संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १३६
जिसका बायाँ अण्ड सूख गया और उसके पुत्र ही पुत्र हुए।
६. मेरी स्वयं जाँच मनुष्योंके विषयमें।
१. बाबू मदनमोहन श्रोड़ा जो मेरे पास दो मासतक रहे उनसे इस विषयपर बातचीत होनेसे मालूम हुआ कि उनकी स्त्रीके बायें ( Ovary ) अण्डमें मवाद पड़ गया था। जनाने अस्पतालमें वह अण्ड निकाल लिया गया। इसके पीछे उनकी स्त्रीको चार पुत्र उत्पन्न हुए।
२. मेरे मित्र पण्डित राजवल्लि मिश्रके फोर्तामें पानी भर जाया करता था। उसे आप एक नाईसे निकलवा दिया करते थे। एक बार अंधेरेमें नश्तर देते समय नाईने दहिने अण्डमें लोहेकी छुच्छी कर दी। बेतुरन्त बेहोश हो गये। अस्पताल आये। दहिना अण्ड निकाल लिया गया। वे अच्छे हो गये। इसके बाद उनके तीन कन्यायें उत्पन्न हुईं।
१०. मेरी स्वयं जाँच पशुओंके विषयमें।
१. देवीपाटनके मेलेमें एक सौदागरके पास सांड घोड़ा था। सौदागर यह कहा करता था कि इस सांडसे बछेरी नहीं होती। सांड तीन घोड़ियोंपर छोड़ा गया। दोको गर्भ रहा और बछेरे पैदा हुए। तीसरे वर्ष सौदागर फिर उस सांडको लेकर आया, तो देखनेसे मालूम हुआ कि सांडके दहिने ओरका ही अण्ड है, चोट लगनेसे बायाँ काट कर निकाल दिया गया था।
( सन् १९१६ ई० )
२. मेरे मास्टर पण्डित मालती प्रसादके पास एक कुत्ता
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सन्तति-शान्त ।
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था । दूसरे कुत्तोंसे भगडा होनेके कारण उसका 'वायाँ' अण्ड बाहर निकल आया । एक मुसलमानने चीर कर निकाल लिया । इस कुत्तेसे दो कुत्तियोंके गर्भ रहा । दोनोंके सात बच्चे हुए । सब कुत्ते थे, कुत्ती एक भी नहीं थी । (सन् १९०१)
३. मेरे एक परममित्र शेखजीने दो बकरीके बच्चोंको बधिया कराया । इनमेंसे एक पूरा बधिया नहीं हुआ । अर्थात् एक औरका अण्ड नहीं निकला । कुछ दिनोंके बाद मालूम हुआ कि एक बकरेके दहिता अण्ड रह गया है । इस बकरेसे दो बकरियोंको गर्भ रहा । दोनोंके छ बच्चे हुए जो सारे बकरे थे, बकरी एक भी नहीं थी ।
(सन् १९०९ ई०)
४. मेरे पास एक पालतू बिल्ली थी । वह एक ऐसे बिलावसे गर्भवती हुई कि जिसका वायाँ अण्ड चोट लगनेसे कुछ छोटा पड़ गया था और कभी कभी फूलकर बहुत बड़ा हो जाया करता था । बिल्लीके तीन बच्चे हुए, सब बिलाव थे ।
(सन् १९०६ ई०)
जिन लोगोंने इन बातोंपर विचार नहीं किया है उनका कहना है कि कन्या और पुत्र होना ईश्वरके आधीन है या भाग्य में जो हो वही होता है । परन्तु जिन्होंने इसकी वार्षिकियोंपर विचार किया है, उनका अटल विश्वास यही है कि कन्या या पुत्र पैदा करना मनुष्यके हाथमें है । हम इस विषयमें बहुत खुलासा साफ साफ लिखना चाहते हैं कि जिससे सर्वसाधारण इस विषयको अच्छी तरह समझ जायँ ।
पुत्र अर्थवा कन्या कैसे पैदा होती है? इस विषयमें हमारा विश्वास इस बातपर है कि स्त्री और पुरुष अपने अपने प्रधान
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १४१
अङ्गसे कन्या और पुत्र उत्पन्न करते हैं। पुरुषका दाहिना और स्त्रीका बायाँ अङ्ग प्रधान हैं। जब पुरुषके दहिने अण्डसे वीर्य निकलकर स्त्री के दहिने अण्डसे निकले रजके साथ मिलता है तो पुत्र; और जब पुरुषके बाएँ अण्डसे निकला वीर्य स्त्रीके बाएँ अण्डसे निकले रजके साथ मिलता है तो कन्या उत्पन्न होती है। ऐसा कभी नहीं होता कि पुरुषके दहिने अण्डसे निकला वीर्य स्त्रीके बाएँ या पुरुषके बाएँ अण्डसे निकला वीर्य स्त्रीके दहिने अण्डके रजसे मिले। इससे यह बात सिद्ध है कि स्त्री और पुरुष दोनोंके दहिने और बाएँ अण्डसे निकला रज वीर्य दहिनेका दहिने और बाएँका बाएँसे मिलता है। इसका कारण यह है कि पुरुषका दहिना अङ्ग प्रधान है इसलिये पुरुष के दहिने अण्डमें पुत्रका वीर्य और बाएँमें कन्याका। इसी भाँति स्त्रीका बायाँ अङ्ग प्रधान है इस कारण स्त्रीके बाएँअण्ड में कन्या और दहिनेमें पुत्रका रज रहता है। इसलिये पुरुषके दहिने अण्डसे पुत्रका वीर्य निकलकर स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले पुत्रके रजसे मिलकर पुत्र उत्पन्न करता है और इसी प्रकार स्त्रीके बाएँ अण्डसे कन्याका रज निकलकर पुरुषके बाएँ अण्डसे निकले कन्याके वीर्यसे मिलकर कन्या उत्पन्न करता है।
