भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
१५४शुक्रनीतिः

झूठ, साहस (बिना विचारे कार्य करना), मूर्खता और काम की अधिकता होती है अतः बिना काम की अधिकता के स्त्री के साथ एक शय्या पर नहीं शयन करना चाहिये ।

दृष्ट्वा धनं कुलं शीलं रूपं विद्यां बलं वयः ॥ १७१ ॥
कन्यां दद्यादुत्तमं चेन्मैत्रीं कुर्याद्यात्मनः ।

वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश— धन, कुल, शील, रूप, विद्या, बल और अवस्था (उम्र) इन सबों को देखकर जिस वर में ये सब उत्तम रीति से हों उसी को कन्या देनी चाहिये, क्योंकि यदि ये सब उत्तम होते हैं तो कन्या भी उस वर से अपनी मैत्री जोड़ती है अथवा यदि कुलादि उत्तम हो तभी उससे अपनी मैत्री या संबन्ध करना उचित होता है।

भार्यार्थिनं वयोविद्यारूपिणं निर्धनं त्वपि ॥ १७२ ॥
न केवलेन रूपेण वयसा न धनेन च ।

वर के लक्षण— भार्यार्थी (विवाह करने के लिये इच्छुक) यदि अवस्था (विवाह योग्य उम्र), विद्या तथा रूप से युक्त हो किन्तु धन उत्तम न हो तो भी उसे बुलाकर कन्या दे देनी चाहिये किन्तु केवल रूप, अवस्था या धन देखकर कन्या नहीं देनी चाहिये ।

आदौ कुलं परीक्षेत ततो विद्यां ततो वयः ॥ १७३ ॥
शीलं धनं ततो रूपं देशं पश्चाद्विवाहयेत् ।

सर्वप्रथम वर के कुल, उसके बाद विद्या, उसके बाद अवस्था, उसके बाद शील, धन, रूप तथा देश की क्रमशः परीक्षा करने के पश्चात् उसके साथ कन्या का विवाह करना चाहिये ।

कन्या वरयते रूपं माता वित्तं पिता श्रुतम् ॥ १७४ ॥
बान्धवाः कुलमिच्छन्ति मिष्टान्नमितरे जनाः ।

विवाहार्थ कन्या वर के रूप की सुन्दरता, माता उत्तम धन, पिता उत्तम विद्या, बान्धव गण उत्तम कुल पसन्द करते हैं किन्तु इनसे अन्य बराती लोग केवल मिष्ट (मधुर) अन्न खाने की इच्छा रखते हैं क्योंकि उन्हें वरादि के कुलादि से कोई प्रयोजन नहीं है।

भार्यार्थं वरयेत्कन्यामसमानर्षिगोत्रजाम् ॥ १७५ ॥
भ्रातृमतीं सुकुलां च योनिदोषविवर्जिताम् ।

कन्या के लक्षण— भार्या बनाने के लिये अपने से भिन्न ऋषि और गोत्र वाली, भाई से संयुक्त, अच्छे कुल में उत्पन्न हुई, योनि रोग से रहित अथवा निर्दोष मांसे पैदा हुई कन्या का वरण करना वर के लिये उचित है।

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ॥ १७६ ॥

तृतीयोऽध्यायः '१५५

न त्याज्यौ तु क्षणकणौ नित्यं विद्याधनार्थिना ।

विद्या और धन का संचय करने का निर्देश — विद्या तथा धन चाहनेवाले को नित्य क्रम से क्षण तथा कण का त्याग ( 'थोड़ा है इससे क्या लाभ होगा' इस बुद्धि से उपेक्षा ) नहीं करनी चाहिये किन्तु क्षण २ भर प्रतिदिन अभ्यास करके विद्या का एवं कण २ भर का संग्रह कर धन का अर्जन करना चाहिये ।

सुभार्यापुत्रमित्रार्थं हितं नित्यं धनार्जनम् ॥ १७७ ॥
दानार्थं च विना त्वेतैः किं धनैश्च जनैश्च किम् ।

धनार्जन के उपयोगों का निर्देश — उत्तम भार्या, पुत्र या मित्र के लिये एवं दान के लिये तो नित्य धनार्जन करना हितकर है, अतः बिना इन सब भार्यादियों के धन और भृत्यादिजनों से क्या प्रयोजन है अर्थात् धनादि व्यर्थ है ।

भाबिसंरक्षणक्षमं धनं यत्नेन रक्षयेत् ॥ १७८ ॥
जीवामि शतवर्षं तु नन्दामि च धनेन च ।
इति बुद्ध्या सञ्चिनुयाद्धनं विद्यादिकं सदा ॥ १७९ ॥
पञ्चविंशत्यब्दपूरं तदर्थं वा तदर्द्धकम् ।

भविष्यकाल में रक्षा करने में समर्थ धन की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये । और १०० वर्ष तक मैं तो जीऊँगा एवं इस धन से आनन्द करूँगा — इस बुद्धि से धन और विद्या आदि का २५ वर्ष पर्यन्त या उसका आधा १२॥ वर्ष या उसका आधा ६। वर्ष पर्यन्त सदा संग्रह करना चाहिये ।

विद्याधनं श्रेष्ठतरं तन्मूलमितरद्धनम् ॥ १८० ॥
दानेन वर्धते नित्यं न भाराय न नीयते ।

धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश — विद्यारूपी धन अत्यन्त श्रेष्ठ है, इससे अन्य धन विद्यामूलक है अर्थात् विद्या से ही अन्य धन का उपार्जन होता है क्योंकि यह विद्याधन देने से नित्य बढ़ता है, अन्य धन घटता है । और इसमें भार नहीं होता है, अन्य धन में भार होता है । एवं इसे कोई उठा कर नहीं ले जा सकता है, अन्य धन को उठा कर ले जा सकता है ।

अस्ति यावत्तु सधनस्तावत्सर्वैस्तु सेव्यते ॥ १८१ ॥
निर्धनस्त्यज्यते भार्यापुत्राद्यैः सगुणोप्यतः ।
संसृतौ व्यवहाराय सारभूतं धनं स्मृतम् ॥ १८२ ॥
अतो यतेत तत्प्राप्त्यै नरः सूपायसाहसैः ।

अवश्य धनार्जन करने का निर्देश — जब तक मनुष्य धनयुक्त रहता है तब तक सब लोग उसकी सेवा करते हैं और जब वही धन से रहित हो जाता

१५६ | शुक्रनीतिः

है तो भले ही गुणवान हो किन्तु उसे स्त्री-पुत्रादिक भी छोड़ देते हैं, अतः संसार में व्यवहार चलाने के लिये धन ही सारभूत कहा हुआ है। और इसीसे धन-प्राप्ति के लिये मनुष्य प्राणों को संशय में डालनेवाले कठिन भी कार्यों के द्वारा प्रयत्नशील रहे।

सुविद्यया सुसेवाभिः शौर्येण कृषिभिस्तथा ॥ १८३ ॥
कौसीदवृद्ध्या पण्येन कलाभिश्च प्रतिग्रहैः ।
यया कया चापि वृत्त्या धनवान्स्यात्तथा चरेत् ॥ १८४ ॥
तिष्ठन्ति सधनद्वारे गुणिनः किङ्करा इव ।

और सुन्दर विद्या उपार्जन या सुन्दर सेवा, शूरता, कृषि (खेती) करके या ब्याज पर रुपया ऋण देकर, दूकानदारी या संगीत आदि कला के द्वारा, दान लेकर और अधिक क्या कहें, चाहे जिस किसी वृत्ति का आश्रय लेकर मनुष्य धनवान बन सके उसीके अनुकूल कार्य करे। क्योंकि धनियों के द्वार पर गुणी लोग नौकर के तरह पड़े रहते हैं।

दोषा अपि गुणायन्ते दोषायन्ते गुणा अपि ॥ १८५ ॥
धनवतो ऽनिर्धनस्य निन्द्यते निर्धनोऽखिलैः ।

