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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०५


स्याऽन्तःकरणरूपोऽज्ञानपरिणामभेदो विशेषाभिव्यक्तिस्थानं सर्वतः प्रसृतस्य सवितृप्रकाशस्य दर्पण इव। अतस्तस्य तदुपाधिकत्वव्यवहारोऽपि। नैतावताऽज्ञानोपाधिपरित्यागः, अन्तःकरणोपाधिपरिच्छिन्नस्यैव चैतन्यस्य जीवत्वे योगिनः कायव्यूहाधिष्ठानत्वानुपपत्तेः।

न च योगप्रभावाद्योगिनोऽन्तःकरणं कायव्यूहाभिव्यक्तियोग्यं वैपुल्यं प्राप्नोतीति तदवच्छिन्नस्य कायव्यूहाधिष्ठानत्वं युज्यते इति वाच्यम्, 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० १५) इति


अभिव्यक्तिस्थान दर्पण है, वैसे ही अज्ञानमें प्रतिबिम्बित जीवका विशेष अभिव्यक्ति-स्थान अज्ञानका परिणामरूप अन्तःकरण है। भाव यह है कि अविद्यामें प्रतिबिम्बित सुषुप्तिसाधारण चैतन्यरूपकी प्रमातृत्व, कर्तृत्व आदि विशेषरूपसे अभिव्यक्ति—उपलब्धिका स्थान (उपाधि) अन्तःकरण है। कर्तृत्व आदि धर्मोंके केवल अज्ञानके परिणाम न होनेसे उनकी उपाधिमात्रतासे जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ नहीं हो सकता, किन्तु कर्तृत्व आदि धर्मवाले अन्तःकरणके तादात्म्यके अध्याससे ही जीवमें कर्तृत्व आदिका लाभ हो सकता है, अतः अन्तःकरणमें जीवकी उपाधिकताका वर्णन किया गया है। अन्तःकरण विशेष उपलब्धिका स्थान है, ऐसा स्वीकार करनेसे जीवमें अन्तःकरणोपाधिकताका व्यवहार भी है, अर्थात् 'कार्योपाधिरयं जीवः' इत्यादि श्रुतिमें और भाष्यमें, यह रहस्य है। श्रुतिमें कार्योपाधिकताके विशेषणमात्रसे अज्ञानोपाधिकताके निराकरणका परित्याग नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणरूप उपाधिसे परिच्छिन्न चैतन्यको जीव माननेपर योगियोंमें एककालीन अनेक शरीरोंकी नियन्तृताकी उपपत्ति नहीं होगी।

योगके प्रभावसे योगीका अन्तःकरण कायव्यूहमें—देहसमूहमें—अभिव्यक्तिके योग्य व्यापकता प्राप्त करता है, अतः उस अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चिदात्मा भी कायव्यूहका प्रेरक हो सकता है ? ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' * इस शास्त्रोपान्त्याधिकरणके अर्थात्


* प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति' इस सूत्रका अर्थ इस प्रकार है—जैसे एक ही प्रदीपका अनेक बत्तियोंमें प्रवेश है, वैसे ही एक ही योगीका योगके प्रभावसे अनेक शरीरोंमें आवेश—प्रवेश होता है। यद्यपि पूर्व दीपका और बत्तियोंमें प्रविष्ट अन्य दीपोंका परस्पर

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१०६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

शास्त्रोपान्त्याधिकरणभाष्यादिषु कायव्यूहे प्रतिदेहमन्तःकरणस्य चक्षुरादिवत् भिन्नस्यैव योगप्रभावात् सृष्टेरुपवर्णनात् । प्रतिबिम्बे बिम्बात् भेदमात्रस्याऽध्यस्तत्वेन स्वरूपेण तस्य सत्यत्वान्न प्रतिबिम्बरूपजीवस्य मुक्त्यन्वयासम्भव

ब्रह्ममीमांसाशास्त्रके अन्तिम अधिकरणके पहले अधिकरणके भाष्य आदिमें कायव्यूहमें योगके प्रभावसे प्रत्येक शरीरमें चक्षु आदिके समान पृथक्-पृथक् अन्तःकरणकी उत्पत्तिका वर्णन किया गया है † । प्रतिबिम्बमें बिम्बसे जो भेद है * वही कल्पित है, इससे स्वरूपतः उसके सत्य होनेसे


भेद है और योगीका सब देहोंमें अभेद ही है इस प्रकार दृष्टान्त और दाष्ट्रान्तमें वैषम्य है, तथापि दीपत्वजातिके अभेदका व्यक्तियोंमें आरोप करके दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी उपपत्ति करनी चाहिए । एक योगीकी अनेकताको श्रुति भी दिखलाती है—'स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा' ( वह योगी एक प्रकारका, तीन प्रकारका, पांच प्रकारका और सात प्रकारका अर्थात् अनेक प्रकारका हो सकता है )। एक ही समयमें अनेक शरीरोंमें योगीके अवस्थानके बिना अनेकत्व उपपन्न नहीं हो सकता ।

† यदि एक ही अन्तःकरणकी कार्यव्यूहमें अभिव्यक्तिके योग्य विपुलता मान ली जाय, तो उक्त भाष्यके साथ अवश्य विरोध होगा । यद्यपि भाष्य आदिका यह तात्पर्य कहना उचित है कि योगीका पूर्वसिद्ध अन्तःकरण ही—योगके प्रभावसे विपुलता प्राप्त कर स्वावच्छिन्न चैतन्यरूप योगीके कायव्यूहमें—भोग आदि कराता है । योगप्रभावसे अनेक अन्तःकरण उत्पन्न होते हैं, ऐसा तात्पर्य मानना ठीक नहीं है, क्योंकि अनेकविध अन्तःकरणोंकी सृष्टि माननेमें कल्पनागौरव और असत्कार्यवादका प्रसङ्ग आता है और हिरण्यगर्भ आदिका ब्रह्माण्डव्यापी जो समष्टि अन्तःकरण है, वह भी योगप्रभावसे ही है, भाष्यमें जो अन्तःकरणकी सृष्टिका प्रतिपादन है, वह परकीय मतके अभिप्रायसे है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि 'एपैव च योगशास्त्रेषु' इत्यादि भाष्यमें यह अर्थ स्पष्ट है, तथापि शास्त्रोपान्त्याधिकरणके यथाश्रुत भाष्यके अभिप्रायसे यह दूषण दिया गया है, ऐसा समझना चाहिए ।

* इस ग्रन्थसे—चित्रदीपमें जो प्रतिबिम्ब चैतन्यरूप जीवके स्वरूपतः मिथ्या होनेसे त्रिकालावाधित ब्रह्मके साथ उस जीवकी एकता नहीं हो सकती, इसलिए चैतन्यके चार भेद करके ऐक्यनिर्वाहके लिए जीव और ईश्वरसे विलक्षण कूटस्थ चैतन्य माना गया है, और दृग्दृश्यविवेकमें प्रतिबिम्बको मिथ्या मानकर युक्तिसे अन्वयके लिए जो पारमार्थिक जीवकी कल्पनाकी गई है—उसका परिहार किया जाता है । अर्थात् प्रमाणके न होनेसे प्रतिबिम्ब जीवसे अतिरिक्त अन्य जीव—कूटस्थ या व्यावहारिक जीवसे अन्य प्रातिभासिक जीव नहीं है, यह भाव है, कुछ लोग शङ्का करते हैं कि व्यावहारिक जीव स्वप्नकालमें आवृत्त रहता है, अतः स्वप्नसमयके व्यवहारकी अनुपपत्ति ही प्रातिभासिक जीवकी कल्पना करती है । नहीं अनुपपत्ति

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०७


इति न तदतिरेकेण मुक्त्यन्वयायाऽवच्छिन्नरूपजीवान्तरं वा प्रतिबिम्बजीवा-
तिरिक्तं जीवेश्वरविलक्षणं कूटस्थशब्दितं चैतन्यान्तरं वा कल्पनीयम् ।
'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इति श्रवणं जीवस्य तदुपाधिनिवृत्तौ


प्रतिबिम्बरूप जीवका मुक्तिमें अन्वयका संभव नहीं है यह नहीं कह
सकते, इससे प्रतिबिम्बरूप जीवसे पृथक् मुक्तिमें सम्बन्ध होनेके लिए
अवच्छिन्नरूप अन्य जीवकी या प्रतिबिम्ब जीवसे अतिरिक्त जीव और
ईश्वरसे विलक्षण कूटस्थ शब्दसे कहे जानेवाले भिन्न चैतन्यकी कल्पना नहीं
करनी चाहिए । $\dagger$ 'अविनाशी वा अरे०' ( अरे मैत्रेयि ! यह आत्मा अवि-
नाशी है ) इत्यादि श्रुति जीवकी उपाधिका विनाश होनेसे प्रतिबिम्बभावका


नहीं है, जीवचैतन्यमें आवरण नहीं होता है, इसका आगे साक्षिनिरूपणमें वर्णन करेंगे, इससे
स्वप्नमें भी जीवचैतन्यसे ही व्यवहारकी उपपत्ति होगी । 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णको देखा था,
वही मैं जागकर उस कृष्णका स्मरण करता हूं' इस प्रकारकी प्रतीतिसे जाग्रत् और स्वप्नके द्रष्टाका
अभेद ही भासता है । इसीलिए प्रातिभासिक जीवकी कल्पना निर्दुष्ट नहीं है ।

