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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

अपने तेजसे प्रज्वलित-से होनेवाले महात्मा अगस्त्यका अभिवादन करके उनसे उत्तम आतिथ्य पाकर नरेश्वर श्रीराम आसनपर बैठे॥ २४ ॥

उस समय महातेजस्वी महातपस्वी कुम्भज मुनिने कहा—‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आपका स्वागत है। आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २५ ॥

‘महाराज श्रीराम! बहुत-से उत्तम गुणोंके कारण आपके लिये मेरे हृदयमें बड़ा सम्मान है। आप मेरे आदरणीय अतिथि हैं और सदा मेरे मनमें बसे रहते हैं॥ २६ ॥

‘देवतालोग कहते थे कि ‘आप अधर्मपरायण शूद्रका वध करके आ रहे हैं तथा धर्मके बलसे आपने ब्राह्मणके उस मरे हुए पुत्रको जीवित कर दिया है’॥ २७ ॥

‘रघुनन्दन! आज रातको आप मेरे ही पास इस आश्रममें निवास कीजिये। कल सबेरे पुष्पकविमानद्वारा अपने नगरको जाइयेगा। आप साक्षात् श्रीमान् नारायण हैं। सारा जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है और आप ही समस्त देवताओंके स्वामी तथा सनातन पुरुष हैं॥ २८-२९ ॥

‘सौम्य! यह विश्वकर्माका बनाया हुआ दिव्य आभूषण है, जो अपने दिव्य रूप और तेजसे प्रकाशित हो रहा है॥ ३० ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन! आप इसे लीजिये और मेरा प्रिय कीजिये; क्योंकि किसीकी दी हुई वस्तुका पुनः दान कर देनेसे महान् फलकी प्राप्ति बतायी जाती है॥ ३१ ॥

‘इस आभूषणको धारण करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं तथा बड़े-से-बड़े फलोंकी प्राप्ति करानेकी शक्ति भी आपमें ही है। आप इन्द्र आदि देवताओंको भी तारनेमें समर्थ हैं, इसलिये नरेश्वर! यह भूषण भी मैं आपको ही दूँगा। आप इसे विधिपूर्वक ग्रहण करें’॥ ३२ १/२ ॥

तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और इक्ष्वाकुकुलके महारथी वीर श्रीरामने क्षत्रियधर्मका विचार करते हुए वहाँ महात्मा अगस्त्यजीसे कहा—‘भगवन्! दान लेनेका काम तो केवल ब्राह्मणके लिये ही निन्दित नहीं है॥ ३३-३४ ॥

‘विप्रवर! क्षत्रियोंके लिये तो प्रतिग्रह स्वीकार करना अत्यन्त निन्दित बताया गया है। फिर क्षत्रिय प्रतिग्रह—विशेषतः ब्राह्मणका दिया हुआ दान कैसे ले सकता है? यह बतानेकी कृपा करें’॥ ३५ १/२ ॥

श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर महर्षि अगस्त्यने उत्तर दिया—‘रघुनन्दन! पहले ब्रह्मस्वरूप सत्ययुगमें सारी प्रजा बिना राजाके ही थी, आगे चलकर इन्द्र देवताओंके राजा बनाये गये॥ ३६-३७॥

‘तब सारी प्रजाएँ देवदेवेश्वर ब्रह्माजीके पास राजाके लिये गयीं और बोलीं—‘देव! आपने इन्द्रको देवताओंके राजाके पदपर स्थापित किया है। इसी तरह हमारे लिये भी किसी श्रेष्ठ पुरुषको राजा बना दीजिये, जिसकी पूजा करके हम पापरहित हो इस भूतलपर विचरें॥ ३८-३९॥

‘हम बिना राजाके नहीं रहेंगी। यह हमारा उत्तम निश्चय है।' तब सुरश्रेष्ठ ब्रह्माने इन्द्रसहित समस्त लोकपालोंको बुलाकर कहा—‘तुम सब लोग अपने तेजका एक-एक भाग दो।' तब समस्त लोकपालोंने अपने-अपने तेजका भाग अर्पित किया॥ ४०-४१॥

‘उसी समय ब्रह्माजीको छींक आयी, जिससे क्षुप नामक राजा उत्पन्न हुआ। ब्रह्माजीने उस राजाको लोकपालोंके दिये हुए तेजके उन सभी भागोंसे संयुक्त कर दिया॥ ४२॥

‘तत्पश्चात् उन्होंने क्षुपको ही उन प्रजाजनोंके लिये उनके शासक नरेशके रूपमें समर्पित किया। क्षुपने वहाँ राजा होकर इन्द्रके दिये हुए तेजोभागसे पृथ्वीका शासन किया॥ ४३॥

‘वरुणके तेजोभागसे वे भूपाल प्रजाके शरीरका पोषण करने लगे। कुबेरके तेजोभागसे उन्होंने उन्हें धनपतिकी आभा प्रदान की तथा उनमें जो यमराजका तेजोभाग था, उससे वे प्रजाजनोंको अपराध करनेपर दण्ड देते थे॥ ४४ १/२॥

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! आप भी राजा होनेके कारण सभी लोकपालोंके तेजसे सम्पन्न हैं। अतः प्रभो! इन्द्र-सम्बन्धी तेजोभागके द्वारा आप मेरे उद्धारके लिये यह आभूषण ग्रहण कीजिये। आपका भला हो'॥ ४५ १/२॥

तब भगवान् श्रीराम उन महात्मा मुनिके दिये हुए उस सूर्यके समान दीप्तिमान्, दिव्य, विचित्र एवं उत्तम आभूषणको ग्रहण करके उसकी उपलब्धिके विषयमें पूछने लगे—॥ ४६-४७ १/२॥

‘महायशस्वी मुने! यह अत्यन्त अद्भुत तथा दिव्य आकारसे युक्त आभूषण आपको कैसे प्राप्त हुआ, अथवा इसे कौन कहाँसे ले आया? ब्रह्मन्! मैं कौतूहलवश ये बातें आपसे पूछ रहा हूँ; क्योंकि आप बहुत-से आश्चर्योंकी उत्तम निधि हैं'॥ ४८-४९ १/२॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामके इस प्रकार पूछनेपर मुनिवर अगस्त्यने कहा—‘श्रीराम! पूर्व चतुर्युगीके त्रेतायुगमें जैसा वृत्तान्त घटित हुआ था, उसे बताता हूँ सुनिये’॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७६॥

