श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
इस प्रकार मारा जाकर कवच, सिर और शिरस्त्राणसहित रावणकुमार धराशायी हो गया। उसका धनुष दूर जा गिरा॥ ७३ ॥
जैसे वृत्रासुरका वध होनेपर देवता प्रसन्न हुए थे, उसी प्रकार इन्द्रजित्के मारे जानेपर विभीषणसहित समस्त वानर हर्षसे भर गये और जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे॥
आकाशमें देवताओं, महात्मा ऋषियों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंका भी विजयजनित हर्षनाद गूँज उठा॥ ७५ ॥
इन्द्रजित्को धराशायी हुआ जान राक्षसोंकी वह विशाल सेना विजयसे उल्लसित हुए वानरोंकी मार खाकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगी॥ ७६ ॥
वानरोंद्वारा मारे जाते हुए राक्षस अपनी सुध-बुध खो बैठे और अस्त्र-शस्त्रोंको छोड़कर तेजीसे भागते हुए लङ्काकी ओर चले गये॥ ७७ ॥
राक्षस बहुत डर गये थे; इसलिये वे सब-के-सब पट्टिश, खड्ग और फरसे आदि शस्त्रोंको त्यागकर सैकड़ोंकी संख्यामें एक साथ ही सब दिशाओंमें भागने लगे॥ ७८ ॥
वानरोंसे पीड़ित होकर कोई डरके मारे लङ्कामें घुस गये, कोई समुद्रमें कूद पड़े और कोई-कोई पर्वतकी चोटीपर चढ़ गये॥ ७९ ॥
इन्द्रजित् मारा गया और रणभूमिमें सो रहा है, यह देख हजारों राक्षसोंमेंसे एक भी वहाँ खड़ा नहीं दिखायी दिया॥ ८० ॥
जैसे सूर्यके अस्त हो जानेपर उसकी किरणें यहाँ नहीं ठहरती हैं, उसी प्रकार इन्द्रजित्के धराशायी होनेपर वे राक्षस वहाँ रुक न सके, सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये॥ ८१ ॥
महाबाहु इन्द्रजित् निष्प्राण हो जानेपर शान्त किरणोंवाले सूर्य अथवा बुझी हुई आगके समान निस्तेज हो गया॥ ८२ ॥
उस समय राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्के समरभूमिमें गिर जानेपर सारे संसारकी अधिकांश पीड़ा नष्ट हो गयी। सबका शत्रु मारा गया और सभी हर्षसे भर गये॥
उस पापकर्मा राक्षसके मारे जानेपर सम्पूर्ण महर्षियोंके साथ भगवान् इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई॥
आकाशमें नाचती हुई अप्सराओं और गाते हुए महामना गन्धर्वोंके नृत्य और गानकी ध्वनिके साथ देवताओंकी दुन्दुभिका शब्द भी सुनायी देने लगा॥ ८५ ॥
देवता आदि वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे। वह दृश्य अद्भुत-सा प्रतीत हुआ। उस क्रूरकर्मा राक्षसके मारे जानेपर वहाँकी उड़ती हुई धूल शान्त हो गयी॥ ८६ ॥
सम्पूर्ण लोकोंको भय देनेवाले इन्द्रजित्के धराशायी होनेपर जल स्वच्छ हो गया, आकाश भी निर्मल दिखायी देने लगा और देवता तथा दानव हर्षसे खिल उठे। देवता, गन्धर्व और दानव वहाँ आये और सब एक साथ संतुष्ट होकर बोले—अब ब्राह्मणलोग निश्चिन्त एवं क्लेशशून्य होकर सर्वत्र विचरें॥ ८७-८८ ॥
समराङ्गणमें अप्रतिम बलशाली निशाचरशिरोमणि इन्द्रजित्को मारा गया देख हर्षसे भरे हुए वानर-यूथपति लक्ष्मणका अभिनन्दन करने लगे॥ ८९ ॥
विभीषण, हनुमान् और रीछ-यूथपति जाम्बवान्— ये इस विजयके लिये लक्ष्मणजीका अभिनन्दन करते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ ९० ॥
हर्ष एवं रक्षाका अवसर पाकर वानर किलकिलाते, कूदते और गर्जते हुए वहाँ रघुकुलनन्दन लक्ष्मणको घेरकर खड़े हो गये॥ ९१ ॥
उस समय अपनी पूँछोंको हिलाते और फटकारते हुए वानर वीर ‘लक्ष्मणकी जय हो’ यह नारा लगाने लगे॥ ९२ ॥
वानरोंका चित्त हर्षसे भरा हुआ था। वे विविध गुणोंवाले वानर एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर श्रीरामचन्द्रजीसे सम्बन्ध रखनेवाली कथाएँ कहने लगे॥ ९३ ॥
युद्धस्थलमें लक्ष्मणके प्रिय सुहृद् वानर उनका वह दुष्कर एवं महान् पराक्रम देख बड़े प्रसन्न हुए। देवता भी उस इन्द्रद्रोही राक्षसका वध हुआ देख मनमें बड़े भारी हर्षका अनुभव करने लगे॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
९० ॥
* पहले लक्ष्मणके कवचके टूटनेका वर्णन आ चुका है। उसके बाद लक्ष्मणने फिर अभेद्य कवच धारण किया था। यह इस प्रसंगसे जाना जाता है।
इक्यानबेवाँ सर्ग
इक्यानबेवाँ सर्ग
लक्ष्मण और विभीषण आदिका श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर इन्द्रजित्के वधका समाचार सुनाना, प्रसन्न हुए श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर उनकी प्रशंसा तथा सुषेणद्वारा लक्ष्मण आदिकी चिकित्सा
संग्रामभूमिमें शत्रुविजयी इन्द्रजित्का वध करके रक्तसे भीगे हुए शरीरवाले शुभलक्षण लक्ष्मण बहुत प्रसन्न हुए॥ १ ॥
