संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
५० संस्कारविधिः चक्षु॑र्नो दे॒वः स॑वि॒ता चक्षु॑र्न उ॒त पर्व॑तः । चक्षु॑र्धाता द॑धातु नः ॥ ४ ॥ चक्षु॑र्नो धेहि॒ चक्षु॑षे॒ चक्षु॑र्वि॒ख्यै त॒नूभ्यः॑ । सं चे॒दं वि च॑ पश्येम ॥ ५ ॥ सु॒संदृशं॑ त्वा व॒यं प्रति॑ पश्येम सूर्य । वि प॑श्येम नृ॒चक्ष॑सः ॥ ६ ॥ इन मन्त्रों से परमेश्वर का उपस्थान करके, वधू— ओम् अमुंक१ गोत्रा शुभदा अमुक२ दा अहं भो भवन्तमभिवादयामि। ऐसा वाक्य बोलके अपने पति को वन्दन अर्थात् नमस्कार करे। तत्पश्चात् स्वपति के पिता पितामहादि और जो वहाँ अन्य माननीय पुरुष तथा पति की माता तथा अन्य कुटुम्बी और सम्बन्धियों की वृद्ध स्त्रियाँ हों, उनको भी इसी प्रकार वन्दन करे। इस प्रमाणे वधू वर के गोत्र की हुए पश्चात् अर्थात् वधू पत्नीत्व और वर पतित्व को प्राप्त हुए। पश्चात् दोनों पति- पत्नी शुभासन पर पूर्वाभिमुख वेदी के पश्चिम भाग में बैठके वामदेव्यगान करें। तत्पश्चात् यथोक्त३ भोजन दोनों जने करें और पुरोहितादि सब मण्डली को सन्मानार्थ यथाशक्ति भोजन कराके आदर- १. इस ठिकाने वर के गोत्र अथवा वर के कुल का नामोच्चारण करे। २. इस ठिकाने वधू अपना नाम उच्चारण करे। ३. उत्तम सन्तान करने का मुख्य हेतु यथोक्त वधू वर के आहार पर निर्भर है। इसलिए पति-पत्नी अपने शरीर, आत्मा की पुष्टि के लिए बल और बुद्धि आदि की वर्द्धक सर्वौषधि का सेवन करें। सर्वौषधि ये हैं—
गर्भाधानप्रकरणम् ५१ सत्कारपूर्वक सबको विदा करें। इसके पश्चात् रात्रि में नियत समय पर जब दोनों का शरीर आरोग्य, अत्यन्त प्रसन्न और दोनों में अत्यन्त प्रेम बढ़ा हो, उस समय गर्भाधान-क्रिया करनी। गर्भाधान-क्रिया का समय प्रहर रात्रि के गये पश्चात् प्रहर रात्रि रहे तक है। जब वीर्य गर्भाशय में जाने का समय आवे तब दोनों स्थिरशरीर, प्रसन्नवन्दन, मुख के सामने मुख, नासिका के सामने नासिकादि सब सूधा शरीर रक्खें। वीर्य का प्रक्षेप पुरुष करे। जब वीर्य स्त्री के शरीर में प्राप्त हो, उस समय अपना पायु, मूलेन्द्रिय और योनीन्द्रिय को ऊपर संकोच और वीर्य को खैंचकर स्त्री गर्भाशय में स्थिर करे। तत्पश्चात् थोड़ा ठहरके स्नान करे। यदि शीतकाल हो तो प्रथम केसर, कस्तूरी, जायफल, जावित्री, छोटी
दो खण्ड आँबाहल्दी, दूसरी खाने की हल्दी, चन्दन, मुरा (यह नाम दक्षिण में प्रसिद्ध है) कुष्ठ, जटामांसी, मोरवेल (यह भी नाम दक्षिण में प्रसिद्ध है), शिलाजीत, कपूर, मुस्ता, भद्रमोथ। इन सब ओषधियों का चूर्ण करके, सब समभाग लेके, उदुम्बर के काष्ठपात्र में गाय के दूध के साथ मिला उनका दही जमा और उदुम्बर ही की लकड़ी की मन्थनी से मन्थन करके उसमें से मक्खन निकाल उसको ताय, घृत करके, उसमें सुगन्धित द्रव्य केशर, कस्तूरी, जायफल, इलायची, जावित्री मिलाके अर्थात् सेर- भर दूध में छटांकभर पूर्वोक्त सर्वोषधि मिला, सिद्धकर, घी हुए पश्चात् एक सेर में एक रत्ती कस्तूरी और एक मासा केशर और एक-एक मासा जायफलादि भी मिलाके, नित्य प्रातःकाल उस घी में से नित्य होम ३२ पृष्ठ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति ४ चार और पृष्ठ ४१ में लिखे हुए (विष्णुर्योनिं०) इत्यादि ७ सात मन्त्रों के अन्त में स्वाहा शब्द का उच्चारण करके जिस रात्रि में गर्भस्थापन क्रिया करनी हो उसके दिन में होम करके उसी घी को दोनों जने खीर अथवा भात के साथ मिलाके यथारुचि भोजन करें।