सतहत्तरवाँ सर्ग

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सतहत्तरवाँ सर्ग

महर्षि अगस्त्यका एक स्वर्गीय पुरुषके शवभक्षणका प्रसंग सुनाना

(अगस्त्यजी कहते हैं—) श्रीराम! प्राचीनकालके त्रेतायुगकी बात है, एक बहुत ही विस्तृत वन था, जो चारों ओर सौ योजनतक फैला हुआ था; परंतु उस वनमें न तो कोऽइ पशु था और न पक्षी ही॥ १ ॥

सौम्य! उस निर्जन वनमें उत्तम तपस्या करनेके लिये घूम-घूमकर उपयुक्त स्थानका पता लगानेके निमित्त मैं वहाँ गया॥ २ ॥

उस वनका स्वरूप कितना सुखदायी था, यह बतानेमें मैं असमर्थ हूँ। सुखद स्वादिष्ट फल-मूल तथा अनेक रूप-रंगके वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ३ ॥

उस वनके मध्यभागमें एक सरोवर था, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी थी। उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी फैले हुए थे और चक्रवाकोंके जोड़े उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ ४ ॥

उसमें कमल और उत्पल छा रहे थे। सेवारका कहीं नाम भी नहीं था। वह परम उत्तम सरोवर अत्यन्त आश्चर्यमय-सा जान पड़ता था। उसका जल पीनेमें अत्यन्त सुखद एवं स्वादिष्ट था॥ ५ ॥

उसमें कीचड़ नहीं था, वह सर्वथा निर्मल था। उसे कोऽइ पार नहीं कर सकता था। उसके भीतर सुन्दर पक्षी कलरव कर रहे थे। उस सरोवरके पास ही एक विशाल, अद्भुत एवं अत्यन्त पवित्र पुराना आश्रम था; जिसमें एक भी तपस्वी नहीं था॥ ६ १/२ ॥

पुरुषप्रवर! जेठकी रातमें मैं उस आश्रमके भीतर एक रात रहा और प्रातःकाल सबेरे उठकर स्नान आदिके लिये उस सरोवरके तटपर जाने लगा॥ ७ १/२ ॥

उसी समय मुझे वहाँ एक शव दिखायी दिया जो हृष्ट-पुष्ट होनेके साथ ही अत्यन्त निर्मल था। उसमें कहीं कोऽइ मलिनता नहीं थी। नरेश्वर! वह शव उस जलाशयके तटपर बड़ी शोभासे सम्पन्न होकर पड़ा था॥ ८ १/२ ॥

प्रभो! रघुनन्दन! मैं उस शवके विषयमें यह सोचता हुआ कि 'यह क्या है?' वहाँ दो घड़ीतक उस तालाबके किनारे बैठा रहा॥ ९ १/२ ॥

दो घड़ी बीतते ही मैंने वहाँ एक दिव्य, अद्भुत, अत्यन्त उत्तम, हंसयुक्त और मनके समान वेगशाली विमान उतरता देखा। रघुनन्दन! उस विमानपर एक स्वर्गवासी देवता बैठे थे, जो अत्यन्त रूपवान् थे। वीर! वहाँ उनकी सेवामें सहस्रों अप्सराएँ बैठी थीं, जो दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थीं॥ १०-११ १/२ ॥

उनमेंसे कुछ मनोहर गीत गा रही थीं, दूसरी मृदङ्ग, वीणा और पणव आदि बाजे बजा रही थीं। अन्य बहुत-सी अप्सराएँ नृत्य करती थीं तथा प्रफुल्ल कमल-जैसे नेत्रोंवाली अन्य कितनी ही अप्सराएँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित एवं चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल बहुमूल्य चवँर लेकर उन स्वर्गवासी देवताके मुखपर हवा कर रही थीं॥ १२-१३ १/२ ॥

रघुकुलनन्दन श्रीराम! तदनन्तर जैसे अंशुमाली सूर्य मेरुपर्वतके शिखरको छोड़कर नीचे उतरते हैं, उसी प्रकार उन स्वर्गवासी पुरुषने विमानसे उतरकर मेरे देखते-देखते उस शवका भक्षण किया॥ १४-१५ ॥

इच्छानुसार उस सुपुष्ट एवं प्रचुर मांसको खाकर वे स्वर्गीय देवता सरोवरमें उतरे और हाथ-मुँह धोने लगे॥ १६ ॥

रघुनन्दन! यथोचित रीतिसे कुल्ला-आचमन करके वे स्वर्गवासी पुरुष उस उत्तम एवं श्रेष्ठ विमानपर चढ़नेको उद्यत हुए॥ १७ ॥

पुरुषोत्तम! उन देवतुल्य पुरुषको विमानपर चढ़ते देख मैंने उनसे यह बात पूछी—॥ १८ ॥

‘सौम्य! देवोपम पुरुष! आप कौन हैं और किसलिये ऐसा घृणित आहार ग्रहण करते हैं? यह बतानेका कष्ट करें॥ १९ ॥

‘देवतुल्य तेजस्वी पुरुष! ऐसा दिव्य स्वरूप और ऐसा घृणित आहार किसका हो सकता है? सौम्य! आपमें ये दोनों आश्चर्यजनक बातें हैं, अतः मैं इसका यथार्थ रहस्य सुनना चाहता हूँ; क्योंकि मैं इस शवको आपके योग्य आहार नहीं मानता हूँ’॥ २० ॥

नरेश्वर! जब कौतूहलवश मैंने मधुर वाणीमें उन स्वर्गीय पुरुषसे इस प्रकार पूछा, तब मेरी बातें सुनकर उन्होंने यह सब कुछ मेरे सामने बताया॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७७॥

अठहत्तरवाँ सर्ग

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अठहत्तरवाँ सर्ग

राजा श्वेतका अगस्त्यजीको अपने लिये घृणित आहारकी प्राप्तिका कारण बताते हुए ब्रह्माजीके साथ हुए अपनी वार्ताको उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषणका दान दे भूख-प्यासके कष्टसे मुक्त होना

