्म में न जाने दे, किन्तु अधर्म करने की इच्छा भी न उठने देवे। (दमः) श्रोत्रादि इन्द्रियों को अधर्माचरण से सदा दूर रक्खे, दूर रखके धर्म ही के बीच में प्रवृत्त रक्खे। (तपः) ब्रह्मचर्य, विद्या, योगाभ्यास की सिद्धि के लिए शीत-उष्ण, निन्दा-स्तुति, क्षुधा-तृषा, मानापमान आदि द्वन्द्व का सहना। (शौचम्) राग-द्वेष-मोहादि से मन और आत्मा को तथा जलादि से शरीर को सदा पवित्र रखना। (क्षान्तिः) क्षमा, अर्थात् कोई निन्दा-स्तुति आदि से सतावें तो भी उनपर कृपालु रहकर क्रोधादि का न करना। (आर्जवम्) निरभिमान रहना, दम्भ, स्वात्मश्लाघा, अर्थात् अपने मुख से अपनी प्रशंसा न करके नम्र, सरल, शुद्ध, पवित्रभाव रखना। (ज्ञानम्) सब शास्त्रों को पढ़के, विचारकर उनके शब्दार्थ-सम्बन्धों को यथावत् जानकर पढ़ाने का पूर्ण सामर्थ्य करना। (विज्ञानम्) पृथिवी से लेके परमेश्वर-पर्यन्त पदार्थों को जान और क्रियाकुशलता तथा


  • धर्म नाम न्यायाचरण। न्याय नाम पक्षपात छोड़ के वर्तना। पक्षपात छोड़ना नाम सर्वदा अहिंसादि निर्वैरता सत्यभाषणादि में स्थिर रहकर, हिंसा-द्वेषादि और मिथ्याभाषणादि से सदा पृथक् रहना। सब मनुष्यों का यही एक धर्म है। किन्तु जो-जो धर्म के लक्षण वर्ण-कर्मों में पृथक्-पृथक् आते हैं, इसी से चार वर्ण पृथक्- पृथक् गिने जाते हैं।

२४० संस्कारविधिः योगाभ्यास से साक्षात् करके यथावत् उपकार ग्रहण करना- कराना। (आस्तिक्यम्) परमेश्वर, वेद, धर्म, परलोक, परजन्म, पूर्वजन्म, कर्मफल और मुक्ति से विमुख कभी न होना। ये नव कर्म और गुण धर्म में समझना। सबसे उत्तम गुण-कर्म-स्वभाव को धारण करना। ये गुण-कर्म जिन व्यक्तियों में हों वे ब्राह्मण और ब्राह्मणी होवें। विवाह भी इन्हीं वर्ण के गुण-कर्म-स्वभावों को मिलाके ही करें। मनुष्यमात्र में से इन्हीं को ब्राह्मण वर्ण का अधिकार होवे॥ २ ॥ अथ क्षत्रियस्वरूपलक्षणम् प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः॥ १ ॥ —मनु० ॥ शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रकर्म स्वभावजम्॥ २ ॥ —गीता ॥ **अर्थ—**दीर्घ ब्रह्मचर्य से (अध्ययनम्) साङ्गोपाङ्ग वेदादि शास्त्रों को यथावत् पढ़ना, (इज्या) अग्निहोत्रादि यज्ञों को करना, (दानम्) सुपात्रों को विद्या, सुवर्ण आदि और प्रजा को अभयदान देना, (प्रजानां रक्षणम्) प्रजाओं का सब प्रकार से सर्वदा यथावत् पालन करना, यह धर्म क्षत्रियों के धर्म के लक्षणों में और शस्त्रविद्या का पढ़ाना, न्यायघर और सेना में जीविका करना क्षत्रियों की जीविका है। (विषयेष्वप्रसक्तिः) विषयों में अनासक्त होके सदा जितेन्द्रिय रहना। लोभ, व्यभिचार, मद्यपानादि नशा आदि दुर्व्यसनों से पृथक् रहकर विनय, सुशीलवादि शुभ कर्मों में सदा प्रवृत्त रहना॥ १ ॥ (शौर्यम्) शस्त्र-संग्राम, मृत्यु और शस्त्र-प्रहारादि से न डरना, (तेजः) प्रगल्भता, उत्तम प्रतापी होकर किसी के सामने दीन वा भीरु न होना, (धृतिः) चाहे कितनी ही आपत्-विपत्,