$\dagger$ 'अन्धेवानु विनश्यति', 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इत्यादि वाक्योंसे प्रकृत
विज्ञानघन आत्मामें विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, परन्तु
इनका एकमें समावेश नहीं हो सकता, इसलिए विनाशी प्रतिबिम्बसे भिन्न विनाशरहित कूटस्थ
चैतन्यकी सिद्धि होती है, यह जो कहा गया है, वह भी असङ्गत है, क्योंकि अविद्या-
प्रतिबिम्ब चैतन्यरूप जीवमें ही प्रतिबिम्बत्वरूप विशेषणांशके नाशके अभिप्रायसे विनाशित्वका
प्रतिपादन है और चैतन्यांश विशेष्य अंशके अभिप्रायसे अविनाशित्वका प्रतिपादन है,
इस प्रकारकी व्यवस्थासे भी विनाशित्व और अविनाशित्वका व्यवहार हो सकता है ऐसी
अवस्थामें गौरवदोषसे दूषित धर्मिभेदकी कल्पना नहीं करनी चाहिए । यहांपर शङ्का
होती है कि अविद्यामें प्रतिबिम्ब चैतन्य जीव है, अविद्यामें बिम्बभूत चैतन्य ईश्वर है और बिम्ब
एवं प्रतिबिम्बमें अनुगत चैतन्य शुद्ध चैतन्य है । इस विवरणपक्षमें चैतन्यके चार भेद
माननेवालोंने कूटस्थका जो अङ्गीकार किया है, उसका किसमें अन्तर्भाव होता है ? जीवमें
या शुद्ध चैतन्यमें तो उसका अन्तर्भाव हो नहीं सकता, क्योंकि ये दोनों किसीके प्रति उपादान
नहीं हैं और कूटस्थ तो स्थूलसूक्ष्म शरीरके प्रति उपादान माना गया है, अतः उनमें कूटस्थका
अन्तर्भाव नहीं हो सकता । ईश्वरमें भी उसका अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि कूटस्थका
देहादि विक्षेपोंमें अवस्थान है और ईश्वरकी ऐसी अवस्थितिमें कोई प्रमाण नहीं है । परन्तु
यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि कूटस्थका जीव या शुद्ध चैतन्यमें अन्तर्भाव न होनेपर भी
ईश्वरमें अन्तर्भाव हो सकता है, क्योंकि वही ईश्वररूप चैतन्य चेतनात्मक और अचेतनात्मक
समस्त प्रपञ्चका उपादान है और देहविकारोंमें उसका अवस्थान भी है, अतः कूटस्थ चैतन्य-
का ईश्वरसे भेद मानना प्रामाणिक नहीं है ।


१०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


प्रतिबिम्बभावापगमेऽपि स्वरूपं न विनश्यतीत्येतत्परम्, न तदतिरिक्तकूटस्थनामकचैतन्यान्तरपरम् । जीवोपाधिना अन्तःकरणादिनाऽवच्छिन्नं चैतन्यं बिम्बभूत ईश्वर एव । 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादिश्रुत्या ईश्वरस्यैव जीवसन्निधानेन तदन्तर्यामिभावेन विकारान्तरावस्थानश्रवणादिति ।

घटसंवृतमित्यादिश्रुतिस्मृतिसमाश्रयात् ।
अन्येऽन्तःकरणेनावच्छिन्नं जीवं वभाषिरे ॥ ४१ ॥

कुछ लोग 'घटसंवृतम्' इत्यादि श्रुति और स्मृतिके आधारपर अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य जीव है, ऐसा कहते हैं ॥४१॥

अन्ये तु—रूपानुपहितप्रतिबिम्बो न युक्तः सुतरां नीरूपे । गगन-


अपगम होनेपर भी जीवका स्वरूप नष्ट नहीं होता, यह बोध कराती है । जीवसे अतिरिक्त कूटस्थ चैतन्यका बोध नहीं कराती । जीवकी उपाधि—अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न बिम्बभूत चैतन्य ही ईश्वर है, क्योंकि * 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' ( जो विज्ञानमें रहता हुआ ) इत्यादि श्रुतिसे जीवके सन्निधानसे उसके अन्तर्यामी रूपसे विकारोंके भीतर ईश्वरके ही अवस्थानका श्रवण है ।

कुछ लोग अवच्छिन्न पक्षको ही रुचिकर मानते हैं, क्योंकि रूपरहित पदार्थका प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता, नीरूप अन्तःकरण आदिमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब होना सुतरां असम्भव है । [ भाव यह है कि पूर्व ग्रन्थसे मतभेदके साथ


* इसमें आदिशब्दसे 'विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयति' इत्यादि वाक्यका ग्रहण है । यहांपर विज्ञानशब्दका अर्थ है—जीव अर्थात् जो जीवके अन्दर रहकर जीवका अभ्यन्तर है, जिसको जीव नहीं जानता है, जिसका जीव शरीर है और जो जीवका नियमन करता है । इससे ईश्वरमें जीव आदिकी नियन्तृता स्पष्टरूपसे भासती है, और जैसे दूरस्थ राजा प्रजाका नियन्त्रण करता है, वह वैसे नियन्त्रण नहीं करता, किन्तु जीवके सान्निध्यसे ही नियन्त्रण करता है, यह भाव है । यह अन्तर्यामिब्राह्मण स्मृतिका भी उपलक्षण है, इससे—

'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥' [ गीता १८ श्लोक ६१ ]

इस स्मृतिका ग्रहण होता है—हे अर्जुन, शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ होकर प्राणियोंको अपनी मायासे भ्रमण कराता हुआ सम्पूर्ण भूतोंके हृद्देशमें ईश्वर रहता है । इससे ईश्वरमें मायाप्रयुक्त नियन्तृत्व है, यह ज्ञात होता है ।

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १०९

प्रतिबिम्बोदाहरणमप्ययुक्तम् , गगनाभोगव्यापिनि सवितृकिरणमण्डले सलिले प्रतिबिम्बिते गगनप्रतिबिम्बत्वव्यवहारस्य भ्रममात्रमूलकत्वात् ।

प्रतिबिम्बवादियोंके मतमें जीव और ईश्वरका विभाग दिखलाया गया है, इस ग्रन्थसे प्रतिबिम्बको न माननेवालोंके मतसे जीव और ईश्वरका विभाग दिखलाया जाता है। जो लोग चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं मानते हैं, उनका मत है कि लोकमें जिनके प्रतिबिम्ब देखे जाते हैं वे सबके-सब रूपवान् होते हैं, जल आदिमें प्रतिबिम्बित चन्द्र आदिमें रूपवत्ताकी उपलब्धि प्रत्यक्ष ही है और जो स्वतः रूपवान् नहीं हैं, जैसे वायु आदि, उनका प्रतिबिम्ब कहींपर भी नहीं होता है। और कदाचित् अरूपवान्का गगनादिके दृष्टान्तसे प्रतिबिम्ब मान भी लिया जाय, तो भी प्रतिबिम्ब जिस स्थलमें होता है उसमें रूप अवश्य ही रहना चाहिए, क्योंकि अरूपी गगनका रूपवान् जल आदिमें ही प्रतिबिम्ब है, अतः उन प्रतिबिम्बवादियोंका पक्ष श्रद्धेय नहीं हो सकता है, यह रहस्य है । ] पूर्व ग्रन्थोंमें नीरूप गगनके जो प्रतिबिम्बका दृष्टान्त दिया गया है, वह भी अत्यन्त युक्तिशून्य है, कारण कि गगनके महाविस्तारमें व्याप्त सूर्य-किरणमण्डलके जलमें प्रतिबिम्बित होनेपर गगनके प्रतिबिम्बकी प्रतीति केवल भ्रममूलक है, अर्थात् जल आदिमें गगनका प्रतिबिम्ब नहीं होता है किन्तु गगनमें व्याप्त सूर्यके किरणोंका ही प्रतिबिम्ब होता है, परन्तु लोग भ्रमसे व्यवहार करते हैं कि गगनका प्रतिबिम्ब है * ।


* इसमें विचारणीय अंश है कि जैसे बाहर 'आकाश नील है' यह व्यवहार होता है, वैसे ही कूप, तडाग इत्यादिमें भी 'नील आकाश और विशाल गगन' ऐसा व्यवहार सभी करते हैं, परन्तु इस व्यवहारको सत्य नहीं मान सकते, इसलिए कूप आदिमें दृश्यमान आकाश प्रतिबिम्बरूप है, ऐसा मानना होगा। इस परिस्थितिमें गगनका, जो नीरूप है, प्रतिबिम्ब नहीं है, ऐसा अपलाप नहीं कर सकते । नीरूपका प्रतिबिम्ब होता ही नहीं, ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि रूप, संख्या और परिमाणका प्रतिबिम्ब देखा जाता है। यदि शङ्का हो कि नीरूप द्रव्यका प्रतिबिम्ब नहीं होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्तमें द्रव्य और गुणकी परिभाषा ही नहीं है, यदि कथञ्चित् मान लिया जाय कि द्रव्य, गुण आदिकी परिभाषा है, तो भी गगनका प्रतिबिम्ब होता है, इसलिए रूपोपहित द्रव्यका प्रतिबिम्ब होता है, ऐसे नियमका स्वीकार करेंगे। उपहितत्व वस्तुगत स्वगतरूपसे होना चाहिए, या आरोपित रूपसे होना चाहिए। अतः आरोपितरूपवाले आकाशका प्रतिबिम्ब हो सकता है, इसमें कोई बाधक नहीं है। यदि शङ्का की जाय कि जलमें आलोकके प्रतिबिम्ब-से ही निर्वाह हो सकता है, फिर गगनके प्रतिबिम्बमें गौरव है, नहीं, क्योंकि आलोकके