यहाँ पर पाठकोंको यह शङ्का होगी कि कुछ लोगोंका यह मत है कि पुरुष अथवा स्त्रीके दोनों अण्डोंमें एक ही प्रकारका पदार्थ रहता है तो फिर दहिनेमें पुत्र और बाएँमें कन्याका रज वीर्य कैसे रहता है? यह एक बड़े भूलकी शङ्का है। सबसे पहली बात तो यह है कि यदि दोनोंमें एक ही पदार्थ होता तो प्रकृतिको दो अण्डे बनानेकी जरूरत ही क्या थी? इसके अतिरिक्त डाकुओंकी जाँचसे यह पता चलता है कि जब पुरुषका बायाँ अण्ड खराब हुआ तो पुत्र ही पुत्र हुए और जब स्त्रीका
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सन्तति-शास्त्र ।
दहिना अण्ड खराब हुआ तो कन्या ही कन्याएँ हुईं। इससे साफ जाहिर है कि स्त्री और पुरुषके दहिने अण्डोंमें पुत्र और बाएँमें कन्याका रज वीर्य रहता है।
अब हम पाठकोंको यह दिखलायेंगे कि हम इस विषयमें जितने मत लिख चुके हैं वे सब हमारे माने हुए मतसे मिलते हैं या नहीं। इनमें एक एक मत पर विचार करनेकी आवश्यकता है।
१ वेद, धर्मशास्त्र, बौद्ध और यूनानी मतसे यह बात कही जाती है कि वीर्य बलवान होनेसे पुत्र और रज बली होनेसे कन्या उत्पन्न होती है। अब यह देखना चाहिये कि रज और वीर्य बलवान कब होता है। इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि पुरुषके दहिने और स्त्रीके बाएँ अङ्गने निकला वीर्य और रज प्रबल होता है।
( रतिशान्त )
इमने इस बातको माना कि पुरुषके प्रधान दहिने अङ्गसे वीर्य निकल कर स्त्रीके दहिने अङ्गसे निकले रजसे मिलकर पुत्र और स्त्रीके प्रधान बाएँ अङ्गसे निकला रज पुरुषके बाएँ अङ्गसे निकले वीर्यसे मिल कर कन्या उत्पन्न करता है। हमरे मतसे ऊपर कहे हुए यह मत कि “बलवान् वीर्यसे पुत्र और बली रजसे कन्या उत्पन्न होती है” इस कारण मिलता है कि पुरुषके दहिने अङ्ग अर्थात् दहिने अण्डसे निकला हुआ बलवान् वीर्य स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले निर्बल रजके साथ मिलकर पुत्र और स्त्रीके बाएँ अण्डसे निकला बली रज पुरुषके बाएँ अण्डसे निकले निर्बल वीर्यसे मिलकर कन्या उत्पन्न करता है अतएव हमारे माने हुए मतसे यह सिद्धान्त पूरा मिलता है।
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १४३
२. धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात कही जाती है कि रजस्वला होने से ६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रात्रि में संयोग करने से पुत्र और ५-७-९-११-१३ और १५ रात्रिमें, गमन करने से कन्या उत्पन्न होती है। इन रात्रियों में रजकी दशा पर विचार करना आवश्यक है। इस विषयमें विदेहाचार्यने लिखा है कि ४-६-८-१०-१२-१४-१६ इन रात्रियोंमें रज बहुत ही कम और ५-७-९-१३-१५ इन रात्रियोंमें बहुत ज्यादा निकलता है। एक और विद्वान् की राय है कि ४-६-८-१०-१२-१४-१६ इन रात्रियोंमें स्त्रीको रज कम निकलता है और इससे पुत्र उत्पन्न होता है। यदि इन रात्रियों में वार्ध अंगसे रज निकले तो वह किसी योग्य नहीं होता। इसी प्रकार ५-७-९-११-१३-१५ इन रात्रियोंमें स्त्रीके रज अधिक निकलता है और उससे कन्या उत्पन्न होती है। यदि इन रात्रियोंमें रज दहिने अंगसे निकले तो वह भी किसी योग्य नहीं होता। (रतिशाम्भ)
इन प्रमाणों से यह बात सिद्ध हुई कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियों में स्त्रीके दहिने अंगसे निकला रज पुत्र और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें वार्ध अंगसे निकला रज कन्या उत्पन्न करता है। यदि इसके विपरीत ४-६-८ इत्यादि रात्रियोंमें वार्ध अंग से और ५-७-९ इत्यादि रात्रियोंमें दहिने अंगसे निकला रज किसी योग्य नहीं होता, तो इससे यह बात सिद्ध होती है कि जब सम रात्रियोंमें रज स्त्रीके दहिने अङ्गसे निकल कर पुरुषके दहिने अंगसे निकले वीर्यसे मिलेगा तो पुत्र और जब स्त्रीके वार्ध अङ्गसे विषम दिनोंमें निकल कर पुरुषके वार्ध अंगसे निकले हुए वीर्यसे मिलेगा तो कन्या होगी। यह
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सन्धति-शास्त्र ।
