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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

अथान्नप्राशनविधिं वक्ष्यामः 'अन्नप्राशन' संस्कार तभी करे जब बालक की शक्ति अन्न पचाने योग्य होवे। इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का प्रमाण— षष्ठे मास्यन्नप्राशनम् ॥ १ ॥ घृतौदनं तेजस्कामः ॥ २ ॥ दधिमधुघृतमिश्रितमन्नं प्राशयेत् ॥ ३ ॥ इसी प्रकार पारस्करगृह्यसूत्रादि में भी है॥ छठे महीने बालक को अन्नप्राशन करावे। जिसको तेजस्वी बालक करना हो, वह घृतयुक्त भात अथवा दही, सहत और घृत तीनों भात के साथ मिलाके निम्नलिखित विधि से अन्नप्राशन करावे, अर्थात् पूर्वोक्त पृष्ठ ९-२१ में कहे हुए सम्पूर्ण विधि को करके जिस दिन बालक का जन्म हुआ हो, उसी दिन यह संस्कार करे और निम्न लिखे प्रमाणे भात सिद्ध करे— ओम् प्राणाय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ १ ॥ ओम् अपानाय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ २ ॥ ओम् चक्षुषे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ३ ॥ ओम् श्रोत्राय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ४ ॥ ओम् अग्नये स्विष्टकृते त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ५ ॥ इन पाँच मन्त्रों का यही अभिप्राय है कि चावलों को धो, शुद्ध करके अच्छे प्रकार बनाना और पकते हुए भात में यथायोग्य घृत भी डाल देना। जब चावल अच्छे प्रकार पक जावें, तब उतार थोड़े ठण्डे हुए पश्चात् होमस्थाली में—

अन्नप्राशनप्रकरणम् ८९ ओम् प्राणाय त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ १ ॥ ओम् अपानाय त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ २ ॥ ओम् चक्षुषे त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ ३ ॥ ओम् श्रोत्राय त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ ४ ॥ ओम् अग्नये स्विष्टकृते त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ ५ ॥ इन पाँच मन्त्रों से कार्यकर्त्ता यजमान और पुरोहित तथा ऋत्विजों को पात्र में पृथक्-पृथक् देके पृष्ठ ३०-३५ में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधानादि करके प्रथम आघारावाज्य- भागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार मिलके ८ घृत की आहुति देके, पुनः उस पकाये हुए भात की आहुति नीचे लिखे हुए मन्त्रों से देवे— दे॒वीं वाच॑मजनयन्त दे॒वास्तां वि॒श्वरू॑पाः प॒शवो॑ वदन्ति । सा नो॑ म॒न्द्रेष॒मूर्जं॒ दुहा॑ना धे॒नुर्वाग॒स्मानुप॒ सुष्टुतैतु॒ स्वाहा॑ ॥ इदं वाचे—इदन्न मम ॥ १ ॥ वाजो॑ नो॒ऽअद्य प्र सु॑वाति॒ दानं॒ वाजो॑ दे॒वाँऽऋ॒तुभि॑: कल्पयाति । वाजो॑ हि मा॒ सर्व॑वीरं ज॒जान॒ विश्वा॒ऽआशा॒ वाज॑- पतिर्जयेयु॒थ्ंस्वाहा॑ ॥ इदं वाचे वाजाय—इदन्न मम ॥ २ ॥ इन दो मन्त्रों से दो आहुति देवें। तत्पश्चात् उसी भात में और घृत डालके— ओं प्राणेनान्नमशीय स्वाहा ॥ इदं प्राणाय—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओमपानेन गन्धानशीय स्वाहा ॥ इदमपानाय—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओं चक्षुषा रूपाण्यशीय स्वाहा ॥ इदं चक्षुषे—इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओं श्रोत्रेण यशोऽशीय स्वाहा ॥ इदं श्रोत्राय—इदन्न मम ॥ ४ ॥ इन मन्त्रों से चार आहुति देके (ओं यदस्य कर्मणो०) पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाण स्विष्टकृत् आहुति एक देवे। तत्पश्चात्