बल-विक्रमसे सम्पन्न वे महातेजस्वी सुमित्राकुमार जाम्बवान् और हनुमान्जीसे दौड़कर मिले और उन समस्त वानरोंको साथ ले शीघ्रतापूर्वक उस स्थानपर आये, जहाँ वानरराज सुग्रीव और भगवान् श्रीराम विद्यमान थे। उस समय लक्ष्मण विभीषण और हनुमान्जीका सहारा लेकर चल रहे थे॥ २-३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके सामने आकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके सुमित्राकुमार अपने उन ज्येष्ठ भ्राताके पास उसी तरह खड़े हो गये, जैसे इन्द्रके पास उपेन्द्र (वामनरूपधारी श्रीहरि) खड़े होते हैं॥ ४ ॥
उस समय वीर विभीषण प्रसन्नतापूर्वक लौटनेके द्वारा ही शत्रुके मारे जानेकी बात सूचित-सी करते हुए आये और महात्मा श्रीरघुनाथजीसे बोले— ‘प्रभो! इन्द्रजित्के वधका भयंकर कार्य सम्पन्न हो गया’॥ ५ ॥
विभीषणने बड़े हर्षके साथ श्रीरामसे यह निवेदन किया कि महात्मा लक्ष्मणने ही रावणकुमार इन्द्रजित्का मस्तक काटा है॥ ६ ॥
‘लक्ष्मणके द्वारा इन्द्रजित्का वध हुआ है’ यह समाचार सुनते ही महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ और वे इस प्रकार बोले— ॥ ७ ॥
‘शाबाश! लक्ष्मण! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। आज तुमने बड़ा दुष्कर पराक्रम किया। रावणपुत्र इन्द्रजित्के मारे जानेसे तुम यह निश्चित समझ लो कि अब हमलोग युद्धमें जीत गये’॥ ८ ॥
यशकी वृद्धि करनेवाले लक्ष्मण (उस समय अपनी प्रशंसा सुनकर) लजा रहे थे; किंतु पराक्रमी श्रीरामने उन्हें बलपूर्वक खींचकर गोदमें ले लिया और बड़े स्नेहसे उनका मस्तक सूँघा।
शस्त्रोंके आघातसे पीड़ित हुए स्नेही बन्धु लक्ष्मणको गोदमें बिठाकर और हृदयसे लगाकर वे बड़े प्यारसे उनकी ओर बारम्बार देखने लगे॥ ९-१० ॥
लक्ष्मण अपने शरीरमें धँसे हुए बाणोंके द्वारा अत्यन्त पीड़ित थे। उनके अङ्गोंमें जगह-जगह घाव हो गया था। वे बारम्बार लम्बी साँस खींचते थे, आघातजनित क्लेशसे संतप्त हो रहे थे तथा उन्हें साँस लेनेमें भी पीड़ा होती थी। उस अवस्थामें पुरुषोत्तम श्रीरामने स्नेहसे उनका मस्तक सूँघकर पीड़ा दूर करनेके लिये पुनः जल्दी-जल्दी उनके शरीरपर हाथ फेरा और आश्वासन देकर लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा— ॥ ११-१२ ॥
‘वीर! तुमने अपने दुष्कर पराक्रमसे परम कल्याणकारी कार्य सम्पन्न किया है। आज बेटेके मारे जानेपर युद्धस्थलमें रावणको भी मैं मारा गया ही मानता हूँ। उस दुरात्मा शत्रुओका वध हो जानेसे आज मैं वास्तवमें विजयी हो गया। सौभाग्यकी बात है कि तुमने रणभूमिमें इन्द्रजित्का वध करके निर्दयी निशाचर रावणकी दाहिनी बाँह ही काट डाली; क्योंकि वही उसका सबसे बड़ा सहारा था॥ १३-१४ १/२ ॥
‘विभीषण और हनुमान्ने भी समरभूमिमें महान् पराक्रम कर दिखाया है। तुम सब लोगोंने मिलकर तीन दिन और तीन रातमें किसी तरह उस वीर राक्षसको मार गिराया तथा मुझे शत्रुहीन बना दिया। अब रावण ही युद्धके लिये निकलेगा॥ १५-१६ ॥
‘महान् सैन्य-समुदायसहित पुत्रको मारा गया सुनकर रावण विशाल सेना साथ लेकर युद्धके लिये आयेगा॥
‘पुत्रके वधसे संतप्त होकर निकले हुए उस दुर्जय राक्षसराज रावणको मैं अपनी बड़ी भारी सेनाके द्वारा घेरकर मार डालूँगा॥ १८ ॥
‘लक्ष्मण! इन्द्रजित् इन्द्रको भी जीत चुका था। जब उसे भी तुमने युद्धभूमिमें मार गिराया; तब तुम-जैसे रक्षक और सहायकके होते हुए मुझे सीता और भूमण्डलके राज्यको प्राप्त करनेमें कोऽइ कठिनाऽइ नहीं होगी’॥ १९ ॥
इस प्रकार भाऽइको आश्वासन देकर रघुकुलनन्दन श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रसन्नतापूर्वक सुषेणको बुलाकर कहा— ॥ २० ॥
‘परम बुद्धिमान् सुषेण! तुम शीघ्र ही ऐसा उपचार करो जिससे ये मित्रवत्सल सुमित्राकुमार पूर्णतः स्वस्थ हो जायँ और इनके शरीरसे बाण निकलकर घाव भरनेके साथ ही सारी पीड़ा दूर हो जाय॥ २१ ॥
‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विभीषण दोनोंके शरीरसे तुम शीघ्र ही बाण निकाल दो और घाव अच्छा कर दो। वृक्षोंद्वारा युद्ध करनेवाले जो शूरवीर रीछ तथा वानर सैनिक हैं, उनमें भी जो दूसरे-दूसरे लोग बाणोंसे बिंधे हुए और घायल होकर युद्ध कर रहे हैं, उन सभीको तुम प्रयत्न करके सुखी एवं स्वस्थ कर दो’॥
महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वानरयूथ पति सुषेणने लक्ष्मणकी नाकमें एक बहुत ही उत्तम ओषधि लगा दी॥ २४ ॥
उसकी गन्ध सूँघते ही लक्ष्मणके शरीरसे बाण निकल गये और उनकी सारी पीड़ा दूर हो गयी। उनके शरीरमें जितने भी घाव थे, सब भर गये॥ २५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे सुषेणने विभीषण आदि सुहृदों तथा समस्त वानरशिरोमणियोंकी तत्काल चिकित्सा की॥ २६ ॥
