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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • अयोध्याकाण्ड *

५११

भरतजीके हृदयमें श्रीसीतारामजीका निवास है। जहाँ सूर्यका प्रकाश है, वहाँ कहीं अंधेरा रह सकता है? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोकको चली गयीं। देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रिमें चकवा व्याकुल होता है ॥ ४ ॥

दो०—सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।

रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु ॥ २९५ ॥

मलिन मनवाले स्वार्थी देवताओंने बुरी सलाह करके बुरा टाट (षड्यन्त्र) रचा। प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया ॥ २९५ ॥

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥ गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥

कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि कामका बनना-बिगड़ना सब भरतजीके हाथ है। इधर राजा जनकजी [मुनि वसिष्ठ आदिके साथ] श्रीरघुनाथजीके पास गये। सूर्यकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीने सबका सम्मान किया, ॥ १ ॥

समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा॥ जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥

तब रघुकुलके पुरोहित वसिष्ठजी समय, समाज और धर्मके अविरোধी (अर्थात् अनुकूल) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजीका संवाद सुनाया। फिर भरतजीकी कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायीं ॥ २ ॥

तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू॥ सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी॥

[फिर बोले—] हे तात राम! मेरा मत तो यह है कि तुम जैसी आज्ञा दो, वैसी ही सब करें! यह सुनकर दोनों हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी सत्य, सरल और कोमल वाणी बोले— ॥ ३ ॥

बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥ राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥

आपके और मिथिलेश्वर जनकजीके विद्यमान रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकारसे भद्दा (अनुचित) है। आपकी और महाराजकी जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूँ वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी ॥ ४ ॥

दो०—राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।

सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत ॥ २९६ ॥

५१२

  • रामचरितमानस *

श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ सुनकर सभासमेत मुनि और जनकजी सकुचा गये (स्तिम्भित रह गये)। किसीसे उत्तर देते नहीं बनता, सब लोग भरतजीका मुँह ताक रहे हैं ॥ २९६ ॥

सभा सकुच बस भरत निहारी । रामबंधु धरि धीरजु भारी ॥ कुसमउ देखि सनेहु सँभारा । बद्धत बिंधि जिमि घटज निवारा ॥

भरतजीने सभाको संकोचके वश देखा। रामबन्धु (भरतजी) ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने [उमड़ते हुए] प्रेमको सँभाला, जैसे बद्धते हुए विन्ध्याचलको अगस्त्यजीने रोका था ॥ १ ॥

सोक कनकल्लोचन मति छोनी । हरी बिमल गुन गन जगजोनी ॥ भरत बिबेक बराहँ बिसाला । अनायास उधरी तेहि काला ॥

शोकरूपी हिरण्याक्षने [सारी सभाकी] बुद्धिरूपी पृथ्वीको हर लिया जो विमल गुणसमूहरूपी जगत्की योनि (उत्पन्न करनेवाली) थी। भरतजीके विवेकरूपी विशाल वराह (वराहरूपधारी भगवान्) ने [शोकरूपी हिरण्याक्षको नष्ट कर] बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया! ॥ २ ॥

करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे । रामु राउ गुर साधु निहोरे ॥ छमब आजु अति अनुचित मोरा । कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ॥

भरतजीने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचन्द्रजी, राजा जनकजी, गुरु वसिष्ठजी और साधु-संत सबसे विनती की और कहा—आज मेरे इस अत्यन्त अनुचित बर्तावको क्षमा कीजियेगा। मैं कोमल (छोटे) मुखसे कठोर (धृष्टतापूर्ण) वचन कह रहा हूँ ॥ ३ ॥

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई । मानस तें मुख पंकज आई ॥ बिमल बिबेक धरम नय साली । भरत भारती मंजु मराली ॥

फिर उन्होंने हृदयमें सुहावनी सरस्वतीजीका स्मरण किया। वे मानससे (उनके मनरूपी मानसरोवरसे) उनके मुखारविन्दपर आ विराजें। निर्मल विवेक, धर्म और नीतिसे युक्त भरतजीकी वाणी सुन्दर हंसिनी [के समान गुण-दोषका विवेचन करनेवाली] है ॥ ४ ॥

दो०—निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु ।

करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु ॥ २९७ ॥

विवेकके नेत्रोंसे सारे समाजको प्रेमसे शिथिल देख, सबको प्रणामकर, श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके भरतजी बोले— ॥ २९७ ॥

प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी । पूज्य परम हित अंतरजामी ॥ सरल सुसाहिबु सील निधानू । प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५९३

हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् (मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरलहृदय, श्रेष्ठ मालिक, शीलके भण्डार, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुज्ञान, ॥ १ ॥

समरथ सरनागत हितकारी । गुनगाहक अवगुन अघ हारी ॥ स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई । मोहि समान मैं साईं दोहाई ॥

समर्थ, शरणागतका हित करनेवाले, गुणोंका आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापोंको हरनेवाले हैं। हे गोसाई! आप-सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामीके साथ द्रोह करनेमें मेरे समान मैं ही हूँ ॥ २ ॥

प्रभु पितु बचन मोह बस पेली । आयउँ इहाँ समाजु सकेली ॥ जग भल पोच ऊँच अरु नीचू । अमिअ अमरपद माहुरु मीचू ॥

मैं मोहवश प्रभु (आप) के और पिताजीके वचनोंका उल्लङ्घनकर और समाज बटोरकर यहाँ आया हूँ। जगत्में भले-बुरे, ऊँचे और नीचे, अमृत और अमरपद (देवताओंका पद), विष और मृत्यु आदि— ॥ ३ ॥

राम रजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥ सो मैं सब बिधि कीन्हि ठिठाई । प्रभु मानी सनेह सेवकाई ॥

किसीको भी कहीं ऐसा नहीं देखा-सुना जो मनमें भी श्रीरामचन्द्रजी (आप) की आज्ञाको मेट दे। मैंने सब प्रकारसे वही ठिठाई की, परन्तु प्रभुने उस ठिठाईको स्नेह और सेवा मान लिया ॥ ४ ॥