गृहाश्रमप्रकरणम् क्लेश-दुःखं प्राप्त हो तथापि धैर्य रखके कभी न घबराना, २४१ (दाक्ष्यम्) संग्राम, वाग्युद्ध, दूतत्व, न्याय, विचार आदि सबमें अतिचतुर, बुद्धिमान् होना, (युद्धे चाप्यपलायनम्) युद्ध में सदा उद्यत रहना, युद्ध से घबराकर शत्रु के वश में कभी न होना, (दानम्) इसका अर्थ प्रथम श्लोक में आ गया। (ईश्वरभावः) जैसे परमेश्वर सबके ऊपर दया करके पितृवत् वर्त्तमान, पक्षपात छोड़कर धर्माऽधर्म करनेवालों को यथायोग्य सुख-दुःखरूप फल देता और अपने सर्वज्ञता आदि साधनों से सबका अन्तर्यामी होकर सबके अच्छे-बुरे कर्मों को यथावत् देखता है, वैसे प्रजा के साथ वर्त्तकर गुप्त दूत आदि से अपने को सर्वप्रजा वा राजपुरुषों के अच्छे-बुरे कर्मों से सदा ज्ञात रखना। रात-दिन न्याय करने और प्रजा को यथावत् सुख देने, श्रेष्ठों का मान और दुष्टों को दण्ड करने में सदा प्रवृत्त रहना और सब प्रकार से अपने शरीर को रोगरहित, बलिष्ठ, दृढ़, तेजस्वी, दीर्घायु रखके आत्मा को न्यायधर्म में चलाकर कृतकृत्य करना आदि गुण-कर्मों का योग जिस व्यक्ति में हो वह क्षत्रिय और क्षत्रिया होवे। इनका भी इन्हीं गुण-कर्मों के मेल से विवाह करना और जैसे ब्राह्मण पुरुषों और ब्राह्मणी स्त्रियों को पढ़ावे, वैसे ही राजा पुरुषों, राणी स्त्रियों का न्याय तथा उन्नति सदा किया करे। जो क्षत्रिय राजा न हों वे भी राज में ही यथाधिकार से नौकरी किया करें ॥ २ ॥ अथ वैश्यस्वरूपलक्षणम् पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च। वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ —मनु० ॥ अर्थ—(अध्ययनम्) वेदादि शास्त्रों का पढ़ना, (इज्या) अग्निहोत्रादि यज्ञों का करना, (दानम्) अन्नादि का दान देना, ये तीन धर्म के लक्षण हैं और (पशूनां रक्षणम्) गाय आदि

२४२ संस्कारविधिः पशुओं का पालन करना, उनके दुग्धादि का बेचना, (वणिक्पथम्) नाना देशों की भाषा, हिसाब, भूगर्भविद्या, भूमि, बीज आदि के गुण जानना और सब पदार्थों के भावाभाव समझना, (कुसीदम्) ब्याज का लेना*, (कृषिमेव च) खेती की विद्या का जानना, अन्न आदि की रक्षा, खाद और भूमि की परीक्षा, जोतना-बोना आदि व्यवहार का जानना, ये चार कर्म वैश्य की जीविका है। ये गुण-कर्म जिस व्यक्ति में हों वह वैश्य- वैश्या और इन्हीं की परस्पर परीक्षा और योग से विवाह होना चाहिए ॥ अथ शूद्रस्वरूपलक्षणम् एकमेव हि शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ -मनु० ॥ अर्थ- (प्रभुः) परमेश्वर ने (शूद्रस्य) जो विद्याहीन, जिसको पढ़ने से भी विद्या न आ सके, शरीर से पुष्ट, सेवा में कुशल हो, उस शूद्र के लिए (एतेषामेव वर्णानाम्) इन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों की (अनसूयया) निन्दा से रहित, प्रीति से सेवा करना, (एकमेव कर्म) यही एक कर्म (समादिशत्) करने की आज्ञा दी है। ये मूर्खत्वादि गुण और सेवा आदि कर्म जिस व्यक्ति में हों वह शूद्र और शूद्रा है। इन्हीं की परीक्षा से इनका विवाह और इनको अधिकार भी ऐसा ही होना चाहिए ॥ इन गुण-कर्मों के योग ही से चारों वर्ण होवें तो उस कुल, देश और मनुष्यसमुदाय की बड़ी उन्नति होवे और जिनका जन्म जिस वर्ण में हो उसी के सदृश गुण-कर्म-स्वभाव हों तो