५२ संस्कारविधिः इलायची डाल गर्म कर रखे हुए शीतल दूध का यथेष्ट पान करके पश्चात् पृथक्-पृथक् शयन करें। यदि स्त्री-पुरुष को ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाए कि गर्भ स्थिर हो गया तो उसके दूसरे दिन, और जो गर्भ रहे का दृढ़ निश्चय न हो तो एक महीने के पश्चात् रजस्वला होने के समय स्त्री रजस्वला न हो तो निश्चित जानना कि गर्भ स्थित हो गया है। अर्थात् दूसरे दिन वा दूसरे महीने के आरम्भ में निम्नलिखित इस प्रकार गर्भस्थापन करें तो सुशील, विद्वान्, दीर्घायु, तेजस्वी, सुदृढ़ और नीरोग पुत्र उत्पन्न होवे। यदि कन्या की इच्छा हो तो जल में चावल पका पूर्वोक्त प्रकार घृत, गूलर के एक पात्र में जमाये हुए, दही के साथ भोजन करने से उत्तम गुणयुक्त कन्या भी होवे, क्योंकि— ‘‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः॥’’ यह छान्दोग्य० का वचन है, अर्थात् शुद्ध आहार जोकि मद्य- मांसादिरहित घृत, दुग्धादि, चावल, गेहूँ आदि के करने से अन्तःकरण की शुद्धि, बल, पुरुषार्थ, आरोग्य और बुद्धि की प्राप्ति होती है। इसलिए पूर्ण युवावस्था में विवाह कर इस प्रकार विधिकर प्रेमपूर्वक गर्भाधान करें तो सन्तान और कुल नित्यप्रति उत्कृष्टता को प्राप्त होते जाएँ। जब रजस्वला होने के समय में १२-१३ दिन शेष रहें, तब शुक्लपक्ष में १२ दिन तक पूर्वोक्त घृत मिलाके इसी खीर का भोजन करके १२ दिन का व्रत भी करें और मिताहारी होकर ऋतु समय में पूर्वोक्त रीति से गर्भाधान क्रिया करें तो अत्युत्तम सन्तान होवें। जैसे सब पदार्थों को उत्कृष्ट करने की विद्या है, वैसे सन्तान को उत्कृष्ट करने की यही विद्या है। इसपर मनुष्य लोग बहुत ध्यान देवें, क्योंकि इसके न होने से कुल की हानि, नीचता और होने से कुल की वृद्धि और उत्तमता अवश्य होती है।
गर्भाधानप्रकरणम् ५३ मन्त्रों से आहुति देवें*— यथा॒ वातः॑ पुष्क॒रिणीं॑ स॒मिङ्गय॑ति स॒र्वत॑:। ए॒वा ते॒ गर्भ॑ एजतु॒ निरै॑तु॒ दश॑मास्य॒: स्वाहा॑ ॥ १ ॥ यथा॒ वातो॒ यथा॒ वनं॒ यथा॑ समु॒द्र एज॑ति। ए॒वा त्वं द॑शमास्य॒ सहावै॑हि ज॒रायु॑णा॒ स्वाहा॑ ॥ २ ॥ दश॒ मासा॑ञ्छशया॒नः कु॑मा॒रो अधि॑ मा॒तरि॑। निरै॑तु॒ जीवो॒ अक्ष॑तो॒ जीवो॒ जीवन्त्या॒ अधि॒ स्वाहा॑ ॥ ३ ॥ —ऋ० म० ५ । सू० ७८ । मं० ७-९ ॥ एज॑तु॒ दश॑मास्यो॒ गर्भो॑ ज॒रायु॑णा स॒ह। यथा॒यं वा॒युरेर्ज॑ति यथा॑ समु॒द्रऽ एज॑ति। ए॒वायं दश॑मास्यो॒ऽ अस्त्र॑ञ्ज॒रायु॑णा स॒ह स्वाहा॑ ॥ १ ॥
- यदि दो ऋतुकाल व्यर्थ जाएँ अर्थात् दो महीनों में दो बार गर्भाधान क्रिया निष्फल हो जाए, गर्भस्थिति न होवे, तो तीसरे महीने में जब ऋतुकाल समय आवे तब पुष्यनक्षत्रयुक्त ऋतुकाल दिवस में प्रथम प्रातःकाल उपस्थित होवे, तब प्रथम प्रसूता गाय का दही दो मासा और यव के दानों को सेकके पीसके दो मासा लेके इन दोनों को एकत्र करके पत्नी के हाथ में देके उससे पति पूछे— “किं पिबसि”। इस प्रकार तीन बार पूछे, और स्त्री भी अपने पति को “पुंसवनम्” इस वाक्य को तीन बार बोलके उत्तर देवे और उसका प्राशन करे। इसी रीति से पुनः-पुनः तीन बार विधि करना। तत्पश्चात् सङ्घाहुलि वा भटकटाई ओषधि को जल में महीन पीसके उसका रस कपड़े में छानके पति पत्नी के दाहिने नाक के छिद्र में सिञ्चन करे। और पति— ओम् इयमोषधी त्रायमाणा सहमाना सरस्वती। अस्या अहं बृहत्याः पुत्रः पितुरिव नाम जग्रभम्॥ इस मन्त्र से जगन्नियन्ता परमात्मा की प्रार्थना करके यथोक्त ऋतुदान विधि करें। यह सूत्रकार का मत है।