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११०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

ध्वनौ वर्णप्रतिबिम्बत्ववादोऽप्ययुक्तः, व्यञ्जकतया सन्निधानमात्रेण ध्वनिधर्माणांमुदात्तादिस्वराणां वर्णेष्कारोपोपपत्तेः ध्वनेर्वर्णप्रतिबिम्बग्राहित्वकल्पनाया निष्प्रमाणकत्वात् ।

प्रतिध्वनिरपि न पूर्वशब्दप्रतिबिम्बः, पञ्चीकरणप्रक्रियया पटहपयो-

ध्वनि वर्णोंका प्रतिबिम्ब है, यह वाद भी युक्त नहीं है, क्योंकि ध्वनिके, जो सन्निधिमात्रसे वर्णोंका व्यञ्जक है, धर्मभूत उदात्त आदि स्वरोंके वर्णोंमें आरोपमात्रसे उपपत्ति हो सकती है, तो फिर ध्वनिमें वर्णप्रतिबिम्बकी ग्राहिता है, इस प्रकारकी कल्पना प्रमाणशून्य है। [ भाव यह है कि ह्रस्वत्व, दीर्घत्व आदि जो धर्म हैं, वे वस्तुतः ध्वनिके ही हैं; परन्तु उनका वर्णोंमें (अकार आदिमें ) आरोप किया जाता है, उनका आरोप तभी हो सकता है, जब ध्वनिको वर्णोंका प्रतिबिम्ब माना जाय। प्रतिबिम्बके स्वीकार करनेसे जैसे दर्पणमें रहनेवाला मालिन्य प्रतिबिम्ब द्वारा मुखमें आरोपित होता है, वैसे ही ध्वनिमें रहनेवाले ह्रस्वत्व आदिका प्रतिबिम्ब द्वारा बिम्बभूत वर्णोंमें आरोप होगा, इस परिस्थितिमें नीरूप ध्वनिमें नीरूप वर्णोंका प्रतिबिम्ब मानना ही पड़ेगा, इस प्रणालीसे नीरूप अन्तःकरणमें नीरूप आत्माका प्रतिबिम्ब क्यों न माना जाय, इसका समाधान इस रीतिसे दिया गया है कि वर्णोंका प्रतिबिम्ब माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, परन्तु व्यञ्जक ध्वनिके सामीप्यमात्रसे ध्वनिमें रहनेवाले ह्रस्वत्व आदिका वर्णोंमें आरोप होता है, जैसे जपाकुसुमके सामीप्यसे रक्तत्वका स्फटिकमें आरोप होता है, अतः वर्णप्रतिबिम्बका स्वीकार न करनेसे इस दृष्टान्तसे अन्तःकरणमें आत्मप्रतिबिम्बका अभ्युपगम नहीं हो सकता ]।

* प्रतिध्वनि भी पूर्वशब्दका प्रतिबिम्ब नहीं है, क्योंकि पञ्ची-


प्रतिबिम्बमें गगनप्रतिबिम्बत्वं भ्रम माननेपर भी उस भ्रमके विषयीभूत गगनप्रतिबिम्बको अनिर्वचनीय मानना होगा, अतः गौरव समान ही है और अनुभवानुसारी गौरव दोषावह नहीं होता, इसलिए रूपवान्का ही प्रतिबिम्ब होता है, इस नियममें गगनमें व्यभिचार दुर्वार है। तथापि चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं होता है, क्योंकि नीरूप अन्तःकरण प्रतिबिम्बकी उपाधि नहीं हो सकती है, यह रहस्य है।

* भाव यह है कि पटह आदि वायसे उत्पन्न शब्दस्थलमें पाषाणविशेष आदिके समीपवर्ती आकाशप्रदेशमें प्रतिध्वनि सुनी जाती है। वह पूर्व शब्दका प्रतिबिम्ब है, मुख्य ध्वनि

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १११


निधिप्रभृतिशब्दानां क्षितिसलिलादिशब्दत्वेन प्रतिध्वनेरेवाकाशशब्दत्वेन तस्यान्यशब्दप्रतिबिम्बत्वायोगात् । वर्णरूपप्रतिशब्दोऽपि न पूर्ववर्णप्रतिबिम्बः। वर्णाभिव्यञ्जकध्वनिनिमित्तकप्रतिध्वनेर्मूलध्वनिवदेव वर्णाभिव्यञ्जकत्वेनोपपत्तेः। तस्मात् घटाकाशवदन्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं जीवः। तदनवच्छिन्नम् ईश्वरः।

न चैवमण्डान्तर्वर्तिनश्चैतन्यस्य तत्तदन्तःकरणोपाधिभिः सर्वात्मना जीव-


करणकी प्रक्रियासे पटह (वाद्यविशेष), समुद्र आदिशब्द पृथ्वी और जल आदिके शब्द हैं, वैसे ही प्रतिध्वनि भी आकाशका ही शब्द है, इसलिए उसे अन्य शब्दका प्रतिबिम्ब मानना युक्तियुक्त नहीं है। वर्णरूपशब्द भी प्रतिध्वनिके समान पूर्व वर्णका प्रतिबिम्ब नहीं है, क्योंकि वर्णकी अभिव्यञ्जक ध्वनिसे उत्पन्न होनेवाली प्रतिध्वनि भी मूलध्वनिके समान वर्णकी अभिव्यञ्जक है, ऐसा माननेसे ही उपपत्ति हो सकती है † । इससे—नीरूप चैतन्यके प्रतिबिम्ब न होनेसे यही स्वीकार करना चाहिए कि घटाकाशके समान अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य ही जीव है और उपाधिसे अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है ।

संसारान्तर्वर्ती चैतन्यका तत्तत् अन्तःकरणरूप उपाधियोंसे सर्वात्मना जीवभावसे अवच्छेद है अर्थात् संसारान्तर्वर्ती समग्र चैतन्य अन्तःकरणरूप उपाधियोंसे


नहीं है, क्योंकि उसका उत्पादक कोई नहीं है, इस परिस्थितिमें जैसे नीरूप ध्वनि नीरूप आकाशमें प्रतिबिम्बित होती है, वैसे ही नीरूप चैतन्य नीरूप अन्तःकरणमें क्यों प्रतिबिम्बित नहीं होता ? नहीं, यह दृष्टान्त युक्त नहीं है अर्थात् नीरूप आकाशमें नीरूप ध्वनिका प्रतिबिम्ब नहीं है, किन्तु वह शब्दान्तर ही है और उसका उत्पादक आकाश है और निमित्त कारण है—पूर्व शब्द । प्रतिध्वनिके प्रतिबिम्बरूप होनेपर आकाशगुण वह नहीं हो सकती, कारण कि बिम्ब और प्रतिबिम्बके भेदपक्षमें प्रतिध्वनिरूप प्रतिबिम्बके प्रातिभासिक होनेसे उसमें व्यावहारिकगुणत्वकी उपपत्ति नहीं हो सकती है और बिम्ब प्रतिबिम्बके अभेद पक्षमें प्रतिध्वनिरूप प्रतिबिम्बके बिम्बभूत पृथ्वी आदि शब्दकी अपेक्षासे भेद न होनेके कारण उसमें आकाशगुणत्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है, यह भाव है ।

† तात्पर्य यह है कि कण्ठ, तालु आदि वर्णके व्यञ्जक नहीं हैं, परन्तु कण्ठ आदिके अभिघातसे उत्पन्न ध्वनि ही उसकी अभिव्यञ्जक है, इसलिए जैसे मूलध्वनि वर्णकी व्यञ्जक है, वैसे ही प्रतिवर्णकी अभिव्यक्तिमें उत्पन्न प्रतिध्वनि ही वर्णकी व्यञ्जक है, अतः प्रतिवर्ण भी प्रतिबिम्ब रूप नहीं है, इसलिए इस दृष्टान्तसे भी चैतन्यके प्रतिबिम्बका प्रतिपादन नहीं कर सकते हैं ।


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११२ सिद्धान्तलेशसंग्रह - [ प्रथम परिच्छेद