फिर तो क्षणभरमें बाण निकल जाने और पीड़ा दूर हो जानेसे सुमित्राकुमार स्वस्थ एवं नीरोग हो हर्षका अनुभव करने लगे॥ २७ ॥
उस समय भगवान् श्रीराम, वानरराज सुग्रीव, विभीषण तथा पराक्रमी ऋक्षराज जाम्बवान् लक्ष्मणको नीरोग होकर खड़ा हुआ देख सेनासहित बड़े प्रसन्न हुए॥ २८ ॥
दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामने लक्ष्मणके उस अत्यन्त दुष्कर पराक्रमकी पुनः भूरि-भूरि प्रशंसा की। इन्द्रजित् युद्धमें मार गिराया गया, यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको भी बड़ी प्रसन्नता हुई॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इक्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९१ ॥
बानबेवाँ सर्ग
बानबेवाँ सर्ग
रावणका शोक तथा सुपार्श्वके समझानेसे उसका सीता-वधसे निवृत्त होना
रावणके मन्त्रियोंने जब इन्द्रजित्के वधका समाचार सुना, तब उन्होंने स्वयं भी प्रत्यक्ष देखकर इसका निश्चय कर लेनेके बाद तुरंत जाकर दशमुख रावणसे सारा हाल कह सुनाया॥ १ ॥
वे बोले—‘महाराज! युद्धमें विभीषणकी सहायता पाकर लक्ष्मणने आपके महातेजस्वी पुत्रको हमारे सैनिकोंके देखते-देखते मार डाला॥ २ ॥
‘जिसने देवताओंके राजा इन्द्रको भी परास्त किया था और पहलेके युद्धोंमें जिसकी कभी पराजय नहीं हुई थी, वही आपका शूरवीर पुत्र इन्द्रजित् शौर्यसम्पन्न लक्ष्मणके साथ भिड़कर उनके द्वारा मारा गया। वह अपने बाणोंद्वारा लक्ष्मणको पूर्णतः तृप्त करके उत्तम लोकोंमें गया’॥ ३ १/२ ॥
युद्धमें अपने पुत्र इन्द्रजित्के भयानक वधका घोर एवं दारुण समाचार सुननेपर रावणको बड़ी भारी मूर्च्छाने घेर दबाया॥ ४ १/२ ॥
फिर दीर्घकालके बाद होशमें आकर राक्षसप्रवर राजा रावण पुत्रशोकसे व्याकुल हो गया। उसकी सारी इन्द्रियाँ अकुला उठीं और वह दीनतापूर्वक विलाप करने लगा—॥ ५ १/२ ॥
‘हा पुत्र! हा राक्षस-सेनाके महाबली कर्णधार! तुम तो पहले इन्द्रपर भी विजय पा चुके थे; फिर आज लक्ष्मणके वशमें कैसे पड़ गये?॥ ६ १/२ ॥
‘बेटा! तुम तो कुपित होनेपर अपने बाणोंसे काल और अन्तकको भी विदीर्ण कर सकते थे, मन्दराचलके शिखरोंको भी तोड़-फोड़ सकते थे; फिर युद्धमें लक्ष्मणको मार गिराना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात थी?॥ ७ १/२ ॥
‘महाबाहो! आज सूर्यके पुत्र प्रेतराज यमका महत्त्व मुझे अधिक जान पड़ने लगा है, जिन्होंने तुम्हें भी कालधर्मसे संयुक्त कर दिया॥ ८ १/२ ॥
‘समस्त देवताओंमें भी अच्छे योद्धाओंका यही मार्ग है। जो अपने स्वामीके लिये युद्धमें मारा जाता है, वह पुरुष स्वर्गलोकमें जाता है॥ ९ ॥
‘आज समस्त देवता, लोकपाल तथा महर्षि इन्द्रजित्का मारा जाना सुनकर निडर हो सुखकी नींद सो सकेंगे॥ १०॥
‘आज तीनों लोक और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी भी अकेले इन्द्रजित्के न होनेसे मुझे सूनी-सी दिखायी देती है॥ ११॥
‘जैसे गजराजके मारे जानेपर पर्वतकी कन्दरामें हथिनियोंका आर्तनाद सुनायी पड़ता है, उसी प्रकार आज अन्तःपुरमें मुझे राक्षस-कन्याओंका करुण-क्रन्दन सुनना पड़ेगा॥ १२॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले पुत्र! आज अपने युवराजपदको, लङ्कापुरीको, समस्त राक्षसोंको, अपनी माँको, मुझको और अपनी पत्नियोंको—हम सब लोगोंको छोड़कर तुम कहाँ चले गये?॥ १३॥
‘वीर! होना तो यह चाहिये था कि मैं पहले यमलोकमें जाता और तुम यहाँ रहकर मेरे प्रेतकार्य करते; परंतु तुम विपरीत अवस्थामें स्थित हो गये (तुम परलोकवासी हुए और मुझे तुम्हारा प्रेतकार्य करना पड़ेगा)॥ १४॥
‘हाय! राम, लक्ष्मण और सुग्रीव अभी जीवित हैं; ऐसी अवस्थामें मेरे हृदयका काँटा निकाले बिना ही तुम हमें छोड़कर कहाँ चले गये?’॥ १५॥
इस प्रकार आर्तभावसे विलाप करते हुए राक्षसराज रावणके हृदयमें अपने पुत्रके वधका स्मरण करके महान् क्रोधका आवेश हुआ॥ १६॥
एक तो वह स्वभावसे ही क्रोधी था। दूसरे पुत्रकी चिन्ताओंने उसे उत्तेजित कर दिया—जलते हुएको और भी जला दिया। जैसे सूर्यकी किरणें ग्रीष्म ऋतुमें उसे अधिक प्रचण्ड बना देती हैं॥ १७॥
ललाटमें टेढ़ी भौंहोंके कारण वह उसी तरह शोभा पाता था, जैसे प्रलयकालमें मगरों और बड़ी-बड़ी लहरोंसे महासागर सुशोभित होता है॥ १८॥
जैसे वृत्रासुरके मुखसे धूमसहित अग्नि प्रकट हुई थी, उसी तरह रोषसे जँभाई लेते हुए रावणके मुखसे प्रकटरूपमें धूमयुक्त प्रज्वलित अग्नि निकलने लगी॥ १९॥
अपने पुत्रके वधसे संतप्त हुआ शूरवीर रावण सहसा क्रोधके वशीभूत हो गया। उसने बुद्धिसे सोचविचार कर विदेहकुमारी सीताको मार डालना ही अच्छा समझा॥ २०॥