सिद्धान्त हमारे माते हुए मतसे जुदा नहीं है। इसलिये हमारी मानी हुई बात और यह सिद्धान्त एक ही है।
२. धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात कही जाती है कि जब वीर्य अधिक हो और रज कम हो, तो पुत्र, यदि रज अधिक हो तथा वीर्य कम हो, तो कन्या उत्पन्न होती है। इस विषयमें यह देखना है कि रज और वीर्य अधिक कब निकलता है। नम्बर २ में विदेशाचार्यका मत लिखा गया है कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियोंमें रज कम और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें अधिक निकलता है। एक विद्वान्की राय है कि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियोंमें कम निकले हुए रजसे पुत्र और ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें निकले हुए अधिक रजसे कन्या उत्पन्न होती है। यदि ४-६-८ इत्यादि सम रात्रियों में स्त्रीके वार्प अंगसे रज निकले या ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियोंमें दाहिने अंगसे निकले, तो दोनों अयोन्म्य होते हैं।
(रतिशास्त्र)
जब इस प्रकार ४-६-८ आदि सम रात्रियों में रज स्त्रीके दाहिने अंग से कम निकलकर पुरुषके दाहिने अंग से निकले हुए अधिक वीर्यके साथ मिलेगा, तो पुत्र होगा। इसी प्रकार जब ५-७-९ इत्यादि विषम रात्रियों में रज स्त्रीके वार्प अंगसे अधिक निकल कर पुरुष के वार्प अङ्गसे निकले हुए कम वीर्य के साथ मिलेगा, तो कन्या होगी। इसमें यह बात है कि जब स्त्रीका रज कम होगा तो पुरुषका वीर्य अधिक होगा। कारण स्त्रीका रज अधिक होगा तो पुरुषका वीर्य कम होगा। यह कि पुरुषका प्रधान अङ्ग दाहिना है, इसलिये दाहिने से अधिक और वार्प से कम वीर्य निकलता है। इसी प्रकार स्त्री-
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अर्थाह है। १४५
के प्रधान वार्ध अंगसे अधिक और दहिने अंगसे कम रज निकलता है। अतएव पुरुषके दहिने अंगसे निकला हुआ अधिक वीर्य स्त्रीके वार्ध अंगसे निकले हुए कम रजके साथ मिलकर पुत्र और स्त्रीके दहिने अंगसे निकला अधिक रज पुरुषके वार्ध अंगसे निकला कम वीर्यके साथ मिलकर कन्या उत्पन्न करता है। इस कारण यह सिद्धान्त हमारे विरुद्ध नहीं, क्योंकि हमारी मानी हुई बात और यह सिद्धान्त एक ही है।
४. वैद्यक, हिन्दुओंका प्राचीन मत, यूनानी मत, यूरोपीय
विद्वानोंकी राय, यूरोपीय विद्वानोंकी जाँच-पशुओं और मनुष्यों पर अनुभव करनेसे और मित्रों द्वारा जो बातें मालूम हुई उससे यह कहा जाता है कि स्त्री-पुरुष के दहिने अंगसे पुत्र और वार्धसे कन्या उत्पन्न होती है। इस विषयका खुलासा यह है कि पुरुषके दहिने अण्डमें पुत्र और वार्धमें कन्याका वीर्य रहता है।
इसी प्रकार स्त्रीके दहिने अण्डमें पुत्र और वार्धमें कन्याका रज रहता है। इसलिये जब पुरुषके दहिने अण्डसे वीर्य निकलकर स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले रजसे मिलता है, तो पुत्र और जब स्त्रीके वार्ध अण्डसे निकला रज पुरुषके वार्ध अण्डसे निकले वीर्यसे मिलता है, तो कन्या उत्पन्न होती है। यहाँ पर पाठक यह शङ्का करेंगे कि पुरुषके दहिने और स्त्रीके वार्ध या स्त्रीके दहिने और पुरुषके वार्ध अण्डोंसे निकले रज-वीर्यसे क्या होता है? इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि दहिनेका वार्ध और वार्धका दहिने अण्डसे निकला रज वीर्य मिलता ही नहीं। (रतिशास्त्र)
५. वैद्यकके मतसे यह कहा जाता है समीरण, चन्द्रमसी
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सन्तति-शास्त्र ।
और गौरीमें वीर्य गिरनेसे कन्या और पुत्र उत्पन्न होते हैं । भावमिश्र जहाँ इस प्रकारणको अपने ग्रन्थ भाव-प्रकाशमें लिखते हैं, वहाँ यों लिखा है कि “ स्त्रियों के काम मन्दिरके मुखमें समीरणा, चन्द्रमसी और गौरी तीन नाडियाँ होती हैं । काममन्दिर क्या है ? इस विषयमें एक विद्वानकी राय है कि काममन्दिर गर्भाशयको कहते हैं । (रतिशास्त्र )