भावेनावच्छेदात् तदवच्छेदरहितचैतन्यरूपस्येश्वरस्याऽण्डाद् बहिरेव सत्त्वं स्यादिति ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्’ इत्यादावन्तर्यामिभावेन विकारान्तर- वस्थानश्रवणं विरुध्येत । प्रतिबिम्बपक्षे तु जलगतस्वाभाविकाकाशे सत्येव प्रतिबिम्बाकाशदर्शनात् एकत्र द्विगुणीकृत्य वृत्तिरुपपद्यते इति वाच्यम् । यतः प्रतिबिम्बपक्षेऽप्युपाधावनन्तर्गतस्यैव चैतन्यस्य तत्र प्रतिबिम्बो वाच्यः, न तु जलचन्द्रन्यायेन कृत्स्नप्रतिबिम्बः । तदन्तर्गतभागस्य तत्र प्रतिबिम्बासम्भवात् । नहि मेघावच्छिन्नस्याऽऽकाशस्याऽऽलोकस्य वा जले प्रतिबिम्बवत् जलान्तर्गतस्याऽपि तत्र प्रतिबिम्बो दृश्यते । न वा मुखादीनां बहिःस्थितिसमये इव जलान्तर्निमज्जनेऽपि प्रतिबिम्बोऽस्ति । अतो जलप्रति-


अवच्छिन्न होनेसे जीवभावापन्न ही है, अतः अन्तःकरणरूप उपाधिसे रहित ईश्वररूप चैतन्यका ब्रह्माण्डसे अन्यत्र ही अवस्थान प्राप्त होगा, इस परिस्थितिमें ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्’ (जो जीवमें रहता हुआ) इत्यादि श्रुतिमें अन्तर्यामिभावसे ईश्वरका विकारोंके अन्दर जो अवस्थानका श्रवण है, वह विरुद्ध होगा, इसलिए अवच्छेदवाद मानना युक्त नहीं है, प्रत्युत प्रतिबिम्ब पक्ष ही मानना युक्त है, क्योंकि प्रतिबिम्ब पक्षमें तो जलके अन्दर वस्तुतः स्वाभाविक आकाशके रहते ही आकाशप्रतिबिम्ब देखा जाता है, इसलिए प्रकृतमें भी एक ही उपाधिमें प्रतिबिम्बभूत जीवभावसे और तत्तत् उपाधिके अन्तर्यामिभावसे वृत्ति—अवस्थिति उपपन्न हो सकती है, अतः अवच्छेदवाद अयुक्त है । इस प्रकारकी यदि कोई शङ्का करे, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि प्रतिबिम्ब पक्षमें भी उसी चैतन्यका उपाधिमें प्रतिबिम्ब मानना चाहिए, जिसका उपाधिमें अवस्थान नहीं है अर्थात् जो चैतन्य उपाधिके अन्तर्गत नहीं है । जलचन्द्रके दृष्टान्तसे सम्पूर्णका प्रतिबिम्ब नहीं मानना चाहिए । उपाधिके अन्तर्गत भागका उस उपाधिमें प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता है, क्योंकि मेघावच्छिन्न आकाश अथवा आलोकका जैसे जलमें प्रतिबिम्ब होता है, वैसे जलान्तर्गत आकाशका या आलोकका जलमें प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता है। अथवा जलसे बाहर जब मुखकी अवस्थिति रहती है, तब जैसे मुखका जलमें प्रतिबिम्ब होता है, वैसे जलके भीतर मज्जन समयमें उस जलमें मुखका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता है, इससे—अर्थात् कथित दृष्टान्तोंसे यह सिद्ध हुआ कि उपाधिमें अनन्तर्गत


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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११३


बिम्बं प्रति मेघाकाशादेरिवान्तःकरणाद्युपाधिप्रतिबिम्बं प्रति तदनन्तर्गतस्यैव बिम्बत्वं स्यादिति बिम्बभूतस्य विकारान्तरवस्थानायोगात् ईश्वरे अन्तर्यामिब्राह्मणाञ्जसस्याऽभावस्तुल्यः ।

एतेनाऽवच्छिन्नस्य जीवत्वे कर्तृभोक्तृसमययोस्तत्र तत्राऽन्तःकरणावच्छेद्यचैतन्यप्रदेशस्य भिन्नत्वात् कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्ग इति निरस्तम् ।

प्रतिबिम्बपक्षेऽपि स्वानन्तर्गतस्य स्वसंनिहितस्य चैतन्यप्रदेशस्याऽन्तःकरणे प्रतिबिम्बस्य वक्तव्यतया तत्र तत्राऽन्तःकरणगमने बिम्बभेदात् तत्प्रतिबिम्बस्याऽपि भेदावश्यम्भावेन दोषतौल्यात् । न च 'अन्तःकरणप्रतिबिम्बो जीवः' इति पक्षे दोषतौल्येऽपि 'अविद्याप्रतिबिम्बो जीवः' । तस्य च तत्र तत्र गत्वरमन्तःकरणं जलाशयव्यापिनो महामेघमण्डलप्रतिबिम्बस्य


का ही उस उपाधिमें प्रतिबिम्ब होता है । इससे जलप्रतिबिम्बके प्रति जैसे मेघाकाश आदिमें बिम्बत्व है, वैसे ही अन्तःकरण आदि उपाधियोंमें रहनेवाले प्रतिबिम्बके प्रति अन्तःकरण आदिमें अनन्तर्भूत चैतन्यमें * बिम्बत्व होगा, इसलिए बिम्बभूत चैतन्यके विकारके अन्दर अवस्थानका अयोग होनेसे प्रतिबिम्बपक्षमें भी 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादि अन्तर्यामिब्राह्मणकी असमञ्जसता तुल्य ही है * ।

इससे अवच्छिन्न चैतन्यके जीवत्वपक्षमें कर्म करने और उसके फल भोगनेके समयमें पृथ्वी और स्वर्ग आदिमें अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशके भिन्न होनेपर भी कृतहान या अकृताभ्यागम रूप दोषका प्रसङ्ग—निरस्त हुआ ।

क्योंकि प्रतिबिम्बपक्षमें भी उपाधिमें अनन्तर्गत और उपाधिके सन्निहित चैतन्य प्रदेशका ही अन्तःकरणमें प्रतिबिम्ब होता है, ऐसा कहना होगा, इसलिए उस-उस स्थलमें अन्तःकरणके गमनमें बिम्बके भेदसे उसके प्रतिबिम्बका भेद भी अवश्यम्भावी है, अतः पूर्वोक्त कृतहान और अकृतका अभ्यागमरूप दोष समान ही है । शङ्का होती है कि अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है, इस पक्षमें दोषकी समानता रहनेपर भी (हम) अविद्यामें चित्के प्रतिबिम्ब को जीव मानते हैं । जैसे तत्तत् जलाशयोंमें व्यास महा मेघमण्डलके प्रतिबिम्बकी


* अर्थात् लोकमें यही अनुभव होता है कि उपाधिकुक्षिमें अप्रविष्टका ही प्रतिबिम्ब देखा जाता है, उपाधिकुक्षिमें प्रविष्टका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता, यह भाव है ।

१५

११४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

तदुपरि विसृत्वरस्फीतालोक इव तत्र तत्र विशेषाभिव्यक्तिहेतुरिति पक्षे नाऽयं दोषः। अन्तःकरणवदविद्याया गत्यभावेन प्रतिबिम्बभेदानापत्तेरिति वाच्यम् , तथैवाऽवच्छेदपक्षेऽपि 'अविद्यावच्छिन्नो जीवः' इत्यभ्युपगमसम्भवात् । तत्राऽप्येकस्य जीवस्य क्वचित् प्रदेशे कर्तृत्वं प्रदेशान्तरे भोक्तृ-


अभिव्यक्तिका हेतु जलाशयके ऊपर भागमें गमनशील मेघके छिद्रोंसे निकला हुआ स्पष्ट प्रकाश विशेष है, वैसे ही इस लोक या परलोकमें गमनशील अन्तःकरण भी अविद्यामें प्रतिबिम्बभूत जीवकी अर्थात् जीवगत कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिकी विशेष अभिव्यक्तिका हेतु है, इसलिए इस पक्षमें समानताप्रयुक्त दोष नहीं है। कृतहानादि दोष की प्रसक्ति भी नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणके समान अविद्याकी गति न होनेसे प्रतिबिम्बका भेद हो ही नहीं सकता। परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदपक्षमें भी उसी प्रकार अविद्यावच्छिन्न जीव है, ऐसा स्वीकार कर सकते हैं। * 'अविद्या-


* भाव यह है कि ब्रह्माण्डान्तर्गत चैतन्यभागके उपाधिके अन्तर्गत होनेसे उससे बाहरके चैतन्यका ही प्रतिबिम्ब होगा, अतः ब्रह्माण्डसे बाहर ही बिम्बभूत चैतन्यके अवस्थानकी प्रसक्ति होगी और अन्तर्यामी ब्राह्मणके साथ विरोध होगा। यदि प्रतिबिम्बपक्षमें ईश्वरकी सर्वान्तर्यामित्वप्रतिपादक श्रुतिके अनुसार लोकानुभवका परित्याग करके सम्पूर्ण चैतन्यका प्रतिबिम्ब मानकर अन्तर्यामी ब्राह्मणके सामञ्जस्यका उपपादन किया जाय, तो अनवच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसी विवक्षा होगी। अन्तःकरणके कल्पित होनेसे चैतन्यमें अन्तःकरणावच्छिन्नके रहनेपर भी वस्तुसत् अन्तःकरणाभाव है, अतः अन्तःकरणाभाववच्छिन्न चैतन्यरूप ईश्वरका सभी विकारोंमें अवस्थान हो सकता, इससे अन्तर्यामी ब्राह्मणकी इस पक्षमें भी अनुपपत्ति नहीं है। तृप्तिदीप-प्रकरणमें अभाव भी ईश्वरकी उपाधि कहा गया है—