रावणकी आँखें एक तो स्वभावसे ही लाल थीं। दूसरे क्रोधाग्निने उन्हें और भी रक्तवर्णकी बना दिया था। अतः उसके वे दीप्तिमान् नेत्र महान् घोर प्रतीत होते थे॥ २१ ॥
रावणका रूप स्वभावसे ही भयंकर था। उसपर क्रोधाग्निका प्रभाव पड़नेसे वह और भी भयानक हो चला और कुपित हुए रुद्रके समान दुर्जय प्रतीत होने लगा॥ २२ ॥
क्रोधसे भरे हुए उस निशाचरके नेत्रोंसे आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं, मानो जलते हुए दीपकोंसे लौके साथ ही तेलके बिंदु झड़ रहे हों॥ २३ ॥
वह दाँत पीसने लगा। उस समय उसके दाँतोंके कटकटानेका जो शब्द सुनायी देता था, वह समुद्र-मन्थनके समय दानवोंद्वारा खींचे जाते हुए मन्थनयन्त्रस्वरूप मन्दराचलकी ध्वनिके समान जान पड़ता था॥
कालाग्निके समान अत्यन्त कुपित हो वह जिस-जिस दिशाकी ओर दृष्टि डालता था, उस-उस दिशामें खड़े हुए राक्षस भयभीत हो खम्भे आदिकी ओटमें छिप जाते थे॥ २५ ॥
चराचर प्राणियोंको ग्रस लेनेकी इच्छावाले कुपित कालके समान सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए रावणके पास राक्षस नहीं जाते थे—उसके निकट जानेका साहस नहीं करते थे॥ २६ ॥
तब अत्यन्त कुपित हुआ राक्षसराज रावण युद्धमें राक्षसोंको स्थापित करनेकी इच्छासे उनके बीचमें खड़ा होकर बोला— ॥ २७ ॥
‘निशाचरो! मैंने सहस्रों वर्षोंतक कठोर तपस्या करके विभिन्न तपस्याओंकी समाप्तिपर स्वयम्भू ब्रह्माजीको संतुष्ट किया है॥ २८ ॥
‘उसी तपस्याके फलसे और ब्रह्माजीकी कृपासे मुझे देवताओं और असुरोंकी ओरसे कभी भय नहीं है॥
‘मेरे पास ब्रह्माजीका दिया हुआ कवच है, जो सूर्यके समान दमकता रहता है। देवताओं और असुरोंके साथ घटित हुए मेरे संग्रामके अवसरोंपर वह वज्रके प्रहारसे भी टूट नहीं सका है॥ ३० ॥
‘इसलिये यदि आज मैं युद्धके लिये तैयार हो रथपर बैठकर रणभूमिमें खड़ा होऊँ तो कौन मेरा सामना कर सकता है ? साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो, वह भी मुझसे युद्ध करनेका साहस नहीं कर सकता॥ ३१ ॥
‘उन दिनों देवासुर-संग्राममें प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने मुझे जो बाणसहित विशाल धनुष प्रदान किया था, आज मेरे उसी भयानक धनुषको सैकड़ों मङ्गल-वाद्योंकी ध्वनिके साथ महासमरमें राम और लक्ष्मणका वध करनेके लिये ही उठाया जाय॥ ३२-३३॥
पुत्रके वधसे संतप्त हो क्रोधके वशीभूत हुए क्रूर रावणने अपनी बुद्धिसे सोच-विचारकर सीताको मार डालनेका ही निश्चय किया॥ ३४॥
उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और आकृति अत्यन्त भयानक दिखायी देने लगी। वह सब ओर दृष्टि डालकर पुत्रके लिये दुःखी हो दीनतापूर्ण स्वरवाले सम्पूर्ण निशाचरोंसे बोला—॥ ३५॥
‘मेरे बेटेने मायासे केवल वानरोंको चकमा देनेके लिये एक आकृतिको ‘यह सीता है’ ऐसा कहकर दिखाया और झूठे ही उसका वध किया था॥ ३६॥
‘सो आज उस झूठको मैं सत्य ही कर दिखाऊँगा और ऐसा करके अपना प्रिय करूँगा। उस क्षत्रियाधम राममें अनुराग रखनेवाली सीताका नाश कर डालूँगा’॥
मन्त्रियोंसे ऐसा कहकर उसने शीघ्र ही तलवार हाथमें ले ली, जो खड्गोचित गुणोंसे युक्त और आकाशके समान निर्मल कान्तिवाली थी। उसे म्यानसे निकालकर पत्नी और मन्त्रियोंसे घिरा हुआ रावण बड़े वेगसे आगे बढ़ा। पुत्रके शोकसे उसकी चेतना अत्यन्त आकुल हो रही थी॥ ३८-३९॥
वह अत्यन्त कुपित हो तलवार लेकर सहसा उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ मिथिलेशकुमारी सीता मौजूद थीं। उधर जाते हुए उस राक्षसको देखकर उसके मन्त्री सिंहनाद करने लगे॥ ४०॥
वे रावणको रोषसे भरा देख एक-दूसरेका आलिङ्गन करके बोले—‘आज इसे देखकर वे दोनों भार्इ राम और लक्ष्मण व्यथित हो उठेंगे॥ ४१॥
‘क्योंकि कुपित होनेपर इस राक्षसराजने इन्द्र आदि चारों लोकपालोंको जीत लिया और दूसरे बहुत-से शत्रुओंको भी युद्धमें मार गिराया था॥ ४२॥
‘तीनों लोकोंमें जो रत्नभूत पदार्थ हैं, उन सबको लाकर रावण भोग रहा है। भूमण्डलमें इसके समान पराक्रमी और बलवान् दूसरा कोर्इ नहीं है’॥ ४३॥
वे इस प्रकार बातचीत कर ही रहे थे कि क्रोधसे अचेत-सा हुआ रावण अशोक-वाटिकामें बैठी हुई विदेहकुमारी सीताका वध करनेके लिये दौड़ा॥ ४४ ॥
उसके हितका विचार करनेवाले सुहृद् उस रोषभरे रावणको रोकनेकी चेष्टा कर रहे थे; तो भी वह अत्यन्त कुपित हो जैसे आकाशमें कोई क्रूर ग्रह रोहिणी नामक नक्षत्रपर आक्रमण करता हो, उसी प्रकार सीताकी ओर दौड़ा॥ ४५ ॥
उस समय सतीसाध्वी सीता राक्षसियोंके संरक्षणमें थीं। उन्होंने देखा, क्रोधसे भरा हुआ राक्षस एक बहुत बड़ी तलवार लिये मुझे मारनेके लिये आ रहा है। यद्यपि उसके सुहृद् उसे बारम्बार रोक रहे हैं तो भी वह लौट नहीं रहा है। इस तरह तलवार ले रावणको आते देख जनकनन्दिनीके मनमें बड़ी व्यथा हुई॥ ४६-४७ ॥