५४ संस्कारविधिः य॒स्यै ते॑ य॒ज्ञियो॒ गर्भो॒ यस्यै॒ योनि॑र्हिर॒ण्ययी॑ । अङ्गान्यहु॑ता॒ यस्य॒ तं मा॒त्रा सर्म॑जीगम॒थ् स्वाहा॑ ॥ २ ॥ —यजुः० अ० ८ । मं० २८, २९ ॥ पुमाग्ंसौ मित्रावरुणौ पुमाग्ंसावश्विनावुभौ । पुमानग्निश्च वायुश्च पुमान् गर्भस्तवोदरे स्वाहा ॥ १ ॥ पुमानग्निः पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः । पुमाग्ंसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननु जायताग्ं स्वाहा ॥ २ ॥ —सामवेदे ॥ इन मन्त्रों से आहुति देकर पूर्वलिखित सामान्यप्रकरण की शान्त्याहुति देके, पुनः ३६ पृष्ठ में लिखे प्रमाणे पूर्णाहुति देवें। पुनः स्त्री के भोजन-छादन का सुनियम करे। कोई मादक मद्य आदि, रेचक हरीतकी आदि, क्षार अतिलवणादि, अत्यम्ल अर्थात् अधिक खटाई, रूक्ष चणे आदि, तीक्ष्ण अधिक लालमिर्ची आदि स्त्री कभी न खावे, किन्तु घृत, दुग्ध, मिष्ट, सोमलता अर्थात् गुडूच्यादि ओषधि, चावल, मिष्ट, दधि, गेहूँ, उर्द, मूँग, तूअर आदि अन्न और पुष्टिकारक शाक खावें। उसमें ऋतु-ऋतु के मसाले—गर्मी में ठण्डे सफेद इलायची आदि और सर्दी में केशर, कस्तूरी आदि डालकर खाया करे। युक्ताहार-विहार सदा किया करे। दूध में सुंठि और ब्राह्मी ओषधि का सेवन स्त्री विशेष किया करे, जिससे सन्तान अतिबुद्धिमान्, रोगरहित, शुभ गुण-कर्म-स्वभाववाला होवे ॥ ॥ इति गर्भाधानविधिः समाप्तः ॥
३ अथ पुंसवनम् 'पुंसवन' संस्कार का समय गर्भस्थिति-ज्ञान हुए समय से दूसरे वा तीसरे महीने में है। उसी समय पुंसवन संस्कार करना चाहिए, जिससे पुरुषत्व अर्थात् वीर्य का लाभ होवे। यावत् बालक के जन्म हुए पश्चात् दो महीने न बीत जावें, तबतक पुरुष ब्रह्मचारी रहकर स्वप्न में भी वीर्य को नष्ट न होने देवे। भोजन-छादन, शयन-जागरणादि व्यवहार उसी प्रकार से करे, जिससे वीर्य स्थिर रहे और दूसरा सन्तान भी उत्तम होवे। अत्र प्रमाणानि पुमाꣳ॒सौ मित्रावरुणौ पुमाꣳ॒सावश्विनावुभौ। पुमान॒ग्निश्च॑ वायु॒श्च पुमान् गर्भस्तवोदरे॥ १॥ पुमान॒ग्निः पुमा॒निन्द्रः पुमा॒न्देवो बृहस्पतिः। पुमाꣳ॒सं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननु जायताम्॥ २॥ —सामवेदे ॥ श॒मीम॑श्व॒त्थ आरू॑ढ॒स्तत्र॑ पुं॒सवनं॑ कृ॒तम्। तद्वै पु॒त्रस्य॑ वेद॒नं तत् स्त्रीष्वा भरा॑मसि॥ १॥ पुं॒सि वै रेतो॑ भव॒ति तत् स्त्रियामनु॑ षिच्यते। तद्वै पु॒त्रस्य॑ वेद॒नं तत् प्र॒जाप॑तिरब्रवीत्॥ २॥ प्र॒जाप॑तिरनु॑मतिः सिनी॒वाल्य॑चीक्लृपत्। स्त्रैषू॑य॒मन्यत्र॑ दध॒त् पुमां॑समु दधदि॒ह॥ ३॥ —अथर्व० का० ६। सू० ११॥ इन मन्त्रों का यही अभिप्राय है कि पुरुष को वीर्यवान्
५६ संस्कारविधिः होना चाहिए। इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का प्रमाण— अथास्यै मण्डलागारच्छायायां दक्षिणस्यां नासिकायामजीतामोषधीं नस्तः करोति ॥ १ ॥ प्रजावज्जीवपुत्राभ्यां हैके ॥ २ ॥ गर्भ के दूसरे वा तीसरे महीने में वटवृक्ष की जटा वा उसकी पत्ती लेके स्त्री के दक्षिण नासापुट से सुँघावे और कुछ अन्य पुष्ट अर्थात् गुडच जो गिलोय वा ब्राह्मी ओषधि खिलावे। ऐसा ही पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण है— अथ पुंसवनं पुरा स्पन्दत इति मासे द्वितीये तृतीये वा ॥ इसके अनन्तर 'पुंसवनं' उसको कहते हैं, जो पूर्व ऋतुदान देकर गर्भस्थिति से दूसरे वा तीसरे महीने में पुंसवन-संस्कार किया जाता है। इसी प्रकार गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रों में भी लिखा है। अथ क्रियारम्भः—पृष्ठ ९ से २१वें पृष्ठ के शान्तिकरणपर्यन्त कहे प्रमाणे (विश्वानि देव०) इत्यादि चारों वेदों के मन्त्रों से यजमान और पुरोहितादि ईश्वरोपासना करें और जितने पुरुष वहाँ उपस्थित हों, वे भी परमेश्वरोपासना में चित्त लगावें और पृष्ठ १३-१७ में कहे प्रमाणे स्वस्तिवाचन तथा पृष्ठ १८-२१ में लिखे प्रमाणे शान्तिकरण करके पृष्ठ २२ में लिखे प्रमाणे यज्ञदेश, यज्ञशाला तथा पृष्ठ २३ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड, यज्ञसमिधा, होम के द्रव्य और स्थालीपाक आदि करके और पृष्ठ ३०-३२ में लिखे प्रमाणे (अयन्त इध्म०) इत्यादि [इत्यादि मन्त्रों से समिदाधान], (ओम् अदिते०) इत्यादि चार [मन्त्रों से] मन्त्रोक्त कर्म [जल-प्रोक्षण] और आघारावाज्यभागाहुति ४ तथा व्याहृति आहुति ४ और पृष्ठ ३२ में [लिखे प्रमाणे]