अन्तःकरणसाहित्यराहित्याभ्यां विशिष्यते।
उपाधिर्जीवभावस्य ब्रह्मतायाश्च नान्यथा ॥ ८५ ॥
यथा विधिरुपाधिः स्यात् प्रतिषेधस्तथा न किम् ।
सुवर्णलोहभेदेन शृङ्खलात्वं न भिद्यते ॥ ८६ ॥
अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन च।
वेदान्तानां प्रवृत्तिः स्याद् द्विधेत्याचार्यभाषितम् ॥ ८७ ॥

इन श्लोकोंका तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणके साहित्य और साहित्यसे जीवभाव और ब्रह्मभावका भेद है अर्थात् जीवत्वकी उपाधि अन्तःकरणसाहित्य है और अन्तःकरणराहित्य ब्रह्मत्वकी उपाधि है। अन्य प्रकारसे इनका भेद नहीं हो सकता। भावके समान अभावके व्यावर्तक उपाधि

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषाअनुवादसहितं ११५


त्वमित्येवं कृतहानादिदोषापनुत्तये वस्तुतो जीवैक्यस्य शरणीकरणीयत्वेन तन्न्यायादन्तःकरणोपाधिपक्षेऽपि वस्तुतश्चैतन्यैक्यस्य तदवच्छेदकोपाध्यैक्यस्य च तन्नत्वाभ्युपगमेन तद्दोषनिराकरणसम्भवाच्च । न चाऽवच्छेदपक्षे 'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । उपाधिना


प्रतिबिम्बो जीवः' इस पक्षमें भी ब्राह्मण आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें कर्तृत्व और देव आदि शरीरगत अन्तःकरणसे अवच्छिन्न प्रदेशमें भोक्तृता है, इस प्रकार प्रदेश-भेद होनेपर भी कृतहान आदि दोषका निराकरण करनेके लिए अगत्या प्रतिबिम्बवादियोंको एकजीववादपक्षका अङ्गीकार करना होगा, अतः इसी न्यायके आधारपर अन्तःकरणोपाधिपक्षमें भी (अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य जीव है, इस पक्षमें भी अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य-प्रदेशके भिन्न होनेपर भी ) वास्तवमें चैतन्यकी एकता और चैतन्यकी अवच्छेदक उपाधिकी एकताको प्रयोजक माननेसे कृतहान आदि दोषोंका निराकरण भी * हो सकता है । परन्तु अवच्छेदपक्षमें—'यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा०'


होनेमें कोई विशेष नहीं है । जैसे सुवर्ण और लोहके भेदसे शृङ्खलात्वमें कोई विशेषता नहीं होती, वैसे ही भावाभावके व्यावर्तकत्वमें विशेषता नहीं है । वेदान्तोंकी अतद्व्यावृत्ति और विधिमुखसे द्विधा प्रवृत्ति होती है, ऐसा आचार्योंका सम्मत पक्ष है। अतद्व्यावृत्ति—तत् शब्दसे ब्रह्मका परिग्रह होता है, अतत् शब्दसे ब्रह्मभिन्न अन्तःकरण आदिका, उनकी व्यावृत्तिरूपसे ब्रह्मका बोध होता है और बुद्धिका साक्षी, मनका साक्षी, इस प्रकार विधिमुखसे भी ब्रह्मका बोध होता है । इस परिस्थितिमें प्रतिबिम्ब और अवच्छेद दोनों वादोंमें अन्तर्यामी ब्राह्मणकी उपपत्ति और अनुपपत्तिके समान होनेपर 'सुतरां नीरूपे' इत्यादिसे नीरूप अन्तःकरण आदिमें चैतन्यके प्रतिबिम्बके असंभवका प्रतिपादन होनेसे अवच्छेदपक्ष ही आदरणीय है, प्रतिबिम्बपक्ष आदरणीय नहीं है।


* तात्पर्य यह है कि वस्तुतः चैतन्य यदि एक है, तो अन्य जीव द्वारा किये गये कर्मोंके फलका भोग अन्यको होगा, यह आपत्ति देना युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदवादियोंके मतमें एक अन्तःकरणसे अवच्छिन्न चैतन्य एक जीव है और अन्य अन्तःकरणसे अवच्छिन्न अन्य जीव है इस प्रकारका अभ्युपगम होनेसे अन्तःकरणोंके भिन्न-भिन्न होनेसे जीवान्तर-कृत कर्मोंका जीवान्तरोंसे भोग नहीं हो सकता है, इसी रहस्यको ग्रन्थकारने ( तदवच्छेदकोपाधि ) इस शब्दसे प्रकट किया है। इस अवच्छेदपक्षमें पूर्वकथनानुसार अन्तःकरणके अभावसे युक्त चैतन्य—अन्तःकरणाभावावच्छिन्न चैतन्य—ईश्वर है अथवा 'कारणोपाधिरीश्वरः' इस श्रुतिके अनुरोधसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसा समझना चाहिए ।

११६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


क्रियते भेदरूपो देवः क्षेतेष्वेवमजोऽयमात्मा' 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १८) इति श्रुतिसूत्राभ्यां विरोधः । 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १९)

(जैसे प्रकाशस्वरूप एक सूर्य अनेक जलपात्रोंमें प्रतिबिम्बित होकर अनेकरूप होता है, वैसे ही स्वप्रकाश यह नित्य आत्मा स्वतः एक होनेपर भी उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होकर अनेकरूप होता है * ) इत्यादि श्रुतिके साथ और 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' †इस सूत्रके साथ विरोध है ? नहीं, विरोध नहीं है, क्योंकि उदाहृत सूत्रके अनन्तर पठित 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' ‡


* इत्यादिमें आदिशब्दसे 'एक एव तु भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः, एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्' 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' 'जीवेशावाभासेन करोति' इत्यादि प्रतिबिम्बबोधक श्रुतियोंका भी ग्रहण करना चाहिए । प्रथम श्रुतिका अर्थ है—एक ही भूतात्मा जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रके समान सभी उपाधियोंमें प्रतिबिम्बरूपसे अवस्थित होकर अनेकसा दीखता है। द्वितीय श्रुतिका अर्थ है—प्रत्येक उपाधिमें आत्माका प्रतिरूप—प्रतिबिम्ब है। तृतीयाका अर्थ है—माया जीव और ईशको आभाससे—प्रतिबिम्बसे—करती है। अनेक स्थलोंमें प्रतिरूपशब्द प्रतिबिम्बरूप अर्थमें प्रयुक्त हुआ है। 'पुरुषका प्रतिरूप है' अर्थात् पुरुषका प्रतिबिम्ब है। इसलिए श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे अवच्छेदवाद अयुक्त है, यह पूर्वपक्षीका भाव है।

† 'अत एव चोपमा सूर्यकादिवत्' इस सूत्रका अर्थ है-चूँकि आत्मा स्वभावतः एक अद्वितीय है, श्रुतियोंमें उसकी अनेकता औपाधिकरूपसे कही गई है। इसीलिए उसकी औपाधिक अनेकरूपतामें जल आदिमें प्रतिबिम्बित सूर्य आदि दृष्टान्तरूपसे श्रुतियोंमें गृहीत हैं। अर्थात् जैसे सूर्य के एक होनेपर भी जल आदिमें उसके प्रतिबिम्बित होनेसे वह अनेकविध होता है, वैसे ही चैतन्यके स्वतः एक होनेपर भी अन्तःकरण आदिमें उसका प्रतिबिम्ब पड़नेसे वह अनेकविध होता है, यह भाव है।

‡ तात्पर्य यह है कि श्रुतिमें स्थित प्रतिरूपशब्द प्रतिबिम्बवाचक नहीं है, क्योंकि 'वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' इसमें पठित प्रतिरूपशब्दका प्रतिबिम्ब अर्थ नहीं हो सकता । अतः सूर्य आदिके प्रतिबिम्बदृष्टान्तकी स्वरसतासे ही चैतन्यका प्रतिबिम्ब कहना चाहिए, परन्तु यह भी नहीं हो सकता है, कारण कि सूत्रकारने स्वयं ही 'अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम्' इस सूत्रसे उसका निराकरण किया है। सूत्रके दृष्टान्तभागके अर्थका ही मूलमें 'यथा' इत्यादिसे विवरण किया है, तथापि संगृहीत अर्थ यह है—जल आदिके समान अत्यन्त स्वच्छ और रूपवान् उपाधिका ग्रहण न होनेसे सूर्य आदिके समान चैतन्यका प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता, यद्यपि अन्तःकरण उपाधि है, तथापि वह रूपवान् और आत्मासे विप्रकृष्ट नहीं है, जैसे कि सूर्यसे विप्रकृष्ट जल है। इसपर शङ्का होती है कि यदि सूर्यका दृष्टान्त उक्त रीतिसे

