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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
५७६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भूतलपर सदा सुखी होते हैं और अन्तमें सनातन मोक्षको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार रामेश्वर महालिंगकी महिमाका वर्णन किया गया। जो इस | प्रसंगको भक्तिपूर्वक पढ़ता और सुनता है, वह श्रीरामेश्वरकी सेवाके परम उत्तम फलको पाता है।

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भगवान् श्रीरामके द्वारा राक्षसोंसहित रावणका वध और सेतुके क्षेत्रमें रामेश्वरलिंगकी स्थापना

**ऋषि बोले—**सब प्राणियोंका उपकार करनेवाले सूतजी ! आपने इस पुराणकी कथा सुनाकर हमलोगोंपर बड़ा अनुग्रह किया। दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार शिवलिंगकी स्थापना की है, उसको हमलोग सुनना चाहते हैं।

**सूतजीने कहा—**वानरोंकी सेनाके साथ महेन्द्रगिरिपर आकर लक्ष्मणसहित महाबली श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रका दर्शन किया। तत्पश्चात् अपार समुद्रके ऊपर सेतु बाँधकर उसीके मार्गसे श्रीरघुनाथजी रावणपालित लंकापुरीको गये। वहाँ पहुँचनेपर सूर्यास्त हो गया। पूर्णिमाके प्रदोषकालमें सेनासहित श्रीरामचन्द्रजी सुवेल पर्वतपर आरूढ़ हो गये। तदनन्तर रात्रिमें महलकी छतपर खड़े हुए लंकापति रावणको देखकर महाबली सूर्यपुत्र सुग्रीवने उसके मुकुटको धरतीपर गिरा दिया। मुकुट भंग हो जानेसे राक्षस घरमें घुस गया। लंकेश्वरके घरमें घुस जानेपर सुग्रीव, लक्ष्मण और सेनासहित श्रीरामचन्द्रजीने पर्वतके किनारेसे उतरकर लंकाके समीप अपनी सेनाको ठहराया। वहाँ ठहराये जाते हुए वानरोंपर रावणके विशालकाय सैनिकोंने अस्त्र-शस्त्र लेकर आक्रमण किया। वे सभी दुष्टात्मा राक्षस अदृश्य होकर आये थे। विभीषणने उन सबका अन्तर्धान-विद्यासे ही वध किया। बहुतसे बलवान् वानरोंद्वारा कितने ही राक्षस मारे गये। भयंकर पराक्रमी वानरोंने जिनका अंग-भंग कर दिया था, ऐसे मरनेसे बचे हुए राक्षस शीघ्र ही रावणपालित लंकापुरीमें भाग गये। उस सेनाके नष्ट हो जानेपर रावणके भेजे हुए इन्द्रजित्ने युद्धमें अत्यन्त भयंकर नागास्त्रोंद्वारा दोनों दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मणको बाँध लिया। तत्पश्चात् विनतानन्दन महात्मा गरुड़ने आकर उन दोनों भाइयोंको नागपाशसे मुक्त किया। तब विभीषणने आठ घण्टावाली विशाल शक्ति हाथमें लेकर उसे अभिमन्त्रित करके प्रहस्तके मस्तकपर चलाया। उस वज्रकी भाँति गिरती हुई शक्तिने राक्षसका मस्तक काट लिया, जिससे वह आँधीसे गिराये हुए वृक्षकी भाँति दिखायी देने लगा। राक्षस प्रहस्तको युद्धमें मारा गया देख धूम्राक्षने बड़े वेगसे वानरोंपर आक्रमण किया। वानर भाग चले। वानर-सेनाको भागते हुए देख पवनकुमार हनुमान्जीने धूम्राक्षको शीघ्र ही मार डाला। धूम्राक्षको मारा गया देख मरनेसे बचे हुए निशाचरोंने सब समाचार राजा रावणको बताया। तब रावणने कुम्भकर्णको सोतेसे जगाया और उसे युद्ध करनेके लिये भेजा। युद्धमें आये हुए कुम्भकर्णको लक्ष्मणजीने कुपित होकर ब्रह्मास्त्रसे मारा, जिससे वह प्राणहीन होकर धरतीपर गिर पड़ा। तब वहाँ दूषण नामक राक्षसके दो छोटे भाई वज्रवेग और प्रमाथी, जो युद्धमें रावणके समान ही बली थे, आये और हनुमान् एवं अंगदके हाथों मारे गये। विश्वकर्माके पुत्र नलने वज्रदंष्ट्रको तथा कुमुद नामक श्रेष्ठ वानरने अकम्पनको मारा। लक्ष्मणजीने अतिकाय और त्रिशिराका वध किया। सुग्रीवने देवान्तक तथा

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नरान्तकको मौतके घाट उतारा। हनुमान्‌जीने कुम्भकर्णके दोनों पुत्रोंको मार डाला। विभीषणने खरके पुत्र मकराक्षका वध किया।

तदनन्तर रावणने इन्द्रजित्‌को युद्धके लिये भेजा। इन्द्रजित्‌ने दोनों भाई राम और लक्ष्मणको मोहित किया। इतनेमें ही अंगदने उसके रथके घोड़ोंको मार डाला। वाहनशून्य हो जानेपर वह आकाशमें स्थित हो गया। उसके प्रहारसे घायल हुए कुमुद, अंगद, सुग्रीव, नल और जाम्बवान् आदिके साथ प्रायः सभी वानर धरतीपर गिर पड़े। इस प्रकार सेनासहित श्रीराम और लक्ष्मणको युद्धमें घायल करके महाबली मेघनाद आकाशमें अदृश्य हो गया। तब विभीषणने इक्ष्वाकुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजीसे बारंबार प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा—'प्रभो! कुबेरकी आज्ञासे एक गुह्यक आपकी सेवामें यह दिव्य जल लेकर उपस्थित हुआ है, महाराज ! इसे कुबेर अन्तर्धान-विद्यासे अदृश्य हुए प्राणियोंको देखनेके लिये आपको अर्पित करते हैं। इसको आँखमें लगा लेनेसे आप आकाशमें अदृश्य हुए प्राणियोंको भी देख सकेंगे और जिसके लिये आप यह जल देंगे, वह भी उन प्राणियोंको देख सकेगा।' 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजीने आदरपूर्वक उस जलको ग्रहण किया और उससे अपने नेत्रोंको धोया। तत्पश्चात् महाबली लक्ष्मण, सुग्रीव, जाम्बवान्, हनुमान्, अंगद, मैंद, द्विविद, नील तथा अन्य जो वानर थे, उन सबने श्रीरामचन्द्रजीके दिये हुए जलसे अपने-अपने नेत्र धो लिये। तब उन्होंने आकाशमें छिपे हुए वीरवर मेघनादको देखा। दृष्टि पड़ जानेपर सुमित्रानन्दन लक्ष्मणने उसपर आक्रमण किया। तब लक्ष्मण और मेघनादमें अत्यन्त विचित्र तथा आश्चर्यजनक युद्ध हुआ। तीसरे दिन बड़े प्रयाससे महाबली लक्ष्मणके द्वारा मेघनाद युद्धमें मारा गया।

अपने प्रिय पुत्रके मारे जानेपर रावणको बड़ा क्रोध हुआ। वह बहुत-सी सेना साथ ले रथपर बैठकर नगरसे बाहर निकला। तब इन्द्रसारथि मातलि हरे घोड़े जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी रथके साथ श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें उपस्थित हुए। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने इन्द्रके भेजे हुए उस रथपर सवार हो युद्धमें ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके राक्षसराज रावणके सभी मस्तक काट डाले। रावणके मारे जानेपर देवताओं और ऋषियोंने दशरथनन्दन श्रीरामको आशीर्वाद दे उनकी जय-जयकार की और अत्यन्त सन्तुष्ट हो भगवान्‌का स्तवन किया। सिद्धों तथा विद्याधरोंने कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीपर फूलोंकी वर्षा की। तब श्रीरामचन्द्रजी उन देवताओं, वानर सैनिकों तथा सीता और लक्ष्मणके साथ लंकामें विभीषणको राजाके पदपर अभिषिक्त करके पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो गन्धमादन पर्वतपर आये। गन्धमादन पर्वतपर विदेहनन्दिनी सीताकी अग्निपरीक्षाद्वारा शुद्धि की गयी। तदनन्तर दण्डकारण्यमें निवास करनेवाले मुनि अगस्त्यजीको आगे करके कमलनयन जानकी-वल्लभ श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये आये और उनकी स्तुति करने लगे।

मुनि बोले—सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले आप भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार है। आपने इस संसारको रावणसे शून्य करनेके लिये अवतार लिया है, आपको नमस्कार है। ताड़काका संहार और विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षा करनेवाले आपको नमस्कार है। मारीचको जीतनेवाले, सुबाहुका प्राण हरण करनेवाले श्रीराम ! आपको नमस्कार है। आपके चरणारविन्दोंकी धूलि अहल्याको मुक्ति देनेवाली है, आपने भगवान् शंकरके धनुषको लीलापूर्वक भंग किया है, आपको नमस्कार है। मिथिलेशकुमारी सीताके पाणिग्रहण-सम्बन्धी उत्सवसे सुशोभित होनेवाले आपको नमस्कार है। रेणुकानन्दन परशुरामजीको पराजित करनेवाले आपको नमस्कार है। कैकेयीके दो