८२ संस्कारविधिः पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३३- ३४ में लिखे प्रमाणे (ओम् त्वन्नो०) इत्यादि से आठ आज्याहुति मिलके बारह आहुति देवे। उसके पीछे आहुति से बचे हुए भात में दही, मधु और उसमें घी यथायोग्य किञ्चित्-किञ्चित् मिलाके और सुगन्धियुक्त और भी चावल बनाये हुए थोड़े-से मिलाके बालक के रुचि प्रमाणे— ओम् अन्न॑पतेऽन्न॑स्य नो देह्यनमी॒वस्य॑ शु॒ष्मिण॑ः। प्रप्र॑ दा॒तारं॑ तारिष॒ऽऊर्जं॑ नो धेहि द्विपदे चतु॑ष्पदे॥ इस मन्त्र को पढ़के थोड़ा-थोड़ा पूर्वोक्त भात बालक के मुख में देवे। यथारुचि खिला, बालक का मुख धो और अपने हाथ धोके पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करके, जो बालक के माता-पिता और अन्य वृद्ध स्त्री-पुरुष आये हों वे परमात्मा की प्रार्थना करके— “त्वमन्नपतिरन्नादो वर्धमानो भूयाः॥” इस वाक्य से बालक को आशीर्वाद देके, पश्चात् संस्कार में आये हुए पुरुषों का सत्कार बालक का पिता और स्त्रियों का सत्कार बालक की माता करके सबको प्रसन्नतापूर्वक विदा करें॥ ॥ इत्यन्नप्राशनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

8 अथ चूडाकर्मसंस्कारविधिं वक्ष्यामः यह आठवाँ संस्कार 'चूडाकर्म' है, जिसको केशछेदन- संस्कार भी कहते हैं। इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का मत ऐसा है- तृतीये वर्षे चौलम् ॥ १ ॥ उत्तरतोऽग्नेर्व्रीहियवमाषतिलानां शरावाणि निदधाति ॥ २ ॥ इसी प्रकार पारस्करगृह्यसूत्रादि में भी है— सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम् ॥ इसी प्रकार गोभिलीयगृह्यसूत्र का भी मत है॥ यह चूडाकर्म अर्थात् मुण्डन बालक के जन्म के तीसरे वर्ष वा एक वर्ष में करना। उत्तरायणकाल शुक्लपक्ष में जिस दिन आनन्द-मङ्गल हो, उस दिन यह संस्कार करे। विधि—आरम्भ में पृष्ठ ९-३४ में लिखित विधि करके चार शरावे ले, एक में चावल, दूसरे में यव, तीसरे में उर्द और चौथे शरावे में तिल भरके वेदी के उत्तर में धर देवे। धरके पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे “ओम् अदितेऽनुमन्यस्व" इत्यादि तीन मन्त्रों से कुण्ड के तीन बाजू और पृष्ठ २७ में लिखे प्रमाणे 'ओम् देव सवितः प्रसुव०' इस मन्त्र से कुण्ड के चारों ओर जल छिटकाके, पूर्व पृष्ठ ३०-३२ में लिखित अग्न्याधान समिदाधान कर अग्नि को प्रदीप्त करके जो समिधा प्रदीप्त हुई हो उसपर लक्ष देकर पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे

८४ संस्कारविधिः आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३४ में लिखे प्रमाणे आठ आज्याहुति, सब मिलके सोलह आहुति देके, पृष्ठ ३४ में लिखे प्रमाणे “ओम् भूर्भुवः स्वः। अग्न आयूंषि०” इत्यादि मन्त्रों से चार आज्याहुति प्रधान होम की देके, पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् मन्त्र से एक आहुति मिलके पाँच घृत की आहुति देवे। इतनी क्रिया करके कर्मकर्त्ता परमात्मा का ध्यान करके नाई की ओर प्रथम देखके— ओम् आयम॑गन्त्सवि॒ता क्षुरेणो॒ष्णेन॑ वाय उद॒केनेहि॑। आदि॑त्या रु॒द्रा वस॑व उन्दन्तु॒ सचे॑त॒सः सोम॑स्य॒ राज्ञो॑ वप॒त् प्रचे॑तसः॥ —अथर्व० कां० ६। सू० ६८॥ इस मन्त्र का ज़प करके, पिता बालक के पृष्ठ-भाग में बैठके किञ्चित् उष्ण और किञ्चित् ठण्डा जल दोनों पात्रों में लेके— ओम् उष्णेन वाय उदकेनैधि॥ इस मन्त्र को बोलके दोनों पात्र का जल एक पात्र में मिला देवे। पश्चात् थोड़ा जल, थोड़ा माखन अथवा दही की मलाई लेके— ओम् अदि॑तिः श्मश्रु॑ वप॒त्वाप॑ उन्दन्तु॒ वर्च॑सा। चिकि॑त्सतु प्र॒जाप॑तिर्दी॒र्घायु॒त्वाय॒ चक्ष॑से॥१॥ —अथर्व० कां० ६। सू० ६८॥ ओं स॒वित्रा प्रसूता दैव्या आप उन्दन्तु ते तनूं दीर्घायुत्वाय वर्चसे॥२॥ इन मन्त्रों को बोलके, बालक के शिर के बालों में तीन बार हाथ फेरके केशों को भिगोवे। तत्पश्चात् कङ्घा लेके केशों को सुधारके इकट्ठा करे, अर्थात् बिखरे न रहे। तत्पश्चात्—