**धन के प्रभाव का निर्देश—**धनवान पुरुषों के दोष भी गुण के समान हो जाते हैं, और निर्धनों के गुण भी दोष-तुल्य हो जाते हैं। इससे निर्धन की सभी लोग निन्दा ही किया करते हैं।

सुनिर्धनत्वं प्राप्यैके मरणं भेजिरे जनाः ॥ १८६ ॥
प्राप्तायैकेऽचलायैके नाशायैके प्रवव्रजुः ।

कितने एक मनुष्य अत्यन्त दरिद्रता भोगकर मर गये, कितने एक देशान्तर में चले गये, कितने एक पहाड़ों में जा बसे, कितने एक आत्म-हत्या करने के लिये घर से निकल गये।

उन्मादमेके पुष्यन्ति यान्त्यन्ये द्विषतां वशम् ॥ १८७ ॥
दास्यमेके च गच्छन्ति परेषामर्थहेतुना ।

धन के फेर में पड़ कर कितने एक चिन्ता करते २ पागल हो जाते हैं, कितने एक शत्रुओं की अधीनता स्वीकार कर लेते हैं और कितने एक दूसरों की या शत्रुओं की नौकरी भी कर लेते हैं।

यथा न जानन्ति धनं संचितं कति कुत्र वै ॥ १८८ ॥
आत्मस्त्रीपुत्रमित्राणि सलेखं धारयेत्तथा ।

और अपने स्त्री पुत्र या मित्र तक भी जिस प्रकार से यह न जान सकें कि 'इसने कितना और कहां पर धन संचित करके रखा है' इस प्रकार प्रयत्न करे और इसीलिये उस धन को बढ़ने के लिये लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर

तृतीयोग्ध्यायः १५७

तृतीयोग्ध्यायः १५७

वे देवे किन्तु घर में न रखे, क्योंकि पुत्रादि को ज्ञात होने पर उस धन की रक्षा असंभव हो जाती है।

नैवास्तिल्लिखितादन्यत् स्मारकं व्यवहारिणाम् ॥ १८९ ॥ न लेख्येन विना कुर्याद् व्यवहारं सदा बुधः ।

**व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश—**व्यवहार (व्यवसाय) करनेवालों के लिये लेख से बढ़ कर दूसरा कोई स्मरणसूचक चिह्न नहीं है, इसलिये बुद्धिमान को सदा बिना लेख के व्यवहार (रुपया देना) नहीं करना चाहिये।

निर्लोभे धनिके राज्ञि विश्वस्ते क्षमिणां वरे ॥ १९० ॥ सुसञ्चितं धनं धार्यं गृहीतलेखितं तु वा।

लोभ से रहित धनी पुरुष या विश्वासपात्र या क्षमाशील किंवा श्रेष्ठ पुरुष अथवा राजा इनमें किसी एक के पास में अच्छी तरह से संचित धन को रखना चाहिये अथवा रखने के लिये लिये हुये धन को लिख लेने के बाद चाहे जिसके पास रखना चाहिये ।

मैत्र्यर्थे याचितं दद्यादकुसीदं धनं सदा ॥ १९१ ॥ तस्मिन् स्थितं चेन्न बहु हानिकृच्च तथाविधम् ।

**मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश—**मित्रता के नाते मांगने पर मित्र के लिये बिना सूद पर धन सदा देना चाहिये और यदि उस मित्र के ऊपर वैसा बिना सूद पर लिया हुआ धन बहुत सा बाकी भी पड़ा हो तो भी पुनः देना हानिकर नहीं है। अर्थात् मित्र के लिये सभी सत्य है।

दृष्ट्वाऽधमर्णं वृद्ध्यापि व्यवहारक्षमं सदा ॥ १९२ ॥ सबन्धं सप्रतिभुवं धनं दद्याच्च साक्षिमत् । गृहीतलेखितं योग्यमानं प्रत्यागमे सुखम् ॥ १९३ ॥ न दद्याद् वृद्धिलोभेन नष्टं मूलधनं भवेत् ।

**लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश—**ऋण लेनेवाले को सूद देने में समर्थ देख कर सदा बन्धक या किसी के जमानत पर और किसी के गवाही के साथ लिखा-पढ़ी करके उचित मात्रा में, सुखपूर्वक लौटाने लायक धन देना चाहिये। और ब्याज के लोभ से उपर्युक्त रीति से भिन्न अवस्था में धन नहीं देना चाहिये नहीं तो मूल धन नष्ट हो जाने की संभावना रहती है।

आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत् ॥ १९४ ॥ धनं मैत्रीकरं दाने चादाने शत्रुकारकम् ।

**आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश—**इस प्रकार से आहार-व्यवहार में

१५८शुक्रनीतिः

जो लज्जा का त्याग करनेवाला होता है वह सुखी होता है। देने के समय धन मैत्री कराता है और लेने के समय वही धन शत्रुता करा देता है।

कृत्वा स्वान्ते तथौदार्यं कार्पण्यं बहिरैव च ॥ १९५ ॥
उचितं तु व्ययं काले नरः कुर्यान्न चान्यथा ।

**उचित व्यय करने का निर्देश—**हृदय के अन्दर उदारता रखकर और ऊपर से कृपणता (कंजूसी) रख कर समय आने पर उचित व्यय मनुष्य को करना चाहिये । इससे अन्यथा नहीं करना चाहिये ।

सुभार्यापुत्रमित्राणि शक्त्या संरक्षयेद्धनैः ॥ १९६ ॥
नात्मा पुनरतो त्मानं सर्वैः सर्वं पुनर्भवैत् ।
पश्यति स्म स जीवश्चेन्नरो भद्रशतानि च ॥ १९७ ॥

**भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश—**भार्या, पुत्र और मित्र ये सब यदि उत्तम हों तो इनकी रक्षा धन से करनी चाहिये । और इन सबों से आत्मा (शरीर) की रक्षा करनी चाहिये क्योंकि शरीर दुबारा नहीं मिल सकता है और भार्या-पुत्रादि तो दुबारा भी मिल सकते हैं। और यदि मनुष्य जीवित रहता है तो सैकड़ों कल्याण देखता है।

सदारप्रौढपुत्रान् द्राक् श्रेयोऽर्थी विभजेत् पिता ।
सदारभ्रातरः प्रौढा विभजेयुः परस्परम् ॥ १९८ ॥

**सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश—**अपना कल्याण का चाहनेवाला पिता स्त्री-युक्त एवं कार्य करने में समर्थ हुये पुत्रों को शीघ्र आपस में विभक्त कर दे (जिसमें आपस में भविष्य में कलह न कर सकें) और इसी प्रकार से सहोदर भाई लोग भी विवाह हो जाने एवं प्रौढ (कार्य करने में समर्थ) हो जाने पर आपस में विभाग कर लें अन्यथा परस्पर लड़कर निश्चय मिट जाते हैं।

एकोदरा अपि प्रायो विनाशायान्यथा खलु ।
नैकत्र संवसेच्चापि स्त्रीद्वयं मनुजस्य तु ॥ १९९ ॥

**२ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध—**यदि किसी पुरुष के पास अथवा स्वतन्त्र दो स्त्रियां हों तो उन दोनों को एवं किसी स्त्री जाति पशु के पास अथवा स्वतन्त्र दो पुरुष जाति के पशुओं को एकत्र नहीं रखना चाहिये । क्योंकि मनुष्य जाति में और पशु जाति में पुरुष एक से अधिक एक जगह कैसे रह सकते हैं ? अर्थात् कभी नहीं रह सकते हैं।

कथं वसेत्तद्बहुत्वं पशूनां तु नरद्वयम् ।
विभजेयुर्न तत्पुत्रा यद्धनं वृद्धिकारणम् ॥ २०० ॥

