शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
( १७८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ले यदा ॥ विचिन्त्य यस्त्यजेत्प्राणान्स तदा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ १८० ॥ टीका-मृत्युके समयमें साधक जो यह चिंतन करे कि हमारा शरीर त्रिवेणीके सलिलमें मग्न है तो उसी क्षण प्राणको त्यागके मोक्षगतिको प्राप्त होगा ॥१८०॥ मूलम्-नातः परतरं गुह्यं त्रिषु लोकेषु विद्य- ते ॥ गोप्तव्यं तत्प्रयत्नेन न व्याख्येयं कदाचन ॥ १८१ ॥ टीका-इस तीर्थसे परे त्रिभुवनमें दूसरा गुप्त तीर्थ नहीं है इसको यत्नसे गोपित रखना उचित है यह कदा- पि प्रकाश करनेके योग्य नहीं है ॥ १८१ ॥ मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ १८२ ॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें मन देकरके यदि क्षणार्धभी स्थिर रक्खे तो सर्वपापसे मुक्त होके साधक परमगतिको अर्थात् मोक्षको प्राप्त होजाय ॥ १८२ ॥ मूलम्-अस्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी मयि लीयते॥ अणिमादिगुणान्भुक्त्वा स्वे- च्छया पुरुषोत्तमः ॥ १८३ ॥
पंचमपटलः। ( १७९ ) टीका-हे पार्वती ! इस ब्रह्मरन्ध्रमें जिसका मन लीन होंय सो पुरुषोत्तम योगी अणिमादिगुणोंको भोगके इच्छापूर्वक हमारेमें लय होजायगा ॥ १८३ ॥ मूलम्-एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारे स्मिन्वल्लभो मे भवेत्सः ॥ पापान् जि- त्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्त्वा तार- यत्यद्भुतं वै ॥ १८४ ॥ टीका-हे देवी ! इस ब्रह्मरन्ध्रके ध्यानमात्रसे यह सं- सारमें प्राणी हमको प्रिय होजाता है और पापराशिको जीतके यह साधक मुक्तिमार्गका अधिकारी होजाता है और अनेक मनुष्योंको ज्ञान उपदेश करके संसार- से परित्राण करदेता है ॥ १८४ ॥ मूलम्-चतुर्मुखादित्रिदशैरगम्यं योगिवल्ल- भम् ॥ प्रयत्नेन सुगोप्यं तद्ब्रह्मरन्ध्रं म- योदितम् ॥ १८५ ॥ टीका-हे देवी ! यह ब्रह्मरन्ध्रका ध्यान जो हमने कहा है इसको यत्न करके गोपित रखना उचित है यह ज्ञान योगीलोगोंको अतिप्रिय है इसका मार्ग ब्रह्मा आदि देवताओंकोभी अगम्य.हैं ॥ १८५ ॥ मूलम्-पुरा मयोक्ता या योनिः सहस्रारे स-
( १८० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । रोरुहे ॥ तस्याऽधो वर्तते चन्द्रस्तद्ध्यानं क्रियते बुधैः ॥ १८४ ॥ टीका-हे देवि ! पहिले जो सहस्रदलकमलके मध्यमें योनिमण्डल हमने कहा है उस योनिके अधोभागमें चन्द्रमा स्थित है यह चन्द्रमण्डलका बुद्धिमान् लोग सर्वदा ध्यान करते हैं ॥ १८४ ॥ मूलम्-यस्य स्मरणमात्रेण योगीन्द्रोऽव- निमण्डले॥पूज्यो भवति देवानां सिद्धानां सम्मतो भवेत् ॥ १८७ ॥ टीका-इस चन्द्रमंडलके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र संसारमें पूजनीय होजाता है और देवता और सिद्ध- लोगोंके तुल्य होजाता है ॥ १८७ ॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे ध्यायेद्दुग्धमहो- दधिम् ॥ तत्र स्थित्वा सहस्रारे पद्मे चन्द्रं विचिन्तयेत् ॥ १८८ ॥ टीका-शिरस्थित जो कपालविवर है उसमें क्षीर समुद्रका ध्यान करे उसी स्थानमें स्थितिपूर्वक सहस्र- दलकमलमें चन्द्रमाका चिन्तन करे ॥ १८८ ॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे द्विरष्टकलयायु- तः ॥ पीयूषभानुहंसाख्यं भावयेत्तं निरं-