चूड़ाकर्मप्रकरणम् ८५ ओम् ओषधे त्रायस्वैनम्॥ इस मन्त्र को बोलके तीन दर्भ लेके दाहिनी बाजू के केशों के समूह को हाथ से दबाके— ओं विष्णोर्दँष्ट्रोऽसि॥ इस मन्त्र से छुरे की ओर देखके— ओं शिवो नामा॑सि॒ स्वधि॑तिस्ते पि॒ता नर्म॑स्तेऽअस्तु॒ मा र्मा हिँग्ंसीः॥ इस मन्त्र को बोलके छुरे को दाहिने हाथ में लेवे। तत्पश्चात्— ओं स्वधिते मैनँ हिँग्सीः ॥ १ ॥ ओं निवर्त्तयाम्यायु॑षे॒ऽन्नाद्या॑य प्र॒जन॑नाय रा॒यस्पोषा॑य सु॒प्र॒जा॒स्त्वाय॑ सु॒वीर्या॑य ॥ २ ॥ इन दो मन्त्रों को बोलके उस छुरे और उन कुशाओं को केशों के समीप ले-जाके— ओं येनाव॑पत् सवि॒ता क्षुरेण॒ सोम॑स्य॒ राज्ञो॒ वरु॑णस्य वि॒द्वान्। तेन॑ ब्रह्माणो वप॒तेदम॒स्य गोमा॑न॒श्ववा॒नय॒मस्तु प्र॒जावा॑न्॥ —अथर्व० का० ६। सू० ६८॥ इस मन्त्र को बोलके कुशासहित उन केशों को काटे* और वे काटे हुए केश और दर्भ शमीवृक्ष के पत्रसहित, अर्थात् यहाँ शमीवृक्ष के पत्र भी प्रथम से रखने चाहिएँ, उन सबको लड़के का पिता और लड़के की माँ एक शरावे में रक्खें और कोई केश छेदन करते समय उड़ा हो, उसको गोबर से उठाके

  • केश-छेदन की रीति ऐसी है कि दर्भ और केश दोनों युक्ति से पकड़कर अर्थात् दोनों ओर से पकड़के बीच में से केशों को छुरे से काटे। यदि छुरे के बदले कैंची से काटे तो भी ठीक है।

८६ संस्कारविधिः शरावा में अथवा उसके पास रक्खें। तत्पश्चात् इसी प्रकार— ओं येन धाता बृहस्पतेरग्नेरिन्द्रस्य चायुषेऽवपत्। तेन त आयुषे वपामि सुश्लोक्याय स्वस्तये॥ इस मन्त्र से दूसरी बार केश का समूह दूसरी ओर का काटके उसी प्रकार शरावा में रक्खे। तत्पश्चात्— ओं येन भूयश्च रात्र्यां ज्योक् च पश्याति सूर्यम्। तेन त आयुषे वपामि सुश्लोक्याय स्वस्तये॥ इस मन्त्र से तीसरी बार उसी प्रकार केशसमूह को काटके उपरि उक्त ३ [तीन] मन्त्रों—अर्थात् (ओं येनावपत्०), (ओं येन धाता०), (ओं येन भूयश्च०), और— ओं येन पूषा बृहस्पतेर्वायोरिन्द्रस्य चावपत्। तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवात्वे जीवनाय दीर्घायुष्ट्वाय वर्चसे॥ इस एक, इन चार मन्त्रों को बोलके चौथी बार इसी प्रकार केशों के समूह को काटे, अर्थात् प्रथम दक्षिण बाजू के केश काटने का विधि पूर्ण हुए पश्चात् बायीं ओर के केश काटने का विधि करे। तत्पश्चात् उसके पीछे आगे के केश काटे। परन्तु चौथी बार काटने में ‘‘येन पूषा०’’ इस मन्त्र के बदले— ओं येन भूरिश्चरादिवं ज्योक् च पश्चाद्वि सूर्यम्। तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवात्वे जीवनाय सुश्लोक्याय स्वस्तये॥ यह मन्त्र बोल चौथी बार केश छेदन करे। तत्पश्चात्— ओं त्र्या॒यु॒षं ज॒मद॑ग्ने॒ क॒श्यप॑स्य॒ त्र्या॒यु॒षम्। यद्दे॒वेषु॑ त्र्या॒यु॒षं तन्नो॑ऽअस्तु त्र्या॒यु॒षम्॥