तृतीयोऽध्यायः १५६

अधमर्णस्थितं चापि यद् देयं चौत्तमर्णिकम्।

**ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध—**गृहपति के पुत्र लोग पिता के उस धन का परस्पर विभाग न करें जो कि सूद पर दिया हुआ अधमर्ण ( ऋण लेनेवाले ) के पास हो अथवा उत्तमर्ण ( सूद पर द्रव्य देनेवाला महाजन ) को देने के लिये जो धन हो।

यस्येच्छेदुत्तमां मैत्रीं कुर्यान्नाभिलाषकम् ॥ २०१ ॥
परोक्षे तद्गृहद्वारं तत्स्त्रीसम्भाषणं तथा ।
तन्न्यूनदर्शनं नैव तत्प्रतीपविवादनम् ॥ २०२ ॥
असाहाय्यं च तत्कार्ये ह्यनिष्टोपेक्षणं न च ।

**शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश—**जिसके साथ उत्तम मैत्री रखना चाहे उससे धन का अभिलाषा न रखे अर्थात् ऋणादि न ले। और परोक्ष में उसके अन्तःपुर में न जाय और न उसकी स्त्री से बातचीत करे। एवं उसकी त्रुटि को न देखे अर्थात् दोष के तरफ ध्यान न दे। और उसके प्रतिकूल विवाद न करे। तथा उसके कार्य में असहायता और अनिष्ट देखकर उसकी उपेक्षा न करे।

सकुसीदमकुसीदं धनं यच्चौत्तमर्णिकम् ॥ २०३ ॥
दद्यादगृहीतमिव नोभयोः क्लेशकृद्यथा ।
नासाक्षिकमचालित्खितमृणपत्रस्य पृष्ठतः ॥ २०४ ॥

**बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश—**और सूद पर या बिना सूद का जो महाजनी ( ऋण देनेवाला ) का धन हो वह जिस प्रकार से दोनों मित्रों को परस्पर क्लेश न पहुंचे तथा बिना साक्षी बिना ऋणपत्र पर लिखाये न दे।

आत्मपितृमातृगुणैः प्रख्यातश्चोत्तमोत्तमः ।
गुणैरात्मभवैः ख्यातः पैतृकैर्मातृकैः पृथक् ॥ २०५ ॥
उत्तमो मध्यमो नीचोऽधमो भ्रातृगुणैर्नरः ।
कन्यास्त्रीभगिनीभाग्यो नरोऽधमतमो मतः ॥ २०६ ॥

**उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण—**जो मनुष्य अपने, पिता तथा माता इन तीनों के गुणों से प्रख्यात होता है वह उत्तमोत्तम कहलाता है, जो केवल अपने ही गुणों से प्रख्यात होता है वह उत्तम, पिता के गुणों से मध्यम एवं माता के गुणों से प्रख्यात नीच कहलाता है। और भाई के गुणों से प्रख्यात पुरुष अधम कहलाता है। तथा जो कन्या, स्त्री या बहन के भाग्य से उन्हीं के सहारे गलग्रह होकर जीवन व्यतीत करता है वह अधमतम कहलाता है।

भूत्वा महाधनः सम्यक् पोष्यवर्गं तु पोषयेत् ।

१६० | शुक्रनीतिः

अदत्त्वा यत्किञ्चिदपि न नयेद्दिवसं बुधः ॥ २०७ ॥

बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश— विपुल धन से सम्पन्न होते हुए भी जो पालन करने के योग्य हैं उन्हीं का पालन करना चाहिये। बुद्धिमान को बिना कुछ दिये हुये कोई भी दिन व्यतीत नहीं करना चाहिये।

स्थितो मृत्युमुखे चाहं क्षणमायुर्ममास्ति न ।
इति मत्वा दानधर्मौ यथेष्टौ तु समाचरेत् ॥ २०८ ॥
न तौ बिना मे परत्र सहायाः सन्ति चेतरे ।
दानशीलाश्रयाल्लोको वर्तते न शठाश्रयात् ॥ २०९ ॥

यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश— 'मैं मृत्यु के मुख में स्थित हूँ, मेरी क्षणभर की भी आयु नहीं है। और दान और धर्म इन दोनों को छोड़कर परलोक में अन्य कोई मेरा सहायक नहीं है। तथा दानशील व्यक्तियों के आश्रय से यह जगत् ठहरा हुआ है। शठों के आश्रय से नहीं।' ऐसा समझकर यथेष्ट दान तथा धर्म करना चाहिये।

भवन्ति मित्रा दानेन द्विषन्तोपि च किं पुनः।

दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश— जब शत्रु लोग भी दान से मित्र बन जाते हैं तब औरों के लिये क्या कहना है अर्थात् अन्य तो मित्र बन ही जाते हैं।

देवतार्थं च यज्ञार्थं ब्राह्मणार्थं गवार्थकम् ॥ २१० ॥
यद्दत्तं तत्पारलौक्यं संविदत्तं तदुच्यते ।

परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण— देवता, यज्ञ, ब्राह्मण, गौ, इनके लिये जो दिया जाता है वह परलोक-सुख-साधन के लिये होता है और उसी को 'संविद्' दान अर्थात् 'अवश्य देना चाहिये' इस बुद्धि से दिया हुआ कहते हैं।

बन्दिमागधमल्लादिनटनार्थं च दीयते ॥ २११ ॥
पारितोष्यं यशोर्थं तु श्रिया दत्तं तदुच्यते ।

पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण— बन्दी, मागध तथा मल्ल आदि लोगों को अपना २ कार्य दिखाने के लिये जो पुरस्कार रूप में दिया जाता है उसे 'पारितोष्य' कहते हैं। और जो यश के लिये दिया जाता है उसे 'श्रियादत्त' (लक्ष्मी से दिया हुआ) कहते हैं अथवा उसे यशोऽर्थक और श्रियादत्त कहते हैं।

उपायनीकृतं यत्तु सुहृत्संबन्धिबन्धुषु ॥ २१२ ॥
विवाहादिषु चाचारदत्तं ह्रीदत्तमेव तत् ।

तृतीयोऽध्यायः | १६१

तृतीयोऽध्यायः | १६१

**आचारदत्त या ह्रीदत्त दान के लक्षण—**विवाहादि कार्यों में मित्र, संबन्धी तथा बन्धुजनों को जो उपहार-स्वरूप में दिया आता है उसे ‘आचारदत्त’ व्यवहार से दिया हुआ कहते हैं और उसी को ‘ह्रीदत्त’ लज्जा से दिया हुआ भी कहते हैं ।

राज्ञे च बलिने दत्तं कार्यार्थं कार्यघातिने ॥ २१३ ॥
पापभीत्याऽथवा यच्च तत्तु भीदत्तमुच्यते ।

**भीदत्त दान के लक्षण—**राजा, बलवान और कार्य को नष्ट करनेवाला इन लोगों को जो कार्य के लिये दिया जाता है अथवा ‘न देने में पाप है’ इस भय से जो दिया जाता है उसे ‘भीदत्त’ भय से दिया हुआ कहते हैं ।

यदत्तं हिंस्रवृद्ध्यर्थं नष्टं द्यूतविनाशितम् ॥ २१४ ॥
चौरैर्हृतं पापदत्तं परस्त्रीसङ्गमायकम् ।

**नष्टदान के लक्षण—**जो धन हिंसकों की वृद्धि के लिये दिया जाता है या जो द्यूत से नष्ट कर दिया गया या जिसे चोरों ने हर लिया, जो पापियों को अथवा परस्त्री-संगमार्थ दिया गया उसे ‘नष्ट’ कहते हैं ।

आराधयति यं देवं तमुत्कृष्टतरं वदेत् ॥ २१५ ॥
तन्न्यूनतां नैव कुर्याज्तोषयेत्तस्य सेवनम् ।

**आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट मानने का निर्देश—**जिस देवता या प्रभु की आराधना करे उसे सबसे अधिक उत्कृष्ट कहे और उसकी न्यूनता को न करे एवं उसकी सेवा हर्ष से करे ।