पंचमपटलः ( १८१ ) जनम् ॥ १८९ ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्त्रि- दिने पश्यति ध्रुवम्॥ दृष्टिमात्रेण पापौघं दहत्येव स साधकः ॥ १९० ॥ टीका—वह शिरःस्थित कपालविवरमें सोलह कलासं- युक्त अमृतकिरणसे युक्त हंससंज्ञक निरंजनका चिन्तन करे निरन्तर तीन दिन यह अभ्यास करनेसे निरञ्जनका साक्षात् साधकको अवश्य प्रकाश होगा सो साधकदृष्टिमा- त्रेसे सर्व पातकोंको दहन करडालेगा ॥ १८९ ॥१९०॥ मूलम्--अनागतञ्च स्फुरति चित्तशुद्धिर्भवे- त्खलु ॥ सद्यः कृत्वापि दहति महापात- कपञ्चकम् ॥ १९१ ॥ टीका—यह ध्यान करनेसे अनागतविषयकी स्फू- र्ति होगी अर्थात् जो विषय कभी उत्पन्न नहीं भया है उसकी स्फूर्ति होगी और चित्तकी शुद्धि होगी और सा- धक ध्यानमात्रसे उसी क्षण पञ्चमहापातक दहन कर- डालेगा ॥ १९१ ॥ मूलम्--आनुकूल्यं ग्रहा यान्ति सर्वे नश्य- न्त्युपद्रवाः ॥ उपसर्गाः शमं यान्ति युद्धे जयमवाप्नुयात् ॥ १९२ ॥ खेचरीभूचरी- सिद्धिर्भवेत्क्षीरेन्दुदर्शनात् ॥ ध्यानादेव
( १८२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । भवेत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ १९३ ॥ सन्तताभ्यासयोगेन सिद्धो भवति मा- नवः॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं मम तुल्यो भवेद्ध्रुवम् ॥ योगशास्त्रं च परमं योगिनां सिद्धिदायकम् ॥ १९४ ॥ टीका-शिरःस्थचन्द्रमाका ध्यान करनेसे सर्व ग्रह अनुकूल होजाते हैं और समस्त उपद्रवका नाश होजा- ताहै और उपसर्ग प्रशमित होते हैं और युद्धमें जय लाभ होता है और खेचरी भूचरीकी सिद्धि प्राप्त होती है इसमें सन्देह नहीं है और निरन्तर यह योगाभ्यास करनेसे अवश्य साधक सिद्ध होजाता है हे पार्वती ! हम सत्य सत्य वारंवार कहते हैं कि हमारे तुल्य होजाय- गा इसमें सन्देह नहीं है यह परमयोग योगीलोगोंके सिद्धिका दाता है ॥ १९२ ॥ १९३ ॥ १९४ ॥ अथ राजयोगकथनम् । मूलम्-अत ऊर्ध्वं दिव्यरूपं सहस्रारं सरोरु- हम् ॥ ब्रह्माण्डाख्यस्य देहस्य बाह्ये तिष्ठति मुक्तिदम् ॥१९५ ॥ कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति॥अकुलाख्योऽ- विनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ १९६ ॥
पंचमपटलः । ( १८३ ) टीका-तालुके ऊपरभागमें दिव्य सहस्रदल कमल है यह कमल मुक्तिदाता ब्रह्माण्डरूपी शरीरके बाहर स्थित है अर्थात् शरीरके ऊपर अंतमें है इसी कमल- को कैलास कहते हैं इसी स्थानमें महेश्वरकी स्थिति है यह ईश्वर निराकुल अविनाशी और क्षयवृद्धिरहित है ॥ १९५ ॥ १९६ ॥ मूलम्-स्थानस्यास्य ज्ञानमात्रेण नृणां सं- सारेऽस्मिन्सम्भवो नैव भूयः ॥ भूतग्रा- मं सन्तताभ्यासयोगात्कर्तुं हर्तुं स्याच्च शक्तिः समग्रा ॥ १९७ ॥ टीका-इस स्थानके ज्ञानमात्रसे जीवका यह सं- सारमें फिर जन्म नहीं होता और सर्वदा यह ज्ञानयोग अभ्यास करनेसे जीवमात्रके स्थिति संहार करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है ॥ १९७ ॥ मूलम्-स्थाने परे हंसनिवासभूते कैलासना- म्नीह निविष्टचेताः॥ योगी हतव्याधिरधः कृताधिर्वायुश्चिरं जीवति मृत्युमुक्तः१९८॥ टीका-यह कैलासनामक स्थानमें परमहंसका निवास है सो सहस्रदलकमलमें जो साधक मनको स्थिर करता है उसकी सकल व्याधि नाश होजाती है और मृत्युसे छूटके अमर होजाताहै ॥ १९८ ॥
( १८४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना कुलाख्ये पर- मेश्वरे॥तदा समाधिसाम्येन योगी निश्च- लतां व्रजेत् ॥१९९ ॥ टीका-जब साधक यह कुलनामक ईश्वरमें चित्त- को लीन करदेगा तब योगीकी समाधि निश्चल सम होजायगी ॥ १९९ ॥ मूलम्-निरन्तरकृते ध्याने जगद्विस्मरणं भवेत् ॥ तदा विचित्रसामर्थ्यं योगिनो भवति ध्रुवम् ॥ २०० ॥ टीका-यह निरन्तर ध्यान करनेसे जगत् विस्मरण होजायगा तब योगीको अवश्य विचित्र सामर्थ्य हो- जायगी ॥ २०० ॥ मूलम्-तस्माद्गलितपीयूषं पिबेद्योगी निर- न्तरम्॥ मृत्योर्मृत्युं विधायाशु कुलं जि- त्वा सरोरुहे ॥ २०१ ॥ अत्र कुण्डलिनी शक्तिर्लयं याति कुलाभिधा ॥ तदा चतु- र्विधा सृष्टिर्लीयते परमात्मनि ॥ २०२ ॥ टीका-सहस्रदलकमलसे जो अमृत स्रवता है उ- सको योगी निरन्तर पान करता है सो योगी अपने मृ- त्युका मृत्युविधानपूर्वक कुलसहित जय करके चिरं-
पंचमपटलः । ( १८५) जीवी होजाता है और यही सहस्रदलकमलमें कुटरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तब यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है ॥ २०१ ॥ २०२ ॥ मूलम्-यज्ज्ञात्वा प्राप्य विषयं चित्तवृत्ति- र्विलीयते ॥ तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षतः ॥ २०३ ॥ टीका-यह सहस्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थात् इस विषयको प्राप्त करनेसे चित्तवृत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी परिश्र- म करे ॥ २०३ ॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्ध्रुवम्॥ तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपो निरञ्जनः ॥ २०४ ॥ टीका-जब योगीकी चित्तवृत्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरञ्जनका प्रकाश होगा अर्थात् ज्ञान होगा ॥ २०४ ॥ मूलम्-ब्रह्मांडबाह्ये संचिंत्य स्वप्रतीकं य- थोदितम् ॥ तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त- येदविरोधतः॥ २०५॥ टीका-ब्रह्माण्डके बाहर अर्थात् ब्रह्मांडरूप शरीरके
( १८६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । बाहर पूर्वोक्त स्वप्रतीकका चिन्तन करे उससे चित्तको स्थिर करके महत् शून्यका शुद्धवृत्तिसे चिन्तन करे २०५ मूलम्-आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यस- मप्रभम् ॥ चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ॥ २०६ ॥ टीका-आदि अंत मध्य शून्य यह सर्वत्र शून्यमें कोटि सूर्यके समान प्रभा और कोटिचन्द्रके समान शीतलप्रकाशके देखनेका अभ्यास करनेसे साधकको परमसिद्धि लाभ होगी ॥ २०६ ॥ मूलम्-एतद्ध्यानं सदा कुर्यादनालस्यं दिने दिने ॥ तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्व- त्सरान्नात्र संशयः ॥ २०७ ॥ टीका-जो पुरुष आलस्यको त्यागके सर्वदा प्रति- दिन इस शून्यका ध्यान करेगा उसको निश्चय एकवर्ष में सकल सिद्धि लाभ होगी ॥२०७ ॥ मूलम्-क्षणार्धं निश्चलं तत्र मनो यस्य भ- वेद्ध्रुवम्॥स एव योगी सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ॥ तस्य कल्मषसङ्घातस्तत्क्षणा- देव नश्यति ॥ २०८ ॥ टीका-जो साधक इस शून्यमें अर्धक्षणभी मनको
पंचमपटलः। ( १८७ ) निश्चल स्थिर रक्खेगा वही निश्चय यथार्थ भक्त योगी है और वह सर्वलोकमें पूजित होता है और उसके पाप- का समूह उसी क्षण नष्ट होजाता है ॥ २०८ ॥ मूलम्-यं दृष्ट्वा न प्रवर्तन्ते मृत्युसंसारव- र्त्मनि॥अभ्यसेत्तं प्रयत्नेन स्वाधिष्ठानेन वर्त्मना ॥ २०९ ॥ टीका-इसके अवलोकन करनेसे मृत्युरूप जो सं- सारपथ है इसमें भ्रमण करना छूट जायगा अर्थात् जन्ममरणसे रहित होजायगा इसका अभ्यास स्वाधि- ष्ठानमार्गसे यत्न करके करना उचित है ॥ २०९ ॥ मूलम्-एतद्ध्यानस्य माहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते ॥ यः साधयति जानाति सोस्माकमपि सम्मतः ॥ २१० ॥ टीका-हे देवी ! इस शून्यके ध्यानके माहात्म्यको हम नहीं कहसकते अर्थात् बहुत विशेष है जो योगी इसका अभ्यास करते हैं सो जानते हैं और वह हमारे बराबर हैं ॥ २१० ॥ मूलम्-ध्यानादेव विजानाति विचित्रफल- सम्भवम् ॥ अणिमादिगुणोपेतो भवत्ये- व न संशयः ॥ २११ ॥
(१८८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका-यह शून्यके ध्यानका विचित्र फल ध्यानसे ही जाना जाता है इसके प्रभावसे साधकको अणिमादि अष्टसिद्धि अवश्य प्राप्त होती है ॥ २११ ॥ मूलम्-राजयोगो मयाख्यातः सर्वतन्त्रेषु गोपितः॥राजाधिराजयोगोऽयं कथया- मि समासतः ॥ २१२ ॥ टीका-हे पार्वती ! यह राजयोग सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है सो तुमसे हमने कहा है अब राजाधिराज यो- ग विस्तारसहित कहते हैं श्रवण करो ॥ २१२ ॥ मूलम्-स्वस्तिकञ्चासनं कृत्वा सुमठे जन्तु- वर्जिते ॥ गुरुं संपूज्य यत्नेन ध्यानमेत- त्समाचरेत् ॥ २१३ ॥ टीका-साधक एकांतस्थान जनरहित सुन्दर मठमें यत्नपूर्वक गुरुकी पूजा करके स्वस्तिकासनसे स्थित होके यह ध्यान करे ॥ २१३ ॥ मूलम्-निरालम्बं भवेज्जीवं ज्ञात्वा वेदान्त- युक्तितः॥निरालम्बं मनः कृत्वा न किञ्चि- च्चिन्तयेत्सुधीः ॥ २१४ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी वेदांतयुक्ति अनुसार जीव- को और मनको निरालम्ब करके चिन्तन करे इसके सिवाय और कुछ चिन्तना न करे ॥ २१४ ॥