  • सवा रुपये सैकड़े से अधिक, चार आने से न्यून ब्याज न लेवे न देवे। जब दूना धन आ जाए उससे आगे कौड़ी न लेवे न देवे। जितना न्यून ब्याज लेवेगा उतना ही उसका धन बढ़ेगा और कभी धन का नाश और कुसन्तान उसके कुल में न होंगे।

गृहाश्रमप्रकरणम् अतिविशेष है। २४३ अब सब ब्राह्मणादि वर्णवाले मनुष्य लोग अपने-अपने कर्मों में निम्नलिखित रीति से वर्त्ते- वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः। तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १ ॥ नेहेतार्थान् प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा। न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः ॥ २ ॥ अर्थ—ब्राह्मणादि द्विज वेदोक्त अपने कर्म को आलस्य छोड़के नित्य किया करें। उसे अपने सामर्थ्य के अनुसार करते हुए वे मुक्तिपर्यन्त पदार्थों को प्राप्त होते हैं॥१॥ गृहस्थ कभी किसी दुष्ट-प्रसङ्ग से द्रव्य-सञ्चय न करे, न विरुद्ध कर्म से, न विद्यमान पदार्थ होते हुए उन्हें गुप्त रखके, दूसरे से छल करके और चाहे कितना भी दुःख पड़े तथापि अधर्म से द्रव्य-सञ्चय कभी न करे॥२॥ इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः। अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा सन्निवर्तयेत् ॥ ३ ॥ सर्वान्परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः। यथा तथाऽध्यापयँस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ ४ ॥ अर्थ—इन्द्रियों के विषयों में काम से कभी न फँसे और विषयों की अत्यन्त प्रसक्ति, अर्थात् प्रसङ्ग को मनसे अच्छे प्रकार दूर करता रहे॥३॥ जो स्वाध्याय और धर्म-विरोधी व्यवहार वा पदार्थ हैं, उन सबको छोड़ देवे। जिस-किसी प्रकार से विद्या को पढ़ाते रहना ही गृहस्थ का कृतकृत्य होना है॥४॥ बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च। नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमाँश्चैव वैदिकान् ॥ ५ ॥ यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति। तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ॥ ६ ॥

२४४ संस्कारविधिः न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुक्कशैः । न मूर्खैर्नावलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥७॥ नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । आमृत्योः प्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥८॥ सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः ॥९॥ अर्थ—हे स्त्री-पुरुषो ! तुम जो धर्म, धन और बुद्ध्यादि को अत्यन्त शीघ्र बढ़ानेवाले हितकारी शास्त्र हैं उन्हें और वेद के भागों की विद्याओं को नित्य देखा करो ॥५॥ मनुष्य जैसे-जैसे शास्त्र का विचार कर उसके यथार्थ भाव को प्राप्त होता है, वैसे-वैसे अधिक-अधिक जानता है और इसकी प्रीति विज्ञान ही में होती जाती है ॥६॥ सज्जन गृहस्थ लोगों को योग्य है कि जो पतित, दुष्ट कर्म करनेवाले हों उनके साथ तथा, चाण्डाल, कञ्जर, मूर्ख, मिथ्या- भिमानी और नीच निश्चयवाले मनुष्यों के साथ कभी निवास न करें ॥७॥ गृहस्थ लोग जो कभी पहले पुष्कल धनी होके पश्चात् दरिद्र हो जाएँ, उससे अपने आत्मा का अवमान न करें कि 'हाय हम निर्धन हो गये' इत्यादि विलाप भी न करें, किन्तु मृत्युपर्यन्त लक्ष्मी की उन्नति में पुरुषार्थ किया करें और लक्ष्मी को दुर्लभ न समझें ॥८॥ मनुष्य सदैव सत्य बोलें और दूसरे को कल्याणकारक उपदेश करें। काणे को काणा और मूर्ख को मूर्ख आदि अप्रिय वचन उनके सन्मुख कभी न बोलें और जिस मिथ्याभाषण से दूसरा प्रसन्न होता हो, उसे भी न बोलें, यह सनातन धर्म है ॥९॥ अभिवादयेद् वृद्धाँश्च दद्याच्चैवासनं स्वकम्। कृताञ्जलिरुपासीत गच्छतः पृष्ठतोऽन्वियात् ॥१०॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २४५ श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यङ् निबद्धं स्वेषु कर्मसु । धर्ममूलं निषेवेत सदाचारमतन्द्रितः ॥ ११ ॥ आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः । आचाराद् धनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १२ ॥ दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥ १३ ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान् नरः । श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १४ ॥ अर्थ:—सदा विद्यावृद्धों और वयोवृद्धों को 'नमस्ते', अर्थात् उनका मान्य किया क़रे। जब वे अपने समीप आवें तब उठकर मान्यपूर्वक ला अपने आसन पर बैठावे और हाथ जोड़के आप उनके समीप बैठे उनसे प्रश्न पूछे और वे उत्तर देवें और जब वे जानें लगें तब थोड़ी दूर पीछे-पीछे जाकर 'नमस्ते' कर विदा किया करे और वृद्ध लोग हर बार निक़म्मे जहाँ-तहाँ न जाया करें ॥ १० ॥ गृहस्थ सदा आलस्य को छोड़कर वेद और मनुस्मृति में वेदानुकूल कहे हुए अपने कर्मों में निबद्ध और धर्म का मूल सदाचार, अर्थात् सत्य और सत्पुरुष, आप्त, धर्मात्माओं का जो आचरण है, उसका सेवन सदा किया करें ॥ ११ ॥ मनुष्य धर्माचरण ही से दीर्घायु, उत्तम प्रजा और अक्षय धन को प्राप्त होता है तथा धर्माचार बुरे, अधर्मयुक्त लक्षणों का नाश कर देता है ॥ १२ ॥ जो दुष्टाचारी होता है, वह सर्वत्र निन्दित, दुःखभागी और व्याधि से सदा अल्पायु हो जाता है ॥ १३ ॥ जो सब अच्छे लक्षणों से हीन होकर भी सदाचारयुक्त, सत्य में श्रद्धावान् और निन्दा आदि दोषरहित होता है, वह सुख से सौ वर्षपर्यन्त जाता है ॥ १४ ॥

२४६ संस्कारविधिः यद्यत् परवशं कर्म तत्तद् यत्नेन वर्जयेत्। यद्यदात्मवशं तु स्यात् तत्तत् सेवेत यत्नतः॥ १५॥ सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद्विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥ १६॥ अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम्। हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते॥ १७॥ अर्थः—मनुष्य जो-जो पराधीन कर्म हो उस-उसको प्रयल से सदा छोड़े और जो-जो स्वाधीन कर्म हो उस-उसका सेवन प्रयल से किया करे॥ १५॥ क्योंकि जितना परवश होना है वह सब दुःख और जितना स्वाधीन रहना है, वह सब सुख कहाता है। यही संक्षेप से सुख और दुःख का लक्षण जानो॥ १६॥ जो अधार्मिक मनुष्य है और जिसका अधर्म से सञ्चित किया हुआ धन है और जो सदा हिंसा में, अर्थात् वैर में प्रवृत्त रहता है, वह इस लोक और परलोक, अर्थात् परजन्म में सुख को प्राप्त कभी नहीं हो सकता॥ १७॥ नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव। शनैरावर्त्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति॥ १८॥ यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पुत्रेषु नप्तृसु। न त्वेवन्तु कृतोऽधर्मः कर्त्तुर्भवति निष्फलः॥ १९॥ सत्यधर्मार्यवृत्तेषु शौचे चैवारमेत् सदा। शिष्याँश्च शिष्याद् धर्मेण वाग्बाहूदरसंयतः॥ २०॥ अर्थः—मनुष्य निश्चय करके जाने कि इस संसार में जैसे गाय की सेवा का फल दूध आदि शीघ्र नहीं होता, वैसे ही किये हुए अधर्म का फल भी शीघ्र नहीं होता, किन्तु धीरे- धीरे अधर्म कर्त्ता के सुखों को रोकता हुआ सुख के मूलों को काट देता है। पश्चात् अधर्मी दुःख-ही-दुःख भोगता है॥ १८॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २४७ यदि अधर्म का फल कर्त्ता की विद्यमानता में न हो तो पुत्रों और पुत्रों के समय में न हो तो नातियों के समय में अवश्य प्राप्त होता है, किन्तु यह कभी नहीं हो सकता कि कर्त्ता का किया हुआ कर्म निष्फल होवे ॥ १९॥ इसलिए मनुष्यों को योग्य है कि सत्य, धर्म और आर्य, अर्थात् उत्तम पुरुषों के आचरणों और भीतर-बाहर की पवित्रता में सदा रमण करें। अपनी वाणी, बाहू, उदर को नियम और सत्यधर्म के साथ वर्त्तमान रखके शिष्यों को सदा शिक्षा किया करें ॥ २० ॥ परित्यजेदर्थकामौ यौ स्यातां धर्मवर्जितौ । धर्मं चाप्यसुखोदर्कं लोकविक्रुष्टमेव च ॥ २१ ॥ धर्मं शनैस्सञ्चिनुयाद् वल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ २२ ॥ उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं सम्बन्धानाचरेत् सह । निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधमाँस्त्यजेत् ॥ २३ ॥ वाच्यार्था नियताः सर्वे वाङ्मूला वाग्विनिःसृताः । तान्तु यः स्तेनयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः ॥ २४ ॥ स्वाध्यायेन जपैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः । महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ २५ ॥ —मनु० ॥ अर्थ—जो धर्म से वर्जित धनादि पदार्थ और काम हों, उन्हें सर्वथा शीघ्र छोड़ देवे और जो धर्माभास, अर्थात् उत्तरकाल में दुःखदायक कर्म हैं और जो लोगों को निन्दित कर्म में प्रवृत्त करनेवाले कर्म हैं, उनसे भी दूर रहे ॥ २१ ॥ जैसे दीमक धीरे-धीरे बड़े भारी घर को बना लेती है, वैसे मनुष्य परजन्म के सहाय के लिए सब प्राणियों को पीड़ा

२४८ संस्कारविधिः न देकर धर्म का सञ्चय धीरे-धीरे किया करे ॥ २ ॥ जो मनुष्य अपने कुल को उत्तम करना चाहे, वह नीच- नीच पुरुषों का सम्बन्ध छोड़कर नित्य अच्छे-अच्छे पुरुषों से सम्बन्ध बढ़ाता जावे ॥ २३ ॥ जिस वाणी में सब व्यवहार निश्चित, वाणी ही जिनका मूल और जिस वाणी ही से सब व्यवहार सिद्ध होते हैं, जो मनुष्य उस वाणी को चोरता, अर्थात् मिथ्याभाषण करता है, वह जानो सब चोरी आदि पाप ही को करता है। इसलिए मिथ्याभाषण को छोड़के सदा सत्यभाषण ही किया करे ॥ २४ ॥ मनुष्यों को चाहिए कि धर्म से वेदादि शास्त्रों का पठन- पाठन, गायत्री-प्रणवादि का अर्थविचार, ध्यान, अग्निहोत्रादि होम, कर्मोपासना, ज्ञान=विद्या, पौर्णमास्यादि इष्टि, पञ्चमहायज्ञ, अग्निष्टोम आदि, न्याय से राज्यपालन, सत्योपदेश और योगाभ्यासादि उत्तम कर्मों से इस शरीर को ब्राह्मी, अर्थात् ब्रह्मसम्बन्धी करें ॥ २५ ॥ अथ सभास्वरूप लक्षणम्—जो-जो विशेष बड़े-बड़े काम हों जैसाकि राज्य, वे सब सभा से निश्चय करके किये जावें। इसमें प्रमाण— तं सभा॑ च॒ समि॑तिश्च॒ सेना॑ च॒ ॥ १ ॥ —अथर्व० कां० १५। सू० ९। मं० २॥ सभ्य॑ स॒भां मे॑ पाहि॒ ये च॒ सभ्या॑ः सभासद॑ः ॥ २ ॥ —अथर्व० कां० १९। सू० ५५। मं० ६॥ त्रीणि॑ राजाना वि॒दथे॑ पु॒रूणि॒ परि॑ वि॒श्वा॑नि भूषथः सदां॑सि ॥ ३ ॥ —ऋ० मं० ३। सू० ३८। मं० ६॥ अर्थ- (तम्) जोकि संसार में धर्म के साथ राज्यपालनादि किया जाता है, उस व्यवहार को सभा और संग्राम तथा सेना सब प्रकार सञ्चित करे ॥ १ ॥

गृहाश्रमप्रकरणम् २४९ हे सभ्य सभा के योग्य सभापते राजन्! तू (मे) मेरी (सभाम्) सभी की (पाहि) रक्षा और उन्नति किया कर। (ये च) और जो (सभ्याः) सभा के योग्य धार्मिक, आप्त (सभासदः) सभासद्, विद्वान् लोग हैं वे भी सभा की योजना, रक्षा और उससे सबकी उन्नति किया करें॥२॥ जो (राजाना) राजा और प्रजा के भद्र पुरुषों के दोनों समुदाय हैं, वे (विदथे) उत्तम ज्ञान और लाभदायक इस जगत् अथवा संग्रामादि कार्यों में (त्रीणि) राजसभा, धर्मसभा और विद्यासभा, अर्थात् विद्यादि व्यवहारों की वृद्धि के लिए ये तीन प्रकार की (सदांसि) सभा नियत करें। इन्हीं से संसार की सब प्रकार उन्नति करें॥३॥ अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत्। यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुस्स धर्मः स्यादशङ्कितः॥१॥ धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिबृंहणः। ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः॥२॥ अर्थः—हे गृहस्थ लोगो! जो धर्मयुक्त व्यवहार मनुस्मृति आदि में प्रत्यक्ष न कहे हों यदि उनमें शङ्का होवे तो तुम जिसको शिष्ट, आप्त विद्वान् कहें, उसी को शङ्कारहित कर्त्तव्य धर्म मानो॥१॥ शिष्ट सब मनुष्यमात्र नहीं होते, किन्तु जिन्होंने पूर्ण ब्रह्मचर्य और धर्म से साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ें हों, जो श्रुतिप्रमाण और प्रत्यक्षादि प्रमाणों ही से विधि वा निषेध करने में समर्थ, धार्मिक, परोपकारी हों, वे ही शिष्ट पुरुष होते हैं॥२॥ दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्। त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत्॥३॥ त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः। त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत् स्याद् दशावरा॥४॥