अब यह सिद्ध हुआ कि गर्भाशयके मुखमें तीन नाडियाँ होती हैं । इतमें समीरणा वह भाग है जो गर्भाशयके मुखके बीचमें होता है । इस स्थानपर वीर्य गिरनेसे बाहर निकल आता है । चन्द्रमसी गर्भाशयकी बाई ओर है । इस रास्तेसे वीर्य जाकर स्त्रीके वार्प अण्डके निकले हुए रजसे मिलता है । इस मार्गसे गया हुआ वीर्य कन्या उत्पन्न करता है । इसी प्रकार गौरी गर्भाशयके दहिनी ओर है, इस रास्तेसे वीर्य जाकर स्त्रीके दहिने अण्डके निकले हुए रजसे मिलता है, इस मार्गसे गया हुआ वीर्य पुत्र उत्पन्न करता है । गर्भाशयके दहिने वार्प दो अण्ड होते हैं । इन्हीं अण्डोंसे गर्भाशयमें रज पहुँचता है । इधरसे चन्द्रमसी रास्तेसे बाई ओर होकर वीर्य पहुँचता है और वार्प अण्डके निकले रजसे मिलकर कन्या उत्पन्न करता है । जब वीर्य गर्भाशयके दहिने ओर गौरीके रास्तेमें पहुँचता है तब दहिने अण्डके रजसे मिलकर पुत्र उत्पन्न करता है । अतएव यह सिद्धान्त हमारे माने हुए मतसे पूरा पूरा मिलता है ।
६. एक डाकूका मन है कि शत्रुदर्शनमें ७-८-१० दिन बाद सयोग करनेसे पुत्र और ज्ञान करके दूसरे तीसरे दिनोंके गर्भ पड़नेसे कन्या उत्पन्न होती है । इसका कारण
कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके अधीन है। १४०
यह कहा जाता है कि श्रीराममें स्त्रीको संयोगकी बहुत इच्छा रहती है, अतएव कन्या और ७-८-१० दिनोंके बाद संयोग करनेसे पुत्र होता है। कारण यह कि उस समय स्त्रीको संयोगकी विशेष इच्छा नहीं रहती। यह सिद्धान्त निर्मूल है। क्योंकि बहुतसे बच्चे ऐसे मौजूद हैं कि जिनका गर्भाधान इस मनुष्यके विरुद्ध हुआ है। मेरे एक मित्रके यहाँ स्नानके दूसरे दिन अर्थात् छठे दिनोंके गर्भाधानसे पुत्र और स्नानसे ग्यारह दिन बादके गर्भाधानसे कन्या उत्पन्न हुई। अतएव ऐसे सिद्धान्त पर विश्वास नहीं किया जा सकता। हमारा माना हुआ मत इसके विरुद्ध है और वही ठीक है।
हमारे पाठकोंने इस विषयमें अनेक भेद देखे हैं, परन्तु प्रायः जितने मत हैं उन सबका सिद्धान्त यही है कि पुरुषके दहिने अण्डसे निकला हुआ वीर्य जब स्त्रीके दहिने अण्डसे निकले रजके साथ मिलता है, तो पुत्र और जब स्त्रीके बाएँ अण्डसे निकला रज पुरुषके बाएँ अण्डसे निकले वीर्यके साथ मिलता है, तो कन्या उत्पन्न होती है।
हम इस बातको पहले कह आये हैं कि कन्या वा पुत्र पैदा करना मनुष्यके आधीन है, इस लिये यह बतलाना आवश्यक है कि स्त्री वा पुरुष अपने अण्डोंसे रज-वीर्य कैसे निकाल सकते हैं, क्योंकि जबतक यह न मालूम होगा उस समय तक यह बात नहीं कही जा सकती कि कन्या या पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आधीन है।
यह प्रकृतिका नियम है कि जिस समय रज-वीर्य निकलने लगता है उस समय अण्डकोष कुछ ऊपरको चढ़ जाते हैं।
28. संयोग-विधि
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संनतति-शास्त्र ।
स्त्रियोंमें ढके होनेके कारण दिखलाई नहीं देते, परंतु पुरुषोंमें ऊपर चढ़ते साफ दिखलाई पड़ते हैं। इतना ही नहीं, हर समय स्त्री या पुरुषोंका एक अंड ऊपरको चढ़ा रहताहै और उस ऊपर चढ़े हुए अण्डसे ही रज-वीर्य निकल पड़ता है।
अब प्रश्न यह होता है कि अण्ड ऊपरको चढ़ते कैसे हैं? इस विषयमें यह ईश्वरीय नियम है कि दहिनी या बाई जिस ओरकी नाकसे श्वास निकलती हो उसी ओरका अण्ड ऊपरको चढ़ जायगा। अब यहाँपर यह शंका होती है कि दहिनी या बाई नाकसे श्वासका निकलना अपने अधीन है या नहीं? हाँ यह भी हमारे हाथमें है। जब चाहें दहिनी नाकसे श्वास निकाले वा जब चाहें बाईसे। इसमें कुछ किया करनी पड़ती है, यह यह है कि—बाई करवट लेटने से दहिने नाकसे और दहिनी करवट लेटनेसे बाई नाकसे श्वास निकलने लगती है और किसी तरहकी कोई बाधा नहीं होती। (रति-शास्त्र)
पाठकोंको कन्या और पुत्र पैदा करनेके सारे हाल मालूम हो चुके हैं। इन सबका खुलासा यह है कि जब पुत्र पैदा करनेकी इच्छा हो तो रजस्वला होनेके दिनोंसे ४-६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रात्रिको और जब कन्या उत्पन्न करनी हो तो रजस्वला होने से ५-७-९-११-१३ और १५ वीं रात्रिको संयोग करना चाहिये।
दोनोंके दहिने नाकसे श्वास निकलनी चाहिये। इससे दोनों स्त्री और पुरुषका दहिना अण्ड ऊपरको चढ़ जायगा और इसीसे रज वीर्य निकलकर पुरुषके दहिने अंगका वीर्य लीके दहिने अंगके रजसे मिलकर पुत्र उत्पन्न करेगा। इसी भाँति जब कन्या उत्पन्न करनी हो तब स्त्री और पुरुष दोनोंके बाएँ नाकसे श्वास निकलनी चाहिये। इससे