सीता दुःखमें डूब गयीं और विलाप करती हुई इस प्रकार बोलीं— ‘यह दुर्बुद्धि राक्षस जिस तरह कुपित हो स्वयं मेरी ओर दौड़ा आ रहा है, इससे जान पड़ता है, यह सनाथा होनेपर भी मुझे अनाथाकी भाँति मार डालेगा॥ ४८ १/२ ॥
‘मैं अपने पतिमें अनुराग रखती हूँ तो भी इसने अनेक बार प्रेरित किया कि ‘तुम मेरी भार्या बन जाओ।’ उस समय निश्चय ही मैंने इसे ठुकरा दिया था॥
‘मेरे इस तरह ठुकरानेपर निश्चय ही यह निराश हो क्रोध और मोहके वशीभूत हो गया है और अवश्य ही मुझे मार डालनेके लिये उद्यत है॥ ५० १/२ ॥
‘अथवा इस नीचने आज समराङ्गणमें मेरे ही कारण दोनों भाई पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणको मार गिराया है॥ ५१ १/२ ॥
‘क्योंकि इस समय मैंने राक्षसोंका बड़ा भयंकर सिंहनाद सुना है। हर्षसे भरे हुए बहुत-से निशाचर अपने प्रियजनोंको पुकार रहे थे॥ ५२ १/२ ॥
‘अहो! यदि मेरे कारण उन राजकुमारोंका विनाश हुआ तो मेरे जीवनको धिक्कार है अथवा यह भी सम्भव है कि पापपूर्ण विचार रखनेवाला यह भयंकर राक्षस पुत्रशोकसे संतप्त हो श्रीराम और लक्ष्मणको न मार सकनेके कारण मेरा ही वध कर डाले॥ ५३-५४ ॥
‘मुझ क्षुद्र (मूर्ख) नारीने हनुमान्की कही हुई वह बात नहीं मानी। यदि श्रीरामद्वारा जीती न जानेपर भी उस समय हनुमान्की पीठपर बैठकर चली गयी होती तो पतिके अङ्कमें स्थान पाकर आज इस तरह बारम्बार शोक नहीं करती॥ ५५ १/२ ॥
‘मेरी सास कौसल्या एक ही बेटेकी माँ हैं। यदि वे युद्धमें अपने पुत्रके विनाशका समाचार सुनेंगी तो मैं समझती हूँ कि उनका हृदय अवश्य फट जायगा॥ ५६ १/२ ॥
‘वे रोती हुई अपने महात्मा पुत्रके जन्म, बाल्यावस्था, युवावस्था, धर्म-कर्म तथा रूपका स्मरण करेंगी॥ ५७ १/२ ॥
‘अपने पुत्रके मारे जानेपर पुत्र-दर्शनसे निराश एवं अचेत-सी हो वे उनका श्राद्ध करके निश्चय ही जलती आगमें समा जायँगी अथवा सरयूकी जलधारामें आत्मविसर्जन कर देंगी॥ ५८ १/२ ॥
‘पापपूर्ण विचारवाली उस दुष्टा कुबड़ी मन्थराको धिक्कार है, जिसके कारण मेरी सास कौसल्याको यह पुत्रका शोक देखना पड़ेगा’॥ ५९ १/२ ॥
चन्द्रमासे बिछुड़कर किसी क्रूर ग्रहके वशमें पड़ी हुई रोहिणीकी भाँति तपस्विनी सीताको इस प्रकार विलाप करती देख रावणके सुशील एवं शुद्ध आचारविचार वाले सुपार्श्व नामक बुद्धिमान् मन्त्रीने दूसरे सचिवोंके मना करनेपर भी उस समय राक्षसराज रावणसे यह बात कही— ॥ ६०–६२ ॥
‘महाराज दशग्रीव! तुम तो साक्षात् कुबेरके भाई हो; फिर क्रोधके कारण धर्मको तिलाञ्जलि दे विदेहकुमारीके वधकी इच्छा कैसे कर रहे हो?॥ ६३ ॥
‘वीर राक्षसराज! तुम विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए वेदविद्याका अध्ययन पूरा करके गुरुकुलसे स्नातक होकर निकले थे और तबसे सदा अपने कर्तव्यके पालनमें लगे रहे तो भी आज अपने हाथसे एक स्त्रीका वध करना तुम कैसे ठीक समझते हो?॥ ६४ ॥
‘पृथ्वीनाथ! इस मिथिलेशकुमारीके दिव्य रूपकी ओर देखो (देखकर इसके ऊपर दया करो) और युद्धमें हमलोगोंके साथ चलकर रामपर ही अपना क्रोध उतारो॥
‘आज कृष्णपक्षकी चतुर्दशी है। अतः आज ही युद्धकी तैयारी करके कल अमावास्याके दिन सेनाके साथ विजयके लिये प्रस्थान करो॥ ६६ ॥
‘तुम शूरवीर, बुद्धिमान् और रथी वीर हो। एक श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो खड्ग हाथमें लेकर युद्ध करो। दशरथनन्दन रामका वध करके तुम मिथिलेशकुमारी सीताको प्राप्त कर लोगे’॥ ६७ ॥
मित्रके कहे हुए उस उत्तम धर्मानुकूल वचनको स्वीकार करके बलवान् दुरात्मा रावण महलमें लौट गया और वहाँसे फिर अपने सुहृदोंके साथ उसने राजसभामें प्रवेश किया॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९२ ॥
तिरानबेवाँ सर्ग
तिरानबेवाँ सर्ग
श्रीरामद्वारा राक्षससेनाका संहार
सभामें पहुँचकर राक्षसराज रावण अत्यन्त दुःखी एवं दीन हो श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठा और कुपित सिंहकी भाँति लम्बी साँस लेने लगा॥ १ ॥
वह महाबली रावण पुत्रशोकसे पीड़ित हो रहा था; अतः अपनी सेनाके प्रधान-प्रधान योद्धाओंसे हाथ जोड़कर बोला— ॥ २ ॥
‘वीरो! तुम सब लोग समस्त हाथी, घोड़े, रथसमुदाय तथा पैदल सैनिकोंसे घिरकर उन सबसे सुशोभित होते हुए नगरसे बाहर निकलो और समरभूमिमें एकमात्र रामको चारों ओरसे घेरकर मार डालो। जैसे वर्षाकालमें बादल जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार तुमलोग भी बाणोंकी वृष्टि करते हुए रामको मार डालनेका प्रयत्न करो॥ ३-४ ॥