(अगस्त्यजी कहते हैं—) रघुकुलनन्दन राम! मेरी कही हुई शुभ अक्षरोंसे युक्त बात सुनकर उन स्वर्गीय पुरुषने हाथ जोड़कर इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥

‘ब्रह्मन्! आप जो कुछ पूछ रहे हैं, वह मेरे सुख-दुःखका अलङ्घनीय कारण, जो पूर्वकालमें घटित हो चुका है, यहाँ बताया जाता है, सुनिये॥ २ ॥

‘पूर्वकालमें मेरे महायशस्वी पिता विदर्भ देशके राजा थे। उनका नाम सुदेव था। वे तीनों लोकोंमें विख्यात पराक्रमी थे॥ ३ ॥

‘ब्रह्मन्! उनके दो पत्नियाँ थीं, जिनके गर्भसे उन्हें दो पुत्र प्राप्त हुए। उनमें ज्येष्ठ मैं था। मेरी श्वेतके नामसे प्रसिद्धि हुई और मेरे छोटे भाईका नाम सुरथ था॥ ४ ॥

‘पिताके स्वर्गलोकमें चले जानेपर पुरवासियोंने राजाके पदपर मेरा अभिषेक कर दिया। वहाँ परम सावधान रहकर मैंने धर्मके अनुकूल राज्यका पालन किया॥ ५ ॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मर्षे! इस तरह धर्मपूर्वक प्रजाकी रक्षा तथा राज्यका शासन करते हुए मेरे एक सहस्र वर्ष बीत गये॥ ६ ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! एक समय मुझे किसी निमित्तसे अपनी आयुका पता लग गया और मैंने मृत्यु-तिथिको हृदयमें रखकर वहाँसे वनको प्रस्थान किया॥ ७ ॥

‘उस समय मैं इसी दुर्गम वनमें आया, जिसमें न पशु हैं न पक्षी। वनमें प्रवेश करके मैं इसी सरोवरके सुन्दर तटके निकट तपस्या करनेके लिये बैठा॥ ८ ॥

‘राज्यपर अपने भाई राजा सुरथका अभिषेक करके इस सरोवरके समीप आकर मैंने दीर्घकालतक तपस्या की॥ ९ ॥

‘इस विशाल वनमें तीन हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके मैं परम उत्तम ब्रह्मलोकको प्राप्त हुआ॥ १० ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! परम उदार महर्षे! ब्रह्मलोकमें पहुँच जानेपर भी मुझे भूख और प्यास बड़ा कष्ट देते हैं। उससे मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठती हैं॥ ११ ॥

‘एक दिन मैंने त्रिलोकीके श्रेष्ठ देवता भगवान् ब्रह्माजीसे कहा—‘भगवन्! यह ब्रह्मलोक तो भूख-प्यासके कष्टसे रहित है, किंतु यहाँ भी क्षुधा-पिपासाका क्लेश मेरा पीछा नहीं छोड़ता है। यह मेरे किस कर्मका परिणाम है? देव! पितामह! मेरा आहार क्या है? यह मुझे बताइये’॥ १२-१३ ॥

यह सुनकर ब्रह्माजी मुझसे बोले—‘सुदेवनन्दन! तुम मर्त्यलोकमें स्थित अपने ही शरीरका सुस्वादु मांस प्रतिदिन खाया करो; यही तुम्हारा आहार है॥ १४ ॥

‘श्वेत! तुमने उत्तम तप करते हुए केवल अपने शरीरका ही पोषण किया है। महामते! दानरूपी बीज बोये बिना कहीं कुछ भी नहीं जमता—कोऽइ भी भोज्य-पदार्थ उपलब्ध नहीं होता है॥ १५ ॥

‘तुमने देवताओं, पितरों एवं अतिथियोंके लिये कभी कुछ थोड़ा-सा भी दान किया हो, ऐसा नहीं दिखायी देता। तुम केवल तपस्या करते थे। वत्स! इसीलिये ब्रह्मलोकमें आकर भी भूख-प्याससे पीड़ित हो रहे हो॥

‘नाना प्रकारके आहारोंसे भलीभाँति पोषित हुआ तुम्हारा परम उत्तम शरीर अमृतरससे युक्त होगा और उसीका भक्षण करनेसे तुम्हारी क्षुधा-पिपासाका निवारण हो जायगा॥ १७ ॥

‘श्वेत! जब उस वनमें दुर्धर्ष महर्षि अगस्त्य पधारेंगे, तब तुम इस कष्टसे छुटकारा पा जाओगे॥ १८ ॥

‘सौम्य! महाबाहो! वे देवताओंका भी उद्धार करनेमें समर्थ हैं, फिर भूख-प्यासके वशमें पड़े हुए तुम-जैसे पुरुषको संकटसे छुड़ाना उनके लिये कौन बड़ी बात है?’॥ १९ ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! देवाधिदेव भगवान् ब्रह्माका यह निश्चय सुनकर मैं अपने शरीरका ही घृणित आहार ग्रहण करने लगा॥ २० ॥

‘ब्रह्मन्! ब्रह्मर्षे! बहुत वर्षोंसे मेरे द्वारा उपभोगमें लाये जानेपर भी यह शरीर नष्ट नहीं होता है और मुझे पूर्णतः तृप्ति प्राप्त होती है॥ २१ ॥

‘मुने! इस प्रकार मैं संकटमें पड़ा हूँ। आप मेरे दृष्टिपथमें आ गये हैं, इसलिये इस कष्टसे मेरा उद्धार कीजिये। आप ब्रह्मर्षि कुम्भजके सिवा दूसरोंकी इस निर्जन वनमें पहुँच नहीं हो

सकती (इसलिये आप अवश्य कुम्भयोनि अगस्त्य ही हैं)॥ २२ ॥

‘सौम्य! विप्रवर! आपका कल्याण हो। आप मेरा उद्धार करनेके लिये मेरे इस आभूषणका दान ग्रहण करें और आपका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो॥ २३ ॥

‘ब्रह्मन्! ब्रह्मर्षे! यह दिव्य आभूषण सुवर्ण, धन, वस्त्र, भक्ष्य, भोज्य तथा अन्य नाना प्रकारके आभरण भी देता है॥ २४ ॥