पुंसवनप्रकरणम् ५७ ( ओं प्रजापतये स्वाहा ), पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे ( ओं यदस्य कर्मणो० ) दो आहुति देकर नीचे लिखे हुए दोनों मन्त्रों से दो आहुति घृत की देवें— ओम् आ ते गर्भो योनिमेतु पुमान् बाण इवेषुधिम्। आ वीरो जायतां पुत्रस्ते दशमास्यः स्वाहा ॥ १ ॥ ओम् अग्निर्हैतु प्रथमो देवतानां सोऽस्यै प्रजां मुञ्चतु मृत्यु- पाशात् । तदयं राजा वरुणोऽनुमन्यतां यथेयं स्त्री पौत्रमघं न रोदात् स्वाहा ॥ २ ॥ इन दोनों मन्त्रों को बोलके दो आहुति किये पश्चात् एकान्त में पत्नी के हृदय पर हाथ धरके यह निम्नलिखित मन्त्र पति बोले— ओम् यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ। मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं माहं पौत्रमघं नियाम् ॥ तत्पश्चात् पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामवेद का महावामदेव्यगान गाके जो-जो पुरुष वा स्त्री संस्कार-समय पर आये हों, उनको विदा कर दे। पुनः वटवृक्ष के कोमल कूपल और गिलोय को महीन बाँट, कपड़े में छान, गर्भिणी स्त्री के दक्षिण नासापुट में सुँघावे। तत्पश्चात्— हिर॒ण्य॒ग॒र्भः सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ भूतस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ऽआसीत्। स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ १ ॥ —यजुः० अ० १३। मं० ४॥ अ॒द्भ्यः सम्भृ॑तः पृथि॒व्यै रसा॑च्च वि॒श्वक॑र्मणः॒ सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ । तस्य॑ त्वष्टा॑ वि॒दध॑द्रू॒पमे॑ति॒ तन्मर्त्य॑स्य दे॒वत्वमा॒जान॒मग्रे॑ ॥ २ ॥ —यजुः० अ० ३१। मं० १७॥
५८ संस्कारविधिः इन दो मन्त्रों को बोलके पति अपनी गर्भिणी पत्नी के गर्भाशय पर हाथ धरके यह मन्त्र बोले— सु॒प॒र्णोऽसि॑ ग॒रुत्माँस्त्रिवृत्ते॑ शिरो॑ गाय॒त्रं चक्षु॑र्बृहद्रथन्त॒रे प॒क्षौ। स्तोम॑ऽआ॒त्मा छन्दाँ॒स्यङ्गा॑नि॒ यजूं॑षि॒ नाम॑। साम॑ ते त॒नूर्वाम॑दे॒व्यं य॒ज्ञाय॒ज्ञियं॒ पुच्छं॒ धिष्ण्या॑: श॒फाः। सु॒प॒र्णोऽसि॑ ग॒रुत्मान्॒ दिवं॑ गच्छ॒ स्वः॑ पत॥ —य० अ० १२। मं० ४॥ इसके पश्चात् स्त्री सुनियम, युक्ताहार-विहार करे। विशेषकर गिलोय, ब्राह्मी ओषधि और सुंठी को दूध के साथ थोड़ी-थोड़ी खाया करे और अधिक शयन और अधिक भाषण, अधिक खारा, खट्टा, तीखा, कड़वा, रेचक हरड़े आदि न खावे। सूक्ष्म आहार करे। क्रोध, द्वेष, लोभादि में न फँसे, चित्त को सदा प्रसन्न रक्खे इत्यादि शुभाचरण करे॥ ॥ इति पुंसवनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
अथ सीमन्तोन्नयनम् अब तीसरा संस्कार ‘सीमन्तोन्नयन’ कहते हैं, जिससे गर्भिणी स्त्री का मन सन्तुष्ट, आरोग्य, गर्भ स्थिर, उत्कृष्ट होवे और प्रतिदिन बढ़ता जावे। इसमें आगे प्रमाण लिखते हैं— चतुर्थे गर्भमासे सीमन्तोन्नयनम् ॥ १ ॥ आपूर्यमाणपक्षे यदा पुंसा नक्षत्रेण चन्द्रमा युक्तः स्यात् ॥ २ ॥ अथास्यै युग्मेन शलालुग्रप्सेन त्रेण्या च शलल्या त्रिभिश्च कुशपिञ्जूलैरूर्ध्वं सीमन्तं व्यूहति भूर्भुवःस्वरोमिति त्रिः चतुर्वा ॥ —यह आश्वलायनगृह्यसूत्र ॥ पुंसवनवत् प्रथमे गर्भे मासे षष्ठेऽष्टमे वा ॥ —यह पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण ॥ इसी प्रकार गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्र में भी लिखा है। अर्थ—गर्भमास से चौथे महीने में शुक्लपक्ष में जिस दिन मूल आदि पुरुष नक्षत्रों से युक्त चन्द्रमा हो, उसी दिन सीमन्तोन्नयन संस्कार करें और पुंसवन-संस्कार के तुल्य छठे, आठवें महीने में पूर्वोक्त पक्ष, नक्षत्रयुक्त चन्द्रमा के दिन सीमन्तोन्नयन-संस्कार करें । अथ विधिः—इसमें प्रथम ९-३१ पृष्ठ तक का विधि करके (अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाण वेदी के पूर्वादि दिशाओं में जल सेचन करके— ओम् दे॒व स॑वि॒तः प्र सु॑व य॒ज्ञं प्र सु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य। दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केतं॑ नः पुनातु॒ वाच॒स्पति॒र्वाचं॑ नः स्वद॑तु॒ स्वाहा॑ ॥ —य० अ० ३० । मं० ७ ॥
६० संस्कारविधिः इस मन्त्र से कुण्ड के चारों ओर जल-सेचन करके आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार—दोनों मिलके आठ आहुति पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे करके— ओम् प्रजापतये त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ अर्थात् चावल, तिल और मूँग इन तीनों को समभाग लेके— ओम् प्रजापतये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ अर्थात् धोके इनकी खिचड़ी बना उसमें पुष्कल घी डालके निम्नलिखित मन्त्रों से आठ आहुति देवें— ओं धा॒ता द॑दातु दा॒शुषे॒ प्राचींᳵ जी॒वातु॑म॒क्षित॑म् । व॒यं दे॒वस्य॑ धीमहि सु॒म॒तिं वा॒जिनी॑वतः॒ स्वाहा॑ ॥ इदं धात्रे—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओं धा॒ता प्र॒जाना॑मु॒त रा॒य ई॑शे धा॒तेदं विश्वं॒ भुव॑नं जजान॑ । धा॒ता कृ॒ष्टीरनि॑मिषा॒भि च॑ष्टे धा॒त्र इद्ध्व्यं घृ॒तव॑ज्जुहोत॒ स्वाहा॑ ॥ इदं धात्रे—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओं रा॒काम॒हं सु॒हवां॑ सुष्टु॒ती हु॑वे शृ॒णोतु॑ नः सु॒भगा॒ बोध॑तु त्मना॑ । सीव्य॒त्वप॑: सू॒च्याच्छिद्य॑मा॑नया ददा॑तु वी॒रं श॒तदा॑यमु॒क्थ्यं॒ स्वाहा॑ ॥ इदं राकायै—इदन्न मम ॥ ३ ॥ यास्ते॑ राके सु॒मत॑यः सु॒पेशा॑सो॒ याभि॑र्ददा॑सि दा॒शुषे॑ वसू॑नि । ताभि॑र्नो अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒पाग॑हि सहस्रपो॒षं सु॑भगे॒ ररा॑णा॒ स्वाहा॑ ॥ इदं राकायै—इदन्न मम ॥ ४ ॥ —ऋ० मं० २ । सू० ३२ । मं० ४, ५ ॥ नेज॑मेष॒ परा॑ पत सुपु॒त्रः पुन॒रा प॑त । अ॒स्यै मे॑ पु॒त्रका॑मायै॒ गर्भ॒मा धे॑हि॒ यः पुमा॒न्त्स्वाहा॑ ॥ ५ ॥
सीमन्तोन्नयनप्रकरणम् ६१ यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ह्युत्ता॑ना॒ गर्भ॑मा द॒धे। ए॒वं तं गर्भ॑मा धेहि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे॒ स्वाहा॑ ॥ ६ ॥ विष्णो॒ः श्रेष्ठेन रू॒पेणा॒स्यां नार्या॑ गवी॒न्याम्। पुमां॑सं पु॒त्राना धे॑हि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे॒ स्वाहा॑ ॥ ७ ॥ इन सात मन्त्रों से खिचड़ी की सात आहुति देके, पुनः (भूर्भुवः स्वः। प्रजापते न त्व०) पृष्ठ ३४ में लिखित इससे एक, सब मिलाके आठ आहुति देवें और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं प्रजापतये०) मन्त्र से एक भात की और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं यदस्य कर्मणो०) मन्त्र से एक खिचड़ी की आहुति देवें। तत्पश्चात् (ओं त्वन्नो अग्ने०) पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे आठ घृत की आहुति और (ओं भूरग्नये०) पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे चार, व्याहृतिमन्त्रों से चार आज्याहुति देकर पति और पत्नी एकान्त में जाके उत्तमासन पर बैठ पति पत्नी के पश्चात्=पृष्ठ की ओर बैठ— ओम् सु॒मि॒त्रिया न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु दुर्मि॒त्रिया॑स्तस्मै॑ सन्तु यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यञ्च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ १ ॥ —य० अ० ६ । मं० २२ ॥ मू॒र्द्धानं॑ दि॒वोऽअ॑र॒तिं पृ॑थि॒व्या वै॑श्वान॒रमृ॒तऽआ जा॒तम॒ग्निम्। क॒विं स॒म्राज॒मति॑थिं॒ जना॑नामा॒सन्ना पात्रं॑ जनयन्त दे॒वाः ॥ २ ॥ —य० अ० ७ । मं० २४॥ ओम् अयमूर्जावतो वृक्ष ऊर्जीव फलिनी भव। पर्णं वनस्पतेऽनु त्वाऽनु त्वा सूयताँश्चरयिः ॥ ३ ॥ ओं येनादितेः सीमानं नयति प्रजापतिर्महते सौभगाय। तेनाहमस्यै सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि ॥ ४ ॥
६२ संस्कारविधिः ओं रा॒काम॒हꣳ सु॒हवांꣳ सु॒ष्टुती हु॑वे शृ॒णोतु॑ नः सु॒भगा॒ बोध॑तु॒ त्मना॑। सीव्य॒त्वप॑ः सू॒च्याच्छिद्य॑मानया ददा॑तु वी॒रꣳ श॒तदा॑युमु॒ख्यम्॥५॥ ओं यास्ते॑ राके सु॒मतय॑ः सु॒पेश॑सो॒ याभि॒र्ददा॑सि दा॒शुषे वसू॑नि। ताभि॑र्नो अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒पाग॑हि सहस्रपो॒षं सु॑भगे॒ ररा॑णा॒॥६॥ किं पश्यसि प्रजां पशून्त्सौभाग्यं मह्यं दीर्घायुष्ट्वं पत्युः ॥७॥ इन मन्त्रों को पढ़के पति अपने हाथ से स्वपत्नी के केशों में सुगन्धित तेल डाल, कंघे से सुधार, हाथ में उदुम्बर अथवा अर्जुन वृक्ष की शलाका वा कुशा की मृदु छीपी वा शाही पशु के काँटे से अपनी पत्नी के केशों को स्वच्छ कर पट्टी निकाल और पीछे की ओर जूड़ा सुन्दर बाँधकर यज्ञशाला में आवें। उस समय वीणा आदि बाजे बजवावें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३६- ३७ में लिखे प्रमाणे सामवेद का गान करें। पश्चात्— ओम् सोम एव नो राजेमा मानुषीः प्रजाः। अविमुक्तचक्र आसीरंस्तीरे तुभ्यम् असौ*॥ आरम्भ में इस मन्त्र का गान करके, पश्चात् अन्य मन्त्रों का गान करें। तत्पश्चात् पूर्व आहुतियों के देने से बची हुई खिचड़ी में पुष्कल घृत डालके गर्भिणी स्त्री अपना प्रतिबिम्ब उस घी में देखे। उस समय पति स्त्री से पूछे—‘किं पश्यसि’? स्त्री उत्तर देवे—‘‘प्रजां पश्यामि’’। तत्पश्चात् एकान्त में वृद्ध, कुलीन, सौभाग्यवती, पुत्रवती,
- यहाँ किसी नदी का नामोच्चारण करें।
सीमन्तोन्नयनप्रकरणम् ६३ गर्भिणी अपने कुल की और ब्राह्मणों की स्त्रियाँ बैठें। प्रसन्नवदन और प्रसन्नता की बातें करें और वह गर्भिणी स्त्री उस खिचड़ी को खावे और वे वृद्ध समीप बैठी हुई उत्तम स्त्री लोग ऐसा आशीर्वाद देवें— ओम् वीरसूस्त्वं भव, जीवसूस्त्वं भव, जीवपत्नी त्वं भव ॥ ऐसे शुभ, माङ्गलिक वचन बोलें। तत्पश्चात् संस्कार में आये हुए मनुष्यों का यथायोग्य सत्कार करके स्त्री स्त्रियों और पुरुष पुरुषों को विदा करें ॥ ॥ इति सीमन्तोन्नयनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
अथ जातकर्म-संस्कारविधिः इसका समय, प्रमाण और कर्मविधि इस प्रकार करें। सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति ॥ इत्यादि पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण है। इसी प्रकार आश्वलायन, गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रों में भी लिखा है। जब प्रसव होने का समय आवे, तब निम्नलिखित मन्त्र से गर्भिणी स्त्री के शरीर पर जल से मार्जन करे— ओम् एज॑तु दश॑मास्यो॒ गर्भो॑ ज॒रायु॑णा स॒ह। यथा॒यं वा॒युरेर्जति॒ यथा॑ समु॒द्र एज॑ति। ए॒वायं दश॑मास्यो॒ अस्रं॑ज्जरायु॑णा स॒ह॥ १ ॥ —यजुः० अ० ८। मं० २८॥ इससे मार्जन करने के पश्चात्— ओम् अवैतु पृश्निशेवलः शुने जरावत्तवे। नैव मांसेन पीवरीं न कस्मिंश्चनायतनमव जरायु पद्य॒ताम्॥ इस मन्त्र का जप करके पुनः मार्जन करे। कुमारं जातं पुराऽन्यैरालम्भात् सर्पिर्मधुनी हिरण्यनिकाषं हिरण्येन प्राशयेत् ॥ जब पुत्र का जन्म होवे तब प्रथम दायी आदि स्त्री लोग बालक के शरीर का जरायु पृथक् कर मुख, नासिका, कान,