‘अथवा मैं ही कल महासमरमें तुम्हारे साथ रहकर अपने तीखे बाणोंसे रामके शरीरको छिन्न-भिन्न करके सब लोगोंके देखते-देखते उन्हें मार डालूँगा'॥ ५ ॥
राक्षसराजकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके वे निशाचर शीघ्रगामी रथों तथा नाना प्रकारकी सेनाओंसे युक्त हो लङ्कासे निकले॥ ६ ॥
वे सब राक्षस वानरोंपर परिघ, पट्टिश, बाण, तलवार तथा फरसे आदि शरीरनाशक अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करने लगे। इसी प्रकार वानर भी राक्षसोंपर वृक्षों और पत्थरोंकी वर्षा करने लगे॥ ७ १/२ ॥
सूर्योदयके समय राक्षसों और वानरोंके उस तुमुल युद्धने महाभयंकर रूप धारण किया॥ ८ १/२ ॥
वानर और राक्षस उस युद्धभूमिमें विचित्र गदाओं, भालों, तलवारों और फरसोंसे एक-दूसरेको मारने लगे॥
इस प्रकार युद्ध छिड़ जानेपर जो बहुत बड़ी धूलराशि उड़ रही थी, वह राक्षसों और वानरोंके रक्तका प्रवाह जारी होनेसे शान्त हो गयी। यह एक अद्भुत बात थी॥ १० १/२ ॥
रणभूमिमें खूनकी कितनी ही नदियाँ बह चलीं, जो काष्ठसमूहकी भाँति शरीरसमुदायको ही बहाये लिये जाती थीं। गिरे हुए हाथी और रथ उन नदियोंके किनारे जान पड़ते थे। बाण मत्स्यके
समान प्रतीत होते थे और ऊँचे-ऊँचे ध्वज ही उनके तटवर्ती वृक्ष थे॥ ११ १/२ ॥
समस्त वानर खूनसे लथपथ हो रहे थे। वे कूद-कूदकर समराङ्गणमें राक्षसोंके ध्वज, कवच, रथ, घोड़े और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका विनाश करने लगे॥
वानर अपने तीखे दाँतों और नखोंसे निशाचरोंके केश, कान, ललाट और नाक कुतर डालते थे॥ १४ ॥
जैसे फलवाले वृक्षकी ओर सैकड़ों पक्षी दौड़े जाते हैं, उसी प्रकार एक-एक राक्षसपर सौ-सौ वानर टूट पड़े॥ १५ ॥
उस समय पर्वताकार राक्षस भी भारी गदाओं, भालों, तलवारों और फरसोंसे भयंकर वानरोंको मारने लगे॥ १६ ॥
राक्षसोंद्वारा मारी जाती हुई वानरोंकी वह विशाल सेना शरणागतवत्सल दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामकी शरणमें गयी॥ १७ ॥
तब बल-विक्रमशाली महातेजस्वी श्रीरामने धनुष ले राक्षसोंकी सेनामें प्रवेश करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ १८ ॥
जैसे आकाशमें बादल तपते हुए सूर्यपर आक्रमण नहीं कर सकते, उसी प्रकार सेनामें प्रवेश करके अपने बाणरूपी अग्निसे राक्षससेनाको दग्ध करते हुए श्रीरामपर वे महाक्रूर निशाचर धावा न कर सके॥ १९ ॥
निशाचर रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा किये गये अत्यन्त घोर एवं दुष्कर कर्मोंको ही देख पाते थे, उनके स्वरूपको नहीं॥ २० ॥
जैसे वनमें चलती हुई हवा बड़े-बड़े वृक्षोंको हिलाती और तोड़ डालती है तो भी वह देखनेमें नहीं आती, उसी प्रकार भगवान् श्रीराम निशाचरोंकी विशाल सेनाको विचलित करते और कितने ही महारथियोंकी धज्जियाँ उड़ा देते थे तो भी वे राक्षस उन्हें देख नहीं पाते थे॥
वे अपनी सेनाको श्रीरामके द्वारा बाणोंसे छिन्नभिन्न, दग्ध, भग्न और पीड़ित होती हुई देखते थे; किंतु शीघ्रतापूर्वक युद्ध करनेवाले श्रीराम उनकी दृष्टिमें नहीं आते थे॥ २२ ॥
अपने शरीरोंपर प्रहार करते हुए श्रीरघुनाथजीको वे उसी तरह नहीं देख पाते थे, जैसे शब्दादि विषयोंके भोक्तारूपमें स्थित जीवात्माको प्रजाएँ नहीं देख पाती हैं॥
‘ये राम हैं, जो हाथियोंकी सेनाको मार रहे हैं, ये रहे राम, जो बड़े-बड़े रथियोंका संहार कर रहे हैं, नहीं-नहीं ये हैं राम, जो अपने पैने बाणोंसे घोड़ोंसहित पैदल सैनिकोंका वध कर रहे हैं;’ इस प्रकार वे सब राक्षस श्रीरघुनाथजीकी किंचित् समानताके कारण सभीको राम समझ लेते और रामके ही भ्रमसे क्रोधमें भरकर आपसमें एक-दूसरेको मारने लगते थे॥ २४-२५ ॥
श्रीरामचन्द्रजी राक्षससेनाको दग्ध कर रहे थे तो भी वे राक्षस उन्हें देख नहीं सके। महात्मा श्रीरामने राक्षसोंको गान्धर्व नामक दिव्य अस्त्रसे मोहित कर दिया था॥ २६ ॥
अतः वे राक्षस रणभूमिमें कभी तो हजारों राम देखते थे और कभी उन्हें उस महासमरमें एक ही रामका दर्शन होता था॥ २७ ॥
वे महात्मा श्रीरामके धनुषकी सुनहरी कोटि (नोक या कोणभाग)-को अलातचक्रकी भाँति घूमती देखते थे; किंतु साक्षात् श्रीरघुनाथजीको नहीं देख पाते थे॥ २८ ॥
युद्धस्थलमें राक्षसोंका संहार करते हुए श्रीरामचन्द्रजी साक्षात् चक्रके समान जान पड़ते थे। शरीरका मध्यभाग अर्थात् नाभि ही उस चक्रकी नाभि थी, बल ही उससे प्रकट होनेवाली ज्वाला था, बाण ही उसके अरे थे, धनुष ही नेमिका स्थान ग्रहण किये हुए था, धनुषकी टंकार और तलध्वनि—ये ही दोनों उस चक्रकी घर्घराहट थीं, तेज-बुद्धि और कान्ति आदि गुण ही उस चक्रकी प्रभा थे तथा दिव्यास्त्रोंके गुणप्रभाव ही उसके प्रान्तभाग अर्थात् धार थे। जैसे प्रजा प्रलयकालमें कालचक्रका दर्शन करती है, उसी प्रकार राक्षस उस समय श्रीरामरूपी चक्रको देख रहे थे॥ २९-३० ॥
