भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३७७

बढ़ानेवाला, सब पापोंका नाश करनेवाला और वैकुण्ठधामरूपी सद्गति देनेवाला है। मुनीश्वरो! यह सब तुम्हें रहस्यकी बातें बतायी गयी हैं। ये जितने भी व्रत हैं, वे भगवद्भक्तिहीन मनुष्योंके लिये निष्फल होते हैं, यह अच्छी तरह जान लो। तीर्थोंका तथा सात्त्विक दान और तपस्याओंका जो उत्तम फल है, वह सब केवल विष्णुभक्तिसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है।

प्राचीन कालकी बात है, त्रेतायुगमें श्वेत नामक एक महान् राजा हो गये हैं। उन्होंने व्रतमें स्थित होकर भगवान् पुरुषोत्तममें बड़ी भक्ति की। राजा इन्द्रद्युम्नके द्वारा निश्चित किये हुए भोगोंकी मात्राके अनुसार वे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक भगवान् लक्ष्मीपतिके लिये भोग प्रस्तुत करते थे। अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य पदार्थ, भलीभाँति संस्कार किये हुए छहों रस, विचित्र माल्य, सुगन्ध, अनुलेपन तथा बहुत प्रकारके राजोचित उपचार अवसर-अवसरपर भगवान्‌की सेवामें समर्पित करते थे। एक दिन राजा श्वेत प्रातःकाल पूजाके समय भगवान्‌का दर्शन करनेके लिये गये और पूजा होते समय उन्होंने श्रीहरिका दर्शन किया। देवाधिदेव भगवान्‌को प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़े प्रसन्नतापूर्वक वे मन्दिरके द्वारके समीप खड़े रहे। अपने ही द्वारा तैयार किये हुए उत्तम उपचारों तथा सहस्रों उपहारकी सामग्रियोंको राजाने भगवान्‌के सामने उपस्थित देखा। तब वे कुछ ध्यानस्थ होकर मन-ही-मन सोचने लगे—‘क्या भगवान् श्रीहरि यह मनुष्यनिर्मित भोग ग्रहण करेंगे? यह बाह्यपूजनकी सामग्री भावदूषित होनेके कारण निश्चय ही भगवान्‌को प्रसन्न करनेवाली न होगी।’

इस प्रकार विचार करते हुए राजाने देखा— दिव्य सिंहासनपर साक्षात् भगवान् विष्णु विराजमान हैं और दिव्य सुगन्ध, दिव्य वस्त्र एवं दिव्य हारोंसे विभूषित साक्षात् लक्ष्मीदेवी उनके आगे अन्न-पान आदि भोजनसामग्री परोस रही हैं और भगवान् भोजन कर रहे हैं। यह अद्भुत झाँकी देखकर राजाने अपनेको कृतार्थ माना तथा आँखें खोल दीं। फिर उन्हें पहले देखी हुई सब बातें दिखायी दीं। इससे राजाको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। भगवान्‌को निवेदित किये हुए प्रसादको ही खानेवाले व्रतशील राजाने बड़ी भारी तपस्या की। उस तपस्याका उद्देश्य यह था कि मेरे राज्यमें किसीकी अकालमृत्यु न हो और मरे हुए प्राणियोंकी मुक्ति हो जाय। शरणागतोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूप मन्त्रराज आनुष्टुभका उन्होंने नित्य नियमपूर्वक जप किया। इस प्रकार सौ वर्षतक जप और तपस्याके पश्चात् राजाने समस्त पापोंका अपहरण करनेवाले साक्षात् भगवान् नृसिंहका दर्शन प्राप्त किया। वे योगासनपर कमलके ऊपर विराजमान थे। उनके वामभागमें भगवती लक्ष्मी शोभा पा रही थीं। देवता, सिद्ध और मुक्त पुरुष उनकी स्तुतिमें लगे थे। ऐसे भगवान्‌को उपस्थित देखकर आश्चर्यसे चकित होकर राजा श्वेत हर्ष-गद्गद वाणीमें ‘हे नाथ! प्रसन्न होइये’ ऐसा कहते हुए धरतीपर गिर पड़े। तपस्यासे दुर्बल तथा चरणोंमें पड़े हुए निष्पाप राजा श्वेतसे भक्तवत्सल भगवान् नृसिंहने कहा—‘वत्स! उठो, मुझे भक्तिसे प्रसन्न जानो और कोई अभीष्ट वर माँगो।’ भगवान्‌का यह वचन सुनकर राजा उठे और दोनों हाथ जोड़कर भक्तिसे विनम्र होकर बोले—‘स्वामिन्! यदि मुझपर आपकी अत्यन्त दुर्लभ कृपा है, तो मैं मरनेके बाद आपके समान रूप प्राप्त करके आपके समीप ही सेवामें रहूँ तथा जबतक इस पृथ्वीपर मैं राजाके पदपर रहूँ, तबतक मेरे राज्यमें कोई भी मनुष्य अकालमृत्युको न प्राप्त हो और जिसकी कालमृत्यु हो, उसकी भी सायुज्य मुक्ति हो जाय।’

यह सुनकर भगवान्‌ने परम उत्तम राजा श्वेतसे कहा—‘श्वेत! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो। एक

भगवान् विष्णुको लक्ष्मीदेवी भोजन परोस रही हैं।

राजा श्वेतको भगवान् लक्ष्मी-नृसिंहके दिव्यदर्शन

३८०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हजार वर्षोंतक तुम अपने समृद्धिशाली राज्यका उपभोग करो। प्रतिदिन मेरे नैवेद्यका भोजन करनेसे तुम्हारी सारी पापराशि नष्ट हो जायगी और अन्तःकरण अत्यन्त शुद्ध हो जायगा। तत्पश्चात् तुम मेरी सायुज्य मुक्ति प्राप्त कर लोगे। तुम्हारे राज्यमें जो लोग मेरे निर्माल्यका भोजन करेंगे, उनकी कभी अकालमृत्यु नहीं होगी।'

इस प्रकार राजा श्वेतको वरदान देकर भगवान् नृसिंह अन्तर्धान हो गये। यहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट एवं सुपक्व अन्नको सबके स्वामी भगवान् नारायण भोजन करते हैं। उनके प्रसादका उपभोग सब पापोंका क्षय करनेवाला है। भगवान् जगन्नाथजीके मन्दिरमें पहुँचकर भगवान्‌को भोग लग जानेपर जैसे भगवान् विष्णु नित्य शुद्ध हैं वैसे ही उनका प्रसाद भी शुद्ध है। व्रतपरायण विधवा स्त्रियाँ, वर्णाश्रम-धर्ममें तत्पर रहनेवाले मनुष्य, यज्ञमें दीक्षित पुरुष तथा अग्निहोत्री भी भगवान् पुरुषोत्तमके प्रसादको खाकर पवित्र होते हैं। दरिद्र, कृपण, गृहस्थ, प्रभु, स्वदेशी, परदेशी, जो भी वहाँ आते हैं, उन्हें चाहिये कि वे कोई भी भगवान् विष्णुका प्रसाद ग्रहण करनेमें अहंकार न दिखावें। भक्तिसे, लोभसे, कौतूहलसे अथवा क्षुधा-शान्तिके निमित्त आकण्ठ भोजन किया हुआ भगवत्प्रसाद सब पापोंको पवित्र कर देता है। जो पण्डितमानी मूर्ख अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके उस अमृतमय प्रसादकी निन्दा करते हैं, उनकी निश्चय ही दुर्गति होती है। उस प्रसादको बेचना या मोल लेना भी अच्छा नहीं माना गया है। मैं जगन्नाथजीके प्रसादका भोजन करके और कुछ नहीं खाऊँगा, इस प्रकार सच्ची प्रतिज्ञा करके जो प्रतिदिन प्रसाद ग्रहण करता है, वह मनुष्य सब पापोंसे मुक्त एवं शुद्धचित्त होकर विशुद्ध वैकुण्ठधामको जाता है। भगवान्‌का प्रसाद यदि चिरकालका रखा हो, सूख गया हो अथवा दूर देशसे लाया गया हो, जिस किसी प्रकार भी उसका उपयोग करनेपर वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। जगन्नाथजीके प्रसादका अन्न और गंगाजल दोनों बराबर हैं। उनको भोजन करनेसे सब पापोंका नाश हो जाता है। वहाँ काष्ठरूपी परब्रह्म सबके नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित हैं। थोड़े पुण्यवाले मनुष्योंका उस प्रसादमें विश्वास नहीं होता, उसकी महिमाको कोई नहीं जानता। भयंकर कलिकालमें धर्मके तीन चरणोंका नाश हो जाता है, उसका एक ही पाद रह जाता है। उस समय प्रायः सब लोग असत्यवादी, दम्भी और शठवृत्तिके होते हैं, धर्मसे विमुख तथा जिह्वा और उपस्थके भोगोंमें तत्पर रहते हैं। ध्यान, तपस्या और व्रत कभी नहीं करते, सभी अत्यन्त अधर्मी, लोभी और हिंसक होते हैं। अपना कोई प्रयोजन न होनेपर भी दूसरोंकी निन्दासे सन्तुष्ट होते हैं, प्रसंग अथवा कौतूहलवश भी दूसरोंके कार्यकी हानि करते हैं और अपने छोटेसे कार्यके लिये भी दूसरोंके महत्त्वपूर्ण कार्योंमें बाधा उपस्थित करते हैं। धर्मतः प्राप्त होकर अपने घरमें आयी हुई सुन्दरी स्त्रीकी भी अवहेलना करके दूसरोंकी निन्दनीय स्त्रीमें आसक्त होते हैं। अग्निहोत्र आदि कर्म अथवा दूसरा कोई व्रत भी कहीं पालित नहीं होता। यदि कहीं है तो वह ब्राह्मणोंकी जीविकाके रूपमें है। जो पारलौकिक कर्म हैं वे भी यथार्थरूपसे सम्पादित न होनेके कारण फलदायक नहीं होते। कलियुगमें राजालोग प्रायः प्रजाकी रक्षासे मुँह मोड़े रहते हैं। वे सदा कर वसूल करते हैं, प्रायः पापिष्ठ और चोरीकी वृत्तिवाले होते हैं। कलियुगमें प्रायः सब लोग वर्णसंकर और शूद्रके तुल्य हो जाते हैं। राजा ही प्रजाका धन अपहरण करते और शूद्र राजसेवक होते हैं। वैदिक और स्मार्त आदि कर्मोंका कलिमें भलीभाँति अनुष्ठान नहीं किया जाता। उस समय दान-धर्म सबसे उत्तम है। कलियुग प्राप्त होनेपर यहाँ भगवान् विष्णु ही सबकी गति हैं। शालग्राम आदि क्षेत्रमें भगवान्‌का स्मरण और कीर्तन किया जाता है, परंतु यह पुण्यक्षेत्र नीलाचल तो उन क्षेत्रज्ञ परमात्माका