पंचमपटलः । ( १८९ ) मूलम्-एतद्ध्यानान्महासिद्धिर्भवत्येव न संशयः ॥ वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णरूपं स्वयं भवेत् ॥ २१५ ॥ टीका-इसप्रकार ध्यान करनेसे महासिद्धि उत्पन्न होगी इसमें संशय नहीं है ऐसेही मनको वृत्तिहीन करके साधक आपही पूर्ण आत्मस्वरूप होजायगा ॥ २१५ ॥ मूलम्-साधयेत्सततं यो वै सयोगी विगत- स्पृहः ॥ अहंनाम न कोप्यस्ति सर्वदा- त्मैव विद्यते ॥ २१६ ॥ टीका-जो योगी निरन्तर इसप्रकार साधन करे सो इच्छारहित है अर्थात् उसको किसी वस्तुकी इच्छा न होगी और उसके वदनसे अहंशब्द कभी उच्चारण न होगी वह सर्वदा सर्ववस्तुको आत्मस्वरूपही देखेगा ॥ २१६ ॥ मूलम्-को बन्धः कस्य वा मोक्ष एकं पश्ये- त्सदा हि सः ॥ २१७ ॥ एतत्करोति यो नित्यं स मुक्तो नात्र संशयः॥ स एव योगी सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ॥ २१८ ॥ टीका-कौन बन्ध है और क्या मोक्ष है सर्वदा एक परिपूर्ण आत्माको देखे जो योगी यह नित्य चिन्तन क-
( १९० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । रता है सो मुक्त है इसमें संशय नहीं है और निश्चय वही योगी सद्भक्त है और सर्वलोकमें पूजनीय है २१७॥२१८॥ मूलम्-अहमस्मीति यन्मत्वा जीवात्मपर- मात्मनोः॥अहं त्वमेतदुभयं त्यक्त्वाखण्डं विचिन्तयेत् ॥२१९॥ अध्यारोपापवादा- भ्यां यत्र सर्वं विलीयते ॥ तद्बीजमाश्रये- द्योगी सर्वसंगविवर्जितः ॥ २२० ॥ टीका-योगी अपनेको और जीवात्मा और परमा- त्माको तुल्य माने अर्थात् भेदरहित होजाय और हम और तुम यह दोनों भावको त्यागके एक अखण्ड ब्रह्मका चिन्तन करे अध्यारोपअपवादद्वारा जिसमें सर्व वस्तुका लय होजाता है योगी सर्वसङ्गसे रहित होके उसी बीजके आश्रय होजाय अर्थात् चित्तवृत्ति- को आत्मामें लय करदे ॥ २१९ ॥ २२० ॥ मूलम्-अपरोक्षं चिदानन्दं पूर्णं त्यक्त्वा भ्र- माकुलाः ॥ परोक्षं चापरोक्षं च कृत्वा मूढा भ्रमन्ति वै ॥ २२१ ॥ टीका-मूढबुद्धिके मनुष्य अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष परि- पूर्णब्रह्मको छोड करके भ्रममें पडके परोक्ष और अप- रोक्षका रात्रि दिवस निर्णय करते फिरते हैं ॥ २२१ ॥
पंचमपटलः । ( १९१ ) मूलम्-चराचरमिदं विश्वं परोक्षं यः करो- ति च ॥ अपरोक्षं परं ब्रह्म त्यक्तं बस्मिन् प्रलीयते ॥ २२२ ॥ टीका-जो मनुष्य यह चराचरसंसारको शास्त्रसे विवाद करके परोक्ष करते हैं और अपरोक्ष परब्रह्मको त्यागदेते हैं अर्थात् ब्रह्मभी प्राप्त नहीं होता वह अज्ञानी संसारमें लय होते हैं अर्थात् उनका मोक्ष नहीं होता है ॥ २२२ ॥ मूलम्-ज्ञानकारणमज्ञानं यथा नोत्पद्यते भृशम् ॥ अभ्यासं कुरुते योगी सदा सङ्गविवर्जितम् ॥ २२३ ॥ टीका-जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है और अज्ञान- का नाश होता है इसी योगअभ्यासको योगी सर्वदा सङ्गरहित होके अभ्यास करे ॥ २२३ ॥ मूलम्-सर्वेन्द्रियाणि संयम्य विषयेभ्यो विचक्षणः॥ विषयेभ्यः सुषुप्त्यैव तिष्ठेत्सङ्ग- विवर्जितः ॥ २२४ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी विषयोंसे इंद्रियोंको रोकके सङ्गरहित होके विषयके त्यागमें सुषुप्तिके समान स्थिर रहते हैं ॥ २२४ ॥