चूडाकर्मप्रकरणम् ८७ इस एक मन्त्र को बोलके शिर के पीछे के केश एक बार काटके इसी (ओम् त्र्यायुषं०) मन्त्र को बोलते जाना और औंधे हाथ के पृष्ठ से बालक के शिर पर हाथ फेरके मन्त्र पूरा हुए पश्चात् छुरा नाई के हाथ में देके— ओं यत्क्षुरेण मर्चयता सुपेशसा वप्ता वपसि केशान्। शुन्धि शिरो मास्यायुः प्रमोषीः॥ इस मन्त्र को बोलके नापित से पथरी पर छुरे की धार तेज कराके नापित से बालक का पिता कहे कि—‘इस शीतोष्ण जल से बालक का शिर अच्छे प्रकार कोमल हाथ से भिगो। सावधानी और कोमल हाथ से क्षौर कर। कहीं छुरा न लगने पावे’। इतना कहके कुण्ड से उत्तर दिशा में नापित को ले- जा, उसके सम्मुख बालक को पूर्वाभिमुख बैठाके जितने केश रखने हों उतने ही केश रक्खे, परन्तु पाँचों ओर थोड़ा-थोड़ा केश रखावे अथवा किसी एक ओर रक्खे अथवा एक बार सब कटवा देवे, पश्चात् दूसरी बार के केश रखने अच्छे होते हैं। जब क्षौर हो चुके, तब कुण्ड के पास पड़ा वा धरा हुआ देने के योग्य पदार्थ वा शरावा आदि कि जिनमें प्रथम अन्न भरा था, नापित को देवे और मुण्डन किये हुए सब केश, दर्भ, शमीपत्र और गोबर नाई को देवे। यथायोग्य उसको धन वा वस्त्र भी देवे और नाई केश, दर्भ, शमीपत्र और गोबर को जङ्गल में ले-जा, गढा खोदके उसमें सब डाल ऊपर से मिट्टी से दबा देवे। अथवा गोशाला, नदी वा तालाब के किनारे पर उसी प्रकार केशादि को गाड़ देवे, ऐसा नापित से कह दे। अथवा किसी को साथ भेज देवे, वह उससे उक्त प्रकार करवा लेवे। क्षौर हुए पश्चात् मक्खन अथवा दही की मलाई हाथ में लगा, बालक के शिर पर लगाके स्नान करा, उत्तम वस्त्र पहनाके,

८८ संस्कारविधिः बालक को पिता अपने पास ले शुभासन पर पूर्वाभिमुख बैठके, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामवेद का महावामदेव्यगान करके बालक की माता स्त्रियों और बालक का पिता पुरुषों का यथा योग्य सत्कार करके विदा करें और जाते समय सब लोग तथा बालक के माता-पिता परमेश्वर का ध्यान करके— “ओम् त्वं जीव शरदः शतं वर्धमानः”॥ इस मन्त्र को बोल बालक को आशीर्वाद देके अपने- अपने घर को पधारें और बालक के माता-पिता प्रसन्न होकर बालक को प्रसन्न रक्खें॥ ॥ इति चूडाकर्मसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

⑨ अथ कर्णवेध-संस्कारविधिं वक्ष्यामः अत्र प्रमाणम्— कर्णवेधो वर्षे तृतीये पञ्चमे वा॥ यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है॥ बालक के कर्ण वा नासिका के वेध का समय जन्म से तीसरे वा पाँचवें वर्ष का उचित है। जो दिन कर्ण वा नासिका के वेध का ठहराया हो, उसी दिन बालक को प्रातःकाल शुद्ध जल से स्नान और वस्त्रालङ्कार धारण कराके बालक की माता यज्ञशाला में लावे। पृष्ठ ९- ३७ तक लिखा हुआँ सब विधि करे और उस बालक के आगे कुछ खाने का पदार्थ वा खिलौना धरके— ओं भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणुयाम देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॑र्यजत्राः। स्थि॒रैरङ्गैᳵस्तुष्टु॒वाग्ँ स॑स्त॒नूभि॒र्व्यशे॑महि दे॒वहि॑तं॒ यदायु॑ः॥ इस मन्त्र को पढ़के चरक-सुश्रुत वैद्यक ग्रन्थों के जाननेवाले सद्वैद्य के हाथ से कर्ण वा नासिका वेध करावें कि जो नाड़ी आदि को बचाके वेध कर सके। पूर्वोक्त मन्त्र से दक्षिण कान, और— ओं व॒क्ष्यन्ती॒वेदा ग॑नीगन्ति॒ कर्णं॑ प्रि॒यग्ँ सखा॑यं परि षस्वजा॒ना। योषे॑व शि॒ङ्क्ते वित॒ताधि॒ धन्व॒ञ्ज्या इ॒यग्ँ सम॑ने पा॒रय॑न्ती॥ इस मन्त्र को पढ़के दूसरे वामकर्ण का वेध करे। तत्पश्चात् वही वैद्य उन छिद्रों में शलाका रक्खे कि जिससे छिद्र पूर न जावें और ऐसी ओषधि इसपर लगावे जिससे कान पकें नहीं और शीघ्र अच्छे हो जावें॥ ॥ इति कर्णवेधसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