विना दानार्जवाभ्यां न भुव्यस्ति च वशीकरम् ॥ २१६ ॥
दानक्षीणो विवर्धिष्णुः शशी वक्रोऽप्यतः शुभः ।

**वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता की महत्ता—**दान तथा सरलता को छोड़ कर संसार में अन्य कोई वशीभूत करने का उपाय नहीं है । अतः एवं अमृत दान करने से क्षीण हुआ किन्तु पुनः बढ़ने की इच्छा रखनेवाला शुक्लपक्ष की द्वितीया का चन्द्र वक्र (सरलता से रहित) होता हुआ भी शुभ होता है, अर्थात् उससे पुनः अमृत-दान मिलने की संभावना रहती है ।

विचार्य स्नेहं द्वेषं वा कुर्यात् कृत्वा न चान्यथा ॥ २१७ ॥
नापकुर्यान्नोपकुर्याद् भवतोऽनर्थकारिणौ ।

**विचार कर स्नेह या द्वेष करने का निर्देश—**विचार करके किसी के साथ स्नेह या द्वेष करना चाहिये और करके पुनः उससे अन्यथा नहीं करना चाहिये । अतः स्नेही के साथ अपकार एवं द्वेषी के साथ उपकार नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये दोनों अनर्थ पैदा करते हैं । अर्थात् स्नेही के साथ सदा स्नेह (उपकार) एवं द्वेषी के साथ द्वेष (अपकार) ही करना उचित है ।

११ शु०

१६२ | शुक्रनीतिः


नातिक्रौर्यं नातिशाठ्यं धारयेन्नातिमार्दवम् ॥ २१८ ॥
नातिवादं नातिकार्यासक्तिमत्याग्रहं न च ।

**क्रूरतादि करने में सर्वत्र अति का निषेध—**अत्यन्त क्रूरता (निष्ठुरता), अत्यन्त शठता, अत्यन्त मृदुता, अत्यन्त बातचीत, अत्यन्त कार्यों में लवलीनता, अत्यन्त आग्रह (हठ) इन सबों को नहीं करना चाहिये।

अति सर्वं नाशहेतुरर्थतोऽत्यन्तं विवर्जयेत् ॥ २१९ ॥
उद्वेजते जनः क्रौर्यात् कार्पण्यादतिनिन्दति ।

**अतिक्रूरता आदिकों से अनिष्ट फल का निर्देश—**किसी विषय में अति करना नाश का कारण होता है अतः उसे (अति करना) छोड़ देना चाहिये। और अत्यन्त क्रूरता करने से लोग विरक्त हो जाते हैं, अत्यन्त कृपणता (कंजूसी) से अत्यन्त निन्दा करते हैं।

मार्दवाञ्चैव गणयेदपमानोऽतिवादतः ॥ २२० ॥
अतिदानेन दारिद्र्यं तिरस्कारोऽतिलोभतः ।

अत्यन्त मृदुता से लोग उसे नहीं गिनते हैं (उसे कुछ नहीं समझते हैं), अत्यन्त बोलने से अपमान करते हैं, अत्यन्त दान से दरिद्रता होती है, अत्यन्त लोभ से तिरस्कार होता है।

अत्याग्रहान्नरस्यैव मौर्ख्यं सञ्जायते खलु ॥ २२१ ॥
अनाचाराद्धर्महानिरत्याचारस्तु मूर्खता ।

अत्यन्त आग्रह करने से मनुष्य की मूर्खता प्रकट होती है। आचार-विचार करने से अथवा दुष्ट आचरण करने से धर्म की हानि एवं आचार के विरुद्ध आचरण करने से भी मूर्खता समझी जाती है।

अधिकोऽस्मीति सर्वेभ्यो अधिकज्ञानवानहम् ॥ २२२ ॥
धर्मतत्त्वमिदमिति नैवं मन्येत बुद्धिमान् ।

**अपने को अधिक श्रेष्ठ मानने का निषेध—**मैं सबसे अधिक श्रेष्ठ या अधिक ज्ञान से युक्त हूँ, और 'धर्म का तत्त्व यही है' ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य को नहीं समझना चाहिये।

तिमिङ्गिलगिलोऽप्यस्ति तद्गिलोऽप्यस्ति राघवः ॥ २२३ ॥
कश्चित्तु तद्गिलोऽस्तीति मत्वा मन्येत कर्हिचित् ।

तिमि नाम की एक बड़ी मछली समुद्र में होती है उसको निगलनेवाली उससे बड़ी 'तिमिङ्गिल' नामकी एक दूसरी मछली होती है और उसको निगलनेवाली और एक मछली होती है उसे 'तिमिङ्गिलगिल' कहते हैं, उसको निगलनेवाली 'राघव' मछली होती है। एवं इसको भी निगलनेवाली कोई सबसे बड़ी भी मछली होती है ऐसा समझकर सदा इसकी

तृतीयोऽध्यायः १६३

तृतीयोऽध्यायः १६३

भावना मनमें करते रहना चाहिये। अर्थात् अपने को सबसे बड़ा नहीं समझना चाहिये।

नेच्छेत् स्वाम्यं तु देवेषु गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ २२४ ॥
महानर्थकरं ह्येतत् समग्रकुलनाशनम् ।

देवादिकों के ऊपर प्रभुत्व रखने की इच्छा का निषेध— देवता, गौ और ब्राह्मण इन तीनों पर प्रभुत्व रखने की इच्छा नहीं रखनी चाहिये। क्योंकि ऐसी इच्छा करना महान अनर्थ तथा समग्रकुल का विनाश करनेवाला होता है।

भजनं पूजनं सेवामिच्छेदेतेषु सर्वदा ॥ २२५ ॥
न ज्ञायते ब्रह्मतेजः कस्मिन्कीदृक्प्रतिष्ठितम् ।

देवादिकों के तिरस्कार का निषेध— अतः इन सबों (देवादिकों) की भजन, पूजन तथा सेवा करने की सर्वदा इच्छा रखनी चाहिये। क्योंकि न जाने इन सबों के बीच किसमें कैसा ब्रह्मतेज (ईश्वरीय तेज) उपस्थित है। इनका तिरस्कार कभी उचित नहीं है।

पराधीनं नैव कुर्यात्तरुणीधनपुस्तकम् ॥ २२६ ॥
कृतं चेल्लभ्यते दैवाद् भ्रष्टं नष्टं विमर्दितम् ।

तरुणी आदि को पराधीन करने का निषेध— अपनी तरुणी स्त्री, धन या पुस्तक को किसी दूसरे के अधीन नहीं कर देना चाहिये। यदि कर दिया जाय तो दैवात् जब उनकी पुनः प्राप्ति होती है तो तरुणी स्त्री संभोग के द्वारा भ्रष्ट की हुई, धन नष्ट हुआ एवं पुस्तक फटी या मैली की हुई रहती है।

बह्वर्थं न त्यजेदल्पहेतुनाऽल्पं न साधयेत् ॥ २२७ ॥
बह्वर्थव्ययतो धीमानभिमानेन वै क्वचित् ।
बह्वर्थव्ययभीत्या तु सत्कीर्तिं न त्यजेत् सदा ॥ २२८ ॥

अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन-व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेध— बुद्धिमान व्यक्ति थोड़े से कार्य के लिये बहुत धन की प्राप्ति का त्याग न करे और अभिमान से कभी छोटे कार्य को सिद्ध करने के लिये अधिक धन का व्यय व्यर्थ न करे अर्थात् थोड़े व्यय से करे। और सदा 'बहुत धन का व्यय होगा' इस भय से सत्कीर्ति की प्राप्ति का त्याग न करे।

भटानामसदुक्त्या तु नेर्ष्येत् कुप्यान्न तैः सह ।

वीर सैनिकों के दुर्वचन सहने का निर्देश— वीर सैनिकों के दुर्वचन कहने पर उनसे ईर्ष्या (द्वेष) अथवा क्रोध न करे। किन्तु सहन ही करे।