‘मुनिश्रेष्ठ! इस आभूषणके द्वारा मैं समस्त कामनाओं (मनोवाञ्छित पदार्थों) और भोगोंको भी दे रहा हूँ। भगवन्! आप मेरे उद्धारके लिये मुझपर कृपा करें'॥ २५ ॥

स्वर्गीय राजा श्वेतकी यह दुःखभरी बात सुनकर मैंने उनका उद्धार करनेके लिये वह उत्तम आभूषण ले लिया॥ २६ ॥

ज्यों ही मैंने उस शुभ आभूषणका दान ग्रहण किया, त्यों ही राजर्षि श्वेतका वह पूर्व-शरीर (शव) अदृश्य हो गया॥ २७ ॥

उस शरीरके अदृश्य हो जानेपर राजर्षि श्वेत परमानन्दसे तृप्त हो प्रसन्नतापूर्वक सुखमय ब्रह्मलोकको चले गये॥ २८ ॥

काकुत्स्थ! उन इन्द्रतुल्य तेजस्वी राजा श्वेतने उस भूख-प्यासके निवारणरूप पूर्वोक्त निमित्तसे यह अद्भुत दिखायी देनेवाला दिव्य आभूषण मुझे दिया था॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अठहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७८॥

उनासीवाँ सर्ग

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उनासीवाँ सर्ग

इक्ष्वाकुपुत्र राजा दण्डका राज्य

अगस्त्यजीका यह अत्यन्त अद्भुत वचन सुनकर श्रीरघुनाथजीके मनमें उनके प्रति विशेष गौरवका उदय हुआ और उन्होंने विस्मित होकर पुनः उनसे पूछना आरम्भ किया— ॥ १ ॥

‘भगवन्! वह भयंकर वन, जिसमें विदर्भदेशके राजा श्वेत घोर तपस्या करते थे, पशु-पक्षियोंसे रहित क्यों हो गया था?॥ २ ॥

‘वे विदर्भराज उस सूने निर्जन वनमें तपस्या करनेके लिये क्यों गये? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ’॥ ३ ॥

श्रीरामका कौतूहलयुक्त वचन सुनकर वे परम तेजस्वी महर्षि पुनः इस प्रकार कहने लगे— ॥ ४ ॥

‘श्रीराम! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है, दण्डधारी राजा मनु इस भूतलपर शासन करते थे। उनके एक श्रेष्ठ पुत्र हुआ, जिसका नाम इक्ष्वाकु था। राजकुमार इक्ष्वाकु अपने कुलको आनन्दित करनेवाले थे॥ ५ ॥

‘अपने उन ज्येष्ठ एवं दुर्जय पुत्रको भूमण्डलके राज्यपर स्थापित करके मनुने उनसे कहा—‘बेटा! तुम भूतलपर राजवंशोंकी सृष्टि करो’॥ ६ ॥

‘रघुनन्दन! पुत्र इक्ष्वाकुने पिताके सामने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की। इससे मनु बहुत संतुष्ट हुए और अपने पुत्रसे बोले— ॥ ७ ॥

“परम उदार पुत्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम राजवंशकी सृष्टि करोगे, इसमें संशय नहीं है। तुम दण्डके द्वारा दुष्टोंका दमन करते हुए प्रजाकी रक्षा करो, परंतु बिना अपराधके ही किसीको दण्ड न देना॥ ८ ॥

“अपराधी मनुष्योंपर जो दण्डका प्रयोग किया जाता है, वह विधिपूर्वक दिया हुआ दण्ड राजाको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है॥ ९ ॥

“इसलिये महाबाहु पुत्र! तुम दण्डका समुचित प्रयोग करनेके लिये प्रयत्नशील रहना। ऐसा करनेसे तुम्हें संसारमें परम धर्मकी प्राप्ति होगी”॥ १० ॥

इस प्रकार पुत्रको बहुत-सा संदेश दे मनु समाधि लगाकर बड़े हर्षके साथ स्वर्गको—सनातन ब्रह्मलोकको चले गये॥ ११ ॥

‘उनके ब्रह्मलोकनिवासी हो जानेपर अमित तेजस्वी राजा इक्ष्वाकु इस चिन्तामें पड़े कि मैं किस प्रकार पुत्रोंको उत्पन्न करूँ?॥ १२ ॥

‘तब यज्ञ, दान और तपस्यारुप विविध कर्मोंद्वारा धर्मात्मा मनुपुत्रने सौ पुत्र उत्पन्न किये, जो देवकुमारोंके समान तेजस्वी थे॥ १३ ॥

‘तात रघुनन्दन! उनमें जो सबसे छोटा पुत्र था, वह मूढ़ और विद्याविहीन था, इसलिये अपने बड़े भाइयोंकी सेवा नहीं करता था॥ १४ ॥

‘इसके शरीरपर अवश्य दण्डपात होगा, ऐसा सोचकर पिताने उस मन्दबुद्धि पुत्रका नाम दण्ड रख दिया॥ १५ ॥

‘श्रीराम! शत्रुदमन नरेश! उस पुत्रके योग्य दूसरा कोई भयंकर देश न देखकर राजाने उसे विन्ध्य और शैवल पर्वतके बीचका राज्य दे दिया॥ १६ ॥

‘श्रीराम! पर्वतके उस रमणीय तटप्रान्तमें दण्ड राजा हुआ। उसने अपने रहनेके लिये एक बहुत ही अनुपम और उत्तम नगर बसाया॥ १७ ॥

‘प्रभो! उसने उस नगरका नाम रखा मधुमन्त और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बनाया॥ १८ ॥

‘इस प्रकार स्वर्गमें देवराजकी भाँति भूतलपर राजा दण्डने पुरोहितके साथ रहकर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस राज्यका पालन आरम्भ किया॥ १९ ॥

‘उस समय वह महामनस्वी महाराजकुमार तथा महान् राजा दण्ड शुक्राचार्यके साथ रहकर अपने राज्यका उसी तरह पालन करने लगा जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्र देवगुरु बृहस्पतिके साथ रहकर अपने राज्यका पालन करते हैं’॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७९॥

अस्सीवाँ सर्ग

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अस्सीवाँ सर्ग

राजा दण्डका भार्गव-कन्याके साथ बलात्कार

महर्षि कुम्भज श्रीरामसे इतनी कथा कहकर फिर इसीका अवशिष्ट अंश इस तरह कहने लगे— ॥ १ ॥