( १९२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-एवमभ्यासतो नित्यं स्वप्रकाशं प्र- काशते ॥ श्रोतुं बुद्धिसमर्थार्थं निवर्तन्ते गुरोर्गिरः ॥ तदभ्यासवशादेकं स्वतो ज्ञा- नं प्रवर्तते ॥ २२५ ॥ टीका-इसी प्रकार नित्य अभ्यास करनेसे साधक- को आपही ज्ञानका प्रकाश होगा तब गुरुके वचनकी निवृत्ति होगी अर्थात् गुरुके उपदेशका अंत हो जा- यगा जब इतरवाक्य श्रवण करनेकी इच्छा निवृत्त होजायगी तब यह योगअभ्यासद्वारा आपही एक अद्वैतज्ञानमें प्रवृत्ति होगी ॥ २२५ ॥ मूलम्-यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मन- सा सह॥ साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद्भवम् ॥ २२६ ॥ टीका-यह ब्रह्म किसी प्रकार प्राप्त नहीं होता मन वाक्यकाभी गमन नहीं है परन्तु यह योगसाधनसे आ- पही निर्मल ज्ञान प्रकाश होता है ॥ २२६ ॥ मूलम्-हठं विना राजयोगो राजयोगं विना हठः ॥ तस्मात्प्रवर्तते योगी हठे सद्गुरु- मार्गतः ॥ २२७ ॥
पंचमपटलः । ( १९३ ) टीका-हठयोगके बिना राजयोग और राजयोगके बिना हठयोग सिद्ध नहीं होता इस हेतुसे योगीको उचित है कि, योगवेत्ता सद्गुरूद्वाग हठयोगमें प्रवृत्त हो ॥ २२७ ॥ मूलम्-स्थिते देहे जीवात् च योगं न श्रि- यते भृशम् ॥ इन्द्रियार्थोपभोगेषु स जी- वति न संशयः ॥ २२८ ॥ टीका-जो मनुष्य इस शरीरसे योगका आसङ्ग नहीं ग्रहण करते हैं वह केवल इंद्रियोंके भोग भोगनेके अर्थ संसारमें जीते हैं इसमें संशय नहीं है ॥ २२८ ॥ मूलम्-अभ्यासपाकपर्यन्तं मितान्नं स्मर- णं भवेत् ॥ अन्यथा साधनं धीमान्कर्तुं पारयतीह न ॥ २२९ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक योगे अभ्यासके आरंभसे अभ्याससिद्धिपर्यंत मिताहारी रहे अर्थात् प्रमाणका भोजन करे अन्यथा अर्थात् अप्रमाण भोजन करनेसे योग अभ्यासके पार न होगा अर्थात् सिद्ध न होगा ॥ २२९ ॥ मूलम्-अतीवसाधुसंलापं साधुसम्मति- बुद्धिमान्॥करोति पिण्डरक्षार्थं बह्वालाप-
( १९४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विवर्जितः ॥२३०॥ त्याज्यते त्यज्यते स- ङ्गं सर्वथा त्यज्यते भृशम्॥अन्यथा न ल- भेन्मुक्तिं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥२३१॥ टीका-बुद्धिमान् साधक सभामें साधुके समान थोडा और प्रमाण वाक्य बोले और शरीरके रक्षार्थ थोडा भोजन करे और संगको सर्व प्रकारसे तजदे कदापि किसीके संगमें लिप्त न होय हे पार्वति ! और दूसरे प्रकार कदापि मुक्ति नहीं पावेगा यह हम सर्वथा सत्य कहते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२३० ॥ २३१ ॥ मूलम्-गुह्यैव क्रियतेऽभ्यासः संगं त्यक्त्वा तदन्तरे ॥ व्यवहाराय कर्तव्यो बाह्यसं- गो न रागतः ॥ २३२ ॥ स्वे स्वे कर्मणि वर्तन्ते सर्वे ते कर्मसम्भवाः॥निमित्तमात्रं करणे न दोषोस्ति कदाचन ॥ २३३ ॥ टीका-साधक संगरहित होके एकान्त स्थानमें योगसाधन करे यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्त- नेकी इच्छा करे तो अन्तर प्रीतिरहित होके , बाह्यसंग करे और अपना आश्रम धर्म कर्मभी इसी प्रकार कर- ता रहे इस हेतुसे कि, ज्ञानादि यावत् कर्म हैं सब कर्मा- नुसार होते हैं फलइच्छारहित होके केवल निमित्त