संयोग-विधि ।
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दोनों स्त्री और पुरुष का वार्या अरुड ऊपरको चढ़ जायगा और उसीसे रज वीर्य निकलकर स्त्रीके बाएँ अरुडसे निकला रज पुरुषके बाएँ अरुडके निकले वीर्यसे मिलकर कन्या उत्पन्न करेगा परन्तु यह विचार रहे कि यह क्रिया पुत्र के लिये रजो रजोधर्म से ४-६-८-१०-१२-१४ और १६ वीं रात्रि और कन्याके लिये रजोधर्मसे ५-७-९-११-१३ और १५वीं रात्रिसँ कीजावे । इन क्रियाओंसे हम अपनी इच्छाके अनुसार मन चाही कन्या और पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं, परन्तु यह तभी भला जब स्त्री पुरुष दोनोंमें अरुडे अच्छी तरह हों और किसी प्रकार का रोग न हो ।
गर्भाशय और योनि विकारयुक्त न हो, पुरुषोंमें वीर्य दोष इत्यादि न हो, ऐसा होने पर इसी रीतिके अनुसार कन्या और पुत्र उत्पन्न करना मनुष्यके आश्रीन है ।
( २८ ) संयोग-विधि
स्त्री और पुरुषके संयोग होनेपर ही गर्भाधान हो जाता है लोग इसको बहुत मामूली बात समझते हैं, पर यह बहुत बड़े गौरव का विषय है । इस काम में स्त्री और पुरुषों की कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है, पर वे जरा भी विचार नहीं करते । यह कार्य बड़ी प्रसन्नता और उत्साहके साथ होना चाहिये । परन्तु यह उसी समय हो सकता है जब कि दोनोंमें प्रेम हो । प्रेमका प्रवाह जिन स्त्री-पुरुषोंमें अथाह होकर बहता है, वेही योग्य सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं ।
दोनोंका शृंगार भी जरूरी है । जिस प्रकार हवन करनेके लिये शीकी जरूरत होती है उसी प्रकार गर्भाधानमें एक
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सन्तति-शास्त्र ।
दूसरेके चित्तको अपनी और खाँचने के लिए २७ गारकी जहरत है । (रतिशास्त्र)
कैसी ही कुरुपा स्त्री क्यों न हो, २७ गारयुक्ता होनेपर वह भली मालूम होती है । इसी प्रकार रूपवती विना २७ गारके अपना विकास नहीं फैला सकती । इसका तात्पर्य यह है कि २७ गार एकमात्र चित्त वशीभूत करके कामोद्दीपन करता और संयोग शक्तिको बढ़ाता है । (रतिशास्त्र)
पुरुष ही नहीं, स्त्रियाँ भी २७ गारयुक्त पुरुषको देख कर मोहित हो जाती हैं । अतएव दोनोंका २७ गार गर्भाधानके समय जरूरी है ।
कितने शोककी बात है कि आज हम अपने नये जवानों-को प्रकृतिके विरुद्ध सीधे रास्ते को छोड़ कर निकम्मे मार्गका अवलम्ब करते हुए देखते हैं ।
लोग यह समझते हैं कि चाहे जिस प्रकारसे संयोग करलें किसी प्रकारसे बाधा नहीं है, क्यों किहर तरहके संयोग ही से सन्तान तो होती ही है । यदि ऐसा न होता तो कोकशास्त्र से चौरासी प्रकारके आसनों का विधान क्यों किया जाता ? इस विषयमें वैद्यकका मत है कि—
१. कुबडी होकर संयोग करानेसे वायु प्रवल होकर योनि बाधा को प्रकट करती है । यदि दहिने करवट होकर संयोग हो, तो कफ गिर कर गर्भाशयको ढक लेता है । बाईं करवट होकर संयोग होने से पित्त गर्भके रक्त और धीर्य को नष्ट कर देता है । इस कारण चित्त करके संयोग करना उत्तम है, क्यों कि चित्त होकर संयोग करने से बात, पित्त और कफ सब अपने अपने
गर्भ कैसे रहता है ?
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स्थानपर ठीक रीतिसे रहते हैं । किसी प्रकारका विनाङ्ग उत्पन्न नहीं होता । ( ३० अ० अ० ८ श्लो० ७ से ८ )
(२) बड़े होकर संयोग करनेसे शुक्राश्रमी रोग हो जाता है । ( भा० प्र० )
(३) सिवाय चित्त होकर संयोग करनेके जितने तरह से किया जाता है, सबमें वात पित्त और कफ उत्पन्न होकर वाधा पहुँचती है । ( अ० क० )
शरीरका संचालन एकमात्र वात, पित्त और कफसे ही होता है । इनमेंसे यदि एक भी विनाङ्ग जाय तो शरीरका दर्जा किनी तरह नहीं चल सकता । ऐसी अनुचित क्रियाओंसे सहज हीमें अनेकों रोग खड़े हो जाने हैं जिनसे गर्भाशय नष्ट हो जाता है । अतएव सर्वसम्भूतिये यही निश्चय होता है कि स्त्रीको चित्त होकर संयोग करना अति उत्तम है और किसी दूसरी रीतिसे कभी संयोग न होना चाहिये ।
(२६) गर्भ कैसे रहता है ?