जातकर्मप्रकरणम् ६५ आँख आदि में से मल को शीघ्र दूर कर कोमल वस्त्र से पोंछ, शुद्ध कर पिता के गोद में बालक को देवें। पिता जहाँ वायु और शीत का प्रवेश न हो, वहाँ बैठके एक बीताभर नाड़ी को छोड़, ऊपर सूत से बाँधके उस बन्धन के ऊपर से नाड़ीछेदन करके किञ्चित् उष्ण जल से बालक को स्नान करा, शुद्ध वस्त्र से पोंछ, नवीन शुद्ध वस्त्र पहिना जो प्रसूता-घर के बाहर पूर्वोक्त प्रकार कुण्ड कर रखा हो अथवा तांबे के कुण्ड में समिधा पूर्वलिखित प्रमाणे चयन कर पूर्वोक्त सामान्यविध्युक्त पृष्ठ ३०- ३२ में कहे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान करके, अग्नि को प्रदीप्त करके सुगन्धित घृतादि वेदी के पास रखके, हाथ-पग धोके एक पीठासन अर्थात् शुभासन पुरोहित* के लिए कुण्ड के दक्षिण भाग में रक्खे, वह उसपर उत्तराभिमुख बैठे और यजमान अर्थात् बालक का पिता हाथ-पग धोके वेदी के पश्चिम भाग में आसन बिछा, उसपर उपवस्त्र ओढ़के पूर्वाभिमुख बैठे तथा सब सामग्री अपने और पुरोहित के पास रखके पुरोहित पद के स्वीकार के लिए बोले— ओ३म् आ वसोः सदने सीद॥ तत्पश्चात् पुरोहित—ओ३म् सीदामि॥ बोलके आसन पर बैठके, पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाणे अयं त इध्म० आदि चार मन्त्रों से वेदी में चन्दन की समिदाधान करे और प्रदीप्त समिधा पर पूर्वोक्त सिद्ध किये घी की पृष्ठ ३३-३४ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार दोनों मिलके आठ आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्—
- धर्मात्मा, शास्त्रोक्त विधि का पूर्णरीति से जाननेहारा, विद्वान्, सद्धर्मी, कुलीन, निर्व्यसनी, सुशील, वेदप्रिय, पूजनीय, सर्वोपकारी गृहस्थ की पुरोहित संज्ञा है।
६६ संस्कारविधिः ओं या तिरश्ची निपद्यते अहं विधरणी इति। तां त्वा घृतस्य धारया यजे सꣳराधिनीमहम्। सꣳराधिन्यै देव्यै देष्ट्र्यै स्वाहा॥ इदं संराधिन्यै—इदन्न मम॥ १ ॥ ओं विपश्चित् पुच्छमभरत् तद्धाता पुनराहरत्। परेहि त्वं विपश्चित् पुमानयं जनिष्यतेऽसौ नाम स्वाहा। इदं धात्रे—इदन्न मम॥ २ ॥ इन दोनों मन्त्रों से दो आज्याहुति करके, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करके, ९-१२ पृष्ठ में लिखे प्रमाणे ईश्वरोपासना करें। तत्पश्चात् घी और मधु दोनों बरोबर मिलाके, जो प्रथम सोने की शलाका कर रखी हो, उससे बालक की जीभ पर “ओ३म्” यह अक्षर लिखके उसके दक्षिण कान में “वेदोऽसीति” 'तेरा गुप्त नाम वेद है' ऐसा सुनाके पूर्व मिलाये हुए घी और मधु को उस सोने की शलाका से बालक को नीचे लिखे मन्त्र से थोड़ा-थोड़ा चटायवे— ओं प्र ते ददामि मधुनो घृतस्य वेदं सवित्रा प्रसूतं मघोनाम्। आयुष्मान् गुप्तो देवताभिः शतं जीव शरदो लोके अस्मिन्॥ १ ॥ ओम् भूस्त्वयि दधामि॥ २ ॥ ओं भुवस्त्वयि दधामि॥ ३ ॥ ओं स्वस्त्वयि दधामि॥ ४ ॥ ओं भूर्भुवः स्वस्सर्वं त्वयि दधामि॥ ५॥ ओं सद॑स॒स्पति॒मद्भु॑तं प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म्। स॒निं मे॒धाम॑यासिष॒ꣳ स्वाहा॑॥ ६॥