‘काकुत्स्थ! तदनन्तर राजा दण्डने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर बहुत वर्षोंतक वहाँ अकण्टक राज्य किया॥ २ ॥

‘तत्पश्चात् किसी समय राजा मनोरम चैत्रमासमें शुक्राचार्यके रमणीय आश्रमपर आया॥ ३ ॥

‘वहाँ शुक्राचार्यकी सर्वोत्तम सुन्दरी कन्या, जिसके रूपकी इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं थी, वनप्रान्तमें विचर रही थी। दण्डने उसे देखा॥ ४ ॥

‘उसे देखते ही वह अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला राजा कामदेवके बाणोंसे पीड़ित हो पास जाकर उस डरी हुई कन्यासे बोला— ॥ ५ ॥

‘“सुश्रोणि! तुम कहाँसे आयी हो अथवा शुभे! तुम किसकी पुत्री हो? शुभानने! मैं कामदेवसे पीड़ित हूँ; इसलिये तुम्हारा परिचय पूछता हूँ” ॥ ६ ॥

‘मोहसे उन्मत्त होकर वह कामी राजा जब इस प्रकार पूछने लगा, तब भृगुकन्याने विनयपूर्वक उसे इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ७ ॥

‘“राजेन्द्र! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं पुण्यकर्मा शुक्रदेवताकी ज्येष्ठ पुत्री हूँ। मेरा नाम अरजा है। मैं इसी आश्रममें निवास करती हूँ॥ ८ ॥

‘“राजन्! बलपूर्वक मेरा स्पर्श न करो। मैं पिताके अधीन रहनेवाली कुमारी कन्या हूँ। राजेन्द्र! मेरे पिता तुम्हारे गुरु हैं और तुम उन महात्माके शिष्य हो॥ ९ ॥

‘“नरश्रेष्ठ! वे महातपस्वी हैं। यदि कुपित हो जायँ तो तुम्हें बड़ी भारी विपत्तिमें डाल सकते हैं। यदि मुझसे तुम्हें दूसरा ही काम लेना हो (अर्थात् यदि तुम मुझे अपनी भार्या बनाना चाहते हो) तो धर्मशास्त्रोक्त सन्मार्गसे चलकर मेरे महातेजस्वी पितासे मुझको माँग लो। अन्यथा तुम्हें अपने स्वेच्छाचारका बड़ा भयानक फल भोगना पड़ेगा॥ १०-११ ॥

“मेरे पिता अपनी क्रोधाग्निसे सारी त्रिलोकीको भी दग्ध कर सकते हैं; अतः सुन्दर अङ्गोंवाले नरेश! तुम बलात्कार न करो। तुम्हारे याचना करनेपर पिताजी मुझे अवश्य तुम्हारे हाथमें सौंप देंगे”॥ १२ ॥

‘जब अरजा ऐसी बातें कह रही थीं, उस समय कामके अधीन हुए दण्डने मदोन्मत्त होकर दोनों हाथ सिरपर जोड़ लिये और इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३ ॥

“सुन्दरी! कृपा करो। समय न बिताओ। वरानने! तुम्हारे लिये मेरे प्राण निकले जा रहे हैं॥ १४ ॥

“तुम्हें प्राप्त कर लेनेपर मेरा वध हो जाय अथवा मुझे अत्यन्त दारुण दुःख प्राप्त हो तो भी को◌्ऽइ चिन्ता नहीं है। भीरु! मैं तुम्हारा भक्त हूँ। अत्यन्त व्याकुल हुए मुझ अपने सेवकको स्वीकार करो”॥ १५ ॥

‘ऐसा कहकर उस बलवान् नरेशने उस भार्गव-कन्याको बलपूर्वक दोनों भुजाओंमें भर लिया। वह उसकी पकड़से छूटनेके लिये छटपटाने लगी तो भी उसने अपनी इच्छाके अनुसार उसके साथ समागम किया॥ १६ ॥

‘वह अत्यन्त दारुण एवं महाभयंकर अनर्थ करके दण्ड तुरंत ही अपने उत्तम नगर मधुमन्तको चला गया॥ १७ ॥

‘अरजा भी भयभीत हो रोती हु◌्ऽइ आश्रमके पास ही अपने देवतुल्य पिताके आनेकी राह देखने लगी’॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८० ॥

इक्यासीवाँ सर्ग

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इक्यासीवाँ सर्ग

शुक्रके शापसे सपरिवार राजा दण्ड और उनके राज्यका नाश

दो घड़ी बाद किसी शिष्यके मुँहसे अरजाके ऊपर किये गये बलात्कारकी बात सुनकर अमित तेजस्वी महर्षि शुक्र भूखसे पीड़ित हो शिष्योंसे घिरे हुए अपने आश्रमको लौट आये॥ १ ॥

उन्होंने देखा, अरजा दुःखी होकर रो रही है। उसके शरीरमें धूल लिपटी हुई है तथा वह प्रातःकाल-राहुग्रस्त चन्द्रमाकी शोभाहीन चाँदनीके समान सुशोभित नहीं हो रही है॥ २ ॥

यह देख विशेषतः भूखसे पीड़ित होनेके कारण देवर्षि शुक्रका रोष बढ़ गया और वे तीनों लोकोंको दग्ध-से करते हुए अपने शिष्योंसे इस प्रकार बोले— ॥

‘देखो, शास्त्रविपरीत आचरण करनेवाले अज्ञानी राजा दण्डको कुपित हुए मेरी ओरसे अग्नि-शिखाके समान कैसे घोर विपत्ति प्राप्त होती है॥ ४ ॥

‘सेवकोंसहित इस दुर्बुद्धि एवं दुरात्मा राजाके विनाशका समय आ गया है, जो प्रज्वलित आगकी दहकती हुई ज्वालाको गले लगाना चाहता है॥ ५ ॥

‘उस दुर्बुद्धिने जब ऐसा घोर पाप किया है, तब इसे उस पापकर्मका फल अवश्य प्राप्त होगा॥ ६ ॥