२५० संस्कारविधिः ऋग्वेदविद् यजुर्विच्च सामवेदविदेव च। त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये॥५॥ एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः। स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः॥६॥ अर्थ:—वैसे शिष्ट न्यून-से-न्यून दश पुरुषों की सभा होवे, अथवा बड़े विद्वान् तीनों की भी सभा हो सकती है। जो सभा से धर्म-कर्म निश्चित हों, उनका भी आचरण सब लोग करें॥३॥ • उन दशों में इस प्रकार के विद्वान् होवें—तीन वेदों के विद्वान्, चौथा हेतुक, अर्थात् कारण-अकारण का ज्ञाता, पाँचवाँ तर्की= न्यायशास्त्रवित्, छठा निरुक्त का जाननेवाला, सातवाँ धर्मशास्त्रवित्, आठवाँ ब्रह्मचारी, नववाँ गृहस्थ और दशवाँ वानप्रस्थ—इन महात्माओं की सभा होवे॥४॥ तथा ऋग्वेदवित्, यजुर्वेदवित् और सामवेदवित् इन तीनों विद्वानों की भी सभा धर्मसंशय, अर्थात् सब व्यवहारों के निर्णय के लिए होनी चाहिए और जितने सभा में अधिक पुरुष हों, उतनी ही उत्तमता है॥५॥ द्विजों में उत्तम, अर्थात् चतुर्थाश्रमी संन्यासी अकेला भी जिस धर्मव्यवहार के करने का निश्चय करे, वही कर्त्तव्य परमधर्म समझना, किन्तु अज्ञानियों के सहस्रों, लाखों और करोड़ों पुरुषों का कहा हुआ धर्मव्यवहार कभी न मानना चाहिए, किन्तु धर्मात्मा विद्वानों और विशेष परमविद्वान् संन्यासी का वेदादि प्रमाणों से कहा हुआ धर्म सबको मानने योग्य है॥६॥ यदि सभा में मतभेद हो तो बहुपक्षानुसार मानना और समपक्ष में उत्तमों की बात स्वीकार करनी और दोनों पक्षवाले बराबर उत्तम हों तो वहाँ संन्यासियों की सम्मति लेनी। जिधर पक्षपातरहित सर्वहितैषी संन्यासियों की सम्मति होवे, वही उत्तम

गृहाश्रमप्रकरणम् २५१ समझनी चाहिए। चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्द्विजैः। दशलक्षणको धर्मस्सेवितव्यः प्रयत्नतः॥७॥ धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥८॥ —मनु०॥ अर्थ—ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी आदि सब मनुष्यों को योग्य है कि निम्नलिखित धर्म का सेवन और उससे विरुद्ध अधर्म का त्याग प्रयत्न से किया करें॥७॥ धर्म नाम न्याय—पक्षपात छोड़कर सत्य ही का आचरण और असत्य का सर्वदा परित्याग रखना। इस धर्म के ग्यारह लक्षण हैं (अहिंसा) किसी से वैर-बुद्धि करके उसके अनिष्ट करने में कभी न वर्तना। (धृतिः) सुख-दुःख, हानि-लाभ में भी व्याकुल होकर धर्म को न छोड़ना, किन्तु धैर्य से धर्म ही में स्थिर रहना। (क्षमा) निन्दा-स्तुति, मानापमान का सहन करके धर्म ही करना। (दमः) मन को अधर्म से सदा हटाकर धर्म ही में प्रवृत्त रखना। (अस्तेयम्) मन-कर्म-वचन से अन्याय और अधर्म से पराये द्रव्य का स्वीकार न करना। (शौचम्) राग-द्वेषादि त्याग से आत्मा और मन को पवित्र और जलादि से शरीर को शुद्ध रखना। (इन्द्रियनिग्रहः) श्रोत्रादि बाह्य इन्द्रियों को अधर्म से हटाके धर्म में ही चलाना। (धीः) वेदादि सत्यविद्या, ब्रह्मचर्य, सत्सङ्ग करने और कुसङ्ग, दुर्व्यसन, मद्यपानादि त्याग से बुद्धि को सदा बढ़ाते रहना। (विद्या) जिससे भूमि से लेके परमेश्वरपर्यन्त का यथार्थ बोध होता है, उस विद्या को प्राप्त होना। (सत्यम्) सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना। (अक्रोधः) क्रोधादि दोषों को छोड़कर शान्त्यादि गुणों का ग्रहण करना धर्म कहाता है, इसका ग्रहण और अन्याय—पक्षपात-सहित आचरण अधर्म, जोकि हिंसा=वैर-