पंचमपटलः । ( १९५ ) मात्र कर्म करनेसे कदापि दोष नहीं है ॥२३२॥२३३॥ मूलम्-एवं निश्चित्य सुधिया गृहस्थोपि यदाचरेत् ॥ तदा सिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २३४ ॥ टीका-इसी प्रकार निश्चयबुद्धिसे यदि गृहस्थभी योगअभ्यास करे तो वह अवश्य सिद्धि लाभ करेगा इसमें संशय नहीं है ॥ २३४ ॥ मूलम्-पापपुण्यविनिर्मुक्तः परित्यक्ताङ्गसा- धकः॥यो भवेत्स विमुक्तः स्याद्गृहे ति- ष्ठन्सदा गृही ॥ २३५ ॥ न पापपुण्यैर्लि- प्येत योगयुक्तो यदा गृही ॥ कुर्वन्नपि तदा पापान्स्वकार्ये लोकसंग्रहे ॥२३६॥ टीका-जो साधक पाप पुण्यसे निर्लिप्त इन्द्रियस- गत्यागी है सोई गृही साधक गृहमें रहके मुक्त है योग- युक्त गृही पाप पुण्यमें बद्ध नहीं होता यदि संसारके संग्रहमें पापभी करेगा तो वह पाप उसको स्पर्श न करेगा ॥ २३५ ॥ २३६ ॥ मूलम्-अधुना संप्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधन- मुत्तमम् ॥ ऐहिकामुष्मिकंसुखं येन स्या- दविरोधतः ॥ २३७॥
(१९६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हे देवि ! अब उत्तम मन्त्रसाधन हम कहते हैं जिससे इस लोक और परलोक दोनों स्थानमें साधक आनन्दपूर्वक सुख भोगेगा ॥ २३७ ॥ मूलम्-यस्मिन्मन्त्रे वरे ज्ञाते योगसिद्धिर्भ- वेत्खलु ॥ योगेन साधकेन्द्रस्य सर्वैश्वर्य- सुखप्रदा ॥ २३८ ॥ टीका-यह उत्तम मन्त्रके ज्ञान होनेसे निश्चय योग सिद्ध होता है साधकेन्द्रको यह योग सर्व ऐश्वर्य सुखका दाता है ॥ २३८ ॥ मूलम्-मूलाधारेस्ति यत्पद्मं चतुर्दलसम- न्वितम् ॥ तन्मध्ये वाग्भवं बीजं विस्फु- रन्तं तडित्प्रभम् ॥२३९॥ हृदये कामबी- जंतु बन्धूककुसुमप्रभम् ॥ आज्ञारविन्दे शक्त्याख्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्॥२४०॥ बीजत्रयमिदं गोप्यं भुक्तिमुक्तिफलप्र- दम् ॥ एतन्मन्त्रत्रयं योगी साधयेत्सि- द्धिसाधकः ॥ २४१ ॥ टीका-जो मूलाधार चतुर्दलसंयुक्त पद्म है उसमें विद्युतके समान प्रभायुक्त वाग्बीजकी स्थिति है और हृदयकमलमें बन्धूकपुष्पके समान प्रभायुक्त कामबी-
पंचमपटलः। ( १९७) जकी स्थिति है और आज्ञाकमलमें कोटिचन्द्रके समान प्रभायुक्त शक्तिबीजकी स्थिति है यह बीजत्रय परम गोपनीय भोग और मुक्तिके दाता हैं यह तीनों मन्त्रका साधक योगी अवश्यसाधन करे॥२३९॥२४०॥२४१॥ मूलम्-एतन्मन्त्रं गुरोर्लब्ध्वा न द्रुतं न वि- लम्बितम्॥ अक्षराक्षरसन्धानं निःसन्दि- ग्धमना जपेत् ॥ २४२ ॥ टीका-साधक गुरुसे यह मन्त्रका उपदेश लेके धी- रे धीरे अक्षर अक्षर स्पष्ट उच्चारणपूर्वक स्थिर मन हो- के जप करे ॥ २४२ ॥ मूलम्-तद्गतश्चैकचित्तश्च शास्त्रोक्तविधिना सुधीः॥ देव्यास्तु पुरतो लक्षं हुत्वा लक्ष- त्रयं जपेत् ॥ २४३ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक एकाग्रचित्तसे शास्त्रवि- धिअनुसार देवीके समीपमें एक लक्ष होम करके ती- नलक्ष जप करे ॥ २४३ ॥ मूलम्--करवीरप्रसूनन्तु गुडक्षीराज्यसंयु- तम् ॥ कुण्डे योन्याकृते धीमाञ्जपान्ते जुहुयात्सुधीः ॥ २४४ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक जपके पीछे योन्याकार-