10 अथोपनयन* संस्कारविधिं वक्ष्यामः अत्र प्रमाणानि— अष्टमे वर्षे ब्राह्मणमुपनयेत् ॥ १ ॥ गर्भाष्टमे वा ॥ २ ॥ एकादशे क्षत्रियम् ॥ ३ ॥ द्वादशे वैश्यम् ॥ ४ ॥ आषोडशाद् ब्राह्मणस्यानतीतः कालः ॥ ५ ॥ आद्वाविंशात् क्षत्रियस्य, आचतुर्विंशाद् वैश्यस्य, अत ऊर्ध्वं पतितसावित्रीका भवन्ति ॥ ६ ॥ —यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का प्रमाण है॥ इसी प्रकार पारस्करादि गृह्यसूत्रों का भी प्रमाण है॥ अर्थः—जिस दिन जन्म हुआ हो, अथवा जिस दिन गर्भ रहा हो, उससे आठवें वर्ष में ब्राह्मण के, जन्म वा गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय के और जन्म वा गर्भ से बारहवें वर्ष में वैश्य के बालक का यज्ञोपवीत करें तथा ब्राह्मण के सोलह, क्षत्रिय के बाईस और वैश्य के बालक का चौबीसवें वर्ष से पूर्व- पूर्व यज्ञोपवीत होना चाहिए। यदि पूर्वोक्त काल में इनका यज्ञोपवीत न हो, तो वे पतित माने जावें। श्लोकः— ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे। राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे॥ —यह मनुस्मृति का वचन है जिसे शीघ्र विद्या, बल और व्यवहार करने की इच्छा हो

  • उप नाम समीप नयन अर्थात् प्राप्त करना वा होना।

उपनयनप्रकरणम् ९१ और बालक भी पढ़ने में समर्थ हुए हों, तो ब्राह्मण के लड़के का जन्म वा गर्भ से पाँचवें, क्षत्रिय के लड़के का जन्म वा गर्भ से छठे और वैश्य के लड़के का जन्म वा गर्भ से आठवें वर्ष में यज्ञोपवीत करे। परन्तु यह बात तब सम्भव है कि जब बालक की माता और पिता का विवाह पूर्ण ब्रह्मचर्य के पश्चात् हुआ होवे। उन्हीं के बालक ऐसे उत्तम, बुद्धि में श्रेष्ठ और पढ़ने में शीघ्र समर्थ होते हैं। जब बालक का शरीर और बुद्धि वैसी हो कि अब यह पढ़ने के योग्य हुआ, तभी उसका यज्ञोपवीत करा देवें। यज्ञोपवीत का समय—उत्तरायण सूर्य, और— वसन्ते ब्राह्मणमुपनयेत्। ग्रीष्मे राजन्यम्। शरदि वैश्यम्। सर्वकालमेके ॥ —यह शतपथब्राह्मण का वचन है॥ अर्थ:—ब्राह्मण का वसन्त, क्षत्रिय का ग्रीष्म और वैश्य का शरद् ऋतु में यज्ञोपवीत करें। अथवा सब ऋतुओं में उपनयन हो सकता है और उसका प्रातःकाल ही समय है। पयोव्रतो ब्राह्मणो यवागूव्रतो राजन्य आमिक्षाव्रतो वैश्यः ॥ —यह शतपथब्राह्मण का वचन है॥ जिस दिन बालक का यज्ञोपवीत करना हो, उससे तीन दिन अथवा एक दिन पूर्व तीन वा एक व्रत बालक को कराना चाहिए। उन व्रतों में ब्राह्मण का लड़का एक बार वा अनेक बार दुग्धपान, क्षत्रिय का लड़का 'यवागू' अर्थात् यव को मोटा दलके गुड़ के साथ पतली जैसीकि कढ़ी होती है, वैसी बनाकर पिलावें और 'आमिक्षा' अर्थात् जिसको श्रीखण्ड वा सिखण्ड कहते हैं, वैसी जो दही चौगुना, दूध एक गुना तथा यथायोग्य खाँड, केसर डालके कपड़े में छानकर बनाया जाता है, उसको वैश्य का लड़का पीके व्रत करे, अर्थात् जब-जब लड़कों को