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११७


इत्युदाहृतसूत्रानन्तरसूत्रेण यथा सूर्यस्य रूपवतः प्रतिबिम्बोदययोग्यं ततो विप्रकृष्टदेशं रूपवज्जलं गृह्यते, नैवं सर्वगतस्याऽऽत्मनः प्रतिबिम्बोदययोग्यं किञ्चिदस्ति ततो विप्रकृष्टमिति प्रतिबिम्वासम्भवमुक्त्वा 'वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० २०) इति तदनन्तरसूत्रेण यथा जलप्रतिबिम्बितः सूर्यो जलवृद्धौ वर्धते इव, जलह्रासे ह्रसतीव, जलचलने चलतीवेति तस्याऽऽध्यासिकं जलानुरोधिवृद्धिह्रासादिभाक्त्वम्, तथा आत्मनोऽन्तःकरणादिनाऽवच्छेदेन उपाध्यन्त-


सूत्रसे—'जैसे रूपवान् सूर्यके प्रतिबिम्बके योग्य स्वच्छ और सूर्यसे दूरदेशमें रहनेवाला रूपवान् जल उपलब्ध होता है, वैसे सर्वगत आत्माके प्रतिबिम्बके योग्य और आत्मासे दूरदेशवर्ती कोई वस्तु उपलब्ध नहीं होती' इस प्रकार प्रतिबिम्बका असम्भव कहकर 'वृद्धिह्रासभाक्त्वम्' इत्यादि अनन्तर पठित सूत्रसे—'जैसे जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य जलकी वृद्धि होनेपर बढ़ता-सा है, जलके कम होनेपर छोटा-सा होता है और जलके चलनेसे जलप्रतिबिम्बित सूर्य मानो चलता है, इस प्रकार सूर्यमें जलके सम्बन्धसे आध्यासिक वृद्धि और ह्रास आदिकी प्रतीति होती है, वैसे ही चिदात्माके अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न होनेके कारण (उसके) बुद्धि आदि उपाधिमें


नहीं घट सकता है, तो श्रुतिमें कहे गये 'जलचन्द्रवत्' या 'जलसूर्यवत्' इत्यादि दृष्टान्तोंकी असङ्गति होगी, नहीं, असङ्गति नहीं होगी, कारण कि यद्यपि दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका प्रतिबिम्बितत्वरूपसे साम्य नहीं है, तथापि वृद्धि, ह्रास आदिसे अन्य सादृश्य होनेसे दृष्टान्तकी उपपत्ति-सङ्गति हो सकती है। इसी उपपत्तिका मूलमें 'वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यम्' इस सूत्रसे उल्लेख किया गया है। यद्यपि मूलमें ही सूत्रका अर्थ किया गया है, तथापि विशेषरूपसे स्फुट होनेके लिए फिर सुन लीजिये—विशाल जलसमुदायमें यदि सूर्यका प्रतिबिम्ब पड़े, तो वह बहुत बड़ा दीखता है, क्षुद्रपात्रस्थित जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य क्षुद्रसा भासता है, जलके हिलनेसे सूर्यका भी हिलना-चलना मालूम होता है, वैसे ही आत्मा भी अन्तःकरण आदिसे अवच्छिन्न है, अतः उसकी अन्तःकरण आदिके अभ्यन्तर सत्ता है, इसलिए हाथी आदि विशालकाय जीवोंके अन्तःकरण आदि उपाधियोंके विशाल होनेसे आत्मा विशाल मालूम होता है और मच्छर आदि क्षुद्र जीवोंके छोटे अन्तःकरणमें वह छोटा मालूम होता है अर्थात् ह्रासित आत्मा ज्ञात होता है। अन्तःकरण आदिके गतिमान् होनेसे वह चलता-सा मालूम होता है। वस्तुतः न तो वह बड़ा है, न छोटा है और न चलता है। इसीलिए 'ध्यायतीव, लेलायतीव' (बुद्धिके ध्यान करनेपर आत्मा मानो ध्यान करता है, चलनेपर मानो आत्मा भी चलता है, ऐसा प्रतीत होता है)। अतः दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिककी इसी रूपसे सङ्गति है, इसलिए दृष्टान्त-वाक्य अनुपपन्न नहीं हैं और उनका तात्पर्य प्रतिबिम्बवादमें नहीं है।

११८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

र्भावादाध्यासिकं तदनुरोधिवृद्धिह्रासादिभाक्त्वमित्येवं दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोस्सामञ्जस्यादविरोध इति स्वयं सूत्रकृतैवाऽवच्छेदपक्षे तयोस्तात्पर्यकथनात् । ‘घटसंवृतमाकाशं नीयमाने यथा घटे । घटो नीयेत नाकाशं तद्वज्जीवो नभोपमः ॥’ ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’ ( उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३ ) इति श्रुतिसूत्राभ्यामवच्छेदपक्षस्यैव परिग्रहाच्च । तस्मात् सर्वगतस्य चैतन्यस्याऽन्तःकरणादिनाऽवच्छेदोऽवश्यम्भावीति आवश्यकत्वात् ‘अवच्छिन्नो जीवः’ इति पक्षं रोचयन्ते ॥

अन्तर्भूत होनेसे उसमें अन्तःकरणप्रयुक्त आध्यासिक वृद्धि और ह्रास आदिकी प्रतीति होती है, इस प्रकार दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका सामञ्जस्य होनेसे विरोध नहीं है—ऐसा स्वयं सूत्रकारने ही ‘यथा ह्ययं’ और ‘अत एव चोपमा’ इत्यादि प्रतिबिम्बबोधक श्रुति और सूत्रका अवच्छेदपक्षमें तात्पर्य कहा है । अवच्छेदपक्षमें श्रुति आदिके विरोधका केवल अभाव ही नहीं है, प्रत्युत श्रुति और सूत्रका आनुकूल्य भी है—‘घटसंवृतम्०’ (जैसे घटके ले जानेपर घटावच्छिन्न आकाश नहीं ले जाया जाता किन्तु केवल घट ही ले जाया जाता है, वैसे ही जीव भी आकाशके तुल्य है अर्थात् जीव भी अवच्छिन्न चैतन्यरूप है और उसकी उपाधिका ही गमन होता है ) इस श्रुतिसे और * ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’ इस सूत्रसे भी अवच्छेदपक्षका ही लाभ होता है । इससे अर्थात् प्रतिबिम्बपक्षमें दोष होनेसे और अवच्छेदपक्षमें किसी प्रकारका दोष न होनेसे सर्वगत चैतन्यका अन्तःकरण आदि उपाधियोंसे अवच्छेद अवश्य ही होगा, अतः अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको † जीव मानना ही अत्यन्त आवश्यक है ।


* ‘अंशो नानाव्यपदेशात्’—अंशः—जीव ईश्वरका अंश है, किससे? इससे कि नानाव्यपदेशात्—‘य आत्मानमन्तरो यमयति’ (जो आत्माका—जीवका अभ्यन्तर नियमन करता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें नियम्यनियामकरूपसे जीव और ईश्वरका भेद कहा गया है । प्रकृतमें अंशशब्दका अर्थ अवयव या एकदेश नहीं है, परन्तु घटाकाशके समान अन्तःकरणावच्छिन्नत्वरूप है, मुख्य अंशत्व विवक्षित नहीं है, क्योंकि ब्रह्म निरवयव है, अतः उसका मुख्य अंश नहीं हो सकता ।

† यह उपलक्षण है, अर्थात् अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ईश्वर है, ऐसा भी जानना चाहिए, क्योंकि ‘कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाधिरीश्वरः’ ऐसी श्रुति पूर्वमें कही जा चुकी है । ‘जीवेशावा-

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११९


कौन्तेय इव राधेयो जीवः स्वाविद्यया परः ।
नाऽभासो नाऽप्यवच्छिन्न इत्याहुरपरे बुधाः ॥४२॥

जैसे कौन्तेय ही राधेय है, वैसे ही परमात्मा ही अपनी अविद्यासे जीवभावापन्न होता है, न प्रतिबिम्ब है और न अवच्छिन्न है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥४२॥

अपरे तु न प्रतिबिम्बः, नाऽप्यवच्छिन्नो जीवः । किन्तु कौन्तेयस्यैव राधेयत्ववदविकृतस्य ब्रह्मण एव अविद्यया जीवभावः । व्याध-कुलसंवर्धितराजकुमारदृष्टान्तेन 'ब्रह्मैव स्वाविद्यया संसरति, स्वविद्यया मुच्यते' इति बृहदारण्यकभाष्ये प्रतिपादनात् ।

कुछ लोग कहते हैं कि प्रतिबिम्ब जीव नहीं है और अवच्छिन्न भी जीव नहीं है, किन्तु जैसे कुन्तीके ही पुत्र कर्णमें राधेयत्व ( दासीपुत्रत्व ) का व्यवहार होता है, वैसे ही अविकृत ब्रह्ममें ही अविद्यासे जीवभावका व्यवहार होता है, क्योंकि बृहदारण्यकभाष्यमें—व्याधकुलसंवर्धितराजकुमारके दृष्टान्तसे * 'ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे संसारका भागी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है, ऐसा—प्रतिपादन किया गया है । और 'राजसूनो०'