‘पापकर्मका आचरण करनेवाला वह दुर्बुद्धि नरेश सात रातके भीतर ही पुत्र, सेना और सवारियोंसहित नष्ट हो जायगा॥ ७ ॥

‘खोटे विचारवाले इस राजाके राज्यको जो सब ओरसे सौ योजन लम्बा-चौड़ा है, देवराज इन्द्र, भारी धूलकी वर्षा करके नष्ट कर देंगे॥ ८ ॥

‘यहाँ जो सब प्रकारके स्थावर-जङ्गम जीव निवास करते हैं, इस धूलकी भारी वर्षासे सब ओर विलीन हो जायँगे॥ ९ ॥

‘जहाँतक दण्डका राज्य है, वहाँतकके समस्त चराचर प्राणी सात राततक केवल धूलिकी वर्षा पाकर अदृश्य हो जायँग’॥ १० ॥

ऐसा कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये शुक्रने उस आश्रममें निवास करनेवाले लोगोंसे कहा—‘दण्डके राज्यकी सीमाके अन्तमें जो देश हैं, उनमें जाकर निवास करो’॥ ११ ॥

शुक्राचार्यकी यह बात सुनकर आश्रमवासी मनुष्य उस राज्यसे निकल गये और सीमासे बाहर जाकर निवास करने लगे॥ १२ ॥

आश्रमवासी मुनियोंसे ऐसी बात कहकर शुक्रने अरजासे कहा— ‘खोटी बुद्धिवाली लड़की! तू यहीं इस आश्रममें मनको परमात्माके ध्यानमें एकाग्र करके रह॥ १३ ॥

‘अरजे! यह जो एक योजन फैला हुआ सुन्दर तालाब है, इसका तू निश्चिन्त होकर उपभोग कर और अपने अपराधकी निवृत्तिके लिये यहाँ समयकी प्रतीक्षा करती रह॥ १४ ॥

‘जो जीव उन रात्रियोंमें तुम्हारे समीप रहेंगे, वे कभी भी धूलकी वर्षासे मारे नहीं जायँगे— सदा बने रहेंगे'॥

ब्रह्मर्षिका यह आदेश सुनकर वह भृगुकन्या अरजा अत्यन्त दुःखित होनेपर भी अपने पिता भार्गवसे बोली— ‘बहुत अच्छा'॥ १६ ॥

ऐसा कहकर शुक्रने दूसरे राज्यमें जाकर निवास किया तथा उन ब्रह्मवादीके कथनानुसार राजा दण्डका वह राज्य सेवक, सेना और सवारियोंसहित सात दिनमें भस्म हो गया॥ १७ १/२ ॥

नरेश्वर! विन्ध्य और शैवलगिरिके मध्यभागमें दण्डका राज्य था। काकुत्स्थ! धर्मयुग कृतयुगमें धर्मविरुद्ध आचरण करनेपर उन ब्रह्मर्षिने राजा और उनके देशको शाप दे दिया। तभीसे वह भूभाग दण्डकारण्य कहलाता है॥ १८-१९ ॥

इस स्थानपर तपस्वीलोग आकर बस गये; इसलिये इसका नाम जनस्थान हो गया। रघुनन्दन! आपने जिसके विषयमें मुझसे पूछा था, यह सब मैंने कह सुनाया॥ २० ॥

वीर! अब संध्योपासनाका समय बीता जा रहा है। पुरुषसिंह! सब ओरसे ये सब महर्षि स्नान कर चुकनेके बाद भरे हुए घड़े लेकर सूर्यदेवकी उपासना कर रहे हैं॥ २१ १/२ ॥

श्रीराम! वे सूर्य वहाँ एकत्र हुए उन उत्तम ब्रह्मवेत्ताओंद्वारा पढ़े गये ब्राह्मणमन्त्रोंको सुनकर और उसी रूपमें पूजा पाकर अस्ताचलको चले गये। अब आप भी जायँ और आचमन एवं स्नान आदि करें॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८१ ॥

बयासीवाँ सर्ग

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बयासीवाँ सर्ग

श्रीरामका अगस्त्य-आश्रमसे अयोध्यापुरीको लौटना

ऋषिका यह आदेश पाकर श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना करनेके लिये अप्सराओंसे सेवित उस पवित्र सरोवरके तटपर गये॥ १ ॥

वहाँ आचमन और सायंकालकी संध्योपासना करके श्रीरामने पुनः महात्मा कुम्भजके आश्रममें प्रवेश किया॥ २ ॥

अगस्त्यजीने उनके भोजनके लिये अनेक गुणोंसे युक्त कन्द, मूल, जरावस्थाको निवारण करनेवाली दिव्य ओषधि, पवित्र भात आदि वस्तुएँ अर्पित कीं॥ ३ ॥

नरश्रेष्ठ श्रीराम वह अमृततुल्य स्वादिष्ट भोजन करके परम तृप्त और प्रसन्न हुए तथा वह रात्रि उन्होंने बड़े संतोषसे बितायी॥ ४ ॥

सबेरे उठकर शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलभूषण श्रीराम नित्यकर्म करके वहाँसे जानेकी इच्छासे महर्षिके पास गये॥ ५ ॥

वहाँ महर्षि कुम्भजको प्रणाम करके श्रीरामने कहा— ‘महर्षे! अब मैं अपनी पुरीको जानेके लिये आपकी आज्ञा चाहता हूँ। कृपया मुझे आज्ञा प्रदान करें॥ ६ ॥

‘आप महात्माके दर्शनसे मैं धन्य और अनुगृहीत हुआ। अब अपने-आपको पवित्र करनेके लिये फिर कभी आपके दर्शनकी इच्छासे यहाँ आऊँगा’॥ ७ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार अद्भुत वचन कहनेपर धर्मचक्षु तपोधन अगस्त्यजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे बोले—॥ ८ ॥

‘श्रीराम! आपके ये सुन्दर वचन बड़े अद्भुत हैं। रघुनन्दन! समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाले तो आप ही हैं॥ ९ ॥

‘श्रीराम! जो कोऽइ एक मुहूर्तके लिये भी आपका दर्शन पा जाते हैं, वे पवित्र, स्वर्गके अधिकारी तथा देवताओंके लिये भी पूजनीय हो जाते हैं॥ १० ॥