दो०—कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर । दूषण भे भूषण सरिस सुजसु चारु चहु ओर ॥ २९८ ॥

हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाईसे मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण (दोष) भी भूषण (गुण) के समान हो गये और चारों ओर मेरा सुन्दर यश छा गया ॥ २९८ ॥

राउरि रीति सुबानि बड़ाई । जगत बिदित निगमागम गाई ॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी । नीच निसील निरीस निसंकी ॥

हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभावकी बड़ाई जगत्में प्रसिद्ध है, और वेद-शास्त्रोंने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी (नास्तिक) और निःशंक (निडर) हैं ॥ १ ॥

तेउ सुनि सरन सामुहें आए । सकृत प्रनामु किहें अपनाए ॥ देखि दोष कबहुँ न उर आने । सुनि गुन साधु समाज बखाने ॥

५९४

  • रामचरितमानस *

उन्हें भी आपने शरणमें सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करनेपर ही अपना लिया। उन (शरणगतों) के दोषोंको देखकर भी आप कभी हृदयमें नहीं लाये और उनके गुणोंको सुनकर साधुओंके समाजमें उनका बखान किया ॥ २ ॥

को साहिब सेवकहि नेवाजी । आपु समाज साज सब साजी ॥ निज करतूति न समुझिअ सपनें । सेवक सकुच सोचु उर अपनें ॥

ऐसा सेवकपर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवकका सारा साज-सामान सज दे (उसकी सारी आवश्यकताओंको पूर्ण कर दे) और स्वप्नमें भी अपनी कोई करनी न समझकर (अर्थात् मैंने सेवकके लिये कुछ किया है ऐसा न जानकर) उलटा सेवकको संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदयमें रखे! ॥ ३ ॥

सो गोसाईं नहीं दूसर कोपी । भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ॥ पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना । गुन गति नट पाठक आधीना ॥

मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर (बड़े जोरके साथ) कहता हूँ, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है। [बंदर आदि] पशु नाचते और तोते [सीखे हुए] पाठमें प्रवीण हो जाते हैं। परन्तु तोतेका [पाठप्रवीणतारूप] गुण और पशुके नाचनेकी गति [क्रमशः] पढ़ानेवाले और नचानेवालेके अधीन है ॥ ४ ॥

दो०—यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर । को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर ॥ २९९ ॥

इस प्रकार अपने सेवकोंकी (बिगड़ी) बात सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओंका शिरोमणि बना दिया। कृपालु (आप) के सिवा अपनी विरदावलीका और कौन जबर्दस्ती (हटपूर्वक) पालन करेगा? ॥ २९९ ॥

सोक सनेहैं कि बाल सुभाएँ । आयउँ लाइ रजायसु बाएँ ॥ तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा । सबहि भाँति भल मानेउ मोरा ॥

मैं शोकसे या स्नेहसे या बालकस्वभावसे आज्ञाको बायें लाकर (न मानकर) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी (आप) ने अपनी ओर देखकर सभी प्रकारसे मेरा भला ही माना (मेरे इस अनुचित कार्यको अच्छा ही समझा) ॥ १ ॥

देखेउँ पाय सुमंगल मूला । जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥ बढ़ें समाज बिलोकेउँ भागू । बड़ीं चूक साहिब अनुरागू ॥

मैंने सुन्दर मङ्गलोंके मूल आपके चरणोंका दर्शन किया, और यह जान लिया कि स्वामी मुझपर स्वभावसे ही अनुकूल हैं। इस बड़े समाजमें अपने भाग्यको देखा कि इतनी बड़ी चूक होनेपर भी स्वामीका मुझपर कितना अनुराग है! ॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५१५

कृपा अनुग्रह अंगु अघाई । कीन्हि कृपानिधि सब अधिकार्ई ॥ राखा मोर दुलार गोसाई । अपनैं सील सुभायँ भलाई ॥

कृपानिधानने मुझपर साझोपाङ्ग भरपेट कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं (अर्थात् मैं जिसके जरा भी लायक नहीं था उतनी अधिक सर्वाङ्गपूर्ण कृपा आपने मुझपर की है)। हे गोसाई! आपने अपने शील, स्वभाव और भलाईसे मेरा दुलार रखा ॥ ३ ॥

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई । स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥ अबिनय बिनय जथारुचि बानी । छमिहि देउ अति आरति जानी ॥

हे नाथ! मैंने स्वामी और समाजके संकोचको छोड़कर अबिनय या विनयभरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है। हे देव! मेरे आर्तभाव (आतुरता) को जानकर आप क्षमा करेंगे ॥ ४ ॥

दो०—सुहृद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि । आयसु देड़अ देव अब सबड़ सुधारी मोरि ॥ ३०० ॥

सुहृद (बिना ही हेतुके हित करनेवाले), बुद्धिमान् और श्रेष्ठ मालिकसे बहुत कहना बड़ा अपराध है। इसलिये हे देव! अब मुझे आज्ञा दीजिये, आपने मेरी सभी बात सुधार दी ॥ ३०० ॥

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई ॥ सो करि कहउँ हिए अपने की । रुचि जागत सोवत सपने की ॥

प्रभु (आप) के चरणकमलोंकी रज, जो सत्य, सुकृत (पुण्य) और सुखकी सुहावनी सीमा (अवधि) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदयकी जागते, सोते और स्वप्नमें भी बनी रहनेवाली रुचि (इच्छा) कहता हूँ ॥ १ ॥

सहज सनेहैं स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥ अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा ॥

वह रुचि है—कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना। और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय ॥ २ ॥

अस कहि प्रेम बिबस भए भारी । पुलक सरीर बिलोचन बारी ॥ प्रभु पद कमल गहे अकुलाई । समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥

५१६

  • रामचरितमानस *

भरतजी ऐसा कहकर प्रेमके बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। अकुलाकर (व्याकुल होकर) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमल पकड़ लिये। उस समयको और स्नेहको कहा नहीं जा सकता ॥ ३ ॥