लज्ज्यते च सुहृद्येन भिद्यते दुमना भवेत् ॥ २२६ ॥
वक्तव्यं न तथा किंचिद्विनोदेऽपि च धीमता ।

१६४शुक्रनीतिः

विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध—जिस वचन से मित्र लज्जित हो जाय या उसके मनमें फर्क पड़ जाय किंवा दुःखित चित्त हो जाय, वैसे वचनों को विनोद में भी बुद्धिमान व्यक्ति को थोड़ा भी नहीं कहना चाहिये ।

यस्मिन् सूक्तं दुरुक्तं च समं स्याद्वा निरर्थकम् ॥ २३० ॥
न तत्र प्रलपेत् प्राज्ञो वधिरेष्विव गायनः ।

अच्छा-बुरा कहने का असर न होने वाले से कुछ भी न कहने का निर्देश—जिस व्यक्ति के सामने अच्छा या बुरा कहना दोनों ही यदि बराबर या निरर्थक हो तो उसके समक्ष बुद्धिमान व्यक्ति प्रलाप ( व्यर्थ बात ) न करे क्योंकि उसका बात करना बहरे के सामने गाने के समान है ।

व्यसने सज्जमानं हि यो मित्रं नाभिपद्यते ॥ २३१ ॥
अनुनीय यथाशक्ति तं नृशंसं विदुर्बुधाः ।

बुरे व्यसनों से अलग न करनेवाले मित्र की नृशंसता का निर्देश—जो लोग द्यूत आदि बुरे व्यसनों में पड़े हुये अपने मित्र को यथाशक्ति समझा बुझाकर उससे अलग नहीं करते हैं अथवा उसके लिये यत्न नहीं करते हैं उन्हें पण्डित लोग नृशंस ( निष्ठुर ) समझते हैं ।

ज्ञातीनां हि मिथो भेदे यन्मित्रं नाभिपद्यते ॥ २३२ ॥
सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं न तन्मित्रं विदुर्बुधाः ।

कुमित्र के लक्षण—भाई आदियों का परस्पर भेद होने पर (दिल में फर्क आ जाने पर ) यदि कोई मित्र होकर भी उन लोगों का मध्यस्थ बनकर मनमुटाव नहीं दूर करता है तो उस ( मित्र ) को पण्डित लोग मित्र नहीं मानते हैं अर्थात् उसे कुमित्र मानते हैं ।

आजन्मसेवितं दानैर्मानैश्च परितोषितम् ॥ २३३ ॥
तीक्ष्णवाक्यानमित्रमपि तत्कालं याति शत्रुताम् ।
वक्रोक्तिशल्यमुद्धर्तुं न शक्यं मानसं यतः ॥ २३४ ॥

कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देश—जिसकी जन्म से ही सेवा की गई हो और दान तथा मान से पोषण किया गया हो ऐसा मित्र भी तीक्ष्ण वाक्यों के कहने से तत्काल ही शत्रु बन जाता है क्योंकि चित्त में चुभे हुये कटु-वचनरूपी कांटों को निकालफर दूर करने में वह समर्थ नहीं होता है। अतः मित्रों को भी तीक्ष्ण बातें नहीं सुनानी चाहिये ।

वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्स्यात् स्वबलाधिकः ।
ज्ञात्वा नष्टबलं तं तु भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि ॥ २३५ ॥

स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देश—जब तक शत्रु

तृतीयोऽध्यायः

१६५

अपने से बल में अधिक रहे तब तक उसे कन्धे पर रखे अर्थात् उसका आदर करे और जब समझ ले कि वह हीनबल हो गया तब उसे घड़े के समान पत्थर पर पटक कर नष्ट कर दे ।

न भूषयत्यलंकारो न राज्यं न च पौरुषम् ।
न विद्या न धनं तादृग् यादृक्सौजन्यभूषणम् ॥ २३६ ॥

'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश— जैसा सुजनतारूपी भूषण मनुष्य को भूषित करता है वैसा अलङ्कार, राज्य, पौरुष (पराक्रम), विद्या या धन नहीं भूषित करता है ।

अश्वे जवो वृषे धैर्य्यं मणौ कान्तिः क्षमा नृपे ।
हावभावौ च वेश्यायां गायके मधुरस्वरः ॥ २३७ ॥
दातृत्वं धनिके शौर्यं सैनिके बहुदुग्धता ।
गोषु दमस्तपस्विषु विद्वत्सु वाषदूकता ॥ २३८ ॥
सभ्येष्व पक्षपातस्तु तथा साक्षिषु सत्यवाक् ।
अनन्यभक्तिर्भृत्येषु सुहितोक्तिश्च मन्त्रिषु ॥ २३९ ॥
मौनं मूर्खेषु च स्त्रीषु पातिव्रत्यं सुभूषणम् ।
महादुभूषणं चैतद्विपरीतममीषु च ॥ २४० ॥

अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दुभूषणता का निर्देश— घोड़े में अधिक वेग, बैल में अधिक भारवहन की सामर्थ्य, मणि में चमक, राजा में क्षमा, वेश्या में हाव-भाव, गानेवाले में मधुर स्वर, धनी में दान देने की शक्ति, सैनिक में शूरता, गायों में बहुत दुग्ध देना, तपस्वियों में इन्द्रियों का दमन करना, विद्वानों में बोलने की अच्छी शक्ति, सभासदों में किसी का पक्षपात न करना, साक्षियों (गवाहों) में सत्य बोलना (सच्ची गवाही देना), भृत्यों में स्वामी की अनन्य भक्ति, मन्त्रियों में राजा के लिये सुन्दर हितकर वचन बोलना, मूर्खों में मौन रहना, स्त्रियों में पतिव्रताधर्म का पालन करना ही सुन्दर भूषण कहलाता है अर्थात् अन्यभूषण इन लोगों के लिये भूषण नहीं है। यदि इन सब घोड़े आदियों में वेगादि गुणों का अभाव हो तो उनकी सुन्दरता को अत्यन्त नष्ट करनेवाले होते हैं ।

गृहं बहुकुटुम्बेन दीपैर्गोभिः सुबालकैः ।
भात्येकनायकं नित्यं नैव निर्बहुनायकम् ॥ २४१ ॥

एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश— गृह में जब अधिक परिवार, बहुत से दीपकों का प्रकाश, बहुतसी गायें और बहुत से बालक सुन्दर हों तब उसकी नित्य शोभा होती है और जब तक गृह का

१६६ | शुक्रनीतिः

स्वामी एक व्यक्ति रहता है तभी तक उसकी शोभा बनी रहती है अनेक स्वामी होने पर शोभा नष्ट हो जाती है।

न च हिंस्रमुपेक्षेत शक्तो हन्याच्च तत्क्षणे ।

हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध— हिंसक पुरुषों या पशुओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये किन्तु सामर्थ्य हो तो तत्काल उनको नष्ट ही कर देना चाहिये क्योंकि देर करना अनिष्टकर होता है।

पैशुन्यं चण्डता चौर्यं मात्सर्यमतिलोभता ॥ २४२ ॥
असत्यं कार्यघातित्वं तथाऽलसकताऽप्यलम् ।
गुणिनामपि दोषाय गुणानाच्छाद्य जायते ॥ २४३ ॥

चुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश— चुगुलखोरी, तीक्ष्णता (अत्यन्तक्रोध), चोरी, मत्सरता, अतिलोभ, असत्य भाषण, कार्य नष्ट करना, अत्यन्त आलस्य ये सब दोष हैं अतः यदि ये गुणवानों को भी हों तो उनके सम्पूर्ण गुणों को ढंक देने वाले होते हैं। अर्थात् इन दोषों से वे निन्दा के पात्र बन जाते हैं।

मातुः प्रियायाः पुत्रस्य धनस्य च विनाशनम् ।
बाल्ये मध्ये च वार्धक्ये महापापफलं क्रमात् ॥ ४४ ॥

बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश— बाल्यावस्था में मां का, युवावस्था में प्रिया स्त्री का, वृद्धावस्था में पुत्र एवं धन का नष्ट हो जाना क्रमसे ये सब प्राक्तन महापाप के फल हैं।

श्रीमत्तामनपत्यत्वमधनानां च मूर्खता ।
स्त्रीणां षण्डपतित्वं च न सौख्यायेष्टनिर्गमः ॥ २४५ ॥

दुःखप्रद विषयों का निर्देश— धनवानों को पुत्र न होना, दरिद्रों को मूर्ख, स्त्रियों को नपुंसक पति मिलना, प्रिय वस्तुओं का अलग हो जाना, ये सब बातें सुख के लिये नहीं होती हैं अर्थात् दुःखप्रद होती हैं।

मूर्खः पुत्रोऽथवा कन्या चण्डी भार्या दरिद्रता ।
नीचसेवा ऋणं नित्यं नैतत्षट्कं सुखाय च ॥ २४६ ॥

सुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश— १. मूर्ख पुत्र अथवा २. कन्या, ३. अत्यन्त क्रोध करनेवाली स्त्री, ४. दरिद्रता, ५. नीच जातिवालों अथवा नीच पुरुषों की सेवा तथा ६. नित्य ऋण लेना ये ६ बातें सुखकारक नहीं होतीं हैं अर्थात् इनसे नित्य मनुष्य दुःखी रहता है।

नाध्यापने नाध्ययने न देवे न गुरौ द्विजे ।
न कलासु न सङ्गीते सेवायां नार्जवे क्रियाम् ॥ २४७ ॥
न शौर्ये न च तपसि साहित्ये रमते मनः ।

तृतीयोऽध्यायः

तृतीयोऽध्यायः १६७

यस्य मुक्तः खलः किं वा नररूपपशुश्च सः॥ २४८ ॥

**जीवन्मुक्त, खल वा पशु के तुल्य के लक्षण—**जिसका मन पढ़ाने या पढ़ने में और देवता, गुरु, ब्राह्मण, चित्रकला आदि कला, सङ्गीत, सेवा ( नौकरी ), सरलता, स्त्री, शूरता, तपस्या या साहित्य इनमें से किसी एक में भी नहीं रमता (लगता) है वह या तो जीवन्मुक्त या खल अथवा मनुष्य रूप में पशु है।

अन्योदयासहिष्णुश्च छिद्रदर्शी विनिन्दकः। द्रोहशीलः स्वान्तमलः प्रसन्नास्यः खलः स्मृतः॥ २४९ ॥

**खल पुरुष के लक्षण—**जो दूसरे के अभ्युदय (तरक्की) को नहीं सह सकनेवाला, दोष देखनेवाला, निन्दा करनेवाला, द्रोह रखनेवाला, मलिन हृदय-वाला, ऊपर प्रसन्नता दिखानेवाला होता है वह 'खल' कहलाता है।

एकस्यैव न पर्याप्तमस्ति यद् ब्रह्मकोशजम्। आशया वर्द्धितस्यास्ति तस्याल्पमपि पूर्तिकृत्॥ २५० ॥

**आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश—**ब्रह्माण्ड के अन्दर विद्यमान जितनी वस्तुयें हैं वे सभी जिसकी आशा बढ़ी हुई है ऐसे अकेले एक पुरुष की थोड़ी भी इच्छापूर्ति के लिये पर्याप्त नहीं हैं अर्थात् उनकी इच्छा की पूर्ति ब्रह्माण्ड की सारी वस्तुओं से भी नहीं हो सकती है।

करोत्यकार्यं साशोऽन्यं बोधयत्यनुमोदते।

आशा से युक्त पुरुष न करने योग्य कार्य को भी स्वयं करता है और अन्य को भी वैसे कार्य करने के लिये समझाता है तथा अनुमोदन करता है।

भवन्त्यन्योपदेशार्थं धूर्त्ताः साधुसमाः सदा॥ २५१ ॥ स्वकार्यार्थ प्रकुर्व्वन्ति ह्यकार्याणांशतं तु ते।

**धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश—**धूर्त लोग दूसरे को उपदेश देने के लिये अत्यन्त साधुपुरुषों के समान आचरण करते हैं किन्तु वे ही धूर्त स्वयं अपना कार्य सिद्ध करने के लिये सैकड़ों कुकृत्यों को कर डालते हैं।

पित्रोराज्ञां पालयति सेवने च निरालसः॥ २५२ ॥ छायेव वर्तते नित्यं यतते चागमाय वै। कुशलः सर्वविद्यासु स पुत्रः प्रीतिकारकः॥ २५३ ॥ दुःखदो विपरीतो यो दुर्गुणो धननाशकः।

**प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण—**जो पुत्र माता-पिता की आज्ञा का पालन करता है और उनकी सेवा करने में आलस्य नहीं करता है बल्कि छाया की भाँति सदा उनका अनुगमन करता है, धन या विद्या का अर्जन करने के

१६८शुक्रनीतिः

लिये नित्य प्रयत्नशील रहता है तथा सभी विद्याओं में निपुण होता है, वही (पुत्र) माता-पिता का आनन्द बढ़ानेवाला होता है। और जो माता-पिता की आज्ञा के विपरीत व्यवहार करनेवाला, दुर्गुणों से युक्त तथा धन नष्ट करनेवाला होता है वह दुःखदायी होता है।

पत्यौ नित्यं चानुरक्ता कुशला गृहकर्मणि ॥ २५४॥
पुत्रप्रसूः सुशीला या प्रिया पत्युः सुयौवना।

प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण— जो स्त्री अपने पति में नित्य अनुराग रखनेवाली, गृहकार्य में चतुर, पुत्र पैदा करनेवाली, सुशीला और सुन्दर यौवनवाली होती है, वह पति की प्यारी होती है।

पुत्रापराधान् क्षमते या पुत्रपरिपोषिणी ॥ २५५॥
सा माता प्रीतिदा नित्यं कुलटाऽन्याऽतिदुःखदा।

आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण— जो माता पुत्रों के अपराधों को क्षमा करनेवाली एवं उनका परिपोषण करनेवाली है वह नित्य आनन्द देनेवाली होती है, इससे अन्य जो माता कुलटा (व्यभिचारिणी) है वह अत्यन्त दुःख देनेवाली होती है।

विद्यागमार्थं पुत्रस्य वृत्त्यर्थं यतते च यः ॥ २५६॥
पुत्रं सदा साधु शास्ति प्रीतिकृत्स पिताऽनृणी।

आनन्ददायक पिता के लक्षण— जो पिता पुत्र को विद्वान बनाने के लिये एवं उसकी स्थायी जीविका रखने के लिये प्रयत्न करता है और पुत्र को सदा अच्छी शिक्षा देता रहता है एवं अपने ऊपर किसी का ऋण नहीं रखता है वह आनन्ददायक होता है अथवा वह आनन्ददायक तथा पुत्र के ऋण से उऋण होता है।

यः साहाय्यं सदा कुर्यात् प्रतीपन्न वदेत् क्वचित् ॥ २५७॥
सत्यं हितं वक्ति याति दत्ते गृह्णाति मित्रताम्।

मित्र के लक्षण— जो व्यक्ति सदा सहायता करे और कभी प्रतिकूल बात न कहे तथा सत्य एवं हितकर वचनों का उपदेश करे और धनादि दे तथा स्वयं प्रेमवश ले भी वही मित्र बन जाता है, अर्थात् जो मित्र होते हैं उनके ये लक्षण हैं।

नीचस्यातिपरिचयो ह्यन्यगेहे सदा गतिः ॥ २५८॥
जातौ संघे प्रातिकूल्यं मानहान्यै दरिद्रता।

मानहानिकारक कार्यों का निर्देश— नीच पुरुषों के साथ अत्यन्त घनिष्ठता, दूसरे के घर बराबर जाना, जिस जाति में स्वयं हो उस (ब्राह्मणादि) जाति