रज और वीर्य ही गर्भके कारण हैं। रजस्वला होनेसे सौलह दिनतक गर्भाशयका मुत्र खुला रहता है । यही गर्भ-धारण होनेका समय है । ( रतिगान्ध )
संयोग समयमें सहवासकी गरमीसे वीर्य पतला होकर वायुसे लिंग द्वारा गर्भाशयकी गरदनपर, जो सुराहीदार योनिके सिरेसे गर्भाशयतक होती है, पहुँचता है और रजसे मिलकर गर्भ बनाता है । इस विषयमें कड़े मत हैं ।
१; ढाकटोंका मत ।
१. इसके अनुसार यह माना गया है कि आगेकी ओरसे वीर्यके साथ जो कोई उसमें होते हैं, गर्भाशयकी
29. गर्भ कैसे रहता है ?
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सन्तति-शास्त्र ।
गरदनके उस सिरेपर पहुँचते हैं जो गर्भाशयसे मिली रहती है । और उधरसे रजके साथ कीड़े जो कि उसमें होते हैं, अरुडवाही नलियोंके छेदोंसे गर्भाशयमें पहुँचते हैं । जब ये दोनों रज वीर्यके कीड़े आपसमें गर्भाशयसे मिली हुई गरदनके सिरेपर पहुँच कर मिलते हैं, तब वीर्यका कीड़ा जो रजके कीड़ेसे छोटा होता है, तुरन्त रजके कीड़ेमें घुस जाता है; घुसते ही उसकी पूँछ कट जाती है और अगला भाग जिसको सर कहते हैं वह रजके कीड़ेमें मिल जाता है तथा गर्भाशयकी गरदनके सिरेसे दोनों कीड़ोंका मिला हुआ पदार्थ गर्भाशयमें पहुँचकर बढता है । यही वध्मेका पहिला स्वरूप है । परन्तु सबसे बड़ी बात इसमें यह है कि वीर्यका कीड़ा रजके कीड़ेमें कुदकर घुसता है । उसलिये वीर्यके कीड़ेमें चंचलता और कुदनेकी शक्ति जरूर होनी चाहिये । यदि ऐसा न हो, तो गर्भास्थापित होनेमें बाधा पड़ती है ।
२; वैयकका मत ।
१. संयोग होनेसे शरीरमें गरमी उत्पन्न होती है । इससे वायु उत्कट होकर गरमीके संबंधसे पुरुषका वीर्य निकलता है और योनिमें पहुँचकर रजसे मिल जाता है । इन दोनोंसे मिला हुआ पदार्थ गर्भाशयमें पहुँचता है । और वायुसे तत्काल घेरला किया हुआ जीवात्मा गर्भाशयमें प्रवेश होकर स्थित होता है । (सू० श० ३० ३ श्लो० २ व ३)
२. रज और वीर्य जैसे ही गर्भाशयमें मिलते हैं उसी समय जीवात्माका संयोग होकर गर्भ रहता है । (श० का०)
गर्भ स्थित होनेके तात्कालिक लक्षण ।
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३. स्त्री और पुरुष जब दोनों एक ही साथ स्वलित होते हैं, तब उधरसे रज आता है और इधरसे वीर्य पहुंचता है और दोनों गर्भाशयमें मिलकर गर्भ बनाते हैं । यदि स्त्री और पुरुष दोनों एक साथ स्वलित न हों, तो गर्भ नहीं बनता । (रति शास्त्र)
डाक्टरों मतसे यह बात सिद्ध होती है कि रज और वीर्य-के कड़े दोनों आपसमें मिलकर गर्भ उत्पन्न करते हैं । वैद्यक-का मत यह कहता है कि रजवीर्यके मिलनेपर जब जीवात्मा इनमें प्रवेश करता है, तब गर्भ रहता है । जीवात्माके प्रवेश होनेसे सतलव यह है कि रजवीर्यसे मिला हुआ पदार्थ सजीव हो जाता है डाक्टरों रीतिसे कौड़ों द्वारा और वैदिक रीतिसे रज-वीर्य मिले हुए पदार्थसे जीवात्मा द्वारा गर्भका स्थित होना सिद्ध है ।
(३०) गर्भ स्थित होनेके तात्कालिक लक्षण ।
प्रायः यह सन्देह ही रहा करता है कि अमुक समयके गर्भाधानसे गर्भ स्थित हुआ या नहीं ? इस विषयमें आचार्यों-के अनेक मत हैं ।
१. वैद्यक का मत ।
१. तात्काल गर्भधारण करनेवाली स्त्रीको थकावट, ग्लानि, प्यास साथलौका थक जाना, योनिका फरकना, और रज-वीर्यका बाहर न निकलना इत्यादि लक्षण होते हैं । (सु० श० अ० १२ श्लो० १२)
२. गर्भ धारण समयमें स्त्रीकी चेष्टा अत्यन्त मनोहर हो जाती है और लावण्यता अधिक बढ़ जाती है । (श० क०)
30. गर्भ स्थिति होनेका तत्कालिक लक्षण
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सन्तति-शास्त्र ।
२. विद्वानोंकी राय ।
१. जब गर्भ धारण होता है तब ज्योंही रज-वीर्य मिलकर गर्भाशयमें पहुँचता है त्यों ही खींची नाभिके नीचे थोडासा मीठा मीठा दर्द होता है । (रति शास्त्र )
१. गर्भ धारण समयमें वीर्य योनिसे बाहर नहीं निकलता और गर्भ धारण होते ही संयोगकी चाह जाती रहती है । (चक्रपाणि )
जब ऐसे लक्षण हों, तो समझ लेना चाहिये कि गर्भ धारण हो गया । ये लक्षण गर्भ धारण होनेके साथ ही साथ मालूम होते हैं ।
(३१) जीव गर्भमें कब आता है ?