९२ संस्कारविधिः भूख लगे, तब-तब तीनों वर्णों के लड़के इन तीनों पदार्थों ही का सेवन करें, अन्य पदार्थ कुछ न खावें-पीवें। विधिः—अब जिस दिन उपनयन करना हो, उसके पूर्व दिन में सब सामग्री इकट्ठी कर याथातथ्य शोधन आदि कर ‘लेवे और उस दिन पृष्ठ ९-२८वें तक कुण्ड के समीप सब सामग्री धर, प्रातःकाल बालक का क्षौर करा, शुद्ध जल से स्नान करावे। उत्तम वस्त्र पहना, यज्ञमण्डप में पिता वा आचार्य बालक को मिष्टान्नादि का भोजन कराके वेदी के पश्चिमभाग में सुन्दर आसन पर पूर्वाभिमुख बैठावे। बालक का पिता और पृष्ठ २८-२९ में लिखे प्रमाणे ऋत्विज् लोग भी पूर्वोक्त प्रकार अपने-अपने आसन पर बैठ, यथावत् आचमनादि क्रिया करें। पश्चात् कार्यकर्त्ता बालक के मुख से— ब्रह्मचर्य्यमागाम्, ब्रह्मचार्य्यसानि ॥ ये वचन बुलवाके आचार्य*— ओं येनेन्द्राय बृहस्पतिर्वासः पर्यदधादमृतम्। तेन त्वा परिदधाम्यायुषे दीर्घायुत्वाय बलाय वर्चसे ॥ इस मन्त्र को बोलके बालक को सुन्दर वस्त्र और उपवस्त्र पहनावे। पश्चात् बालक आचार्य के सम्मुख बैठे और यज्ञोपवीत हाथ में लेके— ओं यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ १ ॥

  • ‘आचार्य’ उसको कहते हैं कि जो साङ्गोपाङ्ग वेदों के शब्द, अर्थ, सम्बन्ध और क्रिया का जाननेहारा, छल, कपटरहित, अतिप्रेम से सबको विद्या का दाता, परोपकारी तन, मन और धन से सबको सुख बढ़ाने में तत्पर, महाशय, पक्षपात किसी का न करे और सत्योपदेष्टा, सबका हितैषी, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय होवे।

उपनयनप्रकरणम् ९३ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ॥ २ ॥ इन मन्त्रों को बोलके आचार्य बायें स्कन्धे के ऊपर कण्ठ के पास से शिर बीच में निकाल, दाहिने हाथ के नीचे बग़ल में निकाल कटि तक धारण करावे। तत्पश्चात् बालक को अपने दाहिने ओर साथ बैठाके ईश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन और शान्तिकरण का पाठ करके समिदाधान, अग्न्याधान कर (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व०) इत्यादि पूर्वोक्त चार मन्त्रों से पूर्वोक्त रीति से कुण्ड के चारों ओर जल छिटका, पश्चात् आज्याहुति करने का आरम्भ करना। वेदी में प्रदीप्त हुई समिधा को लक्ष में धर, चमसा में आज्यस्थाली से घी ले, आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार तथा पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे आज्याहुति आठ, तीनों मिलके सोलह घृत की आहुति देके, पश्चात् बालक के हाथ से प्रधानहोम, जो विशेष शाकल्य बनाया हो, उसकी आहुतियाँ निम्नलिखित मन्त्रों से दिलानी—(ओं भूर्भुवः स्वः। अग्न आयूंषि०) पृष्ठ ३४ में लिखे प्रमाणे चार आज्याहुति देवें। तत्पश्चात्— ओम् अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्। तेनर्ध्यासमिदमहमनृतात् सत्यमुपैमि स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ १ ॥ ओं वायो व्रतपते० * स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदन्न मम ॥ २ ॥ ओम् सूर्य व्रतपते० स्वाहा ॥ इदं सूर्याय—इदन्न मम ॥ ३ ॥ ओम् चन्द्र व्रतपते० स्वाहा ॥ इदं चन्द्राय—इदन्न मम ॥ ४ ॥ ओम् व्रतानां व्रतपते० स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय व्रतपतये—इदन्न मम ॥ ५ ॥

  • इसके आगे 'व्रतं चरिष्यामि' इत्यादि सम्पूर्ण मन्त्र बोलना चाहिए।

९४ संस्कारविधिः इन पाँच मन्त्रों से पाँच आज्याहुति दिलानी। उसके पीछे पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् आहुति एक और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे प्राजापत्याहुति एक, ये सब मिलके छह घृत की आहुति देनी। सब मिलके पन्द्रह आहुति बालक के हाथ से दिलानी। उसके पश्चात् आचार्य यज्ञकुण्ड के उत्तर की ओर पूर्वाभिमुख बैठे और बालक आचार्य के सम्मुख पश्चिम में मुख करके बैठे। तत्पश्चात् आचार्य बालक की ओर देखके— ओम् आगन्त्रा समगन्महि प्र सुमर्त्य युयोतन। अरिष्टाः संचरेमहि स्वस्ति चरतादयम्॥ १॥ इस मन्त्र का जप करे। माणवकवाक्यम्—‘‘ओं ब्रह्मचर्यमागामुप मा नयस्व’’। आचार्योक्तिः—‘‘को नामासि¹?’’ बालकोक्तिः—‘‘एतन्नामास्मि²।’’ तत्पश्चात्— ओम् आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ऽ ऊ॒र्जे द॑धातन। म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥ १॥ यो वः॑ शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह नः॑। उ॒श॒तीरि॑व मा॒तरः॑॥ २॥ तस्मा॒ऽ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ। आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥ ३॥ इन तीन मन्त्रों को पढ़के बटुक की दक्षिण हस्ताञ्जलि १. तेरा नाम क्या है, ऐसा पूछना। २. मेरा यह नाम है।