‘इस भूतलपर जो प्राणी आपको क्रूर दृष्टिसे देखते हैं, वे यमराजके दण्डसे पीटे जाकर तत्काल नरकमें गिरते हैं॥ ११ ॥

‘रघुश्रेष्ठ! ऐसे माहात्म्यशाली आप समस्त देहधारियोंको पवित्र करनेवाले हैं। रघुनन्दन! पृथ्वीपर जो लोग आपकी कथाएँ कहते हैं, वे सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं॥ १२ ॥

‘आप निश्चिन्त होकर कुशलपूर्वक पधारिये। आपके मार्गमें कहींसे कोऽइ भय न रहे। आप धर्मपूर्वक राज्यका शासन करें; क्योंकि आप ही संसारके परम आश्रय हैं’॥ १३ ॥

मुनिके ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् राजा श्रीरामने भुजाएँ ऊपर उठा हाथ जोड़कर उन सत्यशील महर्षिको प्रणाम किया॥ १४ ॥

इस प्रकार मुनिवर अगस्त्य तथा अन्य सब तपोधन ऋषियोंका भी यथोचित अभिवादन कर वे बिना किसी व्यग्रताके उस सुवर्णभूषित पुष्पकविमानपर चढ़ गये॥ १५ ॥

जैसे देवता सहस्रनेत्रधारी इन्द्रकी पूजा करते हैं, उसी प्रकार जाते समय उन महेन्द्रतुल्य तेजस्वी श्रीरामको ऋषि-समूहोंने सब ओरसे आशीर्वाद दिया॥ १६ ॥

उस सुवर्णभूषित पुष्पकविमानपर आकाशमें स्थित हुए श्रीराम वर्षाकालमें मेघोंके समीपवर्ती चन्द्रमाके समान दिखायी देते थे॥ १७ ॥

तदनन्तर जगह-जगह सम्मान पाते हुए वे श्रीरघुनाथजी मध्याह्नके समय अयोध्यामें पहुँचकर मध्यम कक्षा (बीचकी ड्योढ़ी)-में उतरे॥ १८ ॥

तत्पश्चात् इच्छानुसार चलनेवाले उस सुन्दर पुष्पकविमानको वहीं छोड़कर भगवान्ने उससे कहा— ‘अब तुम जाओ। तुम्हारा कल्याण हो’॥ १९ ॥

फिर श्रीरामने ड्योढ़ीके भीतर खड़े हुए द्वारपालसे शीघ्रतापूर्वक कहा— ‘तुम अभी जाकर शीघ्रपराक्रमी भरत और लक्ष्मणको मेरे आनेकी सूचना दो और उन्हें जल्दी बुला लाओ’॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बयासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८२ ॥

तिरासीवाँ सर्ग

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तिरासीवाँ सर्ग

भरतके कहनेसे श्रीरामका राजसूय-यज्ञ करनेके विचारसे निवृत्त होना

क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामका यह कथन सुनकर द्वारपालने कुमार भरत और लक्ष्मणको बुलाकर श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित कर दिया॥ १ ॥

भरत और लक्ष्मणको आया देख रघुकुलतिलक श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और यह बात कही— ॥

‘रघुवंशी राजकुमारो! मैंने ब्राह्मणका वह परम उत्तम कार्य यथावत्रूपसे सिद्ध कर दिया। अब मैं पुनः राजधर्मकी चरम सीमारूप राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करना चाहता हूँ॥ ३ ॥

‘मेरी रायमें धर्मसेतु (राजसूय) अक्षय एवं अविनाशी फल देनेवाला है तथा वह धर्मका पोषक एवं समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ ४ ॥

‘तुम दोनों मेरे आत्मा ही हो, अतः मेरी इच्छा तुम्हारे साथ इस उत्तम राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करनेकी है; क्योंकि उसमें राजाका शाश्वत धर्म प्रतिष्ठित है॥

‘शत्रुओंका संहार करनेवाले मित्रदेवताने उत्तम आहुतिसे युक्त राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञद्वारा परमात्माका यजन करके वरुणका पद प्राप्त किया था॥ ६ ॥

‘धर्मज्ञ सोम देवताने धर्मपूर्वक राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके सम्पूर्ण लोकोंमें कीर्ति तथा शाश्वत स्थानको प्राप्त कर लिया॥ ७ ॥

‘इसलिये आजके दिन मेरे साथ बैठकर तुमलोग यह विचार करो कि हमारे लिये कौन-सा कर्म लोक और परलोकमें कल्याणकारी होगा तथा संयतचित्त होकर तुम दोनों इस विषयमें मुझे सलाह दो’॥ ८ ॥

श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर वाक्यविशारद भरतजीने हाथ जोड़कर यह बात कही— ॥ ९ ॥

‘साधो! अमित पराक्रमी महाबाहो! आपमें उत्तम धर्म प्रतिष्ठित है। यह सारी पृथ्वी भी आपपर ही आधारित है तथा आपमें ही यशकी प्रतिष्ठा है॥ १० ॥

‘देवतालोग जैसे प्रजापति ब्रह्माको ही महात्मा एवं लोकनाथ समझते हैं, उसी प्रकार हमलोग और समस्त भूपाल आपको ही महापुरुष तथा समस्त लोकोंका स्वामी मानते हैं—उसी

दृष्टिसे आपको देखते हैं॥ १२ ॥

‘राजन्! महाबली रघुनन्दन! पुत्र जैसे पिताको देखते हैं, उसी प्रकार आपके प्रति सब राजाओंका भाव है। आप ही समस्त पृथ्वी और सम्पूर्ण प्राणियोंके भी आश्रय हैं॥

‘नरेश्वर! फिर आप ऐसा यज्ञ कैसे कर सकते हैं, जिसमें भूमण्डलके समस्त राजवंशोंका विनाश दिखायी देता है॥ १३ ॥

‘राजन्! पृथ्वीपर जो पुरुषार्थी पुरुष हैं, उन सबका सभीके कोपसे उस यज्ञमें संहार हो जायगा॥ १४ ॥

‘पुरुषसिंह! अतुल पराक्रमी वीर! आपके सद्गुणोंके कारण सारा जगत् आपके वशमें है। आपके लिये इस भूतलके निवासियोंका विनाश करना उचित न होगा'॥ १५ ॥