श्रीरामने अकेले दिनके आठवें भाग (डेढ़ घंटे)-में ही आगकी ज्वालाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंके वायुके समान वेगशाली दस हजार रथोंकी, अठारह हजार वेगवान् हाथियोंकी, चौदह हजार सवारोंसहित घोड़ोंकी तथा पूरे दो लाख पैदल निशाचरोंकी सेनाका संहार कर डाला॥ ३१—३३ ॥
जब घोड़े और रथ नष्ट हो गये तथा ध्वज तोड़-फोड़ डाले गये, तब मरनेसे बचे हुए निशाचर शान्त हो लङ्कापुरीमें भाग गये॥ ३४ ॥
मारे गये हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंकी लाशोंसे भरी हुई वह रणभूमि कुपित हुए महात्मा रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि-सी प्रतीत होती थी॥ ३५ ॥
तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियोंने साधुवाद देकर भगवान् श्रीरामके इस कार्यकी प्रशंसा की॥ ३६ ॥
उस समय धर्मात्मा श्रीरामने अपने पास खड़े हुए सुग्रीव, विभीषण, कपिवर हनुमान्, जाम्बवान्, कपिश्रेष्ठ मैन्द तथा द्विविदसे कहा— ‘यह दिव्य अस्त्र-बल मुझमें है या भगवान् शंकरमें’ ॥ ३७-३८ ॥
उस अवसरपर इन्द्रतुल्य तेजस्वी महात्मा श्रीराम जो अस्त्र-शस्त्रोंका संचालन करते समय कभी थकते नहीं थे, उस राक्षसराजकी सेनाका संहार करके हर्षभरे देवताओंके समुदायद्वारा पूजित एवं प्रशंसित होने लगे॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तिरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९३ ॥
चौरानबेवाँ सर्ग
चौरानबेवाँ सर्ग
राक्षसियोंका विलाप
अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले भगवान् श्रीरामके द्वारा उनके तपाये हुए सुवर्णसे विभूषित चमकीले बाणोंसे रावणके भेजे हुए हजारों हाथी, सवारोंसहित सहस्रों घोड़े, अग्निके समान देदीप्यमान एवं ध्वजोंसे सुशोभित सहस्रों रथ तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, सुवर्णमय ध्वजसे विचित्र शोभा पानेवाले और गदा-परिघोंसे युद्ध करनेवाले हजारों शूरवीर राक्षस मारे गये—यह देख-सुनकर मरनेसे बचे हुए निशाचर घबरा उठे और लङ्कामें जा राक्षसियोंसे मिलकर बहुत ही दुःखी एवं चिन्तामग्न हो गये॥ १—४ ॥
जिनके पति, पुत्र और भाई-बन्धु मारे गये थे, वे अनाथ राक्षसियाँ झुंड-की-झुंड एकत्र होकर दुःखसे पीड़ित हो विलाप करने लगीं— ॥ ५ ॥
‘हाय! जिसका पेट धँसा हुआ और आकार विकराल है, वह बुढ़िया शूर्पणखा वनमें कामदेवके समान रूपवाले श्रीरामके पास कामभाव लेकर कैसे गयी—किस तरह जानेका साहस कर सकी?॥ ६ ॥
‘जो भगवान् राम सुकुमार और महान् बलशाली हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते हैं, उन्हें देखकर वह कुरूपा राक्षसी उनके प्रति कामभावसे युक्त हो गयी—यह कैसा दुःसाहस है? यह दुष्टा तो सबके द्वारा मार डालनेके योग्य है॥ ७ ॥
‘कहाँ सर्वगुणसम्पन्न, महान् बलशाली तथा सुन्दर मुखवाले श्रीराम और कहाँ वह सभी गुणोंसे हीन, दुर्मुखी राक्षसी! उसने कैसे उनकी कामना की?॥ ८ ॥
‘जिसके सारे अङ्गोंमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, सिरके बाल सफेद हो गये हैं तथा जो किसी भी दृष्टिसे श्रीरामके योग्य नहीं है, उस दुष्टाने हम लङ्कावासियोंके दुर्भाग्यसे ही खर, दूषण तथा अन्य राक्षसोंके विनाशके लिये श्रीरामका धर्षण (उन्हें अपने स्पर्शसे दूषित करनेका प्रयास) किया था॥ ९-१० ॥
‘उसके कारण ही दशमुख राक्षस रावणने यह महान् वैर बाँध लिया और अपने तथा राक्षसकुलके वधके लिये वह सीताजीको हर लाया॥ ११ ॥
‘दशमुख रावण जनकनन्दिनी सीताको कभी नहीं पा सकेगा; परंतु उसने बलवान् रघुनाथजीसे अमिट वैर बाँध लिया है॥ १२ ॥
‘राक्षस विराध विदेहकुमारी सीताको प्राप्त करना चाहता है, यह देख श्रीरामने एक ही बाणसे उसका काम तमाम कर दिया। वह एक ही दृष्टान्त उनकी अजेय शक्तिको समझनेके लिये काफी था॥ १३ ॥
‘जनस्थानमें भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंको श्रीरामने अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा कालके गालमें डाल दिया था और सूर्यके सदृश प्रकाशमान सायकोंसे समराङ्गणमें खर, दूषण तथा त्रिशिराका भी संहार कर डाला था; यह उनकी अजेयताको समझ लेनेके लिये पर्याप्त दृष्टान्त था॥ १४-१५ ॥
‘रक्तभोजी राक्षस कबन्धकी बाँहें एक-एक योजन लम्बी थीं और वह क्रोधवश बड़े जोर-जोरसे सिंहनाद करता था तो भी वह श्रीरामके हाथसे मारा गया। वह दृष्टान्त ही श्रीरामचन्द्रजीके दुर्जय पराक्रमका ज्ञान करानेके लिये पर्याप्त था॥ १६ ॥