तृतीयोऽध्यायः

१६६

के लोगों के अथवा जिस समूह में हो उसके साथ प्रतिकूल आचरण करना एवं दरिद्रता ये सब मानहानि करनेवाले हैं अर्थात् इन सबों के होने से मानहानि होती है ।

व्याघ्राग्निसर्पहिंस्राणां नहि सङ्घर्षणं हितम् ॥ २५९ ॥
सेवितत्वात्तु राज्ञो नैते मित्राः कस्य सन्ति किम् ।

मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संघर्ष रखने का निषेध—'इन सबों की मैंने सेवा की है' इस साहस से राजा, व्याघ्र, अग्नि, सर्प तथा हिंसक पुरुष इनके साथ अधिक संघर्ष रखना हितकर नहीं होता है क्योंकि ये सब राजा-व्याघ्रादि क्या किसी के मित्र होते हैं ? अर्थात् किसी के मित्र नहीं होते हैं, इनको रुष्ट होते देर नहीं लगता है ।

दौर्मनस्यं च सुहृदां सुप्राबल्यं रिपोः सदा ॥ २६० ॥
विद्वत्स्वपि च दारिद्र्यं दारिद्र्ये बह्वपत्यता ।
धनिगुणि वैद्यनृपजलहीने सदा स्थितिः ॥ २६१ ॥
दुःखाय कन्यकाऽप्येका पित्रोरपि च याचनम् ।

**दुःखकारक कार्यों का निर्देश—**मित्रों या बन्धुओं का दुःखी होकर दिल फेर लेना, शत्रुओं की सदा प्रबलता, विद्वानों की दरिद्रता, दरिद्रता की अवस्था में बहुत सन्तान होना, धनिक, गुणी, वैद्य, राजा तथा जल से रहित देश में सदा निवास करना, माता-पिता के लिये एक भी कन्या का उत्पन्न होना और किसी से मांगना ये सब दुःखकारक होते हैं ।

सुरूपः सधनः स्वामी विद्वानपि बलाधिकः ॥ २६२ ॥
न कामयेद्यथेष्टं यत् स्त्रीणां नैव सुसौख्यकृत् ।
यो यथेष्टं कामयते स्त्री तस्य वशगा भवेत् ॥ २६३ ॥

**स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश—**पति भले ही सुन्दर स्वरूप, धन तथा विद्या से युक्त एवं अधिक बलशाली हो किन्तु यदि वह यथेष्ट प्रेम न करे तो स्त्रियों के लिये सुन्दर सुखकारक नहीं होता है अर्थात् स्त्रियां स्वामी के प्रेम से ही अधिक सुख मानती हैं ।

सन्धारणाल्लालनाच्च यथा याति वशं शिशुः ।

**स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय—**जैसे गोदी में उठाकर लेने और लाड़-प्यार करने से बच्चे वश में हो जाते हैं उसी भांति जो पति जिस स्त्री का यथेष्ट प्यार करता है वह स्त्री उसके वशीभूत हो जाती है ।

कार्यं तत्साधकादींश्च तद्व्ययं सुविनिर्गमम् ॥ २६४ ॥
विचिन्त्य कुरुते ज्ञानी नान्यथा लघ्वपि क्वचित् ।

व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का

१७० : शुक्रनीतिः

निर्देश—जानकार व्यवसायी किसी कार्य (व्यवसाय) को आरम्भ करने के प्रथम यह कार्य कैसा है ? इसके कौन २ से साधन (उपाय) हैं ? इसमें कितना व्यय है ? इसकी निकास (खपत) कैसी है अथवा जो व्यय होगा उससे लाभ कैसा है ? इन सबों को भलीभांति विचार करके पश्चात् कार्य करता है अन्यथा बिना विचार किये कोई छोटा भी कार्य कभी नहीं करता है ।

न च व्ययाधिकं कार्यं कर्तुमीहेत पण्डितः ॥ २६५ लाभाधिक्यं यत्क्रियते स सेवेद् व्यवसायिभिः । मूल्यं मानं च पण्यानां याथात्म्यान्मृग्यते सदा ॥ २६६ ॥

अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश—विज्ञजन को अधिक व्यय और स्वल्प लाभवाले कार्य करने की इच्छा नहीं रखनी चाहिये । और जिसमें अधिक लाभ हो ऐसे कार्य व्यवसायियों को करना चाहिये अर्थात् इससे अन्य कम लाभवाले कार्य छोड़ देने चाहिये और सदा बेचने योग्य द्रव्यों के मूल्य तथा तौल या संख्या का यथार्थ रूप से ख्याल रखना चाहिये ।

तपःस्त्रीकृषिसेवासूपभोग्ये नापि भक्षणे । हितः प्रतिनिधिनित्यं कार्येऽन्ये तं नियोजयेत् ॥ २६७ ॥

तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश—तपस्या करना, स्त्री (पत्नी), कृषि (खेती), सेवा, किसी वस्तु का उपभोग करना, भोजन करना । इन सबों के लिए अपना प्रतिनिधि किसी को बनाना हितकर नहीं है अर्थात् हानि की सम्भावना है । इससे अन्य कार्यों में प्रतिनिधि की नियुक्ति ठीक होती है ।

निर्जनत्वं मधुरभुग् जारश्चोरः सदेच्छति । साहाय्यं तु बलिद्विष्टं वेश्या धनिकमित्रताम् ॥ २६८ ॥ कुनृपश्च छलं नित्यं स्वामिद्रव्यं कुसेवकः । तत्त्वं तु ज्ञानवान् दम्भं तपोऽग्निं देवजीवकः ॥ २६९ ॥

मधुरभोजी आदिको निर्जनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश—मिठाई खानेवाला, स्त्री-लम्पट (व्यभिचारी), चोर ये सब सदा निर्जनता (एकान्त जहां पर कोई दूसरा न रहे) चाहते हैं । बली शत्रु से आक्रान्त हुआ पुरुष सहायता की, वेश्या-धनियों के साथ मित्रता की, दुष्ट राजा-छल की, दुष्ट नौकर स्वामी के धन की, ज्ञानी पुरुष तत्त्व जानने की, पुजारी (वेतन लेकर देवपूजा करनेवाला), दम्भ (पाखण्ड), तप और अग्नि की नित्य इच्छा करते हैं ।

योग्या कान्तं च कुलटा जारं वैद्यं च व्याधितः । घृतपण्यो महार्घत्वं दानशीलं तु याचकः ॥ २७० ॥

तृतीयोऽध्यायः १७१

तृतीयोऽध्यायः १७१

रक्षितारं मृगयते भीतश्छिद्रं तु दुर्जनः।

योग्य कुलवधू स्त्री पति को, कुलटा स्त्री-जार (परस्त्रीगामी उपपति) को, रोगी वैद्य को, दूकानदार-महंगाई को, याचक-दानशील को, भयभीत पुरुष रक्षा करनेवाले को और दुर्जन छिद्र (दोष या बुराई करने के अवसर) को सदा ढूँढ़ता रहता है।

चण्डायते विवदते स्वपित्यश्नाति मादकम् ॥ २७१ ॥ करोति निष्फलं कर्म मूर्खो वा स्वेष्टनाशनम् ।

**मूर्ख जनों के कृत्य—**मूर्खजन कभी अत्यन्त क्रोधी के समान आचरण करता है, कभी झगड़ा करता है, कभी अधिक सोता है, कभी मादक (भांग-शराब आदि) द्रव्य भक्षण करता है, कभी कार्य को निष्फल और कभी अपना इष्ट कार्य या वस्तु को नष्ट कर देता है।

तमोगुणाधिकं क्षात्रं ब्राह्मं सत्त्वगुणाधिकम् ॥ २७२ ॥ अन्यद्रजोधिकं तेजस्तेषु सत्त्वाधिकं वरम् ।

**सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देश—**क्षत्रियोँ का तेज अधिक तमोगुणी, ब्राह्मणों का तेज अधिक सत्त्वगुणी, इससे अन्य वैश्यों का तेज अधिक रजोगुणी होता है। इन सबों में अधिक सत्त्वगुणी तेज ही श्रेष्ठ होता है।

सर्वाधिको ब्राह्मणस्तु जायते हि स्वकर्मणा ॥ २७३ ॥ तत्तेजसोऽनुतेजांसि सन्ति च क्षत्रियादिषु ।

**स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश—**और इन सबों में ब्राह्मण ही अपने अध्ययन-अध्यापनादि ६ कर्मों के द्वारा सबसे अधिक श्रेष्ठ होता है। क्षत्रियादि अन्य वर्णों में जो तेज हैं वे ब्राह्मण के तेज से हीन (न्यून) हैं।

स्वधर्मस्थं ब्राह्मणं हि दृष्ट्वा बिभ्यति चेतरे ॥ २७४ ॥ क्षत्रियादिर्नान्यथा स्वधर्मं चातः समाचरेत् ।

**स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश—**ब्राह्मण को अपने धर्म में स्थित देखकर अन्य क्षत्रियादि जाति के लोग उससे डरते हैं अन्यथा (अपने धर्म से च्युत रहने पर) नहीं डरते हैं। अतः ब्राह्मण को अपने धर्म का आचरण करना चाहिये।

न स्यात् स्वधर्महानिस्तु यथा वृत्त्या च सा वरा ॥ २७५ ॥ स देशः प्रवरो यत्र कुटुम्बपरिपोषणम् ।

**धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता—**जिस आजीविका से अपने धर्म की हानि न हो वही आजीविका श्रेष्ठ है। जिस देश में अपने कुटुम्ब का भलीभांति पोषण हो वही देश सबसे उत्तम है।

१७२ | शुक्रनीतिः

कृषिस्तु चोत्तमा वृत्तिर्या सरिन्मातृका मता ॥ २७६ ॥
मध्यमा वैश्यवृत्तिश्च शूद्रवृत्तिस्तु चाधमा ।
कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता— नदी से सींची जानेवाली कृषि (खेती) उत्तम आजीविका है। वैश्यवृत्ति (व्यवसाय-गोरक्षा आदि) मध्यम आजीविका है। शूद्रवृत्ति (सेवा) अधम आजीविका है।

याच्ञाऽधमतरा वृत्तिर्ह्युत्तमा सा तपस्विषु ॥ २७० ॥
क्वचित्सेवोत्तमा वृत्तिर्धर्मशीलन्नृपस्य च ।
भिक्षा की अधमता तथा क्वचित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता— भिक्षावृत्ति अत्यन्त अधम आजीविका है किन्तु वही तपस्वियों के लिये उत्तम है। कहीं पर धर्मशील राजा की सेवा भी उत्तम आजीविका मानी जाती है।

आध्वर्यवादिकं कर्म कृत्वा या गृह्यते भृतिः ॥ २७८ ॥
सा किं महाधनायैव वाणिज्यमल्पमेव किम् ।
आध्वर्यवादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश— यजुर्वेदोक्त अध्वर्यु-सम्बन्धी कर्म करके जो दक्षिणास्वरूप में वेतन लिया जाता है क्या वह महाधन की प्राप्ति के लिये पर्याप्त होता है ? अर्थात् कभी नहीं क्योंकि वह थोड़ा होता है। और वाणिज्य (व्यवसाय) भी क्या महाधन के लिये पर्याप्त होता है ? अर्थात् नहीं।

राजसेवां विना द्रव्यं विपुलं नैव जायते ॥ २७९ ॥
राजसेवाऽतिगहना बुद्धिमद्भिर्विना न सा ।
कर्तुं शक्या चेतरेण ह्यसिधारेव सा सदा ॥ २८० ॥
बिना राजसेवा के विपुल धन-प्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश— वस्तुतः बिना राजसेवा के विपुल धन की प्राप्ति नहीं होती है किन्तु राजसेवा अत्यन्त गहन (कठिन) है और बुद्धिमान को छोड़कर अन्य मूर्खजनों के द्वारा वह नहीं की जा सकती है क्योंकि वह तलवार की धार के समान तीक्ष्ण है उसपर मूर्ख लोग सदा नहीं चल सकते हैं।

व्यालग्राही यथा व्यालं मन्त्री मन्त्रबलान्नृपम् ।
करोत्यधीनं तु नृपे भयं बुद्धिमतां महत् ॥ २८१ ॥
राजाओं के साथ सर्प की भांति सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश— सर्प पकड़नेवाला जैसे मन्त्र के बल से सांप को अपने अधीन करता है वैसे ही मन्त्री को भी अपने मन्त्र अर्थात् मन्त्रणा (उचित सलाह) के बल से राजा को अधीन करना चाहिये इसीसे राजा को बुद्धिमानों से अधिक भय रखना चाहिये अर्थात् सतर्कता से व्यवहार करना चाहिये।

तृतीयोऽध्यायः । १७३

तृतीयोऽध्यायः । १७३

ब्राह्मं तेजो बुद्धिमत्सु क्षात्रं राज्ञि प्रतिष्ठितम् । आरादेव सदा चास्ति तिष्ठन् दूरेऽपि बुद्धिमान् ॥ २८२ ॥ बुद्धिपाशैर्बन्धयित्वा सन्ताडयति कर्षति । समीपस्थोऽपि दूरेऽस्ति ह्यप्रत्यक्षसहायवान् ॥ २८३ ॥

दूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश — बुद्धिमान व्यक्तियों में ब्राह्मण-सम्बन्धी तेज तथा राजा में क्षत्रिय-सम्बन्धी तेज स्थापित है। अतः बुद्धिमान लोग दूर रहते हुये भी सदा समीप में ही रहने के समान हैं। और वह बुद्धिरूपी रस्सी से राजा या शत्रु को बांधकर अच्छी तरह से उसको पीटता है और अपने पास खींच लेता है। एवं छिपकर अपने साथियों के साथ समीप में रहता हुआ दूर रहने के समान है।

नानुवाकहता बुद्धिर्व्यवहारक्षमा भवेत् । अनुवाकहता या तु न सा सर्वत्र गामिनी ॥ २८४ ॥

वेदादि के पण्डितों का विना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश— अनुवाक (वेद का एक विभाग विशेष) की आलोचना करने से मारी गई बुद्धि लौकिक व्यवहार समझने में समर्थ नहीं होती है क्योंकि वह अनुवाक से मारी हुई होने से सर्वत्र घुसने वाली नहीं होती। अर्थात् वेदादि के पण्डित बिना नीतिशास्त्र के लोकव्यवहार में चतुर नहीं हो सकते हैं।

आदौ वरं निर्धनत्वं धनिकत्वमनन्तरम् । तथादौ पादगमनं यानगत्वमनन्तरम् ॥ २८५ ॥ सुखाय कल्पते नित्यं दुःखाय विपरीतकम् ।

प्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश— पहले दरिद्र होना पीछे धनी होना एवं पहले पैदल चलना बाद में सवारी पर चढ़ना अच्छा होता है क्योंकि इससे सुख मिलता है और यदि इससे विपरीत हो तो दुःख होता है।

वरं हि त्वनपत्यत्वं मृतापत्यवतः सदा ॥ २८६ ॥ दुष्टयानात्पादगमो ह्यौदासीन्यं विरोधतः ।

**मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश—**सन्तान होकर मर जाने की अपेक्षा निःसन्तान रहना, दुष्ट घोड़े आदि की सवारी से पैदल चलना और झगड़ा करने से तटस्थ (उदासीन) बना रहना अच्छा होता है।

वरं देशाच्छादनतश्चर्मणा पादगूहनम् ॥ २८७ ॥ ज्ञानलवदौर्विदग्ध्यादज्ञता प्रवरा मता ।

चलने-फिरने के प्रदेश को चमड़े से ढंक देने की अपेक्षा चमड़े का जूता