इस विषयमें कि गर्भ समयमें वचोमें जीव कब आता है अनेक विवाद हैं । कोई गर्भ धारण होनेके साथ ही, कोई चार मास के बाद, कोई चैतन्यता उत्पन्न होनेपर जीवका गर्भमें आना मानते हैं । इसी प्रकार अनेक मत हैं, परन्तु यदि यह बात मान ली जाय कि गर्भ धारण होनेके साथ ही साथ जीव नहीं आता, तो यहाँ एक बहुत बड़ी शंका यह होगी कि गर्भ फिर बढ़ता कैसे है ? क्योंकि निर्जीव पदार्थका वृद्धि-क्रम नहीं होता इसलिये यह बात माननी पड़ेगी कि सजीव गर्भाधान होता है या गर्भाधान होनेके साथ ही साथ गर्भ सजीव हो जाता है ।
१. वैदिक मत
१. गर्भाधानसे लेकर दस मास अर्थात् पैदा होनेतक गर्भ सजीव रहता है और सजीव ही उत्पन्न होता है ।
(क० म० ५ सू० ७८ म० ९ )
जीव गर्भमे कब आता है ?
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२. धर्मशास्त्रका मत ।
१. स्त्री और पुरुषके संयोगसे पुरुषका शुद्ध वीर्य योनिमें जाकर स्त्रीके शुद्ध रजसे मिलता है। उसी समय भूतात्मा, आप ही आकाश वायु जल पृथिवी और अग्नि अर्थात् पंच महाभूतोंके साथ गर्भाशयमें स्थित होता है ।
( या० य० ध० प्र० ७२ )
३. वैद्यकका मत ।
१. जब गर्भाशयमें रज-वीर्य और जीव इन तीनोंका संयोग ( मेल ) हो जाता है, तो उसको गर्भ कहते हैं; अर्थात् रज-वीर्य और जीव इनके मिलनेपर ही गर्भ स्थित होता है । ( च० श० अ० ४ श्लो० ३ )
२. जिस समय गर्भाशयमें रजवीर्यका मिश्रण होता है । उसी समय जीव उनके साथ उसमें प्रवेश करता है । जिस प्रकार सूर्यकी किरण और मणिके संयोगसे अग्नि प्रकट होती है, इसी प्रकार रज-वीर्यके मिलनेसे जीव प्रगट होता है । ( भा० प्र० ग० प्र० ३२ ३३ )
६. डाक्टरोंका मत ।
१. रज-वीर्यके कीड़े आपसमें मिलकर गर्भ उत्पन्न करते हैं, बिना इन जीवोंके मिले गर्भ नहीं रहता अर्थात् प्रारम्भसे ही गर्भ सजीव होता है ।
धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात मालूम होती है कि जब गर्भाशयमें रज-वीर्य मिलता है उस समय उनमें जीव आ जाता है । वेदसे भी यही स्पष्ट है कि गर्भ प्रारम्भ से ही सजीव होता है । डाकुरी मतका भी अभिप्राय यही है कि गर्भ सजीव स्थित होता है । अतएव सर्वसम्मतसे यह बात निश्चय है कि
31. गर्भमें जीव कवतक आता है ?
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सन्ततिशास्त्र ।
रज-चीर्थ्य मिलते ही जीवका संयोग मिले हुए पदार्थमें हो जाता है या यों कहो कि गर्भ सजीव ही स्थित होता है ।
(३२) प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।
प्रेम ईश्वरका दिया हुआ एक उत्तम पदार्थ है । संसारी जीव प्रेमके फन्देमें फंसे दिखलाई पड़ते हैं, कारण यह है कि ईश्वरकी स्मृतिही प्रेममय है । अतएव विना प्रेमके निवाँह होता कठिन है । प्रेम मनसे उत्पन्न होता है, इसलिये मनको जो वस्तु मिय होती है उसीसे प्रेम होता है । सारे सम्बन्ध प्रेमके सामने भूटे हैं । इसलिये प्रेमका सम्बन्ध सबसे बलिष्ठ है । हर एक मनुष्य हर एक बातसे प्रेम नहीं रखता । एक जिससे प्रेम रखता है दूसरा उसको बुरा बतलाता है । इसका कारण मन ही है । प्रेम दो तरफ़का होता है ।
(१) वह जो थोड़ी देर तक रहे । इसको 'चर' प्रेम कहते हैं ।
(२) वह जो बराबर बना रहता है और बढ़ता जाता है जिसको 'अखण्ड' या 'अटल' प्रेम कहते हैं । किसी वस्तु-को देखकर प्रसन्न हो जाना और फिर उसकी परवाह न रखना या उससे अच्छी वस्तु पाकर भूल जाना, ऐसे प्रेमका सम्बन्ध हृदयसे अधिक और मस्तकसे कम रहता है । इसीको चर प्रेम कहते हैं । अखण्ड या अटल प्रेम वह है जो सौते, जागते एक समान रहता है, कभी कम नहीं होता, किन्तु बढ़ता ही जाता है । अच्छीसे अच्छी वस्तु प्रेमीके हृदयसे प्रेमको अपनी ओर नहीं खींच सकती । ऐसे प्रेमका सम्बन्ध मस्तकसे अधिक और हृदयसे कम होता है । चर प्रेममें स्वार्थ होता है, परन्तु अटल प्रेममें स्वार्थ नहीं होता । जहाँ सच्चा प्रेम है वहाँ स्वार्थ कहाँ ? प्रेम भी एक प्रकारका नहीं होता । प्रेमके अनेक प्रकार
प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।
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है। जब हम प्रेमको मनकी शक्ति मानेंगे तो इसपर भी विचार करना होगा कि मनुष्यको हर बातका प्रेमी होना चाहिये। क्योंकि मन प्रत्येक बात पर जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि मन हर एक बातोंपर अवश्य जाता है, परन्तु वह सबका प्रेमी नहीं बनता। उसको अपनी इच्छाके अनुसार खास खास बातोंका प्रेम होना पड़ता है, जैसे माताका प्रेमी, जातिका प्रेमी, देशका प्रेमी, ईश्वरका प्रेमी और स्त्रीका प्रेमी इत्यादि।
शरीर-रचना-शास्त्रसे पता चलता है कि प्रेमका स्थान, सर है। जितने तरहके प्रेम हैं सबका स्थान सरमें अलग अलग बना हुआ है। जिसका जितना जिस प्रकारके प्रेमका स्थान बली है, मनुष्य उसका उतना ही प्रेम होता है। सरमें प्रेमके जितने स्थान हैं सब बली क्यों नहीं होते? इस विषयमें वैद्यक-का मत है कि गर्भाधान समयमें जिस बातसे माता पिता दोनोंको प्रेम होता है, सन्तान उस बातकी श्रद्धल प्रेमी हो जाती है। जिस बातमें उस समय केवल माता पिताको प्रेम होता है, सन्तानका अधूरा प्रेम उस बातसे रहता है। जिस बातसे उस समय मातापिता दोनोंका प्रेम नहीं होता, सन्तान उसकी कट्टर विरोधी हो जाती है। जिस बातसे उस समय केवल माता या पिताको प्रेम नहीं होता, सन्तानको उसमें विशेष रुचि नहीं होती। (रतिशास्त्र)
इससे स्पष्ट है कि गर्भाधान समयमें मातापिताका प्रेम जिस बातमें जितना होता है, वृत्तके सरमें उस प्रेमका स्थान उतना ही प्रबल और निर्बल होता है। इस कारण हर मनुष्य हर बातका प्रेमी नहीं होता।
एक बात सारे मनुष्य क्या, जीवमात्रमें दिखलाई पड़ती है कि सब लोग स्त्री-जातिके प्रेमी होते हैं और स्त्री-जाति पुरुष
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सन्तति-शास्त्र ।
जातिकी प्रेमी होती है। इसका कारण यह है कि गर्भाधान समयमें स्त्री जातिको पुरुष जाति और पुरुष जातिको स्त्री जातिसे प्रेम अवश्य होता है और इसी प्रेमके कारण सन्तानमें पैसे प्रेमका स्थान प्रबल हो जाता है। इसलिये हर स्त्री जाति पुरुष जाति और हर पुरुष जाति स्त्री जातिसे प्रेम करती है और दोनों एक दूसरेके प्रेमी होते हैं। सच्चा प्रेम विजलीसे भी अधिक वलवान् है। जब स्त्री-पुरुष एक दूसरेके प्रेमी होते हैं, तो उनमें कुछ प्रेमकी गहराई मालूम होती है। दोनोंमें एक दूसरेके चित्तको खींचनेकी शक्ति इतनी प्रबल होती है कि दोनोंकी आत्मा एक हो जाती है, इसीलिये 'दो शरीर और एक प्राणकी' कहावत प्रसिद्ध है।
प्रेमसे शरीरमें एक प्रकारकी शक्ति पैदा होती है। जिस प्रकार विजलीके नारको हाथमें लेनेसे उसकी शक्तिका कुछ ज्ञान होता है, इसी प्रकार प्रेमके फलसे जकड़े हुए प्रेमियोंके शरीरमें प्रेमकी शक्तिका प्रवाह चिन्तवन मावसे ही उमड़ पड़ता है। एक दूसरेकी प्रेममर्तिको देखते ही शरीरमें प्रेम-शक्तिका सञ्चार हो जाता है। एक दूसरेके प्रेममें लीन हुए स्त्री पुरुषोंके देखनेसे प्रेम और प्रेमीकी मर्यादा मालूम होती है। सच्चा प्रेम उनके हृदयको इतना कोमल बना देता है कि एक दूसरेके प्रति पात्र हो जाते हैं और प्रेमशक्ति उनके हृदयको पवित्र बना देती है। प्रेमीको प्रेमानन्दके सामने स्वर्गके सुख और रंजा महाराजोंके महलोंके वैभव तिनके समान जान पड़ते हैं।
प्रेम केवल प्रेम हीके लिये किया जाता है, इसका और कोई मतलब नहीं है। सच्चा प्रेम स्त्री और पुरुषके मनको एक कर देता है, विचारोंको मिला देता है और भावोंको एक करनेके