भावेन करोति' इत्यादि श्रुतिमें आभासशब्दका अर्थ अवच्छिन्न है, प्रतिबिम्ब अर्थ नहीं है, यह कहा जा चुका है । 'माया च अविद्या च स्वयमेव भवति' इसमें माया शब्दार्थ है—'कार्योपाधिरयं जीवः' इस श्रुतिके अनुसार अन्तःकरण । मायापदसे गृहीत अन्तःकरणमें माया-शब्दका प्रयोग इसलिए है कि यह प्रकृतिका विकार है । अनवच्छिन्नचैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, वह चित्रदीपके आधारपर और अन्तःकरणाभावावच्छिन्नचैतन्य ईश्वर है, यह सम्भवमात्रसे कहा गया है, तात्पर्यसे नहीं कहा गया है, अन्यथा 'कारणोपाधिरिश्वरः' इस श्रुतिके साथ विरोध होगा । अनवच्छिन्नको ईश्वर माननेपर किसी उपाधिके न रहनेसे ईश्वर सर्वज्ञ कैसे होगा ? इस प्रश्नका उत्तर उन्हींसे पूछना चाहिए । इसीलिए वाक्यवृत्तिमें भगवान् शङ्कराचार्यने 'मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः' ( माया उपाधिसे युक्त ईश्वरके सर्वज्ञत्व आदि लक्षण हैं ) ऐसा कहा है ।

* दृष्टान्तका तात्पर्य यह है—राजकुलमें उत्पन्न हुआ कोई राजकुमार किसी कारणवश छोटी अवस्थासे ही व्याधके कुलमें रहा और अपनेको राजकुमार नहीं समझता था किन्तु मैं व्याधका अर्थात् एक निकृष्ट जातिका पुत्र हूँ ऐसा जानता था, इसी कारणसे कदाचित् यह अत्यन्त शूर या विजयी होनेपर भी लोकमें अपनी निकृष्ट जातीयताप्रयुक्त अपमानका अनुभव करता रहा, इस दशामें उसके वंशका परिज्ञान रखनेवाले किसीने उससे कहा कि तुम राजपुत्र हो व्याधके पुत्र नहीं हो, इससे-अपनी उत्कृष्ट जातिके स्मरणसे-हीन जातिप्रयुक्त अपमान आदिको भूलकर यह उत्तम जातिके सुखका जैसे अनुभव करने लगा, वैसे ही ब्रह्म भी अनादि अविद्याके प्रभावसे अपने स्वतः सिद्ध, नित्य और आनन्दरूप स्वभावको भूलकर जीवभावको प्राप्त हुआ है। और तज्जन्य

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१२०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

राजसूनोः स्मृतिप्राप्तौ व्याधभावो निवर्तते ।
यथैवमात्मनोऽज्ञस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यतः ।
इति वार्तिकोक्तेश्च ।
एवं च स्वाविद्यया जीवभावमापन्नस्यैव ब्रह्मण सर्वप्रपञ्चकल्पकत्वात् ईश्वरोऽपि सह सर्वज्ञत्वादिधर्मैः स्वप्नोपलब्धदेवतावज्जीवकल्पित इत्याचक्षते ॥ ६ ॥

एको जीव उताऽनेकस्तत्राऽनुपदवादिनः ।
एकं देहं च तस्यैकमन्यत्स्वप्नसमं विदुः ॥४३॥

एक जीव है या अनेक जीव हैं, इस विप्रतिपत्तिमें अनुपद्वादी (पूर्वोक्त आचार्योंमेंसे कुछ लोग ) कहते हैं कि एक ही जीव है और उसका शरीर भी एक है अन्य सब स्वप्नमें देखे जानेवाले पदार्थोंके समान प्रातिभासिकमात्र हैं ॥४३॥


जैसे व्याधके कुलमें बढ़ा हुआ राजकुमार अपनी राजकुमारताकी स्मृतिसे व्याधभावसे निवृत्त होता है, वैसे ही अज्ञ आत्माकी 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे होनेवाली स्मृतिसे अज्ञानता निवृत्त होती है, इस प्रकार वार्तिकका वचन भी है।

बृहदारण्यकभाष्य और वार्तिकके पर्यालोचनसे प्रतिबिम्बादिभावसे रहित पूर्ण ब्रह्ममें ही जीवभावकी सिद्धि है, अतः अपनी अविद्यासे जीवभावापन्न ब्रह्म ही सभी प्रपञ्चकी कल्पना करनेवाला होनेसे सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त ईश्वर भी—स्वप्नमें उपलब्ध देवताके समान † जीव द्वारा—कल्पित है ॥६॥


अनेक कष्टोंको भोगता है। किसी समयमें गुरुद्वारा या शास्त्रसे जब उसको ज्ञान हो जाता है कि 'मैं जीव नहीं हूँ परन्तु सच्चिदानन्द ब्रह्म ही हूँ' तब जीवभावको भूल कर वह अपने सत्य-स्वरूपका अनुभव करता है ।

† स्वप्न देखनेवाला पुरुष—जीव जैसे स्वयं ही स्वप्नमें अपनेसे भिन्न सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त किसी देवताकी कल्पना करता है और उसकी अहर्निश पूजा करता है, और उसकी उपासनासे अभ्युदय फल प्राप्त करता है, वैसे ही जागरणमें भी ईश्वर कल्पित है, यह दृष्टान्तका भाव है ।

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२१


अथायं जीव एकः, उताऽनेकः ? अनुपदोक्तपक्षावलम्बिनः केचिदाहुः—

एको जीवः, तेन चैकमेव शरीरं सजीवम् । अन्यानि स्वप्नदृष्टशरीराणीव निर्जीवानि । तदज्ञानकल्पितं सर्वं जगत्, तस्य स्वप्नदर्शनवद्यावदविद्यं सर्वो व्यवहारः । बद्धमुक्तव्यवस्थाऽपि नास्ति, जीवस्यैकत्वात् । शुकमुक्तादिकमपि स्वाप्नपुरुषान्तरमुक्तादिकमिव कल्पितम् । अत्र च सम्भावितसकलशङ्कापङ्कप्रक्षालनं स्वप्नदृष्टान्तसलिलधारयैव कर्तव्यमिति ।


अत्र सन्देह होता है कि जीव एक है या अनेक हैं ? इस विषयमें अनुपदोक्त (ब्रह्म ही अपनी अविद्यासे संसारी होता है और अपनी विद्यासे मुक्त होता है, इस ग्रन्थसे कहे गये) पक्षका अनुसरण करनेवाले कुछ लोग कहते हैं—

जीव एक ही है [ ब्रह्म एक है और उसमें अवच्छेदवाद या प्रतिबिम्बवादका स्वीकार नहीं है, अतः जीवका भेद नहीं हो सकता है, यह भाव है ] । इससे एक ही शरीर जीवसे युक्त है और अन्य जितने शरीर हैं; वे सबके सब स्वप्नमें देखे जानेवाले शरीरोंके समान निर्जीव हैं । यह समस्त जगत् जीवके अज्ञानमात्रसे कल्पित है । जैसे जब तक निद्राकी निवृत्ति नहीं होती है, तभी तक स्वप्न देखा जाता है, वैसे ही जब तक जीवकी अविद्याका विनाश नहीं होता, तभी तक जीवके सब व्यवहार होते हैं । [ इस एक जीववादमें पूर्वपक्ष होता है कि यदि अज्ञानसे स्वप्नव्यवहारके समान यह समस्त जगत्का व्यवहार कल्पित है, तो जैसे स्वप्नव्यवहार एकदम नष्ट हो जाता है, वैसे ही जगत्का व्यवहार एकदम नष्ट हो जाना चाहिए, फिर विद्याकी स्वीकृति व्यर्थ है, इसपर इस ग्रन्थसे यह कहा गया है कि विद्या व्यर्थ नहीं है, क्योंकि जैसे कारणान्तरसे निद्रा आदिका क्षय होनेपर स्वप्नकी निवृत्ति होती है, वैसे ही ज्ञानसे अज्ञानान्धकारके निवृत्त होनेपर ही नाश होता है, समस्त संसारका विद्याके उदयके बिना अज्ञानका नाश नहीं होता और अज्ञानके नाशके बिना इस प्रपञ्चात्मक व्यवहारका लोप नहीं होता । अतः विद्या निरर्थक नहीं है ] इस पक्षमें बद्ध या मुक्तकी व्यवस्था भी नहीं हैं, क्योंकि जीव एक ही है । शुक आदिकी जो मुक्ति सुनी जाती है, वह भी स्वप्नकालिक अन्य पुरुषकी मुक्ति आदिके समान कल्पित ही है । तात्पर्य यह है

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१२२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सूत्रमेकं परं जीवपदाभासान् परान् परे ।

कुछ लोग यह कहते हैं कि एक सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ मुख्य जीव है और अन्य सभी जीव जीवाभास हैं ॥

अन्ये त्वस्मिन्नेकशरीरैकजीववादे मनःप्रत्ययमलभमानाः 'अधिकं तु भेदनिर्देशात्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २२ ) 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० ३३ ) इत्यादिसूत्रैर्जीवाधिक ईश्वर एव जगतः स्रष्टा, न जीवः । तस्याऽऽप्तकामत्वेन प्रयोजनाभावेऽपि केवलं लीलयैव जगतः सृष्टिरित्यादि प्रतिपादयद्भिर्विरोधं च मन्यमाना हिरण्यगर्भ एको ब्रह्मप्रतिबिम्बो मुख्यो जीवः । अन्ये तु तत्प्रतिबिम्ब-