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वरदानोंसे विवश हुए पिताके वचनको सत्य करनेके लिये सीता और लक्ष्मणके साथ वनकी यात्रा करनेवाले आपको नमस्कार है। भरतकी प्रार्थनापर उन्हें अपने चरणोंकी युगल पादुका समर्पित करनेवाले आपको नमस्कार है। शरभंग मुनिको अपने परम धामकी प्राप्ति करानेवाले आपको नमस्कार है। विराध राक्षसका संहार करनेवाले तथा गृध्रराज जटायुको अपना सखा बनानेवाले आपको नमस्कार है। मायासे मृगका रूप धारण करके आये हुए महाक्रूर मारीचके शरीरको अपने बाणोंसे विदीर्ण करनेवाले आपको नमस्कार है। रावणसे हरी गयी सीताको छुड़ानेके लिये जिन्होंने युद्धमें अपने शरीरका त्याग कर दिया, उन जटायुको अपने हाथसे दाह-संस्कार करके कैवल्य मोक्ष प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। कबन्धका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है। शबरीने आपके चरणारविन्दोंका पूजन किया है, आपने सुग्रीवके साथ मैत्री जोड़ी है तथा बालि नामक वानरका वध किया है, आपको नमस्कार है। वरुणालय समुद्रमें सेतुनिर्माण करनेवाले आपको नमस्कार है। समस्त राक्षसोंका संहार तथा रावणका प्राण हरण करनेवाले आपको नमस्कार है। आपके चरणारविन्द संसारसागरसे पार उतारनेके लिये जहाज हैं, आपको नमस्कार है। भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप आप श्रीरघुनाथजीको नमस्कार है। जगत्के अभ्युदयके कारणभूत आप श्रीरामभद्रको नमस्कार है। राम आदि पवित्र नामोंका जप करनेवाले मनुष्योंके पाप हर लेनेवाले आपको नमस्कार है। आप सब लोकोंकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। करुणामूर्ति ! आपको नमस्कार है। भक्तोंकी रक्षाके व्रतकी दीक्षा लेनेवाले प्रभो ! आपको नमस्कार है। सीतासहित आपको नमस्कार है। विभीषणको सुख देनेवाले श्रीराम ! आपने लंकापति रावणका वध करके सम्पूर्ण जगत्की रक्षा की है, आपको नमस्कार है। जगन्नाथ ! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। जानकीपते ! हम सबका पालन कीजिये।

इस प्रकार स्तुति करके सब मुनि चुप हो गये।

सूतजी कहते हैं— मुनियोंद्वारा किये हुए श्रीरामचन्द्रजीके इस स्तोत्रका जो भक्तिपूर्वक तीनों समय पाठ करता है, वह भोग और मोक्षको प्राप्त करता है। इस स्तोत्रका पाठ करनेसे भूत-वेताल भाग जाते हैं, रोग दूर होते हैं और पापसमूहोंका नाश हो जाता है।

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़ प्रणाम करके मुनियोंसे कहा—मुनिवरो ! जो सदा आत्मलाभसे ही सन्तुष्ट, सम्पूर्ण भूतोंके सुहृद्, अहंकारशून्य, शान्त और ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) हैं, उन साधु-महात्माओंको मैं भक्तियुक्त चित्तसे प्रणाम करता हूँ। मैं ब्राह्मणोंका हितकारी—ब्रह्मण्यदेव हूँ; इसलिये सदा ब्राह्मणोंका सेवन करता हूँ। इस समय आपलोगोंसे मैं कुछ पूछता हूँ, आप उसे विचारकर उत्तर दें। ब्राह्मणो ! रावणके वधसे मुझे जो पाप लगा है, उसका प्रायश्चित्त क्या है ? यह मुझे बताइये।

मुनि बोले— सत्यकी रक्षाका व्रत लेनेवाले जगन्नाथ ! आप समस्त संसारकी रक्षाका भार वहन करनेवाले हैं। सम्पूर्ण जगत्के उपकारके लिये यहाँ शिवजीकी आराधना कीजिये। गन्धमादन पर्वतका यह शिखर अतिशय पुण्यमय तथा मोक्ष देनेवाला है। आप यहाँ लोकसंग्रहके लिये शिवलिंगकी प्रतिष्ठा कीजिये। इससे रावणके मारनेसे होनेवाला दोष भी दूर हो जायगा। प्रभो ! गन्धमादन पर्वतपर आपके द्वारा जिस शिवलिंगकी स्थापना होगी, उसका दर्शन मनुष्योंको काशी-विश्वनाथके दर्शनसे कोटिगुना अधिक फल देनेवाला होगा। साथ ही वह शिवलिंग संसारमें आपके ही नामसे ख्यातिलाभ करेगा। इसलिये रघुनाथजी ! आप शिवलिंग-स्थापनाके कार्यमें विलम्ब न करें।

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मुनियोंके ये वचन सुनकर जगत्पति श्रीरामचन्द्रजीने लिंगस्थापनाके लिये पुण्यकाल निश्चित किया, जो दो ही मुहूर्त्तमें आनेवाला था। उसे निश्चित करके उन्होंने हनुमान्जीको शिवलिंग ले आनेके लिये कैलास पर्वतपर भेजा। हनुमान्जी बड़े पराक्रमी थे, उन्होंने दो मुहूर्त्तका पुण्यकाल जानकर भी भुजाओंपर ताल ठोंकी। वे सब देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके देखते-देखते बड़े वेगसे ऊपरको उड़े और आकाशमार्गको लाँघते हुए कैलास पर्वतपर जा पहुँचे। वहाँ उन्हें लिङ्गरूपधारी महादेवजीका दर्शन नहीं हुआ। तब उन्होंने महादेवजीको प्रसन्न किया और उनकी कृपासे शिवलिंगको प्राप्त किया। इतनेमें ही वहाँ तत्त्वदर्शी मुनियोंने जब यह देखा कि हनुमान्जी अभी नहीं आये तथा स्थापनाका मुहूर्त्त अब बीतना ही चाहता है, तब उन्होंने परम बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—'महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी! अब तो पुण्यकाल बीत रहा है, अतः जानकीने जो लीलापूर्वक बालूका शिवलिंगका बनाया है, उसीको इस समय स्थापित कर दीजिये।' यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने शीघ्रतापूर्वक श्रीजानकीजी तथा मुनियोंके सहित मंगलाचार आरम्भ किया और ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिको बुधवार और हस्त नक्षत्रके योगमें गद करण, आनन्द और व्यतीपात योग, कन्याराशिके चन्द्रमा तथा वृषराशिके सूर्यमें परम पुण्यमय उपयुक्त दस योगोंकी उपस्थितिमें गन्धमादन पर्वतपर सेतुकी सीमामें लिंगरूपधारी भगवान् शिवकी स्थापना की। उस समय लिंगमें पार्वतीसहित भगवान् शंकर प्रत्यक्ष प्रकट हो गये थे। उनके ललाटपर चन्द्रमाकी कला और साक्षात् गंगा शोभा पा रही थीं। भगवान् साम्बशिवने सब लोगोंको शरण देनेवाले महात्मा रघुनाथजीको इस प्रकार वरदान दिया—'राघवेन्द्र! आपके द्वारा यहाँ स्थापित किये गये शिवलिंगका जो दर्शन करेंगे, वे महापातकोंसे युक्त होंगे, तो भी उनके पापोंका नाश हो जायगा। जैसे धनुष्कोटिमें गोता लगानेसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार इस 'रामेश्वर लिंग'के दर्शनसे महापातक भी नष्ट हो जायँगे।'

तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने भगवान् रामेश्वरके सामने नन्दिकेश्वरको स्थापित किया और अपने धनुषकी कोटिसे रामेश्वर शिवके अभिषेकके लिये धरती फोड़कर एक कूप तैयार किया। फिर उससे जल लेकर भगवान् शंकरको स्नान कराया। वही पुण्यमय तीर्थ 'कोटितीर्थ' के नामसे विख्यात हुआ। मुनिवरो! कोटितीर्थकी महिमाका वर्णन पहले किया जा चुका है।


श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा हनुमान्जीको ज्ञानोपदेश

**श्रीसूतजी कहते हैं—**इस प्रकार अनायास ही सब कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा उस शिवलिंगकी प्रतिष्ठा हो जानेपर पवनपुत्र हनुमान्जी एक उत्तम शिवलिंग लेकर आ पहुँचे। आकर उन्होंने दशरथनन्दन वीरवर श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया। फिर क्रमशः सीता, लक्ष्मण तथा सुग्रीवको भी मस्तक झुकाया। हनुमान्जीने देखा रघुनाथजी सीताजीके बनाये हुए बालुकामय शिवलिंगका मुनियोंके साथ पूजन कर रहे हैं। तब वे खिन्न होकर बोले—'भगवन्! कैलास पहुँचनेपर वहाँ मुझे भगवान् शंकरका दर्शन नहीं हुआ। तब मैंने तपस्याद्वारा उन्हें प्रसन्न किया और उनकी कृपासे शिवलिंग प्राप्त होनेपर मैं तुरंत यहाँ लौट आया हूँ। तबतक आपने दूसरे ही बालुकामय शिवलिंगकी स्थापना कर ली और अब मुनियों, देवताओं तथा गन्धर्वोंके साथ

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उसीकी पूजा करते हैं। मैं जो कैलास पर्वतसे इस शिवलिंगको लेकर आया सो व्यर्थ ही हुआ। अब मैं इस शिवलिंगको क्या करूँ?'

**श्रीरामचन्द्रजी बोले—**कपे! इस संसारमें जो जन्म ले चुके हैं, जो जन्म लेनेवाले हैं और जो मर चुके हैं, उन सबके तथा अपने और पराये सब कार्योंको मैं भलीभाँति जानता हूँ। जीव अपने कर्मके अनुसार अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही मरता है। अपने कर्मोंके अनुसार नरकमें भी वह अकेला ही जाता है। वानरश्रेष्ठ! तत्त्वज्ञानमें बाधा उपस्थित करनेवाले इस शोकको अपने मनमें क्यों स्थान देते हो। तत्त्वज्ञानमें ही सदा स्थित रहो। यह आत्मा स्वयंप्रकाश है, तुम सदा आत्माके इसी स्वरूपका चिन्तन करो। देह आदिमें ममता त्याग दो, सदा धर्मका आश्रय लो, साधु पुरुषोंका सेवन करो, सम्पूर्ण इन्द्रियोंका दमन करो, दूसरोंके दोषकी चर्चासे दूर रहो एवं शिव और विष्णु आदि देवताओंकी सदा पूजा करो। सर्वदा सत्य बोलो, शोक छोड़कर आत्मा और परमात्माकी एकताका अनुभव करो। इस संसारमें भ्रम भी यथार्थकी भाँति प्रतीत होता है, कहीं शोभनमें अशोभनका भ्रम होता है और कहीं अशोभनमें शोभनका। यह सब मोहके वैभवसे ही होता है। भ्रान्त मनुष्योंका विभिन्न विषयोंमें राग हो जाता है। राग और द्वेषके बलसे बँधकर वे धर्म और अधर्मके वशीभूत होते हैं तथा उन्हींके अनुसार देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि योनियोंमें तथा नरकोंमें पड़ते हैं। चन्दन, अगर और कपूर आदि पदार्थ अत्यन्त शोभन हैं, परंतु जिसके स्पर्शसे ये भी मलरूप हो जाते हैं, वह शरीर सुखस्वरूप कैसे माना जा सकता है? जिसके सम्पर्कसे अत्यन्त सुन्दर भक्ष्य-भोजन आदि सब उत्तम पदार्थ विष्ठारूपमें बदल जाते हैं, वह शरीर सुखरूप कैसे हो सकता है? जिसके संगसे सुगन्धित एवं शीतल जल मूत्ररूप हो जाता है, उस शरीरको शोभन कैसे कहा जा सकता है? कपे! तुम्हीं बताओ, जिसके संसर्गमें आनेपर अत्यन्त सफेद एवं धुले हुए वस्त्र भी पसीने आदिके लगनेसे मैले हो जाते हैं, वह शरीर कैसे शोभन माना जा सकता है? वायुनन्दन! मुझसे परमार्थकी बात सुनो। यह संसार एक गड्ढेके समान है। इसमें कुछ भी सुख नहीं। यहाँ पहले तो जीवका जन्म होता है, तत्पश्चात् उसकी बाल्यावस्था रहती है, फिर वह जवान होता है। उसके बाद वह बुढ़ापा भोगता है। तदनन्तर मृत्युको प्राप्त होता है और मृत्युके बाद पुनः जन्मका कष्ट भोगता है। इस प्रकार अज्ञानके प्रभावसे ही मनुष्य दुःख पाता है और अज्ञानकी निवृत्ति हो जानेपर उसे उत्तम सुखकी प्राप्ति होती है। अज्ञानकी निवृत्ति ज्ञानसे ही होती है, कर्मसे नहीं। ज्ञान परब्रह्म परमात्माका नाम है। वेदान्तवाक्यके श्रवण और मननसे जो ज्ञान होता है, वह विरक्त पुरुषको ही होता है, दूसरेको नहीं। श्रेष्ठ अधिकारीको गुरुदेवकी कृपासे भी ज्ञान हो जाता है—यह सत्य है। मनुष्यके हृदयमें जो कामनाएँ हैं, वे सब-की-सब जब छूट जाती हैं, तब वह जीवन्मुक्त होकर इसी जीवनमें परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है। क्रूर काल जागते, सोते, खाते और ठहरते समय सदा ही इस जीवको अपनी ओर खींचता रहता है। संग्रहका अन्त विनाश है, अधिक ऊँचे चढ़नेका अन्त नीचे गिरना है, संयोगका अन्त वियोग और जीवनका अन्त मरण है*। जैसे पके हुए फलोंको गिरनेके


* सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं च जीवितम्॥
(स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४५। ४१)

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५८१

सिवा और कोई भय नहीं है, वैसे ही जन्म लेनेवाले मनुष्योंको मृत्युके सिवा और कोई भय नहीं है। जैसे सुदृढ़ खम्भोंवाला गृह सुदीर्घकालके बाद जीर्ण होनेपर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जराजीर्ण होकर मृत्युके अधीन हो नष्ट हो जाता है। दिन और रात बीतते चले जा रहे हैं। इससे मनुष्योंकी आयु नष्ट होती है। इस दशामें तुम अपनी आत्माके लिये शोक करो। दूसरी किसी बातके लिये क्यों शोक करते हो? कपीश्वर! कोई खड़ा हो या दौड़ता हो, उसकी आयुका प्रतिक्षण नाश हो रहा है। मृत्यु साथ-साथ चलती है, साथ ही बैठती है और दूर देशमें साथ-साथ जाकर पुनः साथ ही लौट आती है*। शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं, सिरके बाल सफेद हो गये और वृद्धावस्था एवं दमा और खाँसीसे देह शिथिल होती जाती है। कपिश्रेष्ठ! जैसे समुद्रमें बहते हुए दो काठ एक-दूसरेसे मिलकर फिर विलग हो जाते हैं, उसी प्रकार कालयोगसे मनुष्योंका एक-दूसरेके साथ संयोग और वियोग होता है। इसी प्रकार स्त्री, पुत्र, भाई, क्षेत्र और धन—ये सब कभी कुछ कालके लिये एकत्र होते और फिर अन्यत्र चले जाते हैं। जैसे कोई पथिक राह चलते हुए किसी दूसरे पथिकसे कहता है कि 'ठहरिये मैं भी आपके साथ चलूँगा' और इस प्रकार दोनों कुछ कालतक साथ हो जाते हैं और फिर अलग-अलग चले जाते हैं, कपे! इसी प्रकार स्त्री और पुत्र आदिका समागम नश्वर है। शरीरके उत्पन्न होनेके साथ ही निश्चय ही मृत्यु भी उत्पन्न होती है। इस अवश्यम्भावी मृत्युको टालनेका कोई उपाय नहीं है। वत्स! इस शरीरका अन्त हो जानेपर देहाभिमानी जीव अपने कर्मकी गतिके अनुसार दूसरा शरीर धारण कर लेता है। वानर! प्राणियोंका सदा एक स्थानपर निवास नहीं होता। अपने-अपने कर्मवश सभी जीव एक-दूसरेसे विलग हो जाते हैं।

कपिश्रेष्ठ! जीवोंके शरीर जिस प्रकार उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, उस प्रकार आत्माका जन्म और मरण नहीं होता। अंजनानन्दन! तुम शोकरहित अद्वैत ज्ञानमय सत्स्वरूप निर्मल परब्रह्म परमात्माका दिन-रात चिन्तन करो। ऐसी दृष्टि होनेपर तुम्हारा किया हुआ प्रत्येक कर्म मेरा किया हुआ है और मेरा किया हुआ प्रत्येक कर्म तुम्हारा किया हुआ है। इसलिये कपे! मैंने जो शिवलिंगकी स्थापना की है, वह तुमने ही की है—ऐसा समझना चाहिये। शिवलिंगस्थापनका पुण्यकाल बीता जा रहा था, इसलिये मैंने सीताजीके बनाये हुए बालुकामय शिवलिंगको यहाँ स्थापित किया है। अतः तुम कोप और दुःख न करो। आज शुभ दिन है। इसमें कैलाससे लाये हुए शिवलिंगको तुम्हीं स्थापित करो। यह लिंग तीनों लोकोंमें तुम्हारे नामसे प्रसिद्ध होगा। पहले हनुमदीश्वरका दर्शन करके तब रामेश्वरका दर्शन होगा। कपे! तुमने ब्रह्मराक्षसोंके समुदायका वध किया है, इसलिये अपने नामसे शिवलिंगकी स्थापना करनेपर तुम उस पापसे छूट सकोगे। यह हनुमन्नामक शिवलिंग साक्षात् भगवान् शिवका दिया हुआ है। इसका दर्शन करके जो रामेश्वर शिवका दर्शन करेगा, वह कृतकृत्य हो जायगा।


* नश्यत्यायुः स्थितस्यापि धावतोऽपि कपीश्वर।
सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति। चरित्वा दूरदेशं च सह मृत्युर्निवर्तते॥
(स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४५। ४५-४६)

५८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हनुमान्‌जीद्वारा भगवान् श्रीराम और सीताका स्तवन तथा अपने लाये हुए शिवलिंगका स्थापन

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर परम दयालु दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर हनुमान्‌जीने पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिरकर साष्टांग प्रणाम किया और हाथ जोड़कर श्रवण-सुखद स्तोत्रोंद्वारा भगवान् जानकीनाथका स्तवन किया।

हनुमान्‌जी बोले—सबकी उत्पत्तिके आदिकारण सर्वव्यापी श्रीहरिस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार है। आदिदेव पुराणपुरुष भगवान् गदाधरको नमस्कार है। पुष्पकके आसनपर नित्य विराजमान होनेवाले महात्मा श्रीरघुनाथजीको नमस्कार है। प्रभो! हर्षमें भरे हुए वानरोंका समुदाय आपके युगल चरणारविन्दोंकी सेवा करता है, आपको नमस्कार है। राक्षसराज रावणको पीस डालनेवाले तथा सम्पूर्ण जगत्‌का अभीष्ट सिद्ध करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार है। आपके सहस्रों मस्तक, सहस्रों चरण और सहस्रों नेत्र हैं, आप विशुद्ध विष्णुस्वरूप राघवेन्द्रको नमस्कार है। आप भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाले तथा सीताके प्राणवल्लभ हैं, आपको नमस्कार है। दैत्यराज हिरण्यकशिपुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले आप नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। अपनी दाढ़ोंपर पृथ्वीको उठानेवाले भगवान् वराह! आपको नमस्कार है। बलिके यज्ञको भंग करनेवाले आप भगवान् त्रिविक्रमको नमस्कार है। वामनरूपधारी भगवान्‌को नमस्कार है। अपनी पीठपर महान् मन्दराचल धारण करनेवाले भगवान् कच्छपको नमस्कार है। तीनों वेदोंकी सुरक्षा करनेवाले मत्स्यरूपधारी भगवान्‌को नमस्कार है। क्षत्रियोंको अन्त करनेवाले परशुरामरूपी रामको नमस्कार है। राक्षसोंका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। राघवेन्द्रका रूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। महादेवजीके महान् भयंकर महाधनुषको भंग करनेवाले आपको नमस्कार है। क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले क्रूर परशुरामको भी त्रास देनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन्! आप अहल्याका सन्ताप और महादेवजीका चाप हरनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। दस हजार हाथियोंका बल रखनेवाली ताड़काके शरीरका अन्त करनेवाले आपको नमस्कार है। पत्थरके समान कठोर और चौड़ी बालिकी छाती छेद डालनेवाले आपको नमस्कार है। आप मायामय मृगका नाश करनेवाले तथा अज्ञानको हर लेनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। दशरथजीके दुःखरूपी समुद्रको शोष लेनेके लिये आप मूर्तिमान् अगस्त्य हैं, आपको नमस्कार है। अनन्त उत्ताल तरंगोंसे उद्वेलित समुद्रका भी दर्प दलन करनेवाले आपको नमस्कार है। मिथिलेशनन्दिनी सीताके हृदयकमलको विकसित करनेवाले सूर्यरूप आप लोकसाक्षी श्रीहरिको नमस्कार है। हरे! आप राजाओंके भी राजा और जानकीजीके प्राणवल्लभ हैं, आपको नमस्कार है। कमलनयन! आप ही तारक ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है। आप ही योगियोंके मनको रमानेवाले 'राम' हैं। राम होते हुए चन्द्रमाके समान आह्लाद प्रदान करनेके कारण 'रामचन्द्र' हैं। सबसे श्रेष्ठ और सुखस्वरूप हैं। आप विश्वामित्रजीके प्रिय हैं, खर नामक राक्षसका हृदय विदीर्ण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। भक्तोंको अभयदान देनेवाले देवदेवेश्वर! प्रसन्न होइये। करुणासिन्धु श्रीरामचन्द्र! आपको नमस्कार है, मेरी रक्षा कीजिये। वेदवाणीके भी अगोचर राघवेन्द्र! मेरी रक्षा कीजिये। श्रीराम! कृपा करके मुझे उबारिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। रघुवीर! मेरे महान् मोहको इस समय दूर कीजिये। रघुनन्दन! स्नान, आचमन, भोजन, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि

हनुमान्जीके द्वारा भगवान् श्रीराम और सीताका स्तवन

५८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सभी क्रियाओं और सब अवस्थाओंमें आप मेरी रक्षा कीजिये। तीनों लोकोंमें कौन ऐसा पुरुष है, जो आपकी महिमाका वर्णन या स्तवन करनेमें समर्थ हो सकता है। रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम! आप ही अपनी महिमाको जानते हैं।

करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजीकी इस प्रकार स्तुति करके वायुपुत्र हनुमान्ने भक्तियुक्त चित्तसे सीताजीका भी स्तवन किया। 'जनकनन्दिनी! आपको नमस्कार करता हूँ। आप सब पापोंका नाश तथा दारिद्र्यका संहार करनेवाली हैं। भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाली भी आप ही हैं। राघवेन्द्र श्रीरामको आनन्द प्रदान करनेवाली विदेहराज जनककी लाड़िली श्रीकिशोरीजीको मैं प्रणाम करता हूँ। आप पृथ्वीकी कन्या और विद्या हैं, कल्याणमयी प्रकृति भी आप ही हैं। रावणके ऐश्वर्यका संहार तथा भक्तोंके अभीष्टका दान करनेवाली सरस्वतीरूपा भगवती सीताको मैं नमस्कार करता हूँ। पतिव्रताओंमें अग्रगण्य आप श्रीजनकदुलारीको मैं प्रणाम करता हूँ। आप सबपर अनुग्रह करनेवाली समृद्धि, पापरहित और श्रीविष्णुप्रिया लक्ष्मी हैं। आप ही आत्मविद्या, वेदत्रयी तथा पार्वतीस्वरूपा हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आप ही क्षीरसागरकी कन्या और चन्द्रमाकी भगिनी कल्याणमयी महालक्ष्मी हैं, जो भक्तोंपर कृपाप्रसादका प्रसाद करनेके लिये सदा उत्सुक रहती हैं, आप सर्वांगसुन्दरी सीताको मैं प्रणाम करता हूँ। आप धर्मका आश्रय और करुणामयी वेदमाता गायत्री हैं, आपको मैं प्रणाम करता हूँ। आपका कमलवनमें निवास है, आप ही हाथमें कमल धारण करनेवाली तथा भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें निवास करनेवाली लक्ष्मी हैं, चन्द्रमण्डलमें भी आपका निवास है, आप चन्द्रमुखी सीतादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। आप श्रीरघुनन्दनकी आह्लादमयी शक्ति हैं, कल्याणमयी सिद्धि हैं और कल्याणकारिणी सती हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी परम प्रियतमा जगदम्बा जानकीको मैं प्रणाम करता हूँ। सर्वांगसुन्दरी सीताका मैं अपने हृदयमें सदैव चिन्तन करता हूँ।'

श्रीसूतजी कहते हैं—द्विजवरो! इस प्रकार हनुमान्जी भक्तिपूर्वक श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजीकी स्तुति करके आनन्दके आँसू बहाते हुए मौन हो गये। जो वायुपुत्र हनुमान्जीद्वारा वर्णित श्रीराम और सीताके इस पापनाशक स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करता है, वह सदा मनोवांछित महान् ऐश्वर्यका उपभोग करता है। अनेक क्षेत्र, धान्य, दूध देनेवाली गौएँ, आयु, विद्या, मनोरमा भार्या तथा श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करता है। इस स्तोत्रका एक बार भी पाठ करनेवाला मनुष्य इन सब वस्तुओंको निःसन्देह प्राप्त कर लेता है। इसके पाठसे मनुष्य नरकमें नहीं पड़ता है, उसके ब्रह्महत्या आदि बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। वह सब पापोंसे मुक्त हो देहावसान होनेपर मोक्ष पा लेता है।

तदनन्तर वायुपुत्र हनुमान्जीने श्रीरामेश्वरके उत्तर भागमें भगवान् रामचन्द्रजीकी आज्ञाके अनुसार अपने द्वारा लाये हुए शिवलिंगको स्थापित किया।


भगवान् रामेश्वरके प्रभावसे राजा शंकरका ब्रह्महत्या और स्त्रीहत्याके पापसे उद्धार

**श्रीसूतजी कहते हैं—**मुनिवरो! प्राचीन कालमें पाण्ड्य देशमें शंकर नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े ब्राह्मणभक्त, सत्यप्रतिज्ञ, यज्ञनिष्ठ तथा धर्मात्मा थे। चारों वर्णों और आश्रमोंका धर्मपूर्वक पालन करते थे। वे भगवान् विष्णु और शिवके समानरूपसे उपासक थे। महात्मा ब्राह्मणोंको

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५८५ ---|---

बड़े-बड़े दान देते थे। एक दिन बुद्धिमान् राजा शंकर शिकार खेलनेके लिये तपोवनमें गये और वहाँ दुर्गम एवं रमणीय प्रदेशों, पर्वतों तथा गुफाओंमें भ्रमण करने लगे। वनके एक भागमें व्याघ्रचर्मधारी, शान्त, जितेन्द्रिय एवं मनको वशमें रखनेवाले एक मुनि गुफाके भीतर निवास करते थे। राजाने दूरसे उन्हें देखकर व्याघ्र ही समझा और बड़े वेगसे झुकी हुई गाँठवाले बाणका प्रहार करके उन्हें मार डाला। राजाके उस बाणने पतिके पास बैठी हुई पतिव्रता मुनिपत्नीका भी वध कर डाला। माता और पिता दोनोंको मारा गया देख उनका पुत्र अत्यन्त दुःखसे पीड़ित होकर कातरभावसे वनमें रोने और विलाप करने लगा—‘हा तात! हा माता! तुम दोनों मुझे छोड़कर कहाँ चले गये। पिताजी! अब मुझे वेद-शास्त्र कौन पढ़ायेगा? मा! कौन मुझे शिक्षाके साथ-साथ भोजन देगी। हाय तात! आप तो परलोकगामी हो गये। अब मुझे सदाचारकी शिक्षा कौन देगा? हाय! आज किस पापीने अपने बाणोंसे बिना किसी अपराधके आप दोनोंको मार डाला! आप ही दोनों मेरे गुरु और मेरे प्राण थे, सदा तपस्यामें लगे रहते थे, तो भी न जाने किस पापीके हाथसे आप मारे गये?’

इस प्रकार कहकर उन दोनों दम्पतिका पुत्र फूट-फूटकर रोने लगा। उसका प्रलाप सुनकर वनमें विचरनेवाले राजा शंकर तुरंत ही उस शब्दकी ओर लक्ष्य करके उस कन्दराके समीप जा पहुँचे। उस वनके रहनेवाले मुनि भी उस आश्रमपर एकत्रित हो गये। मुनियोंने बाणसे मरे हुए मुनि और उनकी पत्नीको देखा। पासमें धनुष धारण किये हुए राजा शंकरपर भी दृष्टिपात किया तथा माता-पिताके लिये विलपते हुए उस मुनिकुमारको भी देखा। उसे देखकर वे अत्यन्त व्याकुल हो उठे और ‘मत रोओ’ ऐसा कहते हुए उस कातर बालकको धैर्य बँधाने लगे।

मुनि बोले—बेटा! धनी, दरिद्र, मूर्ख, पण्डित, मोटे अथवा पतले, सभी जीवोंके प्रति यमराजका समान बर्ताव होता है। कोई वनमें रहता हो, या नगर और गाँवमें; पर्वतपर रहता हो, या दूसरे किसी स्थानमें— सभी जन्तुओंको एक दिन मृत्युके वशमें जाना पड़ता है। वत्स! गर्भमें रहनेवाले, जन्म ग्रहण कर चुकनेवाले, बालक, जवान और बूढ़े—सभी जीवोंको यमलोककी यात्रा करनी पड़ती है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी सबको समय आनेपर यह शरीर त्यागना पड़ता है। महामते! द्विजपुत्र! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और वर्णसंकर सबको एक दिन यमलोक जाना पड़ता है। देवता, मुनि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, राक्षस तथा अन्य सब प्राणी भी नाशको प्राप्त होते हैं। इसलिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। अद्वितीय सच्चिदानन्दस्वरूप जो उपनिषत्प्रतिपादित ब्रह्म है, उसका जन्म-मरण और वृद्धिको प्राप्त होना नहीं बनता। यह नौ द्वारोंवाला शरीर मल-मूत्रका भाण्ड है, पीब और रक्तका घर है। पानीके बुलबुलेके समान यह क्षणभंगुर है एवं इसमें कीड़ोंका ढेर (कीटाणुओंका समुदाय) भरा है। काम, क्रोध, भय, द्रोह, मोह और मात्सर्यका एकमात्र कारण यह शरीर ही है। मल और मूत्रका यह एकमात्र भाजन है। ऐसे घृणित शरीरमें जो सुन्दर एवं श्रेष्ठ बुद्धि रखता है, वह मूर्ख है तथा वह खोटी बुद्धिवाला है। जैसे अनेक छेदवाले घड़ेमें पानी नहीं ठहरता, उसी प्रकार अनेक छेदोंवाले इस अपवित्र शरीरमें प्राणवायुकी स्थिति दीर्घकालतक कैसे हो सकती है? अतः तुम अपने पिता और माताके लिये शोक न करो। वे दोनों अपने कर्मवश इस घरको छोड़कर कहीं चले गये। तुम अपने कर्मवश इस भूतलपर वर्तमान हो। जब तुम्हारे प्रारब्धकर्मका क्षय होगा, तब तुम भी मर जाओगे। तब उनके लिये शोक क्या

५८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करना है? क्या मरनेवाला प्रेत मरे हुए प्रेतके लिये शोक करे? तुम्हारे माता और पिता जब उत्पन्न हुए थे, उस समय तुम्हारा जन्म नहीं हुआ था। अतः तुमसे उनकी गति भिन्न है। यदि तुम्हारी और उनकी समान गति होती, तो तुम भी उन्हींके साथ चले जाते। जिस बाणसे वे मरे हैं, उसीसे तुम भी मर गये होते और वे मरकर जहाँ गये हैं, वहीं तुम भी पहुँच जाते। ऐसा नहीं हुआ इससे सिद्ध है कि तुम्हारी और उनकी समान गति नहीं है। अतः उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये। मरे हुए प्राणियोंके भाई-बन्धु जो इस भूतलपर आँसू बहाते हैं, उन आँसुओंको मरे हुए प्रेत परलोकमें पीते हैं*। अतः शोक छोड़कर एकाग्रचित्त हो धैर्य धारण करो और वैदिक रीतिसे माता-पिताका प्रेतकार्य करो। तुम्हारे पिता और माता बाणके आघातसे मरे हैं, अतः उस दोषकी शान्तिके लिये इनकी अस्थियाँ लेकर रामेश्वर शिवके क्षेत्रमें मुक्तिदायक रामसेतुमें स्थापित करो तथा सपिण्डीकरण आदि श्राद्ध भी वहीं करो। इससे उनके दुर्मृत्युजनित दोषकी शान्ति हो जायगी।

मुनियोंके ऐसा कहनेपर शाकल्यपुत्र जांगलने माता-पिताके सब अन्त्येष्टि संस्कार किये। तत्पश्चात् दूसरे दिन उनकी अस्थियाँ लेकर वे हालास्य क्षेत्रमें गये। हालास्य क्षेत्रसे रामेश्वरक्षेत्रमें जाकर मुनियोंके बताये अनुसार वहाँ उन अस्थियोंको डाल दिया और वहीं रहकर एक वर्ष पूरा होनेतक सब श्राद्ध आदि कार्य सम्पन्न किये। वर्षभर निवास करनेके पश्चात् एक दिन जांगल मुनिने रातको सपनेमें अपने माता-पिताको देखा। उन दोनोंने अपने-अपने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा आदि धारण कर रखे थे। दोनों ही पद्ममाला और तुलसीकी मालासे विभूषित हो गरुड़की पीठपर बैठे थे। उनके कानोंमें मकराकृति कुण्डल झिलमिला रहे थे, कौस्तुभमणि उनके वक्षःस्थलको अलंकृत कर रही थी और वे दोनों पीत वस्त्र धारण करके अतिशय शोभा पा रहे थे। मुनिपुत्रने इस प्रकारकी झाँकीमें माता-पिताका दर्शन करके मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। तदनन्तर जांगल मुनि पुनः अपने आश्रमपर आकर सुखपूर्वक रहने लगे। उन्होंने माता-पिताके विषयमें सपनेमें देखा हुआ वृत्तान्त वहाँके सब ब्राह्मणोंको बड़ी प्रसन्नताके साथ सुनाया। सुनकर वे सब मुनि बड़े प्रसन्न हुए।

इधर जांगलको अन्त्येष्टि संस्कारका आदेश देनेके पश्चात् राजा शंकरकी ओर देखकर उन सभी महर्षियोंने उस समय बड़ा क्रोध किया। वे उन्हें कोसते हुए बोले—'महामूर्ख पाण्ड्यनरेश! तूने क्रूरतावश ब्राह्मणकी हत्या की है, तुझे स्त्रीहत्या और ब्रह्महत्याका पाप लगा है। अतः तू प्रज्वलित अग्निमें जलकर अपने शरीरका त्याग कर दे। अन्यथा सैकड़ों प्रायश्चित्त करनेपर भी तेरी शुद्धि न होगी। तेरे साथ वार्तालाप करनेमात्रसे दूसरोंको भारी पाप लगेगा।' मुनियोंके ऐसा कहनेपर राजा शंकरने कहा—'महात्माओ! ऐसा ही हो। मैं ब्रह्महत्याकी शुद्धिके लिये आपके समीप प्रज्वलित अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दूँगा। आपलोग मुझपर अनुग्रह करें, जिससे शरीर त्याग देनेपर मेरा यह पातक नष्ट हो जाय।' सब मुनियोंसे ऐसा कहकर पाण्ड्यनरेशने अपने मन्त्रियोंको बुलाकर कहा—'सचिवगण! मैंने अनजानमें ब्रह्महत्या तथा क्रूरतापूर्ण स्त्रीहत्या कर डाली है, जो महानरक प्रदान करनेवाली है। इस पातककी शुद्धिके लिये मैं बड़ी-बड़ी


* मृतानां बान्धवा ये तु मुञ्चन्त्यश्रूणि भूतले। पिबन्त्यश्रूणि तान्यद्धा मृताः प्रेताः परत्र वै॥ (स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ४८। ४२)

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५८७

लपटोंवाली प्रज्वलित अग्निमें मुनियोंकी आज्ञासे अपने शरीरको त्याग दूँगा। तुम जल्दी काष्ठ ले आओ और उसके द्वारा अग्निको प्रज्वलित करो। मेरे पुत्र सुरुचिको शीघ्र ही राज्यसिंहासनपर बिठा दो।'

राजाके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मन्त्रीलोग रोने लगे और बोले—पाण्ड्यनाथ! महाराज! आप तो शत्रुओंपर भी स्नेह रखनेवाले हैं। हम सबको आपने सदा पुत्रकी भाँति पाला है। हम आपके बिना देवपुरीके समान सुन्दर अपनी राजधानीमें प्रवेश नहीं करेंगे। हम भी आपके साथ महाकाष्ठोंद्वारा प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर जायँगे।

मन्त्रियोंका प्रलाप सुनकर पाण्ड्यनरेश शंकरने उन्हें समझाते हुए कहा—'मन्त्रियो! मुझ महापातकी राजाको लेकर क्या करोगे? अग्निमें प्रवेश करनेके लिये शीघ्र काष्ठ एकत्रित करो। उनके ऐसा कहनेपर मन्त्रीलोग शीघ्र काष्ठ ले आये। राजा शंकरने देखा, काष्ठोंद्वारा अग्नि प्रज्वलित हो चुकी है। तब उन्होंने स्नान और आचमन करके शुद्धचित्त हो मुनियोंके समीप उस अग्निकी परिक्रमा की। फिर उन मुनियोंकी भी परिक्रमा करके अग्नि और मुनि दोनोंको प्रणाम किया। उसके बाद भगवान् शंकरका ध्यान करके राजा धैर्यपूर्वक ज्यों ही अग्निमें गिरनेको तैयार हुए, त्यों ही सब ऋषि-मुनियोंके सुनते-सुनते आकाशवाणी हुई—'राजा शंकर! तुम अभी अग्निमें प्रवेश न करो। महामते! तुम्हें ब्रह्महत्याके कारण भय नहीं होना चाहिये। दक्षिण समुद्रके किनारे गन्धमादन पर्वतपर महापातकोंका नाश करनेवाले परम पुण्यमय रामसेतुमें श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा स्थापित जो रामेश्वर नामक शिवलिंग है, उसकी एक वर्षतक तीनों समय भक्तिपूर्वक सेवा करो। भगवान् रामेश्वरकी परिक्रमापूर्वक उन्हें नमस्कार करो, उनका महाभिषेक करो और प्रतिदिन नाना प्रकारका नैवेद्य निवेदन करो। चन्दन, अगर और कपूरके द्वारा श्रीरामलिंगकी पूजा करो। दो भार गायके घीसे भगवान्‌का अभिषेक कराओ। प्रतिदिन दो भार गोदुग्धसे और एक द्रोण शहदसे उस शिवलिंगको नहलाओ। नित्यप्रति खीरसे भगवान्‌को नैवेद्य लगाओ तथा रोज-रोज रातमें तिलके तेलसे दीपक जलाकर दीपदानद्वारा आराधना करो। महाराज! रामेश्वर शिवकी इस प्रकार उपासना करनेसे तुम्हारी स्त्रीहत्या और ब्रह्महत्या तत्काल नष्ट हो जायगी। तुम शीघ्र रामसेतुपर जाओ और निरन्तर रामेश्वरका भजन करो। इस कार्यमें विलम्ब न करो।'

वह आकाशवाणी सुनकर सब ऋषि राजाको जल्दी जानेकी प्रेरणा देने लगे—महाराज! मोक्षदायक रामसेतुपर शीघ्र जाओ। हमने भगवान् रामेश्वरके माहात्म्यको न जाननेके कारण ही आपको प्रज्वलित अग्निमें देह त्याग करनेकी सलाह दी थी। मुनीश्वरोंकी ऐसी आज्ञा पाकर महाराज शंकरने चतुरंगिणी सेना तो नगरमें भेज दी और स्वयं हर्षयुक्त चित्तसे महर्षियोंको नमस्कार करके कुछ इने-गिने सैनिकोंके साथ बहुत धन लेकर भगवान् रामेश्वरकी सेवाके लिये गन्धमादन पर्वतपर गये तथा वहाँ शुद्धिदायक रामसेतुपर उन्होंने एक वर्षतक निवास किया। राजा एक समय भोजन करते और क्रोध एवं इन्द्रियसमूहको वशमें रखते थे। वे तीनों समय भक्तिपूर्वक भगवान् रामेश्वरकी सेवा करते हुए उन्हें प्रतिदिन दस भार धन भेंट करते थे। उन्होंने नित्यप्रति भगवान् रामेश्वरकी महापूजा करवायी। प्रतिदिन धनुष्कोटिमें भक्तिपूर्वक स्नान और प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको अन्नदान किया। आकाशवाणीने जैसा बताया था, उसके अनुसार सब पूजन किया। इस प्रकार एक वर्ष पूरा होनेपर राजा शंकरने सन्तुष्टचित्त हो दयानिधान भगवान् रामेश्वरका इस प्रकार स्तवन किया—'मैं सबके ईश्वर रुद्रको नमस्कार करता हूँ। रामेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् उमापतिको

५८८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्रणाम करता हूँ। देव! कृपया मेरी रक्षा कीजिये और मेरी ब्रह्महत्याको शीघ्र जला डालिये। त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले महादेव! आप कालकूट विषको भक्षण करनेवाले हैं। दयासिन्धो! आप मेरी रक्षा करें और मुझे स्त्रीहत्यारूपी पापसे छुड़ावें। गंगाधर! विरूपाक्ष! रामनाथ! त्रिलोचन! प्रभो! आप अपनी कृपादृष्टिसे मेरा पालन कीजिये। विभो! मेरा पातक नष्ट कर दीजिये। कामारे! आप भक्तोंकी मनोवांछित कामनाओंको देनेवाले हैं। रामेश्वर! मुझपर कृपाकटाक्ष कीजिये। धूर्जटे! मुझे शुद्ध बना लीजिये। मार्कण्डेयजीको भयसे बचानेवाले मृत्युंजय! आप अविनाशी शिव हैं, भगवती गिरिराजनन्दिनी आपके आधे अंगमें निवास करती हैं, आपको नमस्कार है। आप मुझे पापरहित कीजिये। रुद्राक्षकी मालासे विभूषित चन्द्रशेखर भगवान् शंकर! आप मुझे वैदिक सदाचारके योग्य बना दीजिये, आपको नमस्कार है। रामेश्वरदेवको नमस्कार है। आप मुझे शुद्धि देनेवाले हों। जो आनन्दस्वरूप और सच्चिदानन्दघन हैं, उन रामेश्वर शिवको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। मेरा पातक नष्ट हो जाय।'

इस प्रकार रामेश्वर महादेवकी भक्तिपूर्वक स्तुति करते हुए राजा शंकरके मुखसे अत्यन्त भयानक ब्रह्महत्या निकली, जो नील वस्त्र धारण करनेवाली और अत्यन्त क्रूर थी। उसके सिरके बाल रक्तकी भाँति लाल थे। राजाके मुखसे निकली हुई उस बीभत्स ब्रह्महत्याको भगवान् शंकरकी आज्ञासे भैरवने त्रिशूलसे मार डाला। तब भगवान् रामेश्वरने राजासे कहा—'पाण्ड्यनरेश! महाराज! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर तुम्हें वर देना चाहता हूँ, तुम कोई मनोवांछित वर माँगो। स्त्रीहत्या और ब्रह्महत्यासे जो तुम्हें दोष लगा था, वह निकल गया। अब तुम शुद्ध हो, निष्पाप हो, पूर्ववत् अपने राज्यका पालन करो। राजन्! मेरी सेवा करनेवाले मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेते। वे मेरे सायुज्य मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं। जो मानव इस स्तोत्रद्वारा भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करेंगे, उनके महापातकोंकी राशिको मैं अवश्य नष्ट कर दूँगा। अब तुम इच्छानुसार वर माँगो।'

राजा बोले—महेश्वर! मैं आपके दर्शनमात्रसे ही कृतार्थ हो गया हूँ। इस समय मुझे इससे बढ़कर माँगने योग्य कोई वस्तु नहीं प्रतीत होती। आपके दोनों चरणकमलोंमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे।

'तथास्तु' कहकर भगवान् रामेश्वरने राजापर अनुग्रह किया और वे पुनः उसी शिवलिंगमें अन्तर्धान हो गये। भगवान् रामेश्वरकी कृपा प्राप्त करके राजा भी कृतार्थ हो गये और उन्हें प्रणाम करके अपनी पुरीको चले गये। उन्होंने वनवासी मुनियोंको यह वृत्तान्त बतलाया। तब उन मुनियोंने प्रसन्नचित्त होकर राजाको पुनः उनके राज्यपर अभिषिक्त किया। तदनन्तर अन्तकाल आनेपर राजाने रामेश्वर शिवका ध्यान करते हुए देहका त्याग किया और भगवान् रामेश्वरके सायुज्य मोक्षको प्राप्त कर लिया।


राजा पुण्यनिधिके यहाँ महालक्ष्मीका पुत्रीके रूपमें निवास एवं सेतुमाधवकी महिमा

श्रीसूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें चन्द्रवंशी राजा पुण्यनिधि मथुरा नामक पुरीका पालन करते थे। किसी समय राजा पुण्यनिधि मथुरामें अपने पुत्रका राज्याभिषेक करके अन्तःपुरकी रानियोंके साथ स्नानके लिये उत्सुक हो रामसेतु नामक तीर्थमें गये। उनके साथ उनकी चतुरंगिणी सेना भी थी। वहाँ धनुष्कोटिमें संकल्पपूर्वक स्नान करके उन नृपश्रेष्ठने वहाँके अन्य तीर्थोंमें

* ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य *

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भी स्नान किया और भक्तिपूर्वक भगवान् रामेश्वरकी सेवा की। इस प्रकार उन्होंने बहुत कालतक उसी तीर्थमें सुखपूर्वक निवास किया। वहाँ रहते हुए राजा पुण्यनिधिने किसी समय भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला एक यज्ञ किया। यज्ञ पूर्ण होनेपर वे अपनी स्त्री तथा परिवारके लोगोंके साथ अवभृथ स्नानके लिये श्रीरामचन्द्रजीकी धनुष्कोटिमें गये और वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया।

इस प्रकार राजा पुण्यनिधि जब उस तीर्थमें निवास करते थे, उसी समय एक दिन राजाकी भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णुने लक्ष्मीजीको भेजा। वे आठ वर्षकी सुन्दरी बालिका होकर गन्धमादन पर्वतपर गयीं। उस समय राजा पुण्यनिधि धनुष्कोटिमें स्नान करनेके लिये गये थे। वहाँ स्नान करके पुण्यकर्म करनेके पश्चात् राजाने अलौकिक रूप-सौन्दर्यसे सुशोभित एक अष्टवर्षीया कन्या देखी। उसे देखकर पुण्यनिधिने पूछा—'बेटी! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन है?' राजाके इस प्रकार पूछनेपर कन्याने कहा—'महाराज! मेरे न माता हैं, न पिता हैं और न कोई भाई-बन्धु हैं। मैं अनाथ हूँ। मैं आपकी पुत्री होकर रहना चाहती हूँ। आपको पिताके रूपमें देखती हुई सदा आपके घरमें निवास करूँगी। परन्तु मेरी एक शर्त है, 'जो मुझे हाथसे पकड़े अथवा हठपूर्वक खींचकर ले जाय, उसको यदि आप दण्ड दें, तभी मैं आपके घरमें आपकी पुत्री होकर चिरकालतक निवास करूँगी।' कन्याके ऐसा कहनेपर राजा पुण्यनिधि बोले—'शुभे! मैं तुम्हारी कही हुई सब बातें मानूँगा। मेरे भी कोई पुत्री नहीं है। एक ही वंशधर पुत्र है। भद्रे! जिसके प्रति तुम्हारा अनुराग होगा, उसे ही तुम्हें समर्पित करूँगा। बेटी! आओ मेरे घर चलो और मेरी पत्नीकी पुत्री होकर अन्तःपुरमें स्वेच्छानुसार निवास करो।'

'बहुत अच्छा' कहकर वह कन्या राजाके साथ उनके घर गयी। राजाने अपनी पत्नीके हाथमें उस कल्याणमयी कन्याको सौंप दिया। रानीका नाम विन्ध्यावली था। राजाने उनसे कहा—'देवि! यह हम दोनोंकी पुत्री है। इसकी दूसरे पुरुषोंसे सर्वथा रक्षा करो।' विन्ध्यावलीने राजाकी आज्ञा शिरोधार्य की और उस कन्याको हाथमें ले लिया। राजाके द्वारा कन्याका पुत्रकी भाँति पालन-पोषण होने लगा। वह लाड़-प्यार और सुखसे राजभवनमें रहने लगी। तदनन्तर जगदीश्वर भगवान् विष्णु अपनी लक्ष्मीको ढूँढ़नेके लिये वैकुण्ठसे निकले और रामसेतुपर गये। वहाँ सब ओर भ्रमण करते रहे। इसी समय फूल तोड़नेके कौतूहलसे वह कन्या सखियोंके सहित राजाके गृहोद्यानमें गयी और वृक्षोंसे फूल चुनने लगी। तब भगवान् विष्णु ब्राह्मणका रूप धारण करके वहीं आकर खड़े हो गये। ब्राह्मणको सहसा वहाँ आया देख वह कन्या ठिठककर खड़ी रह गयी। उस मधुरभाषिणी कन्याको देखकर उस द्विजने शीघ्रतापूर्वक उसका हाथ पकड़ लिया। यह देख वह कन्या अपनी सखियोंके साथ उस उपवनमें चिल्लाने लगी। उसकी चिल्लाहट सुनकर राजा पुण्यनिधि वहाँ आ गये। वहाँ राजाने उस कन्या और उसकी सखियोंसे पूछा—'बेटी! तुम इस समय अपनी सखियोंके साथ क्यों चिल्ला उठी थी?'

कन्या बोली—पाण्ड्यनाथ! इस ब्राह्मणने हठपूर्वक मेरा हाथ पकड़ लिया था। तात! यहीं उस वृक्षके नीचे वह निर्भय होकर खड़ा है। राजा परम बुद्धिमान् और सद्गुणोंके निधान थे। उन्होंने उस ब्राह्मणका यथार्थ बल न जानते हुए उसे हठात् पकड़ लिया और रामेश्वर मन्दिरमें ले जाकर वहाँ पैरोंमें बेड़ी डाल और हाथोंमें रस्सीसे बाँधकर पुनः उसे मण्डपमें ले आये। अपनी पुत्रीको आश्वासन देकर राजाने अन्तःपुरमें भेज दिया और स्वयं भी परम सुन्दर भवनमें

[चित्र विवरण / शीर्षिकाएँ:]

राजाके द्वारा ब्राह्मणको बन्दी बनाया जाना


ब्राह्मणके द्वारा राजकन्याका हाथ पकड़ा जाना

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * | ५९१ ---|---

जाकर शयन किया। सोते समय उन्होंने स्वप्नमें उस ब्राह्मणको देखा। वह शंख, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे विभूषित था। उसके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिका आभूषण शोभा पा रहा था। ब्राह्मणके रूपमें साक्षात् श्रीहरि विराजमान थे। उन्होंने अपने श्रीअंगोंमें पीताम्बर धारण किया था। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति कृष्ण मेघके समान श्याम थी, मुखपर मनोहर मुसकानकी मनोहर छटा छा रही थी और स्वच्छ दन्तपंक्ति चमक रही थी। कानोंमें मकराकृति कुण्डल शोभायमान थे। विष्वक्सेन आदि पार्षद उनकी सेवामें उपस्थित थे। भगवान् शेषशय्यापर लेटे हुए थे और नारद आदि देवर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे। वहीं उन्होंने अपनी कन्याको भी देखा, जो विकसित कमलके आसनपर विराजमान थी। वह कन्या नहीं, साक्षात् लक्ष्मी थीं। उन्होंने अपने हाथमें कमल धारण कर रखा था और उनके मस्तकपर काले-काले घुँघराले बाल बड़ी शोभा पा रहे थे। इस प्रकार राजाने रात्रिमें अपनी कन्याको महालक्ष्मीके स्वरूपमें देखा। यह देखकर राजा सहसा उठ बैठे और कन्याके घरमें गये। वहाँ उन्होंने कन्याको उसी रूपमें देखा, जैसे स्वप्नमें उसका दर्शन हुआ था। प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर राजा पुण्यनिधि कन्याको साथ ले रामेश्वरमन्दिरमें पहुँचे और उस श्रेष्ठ मण्डपमें गये, जहाँ ब्राह्मणको रख छोड़ा था। वहाँ ब्राह्मण देवताको उन्होंने साक्षात् श्रीहरिके रूपमें देखा, ठीक उसी रूपमें, जैसा कि स्वप्नमें दर्शन हुआ था। वनमाला आदि चिह्नोंसे पहचाने जानेवाले भगवान् विष्णुको जानकर राजाने उनकी इस प्रकार स्तुति की—'कमलाकान्त! आपको नमस्कार है। गरुड़ध्वज! आप प्रसन्न होइये। शाङ्गिपाणे! आपको नमस्कार है, आप मेरा अपराध क्षमा करें। आप निर्गुण, अप्रमेय तथा बुद्धिके साक्षी विष्णु हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाले परमात्मा श्रीनिवासको नमस्कार है। कृपामूर्ते! आपके लिये नमस्कार है। मधुसूदन! आप मेरा यह अपराध क्षमा करें।'

इस प्रकार महाविष्णुकी स्तुति करके राजा पुण्यनिधिने सम्पूर्ण जीवोंकी जननी श्रीलक्ष्मीजीका भी स्तवन किया—'सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाली देवि! आपको नमस्कार है। आप भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें निवास करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। समुद्रसे प्रकट हुई हरिप्रिया महालक्ष्मी! आपको नमस्कार है। आप ही सिद्धि, पुष्टि, स्वधा, स्वाहा, सन्ध्या, प्रभा, धात्री, भूति, श्रद्धा, मेधा और सरस्वती हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। देवेश्वरि! आप ही यज्ञविद्या, महाविद्या, अतिशय शोभामयी गुह्यविद्या, आत्मविद्या तथा सब प्राणियोंको मुक्ति देनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। संसारकी रक्षा करनेवाली जगदम्बिके! आप अपनी दयादृष्टिसे मेरी रक्षा करें। महेश्वरि! आप ब्रह्माजीकी माता हैं, आपको नमस्कार है।'

महालक्ष्मीकी इस प्रकार स्तुति करके राजाने पुनः भगवान् विष्णुसे इस प्रकार प्रार्थना की—विष्णो! मैंने अज्ञानवश आपके पैरोंमें बेड़ी डालकर जो इस समय आपके प्रति अपराध किया है, वह स्पष्ट ही द्रोह है आप उसे क्षमा करें। मधुसूदन! आप सम्पूर्ण जगत्‌के पिता हैं, पिताको पुत्रका अपराध क्षमा करना चाहिये। आपने अपराधी दैत्योंको अपना स्वरूपतक दे डाला है। भगवन्! मेरे भी इस अपराधको आप क्षमा करें। कृपानिधे! मारनेके लिये आयी हुई पूतनाको भी आपने अपने चरण-कमलोंमें स्थान दिया है, मेरी भी रक्षा कीजिये। लक्ष्मीकान्त! केशव! मुझपर अपनी कृपापूर्ण दृष्टि डालिये।

राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् विष्णुने कहा—राजन्! मुझे बन्धनमें डालनेके कारण जो तुमको भय हो रहा है, उसे त्याग दो। तुमने इस तीर्थमें मेरी प्रसन्नताके लिये यज्ञ किया है। अतः तुम मेरे प्रिय भक्त हो। शत्रुदमन! मैं भक्तोंके अपराध सदा ही क्षमा करता हूँ। तुम्हारी भक्ति जाननेके लिये मेरी

राजाको स्वप्नमें भगवान्‌के दर्शन


राजाके द्वारा लक्ष्मीनारायणका स्तवन

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५९३

ही प्रेरणासे मेरी प्रिया लक्ष्मी तुम्हारे घर आयी थीं और तुमने इनका भलीभाँति संरक्षण किया है। अतः मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। संसारमें जो पुरुष मेरी स्वरूपभूता इन महालक्ष्मीमें भक्ति रखता है, वह मेरा भक्त कहलाता है और जो इनसे विमुख है, वह मेरा द्वेषपात्र माना गया है। तुमने भक्तिपूर्वक इनका पूजन किया है, अतः तुम्हारे द्वारा मेरी भी पूजा सम्पन्न हो गयी; क्योंकि ये लक्ष्मी मुझसे अभिन्न हैं। इसलिये तुमने मेरा अपराध नहीं, पूजन ही किया है। मेरी स्वरूपभूता लक्ष्मी सम्पूर्ण जगत्की माता तथा वेदत्रयीरूपा हैं। उनकी रक्षा करते हुए जो तुमने मुझे बन्धनमें डाला है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। ये लक्ष्मी वास्तवमें तुम्हारी पुत्री हैं।

भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेके पश्चात् लक्ष्मीने भी कहा—राजन् ! तुमने अपने घरमें मेरी रक्षा की, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारी भक्तिका शोधन करनेके लिये ही मैं और भगवान् दोनों यहाँ आये हैं। तुम्हारे मनःसंयमरूप योग और भक्तिभावसे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हम दोनोंकी कृपासे तुम्हें सदा सुखकी प्राप्ति होगी। हमारे चरणोंमें तुम्हारी अविचल भक्ति बनी रहेगी और देहावसान होनेपर तुम्हें पुनरावृत्तिरहित मेरा सायुज्य मोक्ष प्राप्त होगा। भगवान् विष्णुकी भक्तिसे युक्त तुम्हारी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहेगी।

तदनन्तर भगवान् विष्णुने पुनः इस प्रकार कहा—नृपश्रेष्ठ! तुमने जिस प्रकार मुझे यहाँ बेड़ीसे बाँधा है, उसी रूपसे मैं इस मण्डपमें निवास करूँगा। 'सेतुमाधव' के नामसे यहाँ मेरी प्रसिद्धि होगी। जो मनुष्य यहाँ मुझ सेतुमाधवकी सेवा करेंगे, वे सम्पूर्ण मनोरथों और अन्तमें सायुज्य मोक्षको भी प्राप्त होंगे। तुम्हारे द्वारा किये हुए मेरे तथा लक्ष्मीजीके स्तोत्रको जो प्रसन्नतापूर्वक पढ़ेंगे, सुनेंगे और लिखेंगे, उनकी मेरे परमधामसे कभी पुनरावृत्ति नहीं होगी। राजा पुण्यनिधिसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु सदा पूर्णरूपसे वहाँ निवास करने लगे हैं। राजाने सेतुमाधवरूपी भगवान् विष्णुको प्रणाम करके भक्तिभावसे उनकी महापूजा की और श्रीरामेश्वरका सेवन करके अपने घरको प्रस्थान किया। मथुरामें उन्होंने अपने पुत्रको राजा बना दिया और स्वयं जीवनभर उस परम उत्तम सेतुतीर्थमें निवास किया। देहावसान होनेपर राजाने मोक्ष प्राप्त कर लिया। उनकी पत्नी विन्ध्यावली भी उन्हींके साथ मृत्युको प्राप्त हुई। उस पतिव्रताने भी पतिके साथ उत्तम गति प्राप्त कर ली।

जो सेतुतीर्थमें भक्तिपूर्वक प्रतिदिन सेतुमाधवका दर्शन करते हैं, उनकी कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो सेतुतीर्थकी रेणुका लेकर गंगाजीमें डालता है, वह मृत्युके पश्चात् भगवान् विष्णुके वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जो गंगाजीका जल लाकर भगवान् रामेश्वरको स्नान कराता और उसके भारको सेतुतीर्थमें रखता है, वह निश्चय ही परब्रह्मको प्राप्त होता है। ब्राह्मणो ! इस प्रकार तुमसे भगवान् सेतुमाधवकी महिमाका वर्णन किया गया।


५९४ संक्षिप्त स्कन्दपुराण


सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम

सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! अब मैं सेतुतीर्थकी यात्राका क्रम बतलाता हूँ, जिसे सुनकर मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। श्रेष्ठ बुद्धिवाला पुरुष स्नान और आचमन करके विशुद्धचित्त हो नित्यकर्म पूरा कर ले। उसके बाद भगवान् रामेश्वर शिव तथा राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन करावे। फिर सब अंगोंमें भस्म धारण करके मस्तकमें त्रिपुण्ड्र अथवा गोपीचन्दनसे तिलक करे। रुद्राक्षकी माला धारण करके हाथमें पवित्री पहन ले और पवित्रतापूर्वक यह संकल्प करे कि 'मैं सेतुतीर्थकी यात्रा करूँगा।' तत्पश्चात् भक्तिभावसे अष्टाक्षर मन्त्रका जप करते हुए मौनावलम्बनपूर्वक अपने घरसे निकले। अथवा शिवजीका पंचाक्षर नाममन्त्र जपता रहे। मनको वशमें रखे। प्रतिदिन एक बार हविष्यान्न भोजन करे। क्रोध और इन्द्रियोंको काबूमें रखे। जूता, खड़ाऊँ अथवा छाता न धारण करे। पान न खाये। तेल न लगावे। स्त्री-प्रसंग आदिसे बचकर रहे। शौच-सन्तोष आदि नियमोंके तथा सदाचारके पालनमें तत्पर रहे। समयपर सन्ध्योपासना करे। तीनों समय गायत्रीकी उपासना और श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करता रहे। मार्गमें सेतुतीर्थकी महिमाका प्रतिदिन आदरपूर्वक पाठ करे अथवा रामायण या किसी अन्य पुराणका पाठ करे। व्यर्थकी बातें छोड़कर सेतुतीर्थकी यात्रा करे। आत्मशुद्धिके लिये प्रतिग्रह न स्वीकार करे। सदाचारको न छोड़े। मार्गमें शिव-विष्णु आदिकी पूजा तथा बलिवैश्वदेवादि कर्म करता रहे। ब्रह्मयज्ञ आदि धर्म, अग्निहोत्र कर्म तथा शक्तिके अनुसार अतिथियोंको अन्न-पान आदिका दान करे। रास्तेमें भगवान् शिव और विष्णु आदिके नाम जपे तथा उनके स्तोत्रोंका पाठ करे। निषिद्ध कर्मोंको सर्वथा त्याग दे और सदा धर्मका ही आचरण करे। इस प्रकारके नियमोंका पालन करते हुए पहले सेतुमूल स्थानको जाय। वहाँ एकाग्रचित्त हो समुद्रका आवाहन करके उसे प्रणाम करे। तदनन्तर समुद्रके लिये अर्घ्य दे। अर्घ्यके पश्चात् भगवान्‌से आज्ञा लेकर समुद्रमें स्नान करे। मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते हुए मुनि, देवता, वानर और पितरोंके लिये तर्पण करे।

समुद्रको प्रणाम करनेका मन्त्र

नमस्ते विश्वगुप्ताय नमो विष्णो ह्यपाम्पते।
नमो हिरण्यशृङ्गाय नदीनां पतये नमः ॥

'विश्वमें गुप्तस्वरूपसे व्यापक एवं जलोंके स्वामी श्रीविष्णुदेव*! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हिरण्यमय शृंगसे सुशोभित नदीपति सागर! आपको नमस्कार है।'

अर्घ्यदानका मन्त्र

सर्वरत्नमयः श्रीमान् सर्वरत्नाकराकर।
सर्वरत्नप्रधानस्त्वं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥

'सब रत्नोंके आकर महासागर! तुम सर्वरत्नमय एवं श्रीसम्पन्न हो। तुम्हीं सब रत्नोंमें प्रधान हो। मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार करो।'

भगवान्‌से आज्ञा लेनेका मन्त्र

अशेषजगदाधार शंखचक्रगदाधर।
देहि देव ममानुज्ञां युष्मत्तीर्थनिषेवणे ॥

'सम्पूर्ण जगत्‌के आधार शंख-चक्र-गदाधारी नारायण! अपने तीर्थका सेवन करनेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये।'

सेतुकी पूर्व दिशामें सुग्रीवका, दक्षिणमें नलका, पश्चिममें मयन्दका, उत्तरमें द्विविदका और मध्यमें श्रीराम, लक्ष्मण, यशस्विनी सीता, अंगद, वायुपुत्र


* 'सरसामस्मि सागरः' इस भगवद्वचनके अनुसार समुद्र भगवान्‌की विभूति है। इसलिये उसे 'विष्णु' कहा गया है।

  • ब्राह्मखण्ड-सेतु-माहात्म्य * ५१५

हनुमान् तथा विभीषणका स्मरण करना चाहिये। ‘हिरण्यशृंगम्’ इत्यादि दो मन्त्रोंद्वारा नाभिमें भगवान् नारायणका स्मरण करे। स्नानादि कर्मोंमें भगवान् नारायणका चिन्तन करनेवाला पुरुष ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। वह इस संसारमें फिर जन्म नहीं लेता; उसके समस्त पापोंका भी प्रायश्चित्त हो जाता है। प्रह्लाद, नारद, व्यास, अम्बरीष, शुक तथा अन्यान्य भगवद्भक्तोंका एकाग्रचित्त होकर चिन्तन करना चाहिये।*

समुद्रमें स्नान करनेका मन्त्र

वेदादिर्यो वेदवसिष्ठयोनिः सरित्पतिः सागररत्नयोनिः।
अग्निश्च ते योनिरिडा च देहो रेतोधा विष्णोरमृतस्य नाभिः॥
इदं तेऽन्याभिरस्यमानमद्भिर्याः काश्च सिन्धुं प्रविशन्त्यापः।
सर्पो जीर्णामिव त्वचं जहामि पापं शरीरात्सशिरस्कोऽभ्युपेत्य॥

‘हे सागर! तुम वेदोंके आदि तथा वेद और वशिष्ठकी योनि हो, सरिताओंके स्वामी हो और सम्पूर्ण रत्नोंकी उत्पत्तिके स्थान हो। अग्नि तुम्हारा कारण तथा यज्ञ तुम्हारे शरीरका उपादान है। तुम भगवान् विष्णुके वीर्यको धारण करते हो। तुम अमृतकी नाभि हो। तुम्हारे जलसे तथा जो नदियाँ समुद्रमें प्रवेश करती हैं, उनसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य जलसे भी सिरसहित स्नान करके मैं अपने इस पापको शरीरसे उसी प्रकार त्याग देता हूँ, जैसे सर्प अपने पुराने केंचुलको त्याग देता है।’

इस प्रकार सेतुमें तीन बार स्नान करे। यदि मनुष्य देवीपत्तनसे प्रारम्भ करके सेतुकी यात्रा करे, तो नौ प्रस्तरोंके बीचसे मोक्षदायक सेतुमें अपनी पापराशिके निवारणके लिये समुद्र-स्नान करे और यदि दर्भशयनके मार्गसे मुक्तिदायक सेतुतीर्थमें जाय तो वहाँ समुद्रमें ही स्नान करे।

स्नानके पश्चात् पिप्पलाद, कवि, कण्व, कृतान्त, जीवितेश्वर, मन्यु, कालरात्रि, विद्या, अहः, गणेश्वर, वसिष्ठ, वामदेव, पराशर, उमापति, वाल्मीकि, नारद, वालखिल्य मुनिगण, नल, नील, गवाक्ष, गवय, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, शरभ, ऋषभ, सुग्रीव, हनुमान्, वेगदर्शन, राम, लक्ष्मण, महाभागा यशस्विनी सीता तथा विभु— इन सबके लिये चतुर्थ्यन्त नामोंका नमःसहित उच्चारण करके तर्पण करना चाहिये। जैसे ‘पिप्पलादाय नमः’, ‘कवये नमः’ इत्यादि। देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंको विधिपूर्वक क्रमशः अक्षत, यव, तिलयुक्त जलसे उनके द्वितीयान्त नामोंका उच्चारण करके तर्पण करे। यथा ‘ब्रह्माणं तर्पयामि, विष्णुं तर्पयामि’ इत्यादि। मनुष्य प्रसन्नचित्त हो हाथमें पवित्री धारण करके जलमें खड़ा होकर तर्पण करे। इस प्रकार तर्पण और नमस्कार करके जलसे बाहर निकले। भीगे वस्त्रको खोलकर सूखा वस्त्र पहन ले; फिर आचमन करके हाथमें पवित्री लिये हुए विधिपूर्वक श्राद्ध करे। तिल और चावलोंसे पितरोंको पिण्ड दे।

तदनन्तर चक्रतीर्थमें जाकर वहाँ भी स्नान करे और सेतुके अधिपति भगवान् श्रीनारायणका दर्शन करे। जो पश्चिम मार्गसे जाता हो, वह वहाँके चक्रतीर्थमें स्नान करके दर्भशय्यापर सोनेवाले भगवान्‌का भक्तिपूर्वक दर्शन करे। उसके बाद कपितीर्थमें स्नान करके सीताकुण्डमें गोता लगावे। तत्पश्चात् उत्तम फलवाले ऋणमोचनतीर्थमें स्नान करके वहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम करे। फिर लक्ष्मणतीर्थमें जाय और कण्ठसे ऊपर क्षौर कराकर अपने पापोंका चिन्तन करते हुए उसमें स्नान करे। इसके बाद रामतीर्थमें नहाकर देवालयमें जाय। पुनः पापविनाशनतीर्थमें नहाकर गंगा, यमुना, सावित्री, सरस्वती, गायत्री एवं हनुमत्कुण्डमें स्नान करके ब्रह्मकुण्डमें जाकर विधिपूर्वक स्नान करे। ब्रह्मकुण्डके बाद नागकुण्डमें जाकर स्नान


* प्रह्लादं नारदं व्यासमम्बरीषं शुकं तथा। अन्यांश्च भगवद्भक्तांश्चिन्तयेदेकमानसः॥ (स्क० पु०, ब्रा० से० मा० ५१। २९-३०)