कृपासिंधु सनमानि सुबानी । बैठिए समीप गहि पानी ॥ भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ । सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ॥

कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजीने सुन्दर वाणीसे भरतजीका सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजीकी विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्नेहसे शिथिल हो गये ॥ ४ ॥

छं०—रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी । मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी ॥ भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से । तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ॥

श्रीरघुनाथजी, साधुओंका समाज, मुनि वसिष्ठजी और मिथिलापति जनकजी स्नेहसे शिथिल हो गये। सब मन-ही-मन भरतजीके भाईपन और उनकी भक्ति की अतिशय महिमाको सराहने लगे। देवता मलिन मनसे भरतजीकी प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं—सब लोग भरतजीका भाषण सुनकर व्याकुल हो गये और ऐसे सकुचा गये जैसे रात्रिके आगमनसे कमल !

सो०—देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब । मधवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत ॥ ३०१ ॥

दोनों समाजोंके सभी नर-नारियोंको दीन और दुखी देखकर महामलिन-मन इन्द्र मेरे हुओंको मारकर अपना मङ्गल चाहता है ॥ ३०१ ॥

कपट कुचालि सीवँ सुरराजू । पर अकाज प्रिय आपन काजू ॥ काक समान पाकरिपु रीती । छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥

देवराज इन्द्र कपट और कुचालकी सीमा है। उसे परायी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्रकी रीति कौएके समान है। वह छली और मलिन-मन है, उसका कहीं किसीपर विश्वास नहीं है ॥ १ ॥

प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला । सो उचाटु सब कें सिर मेला ॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे । राम प्रेम अतिसय न बिछोहे ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५१७

पहले तो कुमत (बुरा विचार) करके कपटको बटोरा (अनेक प्रकारके कपटका साज सजा)। फिर वह (कपटजनित) उचाट सबके सिरपर डाल दिया। फिर देवमायासे सब लोगोंको विशेषरूपसे मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमसे उनका अत्यन्त बिछोह नहीं हुआ (अर्थात् उनका श्रीरामजीके प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा) ॥ २ ॥

भय उचाट बस मन थिर नाहीं । छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं ॥ दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी । सरित सिंधु संगम जनु बारी ॥

भय और उचाटके वश किसीका मन स्थिर नहीं है। क्षणमें उनकी वनमें रहनेकी इच्छा होती है और क्षणमें उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मनकी इस प्रकारकी दुविधामयी स्थितिसे प्रजा दुखी हो रही है। मानो नदी और समुद्रके सङ्गमका जल शुष्क हो रहा हो। (जैसे नदी और समुद्रके सङ्गमका जल स्थिर नहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकारकी दशा प्रजाके मनकी हो गयी) ॥ ३ ॥

दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं । एक एक सन मरमु न कहहीं ॥ लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू । सरिस स्वान मधवान जुबानू ॥

चित दोतरफा हो जानेसे वे कहीं सन्तोष नहीं पाते और एक-दूसरेसे अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदयमें हँसकर कहने लगे—कुता, इन्द्र और नवव्यवक (कामी पुरुष) एक-सरीखे (एक ही स्वभावके) हैं। [पाणिनीय व्याकरणके अनुसार श्वन्, युवन् और मधवन् शब्दोंके रूप भी एक-सरीखे होते हैं] ॥ ४ ॥

दो०— भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ । लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ ॥ ३०२ ॥

भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मन्त्री और ज्ञानी साधु-संतोंको छोड़कर अन्य सभीपर जिस मनुष्यको जिस योग्य (जिस प्रकृति और जिस स्थितिका) पाया, उसपर वैसे ही देवमाया लग गयी ॥ ३०२ ॥

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे । निज सनेहँ सुरपति छल भारे ॥ सभा राउ गुर महिसुर मंत्री । भरत भगति सब कै मति जंत्री ॥

कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजीने लोगोंको अपने स्नेह और देवराज इन्द्रके भारी छलसे दुखी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मन्त्री आदि सभीकी बुद्धिको भरतजीकी भक्तिने कील दिया ॥ १ ॥

रामहि चितवत चित्र लिखे से । सकुचत बोलत बचन सिखे से ॥ भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई । सुनत सुखद बरनत कठिनाई ॥

सब लोग चित्रलिखे-से श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये हुए-से वचन बोलते हैं। भरतजीकी प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुननेमें सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करनेमें कठिनता है ॥ २ ॥

५१८

  • रामचरितमानस *

जासु बिलोकि भगति लवल्लेसू । प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू ॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी । भगति सुभायै सुमति हियै हुलसी ॥

जिनकी भक्तिका लवल्लेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेममें मग्न हो गये, उन भरतजीकी महिमा तुलसीदास कैसे कहे? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे [कविके] हृदयमें सुबुद्धि हुलस रही है (विकसित हो रही है) ॥ ३ ॥

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी । कबिकुल कानि मानि सकुचानी ॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई । मति गति बाल बचन की नाई ॥

परन्तु वह बुद्धि अपनेको छोटी और भरतजीकी महिमाको बड़ी जानकर कविपरम्पराकी मर्यादाको मानकर सकुचा गयी (उसका वर्णन करनेका साहस नहीं कर सकी)। उसकी गुणोंमें रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धिकी गति बालकके वचनोंकी तरह हो गयी (वह कुण्ठित हो गयी) ॥ ४ ॥

दो०— भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।

उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि ॥ ३०३ ॥

भरतजीका निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कविकी सुबुद्धि चकोरी है, जो भक्तोंके हृदयरूपी निर्मल आकाशमें उस चन्द्रमाको उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है [तब उसका वर्णन कौन करे?] ॥ ३०३ ॥

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ । लघु मति चापलता कबि छमहूँ ॥

कहत सुनत सति भाउ भरत को । सीय राम पद होइ न रत को ॥

भरतजीके स्वाभावका वर्णन वेदोंके लिये भी सुगम नहीं है। [अतः] मेरी तुच्छ बुद्धिकी चञ्चलताको कविलोग क्षमा करें! भरतजीके सद्भावको कहते-सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजीके चरणोंमें अनुरक्त न हो जायगा ॥ १ ॥

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को । जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को ॥

देखि दयाल दसा सबही की । राम सुजान जानि जन जी की ॥

भरतजीका स्मरण करनेसे जिसको श्रीरामजीका प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम (अभागा) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजीने सभीकी दशा देखकर और भक्त (भरतजी) के हृदयकी स्थिति जानकर, ॥ २ ॥

धरम धुरीन धीर नय नागर । सत्य सनेह सील सुख सागर ॥

देसु कालु लखि समउ समाजू । नीति प्रीति पालक रघुराजू ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

५११

धर्मधुरन्धर, धीर, नीतिमें चतुर; सत्य, स्नेह, शील और सुखके समृद्ध; नीति और प्रीतिके पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल, अवसर और समाजको देखकर, ॥ ३ ॥

बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥ तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥

[तदनुसार] ऐसे बचन बोले जो मानो वाणीके सर्वस्व ही थे, परिणाममें हितकारी थे और सुननेमें चन्द्रमाके रस (अमृत)–सरीखे थे। [उन्होंने कहा—] हे तात भरत! तुम धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो, लोक और वेद दोनोंके जाननेवाले और प्रेममें प्रवीण हो ॥ ४ ॥

दो०— करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।

गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात ॥ ३०४ ॥

हे तात! कर्मसे, बचनसे और मनसे निर्मल तुम्हारे समान तुम्हीं हो। गुरुजनोंके समाजमें और ऐसे कुसमयमें छोटे भाईके गुण किस तरह कहे जा सकते हैं? ॥ ३०४ ॥

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती॥ समउ समाजु लाज गुरजन की। उदासीन हित अनहित मन की॥

हे तात! तुम सूर्यकुलकी रीतिको, सत्यप्रतिज्ञ पिताजीकी कीर्ति और प्रीतिको, समय, समाज और गुरुजनोंकी लज्जा (मर्यादा) को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सबके मनकी बातको जानते हो ॥ १ ॥

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू। मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहहुँ अवसर अनुसारा॥

तुमको सबके कर्मों (कर्तव्यों) का और अपने तथा मेरे परम हितकारी धर्मका पता है। यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकारसे भरोसा है, तथापि मैं समयके अनुसार कुछ कहता हूँ ॥ २ ॥

तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरकुल कृपाँ सँभारी॥ नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू॥

हे तात! पिताजीके बिना (उनकी अनुपस्थितिमें) हमारी बात केवल गुरुवंशकी कृपाने ही सम्हाल रखी है; नहीं तो हमारे समेत प्रजा, कुटुम्ब, परिवार सभी बर्बाद हो जाते ॥ ३ ॥

जौँ बिनु अवसर अथर्वँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥ तस उत्पातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥

यदि बिना समयके (संध्यासे पूर्व ही) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत्में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकारका उत्पात विधाताने यह (पिताकी असामयिक मृत्यु) किया है। पर मुनि महाराजने तथा मिथिलेश्वरने सबको बचा लिया ॥ ४ ॥

६००

  • रामचरितमानस *

दो०— राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम ।

गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम ॥ ३०५ ॥

राज्यका सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर—इन सभीका पालन (रक्षण) गुरुजीका प्रभाव (सामर्थ्य) करेगा और परिणाम शुभ होगा ॥ ३०५ ॥

सहित समाज तुम्हार हमारा । घर बन गुर प्रसाद रखवारा ॥

मातु पिता गुर स्वामि निदेसू । सकल धरम धरनीधर सेसू ॥

गुरुजीका प्रसाद (अनुग्रह) ही घरमें और वनमें समाजसहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है । माता, पिता, गुरु और स्वामीकी आज्ञा [का पालन] समस्त धर्मरूपी पृथ्वीको धारण करनेमें शेषजीके समान है ॥ १ ॥

सो तुम्ह करहु करावहु मोहू । तात तरनिकुल पालक होहू ॥

साधक एक सकल सिधि देनी । कीरति सुगति भूतिमय बेनी ॥

हे तात! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुलके रक्षक बनो । साधकके लिये यह एक ही (आज्ञापालनरूपी साधना) सम्पूर्ण सिद्धियोंकी देनेवाली, कीर्तिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है ॥ २ ॥

सो बिचारि सहि संकटु भारी । करहु प्रजा परिवारु सुखारी ॥

बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई । तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई ॥

इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवारको सुखी करो । हे भाई! मेरी विपत्ति सभीने बाँट ली है, परन्तु तुमको तो अवधि (चौदह वर्ष)—तक बड़ी कठिनाई है (सबसे अधिक दुःख है) ॥ ३ ॥

जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा । कुसमयँ तात न अनुचित मोरा ॥

होहिं कुठायँ सुबंधु सहाए । ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए ॥

तुमको कोमल जानकर भी मैं कठोर (वियोगकी बात) कह रहा हूँ । हे तात! बुरे समयमें मेरे लिये यह कोई अनुचित बात नहीं है । कुठौर (कुअवसर) में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं । वज्रके आघात भी हाथसे ही रोके जाते हैं ॥ ४ ॥

दो०— सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ ।

तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥ ३०६ ॥

सेवक हाथ, पैर और नेत्रोंके समान और स्वामी मुखके समान होना चाहिये । तुलसीदासजी कहते हैं कि सेवक-स्वामीकी ऐसी प्रीतिकी रीति सुनकर सुकबि उसकी सराहना करते हैं ॥ ३०६ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

६०१

सभा सकल सुनि रघुबर बानी । प्रेम पयोधि अमिअँ जनु सानी ॥ सिथिल समाज सनेह समाधी । देखि दसा चुप सारद साधी ॥

श्रीरघुनाथजीकी वाणी सुनकर, जो मानो प्रेमरूपी समुद्रके [मन्थनसे निकले हुए] अमृतमें सनी हुई थी, सारा समाज शिथिल हो गया; सबको प्रेमसमाधि लग गयी। यह दशा देखकर सरस्वतीने चुप साथ ली ॥ १ ॥

भरतहि भयउ परम संतोषू । सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू ॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू । भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू ॥

भरतजीको परम सन्तोष हुआ। स्वामीके सम्मुख (अनुकूल) होते ही उनके दुःख और दोषोंने मुँह मोड़ लिया (वे उन्हें छोड़कर भाग गये)। उनका मुख प्रसन्न हो गया और मनका विषाद मिट गया। मानो गूँगेपर सरस्वतीकी कृपा हो गयी हो ॥ २ ॥

कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी । बोले पानि पंकरुह जोरी ॥ नाथ भयउ सुखु साथ गए को । लहेउँ लाहु जग जनमु भए को ॥

उन्होंने फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और करकमलोंको जोड़कर वे बोले—हे नाथ! मुझे आपके साथ जानेका सुख प्राप्त हो गया और मैंने जगत्में जन्म लेनेका लाभ भी पा लिया ॥ ३ ॥

अब कृपाल जस आयसु होई । करौँ सीस धरि सादर सोई ॥ सो अवलंब देव मोहि देई । अवधि पारु पावौँ जेहि सेई ॥

हे कृपालु! अब जैसी आज्ञा हो, उसीको मैं सिरपर धरकर आदरपूर्वक करूँ! परन्तु देव! आप मुझे वह अवलम्बन (कोई सहारा) दें जिसकी सेवा कर मैं अवधिकार पा जाऊँ (अवधिको बिता दूँ) ॥ ४ ॥

दो०—देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ ॥ ३०७ ॥

हे देव! स्वामी (आप) के अभिषेकके लिये गुरुजीकी आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थोंका जल लेता आया हूँ; उसके लिये क्या आज्ञा होती है? ॥ ३०७ ॥

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं । सभयँ सकोच जात कहि नाही ॥ कहहु तात प्रभु आयसु पाई । बोले बानि सनेह सुहाई ॥

मेरे मनमें एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोचके कारण कहा नहीं जाता। [श्रीरामचन्द्रजीने कहा—] हे भाई! कहो। तब प्रभुकी आज्ञा पाकर भरतजी स्नेहपूर्ण सुन्दर वाणी बोले— ॥ १ ॥

६०२

  • रामचरितमानस *

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन । खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन ॥ प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी । आयसु होइ त आवौं देखी ॥

आज्ञा हो तो चित्रकूटके पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी-पशु, तालाब-नदी, झरने और पर्वतोंके समूह तथा विशेषकर प्रभु (आप) के चरणचिह्नोंसे अंकित भूमिको देख आऊँ ॥ २ ॥

अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू । तात बिगतभय कानन चरहू ॥ मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता । पावन परम सुहावन भ्राता ॥

[श्रीरघुनाथजी बोले—] अवश्य ही अत्रि ऋषिकी आज्ञाको सिरपर धारण करो (उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो) और निभंय होकर वनमें विचरो। हे भाई! अत्रि मुनिके प्रसादसे वन मङ्गलोंका देनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है— ॥ ३ ॥

रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं । राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं ॥ मुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा । मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा ॥

और ऋषियोंके प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहाँ [लाया हुआ] तीर्थोंका जल स्थापित कर देना। प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया ॥ ४ ॥

दो०—भरत राम संबादु मुनि सकल सुमंगल मूल । सुर स्वार्थी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल ॥ ३०८ ॥

समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुलकी सराहना करके कल्पवृक्षके फूल बरसाने लगे ॥ ३०८ ॥

धन्य भरत जय राम गोसाई । कहत देव हरषत बरिआई ॥ मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू । भरत बचन मुनि भयउ उछाहू ॥

‘भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजीकी जय हो!’ ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक (अत्यधिक) हर्षित होने लगे। भरतजीके वचन सुनकर मुनि वसिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी और सभामें सब किसीको बड़ा उत्साह (आनन्द) हुआ ॥ १ ॥

भरत राम गुन ग्राम सनेहू । पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ॥ सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन । नेमु पेमु अति पावन पावन ॥

भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहकी तथा प्रेमकी विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनोंका सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और प्रेम पवित्रको भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले हैं ॥ २ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

६०३

मति अनुसार सराहन लागे । सचिव सभासद सब अनुरागे ॥ सुनि सुनि राम भरत संबादू । दुहु समाज हिर्ष हरषु बिषादू ॥

मन्त्री और सभासद सभी प्रेममृगध होकर अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार सराहना करने लगे । श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीका संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजोंके हृदयोंमें हर्ष और विषाद (भरतजीके सेवाधर्मको देखकर हर्ष और रामवियोगकी सम्भावनासे विषाद) दोनों हुए ॥ ३ ॥

राम मातु दुखु सुखु सम जानी । कहि गुन राम प्रबोध्नी रानी ॥ एक कहहिं रघुबीर बड़ाई । एक सराहत भरत भलाई ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने दुःख और सुखको समान जानकर श्रीरामजीके गुण कहकर दूसरी रानियोंको धैर्य बँधाय। कोई श्रीरामजीकी बड़ाई (बड़प्पन) की चर्चा कर रहे हैं, तो कोई भरतजीके अच्छेपनकी सराहना करते हैं ॥ ४ ॥

दो०—अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप ।

राखिअ तीरथ तोय तहाँ पावन अमिअ अनूप ॥ ३०९ ॥

तब अत्रिजीने भरतजीसे कहा—इस पर्वतके समीप ही एक सुन्दर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत-जैसे तीर्थजलको उसीमें स्थापित कर दीजिये ॥ ३०९ ॥

भरत अत्रि अनुसासन पाई । जल भाजन सब दिए चलाई ॥ सानुज आपु अत्रि मुनि साधू । सहित गए जहाँ कूप अगाधू ॥

भरतजीने अत्रिमुनिकी आज्ञा पाकर जलके सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रि मुनि तथा अन्य साधु-सन्तोंसहित आप वहाँ गये जहाँ वह अथाह कुआँ था ॥ १ ॥

पावन पाथ पुन्यथल राखा । प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा ॥ तात अनादि सिद्ध थल एहू । लोपेउ काल बिदित नहिं केहू ॥

और उस पवित्र जलको उस पुण्यस्थलमें रख दिया। तब अत्रि ऋषिने प्रेमसे आनन्दित होकर ऐसा कहा—हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है। कालक्रमसे यह लोप हो गया था इसलिये किसीको इसका पता नहीं था ॥ २ ॥

तब सेवकन्ह सरस थलु देखा । कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा ॥ बिधिबस भयउ बिस्व उपकारू । सुगम अगम अति धरम बिचारू ॥

तब [भरतजीके] सेवकोंने उस जलयुक्त स्थानको देखा और उस सुन्दर [तीर्थोंके] जलके लिये एक खास कुआँ बना लिया। दैवयोगसे विश्वभरका उपकार हो गया। धर्मका विचार जो अत्यन्त अगम था, वह [इस कूपके प्रभावसे] सुगम हो गया ॥ ३ ॥

६०४

  • रामचरितमानस *

भरतकूप अब कहिहहिं लोगा । अति पावन तीरथ जल जोगा ॥ प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी । होइहहिं बिमल करम मन बानी ॥

अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे । तीर्थोंके जलके संयोगसे तो यह अत्यन्त ही पवित्र हो गया । इसमें प्रेमपूर्वक नियमसे स्नान करनेपर प्राणी मन, वचन और कर्मसे निर्मल हो जायेंगे ॥ ४ ॥

दो०—कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ ।

अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ ॥ ३१० ॥

कूपकी महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे । श्रीरघुनाथजीको अत्रिजीने उस तीर्थका पुण्य प्रभाव सुनाया ॥ ३१० ॥

कहत धरम इतिहास सप्रिती । भयउ भोरु निसि सो सुख बीती ॥

नित्य निबाहि भरत दोउ भाई । राम अत्रि गुर आयसु पाई ॥

प्रेमपूर्वक धर्मके इतिहास कहते वह रात सुखसे बीत गयी और सबेरा हो गया । भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर, ॥ १ ॥

सहित समाज साज सब सादें । चले राम बन अटन पयादें ॥

कोमल चरन चलत बिनु पनहीं । भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं ॥

समाजसहित सब सादे साजसे श्रीरामजीके वनमें भ्रमण (प्रदक्षिणा) करनेके लिये पैदल ही चले । कोमल चरण हैं और बिना जूतेके चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन-ही-मन सकुचाकर कोमल हो गयी ॥ २ ॥

कुस कंटक काँकरीं कुराई । कटुक कठोर कुबस्तु दुराई ॥

महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे । बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे ॥

कुश, काँटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओंको छिपाकर पृथ्वीने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये । सुखोंको साथ लिये (सुखदायक) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी ॥ ३ ॥

सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं । बिटप फूलि फलि तून मृदुताहीं ॥

मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी । सेवहिं सकल राम प्रिय जानी ॥

रास्तेमें देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, तृण अपनी कोमलतासे, मृग (पशु) देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर—सभी भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे ॥ ४ ॥

दो०—सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात ।

राम प्रानप्रिय भरत कहूं यह न होइ बड़ि बात ॥ ३११ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

६०५

जब एक साधारण मनुष्यको भी [आलस्यसे] जँभाई लेते समय 'राम' कह देनेसे ही सब सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं, तब श्रीरामचन्द्रजीके प्राणप्यारे भरतजीके लिये यह कोई बड़ी (आश्चर्यकी) बात नहीं है ॥ ३११ ॥

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं । नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं ॥ पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा । खग मृग तरु तून गिरि बन बागा ॥

इस प्रकार भरतजी वनमें फिर रहे हैं। उनके नियम और प्रेमको देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जलके स्थान (नदी, बावली, कुण्ड आदि), पृथ्वीके पृथक्-पृथक् भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण (घास), पर्वत, वन और बगीचे— ॥ १ ॥

चारु बिचित्र पवित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिव्य सब देखी ॥ सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ ॥

सभी विशेषरूपसे सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरतजी पूछते हैं और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रिजी प्रसन्न मनसे सबके कारण, नाम, गुण और पुण्य-प्रभावको कहते हैं ॥ २ ॥

कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा । कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा ॥ कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई । सुमिरत सीय सहित दोउ भाई ॥

भरतजी कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थानोंके दर्शन करते हैं और कहीं मुनि अत्रिजीकी आज्ञा पाकर बैठकर, सीताजीसहित श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंका स्मरण करते हैं ॥ ३ ॥

देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा । देहिं असीस मुदित बनदेवा ॥ फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई । प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई ॥

भरतजीके स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभावको देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं। यों घूम-फिरकर ढाई पहर दिन बीतनेपर लौट पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं ॥ ४ ॥

दो०—देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ ॥ ३१२ ॥

भरतजीने पाँच दिनमें सब तीर्थस्थानोंके दर्शन कर लिये। भगवान् विष्णु और महादेवजीका सुन्दर यश कहते-सुनते वह (पाँचवाँ) दिन भी बीत गया, सन्ध्या हो गयी ॥ ३१२ ॥

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू । भरत भूमिसुर तेरहुति राजू ॥ भल दिन आजु जानि मन माहीं । रामु कृपाल कहत सकुचाहीं ॥

६०६

  • रामचरितमानस *

[अगले छठे दिन] सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करनेके लिये अच्छा दिन है, यह मनमें जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहनेमें सकुचा रहे हैं ॥ १ ॥

गुर नृप भरत सभा अवलोकी । सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी ॥ सील सराहि सभा सब सोची । कहँ न राम सम स्वामि सँकोची ॥

श्रीरामचन्द्रजीने गुरु वसिष्ठजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभाकी ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वीकी ओर ताकने लगे। सभा उनके शीलकी सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचन्द्रजीके समान संकोची स्वामी कहीं नहीं हैं ॥ २ ॥

भरत सुजान राम रुख देखी । उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी ॥ करि दंडवत कहत कर जोरी । राखीं नाथ सकल रुचि मोरी ॥

सुजान भरतजी श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर प्रेमपूर्वक उठकर, विशेषरूपसे धीरज धारणकर दण्डवत् करके हाथ जोड़कर कहने लगे—हे नाथ! आपने मेरी सभी रुचियाँ रहीं ॥ ३ ॥

मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू । बहुत भाँति दुखु पावा आपू ॥ अब गोसाईं मोहि देउ रजाई । सेवौं अवध अवधि भरि जाई ॥

मेरे लिये सब लोगोंने सन्ताप सहा और आपने भी बहुत प्रकारसे दुःख पाया। अब स्वामी मुझे आज्ञा दें। मैं जाकर अवधिभर (चौदह वर्षतक) अवधका सेवन करूँ ॥ ४ ॥

दो०—जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल ।

सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल ॥ ३१३ ॥

हे दीनदयाल! जिस उपायसे यह दास फिर चरणोंका दर्शन करे—हे कोसलाधीश! हे कृपालु! अवधिभरके लिये मुझे वही शिक्षा दीजिये ॥ ३१३ ॥

पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं । सब सुचि सरस सनेहैं सगाईं ॥ राउर बदि भल भव दुख दाहू । प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू ॥

हे गोसाईं! आपके प्रेम और सम्बन्धसे अवधपुरवासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र और रस (आनन्द) से युक्त हैं। आपके लिये भवदुःख (जन्म-मरणके दुःख) की ज्वालामें जलना भी अच्छा है और प्रभु (आप) के बिना परमपद (मोक्ष) का लाभ भी व्यर्थ है ॥ १ ॥

स्वामि सुजानु जानि सब ही की । रुचि लालसा रहनि जन जी की ॥ प्रनतपालु पालिहि सब काहू । देउ दुहू दिसि ओर निबाहू ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

६०७

हे स्वामी! आप सुजान हैं, सभीके हृदयकी और मुझ सेवकके मनकी रुचि, लालसा (अभिलाषा) और रहनी जानकर, हे प्रणतपाल! आप सब किसीका पालन करेंगे और हे देव! दोनों तरफको ओर-अन्ततक निबाहेंगे ॥ २ ॥

अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो । किऐँ बिचारु न सोचु खरो सो ॥ आरति मोर नाथ कर छोहू । दुहुँ मिलि कीन्ह ठीठु हठि मोहू ॥

मुझे सब प्रकारसे ऐसा बहुत बड़ा भरोसा है। विचार करनेपर तिनकेके बराबर (जरा-सा) भी सोच नहीं रह जाता। मेरी दीनता और स्वामीका स्नेह दोनोंने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ठीठ बना दिया है ॥ ३ ॥

यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी । तजि सकोच सिखइअ अनुगामी ॥ भरत बिनय सुनि सबहिँ प्रसंसी । खीर नीर बिबरन गति हंसी ॥

हे स्वामी! इस बड़े दोषको दूर करके संकोच त्यागकर मुझ सेवकको शिक्षा दीजिये। दूध और जलको अलग-अलग करनेमें हंसिनीकी-सी गतिवाली भरतजीकी विनती सुनकर उसकी सभीने प्रशंसा की ॥ ४ ॥

दो०—दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन ॥ ३१४ ॥

दीनबन्धु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजीके दीन और छलरहित बचन सुनकर देश, काल और अवसरके अनुकूल बचन बोले— ॥ ३१४ ॥

तात तुम्हारि मोरि परिजन की । चिंता गुरहि नृपहि घर बन की ॥ माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू । हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू ॥

हे तात! तुम्हारी, मेरी, परिवारकी, घरकी और वनकी सारी चिन्ता गुरु वसिष्ठजी और महाराज जनकजीको है। हमारे सिरपर जब गुरुजी, मुनि विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें स्वप्नमें भी क्लेश नहीं है ॥ १ ॥

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु । स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु ॥ पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई । लोक बेद भल भूप भलाई ॥

मेरा और तुम्हारा तो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसीमें है कि हम दोनों भाई पिताजीकी आज्ञाका पालन करें। राजाकी भलाई (उनके व्रतकी रक्षा) से ही लोक और वेद दोनोंमें भला है ॥ २ ॥

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ॥ अस बिचारि सब सोच बिहाई । पालहु अवध अवधि भरि जाई ॥

गुरु, पिता, माता और स्वामीकी शिक्षा (आज्ञा) का पालन करनेसे कुमार्गपर भी चलनेसे पैर गड़ेंमें नहीं पड़ता (पतन नहीं होता)। ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधिपर उसका पालन करो ॥ ३ ॥

६०८

  • रामचरितमानस *

देसु कोसु परिजन परिवारु । गुर पद रजहिं लाग छरुभारु ॥ तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी । पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी ॥

देश, खजाना, कुटुम्ब, परिवार आदि सबकी जिम्मेदारी तो गुरुजीकी चरण-रजपर है। तुम तो मुनि वसिष्ठजी, माताओं और मन्त्रियोंकी शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानीका पालन (रक्षा)-भर करते रहना ॥ ४ ॥

दो०—मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहूँ एक ।

पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥ ३१५ ॥

तुलसीदासजी कहते हैं—[श्रीरामजीने कहा—] मुखिया मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेको तो एक (अकेला) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगोंका पालन-पोषण करता है ॥ ३१५ ॥

राजधरम सरबसु एतनोई । जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥ बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥

राजधर्मका सर्वस्व (सार) भी इतना ही है। जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया। परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति ॥ १ ॥

भरत सील गुर सचिव समाजू । सकुच सनेह बिबस रघुराजू ॥ प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं । सादर भरत सीस धरि लीन्हीं ॥

इधर तो भरतजीका शील (प्रेम) और उधर गुरुजनों, मन्त्रियों तथा समाजकी उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेहेके विशेष वशीभूत हो गये। (अर्थात् भरतजीके प्रेमवश उन्हें पाँवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदिका संकोच भी होता है।) आखिर [भरतजीके प्रेमवश] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपाकर खड़ाऊँ दे दीं और भरतजीने उन्हें आदरपूर्वक सिरपर धारण कर लिया ॥ २ ॥

चरनपीठ करुनानिधान के । जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के ॥ संपुट भरत सनेह रतन के । आखर जुग जनु जीव जतन के ॥

करुनानिधान श्रीरामचन्द्रजीके दोनों खड़ाऊँ प्रजाके प्राणोंकी रक्षाके लिये मानो दो पहरेदार हैं। भरतजीके प्रेमरूपी रत्नके लिये मानो डिब्बा है और जीवके साधनके लिये मानो राम-नामके दो अक्षर हैं ॥ ३ ॥

कुल कपाट कर कुसल करम के । बिमल नयन सेवा सुधरम के ॥ भरत मुदित अवलंब लहे तें । अस सुख जस सिय रामु रहे तें ॥

रघुकुल [की रक्षा] के लिये दो किवाड़ हैं। कुशल (श्रेष्ठ) कर्म करनेके लिये दो हाथकी भाँति (सहायक) हैं। और सेवारूपी श्रेष्ठ धर्मके सुझानेके लिये निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अवलम्बके मिल जानेसे परम आनन्दित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्रीसीतारामजीके रहनेसे होता ॥ ४ ॥

  • अयोध्याकाण्ड *

६०१

दो०—मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।

लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ ॥ ३१६ ॥

भरतजीने प्रणाम करके विदा माँगी, तब श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया। इधर कुटिल इन्द्रने बुरा मौका पाकर लोगोंका उच्चाटन कर दिया ॥ ३१६ ॥

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की ॥

नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा ॥

वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधिकी आशाके समान ही वह जीवनके लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो (उच्चाटन न होता तो) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सब लोग घबड़ाकर (हाय-हाय करके) मर ही जाते ॥ १ ॥

रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ॥

भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो ॥

श्रीरामजीकी कृपाने सारी उलझन सुधार दी। देवताओंकी सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओंमें भरकर भाई भरतसे मिल रहे हैं। श्रीरामजीके प्रेमका वह रस (आनन्द) कहते नहीं बनता ॥ २ ॥

तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा ॥

बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी ॥

तन, मन और वचन तीनोंमें प्रेम उमड़ पड़ा। धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजीने भी धीरज त्याग दिया। वे कमलसदृश नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओंकी सभा (समाज) दुःखी हो गयी ॥ ३ ॥

मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से ॥

जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए ॥

मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी-सरीखे धीरधुरन्धर जो अपने मनोंको ज्ञानरूपी अग्निमें सोनेके समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजीने निलेंप ही रचा और जो जगतरूपी जलमें कमलके पतेकी तरह ही (जगत्में रहते हुए भी जगत्से अनासक्त) पैदा हुए, ॥ ४ ॥

दो०—तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।

भाए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार ॥ ३१७ ॥

वे भी श्रीरामजी और भरतजीके उपमारहित अपार प्रेमको देखकर वैराग्य और विवेकसहित तन, मन, वचनसे उस प्रेममें मग्न हो गये ॥ ३१७ ॥

६१०

  • रामचरितमानस *

जहाँ जनक गुर गति मति भोरी । प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी ॥ बरनत रघुबर भरत बियोगू । सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू ॥

जहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजीकी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेमको प्राकृत (लौकिक) कहनेमें बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीके वियोगका वर्णन करते सुनकर लोग कविको कठोरहृदय समझेंगे ॥ १ ॥

सो सकोच रसु अकथ सुबानी । समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी ॥ भेंटि भरतु रघुबर समुझाए । पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए ॥

वह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कविकी सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेमको स्मरण करके सकुचा गयी। भरतजीको भेंटकर श्रीरघुनाथजीने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगा लिया ॥ २ ॥

सेवक सचिव भरत रुख पाई । निज निज काज लगे सब जाई ॥ सुनि दारुन दुखु दुहुँ समाजा । लगे चलन के साजन साजा ॥

सेवक और मन्त्री भरतजीका रुख पाकर सब अपने-अपने काममें जा लगे। यह सुनकर दोनों समाजोंमें दारुण दुःख छा गया। वे चलनेकी तैयारियाँ करने लगे ॥ ३ ॥

प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई । चले सीस धरि राम रजाई ॥ मुनि तापस बनदेव निहोरी । सब सनमानि बहोरि बहोरी ॥

प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके तथा श्रीरामजीकी आज्ञाको सिरपर रखकर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके उनकी विनती की ॥ ४ ॥

दो०—लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।

चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि ॥ ३१८ ॥

फिर लक्ष्मणजीको क्रमशः भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजीके चरणोंकी धूलिको सिरपर धारण करके और समस्त मङ्गलोंके मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चले ॥ ३१८ ॥

सानुज राम नृपहि सिर नाई । कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई ॥ देव दया बस बड़ दुखु पायउ । सहित समाज काननहिं आयउ ॥

छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत श्रीरामजीने राजा जनकजीको सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकारसे विनती और बड़ाई की [और कहा—] हे देव! दयावश आपने बहुत दुःख पाया। आप समाजसहित वनमें आये ॥ १ ॥

पुर पगु धारिअ देड़ असीसा । कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा ॥ मुनि महिदेव साधु सनमाने । बिदा किए हरि हर सम जाने ॥