कि जैसे स्वप्नसे उठा हुआ पुरुष स्वप्नभ्रमसे सिद्ध अन्य पुरुषकी मुक्तिको अन्यके प्रति कहता है, वैसे ही जीवके भ्रमात्मक ज्ञानसे सिद्ध शुक आदिकी मुक्ति श्रवण आदिमें पुरुषोंकी प्रवृत्तिके लिए कही गई है । इस एक जीव-वादमें सम्भावित सम्पूर्ण शङ्कारूप कीचड़का प्रक्षालन स्वप्नदृष्टान्तरूप जल-धारासे ही करना चाहिए—जैसे कोई शङ्का करे कि यदि जीव एक ही है, तो विद्याके उपदेशक अन्यका अभाव होनेसे ज्ञान नहीं होगा और जीव तथा ईश्वरके विभक्त न होनेसे जीवका ईश्वरोपासना आदि व्यवहार भी नहीं होगा, ऐसी आशङ्का करके कहते हैं—'अत्र च' इत्यादिसे । जैसे स्वप्नदशामें स्वप्न देखनेवाला किसीको ईश्वर और किसीको गुरु मानकर उपासना करता है और उससे विद्या प्राप्त करता है, वैसे ही प्रकृतमें भी होगा, यह भाव है ।

कुछ लोग एकजीववादमें सन्तुष्ट न होकर अर्थात् प्रामाण्यनिश्चय न प्राप्त कर 'अधिकं तु भेदनिर्देशात्' 'लोकवत्तु लीलाकैवल्यम्' इत्यादि सूत्रोंके आधारपर जीवसे अन्य ईश्वर ही जगत्‌का स्रष्टा है, जीव स्रष्टा नहीं है, यद्यपि ईश्वरको कोई अभिलाषा नहीं है, क्योंकि वह आप्तकाम है, इसलिए जगत्‌के सर्जनमें उसका कोई प्रयोजन नहीं है, तथापि 'केवल लीला से ही जगत्‌की सृष्टि करता है' इत्यादि प्रतिपादन करनेवालोंके साथ जीवको सृष्टिकर्ता माननेमें विरोध मानते हुए ब्रह्मका प्रतिबिम्बभूत हिरण्यगर्भ ही एक मुख्य जीव है । हिरण्यगर्भसे अन्य इन्द्रादि तो हिरण्यगर्भके प्रतिबिम्बभूत

जीवईश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १२३


भूताश्चित्रपटलेखितमनुष्यदेहार्पितपटाभासकल्पाः जीवाभासाः संसारादि- भाज इति सविशेषानेकशरीरैकजीववादमातिष्ठन्ते ।

योगीव कायव्यूहेषु जीवोऽन्य इति चापरे ॥ ४४ ॥

जैसे शरीरोंके समूहमें एक ही योगी अपना अधिकार रखता है, वैसे ही हिरण्य- गर्भसे अन्य एक मुख्य जीव है [ और वही सब शरीरों में अधिकार रखता है ] ॥४४॥

अपरे तु हिरण्यगर्भस्य प्रतिकल्पं भेदेन कस्य हिरण्यगर्भस्य मुख्यं . जीवत्वमित्यत्र नियामकं नास्तीति मन्यमाना एक एव जीवोऽविशेषेण सर्वं शरीरमधितिष्ठति ।

चित्रके पटमें लिखित मनुष्यके देहमें अर्पित पटाभासके समान संसार आदि भोगनेवाले जीवाभास हैं, इस प्रकार सजीव हैं अनेक शरीर जिस एक जीववादमें, ऐसे जीवैक्यवादका अङ्गीकार करते हैं ।

प्रत्येक कल्पमें हिरण्यगर्भका भेद होनेसे किस हिरण्यगर्भको मुख्य जीव मानना, इसमें नियामक—प्रमाण—नहीं है अर्थात् अमुक कल्पका हिरण्यगर्भ ही मुख्य जीव है, अमुक कल्पका नहीं, ऐसा माननेमें कोई विनिगमक ( एकतर पक्षपातिनी युक्ति ) नहीं है, विनिगमकके विना यदि हिरण्यगर्भको मुख्य जीव माना जाय, तो अविशेषात् सभी कल्पके हिरण्यगर्भ मुख्य जीव होंगे । तस्मात् पूर्वोक्त पक्षसे भी एकजीववाद सिद्ध नहीं होगा, यह भाव है । इसलिए एक ही जीव मुख्य और अमुख्य विभागके विना सब शरीरोंमें अपने भोगके लिए अधिष्ठित है, ऐसा मानते हुए अविशेषानेकशरीरैकजीववादका* ही कुछ लोग स्वीकार करते हैं । [ भाव यह है कि अविद्यामें चैतन्यप्रतिबिम्ब जीव एक है, क्योंकि अविद्या एक है, वही जीव सब शरीरोंमें स्वभोगके लिए अधिष्ठित है, अविद्यामें ब्रह्मप्रतिबिम्ब हिरण्यगर्भशरीरमें अधिष्ठित है, और हिरण्यगर्भका प्रतिबिम्ब जीवाभास इतर शरीरोंमें अधिष्ठित है, यह युक्त नहीं है, क्योंकि इतर जीवोंके हिरण्यगर्भ-प्रतिबिम्ब होनेमें कोई प्रमाण नहीं है, यही 'एक एव' इसमें उक्त एवकारका अर्थ है ] ।


* अविशेषेण अधिष्ठितानि अनेकशरीराणि यस्मिन् एकजीववादे सः अविशेषानेक- शरीरैकजीववादस्तम्, अर्थात् जीवके मुख्य और अमुख्य विभागके विना अधिष्ठित हैं अनेक शरीर जिसमें ऐसा अनेकजीववाद, यह भाव है ।

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१२४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

न चैवं शरीरावयवभेद इव शरीरभेदेऽपि परस्परसुखाद्यनुसन्धानप्रसङ्गः । जन्मान्तरीयसुखाद्यनुसन्धानादर्शनेन शरीरभेदस्य तदननुसन्धानप्रयोजकत्वक्लृप्तेः ।

योगिनस्तु कायव्यूहसुखाद्यनुसन्धानं व्यवहितार्थग्रहणवद्योगप्रभाव-निबन्धनमिति न तदुदाहरणमिति अविशेषानेकशरीरैकजीववादं रोचयन्ते ।


यदि सब शरीरोंमें एक ही जीव है तो शरीरके अवयवभेदके समान शरीरका भेद होनेपर भी परस्परके सुखादिका अनुसन्धान होना चाहिए अर्थात् जैसे हाथ, पैर, मस्तक आदि अनेक अवयवोंमें अधिकार रखनेवाले एक ही देवदत्तमें यह अनुभव देखा जाता है कि 'मेरे मस्तकमें वेदना है और पैरोंमें सुख है', वैसे ही यदि एक जीव सभी शरीरोंमें अधिष्ठित है, तो उसे यह अनुभव होना चाहिए कि देवदत्तके शरीरमें मुझे सुख है और यज्ञदत्तके शरीरमें दुःख है, परन्तु यह अनुभव नहीं होता, इसलिए एकजीववाद असङ्गत है । इस प्रकार यदि शङ्का हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि [ यद्यपि पूर्वजन्मके शरीरमें अधिकार रखनेवाला जीव और इस जन्मके शरीरमें अधिकार रखनेवाला जीव एक ही है, तो भी जन्मान्तरीय सुख आदिका अनुसन्धान इस शरीरमें नहीं देखा जाता, इससे सुख आदिके अनुसन्धानके अभावमें शरीरभेदको हेतु मानना चाहिए, अतः उक्त दोष नहीं है ।

अनेक शरीरोंमें योगीको जो सुख आदिका अनुसन्धान होता है, वह तो व्यवहित अर्थके ज्ञानके समान योगप्रभावसे होता है, अतः उसे उदाहरणरूपसे नहीं दे सकते हैं; [ तात्पर्य यह है कि योगी अपने विलक्षण प्रभावसे अनेक शरीरोंको धारण करता है और उन सब शरीरोंमें से किसीमें सुख और किसीमें दुःखका अनुभव करता है, शरीर-भेदको यदि अननुभवके प्रति हेतु माना जायगा, तो उसे भिन्न-भिन्न शरीरमें सुख दुःखका अनुभव नहीं होना चाहिए, अतः उक्त नियममें ( सुखादिके अननुसन्धानमें शरीरभेद कारण है, इसमें) व्यभिचार होगा, नहीं व्यभिचार नहीं होगा, क्योंकि योगी जैसे सुदूर भूतकालीन पदार्थका और सुदूर भविष्यत्कालीन अर्थका, ( जिन्हें हम अपने चर्मचक्षुओंसे सर्वथा नहीं देख सकते हैं) योगप्रभावसे ज्ञान कर लेते हैं, वैसे ही योगप्रभावसे अनेक शरीरोंमें सुख और दुःखका अनुभव कर लेते हैं, अतः