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३८१

शरीर है। काष्ठके बहाने सबके जीवनरूप विष्णु साक्षात् शरीर धारण करके यहाँ विराजमान हैं। पापियोंके कलिकालजनित पापका नाश करनेके लिये ही यहाँ भगवान्‌का प्राकट्य हुआ है। वे यहाँ अपने दर्शन, स्तवन और प्रसादभोजनसे मोक्षदायक होते हैं। भगवान्‌के प्रसादसे जिसका शरीर व्याप्त है, वह उस विशुद्ध आहारसे विशुद्धात्मा होनेके कारण पातकोंमें लिप्त नहीं होता। भगवान् जगदीश इसी तीर्थमें अर्पित किये हुए नैवेद्यका साक्षात् भोजन करते हैं।

भगवान् विष्णुके श्रीअंगोंसे उतारी हुई तुलसीकी मालाको जो भक्त अपने मस्तक या गलेमें धारण करता है अथवा जो उसे हृदयसे लगाये रखता है या भगवत्प्रसादरूप तुलसीदल भक्षण करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। तुलसीदलसे मिश्रित भगवत्प्रसाद भोजन करके मनुष्य निश्चय ही मोक्ष पाता है। भगवान् विष्णुके आचमन, चरणोदक तथा स्नान-जल सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। शव आदि अपवित्र वस्तुओंके स्पर्शजनित दोषका भी उनके द्वारा नाश होता है। इतना ही नहीं, वे समस्त दीक्षाओं और व्रतोंके फल देनेवाले तथा ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाले हैं। भगवान्‌का चरणामृत अकालमृत्युका निवारण, रोगसमूहका संहार तथा पापराशिका नाश करनेवाला है। इस प्रकार पुरुषोत्तमतीर्थमें लक्ष्मीजीके साथ निवास करनेवाले भगवान् विष्णु सब लोगोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे निवास करते हुए अनायास ही मोक्ष देते हैं।

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भगवान् पुरुषोत्तमके पार्श्व-परिवर्तन, उत्थापन और प्रावरण आदि उत्सवोंका महत्त्व

जैमिनिजी कहते हैं—जगन्मय भगवान् पुरुषोत्तम सब प्रकारसे इस संसारका कल्याण करनेके लिये ही अनेक प्रकारके रूप और लीलाएँ करते हुए नाना शरीर धारण करके प्रकट होते हैं। अहंकारके बिना कर्मका फल नहीं भोगना पड़ता। अहंकारसे मनुष्य इस संसाररूपी कारागारमें बाँधे जाते हैं। बुद्धि और अहंकारसे युक्त होकर मनुष्य जो कर्म करता है, उसके अनुसार शुभाशुभ फलको पाता है। उन कर्म करनेवाले मनुष्योंमें जो सात्त्विक बुद्धिके लोग हैं, वे फलप्राप्तिकी इच्छा न रखकर मुमुक्षुभावसे केवल भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये ही कर्म करते हैं। उन सात्त्विक पुरुषोंके द्वारा दर्शन, ध्यान अथवा स्मरण भी करनेपर सर्वभावन भगवान् जगन्नाथ उन्हें मोक्ष प्रदान करते हैं।

भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी एकादशीको जगन्नाथजीके शयनगृहके दरवाजेपर धीरे-धीरे जाकर उसमें प्रवेश करे और शय्यापर सोये हुए उन जगदीश्वरको नमस्कार करके उपचारोंद्वारा उनके चरणोंकी पूजा करे। तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक प्रणाम करके गुह्य उपनिषदोंसे स्तुति करे। फिर निम्नांकित प्रार्थना करते हुए भगवान्‌की करवट बदलकर उन्हें उत्तरकी ओर मुँह करके सुला दे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करे—'देवाधिदेव जगन्नाथ ! आप अनेकानेक कल्पोंका परिवर्तन करनेवाले हैं, आपसे ही यह स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् परिवर्तित होता है। भगवन् ! आपने स्वेच्छासे स्वीकार की हुई जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिरूप चेष्टाओं‌द्वारा जगत्‌का हित करनेके लिये ही शयन किया है। अब इस समय करवट बदल लीजिये; क्योंकि जगत्‌का पालन करनेके लिये यह आपके करवट बदलनेका समय प्राप्त हुआ है।'

इस प्रकार भगवान्‌की प्रार्थना करके व्यजन और चँवर डुलावे तथा सुगन्धित चन्दनका भगवान्‌के

७. वैष्णवखण्ड (कार्तिकमास-माहात्म्य)

३८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सब अंगोंपर लेपन करे। तत्पश्चात् स्वादयुक्त मिठाई, खीर, हलुवा, भाँति-भाँतिके फल, अन्य स्वादिष्ट व्यंजन, घीके बने हुए पूए तथा ताम्बूलपत्र आदि सब सामग्री शयनगृहके द्वारपर रखकर भक्तिपूर्वक निवेदन करे। उस दिन यदि भगवान्‌के स्वरूपका दर्शन हो जाय तो बड़ा भारी फल होता है।

कौमुदी नामक महोत्सवके अवसरपर जगन्नाथजीकी पूजा करके उसी पूर्णिमाकी रातको उत्सवपूर्वक नारियल आदि द्रव्यों तथा पिष्टक (पीठी)-से भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तत्पश्चात् सबेरे कार्तिकमास आरम्भ होनेपर उत्तम व्रतका संकल्प ले शुक्लपक्षकी एकादशीतक उसी व्रतके नियमसे रहे। एकादशी आनेपर सोये हुए भगवान् जगदीश्वरको उठावे। पहलेकी भाँति आधी रातके समय जगद्गुरु भगवान्‌की पूजा करके निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌को जगावे—

उत्तिष्ठ देवदेवेश तेजोराशे जगत्पते।
वीक्षस्व सकलं देव प्रसुप्तं तव मायया॥
प्रफुल्लपुण्डरीकश्रीहारिणा नयनेन वै।
त्वया दृष्टं जगदिदं पवित्रं परमेष्यति॥

'देवदेवेश्वर! उठिये। तेजःपुंज जगदीश्वर! देव! सम्पूर्ण जगत् आपकी मायासे सो रहा है, इसकी ओर दृष्टिपात कीजिये। प्रभो! खिले हुए कमलकी शोभाका अपहरण करनेवाले आपके नेत्रसे देखा जानेपर यह जगत् अत्यन्त पवित्र हो जायगा।'

इस प्रकार जगदीशजीको जगाकर शंख, धौंसा, ढोल आदि वाद्यों, नृत्य और गीतों, जय-जयकारके शब्दों तथा नाना प्रकारके स्तोत्रोंके साथ नृत्यमण्डपमें ले जाय। वहाँ सुगन्धित तेलसे उबटन करके जगन्नाथजीको पंचामृत, फलोंके रस तथा नारियलके जलसे स्नान करावे। उसके बाद सुगन्धयुक्त आँवले और जौके चूर्णसे भगवान्‌के शरीरपर लेप करे। तुलसीके चूर्णसे उनके शरीरको मले और सुगन्धित चन्दनका लेप करे। उस समय जो लोग हर्षपूर्वक श्रीजगदीशजीका दर्शन करते हैं वे अनेक जन्मोंके सुदृढ़ पापपंकको धो डालते हैं। तत्पश्चात् बड़े-बड़े उपचारोंसे भगवान्‌की विधिवत् पूजा करके उनकी आरती उतारे और हाथ जोड़कर बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रार्थना करे—'प्रभो! यह सम्पूर्ण चराचर जगत् केवल आपकी ही शरणमें है, जगद्गुरो! अपनी कृपासुधासे परिपूर्ण दृष्टिद्वारा इसे पवित्र कीजिये।' तदनन्तर शेष रात्रि भगवत्सम्बन्धी नृत्य-गीतको देखते हुए व्यतीत करे। जो लोग शयनसे उठे हुए भगवान् गदाधरका दर्शन करते हैं वे अपनी मोहमयी निद्राका भेदन करके शान्त ज्योतिःस्वरूप श्रीहरिको प्राप्त होते हैं।

शालग्रामशिलामें स्थित भगवान् श्रीहरिकी चक्रमूर्तिका शुद्धचित्त होकर पूजन करे। पूजाके समय भगवान्‌का ध्यान इस प्रकार करे—दामोदर-स्वरूपधारी भगवान्‌के चार भुजाएँ हैं। उन्होंने हाथोंमें शंख और कमल धारण कर रखा है। उनके वामभागमें कमलके आसनपर लक्ष्मीजी बैठी हैं और वे बायें हाथसे उनका स्पर्श करके बैठे हैं। भगवान् अपने दाहिने हाथसे भक्तोंको वर देनेके लिये उद्यत हैं। उनकी नासिका, ललाट, उनके दोनों नेत्र और कान सभी बहुत सुन्दर हैं। उनका वक्षःस्थल विशाल है, वे सम्पूर्ण लावण्यसे सुशोभित हैं, समस्त अलंकारोंको धारण करके वे बड़े ही मनोहर प्रतीत होते हैं। उनके श्रीअंगोंपर दिव्य पीताम्बर शोभा पा रहा है।

मार्गशीर्षके शुक्ल पक्षमें षष्ठी तिथिको मनुष्य भक्तिभावसे प्रावरणोत्सव अथवा उस उत्सवका दर्शन करके भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। पंचमीकी रात्रिमें भगवान्‌का वस्त्राधिवास करे, भगवान्‌को वस्त्रोंके मध्यमें स्थापित करके अन्य वस्त्रसे आच्छादित करे और पुरुषोत्तमके स्मरणपूर्वक उनका स्पर्श करके इस प्रकार प्रार्थना करे—'हे वस्त्र! जो अविनाशी भगवान् विष्णु अपने

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३८३

तेजसे सम्पूर्ण जगत्‌को आच्छादित करनेवाले हैं, उनका भी वसन (आच्छादन) करनेसे तुम्हारा नाम वस्त्र है। तुम जगदीश्वरके वासस्थानमें निवास करो।' तत्पश्चात् चन्दन और पुष्पसे भगवान्‌का पूजन करे और नृत्य-गीतके द्वारा जागरणपूर्वक रात्रि व्यतीत करे। फिर अरुणोदयकालमें प्रातः-सन्ध्याके समीप पूर्ववत् एकाग्रचित्त हो पुनः भगवान्‌की पूजा करे। उसके बाद तीन बार मन्दिरकी परिक्रमा करके भगवान्‌को भी तीन बार घुमावे और उस आच्छादित वस्त्रको हटाकर दर्शन आदिके द्वारा संस्कार करे। तदनन्तर दूर्वा और अक्षतसे पूजा करके भगवान्‌की आरती उतारे।

हेमन्त ऋतुके आनेपर जो लोग उत्तम वस्त्रोंद्वारा भगवान् नृसिंहको आच्छादित करते हैं अथवा जो आच्छादन-महोत्सवका दर्शन करते हैं वे कभी मोहसे आच्छादित नहीं होते। देवाधिदेव भगवान्‌के इस प्रावरण-महोत्सवका जो लोग भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, वे सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेते हैं।


पुष्यस्नानोत्सव, उत्तरायणोत्सव तथा दोलारोहणोत्सवका वर्णन

जैमिनिजी कहते हैं—पौषके महीनेमें पूर्णिमाको जब पुष्य नक्षत्र हो, तब भगवान्‌का पुष्यस्नानोत्सव करे। चतुर्दशीकी रातमें ८१ कलशोंका अधिवासन (स्थापन) करे। भगवान्‌के आगे सर्वतोभद्रमण्डल बनावे और उसके बीचमें एक बड़ा-सा दर्पण स्थापित करे। रात्रिमें गीत और नृत्य आदिके द्वारा जागरण करे। प्रातःकाल दर्पणमें प्रतिबिम्बित भगवान् पुरुषोत्तमका उपचारोंद्वारा पूजन करे। तदनन्तर पुरुषसूक्तसे कलशोंको अभिमन्त्रित करके फिर उन कलशोंके जलसे अटूट धारा गिराते हुए भगवान् पुरुषोत्तमको स्नान करावे। फिर पावमानीय सूक्त और श्रीसूक्तसे भी क्रमशः बलभद्र और सुभद्राको स्नान करावे। फिर विष्ण्गायत्रीसे* चन्दनयुक्त जलके द्वारा स्नान कराकर श्रीसूक्तसे पूजा करे। तत्पश्चात् भगवान्‌के श्रीअंगोंमें गन्ध और चन्दनसे लेप करे और उन्हें सुगन्धित पुष्पोंकी मालाओंसे विभूषित करे। फिर रत्नमय छत्र ऊपर उठाकर लक्ष्मीसहित पुरुषोत्तमका पूजन करे। फिर उच्चस्वरसे शंखध्वनि, मंगलगीत और नृत्य आदि हों। भगवान्‌को चँवर डुलाये जायें, ब्राह्मणलोग जय-जयकार करें और तीन बार अंजलिमें दूर्वा एवं अक्षत लेकर भगवान्‌की पूजा करके कपूरयुक्त बत्तियोंवाले गायके घीमें जलाये हुए दीपकोंसे जगन्नाथजीकी आरती करे। उसके बाद सुन्दर पानका बीड़ा लगाकर धीरे-धीरे भगवान्‌के मुखके समीप निवेदन करे। तत्पश्चात् आचार्यको दक्षिणा दे और ब्राह्मणोंका पूजन करे। जो प्रसन्नतापूर्वक पुष्यस्नानका पवित्र उत्सव देखते हैं, वे भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं।

जब भगवान् सूर्य उत्तरदिशाकी ओर गमन करनेकी इच्छासे मकर राशिपर जाते हैं, उस समय उत्तरायण प्रारम्भ होता है। उनके संक्रमणकालका आधा बीस कलाका समय परम पुण्यमय काल माना गया है। वह पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणोंको अत्यन्त प्रिय है। उस समय तीर्थराज समुद्रके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य भगवान् नारायणका पूजन करे। कल्पवृक्षको प्रणाम करके देवमन्दिरमें प्रवेश करे और तीन बार श्रीपुरुषोत्तमकी परिक्रमा करके मन्त्रराजके


* विष्ण्गायत्री इस प्रकार है—
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।

३८४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

द्वारा उनकी पूजा करे। इसी प्रकार बलभद्र और सुभद्राका भी उन-उनके नाममन्त्रोंद्वारा पूजन करे। उत्तरायणके प्रारम्भकालमें भगवान् विष्णुका दर्शन करके मनुष्य देहबन्धनसे मुक्त हो जाता है। पूर्वकालमें महर्षि कश्यपने सृष्टिरचना करके इस महान् उत्सवको भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये किया था। कश्यपजीके द्वारा चालू किये हुए इस उत्सवका जो लोग दर्शन करते हैं, वे मोक्षको प्राप्त होते हैं। मुनियो! इस उत्सवमें भी रसोईघरका और अग्निका संस्कार करना चाहिये तथा प्रतिदिन बलिवैश्वदेव करना चाहिये। अग्न्याधानपूर्वक अग्निका संस्कार हो जानेपर प्रतिदिन दिव्यरूपा भगवती लक्ष्मी अदृश्यभावसे वहाँ पहुँचकर भगवान्‌के भोजनके लिये स्वयं रसोई तैयार करती हैं। उत्तरायण या मकरसंक्रान्तिके उत्सवमें किये हुए स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय और पितृतर्पण सब अक्षय होते हैं।

फाल्गुनमासमें भगवान्‌के लिये दोलारोहणका उत्तम उत्सव करना चाहिये। देवदेव श्रीविष्णुकी गोविन्द नामसे प्रसिद्ध प्रतिमा बनवाये और मन्दिरके आगे सोलह खंभोंका एक ऊँचा मण्डप तैयार करे। वह मण्डप चौकोर हो, उसमें चार दरवाजे हों और बीचमें वेदी बनी हुई हो। वेदीके ऊपर सुन्दर चाँदौवा तना हो और माल्य, चँवर तथा ध्वजा आदिसे मण्डपको सुशोभित किया गया हो। वेदीके ऊपर श्रीपर्णी (गम्भारी) काष्ठका बना हुआ भद्रासन स्थापित करे और पाँच या तीन दिनतक वहाँ फाल्गुनोत्सव मनावे। गोविन्दजीकी पूजा करके उन्हें कुछ दूरतक भ्रमण करावे। चतुर्दशीको प्रातःकाल गोविन्दजीकी सुन्दर प्रतिमा जगन्नाथजीके आगे स्थापित करके उन भगवान् पुरुषोत्तमकी पूजा करे। तत्पश्चात् गोविन्दजीकी प्रतिमाका भी पूजन करे। उसके बाद वस्त्र और माला उतारकर मन्त्रज्ञ पुरुष परम ज्योतिकी भावना करते हुए प्रतिमामें उसका न्यास (स्थापन) करे। तदनन्तर वह प्रतिमा पुरुषोत्तमरूप हो जाती है। फिर उसे रत्नमयी डोलीमें बैठाकर स्नानमण्डपमें ले जाय। वहाँ छत्र, ध्वजा, पताका, चँवर, व्यजन तथा दीपमालाओंसे बड़ा भारी उत्सव करे। उसके बाद भद्रासनपर पधराकर विभिन्न उपचारोंद्वारा गोविन्दजीकी पूजा करे। पहले महास्नानकी विधिसे उनको स्नान करावे। फिर सुगन्धित जलसे श्रीसूक्तके द्वारा अभिषेक करे। अभिषेकके पश्चात् वस्त्र, अलंकार और पुष्पहारसे भगवान्‌का श्रृंगार करे और पूजन-आरती करके सात बार मन्दिरकी परिक्रमा करावे। तत्पश्चात् भगवान्‌को डोलामण्डपमें ले आवे। मण्डपके निम्न भागमें सात बार भ्रमण करावे। फिर मण्डपके ऊर्ध्व भागमें सात बार भ्रमण कराकर स्तम्भवेदीपर भी सात बार घुमावे। उसके बाद यात्राके अन्तमें भी पुनः इसी क्रमसे इक्कीस बार भ्रमण करावे। रत्ननिर्मित हिंडोलेमें भगवान्‌को विराजमान करे। भगवान्‌के मस्तकपर सुन्दर रत्नमय मुकुट हो, वक्षःस्थलपर तारहार उनकी शोभा बढ़ा रहा हो, कानोंमें बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित कुण्डल झिलमिला रहे हों। अन्य अंगोंमें भी यथायोग्य शोभा बढ़ानेवाले दिव्य आभूषणोंसे भगवान्‌का मनोहर श्रृंगार किया गया हो। भगवान् विकसित कमलपुष्पके मध्यमें लक्ष्मीजीके साथ बैठे हों। उनके हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म तथा कण्ठमें वनमाला हो। मुखपर प्रसन्नता छा रही हो। सुन्दर नासिका हो। पीन वक्षःस्थलके कारण भगवान्‌का सौन्दर्य और भी बढ़ गया हो। ऐसी मनोहर झाँकीसे सुशोभित गोविन्दजीको डोलापर बैठाकर सब दिशाओंमें सुगन्धित चन्दनकी धूलि बिखेरते हुए उनकी पूजा करे। उस समय गोविन्दजीका ध्यान इस प्रकार करे—‘भगवान् कदम्ब वृक्षके नीचे गोपियोंके मध्यमें विराजमान हैं। गोपी और ग्वालबाल लीलापूर्वक हिंडोलेको डुला रहे हैं और भगवान् उसके भीतर बैठकर लीलारसमें निमग्न हैं।' ऐसा ध्यान करके लाल, पीले और सफेद रंगके

रत्नहिंडोलेपर भगवान् लक्ष्मीनारायण

कदम्बमूलमें भगवान् गोविन्द झूला झूल रहे हैं।

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३८७ ---|---

कर्पूरयुक्त सुगन्धित चूर्ण, अबीर, गुलाल आदि सब ओर बिखेरे। फिर दिव्य वस्त्र, दिव्य माल्य, दिव्य गन्ध और उत्तम धूप निवेदन करके चँवर डुलाने, गीत गाने और स्तुति-पाठ करने आदिके द्वारा भगवान्‌की पूजा करके धीरे-धीरे सात बार डोलामें विराजमान भगवान्‌को झुलावे। उस समय जो लोग भगवान् श्रीकृष्णजीके विग्रहका दर्शन करते हैं, उनकी निःसन्देह मुक्ति होती है और उनके ब्रह्महत्या आदि पाँच महापातकोंका भी नाश हो जाता है। हिंडोलेमें झूलते हुए भगवान्‌का दर्शन करके मनुष्य सम्पूर्ण पापों और आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंसे भी छूट जाता है।

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भगवान्‌की द्वादशादित्य मूर्तियोंकी उपासना, दक्षके द्वारा भगवान्‌की आराधना और वर-प्राप्ति तथा विभिन्न विभूतियोंके रूपमें भगवान्‌की उपासनाका फल

जैमिनिजी कहते हैं—ब्राह्मणो! अनादिदेव भगवान् विष्णुकी जो बारह मूर्तियाँ हैं, उनका प्रतिमास पूजन करे। उनमेंसे एक-एक मूर्तिकी एक-एक मासमें प्रतिदिन पूजा करते हुए बारह महीनोंमें बारह मूर्तियोंकी पूजा सम्पन्न होती है। क्रमशः बारह पुष्पों और बारह फलोंसे पूजन करना चाहिये। अशोक, मल्लिका (बेला), पाटल, कदम्ब, कनेर, चमेली, मालती, शतदलकमल, नीलकमल, वासन्ती, कुन्द और पुन्नाग—इन पुष्पोंको भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये क्रमशः एक-एक मासमें अर्पण करना चाहिये। अनार, नारियल, आम, कटहल, खजूर, ताल, प्राचीन आँवला, श्रीफल, नारंगी, सुपारी, करौदा और जायफल—इन बारह फलोंको भी क्रमशः एक-एक मासमें देना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य और मधुर भोजन तथा आसन आदि उपचार समर्पित करके जगद्गुरु भगवान्‌की स्तुति करे—'हे सर्वव्यापी जगन्नाथ! आप भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालोंके स्वामी हैं। कमलनयन विष्णो! आप संसारसागरसे मेरी रक्षा कीजिये। मधुसूदन! आपने पूर्वकालमें अत्यन्त भयंकर तथा अवलम्बनरहित एकार्णवके जलमें सम्पूर्ण विश्वकी रक्षाके लिये मधु नामक दैत्यका वध किया था। इस समय मेरी रक्षा कीजिये। त्रिविक्रम! जिन्होंने तीन पग चलकर तीनों लोकोंको नाप लिया और दैत्योंकी विशाल सेनाका वध करके त्रिभुवनकी रक्षा की, उन आपके लिये नमस्कार है। जिन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदका ज्ञान अपने भीतर लिये हुए वामनरूप धारण करके अद्भुत रूपसे सबको मोहित कर लिया, उन मायावी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जो भक्तोंके लिये ही अपने हृदयमें लक्ष्मीजीको धारण करते हैं और उन्हें सम्पत्ति देते हैं, उन भगवान् श्रीधरको नमस्कार है। हृषीकेश! आप समस्त इन्द्रियोंके अधिष्ठाता, सबके स्वामी और सदा भक्तोंके सुखके एकमात्र हेतु हैं, आपको नमस्कार है। पद्मनाभ! आपके नाभिकमलसे यह चराचर जगत् उत्पन्न हुआ है। वह कमल ही विधाताका आसन है। आपको नमस्कार है। जिनके तीन गुणोंसे यह चराचर जगत् बँधा हुआ है, उन्हींको गोपीने अपने दाम (रस्सी)-से बाँध लिया, इसलिये दामोदर नाम धारण करनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार है। जो जगत्‌के आदिकारण हैं और जिन्होंने ब्रह्माजीके रूपसे सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि की, उन अचिन्त्य महिमावाले आप सर्वव्यापी नारायणको नमस्कार है। गोविन्द! आप ज्ञानियोंके लिये ज्ञानगम्य हैं और अशरणको शरण देनेवाले हैं, आपके प्रसादसे मेरा यह व्रत सम्पूर्ण हो।'

इस प्रकार प्रतिमास पूजाके अन्तमें इन स्तुतियोंद्वारा

३८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


अतिशय भक्तिके साथ हाथ जोड़कर भगवान् जनार्दनकी प्रार्थना करनी चाहिये।

ब्राह्मणो! प्राचीन कालमें प्रजापति दक्षने मनुष्योंको आध्यात्मिक आदि पापोंसे अत्यन्त क्लेश उठाते देख वैशाख मासके शुक्ल पक्षमें तृतीयाको जगन्नाथजीके अंगमें चन्दनका लेप करके प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार स्तवन किया था—'देवदेव जगन्नाथ! आप सहज आनन्दसे परिपूर्ण एवं निर्मल हैं। परमेश्वर! संसारसागरमें डूबे हुए हम दुःखीयोंका उद्धार कीजिये। ये मनुष्य नाना प्रकारके संतापोंसे संतप्त हो रहे हैं। हे कृष्णमेघ! मुझपर कृपा करनेकी बुद्धिसे अपनी शुभ दृष्टिमयी सुधाधारासे इन सबको तृप्त कीजिये। जगदीश्वर! कलियुगके पापसे मोहित हुए मनुष्योंका उद्धार करनेके लिये ही इस नीलाचल-गुफामें आपका यह अवतार हुआ है। जय कृष्ण! जय ईशान! जय अक्षर! जय अविनाशी परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये और इन दीन, मूढ एवं अज्ञानी मनुष्योंपर कृपा कीजिये।'

इस प्रकार स्तुति करके 'हे ईश्वर! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये' ऐसा कहते हुए दक्ष प्रजापतिने जगन्नाथजीके चरणारविन्दोंमें दण्डवत्-प्रणाम किया। तब भगवान्‌ने स्पष्ट वाणीमें प्रजापतिसे कहा—'वत्स! उठो, मैंने तुम्हें दुर्लभ वर प्रदान किया। तुम्हारी जो अभिलाषा है, वह मेरे प्रसादसे निःसन्देह पूर्ण होगी। यह तो तुम जानते ही हो कि अल्प पुण्यवाले प्राणियोंको मेरा अनुग्रह दुर्लभ है, परंतु मेरे उत्सवसे मुझे सन्तुष्ट करके तुमने मेरी प्रार्थना की है, इसलिये मैं तुम्हें यह वर देता हूँ—'जो मनुष्य भक्तिपूर्वक अक्षय तृतीयाको इस अक्षय यात्राका दर्शन करते हैं, वे उस समय मनमें जो इच्छा करते हैं, उसीको प्राप्त कर लेते हैं।' जैसे चन्दनका लेप तापको हर लेता है, वैसे ही मेरा यह उत्सव तीनों तापोंका विनाश करनेवाला है। मैंने तुम्हारी बुद्धिको प्रेरित किया है, इसीलिये तुमने इस उत्सवको सम्पन्न किया है। मैंने दीनोंका उद्धार करनेके लिये मन-ही-मन यह संकल्प किया था, उसीके अनुसार तुम इस कार्यमें प्रवृत्त हुए हो। प्रजापते! तुमने जो अभिलाषा की है, वह सब मैं पूर्ण करूँगा। ये गुण्डिचा आदि बारह महायात्राएँ पवित्र करनेवाली मानी गयी हैं। इनमेंसे एक-एक यात्रा मुक्ति देनेवाली है और सब यात्राएँ तो धर्म, काम, अर्थ, मोक्ष चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त करानेवाली हैं। जो भक्तिपूर्वक इनमेंसे एक यात्राका भी दर्शन करता है, वह उसी एकसे भवसागरको पार करके भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।'

प्रजापति दक्षसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तब श्रद्धालु दक्ष प्रजापतिने भगवान्‌की आज्ञासे एक वर्षतक नीलाचलपर निवास करके वहाँके सब बड़े-बड़े उत्सवोंका दर्शन किया। जो अल्पबुद्धिवाले मनुष्य हैं, उनमें भी भगवत् विश्वास बढ़ानेके लिये ये यात्राएँ बतायी गयी हैं। जिस किसी प्रकार भी जगन्नाथजीका दर्शन करनेपर वे निश्चय ही मोक्ष प्रदान करते हैं।

इस संसारमें जो समस्त चराचर विभूतियाँ हैं, वे सब भगवान् विष्णुकी ही हैं। विभूति

* वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३८९

और उसके दाता वे एक ही परमेश्वर हैं। जो मनुष्य जिस भावसे भगवान्‌की सेवा करता है, वह वैसा ही हो जाता है। भगवान्‌की इतनी ही महिमा है, इस प्रकार उसका माप नहीं किया जा सकता। जो जिस भावसे भगवान्‌की उपासना करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— इन चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्तिके लिये एक ही मार्ग है— दारुब्रह्म जगन्नाथजीकी उपासना। धर्मके स्वरूपका यथार्थ निश्चय करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। भगवान् विष्णु ही धर्म हैं। ये जनार्दन ही धर्म और जगत् दोनोंके स्वामी हैं। वे ही चतुर्विध पुरुषार्थस्वरूप हैं। उनमें जिसकी भक्ति स्थिर हो गयी है, वह सम्पूर्ण कामनाओंसे तृप्त होकर न कभी शोक करता है और न आकाङ्क्षा। इन्द्ररूपसे उपासना किये जानेपर वे ही भगवान् विष्णु त्रिलोकीका ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। ब्रह्माजीके रूपमें ध्यान किये जानेपर वंशकी वृद्धि करते हैं, सनत्कुमारके रूपमें इनका चिन्तन किया जाय तो ये दीर्घ आयु प्रदान करते हैं। राजा पृथुके रूपमें भावना करनेपर जीविका और सम्पत्ति प्रदान करते हैं, बृहस्पतिके रूपमें भगवान्‌की उपासना की जाय तो वे गंगा आदि तीर्थोंका फल देते हैं। सूर्यरूपसे चिन्तन करनेपर वे अन्तःकरणके अज्ञानान्धकारका नाश करते हैं। चन्द्रमाके रूपमें श्रीहरिकी उपासना की जाय तो वे अनुपम सौभाग्य देते हैं। भगवान् वाणीके अधिपति हैं, इस रूपमें भावना करनेपर मनुष्य अष्टादश विद्याओंका तत्त्वज्ञ होता है। यज्ञेश्वर-स्वरूपमें चिन्तन करनेपर जगन्मय सनातन भगवान् अश्वमेध आदि यज्ञोंका फल देते हैं। कुबेररूपमें ध्यान किया जाय तो भगवान् अनुपम समृद्धि प्रदान करते हैं। इस प्रकार दीनों और अनाथोंपर अनुग्रह करनेके लिये दयासागर भगवान् काष्ठमय शरीर धारण करके नीलगिरिपर निवास करते हैं। ब्राह्मणो! तुम सब लोग वहाँ जाओ, एकाग्रचित्त होकर निवास करो और भगवान् लक्ष्मीपतिके युगल चरणारविन्दोंकी शरण लो।


## राजा इन्द्रद्युम्नका ब्रह्मलोकगमन, पुराण-श्रवणकी विधि और ग्रन्थका उपसंहार

मुनियोंने पूछा— भगवन्! विष्णुभक्त राजा इन्द्रद्युम्नने मन्दिरकी प्रतिष्ठाके पश्चात् कौन-सा कार्य किया?

जैमिनिजी बोले— साक्षात् ब्रह्मस्वरूप जगन्नाथजीसे वरदान पाकर नरश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने अपनेको कृतार्थ माना। भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार उन्होंने पुण्य एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली सम्पूर्ण यात्राएँ करवायीं। अनेक प्रकारके उपचारोंसे जगद्गुरु श्रीहरिकी नाना प्रकारसे पूजा की और राजा गाल श्वेतको भगवान्‌की आज्ञा भलीभाँति समझाकर धर्म और न्यायसे युक्त यह वचन कहा— 'राजन्! तुम बहुश्रुत विद्वान् हो, धर्ममें तुम्हारी निष्ठा है, भगवान्‌में भी मन, वाणी और क्रियाद्वारा तुम्हारी बड़ी भक्ति है। भगवान् श्रीहरि किसी एकके उपदेशके लिये अनुशासन नहीं करते हैं, ये समस्त चराचरके गुरु हैं और सम्पूर्ण विश्व इनका शिष्य है। मुझपर अनुग्रह करनेके लक्ष्यसे अवतीर्ण हुए भगवान् जगन्नाथ यहाँ दीन-दुःखियोंके उद्धारके लिये सदैव निवास करेंगे। तुम भक्ति और श्रद्धाके साथ इनकी आज्ञाके पालनमें लगे रहो। ये साधारण काष्ठकी प्रतिमा हैं— ऐसी व्यावहारिक बुद्धिसे इन्हें न देखो, ये साक्षात् जगदीश्वर हैं। इनके मन्दिर-प्रवेश-कालमें तीनों लोकोंके निवासी इस पृथ्वीपर

३९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आ गये थे, यह तो तुमने प्रत्यक्ष देखा है। ब्रह्मा आदि सब देवता एक ही साथ यहाँ पधारे थे। काष्ठस्वरूप धारण करनेवाले ये साक्षात् चराचरमय विष्णु हैं। इन्हें पृथ्वीपर प्राप्त कल्पवृक्ष समझो। ये सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले हैं। इनकी उपासना करके जो जैसी कामना रखता है, वैसा फल प्राप्त कर लेता है। ये अन्धकारसे परे अनिर्वचनीय ज्योतिस्वरूप हैं। यतिजन बहुधा प्रयत्न करके भी इन्हें यथार्थरूपसे नहीं जान पाते। नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले, शुद्ध धर्मनिष्ठ यतियों तथा अनन्यभक्तिसे युक्त योगियोंके एक ही मार्ग भगवान् श्रीहरि हैं। जैसे संतप्त मनुष्य ग्रीष्म-ऋतुमें शीतल एवं गहरे जलाशयमें गोता लगाकर बड़े सन्तोषका अनुभव करता है उसी प्रकार इन करुणासागर भगवान् पुरुषोत्तमके प्राप्त होनेपर मनुष्य त्रिविध तापजनित दुःखको त्याग देता है। शरणमें आये हुए दीनजनोंका जैसा उपकार ये भगवान् विष्णु करते हैं, वैसा माता, पिता, मित्र, पत्नी और पुत्र कोई भी नहीं कर सकता। अतः भोग और मोक्ष दोनों फलोंको देनेवाले इन जगदीश्वरका तुम सेवन करो और पुरवासियों तथा प्रजाओंके द्वारा भगवान्‌की विभिन्न यात्राओंको भलीभाँति सम्पन्न करते रहो। नृपश्रेष्ठ! सभी राजाओंके लिये धर्मका मार्ग एक-सा ही है। किसी पूर्वपुरुषने उसे चलाया है और पीछे होनेवाले लोग उसका पालन करते हैं। राजेन्द्र! श्रेष्ठ उपचारों और समृद्धियोंद्वारा तीनों समय भगवान् नृसिंहका भजन-पूजन करो, इससे तुम्हें परम शान्ति प्राप्त होगी। अपनी कृतिकी अपेक्षा दूसरेकी कृतिका संरक्षण करना श्रेष्ठ बताया गया है। जो दूसरेके दिये हुए दानकी रक्षा करता है, उसके लिये वह अपने दिये हुए दानसे उत्तम है।'

यह सुनकर नृपश्रेष्ठ श्वेतने राजा इन्द्रद्युम्नके आदेशको गुणयुक्त मालाकी भाँति शिरोधार्य किया। राजर्षि इन्द्रद्युम्न भी भगवान् पुरुषोत्तमको प्रसन्न करके नारदजीके साथ ब्रह्मलोक चले गये।

ब्राह्मणो! यह मैंने तुमसे पुरुषोत्तमक्षेत्रके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया। वहाँ नित्य निवास करनेवाले दारुब्रह्म जगन्नाथजीके माहात्म्यको जो भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, उसे अनेक अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। स्वामिकार्तिकेयजीके बताये हुए अर्द्धोदययोगकी अपेक्षा इस विष्णु-माहात्म्यके कीर्तनका पुण्य अधिक है। जो प्रतिदिन प्रातःकाल इसको सुनता है उसके लिये यह धन, यश, आयु, पुण्य तथा सन्तानकी वृद्धि करनेवाला है। स्वर्गमें प्रतिष्ठारूप फल देता और सब पापोंका नाश करता है।

पुराण-श्रवणके आरम्भमें अपने वैभवके अनुसार तैयारी करनी चाहिये। पहले संकल्प करके पुराण-पाठ श्रवण करनेके लिये अति सुन्दर आभूषणों तथा वस्त्र, चन्दन और माला आदिके द्वारा विधिपूर्वक ब्राह्मणका वरण करे। वह ब्राह्मण शुद्ध कुलमें उत्पन्न हो, किसी अंगसे हीन न हो, शान्त स्वभाववाला हो, अपनी ही शाखाको माननेवाला और अपना पुरोहित हो तथा सब शास्त्रोंके अर्थको यथार्थरूपसे जाननेवाला हो। वरण किये हुए ब्राह्मणको उत्तम आसनपर बिठाकर उसके गलेमें माला पहना दे और मस्तकपर भी पुष्पगर्भ माला रखे। चन्दनसे ब्राह्मणके ललाटमें लेप करे। उस समय वह ब्राह्मण व्यासके समान मान्य होता है। उसी ब्राह्मणके द्वारा विष्णुस्वरूप पुस्तकपर श्रीखण्ड, अगरु आदि पुष्पों और नाना प्रकारके रुचिर उपचारोंसे व्यास-पूजन करावे। कथा सुननेके लिये आने-जानेवाले लोगोंके बैठनेके निमित्त यथायोग्य आसन बनवाकर रखे। स्वयं उत्तम आसनपर बैठकर उत्कण्ठित चित्तसे कथा सुने

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३९१

अथवा झाड़-बुहारकर शुद्ध किये हुए स्थानमें सबके साथ बैठे। व्यासके आगे ऊँचे आसनपर न बैठे। स्नान करके दो शुद्ध वस्त्र धारण करे। आचमन करके शरीरमें यथास्थान तिलक करे और प्रसन्नतापूर्वक मनसे भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए कथामें विश्वास करे। पुराण, ब्राह्मण, देवता, मन्त्र, कर्म, तीर्थ तथा बड़े-बूढ़ोंके वचनमें विश्वास फलदायक होता है। सब पुण्य विश्वासका कारण है। पुराण-श्रवणके समय पाखण्डी आदिसे बातचीत, व्यर्थकी बकवाद और सब प्रकारकी चिन्ताओंका प्रयत्नपूर्वक त्याग करे। इसी विधिसे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक कथा सुने। पाठ समाप्त होनेपर बारंबार करताल आदि बजाकर 'जय कृष्ण! जगन्नाथ! हरे!' इत्यादि नामोंका कीर्तन करे। कीर्तन इतने उच्चस्वरसे होना चाहिये कि आकाशमें उसकी ध्वनि गूँज उठे। इस प्रकार भगवान् विष्णुकी प्रीति के लिये प्रतिदिन कीर्तन करना चाहिये। तदनन्तर ग्रन्थ समाप्त होनेपर भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये बड़ी भक्तिके साथ वस्त्र, माला, चन्दन और आभूषण आदिकी विशेष व्यवस्था करके व्याससदृश माननीय आचार्यको विभूषित करे और अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक दक्षिणा दे। दक्षिणा ऐसी देनी चाहिये जिससे आचार्यको सन्तोष हो जाय। शान्तिकर्म, पौष्टिककर्म, व्रतबन्ध, विवाह आदि कर्म, मोक्षसाधक कर्म, पुराण-श्रवण, यज्ञादिका अनुष्ठान, दान और अनेक प्रकारके व्रत—ये यदि दक्षिणाहीन हों तो निष्फल हो जाते हैं। तत्पश्चात् यथाशक्ति तैयार कराये हुए अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन करावे। मुनिवरो! इस प्रकार तुमलोगोंसे पुराण-श्रवणकी यह सांगोपांग विधि बतायी गयी।

मुनि बोले—अहो! हमारा महान् सौभाग्य है कि पापराशिका विनाश करनेवाला यह पुराण-श्रवणका फल हमने आपके मुखारविन्दसे सुना। मुने! इस समय इसके फलकी प्राप्तिके लिये हम आपको यथाशक्ति दक्षिणा देते हैं, इसे आप प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करें। यह कह उन अकिंचन मुनियोंने समिधा, कुशा, फूल, फल और अक्षत आदि जैमिनिजीको देकर बड़े हर्षके साथ पुरुषोत्तमक्षेत्रको प्रस्थान किया।

॥ उत्कलखण्ड या पुरुषोत्तमक्षेत्र-माहात्म्य संपूर्ण ॥

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३९२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बदरिकाश्रम-माहात्म्य


## सब तीर्थोंका संक्षिप्त माहात्म्य तथा बदरीक्षेत्रकी विस्तृत महिमाका उपक्रम

**शौनकजी बोले—**समस्त धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ पुराणपरिनिष्ठित सूतजी ! सब धर्मोंसे रहित भयंकर कलियुग प्राप्त होनेपर मनुष्य दुष्कर्ममें प्रवृत्त हो सब धर्मोंका त्याग कर देते हैं, उनकी आयु बहुत थोड़ी होती है, उनकी प्राणशक्ति, बल, पराक्रम, तपस्या और कर्मानुष्ठान सब अत्यन्त क्षीण हो जाते हैं। वे सब अधर्मपरायण और वेदशास्त्रसे दूर होते हैं; तीर्थयात्रा, तपस्या, दान और भगवान् विष्णुकी भक्तिका उनमें अभाव-सा होता है। ऐसे क्षुद्र मनुष्योंका थोड़े प्रयाससे किस प्रकार उद्धार हो सकता है ?

**सूतजी बोले—**महाभाग शौनक ! तुम्हें साधुवाद है, तुम सदा दूसरोंके हितमें तत्पर रहते हो, भगवान् विष्णुकी भक्तिमें आसक्त होनेके कारण तुम्हारे मनका मल धुल गया है। संसारमें साधुपुरुषोंका संग दुर्लभ है। वह देहाभिमानी अजितात्मा पुरुषोंकी संचित पापराशिको हर लेता है और अधिक पुण्यके कारण उन्हें उत्तम गति प्रदान करता है। तीनों लोकोंके मनुष्योंके लिये सत्संग दुर्लभ है, वह कर्मपाशसे पीड़ित मनुष्योंकी हृदय-ग्रन्थि (आन्तरिक बन्धन)-को दूर करता है, बहुत कम बोलनेवाले और एकमात्र भगवान्‌का भजन करनेवाले लोगोंको उच्चपद प्रदान करता है और जन्म-मृत्युके चक्रसे थके हुए मानवोंको चिर-विश्रामकी प्राप्ति करानेका कारण होता है\*। शौनकजी ! यही प्रश्न पूर्वकालमें परम सुन्दर कैलाश-पर्वतके शिखरपर श्रोता ऋषियोंके समक्ष सत्पुरुषोंका कल्याण करनेके लिये स्वामिकार्तिकेयजीने भगवान् शंकरके आगे उपस्थित किया था।

**तब श्रीमहादेवजीने कहा—**षडानन ! परमार्थके पथपर चलनेवाले पुरुषोंको वैकुण्ठधामका निवास प्रदान करनेवाले बहुत-से तीर्थ और क्षेत्र हैं। कोई कामनाके अनुसार फल देनेवाले हैं और कोई मोक्षदायक हैं। गंगा, गोदावरी, नर्मदा, तपती, यमुना, क्षिप्रा, पुण्यमयी गौतमी, कौशिकी, कावेरी, ताम्रपर्णी, चन्द्रभागा, महेन्द्रजा, चित्रोत्पला, वेत्रवती, सरयू, चर्मण्वती, शतद्रु, पयस्विनी, गण्डकी, बाहुदा, सिन्धु और सरस्वती—ये सब पवित्र नदियाँ हैं और बार-बार सेवन करनेपर भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। अयोध्या, द्वारका, काशी, मथुरा, अवन्ती, कुरुक्षेत्र, रामतीर्थ, कांची, पुरुषोत्तमक्षेत्र, पुष्करक्षेत्र, दर्दुरक्षेत्र, वाराहक्षेत्र तथा बदरी नामक महापुण्यमय क्षेत्र, जो सब मनोरथोंका साधक है, ये सभी उत्तम तीर्थ हैं। मुक्तिकी एक साधन अयोध्यापुरीका विधिपूर्वक दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। भाँति-भाँतिसे भगवान् विष्णुकी सेवापूर्वक पूजन, नृत्य और कीर्तन

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\* हरति हृदयबन्धं कर्मपाशार्दितानां वितरति पदमुच्चैरल्पजल्पैकभाजाम्।  
जननमरणकर्मश्रान्तविश्रान्तिहेतुस्त्रिजगति मनुजानां दुर्लभः सत्प्रसंगः॥  
(स्क० पु० वै० बद० १। १२)
  • वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य * ३९३

करनेवाले पुरुष घर त्यागकर श्रीहरिका चिन्तन करनेसे गृहकी आसक्ति तथा मृत्युके पराक्रमपर विजय पा जाते हैं। द्वारकामें साक्षात् भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं, वे अपने निवास-मन्दिरको कभी नहीं छोड़ते। षडानन ! गोमतीमें स्नान करके भगवान् श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करनेसे बिना ज्ञानके ही मनुष्यकी मुक्ति हो जाती है।

असी और वरुणाके बीचमें पाँच कोसतक वाराणसीक्षेत्र है। वहाँ मणिकर्णिका, ज्ञानवापी, विष्णुपादोदक और पंचनद कुण्ड (पंचगंगा)-में स्नान करके मनुष्य पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीता है। किसी प्रसंगसे भी काशीमें विश्वनाथजीका दर्शन करके मनुष्यको जन्म-मृत्युरहित मुक्ति प्राप्त होती है। कार्तिकेय ! तपस्या और उपवासमें लगा हुआ मनुष्य मथुरापुरीमें जन्मस्थानपर जाकर सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। विश्रामतीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके तिलसहित जलसे तर्पण करे तो मनुष्य अपने पितरोंका नरकसे उद्धार करके स्वयं विष्णुलोकको जाता है। अवन्तीपुरीमें वैशाखमास आनेपर मनुष्य क्षिप्राके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके कोटि तीर्थमें गोता लगावे और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराकर महाकालेश्वर शिवका दर्शन करे तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुरुक्षेत्र तथा रामतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर यथाशक्ति सुवर्णदान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। हरिक्षेत्रमें पादोदक तीर्थके जलमें स्नान करके श्रीहरिका दर्शन करनेसे पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके साथ आनन्द भोगता है। विष्णुकांचीमें साक्षात् भगवान् विष्णु और शिवकांचीमें साक्षात् भगवान् शिव निवास करते हैं। दोनोंमें कोई भेद न होनेके कारण दोनोंकी ही भक्तिसे मुक्ति हाथमें आ जाती है, भेदबुद्धि पैदा करनेसे मनुष्योंकी निन्दित गति होती है। पुरुषोत्तमक्षेत्रमें मार्कण्डेय-सरोवरके जलमें स्नान करके एक बार जगन्नाथजीका दर्शन कर लेनेसे मनुष्य ज्ञान अथवा योगके बिना भी पुनः माताके स्तनोंका दूध नहीं पीता। रोहिणिक्षेत्रके अन्तर्गत समुद्रमें तथा इन्द्रद्युम्न-सरोवरमें स्नान करके भगवान् विष्णुके प्रसादको खाकर मनुष्य वैकुण्ठधाममें स्थान पाता है। कार्तिकी पूर्णिमाको पुष्करतीर्थमें स्नान करके दक्षिणासहित श्राद्ध एवं भक्तिपूर्वक ब्राह्मण-भोजन कराकर मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। माघ मासमें भक्तिभावसे त्रिवेणीसंगममें स्नान करके मनुष्य उस पुण्यको प्राप्त करता है, जो बदरीतीर्थके कीर्तनसे प्राप्त होता है।

भगवान् विष्णुका बदरी नामक क्षेत्र तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, उसके स्मरणमात्रसे महापातकी मनुष्य भी तत्काल पापरहित होकर मृत्युके पश्चात् मोक्षके भागी होते हैं। स्वर्ग, पृथ्वी तथा रसातलमें बहुत-से तीर्थ हैं, परंतु बदरी तीर्थके समान दूसरा कोई तीर्थ न हुआ है, न होगा। कार्तिकेय ! तप, योग और समाधिसे तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह बदरीक्षेत्रके भलीभाँति दर्शनमात्रसे मिल जाता है।

बदरीक्षेत्रकी महिमा—अग्निदेवके सर्वभक्षणरूप दोषका निवारण

स्कन्दने पूछा—यह क्षेत्र कैसे उत्पन्न हुआ ? किन लोगोंने इसका सेवन किया है तथा इस क्षेत्रके अधिपति कौन हैं? यह सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बताइये।

३९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


भगवान् शिवने कहा—यह बदरीक्षेत्र अनादिसिद्ध है। जैसे वेद भगवान्‌के शरीर हैं, उसी प्रकार यह भी है। इस क्षेत्रके अधिपति साक्षात् भगवान् नारायण हैं। नारद आदि महर्षियोंने इस तीर्थका सेवन किया है। काशीमें, श्रीपर्वतके शिखरपर तथा कैलाशमें पार्वतीसहित मेरी जैसी प्रीति है उससे अनन्तगुनी अधिक बदरीक्षेत्रमें है। अन्य तीर्थोंमें स्वधर्मका विधिपूर्वक पालन करते हुए मृत्यु होनेसे मुक्ति होती है; परंतु बदरीक्षेत्रके दर्शनमात्रसे ही मुक्ति मनुष्योंके हाथ आ जाती है। जहाँ भगवान् नारायणके चरणोंका सान्निध्य है, जहाँ साक्षात् अग्निदेवका निवास है और केदाररूपसे मेरा लिंग प्रतिष्ठित है, वह सब बदरीक्षेत्रके अन्तर्गत है। केदारके दर्शन, स्पर्श तथा भक्तिभावसे पूजन करनेपर कोटि-कोटि जन्मोंका पाप तत्काल भस्म हो जाता है। उस क्षेत्रमें विशेषतः मैं अपनी सम्पूर्ण कलासे स्थित रहता हूँ। वहाँ मेरे श्रीविग्रहमें पंद्रहों कलाएँ विद्यमान हैं। वहाँ कोमल कमलकी-सी कान्तिसे सुशोभित मुखकमलवाले शिवभक्त दोनों हाथ जोड़े मुझ महादेवकी ओर ही दृष्टि लगाये प्रदोषकालमें मेरी ही उपासना करते हैं। हाथमें जपमाल तथा मनमें शान्ति और सन्तोष धारण किये प्रतिदिन मेरी वन्दना और प्रार्थना करनेवाले मेरे भक्त सदा मेरे चरणोंके चिन्तनसे विज्ञानस्वरूप हो हृदयस्थित कामको नष्ट करके सर्वतोभावसे निरन्तर मेरा भजन करते हैं। काशीमें मरे हुए पुरुषोंको तारकब्रह्म मुक्ति देनेवाला होता है, परंतु केदारक्षेत्रमें मेरे लिंगके पूजनसे मनुष्योंकी मुक्ति हो जाती है। श्रीनारायणके चरणोंके समीप प्रकाशमान अग्नितीर्थका तथा मेरे केदारसंज्ञक महालिंगका दर्शन करके मनुष्य पुनर्जन्मका भागी नहीं होता।

पूर्वकालमें ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले) ऋषियोंका समुदाय प्रयागमें एकत्र हुआ था। जहाँ भगवती गंगा यमुनाके साथ मिली हैं और जहाँ त्रिभुवनविख्यात दशाश्वमेध नामक तीर्थ है, वहाँ भगवान् अग्निदेवने ऋषियोंके आगे उपस्थित हो विनीतभावसे पूछा—'आपलोगोंकी एक दृष्टि और एक ज्ञान है; आप सभी ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, दीनोंके लिये करुणासे भरे हुए आर्द्रहृदय और दयालु हैं। आप लोगोंको यहाँ उपस्थित देखकर मैं पूछता हूँ—सब प्रकारकी दूषित वस्तुओंके भक्षणजनक पातकसे मेरा अन्तःकरण लिप्त हो गया है। ब्रह्मज्ञानियो! बताइये मेरा उद्धार कैसे होगा?'

इतनेमें ही सब मुनियोंमें श्रेष्ठ व्यासजी गंगामें स्नान करके वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार बोले—'अग्निदेव! आपके सर्वभक्षणरूप पापकी निवृत्तिके लिये एक श्रेष्ठ उपाय है। आप बदरीक्षेत्रकी शरण लीजिये, जहाँ देवताओंके देवता साक्षात् भगवान् जनार्दन विराजमान हैं, जो सबके पापोंका नाश करनेवाले हैं। वहाँ गंगाजीके जलमें स्नान करके भगवान्‌की परिक्रमा और दण्डवत्-प्रणाम करनेसे सब पापोंका क्षय हो जाता है।'

तब अग्निदेव उत्तराभिमुख होकर गन्धमादन-पर्वतपर आये और बदरीतीर्थमें पहुँचकर गंगाजीके

* वैष्णवखण्ड-बदरिकाश्रम-माहात्म्य *३९५

जलमें स्नान करके भगवान् नारायणके आश्रमपर गये। वहाँ भगवान्‌को प्रणाम करके उन्होंने भक्तिपूर्वक स्तवन किया। 'जो विशुद्ध विज्ञानघन-स्वरूप पुराणपुरुष सनातन प्रजापतियोंके पति, सबके गुरु, एक होते हुए भी अनेक रूपोंको धारण करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्‌के एकमात्र स्वामी हैं, शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले उन शुद्धबुद्धि नारायणको मैं नमस्कार करता हूँ। जो अपनी मायामयी शक्तिका आश्रय लेकर संसारकी सृष्टि करनेके उद्देश्यसे रजोगुणसे युक्त ब्रह्माका रूप धारण करते हैं, सत्त्वगुणसे युक्त होकर इस जगत्‌की रक्षामें कारण बनते हैं और तमोगुणसे संयुक्त हो इस विश्वके भयंकर संहारकारी रुद्र बने हुए हैं, उन त्रिविध रूपधारी भगवान्‌की मैं स्तुति करता हूँ। जो अविद्यासे मोहितचित्त सम्पूर्ण विश्वके रूपमें प्रकट हुआ है और विद्यासे समस्त त्रिलोकीमें एक ही रूपसे व्याप्त हो रहा है, विद्याका आश्रय लेनेसे जिसे सर्वज्ञ और ईश्वर कहते हैं, उस परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने भक्तोंकी इच्छासे अपने दिव्य स्वरूपको प्रकट किया है, योगनिद्राको स्वीकार करके शेषनागकी विशाल शय्यापर अपनेको अर्पित कर रखा है, जो रेशमी पीताम्बर धारण करते हैं और आठ प्रकारकी विचित्र शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं स्तुति करता हूँ।'

इस प्रकार स्तुति किये जानेपर सर्वान्तर्यामी भगवान् नारायण प्रसन्न होकर पवित्रताकी इच्छा रखनेवाले अग्निदेवसे मधुर वाणीमें बोले—'अनघ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। मैं तुम्हारी इस स्तुति और विनयसे बहुत प्रसन्न हूँ।'

अग्नि बोले—प्रभो! मैं जिस उद्देश्यसे आया हूँ वह सब आपको ज्ञात है। तथापि कहता हूँ और इस रूपमें आप जगदीश्वरकी आज्ञाका पालन करता हूँ। मुझे सर्वभक्षी तो होना ही पड़ता है, किंतु मेरे इस दोषका निवारण कैसे हो, यही सोचकर मुझे अत्यन्त भय हो रहा है।

भगवान् नारायणने कहा—इस क्षेत्रका दर्शन करनेमात्रसे किसी भी प्राणीका पाप नहीं रह जाता। मेरे प्रसादसे तुममें कभी पातकका सम्पर्क न होगा।

तबसे लेकर सब दोषोंसे रहित भूतात्मा अग्निदेव यहाँ अपनी कलासे विराजमान हैं। जो प्रातःकाल उठकर पवित्र भावसे इस प्रसंगको सुनता और सुनाता है, वह निश्चय ही अग्नितीर्थमें स्नान करनेका फल पाता है।


बदरीक्षेत्रकी पाँच शिलाओंमेंसे नारदशिला और मार्कण्डेयशिलाका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—स्कन्द ! जो महापातकी और अतिपातकी हैं, वे भी अग्नितीर्थमें स्नान करनेमात्रसे पवित्र हो जाते हैं। जैसे अत्यन्त मलिन सोना आगमें तपानेसे शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार देहधारी प्राणी अग्नितीर्थमें आकर पापमुक्त हो जाता है। जो पाँच प्रकारके महापातक करनेवाले हैं, वे भी इस तीर्थमें स्नान करके प्राणायाम और जप करनेसे शुद्ध हो जाते हैं, ऐसा मेरा मत है। यहाँ जो पाँच शिलाएँ हैं, उनमें सदा भगवान् विष्णुकी स्थिति है, वहींपर सब पापोंका नाश करनेवाला अग्नितीर्थ है।

स्कन्दने पूछा—पिताजी! वहाँ कैसी पाँच शिलाएँ हैं और किसने उनका निर्माण किया है? ये सब बातें पूर्णतः बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् शिवने कहा—बेटा! वहाँ नारदी, नारसिंही, वाराही, गारुड़ी और मार्कण्डेयी—

३९६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


ये पाँच शिलाएँ विख्यात हैं, जो सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाली हैं। एक समय भगवान् नारदने एक शिलापर बैठकर वायु पीकर रहते हुए महाविष्णुका दर्शन करनेके लिये अत्यन्त कठोर तपस्या की। वे साठ हजार वर्षोंतक वृक्षकी भाँति स्थिरभावसे उस शिलापर विराजमान रहे। तदनन्तर भगवान् विष्णु ब्राह्मणका रूप धारण करके कृपापूर्वक उनके सामने गये और उन मुनिश्रेष्ठ नारदसे इस प्रकार बोले—'मुने! बताओ, तुम क्या चाहते हो?'

नारदजीने कहा—आप कौन हैं? इस निर्जन वनमें आपके दर्शनसे मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो रही है।

नारदजीके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने कृपा करके उन्हें अपने दिव्य स्वरूपका दर्शन कराया। उनके हाथोंमें शंख, चक्र, गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे। वे पीताम्बरसे सुशोभित और कमलोंकी मालासे विभूषित थे। लक्ष्मीका निर्मल निवासभूत भगवान्का वक्ष श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशमान था। सुनन्द आदि पार्षद भगवान् जनार्दनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखकर नारदजीके शरीरमें नूतन प्राण-सा आ गया। वे सहसा खड़े हो गये और हाथ जोड़कर बार-बार नमस्कार करते हुए जगदीश्वरोंके भी ईश्वर श्रीविष्णुकी स्तुति करने लगे—'जो सबके साक्षी और सम्पूर्ण जगत्के अधीश्वर हैं, जिन्होंने भक्तोंकी इच्छासे दिव्य देह धारण किया है, जो शरणागतोंके लिये दयाके महासागर हैं, वे पावन दिव्यमूर्तिधारी भगवान् श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। जो सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये और साधुपुरुषोंके मनको सन्तुष्ट और उनका कल्याण करनेके लिये शीघ्र ही अपनी उत्तम कलाओंद्द्वारा दिव्य देह धारणकर प्रसन्नतापूर्वक दिव्यलीला और हास्यपूर्ण दृष्टि प्रकट करते हैं, सत्त्वगुणका समुदाय ही जिनका स्वरूप है, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जिनके चरणारविन्दोंका अर्चन करनेसे निर्मल चित्त हुए मनुष्य ज्ञानरूपी खड्गसे संसारबन्धनके मूल हेतुओंको काट डालते हैं और खेदरहित हो जिनके स्वरूपभूत ब्रह्मानन्दकी उपलब्धि कर लेते हैं, दीनोंपर दयार्द्रचित्त रहनेवाले वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जिनका अनुसरण करनेवाले देवता विपत्तियोंके समुद्रको भी बछड़ेके खुरके समान लाँघकर निर्भय हो स्वर्गमें निवास करते हैं, वे सर्वभूतात्मा हैं। प्रभो! आप वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धस्वरूप विष्णुको बार-बार नमस्कार है। जनार्दन! आज आपके दर्शनसे मेरा जीवन धन्य हो गया, मेरी तपस्या फलवती हुई और मेरा ज्ञान भी सफल हो गया।'

श्रीभगवान् बोले—नारद! तुम्हारी इस तपस्या और स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। तीनों लोकोंमें तुमसे बढ़कर दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।

नारदजीने कहा—देव! यदि आप मुझे वर देते हैं तो एक तो अपने चरणकमलोंमें अविचल भक्ति दीजिये। मेरी शिलाके समीप रहना आप कभी न छोड़िये, यह दूसरा वर है; और मेरे इस तीर्थके दर्शन, स्पर्श, स्नान और आचमन करनेवाला मनुष्य पुनः संसारमें शरीर न धारण करे, यह मेरा तीसरा वर है।

श्रीभगवान् बोले—'एवमस्तु'। मैं तुम्हारे स्नेहवश समस्त चराचर जीवोंको मुक्ति देनेके लिये तुम्हारे तीर्थमें निवास करूँगा।

ऐसा कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर नारदजी भी कुछ दिनोंतक बदरीक्षेत्रमें निवास करके मथुरापुरीको चले गये।

स्कन्दने कहा—भगवन्! अब मुझे मार्कण्डेय-शिलाकी महिमा बताइये।

भगवान् शिव बोले—पहले त्रेतायुगके अन्तमें मार्कण्डेयजी तीर्थयात्राका परिश्रम उठाते हुए मथुरामें आये। वहाँ उन्हें नारदजीका दर्शन हुआ। मार्कण्डेयजीने