उपनयनप्रकरणम् ९५ शुद्धोदक से भरनी। तत्पश्चात् आचार्य अपनी हस्ताञ्जलि भरके— ओँ तत्स॑वि॒तुर्वृ॑णीमहे व॒यं दे॒वस्य॑ भोर्ज॒नम्। श्रेष्ठं॑ स॒र्व॒धात॑मं तुरं॒ भग॑स्य धीमहि॥४॥ इस मन्त्र को पढ़के आचार्य अपनी अञ्जलि का जल बालक की अञ्जलि में छोड़के, बालक की हस्ताञ्जलि अङ्गुष्ठसहित पकड़के— ओम् देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां हस्तं गृह्णाम्यसौ*। इस मन्त्र को पढ़के बालक की हस्ताञ्जलि का जल नीचे पात्र में छुड़ा देना। इसी प्रकार दूसरी बार, अर्थात् प्रथम आचार्य अपनी अञ्जलि भर, बालक की अञ्जलि में अपनी अञ्जलि का जल भरके, अङ्गुष्ठसहित हाथ पकड़के— ओँ सविता ते हस्तमग्रभीत्, असौ॥ इस मन्त्र से पात्र में छुड़वा दे। पुनः इसी प्रकार तीसरी बार आचार्य अपने हाथ में जल भर, पुनः बालक की अञ्जलि में भर, अङ्गुष्ठसहित हाथ पकड़के— ओम् अग्निराचार्यस्तव, असौ॥ तीसरी बार बालक की अञ्जलि का जल छुड़वाके, बाहर निकल सूर्य के सामने खड़े रह उसे देखके आचार्य— ओँ देव सवितरेष ते ब्रह्मचारी तं गोपाय स मामृत॥ इस एक और पृष्ठ ७९ में लिखे प्रमाणे (तच्चक्षुर्देवहितम्०) इस दूसरे मन्त्र को पढ़के बालक को सूर्यावलोकन करा,

  • 'असौ' इस पद के स्थान में बालक का सम्बोधनान्त नामोच्चारण सर्वत्र करना चाहिए।

९६ संस्कारविधिः बालकसहित आचार्य सभामण्डप में आ, यज्ञकुण्ड की उत्तरबाजू की ओर बैठके— ओं युवा॑ सु॒वासा॒ परिवी॑त॒ आगा॒त् स उ॒ श्रेया॑न् भवति॒ जाय॑मानः॥ इस तथा— ओं सूर्यस्यावृतमन्वावर्त्तस्व, असौ*॥ इस मन्त्र को पढ़े और बालक आचार्य की प्रदक्षिणा करके आचार्य के सम्मुख बैठे। पश्चात् आचार्य बालक के दक्षिण स्कन्धे पर अपने हाथ से स्पर्श और पश्चात् अपने हाथ को वस्त्र से आच्छादित करके— ओं प्राणानां ग्रन्थिरसि मा विस्रसोऽन्तक इदं ते परि- ददामि, अमुम्॥ १॥ इस मन्त्र को बोलने के पश्चात्— ओं अहुर इदं ते परिददामि, अमुम्॥ २॥ इस मन्त्र से उदर पर। और— ओं कृशन इदं ते परिददामि, अमुम्॥ ३॥ इस मन्त्र से हृदय। ओं प्रजापतये त्वा परिददामि, असौ॥ ४॥ इस मन्त्र को बोलके दक्षिण स्कन्ध, और— ओं देवाय त्वा सवित्रे परिददामि, असौ॥ ५॥ इस मन्त्र को बोलके वाम हाथ से बायें स्कन्ध पर स्पर्श करके, बालक के हृदय पर हाथ धरके— ओं तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो३ मनसा देवयन्तः॥ ६॥ इस मन्त्र को बोलके आचार्य संम्मुख रहकर बालक के


  • ‘असौ’ और ‘अमुम्’ इन दोनों पदों के स्थान में सर्वत्र बालक का नामोच्चारण करना चाहिए।

उपनयनप्रकरणम् ९७ दक्षिण हृदय पर अपना हाथ रखके— ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु। मम वाचमेकमना जुषस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥ आचार्य इस प्रतिज्ञामन्त्र को बोले। अर्थात् ‘हे शिष्य बालक! तेरे हृदय को मैं अपने अधीन करता हूँ। तेरा चित्त मेरे चित्त के अनुकूल सदा रहे .और तू मेरी वाणी को एकाग्र मन हो प्रीति से सुनकर उसके अर्थ का सेवन किया कर और आज से तेरी प्रतिज्ञा के अनुकूल बृहस्पति परमात्मा तुझको मुझसे युक्त करे’। यह प्रतिज्ञा करावे। इसी प्रकार शिष्य भी आचार्य से प्रतिज्ञा करावे कि— ‘हे आचार्य ! आपके हृदय को मैं अपनी उत्तम शिक्षा और विद्या की उन्नति में धारण करता हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित्त सदा रहे। आप मेरी वाणी को एकाग्र होके सुनिए और परमात्मा मेरे लिए आपको सदा नियुक्त रक्खे’। इस प्रकार दोनों प्रतिज्ञा करके— आचार्योक्तिः—को नामाऽसि ? तेरा नाम क्या है? बालकोक्तिः—[ असौ ] अहम्भोः। मेरा अमुक नाम है। ऐसा उत्तर देवे। आचार्यः—कस्य ब्रह्मचार्यसि? तू किसका ब्रह्मचारी है? बालकः—भवतः। आपका। आचार्य बालक की रक्षा के लिए— इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्यग्निराचार्यस्तवाहमाचार्यस्तव असौ*॥


  • ‘असौ’ इस पद के स्थान में सर्वत्र बालक का नामोच्चारण करना चाहिए।

९८ संस्कारविधिः इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात्— ओं कस्य ब्रह्मचार्यसि प्राणस्य ब्रह्मचार्यसि कस्त्वा कमुपनयते काय त्वा परिददामि ॥ १ ॥ ओं प्रजापतये त्वा परिददामि। देवाय त्वा सवित्रे परिददामि। अद्भ्यस्त्वौषधीभ्यः परिददामि। द्यावापृथिवीभ्यां त्वा परिददामि। विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः परिददामि। सर्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्यः परिद्दाम्यरिष्ट्यै ॥ २ ॥ इन मन्त्रों को बोल बालक को शिक्षा करे कि—'तू प्राण आदि की विद्या के लिए यत्नवान् हो'। यह उपनयन-संस्कार पूरा हुए पश्चात् यदि उसी दिन वेदारम्भ करने का विचार पिता और आचार्य का हो तो उसी दिन करना और जो दूसरे दिन का विचार हो तो पृष्ठ ३६- ३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करके संस्कार में आई हुई स्त्रियों का बालक की माता और पुरुषों का बालक का पिता सत्कार करके विदा करे और माता-पिता, आचार्य, सम्बन्धी, इष्ट, मित्र सब मिलके— 'ओं त्वं जीव शरदः शतं वर्द्धमानः, आयुष्मान् तेजस्वी वर्चस्वी भूयाः ॥' इस प्रकार आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को सिधारें ॥ ॥ इत्युपनयनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

( 11 ) अथं वेदारम्भसंस्कारविधिर्विधीयते 'वेदारम्भ' उसे कहते हैं—'जो गायत्रीमन्त्र से लेके साङ्गोपाङ्ग* चारों वेदों के अध्ययन करने के लिए नियम धारण करना होता है। समय:—जो दिन उपनयन-संस्कार का है, वही वेदारम्भ का है। यदि उस दिवस में न हो सके अथवा करने की इच्छा न हो तो दूसरे दिन करे। यदि दूसरा दिन भी अनुकूल न हो तो एक वर्ष के भीतर किसी दिन करे। विधि:—जो वेदारम्भ का दिन ठहराया हो, उस दिन प्रातःकाल शुद्धोदक से स्नान कराके, शुद्ध वस्त्र पहिना, पश्चात् कार्यकर्त्ता अर्थात् पिता, यदि पिता न हो तो आचार्य बालक को लेके उत्तमासन पर वेदी के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठे। तत्पश्चात् पृष्ठ ९-२१ तक ईश्वरस्तुति**, प्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण करके, पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे ( भूर्भुवः स्वः ) इस मन्त्र से अग्न्याधान पृ० ३० में लिखे प्रमाणे

  • अङ्ग—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष। उपाङ्ग— पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त। उपवेद— आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थवेद अर्थात् शिल्पशास्त्र। ब्राह्मण—ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ। वेद—ऋक्, यजुः, साम और अथर्व इन सबको क्रम से पढ़ें। ** जो उपनयन किये पश्चात् उसी दिन वेदारम्भ करे, उसको पुनः वेदारम्भ के आदि में ईश्वरस्तुति, प्रार्थनोपासना और स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण् करना आवश्यक नहीं।