‘मेरुपर्वतके समान महाकाय बलवान् इन्द्रकुमार वालीको श्रीरामचन्द्रजीने एक ही बाणसे मार गिराया। उनकी शक्तिका अनुमान लगानेके लिये वह एक ही उदाहरण काफी है॥ १७ ॥
‘सुग्रीव बहुत ही दुःखी और निराश होकर ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करते थे; परंतु श्रीरामने उन्हें किष्किन्धाके राजसिंहासनपर बिठा दिया। उनके प्रभावको समझनेके लिये वह एक ही दृष्टान्त पर्याप्त है॥ १८ ॥
‘विभीषणने जो धर्म और अर्थसे युक्त बात कही थी, वह सभी राक्षसोंके लिये हितकर तथा युक्तियुक्त थी; परंतु मोहवश रावणको वह अच्छी न लगी। यदि कुबेरका छोटा भाई रावण विभीषणकी बात मान लेता तो यह लङ्कापुरी इस तरह दुःखसे पीड़ित हो श्मशानभूमि नहीं बन जाती॥ १९-२० ॥
‘महाबली कुम्भकर्ण श्रीरामके हाथसे मारा गया। दुःसह वीर अतिकायको लक्ष्मणने मार गिराया तथा रावणका प्यारा पुत्र इन्द्रजित् भी उन्हींके हाथसे मारा गया तथापि रावण भगवान् श्रीरामके प्रभावको नहीं समझ रहा है॥ २१ ॥
‘हाय, मेरा बेटा मारा गया!’ ‘मेरे भाईको प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा।’ ‘रणभूमिमें मेरे पतिदेव मार डाले गये।’ लङ्काके घर-घरमें राक्षसियोंके ये शब्द सुनायी देते हैं॥ २२ ॥
‘समराङ्गणमें शूरवीर श्रीरामने जहाँ-तहाँ सहस्रों रथों, घोड़ों और हाथियोंका संहार कर डाला है। पैदल सैनिकोंको भी मौतके घाट उतार दिया है॥ २३ ॥
‘जान पड़ता है, श्रीरामका रूप धारण करके हमें साक्षात् भगवान् रुद्रदेव, भगवान् विष्णु, शतक्रतु इन्द्र अथवा स्वयं यमराज ही मार रहे हैं॥ २४ ॥
‘हमारे प्रमुख वीर श्रीरामके हाथसे मारे गये। अब हमलोग अपने जीवनसे निराश हो चली हैं। हमें इस भयका अन्त नहीं दिखायी देता, अतएव हम अनाथकी भाँति विलाप कर रही हैं॥ २५ ॥
‘दशमुख रावण शूरवीर है। इसे ब्रह्माजीने महान् वर दिया है। इसी घमंडके कारण यह श्रीरामके हाथसे प्राप्त हुए इस महाघोर भयको नहीं समझ पाता है॥ २६ ॥
‘युद्धस्थलमें श्रीराम जिसे मारनेको तुल जायँ, उसे न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न राक्षस ही बचा सकते हैं॥ २७ ॥
‘रावणके प्रत्येक युद्धमें जो उत्पात दिखायी देते हैं, वे रामके द्वारा रावणके विनाशकी ही सूचना देते हैं॥ २८ ॥
‘ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर रावणको देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंकी ओरसे अभयदान दे दिया था। मनुष्योंकी ओरसे अभय प्राप्त होनेके लिये इसने याचना ही नहीं की थी॥ २९ ॥
‘अतः मुझे ऐसा जान पड़ता है कि यह निःसन्देह मनुष्योंकी ओरसे ही घोर भय प्राप्त हुआ है, जो राक्षसों तथा रावणके जीवनका अन्त कर देनेवाला है॥ ३० ॥
‘बलवान् राक्षस रावणने अपनी उद्दीप्त तपस्या तथा वरदानके प्रभावसे जब देवताओंको पीड़ा दी, तब उन्होंने पितामह ब्रह्माजीकी आराधना की॥ ३१ ॥
‘इससे महात्मा ब्रह्माजी संतुष्ट हुए और उन्होंने देवताओंके हितके लिये उन सबसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही॥ ३२ ॥
‘आजसे समस्त दानव तथा राक्षस भयसे युक्त होकर ही नित्य-निरन्तर तीनों लोकोंमें विचरण करेंगे’॥ ३३ ॥
‘तत्पश्चात् इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर त्रिपुरनाशक वृषभध्वज महादेवजीको संतुष्ट किया॥ ३४ ॥
‘संतुष्ट होनेपर महादेवजीने देवताओंसे कहा— ‘तुम लोगोंके हितके लिये एक दिव्य नारीका आविर्भाव होगा, जो समस्त राक्षसोंके विनाशमें कारण होगी॥ ३५॥
‘जैसे पूर्वकल्पमें देवताओंद्वारा प्रयुक्त हुई क्षुधाने दानवोंका भक्षण किया था, उसी प्रकार यह निशाचरनाशिनी सीता रावणसहित हम सब लोगोंको खा जायगी॥ ३६॥
‘उद्दण्ड और दुर्बुद्धि रावणके अन्यायसे यह शोकसंयुक्त घोर विनाश हम सबको प्राप्त हुआ है॥ ३७॥
‘जगतमें हम किसी ऐसे पुरुषको नहीं देखती हैं, जो महाप्रलयके समय कालकी भाँति इस समय श्रीरघुनाथजीसे संकटमें पड़ी हुई हम राक्षसियोंको शरण दे सके॥ ३८॥
‘हम बड़े भारी भयकी अवस्थामें स्थित हैं। जैसे वनमें दावानलसे घिरी हुई हथिनियोंको कहीं प्राण बचानेके लिये जगह नहीं मिलती, उसी तरह हमारे लिये भी कोई शरण नहीं है॥ ३९॥
‘महात्मा पुलस्त्यनन्दन विभीषणने समयोचित कार्य किया है। उन्हें जिनसे भय दिखायी दिया, उन्हींकी शरणमें वे चले गये’॥ ४०॥
इस प्रकार निशाचरोंकी सारी स्त्रियाँ एक-दूसरीको भुजाओंमें भरकर आर्तभाव एवं विषादग्रस्त हो गयीं और अत्यन्त भयसे पीड़ित हो अति भयंकर क्रन्दन करने लगीं॥ ४१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९४॥