भरतका यह अमृतमय वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ॥ १६ ॥

उन्होंने कैकेयीनन्दन भरतसे यह शुभ बात कही— ‘निष्पाप भरत! आज तुम्हारी बात सुनकर मैं बहुत प्रसन्न एवं संतुष्ट हुआ हूँ॥ १७ ॥

‘पुरुषसिंह! तुम्हारे मुखसे निकला हुआ यह उदार एवं धर्मसंगत वचन सारी पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला है॥

‘धर्मज्ञ! मेरे हृदयमें राजसूय-यज्ञका संकल्प उठ रहा था; किंतु आज तुम्हारे इस सुन्दर भाषणको सुनकर मैं उस उत्तम यज्ञकी ओरसे अपने मनको हटाये लेता हूँ॥ १९ ॥

‘लक्ष्मणके बड़े भाई! बुद्धिमान् पुरुषोंको ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये जो सम्पूर्ण जगत्को पीड़ा देनेवाला हो। बालकोंकी कही हुई बात भी यदि अच्छी हो तो उसे ग्रहण करना ही उचित है; अतः महाबली वीर! मैंने तुम्हारे उत्तम एवं युक्तिसंगत बातको बड़े ध्यानसे सुना है’॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८३ ॥

चौरासीवाँ सर्ग

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चौरासीवाँ सर्ग

लक्ष्मणका अश्वमेध-यज्ञका प्रस्ताव करते हुए इन्द्र और वृत्रासुरकी कथा सुनाना, वृत्रासुरकी तपस्या और इन्द्रका भगवान् विष्णुसे उसके वधके लिये अनुरोध

श्रीराम और महात्मा भरतके इस प्रकार बातचीत करनेपर लक्ष्मणने रघुकुलनन्दन श्रीरामसे यह शुभ बात कही— ॥ १ ॥

‘रघुनन्दन! अश्वमेध नामक महान् यज्ञ समस्त पापोंको दूर करनेवाला, परमपावन और दुष्कर है। अतः इसका अनुष्ठान आप पसंद करें॥ २ ॥

‘महात्मा इन्द्रके विषयमें यह प्राचीन वृत्तान्त सुननेमें आता है कि इन्द्रको जब ब्रह्महत्या लगी थी, तब वे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान करके ही पवित्र हुए थे॥ ३ ॥

‘महाबाहो! पहलेकी बात है, जब देवता और असुर परस्पर मिलकर रहते थे, उन दिनों वृत्रनामसे प्रसिद्ध एक बहुत बड़ा असुर रहता था। लोकमें उसका बड़ा आदर था॥ ४ ॥

‘वह सौ योजन चौड़ा और तीन सौ योजन ऊँचा था। वह तीनों लोकोंको आत्मीय समझकर प्यार करता था और सबको स्नेहभरी दृष्टिसे देखता था॥ ५ ॥

‘उसे धर्मका यथार्थ ज्ञान था। वह कृतज्ञ और स्थिरप्रज्ञ था तथा पूर्णतः सावधान रहकर धन-धान्यसे भरी-पूरी पृथ्वीका धर्मपूर्वक शासन करता था॥ ६ ॥

‘उसके शासनकालमें पृथ्वी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली थी। यहाँ फल, फूल और मूल सभी सरस होते थे॥ ७ ॥

‘महात्मा वृत्रासुरके राज्यमें यह भूमि बिना जोते-बोये ही अन्न उत्पन्न करती तथा धन-धान्यसे भलीभाँति सम्पन्न रहती थी। इस प्रकार वह असुर समृद्धिशाली एवं अद्भुत राज्यका उपभोग करता था॥ ८ ॥

‘एक समय वृत्रासुरके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं परम उत्तम तप करूँ; क्योंकि तप ही परम कल्याणका साधन है। दूसरा सारा सुख तो मोहमात्र ही है॥ ९ ॥

‘उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र मधुरेश्वरको* राजा बना पुरवासियोंको सौंप दिया और सम्पूर्ण देवताओंको ताप देता हुआ वह कठोर तपस्या करने लगा॥ १० ॥

‘वृत्रासुरके तपस्यामें लग जानेपर इन्द्र बड़े दुःखी-से होकर भगवान् विष्णुके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ ११ ॥

“महाबाहो! तपस्या करते हुए वृत्रासुरने समस्त लोक जीत लिये। वह धर्मात्मा असुर बलवान् हो गया है; अतः अब उसपर मैं शासन नहीं कर सकता॥ १२ ॥

“सुरेश्वर! यदि वह फिर इसी प्रकार तपस्या करता रहा तो जबतक ये तीनों लोक रहेंगे, तबतक हम सब देवताओंको उसके अधीन रहना पड़ेगा॥ १३ ॥

महाबली देवेश्वर! उस परम उदार असुरकी आप उपेक्षा कर रहे हैं (इसीलिये वह शक्तिशाली होता जा रहा है)। यदि आप कुपित हो जायँ तो वह क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता॥ १४ ॥

“विष्णो! जबसे आपके साथ उसका प्रेम हो गया है, तभीसे उसने सम्पूर्ण लोकोंका आधिपत्य प्राप्त कर लिया है॥ १५ ॥

“अतः आप अच्छी तरह ध्यान देकर सम्पूर्ण लोकोंपर कृपा कीजिये। आपके रक्षा करनेसे ही सारा जगत् शान्त एवं नीरोग हो सकता है॥ १६ ॥

“विष्णो! ये सब देवता आपकी ओर देख रहे हैं। वृत्रासुरका वध एक महान् कार्य है। उसे करके आप उन देवताओंका उपकार कीजिये॥ १७ ॥

“प्रभो! आपने सदा ही इन महात्मा देवताओंकी सहायता की है। यह असुर दूसरोंके लिये अजेय है; अतः आप हम निराश्रित देवताओंके आश्रयदाता हों’॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८४ ॥


* मधुरेश्वरका अर्थ तिलककारने मधुर नामक राजा किया है। रामायणशिरोमणिकारने मधुर वक्ताओंका ˚ईश्वर किया है तथा रामायणभूषणकारने मधुर—सौम्य स्वभावका राजा अथवा मधुरा नगरीका स्वामी किया है। ११५६ *श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण*