भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

३०२ | शुक्रनीतिः

पाप करनेवाला व्यक्ति यह समझता है कि कोई पाप करते हुये मुझको नहीं देख रहा है किन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि उसे देवता लोग एवं उसके अन्तर्रात्मा देखते रहते हैं।

सुकृतं यत्त्वया किञ्चिज्जन्मान्तरशतैः कृतम् ।
तत्सर्वं तस्य जानीहि यं पराजयसे । मृषा ॥ २०६ ॥
समाप्नोषि च तत्पापं शतजन्मकृतं सदा ।

सैकड़ों जन्मों में तपस्या करके तुमने जिन पुण्यों का उपार्जन किया है वे उस व्यक्ति को प्राप्त हो जावेंगे, जिसको तुम झूठ बोलकर पराजित कर दोगे और उस पराजित पुरुष के सैकड़ों जन्मों के सभी पापों को प्राप्त करोगे इसे जान लो।

साक्षिणं श्रावयेदेवं सभायामरहोगतम् ॥ २०७ ॥
दद्याद्देशानुरूपं तु कालं साधनदर्शने ।
उपाधिं वा समीक्ष्यैव दैवराजकृतं सदा ॥ २०८ ॥

इस प्रकार से सभा में सबके समक्ष साक्षी को अवश्य सुना देवे। और साधन (प्रमाण) दिखाने के लिये जो समय दे वह देश के अनुरूप होना चाहिये। अथवा दैव तथा राजा के द्वारा की हुई दुर्घटना का भी सदा विचार रखकर समय दे।

विनष्टे लिखिते राजा साक्षिभोगैर्विचारयेत् ।

लिखित के नष्ट हो जाने पर साक्षी एवं भोग (कब्जा) के आधार पर विचार करे।

लेखसाक्षिबिनाशे तु सद्भोगादेव चिन्तयेत् ॥ २०९ ॥

लेख और साक्षी न मिलने पर भोग से ही विचार करने का निर्देश—
और जहां पर लेख तथा साक्षी दोनों नष्ट हो गये हों वहां पर सज्जनकृत भोग (कब्जा) देखकर ही विचार करे।

सद्भोगाभावतः साक्षिलेखतो विमृशेत् सदा ।

और जहां पर सज्जनकृत कब्जा नहीं है वहां पर साक्षी तथा लेख के द्वारा सदा विचार करना चाहिये।

केवलेन च भोगेन लेखेनापि च साक्षिभिः ॥ २१० ॥
कार्यं न चिन्तयेद्राजा लोकदेशादिधर्मतः ।

राजा लोक तथा देश आदि के धर्म का विचार कर केवल भोग (कब्जा), लेख या साक्षी के आधार पर ही मुकदमे का फैसला न कर देवे। बल्कि यथासंभव सभी के आधार पर विचार करे।

कुशला लेख्यबिम्बानि कुर्वन्ति कुटिलाः सदा ॥ २११ ॥

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०३

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०३

तस्मान्न लेख्यसामर्थ्यात् सिद्धिरैकान्तिकी मता ।
**ठगों और कुटिलोँ द्वारा बनावटी लेख कर लेने का निर्देश—**निपुण जालसाज लोग सदा किसी लिखावट का तदनुरूप नकल कर लेते हैं। इसलिये केवल लेख के आधार पर फैसला करना पूर्णरूप से उचित नहीं माना गया है।

स्नेहलोभभयक्रोधैः कूटसाक्षित्वशङ्कया ॥ २१२ ॥
केवलैः साक्षिभिर्नैव कार्यं सिध्यति सर्वदा ।
**केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश—**स्नेह, लोभ, भय, अथवा क्रोधवश होकर भी मनुष्य झूठी साक्षी दे सकता है, इस शंका से केवल साक्षी के आधार पर भी सदा अभियोग का उचित निर्णय नहीं हो सकता है।

अस्वामिकं स्वामिकं वा भुङ्क्ते यद् बलदर्पतः ॥ २१३ ॥
इति शङ्कितभोगेन कार्यं सिध्यति केवलैः ।
**केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश—**अपने बल के घमण्ड में आकर भी मनुष्य चाहे अपनी वस्तु हो या दूसरे की किन्तु उसपर जबर-दस्ती कब्जा कर सकता है। इस लिये भोग (कब्जा) के विषय में भी सन्देह होने से केवल उसी के आधार पर ही फैसला नहीं किया जा सकता है।

शङ्कितव्यवहारेषु शङ्क्येदन्यथा नहि ॥ २१४ ॥
अन्यथा शङ्कितान् सभ्यान् दण्डयेच्चौरवन्नृपः ।
**अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जिन व्यवहारों (मुकदमों) में उचित शंका हो चुकी है उनमें पुनः विपरीत शङ्का नहीं उपस्थित करनी चाहिये। यदि कोई सभा (जूरी आदि) विपरीत शङ्का उपस्थित करे तो राजा उसे चोर के समान दण्ड दे।

अन्यथा शङ्कनान्नित्यमनवस्था प्रजायते ॥ २१५ ॥
लोको विभिद्यते धर्मो ह्यव्यवहारश्च हीयते ।
**विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश—**विपरीत शङ्का करने से व्यवहार में अनवस्था उत्पन्न होने से जल्दी निर्णय न हो सकेगा। और लोकधर्म बिगड़ जावेगा तथा व्यवहार का क्रम भी टूट जायगा।

सागमो दीर्घकालश्च निराक्रोशो निरन्तरः ॥ २१६ ॥
प्रत्यर्थिसन्निधानश्च भुक्तो भोगः प्रमाणवत् ।
**प्रामाणिक भोग के लक्षण—**आगम (लेख) के सहित, और दीर्घकाल का भोग (कब्जा) प्रामाणिक होता है और यदि स्वामी का अपनी वस्तु से विच्छेद हो गया हो या उसने एकदम से उसे छोड़ दिया हो और प्रतिवादी उसके समीप ही रहता हो तो वहां पर कब्जा प्रामाणिक माना जाता है।

३०४ | शुक्रनीतिः

सम्भोगं कीर्तयेद्यस्तु केवलं नागमं क्वचित् ॥ २१७ ॥ भोगच्छलापदेशेन विज्ञेयः स तु तस्करः ।

केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश— जो केवल अपना भलीभांति कब्ज़ा ही दिखाता है किन्तु लेख नहीं दिखाता है । वह छलपूर्वक कब्ज़ा कहलाता है अत एव उसे चोर समझना चाहिये अर्थात् वह दण्डनीय है ।

आगमेऽपि बलं नैव भुक्तिः स्तोकाऽपि यत्र नो ॥ २१८॥

केवल आगम (लेख) के भी प्रबल न होने का निर्देश— जहाँ पर थोड़ा भी कब्ज़ा नहीं है वहाँ पर लेख का केवल प्रमाण माननीय नहीं होता है ।

यं कञ्चिद्दश वर्षाणि सन्निधौ प्रेक्षते धनी । भुज्यमानं परैरर्थं न स तं लब्धुमर्हति ॥ २१९॥

जो किसी अपनी वस्तु को समीप में स्वयं रहता हुआ दूसरे के द्वारा भोग करते हुये देखकर भी नहीं आपत्ति करता है और इस भांति से यदि १० वर्ष व्यतीत हो जाय तो स्वामी उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं होता है ।

वर्षाणि विंशतियेस्य भूर्मुक्ता तु परैरिह । सति राज्ञि समर्थस्य तस्य सेह न सिध्यति ॥ २२० ॥

जिसकी जमीन को कोई दूसरा बीस वर्ष से भोग रहा हो किन्तु समर्थ रहने पर भी वह आपत्ति नहीं करता है तो राजा के रहते हुये भी वह व्यक्ति इस लोक में पुनः उक्त भूमि को नहीं प्राप्त कर सकता है ।

अनागमं तु यो भुङ्क्ते बहून्यब्दशतान्यपि । चौरदण्डेन तं पापं दण्डयेत् पृथिवीपतिः ॥ २२१ ॥

जिस भूमि को बिना लिखित प्रमाण के कोई कई सौ वर्षों से भोग रहा हो किन्तु जब उसके वस्तुतः स्वामी का पता लग जाय तो राजा कब्ज़ा करने-वाले उस पापी को चोर की भाँति दण्ड दे ।

अन्नागमादपि याभुक्तिर्विच्छेदोपरमोज्झिता । षष्टिवर्षात्मिका साऽपहर्तुं शक्या न केनचित् ॥ २२२ ॥

६० वर्ष से भोग में आती हुई वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा सकने का निर्देश— किसी वस्तु पर बिना लेख के जो किसी का कब्ज़ा हो, और स्वामी का उस वस्तु से विच्छेद हो या उसने एकदम से छोड़ दिया हो तो ६० वर्ष व्यतीत हो जाने पर उसे पुनः उस कब्ज़ा करनेवाले से कोई दूसरा नहीं छुड़ा सकता ।

आधिः सीमा बालधनं निक्षेपोपनिधिस्तथा । राजस्वं श्रोत्रियस्वं च न भोगेन प्रणश्यति ॥ २२३ ॥

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् | ३०५

आधि आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश—आधि (धरोहर), ग्राम की सीमा, बालक का धन, गिरवी रखी हुई वस्तु, स्त्री का धन, राजधन, वेदपाठी का धन इनपर कब्जा होने से ही कोई नहीं प्राप्त कर सकता है।

उपेक्षां कुर्वतस्तस्य तूष्णीम्भूतस्य तिष्ठतः।
काले विपन्ने पूर्वोक्ते तत्फलं नाप्नुते धनी ॥ २२४ ॥

उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का निर्देश—और यदि कोई स्वामी अपनी वस्तु पर किसी के कब्जे को देखकर भी उपेक्षा कर दे और कोई आपत्ति न करे इस भाँति से यदि ऊपर लिखित समय भी व्यतीत हो जाय तो वह पुनः उस वस्तु को पाने का अधिकारी नहीं हो सकता।

भोगः संक्षेपतश्चोक्तस्तथा दिव्यमथोच्यते।

अब दिव्य कहने का निर्देश—यहां तक ‘भोग’ (कब्जा) के विषय में संक्षेपतः कहा गया है और अब ‘दिव्य’ का वर्णन करते हैं।

प्रमादाद्धनिनो यत्र त्रिविधं साधनं न चेत् ॥ २२५ ॥
अर्थञ्चापह्नुते वादी तत्रोक्तस्त्रिविधो विधिः।

त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश—यदि किसी वस्तु के स्वामी के प्रमाद से जिस मुकद्दमे में पूर्वोक्त तीन प्रकार के (लेख, कब्जा, साक्षी) साधन न हो सकें और वादी उसकी वस्तु को ले लेना चाहता हो तो वहां पर तीन प्रकार की विधि कही हुई है।

चोदनाप्रतिकालश्च युक्तिलेशस्तथैव च ॥ २२६ ॥
तृतीयः शपथः प्रोक्तस्तैरेवं साधयेत् क्रमात्।

प्रथम—चोदनाप्रतिकाल (बारम्बार प्रेरणा करने पर भी वादी के वचन का उत्तर न देना), द्वितीय—युक्तिलेश (युक्तियों का प्रयोग), तृतीय—शपथ ये क्रम से तीन प्रकार के कहे हुये साधनों से कार्य-सिद्धि करे।

विशिष्टतर्किता या च शास्त्रशिष्टाविरोधिनी ॥ २२७ ॥
योजना स्वार्थसंस्सिद्धयै सा युक्तिस्तु न चान्यथा।

युक्ति के लक्षण—उत्तम प्रकार से जिस पर तर्क किया गया हो और जो शास्त्र और शिष्ट पुरुषों के अविरुद्ध हो ऐसी स्वार्थसिद्धि के लिये बनाई गई योजना को ‘युक्ति’ कहते हैं। अन्य रीति से बनी हुई हो तो नहीं।

दानं प्रज्ञापनं भेदः सम्प्रलापः क्रिया च या ॥ २२८ ॥
चित्तापन्वयनं चैव हेतवो हि विभावकाः।

कार्यसाधक हेतुओं के लक्षण—देना, समझाना, फोड़ना, उत्तम प्रकार का क्षोभ दिखाना, मनको अपनी ओर आकर्षित करना इन सबों से रहस्य का पता लगने से ये सब ‘विभावक’ हेतु कहलाते हैं।

२० शु०

३०६ | शुक्रनीतिः

अभीक्ष्णं चोद्यमानोपि प्रतिहन्यान्न तद्वचः ॥ २२९ ॥
त्रिचतुःपञ्चकृत्वो वा परतोऽर्थं स दाप्यते ।

धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण— बार-बार प्रेरणा करने पर भी जो प्रतिवादी के वचन को न काटे अर्थात् कोई उत्तर न दे ऐसा तीन, चार या पांच बार करने पर भी उत्तर न देना उस प्रतिवादी से वादी को धन दिलानेवाला हो जाता है अर्थात् वादी का अभियोग सत्य होने से उसका विजय हो जाता है ।

युक्तिष्वप्यसमर्थासु दिव्यैरेनं विमर्दयेत् ॥ २३० ॥
यस्माद्देवैः प्रयुक्तानि दुष्करार्थे महात्मभिः ।

जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के लिये दिव्य करने का निर्देश— जहां पर युक्तियों से काम न चल सकता हो वहां पर दिव्य शपथों का प्रयोग करना उचित होता है क्योंकि साधन-विहीन व्यवहार में, कठिनाई आने पर महात्मा देवताओं ने दिव्य शपथों का प्रयोग किया था ।

परस्परविशुद्ध्यर्थं तस्माद्दिव्यानि नामतः ॥ २३१ ॥
सप्तर्षिभिश्च भित्सार्थे स्वीकृतान्यात्मशुद्धये ।

इससे वादी-प्रतिवादी की परस्पर विशुद्धि के लिये ही ये 'दिव्यशपथ' हैं, जिसे अन्न-हरण रूप दोष उपस्थित होने पर आत्मशुद्धि के लिये सप्तर्षियों ने भी स्वीकार किया था ।

स्वमहत्त्वाच्च यो दिव्यं न कुर्याज्ज्ञानदर्पतः ॥ २३२ ॥
वसिष्ठाद्याश्रितं नित्यं स नरो धर्मतस्करः ।

दिव्य को न मानने पर 'धर्मतस्कर' होने का निर्देश— जो अपने बड़प्पन और ज्ञान के घमण्ड से दिव्य शपथों को नहीं ग्रहण करता है, जिसे कि वशिष्ठादि महर्षियों ने भी सदा ग्रहण किया था । वह मनुष्य 'धर्मतस्कर' ( धर्म का चोर ) है ।

प्राप्ते दिव्येऽपि न शपेद् ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ॥ २३३ ॥
संहरन्ति च धर्मार्थं तस्य देवा न संशयः ।

जो ज्ञान-दुर्बल ( मूर्ख ) ब्राह्मण समय आने पर दिव्यशपथ ग्रहण नहीं करता है । उसके धर्म और अर्थ को देवता लोग निःसन्देह हरण कर लेते हैं ।

यस्तु स्वशुद्धिमन्विच्छन् दिव्यं कुर्यादतन्द्रितः ॥ २३४ ॥
विशुद्धो लभते कीर्तिं स्वर्गं चैवान्यथा नहि ।

दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश— अपनी विशुद्धि की इच्छा रखनेवाला जो मनुष्य आलस्य छोड़कर दिव्यशपथ ग्रहण करता है

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०७

वह विशुद्ध होकर लोक में कीर्ति तथा परलोक में स्वर्ग निश्चय प्राप्त करता है। अन्यथा नहीं प्राप्त करता है।

अग्निर्विषं घटस्तोयं धर्माधर्मौ च तण्डुलाः ॥ २३५ ॥
शपथाश्चैव निर्दिष्टा मुनिभिर्दिव्यनिर्णये।

दिव्य-निर्णय में पदार्थों का निर्देश— दिव्य परीक्षा द्वारा निर्णय करने में अग्नि, विष, तुला, जल, धर्म-अधर्म, चावल और शपथ इन सबों का निर्देश किया है।

पूर्वं पूर्वं गुरुतरं कार्यं दृष्ट्वा ऽनियोजयेत् ॥ २३६ ॥
लोकप्रत्ययतः प्रोक्तं सर्वं दिव्यं गुरु स्मृतम् ।

इनमें उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व के दिव्य चावल आदि अधिक महत्त्व-शाली हैं। इनका प्रयोग यथायोग्य कार्य की गुरुता देखकर ही किया जाता है। साधारणतया लोगों का विश्वास होने से सभी दिव्य शपथ गौरवपूर्ण माने जाते हैं।

तप्तायोगोलकं धृत्वा गच्छेन्नव पदं करे ॥ २३७ ॥
तप्ताङ्गारेषु वा गच्छेत् पद्भ्यां सप्त पदानि हि ।
तप्ततैलगतं लोहमाषं हस्तेन निर्हरेत् ॥ २३८ ॥
सुतप्तलोहपत्रं वा जिह्वया संलिहेदपि ।

अग्नि दिव्य के प्रकार का निर्देश— तपाने से लाल हुये लोहे के गोले को हाथ में लेकर कुछ दूर चले यदि हाथ में जलने का न चिह्न हो या जलते हुये अंगारों पर ७ पग नंगे पैरों से चले किन्तु पैर न जले किंवा खौलते हुये तेल में से लोहे के उरदों को हाथ से निकाले किन्तु हाथ न जले अथवा अत्यन्त तपाने से लाल हुये लोह के पत्थरों को जीभ से चाटे पर जीभ न जले।

गरं प्रभक्षयेद्धस्तैः कृष्णसर्पं समुद्धरेत् ॥ २३९ ॥
कृत्वा स्वस्य तुलासाम्यं हीनाधिक्यं विशोधयेत् ।

गर तथा घट दिव्य के प्रकार का निर्देश— विष का भक्षण करे या हाथ से काले सर्प को बांबी आदि में से निकालते समय डँसे जाने पर विष का असर न हो तो निर्दोष जानना चाहिये। और तुला (तराजू) पर एक तरफ बैठ कर दूसरी तरफ बांट रखकर तौलने पर हीन या अधिक होने के द्वारा विशुद्धि की परीक्षा करे।

स्वेष्टदेवस्नपनजमद्यादुदकमुत्तमम् ॥ २४० ॥
यावन्नियमितः कालस्तावदप्सु निमज्जयेत् ।

जल दिव्य के प्रकार का निर्देश— अपने इष्टदेव को स्नान कराये गये

३०८ | शुक्रनीतिः

उत्तम जल (चरणामृत) का पान करके शपथ ग्रहण करे कि मैने अमुक अपराध नहीं किया है यदि किया हो तो वह नाश कर दें। जितने समय तक का नियम किया गया हो उतने समय तक जल में डूबकर पडे रहेगा। इससे वह निर्दोष समझा जाता है।

अधर्मधर्ममूर्तीनामदृष्टहरणं तथा ॥ २४१ ॥
कर्षमात्रांस्तण्डुलांश्च चर्वयेच्च विशङ्कितः ।

धर्माधर्म मूर्त्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश—अधर्म और धर्म की मूर्त्तियों में से किसी एक को आंखों में पट्टी बाँधकर उठाना, यदि धर्म की मूर्त्ति उठाता है तो निर्दोष अन्यथा दोषी समझा जाता है। एक रुपये भर चावलों को निःशङ्क होकर चबावे। यदि दोषी होता है तो मुख से रक्त निकलने लगता है, यह लोकप्रसिद्ध है।

स्पर्शयेत् पूज्यपादांश्च पुत्रादीनां शिरांसि च ॥ २४२ ॥
धनानि संस्पृशेदू द्राक् तु सत्येनापि शपेत्तथा।
दुष्कृतं प्राप्नुयां यद्यत् सर्वं नश्येत्तु सत्कृतम् ॥ २४३ ॥

शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश—पूज्य गुरुजनों के चरणों या पुत्रादिकों के मस्तकों किंवा अपने धनों का शीघ्र स्पर्श करे। यह भी दिव्यशपथ है इससे अपराधी का नाश एवं उसके पुत्र और धन का नाश हो जाता है। और सत्य का भी शपथ खाये जो इस प्रकार से है कि—यदि मैं अपराधी होऊं तो मुझे आज पाप लगे और सारा सुकृत (पुण्य) मेरा नष्ट हो जाय।

सहस्रेऽपहृते चाग्निः पादोने च विषं स्मृतम्।
त्रिभागोने घटः प्रोक्तो ह्यर्धे च सलिलं तथा ॥ २४४ ॥
धर्माधमौ तदर्धे च ह्यष्टमांशे च तण्डुलाः ।
षोडशांशे च शपथा एवं दिव्यविधिः स्मृतः ॥ २४५ ॥

अपराध-तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश—एक सहस्र मुद्रा का यदि अपहरण हुआ हो तो अग्निपरीक्षा, चौथाई भाग से न्यून सहस्र अपहृत हो तो विषपरीक्षा, तृतीयांश-हीन सहस्र हो तो तुलापरीक्षा, आधा सहस्र हो तो जलपरीक्षा, सहस्र का चतुर्थांश हो तो धर्माधर्मपरीक्षा, सहस्र का अष्ट-मांश हो तो तण्डुलपरीक्षा, सहस्र का षोडशांश अपहृत हो तो शपथ (सौगन्ध) खाना, इस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये।

एषां संख्या निकृष्टानां मध्यानां द्विगुणा स्मृता।
चतुर्गुणोत्तमानां च कल्पनीया परीक्षकैः ॥ २४६ ॥

यह संख्या निकृष्ट दिव्य परीक्षाओं की है, मध्यर्मों की इससे दुगुनी और उत्तमों की चौगुनी संख्या की कल्पना परीक्षकों द्वारा करनी चाहिये।

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३०६

शिरोवर्त्ती यदा न स्यात्तदा दिव्यं न दीयते ।
अभियोक्ता शिरःस्थाने दिव्येषु परिकीर्त्यते ॥ २४७ ॥

दिव्य के निषेध का निर्देश— जब तक दिव्य शपथ खानेवाला शिर हिला कर अपनी स्वीकृति न दे तब तक दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये। अथवा जब तक शिरःस्थानी अभियोक्ता (वादी) न उपस्थित हो तब तक (परोक्ष में) अभियुक्त (प्रतिवादी) को दिव्य शपथ नहीं दिलानी चाहिये । 'दिव्य परीक्षाओं में वादी को उपस्थित रहना चाहिये' ऐसा विद्वान लोग कहते हैं।

अभियुक्ताय दातव्यं दिव्यं श्रुतिनिदर्शनात् ।
न कश्चिदभियोक्तारं दिव्येषु विनियोजयेत् ॥ २४८ ॥

वेद की आज्ञा होने से प्रतिवादी को ही दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, अतः कोई वादी को दिव्य शपथ न दिलावे ।

इच्छया त्वितरः कुर्यादितरो वर्त्तयेच्छिरः ।

यदि प्रतिवादी की इच्छा से वादी दिव्य शपथ ग्रहण करे तो दूसरा (प्रतिवादी) ही वादी के सम्मुख उपस्थित रहे अथवा शिर हिला कर अनुमति दे ।

पार्थिवैः शङ्कितानां च निर्दिष्टानां च दस्युभिः ॥ २४६ ।'
आत्मशुद्धिपराणां च दिव्यं देयं शिरो विना ।

शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश— राजा को जिन पर अपराधी होने का सन्देह हो गया हो किंवा डांकू आदि ने अपराध करने में जिनका नाम-निर्देश किया हो अथवा जो स्वयम् अपनी शुद्धि (निर्दोषिता) को दिखाना चाहते हों, उनको दिव्य शपथ दिलाना चाहिये, उस में विरोधी पक्ष की उपस्थिति या शिर हिलाकर अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं है।

परदाराभिशापे च ह्यगम्यागमनेषु च ॥ २५० ॥
महापातकशस्ते च दिव्यमेव न चान्यथा ।

पर-स्त्री गमन का अभियोग लगने पर या अगम्या स्त्री के साथ गमन का किंवा ब्रह्महत्यादि का अभियोग लगने पर ही दिव्य शपथ का विधान है अन्यथा साधारण अभियोगों में दिव्य शपथ नहीं दिलाना चाहिये ।

चौर्याभिशङ्कायुक्तानां तप्तमाषो विधीयते ॥ २५१ ॥

तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश— जिनके ऊपर चोरी के अभियोग की आशङ्का हो उनके लिये उपरि लिखित 'तप्तमाष' (खौलते हुये तेल में पके तप्त लौह के उरदों का हाथ से निकालना) संज्ञक दिव्य शपथ का विधान है।

प्राणान्तिकविवादे तु विद्यमानेऽपि साधने ।
दिव्यमालम्बते वादी न पृच्छेत्तत्र साधनम् ॥ २५२ ॥

३१० | शुक्रनीतिः

वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश— जहां पर प्राण का संकट उपस्थित हो ऐसे विवाद में भले ही साधन (प्रमाण) विद्यमान हो किन्तु अभियुक्त दिव्य शपथ का आश्रय ले सकता है वहां पर वादी साधन के विषय में किसी प्रकार का प्रश्न नहीं कर सकता है।

सोपधं साधनं यत्र तद्राज्ञे श्रावितं यदि ।
शोधयेत्तत्तु .दिव्येन राजा धर्मासनस्थितः ॥ २५३ ॥

यदि किसी विवाद में (प्रमाण) जाली हो और उसकी सूचना राजा को मिल जावे तो धर्मासन पर बैठा हुआ राजा दिव्य शपथ द्वारा उसकी परीक्षा करे।

यन्नामगोत्रैर्यल्लेख्यतुल्यं लेख्यं यदा भवेत् ।
अगृहीतधने तत्र कार्यो दिव्येन निर्णयः ॥ २५४ ॥

भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश— रुपया न लेने पर भी यदि उसके नाम-गोत्र के साथ ऋणपत्र का सचमुच कोई जाली लेख तैयार करके रूपये की नालिश कर दे तो वहां पर राजा सत्यासत्य का निर्णय दिव्य शपथ द्वारा करे।

मानुषं साधनं न स्यात्तत्र दिव्यं प्रदापयेत् ।
लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश— जहाँ पर कोई लौकिक प्रमाण न मिले वहां पर दिव्य शपथ दिलाना चाहिये।

अरण्ये निर्जने रात्रावन्तर्वेश्मनि साहसे ॥ २५५ ॥
स्त्रीणां शीलाभियोगेषु सर्वार्थापह्नवेषु च ।
प्रदुष्टेषु प्रमाणेषु दिव्यैः कार्यं विशोधनम् ॥ २५६ ॥

जङ्गल, निर्जन स्थान, रात्रि, घर के भीतरी भाग, डाँका पड़ना आदि साहस कर्म, और स्त्रियों के आचरण इन सबों के विषय से सम्बद्ध अभियोग में और जहां पर सम्पूर्ण अर्थ का रहस्य न ज्ञात होता हो एवं प्रमाण दूषित होने से माननीय न होने पर दिव्य शपथ द्वारा अपराधी की परीक्षा करनी चाहिये।

महापापामिशापेषु निक्षेपहरणेपु च ।
दिव्यैः कार्यं परीक्षेत राजा सत्स्वपि साक्षिषु ॥ २५७ ॥

यद्यपि साक्षी भले ही हों तो भी राजा बड़े २ अपराधों एवं धरोहर के हड़प कर जाने इत्यादि अभियोगों में दिव्य शपथ द्वारा परीक्षा लेकर ही निर्णय करे।

प्रथमा यत्र भिद्यन्ते साक्षिणश्च तथा परे ।
परेभ्यश्च तथा चान्ये तं वादं शपथैर्नयेत् ॥ २५८ ॥

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३११

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३११

साक्षी के भेदन को प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश—
जहाँ पर प्रथम, मध्यम तथा निकृष्ट श्रेणी के सभी साक्षी दूसरों के द्वारा फोड़ लिये गये हों वहाँ पर दिव्य शपथ के द्वारा अभियोग का निर्णय करना चाहिये।

स्थावरेषु विवादेषु पूगश्रेणिगणेषु च।
दत्तादत्तेषु भृत्यानां स्वामिनां निर्णये सति ॥ २५६ ॥
विक्रयादानसम्बन्धे क्रीत्वा धनमनिच्छति।
साक्षिभिर्लिखितेनाथ भुक्त्या चैतान् प्रसाधयेत् ॥ २६० ॥

स्थावर (अचल) संपत्ति-विषयक विवाद और पूग (जाति-विशेष का सङ्घ), श्रेणि (विभिन्न जातियों का सङ्घ) और गण (एक ही प्रकार की जाति का सङ्घ)—विषयक विवाद एवं भृत्यों को वेतन (तनखाह) दिया गया या नहीं तथा किसी वस्तु का स्वामी कौन है इसके निर्णय में (अथवा दी हुई वस्तु के दिये जाने पर किंवा भृत्य और स्वामी परस्पर किसी किये हुये निर्णयविषयक विवाद में) एवं बेची हुई वस्तु के न देने के सम्बन्ध में, खरीदने के बाद पुनः उसे न लेने की इच्छा करने पर साक्षी, लेखपत्र एवं कब्जा के आधार पर इन सबों का निर्णय करे।

विवाहोत्सवद्यूतेषु विवादे समुपस्थिते।
साक्षिणः साधनं तत्र न दिव्यं न च लेख्यकम् ॥ २६१ ॥

**विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय-साधन होने का निर्देश—**विवाह, उत्सव तथा द्यूत (जुआ) विषयक विवाद उपस्थित होने पर साक्षी ही मुख्य प्रमाण माना जाता है। वहां पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है एवं लिखित भी प्रमाण नहीं माँगा जाता है।

द्वारमार्गक्रियाभोग्यजलवाहादिषु तथा।
भुक्तिरेव तु गुर्वी स्यान्न दिव्यं न च साक्षिणः ॥ २६२ ॥

**द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोग को ही प्रमाण मानने का निर्देश—**द्वार और मार्ग का बनाना, भोग में आने वाली वस्तु एवं जल के प्रवाह आदि के अभियोग में (भुक्ति = कब्जा) ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना जाता है वहाँ पर दिव्य शपथ नहीं लिया जाता है और साक्षी को भी प्रमाण नहीं माना जाता है।

यद्येके मानुषीं ब्रूयादन्यो ब्रूयात्तु दैविकीम्।
मानुषीं तत्र गृह्णीयान्न तु दैवीं क्रियां नृपः ॥ २६३ ॥

**मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश—**यदि वादी-प्रतिवादी में एक मानुषी क्रिया (प्रमाण) के विषय में कहे और दूसरा

३१२शुक्रनीतिः

दैविकी क्रिया (दिव्य शपथ) के विषय में कहे तो वहाँ पर राजा मानुषी क्रिया को ग्रहण करे किन्तु दैवी क्रिया को कदापि नहीं ग्रहण करे।

यद्येकदेशप्राप्ताऽपि क्रिया विद्येत मानुषी ।
सा ग्राह्या न तु पूर्णापि दैविकी वदतां नृणाम् ॥ २६४ ॥

भले ही मानुषी क्रिया अभियोग के एक ही अंश की पुष्टि करती हो किन्तु उसी को ही ग्रहण करे। पूर्ण अंश की पुष्टि करने वाली दैवी क्रिया के कहने वालों की बात को न माने।

प्रमाणैर्हेतुचरितैः शपथेन नृपाज्ञया ।
वादिसंप्रतिपत्त्या वा निर्णयः षड्विधः स्मृतः ॥ २६५ ॥

६ प्रकार के निर्णय का निर्देश— १ प्रमाण (साक्षी, लेख आदि), २ हेतु, ३ आचरण, ४ शपथ, ५ राजा की आज्ञा, ६ वादी की सम्मति इन ६ प्रकारों के द्वारा सम्पन्न किये जाने से निर्णय ६ प्रकार का होता है।

लेख्यं यत्र न विद्येत न भुक्तिर्न च साक्षिणः ।
न च दिव्यावतारोऽस्ति प्रमाणं तत्र पार्थिवः ॥ २६६ ॥

सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश— जहाँ पर लेख, भुक्ति (कब्जा), साक्षी एवं दिव्य शपथ का भी अवसर इनमें से कोई भी प्रमाण न उपस्थित किया गया हो वहाँ पर राजा ही का निर्णय प्रमाण माना जाता है।

निश्चेतुं ये न शक्याः स्युर्वादाः संदिग्धरूपिणः ।
सीमाद्यास्तत्र नृपतिः प्रमाणं स्यात् प्रभुर्यतः ॥ २६७ ॥

जो सीमा आदि के विवाद सन्दिग्ध रूप होने से निश्चय रूप से निर्णय नहीं किये जा सकते हैं वहाँ पर राजा ही प्रमाण होता है क्योंकि वह प्रभु है।

स्वतन्त्रः साधयन्नर्थान् राजाऽपि स्याच्च किल्बिषी ।
धर्मशास्त्राऽविरोधेन ह्यर्थशास्त्रं विचारयेत् ॥ २६८ ॥

धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश— स्वतन्त्र रूप से (बिना प्रमाण के) विवादों का निर्णय करता हुआ राजा पापी होता है अतः धर्मशास्त्र के विरोध से बचता हुआ राजा अर्थशास्त्र का विचार करे अर्थात् धर्मशास्त्रानुसार निर्णय करे।

राजामात्यप्रलोभेन व्यवहारस्तु दुष्यति ।
लोकोऽपि च्यवते धर्मात्कूटार्थे संप्रवर्तते ॥ २६९ ॥

विवाद होने के कारणों का निर्देश— राजा तथा अमात्य (मन्त्री) के लोभाधिक्य से व्यवहार (मुकदमा) का निर्णय दोषयुक्त होता है। और

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१३

लोक (प्रजायें) भी यथेच्छ व्यवहार करने लगते हैं एवं कपटपूर्ण कार्यों में प्रवृत्त होने लगते हैं ।

अतिकामक्रोधलोभैर्यव्यवहारः प्रवर्त्तते ।
कर्त्तृनथो साक्षिणश्च सभ्यान् राजानमेव च ॥ २७० ॥
व्याप्नोत्यतस्तु तन्मूलं छित्त्वा तं विशुशं नयेत् ।

जब काम, क्रोध तथा लोभ की अधिकता से मनुष्य का व्यवहार होने लगता है तब वह फैलते २ क्रमशः कर्त्ता, साक्षी, सभ्य और राजा में भी व्याप्त हो जाता है अतः राजा उसके मूल कारण कामादि को दूर कर व्यवहार (विवाद) का विवेकपूर्वक विचार कर निर्णय करे ।

अनर्थं चार्थवत् कृत्वा दर्शयन्ति नृपाय ये ॥ २७१ ॥
अविचिन्त्य नृपस्तथ्यं मन्यते तैर्निदर्शितः ।
स्वयं करोति तद्वृत्तौ भुभ्यतेऽष्टगुणं त्वघम् ॥ २७२ ॥

जो न्यायालय के अधिकारी पुरुष अनिष्ट को इष्ट की भांति करके (दोषी को निर्दोष बताकर) राजा को दिखाते या बताते हैं । और जो बिना विचारे उन (अधिकारियों) के द्वारा प्रदर्शित विषय को सत्य मानता है और उसी के अनुसार स्वयं व्यवहार करता है अर्थात् विवाद का निर्णय करता है । तो वैसा करने पर उन सबों को राजा तथा अधिकारी पुरुषों को अठगुना पाप लगता है ।

अधर्मतः प्रवृत्तं तं नोपेक्षेरन् सभासदः ।
उपेक्ष्यमाणाः सनृपा नरकं यान्त्यधोमुखाः ॥ २७३ ॥

अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद् को उपेक्षा न करने का निर्देश—और उस तरह से व्यवहार करते हुये उस राजा को जो न्यायाधिकारी पुरुष अधर्म करने से नहीं रोकते हैं तो राजा के सहित वे सभी नरक को जाते हैं ।

धिग्दण्डस्त्वथ वाग्दण्डः सभ्यायत्तौ तु तावुभौ ।
अर्थदण्डवधावुक्तौ राजायत्तावुभावपि ॥ २७४ ॥

धिग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदों के अधीन होने का निर्देश—और किसी को धिक्कार या डांट-फटकार का दण्ड देना ये दोनों दण्ड न्यायसभा के सदस्यों के अधीन रहते हैं किन्तु किसी को अर्थ दण्ड (जुर्माना) या वध दण्ड देना ये दो दण्ड तो केवल राजा ही के अधीन रहता है ।

तीरितं चानुशिष्टं च यो मन्येत विधर्मतः ।
द्विगुणं दण्डमादाय पुनस्तत्कार्यमुद्धरेत् ॥ २७५ ॥

दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश—जो कोई विवाद करने

३१४ | शुक्रनीतिः

वाला यह समझे कि हमारे फैसले में निर्णय या आज्ञा जो हुई है वह अधर्मयुक्त हुई है अर्थात् नियम-विरुद्ध हुई है तो दूना दण्ड देकर पुनः उस मुकद्दमे पर विचार करवा सकता है ।

साक्षिसभ्यावसन्नानां दूषणं दर्शनं पुनः । स्वचर्यावसितानां च प्रोक्तः पौनर्भवो विधिः ॥ २७६ ॥

पौनर्भव विधि के लक्षण— साक्षी तथा सभासदों के द्वारा जिसकी हार हुई और उन लोगों के द्वारा फैसले का बहिष्कार करने पर पुनः मुकद्दमे पर विचार किया जाता है या स्वयं ही विचार करने में यदि राजा या सभासद आदि की त्रुटि हो गई हो तो भी पुनः विचार करना उचित होता है ।

अमात्यः प्राड्विवाको वा ये कुर्युः कार्यमन्यथा । तत् सर्वं नृपतिः कुर्यात्तान् सहस्रं तु दण्डयेत् ॥ २७७ ॥

मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश— यदि मन्त्री या प्राड्विवाक ( जज ) कोई भी नियम-विरुद्ध फैसला करे तो राजा स्वयं पुनः विचार कर दूसरा उचित फैसला करे और उन सबों के ऊपर १००० का अर्थदण्ड ( जुर्माना ) करे ।

नहि जातु विना दण्डं कश्चिन्मार्गेऽवतिष्ठते । सन्दर्शिते सभ्यदोषे यदुद्धृत्य नृपो नयेत् ॥ २७८ ॥

क्योंकि बिना दण्ड के कोई कभी उचित मार्ग पर नहीं चल सकता। अस्तु, विवाद करनेवाले के द्वारा न्यायसभा के सदस्यों का दोष दिखाये जाने पर उस दोष का निवारण करके राजा उचित फैसला करे ।

प्रतिज्ञाभावनाद्वादी प्राड्विवेकादिपूजनात् । जयपत्रस्य चादानाज्जयी लोके निगद्यते ॥ २७९ ॥

जयी के लक्षणों का निर्देश— वादी जिस विषय में दावा करता है उसको प्रमाणित करने से एवं प्राड्विवाक ( जज ) आदि के द्वारा सत्य विवाद उपस्थित करने की प्रशंसा किये जाने पर तथा विजयपत्र ( डिक्री ) प्राप्त करने से लोक में वादी विजयी माना जाता है ।

सभ्यादिभिर्विनिर्णीतं विधृतं प्रतिवादिना । दृष्ट्वा राजा तु जयिने प्रदद्याज्जयपत्रकम् ॥ २८० ॥

जयी को जयपत्र देने के प्रकार का निर्देश— सभ्यादियों के द्वारा विवाद की सत्यता निर्णीत हुई एवं प्रतिवादी द्वारा भी स्वीकृत जान कर राजा वादी को जयपत्र ( डिक्री ) दे ।

अन्यथा ह्यभियोक्तारं निरुन्ध्याद् बहुवत्सरम् ।

चतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१५

चतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१५

मिथ्याभियोगसदृशैर्दण्डयेदभियोगिनम् ॥ २८१ ॥ अन्यथा अर्थात् झूठा विवाद उपस्थित करनेवाले वादी को बहुत वर्षों तक कारागार (जेल) में बन्द कर दे जो कि झूठा विवाद उपस्थित करने के लिये दण्ड के अनुरूप हो।

कामक्रोधौ तु संयम्य योऽर्थान् धर्मेण पश्यति ।
प्रजास्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥ २८२ ॥
प्रजा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश—काम और क्रोध के ऊपर नियन्त्रण रखकर जो राजा विवाद का निर्णय करता है, प्रजायें उसी का अनुवर्त्तन करती हैं जैसे समुद्र का अनुवर्त्तन नदियां करती हैं।

जीवतो रस्त्वतन्त्रः स्याज्ज्रयाऽपि समन्वितः ।
तयोरपि पिता श्रेयान् बीजप्राधान्यदर्शनात् ॥ २८३ ॥
जीवित रहते हुये माता-पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश—वृद्धावस्था से युक्त हो जाने पर भी पुत्र माता-पिता के जीवित रहते उसके सामने स्वतन्त्र संपत्ति का स्वामी नहीं हो सकता है। और उन दोनों (माता-पिता) के मध्य में बीज की प्रधानता मानने से पिता ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

अभावे बीजिनो माता तदभावे तु पूर्वजः ।
स्वातन्त्र्यं तु स्मृतं ज्येष्ठे ज्यैष्ठ्यं गुणवयःकृतम् ॥ २८४ ॥
पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश—पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में ज्येष्ठ भाई सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। क्योंकि सर्वत्र ज्येष्ठ ही में स्वतन्त्रता मानी गई है और उसकी ज्येष्ठता गुण तथा अवस्था दोनों ही के होने से मानी जाती है केवल अवस्था से नहीं।

याः सर्वाः पितृपत्न्यः स्युस्तासु वर्तेत मातृवत् ।
स्वसमैकेन भागेन सर्वास्ताः प्रतिपालयन् ॥ २८५ ॥
पिता की सभी पत्नियों में मातृवद् व्यवहार करने का निर्देश—चाहे जितनी पिता की पत्नियाँ हों उनमें सगी माता के सदृश आदरभाव रखना चाहिये। और अपने समान एक १ भाग से उन सबों का पालन करना चाहिये।

अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः स्वतन्त्रः पृथिवीपतिः ।
अस्वतन्त्रः स्मृतः शिष्य आचार्ये तु स्वतन्त्रता ॥ २८६ ॥
स्वतन्त्रा-स्वतन्त्र का निर्णय—सभी प्रजायें अस्वतन्त्र (पराधीन)

३१६

शुक्रनीतिः

होती हैं। किन्तु केवल एक राजा स्वतन्त्र होता है। और शिष्य परतन्त्र माना जाता है। और आचार्य में स्वतन्त्रता मानी जाती है।

सुतस्य सुतदाराणां वशित्वमनुशासने।
विक्रये चैव दाने च वशित्वं न सुते पितुः॥ २८७॥

पुत्र और पुत्रवधुओं को पिता या श्वशुर की आज्ञा मानने में पराधीनता मानी गई है किन्तु समर्थ पुत्र के लिये बेचने और दान देने में पिता की आज्ञा की प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं मानी गई है।

स्वतन्त्राः सर्व एवैते परतन्त्रेषु नित्यशः।
अनुशिष्टौ विसर्गे वाऽविसर्गे चेश्वरा मताः॥ २८८॥

परतन्त्र होने पर भी ये सभी पुत्र सदा स्वतन्त्र ही माने जाते हैं क्योंकि पिता के साथ मन्त्रणा करने, देने और न देने में स्वाधीन माने गये हैं।

मणिमुक्ताप्रवालानां सर्वस्यैव पिता प्रभुः।
स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः॥ २८९॥

**स्वामित्व का निर्णय—**मणि, मुक्ता (मोती) और प्रवाल (मूंगा) आदि संपूर्ण चल संपत्ति के ऊपर पिता का प्रभुत्व रहता है। किन्तु संपूर्ण स्थावर (अचल) संपत्ति के ऊपर पिता या पितामह का पूर्ण प्रभुत्व नहीं रहता है, हाँ आंशिक रूप से रहता है।

भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम् ॥ २९०॥

पत्नी, पुत्र और नौकर ये तीनों ही क्रम से पति, पिता और स्वामी के रहते दम तक अधन (धन के स्वामित्व से हीन) माने गये हैं अतः इन ये लोग जो कुछ भी धन कहीं से प्राप्त करते हैं ये सब जिनके पत्नी, पुत्र या नौकर होते हैं उन्हीं के अधिकार में चले जाते हैं, इसी से ये 'अधन' कहलाते हैं अर्थात् इनका अपना कोई अलग धन नहीं होता है।

वर्तते यस्य यद्धस्ते तस्य स्वामी स एव न।
अन्यस्वमन्यहस्तेषु चौर्याद्यैः किन्न दृश्यते ॥ २९१॥

जो धन जिनके हाथ में रहता है उस धन का स्वामी वही नहीं माना जाता है जैसे चोरी आदि कारणों से दूसरे का धन दूसरे के हाथ में क्या नहीं देखा जाता है किन्तु हाथ में रखा देखने मात्र से वह उस धन का स्वामी नहीं माना जाता है।

तस्माच्छास्त्रात एव स्यात् स्वाम्यं नानुभवादपि।
अस्यापहृतमेतेन न युक्तं वक्तुमन्यथा॥ २९२॥

इससे शास्त्रानुसार ही किसी धन का कोई स्वामी हो सकता है केवल

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१७

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१७

अनुभव (हाथ में रहना मात्र देखने) से नहीं होता है। अन्यथा इसका धन इसने अपहरण कर लिया यह कहना भी उचित नहीं हो सकता था।

विदिताऽर्थागमः शास्त्रे तथा वर्णः पृथक् पृथक् । शास्ति तच्छास्त्रधर्म्मं यन्म्लेच्छानामपि तत्सदा ॥ २९३ ॥ पूर्वाचार्यैस्तु कथितं लोकानां स्थितिहेतवे ।

वर्णानुसार प्रत्येक वर्णों के पृथक् पृथक् अर्थार्जन के मार्ग शास्त्र में प्रसिद्ध हैं। और ये जो शास्त्रोक्त धर्म अर्थार्जन के विषय में कहे हुये हैं वे म्लेच्छों को भी सदा मान्य हैं। और पूर्वाचार्यों ने लोक की सदाचार-रक्षा के लिये इसी विषय में अन्यत्र कहा है।

समानभागिनः कार्याः पुत्राः स्वस्य च वै स्त्रियः ॥ २९४ ॥ स्वभागादर्धहरा कन्या दौहित्रस्तु तदर्धभाक् ।

विभाग-विचार— धनस्वामी अपने हिस्से में से स्त्री तथा पुत्र का समान समान भाग रक्खे। और अपना भी उन्हीं के समान भाग रक्खे। अपने भाग का आधा भाग कन्या (अविवाहिता) का एवं कन्या से आधा भाग दौहित्र (कन्या का पुत्र) का रक्खे।

मृतेऽधिपेऽपि पुत्राद्या उक्तभागहराः स्मृताः ॥ २९५ ॥

स्वामी के मरने पर पुत्रादिक उक्त भाग के अनुसार सम्पत्ति के स्वामी माने जाते हैं।

मात्रे दद्याच्चतुर्थांशं भगिन्यै मातुरर्धकम् । तदर्धं भागिनेयाय शेषं सर्वं हरेत् सुतः ॥ २९६ ॥

पुत्र माता के लिये अपने भाग का चतुर्थांश (चौथाई) भाग एवं बहिन के लिये माता के भाग से आधा भाग, भाञ्जा के लिये बहिन के भाग से आधा भाग दे, और अन्त में अवशिष्ट सभी भागों को पुत्र स्वयम् ले।

पुत्रो नप्ता धनं पत्नी हरेत् पुत्री च तत्सुतः । माता पिता च भ्राता च पूर्व्वाभावाच्च तत्सुतः ॥ २९७ ॥

अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश— पुत्र, पौत्र, पत्नी, पुत्री, दौहित्र (पुत्री का पुत्र), माता, पिता और भाई यथाक्रम एक के अभाव में दूसरे धन के उत्तराधिकारी होते हैं। और पुत्रादि सभी के अभाव में भाई का पुत्र अन्त में उत्तराधिकारी होता है।

सौदायिकं धनं प्राप्य स्त्रीणां स्वातन्त्र्यमिष्यते । विक्रये चैव दाने च यथेष्टं स्थावरेष्वपि ॥ २९८ ॥

सौदायिक धन में स्त्री की स्वतन्त्रता का निर्देश— सौदायिक (ब्याह के प्रथम या बाद में पति या पिता के गृह से मिले हुये) धन को पाकर स्त्री स्वतन्त्र

३१८ शुक्रनीतिः

रूप से भोग सकती है, और चाहे वह स्थावर ( अचल ) सम्पत्ति हो तो भी किसीको बेच देने या दे देने में उसका इच्छानुसार व्यवहार कर सकती है।

ऊढया कन्यया वापि पत्युः पितृगृहाच्च यत् । मातृपित्रादिभिर्दत्तं धनं सौदायिकं स्मृतम् ॥ २९९ ॥

सौदायिक धन के लक्षण— विवाहिता या अविवाहिता कन्याको पति के पास से या पिता के गृह से माता-पिता के द्वारा दिये गये धन को 'सौदायिक' कहते हैं।

पित्रादिधनसम्बन्धहीनं यद्यदुपार्जितम् । येन स काममश्नीयादविभाज्यं धनं हि तत् ॥ ३०० ॥

अविभाज्य धन के लक्षण— पैतृक धन की सहायता के बिना जो-जो धन जिससे उपार्जित किये जाते हैं वे सभी उस उपार्जनकर्त्ता के लिये यथेष्ट भोग्य होते हैं, क्योंकि उस प्रकार के धन का भाई आदि के द्वारा विभाग नहीं किया जा सकता है।

जलतस्करराजाग्नि व्यसने समुपस्थिते । यस्तु स्वशक्त्या संरक्षेत्तस्यांशो दशमः स्मृतः ॥ ३०१ ॥

जलादिकों से धन की रक्षा करनेवाले को दशवाँ भाग प्राप्त करने का निर्देश— जो कोई व्यक्ति जल, चोर, राजा या अग्नि के द्वारा संकट में पड़े हुये किसी के वस्तु ( धन ) को अपनी शक्ति लगाकर यदि बचा लेता है तो उस धन के दशवें भाग के पाने का वह अधिकारी हो जाता है।

हेमकारादयो यत्र शिल्पं सम्भूय कुर्वते । कार्यानुरूपं निर्वेशं लभेरंस्ते यथार्हतः ॥ ३०२ ॥

जहाँ पर कई सोनार आदि मिलकर किसी शिल्प का निर्माण करते हैं वहाँ पर कार्यानुरूप यथायोग्य वे सब मजदूरी को प्राप्त करते हैं।

संस्कर्त्ता तत्कलाभिज्ञः शिल्पी प्रोक्तो मनीषिभिः ।

शिल्पी के लक्षण— किसी कला का जानकार होते हुये उसकी त्रुटियों को दूरकर सुधार करने वाले को विद्वान् लोग 'शिल्पी' कहते हैं।

हर्म्यं देवगृहं वापि बाटिकोपस्कराणि च ॥ ३०३ ॥ सम्भूय कुर्वतां तेषां प्रमुख्यो द्व्यंशमर्हति ।

धनियों का भवन, देवमन्दिर, बावड़ी या गृहसम्बन्धी उपकरणों को मिलकर बनानेवाले कारीगरों के मध्य में जो प्रधान होता है वह दो भाग मजदूरी पाने का अधिकारी होता है।

नर्तकानामेव धर्मः सङ्गिरेष उदाहृतः ॥ ३०४ ॥ तालज्ञो लभतेऽर्धार्धं गायनास्तु समांशिनः ।

चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३१९

नर्तकादियों का धनविभागविषयक निर्देश— नाचनेवालों के लिये भी वही विधि विद्वानों ने कही है। जैसे ताल का जाननेवाला अर्जित धन का आधा भाग पाता है शेष धन में गाने वाले सब लोग समान-समान भाग में बाँट लेते हैं।

परराष्ट्राद्धनं यत्स्याच्चोरैः स्वाम्याज्ञया हृतम् ॥ ३०५ ॥
राज्ञे षष्ठांशमुद्धृत्य विभजेरन् समांशकम् ।

चोरों का धनविभागविषयक निर्देश— अपने स्वामी की आज्ञा से चोर लोग दूसरे के राज्य में जाकर जो धन चुराकर लाते हैं उसमें से छठा भाग राजा को देने के बाद शेष धन को आपस में समान भाग से बाँट कर ले लेते हैं।

तेषां चेत् प्रस्रुतानां च ग्रहणं समवाप्नुयात् ॥ ३०६ ॥
तन्मोक्षार्थं च यद्दत्तं वहेयुस्ते समांशतः ।

और यदि चोरी करने के बाद वे लोग पकड़ लिये जावें तो अपने छूटने के लिये जो द्रव्य खर्च हो उसको समान भाग से बाँट कर अपने-अपने हिस्से में से दे देवें।

प्रयोगं कुर्वते ये तु हेमधान्यरसादिना ॥ ३०७ ॥
समन्यूनाधिकैरंशैर्लाभास्तेषां तथाविधः ।
समो न्यूनोऽधिको ह्यांशो योऽनुक्षिप्तस्तथैव सः ॥ ३०८ ॥

व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश— जो लोग मिलकर सुवर्ण, धान्य तथा रसादि द्रव्य का कोई व्यवसाय करते हैं उन में जिसका जैसा कार्य हो और धन लगा हो उसके अनुरूप बराबर, न्यून या अधिक अंश में लाभांश में से उन्हें मिलता है। अर्थात् व्यवसाय के प्रारम्भ में उन लोगों ने सम, न्यून या अधिक अंश में जो द्रव्य लगाया हो उसी के अनुसार उनका भाग होता है।

व्ययं दद्यात् कर्म कुर्याल्लाभं गृह्णीत चैव हि ।
वणिजानां कर्षकाणामेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३०९ ॥

एवं वे तदनुसार व्यय एवं कर्म करते हैं तथा लाभ भी प्राप्त करते हैं। यह विधि बनियों और कृषकों के लिये कही हुई है।

सामान्यं याचितं न्यास आधिर्दासाश्च तद्धनम् ।
अन्वाहितं च निक्षेपः सर्वस्वं चान्वये सति ॥ ३१० ॥
आपत्स्वपि न देयानि नव वस्तूनि पण्डितैः ।

आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश— १. बटवारे में प्राप्त धन, २. पुनः लौटा देने के लिये मांगकर लाया हुआ धन, ३. धरोहर

३२० | शुक्रनीतिः

में रखा हुआ धन, ४. बन्धक रखा हुआ धन, ५. दास, ६. दास का धन, ७. दूसरे के हाथ में रखने के लिये दिया हुआ धन, ८. शिल्पी के हाथ में संस्कार करने के लिये दिया हुआ द्रव्य, ९. सन्तान के रहने पर अपना सर्वस्व ( संपूर्ण धन) ये ९ प्रकार के धन या वस्तु आपत्ति आने पर भी दूसरे के हाथ बेच डालना या दे देना आदि कुछ भी नहीं करना चाहिये ।

अदेयं यश्च गृह्णाति यश्चादेयं प्रयच्छति ॥ ३११ ॥
तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ चोत्तमसाहसम् ।

**उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश—**यदि नहीं देने योग्य किसी वस्तु को जो कोई किसी से लेता है या किसी को देता है तो वे दोनों (ग्रहीता-दाता) चौर की भाँति दण्डनीय होते हैं और उत्तम साहस नामक दण्ड (जुर्माना) देने के अधिकारी होते हैं।

अस्वामिकेभ्यश्चौरेभ्यो विगृह्णाति धनं तु यः ॥ ३१२ ॥
अव्यक्तमेव क्रीणाति स दण्ड्यश्चौरवन्नृपैः ।

**अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश—**जिस वस्तु का वह स्वामी नहीं है उससे जो खरीदता है या चोरों से माल लेता है या गुप्त-छुप में किसी से माल खरीदता है वह राजा के द्वारा चोर की भाँति दण्डनीय होता है।

ऋत्विग्याज्यमदुष्टं यस्त्यजेदनपकारिणम् ॥ ३१३ ॥
अदुष्टञ्चर्त्विजं याज्यो विनेयौ तावुभावपि ।

**त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण—**जो पुरोहित निर्दोष एवं कोई अपकार नहीं करनेवाले अपने यजमान का एवं जो यजमान निर्दोष तथा अपक- कारी पुरोहित का त्याग करता है तो वे दोनों दंडनीय होते हैं।

द्वात्रिंशांशं षोडशांशं लाभं पण्ये नियोजयेत् ॥ ३१४ ॥
नान्यथा तद्व्ययं ज्ञात्वा देशाद्यनुरूपतः ।

**राजा को ३२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश—**बनिया (व्यवसायी) विक्री के वस्तुओं पर जैसा प्रदेश या समय हो उसके अनुरूप उस वस्तु के लाने में किये हुये व्यय को समझ कर ३२ वाँ या १६ वाँ भाग लाभ लेने की व्यवस्था करे, इससे अधिक लाभ न लेवे।

वृद्धिं हित्वा ह्यर्थधनैर्वाणिज्यं कारयेत् सदा ॥ ३१५ ॥

व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश—'मैं वृद्धि को नहीं ग्रहण करूँगा' ऐसा कहकर और 'वाणिज्य में लब्ध आधा धन दूंगा' इस प्रकार के स्वीकृत वचनों के द्वारा सदा वाणिज्य करावे। अथवा राजा वृद्धि मुनाफा छोड़कर मूल धन के आधे धन से सदा व्यापारी से व्यापार करावे।

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् ३२१

मूलात्तु द्विगुणा वृद्धिर्गृहीता चाधमर्णिकात् ।
तदोत्तमर्णमूलं तु दापयेन्नाधिकं ततः ॥ ३१६ ॥
**मूल से दूना ब्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिलवाने का निर्देश—**यदि कर्ज देनेवाला महाजन मूल धन से द्विगुण धन सूद में ले चुका हो तो कर्जदार से महाजन के दिये हुये मूल धन को ही राजा दिलावे अधिक न दिलावे ।

धनिकाश्चक्रवृद्ध्यादिमिषतस्तु प्रजाधनम् ।
संहरन्ति ह्यतस्तेभ्यो राजा संरक्षयेत् प्रजाम् ॥ ३१७ ॥
धनी महाजन लोग चक्रवृद्धि (सूद-दरसूद) के व्याज से कर्जदार प्रजाओं का अधिकांश धन हर लेते हैं, अतः राजा उन महाजनों से प्रजा की भलीभांति रक्षा करे ।

समर्थः सन्न ददाति गृहीतं धनिकाद्धनम् ।
राजा सम्दापयेत्तस्मात् सामदण्डविकर्षणैः ॥ ३१८ ॥
यदि कोई समर्थ होकर भी धनिक से लिये हुये धन को नहीं देता है तो राजा समझा-बुझाकर या दण्ड का प्रयोग कर कर्जदार से महाजन को धन दिला दे ।

लिखितं तु यदा यस्य नष्टं तेन प्रबोधितम् ।
विज्ञाय साक्षिभिः सम्यक् पूर्ववद्दापयेत्तदा ॥ ३१९ ॥
**लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश—**जब जिस किसी के पास से किसी का लिखित ऋणपत्र (पुरनोट) नष्ट हो जाय और वह राजा को सूचित कर दे तो राजा साक्षियों के द्वारा भलीभांति समझकर पूर्व की भांति (पुरनोट में लिखित की भांति) ही उसे कर्जदार से द्रव्य दिला दे ।

अदत्तं यश्च गृह्णाति सुदत्तं पुनरिच्छति ।
दण्डनीयावुभावेतौ धर्मज्ञेन महीक्षिता ॥ ३२० ॥
जो किसी द्वारा नहीं दी हुई वस्तु को किसी से ले लेता है और जो भलीभांति से दूसरे को दे दी गई वस्तु को पुनः लेना चाहता है तो वे दोनों ही धर्म के जानकार द्वारा दण्डनीय होते हैं ।

कूटपण्यस्य विक्रेता स दण्ड्यश्चौरवत् सदा ।
**खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश—**जो खोटी वस्तु या धोकेबाजी से किसी वस्तु को बेचता है तो वह सदा राजा द्वारा चोर की भांति दण्डनीय होता है ।

दृष्ट्वा कार्याणि च गुणाञ्छिल्पिनां वृत्तिमावहेत् ॥ ३२१ ॥
२१ शु०