जातकर्मप्रकरणम् ६७ इन प्रत्येक मन्त्र से छह बार घृत-मधु प्राशन कराके तत्पश्चात् चावल और जव को शुद्ध कर पानी से पीस, वस्त्र से छान, एक पात्र में रखके हाथ के अंगूठा और अनामिका से थोड़ा-सा लेके— ओम् इदमाज्यमिदमन्नमिदमायुरिदममृतम् ॥ इस मन्त्र को बोलके बालक के मुख में एक बिन्दु छोड़ देवे। यह एक गोभिलीयगृह्यसूत्र का मत है, सबका नहीं। पश्चात् बालक का पिता बालक के दक्षिण कान में मुख लगाके निम्नलिखित मन्त्र बोले— ओं मेधां ते देवः सविता मेधां देवी सरस्वती। मेधां ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥१॥ ओम् अग्निरायुष्मान्स वनस्पतिभिरायुष्माँस्तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि ॥२॥ ओं सोम आयुष्मान्स ओषधीभिरायुष्माँस्तेन०* ॥३॥ ओं ब्रह्माऽऽयुष्मत् तद् ब्राह्मणैरायुष्मत् तेन० ॥४॥ ओं देवा आयुष्मान्तस्तेऽमृतेनायुष्मन्तस्तेन० ॥५॥ ओम् ऋषय आयुष्मान्तस्ते व्रतैरायुष्मन्तस्तेन० ॥६॥ ओं पितर आयुष्मान्तस्ते स्वधाभिरायुष्मन्तस्तेन० ॥७॥ ओं यज्ञ आयुष्मान्स दक्षिणाभिरायुष्माँस्तेन० ॥८॥ ओं समुद्र आयुष्मान्स स्त्रवन्तीभिरायुष्माँस्तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि ॥९॥
- यहाँ पूर्व मन्त्र का शेष भाग (त्वा) इत्यादि उत्तर मन्त्रों के पश्चात् बोले।
६८ संस्कारविधिः इन नव मन्त्रों का जप करे। इसी प्रकार बाएँ कान पर मुख धर ये ही नव मन्त्र पुनः जपे। इसके पीछे बालक के कन्धों पर कोमल स्पर्श से, अर्थात् बालक के स्कन्धों पर हाथ का बोझ न पड़े, इस प्रकार हाथ धरके निम्नलिखित मन्त्र बोले— ओम् इन्द्र॒ श्रेष्ठा॑नि॒ द्रवि॑णानि धेहि॒ चित्तिं॒ दक्ष॑स्य सुभ॒गत्वम॒स्मे। पोषं॑ रयी॒णामरि॑ष्टिं तनू॒नां स्वा॒द्मानं॑ वा॒चः सु॑दि॒नत्वमह्ना॑म्॥ १ ॥ अ॒स्मे प्र य॑न्धि मघवन्नृजीषि॒न्निन्द्र॑ रा॒यो वि॒श्ववा॑रस्य॒ भूरैः। अ॒स्मे श॒तं श॒रदो॑ जी॒वसे॑ धा अ॒स्मे वी॒राञ्छश्व॑त इन्द्र शिप्रिन्॥ २ ॥ ओम् अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव। वेदो वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्॥ ३॥ इन तीन मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात्— ओं त्र्या॒यु॒षं ज॒मद॑ग्नेः क॒श्यप॑स्य त्र्यायु॒षम्। यद्दे॒वेषु॑ त्र्यायु॒षं तन्नो॑ऽअस्तु त्र्यायु॒षम्॥ इस मन्त्र का तीन बार जप करे। तत्पश्चात् बालक के स्कन्धों पर से हाथ उठा ले और जिस जगह पर बालक का जन्म हुआ हो वहाँ जाके— ओं वेद ते भूमि हृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्। वेदाहं तन्मां तद्विद्यात् पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतँः शृणुयाम शरदः शतम्॥ १ ॥ इस मन्त्र का जप करे। तथा—
जातकर्मप्रकरणम् ६९ यत्ते सुसीमे हृदयꣳ हितमन्तः प्रजापतौ। वेदाहं मन्ये तद् ब्रह्म माहं पौत्रमघं निगाम्॥२॥ यत् पृथिव्या अनामृतं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्। वेदामृतस्याहं नाम माहं पौत्रमघꣳ रिषम्॥३॥ इन्द्राग्नी शर्म यच्छतं प्रजायै मे प्रजापतिः। यथायं न प्रमीयते पुत्रो जनित्र्या अधि॥४॥ यददश्चन्द्रमसि कृष्णं पृथिव्या हृदयꣳ श्रितम्। तदहं विद्वाꣳस्तत् पश्यन्माहं पौत्रमघꣳ रुदम्॥५॥ इन मन्त्रों को पढ़ता हुआ सुगन्धित जल से प्रसूता के शरीर का मार्जन करे। कोऽसि कतमोऽस्येषोऽस्यमृतोऽसि । आहस्पत्यं मासं प्रविशासौ ॥६॥ स त्वाह्ने परिददात्वहस्त्वा रात्र्यै परिददातु रात्रिस्त्वा- होरात्राभ्यां परिददात्वहोरात्रौ त्वाईमासेभ्यः परि- दत्तामर्द्धमासास्त्वा मासेभ्यः परिददतु मासास्त्वृतुभ्यः परिददत्वृतवस्त्वा संवत्सराय परिददतु संवत्सर- स्त्वायुषे जरायै परिददात्वसौ ॥७॥ इन मन्त्रों को पढ़के बालक को आशीर्वाद देवे। पुनः— अङ्गादङ्गात् सꣳस्रवसि हृदयादधिजायसे। प्राणं ते प्राणेन सन्दधामि जीव मे यावदायुषम्॥८॥ अङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादधिजायसे। वेदो वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्॥९॥ अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव। आत्माऽसि पुत्र मा मृथाः स जीव शरदः शतम्॥१०॥ पशूनां त्वा हिङ्कारेणाभिजिघ्राम्यसौ ॥११॥